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श्रीकृष्णका सायकालीन ध्यान
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भगवान् शिवजीका ताण्डव नृत्य
| श्रीहरिः || 1193.
सस्िप्
( सचित्र, मोटा टाइप, केवल हिन्दी )
गीताप्रेस, गोरर्रपुर
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प्रकाशक-गोजिन्दभवन-कार्यालय, गीतौप्रेस, गोरखपुर
सं° २०५७ प्रथम संस्करण ५,०००
मूल्य-एक सौ रुपये
मुद्रक-गीताप्रेस, गोरर्रपुर-- २७३००९५
पफोन : ( ०५९५९ ) २२२४७२९; फैक्स २३२६९९७
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॥ श्रीहरिः ॥
निवेदन
भारतीय संस्कृत-साहित्य अनन्त ज्ञान-गरिमासे परिपूर्णं है। उसके असीम ज्ञान-
सिन्धुसे उपलब्ध हुए पुराणोको अमूल्य रल्रराशिके रूपमे अत्यन्त सम्मान ओर
गौरवशाली स्थान प्राप्त हे। इसीलिये पुराणोके सेवन ८ श्रवण, अनुशीलन) को
अत्यधिक महत्त्व दिया गया हे।
गीताप्रेसने "कल्याण" के माध्यमसे विशेषाङ्कके रूपमे समय-समयपर अनेक
पुराणोंको जनहितमें प्रकाशित किया है। इन्हें सर्वजन-सुलभ करानेके उदेश्यसे
लागतसे भी कम मूल्यमे इनका केवल सरल हिन्दी-अनुवाद उपलब्ध किया गया।
पश्चात् श्रद्धालु पाठकोंकी मोगपर इधरमें कुछ वर्षसि इनका पुनरमुद्रण भी हआ है
ओर आगे भी इस क्रमको बनाये रखनेका विचार हेै।
"कल्याण'-वर्ष २८वेके विशेषाद्कके रूपमे ` नारद-विष्णुपुराणाङ्क'
( सन् ९९५४ ई० में ) प्रकाशित हुआ था। बादमें यह पुनरमुद्रित भी किया गया।
' नारदपुराण' तथा ' विष्णुपुराण" एकदहीमें संयुक्त होनेसे इसका कलेवर प्यपि
बड़ा ( लगभग आठ सौ पृष्टोंका ) था। फलस्वरूप इसका अध्ययन समयसाध्य ओर
पाठकोंके लिये असुविधाजनक था। अतः इसे ध्यानमें रखते हए प्रेमी पाठकोके
सुविधार्थं इसे अब अलग-अलग दो भागोमें प्रकाशित करनेका विचार किया गया
हे। तदनुसार यह केवल ` नारदपुराण ' आप सबकी सेवामें प्रस्तुत दै।
नारदपुराण ' में कल्याणकारी श्रेष्ठ विषयोंका उच्छेख हे। इसमें वेदोके छओं
अङ्को -( शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष ओर छन्द-शास्त्रो ) का विशद
वर्णन तथा भगवानूकी सकाम उपासनाका भी विस्तृत विवेचन हे। भगवान्की सकाम
आराधना भी उत्तम हे। सकाम उपासक धीरे-धीरे निष्काम भाव बननेपर भगवद्धक्तिके
उत्कर्षके वाद् अन्तम भगवत्प्रापि कर लेनेमें समर्थं हो जाता है। आशा दै आत्म-
कल्याणकामी पाठकों ओर सभी श्रद्धालु, जिज्ञासुजनोके लिये प्रस्तुत इस
` नारदपुराण ' का अध्ययन विशेष उपयोगी सिद्ध होगा।
अतः सभी भगवत्प्रेमी महानुभावं ओर श्रद्धालु पाठकोसे हमारा विनप्र निवेदन
हे कि इसके अधिकाधिक अध्ययनसे विषटोष पारमार्थिक लाभ उठाना चाहिये।
-- प्रक श्वक्छ
८ (1 {090 #
((-0. 1/८1111(4/5511॥ 8118811 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
विषय
पूर्वभाग
प्रथम पाद
१- सिद्धाश्रममे शोनकादि महर्षियोका सूतजीसे
प्रश्र तथा सूतजीके द्वारा नारदपुराणको महिमा
ओर विष्णुभक्तिके माहात्म्यका वर्णन ........
२- नारदजीद्वारा भगवान् विष्णुको स्तुति.........
३- सृष्टिक्रमका संक्षिप्त वर्णन; द्वीप, समुद्र ओर
भारतवर्षका वर्णन, भारतम सत्कमनुष्ठानको
महत्ता तथा भगवदर्पणपूर्वक कर्म करकी आज्ञा
४- श्रद्धा-भक्ति, वणाश्रमोचित आचार तथा सत्सद्की
महिमा, मृकण्डु मुनिको तपस्यासे संतुष्ट होकर
भगवान्का मुनिको दर्शन तथा वरदान देना
५- मार्कण्डयजीको पिताका उपदेश, समय-
निरूपण, मार्कण्डेयद्वारा भगवान्को स्तुति
ओर भगवान्का मार्कण्डेयजीको भगवद्धक्तकि
लक्षण बताकर वरदान देना...
६- गद्खा-यमुना-संगम, प्रयाग, काशी तथा गद्खा
एवं गायत्रीको महिमा...
७- असूया-दोषके कारण राजा बाहुको अवनति
ओर पराजय तथा उनकी मृत्युके बाद रानीका
ओर्व मुनिके आश्रममें रहना...
८- सगरका जन्म तथा शत्नु-विजय, कपिलके
क्रोधसे सगर-पुत्रोका विनाश तथा भगीरथ-
द्वारा लायी हुई गङ्खाजीके स्पर्शसे उन
सबका्वदा 6०
९- बलिके द्वारा देवताओंकी पराजय तथा
अदितिको तपस्या
॥ श्रीहरिः ॥
(विषय-सूची ,
पृष्-संख्या
१२
१८
२२
२६
विषय
पृष्ट-संख्या
१०- अदितिको भगवदर्शन ओर वरप्राति,
वामनजीका अवतार, बलि-वामन-संवाद,
भगवान्का तीन पैरसे समस्त ब्रह्याण्डको
लेकर बलिको रसातल भेजना ...............
११-दानका पात्र, निष्फल दान, उत्तम-मध्यम-
अधम दान, धर्मराज-भगीरथ- संवाद, ब्राह्मणको
जीविका-दानका माहात्म्य तथा तडाग-निर्माण-
जनित पुण्यके विषयमे राजा वीरभद्रको कथा
१२-तडाग ओर तुलसी आदिक महिमा, भगवान्
विष्णु ओर शिवके स्रान-पूजनका महत्त्व
एवं विविध दानो तथा देवमन्दिरमे सेवा
करनेका.माहात्म्य् ०
१३- विविध प्रायश्चत्तका वर्णन, इष्टापूर्तका
फल ओर सूतक, श्राद्ध तथा तर्पणका
१४- पापिर्योको प्राप्त होनेवाली नरकोको यातनाओंका
वर्णन, भगवद्भक्तिका निरूपण तथा धर्मराजके
उपदेशसे भगीरथका गङ्गाजीको लानेके
नियोग
१५- राजा भगीरथका भृगुजीके आश्रमपर जाकर
सत्सङ्क-लाभ करना तथा हिमालयपर घोर
तपस्या करके भगवान् विष्णु ओर
शिवकी कृपासे गद्धाजीको लाकर पितरोका
१६- मार्गशीर्ष माससे लेकर कार्तिक मासपर्यन्त
उद्यापनसहित शुक्लपक्षके द्वादशी-त्रतका
((-0. 1/८1114<5111 81188 \/81811851 (01661101. 01411260 0 68110011
२५७
॥.2.
४९
५२
५५८
६६
(२)
विषय पृषएट-संख्या
१७- मार्गशीर्प-पूर्णिमासे आरम्भ होनेवाले लक्ष्मी-
नारायण-तव्रतको उद्यापनसहित॒ विधि
ओर-महिमा ७८
१८- श्रीविष्णुमन्दिरमे ध्वजारोपणकी विधि ओर महिमा. ८०
१९- हरिपञ्चक-तव्रतको विधि ओर माहात्म्य... ८९
२०- मासोपवास-त्रतको विधि ओर महिमा ...... ८४
२१- एकादशी-त्रतकी विधि ओर महिमा-भद्रशील-
की कथा त ८५
२२- चारों वर्णो ओर द्विजका परिचय तथा विभिन्न
वणेकि विशेष ओर सामान्य धर्मका वर्णन ९०
२३- संस्कारेके नियत काल, त्रह्मचारोके धर्म अनध्याय
तथा वेदाध्ययनको आवश्यकताका वर्णन.. ९१
२४- विवाहके योग्य कन्या, विवाहके आठ भेद
तथा गृहस्थोचित शष्टाचारका वर्णन ......... ९
२५- गृहस्थ-सम्बन्धी शोचाचार, सान, संध्योपासन
आदि तथा वानप्रस्थ ओर संन्यास-
आश्रमके धर्म न ९६
२६- श्राद्धको विधि तथा उसके विषयमे अनेक
ज्ञातव्य विषयोंका वर्णन... १०३
२७- त्रत, दान ओर श्राद्ध आदिके लिये तिधि्योका
निर्णय क 2 १०८
२८- विविध पापोके प्राय्चित्तका विधान तथा
भगवान् विष्णुके आराधनको महिमा ....... ११०
२९- यमलोकके मागमे पापियोके कष्ट तथा
पुण्यात्माओके सुखका वर्णन एवं कल्पान्तरमं
भी क्मकि भोगका प्रतिपादन... ११६
३०- पापी जीवेकि स्थावर आदि योनिर्योमिं जनम लेने
ओर दुःख भोगनेकौ अवस्थाका वर्णन ..... ११९
३१- मोक्षप्रा्िका उपाय, भगवान् विष्णु ही मोक्षदाता
है- इसका प्रतिपादन, योग तथा उसके
अङ्लोका निरूपण... ०6 १२३
२३२- भवबन्थनसे मुक्तिके लिये भगवान् विष्णुके
भजता उपदेश १३०
विषय पृष्ट-संख्या
३३- वेदमालिको जानन्ति मुनिका उपदेश तथा
वेदमालिकी गकि १३४
३४- भगवान् विष्णुके भजनकी महिमा- सत्सङ्ग तथा
भगवान्के चरणोदकसे एक व्याधका उद्धार १३६
३५- उत्तङ्कके द्वारा भगवान् विष्णुको स्तुति ओर
भगवान्को आज्ञासे उनका नारायणाश्रमे
जाकर मुहा १३९
३६- भगवान् विष्णुके भजन-पूजनकी महिमा ... १४४
३७- इन्द्र ओर सुधर्मका संवाद, विभिन्न मन्वन्तरोके
इन्द्र ओर देवताओंका वर्णन तथा भगवद्धजनका
माहात्म्य
३८- चारे युर्गोकी स्थितिका संक्षेपसे तथा कलिधर्मका
विस्तारसे वर्णन एवं भगवन्नामको अद्भुत
महिमाका प्रतिपादन... ५०
द्वितीय पाद्
३९- सृष्टितत्वका वर्णन, जीवको सत्ताका प्रतिपादन
ओर आश्रमोके आचारका निरूपण ..........
४०- उत्तम लोक, अध्यात्मततत्व तथा ध्यानयोगका
४१- पञ्चशिखका राजा जनकको उपदेश ,.........
४२- त्रिविध तापोसे छूटनेका उपाय, भगवान् तथा
वासुदेव आदि शब्दोंको व्याख्या, परा ओर
अपरा विद्याका निरूपण, खाण्डिक्य ओर
केशिध्वजकी कथा, केशिध्वजद्वारा अविद्याके
बीजका प्रतिपादन. +०.-००५-०,०००५०००५०००५०२५००. १६६
४३- मुक्तिप्रद योगका वर्णन... १७१
४४- राजा भरतका मृगशरीरमें आसक्तिके कारण मृग
होना, फिर जानसम्पत्न ब्राह्मण होकर जडढ-वृत्तिसे
रहना, जडभरत ओर सौवीरनरेशका संवाद १७५
४५- जडभरत ओर सौवीरनरेशका संवाद-परमार्थका
निरूपण तथा ऋभुका निदाघको अदैतज्ञानका
वप 2 १८०
८६- शिक्षा-निरूपण, ०१०१०९१५
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(३)
विषय पृष्ठ-संख्या विषय पृष्-संख्या
सः अ च, 3 = ` भव चकः
४७- वेदके द्वितीय अङ्ग कल्पका वर्णन-गणेश-
पूजन, ग्रहशान्ति तथा श्राद्धका निरूपण ....
४८- व्याकरण-शास््रका वर्णन...
४९ तिरक वर्ण ००००.
€ - त्रिस्कन्धं ज्यौतिषके वर्णन-प्रसङ्खमें गणित-
विषयकापतिषादन त...
५१- त्रिस्कन्ध ज्यौतिषका जातकस्कन्ध ............
„५२- त्रिस्कन्ध ज्यौतिषका संहिताप्रकरण (विविध
उपयोगी विषयोंका वर्णन) ++...
„५३- छन्दःशास्त्रका संक्षिप्त परिचय ^...
५४- शुकदेवजीका मिथिलागमन, राजभवनमें
युवतियोद्रारा उनकी सेवा, राजा जनकके
द्वारा शुकदेवजीका सत्कार ओर शुकदेवजीके
साथ उनका मोक्षविषयक संवाद् ,..........
५५- व्यासजीका शुकदेवको अनध्यायका कारण
बताते हए "प्रवह ' आदि सात वायुओंका
परिचय देना तथा सनत्कुमारका शुकको
५६- शुकदेवजीको सनत्कुमारका उपदेश ..........
५७- श्रीशुकदेवजीकी ऊर्ध्वगति, शवेतद्रीप तथा
वैकुण्ठधाममें जाकर शुकदेवजीके द्वारा भगवान्
विष्णुकी स्तुति ओर भगवानूकी आज्ञासे
शुकदेवजीका व्यासजीके पास आकर
भागवतशास्त्र पद्ना...... ०
तृतीय पाद
५८- रैवदर्शनके अनुसार पति, पशु एवं पाश
आदिका वर्णन तथा दीक्षाको महत्ता ........
५९- मन्रके सम्बन्धर्मे अनेक ज्ञातव्य बार्ते, मन्त्रके
विविध दोष तथा उत्तम आचार्य एवं शिष्यके
६०- मन्र-शोधन, दीक्षाविधि, पञचदेवपूजा तथा
जपपूर्वक ईष्टदेव ओर. आत्मचिन्तनका
विधान
१९८
२०७
२४९१
२.७८
२३१७
३७४
३८७
२९१
२३९५५
२३९७
०९१
६०९
६१- शौचाचार, स्नान, संध्या-तर्पण, पूजागृहमें
देवताओंका पूजन, केशव-कीर्त्यादि मातृका-
न्यास, श्रीकण्ठमातृका, गणेशमातृका, कला-
मातृका आदि न्यासोंका वर्णन...
६२- देवपूजनको विधि...
६३- श्रीमहाविष्णु-सम्बन्धी अष्टाक्षर, द्वादशाक्षर
अओदि विविध मन्त्रोके अनुष्ठानकी विधि.
६४- भगवान् श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, भरत तथा
शत्तुघ्र-सम्बन्धी विविध मन्त्रोके अनुष्टानको
सिप ^विधि
६५- विविध मन्त्रोद्वारा श्रीहनुमान्जीको उपासना,
दीपदानविधि ओर कामनाशक भूतविद्रावण-
मनाकावणन ~.
६६- भगवान् श्रीकृष्ण-सम्बन्धी मन्त्रोको अनुष्ठान-
विधि तथा विविध प्रयोग...
६७- श्रीकृष्ण-सम्बन्धी विविध मन्त्रों तथा व्यास-
सम्बन्धी मन्रको अनुष्टानविधि......
६८- श्रीनारदजीको भगवान् शङ्करसे प्राप्त हए युगल-
शरणागति-मन्त्र तथा राधाकृष्ण-युगलसहस्र-
नाम-स्तोत्रका वर्णन...
चतुर्थं पाद
६९- नारद-सनातन-संवाद, ब्रह्माजीका मरीचिको
ब्रह्मपुराणकी अनुक्रमणिका तथा उसके पाठ-
श्रवण एवं दानका फल बताना...
७०- पद्मपुराणका लक्षण तथा उसमे वर्णित विषयोकी
अनु्रपणिका
७१- विष्णुपुराणका स्वरूप ओर विषयानुक्रमणिका
७२- वायुपुराणका परिचय तथा उसके दान एवं
श्रवण आदिका फल...
७३- श्रीमद्धागवतका परिचय, माहात्म्य तथा दान-
७४- नारदपुराणको विषय-सूची, इसके पाठ, श्रवण
ओर दानका फल...
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४१६
४२३
४२२९
४२६
2.2.
६५५६
४७१
८८१
५५०१
५०३
५ 0 ५
५०६
(ड)
विषय
७५- मार्कण्डेयपुराणका परिचय तथा उसके श्रवण
एवं दानका माहात्म्य... ०१५५4
७६- अग्रिपुराणकी अनुक्रमणिका तथा उसके पाठ,
श्रवण एवं दानका फल +...
७७- भविष्यपुराणका परिचय तथा उसके पाठ,
श्रवण एवं दानका माहात्म्य ,...... ५.५4
७८- ब्रह्यवैवर्तपुराणका परिचय तथा उसके पाठ,
श्रवण एवं दान आदिको महिमा .............
७९- लिङ्गपुराणका परिचय तथा उसके पाठ,
श्रवण एवं दानका फल ....... +...
८०- वाराहपुराणका लक्षण तथा उसके पाठ,
श्रवण एवं दानका माहात्म्य ,........ ^
८१- स्कन्दपुराणकी विषयानुक्रमणिका, इस पुराणके
पृष्ठ-संख्या
पाठ, श्रवण एवं दानका माहात्म्य ............. ५१५
८२- वामनपुराणको विषय-सूची ओर उस पुराणके
श्रवण, पठन एवं दानका माहात्म्य ........... ५२३
८३- कूर्मपुराणको संक्षिप्त विषय-सूची ओर उसके
पाठ, श्रवण तथा दानका माहात्म्य .......-...
८४- मत्स्यपुराणकी विषय-सूची तथा इस पुराणके
पाठ, श्रवण ओर दानका माहात्म्य ...........
८५- गरुडपुराणकी विषय-सूची ओर पुराणके
पाठ, श्रवण ओर दानको महिमा............
८६-ब्रह्माण्डपुराणका परिचय, संक्षिप्त विषय-
सूची, पुराण-परम्परा, उसके पाठ, श्रवण
एवं+दानकाफल 2.
८७-बारह मासोंकी प्रतिपदाके व्रत एवं आवश्यक
८८-बारह मासोके द्वितीया-सम्बन्धी व्रतं ओर
आवश्यक कृत्योका निरूपण .......+ +...
८९-वारह महीनेकि तृतीया-सम्बन्धी त्रतौका परिचय ..
९०-वारह महीनोके चतुर्थीं -व्रतोको विधि ओर
उनका माहात्म्य ०
९१-सभी मासोंकी पञ्चमी तिधियोमं करनेयोग्य
व्रत-पूजन आदिका वर्णन... ५३९
विषय पृष्ठ-संख्या
९२-वर्षभरकी षष्ठी तिधियोमें पालनीय त्रत एवं
देवपूजन आदिकी विधि ओर महिमा...
९३-बारह मासोके सप्तमी-सम्बन्धी त्रत ओर
उनके माहात्म्य न
९४- बारह महीनोंकी अष्टमी-सम्बन्धी त्रतोकी
विधिः ओर महिमा.
९५-नवमी-सम्बन्धी ब्रतोकी विधि ओर महिमा ५५१
९६-वारह महीनोके दशमी-सम्बन्धी त्रतोकी
विधि ओर महिमा...
९७-द्वादश मासके एकादशी-त्रतोंकी विधि ओर
महिमा तथा दशमी आदि तीन दिनके
पालनीय विशेष नियम...
९८- बारह महीनेकि द्वादशी-सम्बन्धी त्रर्तोकौ
विधि ओर महिमा तथा आठ महाद्रादशिर्यो्
९९-त्रयोदशी-सम्बन्धी त्रर्तोकी विधि ओर महिमा ५६३
१००- वर्षभरके चतुर्दशी -त्र्तोको विधि ओर महिमा ५६७
१०१-वारह महीनोंको पूर्णिमा तथा अमावास्यासे
सम्बन्ध रखनेवाले व्रतं तथा सत्कर्मोकी विधि
ओर पमहिभा
१०२- सनकादि ओर नारदजीका प्रस्थान, नारदपुरणके
माहात्म्यका वर्णन ओर पूर्वभागकीं
उत्तरभाग
१०३- महर्षिं वसिष्ठका मान्धाताको एकादशी-
व्रतको महिमा सुनाना...
१०४-तिथिके विषयमे अनेक ज्ञातव्य बाते तथा
विद्धा तिधिका निषेध... ५०५०५.
१०५- स्क्माद्भदके राज्यमें एकादशी-व्रतके प्रभावसे
सवका वैकुण्ठ-गमन, यमराज आदिका
चिन्तित होना, नारदजीसे उनका वार्तालाप
तथा ब्रह्म-लोक-गमन ...... ५.५.
१०६- यमराजके द्वारा ब्रह्माजीसे अपने कष्टका
निवेदन ओर रुक्ाङ्गदके प्रभावका वर्णन ५८२
(-0. 1\/1(11114/5511॥1 2118811 \/8/8/185। (01661011. 01411260 0 66810011
विषय॑
(५)
पृष्-संख्या
१०७- ब्रह्माजीके द्वारा यमराजको भगवान् तथा `
उनके भक्तोको श्रेष्ठता बताना ...-.५-..+..
१०८- यमराजकी इच्छापूर्तिं ओर भक्त रुक्माङ्दका
गौरव बढानेके लिये ब्रह्माजीका अपने मनसे
एक सुन्दरी नारीको प्रकट करना, नारीके प्रति
वैरा्यकी भावना तथा उस सुन्दरी “ मोहिनी "का
मन्दराचलपर जाकर मोहक संगीत गाना ...
१०९- रुक्माङ्गद-धर्मङ्गद-संवाद, धर्माङ्गदका
प्रजाजनोको उपदेश ओर प्रजापालन तथा
रुक्माङ्गदका रानी सेध्यावलीसे वार्तालाप .
११०- रानी संध्यावलीका पतिको मृगोको हिसासे
रोकना, राजाका वामदेवके आश्रमपर जाना
तथा उनसे अपने पारिवारिक सुख आदिका
क्ारण्पुना
१११- वामदेवजीका पूर्वजन्ममे किये हुए ' अशून्य-
शयन-त्रत "को राजके वर्तमान सुखका कारण
बताना, राजाका मन्दराचलपर जाकर मोहिनीके
गीत तथा रूप-दर्शनसे मोहित होकर गिरना
ओर मोहिनीद्रारा उन आश्वासन प्राप्त होना
११२- राजाकी मोहिनीसे प्रणय-याचना, मोहिनीकी
शर्तं तथा राजाद्वारा उसको स्वीकृति एवं
` ७८४
५८५
८८८
। ९ ©
५९३
विवाह तथा दोर्नोका राजधानीकी ओर प्रस्थान ५९५
११३- घोडेकी टापसरे कुचलीं हुई छिपकलीको
राजद्वारा सेवा, छिपकलीकी आत्मकथा,
पतिपर वशीकरणका दुष्परिणाम, राजाके
पुण्यदानसे उसका उद्धार..."
१९४- मोहिनीके साथ राजा रुक्माङ्गदका वैदिश
नगरको प्रस्थान, राजकुमार धर्माद्गदका
स्वागतके लिये मार्गमे आगमन तथा
पिता-पुत्र-संवाद ... ०५१
११५- धमङ्गिदद्वारा मोहिनीका सत्कार तथा अपनी
माताको मोहिनीकी सेवाके लिये एक पतिव्रता
नारीका उपाख्यान सुनाना
८,९५७
११७- धर्मङ्गदका
विषय
११६- संध्यावलीको मोहिनीको भोजन कराना
ओर धमङ्गिदके मातृभक्ति-पूर्णवचन .......
माताओंसे पिता ओर
` मोहिनीके प्रति उदार होनेका अनुरोध तथा
. पुरद्वार माताओंका धन-वस्त्र आदिसे
११८- राजाका अपने पुत्रको राज्य सौपकर नीतिका
पृष्ट-संख्या
६०४७
उपदेश देना ओर धर्माद्गदके सुराज्यको स्थिति ६०९
११९- धम्मङ्गदका दिग्विजय, उसका विवाह
तथा उसको शासनव्यवस्था...
१२०- राजा रुक्माद्गदका मोहिनीसे कार्तिकमासकी
महिमा तथा चातुर्मास्यके नियम, त्रत एवं
वद्यापननताना
१२१- राजा सुक्माद्गदकी आज्ञासे रानी संध्यावलीका
कार्तिकमासमे कृच्छव्रत प्रारम्भ करना,
धर्माङ्गदको एकादशीके लिये घोषणा,
मोहिनीका राजासे एकादशीको भोजन
करनेका आग्रह ओर राजाकी अस्वीकृति
१२२- राजा रुक्माङ्घदद्रारा मोहिनीके आश्षेपोका
खण्डन, एकादशी-त्रतकी वैदिकता, मोहिनी-
द्वारा गौतम आदि ब्राह्मणोके समक्ष अपने
पक्षकीरस्थापता- क
१२३- राजाके द्वारा एकादशीके दिन भोजनविषयक
मोहिनी तथा ब्राह्यणोके वचनका खण्डन,
मोहिनीका रुष्ट होकर राजाको त्यागकर
जाना ओर धर्माङ्गदका उसे लौटाकर लाना
एवं पितासे मोहिनीको दी हुई वस्तु देनेका
अनुरोधःकना वः
१२४- राजा रुक्माङ्गदका एकादशीको भोजन न
करनेका ही निश्चय...
१२५- संध्यात्रली-मोहिनी- संवाद, रानी संध्यावलीका
मोहिनीको पतिक इच्छाके विपरीत चलनेमें
दोष.बताना "व ॐ
((-0. 1\/॥(1114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661011. 01411260 0 6810011
६९१०
६१२९
६१५
६१९
६२९१
६२४
(६)
विषय
१२६- मोहिनीका संध्यावलीसे उसके पुत्रका मस्तक
मोगना ओर संध्यावलीका उसे स्वीकार
करते हए विरोचनको कथा सुनाना...
१२७- रानी संध्यावलीका राजाको पुत्रवधके लिये
उद्यत करना, राजाका मोहिनीसे अनुनय-
विनय, मोहिनीका दुराग्रह तथा धर्माङ्गदका
राजाको अपने वधके लिये प्रेरित करना .
१२८- राजाको पुत्रवधके लिये उद्यत देख मोहिनीका
मूर्छित होना ओर पत्री, पुत्रसहित राजा
रुक्माङ्गदका भगवान्के शरीरमें प्रवेश
पृष्ट-संख्या
६९६
६२९१९
६३१
१२९- यमराजका ब्रह्माजीसे कष्ट-निवेदन, वर
देनेके लिये उद्यत देवताओंको रुक्माङ्गदके
पुरोहितको फटकार तथा मोहिनीका ब्राह्मणक
शापसे भस्म होना... ०५००
१३०- मोहिनीक दुर्दशा, ब्रह्माजीका राजपुरोहितके
समीप जाकर उनको प्रसन्न करना, मोहिनीकौ
६२३२९
६३५
१२३१- मोहिनीको दशमीके अन्तभागमें स्थानकौ
प्राति तथा उसे पुनः शरीरको प्राति .......
१३२- मोहिनी-वसु-संवाद- गङ्गाजीके माहात्म्यका
६२७
६३९
१३३- गङ्गाजीके दर्शन, स्मरण तथा उनके जलमें
स्नान करनेका महततव...
१३४- कालविशेष ओर स्थलविशेषमें गद्धास्रानकी
६४९
१३५- गङ्गाजीके तटपर किये जानेवाले खान, तपण,
पूजन तथा विविध प्रकारके दानोको महिमा ६४६
१३६- एक वर्तक गब्खार्चन-व्रतका विधान ओर
माहात्म्य, गद्गातटपर नक्त-व्रत करके भगवान्
शिवका पूजन, प्रत्येक मासक पूर्णिमा
ओर अमावास्याको शिवाराधन तथा गद्भा-
दशहराके पुण्य-कृत्य एवं उनका माहात्म्य ६४८
विषय पृष्ट-संख्या
१३७- गयातीर्थकी महिमा 0०५००५१५
१३८- गयामे प्रथम ओर द्वितीय दिनके कृत्यका
वर्णन, प्रेतशिला आदि ती्थेमिं पिण्डदान
आदिकी विधि ओर उन तीर्थोकी महिमा ६५७
१३९- गयामें तीसरे ओर चौथे दिनका कृत्य,
ब्रह्मतीर्थं तथा विष्णुपद आदिकी महिमा ... ६६३
१४०- गयामें पोंचवें दिनका कृत्य, गयाके विभिन्न
तीर्थोको पृथक्-पृथक् महिमा... ६६५
१४१- अविमुक्त क्ेत्र- काशीपुरीको महिमा ...... ६६९
१४२- काशीके तीर्थं एवं शिवलिङ्गोके दर्शन-
पूजन आदिकौ महिमा... ६७२
१४३- काशी-यात्राका काल, यात्राकालमें यात्रियोके
लिये आवश्यक कृत्य, अवान्तर तीर्थं ओर
शिवलिद्धोंका वर्णन... ०५०५५००. ६७४
१४४- काशीकी गद्धाके वरणा-सद्खम, असी-सङ्गम
तथा पञ्चगद्धा आदि तीर्थोका माहात्म्य... ६७७
१४५- उत्कलदेशके पुरुषोत्तम-कषेत्रकी महिमा, राजा
इन्दरद्युम्रका वहां जाकर मोक्ष प्राप्त करना. ६७९
१४६- राजा इन्द्रद्युप्रके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति ६८०
१४७- राजाको स्वप्रमे ओर प्रत्यक्ष भी भगवान्के
दर्शन तथा भगवत्प्रतिमाओंका निर्माण, वर-
प्रापि ओरप्रतिष्ठा न.
१४८- पुरुपोत्तम-क्षत्रकी यात्राका समय, मार्कण्डेयश्च
शिव, वट-वृक्ष, श्रीकृष्ण, बलभद्र तथा
सुभद्राके ओर भगवान् नृसिंहके दर्शन-
पूजन आदिका माहात्म्य...
१४९- शवेतमाधव, मत्स्यमाधव, कल्पवृक्ष ओर
अष्टाक्षर-मनत्र, स्नान, तर्पण आदिकी महिमा ६९१
१५०- भगवान् नारायणके पूजनकी विधि ........ ६९४
१५१- समुद्र-स्ानकी महिमा ओर श्रीकृष्ण-बलराम
आदिके दर्शन आदिकी महिमा तथा श्रीकृष्णसे
जगत्-सृष्टिका कथन एवं श्रीराधा-कृष्णके
उत्कृष्ट स्वरूपका प्रतिपादन... ^...
((-0. 1\/॥८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
(७)
विषय पृष्ठ-संख्या
१५२- इनद्रदयुप्र-सरोवरमेे स्नानकी विधि, ज्येष्ठ
मासक पूर्णिमाको श्रीकृष्ण, बलराम तथा
सुभद्राके अभिषेकका उत्सव .......... ६९९
१५३- अभिषेक-कालमें देवताओंद्रारा जगन्नाथजीकौ
स्तुति, गुण्डिचा-यात्राका माहात्म्य तथा
दवादश यात्राको प्रतिष्ठा-विधि .......... ^. ७०१
१५४- प्रयाग-माहात्म्यके प्रसङ्खमे तीर्थयात्राको
सामान्य विधिका वर्णन... ७०४
१५५- प्रयागमें माघ-मकरके सानको महिमा तथा
वहकि भित्त-भित्न तीर्थोका माहात्म्य ...... ७०५
१५६- कुरुक्षेत्र-माहात्म्य ..... ७०९
१५७- कुरक्ेत्रके वन, नदी ओर भित्र-भित्न तीर्थोका
माहात्म्य तथा यात्राविधिका क्रमिक वर्णन ७१०
१५८- गङ्गाद्वार (हरिद्वार) ओर वहकि विभिन्न
तीर्थोका माहात्स्य +... ७१५
१५९- बदरिकाश्रमके विभिन्न तीर्थोकौ महिमा ... ७१७
१६०- सिद्धनाथ-चरित्रसहित कामाक्षा-माहात्म्य ... ७२०
१६१- प्रभासक्षेत्रका माहात्म्य तथा उसके अवान्तर
विषय
१६४- पुण्डरीकपुरका माहात्म्य, जेमिनिद्वारा भगवान्
शङ्का ^ स्तुति...
१६५- परशुरामजीके द्वारा गोकर्णक्षेत्रका उद्धार
तथा उसका माहात्म्य...
१६६- श्रीराम-लक्ष्मणका संक्षिप्त चरित्र तथा
लक्ष्मणाचलका माहात्म्य...
१६७- सेतु-क्षेत्रके विभिन्न तीर्थोको महिमा.......
१६८- नर्मदाके तीर्थोका दिग्दर्शन तथा उनका
१६९- अवन्ती-महाकालवनके तीर्थोको महिमा
१७०- मथुराके भिन्र-भिन्न तीर्थोका
"धमादात्ष्य व.
१७१- वृन्दावन-क्षेत्रके विभिन्न ती्थेकि सेवनका
माहात्यं.
१७२- पुरोहित वसुका भगवत्कृपासे वृन्दावन-
वास, देवर्षिं नारदके द्वारा शिव-
सुरभि-संवादके रूपमे भावी श्रीकृष्णचरितका
द. ७२१ १७३- मोहिनीका सव तीर्थेमिं घूमकर यमुनामें
१६२- पुष्कर-माहात्म्य....... ७२४ प्रवेशपूर्वक दशमीके अन्तभागमें स्थित
१६३- गौतमाश्रम-माहात्म्यमे गोदावरीके प्राकख्यका होना तथा नारदपुराणके पाठ एवं श्रवणको
तथा पञ्चवटीके माहात्म्यका वर्णन ......... ७२५ महिमा
८१2९-१ =#
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 2118811 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 66810011
पृष्ट-संणख्या
७२३२
७३५
\9६०
\७४०
७४१
७४३
७४५
७८६८
चित्र-सूची
विषय पृष्ट-संख्या
इकरगे ( लाइन )
१- नैमिषारण्यमे सूतजी महर्पियोको कथा
सना द ३
२- नारदजी ओर सनकादि कुमार प्रार्थना कर
र ६
२- श्रीनारायणके अद्गोसे त्रिदेवोंका प्रादुर्भाव... ९
४- मृकण्डु ऋषिको भगवदर्शन ....... ^... १७
५- मार्कण्डेयका भगवान्को प्रणाम .............. २०
६- गङ्गा ओर गायत्री ,...५.,..००००.००,००००००००१००. २२
७-राजा बाहुकी प्नीको ओर्व मुनिका सती
होनेसे रोकना २८
८-कपिलके नेत्रानलसे सगरपुत्र भस्म हो गये .. ३
९-दैत्योको लगायी आगसे सुदर्शनचक्रद्वारा
अदितिकी रक्षा; ३६
१०- अदितिको भगवान्के द्वारा माला-दान ...... ४०
११- वामनजीका बलिसे भूमि मोगा... ४२
१२- धर्मराज ओर भगीरथ... ४६
१३- विष्णु, शिव आदिकी सेवासे भगवत्प्रा्ति.. ५२
१४-नरक-यत्णा ६१
१५- पापनाशकं उपाय ..*,.+.-+०५०,००५००००००००००.०. ६
१६- महर्षिं भृगुके आश्रममें भगीरथ ६६
१७- भगीरथको शिव-दर्शन ,..... ७१
१८- पूजन, ब्राह्मण- भोजन, फलादि-दान ........ ७४
१९- श्रीलक्ष्मी-नारायण-पूजन, हवन... ७८
२०- ध्वजागिपण ८०
२९ दीपदान ८४
२२- भद्रशीलकै द्वारा खेलमं भगवत्पूजन ......... ८७
२ -बाहमणक- क 21 ९०
२४- गुरुके चरणेमिं नमस्कार..." ९३
२५- किस-किस समय शिखा खुली न रहे ..... ९५
२६- त्रिकाल गायत्रीका ध्यान... ++..." १००
विषय पृष्ट-संख्या
२७- अतिथि-सत्कार ...... ५५५०००५० १०१
२८- श्राद्धमे निमन्त्रित ब्राह्यणका पूजन ........... १०५
२९- ग्रहणके समय जप करना चाहिये ........... १०८
३०-~ प्रायतत ११२
३१- विष्णु-पूजनसे सर्वपाप-नाशपूर्वक भगवत्प्राति ११४
३२- पापियोके नरकका मार्ग... ११६
३३- पुण्यात्माओंका मार्ग... ११७
३४- सभी अवस्थाओमिं दुःख... १२९१
३५- सबमें भगवान्... ५१०५० ५५०५५१ १२५
३६- प्रणवम् भगवा १३०
३७- हाथ, पैर, नेत्र आदिको सफलता .......... १३१
३८- जानन्ति ओर वेदमाली ‰........ ०.०. १३६
३९- महर्षिं उत्तङ्क ओर गुलिक ‰.... 4 १३९
४०- उत्तङ्को भगवदर्शन ‰... १४३
४१- परिक्षा १८५
८६२- इन्द्र ओर सुधर्म... १४८६६
४३- चारों युगोके साधन... १५१
४ वारो आश्रम १५५
८६५- शरीरादिकी रथरूपमे कल्पना ,......* +... १५९
८६- मुनि पञ्चशिख ओर राजा जनक... १६२
८४७- केशिध्वज ओर खाण्डिक्य .........* ^+... १६९
४८- भवात् विष्णः १७४
४९- राजा भरत ओर मृग-शिशु...... ++... १७६
५०- जडभरत ओर राजा रहूगण... १८०
५१- निदाघ ओर ऋभु... ५०५०५०००५००५०. १८३
५२- सर्वग्रास चन्दरग्रहणका दृश्य... २७१
५३- खण्ड सूर्यग्रहणका दृश्य... २७१
५८ सूर्यग्रहण २७१
५५- पञ्चशलाकराचक्र ,,,०००,०१.०००००५००१०५०५५०५०००००, ३५०
८५६- शुकदेवजी राजा जनकके द्वारपर ............. ३८८
५.७- शुकदेवजी जनकके प्रमोदवनपें ‰............. ३८८
(-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 66810011
ऋक क १
2 = ककः ऊ
= क =
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ग ~
विषय पृष्ठ-संख्या विषय पृष्ट-संख्या
५८- शुकदेवजी ओर राजा जनक... ३८८ ८७~ पुराण-श्रवण......०...१.०००००००.०००००.००.०००००.०. ५०६
५९- शुकदेवजी ओर व्यासजी ....... ++... ३९२८८ भागवत - दात ~ ०००००००० ५०८
६०- शुकदेवजीको भगवदर्शन +++ ३९८ ८९- गायोके साथ पुराण-दान ....... +++. ५०९
६१-श्रीदेवी ओर भूदेवीके साथ भगवान् ९०- मार्कण्डेयपुराण-दान ...... ++ ५१०
नारायणका्ष्यात^ 14 ४३४ ९१-अग्रिपराण-दकानं ८,.,०.१००००००५००००००००००००००००००. ५११
६२- श्रीसीतारामका ध्यान... ४३६ ९२- भविष्यपुराण-दान ...... +न. ५१२
६३- कल्पवृक्षके नीचे श्रीसीता-लक्ष्मणसहित ९३- वाराहप्राण-दान 2.० ५१५
श्राप्का ध्यात ००००००० ४३८ ९४- राजा अम्बरीष ओर दुर्वासा मुनि... ५१६
६४- सिंहासनासीन सीता-लक्ष्मणसहित श्रीरामका ९५- स्कन्दपुराण-दान ..... १. ५२३
ध्यात. ००५०००००. ४३९ ९६- कूर्मपुराण-दान ......*.. +++ ००० ५२५
६५- पुष्पकविमानपर श्रीसीतारामका ध्यान ....... ४४००. "९७ समद्र-मन्थन् "००००००००. ५२६
६६- कल्पवक्षके नीचे श्रीसीतारामका ध्यान ..... ४४२ ९८- गरुडपुराण-दान ...-.. ५२७
६७- श्रीरामका ध्यान करते हनुमान्जीका ध्यान. ४४७ ९९- देवी-पूजन ..... ५३१
६८- वीर हनुमान्का ध्यान... ४४८ 1१०० शिवनपुजत ०० ५३३
६९- कपीश्वर हनुमान्का ध्यान... ४११ -१०९-गणेश पजन ०० ५३५.
७०- श्रीकृष्णका प्रातः कालीन ध्यान ...... ^. ४५९ १०२- मत्स्यभगवान्को पूजा ‰.. ^-^ ५३९
७१- श्रीकृष्णका मध्याहकालीन ध्यान ............. ४६० १०३- कपिला गौका पूजन... ५४२
७२- श्रीकृष्णका सायंकालीन ध्यान... ६१९०४ सुयपूजन म ५४४
७३- मुरारिभगवान्का ध्यान... ४६५ १०५- श्रीराधाका पूजन ओर उसका फल ........ ५४८
(= गपलयन ४६६ १०६- श्रीरामका पूजन, ब्राह्यण-भोजन ओर उसका
७५- अष्टभुज महाकृष्णका ध्यान ...*.+.+ ^+ ४७३ फल् ५५५१
७६- नन्दनन्दन श्रीकृष्णका ध्यान... ४७४ १०७- गङ्खादशहरा-सान ..... +... ५५२
७७- गोपालकृष्णका ध्यान ....-. + ४७४ १०८- विष्णु-पूजन .... ५८५५
७८- श्रीकृष्णाभिपेकका ध्यान... ४७५ १०९- द्रादश ब्राह्यण-भोजन ,.... +++ ०५५० ५६०
७९- वाल-गोपालका ध्यान... ४७६ ११०- शिव-पार्वती-पूजन...... + ०००० ५६४
८०- श्रीकृष्ण-बलरामका ध्यान, ४७७ १११- नृसिंह-पुजन...... १०० ५६७
८९- व्रजराज-कुमारका ध्यान... ४७७ ११२- वट-प्रदक्षिणा..........०..०००००००००१००००००.०००००० ५७०
८२- गुरुपुत्र प्रदान करते श्रीकृष्णका ध्यान ..... 1९2 दापदात ५७२.
८३- श्रीदेवी, भूदेवीके साथ गरुड्पर वैटे भगवान् १९१४- राजा मान्धाता ओर महर्षिं वसिष्ठ ......... ५७७
विशा ध्यात ४८० ११५- ब्रह्याकी सभामें चित्रगुप्त, यम ओर नारदजी. ५८१
८४- भगवान् व्यासका ध्यान ,... ^. ६८१ ११६ ब्रह्माको सभामें नारीकी उत्पत्ति „^. ५८५
८५- ब्रह्माजी ओर मरीचि... ५०१ ११७- राजा सुक्माद्गदको घोषणा... ५९०
८ पण दा ५०४ ११८- रुक्माद्गद ओर महर्षिं वामदेव .............. ५९१
र ((-0. ॥\५॥1111(॥<511॥ ©118\/8॥1 8181859 (01661101. 10411260 0 66810011
(१०)
विषय पृष्ठ-संख्या
११९- रुक्माङ्गदका पर्वतके पास पहुंचना ......... ५९५
१२०- रुक्माङ्गदका छिपकलीके शरीरपर पानी
डालना ५९८
१२१-छिपकलीका दिव्य शरीर-धारण............. ६००
१२२-मोहिनीको पीठपर पैर रखकर धर्माङ्खदने
घोटेपर. चाया. ६०३
१२२-पतित्रताका पतिसहित देवलोक-गमन ,..... ६०५
१२४- धर्म्गदका माताओंको समञ्चाना .......... ६०८
१२५- धर्मङ्गदका पिताके सामने मणि रखना ... ६१०
१२६- गाय एक घडा दूध देती... ६१३
१२७- त्रिरात्र-त्रतमें दान ++ ६१५
१२८- मोहिनीकी ब्राह्मणोंसे बात +... ६२०
१२९- देवताओंको विष्णु-दर्शन .....+.+ ++ ६२७
१३०- राजाको पुत्र-हत्यासे भगवान्का रोकना .. ६३१
१३१- ब्राह्मणके पास मोहिनीको लेकर देवता्ओंका
जाति ६३६
१३२- गद्गा-सरानसे शिवधामकौ प्राति... ६४२
१३३-गदाजी ध ६४७
१३४- गङ्गामें प्राण-त्याग करनेवालोको देवताओंका
नमस्कार... ६५३
१३५- फल्गु नदीके तटपर श्राद्ध..." ६५९
१३६- श्रीरामद्रारा दशरथजीको पिण्डदान ......... ६६४
१३७- काशी-मुक्ति ...... १५५१०१०० ६७०
१३८- कालिका-पूजन ....... ६७५
=>
विषय पृ्ट-संख्या
१३९- टन्द्रद्युप्रको स्वप्रमे भगवदर्शन ........... ६८२
१४०- बलराम, श्रीकृष्ण ओर सुभद्रा ........-.... ६८८
१४१- वर-पूजन......- ००००००५ ६९२
१४२-वे ही श्रीराम है, वे ही श्रीकृष्ण हैँ... ६९७
९४३ रथयात्रा ७०२
१४४- प्रयाग-सद्गम-सनान ....+ ०५. ७०७
१४५- करत ७१४
१४६- गरुडको भगवदर्शन ,,,.....*++..,.५०.००,०००० + ७१८
१४७- रुकिमिणी-पूजन ..... १००००. ७२३
१४८- गौतमपर शिव-कृपा ....... ०५५००. ७२६
१४९- जैमिनि ऋषिपर शिव-कृपा.......... ^... ७२८
१५०- ऋषियोंको परशुरामजीके दर्शन .......... ~.“ ७३८
१५१- विश्वामित्रको यज्त-रक्षा...... +... ७३५
१५२- श्रीरामजी धनुष तोड़ रहे है... ७३६
१५३- वानरोकी सम्पातीसे भेट ,..* ^+. ७३७
१५४- सीताजीकी अग्रि-परीक्षा +... ७३८
१५५- श्रीराम-दरबारमें लव-कुशका
रामायण-गात ७३८
१५६- लक्ष्मणजी दुर्वासा मुनिको रोक रहे है ... ७३९
१५७- विश्रामघारमें सान करनेसे
विष्णुलोककौो प्राति... ७८४
१५८- गोवर्धन ब्राह्मणको भगवदर्शन .........^* ^. ७८७
१५९- वसुको श्यामसुन्दरके दर्शन... ७४८
१६०- मोहिनीका यमुनामें प्रवेश... ^. ७८५१
4९८५
(-0. 1\/1(11114/5511॥1 2118811 \/8181/185। (0166101. 01411260 0 6810011
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श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
्रीनर्दमहपराण
पूवंभाग
सिद्धाश्रममें शौनकादि महर्षियोंका सूतजीसे प्रश्र तथा सूतजीके द्वारा
नारदपुराणकी महिमा ओर विष्णुभक्तिके माहात्म्यका वर्णन
ॐ वेदव्यासाय नमः
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ ९॥
भगवान् नारायण, नरश्रेष्ठ नर तथा सरस्वतीदेवीको
नमस्कार करके भगवदीय उत्कर्षका प्रतिपादन
करनेवाले इतिहास-पुराणका पाठ करे।
वन्दे वृन्दावनासीनमिन्दिरानन्दमन्दिरम्।
उपेन्द्रं सान्द्रकारुण्यं परानन्दं परात्परम् ॥ २॥
जो लक्ष्मीके आनन्द-निकेतन भगवान् विष्णुके
अवतार-स्वरूप है, उस स्रेहयुक्त करुणाको निधि
परात्पर परमानन्दस्वरूप पुरुषोत्तम वृन्दावनवासी
श्रीकृष्णको मँ प्रणाम करता हू
ब्रह्मविष्णुमरहेशाख्यं यस्यांशा लोकसाधकाः।
तमादिदेवं चिद्रूपं विशुद्धं परमं भजे॥ ३॥
ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव जिसके स्वरूप हं
तथा लोकपाल जिसके अंश है, उस विशुद्ध
ज्ञानस्वरूप आदिदेव परमात्माकी मै आराधना
करता हू ।
नैमिषारण्य नामक विशाल वनमें महात्मा
शौनक आदि ब्रह्मवादी मुनि मुक्तिक इच्छासे
तपस्यामें संलग्र थे। उन्होने इद्धियोको वशमें कर
लिया था। उनका भोजन नियमित था। वे सच्चे
संत थे ओर सत्यस्वरूप परमात्माकी प्रा्िके लिये
पुरुषार्थ करते थे। आदिपुरुष सनातन भगवान्
विष्णुका वे बड़ी भक्तिसे यजन-पूजन करते रहते
थे। उनमें ईर्प्याका नाम नहीं था। वे सम्पूर्णं
धममेकि ज्ञाता ओर समस्त लोकोपर अनुग्रह करनेवाले
थे। ममता ओर अहङ्कार उन्हें छू भी नहीं सके
थे। उनका चित्त निरन्तर परमात्माके चिन्तनं
तत्पर रहता था। वे समस्त कामनाओंका त्याग
करके सर्वथा निष्पाप हो गये थे। उनमें शम, दम
आदि सद्गुणोका सहज विकास था। काले
मृगचर्मको चादर ओदे, सिरपर जटा बढ़ाये तथा
निरन्तर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए वे महर्षिगण
((-0. 1/८11141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
1
~ कः „क
तिदित
9 7 1 7
र . संक्षिप्त नारदपुराण
सदा परब्रह्म परमात्माका जप एवं कीर्तन करते थे।
सूर्यके समान प्रतापी, धर्मशास्त्रोका यथार्थं तत्तव
जाननेवाले वे महात्मा नैमिषारण्यमें तप करते थे।
उनमेसे कुछ लोग यज्ञोद्रारा यञ्चपति भगवान् विष्णुका
यजन करते थे। कुछ लोग ज्ञानयोगके साधनोदरारा
ज्ञानस्वरूप श्रीहरिको उपासना करते थे ओर कुछ
लोग भक्तिके मार्गपर चलते हुए परा-भक्तिके द्वारा
भगवान् नारायणको पूजा करते थे।
एक समय धर्म, अर्थ, काम ओर मोक्षका
उपाय जाननेको इच्छासे उन श्रेष्ठ महात्माओंने
एक बड़ी भारी सभा की। उसमें छव्वीस हजार
ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले)
मुनि सम्मिलित हए थे। उनके शिष्य-प्रशिष्योकी
संख्या तो बतायी ही नहीं जा सकती । पवित्र
अन्तःकरणवाले वे महातेजस्वी महर्षिं लोकोंपर
अनुग्रह करनेके लिये ही एकत्र हुए थे। उनमें राग
ओर मात्सर्यका सर्वथा अभाव था। वे शोनकजीसे
यह पूना चाहते थे कि इस पृथ्वीपर कौन-
कोन-से पुण्यक्षेत्र एवं पवित्र तीर्थं हँ । त्रिविध
तापसे पीडित चित्तवाले मनुष्योको मुक्ति कैसे
प्राप्त हो सकती है। लोगोको भगवान् विष्णुकी
अविचल भक्ति केसे प्राप्त होगी तथा सात्त्विक),
राजस ओर तामस-भेदसे तीन प्रकारके कर्मोका
फल किसके द्वारा प्राप्त होता हे। उन मुनियोंको
अपनेसे इस प्रकार प्रश्र करनेके लिये उद्यत
देखकर उत्तम वुद्धिवाले शौनकजी विनयसे ज्ुक
गये ओर हाथ जोड़कर वोले।
शौनकजीने कहा- महर्षियो! पवित्र सिद्धाश्रम-
तीर्थमे पौराणिकोमें श्रेष्ठ सूतजी रहते है । वे वहाँ
अनेक प्रकारके यज्ञोदवारा विश्वरूप भगवान् विष्णुका
यजन किया करते हें । महामुनि सूतजी व्यासजीके
शिष्य हें । वे यह सब विषय अच्छी तरह जानते
है । उनका नाम रोमहर्षण है। वे बडे शान्त
स्वभावके हें ओर पुराणसंहिताके वक्ता हें । भगवान्
मधुसूदन प्रत्येक युगमें धर्मोका हास देखकर
वेदव्यास-रूपसे प्रकट होते ओर एक ही वेदके
अनेक विभाग करते हेँं। विप्रगण! हमने सब
शास्त्रोमे यह सुना है कि वेदव्यास मुनि साक्षात्
भगवान् नारायण ही हें । उन्हीं भगवान् व्यासने
सूतजीको पुराणोका उपदेश दिया हे । परम बुद्धिमान्
वेदव्यासजीके द्वारा भली भोति उपदेश पाकर सूतजी
सब धर्मोकि ज्ञाता हो गये हं। संसारमें उनसे
वढ्कर दूसरा कोई पुराणोंका ज्ञाता नहीं है;
क्योकि इस लोकमें सूतजी ही पुराणोके तात्त्विक
अर्थको जाननेवाले, सर्वज्ञ ओर बुद्धिमान् हें।
उनका स्वभाव शान्त है। वे मोक्षधर्मकि ज्ञाता तो हं
ही, कर्म ओर भक्तिके विविध साधनोंको भी जानते
हे। मुनीश्चरो! वेद, वेदाङ्ग ओर शस्त्रोका जो
सारभूत तत्तव है, वह सब मुनिवर व्यासने जगत्के
हितके लिये पुराणोमे बता दिया है ओर ज्ञानसागर
सूतजी उन सबका यथार्थ तत्तव जाननेमें कुशल हैँ
इसलिये हमलोग उरन्ीसे सब बातें पृङ्े।
इस प्रकार शौनकजीने मुनिययोंसे जब अपना
अभिप्राय निवेदन किया, तब वे सब महर्षि
विद्वानोमें श्रेष्ट शौनकजीको आलिङ्गन करके बहुत
प्रसन्न हए ओर उन्हें साधुवाद देने लगे । तदनन्तर
सव मुनि वनके भीतर पवित्र सिद्धाश्रमतीर्थमें
गये ओर वहां उन्होने देखा कि सूतजी अग्निष्टोम
यञ्चके द्वारा अनन्त अपराजित भगवान् नारायणका
यजन कर रहे हें । सूतजीने उन विख्यात तेजस्वी
महात्माओंका यथोचित स्वागत-सत्कार किया।
तत्पश्चात् उनसे नैमिषारण्यनिवासी मुनियोने इस
प्रकार. पूछा- |
ऋषि बोले- उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले
सूतजी ! हम आपके यहो अतिधिरूपमें आये ह,
अतः आपसे आतिथ्य-सत्कार पानेके अधिकारी
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/81185। (01661011. 01411260 0 60810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद ३
ब = = ~ ~ -~---------
हे । आप ज्ञान-दानरूपी पूजन-सामग्रीके सुने। आप लोगोको जो अभीष्ट है, वह मेँ
हमारा पूजन कोौजिये। मुने ! देवतालोग चन्द्रमाकी | बतलाता हूं। सनक्रादि मुनी श्वरोनि महात्मा नारदजीसे
किरणोसे निकला हुआ अमृत पीकर जीवन धारण | जिसका वर्णन किया था, वह नारदपुराण आप
करते हँ; परंतु इस पृथ्वीके देवता ब्राह्मण आपके | सुने । यह वेदार्थसे परिपूर्ण है-इसमे वेदके
मुखसे निकले हए ज्ञानरूपी अमृतको पीकर तृप | सिद्धान्तोका ही प्रतिपादन किया गया है। यह
होते हं । तात ! हम यह जानना चाहते दँ कि यह | समस्त पापोँकी शान्ति तथा दुष्ट ग्रहोकी बाधाका
सम्पूर्णं जगत् किससे उत्पन्न हुआ ? इसका आधार | निवारण करनेवाला है। दुःस्वप्नोका नाश करनेवाला,
ओर स्वरूप क्या है 2 यह किसमें स्थित है ओर | धर्मसम्मत तथा भोग एवं मोक्षको देनेवाला हे।
किसमे इसका लय होगा ? भगवान् विष्णु किस | इसमे भगवान् नारायणकी पवित्र कथाका वर्णन
साधनसे प्रसन्न होते हैँ ? मनुष्योद्वारा उनकी पूजा | है । यह नारदपुराण सव प्रकारके कल्याणकी
केसे कौ जाती है ? भिन्न-भिन्न वर्णो ओर आश्रमोंका | प्रातिका हेतु है। धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षका भी
आचार क्या हे ! अतिथिकी पूजा केसे की जाती | कारण है । इसके द्वारा महान् फलोंकी भी प्रासि
हे, जिससे सब कर्म सफल हो जाते हँ ? वह | होती है, यह अपूर्व पुण्यफल प्रदान करनेवाला
मोक्षका उपाय मनुष्योको केसे सुलभ है, पुरुषोंको | है। आप सब लोग एकाग्रचित्त होकर इस
भक्तिसे कौन-सा फल प्राप्त होता है ओर भक्तिका | महापुराणको सुनें । महापातकों तथा उपपातकोसे
स्वरूप क्या हे ? मुनिश्रेष्ठ सूतजी ! ये सब वाते | युक्त मनुष्य भी महर्षिं व्यासप्रोक्तं इस दिव्य
आप हमें इस प्रकार समञ्ञाकर बतावें कि फिर | पुराणका श्रवण करके शुद्धिको प्राप्त होते है।
इनके विषयमे कोई संदेह न रह जाय, आपके | इसके एक अध्यायका पाठ करनेसे अश्चमेध
अमृतके समान वचनोंको सुन॑नेके लिये किसके | यज्ञका ओर दो अध्यायोके पाठसे राजसूय यज्ञका
मनमें श्रद्धा नहीं होगी 2 फल मिलता हे । ब्राह्मणो ! ज्येष्ठके महीनेमें पूर्णिमा
सूतजीने कहा- महर्षियो! आप सब लोग | तिथिको मूल नक्षत्रका योग होनेपर मनुष्य इन्द्रिय
संयमपूर्वक मथुरापुरीकी यमुनाके जलम स्नान
करके निराहार त्रत रहे ओर विधिपूर्वक भगवान्
श्रीकृष्णका पूजन करे तो इससे उसे जिस फलकी
प्राति होती है, उसीको वह इस पुराणके तीन
अध्यायोका पाठ करके प्राप्त कर लेता है। इसके
दस अध्यायोका भक्तिभावसे श्रवण करके मनुष्य
निर्वाण मोक्ष प्राप्त कर लेता दै। यह पुराण
कल्याण-प्राप्तिके साधनोमें सबसे श्रेष्ठ है । पवित्र
ग्रन्थो इसका स्थान सर्वोत्तम है। यह वर
स्वर्प्रोका नाशक ओर परम पवित्र है । ब्रह्मर्षयो!
इसका -यत्रूर्वक श्रवण करना चाहिये । यदि मनुष्य
्रद्धापूर्वक इसके एक श्लोक या आधे श्लोकका
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 21188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
त ऋ चिकी (क स ` ` ऊत
भका षणि मौ
: संक्षिप्त नारदपुराण
भी पाठ कर ले तो वह महापातकोके समूहसे
तत्काल मुक्त हो जाता हे।
साधु पुरुषोके समक्ष ही इस पुराणका वर्णन
करना चाहिये; क्योकि यह गोपनीयसे भी अत्यन्त
गोपनीय हे। भगवान् विष्णुके समक्ष, किसी पुण्य
कषेत्रम तथा ब्राह्मण आदि द्विजातिययोके निकट इस
पुराणको कथा बोचनी चाहिये। जिन्होने काम-
क्रोध आदि दोषोको त्याग दिया है, जिनका मन
भगवान् विष्णुको भक्तिमे लगा है तथा जो
सदाचारपरायण ह, उन्हींको यह मोक्षसाधक पुराण
सुनाना चाहिये। भगवान् विष्णु सर्वदेवमय हैं । वे
अपना स्मरण करनेवाले भक्तोकी समस्त पीडाओंका
नाश कर देते हे । श्रेष्ठ भक्तोंपर उनकी सेह-धारा
सदा प्रवाहित होती रहती हे । ब्राह्यणो ! भगवान्
विष्णु केवल भक्तिसे ही संतुष्ट होते ह, दूस
किसी उपायसे नहीं । उनके नामका विना श्रद्धाके
भी कीर्तन अथवा श्रवण कर लेनेपर मनुष्य सव
पापोसे मुक्त हो अविनाशी वैकुण्ठ धामको प्राप्त
कर लेता हे। भगवान् मधुसूदन संसाररूपी भयङ्कर
एवं दुर्गम वनको दग्ध करनेके लिये दावानलरूप
हे। महर्पियो! भगवान् श्रीहरि अपना स्मरण
करनेवाले पुरुषोके सब पापोंका उसी क्षण नाश
कर देते ह । उनके ततत्वका प्रकाश करनेवाले इस
उत्तम पुराणका श्रवण अवश्य करना चाहिये।
सुनने अथवा पाठ करनेसे भी यह पुराण सव
पापोका नाश करनेवाला है। ब्राह्यणो! जिसकी
बुद्धि भक्तिपूर्वक इस पुराणके सुननेमे लग जाती
हे, वही कृतकृत्य है । वही सम्पूर्ण शास्त्रोका
मर्मज्ञ पण्डित हे तथा उसीके द्वारा किये हुए तप
ओर पुण्यको मे सफल मानता हूँ ; क्योकि चिना
तप ओर पुण्यके इस पुराणको सुननेमें प्रेम नहीं
हो सकता। जो संसारका हित करनेवाले साधु
पुरुष ह, वे ही उत्तम कथाओंके कहने-सुननेमे
प्रवृत्त होते हैँ । पापपरायण दुष्ट पुरुष तो सदा
दूसरोकी निन्दा ओर दूसरोके साथ कलह करनेमें
ही लगे रहते हें । द्विजवरो ! जो नराधम पुराणोमें
अर्थवाद होनेको शङ्का करते हँ, उनके किये हुए
समस्त पुण्य नष्ट हो जाते हँ । विप्रवरो ! मोहग्रस्त
मानव दूसरे-दूसरे का्येकि साधनमें लगे रहते है
परंतु पुराणश्रवणरूप पुण्यकर्मका अनुष्ठान नहीं
करते हें । श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो मनुष्य विना किसी
परिश्रमके यहां अनन्त पुण्य प्राप्त करना चाहता
हो, उसको भक्तिभावसे निश्चय ही पुराणोका
श्रवण करना चाहिये। जिस पुरुषकी चित्तवृत्ति
पुराण सुननेमे लग जाती हे, उसके पूर्वजन्मोपार्जित
समस्त पाप निस्संदेह नष्ट हो जाते हें । जो मानव
सत्सङ्ग, देवपूजा, पुराणकथा ओर हितकारी उपदेशमें
तत्पर रहता हे, वह इस देहका नाश होनेपर
भगवान् विष्णुके समान तेजस्वी स्वरूप धारण
करके उन्हींके परम धाममें चला जाता है।
अतः विप्रवरो! आपलोग इस परम पवित्र
नारदपुराणका श्रवण करे । इसके श्रवण करनेसे
मनुष्यका मन भगवान् विष्णुम संलग्न होता है
ओर वह जन्ममृत्यु तथा जरा आदिके बन्धनसे
छट जाता हे।
आदिदेव भगवान् नारायण श्रेष्ठ, वरणीय,
वरदाता तथा पुराणपुरुष हं । उन्होने अपने प्रभावसे
सम्पूर्णं लोकोंको व्याप्त कर रखा है । वे भक्तजनोके
मनोवाञ्छित पदार्थको देनेवाले है । उनका स्मरण
करके मनुष्य मोक्षपदको प्राप्त कर लेता है।
ब्राह्मणो ! जो ब्रह्मा, शिव तथा विष्णु आदि भिन्न-
भिन्न रूप धारण करके इस जगत्कौ सृष्टि, संहार
ओर पालन करते है, उन आदिदेव परम पुरुष
परमेश्चरको अपने हदयमें स्थापित करके मनुष्य
मुक्ति पा लेता है। जो नाम ओर जाति आदिकी
कल्पनाओंसे रहित हे, सर्वश्रेष्ठ तत्त्वोंसे भी परम
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पूर्वभाग-प्रथम पाद ५
उत्कृष्ट हे, परात्पर पुरुष हँ, उपनिषष्टोके द्वारा
जिनके तत्त्वका ज्ञान होता है तथा जो अपने प्रेमी
भक्तोके समक्ष ही सगुण-साकार रूपमे प्रकट होते
हे, उन्हीं परमेश्चरकी समस्त पुराणों ओर वेदोके
द्वारा स्तुति कौ जाती है । अतः जो सम्पूर्णं जगतके
ईश्वर, मोक्षस्वरूप, उपासनाके योग्य, अजन्मा,
परम रहस्यरूप तथा समस्त पुरुषार्थोकि हेतु हैँ
उन भगवान् विष्णुका स्मरण करके मनुष्य भवसागरसे
पार हो जाता है। धर्मात्मा, श्रद्धालु, मुमुक्षु, यति
तथा वीतराग पुरुष ही यह पुराण सुननेके अधिकारी
हे । उन्हींको इसका उपदेश करना चाहिये । पवित्र
दशमे, देवमन्दिरके सभामण्डपमे, पुण्यक्षेत्रमे,
पुण्यतीर्थमें तथा देवताओं ओर ब्राह्मणोके समीप
पुराणका प्रवचन करना चाहिये । जो मनुष्य पुराण-
कथाके बीचमे दूसरेसे बातचीत करता हे, वह
भयङ्कर नरकमें पडता हे । जिसका चित्त एकाग्र
नहीं हे, वह सुनकर भी कुछ नहीं समञ्चता। अतः
एकचित्त होकर भगवत्कथामृतका पान करना
चाहिये । जिसका मन इधर-उधर भटक रहा हो,
उसे कथा-रसका आस्वादन केसे हो सकता है?
संसारमें चञ्चल चित्तवाले मनुष्यको क्या सुख
मिलता हे? अतः दुःखकी साधनभूत समस्त
कामनःओंका त्याग करके एकाग्रचित्त हो भगवान् ,
विष्णुका चिन्तन करना चाहिये। जिस किसी
उपायसे भी यदि अविनाशी भगवान् नारायणका
स्मरण किया जाय तो वे पातकी मनुष्यपर भी
निस्संदह प्रसन्न हो जाते हें । सम्पूर्णं जगत्के स्वामी
तथा सर्वत्र व्यापक अविनाशी भगवान् विष्णुमें
जिसकी भक्ति है, उसका जन्म सफ़ल हो गया ओर
मुक्ति उसके हाथमे हे । विप्रवरो ! भगवान् विष्णुके
भजनमें संलग्र रहनेवाले पुरुषोको धर्म, अर्थ, काम
ओर मोक्ष- चारों पुरुषार्थं प्राप्त होते है ।
नारदजीद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति
ऋषि्योनि पूछा- सूतजी ! सनत्कुमारजीने महात्मा
नारदको किस प्रकार सम्पूर्णं धर्मोका उपदेश
किया तथा उन दोनोंका समागम किस तरह
हुआ 2 वे दोनों ब्रह्मवादी महात्मा किस स्थानम
स्थित होकर भगवान्की महिमाका गान करते थे ?
यह हमें बताइये । ।
सूतजी बोले- महात्मा सनक आदि ब्रह्माजीके
मानस पुत्र हैँ । उनमें न ममता है ओर न अहद्भार ।
वे सभी नैष्ठिक ब्रह्मचारी हँ । उनके नाम बतलाता
हू, सुनिये। सनक, सनन्दन, सनत्कुमार ओर
सनातन-इन्हीं नामोसे उनकी ख्याति है। वे चायं
महात्मा भगवान् विष्णुके भक्त है तथा निरन्तर
परब्रह्म परमात्माके चिन्तनमें तत्पर रहते दै।
उनका प्रभाव सहस्र सू्येकि समान है । वे सत्यव्रती
तथा मुमुक्षु है । एक दिनकी बात है, वे मेरुगिरिके
शिखरपर ब्रह्माजीकौ सभामें जा रहे थे। मार्गमं
उन्हें भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई गङ्गाजीका
दर्शन हआ। यह उन्हे अभीष्ट॒था। गङ्गाजीका
दर्शन करके वे चारों महात्मा उनको सीता नामवाली
धाराके जलमें स्नान करनेको उद्यत हुए । द्विजवशे
इसी समय देवर्षिं नारदमुनि भी वहाँ आ पहुचे
ओर अपने बडे भाइयोंको वहां स्रानके लिये उद्यत
देख उन्हं हाथ जोड़कर नमस्कार किया। उस
समय वे प्रेम-भक्तिके साथ भगवान् मधुसूदनके
नामोका कीर्तन करने लगे-"नारायण! अच्युत
अनन्त! वामदेव ! जनार्दन ! यज्ञेश! यज्ञपुरुष! कृष्ण ।
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0\ 6810011
६ संक्षिप्त नारदपुराण
विष्णु! आपको नमस्कार है। कमटःनयन।
महत्त्व समञ्ञाइये, जिससे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते
कमलाकान्त! गङ्गाजनक! केशव! क्षीरसमुद्रमें | हे । हे नाथ ! इस प्रकारके ओर भी जो गुह्य सत्कर्म
शयन करनेवाले देवेश्वर ! दामोदर ! आपको नमस्कार
हे। श्रीराम! विष्णो! नृसिंह! वामन! प्रदयम्र।
संकर्षण! वासुदेव ! अज! अनिरुद्ध! निर्मल
प्रकाशस्वरूप । मुरारे! आप सब प्रकारके भयसे
निरन्तर हमारी रक्षा कीजिये।' इस प्रकार उच्च
स्वरसे हरिनामका उच्चारण करते हए उन अग्रज
मुनियोको प्रणाम करके वे उनके पास बैठे ओर
उन्हीके साथ प्रसन्नतापूर्वक वहां सान भी किया।
सम्पूर्णं लोकोंका पाप दूर करनेवाली गङ्गाकी धारा
सीताके जलमें स्नान करके उन निष्पाप मुनियोने
देवताओं, ऋषियों तथा पितयोका तर्पण किया।
फिर जलसे बाहर आकर संध्योपासन आदि अपने
नित्य-नियमका पालन किया । तत्पश्चात् वे भगवान्
नारायणके गुणोंसे सम्बन्ध रखनेवाली नाना प्रकारकी
कथा-वार्तां करने लगे। उस मनोरम गङ्गातरपर
सनकादि मुनियोने जब अपना नित्यकर्म समाप्त
कर लिया, तब देवर्षिं नारदने अनेक प्रकारकी
कथा-वातकि बीच उनसे इस प्रकार प्रश्न किया।
नारदजी बोले- मुनिवरो! आपलोग सर्वज्ञ
है । सदा भगवानूके भजनमें तत्पर रहते है । आप
सब-के-सब सनातन भगवान् जगदीश्वर हैँ ओर
जगतकरे उद्धारमें तत्पर रहते हैँ । दीन-दुःखियोके
प्रति मैत्रीभाव रखनेवाले आप महानुभावोंसे मेँ
कुछ प्रश्न पूता ह, उसे बताये । विद्वानो ! मुञ्चे
भगवानूका लक्षण बताइये । यह सम्मूर्णं स्थावर-
जङ्गम जिनसे उत्पन्न हुआ है, भगवती ग्धा
जिनके चरणोंका धोवन है, वे भगवान् श्रीहरि
केसे जाने जाते है ? मनुष्योके मन, वाणी, शरीरसे
किये हुए कर्म केसे सफल होते है 2 सबको मान
देनेवाले महात्माओ ! ज्ञान ओर तपस्याका भी
भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेवाले ह, उन सबका
मुञ्चपर अनुग्रह करके यथार्थ रूपसे वर्णन कीजिये।
१८
तदनन्तर नारदजी भगवान्की स्तुति करने
लगे-'जो परसे भी परे परम प्रकाशस्वरूप
परमात्मा सम्पूर्णं कार्य-कारणरूप जगते अन्तर्यामी-
रूपसे निवास करते ह तथा जो सगुण ओर
निर्गुणरूप हें, उनको नमस्कार है। जो मायासे
रहित है, परमात्मा जिनका नाम दै, माया
जिनकी शक्ति है, यह सम्पूर्णं विश्च जिनका
स्वरूप हे, जो योगि्योके ईश्वर, योगस्वरूप
तथा योगगम्य हँ, उन सर्वव्यापी भगवान् विष्णुको
नमस्कार है। जो ज्ञानस्वरूप, ज्ञानगम्य तथा
सम्पूर्णं ज्ञानके एकमात्र हेतु हैं, ज्ञानेश्वर, जेय,
ज्ञाता तथा विज्ञानसम्पत्तिरूप हैँ, उन परमात्माको
नमस्कार है। जो ध्यानस्वरूप, ध्यानगम्य तथा
ध्यान करनेवाले साधकोके पापका नाश करनेवाले
ठे; जो ध्यानके ईश्वर श्रेष्ठ बुद्धिसे युक्त तथा
ध्याता, ध्येयस्वरूप हैँ; उन परमेश्वरको नमस्कार
लक्षण बतलाइये। साथ ही अतिथि-पूजाका भी । है। सूर्य, चन्द्रमा, अग्रि तथा ब्रह्मा आदि देवता,
((-0. 1\/॥11104/5511॥1 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद ७
सिद्ध, यक्ष, असुर ओर नागगण जिनकी
संयुक्त होकर ही कुछ करनेमें समर्थ होते हैँ
जो अजन्मा, पुराणपुरुष, सत्यस्वरूप तथा स्तुतिके
अधीश्वर हें, उन परमात्माको मेँ सर्वदा नमस्कार
करता हू। ब्रह्मन्! जो ब्रह्माजीका रूप धारण
करके संसारकौ सृष्टि ओर विष्णुरूपसे जगत्का
पालन करते हँ तथा कल्पका अन्त होनेपर जो
रुद्ररूप धारण करके संहारमें प्रवृत्त होते हैँ
ओर एकार्णवके जलम अक्षयवटके पत्रपर
शिशुरूपसे अपने चरणारविन्दका रसपान करते
हए शयन करते हैँ, उन अजन्मा परमेश्चरका मेँ
भजन करता हू । जिनके नामका संकीर्तन करनेसे
गजराज ग्राहके भयानक बन्धनसे मुक्त हो गया,
जो प्रकाशस्वरूप देवता अपने परम पदमे नित्य
विराजमान रहते हँ, उन आदिपुरुष भगवान्
विष्णुकौ मै शरण लेता हूं। जो शिवकी भक्ति
करनेवाले पुरुषोके लिये शिवस्वरूप ओर विष्णुका
ध्यान करनेवाले भक्तोके लिये विष्णुस्वरूप हे,
जो संकल्पपूर्वक अपने देहधारणमें स्वयं ही
हेतु हैँ, उन नित्य परमात्माकी मैं शरण लेता
हू। जो केशी तथा नरकासुरका नाश करनेवाले
हे, जिन्होने बाल्यावस्थामें अपने हाथके अग्रभागसे
गिरिराज गोवर्धनको धारण किया था, पृथ्वीके
भारका अपहरण जिनका स्वाभाविक विनोद दै
उन दिव्य शक्तिसम्पन्न भगवान् वासुदेवको में
सदा प्रणाम करता हू। जिन्होने खम्भमें भयङ्कर
नृसिहरूपसे अवतीर्णं हो पर्वतको चट्वानके समान
कठोर दैत्य हिरण्यकशिपुके वक्षःस्थलको विदीर्ण
करके अपने भक्त प्रहादकी रक्षा कौ; उन
अजन्मा परमेश्वरको मै नमस्कार करता हूं। जो
आकाश आदि तत्त्वोसे विभूषित, परमात्मा नामसे
प्रसिद्ध, निरञ्जन, नित्य, अमेयतत्तव तथा कर्मरहित
है, उन विश्वविधाता पुराणपुरुष परमात्माको मैं
नमस्कार करता हू्। जो ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अग्रि,
वायु, मनुष्य, यक्ष, गन्धर्व, असुर तथा देवता
आदि अपने विभिन्न स्वरूपोके साथ स्थित हैं
जो एक अद्वितीय परमेश्वर हैँ, उन आदिपुरुष
परमात्माका मे भजन करता हूं। यह भैदयुक्त
सम्पूर्ण जगत् जिनसे उत्पन्न हुआ है, जिनमें
स्थित है ओर संहारकालमें जिनमें लीन हो
जायगा, उन परमात्माकी मैं शरण लेता हूं। जो
विश्चरूपमे स्थित होकर यहां आसक्त-से प्रतीत
होते हें, परंतु वास्तवमें जो असङ्ग ओर परिपूर्ण
हे, उन परमेश्वरकौ म शरण लेता हूं जो
भगवान् सबके हदयमें स्थिर होकर भी मायासे
मोहित चित्तवालोके अनुभवमें नहीं आते तथा
जो परम शुद्धस्वरूप हं, उनको मैं शरण लेता
हूं। जो लोग सव प्रकारकी आसक्तियोसे दूर
रहकर ध्यानयोगे अपने मनको लगाये हए है,
उन्हं जो सर्वत्र ज्ञानस्वरूप प्रतीत होते हैं, उन
परमात्माकी मं शरण लेता हुं। क्षीरसागरे
अमृतमन्थनके समय जिन्होने देवताओंके हितके
लिये मन्दराचलको अपनी पीठपर धारण किया
था, उन कूर्म-रूपधारी भगवान् विष्णुकी मँ
शरण लेता हूं। जिन अनन्त परमात्माने अपनी
दादोके अग्रभागद्रारा एकार्णवके जलसे इस
पृथ्वीका उद्धार करके सम्पूर्णं जगत्को स्थापित
किया, उन वाराह-रूपधारी भगवान् विष्णुको
मे नमस्कार करता हूं । अपने भक्त प्रह्ादकी
रक्षा करते हुए जिन्होने पर्वतकी शिलाके समान
अत्यन्त कठोर वक्षवाले हिरण्यकशिपु दैत्यको
विदीर्ण करके मार डाला था, उन भगवान्
नृसिहको मं नमस्कार करता हू । विरोचनकुमार
वलिसे तीन पग भूमि पाकर जिन्होने दोही
पगोसे ब्रह्मलोकपर्यन्त सम्पूर्ण विश्वको माप
लिया ओर उसे पुनः देवताओंको समर्पित कर
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0\ 6810011
[ द
८ संक्षिप्त नारदपुराण
दिया, उन अपराजित भगवान् वामनको में
नमस्कार करता हू। हैहयराज सहस्रवाहु अर्जुनके
अपराधसे जिन्होंने समस्त क्षत्रियकुलका इक्षीस
बार संहार किया, उन जमदग्रिनन्दन भगवान्
परशुरामको नमस्कार हे। जिन्होंने राम, लक्ष्मण,
भरत ओर शत्रुघ्र-इन चार रूपोमें प्रकट हो
वानरोंकी सेनासे धिरकर राक्षसदलका संहार
किया था, उन भगवान् श्रीरामचन्द्रको में नमस्कार
करता हू । जिन्होने श्रीवलराम ओर श्रीकृष्ण--इन
दो स्वरूपोंको धारण करके पृथ्वीका भार उतारा
ओर अपने यादवकुलका संहार कर दिया, उन
भगवान् श्रीकृष्णका में भजन करता हुं। भूः,
भुवः, स्वः- तीनों लोकोमें व्याप्त अपने हदयमें
साक्षात्कार करनेवाले निर्मल वुद्धरूप परमेश्वरका
मे भजन करता हू । कलियुगके अन्तमे अशुद्ध
चित्तवाले पापियोंको तलवारकी तीखी धारसे
मारकर जिन्होने सत्ययुगके आदिमे धर्मको स्थापना
को है, उन कल्किस्वरूप भगवान् विष्णुको में
प्रणाम करता हं। इस प्रकार जिनके अनेक
स्वरूपोकी गणना बडे-बड़ विद्वान् करोड़ों वर्षामि
भी नहीं कर सकते, उन भगवान् विष्णुका में
भजन करता हूं । जिनके नामक महिमाका पार
पानेमे सम्पूर्णं देवता, असुर ओर मनुष्य भी
समर्थं नहीं हँ, उन परमेश्वरको मै एक क्षुद्र
जीव किस प्रकार स्तुति करू। महापातक
मानव जिनके नामका श्रवण करनेमात्रसे ही
पवित्र हो जाते हे, उन भगवान्की स्तुति मुञ्च
जेसा अल्प-बुद्धिवाला व्यक्ति कैसे कर |
है । जिनके नामका जिस किसी प्रकार कीर्तन
^+»
अथवा श्रवण कर लेनेपर भी पापी पुरुष
अत्यन्त शुद्ध हो जाते हं ओर शुद्धात्मा मनुष्य
मोक्षको प्राप्त कर लेते है, निष्पाप योगीजन
अपने मनको बुद्धिमें स्थापित करके जिनका
साक्षात्कार करते हँ, उन ज्ञानस्वरूप परमेश्वरको
मे शरण लेता हूं। सांख्ययोगी सम्पूर्णं भूतोमें
आत्मारूपसे परिपूर्णं हए जिन जरारहित आदिदेव
श्रीहरिका साक्षात्कार करते हँ, उन ज्ञानस्वरूप
भगवान्का में भजन करता हूं। सम्पूर्णं जीव
जिनके स्वरूप हैँ, जो शान्तस्वरूप हँ, सबके
साक्षी, ईश्वर, सहस्रं मस्तकोँसे सुशोभित तथा
भावरूप हें, उन भगवान् श्रीहरिको मे वन्दना
करता हुं। भूत॒ ओर भविष्य चराचर जगत्को
व्याप्त करके जो उससे दस अङ्गुल ऊपर स्थित
हें, उन जरा-मृत्युरहित परमेश्वरका मैं भजन
करता ह| जो सृक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म,
महान्से भी अत्यन्त महान् तथा गृह्यसे भी
अत्यन्त गुह्य है, उन अजन्मा भगवान्को मेँ
बार-बार प्रणाम करता हू। जो परमेश्वर ध्यान,
चिन्तन, पूजन, श्रवण अथवा नमस्कारमात्र कर
लेनेपर भी जीवको अपना परम पद दे देते है,
उन भगवान् पुरुषोत्तमकी में वन्दना करता ह|
इस प्रकार परम पुरुष परमेश्वरको नारदजीके
स्तुति करनेपर नारदसहित वे सनन्दन आदि
मुनीश्वर बडी प्रसन्नताको प्राप्त हुए। उनके नेत्रोमें
आनन्दके ओंसू भर आये थे। जो मनुष्य प्रातः-
काल उठकर परम पुरुष भगवान् विष्णुके उपर्युक्त
स्तोत्रका पाठ करता हे, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त
होकर भगवान् विष्णुके लोकें जाता हे।
२9/२४
©©-0. ॥॥1111८॥९511॥ 118५811 \/88185 @0॥6011001. 0101260 0 66800011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
सृष्ठिक्रमका संक्षिप्त वर्णन; द्वीप, समुद्र ओर भारतवर्षका वर्णन, भारतमें
सत्कर्मानुष्टानकी महत्ता तथा भगवदर्पणपूर्वक कर्म करनेकी आज्ञा
नारदजीने पृषछा-सनकजी ! आदिदेव भगवान्
विष्णुने पूर्वकालमें ब्रह्मा आदिकी किस प्रकार सृष्ट
को 2 यह बात मुञ्चे बताद्ये; क्योकि आप सर्वज्ञ है ।
श्रीसनकजीने कहा- देवर्षे ! भगवान् नारायण
अविनाशी, अनन्त, सर्वव्यापी तथा निरञ्जन हैं।
उन्होने इस सम्पूर्णं चराचर जगत्को व्याप्त कर
रखा हे । स्वयंप्रकाश, जगन्मय महाविष्णुने आदिसष्टिकि
समय भिन्न-भिन्न गुणोका आश्रय लेकर अपनी
तीन मूर्तियोंको प्रकट किया। पहले भगवान्ने
अपने दाहिने अङ्कसे जगत्की सृष्टिक लिये प्रजापति
ब्रह्मयाजीको प्रकट किया। फिर अपने मध्य अङ्खसे
जगत्का संहार करनेवाले रुद्र-नामधारी शिवको
उत्पन्न किया । साथ ही इस जगत्का पालन करनेके
लिये उन्होने अपने वारये अङ्गसे अविनाशी भगवान्
विष्णुको अभिव्यक्त किया। जरा-मृत्युसे रहित उन
आदिदेव परमात्माको कुछ लोग “शिव नामसे
पुकारते हैँ । कोई सदा सत्यरूप "विष्णु" कहते हैँ
ओर कुछ लोग उन्हें ' ब्रह्मा' वताते हँ । भगवान्
विष्णुको जो पराशक्ति है, वही जगत्रूपी कार्यका
सम्पादन करनेवाली है । भाव ओर अभाव-दोनों
उसीके स्वरूप हैँ । वही भावरूपसे विद्या ओर
अभावरूपसे अविद्या कहलाती है। जिस समय
यह संसार महाविष्णुसे भिन्न प्रतीत होता है, उस
समय अविद्या सिद्ध होती है; वही दुःखका
कारण होती है। नारदजी ! जब तुम्हारी ज्ञाता,
ज्ञान, ज्ञेय रूपकी उपाधि नष्ट हो जायगी ओर
सब रूपोमे एकमात्र भगवान् महाविष्णु ही
है-एेसी भावना बुद्धिम होने लगेगी, उस समय
विद्याका प्रकाश होगा। वह अभेद-बुद्धि ही
विद्या कहलाती है। इस प्रकार महाविष्णुकी
मायाशक्ति उनसे भिन्न प्रतीत होनेपर जन्म-
मृत्युरूप संसार-बन्धनको देनेवाली होती है ओर
वही यदि अभेद-बुद्धिसे देखी जाय तो संसार-
बन्धनका नाश करनेवाली बन जाती है। यह
सम्पूर्णं चराचर जगत् भगवान् विष्णुको शक्तस
उत्पन्न हुआ है, इसलिये जङ्गम-जो चेष्टा करता
है ओर स्थावर-जो चेष्टा नहीं करता, वह
सम्पूर्णं विश्च भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है। जैसे
घट, मठ आदि भिन्न-भिन्न उपाधियोके कारण
आकाश भिन्न-भिन्न रूपमे प्रतीत होता है, उसी
प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् अविद्यारूप उपाधिके
योगसे भिन्न-भिन्र प्रतीत होता है। मुने! जैसे
भगवान् विष्णु सम्पूर्णं जगते व्यापक है, उसी
प्रकार उनकी शक्ति भी व्यापक है; जैसे अङ्गारमें
रहनेवाली दाहशक्ति अपने आश्रयमें व्याप्त होकर
स्थित रहती है। कुछ लोग भगवानूकी उस
शक्तिको लक्ष्मी कहते है तथा कुछ लोग उसे
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 60810011
रिका कक कक
कन्दक >> = क = =
त जा नाक किणि कित केत
९० संक्षिप्त नारदपुराण
उमा ओर भारती (सरस्वती) आदि नाम देते हे।
भगवान् विष्णुको वह परा शक्ति जगत्को सृष्टि
आदि करनेवाली हे । वह व्यक्त ओर अव्यक्तरूपसे
सम्पूर्णं जगत्को व्याप्त करके स्थित है। जो
भगवान् अखिल विश्वको रक्षा करते है, वे ही
परम पुरुष नारायण देव हँ । अतः जो परात्पर
अविनाशी तत्त्व हे, परमपद भी वही है; वही
अक्षर, निर्गुण, शुद्ध, सर्वत्र परिपूर्ण एवं सनातन
परमात्मा है; वे परसे भी परे ह । परमानन्दस्वरूप
परमात्मा सब प्रकारकी उपाधि्योसे रहित हे।
एकमात्र ज्ञानयोगके द्वारा उनके ततत्वका बोध होता
हे। वे सबसे परे हें । सत्, चित् ओर आनन्द ही
उनका स्वरूप हे। वे स्वयं प्रकाशमय परमात्मा
नित्य शुद्ध स्वरूप है तथापि तत्त्व आदि गुणोके
भेदसे तीन स्वरूप धारण करते हे । उनके ये ही
तीनों स्वरूप जगत्को सृष्टि, पालन ओर संहारके
कारण होते हे । मुने ! जिस स्वरूपसे भगवान् इस
जगत्को सृष्टि करते हैँ, उसीका नाम ब्रह्मा है । ये
ब्रह्माजी जिनके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए हे, वे ही
आनन्दस्वरूप परमात्मा विष्णु इस जगत्का पालन
करते हे । उनसे बदकर दूसरा कोई नहीं है । वे
सम्पूर्णं जगते अन्तर्यामी आत्मा हँ । समस्त
संसारमें वे ही व्याप्त हो रहे हैं। वे सबके साक्षी
तथा निरञ्जन हं। वे ही भिन्न ओर अभिन्न रूपमे
स्थित परमेश्वर हें । उन्हींकी शक्ति महामाया है,
जो जगत्को सत्ताका विश्वास धारण कराती है।
विश्वको उत्पत्तिका आदिकारण होनेसे विद्वान्
पुरुष उसे प्रकृति कहते हें । आदिसृष्टिके समय
लोकरचनाके लिये उद्यत हुए भगवान् महाविष्णुके
प्रकृति, पुरुष ओर काल-ये तीन रूप प्रकट होते
हे । शुद्ध अन्तःकरणवाले त्रह्मरूपसे जिसका साक्षात्कार
करते हँ, जो विशुद्ध परम धाम कहलाता है, वही
विष्णुका परम पद हे । इसी प्रकार वे शुद्ध, अक्षर,
अनन्त परमेश्वर ही कालरूपमें स्थित हें। वे ही
सत्व, रज, तम-रूप तीनों गुणोमे विराज रहे हँ
तथा गुणोके आधार भीवे ही हैं। वे सर्वव्यापी
परमात्मा ही इस जगत्के आदि-सखष्टा हे । जगद्गुरु
पुरुषोत्तमके समीप स्थित हुई प्रकृति जब क्षोभ
(चञ्चलता) -को प्राप्त हुई, तो उससे महत्तत्वका
प्रादुभवि हुआ; जिसे समष्टि-बुद्धि भी कहते हें ।
फिर उस महत्तत्वसे अहंकार उत्पन्न हुआ । अहंकारसे
सूक्ष्म तन्मात्रा ओर एकादश इन्द्रियां प्रकर हई ।
तत्पश्चात् तन्मात्राओंसे पञ्च महाभूत प्रकट हुए, जो
इस स्थूल जगत्के कारण हैं । नारदजी ! उन
भूतोके नाम हं- आकाश, वायु, अग्रि, जल ओर
पृथ्वी। ये क्रमशः एक-एकके कारण होते है ।
तदनन्तर संसारकी सृष्टि करनेवाले भगवान्
ब्रह्माजीने तामस सर्गकी रचना की । तिर्यग् योनिवाले
पशु-पक्षी तथा मृग आदि जन्तुओंको उत्पन्न
किया। उस सर्गको पुरुषार्थका साधक न मानकर
ब्रह्माजीने अपने सनातन स्वरूपसे देवताओंको
(सात्विक सर्गको) उत्पन्न किया। तत्पश्चात् उन्होने
मनुप्योको (राजस सर्गको) सृष्टि कौ । इसके बाद
दक्ष आदि पुत्रोंको जन्म दिया, जो सृष्टिक कार्यमें
तत्पर हए ब्रह्माजीके इन पुत्रोंसे देवताओं, असुरो
तथा मनुष्योंसहित यह सम्पूर्ण जगत् भरा हुआ हे ।
भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक,
तपलोक तथा सत्यलोक-ये सात लोक क्रमशः
एकके ऊपर एक स्थित हे । विप्रवर! अतल, वितल,
सुतल, तलातल, महातल, रसातल तथा पाताल-ये
सात पाताल क्रमशः एकके नीचे एक स्थित हे । इन
सव लोकोमं रहनेवाले लोकपालोको भी ब्रह्माजीने
उत्पन्न किया। भिन्नर-भिन्र देशोके कुल पर्वतो ओर
नदिर्योकी भी सृष्टि की तथा वहकि निवासियोके
लिये जीविका आदि सब आवश्यक वस्तु्ओंकी भी
यथायोग्य व्यवस्था की । इस पृथ्वीके मध्यभागमें
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। (01661100. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
१९१
मेरु पर्वत है, जो समस्त देवताओंका ।
हे । जहो पृथ्वीको अन्तिम सीमा है, वहाँ लोकालोक
पर्वतकी स्थिति है। मेरु तथा लोकालोक पर्वतके
बीचमें सात समुद्र ओर सात द्वीप हेैं। विप्रवर।
प्रत्येक द्वीपमें सात-सात मुख्य पर्वत तथा निरन्तर
जल प्रवाहित करनेवाली अनेक विख्यात नदियां
भी हें । वहकि निवासी मनुष्य देवताओंके समान
तेजस्वी होते हें । जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश,
क्रौञ्च, शाक तथा पुष्कर-ये सात द्वीपोके नाम
हे । वे सव-की-सब देवभूमियां हें । ये सातो द्वीप
सात समुद्रोसे धिरे हए हें । क्षारोद, इक्षुरसोद,
सुरोद, घृत, दधि, दुग्ध तथा स्वादु जलसे भरे हए
वे समुद्र उन्हीं नामोसे प्रसिद्ध है । इन द्वीपो ओर
समुद्रोको क्रमशः पूर्व-पूर्वकी अपेक्षा उत्तरोत्तर
दूने विस्तारवाले जानना चाहिये । ये सब लोकालोक
पर्वततक स्थित हें। क्षार समुद्रसे उत्तर ओर
हिमालय पर्वतसे दक्षिणके प्रदेशको ! भारतवर्ष'
समञ्जना चाहिये। वह समस्त कर्मोका फल
देनेवाला है।
नारदजी ! भारतवर्षमे मनुष्य जो सात्विक,
राजसिक ओर तामसिक तीन प्रकारके कर्म करते
हे, उनका फल भोगभूमियोपें क्रमशः भोगा जाता
हे। विप्रवर। भारतवर्पमें किया हआ जो शुभ
अथवा अशुभ कर्म है, उसका क्षणभङ्गुरं (बचा
हआ) फल जो जीवोद्रारा अन्यत्र भोगा जाता हे ।
आज भी देवतालोग भारतभूमिमें जनम लेनेकी इच्छा
करते हं । वे सोचते ह, 'हमलोग कव संचित किये
हए महान् अक्षय, निर्मल एवं शुभ पुण्यके फलस्वरूप
भारतवर्षकी भूमिपर जन्म लेगे ओर कव वहां
महान् पुण्य करके परम पदको प्राप्त होगे। अथवा
वहां नाना प्रकारके दान, भति-भंतिके यज्ञ या
तपस्याके द्वारा जगदीश्वर श्रीहरिकी आराधना
करके उनके नित्यानन्दमय अनामय पदको कव
प्राप्त कर लेगे।' नारदजी ! जो भारतभूमिमें जन्म
लेकर भगवान् विष्णुकी आराधनामें लग जाता है
उसके समान पुण्यात्मा तीनों लोकोमें कोई नहीं
हे । भगवान्के नाम ओर गुणोका कीर्तन जिसका
स्वभाव वन जाता हे, जो भगवद्धक्तोका प्रिय होता
हे अथवा जो महापुरुपोकी सेवा-शुश्रूषा करता है,
वह देवताओके लिये भी वन्दनीय है। जो नित्य
भगवान् विष्णुकी आराधनामें तत्पर है अथवा
हरि-भक्तोके स्वागत-सत्कारमे संलग्न रहता है
ओर उन्हें भोजन कराकर बचे हुए (श्रेष्ट) अन्नका
स्वयं सेवन करता दे, वह भगवान् विष्णुके परम
पदको प्राप्त होता है। जो अहिंसा आदि ध्मोकि
पालनमें तत्पर होकर शान्तभावसे रहता है ओर
भगवानूके नारायण, कृष्ण तथा वासुदेव ' आदि
नामोका उच्चारण करता है, वह श्रेष्ठ इन्द्रादि
देवताओंके लिये भी वन्दनीय है। जौ मानव
` शिव, नीलकण्ठ तथा शङ्कर" आदि नामोद्रारा
भगवान् शिवका स्मरण करता तथा सदा सम्पूर्ण
जीवोके हितमें संलग्र रहता हे, वह (भी)
देवताओके लिये पूजनीय माना गया है। जो
गुरुका भक्त, शिवका ध्यान करनेवाला, अपने
आश्रम-धर्मकि पालनमें तत्पर, दूसरोके दोष न
देखनेवाला, पवित्र तथा कार्यकुशल है, वह भी
देवेश्वरोद्रारा पूज्य होता हे । जो ब्राह्यणोका हित-
साधन करता है, वर्णधर्मं ओर आश्रमधर्मपें श्रद्धा
रखता हे तथा सदा वेदोके स्वाध्यायमें तत्पर होता
हे, उसे ' पटक्तिपावन ' मानना चाहिये । जो देवेश्वर
भगवान् नारायण तथा शिवम कोई भेद नहीं
देखता, वह ब्रह्माजीके लिये भी सदा वन्दनीय है;
फिर हमलोगोकी तो वात ही क्या है? नारदजी।
जो गौओंकरे प्रति क्षमाशील-उनपर क्रोध न
करनेवाला, ब्रह्मचारी, परायी निन्दासे दूर रहनेवाला
तथा संग्रहसे रहित दै, वह भी देवताओंके लिये
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
~ ~ ज क ज कक जितिः ` कनि क्कि कि क ` `
कान्या ज रि कि > क~
४ त प ता 1 1
९२ संक्षि नारदपुराण
पूजनीय है । जो चोरी आदि दोषोंसे पराङ्मुख हे,
दूसरोद्रारा किये हुए उपकारको याद रखता हे
सत्य बोलता है, बाहर ओर भीतरसे पवित्र रहता
हे तथा दूसरोकी भलाईके कार्यमें सदा संलमग्र
रहता हे, वह देवता ओर असुर सबके लिये
पूजनीय होता है। जिसकी बुद्धि वेदार्थं श्रवण
करने, पुराणको कथा सुनने तथा सत्सद्घमें लगी
होती हे, वह भी इन्द्रादि देवताओद्रारा वन्दनीय
होता है । जो भारतवर्षमें रहकर श्रद्धापूर्वक पूर्वोक्त
प्रकारके अनेकानेक सत्कर्म करता रहता है, वह
हमलोगोके लिये वन्दनीय है।
जो शीघ्र ही इन पुण्यात्माओमेसे किसी
एकको श्रेणीमें अपने-आपको ले जानेकी चेष्टा
नहीं करता, वह पापाचारी एवं मूढ ही है; उससे
बढकर बुद्धिहीन दूसरा कोई नहीं हे । जो भारतवर्षमे
जन्म लेकर पुण्यकर्मसे विमुख होता है, वह
अमृतका घड़ा छोड़कर विषके पात्रको अपनाता
हे। मुने! जो मनुष्य वेदों ओर स्मृतियोमें बताये
धर्मोका आचरण करके अपने-आपको पवित्र
नहीं करता, वही आत्महत्यारा तथा पापियोंका
अगुआ हे। मुनीश्वर! जो कर्मभूमि भारतवर्पका
आश्रय लेकर धर्मका आचरण नहीं करता, वह
वेदस्न महात्माओंद्वारा सबसे “अधम ' कहा गया
हे। जो शुभ-कर्मोका परित्याग करके पाप-
कर्मोका सेवन करता है, वह कामधेनुको छोडकर
आकका दूध खोजता फिरता है। विप्रवर! इस
प्रकार ब्रह्मा आदि देवता भी अपने भोगोके नाशसे
भयभीत होकर भारतवर्षके भूभागकी प्रशंसा किया
करते हे । अतः भारतवर्षको सबसे अधिक पवित्र
तथा उत्तम समञ्चना चाहिये । यह देवताओके लिये
भी दुर्लभ तथा सब कर्मोका फल देनेवाला है । जो
इस पुण्यमय भूखण्डमें सत्कर्म करनेके लिये
उद्यत होता है, उसके समान भाग्यशाली तीनों
लोकोमें दूसरा कोई नहीं हे । जो इस भारतवर्षमें
जन्म लेकर अपने कर्मबन्धनको काट डालनेकी
चेष्टा करता हे, वह नररूपमें छिपा हुआ साक्षात्
"नारायण' हे। जो परलोकमें उत्तम फल प्राप्त
करनेको इच्छा रखता है, उसे आलस्य छोडकर
सत्कर्मोका अनुष्ठान करना चाहिये । उन कर्मोको
भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुको समर्पित कर देनेपर
उनका फल अक्षय माना गया हे । यदि कर्मफलोकी
ओरसे मनमें वैराग्य हो तो अपने पुण्यकर्मको
भगवान् विष्णुम प्रेम होनेके लिये उनके चरणोमें
समर्पित. कर दे। ब्रह्मलोकतलके सभी लोक
पुण्यक्षय होनेपर पुनर्जन्म देनेवाले होते हैँ; परंतु
जो कर्मोका फल नहीं चाहता, वह भगवान्
विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है । भगवान्की
प्रसन्नरताके लिये वेद-शास्त्रोद्रारा बताये हए
आश्रमानुकूल कर्मोका अनुष्ठान करना चाहिये ।
जिसने कर्म-फलकी कामना त्याग दी है, वह
अविनाशी पदको प्राप्त होता है। मनुष्य निष्काम
हो या सकाम, उसे विधिपूर्वकं कर्म अवश्य
करना चाहिये । जो अपने वर्णं ओर आश्रमके कर्म
छोड देता हे, वह विद्वान् पुरुषोंद्रारा पतित कहा
जाता हे। नारदजी ! सदाचारपरायण ब्राह्मण अपने
ब्रह्मयतेजके साथ वृद्धिको प्राप्त होता है। यदि वह
भगवान्के चरणोमे भक्ति रखता है तो उसपर
भगवान् विष्णु बहुत प्रसन्न होते हे । समस्त धममोकि
फल भगवान् वासुदेव है, तपस्याका चरम लक्ष्य
भी वासुदेव ही हँ, वासुदेवके तत्वको समञ्च लेना
ही उत्तम ज्ञान है तथा वासुदेवको प्राप्त कर लेना ही
उत्तम गति हे। ब्रह्माजीसे लेकर कीटपर्यन्त यह
सम्पूर्णं स्थावर-जङ्गम जगत् वासुदेवस्वरूप है,
उनसे भिन्न कुछ भी नहीं है। वे ही ब्रह्मा ओर शिव
ह, वे ही देवता, असुर तथा यज्चरूप हँ, वे ही यह
ब्रह्माण्ड भी ह । उनसे भिन्न अपनी पृथक् सत्ता
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पूर्वभाग-प्रथम पाद
रखनेवाली दूसरी कोई वस्तु नहीं है । जिनसे पर
या अपर कोई वस्तु नहीं हे तथा जिनसे अत्यन्त
१३
विष्णुने इस विचित्र विश्वको व्याप्त कर रखा है,
स्तुति करनेयोग्य उन देवाधिदेव श्रीहरिको सदा
लघु ओर महान् भी कोई नहीं है, उन्हीं भगवान् | प्रणाम करना चाहिये" ।
~~
१ क 0
श्रद्धा-भक्ति, वर्णाश्रमोचित आचार तथा सत्सङ्खकी महिमा, मृकण्डु मुनिकी
तपस्यासे संतुष्ट होकर भगवान्का मुनिको दर्शन तथा वरदान देना
श्रीसनकजी कहते टहैै- नारद! श्रद्धापूर्वक
आचरणमें लाये हए सब धर्म मनोवाज्छित फल
देनेवाले होते हैँ । श्रद्धासे सब कुछ सिद्ध होता है
ओर श्रद्धासे ही भगवान् श्रीहरि संतुष्ट होते हैँ ।
भक्तियोगका साधन भक्तिपूर्वक ही करना चाहिये
तथा सत्कर्मोका अनुष्ठान भी श्रद्धा-भक्तिसे ही करना
चाहिये । विप्रवर नारद! श्रद्धाहीन कर्म कभी सिद्ध
नहीं होते। जैसे सूर्यका प्रकाश समस्त जीरवोकों
चेष्टामें कारण होता हे, उसी प्रकार भक्ति सम्पूर्ण
सिद्धियोका परम कारण है। जेसे जल सम्पूर्ण
लोकोंका जीवन माना गया है, उसी प्रकार भक्ति
सब प्रकारकी सिद्धियोका जीवन हे। जेसे सब
जीव-जन्तु पृथ्वीका आश्रय लेकर जीवन धारण
करते है, उसी प्रकार भक्तिका सहारा लेकर सब
कार्योका साधन करना चाहिये। श्रद्धालु पुरुषको
धर्मका लाभ होता हे, श्रद्धालु ही धन पाता हे
पुरुष ही मोक्ष पाता है' मुनिश्रेष्ठ! दान, तपस्या
अथवा बहुत दक्षिणावाले यज्ञ भी यदि भक्तिसे रहित
हैं तो उनके द्वारा भगवान् विष्णु संतुष्ट नहीं होते हे ।
मेरु पर्वतके बराबर सुवर्णको करोड़ां सहस्र राशियोका
दान भी यदि विना श्रद्धा-भक्तिके किया जाय तो
वह निष्फल होता है। विना भक्ति जो तपस्या की
जाती है, वह केवल शरीरको सुखाना मात्र है; विना
भक्ति जो हविष्यका हवन किया जाता है, वह
राखमे डाली हई आहुतिके समान व्यर्थ टै, श्रद्धा-
भक्तिके साथ मनुष्य जो कुछ थोडा-सा भी सत्कर्म
करता है, वह उसे अनन्त कालतक अक्षय मुख
देनेवाला होता है । ब्रह्मन्! वेदोक्त अश्वमेध यक्चका
एक सहस्र बार अनुष्ठान क्यो न किया जाय, यदि
वह श्रद्धा-भक्तिसे रहित है तो सव-का-सव
निष्फल होता है । भगवान्की उत्तम भक्ति मनुष्योके
लिये कामधेनुके समान मानी गयी है; उसके रहते
श्रद्धासे ही कामनाओंकी सिद्धि होती है तथा श्रद्धालु | हए भी अज्ञानी मनुष्य संसाररूपी विषका पान
१. वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरं तपः। वासुदेवपरं शानं वासुदेवपरा गतिः॥
वासुदेवात्मकं स्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् । आब्रह्यस्तम्बपर्यन्तं तस्मादन्यत्र विद्यते ॥
स एव धाता त्रिपुरान्तकश्च स एव देवासुरय्रूपः । स एव ब्रह्माण्डमिदं ततोऽन्यत्न किंचिदस्ति व्यतिरिक्तरूपम्॥
यस्मात्परं नापरमस्ति र्वंचिद्यस्मादणीयात्र तथा महीयान् । व्याप्तं हि तेनेदमिदं विचित्रं तं देवदेवं प्रणमेत्समीड्यम्॥
२. श्रद्धापूर्वाः सर्वधर्मा
३. श्रद्धार्वह्लभते धर्म
(ना० पु० ३। ८०-८३)
मनोरथफलप्रदाः । श्रद्धया साध्यते सर्वे ॒श्रद्धया तुष्यते हरिः॥
(ना० पुं०४। १)
श्रद्धावानर्थमाप्नुयात् । श्रद्धया साध्यते कामः श्रद्धावान् मोक्षमाप्नुयात् ॥
(ना० पु० ४।६)
((-0. 1/८11114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
9 कक `क 99 त ज किः जक
९४ संक्षिप्त नारदपुराण
करते है, यह कितने आश्चर्यकी बात हे! ब्रह्मपुत्र
नारदजी । इस असार संसारमें ये तीन बाते ही सार
है--' भगवद्धक्तोका सद्ग, भगवान् विष्णुकी भक्ति
ओर सुख-दुःख आदि द्रन्द्को सहन करनेका
स्वभाव" । ब्रह्मन्! जिनके मनमें दूसरोके दोष
देखनेकी प्रवृत्ति है, उनके किये हए भजन-दान
आदि सभी कर्मोको निष्फल जानो । भगवान् विष्णु
उनसे बहुत दूर है । जो दूसरोकी सम्पत्ति देखकर
मन-ही-मन संतप्त होते हँ, जिनका चित्त पाखण्डपूर्ण
आचारोमे ही लगता हे, वे व्यर्थं कर्म करनेवाले हे ।
भगवान् श्रीहरि उनसे बहुत दूर हें। जो बड़-बड़
धमेकि विषयमे प्रश्न करते हँ, किंतु उन धर्मक
ञ्ुठा बताते हें ओर धर्म-कर्मके विषयमे जिनका
मन श्रद्धा-भक्तिसे रहित हे, एेसे लोगोसे भगवान्
विष्णु बहुत दूर हं । धर्मका प्रतिपादन वेदमें किया
गया है ओर वेद साक्षात् परम पुरुष नारायणका
स्वरूप हे। अतः वेदोमे जो अश्रद्धा रखनेवाले हैँ
उनसे भगवान् बहुत दूर है । जिसके दिन धर्मानष्ठानके
विना ही आते ओर चले जाते है, वह लुहारकीं
धोकनीके समान सोसि लेता हुआ भी जीवित नहीं
हे । ब्रह्मनन्दन ! धर्म, अर्थ, काम ओर मोक्ष-ये चार
पुरुषार्थं सनातन हैँ 1 श्रद्धालु पुरुषोंको ही इनकी
सिद्धि होती है; श्रद्धाहीनको नहीं ` । जो मानव
अपने वर्णाश्रमोचित आचारका उल्लद्कन किये विना
ही भगवान् विष्णुकी भक्तिमें तत्पर है, वह उस
वेकुण्ठधाममे जाता हे, जिसका दर्शन बड़े-बड़े
ज्ञानी भक्तोको सुलभ होता है । मुनीश्वर! जो अपने
आश्रमके अनुकूल वेदोक्त धर्मोका पालन करते हुए
भगवान् विष्णुके भजन-ध्यानमें लगा रहता हे, वह
परम पदको प्राप्त होता है। आचारसे धर्म प्रकट होता
हे ओर धर्मके स्वामी भगवान् विष्णु हें । अतः जो
अपने आश्रमके आचारमें संलग्न है, उसके द्वारा
भगवान् श्रीहरिं सर्वदा पूजित होतें है । जो छां
अद्खोसहित वेदों ओर उपनिषदोका ज्ञाता होकर भी
अपने वर्णाश्रमोचित आचारसे गिरा हुआ है, उसीको
पतित समञ्जना चाहिये; क्योकि वह धर्म-कर्मसे
भ्रष्ट हो चुका हे। भगवान्की भक्तिमें तत्पर तथा
भगवान् विष्णुके ध्यानमें लीन होकर भी जो अपने
वर्णाश्रमोचित आचारसे भ्रष्ट हो, उसे पतित कहा
जाता हे। द्विजश्रेष्ठ ! वेद, भगवान् विष्णुकी भक्ति
अथवा शिवभक्ति भी आचार-श्रष्ट मूढ पुरुषको
पवित्र नहीं करती हे। ब्रह्यन्! पुण्यक्षत्रोमे जाना,
पवित्र तीर्थोका सेवन करना अथवा भोति-भातिके
यज्ञोका अनुष्ठान भी आचार-भ्रष्ट पुरुषकी रक्षा नहीं
करता। आचारसे स्वर्ग प्राप्त होता हे, आचारसे सुख
मिलता हे ओर आचारसे ही मोक्ष सुलभ होता है;
आचारसे क्या नहीं मिलता 2
साधुश्रेष्ठ ! सम्पूर्ण आचारोका, समस्त योगोका
तथा स्वयं हरिभक्तिका भी मूल कारण भक्ति ही
मानी गयी हे। सबको मनोवाचज्छित फल प्रदान
करनेवाले भगवान् विष्णु भक्तिसे ही पूजित होते
हें । अतः भक्ति सम्पूर्णं लोकोंकी माता कही जाती
है। जेसे सब जीव माताका ही आश्रय लेकर
जीवन धारण करते हे, उसी प्रकार समस्त धार्मिक
१. हरिभक्तिः परा नृणां कामधेनूपमा स्मृता । तस्यां सत्यां पिवन्त्यज्ञाः संसारगरलं ह्यहो ॥
असारभूते संसारे सारमेतदजात्मज । भगवद्धक्तसङ्गश
हरिभक्तिस्तितिक्षुता ॥
(नाः पु ४1 १२-१३)
२. वेदप्रणिहितो धर्मो वेदो नारायणः परः । तत्राश्रद्धापरा ये तु तेषां दूरतरो हरिः ॥ (ना० पु० ४। १७)
३. धर्मार्थकाममोक्षाख्याः पुर्पार्थाः सनातनाः । श्रद्धावतां हि सिध्यन्ति नान्यथा ब्र्यनन्दन ॥ (ना० पु० ४। १९)
४. आचायप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः । आश्रमाचारयुक्तेन पूजितः सर्वदा हरिः ॥ (ना० पु० ४।२२)
((-0. ८1114451 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 68110011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
पुरुष भक्तिका आश्रय लेकर जीते हें । नारदजी ।
अपने वर्ण ओर आश्रमके आचारका पालन करनेमें
लगे हुए पुरुषको यदि भगवान् विष्णुकी भक्ति
प्राप्त हो जाय तो तीनों लोकम उसके समान दूसरा
कोई नहीं है । भक्तिसे कर्मोकी सिद्धि होती हे, उन
कर्मसि भगवान् विष्णु संतुष्ट होते है, उनके संतुष्ट
होनेपर ज्ञान प्राप्त होता है ओर ज्ञानसे मोक्ष
मिलता है। भक्ति तो भगवद्धक्तोके सङ्गसे प्राप्त
होती है, किंतु भगवद्धक्तोका सङ्ग मनुष्योको
पूर्वजन्मोके संचित पुण्यसे ही मिलता है। जो
वर्णाश्रमोचित कर्तव्यके पालनमें तत्पर, भगवद्धक्तिके
सच्वे अभिलाषी तथा काम, क्रोध आदि दोषोंसे
मुक्त है, वे ही सम्पूर्णं लोकोंको शिक्षा देनेवाले
संत ह । ब्रह्मन्! जो पुण्यात्मा अथवा जितेन्धिय
नहीं हँ, उन्हें परम उत्तम सत्सङ्गकी प्राति नहीं
होती । यदि सत्सङ्ग मिल जाय तो उसमें पूर्वजन्मोके
संचित पुण्यको ही कारण जानना चाहिये । जिसके
पूर्वजन्मोमें किये हुए समस्त पाप नष्ट हो जाते हँ
उसीको सत्सङ्ग सुलभ होता हे ; अन्यथा उसकी
प्राप्ति असम्भव है। सूर्य अपनी किरणोके समूहसे
दिनमें बाहरके अन्धकारका नाश करते हँ, किंतु
संत-महात्मा अपने उत्तम वचनरूपी किरणोके
समुदायसे सदा भीतरके अक्ानान्धकारका नाश
करते रहते ह । संसारम भगवद्धक्तिके लिये लालायित
रहनेवाले पुरुष दुर्लभ हँ; उनका सङ्ग जिसे प्राप्त
होता है, उसे सनातन शान्ति सुलभ होती हे ।
नारदजीने पृषछा--भगवद्धक्त पुरुषोका क्या
लक्षण है? वे कैसा कर्म करते है तथा उन्हं केसे
लोककी प्राति होती है 2 यह सब आप यथार्थरूपसे
बताइये । सनकजी ! आप सुदर्शनचक्रधारी देवाधिदेव
लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके भक्त हं । अतः आप
१५
ही ये सव बाते बतानेमें समर्थ है । आपसे बढ़कर
दूसरा कोई नहीं हे ।
सनकजीने कहा-- ब्रह्मन्! योगनिद्रासे मुक्त
होनेपर जगदीश्वर भगवान् विष्णुने बुद्धिमान् महात्मा
मार्कण्डेयजीको जिस परम गोपनीय रहस्यका
उपदेश किया था, वही तुम्हें बतलाता हू, सुनो।
वे जो परम ज्योतिःस्वरूप देवाधिदेव सनातन
भगवान् विष्णु है, वे ही जगत्-रूपमें प्रकट होते
हे । इस जगत्के सखष्टा भी वे ही हैँ । भगवान् शिव
तथा ब्रह्माजी भी उन्हीके स्वरूप हं । वे प्रलयकालमें
भयंकर रुद्ररूपसे प्रकट होते है ओर समस्त
ब्रह्माण्डको अपना ग्रास बनाते हैं। स्थावर-
जद्गमरूप सम्पूर्णं जगत् नष्ट होकर जब एकार्णवके
जलमें विलीन हो जाता है, उस समय भगवान्
विष्णु ही वटवृक्षके पत्रपर शिशुरूपसे शयन करते
हे । उनका एक-एक रोम असंख्य ब्रह्मा आदिसे
विभूषित होता है। महाप्रलयके समय जव भगवान्
वटपत्रपर सो रहे थे, उस समय उसी स्थानपर
भगवान् नारायणके परम भक्त महाभाग मार्कण्डेयजी
भगवान्की विविध लीलाओंका दर्शन करते हुए
खड थे।
ऋषियोने पूछा-- मुने! हमने पहलेसे सुन
रखा है कि उस महाभयंकर प्रलयकाले स्थावर-
जङ्गम समस्त प्राणी नष्ट॒हो गये थे ओर एकमात्र
भगवान् श्रीहरिं ही विराजमान थे। जब समस्त
चराचर जगत् नष्ट होकर एकार्णवे विलीन हो
चुका था, तव सबको अपना ग्रास बनानेवाले
श्रीहरिने मार्कण्डेय मुनिको किसलिये बचा रखा
था ? सूतजी ! इस विषयको लेकर हमारे मनमें
वड़ा कौतूहल हो रहा है । अतः इसका निवारण
कोजिये। भगवान् विष्णुकी सुयश-सुधाका पान
१. वर्णाश्रमाचाररता
भगवद्धक्तिलालसाः। कामादिदोषनि्मु्तास्ते सन्तो लोकशिक्षकाः ॥ (ना० पु०४। ३४)
((-0. 1/८11141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
निकाया ~ न 9१ कक +
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[वि 1 छ
१६ संक्षिप्त नारदपुराण
करनेमे किसे आलस्य हो सकता हे,
सूतजी बोले-- ब्राह्यणो ! पूर्वकालमें मृकण्डु
नामसे विख्यात एक महाभाग मुनि हो गये हैँ । उन
महातपस्वी महर्षिने शालग्राम नामक महान् तीर्थमें
बड़ी भारी तपस्या कौ । ब्रह्मन्! उन्होने दस हजार
यु्गोतक सनातन ब्रह्यका गुणगान करते हए
उपवास किया। वे बड क्षमाशील, सत्यप्रतिज्ञ तथा
जितेन्द्रिय थे। समस्त प्राणियोंको अपने समान
देखते थे। उनके मनमें विषय-भोगोके लिये
तनिक भी कामना नहीं थी। वे सम्पूर्णं जीवोके
हितैषी तथा मन ओर इन्द्रियोको वशमें रखनेवाले
थे। उन्होने उक्त तीर्थमें बड़ी भारी तपस्या की ।
उनको तपस्यासे शङ्कित हो इन्द्र आदि सब देवता
उस समय अनामय परमेश्वर भगवान् नारायणकी
शरणमे गये। क्षीरसागरके उत्तर तटपर जाकर
देवताओने देवदेवेश्वर जगदगुरु पद्यनाभका इस
प्रकार स्तवन किया।
देवता बोले- हे अविनाशी नारायण! दहे
अनन्त! हे शरणागतपालक। हम सब देवता
मृकण्डु मुनिको तपस्यासे भयभीत हो आपकी
शरणमे आये हैं । आप हमारी रक्षा कीजिये।
देवाधिदेवेश्वर ! आपकी जय हो। शङ्ख ओर गदा
धारण करनेवाले देवता! आपकी जय हो । यह
सम्पूर्णं जगत् आपका स्वरूप है । आपको नमस्कार
हे। आप ही ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिके आदि कारण
हे । आपको नमस्कार है। देवदेवेश्वर! आपको
नमस्कार हे। लोकपाल! आपको नमस्कार है।
सम्पूर्णं जगत्को रक्षा करनेवाले ! आपको नमस्कार
हे। लोकसाक्षिन्! आपको नमस्कार है । ध्यानगम्य
आपको नमस्कार है । ध्यानके हेतुभूत ! ध्यानस्वरूप
तथा ध्यानके साक्षी परमेश्वर! आपको नमस्कार
हे । पृथिवी आदि पाँच भूत आपके ही स्वरूप
है; आपको नमस्कार है। आप चैतन्यरूप रहै;
आपको नमस्कार हे। आप सबसे ज्येष्ठ हँ, आपको
नमस्कार हे। आप शुद्धस्वरूप हैँ, निर्गुण हे तथा
गुणरूप हैँ; आपको नमस्कार है। निराकार साकार
तथा अनेक रूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार
हे। गओं तथा ब्राह्यणोके हितैषी ! आपको नमस्कार
है। जगत्का हित-साधन करनेवाले सच्िदानन्दस्करूप
गोविन्द ! आपको बार-बार नमस्कार है।
इस प्रकार देवताओंद्रारा कौ हुई स्तुतिको
सुनकर शङ्ख, चक्र ओर गदा धारण करनेवाले
भगवान् लक्ष्मीपतिने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया।
उनके नेत्र खिले हुए कमलदलके समान शोभा पा
रहे थे। उनका करोड़ों सू्येकि समान प्रभाव था।
सब प्रकारके दिव्य आभूषणणोसे वे युक्त थे।
भगवानूके वक्षःस्थलपर श्रीवत्सचिह्न सुशोभित हो
रहा था। वे पीताम्बर धारण किये हुए थे। उनकी
आकृति बड़ी सौम्य थी। वायं कंधेपर सुनहले
रगका यज्ञोपवीत चमक रहा था। बड़े-बड़े महर्षि
उनको स्तुति कर रहे थे तथा श्रेष्ठ पार्षद उन्हें सब
ओरसे घेरकर खड थे। उनका दर्शन करके वे
सम्पूर्णं देवता उनके तेजके समक्ष फके पड़ गये
ओर बड़ी प्रसन्नताके साथ पृथिवीपर लेटकर
अपने आटो अद्खोसे उन्हें प्रणाम किया। तब
प्रसन्न हए भगवान् विष्णु प्रणाम करनेवाले
इन्द्रादि देवताओंको आनन्दित करते हए गम्भीर
वाणीमें बोले।
श्रीभगवान्ने कहा-देवताओ ! मै जानता हु,
मृकण्डु मुनिको तपस्यासे तुम्हारे मनमें बड़ा खेद
हो रहा हे, परंतु वे महर्षिं साधुपुरुषोमें अग्रगण्य
हे । अतः तुम्हं कष्ट नहीं देँगे। श्रेष्ठ देवताओं! जो
साधुपुरुष हँ, वे सम्पत्तिमें हों या विपत्तिमे, किसी
प्रकार भी दूसरेको कष्ट नहीं देते। वे स्वप्रमे भी
एेसा नहीं करते। सज्जनो! जो मानव सम्पूर्ण
जगत्का हित करनेवाला, दृसरोके दोष न देखनेवाला
((-0. 1\/॥८111101/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद्
तथा ईर्प्यारहित है, वह इहलोक ओर |
साधुपुरुषोद्रारा ' निःशङ्क ' कहा जाता है । सशङ्क
व्यक्ति सदा दुःखी रहता है ओर निःशङ्क पुरुष
सुख पाता ` हे। अतः तुमलोग निश्चिन्त होकर
अपने-अपने घर जाओ मृकण्डु मुनि तुम्हे कोई
कष्ट नहीं देगे । इसके सिवा तुम्हारी रक्षा करनेवाला
में तो हूं ही। अतः सुखपूर्वक विचरो।
इस प्रकार अलसीके फलकी भति श्यामकान्तिवाले
भगवान् विष्णु देवताओंको वर देकर उनके
देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये। देवताओंका
मन प्रसन्न हो गया। वे जैसे आये थे, उसी प्रकार
स्वर्गको लौट गये। भगवान् श्रीहरिने प्रसन्न होकर
मृकण्डुको भी प्रत्यक्ष दर्शन दिया। जो स्वयंप्रकाश,
निरञ्जन एवं निराकार परब्रह्म हैँ, वही अलसीके
पूलके समान श्यामसुन्दर विग्रह धारण करके
प्रकट हो गये। दिव्य आयुधोसे सुशोभित उन
पीताम्बरधारी भगवान् विष्णुको देखकर मृकण्डु मुनि
आश्र्यचकित हो गये। उन्होने ध्यानसे आंखें
खोलकर देखा, भगवान् विष्णु सम्मुख विराजमान
है । उनके मुखसे प्रसन्नता टपक रही है, वे
शान्तभावसे स्थित हें। जगत्का धारण-पोषण
९७
उन्हीके द्वारा होता है। यह सम्पूर्णं विश्च उन्हीका तेज
हे। भगवान्का दर्शन करके मुनिका शरीर पुलकित हो
उठा। उनके नेत्रोंसे आनन्दके ओंसू रने लगे। उन्हनि
पृथ्वीपर दण्डक भोति गिरकर उन देवाधिदेव सनातन
परमात्माको प्रणाम किया। फिर हर्षजनक ओंसुओंसे
भगवानूके दोनों चरण पखारते हए वे सिरपर अञ्जलि
वधे उनकी स्तुति करने लगे।
मृकण्डुजी बोले- परमात्मस्वरूप परमेश्वरको
नमस्कार है। जो परसे भी अति परे हैँ, जिनका
पार पाना असम्भव है, जो दूसरोपर अनुग्रह
करनेवाले तथा दूसरोको संसार-सागरके उस पार
पहुंचा देनेवाले हँ, उन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार
हे। जो नाम ओर जाति आदिकी कल्पनाओंसे
रहित हे, जिनका स्वरूप शब्दादि विषयोके दोषसे
दूर हे, जिनके अनेक स्वरूप हैँ तथा जो
तमोगुणसे सर्वथा शून्य हँ, उन स्तुति करनेयोग्य
परमेश्वरका में भजन करता हूं। जो वेदान्तवेद्य ओर
पुराणपुरुष हं, ब्रह्मा आदिसे लेकर सम्पूर्णं जगत्
जिनका स्वरूप है, जिनको कहीं भी उपमा नहीं
हे तथा जो भक्तजनोपर अनुग्रह करनेवाले है, उन
स्तवन करनेयोग्य आदिपरमेश्चरकी मँ आराधना
करता हूं। जिनके समस्त दोष दूर हो गये है, जो
एकमात्र ध्यानमें स्थित रहते हैँ, जिनकी कामना
निवृत्त ओर मोह दूर हो गये है,एेसे महात्मा पुरुष
जिनका दर्शन कसते ह, संसार-बन्धनको नष्ट करनेवाले
उन परम पवित्र परमात्माको मेँ प्रणाम करता हूं । जो
स्मरणमात्रसे समस्त पीड़ओंका नाश कर देते है,
शरणमे आये हुए भक्तजनोंका पालन करते ह, जो
समस्त संसारके सेव्य हँ तथा सम्पूर्णं जगत् जिनके
भीतर निवास करता है, उन करुणासागर परमेश्वर
विष्णुको म नमस्कार करता हूं ।
महरि मृकण्डुके टस प्रकार स्तुति करनेपर्
शङ्ख, चक्र ओर गदा धारण करनेवाले भगवान्
((-0. 1/८11141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
१८ संक्षिप्त नारदपुराण
विष्णुको बड़ी प्रसत्रता हई । उन्होने अपनी चार
विशाल भुजाओंसे खींचकर मुनिको हदयसे लगा
लिया ओर अत्यन्त प्रेमपूर्वक कहा-“उत्तम त्रतका
पालन करनेवाले मुने! तुम सर्वथा निष्पाप हो,
तुम्हारी तपस्या ओर स्तुतिसे मं बहुत प्रसन्न हूं।
तुम कोई वर मोगो। सुव्रत! तुम्हारे मनको जो
अभीष्ट हो, वही वर मोग लो।'
मृकण्डुने कहा- देवदेव ! जगन्नाथ ! में कृतार्थं
हो गया, इसमे तनिक भी संशय नहीं है; क्योकि
जो पुण्यात्मा नहीं हँ, उनके लिये आपका दर्शन
सर्वथा दुर्लभ हे । ब्रह्मा आदि देवता तथा तीक्ष्ण
त्रतका पालन करनेवाले योगीजन भी जिनका
दर्शन नहीं कर पाते, धर्मनिष्ठ, यज्ञोकी दीक्षा
लेनेवाले यजमान, वीतराग साधक तथा ईर््यरिहित
साधुओंको भी जिनका दर्शन दुर्लभ हे, उन्हीं परम
तेजोमय आप श्रीहरिका में दर्शन कर रहा हू
इससे बढकर दूसरा क्या वर मगृ ? जगद्गुरु
जनार्दन! में इतनेसे ही कृतार्थं ॒हू्। अच्युत
महापातको मनुष्य भी आपके नामोंका स्मरण
करनेमात्रसे आपके परम पदको प्राप्त कर लेते है;
फिर जो आपका दर्शन कर लेता है, उसके लिये
तो कहना ही क्या हे?
श्रीभगवान् बोले-- ब्रह्मन्! तुमने ठीक कहा
हे । विद्वन्! में तुमपर बहुत प्रसन्न हूं, मेरा दर्शन
कदापि व्यर्थं नहीं होगा। अतः तुम्हारी तपस्यासे
संतुष्ट होकर में तुम्हारे यहो (अंशरूपसे) समस्त
गुणोसे युक्त, रूपवान् तथा दीर्घजीवी पुत्रके रूपमें
उत्पन्न होऊंगा। मुनिश्रेष्ठ! जिसके कुलमें मेरा
जन्म होता है, उसका समस्त कुल मोक्षको प्राप्त
कर लेता हे। मेरे प्रसन्न होनेपर तीनों लोकोमें
कौन-सा कार्य असाध्य हेै।
एेसा कहकर देवदेवेश्वर भगवान् विष्णु मृकण्डु
मुनिके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये । तदनन्तर
वे मुनि तपस्यासे निवृत्त हो गये।
=^ ९24९८ +^ =+
मार्कण्डेयजीक्को पिताका उपदेश, समय-निरूपण, मार्कण्डयद्वारा भगवानकी स्तुति
ओर भगव्रान्का मार्कण्डयजीको भगवद्रक्तोके लक्षण बताकर वरदान देना
नारदजीने पूछा--त्रह्यन्! पुराणोमे यह सुना
जाता हे कि चिरञ्जीवी महामुनि मार्कण्डेयने इस
जगत्के प्रलयकालमे भगवान् विष्णुको मायाका
दर्शन किया था, अतः इस विषयमे कहिये।
श्रीसनकजीने कहा- नारदजी ! मैं उस सनातन
कथाका वर्णन करूगा, आप सावधान होकर सुनें !
मार्कण्डेय मुनिस सम्बन्ध रखनेवाली यह कथा
भगवान् विष्णुकी भक्तिसे परिपूर्णं है । साधुशिरोमणि
मृकण्डुने तपस्यासे निवृत्त होनेके बाद विवाह
करके प्रसत्नतापूर्वक गृहस्थधर्भका पालन आरम्भ
किया। वे मन ओर इन्दरियोका संयम करके सदा
प्रसन्न रहते ओर कृतार्थताका अनुभव करते थे।
उनको पत्री बड़ी पवित्र, कार्यकुशल तथा निरन्तर
पतिको सेवामें तत्पर रहनेवाली थीं। वे मन,
वाणी ओर शरीरसे भी पातित्रत-धर्मका पालन
करती थीं । समय आनेपर उन्होने भगवानूके तेजोमय
अंशसे युक्त गर्भं धारण किया ओर दस महीनेके
वाद एक परम तेजस्वी पुत्रको जन्म दिया।
महर्षि मृकण्डु उत्तम लक्षणोंसे सुशोभित पुत्रको
देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्हंनि विधिपूर्वक मद्गलमय
जातकर्म-संस्कार सम्पन्न कराया। मुनिका वह पुत्र
शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भति दिन-दिन बदढने
((-0. 1/11104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
१९
लगा। विप्रवर! तदनन्तर पांचवें वर्षमें प्रसन्नतापूर्वक
पुत्रका उपनयन- संस्कार करके मुनिने उसे वैदिक-
धर्म-संहिताको शिक्षा दी ओर कहा-“बेटा।
ब्राह्यणोका दर्शन होनेपर सदा विधिपूर्वक उन्हें
नमस्कार करना चाहिये। तीनों समय सूर्यको
जलाञ्जलि देकर उनकी पूजा करना ओर वेदोके
स्वाध्यायपूर्वक वेदोक्त कर्मका पालन करते रहना
चाहिये । ब्रह्मचर्य तथा तपस्याके द्वारा सदा श्रीहरिकों
पूजा करनी चाहिये । दुष्ट पुरुषोंसे वार्तालाप आदि
निषिद्ध कर्मको त्याग देना चाहिये। भगवान्
विष्णुके भजनमें लगे हुए साधुपुरुषोके साथ रहना
चाहिये। किसीसे भी द्वेष रखना उचित नहीं हे ।
सबके हितका साधन करना चाहिये । वत्स ! यज्ञ,
अध्ययन ओर दान-ये कर्म तुम्हं सदा करने
चाहिये।
इस प्रकार पिताका आदेश पाकर मुनीश्वर
मार्कण्डेय नित्य-निरन्तर भगवान् विष्णुका चिन्तन
करते हए स्वधर्मका पालन करने लगे। महाभाग
मार्कण्डेय बड़े धर्मानुरागी ओर दयालु थे। वे मनको
वशमें रखनेवाले ओर सत्यप्रतिज्ञ थे। वे जितेन्िय,
शान्त, महाज्ञानी ओर सम्पूर्णं तत्त्वोके मर्मज्ञ थे।
उन्होने-भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये बड़ी भारी
तपस्या की । बुद्धिमान् मार्कण्डेयके आराधना करनेपर
जगदीश्वर भगवान् विष्णुने उन्हें पुराणसंहिता बनानेका
वर दिया। चिरञ्जीवी मार्कण्डेयजी सुदर्शनचक्रधारी
देवाधिदेव भगवान् विष्णुके महान् भक्त ओर उनके
तेजके अंश (अ० ५ श्लोक ६) थे। ब्रह्मन्! यह
संसार जब एकार्णवके जलमें विलीन हो गया,
उस समय भी उन्हे अपना प्रभाव दिखानेके लिये
भगवान् विष्णुने उनका संहार नहीं किया! मृकण्डुपुत्र
मार्कण्डेय बडे बुद्धिमान् ओर विष्णुभक्तं थे।
भगवान् श्रीहरि स्वयं जबतक सोते रहे, तवतक
मार्कण्डेयजी वहां खड रहे । उस समयका माप मेँ
( 1183 ] सं० ना० पु०२-
बतला रहा हू, सुनिये । पंद्रह निमेषकी एक काष्ठा
बतायी गयी हे। नारदजी ! तीस काष्टाकी एक
कला समञ्चन चाहिये। तीस कलाका एक क्षण
होता है ओर छः क्षणोंकी एक घड़ी मानी गयी
हे । दो घडीका एक मुहूर्तं ओर तीस मुहूर्तका एक
दिन होता हे। तीस दिनका एक मास होता है ओर
एक मासमं दो पक्ष होते हं । दो मासका एक ऋतु
ओर तीन ऋतुओंका एक अयन माना गया है । दो
अयनसे एक वर्षं बनता है, जो देवताओंका एक
दिन है। उत्तरायण देवताओंका दिन है ओर
दक्षिणायन उनकी रात्रि हे। मनुष्योके एक मासके
बराबर पितरोका एक दिन कहा जाता हे । इसलिये
सूर्य ओर चनद्रमाके संयोगमें अर्थात् अमावस्याके
दिन उत्तम पितृकल्प जानना चाहिये । बारह हजार
दिव्य वर्षोका एक दैवत युग होता है। दो हजार
देवत युगके बराबर ब्रह्माके एक दिन-रात्रिका
मान है। वह मनुष्योके लिये सृष्टि ओर प्रलय
दोनों मिलकर ब्रह्माका दिन-रात-रूप एक कल्प
है । इकहत्तर दिव्य चतुर्युगका एक मन्वन्तर होता
है ओर चौदह मन्वन्तरोसे ब्रह्माजीका एक दिन
पूरा होता है। मुने! जितना बड़ ब्रह्माजीका दिन
होता है, उतनी ही बड़ी उनकी रात्रि भी बतायी
गयी है । विप्रवर! ब्रह्माजीकी रात्रिके समय तीनों
लोकोंका नाश हो जाता है। मानव वर्ष-गणनाके
अनुसार उसका जो प्रमाण है, वह सुनो । मुने! एक
हजार चतुर्युग (चार हजार युग) -का ब्रह्माजीका
एक दिन होता है । एेसे ही तीस दिनोका एक मास
ओर बारह महीनोंका उनका एक वर्षं सममन
चाहिये । एसे सौ वर्षेमिं उनकी आयु पूरी होती है।
उनके काल-मानके अनुसार उनकी सम्पूर्णं आयुका
समय दो परार्धका होता है! ब्रह्माजीका दो परार्ध
भगवान् विष्णुके लिये एक दिन समञ्जना चादिये।
इतनी ही बड़ी उनकी रत्रि भी बतायी गयी है।
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661100. 01411260 0 60810011
न जि कत कक जि ॐ नः
(3 त
२० संक्षि नारदपुराण
मृकण्डुनन्दन मा्कण्डयजी उतने ही समयतक उस
भयंकर एकार्णवके जलम भगवान् विष्णुकी शक्तिसे
बलवान् होकर स्त्रूखे पत्तेको भांति खड रहे। उस
समय वे श्रीहरिके समीप परमात्मतत्त्वका ध्यान
करते हुए स्थित थे।
तदनन्तर प्रलयकालका अन्त समयं आनेपर
योगनिद्रासे मुक्त हो श्रीहरिने ब्रह्माजीके रूपसे इस
चराचर जगत्को रचना कौ। जलका उपसंहार
ओर जगत्कौ नूतन सृष्टि देखकर मार्कण्डेयजी
चकित हो गये। उन्होने अत्यन्त प्रसन्न होकर
श्रीहरिके चरणोमे प्रणाम किया। महामुनि मार्कण्डेयन
सिरपर अञ्जलि बोधे नित्यानन्दस्वरूप श्रीहरिका
प्रिय वचनोद्रारा इस प्रकार स्तवन किया।
क [ ~ -: ५
न्मे = अ ष न ॥
= भन न भ
षण 1 मचे
= [ चुः; इ~
[मि ।
मार्कण्डयजी व्योले- जिनके सहस्रं मस्तक
हे, रोग-शोक आदिं विकारसे जो सर्वथा रहित हैँ,
जिनका कोई आधार नहीं है (स्वयं ही सबके
आधार है) तथा जो सर्वत्र व्यापक ठै, मनुष्योंसे
सदा प्राधित होनेवाले उन भगवान् नारायणदेवको
मे सदा प्रणाम करता हूं। जो प्रमाणसे परे तथा
जरावस्थासे रहित हैँ, नित्य एवं सच्चिदानन्दस्वरूप
है तथा जहां कोई तर्क या संकेत काम नहीं देता,
उन भगवान् जनार्दनको में प्रणाम करता हूं जो
परम अक्षर, नित्य, विश्वके आदिकारण तथा
जगत्के उत्पत्तिस्थान हँ, उन सर्वतत्त्तमय शान्तस्वरूप
भगवान् जनार्दनको में नमस्कार करता हूं जो
पुरातन पुरुष सब प्रकारको सिद्धियोँसे सम्पन्न
ओर सम्पूर्ण ज्ञानके एकमात्र आश्रय हैं, जिनका
स्वरूप परसे भी अति परे है, उन भगवान्
जनार्दनको में नमस्कार करता हूं। जो परम ज्योति,
परम धाम तथा परम पवित्र पद हैँ, जिनकी सबके
साथ एकरूपता है, उन परमात्मा जनार्दनको मेँ
प्रणाम करता हूं। सत्, चित् ओर आनन्द ही
जिनका स्वरूप है, जो सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मादि देवताओंके
लिये भी परम पद है, उन सर्वस्वरूप श्रेष्ठ सनातन
भगवान् जनार्दनको में नमस्कार करता हूं। जो
सगुण, निर्गुण, शान्त, मायातीत ओर विशुद्ध
मायाके अधिपति ह तथा जो रूपरहित होते हए
भी अनेक रूपवाले हे, उन भगवान् जनार्दनको मेँ
प्रणाम करता हू। जो भगवान् इस जगत्की सृष्टि
पालन ओर संहार करते हँ, उन आदिदेव भगवान्
जनार्दनको मैं नमस्कार करता हूं । परेश! परमानन्द ।
शरणागतवत्सल ! दयासागर! मेरी रक्षा कीजिये। मन-
वाणीसे अतीत परमेश्वर! आपको नमस्कार हेै।
विप्रवर नारदजी ! शङ्ख, चक्र ओर गदा धारण
करनेवाले जगद्गुरु भगवान् विष्णु इस प्रकार
स्तुति करनेवाले मार्कण्डेयजीसे अत्यन्त प्रसन्नता-
पूर्वक बोले।
श्रीभगवानने कहा-- द्विजश्रेष्ठ । संसारम जो
भक्त पुरुष मुञ्च भगवान्को भक्तिमें चित्त लगाये
रहनेवाले हँ, उनपर संतुष्ट हो मँ सदा उनकी रक्षा
करता हू, इसमे संदेह नहीं है । भगवद्धक्तरूपसे
अपनेको छिपाकर मेँ ही सदा सब लोकोंकी रक्षा
करता हूं |
((-0. 1/८11114/5511॥ 8118811 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
[क 17,
पूर्वभाग-प्रथम पाद
मार्कण्डयजीने पूरछा-- भगवन्! भगवद्धक्तके
क्या लक्षण हैं? किस कर्मसे मनुष्य भगवद्भक्त
होते है, यह में सुनना चाहता हू; क्योकि इस
बातको जाननेके लिये मेरे मनमें बडी उत्कण्ठा है।
श्रीभगवानने कहा-- मुनिश्रेष्ठ । भगवद्धरक्तोके
लक्षण बतलाता हू, सुनो। उनके प्रभाव अथवा
महिमाका वर्णन करोड़ों वषेमिं भी नहीं किया जा
सकता। जो सम्पूर्णं जीवोके हितैषी हँ, जिनमें
दूसरोके दोष देखनेकी आदत नहीं हे, जो
ईर्ष्यारहित, मन ओर इन्द्रियोको वशमें रखनेवाले,
निष्काम एवं शान्त हें, वे ही भगवद्धक्तोमें श्रेष्ठ
माने गये हें। जो मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा
दूसरोंको कभी पीडा नहीं देते तथा जिनमें संग्रह
अथवा कुछ ग्रहण करनेका स्वभाव नहीं है, वे
भगवद्धक्त माने गये हें । जिनको सात्विक वुद्धि
उत्तम भगवत्सम्बन्धी कथा- वार्ता सुननेमें स्वभावतः
लगी रहती है तथा जो भगवान् ओर उनके
भक्तोके भी भक्त होते हे, वे श्रेष्ठ भक्त समञ्चे जाते
है । जो श्रेष्ठ मानव माता ओर पिताके प्रति गद्धा
ओर विश्चनाथका भाव रखकर उनकी सेवा करते
हे, वे भी श्रेष्ठ भगवद्धक्त है । जो भगवानके पूजनमं
रत हैँ, जो इसमें सहायक होते है तथा जो भगवानूकी
पूजा देखकर उसका अनुमोदन कसते हँ, वे उत्तम
भगवद्धक्त है! जो त्रतियां तथा यति्योकी सेवामें
संलपग्र तथा परायी निन्दासे दूर रहते है, वे श्रेष्ठ
भागवत है। जो श्रेष्ठ मनुष्य सबके लिये हितकारक
वचन बोलते है ओर सबके गुर्णोको ही ग्रहण
करनेवाले है, वे इस लोकें भगवद्धक्त माने गये ह ।
जो श्रेष्ठ मानव सब जीवोको अपने ही समान देखते
तथा शत्रु ओर मित्रम भी समान भाव रखते ह, वे
उत्तम भगवद्धक्त है । जो धर्मशास्त्रके वक्ता, सत्यवादी
तथा साधुपुरुषोके सेवक टँ, वे भगवद्धक्तोमं ष्ट
२९
कहे गये हें। जो पुराणोंकी व्याख्या करते, जो
पुराण सुनते ओर पुराण-वक्तामें श्रद्धाभक्ति रखते
हे, वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हँ । जो मनुष्य सदा गौओं तथा
ब्राह्यणोकी सेवा करते ओर तीर्थयात्रां लगे रहते
है, वे श्रेष्ठ भगवद्धक्त हँ । जो मनुष्य दूसरोका
अभ्युदय देखकर प्रसन्न होते ओर भगवन्नामका जप
करते रहते हैँ, वे उत्तम भागवत हैं। जो बगीचे
लगाते, तालाब ओर पोखरोकी रक्षा करते तथा
बावडी ओर कुएं बनवाते हँ, वे उत्तम भक्त है । जो
तालाब ओर देवमन्दिर बनवाते तथा गायत्री-मन्त्रके
जपमें संलग्र रहते है, वे श्रेष्ठ भक्त है। जो
हरिनामका आदर करते, उन्हें सुनकर अत्यन्त हर्पमें
भर जाते ओर पुलकित हो उठते है, वे त्रेष्ठ
भगवद्भक्त है । जो मनुष्य तुलसीका बगीचा देखकर
उसको नमस्कार करते ओर कानों तुलसी काष्ठ
धारण करते है, वे उत्तम भगवद्धक्त हैं। जो
तुलसीकी गन्ध सूंधकर तथा उसकी जडके समीपकी
मिटीको सूंघकर प्रसन्न होते है, वे भी श्रेष्ट भक्त है।
जो वर्णाश्रम-धर्मके पालनमें तत्पर, अतिधि्योका
सत्कार करनेवाले तथा वेदार्थके वक्ता होते है, वे
ष्ठ॒ भागवत माने गये हें । जो भगवान् शिवसे प्रेम
रखनेवाले, शिवके चिन्तनमें ही आसक्त रहनेवाले
तथा शिवके चरणोको पूजामें तत्पर एवं त्रिपुण्ड
धारण करनेवाले है, वे भी श्रेष्ठ भक्तं हैं। जो
भगवान् विष्णु तथा परमात्मा शिवके नाम लेते
तथा रुद्राक्षकी मालासे विभूषित होते है, वे श्रेष्ठ
भगवद्धक्त हे। जो बहुत दक्षिणावाले यजोद्रारा
महादेवजी अथवा भगवान् विष्णुका उत्तम भक्तिसे
यजन करते हँ, वे ्रे्ठ भगवद्धक्त ह । जो पदे हए
शास्त्रोका दूसरोकरे हितके लिये उपदेश करते
ओर सर्वत्र गुण ही ग्रहण करते है, वे उत्तम
भक्त माने गये टै । परमेश्वर शिव तथा परमात्मा
((-0. 1/८111141/5511॥ 81188 \/8181185। 01611010. 01411260 0 6810011
२२
विष्णुम जो समलबुद्धिसे प्रवृत्त होते हे, वे श्रेष्ठ
भक्त माने गये हैं । जो शिवकौ प्रसन्नताके लिये
अग्रिहोत्रमे तत्पर पञ्चाक्षर मन्त्रके जपमें संलग्र
तथा शिवके ध्यानमें अनुरक्त रहते हैँ, वे उत्तम
भागवत हें । जो जलदानमें तत्पर, अन्नदानमें संलग्र
तथा एकादशीव्रतके पालनमें लगे रहनेवाले हैँ, वे
श्रेष्ट भक्त हे । जो गोदान करते, कन्यादानमें तत्पर
रहते ओर मेरी प्रसन्नताके लिये सत्कर्म करते हैँ
वे श्रेष्ठ भगवद्धक्त हें । विप्रवर मार्कण्डेय ! यर्हँपर
कुछ ही भगवद्धक्तोका वर्णन कियादहे।मेंभीसो
करोड वर्षमिं भी उन सबका पूरा-पूरा वर्णन नहीं
कर सकता। अतः विप्रवर! तुम भी सदा उत्तम
शीलसे युक्त होकर रहो! समस्त प्राणियोंको
आश्रय दो। मन ओर इन्दरियोंको वशमें रखो।
सबके प्रति मेत्रीभाव रखते हए धर्माचरणमें लगे
रहो । पुनः महाप्रलय-कालतक सब धर्मोका पालन
करते हुए मेरे स्वरूपके ध्यानमें तत्पर रहकर तुम
संक्षिप्त नारदपुराण
परम मोक्ष प्राप्त कर लोगे।
देवताओंके स्वामी दयासिन्धु भगवान् विष्णु
अपने भक्त मार्कण्डेयको इस प्रकार वरदान देकर
वहीं अन्तर्धान हो गये। महाभाग मार्कण्डेयजी
सदा भगवान्के भजनमें लगे रहकर उत्तम धर्मका
पालन करने लगे । उन्होने अनेक प्रकारके यज्ञोद्रारा
विधिपूर्वक भगवान्का पूजन किया । फिर महाक्षेत्र
शालग्रामतीर्थमें उत्तम तपस्या की ओर भगवानके
ध्यानद्वारा कर्मबन्धनका नाश करके परम मोक्ष
प्राप्त कर लिया। इसलिये भगवान्की आराधना
करनेवाला भक्त पुरुष समस्त प्राणियोंका हितकारी
होता हे। वह मनसे जो-जो वस्तुं पाना चाहता
हे, वह सव निस्संदेह प्राप्त कर लेता हे।
सनकजी कहते है-- विप्रवर नारद ! तुमने जो
कुछ पृछा था, उसके अनुसार यह सब भगवद्धक्तिका
माहात्म्य मैने तुम्हें बताया है। अव ओर क्या
सुनना चाहते हो ?
१ (५ 0 |
गङ्का-यमुना-संगम, प्रयाग, काशी तथा गदा एवं गायत्रीकी महिमा
सूतजी कहते है - भगवान्को भक्तिका यह
माहात्म्य सुनकर नारदजी बहुत प्रसन्न हुए।
उन्होने ज्ञान-विज्ञानके पारगामी सनक मुनिसे पुनः
इस प्रकार प्रश्न किया।
नारदजी बोले-- मुने! आप शस्त्रके पारदर्शी
विद्वान् ह । मुञ्जपर बड़ी भारी दया करके यह
ठीक-ठीक बताइये कि क्ेत्रोमें उत्तम क्षेत्र तथा
तीर्थेमिं उत्तम तीर्थं कौन है?
सनकजीने कहा-- ब्रह्मन्! यह परम गोपनीय
प्रसङ्ग हे, सुनो। उत्तम क्षेत्रोंका यह वर्णन सब
प्रकारकी सम्पत्तियोको देनेवाला, श्रेष्ठ, बुरे स्वप्रोका
नाशक, पवित्र, धमनिुकूल, पापहारी तथा शुभ है ।
मुनियोको नित्य-निरन्तर इसका श्रवण करना
चाहिये। गङ्गा ओर यमुनाका जो संगम है,
उसीको महर्षिलोग शस्त्रोमें उत्तम क्षेत्र तथा
तीथमिं उत्तम तीर्थं कहते हें । ब्रह्मा आदि समस्त
देवता, मुनि तथा पुण्यकी इच्छा रखनेवाले सब
मनुष्य श्वेत ओर श्याम जलसे भरे हए उस
संगम-तीर्थका सेवन करते हँ । गङ्खाको परम
पवित्र नदी समञ्जना चाहिये; क्योकि वह भगवान्
विष्णुके चरणोसे प्रकट हुई है। इसी प्रकार
यमुना भी साक्षात् सूर्यकी पुत्री हें । ब्रह्मन्! इन
दोनोंका समागम परम कल्याणकारी है। मुने।
नदियोमें श्रेष्ठ गद्भा स्मरणमात्रसे समस्त क्लेशोका
नाश करनेवाली, सम्पूर्णं पापोंको दूर करनेवाली
तथा सारि उपद्रवोंको मिटा देनेवाली है । महामुने!
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 8118811 \/8181185। (01661011. 01411260 0 6810011
पूवं भाग-प्रथम पाद
२३
समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर जो-जो पुण्यक्षेत्र है, उन
सबसे अधिक पुण्यतम क्षेत्र प्रयागको ही जानना
चाहिये । जहो ब्रह्माजीने यजद्वारा भगवान् लक्ष्मीपतिका
यजन किया है तथा सब महर्षियोने भी वहां नाना
प्रकारके यज्ञ किये हें । सब तीथमिं सान करनेसे
जो पुण्य प्राप्त होते है, वे सब मिलकर गङ्गाजीके
एक बृंद जलसे किये हुए अभिषेककी सोलहवीं
कलाको भी समता नहीं कर सकते। जो गङ्धासे
सो योजन दूर खड़ा होकर भी 'गङ्का-गङ्गा' का
उच्चारण करता है, वह भी सब पापोसे मुक्त हो
जाता है; फिर जो गङ्खामें सान करता है, उसके
लिये तो कहना ही क्या है 2 भगवान् विष्णुके
चरणकमलोसे प्रकट होकर भगवान् शिवके मस्तकपर
विराजमान होनेवाली भगवती गङ्गा मुनियों ओर
देवताओके द्वारा भी भलीभाति सेवन करनेयोग्य
है, फिर साधारण मनुष्योके लिये तो बात ही क्या
है ? श्रेष्ठ मनुष्य अपने ललाटमें जहाँ गङ्गाजीकी
बालूका तिलक लगाते है, वहीं अर्धचन्द्रके नीचे
प्रकाशित होनेवाला तृतीय नेत्र समञ्चना चाहिये।
गङ्कामे किया हुआ स्नान महान् पुण्यदायक तथा
देवताओके लिये भी दुर्लभ है; वह भगवान्
विष्णुका सारूप्य देनेवाला होता है-इससे वदढ्कर
उसकी महिमाके विषयमे ओर क्या कहा जा सकता
है ? गङ्कामें स्नान करनेवाले पापी भी सब पापोसे
मुक्त हो श्रेष्ठ विमानपर वेटठकर परम धाम वैकुण्ठको
चले जाते हैं । जिन्होने गद्गामें सान कियाहै, वे
महात्मा पुरुष पिता ओर माताके कुलको वहुत-
सी पीदियोंको उद्धार करके भगवान् विष्णुके
धाममें चले जाते हें। ब्रह्मन्! जो गङ्घाजीका
स्मरण करता है, उसने सब तीर्थमिं स्नान ओर
सभी पुण्य-क्षेत्रोमें निवास कर लिया-इसमें
संशय नहीं हे । गङ्गा-सरान किये हए मनुष्यको
देखकर पापी भी स्वर्गलोकका अधिकारी हो
जाता हे। उसके अद्धोंका स्पर्शं करनेमात्रसे वह
देवताओंका अधिपति हो जाता है। गद्गा, तुलसी,
भगवानूके चरणोमे अविचल भक्ति तथा धर्मोपदेशक
सद्गुरुमें श्रद्धा- ये सव मनुष्योके लिये अत्यन्त
दुर्लभ हैँ । उत्तम धर्मका उपदेश देनेवाले गुरुके
चरणोको धूल, गद्गाजीको मृत्तिका तथा तुलसीवृक्षके
मूलभागकौ मिद्रीको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक अपने
मस्तकपर धारण करता हे, वह वैकुण्ठ धामको
जाता हे। जो मनुष्य मन-ही-मन यह अभिलाषा
करता है कि में कब गङ्खाजीके समीप जाऊगा
ओर कब उनका दर्शन करूगा, वह भी वैकुण्ठ
धामको जाता है। ब्रह्मन्! दूसरी वाते बहुत
कहनेसे क्या लाभ, साक्षात् भगवान् विष्णु भी
सैकड़ों वर्षमिं गद्गाजीकी महिमाका वर्णन नहीं
कर सकते। अहो! माया सारे जगत्को मोहमें
डाले हुए है, यह कितनी अद्भुत बात है 2 क्योकि
गद्धा ओर उसके नामके रहते हए भी लोग
नरके जाते हें । गङ्खाजीका नाम संसार-दुःखका
नाश करनेवाला बताया गया है। तुलसीके नाम
तथा भगवान्को कथा कहनेवाले साधु पुरुषके
प्रति को हुईं भक्तिका भी यही फल है । जो एक
वार भो गङ्गा" इस दो अक्षरका उच्चारण कर
लेता है, वह सव पापोंसे मुक्त हो भगवान्
१. गङ्गा गद्धेति यो ब्रूयाद् योजनानां शते स्थितः। सोऽपि मुच्येत पापेभ्यः किमु गद्धाभिपेकवान् ॥
विष्णुपादोद्धवा देवी
विश्चश्वरशिरःस्थिता। संसेव्या मुनिभिर्देवैः किं पुनः पामर्जनैः॥
(ना पूर्व० ६। १२-१३)
२. गद्गा च तुलसी चैव हरिभक्तिरचञ्चला । अत्यत्तदुर्लभा नृणां भक्तिधर्मप्रवक्तरि ॥ (ना पूर्वे ६। २१)
((-0. 1/८11114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0\ 6810011
रे संक्षिप्त नारदपुराण
विष्णुके लोकम जाता है-। परम पुण्यमयी इस
गद्धा नदीका यदि मेष, तुला ओर मकरकी
संक्रान्तियोमें (अर्थात् वैशाख, कार्तिक ओर माघके
महीनोमे) भक्तिपूर्वक सेवन किया जाय तो सेवन
करनेवाले सम्पूर्ण जगत्को यह पवित्र कर देती
हे । द्विजश्रेष्ठ ! गोदावरी, भीमरथी, कृष्णा, नर्मदा,
सरस्वती, तुङ्गभद्रा, कावेरी, यमुना, बाहुदा, वेत्रवती,
ताग्रपणीं तथा सरयू आदि सव तीथमिं गङ्खाजी
ही सबसे प्रधान मानी गयी हें । जेसे सर्वव्यापी
भगवान् विष्णु सम्पूर्णं जगत्को व्याप्त करके स्थित
है, उसी प्रकार सब पापोंका नाश करनेवाली गङ्गादेवी
सब ती्थेमिं व्याप्त हे। अहो! महान् आश्चर्य हे।
परम पावनी जगदम्बा गद्धा स्रान-पान आदिके
द्वारा सम्पूर्ण संस।रको पवित्र कर रही ठै, फिर
सभी मनुष्य इनका सेवन क्यों नहीं करते 2
इसी प्रकार विख्यात काशीपुरी भी तीथमिं
उत्तम तीर्थं ओर प्षेत्रोमें उत्तम क्षेत्र है। समस्त
देवता उसका सेवन करते है। इस लोकमें
कानवाले पुरुपोके वे ही दोनों कान धन्य हैँ ओर
वे ही बहुत-से शास्त्रोका ज्ञान धारण करनेवाले
हे, जिनके द्वारा बारम्बार काशीका नाम श्रवण
किया गया हे । द्विजश्रेष्ठ । जो मनुष्य अविमुक्त क्षत्र
काशीका स्मरण करते हे, वे सब पापोंका नाश
करके भगवान् शिवके लोकमें चले जाते है।
मनुष्य सौ योजन दूर रहकर भी यदि अविमुक्त
षेत्रका स्मरण करता हे तो वह बहुतेरे पातकोंसे
भरा होनेपर भी भगवान् शिवके रोग-शोकरहित
नित्यधामको चला जाता है। ब्रह्मन्! जो प्राण
निकलते समय अविमुक्त क्षेत्रका स्मरण कर लेता
हे, वह भी सन पापोसे छूटकर शिवधामको प्राप्त
हो जाता है। काशीके गुणोके विषयमे यहाँ बहुत
कहनेसे क्या लाभ; जो काशीका नाम भीलेतेरै, `
उनसे धर्म, अर्थ, काम ओर मोक्ष-ये चारों
पुरुषार्थ दूर नहीं रहते । ब्रह्मन्! गङ्गा ओर यमुनाका
संगम (प्रयाग) तो काशीसे भी बढ़कर है;
क्योकि उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य परम गतिको
प्राप्त कर लेते है । सूर्यके मकर राशिपर रहते समय
जहां कहीं भी गङ्गाम स्नान किया जाय, वह
स्नान-पान आदिके द्वारा सम्पूर्णं जगत्को पवित्र
करती ओर अन्तमं इन्द्रलोक पहुंचाती है।
लोकका कल्याण करनेवाले लिङ्गस्वरूप भगवान्
शङ्कर भी जिस गङ्गाका सदा सेवन करते है,
उसको महिमाका पूरा-पूरा वर्णन कैसे किया जा
सकता हे 2 शिवलिङ्ग साक्षात् श्रीहरिरूप है ओर
श्रीहरि साक्षात् शिव-लिङ्गरूप हैँ । इन दोनोपमें
थोड़ा भी अन्तर नहीं हे । जो इनमें भेद करता
हे, उसकी बुद्धि खोरी है। अज्ञानके समुद्रे
डूबे हुए पापी मनुष्य ही आदि-अन्तरहित
भगवान् विष्णु ओर शिवमें भेदभाव करते हें । जो
सम्पूर्णं जगत्के स्वामी ओर कारणोके भी कारण
हे, वे भगवान् विष्णु ही प्रलयकालमें रुद्ररूप
धारण करते हे । एेसा विद्वान् पुरुषोंका कथन हे ।
भगवान् रुद्र ही विष्णुरूपसे सम्पूर्णं जगत्का
पालन करते हे । वे ही ब्रह्माजीके रूपसे संसारकौ
सृष्टि करते हँ तथा अन्तमें हररूपसे वे ही तीनों
लोकोका संहार करते हँ । जो मनुष्य भगवान्
१. गङ्गाया महिमा ब्रह्मन् वक्तुं वर्षशतेरपि । न शक्यते विष्णुनापि किमन्यैर्बहुभाषितैः॥
अहो माया जगत्सर्वं मोहयत्येतदद्धुतम्। यतो वै नरकं यान्ति गद्धानाम्नि स्थितेऽपि हि॥
संसारदु: रविच्छेदि गद्खानाम
सकृदप्युच्वरेद् यस्तु
प्रकीर्तितम् । तथा तुलस्या भक्तिश्च हरिकीर्तिप्रवक्तरि॥
गद्रेत्येवाक्षद्धयम्। सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥
(ना० पूर्व०° ६। २४-२७)
((-0. 1\॥(111104/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 66810011
पुर्वभाग-प्रथम पाद्
२५
विष्णु, शिव तथा ब्रह्माजीमें भेदवुद्धि करता हे,
वह अत्यन्त भयंकर नरकमें जाता हे । जो भगवान्
शिव, विष्णु ओर ब्रह्माजीको एक रूपसे देखता
है, वह परमानन्दको प्राप्त होता है । यह शास्त्रोका
सिद्धान्त है । जो अनादि, सर्वज्ञ, जगत्के आदिस्रष्टा
तथा सर्वत्र व्यापक हें, वे भगवान् विष्णु ही
शिवलिङ्गरूपसे काशीमें विद्यमान हैं । काशीपुरीका
विश्वेश्वरलिङ्ग ज्योतिर्लिङ्ग कहलाता हे । श्रेष्ठ मनुष्य
उसका दर्शन करके परम ज्योतिको प्राप्त होता हे ।
जिसने त्रिभुवनको पवित्र करनेवाली काशीपुरीकौ
परिक्रमा कर ली, उसके द्वारा समुद्र, पर्वत तथा
सात द्वीपोंसहित पृथ्वीकी परिक्रमा हो गयी । धातु,
मिटी, लकड़ी, पत्थर अथवा चित्र आदिसे निर्मित
जो भगवान् शिव अथवा विष्णुकी निर्मल प्रतिमां
है, उन सबमें भगवान् विष्णु विद्यमान हैं । जहां
तुलसीका बगीचा, कमलोका वन ओर पुराणोका
पाठ हो, वहां भगवान् विष्णु स्थित रहते हे।
ब्रह्मन्! पुराणकी कथा सुननेमे जो प्रेम होता हे
वह गङ्गास्रानके समान है तथा पुराणको कथा
कहनेवाले व्यासके प्रति जो भक्ति होती हे, वह
प्रयागके तुल्य मानी गयी हे । जो पुराणोक्त धर्मका
उपदेश देकर जन्म-मृत्युरूप संसार-सागरमे डूबे
हुए जगत्का उद्धार करता दहै, वह साक्षात्
श्रीहरिका स्वरूप बताया गया हे । गद्गाके समान
कोई तीर्थं नहीं है, माताके समान कोई गुरु नहं
है, भगवान् विष्णुके समान कोई देवता नहीं हे
तथा गुरुसे बढ़कर कोई तत्त्व नहीं है ` । जेसे
चारों वर्णोमिं ब्राह्मण, नक्षत्रम चन्द्रमा तथा
सरोवरोमें समुद्र श्रेष्ट है, उसी प्रकार पुण्य
तीर्थो ओर नदियोमें गङ्गा सबसे श्रेष्ठ मानी
गयी है । शान्तिके समान कोई बन्धु नहीं है,
सत्यसे बढ कर कोई तप नहीं है, मोक्षसे बड़ा
कोई लाभ नहीं है ओर गक्ताके समान कोई नदी
नहीं है? । गङ्गाजीका उत्तम नाम पापरूपी वनको
भस्म करनेके लिये दावानलके समान है। गङ्गा
संसाररूपी रोगको दूर करनेवाली है, इसलिये
यलपूर्वक उनका सेवन करना चाहिये। गायत्री
ओर गङ्गा दोनों समस्त पापोंको हर लेनेवाली
मानी गयी हं । नारदजी! जो इन दोनोके प्रति
भक्तिभावसे रहित है, उसे पतित समञ्जना
चाहिये । गायत्री वेदोंकी माता है ओर जाहवी
(गङ्गा) सम्पूर्णं जगत्की जननी है । वे दोनों
समस्त पापोंके नाशका कारण हैं । जिसपर
गायत्री प्रसन्न होती हँ, उसपर गङ्गा भी प्रसन्न
होती दै । वे दोनों भगवान् विष्णुकी शक्तिसे
०.५६
ह
सम्पन्न हैं, अतः सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धि
देनेवाली ह । गङ्गा ओर गायत्री धर्म, अर्थ, काम
ओर मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थकि फलरूपमें प्रकट
हुई हं । ये दोनों निर्मल तथा परम उत्तम है ओर
१. नास्ति गद्धासमं तीर्थं नास्ति मातृसमो गुरुः । नास्ति विष्णुसमं दवं नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्॥ (ना० पूर्व ६। ५८)
२. नास्ति शान्तिसमो बन्धुर्नास्ति सत्यात्परं तपः। नास्ति मोक्षात्पगो लाभो नास्ति गङ्गासमा नदी ॥ (ना° पूर्व० ६।६५०)
((-0. 1/८1114<511॥1 81188 \/81811851 (01661101. 01411260 0 66810011
२६
संक्षिप्त नारदपुराण
सम्पूर्णं लोकोपर अनुग्रह करनेके लिये प्रवृत्त हुई
हें । मनुष्योके लिये गायत्री ओर गङ्गा दोनों अत्यन्त
दुर्लभ हं । इसी प्रकार तुलसीके प्रति भक्ति ओर
भगवान् विष्णुके प्रति सात्विक भक्ति भी दुर्लभ हे।
अहो! महाभागा गङ्खा स्मरण करनेपर समस्त
पार्पोका नाश करनेवाली, दर्शन करनेपर भगवान्
विष्णुका लोक देनेवाली तथा जल पीनेपर भगवानूका
सारूप्य प्रदान करनेवाली हें । उनमें स्नान कर लेनेपर
मनुष्य भगवान् विष्णुके उत्तम धामको जाते हैः ।
जगत्का धारण-पोषण करनेवाले सर्वव्यापी सनातन
भगवान् नारायण गङ्गा-स्नान करनेवाले मनुष्योको
मनोवाचज्छित फल देते हं । जो श्रेष्ठ मानव गङ्गाजलके
एक कणसे भी अभिषिक्त होता हे, वह सव पापोसे
मुक्त हो परम धामको प्राप्त कर लेता है। गङ्गाके
जलविन्दुका सेवन करनेमात्रसे राजा सगरकी
संतति परम पदको प्राप्त हुई |
८८०९९८१ =+
असूया-दोषके कारण राजा बाहुकी अवनति ओर पराजय तथा उनकी मृत्युके
बाद रानीका ओर्व मुनिके आश्रममें रहना
नारदजीने पृछा- मुनिश्रेष्ठ ! राजा सगर कौन
थे ? वह सव मुञ्ञे बतानेकी कृपा करे ।
सनकजीने कहा- मुनिवर! गङ्खाजीका उत्तम
माहात्म्य सुनिये, जिनके जलका स्पर्श होनेमात्रसे
राजा सगरका कुल पवित्र हो गया ओर सम्पूर्ण
लोकोमें सबसे उत्तम वैकुण्ठ धामको चला गया।
सूर्यवंशमें बाहु नामवाले एक राजा हो गये हैँ ।
उनके पिताका नाम वृक था। बाहु बडे धर्मपरायण
राजा थे ओर सारी पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन
करते थे। उन्होने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शद्र तथा
अन्य जीवोको अपने-अपने धर्मकी मर्यादामें
स्थापित किया था। महाराज बाहुने सातां हीपोमे
सात अश्वमेध यज्ञ किये ओर ब्राह्यणोको गाय,
भूमि, सुवर्ण तथा वस्त्र आदि देकर भलीभति तृष
किया। नीतिशास्त्रके अनुसार उन्हनि चोर-डाकुओंको
यथेष्ट दण्ड देकर शासनमें रखा ओर दूसरोका
संताप दूर करके अपनेको कृतार्थं माना। पृथ्वीपर
विना जोते-बोये अन्न पैदा होता ओर वह फल- | हो गयी । मुनीश्वर ! दोषदृष्टि
फूलसे भरी रहती थी। मुनीश्वर । देवराज इन्दर
उनके राज्यको भूमिपर समयानुसार वर्षा करते थे
ओर पापाचारियोंका अन्त हो जानेके कारण
वहंको प्रजा धर्मसे सुरक्षित रहती थी ।
एक समय राजा बाहुके मनमें असूया (गुणोमें
दोष-दृष्टि)-के साथ बड़ा भारी अहंकार उत्पन्न
हुआ, जो सब सम्पत्तियोका नाश करनेवाला तथा
अपने विनाशका भी हेतु हे। वे सोचने लगे-में
समस्त लोकोंका पालन करनेवाला बलवान् राजा
हू । मैने बड़े-बड़े यज्ञोका अनुष्ठान किया है । मुञ्चसे
पूजनीय दूसरा कोन है ? मेँ विद्वान् हू, श्रीमान् हूं ।
मेने सव शत्नुओंको जीत लिया है। मुञ्चे वेद ओर
वेदाङ्गोके तत्ततका ज्ञान है ओर नीतिशास्त्रका तो मेँ
बहुत बड़ा पण्डित हू । मुञ्चे कोई जीत नहीं सकता।
मेरे एेश्चर्यको हानि नहीं पहुंचा सकता । इस पृथ्वीपर
मुञ्से बढ़कर दूसरा कोन है 2 इस प्रकार अहंकारके
वशीभूत होनेपर उनके मनमें दूसरोके प्रति दोषदृष्टि
शि चद शे
होनेसे उस राजाके
१. अहो गङ्खा महाभागा स्मृता पापप्रणाशिनी । हरिलोकप्रदा दृष्टा पीता सारूप्यदायिनी।
यत्र स्नाता नरा यान्ति विष्णोः पदमनुत्तमम् ॥
(ना० पूर्व० ६। ६७)
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/81/185। (01661011. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद्
हदयमें काम प्रबल हो उठा । इन सब दोषोके स्थित
होनेपर मनुष्यका विनाश होना निशित है। यौवन,
धनसम्पत्ति, प्रभुता ओर अविवेक-इनमेंसे एक-
एक भी अनर्थका कारण होता है, फिर जहो ये चारों
मौजूद हों वहकि लिये क्या कहना 2 विप्रवर
उनके भीतर बड़ी भारी असूया पेदा हो गयी, जो
लोकका विरोध, अपने देहका नाश तथा सब
सम्पत्तियोका अन्त करनेवाली होती है। सुत्रत।
असूयासे भरे हुए चित्तवाले पुरुषोके पास यदि धन-
सम्पत्ति मौजूद हो तो उसे भूसेकौ आगमे वायुके
संयोगके समान समञ्चो । जिनका चित्त दूसरोके दोष
देखनेमें लगा होता है, जो पाखण्डपूर्णं आचारका
पालन करते हैँ तथा सदा कटुवचन बोला करते हे,
उन्हें इस लोकमें ओर परलोकमें भी सुख नहीं
मिलता। जिनका मन असूया-दोषसे दूषित है तथा
जो सदा निष्ठुर भाषण किया करते है, उनके प्रियजन,
पुत्र तथा भाई-बन्धु भी शत्रु बन जाते हैँ । जो परायी
स्त्रीको देखकर मन-ही-मन उसे प्राप्त करनेको
अभिलाषा करता है, वह अपनी सम्पत्तिका नाश
करनेके लिये स्वयं ही कुठार बन गया है-इसमें
संशय नहीं है । मुने! जो मनुष्य अपने कल्याणका
नाश करनेके लिये प्रयत्न करता है, वही दूसरोका
कल्याण देखकर अपनी कुत्सित बुद्धिके कारण उनसे
डाह करने लगता है । ब्रह्मन्! जो मित्र, संतान, गृह, कषतर,
धन-धान्य ओर पशु-सबकी हानि देखना चाहता हो,
वही सदा दूसरोसे असूया करे।
तदनन्तर जब राजा बाहुका हदय असूया-दोषसे
दूषित हो जनेके कारण वे अत्यन्त उद्दण्ड हो गये, तब
हैहय ओर तालजङ्घ-कुलके क्षत्रिय उनके प्रबल शतत
२७
बन गये । असूया होनेपर दूसरे जीवोके साथ द्वेष बहुत
बद् जाता है-इसमें संदेह नहीं है । असूयासे दूषित
चित्तवाले उस राजाका अपने शत्रुओंके साथ लगातार
एक मासतक भयंकर युद्ध होता रहा । अन्तमं वे अपने
वैरी हैहय ओर तालजङ्घ नामवाले क्षत्रियोंसे परास्त
हो गये। अतः दुःखी होकर राजा बाहु अपनी गर्भवती
पत्ीके साथ वनमें चले गये। वहां एक बहुत बड़ा
तालाब देखकर उन्हें बड़ा संतोष हुआ; परंतु उनके
मनमें तो असूया भरी हुईं थी, इसलिये उनका भाव
देखकर उस जलाशयके पक्षी भी इधर-उधर छप
गये । यह बडे आशर्यकी बात हुई । उस समय बडी
उतावलीके साथ अपने घोंसलोमें समाते हए वे पक्षी
इस प्रकार कह रहे थे-" अहो ! बड़े कष्टकी बात हे ।
यहो तो कोई भयानक पुरुष आ गया।' राजाने अपनी
दोनों प्नियोके साथ उस सरोवरमें प्रवेश करके जल
पीया ओर वृक्षके नीचे उसकी सुखद छायामें जा बेटे ।
नारदजी ! गुणवान् मनुष्य कोई भी क्यों न हो, वह
सबके लिये श्लाघ्य होता है ओर सव प्रकारकी
सम्पत्तियोसे युक्त होनेपर भी गुणहीन मनुष्य सदा
लोगोसे निन्दित ही होता हे। द्विजश्रेष्ठ नारद ! उस
समय बाहुकी बहुत निन्दा हुई थी । वे संसारमें अपने
पुरुषार्थं ओर यशका नाश करके मरे हृएकी भोति
वनमें रहते थे। अकीर्तिके समान कोई मृत्यु नहीं हे।
क्रोधके समान कोई शत्रु नहीं है । निन्दाके समान कोई
पाप नहीं है ओर मोहके समान कोई भय नहीं है।
असूयाके समान कोई अपकीरतिं नहीं है, कामके
समान कोई आग नहीं है, रागके समान कोई बन्धन
नहीं हे ओर सद्धं अथवा आसक्तिके समान कोई विष
नहीं है" इस प्रकार बहुत विलाप करके राजा बाहु
१. यौवनं
धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकता। एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र॒ चतुष्टवम्॥ (ना० पूर्व ७। १५)
२. नास्त्यकीर्तिसमो मृत्यर्नास्ति क्रोधसमो रिपुः। नास्ति निन्दासमं पापं नास्ति मोहसमासवः ॥
नास्त्यसूयासमाकीर्ि्नास्ति कामसमोऽनलः। नास्ति रागसमः पाशो नास्ति सद्गसमं विषम्॥
(ना० पूर्० ७। ४१-४२)
((-0. 1/(11141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 60810011
रै - ऋ
२८ संक्षिप्त नारदपुराण
अत्यन्त दुःखित हो गये। मानसिक संताप ओर | उद्यत देख मुनिवर ओर्व धर्ममूलक वचन बोले ।
बुढापेके कारण उनका शरीर जर्जरीभूत हो गया।
मुनिश्रेष्ठ! इस तरह बहुत समय बीतनेके पश्चात्
ओर्व मुनिके आश्रमके निकट रोगसे ग्रस्त होकर
राजा बाहु संसारसरे चल बसे । उनको छोटी प्री
यद्यपि गर्भवती थी तो भी दुःखसे आतुर हो दीर्धकालतक
विलाप करके उस्ने पतिके साथ चितापर जल
मरनेका विचार किया। इसी बीचमें परम बुद्धिमान्
ओर्व मुनि, जो महान् तेजकी निधि थे, वर्ह आ
पहुंचे । उन्होने उत्तम समाधिके द्वारा यह सब वृत्तान्त
जान लिया धा। सुनीश्वरगण तीनों कालोके जाता
होते है । वे असूयारहित महात्मा अपनी ज्ानदृष्टिसे
भूत, भविष्य ओर वर्तमान सब कुछ देख लेते हे ।
परम पुण्यात्मा ओर्व मुनि अपनी तपस्याके कारण
तेजकी राशि जान पडते थे । वे उसी स्थानपर आये,
जहां राजा बाहुको प्यारी एवं पतिव्रता प्ली खडी
थी । मुनिश्रेष्ठ नारद ! रानीको चितापर चदुनेके लिये
ओर्वने कहा- महाराज बाहुको प्यारी पली। तू
पतिव्रता है; किंतु चितापर चढनेका अत्यन्त साहसपूर्ण
कार्य न कर। तेरे गर्भमें शत्रुओंका नाश करनेवाला
चक्रवतीं बालक हे। कल्याणमयी राजपुत्री ! जिनको
संतान बहुत छोटी हो, जो गर्भवती हो, जिन्होने अभी
ऋतुकाल न देखा हो तथा जो रजस्वला हो, एेसी
स्त्रियों पतिके साथ चितापर नहीं चदृतीं-- उनके लिये
चितारोहणका निषेध हे । श्रेष्ठ पुरुषोनि ब्रह्महत्या आदि
पापोका प्रायश्चित्त बताया हे, पाखण्डी ओर परनिन्दकका
भी उद्धार होता हे; किंतु जो गर्भके बालककी हत्या
करता है, उसके उद्धारका कोई उपाय नहीं हे। सुत्रते।
नास्तिक, कृतघ्न, धर्मत्यागी ओर विश्चासघातीके उद्धारका
भी कोई उपाय नहीं है*। अतः शोभने! तुद्चे यह
महान् पाप नहीं करना चाहिये।
मुनिके इस प्रकार कहनेपर पतिव्रता रानीको
उनके वचनोपर विश्वास हो गया ओर वह अत्यन्त
दुःखसे पीडित हो अपने मरे हुए पतिके चरणकमर्लोको
पकड़कर विलाप करने लगी। महात्मा ओर्व सब
शास्त्रोके साता थे। वे रानीसे पुनः. बोले-' राजकुमारी ।
तू रो मत, तुञ्चे श्रेष्ठ राजलक्ष्मी प्राप्त होगी।
महाभागे! इस समय सज्जन पुरुषोके सहयोगे
इस मृतक शरीरका दाह-संस्कार करना उचित है,
अतः शोक त्यागकर तु समयोचित कार्य कर।
पण्डित हो या मूर्ख, दरिद्र हो या धनवान् तथा
दुराचारी हो या सदाचारी-सबपर मृत्युको समान
दृष्टि है। नगरमे हो या वनमे, समुद्रम हो या
पर्वतपर, जिस जीवने जो कर्म किया है, उसे
उसका भोग अवश्य करना होगा। जैसे दुःख विना
बुलाये ही प्राणियोके पास चले आते है, उसी
` ` £ बालापत्याश्च गग्मिण्यो यदृष्टऋरतवस्तथा । रजस्वला राजसुते नारोहन्ति चिर्ता ३ = ~~ ह्यदृष्टऋतवस्तथा । रजस्वलां राजसुते नारोहन्ति चितां शुभ॥ `` `
ब्रह्महत्यादिपापानां प्रोक्ता
निष्कृतिरुत्तमैः। दम्भिनो निन्दकस्यापि श्रूणघ्रस्य न निष्कृतिः ॥
नास्तिकस्य कृतघ्नस्य धमेपिक्षाकरस्य च । विश्वासधातकस्यापि निष्कृतिर्नास्ति सुव्रते ॥
(ना० पूर्व ७। ५२-५४)
((-0. 1\/॥८1114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661100. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
२९
प्रकार सुख भी आ सकते है-एेसी मेरी |
हे। इस विषयमे दैव ही प्रबल हे । पूर्वजन्मके
जो-जो कर्म॒है, उन्हीं-उन्टीको यहाँ भोगना
पड़ता हे। कमलानने! जीव गभमिं हों या
बाल्यावस्थामें, जवानीमें हों या बुदढापेमे, उन्हें
मृत्युके अधीन अवश्य होना पडता टहै। अतः
सुव्रते! इस दुःखको त्यागकर तू सुखी हो जा।
पतिके अन्त्येष्टि-संस्कार कर ओर विवेकके द्वारा
स्थिर हो जा। यह शरीर कर्मपाशमें बेधा हआ
तथा हजारों दुःख ओर व्याधियोसे धिरा हुआ है।
इसमें सुखका तो आभास ही मात्र है । क्लेश ही
अधिक होता हे।'
परम बुद्धिमान् ओर्व मुनिने रानीको इस
प्रकार समञ्ञा-बुञ्चाकर उससे दाह-सम्बन्धी सव
कार्य करवाये; फिर उसने शोक त्याग दिया ओर
मुनीश्वरको प्रणाम करके कहा-' भगवन्! आप-
जेसे संत दूसरोको भलाई को ही अभिलाषा रखते
है- इसमे कोई आश्चर्यकौ बात नहीं । पृथ्वीपर
जितने भी वृक्ष है, वे अपने उपभोगके लिये नहीं
फलते- उनका फल दूसरोके ही काम आता हे।
इसलिये जो दूसरोके दुःखसे दुःखी ओर दूसरोकी
प्रसन्नतासे प्रसन्न होता है, वही नररूपधारी
जगदीश्वर नारायण है। संत पुरुष दूसरोका दुःख
दूर करनेके लिये शास्त्र सुनते है ओर अवसर
आनेपर सवका दुःख दूर करनेके लिये शास्त्रोके
वचन कहते हें । जहाँ संत रहते हैँ, वहाँ दुःख
नहीं सताता; क्योकि जहां सूर्य हे, वहां अन्धकार
केसे रह सकता हे 2
इस प्रकार कहकर रानीने उस तालावके
किनारे मुनिको बतायी हुई विधिके अनुसार अपने
पतिको अन्य पारलौकिक क्रियाएं सम्पन्न कीं।
वहां ओर्व मुनिके स्थित होनेसे राजा वाह तेजसे
प्रकाशित होते हए चितासे निकले ओर श्रेष्ठ
विमानपर बेठकर मुनीश्वर ओर्वको प्रणाम करके
परम धामको चले गये । जिनपर महापुरुषोंकी दृष्ट
पडती है, वे महापातक या उपपातकसे युक्त
होनेपर भी अवश्य परम पदक प्राप्त हो जाते हैँ।
पुण्यात्मा पुरुप यदि किसीके शरीरको, शरीरके
भस्मको अथवा उसके धुेको भी देख ले तौ वह
परम पदको प्राप्त होता है" । नारदजी ! पतिका श्राद्धकर्म
करके रानी ओर्व मुनिके आश्रमपर गयी ओर अपनी
सोतके साथ महर्षिकी सेवा करने लगी।
१ नी
130 #
सगरका जन्म तथा शत्रुविजय, कपिलके क्रोधसे सगर-पुत्रोका विनाश
तथा भगीरथद्रारा लायी हुईं गङ्काजीके स्पर्शसे उन सबका उद्धार
श्रीसनकजी कहते है- मुनी श्वर ! इस प्रकार
राजा बाहुक वे दोनों रानियां ओर्व मुनिके आश्रमपर
रहकर प्रतिदिन भक्तिभावसे उनको सेवा-शुश्रूषा
सौतको समृद्धि देखकर पापपूर्ण विचार उत्पन्न
हुआ। अतः उस पापिनीने छोरी रानीको जहर दे
दिया; कितु छोटी रानी प्रतिदिन आश्रमकौ भूमि
करती रहीं । नारदजी ! इस तरह छः महीने वीत | लीपने आदिके द्वारा मुनिकी भलीभति सेवा करती
जानेपर राजाकी जो जेठी रानी थी, उसके मनमें । थी, इसीलिये उस पुण्यकर्मके प्रभावसे रानीपर उस
१. महापातकयुक्ता वा युक्ता वा चोपपातकैः। परं पदं प्रयान्त्येव महद्धिरवलोकिताः॥
कलेवरं वा तद्धस्म तद्धूमं वापि सत्तम। यदि पश्यति पुण्यात्मा स प्रयाति परां गतिम्॥
(ना० पूर्व० ७। ७४-७५)
((-0. 1\॥(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661011. 01411260 0 60810011
३9
विषका असर नहीं हुआ । तत्पश्चात् तीन मास ओर
व्यतीत होनेपर रानीने शुभ समयमे विषके साथ ही
एक पुत्रको जन्म दिया । मुनिको सेवासे रानीके सब
पाप नष्ट हो चुके थे। अहो! लोकमें सत्सङ्गका
केसा माहात्म्य है 2 बह कोन-सा पाप नष्ट नहीं कर
सकता ओर सत्सङ्कके प्रभावसे पाप नष्ट हो जानेपर
पुण्यात्मा मनुष्योको कौन-सा सुख अधिक-से-
अधिक नहीं मिल सकता ? जानकर ओर अनजानमें
किया हुआ तथा दूसरोसे कराया हुआ जो पाप है,
उस सबको महात्मा पुरुषोकी सेवा तत्काल नष्ट कर
देती है । संसारमें सत्सद्घके प्रभावसे जड भी पूज्य हो
जाता हे। जैसे भगवान् शंकरके द्वारा ललामं ग्रहण
कर लिये जानेपर एक कलाका चन्द्रमा भी वन्दनीय
हो गया। विप्रवर! इहलोक ओर परलोकमें सत्सङ्ख
मनुष्योको सदा उत्तम समृद्धि प्रदान करता हे, इसलिये
संत पुरुष परम पूजनीय हे । मुनी धर ! महात्मा पुरुषोके
गुणोका वर्णन करनेमे कौन समर्थ हे 2 अहो ! उनके
प्रभावसे गर्भमे पड़ा हुआ विष तीन मासतक पचता
रहा। यह केसी अद्धुत बात है ? तेजस्वी मुनि ओर्वनि
गर (विष)-के सहित उत्पन्न हुए पुत्रको देखकर
उसका जातकर्म-संस्कार किया ओर उस बालकका
नाम सगर रखा। मराताने बालक सगरका बडे प्रेमसे
पालन-पोषण किया । मुनीश्वर ओर्वने यथासमय उसके
चूडाकर्म तथा यज्ञोपवीत-संस्कार किये तथा राजाके
लिये उपयोगी शास्त्रोका उसे अध्ययन कराया । मुनि
सब मन्त्रोके ज्ञाता थे। उन्होने देखा, सगर अव
बाल्यावस्थासे कु ऊपर उठ चुका है ओर
मन्त्रग्रहण करनेमरे समर्थ हे, तवर उसे अस्त्र-
शस्त्रोकी मन्त्रसहित शिक्षा दी। नारदजी ! महर्षि
संक्षिप्त नारदपुराण
ओर्वसे शिक्षा पाकर सगर बड़ा बलवान्, धर्मात्मा,
कृतज्ञ, गुणवान् तथा परम बुद्धिमान् हो गया । धर्मज्ञ
सगर अब प्रतिदिन अमित तेजस्वी ओर्व मुनिके लिये
समिधा, कुशा, जल ओर फूल आदि लाने लगा । बालक
बद्ध विनयी ओर सद्गुणोका भण्डार था। एक दिन उसने
अपनी माताको प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा।
सगरने कहा- मों! मेरे पिताजी कर्हाँ चले गये
हें 2 उनका क्या नाम है ओर वे किसके कुलमें उत्पन्न
हुए हं 2 यह सब बातें मुञ्चे बताओ। मेरे मनमें यह
सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा हे । संसारमें जिनके पिता
नहीं है, वे जीवित होकर भी मरे हृएके समान है ।
जिसके माता-पिता जीवित नहीं है, उसे कोई सुख
नहीं है । जेसे धर्महीन मूर्ख मनुष्य इस लोक ओर
परलोकमें निन्दित होता हे, वही दशा पितृहीन बालककी
भी हे। माता-पितासे रहित, अज्ञानी, अविवेकी,
पुत्रहीन तथा ऋणमग्रस्त पुरुषका जन्म व्यर्थ है। जैसे
चन्द्रमाके विना रात्रि, कमलके बिना तालाब ओर
पतिके विना स्त्रीकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार
पितृहीन बालक भी शोभा नहीं पाता। जेसे धर्महीन
मनुष्य, कर्महीन गृहस्थ ओर गो आदि पशुओंसे हीन
वैश्यकी शोभा नहीं होती, वैसे ही पिताके विना पुत्र
सुशोभित नहीं होता। जेसे सत्यरहित वचन, साधु
पुरुषोसे रहित सभा तथा दयाशून्य तप व्यर्थ हे, वही
दशा पिताके बिना बालककौ होती है। जैसे वृक्षके
विना वन, जलके विना नदी ओर वेगहीन घोड़ा
निरर्थक होता है, वसी ही पिताके बिना बालककी
दशा होती है*। माँ! जैसे याचक मनुष्य-लोकमें
अत्यन्त लघु समज्ञा जाता हे, उसी प्रकर पितृहीन
बालक बहुत दुःख उठाता हेै।
१. चद्द्रहीना यथा रात्रिः पद्महीनं यथा सरः । पतिहीना यथा नारी पितृहीनस्तथा शिशुः॥
धर्महीनो यथा जन्तुः कर्महीनो यथा गृही । पशुहीनो यथा वैश्यस्तथा पित्रा विनार्भकः॥
सत्यहीनं यथा वाक्यं साधुहीना यथा सभा। तपो यथा दयाहीनं तथा पित्रा विनार्भकः॥
वृक्षहीनं यथारण्यं जलहीना यथा नदी । वेगहीनो यथा वाजी तथा पित्रा विनार्भकः॥
(ना० पूर्व° ८1 २१९-२४)
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पूर्वभाग-प्रथम पाद
पुत्रकी यह बात सुनकर रानी लंबी सोस
खींचकर दुःखमें डूब गयी । उसने सगरके पूछनेपर
उसे सब बातें ठीक-ठीक बता दीं। यह सब
वृत्तान्त सुनकर सगरको बड़ा क्रोध हुआ। उनके
नेत्र लाल हो गये । उन्होने उसी समय प्रतिज्ञा को,
"में शत्रुओंका नाश कर डालूंगा।' फिर ओर्व
मुनिकी परिक्रमा करके माताको प्रणाम किया ओर
मुनिसे आज्ञा लेकर वहसे प्रस्थान किया। ओर्वके
आश्रमसे निकलनेपर सत्यवादी एवं पवित्र राजकुमार
सगरको उनके कुलपुरोहित महर्षिं वसिष्ठ मिल
गये । इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । अपने कुलगुरु
महात्मा वसिष्ठको प्रणाम करके सगरने अपना सव
समाचार बताया; यद्यपि वे ज्ञानदृष्टिसे सब कुछ
पहलेसे ही जानते थे। राजा सगरने उन्हीं महर्षिसे
एन्द्र, वारुण, ब्राह्म ओर आग्रेय-अस्त्र तथा उत्तम
खङ्ग तथा वच्रके समान सुदृढ धनुष प्राप्त किया।
तदनन्तर शुद्ध हदयवाले सगरने मुनिकी आज्ञा ले
उनके आशीर्वादसे समादूत हो उन्हें प्रणाम करके
तत्काल वहसे यात्रा की। शूरवीर सगरने एक ही
धनुषसे अपने विरोधियोको पुत्र-पौत्र ओर सेनासहित
स्वर्गलोक पहुंचा दिया। उनके धनुषसे छूटे हए
अग्रिसदृश बाणोँसे संतप्त होकर कितने ही शत्र
नष्ट हो गये ओर कितने ही भयभीत होकर भाग
गये । शक, यवन तथा अन्य बहुत-से राजा प्राण
बचानेकी इच्छासे तुरंत वसिष्ठ मुनिकौ शरणमे
गये। इस प्रकार भूमण्डलपर विजय प्राप्त करके
बाहुपुत्र सगर शीघ्र ही आचार्य वसिष्ठके समीप
आये। उन्हे अपने गुप्तचरोंसे यह बात मालूम हो
गयी थी कि हमारे शत्रु गुरुजीकी शरणमे गये ह !
बाहुपुत्र सगरको आया हुआ सुनकर महर्षिं वर्सिष्ठ
शरणागत राजाओंकी रक्षा करने तथा अपने शिष्य
सगरकी प्रसन्नताके लिये क्षणभर विचार करने
लगे। फिर उन्होने कितने ही राजाओके सिर
२९
मुंडवा दिये ओर कितने ही राजाओंकी दाढी-मूंछ
मुंडवा दी । यह देखकर सगर हंस पड़ ओर अपने
तपोनिधि गुरुसे इस प्रकार बोले ।
सगरने कहा- गुरुदेव ! आप इन दुराचारियोंकी
व्यर्थं रक्षा करते हे । इन्होने मेरे पिताके राज्यका
अपहरण कर लिया था, अतः में सब प्रकारसे
इनका संहार कर डालूगा। पापात्मा दुष्ट मनुष्य
तबतक दुष्टता करते हँ, जबतक कि उनकी शक्ति
प्रबल होती है। इसलिये शत्रु यदि दास बनकर
आये, वेश्या सौहार्दं दिखायें ओर सोप साधुता
प्रकट करें तो कल्याणक इच्छा रखनेवाले पुरुषोको
उनपर विश्वास नहीं करना चाहिये । क्रूर मनुष्य
पहले तो जीभसे बड़ी कठोर वातं बोलते है, किंतु
जब निर्बल पड़ जाते है तो उसी जीभसे बड़ी
करुणाजनक बातें कहने लगते हें । जिसको अपने
कल्याणक इच्छा हो, वह नीतिशास्त्रका ज्ञाता
पुरुष दुष्टौके दम्भपूर्णं साधुभाव ओर दासभावपर
कभी विश्वास न करे। नम्रता दिखाते हए दुर्जन,
कपटी मित्र ओर दुष्टस्वभाववाली स्त्रीपर विश्ास
करनेवाला पुरुष मृत्युतुल्य खतम ही है । अतः
गुरुदेव ! आप इनकी प्राणरक्षा न करें । ये रूप तो
गौका-सा बनाकर आये हँ, परंतु इनका कर्म
व्याप्रोके समान है। इन सब दुष्टोका वध करके मे
आपकी कृपासे इस पृथ्वीका पालन करूगा।
वसिष्ठ बोले- महाभाग! तुम्हे अनेकानेक
साधुवाद है । सुव्रत! तुम ठीक कहते हो। फिर भी
मेरी बात सुनकर तुम्हें पूर्ण शान्ति मिलेगी । राजन्।
सभी जीव कर्मोकी रस्सीमें बंधे हए है, तथापि
जो अपने पा्पोसे ही मारे गये है, उन्हें फिर
किसलिये मारते हो ? यह शरीर पापसे उत्पन्न हुआ
ओर पापसे ही वद् रहा है। इसे पापमूलक
भी तुम क्यों इसका वध करनेको उद्यत
हए हो? तुम वीर क्षत्रिय हो। इस पापमूलक
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` ज
३२ संक्षिप्त नारदपुराण
शरीरको मारकर तुम्हे कोन-सी कर्ति प्राप्त होगी ?
एेसा विचारकर इन लोगोको मत मारो।
गुरु वसिष्टठका यह वचन सुनकर सगरका
क्रोध शान्त हो गया । उस समय मुनि भी सगरके
शरीरपर अपना हाथ फेरते हुए बहुत प्रसन्न हुए।
तदनन्तर महर्षिं वसिष्ठने उत्तम त्रतका पालन
करनेवाले अन्य मरुनियोके साथ महात्मा सगरका
राज्याभिषेक किया । सगरकी दो स्त्रियाँ थी- केशिनी
ओर सुमति। नारदजी ! ये दोनों विदर्भराज काश्यपकी
कन्याएं थीं। एक समय राजा सगरकी दोनों
पत्नियोद्रारा प्रार्थना करनेपर भृगुवंशी मन्त्रवेत्ता
ओर्व मुनिने उन्हें -पुत्र-प्रा्िके लिये वर दिया। वे
मुनीश्वर तीनों कालक बातें जानते थे। उन्होने
क्षणभर ध्यानमें स्थित होकर केशिनी ओर सुमतिका
हर्ष बदाते हए इस प्रकार कहा ।
ओर्व बोले- महाभागे! तुम दोनोमेसे एक
रानी तो एक ही पुत्र प्राप्त करेगी; कितु वह वंशको
चलानेवाला होगा। परतु दूसरी केवल संतानविषयक
इच्छाको पूर्तिके लिये साठ हजार पुत्र पैदा करेगी ।
तुमलोग अपनी-अपनी रुचिके अनुसार इनमेसे
एक-एक वर मोग लो।
ओर्व मुनिका यह वचन सुनकर केशिनीने
वंशपरम्पराके हेतुश्रूत एक ही पुत्रका वरदान मोगा
तथा रानी सुमतिके साठ हजार पुत्र उत्पन्न हए।
मुनिश्रेष्ठ । केशिनीके पुत्रका नाम था असमञ्जस ।
दुष्ट असमञ्जस उन्मत्तको-सी चेष्टा करने लगा।
उसको देखा-देखी सगरके सभी पुत्र बुरे आचरण
करने लगे। इन सबके दूषित कर्मोको देखकर
बाहुपुत्र राजा सगर बहुत दुःखी हए। उन्होने
अपने पुत्रोके निन्दित कर्मपर भलीरभति विचार
किया। वे सोचने लगे- अहो! इस संसारे दुष्टोका
सङ्ग अत्यन्त कष्ट देनेवाला हे। तदनन्तर असमञ्जसके
अंशुमान् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो वडा
धर्मात्मा, गुणवान् ओर शास्त्रोंका ज्ञाता था। वह
सदा अपने पितामह राजा सगरके हितमें संलग्र
रहता था। सगरके सभी दुराचारी पुत्र लोकमें
उपद्रव करने लगे। वे धार्मिक अनुष्ठान करनेवाले
लोगोके कार्यम सदा विघ्न डाला करते थे। वे दुष्ट
राजकुमार सदा मद्यपान करते ओर पारिजात आदि
दिव्य वृक्षोके फूल लाकर अपने शरीरको सजाते
थे । उन्होने साधु पुरुषोंकी जीविका छीन ली ओर
सदाचारका नाश कर डाला। यह सब देखकर इन्द्र
आदि देवता अत्यन्त दुःखसे पीडित हो इन
सगरपुत्रोके नाशके लिये कोई उत्तम उपाय सोचने
लगे। सव देवता कुक निश्चय करके पातालकी
गुफामे रहनेवाले देवदेवेश्वर भगवान् कपिलके
समीप गये । कपिलजी अपने मनसे परमानन्दस्वरूप
आत्माका ध्यान कर रहे थे। देवताओंने भूमिपर
दण्डक भति लेटकर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया
ओर इस प्रकार स्तुति की।
देवता बोले- भगवन्! आप योगशक्तियोंसे
सम्पन्न है, आपको नमस्कार है । आप सांख्ययोग
रत॒रहनेवाले हें, आपको नमस्कार है। आप
नररूपसे छिपे हए नारायण है, आपको नमस्कार
ठे। संसाररूपी वनको भस्म करनेके लिये आप
दावानलके समान ह तथा धर्मपालनके लिये
सेतुरूप हैँ, आपको नमस्कार है। प्रभो! आप
महान् वीतराग महात्मा है, आपको बारम्बार
नमस्कार है। हम सब देवता सगरके पुत्रंसे
पीडित होकर आपकी शरणमे आये हैं । आप
हमारी रक्षा करे।
कपिलजीने कहा--श्रेष्ठ देवगण ? जो लोग
इस्र जगत्मं अपने यश, बल, धन ओर युका
नाश चाहते हं, वे ही लोगोंको पीडा देते है। जो
सर्वदा मन, वाणी ओर क्रियाद्वारा दूसरोको पीडा
दते है, उन्हें दैव ही शीघ्र नष्ट कर देता है । थोडे
((-0. 1/८111141/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
२२
ही दिनोमें इन सगरपुत्रोका नाश हो जायगा।
महात्मा कपिल मुनिके एेसा कहनेपर
विधिपूर्वक उन्हें प्रणाम करके स्वर्गलोकको चले
गये। इसी बीचमें राजा सगरने वसिष्ठ आदि
महर्षियोके सहयोगसे परम उत्तम अश्वमेध यज्ञका
अनुष्ठान आरम्भ किया । उस यज्ञके लिये नियुक्त
किये हुए घोडेको देवराज इन्द्रने चुरा लिया ओर
पातालमें जहो कपिल मुनि रहते थे, वहीं ले
जाकर बोध दिया। इन्द्रके द्वारा चुराये हए उस
अश्चको खोजनेके लिये सगरके सभी पुत्र आश्चर्यचकित
होकर भू आदि लोकोमें घूमने लगे। जब ऊपरके
लोकोमें कहीं भी उन्हें वह अश्च दिखायी नहीं
दिया, तब वे पातालमें जानेको उद्यत हुए। फिर
तो सारी पृथ्वीको खोदना शुरू किया । एक-एकने
अलग-अलग एक-एक योजन भूमि खोद डाली ।
खोदी हुई मिटरीको उन्होने समुद्रके तटपर बिखेर
दिया ओर उसी द्वारसे वे सभी सगरपुत्र पाताललोकमें
जा पहुंचे । वे सब अविवेकी मदसे उन्मत्त हो रहे
थे। पातालमें सब ओर उन्होने अश्वको दूंढना
आरम्भ किया। खोजते-खोजते वहां उन्हें करोड़ों
सू्यकि समान प्रभावशाली महात्मा कपिलका
दर्शन हआ । वे ध्यानमें तन्मय थे। उनके पास ही
वह घोड़ा भी दिखायी दिया। फिर तो वे सभी
अत्यन्त क्रोधे भर गये ओर मुनिको देखकर उन्हे
मार डालनेका विचार करके वेगपूर्वक दौड़ते हुए
उनपर टूट पडे। उस समय आपसमें एक-दूसरेसे
वे इस प्रकार कह रहे थे-“इसे मार डालो, मार
डालो बोध लो, बोध लो। पकड़ो, जल्दी
पकडो। देखो न, घोड़ा चुराकर यहां साधुरूपमें
वगुलेकी भति ध्यान लगाये वैठा है। अहो!
संसारम एसे भी खल है, जो बड़े-वड़ आडम्बर
रचते है ।' इस तरहक बातें बोलते हुए वे मुनीश्वर
कपिलका उपहास करने लगे। कपिलजी अपने
समस्त इन्द्रियवर्ग ओर बुद्धिको आत्मामें स्थिर
करके ध्यानमें तत्पर थे; अतः उनकी इस
करतूतका उन्हें कुछ भी पता नहीं चला। सगरपुत्रोकी
मृत्यु निकर थी, इसलिये उन लोगोकी वुद्धि मारी
गयी थी। वे मुनिको लातोँसे मारने लगे। कुछ
लोगोने उनकी बाहं पकड़ लीं। तव मुनिकी
समाधि भङ्ग हो गयी। उन्होने विस्मित होकर
लोकमें उपद्रव करनेवाले सगरपुत्रोको लक्ष्य करके
गम्भीरभावसे युक्त यह वचन कहा-' जो एेश्वर्यके
मदसे उन्मत्त है, जो भूखसे पीडित है, जो कामी
है तथा जो अहंकारसे मृद हो रहे है-एेसे
मनुष्योको विवेक नहीं होता* । यदि दुष्ट मनुष्य
सज्ननोंको सताते हँ तो इसमे आश्चर्य क्या है 2
नदीका वेग किनारेपर उगे हुए वृक्षोको भी गिरा
देता है । जहो धन है, जवानी है तथा परायी स्त्री
भी है, वहां सदा सब अन्धे ओर मूर्ख बने रहते
हे । दुष्टके पास लक्ष्मी हो तो वह लोकका विनाश
करनेवाली ही होती है। जैसे वायु अग्रिकी
ज्वालाको बद़ानेमें सहायक होता है ओर जैसे दृध
सोपके विषको बढानेमें कारण होता है, उसी
प्रकार दुष्टकी लक्ष्मी उसको दुष्टताको बदा देती
है । अहो! धनके मदसे अन्धा हुआ मनुष्य देखते
हुए भी नहीं देखता। यदि वह अपने हितको
देखता है तभी वह वास्तवमें देखता है ।'
एेसा कहकर कपिलजीने कुपित हो अपने
नेत्रोसे आग प्रकट कौ। उस आगने समस्त
सगरपुत्रोंको क्षणभरमे जलाकर भस्म कर डाला।
उनको नेत्राप्निको देखकर पातालनिवासी जीव
शोके डूब गये ओर असमयमें प्रलय हुआ
१. एेशर्यमदमत्तानां क्षुधितानां च॒ कामिनाम्। अहङ्कारविमृढानां विवेको नैव जायते ॥ (ना० पूर्व° ८। १०३)
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 81188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0\ 60810011
4. संक्षिप्त नारदपुराण
„द (0८८७
जानकर चीत्कार करने लगे। उस अग्निसे संतप्त हो
सम्पूर्णं सर्पं तथा राक्षस समुद्रमें शीघ्रतापूर्वक समा
गये। अवश्य ही साधु-महात्माओंका कोप दुस्सह
होता हे। -
तदनन्तर देवदूतने राजाके यमे आकर यजमान
सगरको वह खव समाचार बताया। राजा सगर
सब शस्त्रोके ज्ञाता थे। यह सब वृत्तान्त सुनकर
उन्होने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक कहा-दैवने ही उन
दुष्टोको दण्ड दे दिया। माता, पिता, भाई अथवा
पुत्रजो भी पाप करता है, वही शत्रु माना गया
हे। जो पापमें प्रवृत्त होकर सव लोगोके साथ
विरोध करता है, उसे महान् शत्र समञ्जना
चाहिये- यही शास्त्रोका निर्णय हे । मुनीश्वर नारदजी ।
राजा सगरने अपने पुत्रका नाश होनेपर भी शोक
नहीं किया; क्योकि दुराचारिर्योकी मृत्यु साधु
पुरुषोके लिये संतोषका कारण होती है । “ पुत्रहीन
पुरुषोका यज्ञम अधिकार नहीं है ' । धर्मशास््रकी
एेसी आज्ञा होनेके कारण महाराज सगरने अपने
पौत्र अंशुमान्को ही दत्तक पुत्रके रूपमे गोद ले
लिया। सारग्राही राजा सगरने बुद्धिमान् ओर
विदवानोमें श्रेष्ट अंशुमान्को अश्च द्द् लानेके
कार्यमे नियुक्त किया। अंशुमानने उस गुफाके
द्वारपर जाकर तेजोराशि मुनिवर कपिलको देखा
ओर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया। फिर दोनों
हाथोको जोड़कर वह विनयपूर्वक उनके सामने
खड़ा हो गया ओर शान्तचित्त सनातन देवदेव
कपिलसे इस प्रकार बोला।
अंशुमानने कहा-- ब्रह्यन्! मेरे पिताके भाईयोने
यहां आकर जो दुष्टता कौ है, उसे आप क्षमा करे;
क्योकि साधु पुरुष सदा दूसरोके उपकारमें लगे
रहते हँ ओर क्षमा ही उनका बल है। संत-
महात्मा दुष्ट जीवोंपर भी दया करते हे । चन्द्रमा
चाण्डालके घरसे अपनी चँदनी खींच नहीं लेते
हैं । सज्जन पुरुष दूसरोसे सताये जानेपर भी सबके
लिये सुखकारक ही होता है । देवताओंद्वारा अपनी
अमृतमयी कलाके भक्षण किये जानेपर भी चन्द्रमा
उन्हे परम संतोष ही देता है। चन्दनको काटा
जाय या छेदा जाय, वह अपनी सुगन्धसे सबको
सुवासित करता रहता हे । साधु पुरुषोंका भी एेसा
ही स्वभाव होता हे। पुरुषोत्तम! आपके गुणोंको
जाननेवाले मुनीश्वरगण एेरण मानते है कि आप
क्षमा, तपस्या तथा धर्मचिरणद्वारा समस्त लोकोंको
शिक्षा देनेके लिये इस भूतलपर अवतीर्णं हए है ।
ब्रह्मन्! आपको नमस्कार है । मुने ! आप ब्रह्मस्वरूप
हे, आपको नमस्कार हे । आप स्वभावतः ब्राह्मणोंका
हित करनेवाले ह ओर सदा ब्रह्मचिन्तने लगे
रहते है, आपको नमस्कार है ।
अंशुमान् इस प्रकार स्तुति करनेपर कपिल
मुनिका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उस समय वे
बोले-' निष्पाप राजकुमार! मे तुमपर प्रसन्न हू
वर॒ मोगो।' मुनिके एेसा कहनेपर अंशुमान्ने
प्रणाम करके कहा-' भगवन्! हमारे इन पितरोको
ब्रह्मलोकमें पहुंचा दं ।' तव कपिल मुनि अंशुमानूपर
((-0. 1/८1114<511॥1 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 68110011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
३५
अत्यन्त प्रसन्न हो आदरपूर्वक बोले-' राजकुमार ।
तुम्हारा पौत्र यहाँ गद्गाजीको लाकर अपने पितरोको
स्वर्गलोक पर्हुचायेगा । वत्स ! तुम्हारे पौत्र भगीरथद्वारा
लायी हुई पुण्यसलिला गङ्गा नदी इन सगरपुत्रोके
पाप धोकर इन्हें परम पदकी प्रापि करा देगी।
बेटा! इस घोडेको ले जाओ, जिससे तुम्हारे
पितामहका यज्ञ पूर्णं हो जाय।' तब अंशुमान्
अपने पितामहके पास लौट गये ओर उन्हें
अश्चसहित सब समाचार निवेदन किया। सगरने
उस पशुके द्वारा ब्राह्यणोके साथ वह यज्ञ पूर्ण
किया ओर तपस्याद्वारा भगवान् विष्णुकी आराधना
करके वे वेकुण्ठधामको चल गये। अंशुमानके
दिलीप नामक पुत्र हृआ। दिलीपसे भगीरथका
जन्म हुआ, जो दिव्य लोकसे गङ्गाजीको इस
भूतलपर ले आये। मुने! भगीरथकी तपस्यासे
संतुष्ट॒हो ब्रह्माजीने उन्हें गङ्गा दे दी; फिर
भगीरथ, गङ्गाजीको धारण कौन करेगा-इस
विषयमे विचार करने लगे। तदनन्तर भगवान्
शिवकी आराधना करके उनकी सहायतासे वे
देवनदी गङ्खाको पृथ्वीपर ले आये ओर उनके
जलसे स्पर्श कराकर पवित्र हुए पितरोको उन्होने
दिव्य स्वर्गलोकमें पहुंचा दिया।
=+ +> 2९८
बलिके द्वारा देवताओंकी पराजय तथा अदितिक्ी तपस्या
नारदजीने कहा-- भाईजी ! यदि मैं आपकी
कृपाका पात्र होऊं तो भगवान् विष्णुके चरणके
अग्रभावसे उत्पन्न हुई जो गङ्गा बतायी जाती है,
उनको उत्पत्तिकी कथा मुञ्जसे कहिये।
श्रीसनकजी बोले- निष्पाप नारदजी ! मे गद्धाकी
उत्पत्ति बताता हूं, सुनिये। वह कथा कहने ओर
सुननेवालेके लिये भी पुण्यदायिनी है तथा सव
पापोका नाश करनेवाली हे । कश्यप नामसे प्रसिद्ध
एक मुनि हो गये है । वे ही इन्द्र आदि देवताओके
जनक है । दक्षपुत्री दिति ओर अदिति-ये दोनों
उनको पतिया हँ । अदिति देवताओंको माता है
ओर दिति दैत्योकी जननी । ब्रह्मन् । उन दोनोके दो
पुत्र है, वे सदा एक-दूसरेको जीतनेको इच्छा
रखते हं । दितिका पुत्र आदिदैत्य हिरण्यकशिपु बड़ा
बलवान् था। उसके पुत्र प्रहाद हए । वे दैत्योमें बड़
भारी संत थे। प्रह्ादका पुत्र विरोचन हआ, जो
ब्राह्मणभक्त था। विरोचनके पुत्र बलि हए, जो
अत्यन्त तेजस्वी ओर प्रतापी थे। मुने! बलि ही
देत्योके सेनापति हए। वे बहुत बड़ी सेनाके साथ
इस पृथ्वीका राज्य भोगते थे। समूची पृथ्वीको
जीतकर स्वर्गको भी जीत लेनेका विचार कर वे
युद्धम प्रवृत्त हुए। उन्होने विशाल सेनाके साथ
देवलोकको प्रस्थान किया । देवशत्रु बलिने स्वर्गलोकं
पहुंचकर सिंहके समान पराक्रमी दैत्योद्वारा इन्द्रकी
राजधानीको घेर लिया। तब इन्द्र आदि देवता भी
युद्धके लिये नगरसे बाहर निकले। तदनन्तर
देवताओं ओर दैत्योमें घोर युद्ध छिड् गया।
दैत्योने देवताओंकी सेनापर बाणोंकी डी लगा
दी। इसी प्रकार देवता भी दैत्यसेनापर बाणवर्षा
करने लगे। तदनन्तर दैत्यगण भी देवताओंपर नाना
प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोद्रारा घातक प्रहार करने
लगे। पत्थर, भिन्दिपाल, खद्ध, परशु, तोमर,
परिघ, क्षुरिका, कुन्त, चक्र, शङ्कु, मूसल, अङ्कुश,
लाङ्गल, पट्टिश, शक्ति, उपल, शतघ्नी, पाश,
धप्पड्, मुक्रे, शूल, नालीक, नाराच, दूरसे फैकनेयोग्य
अन्यान्य अस्त्र तथा मुद्ररसे वे देवताओंको मारने
((-0. 1/(11141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
३६ संक्षिप्त नारदपुराण
लगे। रथ, अश्च, गज ओर पैदल सेनाओंसे
खचाखच भरा हआ वह युद्ध निरन्तर बढ़ने
लगा। देवताओंने भी देत्योंपर अनेक प्रकारके
अस्त्र चलाये। इस प्रकार एक हजार वर्षोतक
वह युद्ध चलता रहा । अन्तमें देत्योका बल बढ
जानेके कारण देवता परास्त हो गये ओर सब-
के-सब भयभीत हो स्वर्गलोक छोडकर भाग
गये। वे मनुष्योके रूपमे छिपकर पृथ्वीपर
विचरने लगे। विरोचनकुमार बलि भगवान्
नारायणको शरण ले अव्याहत एरय, बढी हई
लक्ष्मी ओर महान् बलसे सम्पन्न हो त्रिभुवनका
राज्य भोगने लगे। उन्होने भगवान् विष्णुकी
प्रीतिके लिये तत्पर होकर अनेक अश्वमेध यज्ञ
किये। बलि स्वर्गमें रहकर इन्द्र ओर दिक्पाल-
दोनों पदोंका-उपभोग करते थे। देवमाता अदिति
अपने पुत्रको यह दशा देखकर बहुत दुःखी
हुई । उन्होने यह सोचकर कि अव मेरा यहां
रहना व्यर्थ हे, हिमालयको प्रस्थान किया। वहां
इन्द्रका एेश्र्य तथा दैत्योंकी पराजय चाहती हई
वे भगवान् विष्णुके ध्यानमें तत्पर हो अत्यन्त
कठोर तपस्या करने लगीं। कुछ कालतक वे
निरन्तर बेठी ही रहीं । उसके बाद दीर्घकालतक
दोनो परोसे खडी रहीं । तदनन्तर बहुत समयतक
एक पैरसे ओर फिर उस एक पैरकी अँगुलियोके
ही बलपर खड़ी रहीं। कुछ कालतक तो वे
फलाहार करती रहीं, फिर सूखे पत्ते खाकर
रहने लगीं । उसके बाद बहुत दिनोंतक जल
पीकर रही, फिर वायुके आहारपर रहने लगीं
ओर अन्तम उन्होने सर्वथा आहार त्याग
दिया। नारदजी! अदिति अपने अन्तःकरणद्ारा
सच्चिदानन्दघन परमात्माका ध्यान करती हुई
एक हजार दिव्य वर्षोतक तपस्यामें लगी रहीं ।
तदनन्तर दैत्योने अदितिको ध्यानसे विचलित
करनेके लिये अपनी दादढोके अग्रभागसे अग्नि
प्रकट की, जिसने उस वनको क्षणभरमें जला
दिया। उसका विस्तार सौ योजन था ओर वह
नाना प्रकारके जीव-जन्तुओंसे भरा हआ था।
जो दैत्य अदितिका अपमान करनेके लिये गये
थे, वे सब उसी अग्रिसे जलकर भस्म हो गये।
केवल देवमाता अदिति ही जीवित बची थीं,
क्योकि दैत्योका विनाश ओर स्वजनोंपर अनुकम्पा
२ ८ ^ ॥
(0 %
+
~ ।
८४
८ ~
(
करनेवाले भगवान् विष्णुके सुदर्शन चक्रने उनकी
रक्षा को थी।
((-0. 11/11/5511 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
३७
अदितिको भगवदर्शन ओर वरप्राि, वामनजीका अवतार, बलि-वामन-संवाद,
भगवान्का तीन पेरसे समस्त ब्रह्माण्डको लेकर बलिको रसातल भेजना
नारदजीने पूछा-- भाईजी ! आपने यह बडी
अद्भुत बात बतायी हे । मैं जानना चाहता हूं कि
उस अग्निने अदितिको छोडकर उन देत्योको ही
क्षणभरमे केसे जला दिया । आप अदितिके महान्
सतत्वतका वर्णन कोजिये, जो विशेष आर्यका
कारण हे; क्योकि मुनीश्वर साधु पुरुष सदा
दूसरोको उपदेश देनेमें तत्पर रहते हे ।
सनकजीने कहा- नारदजी ! जिनका मन
भगवान्के भजनमें लगा हआ है, एेसे संतोंकी
महिमा सुनिये । भगवान्के चिन्तनमें लगे हुए साधु
पुरुषोंको बाधा देनेमे कोन समर्थ हो सकता हे?
जहां भगवान्का भक्त रहता हे, वहां ब्रह्मा, विष्णु,
शिव, देवता, सिद्ध, मुनीश्वर ओर साधु-संत नित्य
निवास करते हं। महाभाग! शान्तचित्तवाले
हरिनामपरायण भक्तोके भी हदयमें भगवान् विष्णु
सदा विराजते है, फिर जो निरन्तर उन्हीके ध्यानमें
लगे हुए है, उनके विषयमे तो कहना ही क्या है ?
भगवान् शिवकी पूजामे लगा हुआ अथवा भगवान्
विष्णुकी आराधनामें तत्पर हुआ भक्त पुरुष जहां
रहता है, वहीं लक्ष्मी तथा सम्पूर्णं देवता निवास
करते हे । जहां भगवान् विष्णुको उपासनामें संलग्र
भक्त पुरुष वास करता हे, वहां अग्नि बाधा नहीं
पहुंचा सकती । राजा, चोर अथवा रोग-व्याधि भी
कष्ट नहीं दे सकते हें । प्रेत, पिशाच, कुप्माण्ड,
ग्रह, बालग्रह, डाकिनी तथा राक्षस-ये भगवान्
विष्णुकी आराधना करनेवाले पुरुषको पीड़ा नहीं
दे सकते । जितेन्द्रिय, सबका हितकारी तथा धर्म-
कर्मका पालन करनेवाला पुरुष जहां रहता टै
वहीं सम्पूर्णं तीर्थं ओर देवता वास करते हं । जहां
एकं या आधे पल भी योगी महात्मा पुरुप ठहरते
ठे, वहीं सव श्रेय ह, वहीं तीर्थ हे, वही तपोवन
हे । जिनके नामकीर्तनसे, स्तोत्रपाठसे अथवा पूजनसे
भी सब उपद्रव नष्ट हो जाते ह, फिर उनके
ध्यानसे उपद्रवोंका नाश हो, इसके लिये कहना
ही क्या हे? ब्रह्मन्! इस प्रकार दैत्योद्रारा प्रकर
की हई उस अग्रिसे दैत्योंसहित सारा वन दग्ध हो
गया, किंतु देवमाता अदिति नहीं जली; क्योकि वे
भगवान् विष्णुके चक्रसे सुरक्षित थीं।
तदनन्तर कमलदलके समान विकसित नेत्र
ओर प्रसन्न मुखवाले शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान्
विष्णु अदितिके समीप प्रकट हृए। उनके
मुखपर मन्द-मन्द मुसकानको छटा छा रही थी
ओर चमकीले दोतोंको प्रभासे सम्पूर्णं दिशां
उद्धासित हो रही थीं । उन्होने अपने पवित्र हाथसे
कश्यपजीकी प्यारी पत्री अदितिका स्पर्शं करते
हुए कहा।
श्रीभगवान् बोले- देवमाता ! तुमने तपस्याद्वारा
मेरी आराधना की है, इसलिये मेँ तुमपर प्रसन्न हू।
तुमने बहुत समयतक कष्ट उठाया है । अव तुम्हारा
कल्याण होगा, इसमें संदेह नहीं है । तुम्हारे मनमं
जेसी रुचि हो, वह वर मोँगो, मै अवश्य दृगा।
भद्रे! भय न करो। महाभागे! तुम्हारा कल्याण
अवश्य होगा।
देवाधिदेव भगवान् विष्णुके एेसा कहनेपर
देवमाता अदितिने उनके चरणोमें प्रणाम किया
ओर सम्पूर्ण जगत्को सुख देनेवाले उन परमेश्चरकी
स्तुति को ।
अदिति बोलीं- देवदेवेश्वर ! सर्वव्यापी जनार्दन ।
आपको नमस्कार है । आप ही सत्व आदि गुणोकि
भदे जगत्करे पालन आदि व्यवहार चलानेके
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
ह क कमय शाः ` ओ
का क `
ि
३८ संक्षिप्त नारदपुराण
कारण है । आप रूपरहित होते हए भी अनेक रूप
धारण करते हें । आप परमात्माको नमस्कार हे।
सबसे एकरूपता (भिन्नता) ही आपका स्वरूप है।
आप निर्गुण एवं गुणस्वरूप हें । आपको नमस्कार
हे। आप सम्पूर्णं जगतके स्वामी ओर परम
ज्ञानरूप हें । श्रेष्ठ भक्तजनोके प्रति वात्सल्यभाव
सदा आपको शोभा बढाता रहता है। आप
मङ्गलमय परमात्माको नमस्कार हे। मुनीश्वरगण
जिनके अवतार-स्वरूपोंकी सदा पूजा करते हैँ
उन आदिपुरुष भगवान्को में अपने मनोरथकी
सिद्धिके लिये प्रणाम करती ह| जिन्हें श्रुतियाँ नहीं
जानती, उनके ज्ञाता विद्वान् पुरुष भी नहीं जानते,
जो इस जगत्के कारण हें तथा मायाको साथ रखते
हए भी मायासे सर्वथा पृथक् ह, उन भगवानूको
नमस्कार करती हू । जिनकी अद्भुत कृपादृष्टि मायाको
दूर भगा देनेवाली है, जो जगत्के कारण तथा
जगत्स्वरूप हँ, उन॒विश्चवन्दिति भगवानूकी में
वन्दना करती हू। जिनके चरणारविन्दोंकी धूलके
सेवनसे सुशोभित मस्तकवाले भक्तजन परम सिद्धिको
प्राप्त हो चुके है, उन भगवान् कमलाकान्तको मँ
नमस्कार करती हू । ब्रह्मा आदि देवता भी जिनकी
महिमाको पूर्णरूपसे नहीं जानते तथा जो भक्तके
अत्यन्त निकट रहते हे, उन भक्तसद्गी भगवान्को
मे प्रणाम करती हू। वे करुणासागर भगवान् जगत्के
सङ्गका त्याग करके शान्तभावसे रहनेवाले भक्तजनोंको
अपना सद्ग प्रदान करते है, उन सद्खरहित श्रीहरिको
में प्रणाम करती हूं। जो यज्ञोके स्वामी, यज्ञोके
भोक्ता, यज्ञकर्मोमिं स्थित रहनेवाले यज्ञकर्मके बोधक
तथा यज्ञेके फलदाता ठै, उन भगवानूको मेँ
नमस्कार करती हू । पापात्मा अजामिल भी जिनके
नामोच्वारणके पश्चात् परम धामको प्राप्त हो गया,
उन लोकसाक्षी भगवानूको भँ प्रणाम करती हूं। जो
विष्णुरूपी शिव ओर शिवरूपी विष्णु होकर इस
जगत्करे संचालक हँ, उन जगद्गुरु भगवान् नारायणको
में नमस्कार करती हूं। ब्रह्मा आदि देवेश्वर भी
जिनको मायाके पाशमें बंधे होनेके कारण जिनके
परमात्मभावको नहीं समञ्ञ॒ पाते, उन भगवान्
सर्वेश्वरको में प्रणाम करती हू। जो सबके हदयकमलमें
स्थित होकर भी अज्ञानी पुरुषोको दूरस्थ-से प्रतीत
होते हँ तथा जिनकी सत्ता प्रमाणोसे परे है, उन
ज्ञानसाक्षी परमेश्चरको में नमस्कार करती हूं। जिनके
मुखसे ब्राह्मण प्रकट हुआ है, दोनों भुजाओंसे
षत्रियको उत्पत्ति हुई हे, ऊरुओंसे वैश्य उत्पन्न हुआ
हे ओर दोनों चरणोसे शूद्रका जन्म हुआ है; जिनके
मनसे चन्द्रमा प्रकर हुआ है, नेत्रसे सूर्यका प्रादुर्भाव
हुआ हे; मुखसे अग्रि ओर इनद्रकी तथा कानोसे
वायुको उत्पत्ति हुई हे; ऋवेद, यजुर्वेद ओर
सामवेद जिनके स्वरूप हैँ, जो संगीततिषयक सातां
स्वरोके भी आत्मा है, व्याकरण आदि छः अङ्क भी
जिनके स्वरूप हैँ, उन्हीं आप परमेश्वरको मेरा
बारम्बार नमस्कार है। भगवन्! आप ही इन्द्र, वायु
ओर चन्द्रमा हें । आप ही ईशान (शिव) ओर आप
ही यम हं। अग्नि ओर निरत्रति भी आप ही हैँ । आप
ही वरुण एवं सूर्य हें । देवता, स्थावर वृक्ष आदि,
पिशाच, राक्षस, सिद्ध, गन्धर्व, पर्वत, नदी, भूमि
ओर समुद्र भी आपके स्वरूप है। आप ही
जगदीश्वर हं, जिनसे परात्पर तत्तव दूसरा कोई नहीं
हे। देव ! सम्पूर्णं जगत् आपका ही स्वरूप है,
इसलिये सदा आपको नमस्कार है। नाथनाथ।
सर्वज्ञ! आप ही सम्पूर्णं भूतोकि आदिकारण हैँ । वेद
आपका ही स्वरूप है। जनार्दन! दैत्योद्रारा सताये
हुए मेरे पुत्रोकी रक्षा कीजिये।
इस प्रकार स्तुति करके देवमाता अदितिने
भगवान्को बारम्बार प्रणाम किया ओर हाथ
जोड़कर कहा। उस समय आनन्दके ओंसुओंसे
उनका वक्षःस्थल भींग रहा था। (वे बोलीं-)
((-0. 1/1114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
" देवेश ! आप सबके आदिकारण हैं । मँ आपको
कृपाकौ पात्र हू मेरे देवलोकवासी पुत्रको
अकण्टक राज्यलक्ष्मी दीजिये। अन्तर्यामिन्! विश्वरूप ।
सर्वज्ञ! परमेश्वर! लक्ष्मीपते! आपसे क्या छिपा
हुआ हे? प्रभो! आप मुञ्से पूषछछकर मुञ्चे क्यों
मोहमें डाल रहे हें 2 तथा आपकी आज्ञाका पालन
करनेके लिये मेरे मनमें जो अभिलाषा है, वह
आपको बताऊगी । देवेश्वर! मेँ देत्योसे पीडित हो
रही हं। मेरे पुत्र इस समय मेरी रक्षा न कर
सकनेके कारण व्यर्थ हो गये हें । मेँ दैत्योंका भी
वध करना नहीं चाहती, क्योकि वे भी मेरे पुत्र
ही हें । सुरेशर ! उन दैत्योँको मारे बिना ही मेरे
पुत्रको सम्पत्ति दे दीजिये ।' नारदजी ! अदितिके
एेसा कहनेपर देवदेवेश्वर भगवान् विष्णु पुनः
बहुत प्रसन्न हुए ओर देवमाताको आनन्दित
करते हुए आदरपूर्वक बोले।
श्रीभगवान्ने कहा- देवि! में प्रसन्न हू। तुम्हारा
कल्याण हो। मँ स्वयं ही तुम्हारा पुत्र बनूंगा;
क्योकि सौतके पुत्रोोपर इतना वात्सल्य तुम्हारे
सिवा अन्यत्र दुर्लभ है। तुमने जो स्तुति कौ है
उसको जो मनुष्य पदढंगे, उन्हें श्रेष्ट सम्पत्ति प्राप्त
होगी ओर उनके पुत्र कभी हीन दशामें नहीं
पड़गे। जो अपने तथा दूसरेके पुत्रपर समानभाव
रखता हे, उसे कभी पुत्रका शोक नहीं होता- यह
सनातन धर्म है९।
अदिति बोलीं-देव ! आप सबके आदिकारण
ओर परम पुरुष हे । म आपको अपने गभमिं धारण
करनेमे असमर्थं हूं। आपके एक-एक रोममं
असंख्य ब्रह्माण्ड हं । आप सवके ईश्वर तथा
कारण हैं । प्रभो ! सम्पूर्णं देवता ओर श्रुतियां भी
जिनके प्रभावको नहीं जानती, उन्हीं देवाधिदेव
३९
भगवान्को मैं गभ्मिं केसे धारण करूगी 2? आप
सृक्ष्मसे भी अत्यन्त सक्षम, अजन्मा तथा परात्पर
परमेश्वर हें । देव ! आप पुरुषोत्तमको मँ कैसे गभं
धारण करूगी 2 महापातकी मनुष्य भी जिनके
नाम-स्मरणमात्रसे मुक्त हो जाता है, वे परमात्मा
ग्राम्यजनोंके बीच जन्म केसे धारण कर सकते हँ ?
प्रभो ! जैसे आपके मत्स्य ओर शूकर अवतार हो
गये हे, वेसा ही यह भी होगा। विश्चेश! आपकी
लीलाको कोन जानता है? देव! में आपके
चरणारविन्दोमे प्रणत होकर आपके ही नाम-
स्मरणे लगी हुई सदा आपका ही चिन्तन करती
हू। आपको जेसी रुचि हो, वैसा करें ।
श्रीसनकजीने कहा- अदितिका वचन सुनकर
देवताओंके भी देवता भगवान् जनार्दनने देवमाताको
अभयदान दिया ओर इस प्रकार कहा।
श्रीभगवान् बोले- महाभागे ! तुमने सत्य कहा
हे। इसमे संशय नहीं हे। शुभे! तथापि मेँ तुम्हें
एक गोपनीयसे भी गोपनीय रहस्य बतलाता हू,
सुनो। जो राग-द्वेषसे शुन्य, दूसरोमें कभी दोष
नहीं देखनेवाले ओर दम्भसे दूर रहनेवाले मेरे
शरणागत भक्त है, वे सदा मुञ्चे धारण कर सकते
हैँ। जो दूसरोंको पीड़ा नहीं देते, भगवान्
शिवके भजनम लगे रहते ओर मेरी कथा
सुननेमें अनुराग रखते हँ, वे सदा मुञ्चे अपने
हदयमें धारण करते हँ । देवि ! जिन्होँने पति-
भक्तिका आश्रय लिया है, पति ही जिनका
प्राण ठै ओर जो आपसे कभी डउाह नहीं
रखती, एेसी पतिव्रता स्त्रियाँ भी सदा मृद्चे
अपने भीतर धारण कर सकती ह । जो माता-
पिताका सेवक, गुरुभक्त, अतिधियोंका प्रेमी
ओर् ब्राह्मणोका हितकारी है, वह सदा मुञ्च
१. स्वात्मजे वान्यपुत्रे वा यः समत्वेन वर्तते । न तस्य पुत्रशोकः स्यादेष धर्मः सनातनः ॥
(ना० पूर्व ११। ४८)
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 66810011
चका चा क क का कर ऋ ` कक क
कापा काक चका ` वा न ` ऋक र क ककर ` `
४० संक्षिप्त नारदपुराण
धारण करता है। जो सदा पुण्यतीर्थोका सेवन
करते, सत्सङ्गमें लगे रहते ओर स्वभावसे ही
सम्पूर्ण जगतूपर कृपा रखते है, वे मुञ्चे सदा अपने
हदयमें धारण करते हँ । जो परोपकारमें तत्पर,
पराये धनके लोभसरे विमुख ओर परायी स्त्रियोके
प्रति नपुंसक होते हँ, वे भी सदा मुञ्चे अपने भीतर
धारण करते हैँ -। जो तुलसीकी उपासनामें लगे
हे, सदा भगवन्नामके जपमें तत्पर हैँ ओर गोओंकी
रक्षामें संलग्र रहते हँ, वे सदा मुञ्चे हदयमे धारण
करते हे । जो दान नहीं लेते, पराये अन्नका सेवन
नहीं करते ओर स्वयं दूसरोंको अन्न ओर जलका
दान देते हे, वे भो सदा मुञ्चे धारण करते हेँ।
देवि! तुम तो सम्पूर्ण भूतोके हितमें तत्पर पतिप्राणा
साध्वी स्त्री हो, अतः में तुम्हारा पुत्र होकर
तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूगा।
देवमाता अदितिसे एेसा कहकर देवदेवेश्वर
भगवान् विष्णुने अपने कण्ठकी माला उतारकर
उन्हे दे दी ओर अभयदान देकर वे वहाँसे
१. परोपक्रारनिरताः
अन्तरधनि हो गये। तदनन्तर दक्षकुमारी देवमाता
अदिति प्रसन्नचित्तसे भगवान् कमलाकान्तको पुनः
प्रणाम करके अपने स्थानपर लौट आयीं । फिर
समय आनेपर विश्चवन्दिति महाभागा अदितिने
अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक सर्वलोकनमस्कृत पुत्रको
जन्म दिया। वह बालक चन्द्रमण्डलके मध्य
विराजमान ओर परम शान्त था। उसने एक हाथमे
शङ्क ओर दूसरेमें चक्र ले रखा था। तीसरे हाथमें
अमृतका कलश ओर चोथेमें दधिमिशचित अन्न था।
यह भगवान्का सुप्रसिद्ध वामन अवतार था।
भगवान् वामनको कान्ति सहस्रो सूर्येकि समान
उज्ज्वल थी । उनके नेत्र खिले हुए कमलके समान
शोभा पा रहे थे। वे पीताम्बरधारी श्रीहरि सव
प्रकारके दिव्य आभूषणोसे विभूषित थे। सम्पूर्ण
लोकोके एकमात्र नायक, स्तोत्रोरारा स्तवन करने
योग्य तथा ऋषि-मुनियोके ध्येय भगवान् विष्णुको
प्रकट हुए जानकर महर्षिं कश्यप हर्षसे विहल हो
गये । उन्होने भगवान्को प्रणाम करके हाथ जोड़कर
इस प्रकार स्तुति करना आरम्भ किया।
कश्यपजी वबोले- सम्पूर्णं विश्वको सृष्टिक
कारणभूत ! आप परमात्माको नमस्कार है, नमस्कार
है। समस्त जगत्का पालन करनेवाले! आपको
नमस्कार हे, नमस्कार हे। देवताओंके स्वामी।
आपको नमस्कार हे, नमस्कार है। दैत्योका नाश
करनेवाले देव ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है।
भक्तजनेके प्रियतम ! आपको नमस्कार है, नमस्कार
हे । साधु पुरुष आपको अपनी चेष्टाओंसे प्रसन्न
करते है; आपको नमस्कार है, नमस्कार है।
दुष्टोका नाश करनेवाले भगवान्को नमस्कार है,
नमस्कार है। उन जगदीश्वरको नमस्कार है,
नमस्कार है। कारणवश वामनस्वरूप धारण करनेवाले
परद्रव्यपराङ्मुखाः। नपुंसकाः परस्त्रीषु ते वहन्ति च मां सदा॥
(ना० पूर्वं° १२। ६२)
((-0. 1\॥111104/5511॥1 81188 \/8181185। 01661010. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
४१
अमित पराक्रमी भगवान् नारायणको नमस्कार
नमस्कार है। धनुष, चक्र, खद्ख ओर गदा धारण
करनेवाले पुरुषोतमको नमस्कार है । क्षीरसागरमें
निवास करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। साधु-
पुरुषोके हदयकरमलमें विराजमान परमात्माको नमस्कार
हे। जिनकौ अनन्त प्रभाकी सूर्य आदिसे तुलना
नहीं को जा सकती, जो पुण्यकथामें आते ओर
स्थित रहते हैँ, उन भगवान्को नमस्कार दहै,
नमस्कार है। सूर्यं ओर चन्द्रमा आपके नेत्र हैं
आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप यज्ञोका
फल देनेवाले है, आपको नमस्कार है। आप
यज्षके सम्पूर्ण अद्धोमें विराजित होते है, आपको
नमस्कार है। साधु पुरुषोके प्रियतम! आपको
नमस्कार है । जगत्के कारणोके भी कारण आपको
नमस्कार है। प्राकृत शब्द, रूप आदिसे रहित
आप परमेश्वरको नमस्कार है। दिव्य सुख प्रदान
करनेवाले आपको नमस्कार है। भक्तोके हदयमें
वास करनेवाले आपको नमस्कार है। मत्स्यरूप
धारण करके अज्चानान्धकारका नाश करनेवाले
आपको नमस्कार है। कच्छपरूपसे मन्दराचल
धारण करनेवाले आपको नमस्कार है । यज्ञवराह-
नामधारी आपको नमस्कार है। हिरण्याक्षको विदीर्ण
करनेवाले आपको नमस्कार है। वामन-रूपधारी
आपको नमस्कार है। क्षत्रिय-कुलका संहार करनेवाले
परशुरामरूपधारी आपको नमस्कार दहै । रावणका
संहार करनेवाले श्रीराम-रूपधारी आपको नमस्कार
है। नन्दसुत बलराम जिनके ज्येष्ठ भ्राता है, उन
श्रीकृष्णावतारधारी आपको नमस्कार है। कमलाकान्त ।
आपको नमस्कार है। आप सबको सुख देनेवाले
तथा स्मरणमात्र करनेपर सबको पीडाओंका नश
करनेवाले है। आपको बारम्बार नमस्कार दहै।
यन्ञेश ! यज्ञस्थापक । यज्ञविघ्र-विनाशक ! यन्ञरूप।
ओर यजमानरूप परमेश्वर ! आप ही यज्ञके सम्पूर्ण
अङ्ग ह । म आपका यजन करता हूं।
कश्यपजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर सम्पूर्ण
लोकोंको पवित्र करनेवाले देवेश्वर वामन हँसकर
कश्यपजीका हर्षं बढ़ाते हए बोले।
श्रीभगवान्ने कहा- तात । तुम्हारा कल्याण
हो। में तुमपर बहुत प्रसन्न हूं । देवपूजित महर्षे ?
थोडे ही दिनोमें तुम्हारा सम्पूर्णं मनोरथ सिद्ध
करूगा। म पहले भी दो जन्मों तुम्हारा पुत्र
हुआ हू तथा अब इस जन्मे भी तुम्हारा पुत्र
होकर तुम्हें उत्तम सुखकी प्राति कराऊंगा।
इधर दैत्यराज बलिने भी अपने गुरु शुक्राचार्य
तथा अन्य मुनीश्वरोके साथ दीर्घकालतक चलनेवाला
बहुत बड़ा यज्ञ प्रारम्भ किया। उस यज्ञमें ब्रह्मवादी
महर्षियोने हविष्य ग्रहण करनेके लिये लक्ष्मीसहित
भगवान् विष्णुका आवाहन किया। जिसका एेशर्य
बहुत बढा-चदा था, उस दैत्यराज बलिके महायज्ञमें
माता-पिताकी आज्ञा ले ब्रह्मचारी वामनजी भी
गये। वे अपनी मन्द मुसकानसे सव लोगोंका
मन मोहे लेते थे। भक्तवत्सल वामनके रूपमें
भगवान् विष्णु मानो बलिके हविष्यका प्रत्यक्ष
भोग लगानेके लिये आये थे। दुराचारी हो या
सदाचारी, मूख हो या पण्डित, जो भक्छिभावसं
युक्त है, उसके अन्तःकरणे भगवान् विष्णु
सदा विरजमान रहते हं । वामनजीको आते देख
ज्ञानदृ्टिवाले महर्षिगण उन्हें साक्षात् भगवान्
नारायण जानकर सभासदोंसहित उनकी अगवानीमें
गये । यह जानकर दैत्यगुरु शुक्राचार्य एकान्तमें
धघलिको कुछ सलाह देने लगे।
शुक्राचार्य बोले--देत्यराज! सौम्य । तुम्हारी
राजलक्ष्मीका अपहरण करनेके लिये भगवान्
विष्णु वामनरूपसे अदितिके पुत्र हुए । वे
तुम्हारे यज्ञम आ रहे ह । असुरैर! तुम उन्हे कुछ
न देना। तुम तो स्वयं विदान् हो । इस समय मेरा
-0. ॥\५५111(॥<510॥ 8118\/8॥1 \/218185। (06011010. [1411260 0 €७81001॥1
र, २
संक्षिप्त नारदपुराण
जो मत है, उसे सुनो। अपनी बुद्धि ही सुख | आ रहे हैँ, तब तो मैं कृतार्थं हो गया-इसमे
देनेवाली होती दहै। गुरुकी बुद्धि विशेषरूपसे
सुखद होती हे । दूसरेको बुद्धि विनाशका कारण
होती है ओर स्त्रीकी बुद्धि तो प्रलय करनेवाली
होती हे।
बलिने कहा-- गुरुदेव ! आपको इस प्रकार
धर्ममार्गका विरोधी वचन नहीं कहना चाहिये ।
यदि साक्षात् भगवान् विष्णु मुञ्जसे दान ग्रहण
करते है तो इससे बढ़कर ओर क्या होगा ? विद्वान्
पुरुष भगवान् विष्णुको प्रसन्नताके लिये यज्ञ करते
है, यदि साक्षात् विष्णु ही आकर हमारे हविष्यका
भोग लगाते है तो संसारम मुञ्जसे बढ़कर भाग्यशाली
कोन होगा? पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु जीवको
उत्तम भक्तिभावसे स्मरण कर लेनेसे ही पवित्र
कर देते ह । जिस किसी भी वस्तुसे उनकी पूजा
को जाय, वे परम गति दे देते हे । दूषित चित्तवाले
पुरुषोके स्मरण करनेपर भी भगवान् विष्णु उनके
पापको वेसे ही हर लेते है, जैसे अग्रिको विना
इच्छा किये भी च्छ् दिया जाय तो भी वह जला
ही देती हे। जिसक्की जिहाके अग्रभागपर “हरि
यह दो अक्षर वास करता हे, वह पुनरावृत्तिरहित
श्रीविष्णुधामको प्रास होता है^। जो राग आदि
दोषोसे दूर रहकर सदा भगवान् गोविन्दका ध्यान
करता है, वह वैकुण्ठधाममें जाता है-यह मनीषी
पुरुषोका कथन है । महाभाग गुरुदेव}! अग्रि
अथवा ब्राह्मणके मुखमें भगवान् विष्णुके प्रति
भक्ति-भाव रखते हए जो हविष्यको आहुति दी
जाती है, उससे वे भगवान् प्रसन्न होते हें । मे तो
केवल भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये ही उत्तम
यज्ञका अनुष्ठान करता हू । यदि स्वयं भगवान् यहाँ
१. हरिर्हरति
पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः।
संशय नहीं हे ।
दैत्यराज बलि जब एेसी बातें कह रहे थे,
उसी समय वामनरूपधारी भगवान् विष्णुने यक्षशालामें
प्रवेश किया। वह स्थान होमयुक् प्रज्वलित
अग्रिके कारण बड़ा मनोरम जान पड़ता धा।
करोडों सूर्योकि समान प्रकाशमान तथा सुडौल
अङ्खोके कारण परम सुन्दर वामनजीको देखकर
राजा बलि सहर्ष खडे हो गये ओर हाथ जोड़कर
उनका स्वागत किया। वैठनेके लिये आसन देकर
उन्होने वामनरूपधारी भगवान्के चरण पखारे ओर
उस चरणोदकको कृटुम्बसहित मस्तकपर धारण
करके बड़े आनन्दका अनुभव किया। जगदाधार
भगवान् विष्णुको विधिपूर्वक अर्ध्यं देते-देते बलिके
शरीरमें रोमाञ्च हो आया, नेत्रोसे आनन्दके ओंसू
ञ्ञरने लगे ओर वे इस प्रकार बोले।
बलिने कहा- आज मेरा जन्म सफल हुआ।
अनिच्छयापि संस्यृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥
जिह्वाग्रे -वसते यस्य॒ 'हरिरित्यक्षरदयम्। स॒ विष्णुलोकमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥
(ना० पूर्व० ११। १००-१०१)
((-0. 1\/॥८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01611010. 01411260 0 6810011
पूर्व भाग-प्रथम पाद
४३
आज मेरा यज्ञ सफल हुआ ओर मेरा ह जीवन
भी सफल हो गया। मैं कृतार्थं हो गया- इसमें
संदेह नहीं हे । भगवन्! आज मेरे यहाँ अत्यन्त
दुर्लभ अमोघ अमृतकी वर्षा हो गयी । आपके
शुभागमनमात्रसे अनायास महान् उत्सव छा गया ।
इसमे संदेह नहीं कि ये सब ऋषि कृतार्थ हो गये
प्रभो ! इन्होने पहले जो तपस्या कौ थी, वह आज
सफल हो गयी । मेँ कृतार्थ हू, कृतार्थ हू, कृतार्थ
हू-इसमे संशय नहीं हे । अतः भगवन्! आपको
नमस्कार है, नमस्कार हे ओर बारम्बार नमस्कार हे ।
आपकी आज्ञासे आपके आदेशका पालन करू एेसा
विचार मेरे मनमें हो रहा है । अतः प्रभो! आप पूर्ण
उत्साहके साथ मुञ्े अपनी सेवाके लिये आज्ञा दें।
यज्ञमे दीक्षित यजमान बलिके एेसा कहनेपर
भगवान् वामन हंसकर बोले--"राजन्। मुञ्चे तपस्याके
निमित्त रहनेके लिये तीन पग भूमि दे दो।
भूमिदानका माहात्म्य महान् है । वैसा दान न
हुआ है, न होगा। भूमिदान करनेवाला मनुष्य
निश्चय ही परम मोक्ष पाता है। जिसने अग्निको
स्थापना की हो, उस श्रोत्रिय ब्राह्मणके लिये
थोड़ी-सी भी भूमि दान करके मनुष्य पुनरावृकत्तिरहित
ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लेता हे । भूमिदाता सब कुछ
देनेवाला कहा गया है। भूमिदान करनेवाला
मोक्षका भागी होता हे। भूमिदानको अतिदान
समञ्ना चाहिये । वह सब पापोका नाश करनेवाला
हे। कोई महापातकसे युक्त अथवा समस्त पातकोंसे
दूषित हो तो भी दस हाथ भूमिका दान करके सव
पापोसे छूट जाता है । जो सत्पात्रको भूमिदान
करता हे, वह सम्पूर्णं दानोका फल पाता हे । तीनों
लोकोमें भूमिदानके समान दूसरा कोई दान नहीं
हे । दैत्यराज ! जो जीविकारहित ब्राह्मणको भूमिदानं
करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन मँ सौ वर्षों
भी नहीं कर सकता। जो ईख, गेह, धान ओर
सुपारीके वृक्ष आदिसे युक्त भूमिका दान करता है,
वह निश्चय ही श्रीविष्णुके समान है । जीविकाहीन,
दद एवं कुटुम्बी ब्राह्मणको थोड़ी-सी भी भूमि
देकर मनुष्य भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर
लेता हे। भूमिदान बहुत बड़ा दान दहै। उसे
अतिदान कहा गया हे। वह सम्पूर्णं पापोका
नाशक तथा मोक्षरूप फल देनेवाला है । इसलिये
दैत्यराज! तुम सब ध्मकि अनुष्ठानमें लगे रहकर
मुड़ तीन पग पृथ्वी दे दो। वहां रहकर मैं तपस्या
करूगा।'
भगवान्के एेसा कहनेपर विरोचनकुमार बलि
बहुत प्रसन्न हुए ओर उन्होनि ब्रह्मचारी वामनजीको
भूमिदान करनेके लिये जलसे भरा कलश हाथमं
लिया। सर्वव्यापी भगवान् विष्णु यह जान गये कि
शुक्राचार्य इस कलशमें घुसकर जलकी धाराको
रोक रहे हें । अतः उन्होने अपने हाथमे लिये हुए
कुशके अग्रभागको उस कलशके मुखम घुसेड्
दिया जिसने शुक्राचार्यके एक नेत्रको नष्ट कर
दिया। इसके वाद उन्होने शस्त्रके समान उस
कुशके अग्रभागको ओंखसे अलग किया। इतनेमें
राजा बलिने भगवान् महाविष्णुको तीन पग
पृथ्वीका दान कर दिया। तदनन्तर विश्वात्मा भगवान्
उस समय बढ़ने लगे। उनका मस्तक ब्रह्मलोकतक
पहुंच गया। अत्यन्त तेजस्वी विश्वरूप श्रीहसिनि
अपने दो पैरसे सारी भूमि नाप ली। उस्र समय
उनका दूसरा पैर ब्रह्माण्डकटाह (शिखर) -को द
गया ओर अंगृठेके अग्रभागके आघातसे फूटकर वह
ब्रह्माण्ड दो भागेमिं वट गया। उस चिद्रके द्वारा
ब्रह्माण्डसे बाहरका जल अनेक धाराओमे बहकर
आने लगा। भगवान् विष्णुके चरणोंको धोकर
निकला हुआ वह निर्मल गद्धाजल सम्पूर्णं लोकोको
पवित्र करनेवाला था। ब्रह्माण्डके बाहर जिसका
उद्रमस्थान दहै, ब्रह श्रेष्ट एवं पावन गङ्गाजलं
((-0. 1\/॥(11104/5511॥1 81188 \/81/81185। (01661101. 01411260 0 66810011
ठठ
संक्षिप्त नारदपुराण
महाविष्णुने विरोचनपुत्र बलिके लिये भोजन
धारारूपमें प्रवाहित हआ ओर ब्रह्मा आदि देवता्ओंको
उसने पवित्र किया । फिर सपर्षियोसे सेवित हो
वह मेरुपर्वतके शिखरपर गिरा। वामनजीका यह
अद्भुत कर्म देखकर ब्रह्मा आदि देवता, ऋषि तथा
मनुष्य हर्षसे विहत हो उनकी स्तुति करने लगे।
देवता बोले- आप परमात्मस्वरूप परमेश्चरको
नमस्कार हे। आप परात्पर होते हए भी अपरा
प्रकृतिसे उत्पन्न जगत्का रूप धारण करते दै ।
आपको नमस्कार हे । आप ब्रह्मरूप है, आपकी
मन-बुद्धि अपने ब्रह्यरूपमें ही रमण कर्ती हे ।
आप कहीं भी कुण्ठित न होनेवाले अद्भुत कर्मसे
सुशोभित होते हें । आपको नमस्कार दै। परेश।
परमानन्द! परमात्मन् ! परात्पर विश्वमूर्ते! प्रमाणातीत ।
आप सर्वात्माको नमस्कार है। आपके सब ओर
नेत्र हँ, सब ओर भुजां हं, सब ओर मस्तक हैँ
ओर सब ओर गति है, आपको नमस्कार हे।
ब्रह्मा आदि देताओंद्रारा इस प्रकार स्तुति कौ
जानेपर भगवान् महाविष्णुने स्वर्गवासी देवताओंको
अभयदान दिया ओर वे देवाधिदेव सनातन श्रीहरि
बहुत प्रसन्न हुए। उन्होने एक पग भूमिको पूर्तिके
लिये विरोचनपुत्र दैत्यराज बलिको बांध लिया,
फिर उसे अपनी -शरणमे आया जान रसातलका
राज्य दे दिया ओर स्वयं भक्तके वशीभूत होकर
बलिके द्वारपाल होकर रहने लगे।
नारदजीने पृच्छा- मुने! रसातल तो सर्पोकि
भयसे परिपूर्ण भयंकर स्थान है । वहां भगवान्
^+ +
आदिक क्या व्यवस्था की ।
श्रीसनकजीने कहा- नारदजी ! अग्रिमे विना
मन्त्रके जो आहुति डाली जाती है ओर अपात्रको
जगी दान दिया जाता है, वह सब कतकि लिये
भयंकर होता है ओर वही राजा बलिके भोगका
साधन बनता हे। अपवित्र मनुष्यके द्वारा जो
हविष्यका होम, दान ओर सत्कर्म किया जाता
हे, वह सब रसातलमें बलिके उपभोगके योग्य
होता है ओर कर्ताको अधःपातरूप फल देनेवाला
हे। इस प्रकार भगवान् विष्णुने बलिदैत्यको
रसातल-लोक ओर अभयदान देकर सम्पूर्ण
देवताओंको स्वर्गका राज्य दे दिया। उस समय
देवता उनका पूजन, महर्षिगण स्तवन ओर
गन्धर्वलोग गुणगान कर रहे थे। वे विराट्
महाविष्णु पुनः वामनरूप हो गये । ब्रह्मवादी
मुनियोने भगवान्का यह महान् कर्म देखकर
परस्पर मुसकराते हए उन पुरुषोत्तमको प्रणाम
किया। सम्पूर्ण भूतस्वरूप भगवान् विष्णु वामनरूप
धारण करके सब लोगोंको मोहित करते हए
तपस्याके लिये वनमें चले गये । भगवान् विष्णुके
चरणोसे निकली हुई गङ्गादेवीका एेसा प्रभाव है
कि जिनके स्मरणमात्रसे मनुष्य सम्पूर्णं पातकोंसे
मुक्त हो जाता हे। जो इस गद्धा-माहात्म्यको
देवालय अथवा नदीके तटपर पठता या सुनता
है, वह अश्चमेधयज्ञका फल पाता हे ।
सद २/४
दानका पात्र, निष्फल दान, उत्तम-मध्यम-अधम दान, धर्मराज-भगीरथ-संवाद,
ब्राह्मणक्छो जीविकादानका माहात्म्य तथा तडाग-निर्माणजनित पुण्यके
विषयमे राजा वीरभद्रकी कथा
नारदजी बोले-भाईजी ! मुञ्चे गङ्गा-माहात्म्य | पापोंका नाश करनेवाला है। अब मुञ्जे दान एवं
सुननेको इच्छा थी, सो तो सुन ली। वह सब
दानके पात्रका लक्षण बताइये ।
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 0141260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
५
श्रीसनकजीने कहा-- देवर्षे! ब्राह्मण
वर्णोका श्रेष्ठ गुरु है। जो दिये हुए दानको अक्षय
बनाना चाहता हो, उसे ब्राह्मणको ही दान देना
चाहिये। सदाचारी ब्राह्मण निर्भय होकर सबसे
दान ले सकता हे, किंतु क्षत्रिय ओर वैश्य कभी
किसीसे दान ग्रहण न करें। जो ब्राह्मण क्रोधी,
पुत्रहीन, दम्भाचार-परायण तथा अपने कर्मका
त्याग करनेवाला हे, उसको दिया हआ दान
निष्फल हो जाता है। जो परायी स्रीमें आसक्त)
पराये धनका लोभी तथा नक्षत्रसूचक (ज्योतिषी)
हे, उसे दिया हुआ दान भी निष्फल होता है
जिसके मनमें दूसरोके दोष देखनेका दुर्गुण भरा
है, जो कृतघ्न, कपटी ओर यज्ञके अनधिकारियोसे
यज्ञ करानेवाला है, उसको दिया हुआ दान भी
निष्फल होता है । जो सदा मांगनेमें ही लगा रहता
है, जो हिंसक, दुष्ट ओर रसका विक्रय करनेवाला
हे, उसे दिया हुआ दान भी निष्फल होता हे।
ब्रह्मन्! जो वेद्, स्मृति तथा धर्मका विक्रय
करनेवाला हे, उसको दिया हुआ दान भी निष्फल
होता है। जो गीत गाकर जीविका चलाता है
जिसको स्त्री व्यभिचारिणी है तथा जो दूसरोको
कष्ट देनेवाला है, उसको दिया हुआ दान भी
निष्फल होता हे। जो तलवारसे जीविका चलाता
हे, जो स्याहीसे जीवन-निर्वाह करता है, जो
जीविकाके लिये देवताको पूजा स्वीकार करता
हे, जो समूचे गोवका पुरोहित है तथा जो
धावनका काम करता हे, एेसे लोगोको दिया हुआ
दान निष्फल होता हे। जो दूसररोके लिये रसोई
वनानेका काम करता है, जो कविताद्रारा लोगोंकी
ज्ूठी प्रशंसा किया करता ह, जो वैद्य एवं अभक्ष्य
वस्तुओंका भक्षण करनेवाला है, उसको दिया
हुआ दान भी निष्फल होता है। जो शृद्रोंका अन्न
खाता, शुद्रोके मुदे जलाता ओर व्यभिचारिणी
स्त्रीक संतानका अन्न भोजन करता है, उसको
दिया हुआ दान भी निष्फल होता हे। जो भगवान्
विष्णुके नाम-जपको वेचता ठै, संध्याकर्मको
त्यागनेवाला हे तथा दूषित दान-ग्रहणसे दग्ध हो
चुका है, उसे दिया हुआ दान भी निष्फल होता
ठे। जो दिनमें सोता, दिनमें मेथुन करता ओर
संध्याकालमें खाता है, उसे दिया हुआ दान भी
निष्फल होता है । जो महापातकोसे युक्त है, जिसे
जाति-भाइयोने समाजसे बाहर कर दिया है तथा
जो कुण्ड (पतिके रहते हए भी व्यभिचारसे
उत्पन्न हुआ) ओर गोलक (पतिके मर जानेपर
व्यभिचारसे पेदा हुआ) है, उसे दिया हुआ दान
भी निष्फल होता है । जो परिवित्ति (छोटे भाईके
विवाहित हो जानेपर भी स्वयं अविवाहित), शठ,
परिवेत्ता (बडे भाईके अविवाहित रहते हुए स्वयं
विवाह करनेवाला), स्त्रीके वशमें रहनेवाला ओर
अत्यन्त दुष्ट हे, उसको दिया हआ दान भी
निष्फल होता है। जो शराबी, मांसखोर, स्त्रीलम्पर,
अत्यन्त लोभी, चोर ओर चुगली खानेवाला टै,
उसको दिया हुआ दान भी निष्फल होता है।
द्विजश्रेष्ठ । जो कोई भी पापपरायण ओर सज्जनं
पुरुषोद्रारा सदा निन्दित हो, उनसे न तो दान लेना
चाहिये ओर न दान देना ही चाहिये।
नारदजी ! जो ब्राह्मण सत्कर्ममिं लगा हआ हो,
उसे यपूर्वक दान देना चाहिये । जो दान श्रद्धापूर्वकं
तथा भगवान् विष्णुके समर्पणपूर्वक दिया गया हो
एवं जो उत्तम पात्रके याचना करनेपर दिया गया
हो, वह दान अत्यन्त उत्तम है । नारदजी । इहलोकं
या परलोकके लाभका उदेश्य रखकर जो सुपात्रको
दान दिया जाता है, वह सकाम दान मध्यम माना
गया टै। जो दम्भसे, दूसरोकी हिंसाके लिये,
अविधिपूर्वक, क्रोधसे, अश्रद्धासे ओर अपात्रको
दिया जाता है, वह दान अधम माना गया है । राजा
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1.
संक्षिप्त नारदपुराण
बलिको संतुष्ट करनेके लिये यानी अपवित्र भावसे
तथा अपात्रको किया हुआ दान अधम, स्वार्थ-
सिदधिके लिये करिया हुआ दान मध्यम तथा
भगवान्को प्रसन्नताके लिये किया हुआ दान उत्तम
है- यह वेदवेत्ताओमें श्रेष्ठ ज्ञानी पुरुष कहते हें ।
दान, भोग ओर नाश-ये धनकी तीन प्रकारकी
गतियो है । जो न दान करता है ओर न उपभोगमें
लाता हे, उसका धन केवल उसके नाशका कारण
होता हे। ब्रह्मन्! धनका फल है धर्म ओर धर्म
वही है जो भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेवाला हे ।
क्या वृक्ष जीवन धारण नहीं करते? वे भी इस
जगते दूसरोके हितके लिये जीते हें । विप्रवर
नारद! जहो वृक्ष भी अपनी जड़ो ओर फलोके
द्वारा दूसरोका हित-साधन करते है, वहाँ यदि
मनुष्य परोपकारी न हों तो वे मरे हृएके ही समान
हे । जो मरणशील मानव शरीरसे, धनसे अथवा
मन ओर वाणीसे भी दूसरोका उपकार नहीं करते,
उन्हं महान् पापी समञ्जना चाहिये । नारदजी ! इस
विषयमे मे एक यथार्थं इतिहास सुनाता हूँ
सुनिये। उसमे दान आदिका लक्षण भी बताया
जायगा, साथ ही उसमें गक्लाजीका माहात्म्य भी
आ जायगा, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है।
इस इतिहासमें भगीरथ ओर धर्मका पुण्यकारक
संवाद हे।
सगरके कुलमें भगीरथ नामवाले राजा हए,
जो सातो द्वीपां ओर समुद्रोसहित इस पृथ्वीका
शासन करते थे। वे सदा सव धर्मोपि तत्पर, सत्य-
प्रतिज्ञ ओर प्रतापी थे। कामदेवके समान रूपवान्,
महान् यज्ञकर्ता ओर विद्वान् थे। वे राजा भगीरथ
धेर्यमे हिमालय ओर धर्ममें धर्मराजकी समानता
करते थे। उनमें सभी प्रकारके शुभ लक्षण भरे थे।
मुने! वे सम्पूर्णं शास्त्रोके पारगामी विद्वान्, सव
सम्पत्तियोसे युक्त ओर सबको आनन्द देनेवाले थे।
अतिथियोके सत्कारमें यलपूर्वक लगे रहते ओर
सदा भगवान् वासुदेवकी आराधनामें तत्पर रहते
थे। वे बड़े पराक्रमी, सदगुणोके भण्डार, सबके
प्रति मेत्रीभावसे युक्त, दयालु तथा उत्तम बुद्धिवाले
थे। द्विजश्रेष्ठ ! राजा भगीरथको एेसे सदगुणोसे
युक्त जानकर एक दिन साक्षात् धर्मराज उनका
दर्शन करनेके लिये आये । राजाने अपने घरपर
पधार हुए धर्मराजका शास्त्रीय विधिसे पूजन किया।
तत्पश्चात् धर्मराज प्रसन्न होकर राजासे बोले ।
धर्मराजने कहा-- धर्मजोमें श्रेष्ठ राजा भगीरथ,
तुम तीनों लोकमें प्रसिद्ध हो। मै धर्मराज होकर
भी तुम्हारी कौर्ति सुनकर तुम्हारे दर्शनके लिये
आया हूं। तुम सन्मार्गे तत्पर, सत्यवादी ओर
सम्पूर्ण भूतोके हितेषी हो। तुम्हारे उत्तम गुणोके
कारण देवता भी तुम्हारा दर्शन करना चाहते हं ।
भूपाल! जहो कौर्ति, नीति ओर सम्पत्ति है, वहां
निश्चय ही उत्तम गुण, साधु पुरुष तथा देवता
निवास करते हे । राजन्! महाभाग! समस्त प्राणियोकि
हितमें लगे रहना आदि तुम्हारा चरित्र बहुत सुन्दर
हे। वह मेरे-जेसे लोगोके लिये भी दुर्लभ ह।
= | 0 ` गे (0 ४ ~ - 7 - च
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
एेसा कहनेवाले धर्मराजको प्रणाम
राजा भगीरथ प्रसन्न एवं विनीत भावसे मधुर
वाणीमें बोले।
भगीरथने कहा-- भगवन्! आप सब धममेकि
ज्ञाता हें। परेधर! आप समदर्शी भीरहैं। मैं जो
कुछ पूछता हू, उसे मुञ्चपर बड़ी भारी कृपा करके
बताइये। धर्म कितने प्रकारके कहे गये हैँ?
धर्मात्मा पुरुषोके कौन-से लोक हैँ 2 यमलोकमें
कितनी यातनां बतायी गयी है ओर वे किन्दें
प्राप्त होती हें 2 महाभाग। कैसे लोग आपके द्वारा
सम्मानित होते है ओर कौन लोग किस प्रकार
आपके द्वारा दण्डनीय हें 2 यह सब मुञ्ञे विस्तारपूर्वक
बतानेकी कृपा करे ।
धर्मराजने कहा- महाबुद्धे! बहुत अच्छा,
बहुत अच्छा । तुम्हारी बुद्धि निर्मल तथा ओजस्विनी
हे । मे धर्म ओर अधर्मका यथार्थं वर्णन करता हूं
तुम भक्तिपूर्वक सुनो! धर्म अनेक प्रकारके बताये
गये है, जो पुण्यलोक प्रदान करनेवाले हैँ । इसी
प्रकार अधर्मजनित यातना भी असंख्य कही
गयी हैं, जिनका दर्शन भी भयंकर है। अतः में
संक्षेपसे ही धर्म ओर अधर्मका दिग्दर्शन कराऊगा।
ब्राह्यणोको जीविका देना अत्यन्त पुण्यमय कहा
गया है । इसी प्रकार अध्यात्मतत्त्वके ज्ञाता पुरुषको
दिया हुआ दान अक्षय होता हे । ब्राह्मण सम्पूर्ण
देवताओंका स्वरूप बताया गया है, उसको जीविका
देनेवाले मनुष्यके पुण्यका वर्णन करनेमें कौन
समर्थं है ? जो नित्य (सदाचारी) ब्राह्मणका हित
करता हे, उसने सम्पूर्ण यज्ञोका अनुष्ठान कर
लिया, वह सब तीर्थमिं नहा चुका ओर उसने सव
तपस्या पूरी कर ली। जो ब्राह्मणको जीविका
देनेके लिये "दो" कहकर दूसरेको प्रेरित करता है
वह भी उसके दानका फल प्राप्त कर लेता है।
जो स्वयं अथवा दूसरेके द्वारा तालाव बनवाता
४७
हे, उसके पुण्यकी संख्या वताना असम्भव है।
राजन्। यदि एक राही भी पोखरेका जल पी ले
तो उसके बनानेवाले पुरुषके सव पाप अवश्य नष्ट
हो जाते है। जो मनुष्य एक दिन भी भूमिपर
जलका संग्रह एवं संरक्षण कर लेता है, वह सव
पापोसे दूटकर सौ वर्षोतक स्वर्गलोके निवास
करता है। जो मानव अपनी शक्तिभर तालाब
खुदानेमे सहायता करता है, जो उससे संतुष्ट
होकर उसको प्रेरणा देता है, वह भी पोखर
वनानेका पुण्यफल पा लेता है। जो सरसों बराबर
मिद्री भी तालाबसे निकालकर बाहर फेकता है
वह अनेकों पापोंसे मुक्त हो सौ वर्पोतक स्वगमिं
निवास करता है । नृपश्रेष्ठ । जिसपर देवता अथवा
गुरुजन संतुष्ट॒होते है, वह पोखरा खुदानेके
पुण्यका भागी होता है- यह सनातन श्रुति है।
नृपश्रेष्ठ । इस विषयमे मै तुम्हें एक इतिहास
वतलाता हू, जिसे सुनकर मनुष्य सब पापोसे
छुटकारा पा जाता हे-इसमें संशय नहीं है।
गोडदेशमें अत्यन्त विख्यात वीरभद्र नामके एक
राजा हो गये हे । वे बड़ प्रतापी, विद्वान् तथा सदैव
ब्राह्मणको पूजा करनेवाले थे। वेद ओर शस्त्रोकौ
आज्ञाके अनुसार कुलोचित सदाचारका वे सदा
पालन करते ओर मित्रके अभ्युदयमें योग देते थे।
उनको परम सौभाग्यवती रानीका नाम चम्पकमञ्जरी
था। उनके मुख्य मन्त्रीगण कर्तव्य ओर अकर्तव्यके
विचारमे कुशल थे। वे सदा धर्मशास्त्रोद्रारा धर्मका
निर्णय किया करते थे। ' जो प्रायश्चित्त, चिकित्सा,
ज्योतिष तथा धर्मका निर्णय विना शस्त्रके करता
हे, उसे ब्राह्यणघाती बताया गया है'- मन-ही-
मन एसा सोचकर राजा सदा अपने आचार्योसि मनु
आदिके बताये हए धर्मोका विधिपूर्वकं श्रवण
किया करते थ । उनके राज्ये कोई छोरे-से- छोटा
मनुष्य भी अन्यायका आचरण नहीं करता था।
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8८
उस राजाका धर्मपूर्वक पालित होनेवाला देश
स्वर्गको समता धारण करता था। वह शुभकारक
उत्तम राज्यका दर्श था।
एक दिन राजा वीरभद्र मन्त्री आदिके साथ
शिकार खेलनेके लिये बहुत बड़ वनमें गये ओर
दोपहरतक इधर-उधर घूमते रहे । वे अत्यन्त थक
गये थे। भगीरथ ! उस समय वहां राजाको एक
छोरी-सी पोखरी दिखायी दी। वह भी सूखी हई
थी। उसे देखकर मन्त्रीने सोचा- पृथ्वीके ऊपर
इस शिखरपर यह पोखरी किसने बनायी है ? यहाँ
कैसे जल सुलभ होगा, जिससे ये राजा वीरभद्र
प्यास वुञ्ञाकर जीवन धारण करेगे। नृपश्रेष्ठ!
तदनन्तर मन्त्रीके मनमे उस पोखरीको खोदनेका
विचार हआ। उसने एक हाथका गड़7 खोदकर
उसमेसे जल प्रास किया। राजन्! उस जलको
पीनसे राजा ओर उनके बुद्धिसागर नामक मन्त्रीको
भी तृपति हई । तव्र धर्म-अर्थके ज्ञाता बुद्धिसागरने
राजासे कहा-' राजन्! यह पोखरी पहले वकि
जलसे भरी थी। अब इसके चारों ओर बाँध बना
द-एेसी मेरी सम्मति हे। देव ! निष्पाप राजन्।
आप इसका अनुमोदन करे ओर इसके लिये मुञ्च
आज्ञा दें ।' नृपश्रेष्ठ वीरभद्र अपने मन्त्रीकौ यह
बात सुनकर वहत प्रसन्न हए ओर इस कामको
करनेके लिये तेयार हो गये । उन्होने अपने मन्त्री
बुद्धिसागरको ही इस शुभ कार्यमें नियुक्त किया।
तव राजाकी आज्ञासे अतिशय पुण्यात्मा बुद्धिसागर
उस पोखरीको सरोवर वनानेके कार्यमें लग गये।
उसको लंबाई ओर चौडाई चारों ओरसे पचास
धनुषको हो गयी । उसके चारों ओर पत्थरके घाट
बन गये ओर उसमें अगाध जलराशि संचित हो
गयी । एेसी पोखरी बनाकर मन्त्रीने राजाको सव
समाचार निवेदन किया। तवसे सब वनचर जीव
ओर प्यासे पथिक उख पोखरीसे उत्तम जल पान
संक्षिप्त नारदपुराण
करने लगे। फिर आयुको समाति होनेपर किसी
समय मन्त्री बुद्धिसागरकी मृत्यु हो गयी । राजन्
वे मुञ्च धर्मराजके लोकें गये । उनके लिये मेने
चित्रगुप्तसे धर्म पूषा, तव चित्रगुप्तने उनके पोखरी
बनानेका सव कार्य मुञ्चे बताया। साथ ही यह भी
कहा कि ये राजाको धर्म-कार्यका स्वयं उपदेश
करते थे, इसलिये इस धर्मविमानपर चढनेके
अधिकारी हें । राजन्! चित्रगुपके एेसा कहनेपर
मेने बुद्धिसागरको धर्मविमानपर चढनेकी आज्ञा दे
दी। भगीरथ! फिर कालान्तरमें राजा वीरभद्र भी
मृत्युके पश्चात् मेरे स्थानपर गये ओर प्रसन्नतापूर्वक
मुञ्चे नमस्कार किया। तब मेने वहो उनके सम्पूर्ण
ध्मेकि विषयमे भी प्रश्र किया राजन्! मेरे पृछनेपर
चित्रगुप्तने राजाके लिये भी पोखरे खुदानेसे होनेवाले
धर्मक बात बतायी । तब मेने राजाको जिस प्रकार
भली भोति समज्ञाया, वह सुनो। (मेने कहा--)
' भूपाल भगीरथ! पूर्वकालमें सेकतगिरिके
शिखरपर उस लावक (एक प्रकारको चिडिया)
पक्षीने जलके लिये अपनी चोचसे दो अङ्गुल
भूमि खोद ली थी । नृपश्रेष्ठ । तत्पश्चात् कालान्तरमे
उस वाराहने अपनी शृथुनसे एक हाथ गहरा गड़ा
खोदा । तवसे उसमें हाथभर जल रहता था । उसके
बाद किसी समय उस काली (एक पक्षी )-ने उसे
पानीमें खोदकर दो हाथ गहरा कर दिया। महाराज ।
तवसे उसमें दो महीनेतक जल टिकने लगा।
वनके छोटे-छोटे जीव प्याससे व्याकुल होनेपर
उस जलको पीते थे 1 सुव्रत ! उसके तीन वर्षके बाद
इस हाथीने उस गडको तीन हाथ गहरा कर दिया।
अव उसमे अधिक जल संचित होकर तीन महीनेतक
रिकने लगा। जंगली जीव-जन्तु उसको पीया करते
थे! फिर जल सुख जानेके बाद आप उस स्थानपर
आये। वह एक हाथ पिट खोदकर आपने जल प्राप्त
किया। नरपते! तदनन्तर मन्त्री बुद्धिसागरके उपदेशसे
((-0. 1\/॥८111041/5511॥1 81188 \/818/185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
आपने पचास धनुषकी लंबाई- चौडाईमें उसे उतना
ही गहरा खुदवाया। फिर तो उसमे बहुत जल
संचित हो गया। इसके बाद पत्थरोसे दृढृतापूर्वक
घाट बंध जानेपर वह महान् सरोवर बन गया।
वहां किनारेपर सब लोर्गोके लिये उपकारी वृक्ष
लगा दिये गये। उस पोखरेके द्वारा अपने-अपने
पुण्यसे ये पांच जीव धर्मविमानपर आरूढ हुए है ।
अव छठे तुम भी उसपर चढ़ जाओ।' भगीरथ ।
8:
मेरा यह वचन सुनकर छठे राजा वीरभद्र भी उन
पाचके समान ही पुण्यभागी होकर उस धर्मविमानपर
जा बेठे। राजन्! इस प्रकार मैने पोखरे बनवानेसे
होनेवाले सम्पूर्ण फलका वर्णन किया। इसे सुनकर
मनुष्य जन्मसे लेकर मृत्युतकके पापसे मुक्त हो
जाता है। जो मानव श्रद्धापूर्वकं इस कथाको
सुनता अथवा पढ़ता हे, वह भी तालाव बनानेके
सम्पूर्ण पुण्यको प्राप्त कर लेता है।
0 ५ 0 |
तडाग ओर तुलसी आदिकी महिमा, भगवान् विष्णु ओर शिवके स्रान-पूजनका
महत्त्व एवं विविध दानों तथा देवमन्दिरमें सेवा करनेका माहात्म्य
धर्मराज कहते हैँ- राजन्! कासार (कच्चे
पोखरे) बनानेपर तडाग (पक्के पोखरे) बनानेकी
अपेक्षा आधा फल बताया गया हे । कुएं बनानेपर
एक चौोथाई फल जानना चाहिये । बावडी बनानेपर
कमलोसे भरे हए सरोवरके बरावर पुण्य प्रात
होता है। भूपाल! नहर निकालनेपर बावड़ीकी
अपेक्षा सौगुना फल प्राप्त होता है। धनी पुरुष
पत्थरसे मन्दिर या तालाब बनावे ओर दरिद्र पुरुष
मिद्धरीसे बनावे तो उन दोनोंको समान फल प्रा
होता है। यह ब्रह्माजीका कथन है । धनी पुरुष
एक नगर दान करे ओर गरीब एक हाथ भूमि दे;
इन दोनोके दानका समान फल है-एेसा वेदवेत्ता
पुरुष कहते हेँं। जो धनी पुरुष उत्तम फलके
साधनभूत तडागका निर्माण करता है ओर दरिद्र
एक कुओं बनवाता है; उन दोनोंका पुण्य समान
कहा गया हे। जो बहुत-से प्राणियोंका उपकार
करनेवाला आश्रम या धर्मशाला बनवाता है, वह
तीन पीदियोकि साथ ब्रह्मलोकमें जाता है । राजन्!
धेनु अथवा ब्राह्मण या जो कोई भी आधे क्षण भी
उस आश्रमको छायामें स्थित होता है, वह उसके
बनवानेवालेको स्वर्गलोके पहंचाता है। राजन्।
जो बगीचे लगाते, देवमन्दिर वनवाते, पोखरा
खुदाते अथवा गोव वसाते हँ, वे भगवान् विष्णुके
साथ पूजित होते ह। जो तुलसीके मूलभागकी
मिद्रीसे, गोपीचन्दनसे, चित्रकूटकी मिद्रीसे अथवा
गङ्गाजीको मृत्तिकासे ऊर्ध्वपुण्ड तिलक लगाता
है, उसे प्राप्त होनेवाले पुण्यफलका वर्णन सुनो।
वह श्रेष्ट विमानपर बैठकर गन्धर्वो ओर अप्सराअकि
समूहद्वारा अपने चरित्रका गान सुनता हआ भगवान्
विष्णुके धाममें आनन्द भोगता है। जो तुलसीके
पोधेपर चुद्यृभर भी पानी डालता हे, वह क्षीरसागर-
निवासी भगवान् विष्णुके साथ तवतक निवास
करता है, जबतक चन्द्रमा ओर तारे रहते हँ
तदनन्तर विष्णुम लय हो जाता है । जो ब्राह्मणोको
कोमल तुलसीदल अर्पित करता है, वह तीन
पीटियोके साथ ब्रह्मलोकमें जाता है। जो तुलसीके
लिये कोटोंका आवरण या चहारदीवारी बनवाता
हे, वह भी इक्तीस पीदियोके साथ भगवान्
विष्णुके धाममें आनन्दका अनुभव करता है।
नरेश्वर! जो तुलसीके कोमल दलोसे भगवान्
विष्णुके चरणकमर्लोकौ पूजा करता दै, वह
विष्णुलोकको प्राप्त होता है, उसका वहामि कभी
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८५ (च
संक्षिप्त नारदपुराण
पुनरागमन नहीं होता पुष्प तथा चन्दनके जलसे
भगवान् गोविन्दको भक्तिपूर्वक नहलाकर मनुष्य
विष्णुधाममें जाता है। जो कपड़से छाने हुए
जलके द्वारा भगवान् लक्ष्मीपतिको स्नान कराता है,
वह सव पापोंसे छूटकर भगवान् विष्णुके साथ
सुखी होता हे। जो सूर्यको संक्रान्तिके दिन दूध
आदिसे श्रीहरिको नहलाता है, वह इक्ीस पीदि्योके
साथ विष्णुलोकमें वास करता है। शुक्लपक्षमें
चतुर्दशी, अष्टमी, पूर्णिमा, एकादशी, रविवार,
द्वादशी, पञ्चमी तिथि, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, मन्वादि
तिथि, युगादितिथि, सूर्यके आधे उदयके समय,
सूर्यके पुष्यनक्षत्रपर रहते समय, रोहिणी ओर
बुधके योगमे, शनि ओर रोहिणी तथा मङ्गल ओर
अश्िनीके योगमें, शनि-अश्चिनी, वुध-अश्चिनी,
शुक्र-रेवती योग, वुध-अनुराधा, श्रवण-सूर्य, सोमवार-
श्रवण, हस्त-लरृहस्पति, वुध-अष्टमी तथा बुध
ओर आषाढाके योगमें ओर दूसरे-दूसरे पवित्र
दिनोमें जो पुरुष शान्तचित्त, मौन ओर पवित्र होकर
दूध, दही, घी ओर शहदसे श्रीविष्णुको सान कराता
है, उसको प्रात होनेवाले फलका वर्णन सुनो । वह
सव पापोसे दटकर सम्पूर्णं यज्ञोका फल पाता ओर
इक्रोस पीटियोक साथ वेकुण्ठधाममें निवास करता
हे। राजन्! फिर वहीं ज्ञान प्राप्त करके वह
पुनरावृत्तिरहित ओर योगियोके लिये भी दुर्लभ
हरिका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। भूपते! जो
कृष्णपक्षमें चतुर्दशी तिथि ओर सोमवारके दिन
भगवान् शङ्करको दूधसे नहलाता दहै, शिवका
सायुज्य प्राप्त कर लेता हे। अष्टमी अथवा सोमवारको
भक्तिपूर्वकं नारियलके जलसे भगवान् शिवको
स्नान कराकर मनुष्य शिव-सायुज्यका अनुभव
करता हे। भूपते! शुक्लपक्षकी चतुर्दशी अथवा
अष्टमीको घृत ओर मधुके द्वारा भगवान् शिवको
स्नान कराकर मनुष्य उनका सारूप्य प्राप्त कर लेता
हे । तिलके तेलसे भगवान् विष्णु अथवा शिवको
स्नान कराकर मनुष्य सात पीटियोके साथ उनका
सारूप्य प्राप्त कर लेता हे । जो शिवको भक्तिपूर्वक
ईखके रससे स्नान कराता है, वह सात पीढियोके
साथ एक कल्पतक भगवान् शिवके लोकमें निवास
करता हे। (फिर शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।)
नरेश! एकादशीके दिन सुगन्धित फूलोसे
भगवान् विष्णुको पूजा करके मनुष्य दस हजार
जन्मके पापोंसे छूट जाता ओर उनके परम धामको
प्राप्त कर लेता हे। महाराज! चम्पाके फूलोसे
भगवान् विष्णुको ओर आकके फूलोंसे भगवान्
शङ्करको पूजा करके मनुष्य उन-उनका सालोक्य
प्राप्त करता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक भगवान्
शङ्कर अथवा विष्णुको धूपमें घृतयुक्तं गुग्गुल
मिलाकर देता हे, वह सव पापोंसे छूट जाता हे।
नृपश्रेष्ठ ! जो भगवान् विष्णु अथवा शङ्करको
तिलके तेलसे युक्त दीपदान करता है, वह समस्त
कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो भगवान् शिव
अथवा विष्णुको घीका दीपक देता है, वह सव
पापोंसे मुक्त हो गङ्खा-स्नानका फल पाता है।
जो-जो अभीष्ट वस्तुं हे, वह सब ब्राह्मणको
दान कर दे-एेसा मनुष्य पुनर्जन्मसे रहित भगवान्
विष्णुके धाममें जाता है। अन्न ओर जलके समान
दूसरा कोड दान न हआ है; न होगा। अन्नदान
करनेवाला प्राणदाता कहा गया है ओर जो
प्राणदाता हे, वह सब कुछ दनेवाला हे । नृपश्रेष्ठ ।
इसलिये अन्नदान करनेवालेको सम्पूर्णं दानोका
फल मिलता हे। जलदान तत्काल संतुष्ट करनेवाला
माना गया हे । नृपश्रेष्ठ ! इसलिये ब्रह्मवादी मनुष्योने
जलदानको अन्नदानसे त्रेष्ट बताया है । महापातक
अथवा उपपातकोसे युक्तं मनुष्य भी यदि जलदान
करनेवाला है तो वह उन सव पापस मुक्त हो जाता
टै, यह ब्रह्माजीका कथन है । शरीरको अन्नसे उत्पन्न
((-0. /111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
कहा गया हे । प्राणोको भी अन्रजनित ही
हं; अतः प्ृथ्वीपते। जो अन्नदान देनेवाला है, उसे
प्राणदाता समञ्जना चाहिये; क्योकि जो-जो तृप्िकारक
दान है, वह समस्त मनोवाज्छित फलोंको देनेवाला
हे; अतः भूपाल! इस पृथ्वीपर अन्नदानके समान
दूसरा कोई दान नहीं हे। जो दरिद्र अथवा रोगी
मनुष्यको रक्षा करता है, उसपर प्रसन्न होकर
भगवान् विष्णु उसकी सम्पूर्णं कामनाओंको पूर्ण
कर देते हें। जो मन, वाणी ओर क्रियाद्वारा
रोगीको रक्षा करता है, वह सब पापोँसे छूटकर
सम्मूर्णं कामनाओंको प्राप्त कर लेता हे । महीपाल ।
जो ब्राह्मणको निवास-स्थान देता है, उसपर प्रसन्न
हो देवेश्वर भगवान् विष्णु उसे अपना लोक देते
हें । जो ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणको दूध देनेवाली गाय दान
करता है, वह ब्रह्मलोके जाता है तथा जो
वेदवेत्ता ब्राह्मणको कपिला गाय दान देता है, वह
सव पापोंसे मुक्त हो रुद्रस्वरूप हो जाता है। जो
भयसे व्याकुलचित्तवाले पुरुषोंको अभय दान देता
हे, राजन्! उसके पुण्यफलका यथार्थ वर्णन करता
ह्, सुनो; एक ओर तो पूर्णरूपसे उत्तम दक्षिणा
देकर सम्पन्न किये हए सभी यज्ञ ह ओर दूसरी
ओर भयभीत मनुष्यकी प्राणरक्षा है (ये दोनों
समान हैँ) । महीपाल! जो भयविह्वल ब्राह्मणक
रक्षा करता हे, वह सम्पूर्ण तीथमिं सान कर चुका
ओर सम्पूर्णं यज्ञोकी दीक्षा ले चुका। वस्त्रदान
करनेवाला रुद्रलोकमें ओर कन्यादाता ब्रह्मलोकमें
जाता हे।
भूपते! कार्तिक अथवा आपाढठ्की पूर्णिमाको
जो मानव भगवान् शिवेको प्रसन्नताके लिये
वृषोत्सर्ग कर्म करता ठै, उसका फल सुनो- वह
सात जन्मोकि पापोंसे मुक्त हो रुद्रका स्वरूप प्राप्त
कर् लेता है। नृपश्रेष्ठ! जो भैसेको शिवलिद्खसे
चिहित करके छोड्ता है, उसे कभी यमयातना
[ 1183 ] सं० ना० पु०३-
५१
(नरक) नहीं प्राप्त होती है। नृपसत्तम! जो
शक्तिके अनुसार ताम्बूल दान करता है, उसपर
प्रसन्न हो भगवान् विष्णु उसे आयु, यश तथा
लक्ष्मी प्रदान करते हें । दूध, दही, घी ओर मधुका
दान करनेवाला मनुष्य दस हजार दिव्य वर्षिक
स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है । नृपोत्तम ! ईख दान
करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोकमें जाता है । गन्ध एवं
पवित्र फल देनेवाला पुरुष भी ब्रह्मधाममें जाता
हे। गुड़ ओर ईखका रस देनेवाला मनुष्य क्षीरसागरको
प्राप्त होता हे । विद्यादान करनेसे मनुष्यको भगवान्
विष्णुका सायुज्य प्राप्त होता है । विद्यादान, भूमिदान
ओर गोदान--ये उत्तम-से-उत्तम तीन दान क्रमशः
जप, जोतने-बोनेको सुविधा ओर दूध दुहनैके
कारण नरकसे उद्धार करनेवाले होते है । नृपोत्तम!
सम्पूर्ण दानोमें विद्यादान श्रेष्ट है। विद्यादानसे
मनुष्य भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता
हे। ईधन दान करनेसे मनुष्यको उपपातकोसे
छुटकारा मिलता है। शालग्राम शिलाका दान
महादान बताया गया है । उसका दान करके मनुष्य
मोक्ष प्राप्त करता है। शिवलिङ्ग-दान भी एेसा ही
माना गया हे । प्रभो! जो मनुष्य श्रेष्ठ पुरु्पोको घर
दान देता है, राजन्! उसे गद्गास्लानका फल
अवश्य प्राप्त होता है।
नृपश्रेष्ठ ! जो रन्नयुक्त सुवर्णका दान करता है
वह भोग ओर मोक्ष-दोनों प्राप्त कर लेता है;
क्योकि स्वर्णदान महादान माना गया है । माणिक्यदान
करनेसे मनुष्य परममोक्षको प्राप्त होता है । वज्रमणिके
दानसे मानव श्रुवलोकमें जाता है। मगा दान
करनेसे स्वर्गं एवं रद्रलोककी प्रापि होती दै।
सवारी देने ओर मुक्तादान करनेसे दाता चन्द्रलोक
प्राप्त करता हे । वैदूर्यं ओर पद्यरागमणि देनेवाला
मनुष्य सद्रलोकमं जाता है। पद्मरागमणिके दानमे
सर्वत्र सुखको प्राप्ति होती है) राजन्! घोड़ा दान
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 6810011
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करनेवाला दीर्घकालके लिये अशधिनीकुमारोके समीप
जाता हे। हाथी-दान महादान है। उससे मनुष्य
सब कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। सवारी दान
करनेसे मनुष्य स्वर्गीय विमानमें बैठकर स्वर्गलोकमें
जाता है। भस देनेवाला निस्संदेह अपमृत्युको
जीत लेता है। गोओंको घास देनेसे रुद्रलोककौ
प्राति होती है। महीपते! नमक देनेवाला पुरुष
वरुणलोकमें जाता दै।
जो अपने आश्रमोचित आचारके पालनमें
संलग्र, सम्पूर्णं भूतोके हितमें तत्पर तथा दम्भ
ओर असूयासे रहित है, वे ब्रह्मलोकमें जाते हे ।
जो वीतराग ओर ई््यारहित हो दूसरोंको परमार्थका
उपदेश देते ओर स्वयं भी भगवान्के चरणोंकी
आराधनामें लगे रहते है, वे वैकुण्ठधाममें जाते
है । जो सत्सद्खमें आनन्दका अनुभव करते, सत्कर्म
करनेके लिये सदा उद्यत रहते ओर दूसरोके
अपवादसे मह मोड़ लेते हे, वे विष्णुधाममें जाते
हें । जो सदा ब्राह्मणों ओर गोओंका हित साधन
करते ओर परायी स्त्रियोके सङ्गसे विमुख होते हे
वे यमलोकका दर्शन नहीं करते। जिन्होने इन्द्रियों
ओर आहारको जीत लिया हे, जो गायोके प्रति
क्षमाभाव रखनेवाले ओर सुशील ह तथा जो
ब्राह्मणोपर भी क्षमाभाव रखते हें, वे वैकुण्ठधाममें
जाते हें । जो अग्रिका सेवन करनेवाले गुरुसेवक
पुरुष है तथा जो पतिकी सेवामें तत्पर रहनेवाली
स्त्रियो हँ, वे कभी जन्म-मरणरूप संसार- बन्धनम
नहीं पडती । जो सदा देव-पूजामें तत्पर, हरिनामकौ
शरण लेनेवाले तथा प्रतिग्रहसे दूर रहते है, वे
परम पदको प्राप्त होते हें । नृपश्रेष्ठ ! जो ब्राह्मणके
अनाथ शवका दाह करते है, वे सहस्र अश्वमेध
यज्ञोका फल भोगते हें । मनुजेश्वर ! जो पूजारहित
शिवलिङ्गका पत्र, पुष्प, फल अथवा जलसे पूजन
करता हे, उसका फल सुनो-वह विमानपर
संक्षिप्त नारदपुराण
बैठकर भगवान् शिवके समीप जाता हे । जनेश्वर ।
जो भक्ष्य-भोज्य ओर फलद्वारा निर्जन स्थानमें
स्थित शिवलिङ्खका पूजन करता है, वह पुनरावृक्तिरहित
शिव-सायुज्यको प्राप्त करता हे । सूर्यवंशी भगीरथ ।
जो पूजारहित विष्णु-प्रतिमाका जलसे भी पूजन
करता है, उसे विष्णुका सालोक्य प्राप्त होता हे।
राजन्! जो देवालयमें गोचर्मके बराबर भू-भागको
भी जलसे सचता हे, वह स्वर्गलोक पाता हे। जो
देवमन्दिरको भूमिको चन्दनमिशरित जलसे सचता
हे, वह जितने कर्णोको भिगोता है, उतने कल्पतक
उस देवताके समीप निवास करता है । जो मनुष्य
पत्थरके चूनेसे देवमन्दिरको लीपता है या उसमे
स्वस्तिक आदिके चिह्न बनाता हे, उसको अनन्त
पुण्य प्राप्त होता है। जो भगवान् विष्णु या शङ्करके
समीप अखण्ड दीपकी व्यवस्था करता है, उसको
एक-एक क्षणमे अश्वमेध यज्ञका फल सुलभ
होता हे। भूमिपाल! जो देवीके मन्दिरको एक
वार, सूर्यके मन्दिरकी सात वार, गणेशके मन्दिरकी
तीन बार ओर विष्णु-मन्दिरिकोी चार वार परिक्रमा
करता हे, वह उन-उनके धाममे जाकर लाखों
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पूर्वभाग-प्रथम पाद
५२
युगोंतक सुख भोगता है । जो भक्तिभावसे भगवान्
विष्णु, गौ तथा ब्राह्मणक प्रदक्षिणा करता हे, उसे
पग-पगपर अश्चमेध यज्ञका फल मिलता है। जो
काशीमें भगवान् शिवके लिङ्गका पूजन करके
प्रणाम करता हे, उसके लिये कोई कर्तव्य शेष
नहं रह जाता, उसका फिर संसारम जन्म नहीं
होता। जो विधिपूर्वक भगवान् शङ्करकी दक्षिण
ओर वाम परिक्रमा करता हे, वह मनुष्य उनको
कृपासे स्वर्गसे नीचे नहीं आता। जो रोग-शोकसे
रहित भगवान् नारायणको स्तोत्रोद्वारा स्तुति करता
हे, वह मनसे जो-जो चाहता है, उन सब
कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। भूपाल! जो
भक्तिभावसे युक्त हो देवमन्दिरमें नृत्य अथवा गान
करता हे, वह सुद्रलोकमें जाकर मोक्षका भागी
होता हे। जो मनुष्य देवमन्दिरमें बाजा बजाते हैं
वे हंसयुक्तं विमानपर आरूढ हो ब्रह्माजीके धाममें
जाते हँ । जो लोग देवालयमें करताल बजाते हें
वे सब पापोसे मुक्त हो दस हजार युगोंतक
विमानचारी होते हं। जो लोग भरी, मृदद्ध,
पटह, मुरज ओर डिडिम आदि बाजोद्रारा देवेश्वर
भगवान् शिवको प्रसन्न करते हँ, उन्हें प्राप्त
होनेवाले पुण्यफलका वर्णन सुनो। वे सम्पूर्ण
‡
कामनाओंसे पूजित हो स्वर्गलोके जाकर पांच
कल्पोतक सुख भोगते हँ । राजन्! जो मनुष्य
देवमन्दिरमें शङ्खध्वनि करता है, वह सब पापोंसे
मुक्त हो भगवान् विष्णुके साथ सुख भोगता है।
जो भगवान् विष्णुके मन्दिरमे ताल ओर आंञ्च
आदिका शब्द करता है, वह सव पापोंसे मुक्त
हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है । जो सबके
साक्षी, निरञ्जन एवं ज्ञानस्वरूप भगवान् विष्णु
है, वे संतुष्ट होनेपर सब धर्मोका यथायोग्य
सम्पूर्णं फल देते हें । भूपते! जिन देवाधिदेव
सुदर्शनचक्रधारी श्रीहरिके स्मरण मात्रसे सम्पूर्ण
कर्म सफल होते हँ, वे जगदीश्वर परमात्मा ही
समस्त कमकि फल है । पुण्यकर्म करनेवाले
पुरुषाद्रारा सदा स्मरण किये जानेपर वे भगवान्
उनको सव पीड़ाओंका नाश करते हें । भगवान्
विष्णुके उदेश्यसे जो कुछ किया जाता है, वह
अक्षय मोक्षका कारण होता हं। भगवान् विष्णु
ही धर्म हे। धर्मकि फल भी भगवान् विष्णु ही
हे । इसी प्रकार कर्म, कमेकि फल ओर उनके
भोक्ता भी भगवान् विष्णु ही हें । कार्य भी विष्णु
हे, करण भी विष्णु है । उनसे भिन्न कोई भी
वस्तु नहीं है
विविध प्रायश्चित्तका वर्णन, इष्टापूर्तका फल ओर सूतक,
श्राद्ध तथा तर्पणका विवेचन
धर्मराज कहते है- नृपश्रष्ट ! अब में चारों | सुनो। जो भोजन करते समय क्रोधे या अज्ञानवश
वेकि लिये वेदों ओर स्मृति्योमे बताये हए | किसी अपवित्र वस्तुको या चाण्डाल एवं पतितको
धर्मका क्रमशः वर्णन करता हू, एकाग्रचित्त होकर | छू लेता है, उसके लिये प्रायश्चित्त बतलाता हं ।
१. यो देवः सर्वदृग्विष्णुक्ञनरूपी निरञ्जनः। सर्वधर्मफलं पूर्णं संतुष्टः प्रददाति च॥
यस्य स्मरणमात्रेण देवदेवस्य चक्रिणः । सफलानि भवन्त्येव सर्वकर्माणि भूपते ॥
परमात्मा जगन्नराध
सर्वकर्मफलप्रदः । सत्कर्मकर्तृभिर्नित्यं स्मृतः सर्वार्तिनाशनः।
तमुद्दिश्य कृतं यच्च तदानन्त्याय कल्पते ॥
धर्माणि विष्णुश्च फलानि विष्णुः कर्माणि विष्णुश्च फलानि भोक्ता । कार्यं च विष्णुः करणानि विष्णुरस्मान किंचिद् व्यतिरिक्त मस्ति ॥
(ना० पूर्व १३1 ५०-५३)
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५४
वह क्रमानुसार अर्थात् अपवित्र वस्तुके स्पर्श
करनेपर तीन रातत ओर चाण्डाल या पतितका स्पर्शं
कर लेनेपर छः राततक पञ्चगव्यसे तीनों समय
स्नान करे तो शुद्ध होता हे। यदि कदाचित् भोजन
करते समय ब्राह्मणक गुदासे मलस्राव हो जाय
अथवा जूठे मुंह या अपवित्र रहनेपर एेसी बात हो
जाय तो उसको शुद्धिका उपाय बतलाता हूं
पहले वह ब्राह्मण शोच जाकर जलसे पवित्र होवे
(अर्थात् शोच जाकर जलसे हाथ-पैरकी शुद्धि
करके कुल्ला ओर स्नान करे) । तदनन्तर दिन-रात
उपवास करके पञ्चगव्य पीनेसे शुद्ध होता है । यदि
भोजन करते सप्रय पेशाब हो जाय अथवा पेशाब
करनेपर विना शुद्ध हुए ही भोजन कर ले तो
दिन-रात उपवास्र करे ओर अग्रिमे घीको आहुति
दे। यदि भोजनके समय ब्राह्मण किसी भी
निमित्तसे अपवित्र हो जाय तो उस समय ग्रासको
जमीनपर रखकर स्नान करनेके पश्चात् शुद्ध होता
हे । यदि उस ग्रासकों खा ले तो उपवास करनेपर
शुद्ध होता है ओर यदि अपवित्र अवस्था्मे वह
सारा अन्न भोजन करके उठे तो तीन राततक वह
[ ५१
अशुद्ध रहता है (अर्थात् तीन रात्रितक उपवास
संक्षिप्त नारदपुराण
करनेसे शुद्ध होता हे) । यदि भोजन करते-करते
वमन हो जाय तो अस्वस्थ मनुष्य तीन सौ
गायत्री-मन्त्रका जप करे ओर स्वस्थ मनुष्य तीन
हजार गायत्री जपे, यही उसके लिये उत्तम
प्रायश्चित्त हे । यदि द्विज मलमूत्र करनेपर चाण्डाल
या डोमसे छ् जाय तो वह त्रिरात्र व्रत करे ओर
यदि भोजन करके जृठे मुंह दक् जाय तो छः
राततक त्रत करे। यदि रजस्वला ओर सूतिका
स्त्रीको चाण्डाल हू ले तो तीन राततक व्रत
करनेपर उसकी शुद्धि होती है- यह शातातप मुनिका
वचन* हे। यदि रजस्वला स्त्री कुततो, चाण्डालं
अथवा कोओंसे छ् जाय तो वह अशुद्ध अवस्थातक
निराहार रहे; फिर समयपर (चोथे दिन) स्नान करनेसे
वह शुद्ध होती है। यदि दो रजस्वलां आपसमे एक
दूसरीका स्पर्श कर लेती हैँ तो ब्रह्यकूर्चः पीनेसे
उनको शुद्धि होती हे ओर ऊपरसे भी ब्रह्मकूर्चद्वारा
उन्हें स्नान कराना चाहिये । जो जूठेसे द्कू जानेपर
तुरत स्नान नहीं कर लेता, उसके लिये भी यही
प्राय्चित्त है। ऋतुकालमें मैथुन करनेवाले पुरुषको
गर्भाधान होनेकौ आशङ्कासे सान करनेका विधान
है । विना ऋतुके स्त्रीसङ्गम करनेपर मल-मूत्रकी
१. इस प्रसङ्कक्क प्रायः अधिक श्लोक यम-स्मृतिसे ओर कुछ श्लोक वृद्धशातातप-स्मृतिसे भी मिलते ह ।
२. पञ्चगव्य ओर कुशोदक मिलानेसे ब्रह्मकूर्चं बनता है। उसकी विधि इस प्रकार है- पलाश या कमलके पत्तमे
अथवा तोवे या सुवर्पकि पात्रमें पञ्चगव्य संग्रह करना चाहिये । गायत्री-मन्रसे गोमूत्रका, “गन्धद्वारा० ' इस मन्त्रसे गोवरका,
"आप्यायस्व ० ' इस खन्त्रसे धका, ' दधिक्राव्णो०' इस मन्त्रसे दहीका, ' तेजोऽसि शुक्र° ' इस मन्त्रसे घीका ओर “देवस्य
त्वा०' इस मन्त्रसे कुशोदकका संग्रह करे। चतुर्दशीको उपवास करके अमावास्याको उपर्युक्त वस्तुओंका संग्रह करे । गोमूत्र
एक पल होना चाहिये । गोवर आधे अगठेके बराबर हो । दूधका मान सात पल ओर दहीका तीन पल है। घी ओर
कुशोदक एक-एक खल बताये गये है । इस प्रकार इन सवको एकत्र करके परस्पर मिला दे। तत्पश्चात् सात-सात पत्तोके
तीन कुश लेकर जिनके अग्रभाग कटे न हो, उनसे उस पञ्चगव्यको अग्रिमे आहुति दे। आहुतिसे बचे हए पञ्चगव्यको
प्रणवसे आलोडन ओर प्रणवसे ही मन्थन करके प्रणवसे ही हाथमे ले तथा फिर प्रणवका ही उचारण करके उसे पी
जाय। इस प्रकार तैयार किये हुए पञ्चगव्यको ब्रह्मकूर्चं कहते है । स्त्री-शु्रोंको ब्राह्मणके द्वारा पञ्चगव्य बनवाकर प्रणव
उच्वारणके विना हौ पीना चाहिये। सर्वसाधारणके लिये ब्र्यकूर्च -पानका म्र यह है-
यत्तवगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति देहिनाम् । ब्रह्मकूर्चो दहेत्सर्वं ॒प्रदीप्ताग्निरिवेन्धनम्॥
( वृद्धशातातप० १२)
अर्थात् ' देहधारियोके शरीरम चमडे ओर हदीतकमें जो पाप विद्यमान है, वह सब ब्रह्मकूर्चं इस प्रकार जला
दे, जैसे प्रज्वलित आग ईधनको जला डालती रै।'
((-0. 1८111551 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
५५
ही भोति शुद्धि मानी गयी हे। अर्थात् हाथ, मुंह
आदि धोकर कुल्या करना चाहिये । मेथुनकर्ममिं
लगे हुए पति-पत्री दोनों ही अशुद्ध होते हे, परंतु
शय्यासे उठनेपर स्त्री तो शुद्ध हो जाती है, किंतु
पुरुष स्नानके पूर्वतक अशुद्ध ही बना रहता हे । जो
लोग पतित न होनेपर भी अपने बन्धुजनोंका त्याग
करते हें, (राजाको उचित है कि) उन्हें उत्तम
साहस* का दण्ड दे। यदि पिता पतित हो जाय
तो उसके साथ इच्छानुसार वर्ताव करे। अर्थात्
अपनी रुचिके अनुसार उसका त्याग ओर ग्रहण
दोनों कर सकते हे; किंतु माताका त्याग कभी न
करे । जो रस्सी आदि साधनोद्रारा फोंसी लगाकर
आत्मघात करता है, वह यदि मर जाय तो उसके
शरीरम पवित्र वस्तुका लेप करा दे ओर यदि
जीवित बच जाय तो राजा उससे दो सौ मुद्रा दण्ड
ले। उसके पुत्र ओर मित्रोंपर एक-एक मुद्रा दण्ड
लगवे ओर वे लोग शास्त्रीय विधिके अनुसार
प्रायश्चित्त करे। जो मनुष्य मरनेके लिये जलमें
प्रवेश करके अथवा फांसी लगाकर मरनेसे वच
जाते हे, जो संन्यास ग्रहण करके ओर उपवास
व्रत प्रारम्भ करके उसे त्याग देते हैं, जो विष
पीकर अथवा ऊचे स्थानसे गिरकर मरनेकी चेष्टा
करनेपर भी जीवित बच जाते है तथा जो शस्त्रका
अपने ऊपर आघात करके भी मृत्युसे वञ्चित रह
जाते ठै, वे सव सम्पूर्णं लोकसे बहिष्कृत हैँ ।
इनके साथ भोजन या निवास नहीं करना चाहिये ।
ये सव-के-सव एक चान्द्रायण अथवा दो तप्तकृच्छ्त्रत
करनेसे शुद्ध होते हे । कुत्ते, सियार ओर वानर
आदि जन्तुओंके काटनेपर तथा मनुष्यद्रारा दोतसे
काटे जानेपर भी मनुष्य दिन, रात अथवा संध्या
कोई भी समय क्यों न हो, तुरंत स्नान कर लेनेपर
शुद्ध हो जाता हे । जो ब्राह्मण अक्लानसे- अनजानमें
किसी प्रकार चाण्डालका अन्न खा लेता है, वह
गोमूत्र ओर यावकका आहार करके पंद्रह दिनमें
शुद्ध होता हे । गो अथवा ब्राह्मणका घर जलाकर,
फांसी आदि लगाकर मरे हए मनुष्यका स्पर्शं
करके तथा उसके बन्धनोंको काटकर ब्राह्मण
अपनी शुद्धिके लिये एक कृच्छव्रतका आचरण
करे। माता, गुरुपली, पुत्री, बहिन ओर पुत्रवधूसे
समागम करनेवाला तो प्रज्वलित अग्रिमे प्रवेश
कर जाय। उसके लिये दूसरा कोई शुद्धिका उपाय
नहीं हे। रानी, संन्यासिनी, धाय, अपनेसे श्रेष्ठ
वर्णको स्त्री तथा समान गोत्रवाली स्त्रीके साथ
समागम करनेपर मनुष्य दो कृच्छत्रतका अनुष्ठान
करे। पिताके गोत्र अथवा माताके गोत्रमें उत्पन्न
होनेवाली अन्यान्य स्त्रियों तथा सभी परस्त्रि्योसे
अनुचित सम्बन्ध रखनेवाला पुरुष उस पापसे
हटकर अपनी शुद्धिके लिये कृच्छरशान्तपनब्रत
१. मनुष्य बलके अभिमानसे जो क्रूरतापूर्णं कर्म करता है, उसे " साहस" कहते है । उसके तीन भेद है प्रथम,
मध्यम ओर उत्तम। फल, मूल, जल आदि ओर खेतकौ सामग्रोको नष्ट करना "प्रथम साहस ' माना गया है। वस्त्र, पशु
अन्न,पान ओर घरकी सामग्रो आदिकी लूट-खसोर करना "मध्यम साहस" कहा गया है । जहर देकर् या हधियारसे किसीको
मारना, परायी स्त्रियोसे बलात्कार करना तथा अन्यान्य प्राणनाशक कार्य करना “उत्तम साहस" के अन्तर्गत दै। ' प्रथम
साहस ' का दण्ड है कम-से-कम सौ पण, ' मध्यम साहस ' का दण्ड कम-से-कम पाच सौ पण ्है। "उत्तम साहस"
पं कम-से-कम एक हजार पण दण्ड लगाया जाता है। इसके सिवा, अपराधीका वध या अद्ग-भङ्ग अथवा सर्वस्व-
हरण या नगरसे निर्वासन आदि भी “उत्तम साहस्र" के दण्ड बताये गये ठै; जैसा कि नारद-स्मृतिमं कहा गया है-
तस्य दण्डः क्रियापेक्षः प्रथमस्य शतावरः। मध्यमस्य तु शस्त्रन्ैदृष्टः पञ्चशतावरः ॥
उत्तमे साहसे दण्डः सहस्नावर इष्यते। वधः सर्वस्वहरणं
पुरानिर्वासनाङ्कने ॥
तदङ्गच्छेद इत्युक्तो दण्ड उत्तमसाहसे ॥
( विवादपद् ७-९)
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५६
संक्षिप्त नारदपुराण
करे । द्विजगण खूब तपाये हुए कुशोदकको केवल
एक बार पांच राततक पीकर वेश्यागमनके पापका
निवारण करते हें । गुरुतल्पगामीके लिये जो त्रत
हे, वही कुछ लोग गोघातकके लिये भी बताते हैँ
ओर कुछ विद्वान् अवको्णीं ( धर्मभ्रष्ट )-के लिये
भी उसी त्रतका विधान करते हँ । जो डंडेसे गौके
ऊपर प्रहार करके उसे मार गिराता है, उसके
लिये गोवधका जो सामान्य प्रायश्चित्त है, उससे
टूना ब्रत करनेका विधान है । तभी वह त्रत उसके
पापको शुद्ध कर सकता हे । गोको हांकनेके लिये
अगृटेके बराबर मोटी, बोहके बराबर बडी पह्यवयुक्त
ओर गीली पतली डालका डंडा उचित बताया
गया है । यदि गोओंके मारनेपर उनका गर्भ भी हो
ओर वह मर जाय तो उनके लिये पृथक् -पृथक्
एक-एक कृच्छत्रत करे । यदि कोई काठ, ढला,
पत्थर अथवा किसी प्रकारके शस्त्र्वारा गौओंको
मार डाले तो भिन्न-भिन्न शस्त्रके लिये शास्त्रमें
इस प्रकार प्रायश्चित्त बताया गया है। काष्टसे
मानेपर शान्तपनतव्रतका विधान है । ढलेसे मारनेपर
प्राजापत्यतब्रत करना चाहिये। पत्थरसे आघात
करनेपर तप्तकृच्छरत्रत ओर किसी शस्त्रसे मारनेपर
अतिकृच्छव्रत करना चाहिये । यदि कोई गोओं
ओर ब्राह्मणोके लिये (अच्छी नीयतसे) ओषधि,
तेल एवं भोजन दे ओर उसके देनेके वाद उसकी
मृत्यु हो जाय तो उस दशामें कोई प्रायश्चित्तं नहीं
हे। तेल ओर दवा पीनेपर अथवा दवा खानेपर या
शरीरम धसे हए लोहे या कटि आदिको निकालनेका
प्रयल करनेपर मृत्यु हो जाय तो भी कोड प्रायश्चित्त
नहीं है । चिकित्सा या दवा करनेके लिये बड़का
कण्ठ बोधनेसे अथवा शामको उनकी रक्षाके
लिये उन्हं घरमें रोकने या बोँधनसे भी कोई दोष
नहीं होता।
(उपर्युक्त पापोका प्राय्ित्त करते समय मनुष्यको
इस विधिसे मुण्डन कराना चाहिये)- एक पाद
(चोथाई) प्रायश्चित्त करनेपर कुछ रोममात्र कटा
देने चाहिये । दो पादके प्रायश्चित्तमे केवल दादी-
मृ मुडा ले, तीन पादका प्रायश्चित्त करते समय
शिखाके सिवा ओर सब बाल वनवा दे ओर पूरा
प्रायश्चित्त करनेपर सव कुक मुडा देना चाहिये।
यदि स्त्रियोको प्रायश्चित्त करना पडे तो उनके सब
केश समेटकर दो अंगुल कटा देना चाहिये । इसी
प्रकार स्त्रियोके सिर मुड़ानेका विधान है। स्त्रीके
लिये सारे बाल कटाने ओर बीरासनसे वेठनेका
नियम नहीं हे। उनके लिये गोशालामें निवास
करनेकी विधि नहीं हे। यदि गौ कहीं जाती हो
तो उसके पीछे नहीं जाना चाहिये । राजा, राजकुमार
अथवा वहुत-से शास्त्रोका ज्ञाता ब्राह्मण हो तो
उन सबके लिये केश मुडाये विना ही प्रायश्चित्त
बताना चाहिये । उन्हें केशोंको रक्षाके लिये दूने
त्रतका पालन करनेको आज्ञा दे । दूना ब्रत करनेपर
उसके लिये दक्षिणा भी दूनी ही होनी चाहिये।
यदि एेसा न करे तो हत्या करनेवालेका पाप नष्ट
नहीं होता ओर दाता नरकमें पड़ता है। जो लोग
वेद ओर स्मृतिके विरुद्ध व्रत- प्रायश्चित्त बताते हँ
वे धर्मपालनमें विघ्न डालनेवाले है । राजा उने
दण्डद्रारा पीडित करे, परंतु किसी कामना या
स्वार्थसे मोहित होकर राजा उन्हें कदापि दण्डन
दे; नहीं तो उनका पाप सौगुना होकर उस राजापर
ही पड़ता हे । तदनन्त< प्रायश्चित्त पूरा कर लेनेपर
ब्राह्मणको भोजन करावे। बीस गाय ओर एक
वेल उन्हें दक्षिणामें दे। यदि गौओके अद्धोमें घाव
होकर उसमे कीड़े पड जायं अथवा मक्खी आदि
लगने लगे ओर इन कारणोसे उन गोओंकी मृत्यु
हो जाय तो उन गा्योको रखनेवाला पुरुष आधे
कृच्छत्रतका अनुष्ठान करे ओर अपनी शक्तिके
अनुसार दक्षिणा दे। इस प्रकार प्रायश्चित्त करके
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181/185। (0166101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
श्रेष्ठ ब्राह्यणोंको भोजन कराकर कम-से-कम एक
माशा सुवर्ण दान करे तो शुद्धि होती हे।
जलके भीतरकी, वोँबीकी, चृहोंके विलकी,
ऊसर भूमिक, रास्तेको, श्मशान-भूमिको तथा
शोचसे बची हई-ये सात प्रकारक मृत्तिका
काममें नहीं लानी चाहिये । ब्राह्मणको प्रयलपूर्वक
इष्टापूर्तं कर्म करने चाहिये । इष्ट (यज्ञ-याग आदि)
से वह स्वर्ग पाता है ओर पूर्तं कर्मसे वह
मोक्षसुखका भागी होता हे। धनकी अपेक्षा रखनेवाले
यज्ञ, दान आदि कर्म ईष्ट कहलाते हं ओर
जलाशय बनवाना आदि कार्य पूर्तं कहा जाता हे ।
विशेषतः बगीचा, किसी देवताके लिये बने हुए
तालाब, बावड़ी, कुओं, पोखरा ओर देवमन्दिर- ये
यदि गिरते या नष्ट होते हों तो जो इनका उद्धार
करता है, वह पूर्त कर्मका फल भोगता हे; क्योकि
ये सब पूर्तं कर्म हें। सफेद गायका मूत्र, काली
गोका गोबर, तोबेके रगवाली गायका दूध, सफेद
गायका दही ओर कपिला गायका घी- इन सब
वस्तुओंको लेकर एकत्र करे तो वह पञ्चगव्य बड-
बडे पातर्काका नाश करनेवाला होता है। कुशोद्वारा
लाये हए तीर्थ-जल ओर नदी-जलके साथ उक्त
सभी द्रव्योको पृथक् -पृथक् प्रणवमन्त्रसे लाकर
प्रणवद्वारा ही उन्हें उठावे, प्रणव-जप करते हए ही
उनका आलोडन करे ओर प्रणवके उच्वारणपूर्वक
ही पीये। पलाश वृक्षके विचले पत्तेमे अथवा तविके
शुभ पात्रमे अथवा कमलके पत्तेमें या मिद्रीके
बर्तनमे कुशोदकसहित उस पञ्चगव्यको पीना चाहिये ।
एक सूतकमें दूसरा सूतक उपस्थित हो जाय
तो दूसरेमें दोष नहीं लगता। पहले सूतकके साथ
ही उसकी शुद्धि हो जाती है। एक जननाशौचके
साथ दूसरा जननाशौच ओर एक मरणाशौचके
साथ दूसरा मरणाशौच भी शुद्ध हो जाता है । एक
मासके भीतर गर्भस्राव हो तो तीन दिनका अशौच
“७9
बताये। दो माससे ऊपर होनेपर जितने महीनेमें
गर्भस्राव हो, उतनी ही रात्रियोमें उसके अशौचकी
निवृत्ति होती है । साध्वी रजस्वला स्त्री रज वंद हो
जानेपर स्नानमात्रसे शुद्ध होती हे । विवाहसे सातवें
पदपर अर्थात् सप्तपदीको क्रिया पूरी होनेपर अपने
पितृ-सम्बन्धी गोत्रसे च्युत हो जाती है यानी
उसके पतिका गोत्र हो जाता है; अतः उसके लिये
श्राद्ध ओर तर्पण पतिके गोत्रसे ही करने चाहिये।
पिण्डदानमें पति ओर पती दोनोंका उदेश्य होता
हे; अतः प्रत्येक पिण्डमें दो नामसे संकल्प होना
चाहिये । तात्पर्य यह है कि पिता या पितामह
आदिको सपत्रीक विशेषण लगाकर पिण्डदान
करना चाहिये । इस प्रकार छः व्यक्तियोके लिये
तीन पिण्ड देने योग्य है। एेसा दाता मोहमें नहीं
पड़ता। माता अपने पतिके साथ विश्चेदेवपूर्वक
श्राद्धका उपभोग करती है । इसी प्रकार पितामही
ओर प्रपितामही भी अपने-अपने पतिके ही साथ
श्राद्ध-भोग करती हें । प्रत्येक वर्षमे माता-पिताका
एकोटिष्टश्राद्धद्रारा सत्कार करे । उस वार्षिक श्राद्धमे
विश्चेदेवका पूजन नहीं किया जाता। अतः उनके
विना ही वह श्राद्धभोजन करावे। उसमे एक ही
पिण्ड दे। नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धिश्राद्ध तथा
पार्वण- विद्वान् पुरुषोंको ये पोच प्रकारके श्राद्ध
जानने चाहिये। ग्रहण, संक्रान्ति, पूर्णिमा या
अमावास्या पर्व, उत्सवकाल तथा महालयके
अवसरपर मनुष्य तीन पिण्ड दे ओर मृत्युतिथिको
एक ही पिण्ड दे। जिस कन्याका विवाह
नहीं हुआ है, वह पिण्ड, गोत्र ओर सूतकके
विषयमे पिताके गोत्रसे पृथक् नहीं है।
पाणिग्रहण ओर मन्त्रोद्रारा वह अपने पिताक
गोत्रे पृथक् होती है। जिस कन्याका विवाह
जिस वण्कि साथ होता है, उसके समान उसे
सूतक भी लगता है । उसके लिये पिण्ड ओर
((-0. 1\॥८11114/5511॥1 21188 \/8181185। (0166101. 01411260 0 66810011
५८
संक्षिप्त नारदपुराण
तर्पण भी उसी वर्णके अनुसार होने चाहिये।
विवाह हो जानेपर चोथी रातमें वह पिण्ड, गोत्र
ओर सूतकके विषयमे अपने पतिके साथ एक
हो जाती है। मृत व्यक्तिके प्रति हितबुद्धि
रखनेवाले बन्धुजनोंको शवदाहके प्रथम, द्वितीय,
तृतीय अथवा चतुर्थं दिन अस्थि-संचय करना
चाहिये अथवा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोका
अस्थि-संचय क्रमशः चौथे, पांचवें, सातवें ओर
नवं दिन भी कर्तव्य बताया गया है । जिस मृत
व्यक्तिके लिये ग्यारहवें दिन वृषोत्सर्ग किया
जाता हे, वह प्रेतलोकसे मुक्तं ओर स्वर्गलोकमें
प्रतिष्ठित होता हे । नाभिके बरावर जलमें खडा
होकर मन-ही-मन यह चिन्तन करे कि मेरे
पितर आवें ओर यह जलाञ्जलि ग्रहण करे ।
दोनों हाथोको संयुक्त करके जलसे पूर्णं करे
ओर गोशृद्गमात्र जल उठाकर उसे पुनः जलमें
डाल दे। जलम दकषिणकी ओर मुंह करके खडा
हो आकाशम जल गिराना चाहिये; क्योकि
पितरोंका स्थान आकाश ओर दिशा दक्षिण हे।
देवता आप (जल) कहे गये हैँ ओर पितरोंका
नाम भी आप है; अतः पितरोके हितकी इच्छा
रखनेवाला पुरुष उनके लिये जलमें ही जल दे।
जो दिनमें सूर्यकी किरणोंसे तपता दै, रातमें
नक्षत्रोके तेज तथा वायुका स्पर्शं पाता है ओर
दोनों संध्याओंके समय भी उक्त दोनों वस्तुओंका
सम्पर्क लाभ करता है, वह जल सदा पवित्र
माना गया है। जो अपने स्वाभाविक रूपमें हो,
जिसमे किसी अपवित्र वस्तुका मेल न हआ हो,
वह जल सदा पवित्र हे । एेसा जल किसी पात्रमें
हो या पृथ्वीपर, सदा शुद्ध माना गया है।
देवताओं ओर पितरोके लिये जलमें ही जलाञ्जलि
दे ओर जो बिना संस्कारके ही मरे हैँ, उनके
लिये विद्वान् पुरुष भूमिपर जलाञ्जलि दे । श्राद्ध
ओर होमके समय एक हाथसे पिण्ड एवं
आहुति दे; किंतु तर्पणमें दोनों हाथोसे जल देना
चाहिये । यह शस्त्रोद्रारा निश्चित धर्म है।
(1३/09
पापियोको प्रास होनेवाली नरकोंकी यातनाओंका वर्णन, भगवद्धक्तिका निरूपण
तथा धर्मराजके उपदेशसे भगीरथका गङ्ाजीको लानेके लिये उद्योग
धर्मराज कहते है- राजा भगीरथ! अब में
पापोके भेद ओर स्थूल यातनाओंका वर्णन करूगा।
तुम धैर्य धारण करके सुनो; क्योकि नरक वड
भयंकर होते है। जो दुरात्मा पापी सदा जिन
नरकाग्रियोमे पकाये जाते हैं, वे नरक पापका
भयंकर फल देनेवाले हे । मे उन सबका वर्णन
करता हूं। उनके नाम इस प्रकार ठै-तपन,
बालुका, रौरव, महारौरव, कुम्भ, कुम्भीपाकः,
निरुच्छ्वास, कालसूत्र, प्रमर्दन, भयंकर असिपत्रवन,
लालाभक्ष, हिमोत्कट, मूषावस्था, वसारूप, वैतरणी
नदी, श्वभक्ष्य, मूत्रपान, पुरीषहद, तप्तशूल, तप्तशिला,
शाल्मली वृक्ष, शोणित कूप, भयानक शोणितभोजन,
वहिज्वालानिवेशन, शिलावृष्टि, शस्त्रवृष्टि, अग्रिवृष्ट,
क्षारोदक, उष्णतोय, तप्तायःपिण्डभक्षण, अधःशिरः-
शोषण, मर्प्रतपन, पाषाणवर्षा, कृमिभोजनः, क्षारोदपान,
भ्रमन, क्रकचदारण, पुरीष-लेपन, पुरीष-भोजन,
महाघोर रेतःपान, सर्वसन्धिदाहन, धूमपान, पाशबन्ध,
नानाशूलानुलेपन, अद्खार-शयन, मुसलमर्दन,
विविधकाष्ट यन्त्र, कर्षण, छेदन, पतनोत्पतन,
गदादण्डादिपीडन, गजदन्तप्रहरण, नानासर्पदंशन,
नासामुखशीताम्बुसेचन, घोरक्षाराम्बुपान, लवणभक्षण,
सनायुच्छेद, स्रायुबन्ध, अस्थिच्छेद, क्षाराम्बुपूर्णरनभरप्रवेश,
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पूर्वभाग-प्रथम पाद
मांस- भोजन, महाघोर पित्तपान, श्लेष्म-भोजन,
वृक्षाग्रपातन, जलान्तर्मज्जन, पाषाणधारण,
कण्टकोपरिशयन, पिपीलिकादंशन, वृश्चिकपीडन,
व्याघ्रपीडा, शगालीपीडा, महिष-पीडन, कर्दमशयन,
दुर्गन्धपरिपूर्ण, बहुशस्त्रास्त्रशयन, महातिक्तनिषेवण,
अत्युष्णतेलपान, महाकटनिषेवण, कषायोदक-पान,
तप्तपाषाण-तक्षण, अत्युष्णशीत-सनान, दशनशीर्णन,
तप्तायःशयन ओर अयोभार-बन्धन। महाभाग ।
इस तरह करोडों प्रकारकी नरक-यातनाएँ होती
हें । जिनका सहस्रं वषेमिं भी मैं वर्णन नहीं
कर सकता।
भूपाल ! इन नरकोमेसे जिस पापीको जो प्राप्त
होता हे, वह सब में बतलाऊगा। यह सब मेरे
मुखसे सुनो । ब्रह्महत्यारा, शराबी, सुवर्णकी चोरी
करनेवाला, गुरुपत्रीगामी- ये महापातक हे । इनसे
संसर्गं रखनेवाला पाँचवाँ महापातकी है*। जो
पटुक्तिभेद करता, बलिवैश्वदेवहीन होनेके कारण
व्यर्थं (केवल शरीरपोषणके लिये ही) पाक
बनाता, सदा ब्राह्मणोंको लाच्छित करता, ब्राह्यणो
या गुरुजनोपर हुक्म चलाता ओर वेद वेचता हे
ये पोच प्रकारके पापी ब्रह्मघातक कहे गये हे । मे
आपको धन आदि दूगा' यह आज्ञा देकर जो
ब्राह्मणको बरुलाता है ओर पीछे ' नहीं है' एेसा
कहकर उसे सूखा जवाब दे देता है, उसे ब्रह्म-
हत्यारा कहा गया है । जो सान अथवा पूजनके
लिये जाते हुए ब्राह्मणके कार्यमें विघ्र डालता ठे,
उसे भी ब्रह्मघाती कहते हँ । जो पराय निन्दा ओर
अपनी प्रशंसामें लगा रहता हे तथा जो असत्यभाषणमं
रत रहता है, वह ब्रह्महत्यारा कहा गया हे ।
अधर्मका अनुमोदन करनेवालेको भी ब्रह्मघाती
भाता >
१. ब्रह्महा च सुरापी च स्तेयी च गुरुतल्पगः ॥ महापातकिनस्त्वेते तत्संसर्गी च पञ्चमः ।
५९
कहते हं । जो दूसरोको उद्ेगमें डालता, दूसरोके
दोषोंकी चुगली खाता ओर पाखण्डपूर्णं आचारमें
तत्पर रहता हे, उसे ब्रह्यहत्यारा बताया गया हे।
जो प्रतिदिन दान लेता, प्राणियोके वधम तत्पर
रहता तथा अधर्मका अनुमोदन करता है, उसे भी
ब्रह्मघाती कहा गया हे। राजन्! इस तरह नाना
प्रकारके पाप ब्रह्महत्याके तुल्य बताये गये हँ ।
अव मदिरापानके समान पापका संक्षेपसे
वर्णन करता हू। गणान्न-भोजन (कई जगहसे
भोजन लेकर खाना), वेश्यासेवन करना ओर
पतित पुरुषोंका अन्न भोजन करना सुरापानके तुल्य
माना गया है। उपासनाका त्याग, देवल पुरुष
(मन्दिरके पुजारी)-का अन्न खाना तथा शराव
पीनेवाली स्त्रीसे सम्बन्ध रखना मदिरापानके समान
माना गया हे। जो द्विज शृद्रके यहां भोजन करता
हे, उसे सव धर्मोसि बहिष्कृत शरावी ही समञ्जना
चाहिये । जो शूद्रके आज्ञानुसार दासका कर्म करता
हे, वह नराधम ब्राह्मण मदिरापानके समान पापका
भागी होता है। इस तरह अनेक प्रकारके पाप
मदिरापानके तुल्य माने गये हें ।
अब मैं सुवर्णको चोरीके समान पापका वर्णन
करता हृ, सुनो। कंद, मूल, फल, कस्तूरी, रेशमी
वस्त्र तथा रत्नोकी चोरीको सदा सुवर्णकी चोरीके
ही समान माना गया हे । तावा, लोहा, रंगा, कस,
घी, शहद ओर सुगन्धित द्रव्योका अपहरण करना
सुवर्णकी चोरीके समान माना गया है। सुपारी,
जल, चन्दन तथा कपूरका अपहरण भी सुवर्णकी
चोरीके समान है। श्राद्धका त्याग, धर्मकार्यका
लोप करना ओर यति पुरुषोंकी निन्दा करना भी
सुवर्णको चोरके समान माना गया है । भोजनके
(ना० पूर्व० १५५ । २२-२३)
((-0. 1\॥(1114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
६०
संक्षि नारदपुराण
योग्य पदार्थोका अपहरण, विविध प्रकारके अनाजोकी
चोरी तथा रुद्राक्षका अपहरण भी सुवर्णकी चोरीके
समान माना गया हे।
अब गुरुपत्ीगमनके समान पापका वर्णन
किया जाता है। भगिनी, पुत्र-वधू तथा रजस्वला
स्त्रीके साथ संगम करना गुरुपत्रीगमनके समान
माना गया है। नीच जातिकी स्त्रीसे सम्बन्ध
रखना, मदिरा पीनेवाली स्त्रीसे सहवास करना
तथा परायी स्त्रीके साथ सम्भोग करना गुरुतल्पगमनके
समान माना गया है । भाईकी स्त्रीके साथ गमन,
मित्रको स्त्रीका सेवन तथा अपनेपर विश्वास
करनेवाली स्त्रीके सतीत्वका अपहरण भी
गुरुतल्पगमनके समान माना गया है। असमयमें
मेथुन कर्म करना, पुत्रीगमन करना तथा धर्मका
लोप ओर शास्त्रको निन्दा करना-यह सव
गुरुपलीगमनके समान माना गया है । राजन्! इस
प्रकारके पाप महापातक कहे गये हैँ । इनमेसे
किसी एकके साथ भी संसर्गं रखनेवाला पुरुष
उसके समान हो जाता है। शान्तचित्त महर्पियोने
जिस किसी प्रकार प्रायश्चित्त आदिकी व्यवस्थाद्रारा
इन पापोके निवारणका उपाय देखा हे ।
भूपते! जो पाप प्राय्ित्तसे रहित है, उनका
वर्णन सुनो । वे पाप समस्त पापोके तुल्य तथा बडे
भारी नरक देनेवाले हे । ब्रह्महत्या आदि पापोके
निवारणका उपाय तो किसी प्रकार हो सकता है;
परतु जो ब्राह्यणसे द्वेष करता है, उसका कहीं भी
निस्तार नहीं होता। नरेश्वर! जो विश्वासघाती,
कृतघ्र तथा शृद्रजातीय स्त्रीका सङ्ग करनेवाले है,
उनका उद्धार कभी नहीं होता। जिनका शरीर
निन्दति अन्नसे पुष्ट हुआ है तथा जिनका चित्त
वेदोको निन्दामें ही रत है ओर जो भगवत्-कथा-
वार्तां आदिक निन्दा करते है, उनका इहलोक
तथा परलोकमें कहीं भी उद्धार नहीं होता । प्रायध्चित्तहीन
ओर भी बहुत-से पाप है, उनका परिचय मेरे
नरक-वर्णनके साथ सुनो। जो महापातकी बताये
गये हैँ, वे उन प्रत्येक नरकमें एक-एक युग रहते
हे ओर अन्तमें इस पृथ्वीपर आकर वे सात
जन्मोतक गदहे होते हँ, तदनन्तर वे पापी दस
जन्मोंतक घावसे भरे शरीरवाले कुत्ते होते है,
फिर सौ वर्षोतक उन्हे विष्ठाका कीड़ा होना
पडता हे । तदनन्तर बारह जन्मोंतक वे सर्पं होते
हं । राजन्! इसके बाद एक हजार जन्मोंतक वे
मृग आदि पशु होते हे । फिर सौ वर्षोतक स्थावर
( वृक्ष आदि) योनिमें जन्म लेते हें । तत्पश्चात् उन्हें
गोधा (गोह) -का शरीर प्राप्त होता है| फिर सात
जन्मोतक वे पापाचारी चाण्डाल होते ह । इसके
नाद् सोलह जन्मोंतक उन्हें नीच जातियोमें जन्म
लेना पडता है। फिर दो जन्मतक वे दरिद्र
रोगपीडित तथा सदा प्रतिग्रह लेनेवाले होते है,
इससे उन्हें फिर नरकगामी होना पडता है । जिनका
चित्त असूया (गुणोमें दोषदृष्टि) -से व्याप्त है,
उनके लिये रौरव नरककी प्रापि बतायी गयी हे।
वहो दो कल्पोंतक स्थित रहकर वे सौ जन्मोतक
चाण्डाल होते ह । जो गाय, अग्रि ओर ब्राह्मणके
लिये “न दो ' एेसा कहकर बाधा डालते है, वे सौ
वार कुत्तोको योनिमें जन्म लेकर अन्तमें चाण्डालोके
घर् उत्पन्न होते हें । इसके बाद वे विष्टाके कीडे होते
हे । फिर तीन जन्ोतक व्याघ्र होकर अन्तमें इक्मीस
युगोतक नरकमें पड़ रहते हे । जो परायी निन्दामे
तत्पर, कटु भाषी ओर दानमें विघ्र डालनेवाले
होते ह, उनके पापका यह फल है । चोर मुसल
ओर ओखलीके द्वारा चूर्णं किये जाते हे । उसके
बाद उन्हे तीन वर्पोतक तपाया हुआ पत्थर
उठाना पड़ता है, तदनन्तर वे सात वर्पोतक
कालसूत्रसे विदीर्ण किये जाते है । उस समय
पराये धनका अपहरण करनेवाते वे चोर अपने
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पूर्वभाग-प्रथम पाद्
६९१
पाप-कर्मके लिये शोक करते हए कर्मके फलसे
निरन्तर नरकाग्निमे पकाये जाते हैँ । जो दूसरोके
दोष बताते या चुगुली खाते है, उन्हें जिस भयंकर
नरकको प्राति होती है, वह सुनो। उन्हें एक
सहस्र युगतक तपाये हए लोहेका पिण्ड भक्षण
करना पड़ता है। अत्यन्त भयानक संडसोसे
उनको जीभको पीड़ा दी जाती है ओर वे अत्यन्त
घोर निरुच्छ्वास नामक नरकमें आधे कल्पतक
निवास करते हैँ । अब पर-स्त्री-लम्पट पुरुषोको
प्राप्त होनेवाले नरकका तुमसे वर्णन करता हू।
तपाये हुए तोँबेको स्त्रियों सुन्दर रूप ओर
आभरणोसे युक्त होकर उनके साथ हदपूर्वक
दीर्घकालतक रमण करती हैँ । उनका रूप वैसा ही
होता है, जेसी स्त्रियोके साथ वे इस लोकमें
सम्बन्ध रखते रहे हैँ । वह पुरुष उनके भयसे
भागता है ओर वे बलपूर्वक उसे पकड़ लेती हँ
तथा उसके पाप-कर्मका. परिचय देती हुई उन्हं
क्रमशः विभिन्न नरकोमें पहुंचाती हं । भूपाल । इस
लोकें जो स्त्रियं अपने पतिंको त्यागकर दूसरे
पुरुषकी सेवा स्वीकार करती हँ, उन्हें यमलोकमें
तपाये हए लोहेके बलवान् पुरुष लोहेकी तपी हुई
शय्यापर बलपूर्वक गिराकर उनके साथ बहुत
समयतक रमण करते हैँ । उनसे छूटनेपर वे स्त्रियां
अग्रिके समान प्रज्वलित लोहेके खंभेका आलिङ्गन
करके एक हजार वर्षतक खडी रहती है।
तत्पश्चात् उन्हं नमक मिलाये जलसे नहलाया
जाता है ओर खारे पानीका ही सेवन कराया जाता
हे। उसके बाद वे सौ वर्षोतक सभी नरकोकी
यातना भोगती हँ । जो मनुष्य ब्राह्मण, गौ ओर
श्रष्ठ क्षत्रिय राजाका इस लोकमें वध करता है,
वह भी पाँच कल्पोतक सम्पूर्णं यातनाओंको
भोगता है। जो महापुरुषोंकी निन्दाको आदरपूर्वक
सुनता है, उसका फल सुनो; एेसे लोगोके
कानोमें तपाये हुए लोहेकी बहुत-सी कीले ठोंक
दी जाती हें। तत्पश्चात् कानोके उन चिद्रोमें
अत्यन्त गरम किया हुआ तेल भर दिया जाता हे।
फिर वे कुम्भीपाक नरके पडते हैँं। जो लोग
भगवान् शिव ओर विष्णुसे विमुख एवं नास्तिक
है, उनको मिलनेवाले फलोका वर्णन करता हुं ।
वे यमलोके करोड़ों वर्षोतक केवल नमक खाते
ठे । उसके बाद एक कल्पतक तपी हुईं बालूसे
पूर्ण ररव नरकमें डाले जाते हैं । राजन्! इसी
प्रकार अन्य नरकोमें भी वे पापाचारी जीव अपने
पापोका फल भोगते हें। जो नराधम कोपपूर्ण
दृष्टिसे ब्राह्यणोकी ओर देखते हें, उनको ओंखमें
हजारों तपी हुई सूइया चुभो दी जाती ट । नृपश्रेष्ठ ।
तदनन्तर वे नमकीन पानीको धारासे भिगोये जाते
है, इसके बाद उन पापकर्मियोंको भयंकर क्रकचो
(आरो) से चीरा जाता है। राजन्! जो लोग
विश्वासघाती, मर्यादा तोडनेवाले तथा पराये अन्नरके
लोभी हँ, उन्हें जिस भयंकर नरकको प्राति होती
है, वह सुनो। वे अपना ही मांस खाते है ओर
उनके शरीरको वहां प्रतिदिन कुत्ते नोच खाते है ।
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0\ 60810011
६२
संक्षिप्त नारदपुराण
उन्हें सभी नरकोमें एक-एक वर्ष निवास करना
पड़ता हे। जो सदा दान ही लिया करते हें, जो
केवल नक्षत्रोके ही पदढनेवाले (नक्षत्र-विद्यासे जीविका
करनेवाले) ह तथा जो सदा देवलक (पुजारी) -
का अन्न भोजन करते है, उनकी क्या दशा होती है
वह भी मुञ्चसे सुनो। राजन्! वे पापसे पूर्णं जीव
एक कल्पतक इन सभी यातनाओमें पकाये जाते
हे ओर वे सदा दुःखी रहकर निरन्तर कष्ट भोगते
रहते हे । तत्पश्चात् कालसूत्रसे पीडित हो तेलमें
डबोये जाते हं। फिर उन्हें नमकीन जलसे
नहलाया जाता है ओर उन्हें मलमूत्र खाना
पडता हे । इसके बाद वे पुथ्वीपर आकर म्लेच्छ
जातिमें जनम लेते हें। जो सदा दूसरोंको उद्वेगमें
डालनेवाले हें, वे वैतरणी नदीमें जाते हं । पञ्च
महायज्ञोका त्याग करनेवाले पुरुष लालाभक्ष नरकमें
पडते हें । वहां उन्हे लार खाना पडता हे।
उपासनाका त्याग करनेवाला पुरुष रौरव नरकमें
जाता हे । भूपाल । जो ब्राह्मणोके गोँवसे ' कर ' लेते
ह, वे जबतक चन्द्रमा ओर तारोकी स्थिति रहती हैः
तबतक इन नरकयातनाओमें पकाये जाते है । जो राजा
गोवोमे अधिक “कर ' लगाता हे, वह पाच कल्पोतक
सहस्रा पीटियोके साथ नरक भोगता हे। राजन्! जो
पापी ब्राह्यणेोके गांवसे ' कर' लेनेकी अनुमति देता है,
उसने मानो सहस्रो ब्रह्महत्यां कर डाली । वह दो
चतुर्युगीतक महाघोर कालसूत्रमे निवास करता ठै।
जो महापापी अयोनि (योनिसे भिन्न स्थान),
वियोनि (विजातीय योनि) ओर पशुयोनिमें वीर्यत्याग
करता है, बह यमलोकमें वीर्य ही भोजनके लिये
पाता है। तत्पश्चात् चर्बीसे भरे हए कुर्म डाला
जाकर वहो सात दिव्य वर्षोतक केवल वीर्य भोजन
करके रहता है। उसके बाद मनुष्य होकर सम्पूर्ण
लोकम निन्दाका पात्र बनता है। राजन्! जो
उपवासके दिन दोतुन करता है, वह चार युगोतक
व्याघ्रभक्ष नामक घोर नरकमे पड़ा रहता है;
जिसमें व्याघ्र उसका मांस खाते हें । जो अपने
कर्मोका परित्याग करनेवाला है, उसे विदान् पुरुष
पाखण्डी कहते हैँ । उसका साथ करनेवाला भी
उसीके समान हो जाता हे। वे दोनों अत्यन्त पापी
हं ओर सहस्रो कल्पोतक क्रमशः नरक-यातनापं
भोगते हँ । राजन्! जो देवता-सम्बन्धी द्रव्यका
अपहरण करनेवाले ओर गुरुका धन चुरानेवाले
है, वे ब्रह्महत्याके समान पापका फल भोगते है ।
जो अनाथका धन हड़प लेते ओर अनाथसे द्वेष
करते हं, वे कोटिकल्पसहस्रोतक नरकमें निवास
करते हें । जो स्त्रियों ओर शद्रोके समीप वेदाध्ययन
करते हें, उनके पापका फल बतलाता हूं, ध्यान
देकर सुनो । उनका सिर नीचे करके पैर ऊपर कर
दिया जाता हे ओर दोनों पैरोको दो खंभेमिं कटिसे जड
दिया जाता हि। फिर वे ब्रह्माजीके एक वर्षतक
प्रतिदिन धुओं पीकर रहते है। जो जल ओर
देवमन्दिरमं तथा उनके समीप अपने शारीरिक मलका
त्याग करता है, वह भ्रुणहत्याके समान अत्यन्त
भयानक पापको प्राप्त होता हे। जो ब्राह्मणका धन तथा
सुगन्धित काष्ट चुराते हे, वे चन्रमा ओर तारकी
स्थितिपर्यन्त घोर नरके पड रहते हैं। राजन्।
ब्राह्मणके धनका अपहरण इहलोक ओर परलोकमें भी
दुःख देनेवाला है। इस लोकम तो वह धनका नाश
करता है ओर परलोकमें नरककी प्राप्ति कराता है।
जो ज्युठी गवाही देता है, उसके पापका फल
सुनो। वह जबतक चौदह इन्द्रोका राज्य समाप्त
होता हे, तबतक सम्पूर्णं यातनाओंको भोगता रहता
हे । इस लोकमें उसके पुत्र-पौत्र नष्ट हो जाते हें
ओर् परलोके वह रौरव तथा अन्य नरकोंको
क्रमशः भोगता है। जो मनुष्य अत्यन्त कामी
ओर मिथ्यावादी है, उनके मुंहमे सर्पके समान
जोके भ्र दी जाती हे । इस अवस्थामें उन्हें साठ
((-0. 1/(11114<511॥1 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0\ 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
हजार वर्षोतक रहना पड़ता है । तत्पश्चात् उन्हं
खरे पानीसे नहलाया जाता है। मनुजेश्वर! जो
ऋतुकालमें अपनी स्त्रीसे सहवास नहीं करते, वे
ब्रह्महत्याका फल पाते ओर घोर नरकमें जाते हे ।
जो किसीको अत्याचार करते देखकर शक्ति होते
हए भी उसका निवारण नहीं करता, वह भी उस
अत्याचारके पापका भागी होता है ओर वे दोनों
नरकमें पडते हें । जो लोग पापियोके पापोंको
गिनती करके दूसरोको बताते हे, वे पाप सत्य
होनेपर भी उनके पापके भागी होते हें । राजन्।
यदि वे पाप ब्यूठे निकले तो कहनेवालेको दूने
पापका भागी होना पडता हे । जो पापहीन पुरुषमें
पापका आरोप करके उसकी निन्दा करता हे, वह
चन्द्रमा ओर तारोके स्थितिकालतक घोर नरकमें
रहता है । जो ब्रत लेकर उन्हें पूर्ण किये विना ही
त्याग देता है, वह असिपत्रवने पीडा भोगकर
पृथ्वीपर किसी अङ्गसे हीन होकर जन्म लेता हे ।
जो मनुष्य दूसरोद्रारा किये जानेवाले ब्रतोमे विघ्र
डालता है, वह मनुष्य अत्यन्त दुःखदायक ओर
भयंकर श्लेष्म भोजन नामक नरके, जहां कफ
भोजन करना पडता है, जाता है । जो न्याय करने
तथा धर्मकी शिक्षा देनेमें पक्षपात करता हे, वह
दस हजार प्रायश्चित्त कर ले तो भी उस पापसे
उसका उद्धार नहीं होता. । जो अपने कटुवचनोँसे
ब्राह्मणोका अपमान करता है, वह ब्रह्महत्याको
प्राप्त होता है ओर सम्पूर्णं नरकोंकी यातनाए
भोगकर दस जन्मोंतक चाण्डाल होता है। जो
ब्राह्मणको कोई चीज देते समय विघ्र डालता हे
उसे ब्रह्महत्याके समान प्रायश्चित्त करना चादिये।
जो दूसरेका धन चुराकर दूसरोको दान देता हे
वह चुरानेवाला तो नरकमें जाता है ओर जिसका
६३
धन होता है, उसीको उस दानका फल मिलता हे।
जो कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके नहीं देता है, वह
लालाभक्ष नरकमें जाता हे । राजन् ! जो संन्यासीकी
निन्दा करता है, वह शिलायन्त्र नामक नरकमें
जाता हे। बगीचा काटनेवाले लोग इक्तीस युगोतक
श्चभोजन नामक नरकमें रहते हें, जहां कुत्ते उनका
मांस नोचकर खाते हें। फिर क्रमशः वह सभी
नरकोंकी यातनां भोगता है।
भूपते! जो देवमन्दिर तोड़ते, पोखरा नष्ट करते
ओर फुलवारी उजाड् देते हँ, वे जिस गतिको प्राप्त
होते हे, वह सुनो । वे इन सब यातनाओं (नरकं) -
में पृथक् -पृथक् पकाये जाते ह । अन्तमें इक्तीस
कल्पोतक वे विष्ठाके कीड़ होते हे । राजन्! उसके
वाद वे सौ बार चाण्डालकी योनिमें जन्म लेते हे।
जो जूठा खाते ओर मित्रंसे द्रोह करते हं, उन्हे
चन्द्रमा ओर सूर्यके स्थितिकालतक भयंकर
नरकयातनाएं भोगनी पड़ती हैं । जो पितृयज्ञ ओर
देवयन्ञका उच्छेद करते तथा वेदिक मार्गसे बाहर
हो जाते है, वे पाखण्डीके नामसे प्रसिद्ध है । उन्दें
सव प्रकारकी यातनाएं भोगनी पड़ती दहं । राजा
भगीरथ! इस प्रकार पापियोके लिये अनेक प्रकारक
यातना हे । प्रभो! में नरकं ओर उनकी यातनाओंकी
गणना करनेमें असमर्थ हूं । भूपते ! पापों, यातनाओं
तथा धर्मोकी संख्या बतलानेके लिये संसारम
भगवान् विष्णुके सिवा दूसरा कौन समर्थ है ? इन
सव पापका धर्मशास्त्रकी विधिसे प्रायश्चित्त कर
लेनेपर पापराशि नष्ट हो जाती हे। धार्मिक
कृत्योमें जो न्यूनाधिकता रह जाती है, उसको
पूर्तिके लिये लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके समीप
पूर्वोक्तं पापोके प्राय्ित्त करने चाहिये । ग्धा,
तुलसी, सत्सद्भ, हरिकीर्तन, किसके दोष न
--- द्व न ----र------------- ---------
ह ज्ये च घर्मिक्षायां पक्षपातं करोति यः। न तस्य निष्कृतिर्भृयः प्रायश्चिततायुतैरपि ॥
(ना० पूरव० १५। ११९)
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 8118811 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
६४ संक्षिप्त नारदपुराण
देखना ओर हिंसासे दूर रहना-ये सब वाते
पापोका नाश करनेवाली होती है । भगवान् विष्णुको
अर्पित किये हए कर्म निश्चय ही सफल होते हे ।
जो कर्म उन्हें अर्पित नहीं किये जाते, वे राखमें
डाली हुई आहुतिके समान व्यर्थ होते हँ । नित्य,
नैमित्तिक, काम्य तथा जो मोक्षके साधनभूत कर्म॑
है, वे सब भगवान् विष्णुके समर्पित होनेपर
सात्विक ओर सफल होते हे ।
भगवान् विष्णुको उत्तम भक्ति सब पापोका
नाश करनेवाली है। नृपश्रेष्ठ । सात्त्विक, राजस
ओर तामस आदि भेदोसे भक्ति दस प्रकारक
जाननी चाहिये । वह पापरूपी वनको जलानेके
लिये दावानलके समान हे । राजन्! जो दूसरेका
विनाश करनेके लिये भगवान् लक्ष्मीपतिका
भजन किया जाता है, वह “अधमा तामसी'
भक्ति है; क्योकि वह दुष्ट भाव धारण करनेवाली
है। जो मनमें कपटरबुद्धि रखकर, जैसे व्यभिचारिणी
स्त्री अपने पतिक्की सेवा करती है, उस प्रकार
जगदीश्वर भगवान् नारायणका पूजन करता हे,
उसकी वह ' मध्यमा तामसी ' भक्ति हे। पृथ्वीपाल।
जो दूसरोको भगवान्को आराधनामें तत्पर देखकर
ईष्यविश स्वयं भी भगवान् श्रीहरिकौ पूजा
करता है, उसकी वह क्रिया "उत्तमा तामसी
भक्ति मानी गयी है। जो धन-धान्य आदिक
याचना करते हुए परम श्रद्धाके साथ श्रीहरिको
अर्चना करता है, वह पूजा * अधमा राजसी '
भक्ति मानी गयी है। जो सम्पूर्ण लोकोमें
विख्यात कीर्तिका उदेश्य रखकर परम भक्तिभावसे
भगवानकी आराधना करता है, उसको वह
क्रिया "मध्यमा राजसी" भक्ति कही गयी हे ।
पृथ्वीपते! जो सालोक्य ओर सारूप्य आदि पद्
प्राप्त करनेकी इच्छासे भगवान् विष्णुकौ अर्चना
करता है, उसके द्वारा को हुई वह पूजा ˆ उत्तमा
राजसी ' भक्ति कही गयी है। जो अपने किये
हुए पापोंका नाश करनेके लिये पूर्ण श्रद्धाके
साथ श्रीहरिकी पूजा करता है, उसकी कौ हुई
वह पूजा “अधमा सात्विकी ' भक्ति मानी गयी
है। “यह भगवान् विष्णुको प्रिय है' एेसा
मानकर जो श्रद्धापूर्वक सेवा-शुश्रूषा करता हे,
उसकी वह सेवा “मध्यमा सात्विकी ' भक्ति हे ।
राजन्! “शस्त्रको एेसी ही आज्ञा है" यह
मानकर जो दासकी भोति भगवान् लक्ष्मीपतिको
पूजा-अर्चा करता है, उसको वह भक्ति सन
प्रकारकी भक्तियोमें भ्रष्ठ “उत्तमा सात्विको '
भक्ति मानी गयी है। जो भगवान् विष्णुको
थोडी-सी भी महिमा सुनकर परम संतुष्ट हो
उनके ध्यानमें तन्मय हो जाता है, उसको वह
भक्ति “उत्तमोत्तमा' मानी गयी हेै। मै ही परम
विष्णुरूप हू मुञ्षमें यह सम्पूर्णं जगत् स्थित ह ।'
१. पहले सात्त्विक, राजस ओर तामस-भदसे भक्तिके तीन भेद रै । फिर प्रत्येकके उत्तम, मध्यम ओर
अधम-ये तीन भेद ओर होते ह! इस प्रकार नौ भेद हुए । दसवीं “उत्तमोत्तमा परा भक्ति" है ।
((-0. 1/८1111(4<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
६५
इस प्रकार जो सदा भगवान्से अपनेको अभिन्न
देखता है, उसे उत्तमोत्तम भक्त समञ्जना चाहिये ।
यह दस प्रकारको भक्ति संसार-बन्धनका नाश
करनेवाली है। उसमें भी सात्विकी भक्ति सम्पूर्ण
मनोवाचज्छित फल देनेवाली है। इसलिये भूपाल ।
सुनो-संसारको जीतनेकी इच्छावाले उपासकको
अपने कर्मका त्याग न करते हुए भगवान् जनार्दनकौ
भक्ति करनी चाहिये। जो स्वधर्मका परित्याग
करके भक्तिमात्रसे जीवन धारण करता है, उसपर
भगवान् विष्णु संतुष्ट नहीं होते। वे तो धर्माचरणसे
संतुष्ट होते हें । सम्पूर्णं आगमोमें आचारको प्रथम
स्थान दिया गया है। आचारसे धर्म प्रकट होता है
ओर धर्मके स्वामी साक्षात् भगवान् विष्णु हं \।
इसलिये स्वधर्मका विरोध न करते हए श्रीहरिको
भक्ति करनी चाहिये । सदाचारशून्य मनुष्योके धर्मं
भी सुख देनेवाले नहीं होते। स्वधर्मपालनके विना
को हुई भक्ति भी नहीं को हुईके समान कही गयी
हे। राजन्! तुमने जो कुछ पृछा था, वह सव मेने
कह दिया। अतः तुम अपने धर्में तत्पर रहकर
सृक्ष्म-से- सूक्ष्म स्वरूपवाले जनार्दन भगवान्
नारायणका पूजन करो। इससे तुम्हें सनातन सुखको
प्राति होगी। भगवान् शिव ही साक्षात् श्रीहरि हं
ओर श्रीहरि ही स्वयं शिव ह। इन दोनोमें भेद
देखनेवाला दुष्ट पुरुष करोड़ों नरकोपमं जाता दै।
इसलिये भगवान् विष्णु ओर शिवको समान
समञ्जकर उनको आराधना करो। इनमें भेददृष्ट
करनेवाला मनुष्य इहलोक ओर परलोकमें भी दुःख
पाता हे।
जनेश्वर! में जिस कार्यके लिये तुम्हारे पास
आया था, वह तुम्हें बतलाता हूं । सुमते! सावधान
होकर सुनो। रानन्! आत्मघातका पाप करनेवाले
तुम्हारे पितामहगण महात्मा कपिलके क्रोधसे दग्ध
हो गये हं ओर इस समय वे नरकमें निवास करते
हे । महाभाग! गद्धाजीको लानेका पराक्रम करके
तुम उनका उद्धार करो। भूपते! गङ्गाजी निश्चय ही
सव पापोका नाश कर देती हे। नृपश्रेष्ठ ! मनुष्यके
केश, हड़ी, नख, दात तथा शरीरकौ भस्म भी
यदि गङ्गाजीके शरीरसे छ जायं तो वे भगवान्
विष्णुके धाममें पहुंचा देती हँ । राजन्! जिसकी
हड़ी अथवा भस्मको मनुष्य गङ्गाजीमें डाल देते
हे, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् श्रीहरिके
धाममें चला जाता है। भूपते! अबतक जितने भी
पाप तुम्हें बताये गये है, वे सव गङ्गाजीके एक
विन्दुका अभिषेक होनेसे नष्ट हो जाते हे ।
१.यच्वान्यस्य विनाशार्थं भजनं श्रीपतेरनृप।
योऽचयेत्केतवधिया स्वैरिणी स्वपतिं यथा।
देवपूजापरान् दृष्टा मात्सर्याद् योऽर्चयेद्धरिम् ।
धनधान्यादिकं यस्तु प्रार्थयत्रर्चयेद्धरिम् 1
यः सर्वलोकविख्यातकोर्तिमुदिश्य माधवम्।
सालोक्यादि पदं यस्तु समुदिश्यार्चयद्धरिम् ।
यस्तु स्वकृतपापानां क्षयार्थं ॒प्रार्चयद्धरिम्।
हरेरिदं प्रियमिति शुश्रूषां कुरुदे तु यः।
विधिवुद्खयार्चयेद्यस्तु दासवच्छरीपतिं नृप ।
महिमानं ह्यस्तु किंचिच्छृत्वापि यो नरः।
अहमेव परो विष्णुर्मयि सर्वमिदं जगत् ।
परिकल्पते ।
२. सर्वागपानापाचारः प्रथमं
सा तामस्यधमा भक्तिः खलभावधरा यतः॥
नारायणं जगन्नाथं तामसी मध्यमा तु सा॥
सा भक्तिः पृथ्वीपाल तामसी चोत्तमा स्मृता॥
श्रद्धया परया युक्तः सा राजस्यधमा स्मृता ॥
अचयेत्परया भक्त्या सा मध्या राजसी मता॥
सा राजस्युत्तमा भक्तिः कीर्तिता पृथिवीपते॥
श्रद्धया परयोपेतः सा सात्विक्यधमा स्मृता॥
श्रद्धया संयुतो भूयः सात्विको मध्यमा तु सा॥
भक्तीनां प्रवरा सा तु उत्तमा सात्विको स्मृता ॥
तन्मयत्वेन संतुष्टः सा भक्तिरुत्तमोत्तमा॥
इति यः सततं पश्येत्तं विद्यादुत्तमोत्तमम्॥
(ना० पूर्व० १८५ । १४०- १५०)
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः॥
(ना पूर्व० १५1 १५४)
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
६६
श्रीसनकजी कहते है - मुनिश्रेष्ठ नारद,
धर्मात्मा महाराज भगीरथसे एेसा कहकर धर्मराज
तत्काल अन्तधनि हो गये । तब सब शास्त्रोके
पारगामी महावुद्धिमान् राजा भगीरथ सम्पूर्ण
पृथ्वीका राज्य मन्त्रियोंको सौपकर स्वयं वनको
संक्षिप्त नारदपुराण
चले गये। वहसे हिमालयपर जाकर नर-
नारायणके आश्रमसे पञ्चिमकी तरफ बफसे ढके
हए एक शिखरपर, जो सोलह योजन विस्तृत है
उन्होने तपस्या कौ ओर त्रिभुवनपावनी गङ्खाको
वे इस भूतलपर ले आये।
१ 7 |
राजा भगीरथका भृगुजीके आश्रमपर जाकर सत्सङ्क-लाभ करना तथा
हिमालयपर घोर तपस्या करके भगवान् विष्णु ओर शिवक्ी
कृपासे गङ्ाजीको लाकर पितरोंका उद्धार करना
नारदजीने पृछा- मुने ! हिमालय पर्वतपर जाकर
राजा भगीरथने क्या किया? वे गङ्खाजीको किस
प्रकार ले आये ? यह मुञ्चे बतानेको कृपा करे ।
श्रीसनकजीने कहा- मुने! महाराज भगीरथ
जटा ओर चीर धारण करके तपस्याके लिये
हिमालयपर जाते हए गोदावरी नदीके तटपर
पहुंचे*। वहाँ उन्होने महान् वनमें महि भृगुका
उत्तम आश्रम देखा, जो कृष्णसार मृगोंसे भरा
हुआ था ओर चमरी गायका समुदाय अपनी पूंछ
हिलाकर मानो उस आश्रमको चंवर इला रहा
था। मालती, जही, कुन्द, चम्पा ओर अश्त्थ--उस
आश्रमको विभूषित कर रहे थे! वहां चारों ओर
भोति-भोतिके फूल खिले हुए थे। ऋषि-मुनियोंका
समुदाय वहां निवास करता था। वेदों ओर
शास्त्रोका महान् घोष आकाशमें गज रहा था।
महर्षि भृगुके एेसे आश्रममें राजा भगीरथने प्रवेश
किया। भृगुजी परब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन कर
रहे थे। शिष्योको मण्डली उन्हें घेरकर वैठी थी।
तेजमें वे भगवान् सूर्यके समान थे । राजा भगीरथने
वहां उनका दर्शन किया ओर उनके चरण-ग्रहण
आदि विधिसे उन ब्राह्यणशिरोमणिको वन्दना कौ;
साथ ही भृगुजीने भी सम्मानपूर्वक राजाका आतिथ्य-
सत्कार किया। महर्षिं भृगुके द्वारा आतिथ्य
सत्कार हो जानेपर राजा भगीरथ उन मुनीश्वरसे
हाथ जोड़कर विनयपूर्वक बोले ।
भगीरथने कहा-- भगवन्! आप सब धममेकि
साता तथा सम्पूर्णं शास्त्रोके विद्वान् हें । मैं संसार-
१. इस प्रसंगको देखनेसे यह जान पडता है कि उन दिनों राजा भगीरथ दक्षिण भारतमें गोदावरीसे भी कुछ
दूर दक्षिणके किसी स्थानमें रहा करते थे। तभी उनके मार्गमे गोदावरी नदी आ सकी। सूर्यवंशियोंकी सुप्रसिद्ध
राजधानी अयोध्यासे हिमालय जानेमे तो गोदावरीका मार्गमे आना सम्भव नहीं है।
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद्
६७9
बन्धनके भयसे डरकर आपसे मनुष्योके उद्धारका
उपाय पूता दहूं। सर्वज्ञ मुनिसत्तम! यदि में
आपका कृपापात्र होऊ तो जिस कर्मसे भगवान्
संतुष्ट होते हैँ, वह मुञ्चे बताइये ।
भृगुने कहा- राजन्, तुम्हारी अभिलाषा क्या
हे, यह मुञ्चे मालूम हो गयी । तुम पुण्यात्माओंमे
श्रेष्ठ हो । अन्यथा अपने समस्त कुलका उद्धार
करनेकी योग्यता तुममें केसे आती । भूपाल! जो
कोई भी क्योंन हो, यदि वह शुभ कर्मके द्वारा
अपने कुलके उद्धारकी इच्छा रखता है तो उसे
नररूपमें साक्षात् नारायण ही समञ्चना चाहिये।
राजेन्द्र! जिस कर्मसे प्रसन्न होकर देवेश्वर भगवान्
विष्णु मनुष्योंको अभीष्ट फल प्रदान करते हं, वह
बतलाता हू, एकाग्रचित्त होकर सुनो । राजन्। तुम
सदा सत्यका पालन करो ओर अहिंसाधर्ममें स्थित
रहो। सदा सम्पूर्णं प्राणियोके हितमें लगे रहकर
कभी भी ज्ूठ न बोलो। दुष्टका साथ छोड दो।
सत्सङ्गका सेवन करो। पुण्य करो ओर दिन-रात
सनातन भगवान् विष्णुका स्मरण करते रहो।
भगवान् महाविष्णुकी पूजा करो ओर उत्तम
शान्तिका आश्रय लो। द्वादशाक्षर अथवा अष्टाक्षर-
मन्त्र जपो। इससे तुम्हारा कल्याण होगा ।
भगीरथने पृषछा- मुने ? सत्य केसा कहा गया
है 2 सम्पूर्णं भूतोका हित क्या है ? अनृत (ञ्यूट)
किसे कहते हैँ 2 दुष्ट कैसे होते है ? केसे लोगोंको
साधु कहा गया है 2 तथा पुण्य कैसा होता है?
भगवान् विष्णुका स्मरण कैसे करना चाहिये ओर
उनको पूजा कैसे होती टै? मुने! शान्ति किसे
कहा गया है 2 अष्टाक्षर-मन्त्र क्या है 2 तत्तवार्धक
ज्ञाता महर्षे! द्वादशाक्षर-मन्त्र क्या होता हे 2 मुञ्जपर
भृगुने कहा- महाप्राज्ञ! वहत अच्छा, बहुत
अच्छा। तुम्हारी बुद्धि बहुत उत्तम हे। भूपाल,
तुमने मुञ्चसे जो कुछ पृचछा है, वह सव तुम्हें
बतलाता हूं । विद्वान् पुरुष यथार्थं कथनको ' सत्य '
कहते हें । धर्मपरायण मनुष्योको इस प्रकार सत्य
बोलना चाहिये कि धर्मका विरोध न होने पाये।
इसलिये साधु पुरुष देश, काल आदिका विचार
करके स्वधर्मका विरोध न करते हए जो यथार्थं
वचन बोलते हँ, वह * सत्य' कहलाता है । राजन्।
सम्पूर्ण जीवसे किसीको भी जो क्लेश न देना है,
उसीका नाम “ अहिसा' हे। वह सम्पूर्णं कामनाओंको
देनेवाली बतायी गयी हे । धर्मके कार्यमं सहायता
पहंचाना ओर अधर्मके कार्यका विरोध करना--इसे
धर्मज्ञ पुरुष सम्पूर्णं लोकोंका हितसाधन कहते हे ।
धर्म ओर अधर्मका विचार न करके केवल अपनी
इच्छाके अनुसार कहना असत्य है । उसे सव
प्रकारके कल्याणका विरोधी समञ्जना चाहिये।
राजन्! जिनकी बुद्धि सदा कुमार्गमें लगी रहती
हे, जो सब लोगोसे द्वेष रखनेवाले ओर मूर्ख हें
उन्हें सम्पूर्ण धर्मसि बहिष्कृत दुष्ट पुरुष जानना
चाहिये। जो लोग धर्म ओर अधर्मका विवेक
करके वेदोक्त मार्गपर चलते हँ तथा सव लोगोके
हितमे संलग्र रहते हें, उन्हें साधु" कहा गया
हे\। जो भगवान्की भक्तिमें सहायक है, साधु
पुरुष जिसका पालन करते हैँ तथा जो अपने लिये
भी आनन्ददायक है, उसे ' धर्म" कहते ह । यह
सम्पूर्ण जगत् भगवान् विष्णुका स्वरूप ठै, विष्णु
सवके कारण हँ ओर मैं भी विष्णु दहरू--यह जो
ज्ञान टै, उसीको “भगवान् विष्णुका स्मरण
समञ्चना चाहिये । भगवान् विष्णु सर्वदेवमय है, मै
बड़ी भारी कृपा करके इन सबकी व्याख्या करं । | विधिपूर्वक उनको पूजा करूगा; इस प्रकारसे जो
१. धर्माधर्मविवेकेन
वेदमागनुसारिणः ॥ सर्वलीकटितासक्छाः साधवः परिकौर्तिताः।
(ना० पूर्व० १६॥ २९-३०)
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६८
श्रद्धा होती हे, वह उनको ' भक्ति" कही गयी हे।
श्रीविष्णु सर्वभूतस्वरूप हँ, सर्वत्र परिपूर्ण सनातन
परमेश्वर हैँ; इस प्रकार जो भगवान्के प्रति अभेद
बुद्धि होती हे, उसखीका नाम “समता ' हे। राजन् ।
शत्रु ओर मित्रके प्रति समान भाव हो, सम्पूर्ण
इन्द्रियां अपने वशमें हों ओर देववश जो कुछ
मिल जाय, उसीमे संतोष रहे तो इस स्थितिको
शान्ति" कहते हें । राजन्! इस प्रकार तुम्हारे इन
सभी प्रश्नोको व्याख्या हो गयी। ये सव विषय
मनुष्योको सिद्धि प्रदान करनेवाले ह ओर समस्त
पापराशियोंका वेगपूर्वक नाश करनेके साधन हे ।
अष्टाक्षर-मन्त्र सव पापोंका नाश करनेवाला
हे । राजेनद्र! मै उसका स्वरूप तुम्हें बतलाता हूं ।
वह समस्त पुरुषार्थोका एकमात्र साधन, भगवान्
विष्णुको प्रसन्न करनेवाला तथा सम्पूर्ण सिद्धियोको
देनेवाला हे। " ॐ नमो नारायणाय" यही अष्टाक्षर-
मन्त्र हे। इसका जप करना चाहिये। महाराज!
" ॐ नमो भगवते ासुदेवाय' यह द्वादशाक्षर- मन्त्र
कहा गया है। राजन्! इन अष्टाक्षरं ओर
द्वादशाक्षर--दोनों खनन्त्रोका समान फल है । इनकी
प्रवृत्ति ओर निवृत्ति-इन दोनों मार्गवालोके लिये
समता बतायी गयी है। इन दोनों मन्त्रोके जपके
लिये भगवान्का ध्यान इस प्रकार करना चाहिये।
भगवान् नारायण अपने हाथों शङ्ख ओर चक्र
धारण किये शान्तभावसे विराजमान हें । रोग ओर
शोक उनका कभी स्पर्श नहीं करते! उनके
वामाङ्कमे लक्ष्मीजी विराज रही ह । वे सर्वशक्तिमान्
प्रभु सबको अभयदान कर रहे हे । उनके मस्तकपर
किरीट ओर कानोमे कुण्डल शोभा पाते ह। वे
नाना प्रकारके अलंकारोसे सुशोभित ह। गलेमें
कौस्तुभमणि ओर वनमाला धारण कयि हुए ह।
उनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिहसे चिदित है । वे
पीताम्बरधारी भगवान् देवताओं ओर दानवोंसे भी
संक्षिप्त नारदपुराण
वन्दित हें । उनका आदि ओर अन्त नहीं हे।
वे सम्पूर्ण मनोवाचज्छित फलोके देनेवाले हेँ।
इस प्रकार भगवान्का ध्यान करना चाहिये । वे
अन्तर्यामी, ज्ञानस्वरूप, सर्वव्यापी तथा सनातन
ह । राजा भगीरथ! तुमने जो कुछ पूछा, वह
सब इस रूपमे बताया गया है । तुम्हारा कल्याण
हो । अव सुखपूर्वक तपस्यामें सिद्धि प्राप्त करनेके
लिये जाओ।
महिं भृगुके एेसा कहनेपर राजा भगीरथ
बहुत प्रसन्न हए ओर तपस्याके लिये वनमें गये।
हिमालय पर्वतपर पहुंचकर वहकि मनोहर पावन
प्रदेशमे स्थित नादेश्र महाक्षेत्रमे उन्होने अत्यन्त
दुष्कर तपस्या कौ । राजा तीनों काल स्नान करते।
कन्द, मूल तथा फल खाकर रहते ओर उसीसे
आये हुए अतिथियोका सत्कार भी करते थे। वे
प्रतिदिन होममें तत्पर रहते। सम्पूर्णं भूतोके हितेषी
होकर शान्तभावसे स्थित थे। उन्होने भगवान्
नारायणकी शरण ले रखी थी । पत्र, पुष्प, फल
ओर जलसे वे तीनों काल श्रीहरिकौ आराधना
करते थे। इस प्रकार अत्यन्त धर्यपूर्वक भगवान्
नारायणका ध्यान करते हए वे सूखे पत्ते खाकर
रहने लगे। तदनन्तर परम धर्मात्मा राजा भगीरथने
प्राणायाम करते हुए श्वास बंद करके तपस्या
करना प्रारम्भ किया। जिनका कहीं अन्त नहीं है
या जो किसीसे पराजित नहीं होते, उन्हीं
श्रीनारायणदेवका चिन्तन करते हुए वे साठ हजार
वर्षोतक श्वास रोके रहे। उस समय राजाकं
नासिकाके छिद्रसे भयंकर अग्रि प्रकट हुई । उसे
देखकर सव देवता थरा उठे ओर उस अग्रिसे
संतप्त होने लगे। फिर वे देवेश्वरगण क्षीरसागरके
उत्तर तटपर जह जगदीश्वर श्रीहरि निवास करते
हे, पहुंचकर भगवान् महाविष्णुकी शरणमे गये
ओर शरणागतोकी रक्षा करनेवाले देवदेवेश्वर भगवानूकी
((-0. 1\/॥८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
६९
इस प्रकार स्तुति करने लगे।
देवताओने कहा- जो जगत्के एकमात्र स्वामी
तथा स्मरण करनेवाले भक्तजनोंकी समस्त पीड़ा
दूर कर देनेवाले हैँ, उन परमेश्वर श्रीविष्णुको हम
नमस्कार करते हें । ज्ञानी पुरुष उन्हें स्वभावतः
शुद्ध, सर्वत्र परिपूर्ण एवं ज्ञानस्वरूप कहते हे ।
श्रेष्ठ योगीजन जिनका सदा ध्यान करते हें, जो
परमात्मा अपनी इच्छाके अनुसार शरीर धारण
करके देवताओंका कार्य सिद्ध करते है, यह
सम्पूर्णं जगत् जिनका स्वरूप है तथा जो जगत्के
आदिस्वामी हैँ, उन भगवान् पुरुषोत्तमको हम
प्रणाम करते हे । जिनके नामोका संकीर्तन करनेमात्रसे
दुष्ट पुरुषोके भी समस्त पाप नष्ट हो जाते है; जो
सबके शासक, स्तवन करने योग्य एवं पुराणपुरुष
है, उन भगवान् विष्णुको हम पुरुषार्थसिद्धिके
लिये नमस्कार करते हे । सूर्य आदि जिनके तेजसे
प्रकाशित होते हैँ ओर कभी भी जिनको आज्ञाका
उच्लद्कन नहीं करते, जो सम्पूर्णं देवताओंके अधीश्वर
तथा पुरुषार्थरूप हँ, उन कालस्वरूप श्रीहरिको
हम नमस्कार करते है । जिनकी आज्ञाके अनुसार
ब्रह्माजी इस जगत्कौ सृष्टि करते है, रुद्र संहार
करते ह ओर ब्राह्मणलोग श्रुतियोके द्वारा सव
लोगोंको पवित्र करते हैँ, जो गुणोके भण्डार ओर
सबके उपदेशक गुरु हँ, उन आदिदेव भगवान्
विष्णुकी हम शरणमे आये हँ । जो सवसे श्रेष्ठ,
वरण करने योग्य तथा मधु ओर कैटभको
मारनेवाले हैँ, देवता ओर दैत्य भी जिनको
चरणपादुकाका पूजन करते हें, जो श्रेष्ट भक्तोकी
मनोवाच्छित कामनाओंकी सिद्धिके कारण हैँ तथा
एकमात्र ज्ञानद्वारा जिनके तत्त्वका बोध होता है
उन दिव्यशक्तिसम्पन्न भगवान्को हम प्रणाम करते
ह । जो आदि, मध्य ओर अन्तसे रहित, अजन्मा,
अनादि, अविद्या नामक अन्धकार्का नाश करनेवाले,
सत्, चित्, परमानन्दघन स्वरूप तथा रूप आदिसे
रहित हे, उन भगवान् परमेश्चरको हम प्रणाम
करते हें । जो जलमें शयन करनेके कारण नारायण,
सर्वव्यापी होनेसे विष्णु, अविनाशी होनेसे अनन्त
ओर सबके शासक होनेसे ईश्वर कहलाते हैँ
अपने श्रीअङ्खोपर रेशमी पीताम्बर धारण करते हैँ
ब्रह्मा तथा रुद्र॒ आदि जिनकी सेवामें लगे रहते हैँ
जो यक्षके प्रेमी, यज्ञ करनेवाले, विशुद्ध, सर्वोत्तम
एवं अव्यय है, उन भगवान् विष्णुको हम नमस्कार
करते हे।
इन्द्र॒ आदि देवताओंके इस प्रकार स्तुति
करनेपर भगवान् महाविष्णुने देवताओंको राजर्षि
भगीरथका चरित्र बतलाया । नारदजी ! फिर उन
सबको आश्वासन तथा अभय देकर निरञ्जन
भगवान् विष्णु उस स्थानपर गये, जहां राजर्षि
भगीरथ तपस्या करते थे। सम्पूर्णं जगत्के गुरु
शड्ख-चक्रधारी सच्विदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीहरि
राजा भगीरथको प्रत्यक्ष दर्शन दिया। राजाने देखा,
सामने कमलनयन भगवान् विराजमान हैँ । उनकी
प्रभासे सम्पूर्णं दिग्दिगन्त उद्धासित हो रहा है।
उनके अद्खोको कान्ति अलसीके फूलकौी भति
श्याम हे । कानमे ञ्जलमलाते हए कुण्डल उनको
शोभा बढ़ा रहे हैं । चिकने घुंघराले केशोंवाले
मुखारविन्दसे सुशोभित हँ । मस्तकपर जगमगाता
हुआ मुकुट उनके स्वरूपको ओर भी प्रकाशपूर्णं
किये देता हे । वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न ओर
कोस्तुभमणि है। वे वनमालासे विभूषित ह।
उनको भुजां बड़ी-बड़ी है । अङ्ख-अङ्गसे उदारता
टपक रही है । उनके चरणारविन्द लोकेश ब्रह्माजीके
द्वारा पूजित हैं । भगवान्की यह की देखकर
राजा भगीरथ भृतलपर दण्डकी भति पड़ गये।
उनका कधा ज्युक गया ओर् वे बार-वार प्रणाम करने
लगे। उनका हदय अत्यन्त हर्षसे भरा हुआ था।
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७०
संक्षिप्त नारदपुराण
शरीरम रोमाञ्च हो आया था ओर वे गद्गदं
कण्ठसे “कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण, श्रीकृष्ण '- इस
प्रकार उच्चारण कर॒ रहे थे। अन्तर्यामी जगद्गुरु
भगवान् विष्णु भगीरथपर प्रसन्न थे। उन भूतभावन
भगवानूने करुणासे भरकर कहा।
श्रीभगवान् बोले- महाभाग भगीरथ । तुम्हारा
अभीष्ट सिद्ध होगा, तुम्हारे पूर्वं पितामह मेरे
लोकमें जायेगे। राजन्! भगवान् शिव मेरे दूस
स्वरूप हँ । तुम यथाशक्ति स्तुति-पाठ करके
उनका स्तवन करो। वे तुम्हारा सम्पूर्णं मनोरथ
तत्काल सिद्ध करेगे । जिन्होंने अपनी शरणमे आये
हुए चन्द्रमाको स्वीकार किया हे, वे बडे
शरणागतवत्सल हें । अतः स्तोर््रोह्वारा स्तवन करने
योग्य उन सुखदाता ईशानकी तुम आराधना करो ।
अनादि अनन्तदेव महे श्वर सम्पूर्णं कामनाओं तथा
फलोके दाता हें । राजन्! तुमसे भली भति पूजित
होकर वे शीघ्र तुम्हारा कल्याण करेगे ।
मुनिश्रेष्ठ नारद } तीनों लोकोके स्वामी देवदेवेश्वर
भगवान् अच्युत एेसा कहकर अन्तर्धान हो गये ।
फिर वे राजा भगीरथ भी उठे] द्विजश्रेष्ठ ! राजाके
मनमे बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सोचने लगे- क्या
यह सब स्वप्र था अथवा साक्षात् सत्यका ही
दर्शन हुआ है। अवं क्या करू? इस प्रकार
भ्रान्तचित्त हए राजा भगीरथसे आकाशवाणीने
उच्च स्वरसे कहा-' राजन्! यह सब अवश्य ही
सत्य हे। तुम चिन्ता न करो।' आकाशवाणी
सुनकर भूपाल भगीरथने हम सबके कारण तथा
समस्त देवताअकि स्वामी भगवान् शिवका भक्तिपूर्वकं
स्तवन किया।
भगीरथने कहा- म प्रणतजनोंकी पीडाका
नाश करनेवाले विश्वनाथं शिवको प्रणाम करता
हूं जो प्रमाणसे परे तथा प्रमाणरूप है, उन
भगवान् ईशानको मं नमस्कार करता हूं जो
जगतूस्वरूप होते हुए भी नित्य ओर अजन्मा हैँ
संसारको सृष्टि. संहार ओर पालनके एकमात्र
कारण हे, उन भगवान् शिवको मेँ प्रणाम करता
हू। योगी श्वर, महात्मा जिनका आदि, मध्य ओर
अन्तसे रहित अनन्त, अजन्मा एवं अव्ययरूपसे
चिन्तन करते हे, उन पुष्टिवर्धक शिवको मेँ प्रणाम
करता हूं । पशुपति भगवान् शिवको नमस्कार है।
चेतन्यस्वरूप भगवान् शंकरको नमस्कार रहै।
असमर्थोको सामर्थ्य देनेवाले शिवको नमस्कार
हे । समस्त प्राणियोके पालक भगवान् भूतनाथको
नमस्कार हे। प्रभो! आप हाथमे पिनाक धारण
करते हे । आपको नमस्कार हेै। त्रिशूलसे शोभित
हाथवाले आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण भूत
आपके स्वरूप हँ, आपको नमस्कार है । जगत्के
अनेक रूप आपके ही रूप ह। आप निर्गुण
परमात्माको नमस्कार है। ध्यानस्वरूप आपको
नमस्कार हे । ध्यानके साक्षी आपको नमस्कार है
ध्यानमें सम्यक् रूपसे स्थित आपको नमस्कार है
तथा ध्यानसे ही अनुभवमें आनेवाले आपको
नमस्कार है। जो अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित
होनेवाले, महात्मा, परमज्योतिःस्वरूप तथा सनातन
हँ, तत्त्वज्ञ पुरुष जिन्हें मानवनेत्रोको प्रकाश
देनेवाले सूर्य कहते है, जो उमाकान्त, नन्दिकेश्वर,
नीलकण्ठ, सदाशिव, मृत्युञ्जय, महादेव, परात्पर
एवं विभु कहे जाते हँ, परब्रह्म ओर शब्दब्रह्म
जिनके स्वरूप हँ, उन समस्त जगत्के कारणभूत
परमात्माको मैं प्रणाम करता हूं। प्रभो! आप
जटाजूट धारण करनेवाले हँ, आपको नमस्कार
है। जिनसे समुद्र, नदिया, पर्वत, गन्धर्व, यक्ष,
असुर, सिद्ध-समुदाय, स्थावर-जङ्गम, बडे-छोरे,
सत्-असत् तथा जड ओर चेतन- सवका प्रादुर्भाव
हुआ है, योगी पुरुष जिनके चरणारविन्दोमें
नमस्कार करते है, जो सबके अन्तरात्मा, रूपहीन
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पूर्वभाग-प्रथम पाद
७९
एवं ईश्वर हें, उन स्वतन्त्र एक तथा गुणियोके
गुणस्वरूप भगवान् शिवको में बार-बार
करता हू, बार-बार मस्तक ज्जुकाता हूं।
सब लोगोका कल्याण करनेवाले महादेव
भगवान् शंकर इस प्रकार अपनी स्तुति सुनकर,
जिनकी तपस्या पूर्णं हो चुकी ठै, उन राजा
भगीरथके आगे प्रकट हुए । उनके पाच मुख ओर
दस भुजां हे । उन्होने अर्धचन्द्रका मुकुट धारण
कर रखा हे । उनके तीन नेत्र है । एक-एक अङ्गसे
उदारता टपकती है। उन्होने सर्पका यज्ञोपवीत
पहन रखा हे । उनका वक्षःस्थल विशाल तथा
कान्ति हिमालयके समान उज्वल हे । गजचर्मका
वस्त्र पहने हए उन भगवान् शिवके चरणारविन्द
समस्त देवताओंद्वारा पूजित हो रहे हैँ । नारदजी !
भगवान् शिवको इस रूपमे उपस्थित देख राजा
भगीरथ उनके चरणके आगे दण्डकी भाति
पृथ्वीपर गिर पड। फिर सहसा उठकर उन्होने
भगवान्के सम्मुख हाथ जोड ओर उनके महादेव
तथा शंकर आदि नामोंका कीर्तन करते हए प्रणाम
किया। राजाकी भक्ति जानकर चन्द्रशेखर भगवान्
शिव उनसे बोले-“ राजन्! मे बहुत प्रसन्न हूं।
तुम इच्छानुसार वर मोगो। तुमने स्तोत्र ओर
तपस्याद्वारा मुञ्चे भलीभोति संतुष्ट किया है।'
भगवान् शिवके एेसा कहनेपर राजाका हदय
प्रसन्नतासे खिल उठा ओर वे हाथ जोड़कर
जगदीश्वर शिवसे इस प्रकार बोले।
भगीरथने कहा- महेश्वर! यदि मं वरदान
देकर अनुगृहीत करने योग्य होऊं तो हमरे
पितरोको मुक्तिके लिये आप हमें गङ्गा
प्रदान करें।
भगवान् शिव बोले-- राजन्! मेने तुम्हें गङ्गा
दे दी। इससे तुम्हारे पितरोंको उत्तम गति प्राप्त
| होगी ओर तुम्हें भी परम मोक्ष मिलेगा।
यों कहकर भगवान् शिव अन्तरधनि हो गये।
तत्पश्चात् जराजूटधारी भगवान् शिवको जटासे
नीचे आकर जगत्को एकमात्र पावन करनेवाली
गङ्गा समस्त जगत्को पवित्र करती हुई राजा
भगीरथके पीछे-पीछे चलीं । मुने! तवसे परम
निर्मल पापहारिणी गद्भादेवी तीनों लोकोमें ' भागीरथी '
के नामसे विख्यात हुई । सगरके पुत्र पूर्वकालपें
अपने ही पापके कारण जहाँ दग्ध हुए थे, उस
स्थानको भी सरिताओमं श्रेष्ठ गङ्गाने अपने जलसे
प्लावित कर दिया। सगर-पुत्रोंकी भस्म ज्यों ही
गङ्गाजलसे प्रवाहित हुई, त्यों ही वे निष्पाप हो
गये । पहले जो नरके दूबे हुए थे, उनका गङ्खाने
उद्धार कर दिया। पूर्वकालमें यमराजने अत्यन्त
कुपित होकर जिन्हं बड़ी भारी पीडादीथी, वे
ही गङ्काजीके जलसे (उनके शरीरकी भस्म)
आप्लावित होनेके कारण उन्हीं यमराजके द्वारा
पूजित हए । सगर-पुत्रोको निष्पाप समञ्चकर यमराजने
उन्हें प्रणाम किया ओर विधिपूर्वक उनकी पूजा
करके प्रसन्नतापूर्वक कहा--' राजकुमारो ! आपलोग
अत्यन्त भर्यकर् नरकसे उद्धार पा गये। अब इस
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७२
विमानपर बैठकर भगवान् विष्णुके धाममें
जाइये ।' यमराजके एेसा कहनेपर वे पापरहित
महात्मा दिव्य देह धारण करके भगवान् विष्णुके
लोकमें चले गये । भगवान् विष्णुके चरणों के
अग्रभागसे प्रकट हई गङ्काजीका एेसा प्रभाव
हे । महापातकोका नाश करनेवाली गङ्गा सम्पूर्ण
संक्षिप्त नारदपुराण
लोकोमें विख्यात हैँ । यह पवित्र आख्यान
महापातकोंका नाश करनेवाला है। जो इसे
पदता अथवा सुनता है, वह गङ्गास्रानका फल
पाता है। जो इस पवित्र आख्यानको ब्राह्यणके
सम्मुख कहत है, वह भगवान् विष्णुके
पुनरावृत्तिरहित धाममें जाता हे।
मार्गशीषं माससे लेकर कार्तिक मासपर्यन्त उद्यापनसहित शुक्लपक्षके
द्वादशीव्रतका वर्णन
ऋषि बोले- महाभाग सूतजी ! आपको साधुवाद
है । आपका हदय अत्यन्त दयालु है । आपने कृपा
करके सब पापोका नाश करनेवाला उत्तम गङ्गा
माहात्म्य हमें सुनाया है। यह गङ्गा- माहात्म्य
सुनकर देवर्षिं नारदजीने मुनिश्रेष्ठ सनकजीसे कोन-
सा प्रश्न किया? यह बताइये ।
सूतजीने कहा- आप सव ऋषि सुनें । देवर्षि
नारदने फिर जिस प्रकार प्रश्न किया था, वह
बतलाऊगा।
नारदजी बोले- मुने! आप भगवान् विष्णुके
उन त्रतोका वर्णन कीजिये, जिनका अनुष्ठान
करनेसे भगवान् प्रसन्न होते ह। जो भगवत्-
सम्बन्धी त्रत, पूजन ओर ध्यानमें तत्पर हो
भगवान्का भजन करते है, उनको भगवान् विष्णु
मुक्ति तो अनायास ही दे देते हँ, पर वे जल्दी
किसीको भक्तियोग नहीं देते। मुनिश्रेष्ठ! आप
भगवान् विष्णुके भक्त ह । प्रवृत्तिमार्गं ओर निवृत्तिमार्ग-
सम्बन्धी जो कर्म भगवान् श्रीहरिको प्रसन्न करनेवाला
हो, उसका मुञ्जसे वर्णन कीजिये ।
श्रीसनकजीने कहा- मुनिश्रेष्ठ ! बहुत अच्छा,
बहुत अच्छा। तुम भगवान् पुरुषोत्तमके भक्त हो,
इसीलिये बार-बार उन शार्द्धधन्वा--श्रीहरिका
चरित्र पृते हो । में तुम्हे उन लोकोपकारी त्रतोका
उपदेश करता हू, जिनसे भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होते
हे ओर साधकको अभय-दान देते हें । जिस पुरुषपर
यज्ञस्वरूप भगवान् जनार्दनकौ प्रसन्नता हो जाती है
उसे इहलोक ओर परलोकमें सुख मिलता है तथा
उसके तपकी वृद्धि होती हे । महर्षिगण कहते हे कि
जिस किसी उपायदवारा भी जो लोग भगवान्
विष्णुकी आराधनामें लगे रहते हे, वे परम पदको
प्राप्त होते हें । मार्गशीर्ष मासमे शुक्लपक्षकी द्वादशीको
उपवास करके मनुष्य श्रद्धापूर्वकं जलशायी भगवान्
नारायणकी पूजा करे। मुनिश्रेष्ठ । पहले दन्तधावन
करके स्नान करे, फिर श्चेतवस्त्र धारण करके मौन
हो गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप ओर नैवेद्य आदि
उपचारोद्वारा भक्ति-भावसे श्रीहरिका पूजन करना
चाहिये । * केशवाय नमस्तुभ्यम्" (केशव ! आपको
नमस्कार है1)-इस मन्त्रद्रारा श्रीविष्णुकी पूजा
करनी चाहिये। उसी मन्त्रसे प्रज्वलित अग्रिमं
घृतमिश्चित तिलको एक सौ आठ आहुति देकर
भगवान् शालग्रामके समीप रातमें जागरण करे । उस
रात्रिमं ही सरभर दूधसे रोग-शोकरहित भगवान्
श्रनारायणको स्नान करावे ओर गीत-वाद्य, नैवेद्य,
भक्षय तथा भोज्यपदार्थोद्रारा महालक्ष्मीसहित उन
भगवान् नारायणका भक्तिपूर्वक तीन समय पूजन
करे। फिर सवेरे उठकर यथावश्यक शोच-स्रानादि
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पूर्वभाग-प्रथम पाद
७२
कर्म करके पूर्ववत् मन-इन्द्रियोको संयममें रखते
हुए मौनभावसे पवित्रतापूर्वक भगवान्की
करे। उसके बाद निम्नाङ्कित मन्त्रसे दक्षिणासहित
घृतमिश्चित खीर ओर नारियलका फल भक्तिपूर्वकं
ब्राह्मणको अर्पित करे-
केशवः केशिहा देवः सर्वसम्पत्प्रदायकः ॥
परमान्नप्रदानेन मम स्यादिष्टदायकः।
(ना० पूर्व° १७। २१-२२)
"जिन्होने केशी दैत्यको मारा है तथा जो सव
प्रकारकी सम्पत्ति देनेवाले है, वे भगवान् केशव
यह उत्तम अन्न दान करनेसे मेरे लिये अभीष्ट
वस्तुको देनेवाले हों ।'
तदनन्तर अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणभोजन
करावे। उसके बाद भगवान् नारायणका चिन्तन
करते हुए मौन होकर स्वयं भी भाई-बन्धुओंसहित
भोजन करे। इस प्रकार जो भक्ति-भावसे भगवान्
केशवकी उत्तम पूजा करता है, वह आठ पौण्डरीक
यज्ञके समान फल पाता है । पौष मासके शुक्लपक्षको
द्वादशी तिथिको उपवास करके "नमो नारायणाय
इस मन्त्रसे पवित्रतापूर्वक श्रीहरिका पूजन करे।
दूधसे भगवान्को नहलाकर खीरका नैवेद्य अर्पण
करे। रातमें तीनों समय श्रीहरिकी पूजाम संलग्र
रहकर जागता रहे । गन्ध, मनोरम पुष्प, धूप, दीप,
नैवेद्य, नृत्य, गीत-वाद्य आदि तथा स्तोत्रोद्रारा
श्रीहरिकी अर्चना करे। सबेरेको पूजाके पश्चात्
घृत ओर दक्षिणासहित खिचडी ब्राह्यणको दे।
(उस समय निम्राह्कित मन्त्र पढना चाहिये- )
सर्वात्मा सर्वलोकेशः सर्वव्यापी सनातनः।
नारायणः प्रसन्नः स्यात् कृशरात्नप्रदानतः॥
(ना० पूर्वः १७। २८)
"जो सवके आत्मा, सम्पूर्ण लोकोके ईश्वर तथा
सर्वत्र व्यापक रहै, वे सनातन भगवान् श्रीनारायण
यह खिचडी दान करनेसे मुञ्चपर प्रसन्न ही ।'
इस मन्त्रसे ब्राह्मणको उत्तम दान देकर यथाशक्ति
ब्राह्मणोंको भोजन करावे। फिर स्वयं बन्धु-
वान्धवोंसहित भोजन करे । जो इस प्रकार भक्तिपूर्वक
भगवान् नारायणदेवका पूजन करता है, वह आठ
अग्निष्टोम यज्ञोका सम्पूर्ण फल प्राप्त कर लेता है।
माघ शुक्ला द्वादशीको भी पूर्ववत् उपवास करके
' नमस्ते माधवाय" इस मन्त्रसे अग्रिमे आठ वार
घीको आहुति दे। उस दिन पूर्ववत् सेरभर दूधसे
भगवान् माधवको सान करावे। फिर ॒चित्तको
एकाग्र करके गन्ध, पुष्प ओर अक्षत आदिसे
पहलेको तरह तीनों समय भक्तिपूर्वक पूजन करते
हुए रातमे जागरण करे। तत्पश्चात् प्रातःकालका
कृत्य समाप्त करके पुनः श्रीमाधवको अर्चना करे ।
अन्तमें सब पापोंसे छुटकारा पानेके लिये वस्त्र
ओर दक्षिणासहित सेरभर तिल ब्राह्मणको इसं
मन्त्रसे दान करे-
माधवः सर्वभूतात्मा सर्वकर्मफलप्रदः।
तिलदानेन महता सर्वान् कामान् प्रयच्छतु ॥
(ना० पूर्व० १७1 ३५)
' सम्पूर्ण कर्मोका फल देनेवाले तथा समस्त
भूतोके आत्मा भगवान् लक्ष्मीपति तिलके
इस महादानसे प्रसन्न होकर मेरी सब कामना
पूरी करे ।'
इस मन््रसे भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको तिल दानं
देकर भगवान् माधवका स्मरण करते हुए यथाशक्ति
ब्राह्मणोको भोजन कराये। मुने! जो इस प्रकार
भक्ति-भावसे तिलदानयुक्त त्रत करता है, वह सौ
वाजपेय यक्ञके सम्पूर्णं फलको प्राप्त कर लेता है।
फाल्गुनके शुक्लपक्षमें द्वादशीको उपवास करके
व्रती पुरुष गोविन्दाय नमस्तुभ्यम्" इस मन्त्रसे
भगवान्का पजन करे ओर घृतमिश्चित तिलकी
एक सी आठ आहुति देकर पूर्वोक्तं मानके
अनुसार एक सेर् दृधसे पवित्रतापूर्वक भगवान्
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७
गोविन्दको स्नान करावे। पूर्ववत् रातमें जागरण
ओर तीनों समय पूजा करे। फिर प्रातःकालका
शोच, सान आदि कर्म पूरा करके पुनः भगवान्
गोविन्दको पूजा करनी चाहिये । तत्पश्चात् वस्त्र
ओर दक्षिणासहित एक आढक (चार सेर) धान
ब्राह्मणको दे ओर निम्रा्धित मन्त्रका पाठ करे-
नमो गोविन्द सर्वेश गोपिकाजनवल्यभ ॥
अनेन धान्यदानेन प्रीतो भव जगदगुरो ।
(ना० पूर्व १७। ४१-४२)
“गोविन्द! सर्वे श्वर ! गोपाङ्गनाओके प्राणव्छभ ।
जगद्गुरो! इस धान्यके दानसे आप मुद्र
प्रसन्न हों ।'
इस प्रकार भली भोति व्रतका पालन करके
मनुष्य सम्पूर्णं पापोंसे मुक्त हो जाता है ओर महान्
यज्ञका पूरा पुण्य प्राप्त कर लेता है।
चैत्र मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको
उपवास करके पहले बताये अनुसार ' नमोऽस्तु
विष्णवे तुभ्यम्'- इस मन्त्रसे भगवान्कौ पूजा
करे । पूर्ववत् एक सेर दूधसे भगवान् विष्णुको
स्नान करावे। विघ्रवर! यदि शक्ति हो तो उसी
संक्षिप्त नारदपुराण
प्रकार सेरभर घीसे भी आदरपूर्वक भगवान्को
नहलावे तथा रातमें भी पहलेको तरह जागरण
ओर पूजन करे। तदनन्तर सबेरे उठकर प्रातः-
कालके आवश्यक कर्म पूरा करके मधु, घी ओर
तिलमिश्रित हवन-सामग्रीको एक सौ आठ आहुति
दे। उसके बाद ब्राह्मणको दक्षिणासहित एक
आढक (चार सेर) चावल दान करे। (मन्त्र इस
प्रकार है--)
प्राणरूपी महाविष्णुः प्राणदः सर्ववल्छभः ॥
तण्डुलाढकदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः।
(१७ ४७-४८)
' भगवान् महाविष्णु प्राणस्वरूप हें। वे ही
सबके प्रियतम ओर प्राणदाता हें । इस एक आढक
चावलके दानसे वे भगवान् जनार्दन मुञ्जपर
प्रसन्न हों।'
इस प्रकार भक्तिभावसे ब्रतका पालन करके
मनुष्य सव पापोंसे मुक्त हो जाता है ओर
अत्यग्निष्टोम यक्ञके आठगुने फलको पाता हे।
वैशाख शुक्ला द्रादशीको उपवास करके
भक्तिपूर्वक देवेश्वर मधुसूदनको द्रोण (कलश)
परिमित दूधसे स्नान करावे तथा रातमें तीन समय
पूजन करते हुए जागरण करे। मधुसूदनकी विधिपूर्वक
पूजा करके "नमस्ते मधुहन्त्रे - इस मन्त्रसे घीकौ
एक सौ आठ आहुतिका होम करे । घीका उपयोग
अपनी शक्तिके अनुसार करे। इससे पापरहित
होकर मनुष्य आठ अश्वमेध यज्ञोका फल पाता हे।
ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको उपवास
करके एक आढक (चार सेर) दूधसे भगवान्
त्रिविक्रमको स्नान करावे ओर ' नमस्त्रिविक्रमाय' इस
मन्त्रसे भक्तिपूर्वक भगवानूका पूजन करे। खीरको
एक सौ आठ आहुति देकर होम करे। फिर रातमें
जागरण करके भगवानूको पूजा करे। फिर प्रातः कृत्य
करके पृजनके पथात् ब्राह्मणको दक्षिणासहित बीस
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661011. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद्
७५
पूञआ दान करे। (दानका मन्त्र इस प्रकार है-
देवदेव जगन्नाथ प्रसीद परमेश्वर॥
उपायनं च संगृह्य ममाभीष्टप्रदो भव।
(ना० पूर्व १७। ५५-५६)
"देवदेव ! जगन्नाथ! परमेश्वर! आप मुञ्चपर
प्रसन्न होइये ओर यह भेट ग्रहण करके मेरे
अभीष्टको सिद्धि कौजिये।'
तत्पश्चात् यथाशक्ति ब्राह्यणोको भोजन करावे
ओर उसके बाद स्वयं भी मौन होकर भोजन करे।
ब्रह्मन्! जो इस प्रकार भगवान् त्रिविक्रमका त्रत
करता हे, वह निष्पाप हो आठ यज्ञोका फल
पाता हे।
आषाढ शुक्ला द्वादशीको उपवास-त्रत करनेवाला
जितेन्द्रिय पुरुष पूर्ववत् एक आढक (चार
सेर) दूधसे वामनजीको स्नान करावे। ' नमस्ते
वामनाय '- इस मन्त्रसे दूर्वा ओर घीकी एक सौ
आठ आहुति देकर रातमें जागरण ओर वामनजीका
पूजन करे । दक्षिणासहित दही, अनन ओर नारियलका
फल वामनजीकी पूजा करनेवाले ब्राह्मणको भक्तिपूर्वक
अर्पण करे। (मन्त्र इस प्रकार है-)
वामनो बुद्धिदो होता द्रव्यस्थो वामनः सदा।
तामनस्तारक्छोऽस्माच्च वामनाय नमो नमः॥
(ना० पूर्व° १७। ६१)
"वामन वबुद्धिदाता हं। वे ही होता है ओर
दरव्यम भी सदा वामनजी स्थित रहते हे । वामन
ही इस संसार-सागरसे तारनेवाले हँ । वामनजीको
वार-वार नमस्कार है।'
इस मन्त्रसे दही-अन्नका दान करके यथाशक्ति
ब्राह्मणको भोजन करावे। एेसा करके मनुष्य सौ
अग्निष्टोम यज्ञोका फल पा लेता हे।
श्रवण मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिधिको
उपवास करनेवाला व्रती मधुमिश्रित दूधस भगवान्
श्रीधरको सान करावे ओर "नमोऽस्तु श्रीधराव'-
इस मन्त्रसे गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि सामग्रियेद्रारा
क्रमशः पूजन करे । मुने! तत्पश्चात् दही मिले हए
घीसे एक सौ आठ आहुति दे। फिर रातमें जागरण
करके पूजाकौ व्यवस्था करे ओर ब्राह्मणको परम
उत्तम एक आढक (चार सेर) दूध दान करे।
विप्रवर! साथ ही सम्पूर्णं कामनाओंकी सिद्धिके
लिये वस्त्र ओर दक्षिणासहित सोनेके दो कुण्डल
भी निग्नाङ्भित मन्त्रसे अर्पण करे।
क्षीराव्धिशायिन् देवेश रमाकान्त जगत्पते।
क्षीरदानेन सुप्रीतो भव सर्वसुखप्रदः॥
(ना० पूर्व १७। ६७)
'क्षीरसागरमें शयन करनेवाले देवेश्वर!
लक्ष्मीकान्त । जगत्पते! इस दुग्धदानसे आप अत्यन्त
प्रसन्न हो सम्पूर्ण सुखोके दाता होडये ।'
ब्राह्मणभोजन सुख देनेवाला है, इसलिये व्रती
पुरुष यथाशक्ति भोजन करावे । एेसा करनेसे एक
हजार अश्वमेध यज्ञोका फल प्राप्त होता है।
भाद्रपद मासके शुक्लपक्षको द्वादशी तिथिको
उपवास करके एक द्रोण (कलश) दृधसे जगद्गुरु
भगवान् हपीकेशको स्नान करावे। “हृषीकेश
नमस्तुभ्यम्" इस मन्त्रसे मनुष्य भगवान्का पूजन
करे । फिर मधुमिश्चरित चरुसे एक सौ आठ आहति
दे। फिर पूर्ववत् जागरण आदि कार्य सम्पन्न
करके आत्मज्ञानी ब्राह्मणको डट् आढक (छः
सेर) गेहूं ओर यथाशक्ति सुवर्णकी दक्षिणा दे।
(मन्त्र इस प्रकार है-- )
हृषीकेश नमस्तुभ्यं सर्वलोकैकहेतवे।
मह्यं सर्वसुखं देहि गोधूमस्य प्रदानतः ॥
(ना० पूर्त॑° १७। ५२)
" इन्द्ियोके स्वामी भगवान् हषीकेश! आप
सम्पूर्णं लोकोके एकमात्र कारण दहै । आपको
नमस्कार टै। इस गोधूम-दानसे प्रसन्न हौ आप
मुञ्चे सव प्रकारके सुख दीजिये ।'
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
७६
संक्षि नारदपुराण
तत्पश्चात् यथाशक्ति ब्राह्मणोको भोजन कराकर | भक्तिपूर्वक दे। (मन्त्र इस प्रकार है- )
स्वयं भी मौन होकर भोजन करे । एेसा करनेवाला
पुरुष सब पापोसे मुक्त हो महान् यज्षका फल
पाता हे।
आश्विन मासको शुक्ला द्वादशीको उपवास
करके पवित्र हो भक्तिपूर्वक भगवान् पद्मनाभको
दूधसे स्नान करावे । फिर ' नमस्ते पद्मनाभाय '- इस
मन््रसे यथाशक्ति तिल, चावल, जौ ओर घृतद्वारा
होम एवं विधिपूर्वक पूजन करे । रातमें जागरणका
कार्यं सम्पन्न करके पुनः पूजन करे ओर ब्राह्मणको
दक्षिणासहित एक पाव मधु दान करे । (मन्त्र इस
प्रकार है-)
पदानाभ नमस्तुभ्यं सर्वलोकपितामह।
मधुदानेन सुप्रीतो भव सर्वसुखप्रदः॥
(ना० पूर्व० १७। ७७)
सम्पूर्णं लोकोंके पितामह पद्मनाभ] आपको
नमस्कार हे। इस मधुदानसे अत्यन्त प्रसन्न हो
आप हमें सम्पूर्णं सुख प्रदान करे ।'
जो उत्तम वुद्धिवाला पुरुष इस प्रकार भक्तिभावसे
पद्मनाभ-त्रतका पालन करता है, उसे निश्चय ही
एक हजार महान् यज्ञोका फल प्राप्त होता ठे ।
कातिक शुक्ला द्वादशीको उपवास करके
जितिन्द्रिय पुरुष एक आढक (चार सेर) दूध, दही
अथवा उतने ही घीसे भक्तिपूर्वक भगवान् दामोद्रको
स्नान करावे। स्नान करानेका मन्त्र है-" ॐ नमो
दामोदराय।' उसीसे मधु ओर घी मिलाये हए
तिलको एक सौ आठ आहुति दे। फिर संयम-
नियमपूर्वक तीनों समय श्रीहरिकी पूजामें तत्पर
हो रातमें जागरण करे ओर प्रातःकाल आवश्यक
कृ्योसे निवृत्त हो मनोरम कमलके फूलोद्रारा
भगवान्को पूजा करे। उसके बाद धृतमिश्ित
तिलोके द्वारा पुनः एक सौ आठ आहति दे ओर
पोच प्रकारके भक्ष्य पदार्थोसि युक्त अन्न ब्राह्मणको
दामोदर जगन्नाथ सर्वकारणकारण।
त्राहि मां कृपया देव शरणागतपालक ॥
(ना० पूर्व० १७। ८३)
` दामोदर! जगन्नाथ! आप समस्त कारणोके
भी कारण हें । शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले देव।
कृपया मेरी रक्षा कीजिये ।'
इस प्रकार कुटुम्बयुक्त श्रोत्रिय ब्राह्मणको दान
ओर यथाशक्ति दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंको भी
भोजन करावे। इस प्रकार त्रतका विधिपूर्वक
पालन करके अपने बन्धुजनोंके साथ स्वयं भी
भोजन करे। इससे वह दो हजार अश्मेधयज्ञोका
फल पाता हे।
मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार ब्रतका पालन करनेवाला
जो पुरुष परम उत्तम द्वादशी-व्रतका एक वर्षतक
पूर्वोक्तं विधिसे अनुष्ठान करता है, वह परम
पदको प्राप्त होता हे। जो एक मास यादो मासमे
भक्तिपूर्वक उक्त ब्रतका पालन करता है, वह
उस-उस महीनेके बताये हुए फलको पाता है
ओर हरिके. परम पदको प्राप्त हो जाता है।
मुनी र! व्रती पुरुषको चाहिये कि वह एक वर्ष
पूरा करके मार्गशीर्षं मासके शुक्लपक्षमें द्वादशी
तिथिको त्रतका उद्यापन करे। प्रातःकाल शोचादिसे
निवृत्त हो दन्तधावन ओर सान करके नित्य कृत्य
करे। फिर शेत वस्त्र तथा शेत पुष्पोंकी माला
धारण करे । श्वेत चन्दनका अनुलेपन करे। घरके
आओगनमें एक दिव्य चौकोर एवं परम सुन्दर
मण्डप वनावे। उसमे घण्टा ओर चंवर यथास्थान
लगा दे। छोटी-छोरी घण्टियोंकी ध्वनिसे उस
मण्डपको सुशोभित करे। फूलोकी मालाओंसे
उसको सजावे। ऊपरसे चंदवा लगा दे ओर
ध्वजा-पताकासे भी उस मण्डपको विभूषित करे।
वह मण्डप श्वेत वस्त्रसे आच्छादित तथा दीपमालाओस
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 8181185 (01661010. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
७७
आच्छादित होना चाहिये। उसके मध्यभागं
सर्वतोभद्रमण्डल बनाकर उसे विविध रसि भलीभोति
अलंकृत करे। सर्वतोभद्रके ऊपर जलसे भरे हए बारह
घडे रखे। भलीभोति शुद्ध किये हुए एक ही श्रेत
वस्त्रसे उन सभी कलशोको टंक दे। वे सब कलश
पञ्चरतसे युक्त होने चाहिये । ब्रह्य! त्रती पुरुष अपनी
शक्तिके अनुसार सोने, चांदी अथवा तोबेकी भगवान्
लक्ष्मीनारायणको प्रतिमा बनावे ओर उसे मन ओर
इद्िर्योको संयमे रखते हुए कलशके ऊपर स्थापित
करे। द्विजश्रेष्ठ! जो प्रतिमा न बना सके, वह अपनी
शक्तिके अनुसार सुवर्णं अथवा उसका मूल्य वहां चदा
दे। बुद्धिमान् पुरुष सभी त्रतेमिं उदार रहे। धनकी
कंजूसी न करे। यदि वह कृपणता करता हे तो उसकी
आयु ओर धन-सम्पत्तिका क्षय होता है । पहले
शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले रोग-शोकसे
रहित भगवान् लक्ष्मीनारायणका ध्यान करके उन्हं
भक्तिमूर्वक पञ्चामृतसे स्नान करावे। फिर केशव आदि
नामोसे उनके लिये भिन्न-भित्न उपचार चदावे। रातमें
पुराण-कथा-श्रवण आदिके द्वारा जागरण करे। निद्राको
जीते ओर उपवासपूर्वक जितेनद्धिय-भावसे रहकर
अपने वैभवके अनुसार रातके प्रथम, द्वितीय ओर तृतीय
प्रहरके अन्तमं तीन बार भगवानूकी पूजा करे। तदनन्तर
प्रातःकाल उठकर सबेरेके शेच-स्नान आदि आवश्यक
कृत्य पुरे करके ब्राह्मणोदारा व्याहतिमन्रसे तिलको
एक हजार आहुतियां दिलावे। उसके बाद क्रमशः
गन्ध, पुष्प आदि उपचारसे पुनः भगवानूकी पूजा करे
तथा भगवानूके समक्ष पुराणकी कथा भी सुने। फिर
वारह ब्राह्यणो मेसे प्रत्येकको दस-दस पञ,
घृत, दधिसहित अत्र तथा खीर दान करे । उसके साथ
दक्षिणा भी दे। (दानका मन्त्र इस प्रकार दै- )
देवदेव जगत्राथ भक्तानुग्रहविग्रह।
गृहाणोपायनं कृष्ण सर्वाभीष्टप्रदो भव॥
(ना० पूर्व ?७॥। १०३)
` भक्तोपर कृपा के अवतार-शरीर धारण कलेवाले
देवेदव ! जगदीश्वर! श्रीकृष्ण आप यह भेट ग्रहण
कीजिये ओर मुञ्चे सम्पूर्णं अभीष्ट वस्तुं दीजिये।'
इस मन्त्रसे भगवान्को भट अर्पण करके दोनों
घुटने पृथ्वीपर टेककर ब्रती पुरुष विनयसे नतमस्तक
हो हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रार्थना करे-
नमो नमस्ते सुरराजरज
नमोऽस्तु ते देव जगन्निवास ।
कुरुष्व सम्पूर्णफलं ममाद्य
नमोऽस्तु तुभ्यं पुरुषोत्तमाय ॥
(ना° पूर्वं० १७। १०५)
' देवताओकि राजाधिराज! आपको नमस्कार है
नमस्कार है। सम्पूर्णं जगत्करे निवासस्थान नारायणदेव ।
आपको नमस्कार है। आज मेरे इस त्रतको पूर्णतः
सफल बनाइये। आप पुरुषोत्तमको नमस्कार है ।'
इस प्रकार ब्राह्मणों तथा भगवान् पुरुषोत्तमसे
प्रार्थना करे। तत्पश्चात् महालक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुको
निप्राङ्धित मन््रसे अर्ध्यं दे।
लक्ष्मीपते नमस्तुभ्यं क्षीरार्णवनिवासिने।
अर्घ्यं गृहाण देवेश लक्ष्या च सहितः प्रभो॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयञ्चक्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥
(ना० पूर्व० १७। १०७-१०८)
"लक्ष्मीपते! क्षीरसागरमं निवास करनेवाले आपकर
नमस्कार है। देवेश्वर! प्रभो! आप लक्ष्मीजीके साथ
यह अर्ध्यं स्वीकार कर । जिनके स्मरण तथा नामोच्चारण
करनेसे तप तथा यज्ञकर्म आदिमे जो त्रुटि रह गयी
हो, उसकी पूर्ति हो जाती हे, उन भगवान् अच्युतको
में शीघ्र मस्तक ज्युकाता दं ।'
इस प्रकार देवेश्वर भगवान् विष्णुस वह सव
कुछ निवेदन कर्के संयमशील व्रती पुरुष दक्षिणासहित
प्रतिमा आचार्यको समर्पित करे। उसके बाद ब्राद्यणोको
भोजन करावे ओर यथाशक्ति दक्षिणा दे । फिर स्वयं
((-0. 1\॥८11114/5511॥1 8118 8/1 \/8181185। (01661010. 01411260 0 60810011
७८ संक्षिप्त नारदपुराण
भी बन्धुजनोके साथ मौन होकर भोजन करे । फिर | तथा सब पापोंसे मुक्त ठो अपनी इक्ीस पीदियोके
सायंकालतक विद्धानोके साथ बैठकर भगवान् | साथ भगवान् विष्णुके धाममें जाता है, जहाँ
विष्णुको कथा स्ुने। नारदजी ! जो मनुष्य इस | जाकर कोई शोकका सामना नहीं करता। ब्रह्मन्
प्रकार द्वादशी-तव्रत करता हे, वह इहलोक ओर | जो इस उत्तम द्वादशी -व्रतको पढ़ता अथवा सुनता
परलोकमे सम्पूर्णं कामनाओंको प्राप्त कर लेता हे । है, वह मनुष्य वाजपेय यज्ञका फल पाता हे।
7 7 |
मार्गशीष-पूर्णिमासे आरम्भ होनेवाले लक्ष्मीनारायण-व्रतकी उद्यापनसहित
विधि ओर महिमा
श्रीसनकजी कहते है- मुनिश्रेष्ठ! अब में दूसरे
उत्तम त्रतका वर्णन करता हूं सुनिये। वह सब पापौको
दूर कसलेवाला, पुण्यजनक तथा सम्पूर्णं ॒दुःखोका
नाशक हे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र तथा स्त्री-इन
सबको समस्त मनोवाज्छित कामनाओंको सफल
करनेवाला तथा सम्पूर्ण व्रतोका फल देनेवाला है । उस
त्रतसे वुरे-बुरे स्वघ्रोका नाश हो जाता है। वह
धर्मानुकूल त्रत दुष्ट ग्रहोंको बाधाका निवारण
करनेवाला है, उसका नाम हे पर्णिमात्रत। वह परम
उत्तम तथा सम्पूर्ण जगते विख्यात हि। उसके
पालनसे पापोकी करोड़ों राशियां न्ट हो जाती है।
मार्गशीर्षं मासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथिको
संयम-नियमपूर्वक पवित्र हो शास्त्रीय आचारके 4“
अनुसार दन्तधावन पूर्वक स्नान करे; फिर शेत वस्त्र | पुष्प आदि उपचारोद्रारा भक्ति-तत्पर हो भगवानूकी
धारण करके शुद्ध हो मौनपूर्वक घर आवे। वह | अर्चना करे ओर एकाग्रचित्त हो वह गीत, वाद्य, नृत्य,
हाथ-पेर धोकर् आचमन करके भगवान् नारायणका | पुराण-पाठ तथा स्तोत्र आदिके द्वार श्रीहरिकी आराधना
स्मरण करे ओर संध्या-वन्दन, देवपूजा आदि | करे। भगवानके सामने चौकोर वेदी बनावे, जिसकी
नित्यकर्म करके सं कल्पपूर्वक भक्तिभावसे भगवान् | लंबाई-चौडई लगभग एक हाथ हो। उसपर गृह्य-
लक्ष्मीनारायणको पूजा करे। व्रती पुरुष “नमो | सूत्रम बतायी हई पद्धतिके अनुसार अग्निकी स्थापना
नारायणाय '--इस मन्त्रसे आवाहन, आसन तथा गन्ध, | कर ओर उसमें आज्यभागान्त होम करके पुरुषसूक्तके
0 च (व्ल (
१. अग्निस्थापनाक्के पश्चात् दाये हाथमे सुव लेकर दाहिना घटना भूमिपर रखकर ब्रह्मासे अन्वारम्भ करके घृतकी जो
चार आहतियों दौ जाती है, उनमेसे दो आहुतिर्योकी * आघार संजा है ओर शेष दो आहतिर्योको “आज्यभाग” कहते है। “प्रजापतये
स्वाहा -इस मन्रसे श्रजापतिके लिये जो धृतकी अविच्छिन्न धाय दी जाती है, वह "पर्वं आघार' है। यह अग्निके उत्तरभागमें
प्रज्वलित अग्रिमे ही छोड़ी जाती हे। इसी प्रकार अग्निके दक्षिणभागमें “इन्द्राय स्वाहा '--इस मन्त्रसे प्रज्वलित अग्रिमे इन्रके
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पूर्व भाग-प्रथम पाद
७९
मन्त्रोसे चरु, तिल तथा घृतद्वारा यथाशक्ति एक, दो,
तीन बार होम करे। सम्पूर्ण पापोंकी निवृत्तिके
लिये प्रयलपूर्वक होमकार्य सम्पन्न करना चाहिये ।
अपनी शाखाके गृह्यसूत्रमे बतायी हई विधिके
अनुसार प्रायश्चित्त आदि सब कार्य करे। फिर
विधिवत् होमको समाप्ति करके विद्वान् पुरुष
शान्तिसूक्तका जप करे । तत्पश्चात् भगवान्के समीप
आकर पुनः उनको पूजा करे ओर अपना उपवासत्रत
भक्तिभावसे भगवानूके अर्पण करे।
पौर्णमास्यां निराहारः स्थित्वा देव तवाज्ञया ।
भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष परेऽदह्धि शरणं भव ॥
(ना० पूर्व० १८। १३)
"देव! पुण्डरीकाक्ष! में पूर्णिमाको निराहार
रहकर दूसरे दिन आपको आज्ञासे भोजन करूगा।
आप मेरे लिये शरण हों ।'
इस प्रकार भगवान्को त्रत निवेदन करके
संध्याको चन्द्रोदय होनेपर पृथ्वीपर दोनों घुटने
टेककर शेत पुप्प, अक्षत, चन्दन ओर जलसहित
अर्घ्य हाथमे ले चन्द्रदेवको समर्पित करे-
्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिगोत्रसमुद्धव ।
गृहाणार्ध्यं मया दत्तं रोहिणीनायक प्रभो ॥
(ना० पूर्व° १८। १५)
" भगवन् रोहिणीपते ! आपका जन्म अत्रिकुलमं
हुआ हे ओर आप क्षीरसागरसे प्रकट हुए है । मेरे
दिये हए इस अर्घ्यको स्वीकार कीजिये ।'
नारदजी ! इस प्रकार चन्द्रदेवको अर्ध्य देकर्
पूर्वाभिमुख खड़ा हो चन्द्रमाको ओर देखते हुए
हाथ जोड़कर प्रार्थना करे-
नमः शुक्लांशवे तुभ्यं द्विजराजाय ते नमः।
रोहिणीपतये तुभ्यं लक्ष्मीश्रात्रे नमोऽस्तु ते॥
(ना० पूर्व०१८ । १७)
' भगवन्! आप त किरणोसे सुशोभित होते हं
आपको नमस्कार है। आप द्विजेकि राजा रहै
आपको नमस्कार हे। आप रोहिणीके पति हैँ
आपको नमस्कार है। आप लक्ष्मीजीके भाई है
आपको नमस्कार है।'
तदनन्तर पुराण-श्रवण आदिके द्वारा जितेन्धिय
एवं शुद्ध भावसे रातभर जागरण करे। पाखण्डियोकी
दृष्टिसे दूर रहे। फिर प्रातःकाल उठकर अपने नित्य-
नियमका विधिपूर्वक पालन करे। उसके बाद अपने
वेभवके अनुसार पुनः भगवानूकी पूजा करे। तत्पश्चात्
यथाशक्ति ब्राह्यणोको भोजन करावे ओर स्वयं भी
शुद्धचित्त हो अपने भाई-बन्धुओं तथा भृत्य आदिके
साथ भोजन करे। भोजनके समय मौन रहे। इसी
प्रकार पोष आदि महीनोमें भी पूर्णिमाको उपवास
करके भक्तियुक्तं हो रोग-शोकरहित भगवान् नारायणकी
पृजा-अर्या करे। इस तरह एक वर्षं पूग करके
कार्तिकको पूर्णिमाके दिन उद्यापन करे। उद्यापनका
विधान तुम्हं बतलाता हू! व्रती पुरुष एक परम सुन्दर
चौकोर मद्गलमय मण्डप बनवावे, जो पुष्प-लताअपे
सुशोभित तथा चंदोवा ओर ध्वजा-पताकासे सुसज्नित
हो । वह मण्डप अनेक दीपकेकि प्रकाशसे व्याप्त होना
चाहिये। उसकी शोभा बढानेके लिये छोरी-दछोटी
घण्टिकाओंसे सुशोभित लर लगा देनी चादिये।
उसमे किनारे-किनारे बड़े-बड़े शीशे ओर चवर लगा
देने चाहिये। कलशेसे वह मण्डप धिरा रहे। मण्डपके
मध्य भागमें पाच रगोसे सुशोभित सर्वतोभद्र मण्डल
वनावे। नारदजी ! उस मण्डलपर जलसे भर ह
एक कलश स्थापित करे। फिर सुन्दर एवं महीन
वस्त्रसे उस कलशको ढक दे। उसके ऊपर सोने,
चोदी अथवा तंविसे भगवान् लक्ष्मीनारायणकी परम
सुन्दर प्रतिमा बनाकर स्थापित करे। तदनन्तर जितेन्द्रिय
पुरुष भक्तिभावसे भगवान्को पञ्चामृतद्वारा स्नान
करावे ओर क्रमशः गन्ध, पुष्य, धूप, दीप आदि
॥ररराप्यातााररपरगापककाणाणाताााणायायाणयातययायायायायायागााागााकातााराययायााााााातादादायायया
लिये जो अविच्छिति पृते धाय दी जाती दै उक्र नाम “उर आचार" हे। इसके वाद अग्निक उच्य्ध-पू््धमे ' अग्रये स्वाह्'-इस
मन््रसे अग्निके लिये जो धृतकी एक आहति दी जाती है, उसका नाम अग्रिय आज्यभाग ' है ओर अग्रिके दक्षिणार्ध-पृवारधमें
"सोमाय स्वाहा'-इस मन््रसे सोमके लिये दी जानेवाली आह्तिका नाम “ सीम्य आज्यभाग" है।
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©
संक्षिप्त नारदपुराण
सामग्रियों तथा भक्ष्य, भोज्य आदि नैवेद्योद्रारा
उनको पूजा करके उत्तम श्रद्धापूर्वक रातमें जागरण
करे। दूसरे दिन प्रातः काल पूर्ववत् भगवान् विष्णुकों
विधिपूर्वक अर्चना करे। फिर दकषिणासहित प्रतिमा
आचार्यको दान कर दे ओर धन-वैभव हो तो
ब्राह्मणोको यथाशक्ति अवश्य भोजन करावे । उसके
बाद एकाग्रचित्त हो विद्वान् पुरुष यथाशक्ति तिल
दान करे ओर तिलका ही विधिपूर्वक अग्रिमं
होम करे। जो मनुष्य इस प्रकार भली भोति
लक्ष्मीनारायणका ब्रत करता हे, वह इस लोकमें
पुत्र-पौत्रोके साथ महान् भोग भोगकर सब
पापोंसे मुक्त हो अपनी बहुत-सी पीढियोंके
साथ भगवानके वैकुण्ठधाममें जाता है, जो
योगियोके लिये भी दुर्लभ हे।
0 0
श्रीविष्णुमन्दिरमे ध्वजारोपणको विधि ओर महिमा
श्रीसनकजी कहते हे- नारदजी।! अव में
ध्वजारोपण नामक दूसरे ब्रतका वर्णन करूगा, जो
सब पापको हर लेनेवाला, पुण्यस्वरूप तथा
भगवान् विष्णुकी प्रसत्नताका कारण है। जो
भगवान् विष्णुके मन्दिरमे ध्वजारोपणका उत्तम
कार्य करता हे, वह ब्रह्मा आदि देवताओद्रारा
पूजित होता है। बहुत-सी दूसरी बातें कहनेसे
क्या लाभ! जो कुटुम्बयुक्त ब्राह्मणको सुवर्णका
एक हजार भार दान देता है, उसके उस दानका
फल ध्वजारोपण-कर्मके बराबर ही होता है । परम
उत्तम गङ्गा-स्नान, तुलसीको सेवा अथवा शिवलिद्धका
पूजन-ये सब कर्म ही ध्वजारोपणको समानता
कर सकते हे । ब्रह्यन्! यह ध्वजारोपण नामक
कर्म अद्धुत है, अपूर्व है ओर आश्चर्यजनक हे ।
यह सव पापोको दूर करनेवाला है । ध्वजारोपण
कार्यमें जो-जो कार्य आवश्यक है, उन सबको
बतलाता हू, आप मेरे मुखसे सुनें ।
कार्तिक मासक शुक्लपक्षमें दशमी तिथिको
मनुष्य अपने मन ओर इन्द्रियोंको संयममें रखते
हुए, प्रयत्रपूर्वक दातुन करके स्नान करे। त्रत
करनेवाला ब्राह्मण उस दिन एक समय भोजन
करे, ब्रह्मचर्यसे रहे ओर धुले हए शुद्ध वस्त्र धारण
करके शुद्धतापूर्वक भगवान् नारायणके सामने
उन्हीका स्मरण करते हुए रातमें शयन करे।
तत्पश्चात् प्रातःकाल उठकर विधिपूर्वक स्नान ओर
आचमन करके नित्यकर्म पूर्ण करनेके अनन्तर
भगवान् विष्णुको पूजा करे । चार ब्राह्मणोके साथ
स्वस्तिवाचन करके ध्वजारोपणके निमित्त नान्दीमुख-
श्राद्ध करे । वस्त्रसहित ध्वज ओर स्तम्भका गायत्री-
मन्त्रद्वारा प्रोक्षण (जलसे अभिषेक) करे। फिर
उस ध्वजके वस्त्रमे सूर्य, गरुड ओर चन्द्रमाकौ
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पूर्वभाग-प्रथम पाद
८१
विशेषतः श्रेत पुष्पोंसे पूजन करना चाहिये।
तदनन्तर गोचर्म बराबर एक वेदी बनाकर उसे
जल ओर गोबरसे लीपे। फिर अपनी शाखाके
गृह्यसूरत्रमे बतलायी हई विधिके अनुसार पञ्चभू-
संस्कारपूर्वक अग्रिको स्थापना करके क्रमशः
आघार ओर आज्य-भाग आदि होमकार्य करे।
फिर घृतमिश्रित खीरकौ एक सो आठ आहुति दे।
यह आहुति प्रधान देवता भगवान् विष्णुके अष्टाक्षर-
मन्त्रसे देनी चाहिये । (यथा ' ॐ नमो नारायणाय
स्वाहा ।') ब्रह्मन्! इसके वाद पुरुषसूक्तके प्रथम
म्र, विष्णोर्नुकम्, इरावती, वैनतेयाय स्वाहा,
सोमो" धेनुम् ओर उदुत्यं जातवेदसम्+-इन मनत्रोसे
क्रमशः आठ-आठ आहुति अग्रिमे डाले । तत्पश्चात्
वहां यथाशक्ति ' विभ्राड् वृहत् पिबतु सोम्यं मधु '
इत्यादि (यजु० ३३। ३०) सूर्यदेवतासम्बन्धी
मन्त्रों तथा “शं नो मित्रः शं वरुणः ' (यजु° ३६।
९) इत्यादि शान्तिसूक्तके मन्त्रोका पाठ या जप
करे ओर पवित्रतापूर्वक भगवान् विष्णुके समीप
रात्रिमें जागरण करे । दूसरे दिन प्रातःकाल नित्यकर्म
समाप्त करके गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा क्रमशः
पहलेकी तरह ही भगवान्की पूजा करनी चाहिये ।
तदनन्तर उस सुन्दर ध्वजको मद्गलवाद्य, सूक्तपाठ,
स्तोत्रगान ओर नृत्य आदि उत्सवके साथ भगवान्
विष्णुके मन्दिरमे ले जाय। नारदजी ! भगवान्के
द्वारपर अथवा मन्दिरके शिखरपर खम्भेसहित उस
ध्वजको प्रसत्रतापूर्वक दृटढृताके साथ स्थापित
करे। फिर गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप आदि
मनोहर उपचारो तथा भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थयुक्त
नवेद्योसे भगवान् विष्णुकी पूजा करे । इस प्रकार
उत्तम एवं सुन्दर ध्वजको देवालयमें स्थापित
करके परिक्रमा करे।
इसके वाद भगवान्के सामने इस स्तोत्रका
पाठ करे। पुण्डरीकाक्ष! कमलनयन! आपको
नमस्कार है। विश्वभावन! आपको नमस्कार है।
हषीकेश। महापुरुष ! सबके पूर्वज । आपको नमस्कार
हे। जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हआ ठै
जिनमें यह सव प्रतिष्ठित है ओर प्रलयकाल
आनेपर जिनमे ही इसका लय होगा, उन भगवान्
विष्णुकौ में शरण लेता हूं । ब्रह्मा आदि देवता भी
जिनके परम भाव (यथार्थं स्वरूप)-को नहीं
जानते ओर योगी भी जिन्हें नहीं देख पाते, उन
ज्ञानस्वरूप श्रीहरिको म वन्दना करता हूं । अन्तरिक्ष
जिनकी नाभि है, द्युलोक जिनका मस्तक है ओर
पृथ्वी जिनका चरण टे, उन विश्वरूप भगवान्को
मे प्रणाम करता हू। सम्पूर्णं दिशाएं जिनके कान
हे, सूर्य ओर चन्द्रमा जिनके नेत्र हिं तथा ऋक् ,
साम ओर यजुर्वेद जिनसे प्रकाशित हए टै, उन
ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुको में नमस्कार करता दरं ।
१. सहस्रशीर्षा पुरुपः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स॒ भूमिःसर्वतः स्पृत्वात्यतिषठदशाङ्गुलम् ॥
(यजु° ३१। १)
२. विष्णोर्नुकं वीर्य्या णि प्रबोचं यः पार्धिवानि विममे रजाईसि ! यो अस्कभायदुत्तरईसधस्थं विचक्रमाणस्त्रधोसुगायो विष्णवे त्वा ॥
( यजु° ५। १८)
३. इरावती धेनुमती टि भूतःसूयवसिनी मनवे दशस्या। व्यस्कभ्ना रोदसी विष्णवे ते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयै; स्वाहा ॥
( यज्जु° ५। १६)
४. सोमो धनु सोमो अर्वन्तमाशुःसोमो वीरं कर्मण्यं ददाति। सादन्यं विदध्यसभयं पितृश्रवणं यो ददाशदस्मै ॥
(गरज? ३४। २१)
५. उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय मर्यम् ॥ (यनु०३३। ३१)
((-0. 1/८11114<511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
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संक्षिप्त नारदपुराण
वैश्य प्रकट हए हँ ओर जिनके चरणोंसे शूद्रका
जन्म हुआ है, विद्वान् लोग मायाके संयोगमात्रसे
जिन्हें पुरुष कहते हैँ, जो स्वभावतः निर्मल,
शुद्ध, निर्विकार तथा दोषोँसे निर्लिप्त है, जिनका
कहीं अन्त नहीं हे, जो किसीसे पराजित नहीं होते
ओर क्षीरसागरम्पे शयन करते हे, श्रेष्ठ भक्तोपर
जिनकी स्रेहधारा सदा प्रवाहित होती रहती ह
तथा जो भक्तिसे ही सुलभ होते हे, उन भगवान्
विष्णुको मैं प्रणाम करता हूं। पृथ्वी आदि पोच
भूत, तन्मात्रा इन्दियँ तथा सूक्ष्म ओर स्थूल
सभी पदार्थं जिनसे अस्तित्व लाभ करते हे, सब
ओर मुखवाले उन सर्वव्यापी परमेश्वरको में
नमस्कार करता हूं। जिन्हे सम्पूर्ण लोकें
उत्तम-से-उत्तम, निर्गुण, अत्यन्त सुक्ष्म, परम
प्रकाशमय परब्रह्म कहा गया हे, उन श्रीहरिको
मे बारम्बार प्रणाम करता हू। योगीश्चरगण जिन्हें
निर्विकार, अजन्मा, शुद्ध, सब ओर रवाँहवाले
तथा ईश्वर मानते है, जो समस्त कारणतत््वोके
भी कारण हे, जो भगवान् सम्पूर्णं प्राणियोके
अन्तर्यामी आत्मा हे, यह जगत् जिनका स्वरूप
है तथा जो निर्गुण परमात्मा हैं, वे भगवान् विष्णु
मुञ्जपर प्रसन्न हों। जो मायासे मोहित चित्तवाले
अज्ञानी पुरु्षोक लिये हदयमें रहकर भी उनसे
दूर बने हए ह ओर स्ानियोंके लिये जो सर्वत्र
प्राप्त हें, वे भगवान् विष्णु मुञ्चपर प्रसन्न हों
चारः, चार, दोर, पाच ओर दो अक्षरवाले
मन्त्रोंसे जिनके लिये आहुति दी जाती है, वे
विष्णुभगवान् मुञ्धपर प्रसन्न हों। जो सानियो,
जिनके मुखसे ब्राह्मण उत्पन्न हुए है, जिनको | कर्मयोगियों तथा भक्त पुरुषोंको उत्तम गति
भुजासे क्षत्रियो कौ उत्पत्ति हुई हे, जिनके ऊरुसे | प्रदान करनेवाले हें, वे विश्वपालक भगवान्
मुञ्धपर प्रसन्न हों । जगत्का कल्याण करनेके
लिये श्रीहरि लीलापूर्वक जिन शरीरोंको धारण
करते हें, विद्वान् लोग उन सबकी पूजा करते
है, वे लीलाविग्रहधारी भगवान् मुञ्जपर प्रसन्न
हों । जानी महात्मा जिन्हें सच्विदानन्दस्वरूप
निर्गण तथा गुणोके अधिष्ठान मानते हँ, वे
भगवान् विष्णु मुञ्ञपर प्रसन्न हों।
इस प्रकार स्तुति करके भगवान् विष्णुको
प्रणाम ओर ब्राह्यणोंका पूजन करे। तत्पश्चात्
दक्षिणा ओर वस्त्र आदिके द्वारा आचार्यकौ
भी पूजा करे । विप्रवर । उसके बाद भक्तिभावसे
पूर्ण होकर यथाशक्ति ब्राह्यणोंको भोजन करावे।
फिर स्त्री-पुत्र ओर मित्र आदि बन्धुजनोंके
साथ स्वयं भी भोजन करे तथा निरन्तर भगवान्
नारायणके चिन्तनमें लगा रहे । नारदजी ! जितने
क्षणो तक उस ध्वजाकौ पताका वायुसे फहराती
रहती है, आरोपण करनेवाले मनुष्यकौ उतनी
ही पाप-राशियाँं निस्संदेह नष्ट हो जाती हँ |
महापातकोंसे युक्त अथवा सम्पूर्णं पातकोंसे दूषित
पुरुष भी भगवान् विष्णुके मन्दिरमे ध्वजा फहराकर
सब पातकोसे मुक्त हो जाता है। जो धार्मिक पुरुष
ध्वजाको आरोपित देखकर उसका अभिनन्दन
करते हँ, वे सभी अनेकों महापातकोसे मुक्त हो
जाते हें । भगवान् विष्णुके मन्दिरमे स्थापित
किया हुआ ध्वज जव अपनी पताका फहराने
लगता है, उस समय आधे पलमे ही वह उसे
आरोपित करनेवाले पुरुषके सम्पूर्ण-पापोकों नष्ट
कर देता हे।
~>
(कु च / +
१. ओश्रावय । २. अस्तु श्रौषट्। ३. यज । ४. ये यजामहे । ५. वषट्
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661011. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
८३
हरिपञ्क-त्रतक्ी विधि ओर माहात्म्य
श्रीसनकजी कहते है--नारदजी ! अव में दूसरे | अपना उपवास-त्रत भगवान्को समर्पित करे-
व्रतका यथार्थरूपसे वर्णन करता हूं सुनिये । यह त्रत
हरिपञ्चक नामसे प्रसिद्ध है ओर सम्पूर्णं लोकमिं
दुर्लभ हे। मुनिश्रेष्ठ! स्त्रियों तथा पुरुषोके सम्पूर्ण
दुःखोका इससे निवारण हो जाता है तथा यह धर्म॑
अर्थ, काम ओर मोक्षकी प्राति करनेवाला एवं सम्पूर्ण
मनोरथो ओर समस्त त्रतेकि फलको देनेवाला हे।
मार्गशीर्ष मासके शुक्लपक्षको दशमी तिथिको
मनुष्य अपने मन ओर इन्द्रियोंको संयममें रखते
हुए शोच, दन्तधावन ओर स्नान करके शास्त्रविहित
नित्यकर्म करे। फिर भली भोति देवपूजन तथा
पञ्च॒ महायज्ञोका अनुष्ठान करके उस दिन
नियमपूर्वक रहकर केवल एक समय भोजन
करे। मुनीश्वर ! दूसरे दिन एकादशीको प्रातः-
काल उठकर स्रान ओर नित्यकर्मसे निवृत्त
होकर अपने घरपर भगवान् विष्णुकी पूजा
करे। पञ्चामृतकौ विधिसे देवदेवेश्वर श्रीहरिको
स्नान करावे । तत्पश्चात् गन्ध, पुष्प आदिसे तथा
धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल ओर परिक्रमाद्वारा
उत्तम भक्तिभावके साथ क्रमशः भगवान्को अर्चना
करे । देवदेवेश्वर भगवान्की भलीभोति पूजा करके
इस मन्त्रका उच्चारण करे-
नमस्ते ज्ञानरूपाय ज्ञानदाय नमोऽस्तु ते॥
नमस्ते सर्वरूपाय सर्वसिदधिप्रदायिने।
(ना० पूर्व २१। ८-९)
“प्रभो । आप ज्ञानस्वरूप है, आपको नमस्कार
है । आप ज्ानदाता ह, आपको नमस्कार है। आप
सर्वरूप तथा सम्पूर्णं सिद्धिरयोको देनेवाले हं
आपको नमस्कार है।'
इस प्रकार सर्वव्यापी देवेश्वर भगवान् जनार्दनको
प्रणाम करके आगे बताये जानेवाले मन्त्रके द्वारा
[ 1183 ] सं० ना० पुर ४-
प्रात्र निराहारो ह्यद्यप्रभृति केशव ॥
त्वदाज्ञया जगत्स्वामिन् ममाभीष्टप्रदो भव।
(ना० पूर्व° २१। १०-११)
` सम्पूर्णं जगत्के स्वामी केशव! आपकी
आज्षासे म आजसे पांच राततक निराहार ररहूंगा।
आप मुञ्चे मेरी अभीष्ट वस्तु प्रदान करें।'
इस प्रकार भगवान्को उपवास समर्पित करके
जितेन्द्रिय पुरुष रातमें जागरण करे । मुने! एकादशी,
द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमाको इन्धियसंयम
एवं उपवासपूर्वक इसी प्रकार भगवान् विष्णुका
पूजन करना चाहिये। विप्रवर! एकादशी तथा
पूर्णिमाकी रात्रिमें ही जागरण करना चाहिये । पञ्चामृत
आदि सामग्रियोसे की जानेवाली पूजा तो पाचों दिन
समानरूपसे आवश्यक हे; परेतु पूर्णिमाके दिन
यथाशक्ति दूधके द्वारा भगवान् विष्णुको सान कराना
चाहिये । साथ ही तिलका होम ओर दान भी करना
चाहिये । तत्पश्चात् छटा दिन आनेपर अपना आश्रमोचित
कर्म करके पञ्चगव्य पीकर विधिपूर्वक श्रीहरिकीं
पूजा करे। यदि अपने पास धन हो तो ब्राह्मणोको
वेरोक-टोक भोजन करावे । तदनन्तर भाई-बन्धुभकि
साथ स्वयं भी मोन होकर भोजन करे। नारदजी ! इस
प्रकार पौषसे लेकर कार्तिकतकके महीनेमिं भी
शुक्लपक्षमे मनुष्य पूर्वोक्त विधिसे इस व्रतको करे।
इस प्रकार इस पापनाशकं व्रतको एक वर्षतक करे।
फिर मार्गशीर्षं मास आनेपर व्रती पुरुष उसका
उद्यापन करे। ब्रह्मन्! एकादशीको पहलेकी दही
भोति निराहार रहना चाहिये ओर द्वादशको एकाग्रचित्त
हो पञ्चगव्य पीना चाहिये । फिर गन्ध, पुष्प आदि
सामग्रियोसे देवदेव जनार्दनकौ भलीभाति पूजा
करके जितेन्द्रिय पुरुप ब्राह्मणको भट दे । मुनीश्वर ।
((-0. 1/८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
८४ संक्षिप्त नारदपुराण
मधु ओर घृतयुक्तं खीर, फल, सुगन्धित जलसे
भरा ओर वस्त्रसे टका हुआ पञ्चरनन ओर दक्षिणासहित
कलश अध्यात्मतत्त्वके ज्ञाता ब्राह्मणको दान करे।
(उस समय निश्राङ्कितश्रूपसे प्रार्थना करे)
सर्वात्मन् सर्वभूतेश सर्वव्यापिन् सनातन।
परमान्नप्रदानेन सुप्रीतो भव माधव॥
(ना० पूर्व २१। २३)
"सबके आत्मा, सम्पूर्ण भूतोके स्वामी, सर्वव्यापी,
सनातन माधव! आप इस उत्तम अन्रके दानसे
अत्यन्त प्रसन्न हों ।'
इस मन्त्रसे खीर दान करके यथाशक्ति ब्राह्यण-
=+»
भोजन करावे ओर स्वयं भी मौन होकर भाई-
बन्धुओंके साथ भोजन करे। जो इस हरिपञ्चक
नामक ब्रतका पालन करता हे, उसका ब्रह्मलोक
अर्थात्. परमात्माके परम धामसे कभी पुनरागमन
नहीं होता। उत्तम मोक्षको इच्छा रखनेवाले
पुरुषोंको यह त्रत अवश्य करना चाहिये । ब्रह्मन्
यह त्रत सम्पूर्ण पापरूपी दुर्गम वनको जलानेके
लिये दावानलके समान है। जो मानव भगवान्
नारायणके चिन्तनमें तत्पर हो भक्तिपूर्वक इस
प्रसंगको सुनता हे, वह महाघोर पातकोसे मुक्त
हो जाता है।
९५१ 0
मासोपवास-व्रतव्छी विधि ओर महिमा
[ ५
श्रीसनकजी कहते है- नारदजी! अव में | निराहार रहकर मासके अन्तमे आपकी आक्ञासे पारण
मासोपवास नामक दूसरे श्रष्ठ व्रतका वर्णन करूगा;
एकाग्रचित्त होकर सुनिये। वह सब पापोको हर
लेनेवाला, पवित्र॒ तथा सब लोकोका उपकार
करनेवाला है। विप्रवर! आषाढ, श्रावण, भादों
अथवा आश्विन मासमे इस तब्रतको करना चाहिये ।
इनमेसे किसी एक मासके शुक्ल पक्षम जितेन्द्रिय
पुरुष पञ्चगव्य पीये ओर भगवान् विष्णुके समीप
शयन करे। तदनन्तर प्रातःकाल उठकर नित्यकर्म
समाप्त करनेके पश्चात् मन ओर इद्दियोको वशमें
करके क्रोधरहित हो, श्रद्धापूर्वक भगवान् विष्णुकं
पूजा करे। विद्वानेकि साथ भगवान् विष्णुका यथोचित
पूजन करके स्वस्तिवाचनपूर्वक यह संकल्प करे-
मासमेकं निराहारो ह्यद्यप्रभृति केशव ।
मासान्ते पारणं कुवे देवदेव तवाज्ञया ॥
तपोरूप नमस्तुभ्यं तपसां फलदायक।
ममाभीष्टफलं देहि सर्वविघ्नान् निवारय ॥
(ना० पूर्व° २२। ६-७)
' ट्वदेव ! केशव ! आजसे एक मासतक में
करगा। प्रभो! आप तपस्यारूप हँ ओर तपस्याके फल
देनेवाले है। आपको नमस्कार है। आप मुञ्चे अभीष्ट
फल दं ओर मेरे सम्पूर्ण विघ्रोका निवारण करे।'
इस प्रकार भगवान् विष्णुको शुभ मासत्रत
समर्पण करके उस दिनसे लेकर महीनेके अन्ततक
॥
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1५4 - (कि
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((-0. /८11104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
[ क श त)
[क 2 क 111 1 रीरि
क वि प 1 किं === क = =
पूवं भाग-प्रथम पाद
८५
भगवान् विष्णुके मन्दिरमे निवास करे ओर प्रतिदिन | अनुसार उन्हें वख, आभूषण तथा दक्षिणा दे।
पञ्चामृतकी विधिसे भगवानको स्नान करावे। उस
महीनेमें निरन्तर भगवान्के मन्दिरमे दीप जलावे।
नित्यप्रति अपामार्ग (ऊंगा--चिरचिरा)-की दातुन
करे ओर भगवान् नारायणके चिन्तने रत हो
विधिपूर्वक स्नान करे। तदनन्तर पहलेकी भति
संयमपूर्वक भगवान् विष्णुको स्नान करावे ओर
उनकी पूजा करे । इस प्रकार मासोपवास पूरा होनेपर
भगवत्पूजनपूर्वक यथाशक्ति त्राह्यणोको भोजन करावे
ओर भक्तिपूर्वक उन्हें दक्षिणा दे। फिर स्वयं भी
इन्द्रियोको वशमें करके बन्धुजनोंके साथ भोजन
करे। इस प्रकार व्रती पुरुष तेरह बार मासोपवास
अर्थात् प्रतिवर्षं एक मासोपवास-त्रत करता हआ
तेरह वर्पतक त्रत ॒करे। उसके अन्तमं वेदवेत्ता
ब्राह्मणको दक्षिणासहित गोदान करे । वारह ब्राह्मणांको
विधिपूर्वकं भोजन करावे ओर अपनी शक्तिके
[क
इस प्रकार जो मनुष्य इद्दियसंयमपूर्वक तेरह
पराक पूर्ण कर लेता हे, वह परमानन्द पदको प्राप्त
होता हे, जहां जाकर कोई शोक नहीं करता।
मासोपवास-त्रतमें लगे हए, गद्गास्नानमें तत्पर
तथा धर्ममार्गका उपदेश करनेवाले मनुष्य निस्संदेह
मुक्त ही हे । विधवा स्त्रियो, संन्यासियों, ब्रह्मचारियों
ओर विशेषतः वानप्रस्थियोंको यह मासोपवास-
व्रत करना चाहिये । स्त्री हो या पुरुष, इस परम
दुर्लभ व्रतका अनुष्ठान करके मोक्ष प्राप्त कर लेता
हे, जो योगियोके लिये भी दुर्लभ है । गृहस्थ हो
या वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी हो या संन्यासी तथा मूर्ख
हो या पण्डित-इस प्रसंगको सुनकर कल्याणका
भागी होता ठहै। जो भगवान् नारायणकी शरण
होकर इस पुण्यमय त्रतका वर्णन सुनता अथवा
पदता हे, वह पापोंसे मुक्त हो जाता है।
१०;
[ऋ / + / पद श-र१ षु / >
एकादशी-व्रतकी विधि ओर महिमा-भद्रशीलकी कथा
श्रीसनकजी कहते ह - नारदजी । अव मं इस
अन्य त्रतका, जो तीनों लोकों विख्यात हे, वर्णन
करूगा। यह सब पापका नाश करनेवाला तथा
सम्मूर्णं मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला हे । इसका
नाम है-एकादशी-व्रत। यह भगवान् विष्णुको
विशेष प्रिय है। ब्रह्यन्! ब्राह्यण, क्षत्रिय, वैश्य,
श्र ओर स्त्री-जौ भी भक्तिपूर्वकं इस त्रतका
पालन करते हं, उनको यह मोक्ष देनेवाला हे । यह
मनुष्योको उनकी समस्त अभीष्ट वस्तुएं प्रदान
करता है। विप्रवर। सव प्रकारसे इस त्रतका
पालन करना चाहिये; क्यांकि यह भगवान् विष्णुको
प्रसन्न करनेवाला है। दोनों पक्षकी एकादशीको
भोजन न करे। जो भोजन कर लेता टै, वह इस
लोकमें वड़ा भारी पापी टै। परलोकमं उसे
नरककी प्राति होती है। मुनीश्वर! मनुष्य यदि
मुक्तिको अभिलाषा रखता है तो वह दशमी ओर
द्रादशीको एक समय भोजन करे ओर एकादशीको
सर्वथा निराहार रहे। महापातर्काो अथवा सब
प्रकारके पातकोसे युक्त मनुष्य भी यदि एकादशीको
निराहार रहे तो वह परम गतिको प्राप्त होता है।
एकादशी परम पुण्यमयी तिथि है। यह भगवान्
विष्णुको बहुत प्रिय हे। संसार-बन्धनका उच्छेट्
करनेको इच्छावाले ब्राह्मणोंको सर्वथा इसका
सेवन करना चाहिये । दशमीको प्रातःकाल उठकर
दन्तधावनपूर्वक स्नान करे ओर इन्दियोको वशमें
रखते हुए विधिपूर्वक भगवान् विष्णुका पूजन
कर । रातमं भगवान् नारायणका चिन्तन करते हप
उरन्टीके समोप शयन करे। एकादशीकी सवेरे
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 8118811 \/8181/185। 0166101. 01411260 0 6810011
८६ संक्षिप्त नारदपुराण
उठकर शोच-स्रानके अनन्तर गन्ध, पुष्प आदि
सामग्रियोद्रारा भगवान् विष्णुको विधिपूर्वक पूजा
करके इस प्रकार कहे-
एकादश्यां निराहारः स्थित्वाद्याहं परेऽहनि।
भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥
(ना० पूर्व० २३। १५)
"कमलनयन अच्युत! आज एकादशीको निराहार
रहकर मे दूसरे दिन भोजन करूगा। आप मेरे
लिये शरणदाता हों ।'
सुदर्शनचक्रधारी देवदेव भगवान् विष्णुके समीप
भक्तिभावसे उक्त मन्त्रका उच्चारण करके संतुष्टचित्त
हो उन्हें एकादशीका उपवास समर्पित करे । व्रती
पुरुष नियमपूर्वक रहकर भगवान् विष्णुके समक्ष
गीत, वाद्य, नृत्य तथा पुराणश्रबण आदिके द्वारा रातमें
जागरण करे। तदनन्तर द्वादशके दिन प्रातःकाल
उठकर त्रतधारी पुरुष स्नान करे ओर इन्धियोको वशमें
रखते हए विधिपूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करे।
विप्रवर! जो एकादशीके दिन भगवान् जनार्दनको
पञ्चामृतसे स्नान कराकर द्वादशको दधसे नहलाता
हे, वह श्रीहरिका सारूप्य प्राप्त कर लेता है।
(पूजनके पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करे)
अन्ञानतिमिरान्धस्य व्रतेनानेन केशव।
प्रसीद सुमुखो भूत्वा ज्ञानटृष्टिप्रदो भव ॥
ध (ना० पूर्व २३। २०)
"केशव ! मं अज्ञानरूपी तिमिर रोगसे अन्धा
हो रहा हू। मेरे इस त्रतसे आप प्रसन्न हों ओर
प्रसन्नमुख होकर मुञ्चे ज्ञानदृष्टि प्रदान करं ।'
विप्रवर! इस प्रकार द्वादशीके दिन भगवान्
लक्ष्मीपतिसे निवेदन करके एकाग्रचित्त हो यथाशक्ति
ब्राह्मणोंको भोजन करावे ओर उन्हें दक्षिणा दे।
तत्पश्चात् अपने भाई-बन्धुओंके साथ भगवान्
नारायणका चिन्तन करते हए पञ्चमहायक्च
(बलिवैश्वदेव) करके स्वयं भी मौनभावसे भोजन
करे। जो इस प्रकार संयमपूर्वक पवित्र एकादशी-
त्रतका पालन करता है, वह पुनरावृत्तिरहित
वैकुण्ठधाममें जाता हे । उपवास-त्रतमें तत्पर तथा
धर्मकार्यमे संलग्र मनुष्य चाण्डालो ओर पतितोंकी
ओर कभी न देखे। जो नास्तिक हैँ, जिन्होने
मर्यादा भङ्ग की है तथा जो निन्दक ओर चुगले
हे, एेसे लोगोसे उपवास-त्रत करनेवाला पुरुष
कभी बातचीत न करे। जो यज्ञके अनधिकारियोंसे
यज्ञ करानेवाला हे, उससे भी व्रती पुरुष कभी न
बोले। जो कुण्ड (पतिके जीते-जी परपुरुषसे
उत्पन्न किये हुए पुरुष)-का अन्न खाता, देवता
ओर ब्राह्मणसे विरोध रखता, पराये अन्रके लिये
लालायित रहता ओर परायी स्त्रियोमे आसक्त
होता हे, एेसे मनुष्यका व्रती पुरुष वाणीमात्रसे भी
आदर न करे। जो इस प्रकारके दोषोंसे रहित,
शुद्ध, जितेद्धिय तथा सबके हितमें तत्पर है, वह
उपवासपरायण होकर परम सिद्धिको प्राप्त कर
लेता हे। गङ्घाके समान कोई तीर्थं नहीं हे।
माताके समान कोई गुरु नहीं हे । भगवान् विष्णुके
समान कोई देवता नहीं हे ओर उपवाससे बदढकर
कोई तप नहीं हे । क्षमाके समान कोई माता नहीं
है। कौर्तिके समान कोई धन नहीं है। ज्लानके
समान कोई लाभ नहीं हे। धर्मके समान कोई
पिता नहीं है । विवेकके समान कोई बन्धु नहीं है
ओर एकादशीसे बटढकर कोई त्रत नहीं है९।
१.नास्ति गङ्गासमं तीर्थं नास्ति मातृसमो गुरुः। नास्ति विष्णुसमं दैवं तपो नानशनात्परम् ॥
नास्ति क्षमासमा माता नास्ति कीर्तिसमं धनम्। नास्ति ज्ञानसमो लाभो न च धर्मसमः पिता॥
न॒विवेकसमो बन्धुनैकादश्याः परं त्रतम्। (ना० पूर्व० २३। ३०-३२)
((-0. 1\/॥८11104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
८७
इस विषयमे लोग भद्रशील ओर गालवमुनिके
पुरातन इतिहासका उदाहरण दिया करते हें।
पूर्वकालकौ बात है, नर्मदाके तटपर गालव नामसे
प्रसिद्ध एक सत्यपरायण मुनि रहते थे। वे शम
(मनोनिग्रह) ओर दम (इन्ियसंयम)-से सम्पन्न
तथा तपस्याको निधि थे। सिद्ध, चारण, गन्धर्वं,
यक्ष ओर विद्याधर आदि देवयोनिके लोग भी वहां
विहार करते थे। वह स्थान कंद, मूल, फलोँसे
परिपूर्ण था। वहां मुनियोंका बहुत बड़ा समुदाय
निवास करता था। विप्रवर गालव वहां चिरकालसे
निवास करते थे। उनके एक पुत्र हुआ, जो
भद्रशील नामसे विख्यात हुआ । वह बालक अपने
मन ओर इन्द्ियोंको वशमें रखता था। उसे अपने
पूर्वजन्मको बातोका स्मरण था। वह महान् भाग्यशाली
ऋषिकुमार निरन्तर भगवान् नारायणके भजन-
चिन्तनमें ही लगा रहता था। महामति भद्रशील
वालोचित्त क्रीडाके समय भी मिद्रीसे भगवान्
4 प्र 2 क प
| 14 (4 ९४ (र ८9
==> क च
न [> । ध के । 3 = --
जनयः [4 जक = ५ <
ॐ १६ २५५
विष्णुकी प्रतिमा बनाकर उसको पूजा करता ओर
अपने साधथि्योको समञ्चाता कि 'मनुप्योको सदा
भगवान् विष्णुकी आराधना करनी चाहिये ओर
विद्वानोको एकादशी-तव्रतका भी पालन करना
चाहिये ।' मुनीश्वर ! भद्रशीलद्रारा इस प्रकार समञ्जाये
जानेपर उसके साथी शिशु भी मिद्रीसे भगवान्की
प्रतिमा वनाकर एकत्र या अलग-अलग वैठ जाते
ओर प्रसन्नतापूर्वक उसकी पूजा करते थे। इस
तरह वे परम सौभाग्यशाली बालक भगवान्
विष्णुके भजनमें तत्पर हो गये । भद्रशील भगवान्
विष्णुको नमस्कार करके यही प्रार्थना करता था
कि 'सम्मूर्ण जगत्का कल्याण हो।' खेलके
समय वह दो घड़ी या एक घडी भी ध्यानस्थ हो
एकादशी-त्रतका संकल्प करके भगवान् विष्णुको
समर्पित करता था। अपने पुत्रको इस प्रकार
उत्तम चरित्रसे युक्त देखकर तपोनिधि गालव
मुनि बड़ विस्मित हुए ओर उसे हदयसे लगाकर
पृने लगे।
गालव बोले- उत्तम व्रतका पालन करनेवाले
महाभाग भद्रशील! तुम अपने कल्याणमय शील-
स्वभावके कारण सचमुच भद्रशील हो। तुम्हारा
जो मङ्गलमय चरित्र है, वह योगियोके लिये भी
दुर्लभ हे। तुम सदा भगवान्की पूजामें तत्पर,
सम्पूर्ण प्राणियोके हितम संलग्र तथा एकादशी-
व्रतके पालनमें लगे रहनेवाले हो। शस्त्रनिपिद्ध
कर्मसि तुम सदा दूर रहते हो । तुमपर सुख-दुःख
आदि द्रन्द्ोका प्रभाव नहीं पड्ता। तुममें ममता
नहीं दिखायी देती ओर तुम शान्तभावसे भगवान्के
ध्यानमें मग्र रहते हो। वेरा! अभी तुम बहुत छोटे
हो तो भी तुम्हारी वुद्धि एेसी किस प्रकार हुई;
क्योकि महापुरूषोको सेवाके विना भगवानूकी
भक्ति प्रायः दुर्लभ होती है। इस जीवकी बुद्धि
स्वभावतः अक्चानयुक्त सकाम कर्ममिं लगती है।
तुम्हारी सव क्रिया अलौकिक कैसे हो रही
टे ? सत्संग होनेपर भी पूर्वं पुण्यकौ अधिकतासे
ही मनुर्योमें भगवद्धक्तिका उदय होता टै । अतः
((-0. 1/८11111/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
८८
तुम्हारी अद्भुत स्थिति देखकर में बड़े विस्मयमें
पड़ा हू ओर प्रसन्रतापूर्वक इसका कारण पूछता
हू। अतः तुम्हें यह बताना चाहिये ।
मुनिश्रेष्ठ ! पिताके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर
पूर्वजन्मका स्मरण रखनेवाला पुण्यात्मा भद्रशील
बहुत प्रसन्न हुआ 1 उसके मुखपर हास्यकी छटा
छा गयी। उसने अपने अनुभवमें आयी हुई सव
वाते पिताको ठीक-ठीक कह सुनायीं।
भद्रशील बोला- पिताजी ! सुनिये । पूर्वजन्ममें
मेने जो कुछ अनुभव किया है, वह जातिस्मर
होनेके कारण अब भी जानता हूं। मुनिश्रेष्ठ! मेँ
पूर्वजन्ममे चन्द्रवंशी राजा था। मेरा नाम धर्मकीर्ति
था ओर महर्षिं दत्तात्रेयने मुञ्चे शिक्षा दी थी। मैने
नौ हजार वर्षोतक सम्पूर्णं पृथ्वीका पालन किया।
पहले मेने पुण्यकर्म भी बहुत-से किये थे, परंतु
पीके पाखण्डियोंसे बाधित होकर मैने वेदिकमार्गको
त्याग दिया । पाखण्डियोको कूर युक्तिका अवलम्बन
करके मेने भी सब यज्ञोका विध्वंस किया मुञ्च
अधर्ममे तत्पर देख मेरे देशक प्रजा भी सदेव
पाप-कर्म करने लगी। उसमेसे छठा अंश ओर
मुञ्चे मिलने लगा। इस प्रकार मँ सदा पापाचारपरायण
हो दुर्व्यसनोमें आसक्त रहने लगा। एक दिन
शिकार खेलनेको रुचिसे मेँ सेनासहित एक वनमें
गया ओर वहां भूख-प्याससे पीडित हो थका-
मादा नर्मदाके तटपर आया। सूर्यकी तीखी धूपसे
संतप्त होनके कारण मैने नर्मदाजीके जलमें स्नान
किया। सेना किधर गयी, यह मैने नहीं देखा ।
अकेला ही वहां भूखसे बहुत कष्ट पा रहा था।
संध्याके समय नर्मदा-तटके निवासी, जो एकादशी-
त्रत करनेवाले थे, वहाँ एकत्र हुए। उन सबको
मेने देखा। उन्हीं लोगोके साथ निराहार रहकर
बिना सेनके ही मे अकेला रातमें वहाँ जागरण
करता रहा। ओर हे तात! जागरण समाप्त होनेपर
सञ्चित नारदपुराण
मेरी वहीं मृत्यु हो गयी । तब बड़ी-बड़ी दाढोँसे
भय उत्पन्न करनेवाले यमराजके दूरतोने मुञ्चे बध
लिया ओर अनेक प्रकारके क्लेशसे भरे हए
मार्गद्वारा यमराजके निकट पहुंचाया । वहो जाकर
मेने यमराजको देखा, जो सबके प्रति समान
बरताव करनेवाले हें । तब यमराजने चित्रगुप्तको
बुलाकर कहा-' विद्वन्! इसको दण्ड-विधान
केसे करना हे, बताओ।' साधुशिरोमणे! धर्मराजके
एेसा कहनेपर चित्रगुप्ने देरतक विचार किया;
फिर इस प्रकार कहा-- ' धर्मराज ! यद्यपि यह
सदा पापमें लगा रहा है, यह ठीक है, तथापि एक
बात सुनिये। एकादशीको उपवास करनेवाला
मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। नर्मदाके
रमणीय तटपर एकादशीके दिन यह निराहार रहा
हे । वहां जागरण ओर उपवास करके यह सर्वथा
निष्पाप हो गया हे । इसने जो कोई भी बहुत-से
पाप किये थे, वे सब उपवासक प्रभावसे नष्ट हो
चुके हें ।' बुद्धिमान् चित्रगुप्तके एेसा कहनेपर
धर्मराज मेरे सामने कोपने लगे। उन्होने भूमिपर
दण्डकी भोति पड़कर मुञ्चे साष्टाङ्ग प्रणाम किया
ओर भक्तिभावसे मेरी पूजा की । तदनन्तर धर्मराजने
अपने सब दूतोको बुलाकर इस प्रकार कहा।
धर्मराज बोले-- दूतो ! मेरी बात सुनो। में
तुम्हारे हितकी बड़ी उत्तम वात बतलाता हू।
धर्ममार्गे लगे हए मनुष्योको मेरे पास न लाया
करो। जो भगवान् विष्णुके पूजनमें तत्पर, संयमी,
कृतक्ञ, एकादशी-त्रतपरायण तथा जितेन्द्रिय हैँ
ओर जो "हे नारायण! हे अच्युत! हे हरे! मुस
शरण दीजिये" इस प्रकार शान्तभावसे निरन्तर
कहते रहते है, एेसे लोगोको तुम तुरंत छोड देना।
मेरे दूतो ! जो सम्पूर्ण लोकोके हितैषी तथा परम
शान्तभावसे रहनेवाले हँ ओर जो नारायण ! अच्युत ।
जनार्दन ! कृष्ण ! विष्णो ! कमलाकान्त ! ब्रह्माजीके
((-0. 1/८111141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद ८९
पिता! शिव! शंकर ! इत्यादि नामोंका नित्य कीर्तन
किया करते हे, उन्हं दूरसे ही त्याग दिया करो। उनपर
मेरा शासन नहीं चलता। मेरे सेवको। जो अपना
सम्पूर्ण कर्म भगवान् विष्णुको समर्पित कर देते हैँ
उन्हीके भजनमें लगे रहते है, अपने वर्णाश्रमोचित
आचारके मार्गमे स्थित हे, गुरुजनोंकी सेवा किया
करते है, सत्पात्रको दान देते, दीनोंकी रक्षा करते ओर
निरन्तर भगवन्नामके जप-कीर्तनमें संलग्र रहते हैं
उनको भी त्याग देना। दूतगण! जो पाखण्डियोके
संगसे रहित, ब्राह्मणोके प्रति भक्ति रखनेवाले,
सत्संगके लोभी, अतिथि-सत्कारके प्रेमी, भगवान्
शिव ओर विष्णुम समता रखनेवाले तथा लोगोके
उपकारमें तत्पर हों, उन्हं त्याग देना। मेरे दूतो! जो
लोग भगवान्की कथारूप अमृतके सेवनसे वञ्चित हैं
भगवान् विष्णुके चिन्तनमे मन लगाये रखनेवाले
साधु-महात्माओंसे जो दूर रहते हे, उन पापियोको ही
मेरे घरपर लाया करो। मेरे किड्करो! जो माता ओर
पिताको डटनेवाले, लेगोसे द्वेष रखनेवाले, हितेषी-
जनोका भी अहित करनेवाले, देवताकी सम्पत्तिके
लोभी, दूसरे लोगोका नाश करेवाले तथा सदैव
दूसरेके अपराधमें ही तत्पर रहनेवाले है, उनको यहां
पकड़कर लाओ। मेरे दूतो! जो एकादशी-त्रतसे विमुख,
क्रूर स्वभाववाले, लोगोको कलङ्क लगानेवाले, परनिन्दा
तत्पर, ग्रामका विनाश करनेवाले, श्रेष्ठ पुरुषेसि वैर
रखनेवाले तथा ब्राह्मणके धनका लोभ कसेवाले हैँ उनको
यहो ले आओ। जो भगवान् विष्णुकी भक्तिसे मह मोड़
चुके है, शरणागतपालक भगवान् नारयणको प्रणाम नही
करते ह तथा जे मूर्ख मनुष्य कभी भगवान् विष्णुके
मन्दिरमे नहीं जाते ह, उन अतिशय पापम सत रहनेवाले
दुष्ट लोगोको ही तुम बलपूर्वक पकड़कर यहां ले आओ।
इस प्रकार जब मैने यमराजकी कही हुई बातें
सुनीं तो पश्चात्तापसे दग्ध होकर अपने किये हए उस
१7 क
निन्दित कर्मको स्मरण किया। पापकर्मकि लिये
पश्चात्ताप ओर श्रेष्ठ धर्मका श्रवण करनेसे मेरे सव पाप
वहीं नष्ट हो गये। उसके बाद मँ उस पुण्यकर्मकि
प्रभावसे इनद्रलोकमें गया। वर्हापर मँ सव प्रकारके
भोगोसे सम्पन्न रहा। सम्पूर्णं देवता मुञ्चे नमस्कार करते `
थे। बहुत कालतक स्वर्गमें रहकर फिर वहसि मेँ
भूलोके आया। यहाँ भी आप-जेसे विष्णु-भक्तकि
कुलमें मेरा जन्म हुआ। मुनीश्वर! जातिस्मर होनेके
कारण मँ यह सब वाते जानता हूं। इसलिये मँ
बालककि साथ भगवान् विष्णुके पूजनकी चेष्टा करता
हू। पूर्वजन्ममें एकादशी-व्रतका एेसा माहात्म्य है, यह
वात में नहीं जान सका था। इस समय पूर्वजन्मकी
वातोकी स्मृतिके प्रभावसे मैने एकादशी-त्रतको जान
लिया है। पहले विवश होकर भी जो त्रत किया गया
था, उसका यह फल मिला है। प्रभो! फिर जो
भक्तिपूर्वक एकादशी-त्रत करते है, उनको क्या नहीं
मिल सकता। अतः विप्रद्र! "मे शुभ एकादशी-
व्रतका पालन तथा प्रतिदिन भगवान् विष्णुको पजा
करूगा। भगवानके परम धामको पानेकी आकाङ्क्षा
ही इसमें हेतु हे। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक एकादशी-~त्रत
करते है, उन्हें निश्चय ही परमानन्ददायक वैकुण्टधाम
प्राप्त होता है।' अपने पुत्रका एेसा वचन सुनकर
गालव मुनि बहुत प्रसन्न हुए । उन्हें बद संतोष प्राप्त
हुआ। उनका हदय अत्यन्त हर्षसे भर गया। वे
बोले- वत्स! मेरा जन्म सफल हो गया। मेरा कुल
भी पवित्र हो गया; क्योकि तुम्हारे-जेसा विष्णुभक्तं
पुरुष मेरे घरमं पेदा हुआ है।' इस प्रकार पुत्रके उत्तम
कर्मसे मन-ही-मन संतुष्ट होकर महर्षिं गालवने उसे
भगवानूकीो पूजाका विधान टठीक-ठीक समञ्चाया।
मुनिश्रेष्ठ नारद ! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैने ये सव
बातें कुछ विस्तारके साथ तुम्हें बता दी है। तुम
ओर क्या सुनना चाहते हो?
{८८५ +
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संक्षिप्त नारदपुराण
चारों वर्णो ओर द्विजक्ा परिचय तथा विभिन्न बणकि विोष ओर
सामान्य धर्मका वर्णन
सूतजी कहते हे- महर्षयो ! सनकजीके मुखसे
एकादशी-त्रतका यह माहात्म्य जो अप्रमेय, पवित्र,
सर्वोत्तम तथा पापराशिको शान्त करनेवाला है
सुनकर ब्रह्मपुत्र नारदजी बड़ प्रसन्न हुए ओर फिर
इस प्रकार बोले।
नारदजीने कहा- महर्ष ! आप बडे तत्त्वज्ञ
हे । आपने भगवान्की भक्ति देनेवाले तथा
परम पुण्यमय ब्रत-सम्बन्धी इस आख्यानका
यथार्थरूपसे पूरा-पूरा वर्णन किया है। मुने,
अव मे चारों बर्णोकि आचारकी विधि ओर
सम्पूर्णं आश्रमोके आचार तथा प्रायश्चित्तकी
विधि सुनना चाहता हू । महाभाग ! मुञ्जपर बडी
भारी कृपा करके यह सब मुञ्ञे यथार्थरूपसे
बताइये ।
श्रीसनकजी बोले- मुनिश्रेष्ठ! सुनिये । भक्तोंका
प्रिय करनेवाले अविनाशी श्रीहरि वर्णाश्रम-धर्मका
पालन करनेवाले पुरुषोद्रारा जिस प्रकार पूजित
होते हँ, वह सव बतलाता हूं। मनु आदि
स्मृतिकारोने वर्ण ओर आश्रम-सम्बन्धी धर्मका
जेसा वर्णन किया है, वह सब आपको विधिपूर्वक
बतलाता हू; क्योकि आप भगवानूके भक्त हैँ।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ओर शृद्र-ये चार ही वर्णं
कहे गये ह । इन सबमें ब्राह्मण श्रेष्ठ है । ब्राह्मण,
क्षत्रिय ओर वेश्य- ये तीन द्विज कहे गये हें ।
पहला जनम मातासे ओर दूसरा उपनयन-संस्कारसे
होता है। इन्हीं दो कारणोसे तीनों व्णेकि लोग
द्विजत्व प्राप्त करते हें। इन व्णंकि लोगोंको
अपने-अपने वर्णके अनुरूप सब धर्मोका पालन
करना चाहिये। अपने वर्णधर्मका त्याग करनेसे
विद्वान् पुरुष उसे पाखण्डी कहते हे । अपनी
शाखाके गृह्य सूत्रमे बताये हुए कर्मका अनुष्ठान
करनेवाला द्विज कृतकृत्य होता है, अन्यथा वह
सब धर्मेसि बहिष्कृत एवं पतित हो जाता है।
इन वर्णोको यथोचित युगधर्मका धारण करना
चाहिये तथा स्मृतिधर्मके विरुद्ध न होनेपर
देशाचार भी अवश्य ग्रहण करना चाहिये । मन,
वाणी ओर क्रियाद्वारा यलपूर्वक धर्मका पालन
करना चाहिये ।
द्विजश्रेष्ठ ! अब मं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ओर
शूद्रके सामान्य कर्तव्योका वर्णन करता हु
एकाग्रचित्त होकर सुनो । ब्राह्मण ब्राह्मणोंको दान
दे, यज्ञोद्रारा देवताओंका यजन करे, जीविकाके
लिये दूसरोका यज्ञ करावे तथा दूसरोको पावे।
जो यन्ञके अधिकारी हों, उन्हींका यज्ञ करावे।
ब्राह्मणको नित्य जलसम्बन्धी क्रिया-सरान-संध्या
ओर तर्पण करना चाहिये । वह वेदोंका स्वाध्याय
^ += ५
तथा अग्निहोत्र करे। सम्पूर्ण
लोकोंका हित करे,
((-0. 1\/॥(1111041/5511॥1 8118811 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद्
सदा मीठे वचन बोले ओर सदा भगवान् विष्णुको
पूजामें तत्पर रहे । द्विजश्रेष्ठ ! क्षत्रिय भी ब्राह्मणोको
दान दे। वह भी वेदोँका स्वाध्याय ओर यज्ञोद्रारा
देवताओंका यजन करे। वह शस्त्रग्रहणके द्वारा
जीविका चलावे ओर धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन
करे । दुष्टोको दण्ड दे ओर शिष्ट पुरुषोंको रक्षा करे।
द्विजसत्तम! वैश्यके लिये भी वेदोंका अध्ययन
आवश्यक बताया गया है। इसके सिवा वह
पशुओंका पालन, व्यापार तथा कृषिकर्म करे।
सजातीय स्त्रीसे विवाह करे ओर धर्मोका भलीभोति
पालन करता रहे। वह क्रय-विक्रय अथवा
शिल्पकर्मद्वारा प्राप्त हए धनसे जीविका चलावे।
शूद्र भी ब्राह्मणोको दान दे, किंतु पाकयज्ञोद्रारा
यजन न करे। वह ब्राह्मण, क्षत्रिय ओर वैश्योको
सेवामें तत्पर रहे ओर अपनी सत्रीसे ऋतुकालमें
सहवास करे ।
सब लोगोंका हित चाहना, सबका मङ्गल-
साधन करना, प्रिय वचन बोलना, किसीको क्ट
न पहुंचाना, मनको प्रसन्न रखना, सहनशील होना
तथा घमंड न करना-यह सब मुनि्योने समस्त
९९१
वर्णोका सामान्य धर्म बतलाया है। अपने आश्रमोचित
कर्मकि पालनसे सब लोग मुनितुल्य हो जाते हे।
ब्रह्मन्! आपत्तिकालमें ब्राह्मण क्षत्रियोचित आचारका
आश्रय ले सकता है । इसी प्रकार अत्यन्त आपत्ति
आनेपर क्षत्रिय भी वैश्यवृत्तिको ग्रहण कर सकता
है; परंतु भारी-से-भारी आपत्ति आनेपर भी
ब्राह्मण कभी शूद्रवृत्तिका आश्रय न ले। यदि कोई
मूढ ब्राह्मण शूद्रवृत्ति ग्रहण करता ठै तो वह
चाण्डालभावको प्राप्त होता हे। मुनिश्रेष्ट । ब्राह्मण,
कषत्रिय ओर वैश्य--इन तीनों वणकि लिये ही चार
आश्रम बताये गये है । कोई पाचरवां आश्रम सिद्ध
नहीं होता। साधुशिरोमणे ! ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ
ओर संन्यास- ये ही चार आश्रम ह । विप्रवर! इन्हीं
चार आश्रमोद्रारा उत्तम धर्मका आचरण किया जाता
है । जिसका चित्त कर्मयोगमें लगा हुआ है, उसपर
भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हे । जिनके मनमें कोई
कामना नहीं है, जिनका चित्त शान्त है तथा जो
अपने वर्ण-आश्रमोचित कर्तव्यके पालनमें लगे
रहते है, वे उस परम धामको प्राप्त होते है, जहपि
पुनः इस संसारम लौटकर आना नहीं पड़ता ।
१ 0 0 0 |
संस्कारोके नियत काल, ब्रह्ययारीके धर्म, अनध्याय तथा वेदाध्ययनकी
आवश्यकताका वर्णन
श्रीसनकजी कहते है- मुनिश्रेष्ट! अब मं विशेष-
रूपसे वर्णं ओर आश्रम-सम्बन्धी आचार ओर
विधिका वर्णन करता हृ, तुम सावधान होकर
सुनो । जो स्वधर्मका त्याग करके परधर्मका पालन
करता है, उसे पाखण्डी समञ्जना चाहिये । द्विजोकि
गर्भाधान आदि संस्कार वैदिक मन्त्रोक्त विधिसे
करने चाहिये । स्त्रियोके संस्कार यथासमय विना
मन्त्रके ही विधिपूर्वक करने चाहिये । प्रथम वार
गर्भाधान होनेपर चौथे मासमे सीमन्तकर्म करना
उत्तम माना गया है अथवा उसे छठे, सातवें या
आठवें महीनेमें कराना चाहिये । पुत्रका जन्म होनेपर्
पिता वस्त्रसहित स्नान करके स्वस्तिवाचनपूर्वक.
१. तैयार की हई रसोईसे जो यत्न होते ह, उन्हे “ पाकयज्ञ कहते है । मनुस्मृति चार प्रकारके पाकयज्ञोका
उदेव है- वैश्वदेवहोम, बलिकर्म, नित्यश्राद्ध ओर अतिधि-भोजन।
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९२
नान्दीश्राद्ध तथा जातकर्म-संस्कार करे। पुत्र
जन्मके अवसरपर किया जानेवाला वृद्धिश्राद्ध सुवर्णं
या रजतसे करना चाहिये। सूतक व्यतीत होनेपर
पिता मोन होकर आभ्युदयिक श्राद्ध करनेके अनन्तर
पुत्रका विधिपूर्वक नामकरण-संस्कार करे । विप्रवर
जो स्पष्ट न हो, जिसका कोई अर्थं न बनता हो,
जिसमें अधिक गुरु अक्षर आते हों अथवा जिसमें
अक्षरोको संख्या विषम होती हो, एेसा नाम न रखे।
तीसरे वर्षमे चूडा-संस्कार उत्तम है। यदि उस
समय न हो तो पांचवें, छठे, सातवें अथवा आठवें
वर्षमे भी गृह्यसूत्रमे बतायी हई विधिके अनुसार
उसे सम्पन्न कर लेना चाहिये । गर्भसे आठवें वर्षमे
अथवा जन्मसे आठवें वर्षमे ब्राह्मणका उपनयन-
संस्कार करना चाहिये। विद्वान् पुरुष सोलहवें
वर्षतक उपनयनका गौणकाल बतलाते हे ।
गर्भसे ग्यारहवें वर्षमे क्षत्रियके उपनयनका
मुख्यकाल है। उसके लिये बाईसवें वर्षतक
गोणकाल निचित करते हें । गर्भसे बारहवें वर्षमें
वैश्यका उपनयन-संस्कार उचित कहा गया हे।
उसके लिये चौबीसवें वर्षतक गौणकाल बतलाते
हे । ब्राह्मणको मेखला मूंजकी ओर प्त्रियकी
मेखला धनुषको प्रत्यञ्चासे बनी हुईं (सूतकी )
तथा वैश्यकी मेखला भेडके ऊनकी बनी होती है।
ब्राह्मणके लिये पलाशका ओर क्षत्रियके लिये
गूलरका तथा वैश्यके लिये विल्वदण्ड विहित हे।
ब्राह्मणका दण्ड केशतक, क्षत्रियका ललाटके
बराबर ओर वैश्यके दण्डकी लंबाई नासिकाके
अग्रभागतककी वतायी हे। ब्राह्मण आदि ब्रह्मचारियोकि
व क्रमशः गेरुए, लल आर चलि रका वस्र
बताया गया हे। विप्रवर! जिसका उपनयन-
संस्कार किया गया हो, वह द्विज गुरुकी सेवामें
तत्पर रहे ओर जब्रतक वेदाध्ययन समाप्त न हो
जाय, तबतक गुरुके ही घरमे निवास करे।
संक्षिप्त नारदपुराण
मुनीश्वर! ब्रह्मचारी प्रातःकाल स्नान करे ओर
प्रतिदिन सबेरे ही गुरुके लिये समिधा, कुशा ओर
फल आदि ले आवे । मुनिश्रेष्ठ । यज्ञोपवीत, मृगचर्म
अथवा दण्ड जब नष्ट या अपवित्र हो जाय तो
मन्त्रसे नूतन यज्ञोपवीत आदि धारण करके नष्ट-
भ्रष्ट हुए पुराने यसलोपवीत आदिको जलमें फेक दे।
ब्रह्मचारीके लिये केवल भिक्षाके अन्नरसे ही
जीवन-निर्वाह करना बताया गया है । वह मन-
इन्द्रियोको संयममें रखकर श्रोत्रिय पुरुषके घरसे
भिक्षा ले आवे। भिक्षा मोँगते समय ब्राह्मण वाक्यके
आदिमे, क्षत्रिय वाक्यके मध्यमे ओर वैश्य वाक्यके
अन्तमें ' भवत्" शब्दका प्रयोग करे। जेसे-- ब्राह्यण
' भवति! भिक्षां मे देहि" (पूजनीय देवि ! मुञ्चे भिक्षा
दीजिये), क्षत्रिय "भिक्षां भवति! मे देहि" ओर वैश्य
"भिक्षां मे देहि भवति" कटे । जितेद्धिय ब्रह्मचारी
प्रतिदिन सायंकाल ओर प्रातःकाल शास्त्रीय विधिके
अनुसार अग्निहोत्र (ब्रह्मयज्ञ) तथा तर्पण करे। जो
अग्रिहोत्रका परित्याग करता हे, उसे विद्वान् पुरुष
पतित कहते हैं । ब्रह्मयज्ञसे रहित ब्रह्मचारी ब्रह्महत्यारा
कहा गया हे। वह प्रतिदिन देवताको पूजा ओर
गुरुको उत्तम सेवा करे । ब्रह्मचारी नित्यप्रति भिक्षाका
ही अन्न भोजन करे। किसी एक घरका अन्न कभी
न खाय। वह इन्द्ियोको वशमें रखते हुए श्रेष्ठ
ब्राह्मणोके घरसे भिक्षा लाकर गुरुको समर्पित कर
दे ओर उनकी आज्ञासे मोन होकर भोजन करे । ब्रह्मचारी
मधु, मांस, स्त्री, नमक, पान, दन्तधावन, उच्छिष्ट-
भोजन, दिनका सोना तथा छता लगाना आदि न करे।
पादुका, चन्दन, माला, अनुलेपन, जलक्रीड, नृत्य,
गीत, वाद्य, परनिन्दा, दूसरेको सताना, वहकी-बहकी
वातं करना, अजन लगाना, पाखण्डी लोगोका साथ
करना ओर श्रोको संगतिमें रहना आदि न करे।
वृद्ध पुरुषोको क्रमशः प्रणाम करे । वृद्ध तीन
प्रकारके होते है । एक ज्ञानवृद्ध, दूसरे तपोवृद्ध
((-0. /८11114<511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
९३
ओर तीसरे वयोवृद्ध ॒है। जो गुरु वेद-शास्त्रोके
उपदेशसे आध्यात्मिक आदि दुःखोका निवारण करते
हे, उन्हें पहले प्रणाम करे। प्रणाम करते समय द्विज
बालक "भे अमुक हूं इस प्रकार अपना परिचय
दे। ब्राह्मण किसी प्रकार क्षत्रिय आदिको प्रणाम न
करे। जो नास्तिक, धर्ममर्यादाको तोड़नेवाला, कृतघ्न
ग्राम-पुरोहित, चोर ओर शठ हो, उसे ब्राह्मण होनेपर
भी प्रणाम न करे। पाखण्डी, पतित, संस्कार-भ्रष्,
नक्षत्रजीवी (ज्योतिषी) तथा पातकीको भी प्रणाम न
करे। पागल, शठ, धूर्त, दोडते हुए, अपवित्र, सिरे
तल लगाये हए तथा मन्त्र-जप कसते हए पुरुषको भी
प्रणाम नहीं करना चाहिये। जो इगड्लू ओर क्रोधी हो,
वमन कर रहा हो, पानीमे खड हो, हाथमे भिक्षाका अत्न
लिये हो ओरसो रहा हो, उसको भी प्रणाम न करे।
स्त्रियोमें जो पतिकी हत्या करनेवाली, रजस्वला,
परपुरुषसे सम्बन्ध रखनेवाली, सूतिका, गर्भपात
करनेवाली, कृतघ्र ओर क्रोधिनी हो, उसे कभी प्रणाम
न करे। सभा, य्षशाला ओर देवमन्दिरं भी एक-
एक व्यक्तिके लिये किया जानेवाला नमस्कार पूर्वकृत
पुण्यका नाश करता हे। श्राद्ध, त्रत, दान, देवपूजा,
यज्ञ ओर तर्पण करते हुए पुरुषको प्रणाम न करे;
क्योकि प्रणाम करनेपर जो शस्त्रीय विधिसे आशीर्वाद
न दे सके, वह प्रणाम करने योग्य नही । बुद्धिमान्
शिष्य दोनों पैर धोकर आचमन करके सदा गुरुके
सामने बैठे ओर उनके चरण पकड़कर नमस्कार करे।
फिर अध्ययन करे। अष्टमी, चतुर्दशी, प्रतिपदा,
अमावास्या, पूर्णिमा, महाभरणी (भरणी-नक्षत्रके योगसे
होनेवाले पर्वविशेष) श्रवणयुक्त द्वादशी, पितृपक्षकी
द्वितीया, माघशुक्ला सप्तमी, अश्चिन शुक्ला नवमी--इन
प ५ ८ ब्धः 0 कि. 7 ` ८ ~- ~ ४
( ५ 4 १ + न |
$ ८ ॥। .
@;9 #। ।
(4 [४ 2 क 010 + (4 ५8
7 9) ४) र 1. । ( (^
तिधिर्योमं तथा सूर्यके चारों ओर वेग लगनेपर एवं
किसी श्रोत्रिय विद्रानके अपने यहां पधारनेपर अध्ययन
वंद रखना चाहिये । जिस दिन किसी श्रष्ठ ब्राह्मणक
स्वागत-सत्कार् किया गया हो या किस्रीके साध
कलह बद् गया हो, उस दिन भी अनध्याय रखना
चाहिये। देवर्पे। संध्याके समय, अकालमें मेघकी
गर्जना होनेपर, असमयमें वर्षा होनेपर, उल्कापात तथा
वज्रपात होनेपर, अपने द्वारा किसी ब्राह्मणका अपमान
हो जानेपर, मन्वादि तिधियेकि आनेपर तथा युगादि चार
तिधियकि उपस्थित होनेपर सव क्मकि फलकी इच्छा
रखनेवाला कोई भी द्विज अध्ययन न करे। वैशाख
शुक्ला तृतीया, भाद्र कृष्णा त्रयोदशी, कार्तिक शुक्ला
नवमी तथा माघकी पूर्णिमा-ये तिथियों युगादि कटी
गयी हे । इनमं जो दान दिया जाता है, उसके पुण्यको
ये अक्षय वनानेवाली हँ“ । नारदजी ! आश्विन शुक्ला
नवमी, कार्तिक शुक्ला द्वादशी, चैत्र तथा भाद्रपदमासकी
तृतीया, आपाद शुक्ला दशमी, माघ शुक्ला सप्तमी,
१. तृतीया माधवे शुक्ला भाद्रे कृष्णा त्रयोदशी । कार्तिके नवमी शुद्धा माघे पञ्चदशी तिधि; ॥
एता युगाद्याः कथिता दत्तस्याक्षयकारिकाः। (ना० पूर्व० २५। ५०-५१)
स्कन्दपुराणके अनुसार भिन्न-भिन्न युगकौ आदितिधि इस प्रकार है- कार्तिक शुक्ला नवमी सत्ययुगकी,
वैशाख शुक्ला तृतीया त्रेतायुगकी, माकी पूर्णिमा द्वापरकौ ओर भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी कलियुगकी आदितिधि दै ।
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 8118811 \/8181185। (0166101. 01411260 0 6810011
९
श्रवण कृष्णा अष्टमी, आषाढ शुक्ला पूर्णिमा,
फाल्गुनकी अमावास्या, पौष शुक्ला एकादशी तथा
कार्तिक, फाल्गुन, चेत्र ओर ज्येष्ठकी पूर्णिमा तिथियो- ये
मन्वन्तरकी आदितिथियों बतायी गयी है, जो दानके
पुण्यको अक्षय बनानेवाली ९ । द्विजोको मन्वादि
ओर युगादि तिथियोमें श्राद्ध करना चाहिये । श्राद्धका
निमन्त्रण हो जानेपर, चन्द्रग्रहण ओर सूर्यग्रहणके दिन,
उत्तरायण ओर दक्षिणायन प्रारम्भ होनेके दिन, भूकम्प
होनेपर, गलमग्रहमे ओर बादलेके आनेसे अंधेरा हो
जानेपर कभी अध्ययन न करे। नारदजी ! इन सब
अनध्यायोमें जो अध्ययन करते हे, उन मूढ़ पुरुषोकी
सकिप्त नारदपुराण
संतति, बुद्धि, यश, लक्ष्मी, आयु, बल तथा आरोग्यका
साक्षात् यमराज नाश करते है । जो अनध्यायकालमें
अध्ययन करता हे, उसे ब्रह्म-हत्यारा समञ्लना चाहिये ।
जो ब्राह्मण वेद-शास्त्रोका अध्ययन न करके अन्य
कर्ममिं परिश्रम करता है, उसे शद्रके तुल्य जानना
चाहिये, वह नरकका प्रिय अतिथि हे । वेदाध्ययनरहित
ब्राह्यणके नित्य, नैमित्तिक, काम्य तथा दूसरे जो
वैदिककर्म है, वे सब निष्फल होते हे । भगवान् विष्णु
शब्दब्रह्ममय हँ ओर वेद साक्षात् श्रीदरिका स्वरूप
माना गया है। जो ब्राह्मण वेदोका अध्ययन करता है,
वह सम्पूर्णं कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।
(मम 11२ # 6४
विवाहके योग्य कन्या, विवाहके आठ भेद तथा गृहस्थोचित शिष्टाचारका वर्णन
श्रीसनकजी कहते है नारदजी ! वेदाध्ययनकाल-
तक ब्रह्मचारी निरन्तर गुरुकी सेवामें लगा रहे,
उसके बाद उनकी आज्ञा लेकर अग्रिपरिग्रह
(गार्हपत्य-अग्रिकी स्थापना) करे। द्विज वेद्,
शास्त्र ओर वेदाद्खोका अध्ययन करके गुरुको
दक्षिणा देकर अपने घर जाय। वरहा उत्तम कुलमें
उत्पन्न, रूप ओर लावण्यसे युक्त, सद्गुणवती तथा
सुशीला ओर धर्मपरायणा कन्याके साथ विवाह
करे। जो कन्या रोगिणी हो अथवा किसी विशेष
रोगसे युक्त कुलमें उत्पन्न हुई हो, जिसके केश
बहुत अधिक या कम हों, जो सर्वथा केशरहित
हो ओर बहुत बोलनेवाली हो, उससे विद्वान् पुरुष
विवाह न करे। जो क्रोध करनेवाली, बहुत नाटी,
बहुत बड़े शरीरवाली, कुरूपा, किसी अङ्कसे हीन
या अधिक अङ्गवाली, उन्मादिनी ओर चुगली
करनेवाली हो तथा जो कुबड़ी हो, उससे भी
विवाह न करे। जो सदा दूसरेके घरमें रहती हो,
ञ्ञगड़ालू हो, जिसको मति भ्रान्त हो तथा जो
निष्ठुर स्वभावकी हो, जो बहुत खानेवाली हो,
जिसके दाति ओर ओठ मोटे हों, जिसकी नाकसे
घुर्घुराहटकी आवाज होती हो ओर जो धूर्त हो,
उससे विद्वान् पुरुष विवाह न करे। जो सदा
रोनेवाली हो, जिसके शरीरकी आभा श्चैत रंगको
हो, जो निन्दित, खंसी ओर दमे आदिके रोगसे
पीडित तथा अधिक सोनेवाली हो, जो अनर्थकारी
वचन बोलती हो, लोगोसे देष रखती हो ओर
चोरी करती हो, उससे विद्वान् पुरुष विवाह न
करे। जिसकी नाक बड़ी हो, जो छल-कपर
१. अश्वयुक्शुक्लनवमी कार्तिके द्वादशी सिता। तृतीया चैत्रमासस्य तथा भाद्रपदस्य च॥
आपाढशुक्लदशमी सिता
माघस्य सप्तमी । श्रावणस्याष्टमी कृष्णा तथाषाढी च पूर्णिमा॥
फाल्गुनस्य त्वमावास्या पौषस्यैकादशी सिता। कार्तिकी फाल्गुनी चैत्री ज्यैष्ठी पञ्चदशी सिता॥
मन्वादयः समाख्याता दत्तस्याक्षयकारिकाः। (ना० पूर्व २५। ५१-५५)
स्कन्दपुराणमें भी मन्वादि तिथियोका पाठ एेसा ही है। केवल श्लोकोके क्रममें थोडा अन्तर है।
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद्
करनेवाली हो, जिसके शरीरमें अधिक रोणे बढ
गये हों तथा जो बहुत घमंडी ओर बगुलावृत्तिवाली
(ऊपरसे साधु ओर भीतरसे दष्ट हो), उससे भी
विद्वान् पुरुष विवाह न करे ।
मुनिश्रेष्ठ ! ब्राह्म आदि आढ प्रकारके विवाह
होते है, यह जानना चाहिये । इनमें पहला-पहला
श्रेष्ठ हे। पहलेवालेके अभावमें दूसरा श्रेष्ठ एवं
ग्राह्य माना गया हे । ब्रह्य, देव, आर्ष, प्राजापत्य,
आसुर, गान्धर्व, राक्षस तथा आटवां पैशाच विवाह
हे । श्रेष्ठ द्विजको ब्राह्यविवाहकी विधिसे विवाह
करना चाहिये। अथवा देवविवाहको रीतिसे भी
विवाह किया जा सकता है। कोई-कोई आर्ष-
विवाहको भी श्रेष्ठ बतलाते हें। ब्रह्मन्! शेष
प्राजापत्य आदि पाच विवाह निन्दित हें।
(अव गृहस्थ पुरुषका शिष्टाचार बताया जाता
हे--) दो यज्ञोपवीत तथा एक चादर धारण करे।
कानोमें सोनेके दो कुण्डल पहने। धोती दो रखे ।
सिरके बाल ओर नख कटाता रहे । पवित्रतापूर्वक
रहे । स्वच्छ पगड़ी, छाता तथा चरणपादुका धारण
करे। वेष एेसा रखे जो देखनेमें प्रिय लगे।
प्रतिदिन वेदोका स्वाध्याय करे । शस्त्रोक्त आचारका
पालन करे। दूसरोका अन्न न खाय। दूसरोको
निन्दा छोड दे। पैरसे पैरको न दवाये, जृठी
चीजको न लधे। दोनों हाथोंसे अपना सिर न
खुजलाये । पूज्य पुरुष तथा देवालयको वारये करके
न चले। देवपूजा, स्वाध्याय, आचमन, स्नान, व्रत
तथा श्राद्धकर्म आदिमे शिखाको खुली न रखे ओर
एक वस्त्र धारण करके न रहे । गदहे आदिक
सवारी न करे । सूखा वाद-विवाद त्याग दे । परायी
स्त्रीके पास कभी न जाय। ब्रह्मन्! गौ, पीपल
तथा अग्रिको भी अपनेसे वाये करके न जाय।
इसी प्रकार चौराहेको, देववृक्षको, देवसम्बन्धी
कुण्ड या सरोवरको तथा राजाको भी अपनसे
वाये करके न चले। दूसरोके दोष देखना, डाह
रखना ओर दिनमें सोना छोड़ दे। दृसरोके पाप
न कहे । अपना पुण्य प्रकट न करे । अपने नामको,
जन्म-नक्षत्रको तथा मानको अत्यन्त गुप्त रखे ।
दुष्टोके साथ निवास न करे। अशास्त्रीय बात न
सुने। द्विजको मद्य, जूआ तथा गीतमे कभी
आसक्ति नहीं रखनी चाहिये । गीली हड़ी, जुटी
वस्तु, पतित तथा मुर्दा ओर कुत्तेको छकर मनुष्य
वस्त्रसहित स्नान कर ले। चिता, चिताकी लकी,
युप, चाण्डालका स्पर्श कर लेनेपर मनुष्य वस्त्रसहित
जलम प्रवेश करे। दीपककी, खाटकी ओर शरीरकं
छाया, केशका, वस्त्रका ओर चटाईका जल तथा
वकरीके, ्आाडके ओर विद्टीके नीचेको धृल-ये
सव शुभ प्रारव्धको हर लेते है । सूपकी हवा,
प्रेतके दाहका धुओं, शृद्रके अन्नरका भोजन तथा
वृषलीके पतिका साथ दूरसे ही त्याग दे। असत्
शास्त्रोके अर्थका विचार, नख ओर केशोका
दातासे चवाना तथा नगे होकर सोना सर्वदा छोड
दे। सिरमं लगानेसं वचे हुए तेलको शरीरम न
लगावे। अपवित्र ताम्बृल (बाजारके लगाये हए
पान) न खाय तथा सोतेको न जगाये। अशुद्ध
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९६
संक्षिप्त नारदपुराण
हुआ मनुष्य अग्निक सेवा, देवताओं ओर गुरुजनोका
पूजन न करे। वाये हाथसे अथवा केवल मुखसे
जल न पीये। मुनी श्वर! गुरुकी छायापर पैर न रखे।
उनको आज्ञा भी न टाले। योगी, ब्राह्मण ओर यति
पुरुषोको कभी निन्दा न करे । द्विजको चाहिये कि
वह आपसकी गुप्त (रहस्य)-को बातें कभी न
कहे । अमावास्या तथा पूर्णिमाको विधिपूर्वक याग
करे। द्विजोको सुबह-शाम उपासना ओर होम
अवश्य करने चाहिये। जो उपासनाका परित्याग
करता हे, उसे विद्वान् पुरुष शराबी ' कहते हे ।
अयन आरम्भ होनेके दिन, विषुवयोगमें (जव
दिन-रात बरावर होते हँ), चार युगादि तिथियोमे
अमावास्याको ओर प्रेतपक्षमें गृहस्थ द्विजको अवश्य
श्राद्ध करना चाहिये । नारदजी ! मन्वादि तिथियोमे,
मृत्युको तिथिको, तीनों अष्टकाओमें तथा नूतन अत्न
घरमे आनेपर गृहस्थ पुरुष अवश्य श्राद्ध करे । कोई
श्रोत्रिय ब्राह्मण घरपर आ जाय या चन्द्रमा ओर
सूर्यका ग्रहण लगा हो अथवा पुण्यक्षेत्र एवं तीर्थे
पर्हुच जाय तो गृहस्थ पुरुष निश्चय ही श्राद्ध करे ।
जो उपर्युक्त सदाचारमें तत्पर हैँ, उनपर भगवान्
विष्णु प्रसन्न होते हे । द्विजश्रेष्ठ ! भगवान् विष्णुके
प्रसन्न हो जानेपर क्या असाध्य रह जाता है?
9 |
नम 1४-# 6
गृहस्थ-सम्बन्धी शौचाचार, स्नान, संध्योपासन आदि तथा वानप्रस्थ ओर
सन्यास-आश्रमक्े धर्म
श्रीसनकजी कहते है- मुनित्रष्ठ। अव मे गृहस्थका
सदाचार बतलाता हु, सुनो। उन सदाचारोके पालन
करनेवाले पुरुषोके सब पाप नष्ट हो जाते है, इसमें
संशय नहीं हे। ब्रह्यन्। गृहस्थ पुरुष तब्राह्यमुहूर्त
(सूर्योदयसे पूर्वको चार घडी) -में उठकर जो
पुरुषार्थ (मोक्ष) साधनकी विरोधिनी न हो, एेसी
जीविकाका चिन्तन करे। दिनमें या संध्याके समय
कानपर जनेऊ चदाकर उत्तरकी ओर मह करके मल-
मूत्रका त्याग करना चाहिये। यदि रातमें इसका
अवसर आवे तो दकषिणकी ओर मुंह करके वेठना
चाहिये । द्विज सिरको वस्त्रसे ढककर ओर भूमिपर
तृण विकर शोचके लिये वैठे ओर उसके होनेतक
मोन रहे। मार्गमे, गोशालामे, नदीके तटपर, पोखर
ओर घरके समीप, पेडकी छायामे, दुर्गम स्थानम
अग्निके समीप, देवालयके निकट, बगीचेमें, जेते हए
खेतमे, चौराहेपर; ब्राह्मण, गाय, गुरुजन तथा स्त्रियेकि
समीप; भूसी, अगार, खप्पर या खोपड़ीमें तथा जलके
भीतर--इत्यादि स्थानेमें मलमूत्र न करे। शोच
(शुद्धि) -के लिये सदा यत्न करना चाहिये । शोच ही
द्विजत्वका मूल है। जो शोचाचारसे रहित हे उसके
सब कर्म निष्फल होते हे । शोच दो प्रकारका कहा
गया है-एक बाह्य शोच ओर दूसरा आभ्यन्तर-
शोच। मिट्री ओर जलसे जो ऊपर-ऊपरकी शुद्धि की
जाती हे, वही बाह्य-शोच है ओर भीतरके भावोंकी
जो पवित्रता है उसे ही आभ्यन्तर-शोच कहा गया
हे। मलत्यागके पश्चात् उठकर शुद्धिके लिये मिद्री
लावे। चृहे आदिक खोदी हुई, फारसे उलारी हुई
तथा वावी, कं ओर पोखसे निकाली हुई मिट
शोचके लिये न लावे। अच्छी मिद्री लेकर यत्नसे
शुद्धिका सम्पादन करे। लिद्धमे एक बार या तीन
वार मिटरी लगाकर धोये ओर अण्डकोषोमें दो
बार मिदटरी लगाकर जलसे धोये। मनीषी पुरुषोने
१. शौचे यतः सदा कार्यः शोचमूलो द्विजः स्मृतः। शौचाचारविहीनस्य समस्तं कर्म निष्फलम्॥
(ना० पूर्व० २७। ८)
((-0. ८1114551 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
मूत्रत्यागके पश्चात् इस प्रकार शुद्धिका विधान
किया हे । लिङ्खमें एक बार, गुदाद्वारमें पोच वार,
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आदिसे मण्डल बनाकर उन्हीं भगवान् जनार्दनका
ध्यान करे । नारदजी ! तदनन्तर पवित्र मन्त्रों ओर
वाये हाथमें दस बार, फिर दोनों हाथमे सात बार | तीर्थोका स्मरण करते हए स्नान करना चाहिये-
तथा दोनों पैरोमें तीन बार पृथक् मिदर लगानी ओर
धोनी चाहिये । यह मल-त्यागके पश्चात् उसके लेप
ओर दुर्गन्धको दूर करनेके लिये शुद्धिका विधान
किया गया है। ब्रह्मचारियोके लिये इससे दुगुने
शोचका विधान हे। वानप्रस्थियोके लिये तिगुना
ओर संन्यासि्योके लिये गृहस्थकी अपेक्षा चौगुना
शोच बताया गया है । मुनिश्रेष्ठ । कीं रास्तेमे हो तो
आधा ही पालन करे। रोगीके लिये या बड़ी भारी
विपत्ति पडनेपर भी नियमका बन्धन नहीं रहता।
स्त्रियां ओर उपनयनरहित द्विजकुमारोके लिये भी
लेप ओर दुर्गन्ध दूर होनेतक ही शौोचकी सीमा हे।
उसके बाद किसी श्रेष्ठ वृक्षकी छिलकेसहित लकड़ी
लेकर उससे दँतुन करे। बेल, असना, अपामार्गं
(ऊंगा या चिरचिरा) नीम, आम ओर अर्क आदि
वृक्षोका दोतुन होना चाहिये। पहले उसे जलसे
धोकर निप्राह्ित मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे-
आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च।
ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते ॥
(ना० पूर्व २७। २५)
' वनस्पते! तुम हमें आयु, यश, बल, तेज,
प्रजा, पशु, धन, वेद, बुद्धि तथा धारणाशक्ति
प्रदान करो।'
कनिष्ठिकाके अग्रभागके समान मोटा ओर
दस अंगुल लंबा दाँतुन ब्राह्मण करे । क्षत्रिय नौ
अगुल, वैश्य आठ अंगुल, शुद्र ओर स्त्रि्योको
चार अंगुलका दँतुन करना चाहिये। दोतुन न
मिलनेपर बारह कुट्लोसे मुख शुद्धि कर लेनी
चाहिये । उसके बाद नदी आदिके निर्मल जलें
सान करे। वहाँ तीर्थोको प्रणाम करके सूर्यमण्डलं
भगवान् नारायणका आवाहन कर् । फिर गन्ध
गद्धे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥
पुष्कराद्यानि तीर्थानि गङ्काद्याः सरितस्तथा ।
आगच्छन्तु महाभागाः स्रानकाले सदा मम॥
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची ह्यवन्तिका ।
पुरी द्वारावती ज्ञेयाः सप्तैता मोक्षदायिकाः ॥
(ना० पूर्व० २७। ३३-३५)
'गङ्खा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा,
सिन्धु तथा कावेरी नामवाली नदियां इस जलमें
निवास करे । पुष्कर आदि तीर्थं ओर गङ्गा आदि
परम सौभाग्यवती नदियों सदा मेरे स्रानकालमें
यहाँ पधारे। अयोध्या, मथुरा, हरद्रार, काशी,
काञ्ची, अवन्ती (उजैन) ओर द्वारकापुरी-इन
सातोंको मोक्षदायिनी समञ्जना चाहिये ।'
तदनन्तर शासको रोके हए पानीमं इवको
लगावे ओर अघमर्षण सूक्तका जप करे। फिर
सनानाद्ग-तर्पण करके आचमनके पश्चात् सूर्यदेवको
अर्घ्य दे। नारदजी ! उसके बाद सूर्यभगवान्का
ध्यान करके जलसे बाहर निकलकर विना फटा
हुआ शुद्ध धौतवस्त्र धारण करे। ऊपरसे दूसरा
वस्त्र (चादर) भी ओद् ले। तत्पश्चात् कुशासनपर
बैठकर संध्याकर्मं प्रारम्भ करे । ब्रह्मन्! ईशानकोणको
ओर मुख करके गायत्री-मन्त्रसे आचमन करे,
फिर “ऋतञ्च ' इत्यादि मन््रका उच्चारण करके
विद्वान् पुरुष दुबारा आचमन करे । तदनन्तर अपने
चारों ओर जल चछिड़कर अपने-आपको उस
जलसे आवेष्टित करे। अपने शरीरपर भी जल
सींचे । फिर प्राणायामका संकल्प लेकर प्रणवका
उच्चारण करनेके बाद प्रणवसहित सातो व्याहतियेकि
तथा गायत्री-मन्त्रके ऋषि, छन्द ओर देवताओंका
((-0. 1/८11114<511॥1 8118811 \/81811851 01661101. 01411260 0 66810011
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स्मरणः करते हुए (विनियोग करते हए) भूः आदि
सात व्याहतियोद्रारा मस्तकपर जलसे अभिषेक करे।
तत्पश्चात् मन्त्रज्ञ पुरुष पृथक् -पृथक् करन्यास ओर
अद्धन्यास करे। पहले हृदयम प्रणवका न्यास करके
मस्तकपर भूःका न्यास करे। फिर शिखामे भुवःका,
कवचमें स्वःका, नेत्रमें भूर्भुवःका तथा दिशाओं
भूर्भुवः स्वः-इन तीनों व्याहतियोका ओर अस्त्रका
न्यास करे। तीन वार हथेलीपर ताल देना ही
अस्त्रन्यास हैः । तदनन्तर प्रातःकाल कमलके आसनपर
विराजमान संध्या (गायत्री) -देवीका आवाहन करे ।
सबको वर देनेवाली तीन अशक्षरोसे युक्त ब्रह्मवादिनी
गायत्रीदेवी ! तुम वेदोकी माता तथा ब्रह्मयोनि हो!
संक्षिप्त नारदपुराण
तुम्हं नमस्कार है । मध्याहकालमें वृषभपर आरूढ
हई, श्चेतवस्त्रसमावृत सावित्रीका आवाहन करे । जो
रुद्रयोनि तथा रुद्रवादिनी है*। सायंकालके समय
गरुड्पर चदी हुई पीताम्बरसे आच्छादित विष्णुयोनि
एवं विष्णुवादिनी सरस्वतीदेवीका आवाहन करना
चाहिये ^ । प्रणव, सात व्याहति, त्रिपदा गायत्री तथा
शिरःशिखा मन््र-इन सबका उच्चारण करते हए
क्रमशः पूरक, कुम्भक ओर विरेचन करे । प्राणायाममं
बायीं नासिकाके छिद्रसे वायुको धीरे-धीरे अपने
भीतर भरना चाहिये । फिर क्रमशः कुम्भक करके
विरेचनद्रारा उसे बाहर निकालना चाहिये तत्पश्चात्
प्रातःकालको संध्याम "सूर्यश्च मा' इत्यादि मन्त्र
१. ॐकारसहित व्याहतियोका, गायत्नरी-मन्त्रका तथा शिरोमन्त्रका विनियोग या उनके ऋषि, छन्द ओर
देवताओंका स्मरण इस प्रकार टहै-
ॐॐकारस्य ब्रह्म ऋषिरदैवी गायत्री छन्दः परमात्मा देवता, सप्तव्याहतीनां प्रजापतित्ऋषिर्गायत्युष्णिगनुष्व्वृहतीपदिक्तत्ष्टुक्जगत्य-
श्छन्दास्यप्रिवायुसूर्यव्रहस्पतिवरुणेन्द्रविश्चेदेवा देवताः, तत्सवितुरिति विश्वामित्र ऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता, आपो
ज्योतिरिति शिरसः प्रजापतित्ऋषपिर्यजुश्छन्दो ब्रह्याग्रिवायुसूर्या देवताः प्राणायामे विनियोगः ।
२. आधुनिक संध्याको प्रतियोमे न्यासकी विधि सूर्योपस्थानके बाद दी हुई हे। परंतु नारदपुराणके अनुसार
प्राणायामके पहले तथा जपके पहले भी न्यास करना चाहिये । मूलमें करन्यास ओर अङ्गन्यास दोनोंकी चर्चा कौ
गयी हे। पर विधि केवल अङ्गन्यासकी ही दी गयी है । जिसका प्रयोग इस प्रकार होता है-
ॐ हदयाय नमः। ॐ भूः शिरसे स्वाहा। ॐ भुवः शिखायै वपर्। ॐ स्वः कवचाय हुम्। ॐ भूर्भुवः नेत्राभ्यां
वौषट्। ॐ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट्।
उपर्युक्त छः मन्त्रवाक्य अद्खन्यासके है । इनमेसे पहले वाक्यका उच्चारण करके दाहिने हाथकी हथेलीसे हदयका स्पर्श
करे। दूसरे वाक्यको पदढकर अंगठेसे मस्तकका स्पर्श करना चाहिये । तीसरे वाक्यका उच्चारण करके अंगुलियेकि अग्रभागसे
शिखाका स्पर्श करे। चतुर्थं वाक्य पदठुकर दाहिने हाथको अंगुलि्योसे बायीं भुजाका ओर वायं हाथकी अगुलियोसे दाहिनी
भुजाका स्पर्श करे। पञ्चम वाक्यसे अनामिका ओर अद्रषटदाय दोनों नेत्रोका स्पर्शं करना चाहिये । छटा वाक्य बोलकर दाहिने
हाधको बायीं ओरसे पीछेको ओर ले जाकर दाहिने ओरसे आगेको ओर ले आवे। तर्जनी तथा मध्यमा अंगुलि्यासे वायं
हाथको हथेलीपर ताली बजावे। अद्खन्याससे पहले करन्यास करना चाहिये। करन्यास-वाक्य इस प्रकार हो सकते है-
ॐ अन्रुभ्यां नमः। ॐ भूः तर्जनीभ्यां नमः। ॐ भुवः मध्यमाभ्यां नमः। ॐ स्वः अनामिकाभ्यां नमः। ॐ भूर्भुवः
कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ भूर्भुवः स्वः करतलकरपृष्भ्यां नमः।
इनमें प्रथम वाक्य बोलकर दोनों तर्जनीसे दोनों अङ्गुष्ठोका, द्वितीय वाक्य बोलकर दोनों अङ्गुष्ठो से दोनों तर्जनीका,
तृतीय वाक्यसे अङ्खुषटोदार ही दोनों मध्यमाओंका, चतुर्थं वाक्यसे दोनों अनामिकाओंका, पञ्चम वाक्यसे दोनो
कनिष्ठिकाओंका ओर छठे वाक्यसे दोनों हथेलियों तथा उनके पष्ठ भागोका परस्पर स्पर्शं करना चाहिये।
३. आगच्छ वरदे देवि व्रयक्षरे ब्रह्मवादिनि । गायत्रिच्छन्दसां मात्ब्रह्ययोने नमोऽस्तु ते॥
(ना० पूर्व० २७। ४३-४४)
४. मध्ये वृषभारूढां शुक्लाम्बरसमावृताम् । सावित्रीं रुद्रयोनिं चावाहयेद्रुद्रवादिनीम् ॥
५. सायं तु गरुडारूढां पौताम्बरसमावृताम् । सरस्वतीं विष्णुयोनिमाह्ययेद् विष्णुवादिनीम् ॥
(ना० पूर्व० २७। ४४- ४६)
६. प्राणायाम- मन्त्र ओर उसकी विधि इस प्रकार है-
((-0. 1/(111141/5511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
९९
पढ़कर दो बार आचमन करे। मध्याहकालमें
"आपः पुनन्तु ' इत्यादिसे ओर सायं संध्यामं ' अग्निश्च
मा" इत्यादि मन्त्रसे आचमन करना चाहिये । इसके
वाद "आपो हि षा मयो भुवः' इत्यादि तीन
ऋचाओद्वारा मार्जन करे। फिर-
सुमित्रिया न आप ओषधयः सन्तु । दुर्मित्रियास्तस्मै
सन्तु योऽस्मान्देष्टि। यं च वयं द्विष्मः।
-इस मन्त्रको पढते हए हथेलीमें जल लेकर
नासिकासे उसका स्पर्शं कराये ओर भीतरके काम-
क्रोधादि शत्रु उस जलमें आ गये, एेसी भावना
करके दूर फक दे । इस प्रकार शतरुवर्गको दूर भगाकर
"द्रुपदादिव मुमुचानः" इत्यादि मन्रसे अभिमन्त्रित
जलको अपने सिरपर डाले । उसके वाद ऋतञ्च
सत्यम्" इत्यादि मन्त्रसे अघमर्षण करके ` अन्तश्चरसि '
इत्यादि मन्त्रद्रारा एक ही बार जलका आचमन
करे । देवर्षे ! तदनन्तर सूर्यदिवको विधिपूर्वक गन्ध,
पुष्प ओर जलकी अञ्जलि दे। प्रातःकाल स्वस्तिकाकार
अञ्जलि बांधकर भगवान् सूर्यका उपस्थान करे ।
मध्याहकालमें दोनों भुजाओंको ऊपर उठाकर ओर
सायंकाल बहि नीचे करके उपस्थान करे। इस
प्रकार प्रातः आदि तीनों समयके लिये पृथक्-
पृथक् विधि है। नारदजी ! सूर्योपस्थानके समय
"उदुत्यं जातवेदसम्", चित्रं देवानामुदगादनीकम् ,
" तच्चक्षुर्देवहितम्' इन तीन ऋचाओंका जप करे ।
इसके सिवा सूर्यदेवता-सम्बन्धी अन्य मन्त्रोका,
शिव-सम्बन्धी मन्त्रीका तथा विष्णुदेवता- सम्बन्धी
मन्त्रोका भी जप किया जा सकता हे । सूर्योपस्थानके
वाद "तेजोऽसि" तथा "गायत्र्यस्येकपदी ' इत्यादि
मन्त्रोको पढ़कर भगवान् सविताके तेजःस्वरूप
गायत्रीको अथवा परमात्म-तेजको स्तुति- प्रार्थना
करे । तदनन्तर पुनः तीन वार अद्भन्यास करके
ब्रह्मा, रुद्र तथा विष्णुको स्वरूपभूता शक्तियोका
चिन्तन करे। (प्रातःकाल ब्रह्माको, मध्याहमें सुद्रकों
ओर सायंकाल विष्णुकी शक्तिरूपसे क्रमशः गायत्री,
सावित्री ओर सरस्वतीका चिन्तन करना चाहिये ।
उनका क्रमशः ध्यान इस प्रकार है-)
ब्रह्माणी चतुराननाक्षवलयं कुम्भं करेः स्रुक्स्रुवौ
विभ्राणा त्वरुणेन्दुकान्तिवदना ऋृरूपिणी बालिका ।
हंसारोहणकेलिखणखणमणेर्विम्बार्सिता भूषिता
गायत्री परिभाविता भवतु नः संपत्समृद्धयै सदा ॥
(ना० पूर्व०। २५॥। ५५)
"प्रातःकालमे गायत्रीदेवी ऋएवेदस्वरूपा
वालिकाके रूपमे विराज रही है । ये ब्रह्माजीकी
शक्ति टै । इनके चार मुख टै । इन्टोने अपने
हाथमे अक्षवलय, कलश, सुक् ओर सुवा धारण
कर रखा है । इनके मुखकी कान्ति अरूण चन्द्रमाके
समान कमनीय है। ये हंसपर चद्नेकी क्रोडा कर
रही हँ। उस समय इनके मणिमय आभूपण
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ तत्सवितुर्विण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो
यो नः प्रचोदयात्। ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् ॥ त ॥ र
पहले दाहिने हाधके अङ्गु्ठस नासिकाका दायोँ चिद्र बंद करके बाय द्रम वायुको अदर खीचे। साथ दही
नाभिदेशमें नीलकमलदलके समान श्यामवर्णं चतुर्भुज भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए प्राणायाम-मन््रका तीन बार पाट
कर जाय। (यदि तीन बार पाठ नहो सकेतो एक ही वार पाठ करे ओर अधिकके लिये अभ्यास बढ़वे।) इसको
पूरक कहते रै । पूरकके पश्चात् अनामिका ओर कनिष्ठिका अगुलियोंसे नासिकाके वारये छिद्रको भी वंद करके तवतक
श्वास रेके रहे, जबतक कि प्राणायाम-मन््रका तीन वार (या शक्तिके अनुसार एक बार) पाठ न हो जाय। इस समय
हदयके बीच कमलासनपर विराजमान अरुण-गौरमिश्रित वर्णवाले चतुर्मुख ब्रह्माजीका ध्यान करे । यद कुम्भक क्रिया
है । इसके बाद अँगृटा हटाकर नासिकाके दाहिने दद्रसे वायुको धीरे-धीरे तवतक बाहर् निकाले, जवतक प्राणायाम
मन्त्रका तीन (या एक) बार पाठ न हौ जाय। इस समय शुद्ध स्फटिककरे समान श्रेत वर्णवाले त्रिनेत्रधारी भगवान्
शंकरका ध्यान करे। यह रेचक क्रिया टै, यह सव मिलकर एकः प्राणायाम कटलाता है ।
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। 0166101. 01411260 0 6810011
१००
खनखन करने लगते हं । मणिके विम्बोसे ये कूजित
ओर विभूषित हं । एेसी गायत्रीदेवी हमारे ध्यानकी
विषय होकर देवी सम्पत्ति बढ़ानेमें सहायक हों ।
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4
रुद्राणी नवयोवना त्रिनयना वेयाध्रचर्माम्बरा
खट्वाद्धत्रिशिखाक्षसूत्रवलयाऽभीतिः श्रियै चास्तु नः।
विद्युदामजटाकलापविलसद्बालेन्दुमौलिर्मुदा
सावित्री वृषवाहना सिततनुर्ध्येया यजूरूपिणी ॥
(ना० पूर्वं । २७॥। ५६)
` मध्याहकालमं वही गायत्री " सावित्री ' नाम धारण
करती हं। ये सट्रकी शक्ति हे। नूतन योवनसे सम्पन्न है।
इनके तीन नेत्र हे। व्याघ्रका चर्म इन्होने वस्त्रके रूपमे
धारण कर रखा हे। इनके हाथोमें खट्वाङ्ग, त्रिशूल,
अक्षवलय ओर अभयकी मुद्रा हे। तेजोमयी विदयुतके
समान देदीप्यमान जयम बालचन्द्रमाका मुकुर शोभा
पा रहा हे। ये आनन्दमें मग्र है । वृषभ इनका वाहन
है । शरीरका रग (कपुरके समान) गौर है ओर यजुर्वेद
इनका स्वरूप है। इस रूपमे ध्यान करने योग्य
सावित्री हमारे एेशर्यकी वृद्धि करें।'
ध्येया सा च सरस्वती भगवती पीताम्बरालङ्कता ॥
श्यामा श्यामतनुर्जरा परिलसद् गात्राञ्चिता वेष्णवी।
सस्षिप्त नारदपुराण
तार््यस्था मणिनूपुराङ्गदलसदग्रेवेयभूषोज्चला
हस्तालङ्कूतशङ्खचक्रसुगदापद्या श्रिये चास्तु नः ॥
(ना० पूर्व २७। ५७)
` सायंकालमे वही गायत्री विष्णुशक्ति भगवती
सरस्वतीका रूप धारण करती हैं । उनके श्रीअङ्ग
पीताम्बरसे अलङ्कत्त होते है । उनका रंग-रूप श्याम
हे। शरीरका एक-एक अवयव श्याम हे। विभिन्न
अङ्खोमे जरावस्थाके लक्षण प्रकर होकर उनकी शोभा
बदा रहे हं। वे गरुड्पर बेटी हैं। मणिमय नूपुर.
भुजबंद ओर सुन्दर हार, हमेल आदि भूषणोसे उनकी
स्वाभाविक प्रभा ओर बट गयी है। उनके हाथेमिं
शङ्ख, चक्र ओर उत्तम गदा तथा पदम सुशोभित हे ।
इस रूपमे ध्यान करने योग्य सरस्वतीदेवी हमारी
श्रवृद्धि करे।'
इस प्रकार ध्यान करके गायत्री-मन्त्रका
जप करे। प्रातः ओर मध्याहकालमें खड
होकर तथा सायंकालमे बैठकर भक्तिभावसे
गायत्रीके ध्यानमें ही मनको लगाये हुए जप
करना चाहिये । प्रति समयकी संध्योपासनामें
गायत्रीदेवीका एक हजार जप उत्तम, एक सो
जप मध्यम तथा कम-से-कम दस बार जप
साधारण माना गया है। आरम्भमें प्रणव फिर
" भूर्भुवःस्वः' उसके वाद ‹ तत्सवितुः" इत्यादि
त्रिपदा गायत्री- यही जपने योग्य गायत्री-मन्त्रका
स्वरूप हे। मुने} ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ ओर
यतिके द्वारा जो गायत्री-मन्त्रका जप होता है,
उसमें छः प्रणव लगावे अथवा आदि-अन्तमे प्रणव
लगाकर मन््रको उसमें सम्युटित कर दे। परंतु
गृहस्थके लिये केवल आदिमे एक प्रणव
लगानेका नियम हे। एेसा ही मन्त्र उसके लिये
जपने योग्य हे 1 तदनन्तर यथाशक्ति जप करके
उसे भगवान् सूर्यको निवेदित करे। फिर
गायत्री तथा सूर्यदेवताके लिये एक-एक अञ्जलि
((-0. 1/८1111(4<511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
जल छोडे। तत्पश्चात् 'उत्तरेः शिखरे देवि"
इत्यादि मन्त्रसे गायत्रीदे बीका विसर्जन करते
हुए कहे--' देवि ! श्रीब्रह्मा, शिव तथा भगवान्
विष्णुको अनुमति लेकर सादर पधारो।' इसके
वाद दिशाओं ओर दिग्देवताओंको हाथ जोड़कर
प्रणाम करनेके अनन्तर प्रातःकाल आदिका दूसरा
कर्म भी विधिपूर्वक सम्पन्न करे। देवर्षे! गृहस्थ
पुरुष तो प्रातःकाल ओर मध्याहकालमें स्नान करे ।
परतु वानप्रस्थी तथा संन्यासीको तीनों समय स्नान
करना चाहिये । जो रोग आदिसे कष्ट पा रहे हों
उनके लिये तथा पथिकोके लिये एक ही बार
स्नानका विधान किया गया हे। मुनीश्वर! संध्योपासनके
अनन्तर द्विज हाथमे कुश धारण करके ब्रह्मयज्ञ
करे । यदि दिनमें बताये गये कर्मं प्रमादवश न
किये गये हों तो रातके पहले पहरमे उन्हे क्रमशः
पूर्णं कर लेना चाहिये। जो धूर्तं बुद्धिवाला द्विज
आपत्तिकाल न होनेपर भी संध्योपासन नहीं
करता, उसे सब धर्मेसि भ्रष्ट एवं पाखण्डी
समञ्जना चाहिये । जो कपटपूर्णं ल्यूठी युक्ति देनेमें
चतुर होनेके कारण संध्या आदि कर्मोको अनावश्यक
बताते हुए उनका त्याग करता है, उसे महापातकिर्याका
सिरमौर समञ्जना चाहिये ।
संध्योपासनाके बाद विधिपूर्वकं देवपूजा तथा
बलिवैश्चदेव-कर्म करना चाहिये । उस समय आये
हुए अतिथिका अन्न आदिसे भलीभोति सत्कार
करना चाहिये । उनके आनेपर मीठे वचन बोलना
चाहिये । उन्हें घरमें ठहरनेके लिये स्थान देकर
१०९१
अन्न-जल अथवा कन्द-मूल-फलसे उनको पूजा
करनी चाहिये। जिसके घरसे अतिथि निराश
होकर लौटता है, वह उसे अपना पाप दे बदलें
उसका पुण्य लेकर चला जाता हे। जिसका नाम
ओर गोत्र पहलेसे सात न हो ओर जो दूसरे
गोवसे आया हो, एसे व्यक्तिको विद्वान् पुरूष
' अतिथि' कहते हैं । उसका श्रीविष्णुकी भति
पूजन करना चाहिये । ब्रह्मन् ! प्रतिदिन पितरोकौ
तृपिके उदेश्यसे अपने ग्रामके निवासी एक
श्रोत्रिय एवं वैष्णव ब्राह्मणको अन्न आदिसे तृप्त
करना चाहिये। जो पञ्चमहायजोका त्यागी है,
उसे विद्वान् लोग ब्रह्महत्यारा कहते ह । इसलिये
प्रतिदिन प्रयतपूर्वक पञ्चमहायज्ञोका अनुष्ठान करना
चाहिये । देवयक्, भूतयज्ञ, पितृयस्च, मनुष्ययज्ञ
तथा ब्रह्मयज्ञ-इनको पञ्चयज्ञ कहते हैं । भृत्य
१. तैत्तिरीय आरण्यके “उत्तमे शिख" एेसा पाट मिलता है। इस पुराणे "उत्तरे शिखरे" आया दै ।
२. यस्तु संध्यादिकर्माणि कूटयुिविशास्दः । परित्यजति तं विद्यान्महापातकिनां वरम् ॥
(ना० पूर्व २७। ६८)
३. अतिधिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवरतति । स॒ तस्मै दुष्कृतं द्वा पुण्यमादाय गच्छति॥
अस्ातगोत्रनामानें
अन्यग्रामादुपागतम् । विपध्चितोऽतिधिं प्राहुरविष्णुवत् तं प्रपूजयेत् ॥
(ना पूर्व° २७। ७२-५३)
((-0. 1/८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
कावा काकण्ववा त कक कका काक्का क
९०२
संक्षिप्त नारदपुराण
ओर मित्रादिवग्कि साथ स्वयं मोन होकर भोजन
करना चाहिये । द्विज कभी अभक्ष्य पदार्थको न
खाय। सुपात्र व्यक्तिका त्याग न करे, उसे अवश्य
भोजन करावे। जो अपने आसनपर पैर रखकर
अथवा आधा वस्त्र पहनकर भोजन करता है या
मुखसे उगले हुए अन्रको खाता है, विद्वान् पुरुष
उसे “शराबी' कहते हँ । जो आधा खाये हुए
मोदक, फल ओर प्रत्यक्ष नमकको पुनः खाता है,
वह गोमांसभोजी कहा जाता हे । द्विजको चाहिये
कि वह पानी पीते, आचमन करते तथा भक्ष्य
पदार्थोका भोजन करते समय मुखसे आवाज न
करे। यदि वह उस समय मुंहसे आवाज करता है
तो नरकगामी होता हे । मोन होकर अन्नकी निन्दा
न करते हए हितकर अन्नरका भोजन करना
चाहिये । भोजनके पहले एक बार जलका आचमन
करे ओर इस प्रकार कहे “अमृतोपस्तरणमसि'-
(हे अमृतरूप जल! तू भोजनका आश्रय अथवा
आसन है) । फिर भोजनके अन्तमं एक बार जल
पीये ओर कहे-" अमृतापिधानमसि" (हे अमृत,
तू भोजनका आवरण-उसे ठढकनेवाला है) ।
पहले प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान-इनके
निमित्त अन्नकी पोच आहुतियों अपने मुखमें
डालकर आचमन कर लेः। उसके बाद भोजन
आरम्भ करे । विप्रवर नारदजी ! इस प्रकार भोजनके
पश्चात् आचमन करके शास्त्रचिन्तनमें तत्पर होना
चाहिये । रातमें भी आये हुए अतिथिका यथाशक्ति
भोजन, आसन तथा शयनसे अथवा कन्द-मूल-
फल आदिसे सत्कार करे । मुने ! इस प्रकार गृहस्थ
पुरुष सदा सदाचारका पालन करे। जिस समय
वह सदाचारको त्याग देता हे, उस समय प्रायश्चित्तका
भागी होता हे।
साधुशिरोमणे ! अपने शरीरको सफेद बाल
आदि दोषोसे युक्त देखकर अपनी पत्रीको
पुत्रके संरक्षणमें छोड दे। स्वयं घरसे विरक्त
होकर वनमें चला जाय अथवा पत्रीको भी साथ
ही लेता जाय । वहां तीनों समय स्नान करे । नख,
दादी, मूं ओर जटा धारण किये रहे । नीचे
भूमिपर सोये। ब्रह्यचर्यका पालन करे ओर
पञ्चमहायज्चोके अनुष्ठानमें तत्पर रहे । प्रतिदिन
फल-मूलका भोजन करे ओर स्वाध्यायमें लगा
रहे । भगवान् विष्णुके भजनमें संलग्र होकर सब
प्राणियोके प्रति दयाभाव रखे। गवमें पैदा हए
फल-मूलको त्याग दे । प्रतिदिन आठ ग्रास भोजन
करे तथा रातमें उपवासपूर्वक रहे। वानप्रस्थ-
आश्रममें रहनेवाला द्विज उबटन, तेल, मैथुन,
निद्रा ओर आलस्य त्याग दे। वानप्रस्थी पुरुष
शङ्ख, चक्र ओर गदा धारण करनेवाले भगवान्
नारायणका चिन्तन तथा चान्द्रायण आदि तपोमय
त्रत करे। सदीं-गरमी आदि दन्द्रोको सहन करे।
सदा अग्रिको सेवा (अग्निहोत्र) -में संलग्र रहे।
जब मनमें सब वस्तुओंकी ओरसे वैराग्य हो
जाय तभी संन्यास ग्रहण करे, अन्यथा वह पतित
हो जाता है। संन्यासीको वेदान्तके अभ्यासं
तत्पर, शान्त, संयमी ओर जितेन्द्रिय, दन्द्रौसे रहित
तथा ममता ओर अहंकारसे शून्य रहना चाहिये ।
वह शम-दम आदि गुणोंसे युक्त तथा काम-
क्रोधादि दोषोंसे दूर रहे। संन्यासी द्विज नग्र रहे या
पुराना कोपीन पहने। उसे अपना मस्तक मुंडाय
रहना चाहिये । वह शत्रु-मित्र तथा मान-अपमानमें
समान भाव रखे। गोँवमें एक रात ओर नगरमें
अधिक-से-अधिक तीन रात रहे। संन्यासी सदा
भिक्षासे ही जीवन-निर्वाह करे। किसी एकके
बब ब् ~~~
९. प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा, समानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा- इस प्रकार कहता हुजा
पांच ग्रास ले।
00-0. ॥\/८1111॥|<511८1 8118८811 \/28185} 06101. 01011266 0४ 66800011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
घरका अन्न खानेवाला न हो । जब चूल्हेकी आग वुञ्च
जाय, घरके लोगोका खाना-पीना हो गया हो, कोई
वाको न हो, उस समय किसी उत्तम द्विजके घरमे,
जहो लडाई-ज्जगड़ा न हो, भिक्षाके लिये संन्यासीको
जाना चाहिये। संन्यासी तीनों काल स्नान ओर
भगवान् नारायणका ध्यान करे। ओर मनको जीतकर
इद्धियोको वशमें रखते हुए प्रतिदिन प्रणवका जप
करता रहे। अगर कोई लम्पट संन्यासी कभी एक
व्यक्तिका अन्न खाकर रहने लगे तो दस हजार
प्रायश्चित्त करनेपर भी उसका उद्धार नहीं दिखायी
देता । ब्रह्मन्! यदि संन्यासी लोभवश केवल शरीरके
ही पालन-पोषणमें लगा रहे तो उसे चाण्डालक
समान समञ्चना चाहिये। सभी वर्णो ओर आश्रमोमें
उसकी निन्दा होती है। संन्यासी अपने आत्मस्वरूप
भगवान् नारायणका चिन्तन करे। जो रोग-शोकसे
^+
१०३
रहित, दद्धि परे ममताशुन्य, शान्त, मायातीत, ईप्यारहित,
अव्यय, परिपूर्ण, सच्विदानन्दस्वरूप ज्ञानमय, निर्मल,
परम ज्योतिर्मय, सनातन, अधिकारी, अनादि, अनन्त
जगत्को चिन्मयताके कारण गुणातीत तथा परात्पर
परमात्मा है उन्हीका नित्य ध्यान करना चाहिये। वह
उपनिषद्-वाक्योका पाठ एवं वेदान्तशास्त्रके अर्का
विचार करता रहे। जितेन्द्रिय रहकर सदा सहस्रो
मस्तकवाले भगवान् श्रीहरिका ध्यान करे। जो ईर्ष्या
छोडकर इस प्रकार भगवानके ध्यानम तत्पर रहता देः
वह परमानन्दस्वरूप उत्कृष्ट सनातन ज्योतिको प्राप्त होता
है। जो द्विज इस तरह क्रमशः आश्रमसम्बन्धी आचाररका
पालन करता है, वह परम धामे जाता है। वहो जाकर
कोई शोक नहीं करता। वर्ण ओर आश्रम-सम्बन्धी
धर्मके पालनमें तत्पर एवं सब पापस रहित भगवद्धक्त
भगवान् विष्णुके परम धामको प्राप्त होते ह।
४९९२५
श्राद्धी विधि तथा उसके विषयमे अनेक ज्ञातव्य विषयोंका वर्णन
श्रीसनकजी कहते है- मुनिश्रेष्ठ! में श्राद्धको
उत्तम विधिका वर्णन करता हू, सुनो। उसे सुनकर
मनुष्य सब पापोसे मुक्त हो जाता है। पिताक
क्षयाह तिथिके पहले दिन स्नान करके एक समय
भोजन करे। जमीनपर सोये, ब्रह्मचर्यका पालन करे
तथा रातमें ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दे। श्राद्धकर्ता पुरुष
दातुन करना, पान खाना, तेल ओर उबटन लगाना,
मैथुन, ओषध-सेवन तथा दूसरोके अन्नका भोजनं
अवश्य त्याग दे। रास्ता चलना, दूसरे गोव जाना,
कलह, क्रोध ओर मैथुन करना, बोज्ञ ढोना तथा
दिनमें सोना-ये सब कार्य श्राद्धकर्ता ओर श्राद्धभोक्ताको
छोड देने चाहिये। यदि श्राद्धमं निमच्रित पुरुष
मैथुन करता है तो वह ब्रह्महत्याको प्राप्त होता ओर
नरकमें जाता हि। श्राद्धमें वेदके ज्ञाता ओर वैष्णव
ब्राह्मणको नियुक्त करना चाहिये । जो अपने वर्ण
ओर आश्रमधर्मके पालनमें तत्पर, परम शान्त, उत्तम
कुले उत्पन्न, राग-द्वेषसे रहित, पुराणोके अर्थज्ञानं
निपुण, सब प्राणि्योपर दया करनेवाला, देवपूजापगयण,
स्मृति्योका तत्व जाननेमं कुशल, वेदान्त-तत्वका
ज्ञाता, सम्पूर्णं लोककि हितमं संलग्न, कृतज्ञ, उत्तम
गुणयुक्त, गुरुजनोकी सेवामं तत्पर तथा उत्तम
शास्त्रवचनेद्राय धर्मका उपदेश देनेवाला हो, उसे
श्राद्धमे निमन्त्रित करे।
किसी अङ्खसे हीन अथवा अधिक अद्धवाला,
कदर्य, रोगी, कोढी, बुरे नखोवाला, अपने व्रतकं
खण्डित करनेवाला, ज्योतिषी, मुर्दां जलानेवाला,
कुत्सित वचन बोलनेवाला, परिवेत्ता (बं
भाईके अविवाहित रहते हुए स्वयं विवाह
करनेवाला), देवल, दुष्ट, निन्दकः, असहनशील,
धृत, गोवभर्का पुरोहित, असत्-शस्त्रोमें अनुराग
((-0. 1\/1(11114/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 60810011
९०६
संक्षिप्त नारदपुराण
रखनेवाला, वृषलीपति, कुण्डगोलक, यज्ञके
अनधिकारियेसे यज्ञ करनेवाला, पाखण्डपूर्णं आचरणवाला,
अकारण सिर मुंडनेवाला, परायी स्त्री ओर पराये धनका
लोभ रखनेवाला, भगवान् विष्णुकी भक्तिसे रहित,
भगवान् शिवकी भक्तिसे विमुख, वेद वेचनेवाला,
व्रतका विक्रय करनेवाला, स्मृतियों तथा मनत्रोको
बेचनेवाला, गवैया, मनुष्योको ञ्ठी प्रशंसाके लिये
कविता करनेवाला, कैयक-शस्त्रसे जीविका चलानेवाला,
वेदनिन्दक, गोव ओर वनमें आग लगानेवाला, अत्यन्त
कामी, रस वेचनेवाला, बूटी युक्ति देनेमे तत्पर
रहनेवाला-ये सब ब्राह्मण यत्नूर्वक श्राद्धमे त्याग देने
योग्य हें। श्राद्धसे एक दिन पहले या श्राद्धके दिन
ब्राह्मणको निमन्त्रित करे। श्राद्धकर्ता पुरुष हाथमे कुश
लेकर इन्ियोको वशमें रखते हए विद्वान् ब्राह्मणको
निमन्त्रण दे ओर इस प्रकार कटे “हे साधुशिरोमणे।!
श्राद्धमे अपना समय देकर मुञ्चपर कृपा प्रसाद करं।'
तदनन्तर प्रातःकाल उठकर सबेरेका नित्यकर्म
समाप्त करके विद्वान् पुरुष कुतपकालमेः श्राद्ध
प्रारम्भ करे। दिनके आठवें मुहूर्तम जब सूर्यका तेज
कुछ मन्द हो जाता है, उस समयको ' कुतपकाल'
कहते हे । उसमें पितरोकी तृपिके लिये दिया हुआ
दान अक्षय होता हे । ब्रह्माजीने पितरोको अपराहकाल
ही दिया है। मुनिश्रेष्ठ! विभिन्न द्रव्योके साथ जो
कव्य असमयमें पितरोके लिये दिया जाता हे, उसे
राक्षसका भाग समञ्जना चाहिये । वह पितरोके पास
नहीं पहुंच पाता है। सायंकालमे दिया हुआ कव्य
राक्षसका भाग हो जाता हे। उसे देनेवाला नरकमें
पड़ता है ओर उसको भोजन करनेवाला भी
नरकगामी होता हे । ब्रह्मन्! यदि निधनतिथिका मान
पहले दिन एक दण्ड ही हो ओर दूसरे दिन वह
अपराह्नतक व्याप्त हो तो विद्वान् पुरुषको दूसरे ही
दिन श्राद्ध करना चाहिये। किंतु मृत्युतिथि यदि
दोनों दिन अपराहकालमें व्याप्त हो तो क्षयपक्षमें
पूर्वतिथिको श्राद्धमे ग्रहण करना चाहिये ओर
वृद्धिपक्षमें परतिथिको । यदि पहले दिन क्षयाहतिथि
चार घडी हो ओर दूसरे दिन वह सायंकालतक
व्याप्त हो तो श्राद्धके लिये दूसरे दिनवाली तिथि ही
उत्तम मानी गयी हे । द्विजोत्तम ! निमन्त्रित ब्राह्यणोके
एकत्र होनेपर प्रायश्चित्तसे शुद्ध हदयवाला श्राद्धकर्ता
पुरुष उनसे श्राद्धके लिये आज्ञा ले। ब्राह्यणोसे
श्राद्धके लिये आज्ञा मिल जानेपर श्राद्धकर्ता पुरुष
फिर उनमेसे दोको विश्वेदेव श्राद्धके लिये ओर
तीनको विधिपूर्वक पितृश्राद्धके लिये पुनः निमन्त्रित
करे। अथवा देवश्राद्ध तथा पितृश्राद्धके लिये एक-
एक ब्राह्मणको ही निमन्त्रित करे । श्राद्धके लिये
आज्ञा लेकर एक-एक मण्डल बनावे । ब्राह्यणके
लिये चोकोर, क्षत्रियके लिये त्रिकोण तथा वैश्यके
लिये गोल मण्डल बनाना आवश्यक समञ्लना चाहिये
ओर शुद्रको मण्डल न बनाकर केवल भूमिको सीच
देना चूदिये। योग्य ब्राह्मणेकि अभावमें भाईको, पुत्रको
अथवा अपने-आपको ही श्राद्धं नियुक्त करे । परंतु
वेदशास्त्रके ज्ञानसे रहित ब्राह्मणको श्राद्धमे नियुक्त
न करे। ब्राह्यणोके पैर धोकर उन्हें आचमन करावे
ओर नियत आसनपर बेठाकर भगवान् विष्णुका
स्मरण करते हुए उनकी विधिपूर्वक पूजा करे ।
ब्राह्यणोके बीचमें तथा श्राद्धमण्डपके द्वारदेशमें
श्राद्धकर्ता पुरुष "अपहता असुरा रक्चाःसि वेदिषदः ।'
इस ऋचाका उच्चारण करते हुए तिल विखेरे । जौ
१. वृषली शुद्रजातिकी स्त्रीको कहते ह । स्मृतियोके अनुसार जो कन्या अविवाहित अवस्थामें अपने पिताके
यहां रजस्वला हो जाती है, उसकी भी वृषली संजा होती है ।
२. सम्पूर्ण दिन १५ मुहूर्तका होता है । उसमें आट्वँ मुहूर्तं मध्याहके बाद आता है । वही पितरोके श्राद्धके
लिये उत्तम माना गया हे, उसीका नाम "कुतप" है।
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद्
ओर कुशोद्रारा विश्वेदेवोंको आसन दे। हाथमे जौ
ओर कुश लेकर कहे- विश्वेषां देवनाम् इदम् आसनम्'
एेसा कहकर विश्चेदेवोकि बेठनेके लिये आसनरूपसे
उस कुशाको रख दे ओर प्रार्थना करे-हे विश्वदेवो ।
आपलोग इस देवश्राद्धमे अपना क्षण (समय) दें
ओर प्रतीक्षा करे। अक्षय्योदक ओर आसन समर्पणके
` वाक्यमं विश्वदेवो ओर पितरोके लिये षष्ठी विभक्तिका
प्रयोग करना -चाहिये। आवाहन-वावय द्वितीया
विभक्ति वतायी गयी है । अन्न सेमर्पणके वाक्यम
चतुर्थी विभक्तिका प्रयोग होना । रोष कार
सम्बो कुशक। पवित्रं
युक्त दो पात्र लेकर उनमें “शं नो देवी ' इत्यादि
ऋचाका उच्चारण करके जल डाले । फिर "यवोऽसि"
इत्यादि मन्त्र बोलकर उसमें जव डउाले। उसके
बाद चुपचाप विना मन्त्रके ही गन्ध ओर पुष्प
छोड दे। इस प्रकार अर्ध्यपात्र तैयार हो जानेपर
' विश्वेदेवाः स" इत्यादि मन््रसे विश्वेदेवोका आवाहन
करे। तदनन्तर “या दिव्या आपः" इत्यादि मन्त्रसे
अर्घ्यको अभिमन्त्रित करके एकाग्रचित्त हो पित्र
१०५
ओर मातामह- सम्बन्धी विश्चेदेवोंको संकल्पपूर्वक
क्रमशः अर्घ्य दे। उसके वाद गन्ध, पत्र, पुष्प,
यज्ञोपवीत, धूप, दीप आदिक द्वारा उन देवताओंका
पूजन करे। तत्पश्चात् विश्चेदेवोंसे आज्ञा लेकर
पितृगणोका पूजन करे । उनके लिये सदा तिलयुक्त
कुशोवाला आसन देना चाहिये । उन्हे अर्घ्य देनेके
लिये द्विज पूर्ववत् तीन पात्र रखे । “शं नो देवी० '
इत्यादि मन््रसे जल डालकर ' तिलोऽसि सोमदैवत्यो'
इत्यादि मन््रसे तिल डाले । फिर “उशन्तस्त्वा ' इत्यादि
मन््द्रारा पितरोका आवाहन करके ब्राह्मण एकाग्रचित्त
हो “या दिव्या आपः" इत्यादि मन्त्रसे अर्ध्यको
अभिमन्त्रित करके पूर्ववत् संकल्पपूर्वक पितरोको
समर्पित करे (अर्ध्यपात्रको उलटकर पितरेकि वामभागे
रखना चाहिये) । साधुशिरोमणे! तदनन्तर गन्ध, पत्र,
पुष्प, धूप, दीप, वस्त्र ओर आभूषणसे अपनी शक्तिके
अनुसार उन सबकी पूजा करे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष
घृतसहित अन्नका ग्रास ले अग्नौ करिष्ये" (अग्रिमे
होम कर्ूगा) एेसा कहकर उन ब्राह्म्णोसे इसके
लिये आज्ञा ले। मुने! "करवै अथवा "करवाणि"
(करू?) एेसा कहकर श्राद्धकतकि पृषछनेपर व्राह्मण
लोग ' कुरुष्व ' ' क्रियताम्" अथवा ' कुर" (कये) एेसा
करं । इसके बाद अपनी शाखाके गृह्यसूत्रमं वतायी हुई
विधिके अनुसार उपासनाग्रिकी स्थापना करके उसमे
पूर्वोक्त अन्नके ग्रासकी दो आहुतयो डाले। उस समय
“सोमाय पितुमते स्वधा नमः" एेसा उच्चारण करे। फिर
" अग्रये कव्यवाहनाय स्वधा नमः' एेसा उच्चारण
करे। विद्वान् पुरुष अन्तमं स्वधाकी जगह स्वाहा लगाकर
भी पित्ृयञ्चकी भोति आहुति दे सकते ह। इन्हीं दो
आहुतियेि पितरोको अक्षय तृति प्राप्त होती है। अग्रिके
अभावमें अर्थात् यजमानके अग्निहोत्री न होनेषर
ब्राह्मणके हाथ दानरूप होम करनेका विधान टै “ ।
१. आजकल अपात्रक पार्वण आदि श्राद्धोमं अग्नौकरण होमकी दोनों आहृतिं पुटकस्थित जलम डाली जाती
है । परंतु प्राचीन मत उपासनाग्रिमं ही हवन करनैका दै । आश्वलायनका वचन ह ' अग्रीकरणहोमं तु कुर्यादौपासनानले'
ओर अग्निके अभावमें पितृस्वरूप ग्राद्यणेकि हाथमे हवन कटनेका विधान है जैसा कि आश्वलायनका वचन है । ' जुहुयात्
पितृपाणिषु" अतः नारदपुराणका मूलोक्तं वचन अन्य स्मृतिकारोके मतसे भी मिलता-जुलता दै।
((-0. 1\॥८11114/5511॥1 21188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
१०६ संक्षिप्त नारदपुराण
ब्रह्मन्! जैसा आचार हो, उसके अनुसार
ब्राह्मणके हाथ या अग्रिमे उक्त होम करना
चाहिये । पार्वण उपस्थित होनेपर अग्रिको दूर
नहीं करना चाहिये ॥ विप्रवर ! यदि पार्वण उपस्थित
होनेपर अपनी उपास्य अग्रि दूर हो तो पहले
नूतन अग्रिकी स्थापना करके उसमें होम आदि
आवश्यक कार्य करनेके पश्चात् विद्वान् पुरुष उस
अग्रिका विसर्जन कर दे। यदि क्षयाह (निधनदिन)
तिथि प्राप्त हो ओर उपासनाग्नि दूर हो तो अपने
अग्निहोत्री द्विज भाईयों से विधिपूर्वक श्राद्धकर्म
सम्पन्न करावे । द्विजश्रेष्ठ ! श्राद्धकर्ता प्राचीनावीती
होकर (जनेरऊको दाहिने कंधेपर करके)
अग्रिमे होम करे ओर होमावशिष्ट अन्नको
ब्राह्मणके पात्र मे भगवत्स्मरणपूर्वक डाले।
फिर स्वादिष्ट भक्ष्य, भोज्य, लेह्य आदिके द्वारा
ब्राह्मणोका पूजन करे। तदनन्तर एकाग्रचित्त हो
विश्वेदेव ओर पितर-दोनेके लिये अनन परोसे। उस
समय इस प्रकार प्रार्थना करे
आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेवा महाबलाः ॥
ये यत्र विहिताः श्राद्धे सावधाना भवन्तु ते।
(ना० पूर्व० २८। ५७-५८)
"महान् बलवान् महाभाग विश्वेदेवगण यहां
पधारे ओर जो जिस श्राद्धमे विहित हो वे उसके
लिये सावधान रहें ।'
इस प्रकार विश्ेदवोसे प्रार्थना करे। "ये देवासः '
इत्यादि मन्त्रसे भी उनकी अभ्यर्थना करनी चाहिये।
देवपक्षके ब्राह्मणोसे भी एेसी ही प्रार्थना करे। उसके
१. ' ॐ अपहता असुरा रक्षाईसि वेदिषदः ' इत्यादि ।
बाद "ये चेह पितरो" इत्यादि मन््रसे पितरोकौ अभ्यर्थना
करके निघ्नाद्भिति मन्त्रसे उनको नमस्कार करे
अमूर्तानां च मूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्॥।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां योगचक्षुषाम्।
(ना० पूर्व २८। ५९-६०)
जिनका तेज सब ओर प्रकाशित हो रहा है जो
ध्यानपरायण तथा योगटष्टिसि सम्पत्र है, उन मूर्तं पितरोको
तथा अमूर्त पितरको भी में सदा नमस्कार करता हू।'
इस प्रकार पितरोको प्रणाम करके श्राद्धकर्ता पुरुष
भगवान् नारायणका चिन्तन करते हए दिये हुए हविष्य
तथा श्राद्धकर्मको भगवान् विष्णुकी सेवामे समर्पित कर
दे। इसके बाद वे सब ब्राह्मण मोन होकर भोजन प्रारम्भ
करे। यदि कोई ब्राह्मण उस समय हंसता या बात करता
है तो वह हविष्य राक्षसका भाग हो जाता है। पाक
आदिकी प्रशंसा (या निन्दा) न करे। सर्वथा मोन रहे।
भोजनपात्रको हाथसे स्पर्श किये हुए ही भोजन करे। यदि
कोई श्राद्धमे नियुक्त हुआ ब्राह्मण पात्रको सर्वथा छोड
देता है तो उसे श्राद्धहन्ता जानना चाहिये। वह नरकमें
पड़ता है। भोजन करनेवाले ब्राह्यणेमेंसे कुछ लोग यदि
एक- दूसरेका स्पर्शं कर लं ओर अन्रका त्याग न करके
उसे खरा लं.तो उस स्पर्शजनित दोषका निवारण कर्के
लिये र्हं आठ सौ गायत्री-मन्रका जप कला चाहिये
जब त्राह्मणलोग भोजन कसते हों उस समय श्राद्धकर्ता
पुरुष श्रद्धापूर्वक कभी पराजित न होनेवाले अविनाशी
भगवान् नारयणका स्मरण करे। रकषोघ्नमन्र, वैष्णवसूक्तः
तथा विशेषतः पितृसम्बन्धी* मन््रोका पाठ करे।
इसके सिवा पुरुषसूक्तः, त्रिणाचिकेतं, त्रिमधुः,
२. “इदं विष्णुति चक्रमे ', * विष्णोः कर्माणि पश्यत ', विष्णोः क्रमोऽसि सपत्रहा ', ' विष्णोनुं कं वीर्याणि प्रवोचम्,
ˆ विष्णो रराटमसि विष्णोः '।
३. ` आयन्तु न: पितरः”, “उदीरतामवर ', "ये चेह पितरो" * ऊर्ज॑वहन्तीरमृतं " इत्यादि ।
४. "सहस्रशीर्षः पुरुषः ' इत्यादि ।
५. द्वितीय कठक अन्तर्गत अयं वाव यः पवते" इत्यादि तीन अनुवाक ।
६. ' मधुवाता इत्यादि तीन ऋचाएं।
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पूर्वभाग-प्रथम पाद
त्रिसुपर्ण, पवमानसूक्त तथा यजुर्वेद ओर सामवेदक
मन्त्रोका जप करे। अन्यान्य पुण्यदायक प्रसंगोका
चिन्तन करे। इतिहास, पुराण तथा धर्मशास्रका भी
पाठ करे। नारदजी । जबतक ब्राह्मणलोग भोजन कर
तबतक इन सवका जप या पाठ करना चाहिये । जब
वे भोजन कर लें, उस समय परोसनेवाले पात्रमे बचा
हुआ उच्छिष्टके समीप भूमिपर लिखेर दे। यह
विकिरानः कहलाता हे।
उस समय "मधुवाता ऋतायते" इत्यादि सूक्तका
जप करे। नारदजी! इसके बाद श्राद्धकर्ता पुरुष
स्वयं दोनों पैर धोकर भलीभोति आचमन कर ले।
फिर ब्राह्यणोके आचमन कर लेनेपर पिण्डदान करे।
स्वस्तिवाचन कराकर अक्षय्योदक दे (तर्पण करे) ।
उसे देकर एकाग्रचित्त होकर ब्राह्मणोंका अभिवादन
करे। उलटे हुए अर्घ्यपात्रोको सीधा करके ब्राह्यणोको
दक्षिणा दे ओर उनसे स्वस्तिवाचनपूर्वक आशीर्वाद
ले। जो द्विज अर्घ्यपात्रको हिलाये या सीधा किये
बिना (दक्षिणा लेते ओर) स्वस्तिवाचन करते है,
उनके पितर एक वर्षतक उच्छिष्ट भोजन करते है।
स्मृति-कथित गोत्रं नो वर्धताम्" “दातारो नोऽभिवर्धन्ताम्'
इत्यादि वचन कहकर ब्राह्य्णोसे आशीर्वाद ग्रहण
करे। तदनन्तर उन्हें प्रणाम करे ओर उन्हं यथाशक्ति
दक्षिणा, गन्ध एवं ताम्बूल अर्पित करे। उलटे हुए
अर््यपात्रको उत्तान करके बाद हाथमे लेकर ' स्वधा"का
उच्चारण करे। फिर “ वाजे वाजे इत्यादि ऋचाको
पटढकर पितरोका, देवताओंका विसर्जन करे।
श्राद्ध-भोजन करनेवाला ब्राह्मण तथा श्राद्धकर्ता
यजमान दोनों उस रातमें मेथुनका त्याग करं। उस दिन
स्वाध्याय तथा रास्ता चलनेका कार्य यलनपूर्वक छोड
दं। जो करटी जानेके लिये यात्रा कर रहा हो, जिसे
१९०७
कोई रोग हो तथा जो धनहीन हो, वह पुरुष पाक न
बनाकर कच्चे अन्नसे श्राद्ध करे ओर जिसकी पती
रजस्वला होनेसे स्पर्श करे योग्य न हो, वह
दक्षिणारूपसे सुवर्ण देकर श्राद्धकार्य सम्पन करे। यदि
धनका अभाव हो ओर ब्राह्मण भी न मिलं तो बुद्धिमान्
पुरुष केवल अन्नका पाक बनाकर पित्रुसूक्तके मन्त्रसे
उसका होम करे। ब्रह्मन्! यदि उसके पास अन्नमय
हविष्यका अभाव हो तो यथाशक्ति घास ले आकर
पितरोकी तृप्िके उदेश्यसे गोओंको अर्पण करे। अथवा
स्नान करके विधिपूर्वक तिल ओर जलसे पितरोका
तर्पण करे। अथवा विद्वान् पुरुष निर्जन वनमें चला
जाय ओर म महापापी ददि हू यह कहते हुए
उच्वस्वरसे रुदन करे। मुनीश्वर! जो मनुष्य श्रद्धापूर्वकं
श्राद्ध करते है वे सम्पत्तिशाली होते है ओर उनकी
संतानपरम्पराका नाश नहीं होता। जो श्राद्धमं पितररोका
पूजन कसते है उनके द्वार साक्षात् भगवान् विष्णु पूजित
होते हँ ओर जगदीश्वर भगवान् विष्णुके पृजित होनेपर
सब देवता संतुष्ट हो जाते ह। देवता, पितर, गन्धर्व,
अप्सरा, यक्ष, सिद्ध ओर मनुष्यके रूपमं सनातन
भगवान् विष्णु ही विराजमान हं । उरसि यह स्थावर-
जंगमरूप जगत् उत्पत्न हुआ हे। अतः दाता ओर भोक्ता
सब भगवान् विष्णु ही है। भगवान् विष्णु सम्पूर्णं जगत्के
आधार सर्वभूतस्वरूप तथा अविनाशी ह । उनके स्वभावकी
कहीं भी तुलना नहीं हे, वे ही हव्य ओर कव्यके भोक्ता
है। एकमात्र भगवान् जनार्दन ही पख्रह्म परमात्मा कहलाते
है। मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार तुमसे श्राद्धकी उत्तम विधिका
वर्णन किया गया। इस विधिसे श्राद्ध करनेवा्लोका
पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। जो श्र द्विज श्राद्धकालमं
भक्तिपूर्वक इस प्रसंगका पाठ करता है, उसके पितर्
संतुष्ट होते हँ ओर संतति बढती है।
१ 0 0
१. “ब्रह्ममेतु माम्" इत्यादि तीन अनुवाक ।
२. विकिरान्न उन पितरोंका भाग है जौ आगमे जलकर मर गयं हां अथवा जिनका दाह-संस्कार न हआ हौ)
पितृ-सम्बन्धी ब्राह्मणके आगे उनके जृठनके समीप दक्षिणाग्र कुश विचछाकर परोसनेको थालीमें बचे अन्रको विखेर
देना चाहिये। फिर तिल ओर जल लेकर निम्नाह्ित श्लोक पदते हए वह अन्न समर्पित करना चाहिये ।
अग्रिदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुलै मम। भूमौ दत्तेन तोयेन तृप्ता यान्तु परां गतिम्॥
(याक्ञ० आचार० २४१ व शलोकक्री पिताक्षरा टीका)
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संक्षिप्त नारदपुराण
व्रत, दान ओर श्राद्ध आदिके लिये तिथियोक्ा निर्णय
श्रीसनकजी कहते हे- ब्रह्मन्! श्रुतियों ओर
स्मृतियोमें कहे हए जो त्रत, दान ओर अन्य
वेदिक कर्म हें वे यदि अनिर्णीत (अनिश्चित)
तिथियोमे किये जाये तो उनका कोई फल नहीं
होता। एकादशी, अष्टमी, षष्ठी, पूर्णिमा, चतुर्दशी,
अमावास्या ओर त॒तीया-ये पर-तिथिसे विद्ध
(संयुक्त) होनेपर उपवास ओर त्रत आदिमे भ्रष्ठ
मानी जाती हें । पूर्व-तिथिसे संयुक्त होनेपर ये त्रत
आदिमं ग्राह्य नहीं होती हैँ । कोई-कोई आचार्य
कृष्णपक्षमे सप्तमी, चतुर्दशी, तृतीया ओर नवमीको
पूर्वतिथिसे विद्ध होनेपर भी श्रेष्ठ कहते हँ । परंतु
सम्पूर्णं व्रत आदिमें शुक्लपक्ष ही उत्तम माना गया
हे ओर अपराहकौ अपेक्षा पूर्वाह्नको त्रतमें ग्रहण
करने योग्य काल बताया गया है; क्योंकि वह
उससे अत्यन्त श्रेष्ठ है । रात्रि-त्रतमें सदा वही
तिथि ग्रहण करनी चाहिये जो प्रदोषकालतक
मौजूद रहे। दिनके त्रतमें दिनव्यापिनी तिथियाँ
ही त्रतादि कर्म करनेके लिये पवित्र मानी गयी
हे। इसी प्रकार रात्रि-त्रतोमें तिथियोके साथ
रात्रिका संयोग बड़ा श्रेष्ठ माना गया हि। श्रवण
द्रादशीके त्रतमें सूर्योदयव्यापिनी द्वादशी ग्रहण
करनी चाहिये । सूर्यग्रहण ओर चन्द्रग्रहणमें जबतक
ग्रहण लगा रहे, तबतककी तिथि जप आदिमे
ग्रहण करने योग्य दे।
अब सम्पूर्णं संक्रान्तियोमें होनेवाले पुण्यकालका
वर्णन किया जाता है । सूर्यकी संक्रान्तियोमें सान,
दान ओर जप आदि करनेवालोको अक्षय फल
प्राप्त होता है । इन संक्रान्तियोमिं कर्ककी संक्रान्तिको
दक्षिणायन संक्रम जानना चाहिये । कर्ककी संक्रान्तिमे
विद्वान् लोग पहलेकी तीस घड़ीको पुण्यकाल
मानते हें । वृष, वृद्चिक, सिंह ओर कुम्भ राशिको
संक्रान्तियोमें पहलेके आठ मुहूर्तं (सोलह घडी)
स्नान ओर जप आदिमे ग्राह्य है । ओर तुला तथा
मेषको संक्रान्तियोमें पूर्वं ओर परकी दस-दस
घड्यां सान आदिके लिये श्रेष्ठ मानी गयी हेँ।
इनमे दिया हुआ दान अक्षय होता है। ब्रह्यन्।
कन्या, मिथुन, मीन ओर धनकी संक्रान्तियोमें
बादको सोलह घटिकाएं पुण्यदायक जाननी चाहिये।
मकर-संक्रान्तिको उत्तरायण संक्रम कहा गया है।
इसमे पूर्वक चालीस ओर बादक्ी तीस घडा
स्नान-दान आदिके लिये पवित्र मानी गयी हें।
विप्रवर! यदि सूर्यं ओर चन्द्रमा ग्रहण लगे हुए ही
अस्त हो जाये तो दूसरे दिन उनका शुद्ध मण्डल
देखकर ही भोजन करना चाहिये ।
धर्मको इच्छा रखनेवाले विद्वानोने अमावास्या
दो प्रकारकी बतायी है-सिनीवाली ओर कुहू ।
जिसमे चन्द्रमाकौ कला देखी जाती है, वह
चतुर्दशीयुक्त अमावास्या सिनीवाली कही जाती है
ओर जिसमें चनद्रमाकी कलाका सर्वथा क्षय हो
जाता हे, वह चतुर्दशीयुक्त अमावास्या कुहू मानी
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पूर्वभाग-प्रथम पाद
गयी हे‹ । अग्निहोत्री द्विजोको श्राद्धकर्ममिं सिनीवाली
अमावास्याको ही ग्रहण करना चाहिये तथा |
शूद्रो ओर अग्रिरहित द्विजोंको कुमे श्राद्ध करना
चाहिये। यदि अमावास्या तिथि अपराहकालमें
व्याप्त हो तो क्षय (मूृत्युकर्म) -में पूर्व-तिथि ओर
वृद्धि (जन्म-कर्म) -में उत्तर-तिथिको ग्रहण करना
चाहिये । यदि अमावास्या मध्याहकालके बाद प्रतीत
हो तो शास्त्रकुशल साधु पुरुषोने उसे भूतविद्धा
( चतुर्दशीसे संयुक्त) कहा हे । जव तिथिका अत्यन्त
क्षय होनेसे दूसरे दिन वह अपराह्व्यापिनी न हो
तब (पूर्वं दिनको) सायंकालव्यापिनी सिनीवाली
तिथिको ही श्राद्धमे ग्रहण करना चाहिये। यदि
तिथिकी अतिशय वृद्धि होनेपर वह दूसरे दिन
अपरा्ृकालतक चली गयी हो तो चतुर्दशी-विद्धा
अमावास्याको त्याग दे ओर कुहूको ही श्राद्धकर्ममे
ग्रहण करे। यदि अमावास्या तिथि एक मध्याहसे
लेकर दूसरे मध्याहतक व्याप्त हो तो इच्छानुसार पूर्व
या पर-दिनकी तिथिको ग्रहण करे।
मुनिश्रेष्ठ! अब मं सम्पूर्णं पर्वापर होनेवाले अन्वाधान
(अग्रिस्थापन)-का वर्णन करता हू। प्रतिपदाके
दिन याग करना चाहिये। पर्वके अन्तिम चतुर्थाश
ओर प्रतिपदाके प्रथम तीन अंशको मनीषी पुरुषोने
यागका समय बताया है। यागका आरम्भ प्रातःकाल
करना चाहिये। विप्रवर! यदि अमावास्या ओर
पूर्णिमा दोनों मध्याहकालमें व्याप्त हों तो दूसरे ही
दिन यागका मुख्य काल नियत किया जाता है ।
यदि अमावास्या ओर पूर्णिमा दूसरे दिन सङ्गवकाल
(प्रातःकालसे छः घड़ी)-के बाद हो तो दूसरे ही
दिन पुण्यकाल होता हे। तिधिक्षयमें भी एेसी ही
व्यवस्था जाननी चाहिये । सभी लोगोको दशमीरहित
१०९
एकादशी तिथि त्रतमें ग्रहण करनी चाहिये । दशमीयुक्त
एकादशी तीन जन्मोके कमाये हुए पुण्यका नाश
कर देती है। यदि एकादशी द्वादशीमें एक कला भी
प्रतीत हो ओर सम्पूर्णं दिन द्वादशी हो ओर द्वादशी
भी त्रयोदशीमें मिली हुई हो तो दूसरे दिनकी तिथि
(द्वादशी ) ही उत्तम मानी गयी है । यदि सम्पूर्ण दिन
शुद्ध एकादशी हो ओर द्वादशीमें भी उसका संयोग
प्राप्त होता हो तथा रात्रिके अन्तमें त्रयोदशी आ जाय
तो उस विषयमें निर्णय बतलाता हूं । पहले दिनकी
एकादशी गृहस्थोको करनी चाहिये ओर दूसरे
दिनकी विरक्तोको। यदि कलाभर भी द्वादशी न रहनेसे
पारणाका अवसर न मिलता हो तो उस दशामें
दशमीविद्धा एकादशीको भी उपवास-त्रत करना
चाहिये। यदि शुक्ल या कृष्णपक्षे दो एकादश्या हो
तो पहली गृहस्थोके लिये ओर दूसरी विरक्त यतियेकि
लिये ग्राह्य मानी गयी हे। यदि दिनभर दशमीयुक्त
एकादशी हो ओर दिनकी समापिके समय द्वादशीमें
भी कुछ एकादशी हो तो सवके लिये दूसरे ही दिन
(द्वादशी) त्रत बताया गया है। यदि दूसरे दिन
द्वादशी न हो तो पहले दिनक दशमीविद्धा एकादशी
भी व्रते ग्राह्य है। ओर यदि दूसरे दिन द्वादशी दै
तो पहते दिनकी दशमीविद्धा एकादशी भी निषिद्ध
ही है (इसलिये एेसी परिस्थितिमें द्वादशीको त्रत
करना चाहिये) । यदि एक ही दिन एकादशी,
द्वादशी तथा रातके अन्तिम भागमें त्रयोदशी भी आ
जाय तो त्रयोदशीमें पारणा करनेपर बारह द्वादशि्योका
पुण्य होता है। यदि द्वादशके दिन कलामात्र ही
एकादशी हो ओर त्रयोदशीमं द्वादशीका योग हो यान
हो तो गृहस्थकि पहले दिनकी विद्धा एकादशी भी
व्रतम ग्रहण करनी चाहिये। ओर विरक्तं साधुओं
१. अमावास्याके तीन विभाग ह -- सिनीवाली, दर्शं ओर कुहू । चतुर्दशीका अन्तिम प्रहर ओर अमावास्यके आद
प्रहर इस प्रकार यह नी प्रहरका समय चनद्रमाके क्षयका काल माना गया है। इनमेसे पहले दो प्रहरमिं -चन्धमाकी
कला विराजमान रहती है, अतः उसे सिनीवाली कते हँ ओर अन्तिम दो प्रहररोमें चन््रमाकी कलाका पूर्णतः क्षय
हो जाता है। अतः उसीका नाम कुट है ओर बीचके जौ शेष पचि प्रहर है उनका नाम दर्शं है।
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११०
सक्षिप्त नारदपुराण
तथा विधवाओंको दूसरे दिनकी तिथि (द्वादशी)
स्वीकार करनी चाहिये। यदि पूरे दिनभर शुद्ध
एकादशी हो, द्वादशीमें उसका तनिक भी योग न
हो तथा द्वादशी त्रयोदशीमें संयुक्त हो तो वहाँ कैसे
त्रत रहना चाहिये- इसका उत्तर देते है-गृहस्थोको
पूर्वको (एकादशी) तिथिमें व्रती रहना चाहिये
ओर विरक्त साधुओंको दूसरे दिनकी (द्वादशी)
तिधिमें। कोई-कोई विद्वान् एेसा कहते हैँ कि सब
लोगोको दूसरे दिनक तिथिमें ही भक्तिपूर्वक
उपवास करना चाहिये। जब एकादशी दशमीसे .
विद्ध हो, द्वादशीमें उसको प्रतीति न हो ओर
द्वादशी त्रयोदशीसे संयुक्त हो तो उस दशामें
सबको शुद्ध द्वादशी तिथिं उपवास करना चाहिये-
इसमे संशय नहीं हे । कुछ लोग पूर्व तिथिमें त्रत
कहते हे; किंतु उनका मत ठीक नहीं हे।
जो रविवारको दिनमे, अमावास्या ओर पूर्णिमाको
रातमे, चतुर्दशी ओर अष्टमी तिथिको दिनमें तथा
एकादशी तिथिको दिन ओर रात दोनोमें भोजन
कर लेता हे, उसे प्रायश्चित्तरूपमे चाद्द्रायण-त्रतका
अनुष्ठान करना चाहिये । सूर्यग्रहण प्राप्त होनेपर
तीन पहर पहलेसे ही भोजन न करे। यदि कोई
कर लेता है तो वह मदिरा पीनेवालेके समान होता
हे । मुनिश्रेष्ठ ! यदि अग्न्याधान ओर दर्शपीौर्णमास
आदि यागके बीच चन्द्रग्रहण अथवा सूर्यग्रहण हो
जाय तो यज्ञकर्ता पुरुषोंको प्रायश्चित्त करना चाहिये।
ब्रह्मन्। चन्द्रग्रहणमे "दशमे सोमः ' * आप्यायस्व!
तथा *सोमपास्ते' इन तीन मन्त्रोसे हवन करें । ओर
सूर्यग्रहण होनेपर हवन करनेके लिये “उदुत्यं
जातवेदसम्", ` आसत्येन , “उद्घयं तमसः" ये तीन
मन्त्र बताये गये हं। जो पण्डित इस प्रकार
स्मृतिमार्गसे तिथिका निर्णय करके त्रत आदि
करता है उसे अक्षय फल प्राप्त होता है । वेदमें
जिसका प्रतिपादन किया गया है वह धर्म हे।
धर्मसे भगवान् विष्णु संतुष्ट॒होते हैं । अतः
धर्मपरायण मनुष्य भगवान् विष्णुके परम धाममें
जाते हें । जो धर्माचरण करना चाहते हं, वे साक्षात्
भगवान् कृष्णके स्वरूप हे । अतः संसाररूपी रोग
उन्हे कोई बाधा नहीं पहुंचाता।
१ 0 6 7
विविध पापोंके प्रायश्चित्तका विधान तथा भगवान् विष्णुके आराधनकी महिमा
श्रीसनकजी कहते है- नारदजी।! अब मैं
प्राय्चित्तको विधिका वर्णन करूगा, सुनिये! सम्पूर्ण
धर्मोका फल चाहनेवाले पुरुषोंको काम-क्रोधसे
रहित धर्मशास्त्रविशारद ब्राह्यणोसे धर्मक बात
पूछनी चाहिये । विप्रवर । जो लोग भगवान् नारायणसे
विमुख हे, उनके द्वारा किये हुए प्रायश्चित्त उन्हें
पवित्र नहीं करते; ठीक उसी तरह जैसे मदिराके
पात्रको नदियों भी पवित्र नहीं कर सकतीं ।
ब्रह्महत्यारा, मदिरा पीनेवाला, स्वर्णं आदि वस्तुर्ओकी
चोरी करनेवाला तथा गुरुपतरीगामी-ये चार
महापातको कहे गये है । तथा इनके साथ सम्पर्क
करनेवाला पुरुष पांचवों महापातकी हे । जो इनके
साथ एक वर्षतक सोने, वैठने ओर भोजन करने
आदिका सम्बन्ध रखते हुए निवास करता है, उसे
भी सब कर्मासि पतित समञ्चना चाहिये । अज्ञातवश
ब्राह्यणहत्या हो जानेपर चीर-वस्त्र ओर जया
धारण करे ओर अपने द्वारा मारे गये ब्राह्यणकौ
कोई वस्तु ध्वज-दण्डमें बोधकर उसे लिये हए वनमें
धूमे। वहो जंगली फल-मूलोका आहार करते हए
निवास करे। दिनमें एक वार परिमित भोजन करे।
तीनों समय स्नान ओर विधिपूर्वक संध्या करता रहे।
अध्ययन ओर अध्यापन आदि कार्य छोड दे।
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पूर्वभाग-प्रथम पाद
निरन्तर भगवान् विष्णुका चिन्तन करता रहे
नित्य ब्रह्मचर्यका पालन करे ओर गन्ध एवं माला
आदि भोग्य वस्तुओंको छोड दे। तीर्थो तथा पवित्र
आश्रमोमें निवास करे। यदि वनमें फल-मूलोंसे
जीविका न चले तो गोवोमें जाकर भिक्षा मंगि।
इस प्रकार श्रीहरिका चिन्तन करते हुए बारह
वर्षका त्रत करे। इससे ब्रह्महत्यारा शुद्ध होता ओर
ब्राह्मणोचित कर्म करनेके योग्य हो जाता हे । व्रतके
वीचमें यदि हिंसक जन्तुओं अथवा रोगोसे उसको
मृत्यु हो जाय तो वह शुद्ध हो जाता हे। यदि गौओं
अथवा ब्राह्यणेके लिये प्राण त्याग दे या त्रे
ब्राह्मणोको दस हजार उत्तम गायोका दान करे तो
इससे भी उसकी शुद्धि होती हे। इनमेसे एक भी
प्रायश्चित्त करके ब्रह्महत्यारा पापसे मुक्त हो सकता हे।
यज्ञे दीक्षित क्षत्रियका वध करके भी ब्रह्यहत्याका
ही व्रत करे अथवा प्रज्वलित अग्रिमे प्रवेश कर
जाय या किसी ऊचे स्थानसे वायुके ज्लोके खाकर
गिर जाय। यज्ञमें दीक्षित ब्राह्मणको हत्या करनेपर
दुगुने ब्रतका आचरण करे। आचार्य आदिकं
हत्या हो जानेपर चौगुना ब्रत बतलाया गया हे।
नाममात्रके ब्राह्मणको हत्या हो जाय तो एक
वर्षतक त्रत करे। ब्रह्मन्! इस प्रकार ब्राह्मणके
लिये प्रायश्चित्तकी विधि बतलायी गयी हे। यदि
्षत्रियके द्वारा उपर्युक्त पाप हो जाय तो उसके
लिये दुगुना ओर वैश्यके लिये तीनगुना प्रायश्चित्त
बताया गया है। जो शूद्र ब्राह्यणका वध करता है,
उसे विद्वान् पुरुष मुशल्य (मूसलसे मार डालने
योग्य) मानते हैं । राजाको ही उसे दण्ड देना
चाहिये। यही शस्त्रोका निर्णय है । ब्राह्मणीके
वधे आधा ओरं ब्राह्मण-कन्याके वधमें चौधाई
प्रायश्चित्त कहा गया है। जिनका यज्ञोपवीत-
संस्कार न हुआ हो, एेसे ब्राह्मण वालकोंका वध
करनेपर भी चौथाई त्रत करे। यदि ब्राह्मण
१९९
क्षत्रियका वध कर डाले तो वह छः वर्षोतक
कृच्छव्रतका आचरण करे । वेश्यको मारनेपर तीन
वर्षं ओर शूद्रको मारनेपर एक वर्षतक त्रत करे ।
यज्ञमें दीक्षित ब्राह्मणको धर्मपत्नीका वध करनेपर
आठ वर्पोतक ब्रह्महत्याका त्रत करे। मुनिश्रेष्ठ!
वृद्ध, रोगी, स्त्री ओर बालकोके लिये सर्वत्र आधे
प्रायश्चित्तका विधान बताया गया है।
सुरा मुख्य तीन प्रकारक जाननी चाहिये।
गौडी (गुडसे तेयार की हई), पेटी (चावलों
आदिके आटेसे बनायी हुई) तथा माध्वी (फूलके
रस, अंगूर या महुवेसे बनायी हई) । नारदजी ।
चारों वणकि पुरुषों तथा स्त्रियंको इनमेसे कोई
भी सुरा नहीं पीनी चाहिये । मुने ! शराव पीनेवाला
द्विज सान करके गीले वस्त्र पहने हुए मनको
एकाग्र करके भगवान् नारायणका निरन्तर स्मरण
करे ओर दूध, घी अथवा गोमूत्रको तपाये हुए
लोहेके समान गरम करके पी जाय, फिर (जीवित
रहे तो) जल पीवे। वह भी लौहपात्र अथवा
आयसपात्रसे पीये या तोवेके पात्रसे पीकर मृत्युको
प्राप्त हो जाय। एेसा करनेपर ही मदिरा पीनेवाला
द्विज उस पापसे मुक्त होता है। अनजानमें पानी
समञ्जकर जो द्विज शराब पीले तो विधिपूर्वक
ब्रह्महत्याका त्रत करे; किंतु उसके चिद्ठंको न
धारण करे। यदि रोग-निवृत्तिके लिये ओषध-
सेवनको दृष्टिसे कोई द्विज शराव पी ले तो उसका
फिर उपनयन- संस्कार करके उससे दो चान्द्रायण-
व्रत कराने चाहिये। शराबसे छुवाये हए पत्रमे
भोजन करना, जिसमें कभी शराब रखी गयी हो
उस पात्रका जल पीना तथा शरास भोगी हुई
वस्तुको खाना यह सव शराब पीनेके ही समान
वताया गया टे । ताड, कटहल, अंगूर, खजुर ओर
महुआसे तैयार कौ हुई तथा प्रसरे अटेको
पीसकर वनायी हुई अण्ष्टि, मैरेय ओर् नारियलसे
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१९२
संक्षिप्त नारदपुराण
निकाली हई, गुड़की वनी हई तथा माध्वी-ये
ग्यारह प्रकारक मदिरा बतायी गयी हें । (उपर्युक्त
तीन प्रकारकी मदिरके ही ये ग्यारह भेद हैँ ।)
इनमेसे किसी भी मद्यको ब्राह्मण कभी न पीवे।
यदि द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वेश्य) अक्ञानवश इनमेसे
किसी एकको पी ले तो फिरसे अपना उपनयन-
संस्कार कराकर तप्तकृच्छ-त्रतका आचरण करे |
जो सामने या परोक्षमे बलपूर्वक या चोरीसे
दूसरोके धनको त्ते लेता है, उसका यह कर्म॑
विद्वान् पुरुषोद्रारा स्तेय (चोरी) कहा गया हे । मनु
आदिने सुवण्कि मापकी परिभाषा इस प्रकार कौ
हे । विप्रवर ! वह मान (माप) आगे कहे जानेवाले
प्रायधित्तको उक्तिका साधन है। अतः उसका
वर्णन करता हू; सुनिये ! ज्जरोखेके छिद्रसे घरमें
आयी हुई सूर्यको जो किरणें है, उनमेसे जो
उत्पन्न सूक्ष्म धूलिकण उड़ता दिखायी देता है
उसे विद्वान् पुरुष जसरेणु कहते हैं । वही त्रसरेणुका
माप है। आठ त्रसरेणुओंका एक निष्क होता ह
ओर तीन निष्कोक्ता एक राजसर्षप (राई) बताया
गया है। तीन राजसर्षपोंका एक गौरसर्पप (पीली
सरसों) होता है ओर छः गौरसर्षपोंका एक यव
कहा जाता हे। तीन यवका एक कृष्णल होता हे ।
पोच कृष्णलका एक माष (माशा) माना गया हे ।
नारदजी ! सोलह माशेके बराबर एक सुवर्ण होता
हे। यदि कोई मूरस्खतासे सुवर्णके बराबर ब्राह्यणके
धनका अर्थात् सोलह माशा सोनेका अपहरण कर
लेता है तो उसे पूर्ववत् वारह वर्पोतक कपाल
ओर ध्वजके चिद्धोंसे रहित ब्रह्महत्या-त्रत करना
चाहिये । गुरुजनं, यन्न करनेवाले धर्मनिष्ठ पुरुषों
तथा श्रोत्रिय ब्राह्मणोके सुवर्णको चुरा लेनेपर इस
प्रकार प्रायध्चित्त करे। पहले उस पापके कारण
बहुत पश्चात्ताप करे, फिर सम्पूर्णं शरीरमें घीका
लेप करे ओर कंडसे अपने शरीरको ठककर आग
चे क्त्वि, च
लगाकर जल मरे। तभी वह उस चोरीसे मुक्त
होता हे। यदि कोई क्षत्रिय ब्राह्मणके धनको चुरा
ले ओर पश्चात्ताप होनेपर फिर उसे वहीं लोटा दे
तो उसके लिये प्रायश्चित्तकी विधि मुञ्लसे सुनिये।
ब्रह ! वह बारह दिनतक उपवासपूर्वक सान्तपन-
व्रत करके शुद्ध होता हे। रत्र, सिंहासन, मनुष्य,
स्त्री, दूध देनेवाली गाय तथा भूमि आदि पदार्थं
भी स्वर्णके ही समान माने गये हें । इनकी चोरी
करनेपर आधा प्रायधित्त कहा है। राजसर्षप
(राई) बराबर सोनेकी चोरी करनेपर चार प्राणायाम
करने चाहिये । गौरसर्पप बराबर स्वर्णका अपहरण
कर लेनेपर विद्वान् पुरुष स्नान करके विधिपूर्वक
८००० गायत्नरीका जप करे । जौ बराबर स्वर्णको
चुरानेपर द्विज यदि प्रातःकालसे लेकर सायंकालतक
वेदमाता गायत्रीका जप करे तो उससे शुद्ध होता
हे । कृष्णल बराबर स्वर्णकौ चोरी करनेपर मनुष्य
सान्तपन-त्रत करे। यदि एक माशाके बराबर
सोना चुरा ले तो वह एक वर्षतक गोमूत्रमे पकाया
हुआ जौ खाकर रहे तो शुद्ध होता है। मुनीश्वर!
पूरे सोलह माशा सोनेकी चोरी करनेपर मनुष्य
एकाग्रचित्त हो बारह वर्पोतक त्रह्यहत्याका त्रत करे ।
((-0. 1\/॥८11104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
अब गुरुपल्ीगामी पुरुषोके लिये प्राय्ित्तका
वर्णन किया जाता हे। यदि मनुष्य अज्ञानवश माता
अथवा सौतेली मातासे समागम कर ले तो
लोगोपर अपना पाप प्रकट करते हुए स्वयं ही
अपने अण्डकोशको काट डाले। ओर हाथमे उस
अण्डकोशको लिये हुए नैऋत्य कोणमें चलता
जाय। जाते समय मामे कभी सुख-दुःखका
विचार न करे। जो इस प्रकार किसी यात्रीको ओर
न देखते हुए प्राणान्त होनेतक चलता जाता है
वह पापसे शुद्ध होता हे। अथवा अपने पापको
बताते हुए किसी ऊंचे स्थानसे हवाके ज्ोकेके
साथ कूद पड़ । यदि बिना विचारे अपने वर्णको
या अपनेसे उत्तम वर्णको स्त्रीके साथ समागम
कर ले तो एकाग्रचित्त हो बारह वर्षोतक ब्रह्यहत्याका
व्रत करे। द्विजश्रेष्ठ ! जो विना जाने हुए कईं बार
समान वर्ण या उत्तम वर्णवाली स्त्रीसे समागम कर
ले तो वह कंडको आगमे जलकर शुद्धिको प्राप्त
होता है। यदि वीर्यपातसे पहले ही माताके साथ
समागमसे निवृत्त हो जाय तो ब्रह्महत्याका त्रत करे
ओर यदि वीर्यपात हो जाय तो अपने शरीरको
अग्रिमे जला दे। यदि अपने वर्णको तथा अपनेसे
उत्तम वर्णक स्त्रीके साथ समागम करनेवाला
पुरुष वीर्यपातसे पहले ही निवृत्त हो जाय तो
भगवान् विष्णुका चिन्तन करते हुए नौ वर्षोतक
ब्रह्यहत्याका त्रत करे। मनुष्य यदि कामसे मोहित
होकर मौसी, वू, गुरुपत्री, सास, चाची, मामी
ओर पुत्रीसे समागम कर ले तो दो दिनतक
समागम करनेपर उसे विधिपूर्वक ब्रह्महत्याका त्रत
करना चाहिये ओर तीन दिनतक सम्भोग करनेपर
वह आगमे जल जाय, तभी शुद्ध होता है, अन्यथा
नहीं । मुनी श्वर! जो कामके अधीन हो चाण्डाली,
११२
पुष्कसी (भीलजातिकी स्त्री), पुत्रवधू, बहिन,
मित्रपती तथा शिष्यकी स्त्रीसे समागम करता है,
वह छः वर्षोतक ब्रह्महत्याका त्रत करः ।
अव महापातकी पुरुषोके साथ संसर्गका प्रायश्चित्त
बतलाया जाता हे। ब्रह्महत्यारे आदि चार प्रकारके
महाषातकियोँसे जिसके साथ जिस पुरुषका संसर्ग
होता हे, वह उसके लिये विहित प्रायश्चित्त ब्रतका
पालन करके निश्चय ही शुद्ध हो जाता हे। जो
विना जाने पांच राततक इनके साथ रह लेता है
उसे विधिपूर्वक प्राजापत्य कृच्छं नामक त्रत
करना चाहिये । बारह दिनोतक उनके साथ संसर्ग
हो जाय तो उसका प्रायश्चित्त महासान्तपन-त्रत
बताया गया हे। ओर पंद्रह दिनोतक महापातकिर्योका
साथ कर लेनेपर मनुष्य वारह दिनतक उपवास
करे। एक मासतक संसर्गं करनेपर पराक-व्रत
ओर तीन मासतक संसर्ग हो तो चान्द्रायण-त्रतका
विधान है। छः महीनेतक महापातकी मनुष्योका
संग करके मनुष्य दो चान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान
करे । एक वर्षसे कुछ कम समयतक उनका सर्ग
करनेपर छः महीनेतक चाद्द्रायण-व्रतका पालन
करे ओर यदि जान-बूञ्चकर महापातकी पुरुषोका
सङ्ग किया जाय तो क्रमशः इन सवका प्रायधित्त
ऊपर बताये हए प्रायश्चित्तसे तीनगुना बताया गया
है । मेदक, नेवला, कौआ, सूअर, चूहा, विद्धी,
बकरी, भेड, कुत्ता ओर मुर्गा- इनमेसे किसीका
वध करनेपर ब्राह्मण अर्धकृच्छ-व्रतका आचरण
करे ओर घोडेकी हत्या करनेवाला मनुष्य अतिकृच्छ-
व्रतका पालन करे। हाथीकी हत्या करनेपर तप्तकृच्छ्र
ओर गोहत्या करनेपर पराक-त्रत करनेका विधान
हे। यदि स्वेच्छासे जान-वृञ्चकर् गौओंका वध
किया जाय तो मनीषी पुरुषोनि उसकी शुद्धिका
१. ये महापाप समाजमें प्रायः बहुत ही कम होते है, पतु प्रायश्चित्त-विधानमें तो लाखो -करोढमिंसे एक भी मनुष्यसे
यदि वैसा पाप वनता है तो उसका भी प्रायश्चित्त बताना चाहिये, इसीलिये शास्त्रका यह कटिन दण्ड-विधान है ।
((-0. 1/८1111(4/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
९९४
कोई भी उपाय नहीं देखा हे । पीनेयोग्य वस्तु,
शय्या, आसन, फूल, फल, मूल तथा भक्ष्य ओर
भोज्य पदार्थोकौ चोरीके पापका शोधन करनेवाला
प्रायश्चित्त पञ्चगव्यका पान कहा गया है। सूखे
काठ, तिनके, वृक्ष, गुड्, चमड़ा, वस्त्र ओर
मांस-इनको चोरी करनेपर तीन रात उपवास
करना चाहिये । रिटिहरी, चकवा, हंस, कारण्डव,
उदू, सारस, कबूतर, जलमुर्गा, तोता, नीलकण्ठ,
बगुला, संस ओर कुआ इनमेसे किसीको भी
मारनेपर बारह दिनोंतक उपवास करना चाहिये ।
वीर्य, मल ओर मूत्र खा लेनेपर प्राजापत्य-व्रत
करे। शूद्रका जूढा खानेपर तीन चान्द्रायण-त्रत
करनेका विधान है। रजस्वला स्त्री, चाण्डाल,
महापातक, सूतिका, पतित, उच्छिष्ट वस्तु आदिका
स्पर्श कर लेनेपर वस्त्रसहित स्नान करे ओर घृत
पीवे। नारदजी ! इसके सिवा आठ सौ गायत्रीका
जप करे, तब वह शुद्धचित्त होता हे । ब्राह्मणों ओर
देवताओंकी निन्दा सब पापोंसे बड़ा पाप है।
विद्वानोने जो-जो पाप महापातकके समान बताये
हं, उन सवका इसी प्रकार विधिपूर्वक प्रायधित्त
करना चाहिये। जो भगवान् नारायणको शरण
लेकर प्रायश्चित्त करता हे, उसके सब पाप नष्ट हो
जाते हे।
जो राग-द्वेष आदिसे मुक्त हो पापोके लिये
प्रायश्चित्त करता हे, समस्त प्राणिरयोके प्रति दयाभाव
रखता है ओर भगवान् विष्णुके स्मरणमें तत्पर
रहता हे, वह महापातर्कोसे अथवा सम्पूर्ण पातकोसे
युक्त हो तो भी उसे सब पापोँसे मुक्त ही समञ्चन
चाहिये। क्योकि वह भगवान् विष्णुके भजनमें
लगा हआ है । जो मानव अनादि, अनन्त, विश्वरूप
तथा रोग-शोकसे रहित भगवान् नारायणका चिन्तन
करता है, वंह करोड़ों पापोसे मुक्त हो जाता हे।
साधु पुरुपोके हदयमें विराजमान भगवान् विष्णुका
संक्षिप्त नारदपुराण
स्मरण, पूजन, ध्यान अथवा नमस्कार किया जाय
तो वे सब पापोंका निश्चय ही नाश कर देते हें।
जो किसीके सम्पर्कसे अथवा मोहवश भी भगवान्
विष्णुका पूजन करता हे, वह सव पापोंसे मुक्त हो
उनके वैकुण्ठधाममें जाता हे। नारदजी ! भगवान्
विष्णुके एक बार स्मरण करनेसे सम्पूर्णं क्लेशोको
राशि नष्ट हो जाती हे तथा उसी मनुष्यको स्वर्गादि
भोगोंको प्राति होती है-- यह स्वयं ही अनुमान हो
जाता हे। मनुष्य-जन्म बड़ा दुर्लभ है। जो लोग
इसे पाते हें, वे धन्य हें । मानव-जन्म मिलनेपर
भी भगवान्कौ भक्ति ओर भी दुर्लभ बतायी गयी
हे, इसलिये बिजलीकौ तरह चञ्चल (क्षणभङ्गुर)
एवं दुर्लभ मानव-जन्मको पाकर भक्तिपूर्वक
भगवान् विष्णुका भजन करना चाहिये । वे भगवान्
ही अज्ञानी जीवोंको अज्ञानमय बन्धनसे दुडानेवाले
हें । भगवान्के भजनसे सव विघ्न नष्ट हो जाते
हैं तथा मनकी शुद्धि होती हे। भगवान् जनार्दनके
पूजित होनेपर मनुष्य परम मोक्ष प्राप्त कर लेता है ।
भगवान्की आराधनामे लगे हए मनुष्योके धर्म,
अर्थ, काम ओर मोक्ष नामक सनातन पुरुषार्थ
। ॥
॥॥'
-0. 141111८॥|5|1॥ 5118५८81 \/8/81185} 01661101). [14111260 0\ 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
अवश्य सिद्ध होते है । इसमें संशय नहीं हैः ।
ॐरे। पुत्र, स्त्री, घर, खेत, धन ओर धान्य नाम
धारण करनेवाली मानवी वृकत्तिको पाकर तू घमण्ड
न कर। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, परापवाद
ओर निन्दाका सर्वथा त्याग करके भक्तिपूर्वक
भगवान् श्रीहरिका भजन कर । सारे व्यापार छोडकर
भगवान् जनार्दनको आराधनामें लग जा। यमपुरीके
वे वृक्ष समीप ही दिखायी देते हैं । जबतक बुढ़ापा
नहीं आता, मृत्यु भी जबतक नहीं आ पहुंचती है
ओर इच्दियां जबतक शिथिल नहीं हो जातीं
तभीतक भगवान् विष्णुकी आराधना कर लेनी
चाहिये। यह शरीर नाशवान् है। बुद्धिमान् पुरुष
इसपर कभी विश्वास न करे। मोत सदा निकट रहती
हे। धन-वैभव अत्यन्त चञ्चल है ओर शरीर कुछ
ही समयमें मृत्युका ग्रास बन जानेवाला है। अतः
अभिमान छोड दे। महाभाग। संयोगका अन्त
वियोग ही है यहां सब कुछ क्षणभ्गुर है-- यह
जानकर भगवान् जनार्दनकी पूजा कर। मनुष्य
१९१५
आशासे कष्ट पाता हे। उसके लिये मोक्ष अत्यन्त
दुर्लभ हे। जो भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुका भजन
करता हे, वह महापातकी होनेपर भी उस परम
धामको जाता हे, जहां जाकर किसीको शोक नहीं
होता। साधुशिरोमणे। सम्पूर्ण तीर्थ, समस्त यज्ञ ओर
अद्धोसहित सब वेद भी भगवान् नारायणके पूजनकी
सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकतेः। जो
लोग भगवान् विष्णुकी भक्तिसे वञ्चित है, उन्हं वेद,
यज्ञ ओर शास्त्रोसे क्या लाभ हआ 2 उन्होने तीर्थोकी
सेवा करके क्या पाया तथा उनके तप ओर त्रतसे
भी क्या होनेवाला है 2 जो अनन्तस्वरूप, निरीह,
ॐकारवबोध्य, वरेण्य, वेदान्तवेद्य तथा संसाररूपी
रोगके वैद्य भगवान् विष्णुका यजन करते हं, वे
मनुष्य उन्हीं भगवान् अच्युतके वैकुण्टधाममें जाते
हें । जो अनादि, आत्मा, अनन्तशक्तिसम्पत्न, जगत्के
आधार, देवताओंके आराध्य तथा ज्योति;स्वरूप
परम पुरुष भगवान् अच्युतका स्मरण करता है, वह
नर अपने नित्यसखा नारायणको प्राप्त कर लेता है ।
मज १६०२४८२४
रागादिनिर्मुक्तो ह्यनुतापसमन्वितः॥
सर्वभूतदयायुक्तो विष्णुस्मरणतत्परः । महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः॥
विमुक्त एव पापेभ्य ज्ञेयो विष्णुपरो यतः। नारायणमनाद्यन्तं विश्वाकारमनामयम्॥
यस्तु संस्मरते मर्त्यः स॒ मुक्तः पापको रिभिः। स्मृतो वा पृजितो वापि ध्यातः प्रणमितोऽपि वा॥
नाशयत्येव पापानि विष्णुर्हद्गमनः सताम् । सम्पर्काद्यदि वा मोहाद्यस्तु पूजयते हरिम्॥
सर्वपापविनिर्मुक्तः स प्रयाति हरेः पदम्। सकृत्संस्मरणाद्विष्णोर्नश्यन्ति क्लेशसंचयाः ॥
स्वर्गादिभोगप्रापिस्तु तस्य विप्रानुमीयते। मानुषं दुर्लभं जन्म प्राप्यते यैर्मुनीश्चर॥
तत्रापि हरिभक्तिस्तु दुर्लभा परिकोर्तिता। तस्मात्तडिल्लतालोलं मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम्॥
हरि सम्पूजयेद् भक्त्या पशुपाशविमोचनम्। सर्वेऽन्तयया नश्यन्ति मनःशुद्धिश्च जायते ॥
परं मोक्षं लभेच्यैव पृजिते तु जनार्दने। धर्मार्थकाममोक्षाख्याः पुरुषार्थाः सनातनाः ॥
हरिपूजापराणां तु सिध्यन्ति नात्र संशयः । (ना० पूर्व° ३०1 ९२- १०२)
२. सर्वतीर्थानि यज्ञाश्च साद्रा वेदाश्च सत्तम॥
नारायणार्चनस्यैते कलां नार्हन्ति यपोडशीम्। (ना पूर्व० ३०। ११०-१११)
[1183 ] सं० ना०पु०५-
((-0. 1\/॥८11114/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0\ 60810011
१. यस्तु
| का
१९१६
संक्षिप्त नारदपुराण
यमलोकके मार्गमे पापियोंके कष्ट तथा पुण्यात्माओंके सुखका वर्णन एवं
कल्पान्तरमे भी क्मकि भोगका प्रतिपादन
श्रीसनकजी बोले-- ब्रह्मन्! सुनिये । में अत्यन्त
दुर्गम यमलोकके मार्गका वर्णन करता हूं। वह
पुण्यात्माओके लिये सुखद ओर पापियोके लिये
भयदायक है। मुनीश्वर! प्राचीन ज्ञानी पुरुषोने
यमलोकके मार्गका विस्तार छियासी हजार योजन
बताया हे। जो मनुष्य यहां दान करनेवाले होते हँ
वे उस मार्गमे सुखसे जाते हें; ओर जो धर्मसे हीन
हे, वे अत्यन्त पीडित होकर बडे दुःखसे यात्रा
करते हे । पापी मनुष्य उस मार्गपर दीनभावसे
जोर-जोरसे रोते-चिह्वाते जाते है- वे अत्यन्त
भयभीत ओर नंगे होते ह । उनके कण्ठ, ओट
ओर तालु सूख जाते है । यमराजके दूत चाब्रुक
आदिसे तथा अनेक प्रकारके आयुधोंसे उनपर
आघात करते रहते हे । ओर वे इधर-उधर भागते
हुए बड़े कष्टसे उस पथपर चल पाते हैँ । वहां
कहीं कीचड़ हे, कहीं जलती हुई आग है, कहीं
तपायी हुईं बालू विदछी हे, कहीं तीखी धारवाली
शिलां हं। कहीं कोटिदार वृक्ष ह ओर कहीं
एेसे-एेसे पहाड़ है, जिनकी शिलाओंपर चदढना
अत्यन्त दुःखदायक होता हे । कहीं कयेंकी बहुत
बड़ी बाड लगी हुई हे, कहीं-कहीं कन्दरामें
प्रवेश करना पड़ता है। उस माग्मिं कहीं कंकड
है, कहीं ठेले हँ ओर कहीं सुईके समान कोटि
विके है तथा कहीं बाघ गरजते रहते हे । नारदजी ।
इस प्रकार पापी मनुष्य--भोति-भंतिके क्लेश
उठाते हुए यात्रा करते हें । कोई पाशमें बंधे होते
है, कोई अड्कशोंसे खीचे जाते हँ ओर किन्हीकी
पीठपर अस्त्र-शस्त्रोको मार पडती रहती है । इस
दुर्दशाके साथ पापी उस मार्गपर जाते हें । किन्हीकी
नाक छेदकर् उसमें नकेल डाल दी जाती है ओर
उसीको पकड़कर खीचा जाता हे। कोई ओंासे
वेधे रहते है ओर कुक पापी अपने शिश्नके
अग्रभागसे लोहेका भारी भार ढोते हुए यात्रा करते
हे । कोई नासिकाके अग्रभागद्वारा लोहेका दो भार
ढोते हं ओर कोई पापी दोनों कानोसे दो लौहभार
वहन करते हुए उस मार्गपर चलते हैँ । कोई
अत्यन्त उच्छवास लेते हं ओर किन्दीक ओंखें
ठक दी जाती है। उस मागमिं कहीं विश्रामके
लिये छाया ओर पीनेके लिये जलतक नहीं हे।
अतः पापी लोग जानकर या अनजानमें किये हुए
अपने पापकमेकि लिये शोक करते हुए अत्यन्त
दुःखसे यात्रा करते हे ।
नारदजी ! जो उत्तम बुद्धिवाले मानव धर्मनिष्ठ
ओर दानशील होते ह, वे अत्यन्त सुखी होकर
धर्मराजके लोकको यात्रा करते हें । मुनिश्रेष्ठ । अन्न
देनेवाले स्वादिष्ट अन्नका भोजन करते हुए जाते
हे । जिन्होंने जल दान किया है, वे भी अत्यन्त
सुखी होकर उत्तम दृध पीते हुए यात्रा करते हे ।
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्व भाग-प्रथम पाद
१९७
मदा ओर दही दान करनेवाले तत्सम्बन्धी भोग प्राप्त | है। जो विद्यादानमें तत्पर रहता है, वह ब्रह्माजीसे
करते हें । द्विजश्रेष्ठ ! घृत, मधु ओर दूधका दान
करनेवाले पुरुष सुधापान करते हए धर्ममन्दिरको
जाते हें । साग देनेवाला खीर खाता है ओर दीप
देनेवाला सम्पूर्णं दिशाओंको प्रकाशित करते हए
जाता हे। मुनिप्रवर। वस्त्र-दान करनेवाला पुरुष
दिव्य वस््रोंसे विभूषित होकर यात्रा करता हे।
जिसने आभूषण दान किया हे, वह उस मार्गपर
देवताओके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हआ जाता
है । गोदानके पुण्यसे मनुष्य सब प्रकारके सुख-
भोगसे सम्पन्न होकर जाता है। द्विजश्रेष्ठ! घोडे,
हाथी तथा रथको सवारीका दान करनेवाला पुरुष
सम्पूर्ण भोगोसे युक्त विमानद्वारा धर्मराजके मन्दिरको
१ च
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हे
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जाता है। जिस श्रेष्ठ पुरुषने माता-पिताकी सेवा-
शुश्रुषा कौ हे, वह देवताओंसे पूजित हो प्रसन्नचित्त
होकर धर्मराजके घर जाता है! जो यतियो
व्रतधारियों तथा श्रेष्ठ ब्राह्यणोकी सेवा करता दहै
वह बडे सुखसे धर्मलोकको जाता है । जो सम्पूर्ण
भूर्तोके प्रति दयाभाव रखता है, वह द्विज देवतार्भसि
पूजित हो सर्वभोगसमन्वित विमानद्रारा यात्रा करता
पूजित होता हुआ जाता हे । पुराण-पाठ करनेवाला
पुरुप मुनी श्वरोद्रारा अपनी स्तुति सुनता हआ यात्रा
करता है । इस प्रकार धर्मपरायण पुरुष सुखपूर्वक
धर्मराजके निवासस्थानको जाते है। उस समय
धर्मराज चार भुजाओंसे युक्त हो शङ्क, चक्र, गदा
ओर खद्ध धारण करके बडे स््रेहसे मित्रकी भति
उस पुण्यात्मा पुरुषको पूजा करते हं ओर इस
प्रकार कहते है" हे वुद्धिमानोमें श्रेष्ट पुण्यात्मा
पुरुषो! जो मानव-जन्म पाकर पुण्य नहीं करता
हे, वही पापियोमें बड़ा है ओर वह आत्मघात
करता हे । जो अनित्य मानव-जन्म पाकर उसके
द्वारा नित्य वस्तु (धर्म)-का साधन नहीं करता,
वह घोर नरकमें जाता हे । उससे बटढकर जड ओर
कोन होगा 2 यह शरीर यातनारूप (दुःखरूप) दहे
ओर मल आदिके द्वारा अपवित्र है। जो इसपर
(इसको स्थिरतापर) विश्वास करता है, उसे
आत्मघाती समञ्चना चाहिये । सव भृतोमे प्राणधारी
श्रेष्ठ हें । उनमें भी जो (पशु-पक्षी आदि) बुद्धि
जीवन-निर्वाह करते हे, वे श्रेष्ट है। उनसे भी
मनुष्य श्रेष्ठ हे । मनुष्योमे ब्राह्यण, ब्राह्यणोमं विद्वान्
ओर विद्वानोमें अचञ्चल बुद्धिवाले पुरुष श्रेष्ठ हे ।
अचञ्चल वुद्धिवाले पुरुपोमें कर्तव्यका पालन
करनेवाले श्रेष्ठ है ओर कर्तव्य-पालकोपे भी
ब्रह्मवादी (वेदका कथन करनेवाले) पुरुष श्रेष्ठ
हे । ब्रह्मवादियोमे भी वह श्रेष्ठ कहा जाता हे, जो
ममता आदि दोपोंसे रहित हो। इनकी अपेक्षा भी
उस पुरुषको श्रेष्ट समञ्लना चाहिये, जो सदा
भगवान्के ध्यानमें तत्पर रहता है । इसलिये सर्वधा
प्रयत्न करके (सदाचार ओर ईश्वरकी भक्तिरूप)
धर्मका संग्रह करना चाहिये। धर्मात्मा जीव सर्वत्र
पृजित होता टै इसमें संशय नहीं है । तुम लोग सम्पूर्ण
भोगोसे सम्पन्न पुण्यलोकमें जाओ। यदि कोई पाप है
0060-0. ॥५५११५॥९७॥1५ 18/81 \/28/8185| 01601101. [21411260 0\ 66810011
१९८
संक्षिप्त नारदपुराण
तो पीछे यहीं आकर उसका फल भोगना ।'
एेसा कहकर यमराज उन पुण्यात्माओंकी
पूजा करके उन्हें सद्गतिको पहुंचा देते हैँ ओर
पापियोको बुलाकर उन्हें कालदण्डसे डराते हए
फटकारते हे । उस समय उनकी आवाज प्रलयकालके
मेघके समान भयंकर होती है ओर उनके
शरीरको कान्ति कज्जलगिरिके समान जान पडती
हे । उनके अस्त्र-शस्त्र विजलीकी भति चमकते
हे, जिनके कारण वे बड़े भयंकर जान पडते हेँ।
उनके बत्तीस भुजा हो जाती हें शरीरका
विस्तार तीन योजनका होता हे। उनकी लाल-
लाल ओर भयंकर आंखें बावडीके समान जान
पडती हं । सव दूत यमराजके समान भयंकर
होकर गरजने लगते हे । उन्हें देखकर पापी जीव
थर-थर कोपने लगते है ओर अपने-अपने कर्माका
विचार करके शोकग्रस्त हो जाते हं । उस समय
यमको आज्ञासे चित्रगुप्त उन सब पापियोंसे कहते
हे-' अरे, ओ दुराचारी पापात्माओ ! तुम सव
लोग अभिमानसे दूषित हो रहे हो । तुम अविवेकियोने
काम, क्रोध आदिसे दूषित अहंकारयुक्त चित्तसे
किसलिये पापका आचरण किया है। पहले तो
वड़ हर्षम भरकर तुम लोगोने पाप किये है, अव
उसी प्रकार नरकको यातनां भी भोगनी चाहिये ।
अपने कुटुम्ब, मित्र ओर स्त्रीके लिये जैसा पाप
तुमने किया है, उसीके अनुसार कर्मवश तुम
यहां आ पहुंचे हो । अव अत्यन्त दुःखी क्यों हो
रहे हो ? तुम्हीं सोचो, जब पहले तुमने पापाचार
किया था, उस समय यह भी क्यों नहीं विचार
लिया कि यमराज इसका दण्ड अवश्य देगे।
कोई दरिद्र हो या धनी, मूर्ख हो या पण्डित ओर
कायर हो या वीर-यमराज सबके साथ समान
बतवि करनेवाले हं ।' चित्रगुप्तका यह वचन
सुनकर वे पापी भयभीत हो अपने क्मेकि लिये
शोक करते हुए चुपचाप खड़े रह जाते हैँ । तव
यमराजको आज्ञाका पालन करनेवाले क्रूर, क्रोधी
ओर भयंकर दूत इन पापि्योको बलपूर्वक पकड़कर
नरकोमें फकः देते हें । वहां अपने पापोंका फल
भोगकर अन्तमें शेष पापके फलस्वरूप वे भूतलपर
आकर स्थावर आदि योनि्योमे जन्म लेते हेै।
नारदजीने कहा-- भगवन्! मेरे मनमें एक
संदेह पेदा हो गया हे । आपने ही कहा है कि जो
लोग ग्राम-दान आदि पुण्यकर्म करते है, उन्हें
कोटिसहस्र कल्पोंतक उनका महान् भोग प्राप्त
होता रहता हे । दूसरी ओर यह भी आपने बताया
हे कि प्राकृत प्रलयमें सम्पूर्ण लोकोंका नाश हो
जाता हे ओर एकमात्र भगवान् विष्णु ही शेष रह
जाते हं। अतः मुञ्ञे यह संशय हआ है कि
प्रलयकालतक जीवके पुण्य ओर पापभोगको क्या
समाति नहीं होती ? आप इस संदेहका निवारण
करने योग्य हें।
श्रीसनकजी बोले- महाप्राज्ञ भगवान् नारायण
अविनाशी, अनन्त, परमप्रकाशस्वरूप ओर
सनातन पुरुष हँ । वे विशुद्ध, निर्गुण, नित्य ओर
माया-मोहसे रहित हें । परमानन्दस्वरूप श्रीहरि
निर्गुण होते हए भी सगुण-से प्रतीत होते हे।
ब्रह्मा, विष्णु ओर शिव आदि रूपोमें व्यक्त
होकर भेदवान्-से दिखायी देते हें। वे ही
मायाके संयोगसे सम्पूर्णं जगत्का कार्य करते
ठे। वे ही श्रीहरि ब्रह्माजीके रूपसे सृष्टि ओर
विष्णुरूपसे जगत्का पालन करते हैँ ओर अन्तमं
भगवान् रुद्रके रूपसे वे ही सबको अपना ग्रास
बनाते है। यह निश्चित सत्य हि। प्रलयकाल
व्यतीत होनेपर भगवान् जनार्दनने शेषशय्यासे
उठकर ब्रह्माजीके रूपसे सम्पूर्णं चराचर विश्वको
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
पूर्वं कल्पोके अनुसार सृष्टि कौ है । विप्रवर! पूर्व
कल्पोमें जो-जो स्थावर-जङ्गम जीव जर्हँ-जहां
स्थित थे, नूतन कल्पमें ब्रह्माजी उस सम्पूर्ण
जगत्की पूर्ववत् सृष्टि कर देते हें । अतः साधुशिरोमणे।
किये हुए पापों ओर पुण्योका अक्षय फल अवश्य
भोगना पडता हे (प्रलय हो जानेपर जीवके जिन
१९१९
कर्मोका फल शेष रह जाता है, दूसरे कल्पमें नयी
सृष्ट होनेपर वह जीव पुनः अपने पुरातन कर्मोका
भोग भोगता है।) कोई भी कर्म सौ करोड़
कल्पोमे भी विना भोगे नष्ट नहीं होता। अपने
किये हुए शुभ ओर अशुभ कर्मोका फल अवश्य
ही भोगना पड़ता है\।
१.6 (
न+
पापी जीवोंके स्थावर आदि योनियोमें जन्म लेने ओर दुःख भोगनेकी
अवस्थाका वर्णन
श्रीसनकजी कहते है- इस प्रकार कर्मपाशमें
वधे हुए जीव स्वर्ग आदि पुण्यस्थानोमें पुण्यकर्मोका
फल भोगकर तथा नरक-यातनाओमें पापोंका
अत्यन्त दुःखमय फल भोगकर क्षीण हुए क्मेकि
अवशेष भागसे इस लोकमें आकर स्थावर आदि
योनियोमें जन्म लेते है । वृक्ष, गुल्म, लता, वही
ओर पर्वत तथा तृण-ये स्थावरके नामसे विख्यात
हें । स्थावर जीव महामोहसे आच्छन्न होते हैँ ।
स्थावर योनियोमें उनको स्थिति इस प्रकार होती
हे। पहले वे बीजरूपसे पृथ्वीमें बोये जाते है ।
फिर जलसे सीचनेके पश्चात् मूलभावको प्राप्त होते
है । उस मूलसे अङ्कुरको उत्पत्ति होती है । अद्कुरसे
पत्ते, तने ओर पतली डाली आदि प्रकट होते हें।
उन शाखाओंसे कलियां ओर कलियोसे फूल
प्रकट होते हें। उन फूलोसे ही वे धान्य वृक्ष
फलवान् होते हें । स्थावर योनिमें जो बडे-बडे
वृक्ष होते हे, वे भी दीर्घकालतक काटने, दावानलमें
जलने तथा सर्दी-गरमी लगने आदिके महान् दुः
खका अनुभव करके मर् जाते हें। तदनन्तर वे
जीव कोट आदि योनि्योमिं उत्पन्न होकर सदा
अतिशय दुःख उठाते रहते हँ । अपनेसे बलवान्
प्राणियोद्रारा पीड़ा प्राप्त होनेपर वे उसका निवारण
करनेमे असमर्थ होते हें । शीत ओर वायु आदिके
भारी क्लेश भोगते हँ ओर नित्य भूखसे पीडित हो
मल-मूत्र आदिमं विचरते हए दुःख-पर-दुःख
उठाते रहते हें । तदनन्तर इसी क्रमसे पशुयोनिमें
आकर अपनेसे बलवान् पशुओंकी बाधासे भयभीत
रहते हुए वे जीव अकारण भी भारी उद्रेगसे कष्ट
पाते रहते हें । उन्हें हवा, पानी आदिका महान्
कष्ट सहन करना पड़ता है। अण्डज (पक्षी) -
को योनिमे भी वे कभी वायु पीकर रहते टै ओर
कभी मांस तथा अपवित्र वस्तुएँ खाते ह । ग्रामीण
पशुओंको योनिम आनेपर भी उन्हे कभी भार
ढोने, रस्सी आदिसे बोधे जाने, डंडोसे पटे जाने
तथा हल आदि धारण करनेके समस्त दुःख
भोगने पडते हे । इस प्रकार बहुत-सी योनियोमें
क्रमशः भ्रमण करके वे जीव मनुपष्य-जन्म पाते
हं। कोई पुण्यविशेषके कारण विना क्रमके भी
शीघ्र मनुष्य-योनि प्राप्त कर लेते ह । मनुष्य-जन्म
पाकर भी नीची जातिययोमें नीच पुरुषोंकी टहल
वजानेवाले, दरिद्र, अङ्गहीन तथा अधिक अङ्कवाले
इत्यादि होकर वे कट ओर अपमान उठाते हँ तथा
१. नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि । अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्मं शुभाशुभम्॥
(ना० पूर्वे० ३१। ६९-७०)
((-0. 1\/॥८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
९२०
संक्षिप्त नारदपुराण
अत्यन्त दुःखसे पूर्ण ज्वर, ताप, शीत, गुल्मरोग,
पादरोग, नेत्ररोग, सिरदर्द, गर्भ-वेदना तथा पसलीमें
दर्द होने आदिके भारी कष्ट भोगते है ।
मनुष्य-जन्ममें भी जब स्त्री ओर पुरुष मैथुन
करते हे, उस समय वीर्य निकलकर जब जरायु
(गरभाशय) -में प्रवेश करता हे, उसी समय जीव
अपने क्मकि वशीभूत हो उस वीर्यके साथ
गभाशयमें प्रविष्ट हो रज-वीर्यके कललमें स्थित
होता हे। वह वीर्य जीवके प्रवेश करनेके पाँच
दिन बाद कललरूपमें परिणत होता है । फिर पंद्रह
दिनके बाद बह पलल (मांसपिण्डको-सी स्थिति)
भागको प्राप्त हो एक महीनेमें प्रादेशमात्रः बडा
हो जाता है। तवसे लेकर पूर्णं चेतनाका अभाव
होनेपर भी माताके उदरमें दुस्सह ताप ओर क्लेश
होनेसे वह एक स्थानपर स्थिर न रह सकनेके
कारण वायुको प्रेरणासे इधर-उधर भ्रमण करता
हे । फिर दूसरा महीना पूर्णं होनेपर वह मनुष्यके-
से आकारको पाता है। तीसरे महीनेकी पूर्णता
होनेपर उसके हाथ-पैर आदि अवयव प्रकट होते
हे ओर चार महीने बीत जानेपर उसके सब
अवयवोको सन्धिका भेद जात होने लगता है।
पोच महीनेपर अगुलियोमें नख प्रकट होते है ।
छः मास पूरे हो जानेपर नखोंकी सन्धि स्पष्ट हो
जाती हे । उसकी नाभिमें जो नाल होती है, उसीके
द्वारा अन्नका रस पाकर वह पुष्ट होता है । उसके
सारे अद्ध अपवित्र मलमूत्र आदिसे भीगे रहते
हे । जरायुमे उसका शरीर वंधा होता है ओर बह
माताके रक्त, हड़ी, कोड, वसा, मज्जा, सरायु ओर
केश आदिसे दूषित तथा घृणित शरीरमें निवास
करता हे । माताके खाये हुए कड्वे, खट, नमकीन
तथा अधिक गरम भोजनसे वह अत्यन्त दग्ध
होता रहता हे। इस दुरवस्थामें अपने-आपको
देखकर वह देहधारी जीव पूर्वजन्मोंकी स्मृतिके
प्रभावसे पहलेके अनुभव किये हुए नरकके
दुःखो को भी स्मरण करता ओर आन्तरिक दुःखसे
अधिकाधिक जलने लगता है। ' अहो! में वडा
पापी हूं) कामसे अन्धा होनेके कारण परायी
स्त्रियोको हरकर उनके साथ सम्भोग करके मेने
वड-बड़ पाप किये हैं । उन पापोंसे अकेला मेही
एेसे-एेसे नरकोंका कष्ट भोगता रहा । फिर स्थावर
आदि योनियोमें महान् दुःख भोगकर अब मानवयोनिमें
आया हूं । आन्तरिक दुःख तथा बाह्य संतापसे
दग्ध हो रहा हू। अहो ! देहधारि्योको कितना दुःख
उठाना पड़ता है । शरीर पापसे ही उत्पन्न होता है ।
इसलिये पाप नहीं करना चाहिये । मेने कुटम्ब,
मित्र ओर स्त्रीके लिये दूसरोका धन चुराया हे।
उसी पापसे आज गर्भको ज्िह्ीमें बंधा हुआ जल
रहा हू । पूर्वजन्ममें दूसरोका धन देखकर ईर्प्यावश
जला करता था; इसीलिये में पापी जीव इस समय
भी गर्भको आगसे निरन्तर दग्ध हो रहा हू। मन,
वाणी ओर शरीरसे मेने दूसरोको बहुत पीडा दी
थी । उस पापसे आज में अकेला ही अत्यन्त
दुःखी होकर जल रहा हू।' इस प्रकार वह गर्भस्थ
जीव नाना प्रकारसे विलाप करके स्वयं ही अपने-
आपको इस प्रकार आश्वासन देता है-"अव में
जन्म लेनेके वाद सत्सङ्ग तथा भगवान् विष्णुकौ
कथाका श्रवण करके विशुद्ध-चित्त हो सत्कर्मोका
अनुष्ठान करूगा ओर सम्पूर्णं जगत्के अन्तरात्मा
तथा अपनी शक्तिके प्रभावसे अखिल विश्वको
सृष्टि करनेवाले सत्य-ज्ञानानन्दस्वरूप लक्ष्मीपति
भगवान् नारायणके उन युगल-चरणारविन्दोका
भक्तिपूर्वक पूजन करूगा। जिनकी समस्त देवता,
१. अंगृठेकी नोकसे लेकर तर्जनीकौ नोकतककी लम्बाईको "प्रादेश" कहते है।
((-0. 1/८111141/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद्
असुर, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, नाग, मुनि तथा
किन्नरसमुदाय आराधना करते रहते ह । भगवानके
वे चरण दुस्सह संसार-बन्धनके मूलोच्छेदके हेतु
हें । वेदोके रहस्यभूत उपनिषदोद्रारा उनको महिमाका
स्पष्ट ज्ञान होता हे। वे ही सम्पूर्णं जगत्के आश्रय
हे। मे उन्हीं भगवच्वरणारविन्दोको अपने हदयमें
रखकर अत्यन्त दुःखसे भरे हुए संसारको लोघ
जाऊंगा ।' इस प्रकार वह मनमें भावना करता हे ।
नारदजी ! जब माताके प्रसवका समय आता
हे, उस समय वह गर्भस्थ जीव वायुसे अत्यन्त
पीडित हो माताको भी दुःख देता हुआ कर्मपाशसे
बंधकर जबरदस्ती योनिमार्गसे निकलता हे। निकलते
समय सम्पूर्ण नरक-यातनाओंका भोग उसे एक ही
साथ भोगना पड़ता हे। बाहरकी वायुका स्पर्श होते
ही उसकी स्मरणशक्ति न्ट हो जाती हे। फिर वह
जीव बाल्यावस्थाको प्राप्त होता हे। उसमे भी अपने
ही मल-मूत्रमे उसका शरीर लिपटा रहता हे।
आध्यात्मिक आदि त्रिविध दुःखोसे पीडति
१२९
होकर भी वह कुछ नहीं बता सकता । उसके रोनेपर
लोग यह समञ्जते हें कि यह भूख-प्याससे कष्ट पा
रहा हे, इसे दूध आदि देना चाहिये ओर इसी
मान्यताके अनुसार वे लोग प्रयत्न करते हं। इस
प्रकार वह अनेक प्रकारके शारीरिक कष्ट-भोगका
अनुभव करता हे। मच्छरों ओर खटमलेकि काट
लेनेपर वह उन्हें हटानेमे असमर्थ होता हे । शेशवसे
वाल्यावस्थामें पर्हुचकर वहो माता-पिता ओर गुरुको
डटि सुनता ओर चपत खाता हे। वह बहुत-से
निरर्थक कार्योमिं लगा रहता है । उन कायेकि सफल
न होनेपर वह मानसिक कष्ट पाता है। इस प्रकार
वाल्य-जीवनमं अनेक प्रकारके कष्टोका अनुभव
करता है। तत्पश्चात् तरुणावस्थामें आनेपर जीव
धनोपार्जन करते हें । कमाये हुए धनकी रक्षा करनेपें
लगे रहते हें । उस धनके नष्ट या खर्च हो जानेपर
अत्यन्त दुःखी होते हं । मायासे मोहित रहते हे।
उनका अन्तःकरण काम-क्रोधादिसे दूषित हो जाता
हे। ये सदा दूसरोके गुणोमिं भी दोष ही देखा करते
हें । पराये धन ओर परायी स्त्रीको हड़प लेनेके
प्रयतनमे लगे रहते हे । पुत्र, मित्र ओर स्त्री आदिक
भरण-पोषणके लिये क्या उपाय किया जाय ? अव इस
वटे हुए कुदटुम्बका कैसे निर्वाह हागा ? मरे पास मृल-
धन नहीं हे (अतः व्यापार नहीं हो सकता), इधर
वर्षा भी नहीं हो रही है (अतः खेतीसे क्या आशा
की जाय), मेरी घरवालीके वच्चे अभी बहुत छट हैँ
(अतः उनसे काम~काजमे कोई मदद नहीं मिल
सकती), इधर में भी रोगी हो चला ओर निर्धन ही
रह गया। मेरे विचार न करनेसे खेती-बारी नष्ट हो
गयी। वच्चे रोज रोया कमते है । मेरा घर टूट-पफूट
गया । कोई जीविका भी नहीं मिलती । जाकी ओरसे
भी अत्यन्त दुःसह दुःख प्राप्त हो रहा है । शत्रु रोज
मरा पीच कसते है। म इन्दं कै से जीर्तुगा । इस प्रकार
चिन्ता व्याकुल तथा अपने दुःखको दूर करनेमें
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 66810011
१२२
संक्षिप्त नारदपुराण
असमर्थ हो, वे कहते है-विधाताको धिक्छार है।
, उसने मुञ्च भाग्यहीनको पेदा ही क्यो किया ? इसी तरह
जीव जब वृद्धावस्थाको प्राप्त होता है तो उसका बल
घटने लगता है। बाल सफेद हो जाते है ओर
जरावस्थाके कारण सारे शरीरमें ुर्रियां पड़ जाती है।
अनेक प्रकारके रोग उसे पीड देने लगते है। उसका
एक-एक अद्ख॒कोपता रहता है। दमा ओर खोंसी
आदिसे वह पीडित होता है। कीचड़से मलिन हई आंखें
चञ्चल एवं कातर हो उठती है। कफसे कण्ठ भर जाता
हि। पुत्र ओर पती आदि भी उसे ताडना करते हँ। मं
कब मर जाङगा-इस चिन्तासे वह व्याकुल हो उठता
है ओर सोचने लगता है कि मेरे मर जानेके बाद यदि
दूसरेनि मेर धन हड्प लिया तो मेर पुत्र आदिका जीवन-
निर्वाह कैसे होगा 2 इस प्रकार ममता ओर दुःखम
डूबा हुआ वह लंबी संस खीचता है ओर अपनी
आयुमे किये हुए कर्मोको बार-बार स्मरण करता है तथा
क्षण-क्षणमें भूल जाता हे। फिर जव मृत्युकाल निकट
आता है तो वह रोगसे पीडित हो आन्तरिक संतापसे
व्याकुल हो जाता हे। मेरे कमाये हए धन आदि किसके
अधिकारे होगे-इस चिन्तामें पडकर उसकी ओखेमें
ओंसू भर आते है। कण्ठ घुरघुराने लगता है ओर इस
दशामें शरीरसे प्राण निकल जाते ह। फिर यमदू्तोकी
डँट-फटकार सुनता हआ वह जीव पाशे बंधकर
पूर्ववत् नरक आदिके कष्ट भोगता हे । जिस प्रकार सुवर्ण
आदि धातु तबतक आगमे तपाये जाते है, जबतक कि
उनकी मैल नहीं जल जाती । उसी प्रकार सब जीवधारी
कमेकि क्षय होनेतक अत्यन्त कष्ट भोगते है ।
द्विजश्रेष्ठ! इसलिये संसाररूपी दावानलके तापसे
संतप्त मनुष्य परम ज्ञानका अभ्यास करे। कज्लानसे वह
मोक्ष प्राप्त कर लेता है। ज्ानशन्य मनुष्य पशु कहे गये
है। अतः संसार-बन्धनसे मुक्त होनके लिये परम ज्ञानका
अभ्यास करः । सब कर्मौको सिद्ध करनेवाले मानव-
जन्मको पाकर भी जो भगवान् विष्णुकी सेवा नहीं
करता, उससे बढ़कर मूर्ख कोन हो सकता हे ? मुनिशरष्ठ।
सम्पूर्णं मनोवाञ्छित फलेकि दाता जगदीश्वर भगवान्
विष्णुके रहते हुए भी मनुष्य ज्ञानरहित होकर नरकोमं
पकाये जाते है यह कितने आश्चर्यकी बात हे। जिससे
मल-मूत्रका स्रोत बहता रहता हे, एेसे इस क्षणभङ्गुर
शरीरम अज्ञानी पुरुष महान् मोहसे आच्छन्न होनेके
कारण नित्यताकी भावना करते है। जो मनुष्य मांस तथा
रक्त आदिसे भरे हुए उस घृणित शरीरको पाकर संसार
वन्धनका नाश करनेवाले भगवान् विष्णुका भजन नही
करता, वह अत्यन्त पातकी हे। ब्रह्मन्! मूर्खता या अज्ञान
अत्यन्त कष्टकारक है, महान् दुःख देनेवाला है, पतु
भगवानके ध्यानमे लगा हुआ चाण्डाल भी जान प्राप्त
करके महान् सुखी हो जाता है। मनुष्यका जन्म दुर्लभ
है। देवता भी उसके लिये प्रार्थना कसते है। अतः उसे
पाकर विद्वान् पुरुष परलोक सुधारेका यल करेः। जो
अध्यात्मन्ञानसे सम्पन्न तथा भगवानूकी आराधनामे
तत्पर रहनेवाले है, वे पुनरावृत्तिरहित परम धामको पा
लेते है। जिनसे यह सम्पूर्णं विश्च उत्पन्न हुआ है, जिनसे
चेतना पाता है ओर जिनमें ही इसका लय होता है,
वे भगवान् विष्णु ही संसार-बन्धनसे द्ुडानेवाले है।
जो अनन्त परमेश्वर निर्गुण होते हए भी सगुण-से
प्रतीत होते है, उन देवेश्वर श्रीहरिकी पूजा-अर्चा
करके मनुष्य संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
८ २४८ #
९. तस्मात्संसारदावाग्नितापार्तो
द्विजसत्तम । अभ्यसेत्परमं ज्ञानं ज्ानान्मोक्षमवाप्ुयात्॥
ज्ञानशून्या नरा ये तु पशवः परिकीर्तिताः। तस्मात्संसारमोक्षाय परं ज्ञानं समभ्यसेत् ॥
(ना० पूर्व० ३२। ३९-४०)
२. दुर्लभं मानुषं जन्म प्रार्थ्यते त्रिदशैरपि । तछ्छव्ध्वा परलोकार्थं यतं कुर्याद् विचक्षणः ॥
(ना० पूर्व ३२। ४७)
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पूर्वभाग-प्रथम पाद
१२२
मोक्षप्राप्िका उपाय, भगवान् विष्णु ही मोक्षदाता है- इसका प्रतिपादन, योग
तथा उसके अद्खोका निरूपण
नारदजीने पूछा-- भगवन्! कर्मसे देह मिलता
हे । देहधारी जीव कामनासे बंधता है । कामसे वह
लोभके वशीभूत होता है ओर लोभसे क्रोधके
अधीन हो जाता दै । क्रोधसे धर्मका नाश होता है।
धर्मके नाशसे बुद्धि बिगड़ जाती है ओर जिसकी
बुद्धि नष्ट हो जाती है, वह मनुष्य पुनः पाप करने
लगता है। अतः देह ही पापक जड़ है तथा
उसीकी पापकर्ममें प्रवृत्ति होती है, इसलिये मनुष्य
इस देहके भ्रमको त्यागकर जिस प्रकार मोक्षका
भागी हो सके, वह उपाय बताइये ।
श्रीसनकजीने कहा- महाप्राज्ञ ! सुत्रत । जिनको
आज्ञासे ब्रह्माजी सम्पूर्ण जगत्को सृष्टि, विष्णु
पालन तथा रुद्र संहार करते है, महत्तत्त्वसे लेकर
विशेषपर्यन्त सभी तत्व जिनके प्रभावसे उत्पन्न
हुए है, उन रोग-शोकसे रहित सर्वव्यापी भगवान्
नारायणको ही मोक्षदाता जानना चाहिये । सम्पूर्ण
चराचर जगत् जिनसे भिन्न नहीं है तथा जो जरा
ओर मृत्युसे परे है, उस तेज प्रभाववाले भगवान्
नारायणका ध्यान करके मनुष्य दुःखसे मुक्त हो
जाता है। जो विकाररहित, अजन्मा, शुद्ध, स्वयंप्रकाश,
निरञ्जन, ज्ञानरूप तथा सच्विदानन्दमय हैँ, ब्रह्मा
आदि देवता जिनके अवतारस्वरूपोंकी सदा
आराधना करते है, वे श्रीहरि ही सनातन स्थान
(परम धाम या मोक्ष)-के दाता हे। एेसा जानना
चाहिये। जो निर्गुण होकर भी सम्पूर्णं गुणोके
आधार है, लोकोपर अनुग्रह करनेके लिये विविध
रूप धारण करते ह ओर सबके हदयाकाशमं
विराजमान तथा सर्वत्र परिपूर्ण है, जिनकी कहीं
भी उपमा नहीं है तथा जो सबके आधार हं, उन
भगवान्को शरणमे जाना चाहिये। जो कल्पके
अन्तमं सबको अपने भीतर समेटकर स्वयं जलमें
शयन करते हे, वेदार्थके ज्ञाता तथा कर्मकाण्डके
विद्वान् नाना प्रकारके यज्ञोद्वारा जिनका यजन
करते हे, वे ही भगवान् कर्मफलके दाता हैँ ओर
निष्कामभावसे कर्मं करनेवालोको वे ही मोक्ष देते
है । जो ध्यान, प्रणाम अथवा भक्तिपूर्वक पूजन
करनेपर अपना सनातन स्थान वैकुण्ठ प्रदान करते
हे, उन दयालु भगवान्की आराधना करनी चाहिये ।
मुनीश्वर! जिनके चरणारविन्दोकी पूजा करके
देहाभिमानी जीव भी शीघ्र ही अमृतत्व (मोक्ष)
प्राप्त कर लेते हं, उन्दींको ज्ञानीजन पुरुषोत्तम
मानते है । जो आनन्दस्वरूप, जरारहित, परमज्योतिर्मय,
सनातन एवं परात्पर ब्रह्म हँ, वही भगवान्
विष्णुका सुप्रसिद्ध परम पद है। जो अद्वेत, निर्गुण,
नित्य, अद्वितीय, अनुपम, परिपूर्णं तथा ज्ञानमय
ब्रह्म है, उसीको साधु पुरुष मोक्षका साधन
मानते है। जो योगी पुरुष योगमार्गकी विधिसे
एेसे परम तत्त्वकी उपासना करता है, वह परम
पदको प्राप्त होता है। जो सब प्रकारकी आसक्तियोंका
त्याग करनेवाला, शम-दम आदि गुणोंसे युक्त
ओर काम आदि दोषोंसे रहित ठे, वह योगी परम
पदको पाता है।
नारदजीने पृछा- वक्ताओमें श्रेष्ठ । किस कर्मये
योगियोके योगकी सिद्धि होती है? वह उपाय
यथार्थरूपसे मुञ्चे बताइये ।
श्रीसनकजीने कहा- तत्त्वार्थका विचार
करनेवाले जानी पुरुष कहते है कि परम मोक्ष
ज्ञानसे ही प्राप्त होने योग्य है । उस सानका मूल
((-0. 1/८1114/5511॥1 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
९२४
हे भक्ति ओर भक्ति प्रात होती है (भगवदर्थ) कर्म
करनेवालोंको । भक्तिका लेशमात्र होनेसे भी अक्षय
परम धर्म सम्पन्न होता है। उत्कृष्ट श्रद्धासे सब
पाप नष्ट हो जाते हं। सब पापोंका नाश होनेपर
निर्मल बुद्धिका उदय होता है। वह निर्मल वुद्धि
ही जानी पुरुषोद्रारा ज्ञानके नामसे बतायी गयी है ।
ज्ञानको मोक्ष देनेवाला कहा गया है । वैसा ज्ञान
योगियोंको होता हे 1 कर्मयोग ओर ज्ञानयोग-इस
प्रकार दो प्रकारका योग कहा गया हे। कर्मयोगके
बिना मनुष्योका ज्ञानयोग सिद्ध नहीं होता; अतः
क्रिया (कर्म) -योगमें तत्पर होकर श्रद्धापूर्वक
भगवान् श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये । ब्राह्मण,
भूमि, अग्रि, सूर्य, जल, धातु, हदय तथा चित्र
नामवाली-ये भगवान् केशवकी आठ प्रतिमां
हे। इनमें भक्तिपूर्वक भगवान्का पूजन करना
चाहिये। अतः मन, वाणी ओर क्रियाद्वारा दूसरोंको
पीड़ा न देते हुए भक्तिभावसे संयुक्त हो सर्वव्यापी
भगवान् विष्णुको पूजा करे। अहिंसा, सत्य,
क्रोधका अभाव, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, ईर्घ्याका
त्याग तथा दया-ये सद्गुण ज्ञानयोग ओर
कर्मयोग-दोनोमे समानरूपसे आवश्यक हैँ ।
यह चराचर विश्च सनातन भगवान् तिष्णुका ही
स्वरूप है । एेसा मनसे निश्चय करके उक्तं दोनों
योगोका अभ्यास करे। जो मनीषी पुरुष समस्त
प्राणियोको अपने आत्मके ही समान मानते है, वे
ही देवाधिदेव चक्रसुदर्शनधारी भगवान् विष्णुके
परम भावको जानते हे । जो असूया (दूसरोके दोष
देखने) -मे संलग्र हो तपस्या, पूजा ओर ध्यानमें
प्रवृत्त होता हे, उसको वह तपस्या, पजा ओर
ध्यान सब व्यर्थ होते ह । इसलिये शम, दम आदि
गुणोके साधनमे लगकर विधिपूर्वक क्रियायोगे
१. अहिंसा सत्यमक्रोधो
संक्षिप्त नारदपुराण
तत्मर हो मनुष्य अपनी मुक्तिके लिये सर्वस्वरूप
भगवान् विष्णुको पूजा करे। जो सम्पूर्णं लोकोँके
हितसाधनमें तत्पर हो मन, वाणी ओर क्रियाद्वारा
देवेश्वर भगवान् विष्णुका भली भोति पूजन करता
हे, जो जगत्के कारणभूत, सर्वान्तर्यामी एवं
सर्वपापहारी सर्वव्यापी भगवान् विष्णुकी स्तोत्र
आदिके द्वारा स्तुति करता है, वह कर्मयोगी कहा
जाता हे। उपवास आदि त्रत, पुराणश्रवण आदि
सत्कर्म तथा पुष्प आदि सामग्रियोंसे जो भगवान्
विष्णुको पूजा कौ जाती है, उसे क्रियायोग कहा
गया हे। इस प्रकार जो भगवान् विष्णुमें भक्ति
रखकर क्रियायोगमें मन लगानेवाले है, उनके
पूर्वजन्मोके किये हुए समस्त पाप नष्ट हो जाते
हें । पापोके नष्ट होनेसे जिसकी बुद्धि शुद्ध हो
जाती हे, वह उत्तम ज्ञानको इच्छा रखता है;
क्योकि ज्ञान मोक्ष देनेवाला है-एेसा जानना चाहिये।
अव में तुम्हें ज्ञान-प्रा्िका उपाय बतलाता हूं।
बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह शास्त्रार्थविशारद
साधुपुरुषोके सहयोगसे इस चराचर विश्वमे स्थित
नित्य ओर अनित्य वस्तुका भलीभोति विचार
करे। संसारके सभी पदार्थं अनित्य हे । केवल
भगवान् श्रीहरि नित्य माने गये हें । अतः अनित्य
वस्तुओंका परित्याग करके नित्य श्रीहरिका ही
आश्रय लेना चाहिये । इहलोक ओर परलोकके
जितने भोग है, उनकी ओरसे विरक्त होना
चाहिये। जो भोगोंसे विरक्त नहीं होता, वह
संसारम फस जाता है । जो मानव जगत्के अनित्य
पदार्थमिं आसक्त होता हे, उसके संसार-बन्धनका
नाश कभी नहीं होता। अतः शम, दम आदि
गुणोसे सम्पन्न हो मुक्तिको इच्छा रखकर ज्ञान-
प्राप्िके लिये साधन करे। जो शम (दम,
ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ । अनीर्प्या च दया चैव योगयोरूभयोः समाः ॥
(ना० पूर्व० ३३1 ३५)
((-0. 1/111141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद्
तितिक्षा, उपरति, श्रद्धा ओर समाधान) आदि
गुणोसे शून्य हे, उसे ज्ञानकौ प्राप्ति नहीं होती । जो
राग-द्वेषसे रहित, शमादि गुणोंसे सम्पन्न तथा
प्रतिदिन भगवान् विष्णुके ध्यानमें तत्पर है, उसीको
" मुमुक्षु" कहते हें । इन चार (नित्यानित्यवस्तुविचारः,
वैराग्य, षट् सम्पत्ति ओर मुमुक्षुत्व-) साधनोसे
मनुष्य विशुद्धबुद्धि कहा जाता हे। एेसा पुरुष
सम्पूर्ण प्राणियोके प्रति दयाभाव रखते हए सदा
सर्वव्यापी भगवान् विष्णुका ध्यान करे। ब्रह्यन्।
्षर-अक्षर (जड-चेतन) स्वरूप सम्पूर्ण विश्वको
व्याप्त करके भगवान् नारायण विराजमान है । एेसा
जो जानता है, उसका ज्ञान योगज माना गया है ।
अतः मँ योगका उपाय बतलाता हूं। जो संसार-
बन्धनको दूर करनेवाला हे ।
पर ओर अपर-भेदसे आत्मा दो प्रकारका
१२५
कहा गया हे । अथर्ववेदकी श्रुति भी कहती है कि
दो ब्रह्म जानने योग्य हैं। पर आत्मा अथवा
परब्रह्मको निर्गुण बताया गया ठै तथा अपर
आत्मा या अपरब्रह्म अहकारयुक्त (जीवात्मा)
कहा गया है । इन दोनोके अभेदका ज्ञान “ ज्ञानयोग"
कहलाता है। इस पाञ्चभौतिक शरीरके भीतर
हदयदेशमें जो साक्षीरूपमें स्थित ठै, उसे साधु
पुरुषोने अपरात्मा कहा हे तथा परमात्मा पर
(श्रेष्ठ) माने गये हे । शरीरको क्षेत्र कहते है । जो
कषेत्रम स्थित आत्मा हे, वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है ।
परमात्मा अव्यक्त, शुद्ध एवं सर्वत्र परिपूर्णं कहा
गया हे । मुनिश्रेष्ठ ! जब जीवात्मा ओर परमात्माके
अभेदका ज्ञान हो जाता है, तब अपरात्माके
वन्धनका नाश होता हे। परमात्मा एक, शुद्ध
अविनाशी, नित्य एवं जगन्मय हें । वे मनुष्योके
बुद्धिभेदसे भेदवान्-से दिखायी देते ह । ब्रह्यन्।
उपनिषदोद्रारा वर्णित जो एक अद्वितीय सनातन
परब्रह्म परमात्मा है, उनसे भिन्न कोई वस्तु नहीं
है९। उन निर्गुण परमात्माका न कोई रूप टै, न
रग हे, न कर्तव्य कर्मं है ओर न कर्तत्वं या
भोक्ृत्व ही है । वे सब कार्णोके भी आदिकारण
है, सम्पूर्णं तेजोके प्रकाशक परम तेज है । उनसे
भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं हं । मुक्तके लिये उन्हीं
परमात्माका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। ब्रह्मन्
शब्दब्रह्ममय जो महावाक्य आदि ह अर्थात् वेदवर्णित
जो “ तत्त्वमसि", ' सोऽहमस्मि ' इत्यादि महावाक्य है
उनपर विचार करनेसे जीवात्मा ओर परमात्माका
अभेद ज्ञान प्रकाशित होता है, वह मुक्तिका सर्वश्रेष्ठ
साधन है। नारदजी। जो उत्तम ज्ञानसे हीन दै
२. यदा त्वभेदविज्ञानं
एकमेवाद्वितीयं यत्परं
जीवात्मपरमात्मनोः । भवेत्तदा
एकः शुद्धोऽक्षरो नित्यः परमात्मा जगन्मयः । नृणां
व्रह्म सनातनम् । गीयमानं च. वेदान्तैस्तस्मात्नास्ति परं द्विज॥
मुनिश्रेष्ट पाशच्छेदोऽ परात्मनः ॥
विज्ञानभदेन भदवानिव लक्ष्यते ॥
(ना पूर्व ३३। ६०-६२)
((-0. 1\/॥८11114/5511॥ 21188 \/818185। (0166101. 01411260 0 66810011
९२६
उन्हें यह जगत् नाना भेदोंसे युक्त दिखायी देता हे,
परंतु परम ज्ञानियोंको दृष्टिमें यह सब परत्रह्मरूप हे ।
परमानन्दस्वरूप, परात्पर, अविनाशी एवं निर्गुण
परमात्मा एक ही हँ, किंतु वुद्धिभेदसे वे भिन्न-भित्न
अनेक रूप धारण करनेवाले प्रतीत होते हे।
द्विजश्रेष्ठ । जिनके ऊपर मायाका पर्दा पडा है, वे
मायाके कारण परमात्मामे भेद देखते हँ, अतः
मुक्तिको इच्छा रखनेवाला पुरुष योगके बलसे
मायाको निस्सार समञ्चकर त्याग दे। माया न सद्रूप
हे, न असरूप, न सद्-असद् उभयरूप है, अतः
उसे अनिर्वाच्य (किसी रूपमे भी न कहने योग्य)
समञ्चना चाहिये । वह केवल भेदवुद्धि प्रदान करनेवाली
हे । मुनिश्रेष्ट! अज्ञान शब्दसे मायाका ही बोध होता
है, अतः जो मायाको जीत लेते है, उनके अज्ञानका
नाश हो जाता हे‹ । ज्ञान शब्दसे सनातन परत्रह्मका
ही प्रतिपादन किया जाता है, क्योकि ज्लानियोके
हदयमें निरन्तर परमात्मा प्रकाशित होते रहते हँ
मुनिश्रेष्ठ ! योगी पुरुष योगके द्वारा अज्ञानका नाश
करे। योग आठ अद्घोसे सिद्ध होता है; अतः मैं उन
आटो अद्धोका यथार्थरूपसे वर्णन करता हू।
मुनिवर नारद ! यम, नियम, आसन, प्राणायाम,
प्रत्याहार, धारणा, ध्यान ओर समाधि-ये योगके
आठ अद्ध हैः। मुनीश्वर! अव क्रमशः संक्षेपसे
इनके लक्षण बतलाता हू । अहिंसा, सत्य, अस्तेय,
ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अक्रोध ओर अनसूया-ये
संक्षेपसे यम बताये गये हँ । सम्पूर्णं प्राणियोमेसे
किसीको (कभी किचिन्मात्र) भी जो कष्ट न
१. एक एव परानन्दो निर्गुणः परतः पर्ः
मायिनो मायया
मायैवाज्ञानशब्देन बुद्धयते
२. यमाश्च नियमाश्चैव आसनानि च सत्तम
समाधिश्च मुनिश्रेष्ठ
योगाङ्गानि यथाक्रमम्।
संक्षिप्त नारदपुराण
पहंचानेका भाव है, उसे सत्पुरुषोने "अहिंसा ' कहा
हे। ' अहिंसा" योगमार्गे सिद्धि प्रदान करनेवाली
हे। मुनिश्रेष्ठ! धर्म ओर अधर्मका विचार रखते हए
जो यथार्थं बात कही जाती है, उसे श्रेष्ट पुरुष
' सत्य ' कहते हे । चोरीसे या बलपूर्वक जो दूसरेके
धनको हड्प लेना है, वह साधु पुरुषोद्रारा ' स्तेय'
कहा गया हे। इसके विपरीत किसीको वस्तुको न
लेना “अस्तेय ' हे। सब प्रकारसे मेथुनका त्याग
'ब्रह्मचर्य' कहा गया है । मुनीश्वर ! आपत्तिकालमें
भी द्रव्योका संग्रह न करना "अपरिग्रह" कहा गया
हे। वह योगमार्गे उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाला
है। जो अपना उत्कर्षं जताते हए किसीके प्रति
अत्यन्त कठोर वचन बोलता है, उसके उस
क्रूरतापूर्ण भावको धर्मज्ञ पुरुष ! क्रोध ' कहते हे,
इसके विपरीत शान्तभावका नाम "अक्रोध" हे। धन
आदिके द्वारा किसीको बढते देखकर डाहके कारण
जो मनमें संताप होता हे, उसे साधु पुरुषोनि ' असूया'
(ईर्प्या) कहा हे; इस “ असूया "का त्याग ही " अनसूया'
हे। देवर्ष! इस प्रकार संक्षेपसे ' यम' बताये गये ह ।
नारदजी ! अव मेँ तुष्हं 'नियम' बतला रहा हू सुनो।
तप, स्वाध्याय, संतोष, शोच, भगवान् विष्णुकी
आराधना तथा संध्योपासन आदि नियम कहे गये है ।
जिसमें चान्द्रायण आदि ब्रतोके द्वारा शरीरको कृश
किया जाता है, उसे साधु पुरुषनि तप' कहा हे । वह
योगका उत्तम साधन है। ब्रह्मन्! ॐकार, उपनिषद्,
द्वादशाक्षर-मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ),
अष्टाक्षर-मन्त्र ( ॐ नमो नारायणाय ) तथा तत्वमसि
। भाति विज्ञानभेदेन बहुरूपधरोऽव्ययः ॥
भेदं पश्यन्ति परमात्मनि। तस्मान्मायां
नासद्रूपा न॒ सद्रूपा माया नैवोभयात्मिका। अनिर्वाच्या
त्यजेद्योगान्मुमुक्षुरद्विजसत्तम ॥
ततो ज्ञेया भदवुद्धिप्रदायिनी॥
मुनिसत्तम । तस्मादज्ञानविच्छेदो भवेद्वै जितमायिनाम्॥
(ना० पूर्व० ३३। ६७-७०)
। प्राणायामः प्रत्याहारो धारणा ध्यानैमेव च॥
(ना० पूर्व० ३३। ७३-७४)
((-0. 1\॥11114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
१२७
आदि महावाक्योके समुदायका जो जप, अध्ययन
एवं विचार है, उसे ' स्वाध्याय ' कहा गया है । वह
भी योगका उत्तम साधन है। जो मृद् उपर्युक्त
स्वाध्याय छोड देता है, उसका योग सिद्ध नहीं
होता। कितु योगके विना भी केवल स्वाध्यायमात्रसे
मनुष्योके पापका नाश हो जाता है। स्वाध्यायसे
संतुष्ट किये हुए इष्टदेवता प्रसन्न होते हें । विप्रवर ।
जप तीन प्रकारका कहा गया है- वाचिक, उपांशु
ओर मानस। इन तीन भेदोमे भी पूर्व-पूर्वकौ
अपेक्षा उत्तर-उत्तर श्रेष्ठ हे । विधिपूर्वक अक्षर ओर
पदको स्पष्ट बोलते हए जो मन्त्रका उच्चारण
किया जाता हे, उसे वाचिक" जप बताया गया
हे। वह सम्पूर्ण यज्ञोका फल देनेवाला है। कुछ
मन्द स्वरमें मन्त्रका उच्चारण करते समय एक
पदसे दूसरे पदका विभाग करते जाना “उपांशु
जप कहा गया हे। वह पहलेको अपेक्षा दूना
महत्त्व रखता है। मन-ही-मन अशक्षरोकी श्रेणीका
चिन्तन करते हए जो उसके अर्थपर विचार किया
जाता है, वह ' मानस" जप कहा गया है । मानस
जप योगसिद्धि देनेवाला है! । जपसे स्तुति करनेवाले
पुरुषपर इष्टदेव नित्य प्रसन्न रहते हँ, इसलिये
स्वाध्यायपरायण मनुष्य सम्पूर्णं मनोरथोको पा
लेता हे । प्रारब्धके अनुसार जो कुछ मिल जाय,
उसीसे प्रसन्न रहना “संतोष ' कहलाता है । संतोषहीन
पुरुष कहीं सुख नहीं पाता। भोगोको कामना
भोग्य वस्तुओंको भोग लेनेसे शान्त नहीं होती,
अपितु इससे भी अधिक भोग मुञ्चे कव मिलेगा-इस
प्रकार कामना बढती रहती हे । अतः कामनाका
त्याग करके दैवात् जो कुछ मिले, उसीसे संतुष्ट
रहकर मनुष्यको धर्मके पालनमें लगे रहना चाहिये ।
वाह्यशौच ओर आभ्यन्तर शौचके भेदसे ' शोच! दो
प्रकारका माना गया है। मिद्री ओर जलसे जो
शरीरको शुद्ध किया जाता है, वह बवाह्यशौच है
ओर अन्तःकरणके भावकी जो शुद्धि है, उसे
आभ्यन्तरशोच कहा गया है । मुनिश्रेष्ठ ! आन्तरिक
शुद्धिसे हीन पुरुपोंद्रारा जो नाना प्रकारके यज्ञ
किये जाते हँ, वे राखमें डाली हुई आहुतिके
समान निष्फल होते हें । अतः राग आदि सव
दोषोंका त्याग करके सुखी होना चाहिये । हजारों
भार मिद्री ओर करोड़ों घडे जलसे शरीरकी शुद्धि
कर लेनेपर भी जिसका अन्तःकरण दूषित है, वह
चाण्डालके ही समान अपवित्र माना गया है। जो
आन्तरिक शुद्धिसे रहित होकर केवल बाहरसे
शरीरको शुद्ध करता टै, वह ऊपरसे सजाये हुए
मदिरापात्रकी भति अपवित्र ही टै, उसे शान्ति
नहीं मिलती। जो मानसिक शुद्धिसे हीन होकर
तीर्थयात्रा करते है, उन्हे वे तीर्थ उसी तरह पवित्र
नहीं करते जेसे मदिरासे भरे हए पात्रको नदियां ।
मुनिश्रेष्ठ । जो वाणीसे धर्मोका उपदेश करता ओर
मनसे पापकी इच्छा रखता हे, उसे महापातकिर्योका
सिरमौर समञ्जना चाहिये । जिनका अन्तःकरण
शुद्ध है, वे यदि परम उत्तम धर्ममार्गका आचरण
करते ह तो उसका फल अक्षय एवं सुखदायक
जानना चाहिये । मन, वाणी ओर क्रियाद्वारा स्तुति,
कथाश्रवण तथा पूजा करनेसे भगवान् विष्णुमें
जिसकी दृढ भक्ति हो गयी है, उसकी वह
भक्ति भौ भगवान् विष्णुकी “आराधना!
कटी गयी है (तथा संध्योपासना तो प्रसिद्ध
ही हे)। नारदजी! इस प्रकार मैने यम ओर
नियमोको संक्षेपसे समञ्चाया। इनके द्वारा
जिनका चित्त शुद्ध हौ गया है, उनके मोक्ष
हस्तगत ही है-एेसा माना जाता है। यम
१. धिया यदक्षरश्रेण्यां तत्तदर्थविचारणम्। स॒ जपो मानसः प्रोक्तौ योगसिद्धिप्रदायकः॥
(ना० पूर्व० ३३। ९५)
(-0. 1\॥(11114/5511॥1 21188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
९२८
ओर नियमोंद्रारा बुद्धिको स्थिर करके जितेद्दिय
पुरुष योग-साधनाके अनुकूल उत्तम आसनका
विधिपूर्वक अभ्यास करे।
पद्मासन, स्वस्तिकासन, पीठासन, सिंहासन,
कुक्कुटासन, कुञ्जरासन, कूर्मासन, वज्रासन,
वाराहासन, मृगासन, चैलिकासन, क्रौञ्चासन,
नालिकासन, सर्वतोभद्रासन, वृषभासन, नागासन,
मत्स्यासन, व्याघ्रासन, अर्धचन्द्रासन, दण्डवातासन,
शेलासन, खद्धासन, मुद्ररासन, मकरासन, त्रिपथासन,
काष्टासन, स्थाणु-आसन, वैकर्णिकासन, भोमासन
ओर वीरासन-ये सब योगसाधनके हेतु हें।
मुनीश्चरोने ये तीस आसन बनाये है । साधक पुरुष
शीत-उष्ण आदि द्न्द्रोसे पृथक् हो ईर्प्या-द्वेष
छोडकर गुरुदेवके चरणोमे भक्ति रखते हए
उपर्युक्त आसनोमेसे किसी एकको सिद्ध करके
प्राणोको जीतनेका अभ्यास करे। जहां मनुष्योंकी
भीड़ न हो ओर किसी प्रकारका कोलाहल न
होता हो, एेसे एकान्त स्थानमें पूर्व, उत्तर अथवा
पश्चिमको ओर मुंह करके अभ्यासपूर्वक प्राणोको
जीते- प्राणायामका अभ्यास करे। शरीरके भीतर
स्थित वायुका नाम प्राण हे। उसके विग्रह (वशमें
करनेकी चेष्टा)-को आयाम कहते हें । यही
"प्राणायाम ' कहा गया है । उसके दो भेद बताये
गये है-एक अगर्भ प्राणायाम ओर दूसरा सगर्भ
प्राणायाम, इनमें दूसरा श्रेष्ठ है । जप ओर ध्यानके
विना जो प्राणायाम किया जाता हे, वह अगर्भ हे
ओर जप तथा ध्यानके सहित किये जानेवाले
प्राणायामको सगर्भं कहते हे । मनीषी पुरुषोने इस
दो भेदोवाले प्राणायामको रेचक, पूरक, कुम्भक
ओर शुन्यकके भेदसे चार प्रकारका वताया हे ।
जीवोकी दाहिनी नाडीका नाम पिङ्गला दे। उसके
देवता सूर्य हे । उसे पितृयोनि भी कहते हं । इसी
प्रकार बायीं नाडीका नाम इडा है, जिसे देवयोनि
संक्षिप्त नारदपुराण
भी कहते हे । मुनिश्रेष्ठ! चन्द्रमाको उसका अधिदेवता
समञ्मो। इन दोनोके मध्यभागमें सुषुम्ना नाडी है।
यह अत्यन्त सक्षम ओर परम गुह्य है । ब्रह्माजीको
इसका अधिदेवता जानना चाहिये। नासिकाके
वाये छिद्रसे वायुको बाहर निकाले । रेचन करने
(निकालने) -के कारण इसका नाम रेचक" हे,
फिर नासिकाके दाहिने लिद्रसे वायुको अपने
भीतर भरे। वायुको पूर्णं करने (भरने) -के कारण
इसे पूरक" कहा गया है । अपने देहमें भरी हुई
वायुको रोके रहे, छोड नहीं ओर भरे हए कुम्भ
(घड)-की भाति स्थिरभावसे बेठा रहे । कुम्भकी
भोति स्थित होनेके कारण इस प्राणायामका नाम
' कुम्भक ' हे । बाहरकी वायुको न तो भीतरको
ओर ग्रहण करे ओर न भीतरकी वायुको बाहर
निकाले। जेसे हो, वैसे ही स्थित रहे । इस तरहके
प्राणायामको “शुन्यक"' समदञ्लो। जैसे मतवाले
गजराजको धीरे-धीरे वशमें किया जाता है, उसी
प्रकार प्राणको धीरे-धीरे जीतना चाहिये । अन्यथा
बड़े-बड़े भयङ्कर रोग हो जाते हं। जो योगी
क्रमशः वायुको जीतनेका अभ्यास करता हे, वह
निष्पाप हो जाता है ओर सन पापोंसे मुक्त होनेपर
वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हे।
“मुनीश्वर! जो विष्योमें फसी हुई इन्द्रियोको
विषयोंसे सर्वथा समेटकर अपने भीतर रोके रहता
हे, उसके इस प्रयलका नाम "प्रत्याहार! हे।
ब्रह्मन्! जिन्होने प्रत्याहारद्वारा अपनी इद्ियोको
जीत लिया है, वे महात्मा पुरुष ध्यान न करनेपर
भी पुनरावृत्तिरहित परब्रह्म पदको प्रात कर लेते
हं । जो इद्ियसमुदायको वशमें किये विना ही
ध्यानमें तत्पर होता है, उसे मूर्ख समङ्ञो; क्योकि
उसका ध्यान सिद्ध नहीं होता। मनुष्य जिस-
जिस वस्तुको देखता हे, उसे अपने आत्मामं
आत्मस्वरूप समञ्च ओर प्रत्याहारद्वारा वशम कौ
((-0. 1\/॥11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
१९२९
हुई इन्िर्योको अपने आत्मामें ही अन्तर्मुख करके
धारण करे। इस प्रकार इद्दरियोंको जो आत्मामें
धारण करना है, उसीको ' धारणा' कहते हैँ ।
( प्रत्याहार )-से इन्द्रियोके समुदायको जीतकर
धारणाद्वारा उन इद्दियोको दृटढतापूर्वक हदयमें
धारण कर लेनेके पश्चात् साधक उन परमात्माका
ध्यान करे, जो सवका धारण-पोषण करनेवाले हें
ओर जो कभी अपनी महिमासे च्युत नहीं होते।
सम्पूर्ण विश्च उन्हींका स्वरूप हे । वे सर्वत्र व्यापक
होनेसे विष्णु कहलाते हैं । समस्त लोकोकि एकमात्र
कारण वे ही हें । उनके नेत्र विकसित कमलदलके
समान सुशोभित हें । मनोहर कुण्डल उनके कानोकी
शोभा वदाते हे । उनकी भुजां विशाल हें । अङ्ग
अङ्गसे उदारता सूचित होती है। सब प्रकारके
आभूषण उनके सुन्दर विग्रहकौ शोभा बढ़ाते हे ।
उन्होने पीताम्बर धारण कर रखा है । वे दिव्यशक्तिसे
सम्पन्न हें । उन्होने स्वर्णमय यज्ञोपवीत धारण
किया हे। गलेमें तुलसीकी माला पहन रखी हे।
कोस्तुभमणिसे उनकी शोभा ओर बढ़ गयी है।
वक्षःस्थलमे श्रीवत्सका चिह सुशोभित हे । देवता
ओर असुर सभी भगवान्के चरणो मस्तक नवा
रहे हँ । बारह अंगुल विस्तृत तथा आठ दलोसे
विभूषित अपने हदयकमलके आसनपर विराजमान
सर्वव्यापी अव्यक्तस्वरूप परात्पर परमात्माका
उपर्युक्तरूपसे ध्यान करना चाहिये । ध्येय वस्तुमें
चित्तकी वृत्तिका एकाकार हो जाना ही साधु पुरुषोद्रारा
"ध्यान ' कहा गया हे। दो घडी ध्यान करके भी
मनुष्य परम मोक्षको प्राप्त कर लेता है। ध्यानसे
पाप नष्ट होते है । ध्यानसे मोक्ष मिलता दै । ध्यानसे
भगवान् विष्णु प्रसन्न होते है तथा ध्यानसे सम्पूर्ण
मनोर्थोकी सिद्धि हो जाती हैः । भगवान् महाविष्णुके
जो-जो स्वरूप है, उनमेंसे किसीका भी एकाग्रतापूर्वक
ध्यान करे। उस ध्यानसे संतुष्ट होकर भगवान्
विष्णु निश्चय ही मोक्ष देते हे । साधुशिरोमणे। ध्येय
वस्तुमें मनको इस प्रकार स्थिर कर देना चाहिये
कि ध्याता, ध्यान ओर ध्येयकी त्रिपुरटीका तनिक
भी भान न रह जाय। तब ज्ानरूपी अमृतके
सेवनसे अमृतत्व (परमात्मा) -को प्राप्त होता हेै।
निरन्तर ध्यान करनेसे ध्येय वस्तुके साथ अपना
अभेदभाव स्पष्ट अनुभव हो जाता है । जिसकी सब
इन्द्रियं विषयोसे निवृत्त हो जाती है ओर वह
परमानन्दसे पूर्ण हो वायुशून्य स्थानमें जलते हए
दीपककी भोति अविचलभावसे ध्याने स्थित हो
जाता है, तो उसको इस ध्येयाकार स्थितिको
समाधि ' कहते हं । नारदजी ! योगी पुरुष समाधि-
अवस्थामें न देखता है, न सुनता है, न सुंघता है
न स्पर्श करता है ओर न वह कुच बोलता ही है।
उस अवस्थामे योगियोको सम्पूर्णं उपाधियोसे
मुक्त, शुद्ध, निर्मल, सच्विदानन्दस्वरूप तथा अविचल
आत्माका साक्षात्कार होता है। विद्वान् नारदजी।
यह आत्मा परम ज्योतिर्मय तथा अमेय है। जो
मायाके अधीन है, उन्हीको वह मायायुक्त-सा
प्रतीत होता है । उस मायाका निवारण होनेपर वह
निर्मल ब्रह्मरूपसे प्रकाशित हौता है। वह ब्रह्म
एक, अद्वितीय, परमज्योतिः स्वरूप, निरञ्जन तथा
सम्पूर्णं प्राणियोके अन्तर्यामी आत्मारूपसे स्थित
हे। परमात्मा सुृक्ष्मसे भी अत्यन्त सुक्ष्म ओर
महानूसे भी अत्यन्त महान् है। वह सनातन
परमेश्वर समस्त विश्चका कारण हे । ज्ञानियोमें श्रेष्ठ
पुरुष परम पवित्र परात्पर ब्रह्मरूपे उसका दर्शन
करते ठे । अकारसे लेकर् हकारतकके भिन्न-भिन्न
वणेकि रूपमे स्थित अनादि पुराणपुरुष परमात्माको
१. ध्यानात्पापानि नश्यन्ति ध्यानान्मोक्षं च विन्दति। ध्यानात्प्रसीदति दहरिर्ध्यानात्सर्वार्थसाधनम् ॥
(ना० पूर्व° ३३1 १३९)
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ही शब्दब्रह्म कहा गया है ओर जो विशुद्ध, अक्षर,
नित्य, पूर्ण, हदयाकाशके मध्य विराजमान अथवा
आकाशम व्याप्त, आनन्दमय, निर्मल एवं शान्त तत्तव
हे, उसीको ' परब्रह्म परमात्मा" कहते हे, योगीलोग
अपने हदयमें जिन अजन्मा, शुद्ध, विकाररहित, सनातन
परमात्माका दर्शन करते हे, उन्हीका नाम परब्रह्म है।
मुनिश्रेष्ठ! अब दूसरा ध्यान बतलाता हूं सुनो।
परमात्माका यह ध्यान संसार-तापसे संतप्त मनुष्योको
अमृतकी वषकि समान शान्ति प्रदान करनेवाला हे।
परमानन्दस्वरूप भगवान् नारायण प्रणवमें स्थित
है-एेसा चिन्तन करे। उनकी कहीं उपमा नहीं है।
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५.
सस्षिप्त नारदपुराण
वे प्रणवकी अर्धमात्राके ऊपर विराजमान नादस्वरूप
है। अकार ब्रह्याजीका रूप है, उकार भगवान्
विष्णुका स्वरूप है, मकार रुद्ररूप है तथा अर्धमात्रा
निर्गुण परब्रह्म परमात्मस्वरूप हे। अकार, उकार ओर
मकार-ये प्रणवकी तीन मात्रां कही गयी हे । ब्रह्या,
विष्णु ओर शिव-ये तीन क्रमशः उनके देव्रता हे।
इन सबका समुच्चयरूप जो ञकार है, वह परब्रह्म
परमात्माका बोध करानेवाला है। परब्रह्य परमात्मा
वाच्य है ओर प्रणव उनका वाचक माना गया है।
नारदजी ! इन दोनोमे वाच्य-वाचक-सम्बन्ध उपचारसे
ही कहा गया है! जो प्रतिदिन प्रणवका जप करते हः
वे सम्पूर्णं पातकोसे मुक्त हो जाते ह तथा जो निरन्तर
उसीके अभ्यासे लगे रहते है, वे परम मोक्ष पाते हे।
जो ब्रह्मा, विष्णु ओर शिवरूप प्रणव-मन्त्रका जप
करता है, उसे अपने अन्तःकरणमें कोटि-कोरि सूयेकि
समान निर्मल तेजका ध्यान करना चाहिये अथवा
प्रणव-जपके समय शालग्रामशिला या किसी
भगवत्प्रतिमाके स्वरूपका ध्यान करना चाहिये। अथवा
जो-जो पापनाशक तीर्थादिक वस्तु हे, उसी-उसीका
अपने हदयमें चिन्तन करना चाहिये। मुनीश्वर! यह
वैष्णवज्ञान तुम्हं बताया गया है । इसे जानकर योगीश्वर
पुरुष उत्तम मोक्ष पा लेता हे। जो एकाग्रचित्त होकर
इस प्रसंगको पदता अथवा सुनता है, वह सब पापोसे
मुक्त हो भगवान् विष्णुका सालोक्य प्राप्त कर लेता हे।
=+» 2८१८ =#
भवबन्धनसे मुक्तके लिये भगवान् विष्णुके भजनका उपदेश
नारदजीने क्हा-हे सर्वज्ञ महामुने ! सबके
स्वामी देवदेव भगवान् जनार्दन जिस प्रकार संतुष्ट
होते हँ, वह उपाय मुञ्चे बताइये ।
श्रीसनकजी बोले- नारदजी ! यदि मुक्ति चाहते
हो तो सच्िदानन्दस्वरूप परमदेव भगवान् नारायणका
सम्पूर्ण चित्तसे भजन करो। भगवान् विष्णुकी
शरण लेनेवाले मनुष्यको शत्रु मार नहीं सकते,
ग्रह पीडा नहीं दे सकते तथा राक्षस उसको ओर
ओंख उठाकर देख नहीं सकते। भगवान् जनार्दनम
जिसकी दृद भक्ति है, उसके सम्पूर्णं श्रेय सिद्ध
हो जाते ह । अतः भक्त पुरुष सबसे बदकर है।
मनुष्योके उन्हीं पैरोको सफल जानना चाहिये, जो
((-0. 1/८1114<511॥1 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद्
ज जी ^ १ „~ न्दे
५ 1 क र ॐ
44
^ (7
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भगवान् विष्णुके मन्दिरमे दर्शनके लिये जाते हे ।
उन्हीं हाथोको सफल समञ्जना चाहिये, जो भगवान्
विष्णुकी पूजामें तत्पर होते है । पुरुषोके उन्हीं
नेत्रोको पूर्णतः सफल जानना चाहिये, जो भगवान्
जनार्दनका दर्शन करते हैं। साधुपुरुषोने उसी
जिह्वाको सफल बताया है, जो निरन्तर हरिनामक
जप ओर कौर्तनमें लगी रहती है। मैं सत्य कहता
हूं, हितकी बात कहता हूँ ओर बार-बार सम्पूर्ण
शास्त्रोका सार बतलाता हूं-इस असार संसारमं
केवल श्रीहरिकी आराधना ही सत्य ठहै। यह
संसारबन्धन अत्यन्त दृढ़ है ओर महान् मोहं
डालनेवाला है। भगवद्धक्तिरूपी कुठारसे इसको
काटकर अत्यन्त सुखी हो जाओ। वही मन
सार्थक है, जो भगवान् विष्णुके चिन्तनं लगता
है, तथा वे ही दोनों कान समस्त जगत्के लिये
वन्दनीय है, जो भगवत्कथाकी सुधाधारासे परिपूर्ण
रहते है । नारदजी ! जो आनन्दस्वरूप, अक्षर एवं
जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओंसे रहित तथा हदयमें
विराजमान टै, उन्हीं भगवान्का तुम निरन्तर
भजन करो। मुनिश्रेष्ठ ! जिनका अन्तःकरण शुद्ध
१३९
नहीं हे-एेसे लोग भगवानूके स्थान या स्वरूपका न
तो वर्णन कर सकते हँ ओर न दर्शन ही। विप्रवर!
यह स्थावर-जंगमरूप जगत् केवल भावनामय है
ओर बिजलीके समान चञ्चल है। अतः इसकी
ओरसे विरक्त होकर भगवान् जनार्दनका भजन करो।
जिनमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य ओर
अपरिग्रह विद्यमान है, उन्हींपर जगदीश्वर श्रीहरि
संतुष्ट होते हैँ । जो सम्पूर्ण प्राणियोके प्रति दयाभाव
रखता है ओर ब्राह्मणोके आदर-सत्कारमें तत्पर
रहता है, उसपर जगदीश्वर भगवान् विष्णु प्रसन्न
होते है। जो भगवान् ओर उनके भक्तोकी कथां
प्रेम रखता है, स्वयं भगवान्की कथा कहता है
साधु-महात्माओंका संग करता है ओर मनमं अहङ्कार
नहीं लाता, उसपर भगवान् विष्णु प्रसन्न रहते ह । जो
भूख-प्यास ओर लडखडकर गिरने आदिके अवसर्योपर
भी सदा भगवान् विष्णुके नामका उच्चारण करता है
उसपर भगवान् अधोक्षज (विष्णु) प्रसन्न होते ।
मुने! जो स्त्री पतिको प्राणके समान समञ्चकर् उनके
आदर-सत्कारमें सदा लगी रहती है, उसपर प्रसन्न हो
जगदीश्वर श्रीहरि उसे अपना परम धाम दे देते है।
जो ईर्ष्या तथा दोपटृष्टिसे रहित होकर अहद्कारसे दूर
रहते ह ओर सदा देवाराधन किया करते है, उनपर
भगवान् केशव प्रसत होते है। अतः देवं । सुनो, तुम
सदा श्रीहरिका भजन करो। शरीर मृत्युस जुड़ा हभ
है। जीवन अत्यन्त चञ्चल है। धनपर राजा आदिके
द्वारा बराबर बाधा आती रहती है ओर सम्पत्त्या
क्षणभसमें नष्ट हो जानेवाली है । देवर्ष! क्या तुम नहीं
देखते कि आधी आयु तो नीदसे ही नष्ट हो जाती है
ओर कुछ आयु भोजन आदिमे समाप्त हो जाती दै।
आयुका कुछ भाग वचपनमे, कुछ विषय-भोगेम्ं
ओर कुछ वुदापिमं व्यर्थं बीत जाता दै। फिर तुम
धर्मका आचरण कब करोगे 2 बचपन ओर बुदपिमं
भगवान्को आराधना नहीं हो सकती, अतः अहङ्कर
((-0. 1/८1111(4<511॥ 81188 \/81811851 (01661101. 0141260 0 60810011
+ + === क ~
१३२
छोडकर युवावस्थामें ही धर्मोका अनुष्ठान करना
चाहिये। मुने! यह शरीर मृत्युका निवासस्थान
ओर आपत्तियोका सबसे बड़ा अङा है। शरीर
रोगोका घर है। यह मल आदिसे सदा दूषित रहता
हे। फिर मनुष्य इसे सदा रहनेवाला समञ्लकर
व्यर्थं पाप क्यों करते हं । यह संसार असार है ।
इसमे नाना प्रकारके दुःख भरे हुए हैँ । निश्चय ही
यह मृत्युसे व्याप्त हे, अतः इसपर विश्वास नहीं
करना चाहिये। इसलिये विप्रवर! सुनो, मे यह
सत्य कहता हू देह-बन्धनकी निवृत्तिके लिये
भगवान् विष्णुकी ही पूजा करनी चाहिये । अभिमान
ओर लोभ त्यागकर काम-क्रोधसे रहित होकर
सदा भगवान् विष्णुका भजन करो; क्योकि मनुष्यजन्म
अत्यन्त दुर्लभ हे ।
सत्तम! (अधिकांश) जीवोंको कोरि सहस्र
जन्मोतक स्थावर आदि योनिरयोमें भटकनेके बाद
कभी किसी प्रकार मनुष्य-शरीर मिलता है।
साधु-शिरोमणे! मनुष्य-जन्ममें भी देवाराधनकी
बुद्धि, दानक बुद्धि ओर योगसाधनाको बुद्धिका
प्राप्त होना मनुष्योके पूर्वजन्मकी तपस्याका फल
हे। जो दुर्लभ मानव-शरीर पाकर एक बार भी
श्रीहरिको पूजा नहीं करता, उससे बढ़कर मूर्ख,
जड्बुद्धि कोन है 2 दुर्लभ मानव-जन्म पाकर जो
भगवान् विष्णुको पूजा नहीं करते, उन महामूर्खं
मनुष्योमें विवेक कहां है ? ब्रह्मन्! जगदीश्वर
भगवान् विष्णु आराधना करनेपर मनोवाज्छित
फल देते हे । फिर संसार-रूप अग्रिमे जला हुआ
कोन मानव उनकी पूजा नहीं करेगा ? मुनिश्रेष्ठ ।
विष्णुभक्तं चाण्डाल भी भक्तिहीन द्विजसे बढ़कर
हे । अतः काम, क्रोध आदिको त्यागकर अविनाशी
भगवान् नारायणका भजन करना चाहिये । उनके
संक्षिप्त नारदपुराण
प्रसन्न होनेपर सब संतुष्ट होते हैँ; क्योकि वे
भगवान् श्रीहरि ही सबके भीतर विद्यमान हैँ । जैसे
सम्पूर्णं स्थावर- जङ्गम जगत् आकाशसे व्याप्त हें
उसी प्रकार इस चराचर विश्वको भगवान् विष्णुने
व्याप्त कर रखा है । भगवान् विष्णुके भजनसे जन्म
ओर मृत्यु दोनोंका नाश हो जाता है। ध्यान,
स्मरण, पूजन अथवा प्रणाममात्र कर लेनेपर
भगवान् जनार्दन जीवके संसारबन्धनको काट देते
हें । ब्रह्यर्षे ! उनके नामका उच्चारण करनेमात्रसे
महापातकोंका नाश हो जाता है ओर उनकी
विधिपूर्वक पूजा करके तो मनुष्य मोक्षका भागी
होता हे । ब्रह्मन्! यह बडे आश्चर्यको बात है,
बड़ी अद्धुत बात हे ओर बड़ी विचित्र बात है कि
भगवान् विष्णुके नामके रहते हुए भी लोग जन्म-
मृत्युरूप संसारमें चक्र कारते हं५। जबतक
इन्द्रियां शिथिल नहीं होतीं ओर जबतक रोग-
व्याधि नहीं सताते, तभीतक भगवान् विष्णुको
आराधना कर लेनी चाहिये। जीव जव माताके
गर्भसे निकलता है, तभी मृत्यु उसके साथ हो लेती
है । अतः सबको धर्मपालनमें लग जाना चाहिये।
अहो! बड़ कष्टकी बात है, बड़े कष्टकी बात हे,
बड़ कष्टकी बात है कि यह जीव इस शरीरको
नाशवान् समञ्चकर भी धर्मका आचरण नहीं करता।
नारदजी ! बोंह उठाकर यह सत्य-सत्य ओर
पुनः सत्य वात दुहरायी जाती है कि पाखण्डपूर्ण
आचरणका त्याग करके मनुष्य भगवान् वासुदेवको
आराधनामे लग जाय । क्रोध मानसिक संतापका
कारण है। क्रोध संसारबन्धनमें डालनेवाला है
ओर क्रोध सब धर्मोका नाश करनेवाला है । अतः
क्रोधको छोड देना चाहिये । काम इस जन्मका
मूल कारण है, काम पाप करानेमें हेतु है ओर
१. अहो चित्रमहो चित्रमहो चित्रमिदं द्विज। हरिनाप्नि स्थिते लोकः संसारे परिवर्तते ॥
(ना० पूर्व० ३४। ४८)
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661101. 14111260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
१३२
काम यशका नाश करनेवाला हे। अतः कामको | चाहनेवाला मनुष्य सदा श्रीहरिकी पूजा करे तथा
भी त्याग देना चाहिये। मात्सर्य समस्त दुःख-
समुदायका कारण माना गया है, वह नरकोंका भी
साधन है, अतः उसे भी त्याग देना चाहियेः । मन
ही मनुष्योके बन्धन ओर मोक्षका कारण है । अतः
मनको परमात्मामें लगाकर सुखी हो जाना चाहिये ।
अहो! मनुष्योका धैर्य कितना अद्भुत, कितना
विचित्र तथा कितना आश्चर्यजनक है कि जगदी.धर
भगवान् विष्णुके होते हए भी वे मदसे उन्मत्त
होकर उनका भजन नहीं करते हैँ२। सबका
धारण-पोषण करनेवाले जगदीश्वर भगवान् अच्युतको
आराधना किये विना संसार-सागरमें डूबे हए
मनुष्य कैसे पार जा सकेगे 2 अच्युत, अनन्त ओर
गोविन्द-इन नामोके उच्वारणरूप ओषधसे सब
रोग नष्ट हो जाते है । यह में सत्य कहता हू, सत्य
कहता हूं २। जो लोग नारायण ! जगन्नाथ ! वासुदेव !
जनार्दन ! आदि नामोंका नित्य उच्चारण किया
करते है, वे सर्वत्र वन्दनीय हें। देवर्षे! दुष्ट
चित्तवाले मनुष्योकी कितनी भारी मूर्खता है कि
वे अपने हदयमें विराजमान भगवान् विष्णुको नहीं
जानते हें । मुनिश्रेष्ठ । नारद ! सुनो, में बार-बार इस
बातको दुहराता हू, भगवान् विष्णु श्रद्धालु जनोपर
ही संतुष्ट होते है, अधिक धन ओर भाई-
बन्धुवालोपर नहीं । इहलोक ओर परलोकमें सुख
इहलोक ओर परलोकमें दुःख चाहनेवाला मनुष्य
दूसरोको निन्दामें तत्र रहे । जो देवाधिदेव भगवान्
जनार्दनकौ भक्तिसे रहित दहै, एेसे मनुष्योके
जन्मको धिकार है। जिसे सत्पात्रके लिये दान नहीं
दिया जाता, उस धनको बारम्बार धिकार दै।
मुनिश्रेष्ठ ! जो शरीर भगवान् विष्णुको नमस्कार
नहीं करता, उसे पापकी खान समञ्जना चाहिये ।
जिसने सुपात्रको दान न देकर जो कुछ द्रव्य जोड़
रखा हे, वह लोकमें चोरीसे रखे हए धनकी भाति
निन्दनीय है। संसारी मनुष्य विजलीके समान
चञ्चल धन-सम्पत्तिसे मतवाले हो रहे है। वे
जीवोके अज्ञानमय पाशको दूर करनेवाले जगदीश्वर
श्रीहरिकी आराधना नहीं करते हे ।
दैवी ओर आसुरी सृष्टिक भेदसे सृष्टि दो
प्रकारकी बतायी गयी है । जहां भगवान्की भक्ति
(ओर सदाचार) है, वह दैवी सृष्टि है ओर जो
भक्ति (ओर सदाचार) -से हीन है, वह आसुरी
सृष्टि है। अतः विप्रवर नारद! सुनो, भगवान्
विष्णुके भजनमें लगे हुए मनुष्य सर्वत्र श्रेष्ट कहे
गये ठै; क्योंकि भक्ति अत्यन्त दुर्लभ है। जो ईर्प्या
ओर द्रैपसे रहित, ब्राह्मणोंकी रक्षाम तत्पर तथा
काम आदि दोषोसे दूर हं, उनपर भगवान् विष्णु
संतुष्ट हाते ह ।
१ 7 त 0
१. काममूलमिदं जन्म॒ कामः पापस्य कारणम् । यशःक्षयकरः
कामस्तस्मात्तं परिवर्जयेत् ॥
समस्तदुःखजालानां मात्सर्य कारणं स्मृतम्। नरकाणां साधनं च तस्मात्तदपि संत्यजेत् ॥
२. अहो धैर्यमहो
३. अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभषजात्
(ना० पूर्वं० ३४। ५६-५७)
धर्यमहो धैर्यमहो नृणाम् । विष्णौ स्थिते जगन्नाथे न भजन्ति मदोद्धताः ॥
(ना० पूर्व० ३४६। ५९)
। नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥
(नार पूर ३४। ६१)
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१
संक्षिप्त नारदपुराण
वेदमालिको जानन्ति मुनिका उपदेश तथा वेदमालिकी मुक्ति
श्रीसनकजी कहते है-- नारद ! जिन्होने योगके
द्वारा काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह ओर मात्सर्यरूपी
छः शतरुओंको जीत लिया हे तथा जो अहङ्कारशून्य
ओर शान्त हे, एेसे ज्ञानी महात्मा ज्ञानस्वरूप
अविनाशी श्रोहरिका ज्लानयोगके द्वारा यजन करते
हे । जो त्रत, दान, तपस्या, यज्ञ तथा तीर्थसरान
करके विशुद्ध हो गये हें, वे कर्मयोगी महापुरुष
कर्मयोगके द्वारा भगवान् अच्युतका पूजन करते
हे । जो लोभी, दुर्व्यसनोमे आसक्त ओर अज्ञानी
हे, वे जगदीश्वर श्रीहरिकी आराधना नहीं करते ।
वे मूढ अपनेको अजर-अमर समञ्जते है; किंतु
वास्तवमे मनुषप्योमे वे कीडेके समान जीवन
बिताते हे । जो बिजलीकी लकीरके समान क्षणभरमें
चमककर लुप्त हो जानेवाली है, एेसी लक्ष्मीके
मदसे उन्मत्त हो व्यर्थं अहंकारसे दूपित चित्तवाले
मनुष्य सव प्रकारसे कल्याण करनेवाले जगदीश्वर
भगवान् विष्णुकी पूजा नहीं कसते हें । जो भगवद्धर्मके
पालनमें तत्पर, शान्त, श्रीहरिके चरणारविन्दोकी
सेवा करनेवाले तथा सम्पूर्ण जगत्पर अनुग्रह
रखनेवाले है, एेसे तो कोई विरले महात्मा ही
देवयोगसे उत्पनन हो जाते हैँ । जो मन, वाणी ओर
क्रियाद्वारा भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुकी आराधना
करता ह, वह समस्त लोकोपिं परम उत्तम, परम
धामको जाता हे। इस विषयमे इस प्राचीन इतिहासका
उदाहरण दिया करते हे, जिसे पदूने ओर सुननेवालेकि
समस्त पापोका नाश हो जाता हे।
नारदजी । प्राचीन कालकी बात हे । रैवतमन्वन्तरमे
वेदमालि नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण रहते थे, जो
वेदों ओर वेदाङ्गोके पारदर्शी विद्वान् थे। उनके
मनम सम्पूर्ण प्राणियोके प्रति दया भरी हई थी ।
वे सदा भगवान्की पूजामें लगे रहते थे; किंतु
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आगे चलकर वे स्त्री, पुत्र ओर मित्रके लिये
धनोपार्जन करनेमें संलग्र हो गये। जो वस्तु नहीं
बेचनी चाहिये, उसको भी वे बेचने लगे । उन्होने
रसका भी विक्रय किया। वे चाण्डाल आदिसे भी
बात करते ओर उनका दिया हुआ दान ग्रहण
करते थे । उन्होने पैसे लेकर तपस्या ओर त्रतोका
विक्रय किया ओर तीर्थयात्रा भी वे दूसरोके लिये
ही करते थे। यह सव उन्होने अपनी स्त्रीको संतुष्ट
करनेके लिये ही किया। विप्रवर! इसी तरह
कुछ समय बीत जानेपर ब्राह्यणके दो जुडवे पत्र
हुए, जिनका नाम था- यज्ञमाली ओर सुमाली । वे
दोनों बड़ सुन्दर थे। तदनन्तर पिता उन दोनों
वालकोंका बड़े स्नेह ओर वात्सल्यसे अनेक
प्रकारके साधनोद्रारा पालन-पोषण करने लगे।
वेदमालिने अनेक उपाययोंसे यतपूर्वक धन एकत्र
किया ओर एक दिन मेरे पास कितना धन है यह
जाननेके लिये उन्होने अपने धनको गिनना प्रारम्भ
किया। उनका धन संख्याम बहुत ही अधिक था।
इस प्रकार धनकी स्वयं गणना करके वे हर्षसे
फूल उटे। साथ ही उस अर्थकी चिन्तासे उन्हे
बड़ा विस्मय भी हआ। वे सोचने लगे-्मेने नीच
पुरुपोंसे दान लेकर, न वेचने योग्य वस्तुओंका
विक्रय करके तथा तपस्या आदिको भी बेचकर
यह प्रचुर धन पैदा किया है। किंतु मेरी अत्यन्त
दुःसह तृष्णा अव भी शान्त नहीं हुई । अहो! मेँ
तो समञ्चता हूं, यह तृष्णा बहुत बडा कष्ट है,
समस्त क्लेशोंका कारण भी यही है । इसके कारण
मनुष्य यदि समस्त कामनाओंको प्राप्त करलेतो
भी पुनः दूसरी वस्तु्ओंकी अभिलाषा करने लगता
हे। जरावस्था (बुदढापे)-में आनेपर मनुष्यके केश
पक जाते हं, दांत गल जाते है, आंख ओर कान
८ ~ # ~ च
॥ }
पूर्वभाग-प्रथम पाद
१३५
भी जीर्ण हो जाते हैँ; किंतु एक तृष्णा ही तरुण-
सी होती जाती है‹। मेरी सारी इन्ियां शिथिल हो
रही है, बुढापेने मेरे बलको भी नष्ट कर
कितु तृष्णा तरुणी हो ओर भी प्रबल हो उठी है।
जिसके मनमें कष्टदायिनी तृष्णा मौजूद है, वह
विद्वान् होनेपर भी मूर्ख हो जाता है । परम शान्त
होनेपर भी अत्यन्त क्रोधी हो जाता है ओर
बुद्धिमान् होनेपर भी अत्यन्त मूद्बुद्धि हो जाता
हे। आशा मनुष्योके लिये अजेय शत्रुकी भति
भयंकर है । अतः विद्वान् पुरुष यदि शाश्वत सुख
चाहे तो आशाको त्याग दे। बल हो, तेज हो,
विद्या हो, यश हो, सम्मान हो, नित्य वृद्धि हो रही
हो ओर उत्तम कुलमें जन्म हुआ हो तो भी यदि
मनमे आशा, तृष्णा बनी हुई है तो वह बडे वेगसे
इन सवपर पानी फेर देती है२। मैने बडे क्लेशसे
यह धन कमाया है । अब मेरा शरीर भी गल गया।
बुढापेने मेरे बलको नष्ट कर दिया। अतः अवरे
उत्साहपूर्वक परलोक सुधारनेका यत करूगा।
विप्रवर! एेसा निश्चय करके वेदमालि धम्कि
मार्गपर चलने लगे। उन्होने उसी क्षण उस सारे
धनको चार भागों बांटा। अपने द्वारा पैदा किये
उस धनमेसे दो भाग तो ब्राह्मणने स्वयं रख लिये
ओर शेष दो भाग दोनों पुत्रको दे दिये। तदनन्तर
अपने किये हुए पापोंका नाश करनेकी इच्छासे
उन्होने जगह-जगह पौंसले, पोखरे, बगीचे ओर
बहुत-से देवमन्दिर बनाये तथा गङ्गाजीके तटपर
अन्न आदिका दान भी किया।
इस प्रकार सम्पूर्णं धनका दान करके भगवान्
विष्णुके प्रति भक्तिभावसे युक्त हो वे तपस्याके
लिये नर-नारायणके आश्रम बदरीवनमें गये । वहाँ
उन्होने एक अत्यन्त रमणीय आश्रम देखा, जहां
बहुत-से ऋषि-मुनि रहते थे। फल ओर फूलोसे
भे हुए वृक्षसमूह उस आश्रमकी शोभा वदा रहे
थे । शास्त्र-चिन्तनमें तत्पर भगवत्सेवापरायण तथा
परब्रह्म परमेश्वरकौ स्तुतिमें संलग्र अनेक वृद्ध
महिं उस आश्रमकी श्रीवृद्धि कर रहे थे।
वेदमालिने वरहो जाकर जानन्ति नामवाले एक
मुनिका दर्शन किया, जो शि्योसे धिरे बैठे थे
ओर उन्हें परब्रह्म तत्वका उपदेश कर रहे थे। वे
मुनि महान् तेजके पुञ्ज-से जान पडते थे । उनमें
शम, दम आदि सभी गुण विराजमान थे। राग
आदि दोपोका सर्वथा अभाव था। वे सूखे पत्ते
खाकर रहा करते थे। वेदमालिने मुनिको देखकर
उन्हें प्रणाम किया। मुनि जानन्तिने कन्द, मूल
ओर फल आदि सामग्रियोद्रारा नारायण-बुद्धिसे
अतिथि बवेदमालिका पूजन किया। आतिथ्य-सत्कार
हो जानेपर वेदमालिने हाथ जोड विनयसे मस्तक
ज्युकाकर वक्ताओमें श्रेष्ठ महर्पिसे कहा- भगवन्।
मे कृतकृत्य हो गया । आज मेरे सव पाप दूर् हो
गये। महाभाग ! आप विद्वान् है । ञान देकर मेर उद्धार
कीजिये। एेसा कहनेपर मुनिश्रेष्ट जानन्ति बोले-
ब्रह्मन् ! तुम प्रतिदिन सर्वश्रेष्ठ भगवान् विष्णुका
भजन करो । सर्वशक्तिमान् श्रीनारायणका चिन्तन
करते रहो । दूसरोकौ निन्दा ओर चुगली कभी न
करो। महामते! सदा परोपकारमें लगे रहो । भगवान्
विष्णुकौ पूजामें मन लगाओ ओर मृखंसि मिलना-
१. जीर्यन्ति जीर्यतः केशाः दन्ताः जीर्यन्ति जीर्यतः। चक्षुःश्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका तरुणायते ॥
२. आशा भयंकरी
(ना० पूर्व° ३५। २१)
पुंसामजयारातिसत्निभा। तस्मादाशां त्यजेत्प्राज्ञो यदीच्छेच्छाश्वतं सुखम् ॥
बलं तेजो यशश्चैव विद्यां मानं च वृद्धताम्। तथैव सत्कुले जन्म आशा हन्त्यतिवैगतः ॥
(ना० पूर्व० ३५। २४-२५)
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;
।
:
॥
।
कि दे क ऋ
१३६ संक्षिप्त नारदपुराण
जुलना छोड दो। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद
ओर मात्सर्य छोडकर लोकको अपने आत्माके
समान देखो-इससे तुम्हें शान्ति मिलेगी । ईर्ष्या,
दोषदृष्टि तथा दूसरेको निन्दा भूलकर भी न करो।
पाखण्डपूर्णं आचार, अहङ्कार ओर क्रूरताका सर्वथा
त्याग करो। सव्र प्राणियोपर दया तथा साधु
पुरुषोको सेवा करते रहो। अपने किये हुए | लगे रहे। वे अपने-आपमें ही परमात्मा भगवान्
धर्मोको पृनेपर भी दूसरोपर प्रकट न करो।
दूसरोको अत्याचार करते देखो, यदि शक्ति हो तो
उन्हे रोको, लापरवाही न करो। अपने कुट॒म्बका
विरोध न करते हुए सदा अतिधियोंका स्वागत-
सत्कार करो। पत्र, पुष्प, फल, दूर्वा अथवा
पलछवोद्वारा निष्कामभावसे जगदीश्वर भगवान्
नारायणको पूजा करो। देवताओं, ऋषियों तथा
पितरोका विधिपूर्वक तर्पण करो । विप्रवर ! विधिपूर्वक
अग्रिको सेवा भी करते रहो । देवमन्दिरमें प्रतिदिन
ज्ञाड् लगाया करो ओर एकाग्रचित्त होकर उसकी
लिपाई-पुताई भी किया करो । देवमन्दिरकी दीवारमें
जहां-कहीं कुछ दूट-फूट गया हो, उसकी मरम्मत
कराते रहो। मन्दिरमे प्रवेशका जो मार्ग हो उसे
पताका ओर पुष्प आदिसे सुशोभित करो तथा
भगवान् विष्णुके गृहमे दीपक जलाया करो । प्रतिदिन
यथाशक्ति पुराणको कथा सुनो। उसका पाठ करो
ओर वेदान्तका स्वाध्याय करते रहो । एेसा करनेपर
तुम्हे परम उत्तम ज्ञान प्राप्त होगा। ज्ञानसे समस्त
पापोका निश्चय ही निवारण एवं मोक्ष हो जाता हे ।
जानन्ति मुनिके इस प्रकार उपदेश देनेपर परम
वुद्धिमान् वेदमालि उसी प्रकार ज्ञानके साधनमें
अच्युतका दर्शन करके बहुत प्रसन्न हृए। मेँ ही
उपाधिरहित स्वयंप्रकाश निर्मल ब्रह्म हूं-एेसा
निश्चय करनेपर उन्हें परम शान्ति प्राप्त हृई।
१८९९9६५१ =#
भगवान् विष्णुके भजनकी महिमा- सत्सङ्ग तथा भगवान्के चरणोदकसे एक
व्याधका उद्दधार
श्रीसनकजी कहते हं-- विप्रवर! भगवान् | एक ही नामका स्मरण कर देता है । जो भगवान्कौ
लक्ष्मीपति विष्णुके माहात्म्यका वर्णन फिर सुनो । | पूजासे दूर रहते, वेदोंका विरोध करते ओर गौ
भगवान्की अमृतमयी कथा सुननेके लिये किसके | तथा ब्राह्यणसे द्वेष रखते है, वे राक्षस कहे गये हैः ।
मनम प्रेम ओर उत्साह नहीं होता 2 जो विषयभोगे | जो भगवान् विष्णुकी आराधनामें लगे रहकर
अन्धे हो रहे हं, जिनका चित्त ममतासे व्याकुल | सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह रखते तथा धर्मकार्यमें
हे, उन मनुष्योके सम्पूर्णं पापोका नाश भगवानके | सदा तत्पर रहते है, वे साक्षात् भगवान् विष्णुके
१. हरिपूजाविहीनाश्च वेदविद्रेषिणस्तथा। गोद्विजद्वेषनिरता राक्षसाः परिकीर्तिताः ॥
(ना० पूर्व ३७। ५)
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
स्वरूप माने गये हें । जिनका चित्त भगवान्
विष्णुकौ आराधनामें लगा हुआ है, उनके करोड़ों
जन्मोंका पाप क्षणभरमें नष्ट हो जाता है; फिर
उनके मनमें पापका विचार कैसे उठ सकता हे ?
भगवान् विष्णुकी आराधना विषयान्ध मनुष्योके
भी सम्पूर्णं दुःखोंका नाश करनेवाली कही गयी
हे। वह भोग ओर मोक्ष देनेवाली है। जो मनुष्य
किसीके सङ्खसे, स्रेहसे, भयसे, लोभसे अथवा
अज्ञानसे भी भगवान् विष्णुकी उपासना करता हे,
वह अक्षय सुखका भागी होता हे‹। जो भगवान्
विष्णुके चरणोदकका एक कण भी पी लेता हे,
वह सब तीथेमिं सान कर चुका। भगवान्को वह
अत्यन्त प्रिय होता है। भगवान् विष्णुका चरणोदक
अकालमृत्युका निवारण, समस्त रोगोका नाश ओर
सम्पूर्णं दुःखोकी शान्ति करनेवाला माना गया हैः ।
इस विषयमे भी ज्ञानी पुरुष यह प्राचीन
इतिहास कहा करते है, इसे पटने ओर सुननेवालोके
सम्पूर्णं पापका नाश हो जाता हे। प्राचीन सत्ययुगको
वात है, गुलिक नामसे प्रसिद्ध एक व्याध था; वह
परायी स्त्री ओर पराये धनको हड़प लेनेके लिये
सदा उद्यत रहता था। वह सदा दूसरोको निन्दा
किया करता था। जीव-जन्तुओंको भारी सङ्कटमें
डालना उसका नित्यका काम था। उसने सेकडं
गोओं ओर हजारों ब्राह्मणोंकौ हत्या कौ थी।
नारदजी ! व्याधोका सरदार गुलिक देवसम्पत्तिको
हड़पने तथा दूसरोका धन लूट लेनेके लिये सदा
कमर कसे रहता था। उसने बहुत-से बड़े भारी-
भारी पाप किये थे। जीव-जन्तुओंके लिये वह
यमराजके समान धा। एक दिन वह महापापी
१३७
व्याध सौवीर नरेशके नगरमे गया, जो सम्पूर्ण
एेश्व्येसि भरा-पूरा था। उसके उपवनमें भगवान्
विष्णुका एक बड़ा सुन्दर मन्दिर था, जो सोनेके
कलशोंसे छाया गया था। उसे देखकर व्याधको
बडी प्रसन्नता हुई । उसने निश्चय किया, यहां
वहुत-से सुवर्ण-कलश दँ, उन सवको चुराऊगा।
एेसा विचारकर व्याध चोरीके लिये लोलुपं हो
उठा ओर मन्दिरके भीतर गया। वहां उसने एक
शरेष्ठ ब्राह्मणको देखा, जो परम शान्त ओर तत्त्वार्थानमें
निपुण थे। उनका नाम उत्तङ्क था। वे भगवान्
विष्णुको सेवा-पूजा कर रहे थे। उत्तद्क तपस्याक्प
निधि थे। वे एकान्तवासी, दयालु, निःस्पृह तथा
भगवानके ध्यानमें परायण थे। मुने! उस व्याधने
उन्हे अपनी चोरीमें विघ्न डालनेवाला समज्ञा । वह
देवताका सम्पूर्ण धन हड्प लेनेके लिये आया
हुआ अत्यन्त साहसी लुटेरा था ओर मदसे उन्मत्त
हो रहा था। उसने हाथमे तलवार उठा ली ओर
उत्तङ्कजीको मार डालनेका उद्योग आरम्भ किया।
मुनि (-को भूमिपर गिराकर उन)-की छातीकों
एक पैरसे दबाकर उसने एक हाथसे उनकी
जटाएं पकड लीं ओर उन्हे मार डालनेका विचार
किया। इस अवस्थामे उस व्याधको देखकर
उत्तङ्कजीने कहा।
उत्तङ्क बोले-- अरे, ओ साधु पुरुष! तुम व्यर्थ
ही मुञ्चे मार रहे हो । मँ तो निरपराध हूं । महामते।
बताओ तो सही, मैने तुम्हारा क्या अपराध किया
है । लोकें शक्तिशाली पुरुष अपराधियोको दण्ड
देते है, किंतु सजन पुरुष पापि्योको भी अकारण
नहीं मारते हँ । जिनके चित्तम शान्ति विराज रही
१. सद्वात्स्रहाद् भयाघ्टोभादजञानाद्वापि यो नरः। विष्णोरूपासनं कुर्यात्सोऽक्षयं सुखमश्नुते ॥
२. अकालमृत्युशमनं
(ना० पूर्व ३७। १४)
सर्वव्याधिविनाशनम्। सर्वदुःखोपशमनं हरिपादोदकं स्मृतम् ॥
(ना० पूर्व° ३७1 १६)
((-0. 1/८1111(4/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
|
।
१३८ संक्षिप्त नारदपुराण
हे, वे साधु पुरुष अपनेसे विरोध रखनेवाले
मूखमिं भी जो गुण विद्यमान हैँ, उन्हींपर दृष्ट
रखकर उनका विरोध नहीं करते है । जो मनुष्य
अनेक वार सताये जानेपर भी क्षमा करता है, उसे
उत्तम कहा गया हे । वह भगवान् विष्णुको सदा
ही अत्यन्त प्रिय है । जिनको बुद्धि सदा दूसरोके
हितमे लगी हुई हे, वे साधु पुरुष मृत्युकाल
आनेपर भी किसीसे वैर नहीं करते। चन्दनका
वृक्ष काटे जानेपर भी कुठारकी धारको सुगन्धित
ही करता हे मृग तृणसे, मछलियां जलसे तथा
सज्जन पुरुष संतोषसे जीवन-निर्वाह करते हैँ
परतु संसारमें क्रमशः तीन प्रकारके व्यक्ति इनके
साथ भी अकारण वैर रखनेवाले होते ह--व्याध,
धीवर ओर चुगलखोर! । अहो ! माया बडी प्रबल
हे। वह समस्त जगत्को मोहमें डाल देती हे ।
तभी तो लोग पुत्र-मित्र ओर स्त्रीके लिये सबको
दुःखी करते रहते हैँ । तुमने दूसरोका धन लूटकर
अपनी स्त्रीका पालन-पोषण किया है, परंतु
अन्तकालमें मनुष्य सबको छोडकर अकेला ही
परलोककी यात्रा करता है। मेरी माता, मेरे पिता,
मेरी पी, मेरे पुत्र ओर मेरी यह वस्तु-इस
प्रकारको ममता प्राणियोंको व्यर्थं पीडा देती रहती
हे । पुरुष जबतक धन कमाता है, तभीतक भाई-
बन्धु उससे सम्बन्ध रखते है, परंतु इहलोक ओर
परलोकमें केवल धर्म ओर अधर्म ही सदा उसके
साथ रहते है, वहो दूसरा कोई साथी नहीं हैर । धर्म
ओर अधर्मसे कमाये हुए धनके द्वारा जिसने जिन
लोगोंका पालन-पोषण कियादहै, वे ही मरनेपर
उसे आगके मुखमें ज्ञोककर स्वयं घी मिलाया
हुआ अन्न खाते हें । पापी मनुष्योंकी कामना रोज
बढती हे ओर पुण्यात्मा पुरुषोंकी कामना प्रतिदिन
क्षीण होती है। लोग सदा धन आदिके उपार्जनमें
व्यर्थ ही व्याकुल रहते हँ । ' जो होनेवाला है, वह
होकर ही रहता है ओर जो नहीं होनेवाला है, वह
कभी नहीं होता" जिनकी बुद्धिम एेसा निश्चय
होता है, उन्हें चिन्ता कभी नहीं सतातीरे। यह
सम्पूर्णं चराचर जगत् दैवके अधीन है; अतः दैव
ही जन्म ओर मृत्युको जानता है, दूसरा नहीं।
अहो ! ममतासे व्याकुल चित्तवाले मनुष्योका दुःख
महान् है; क्योकि वे बड़े-बड़े पाप करके भी
दूसरोका यलपूर्वक पालन करते है । मनुष्यके
कमाये हुए सम्पूर्णं धनको सदा सब भाई-बन्धु
भोगते है, कितु वह मूर्ख अपने पापोका फल
स्वयं अकेला ही भोगता है*।
एेसा कहते हुए महर्षिं उत्तङ्कको गुलिकने
छोड दिया । फिर वह भयसे व्याकुल हो उठा ओर
हाथ जोड़कर बार-बार कहने लगा-“ मेरा अपराध
क्षमा कीजिये।' सत्सङ्गके प्रभावसे तथा भगवद्विग्रहका
सामीप्य मिल जानेसे व्याध्का सारा पाप नष्ट हो
गया। उसे अपनी करनीपर बड़ा पश्चात्तापं हुआ
ओर वह इस प्रकार बोला-' विप्रवर! मैने बहुत
बड़े-बड़े पाप किये हे । वे सब आपके दर्शनसे
१. मृगमीनसख्जननानां तृणजलसंतोषविहितवृत्तीनाम् । लुब्धकधीवरपिशुना निष्कारणवैरिणो जगति ॥
(ना पूर्व० २३७। ३८)
२. यावदर्जयति द्रव्यं वान्धवास्तावदेव हि। धर्माधर्मौ सहैवास्तामिहामुत्र न चापरः॥
३. यद्धावि
४. अजितं च धनं सर्वं भुञ्जते बान्धवाः सदा । स्वयमेकतमो
(ना० पूर्व० ३७। ४२)
तद्धवत्येव यदभाव्यं न तद्धवेत् । इति निश्चितवुद्धीनां न चिन्ता बाधते क्रचित्॥
(ना० पूर्व° ३७ ४७)
मृढस्तत्पापफलमशनुते ॥
(ना पूर्व° ३७। ५१)
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661011. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद १३९
नष्ट हो गये । अहो ! मेरी वुद्धि सदा पापमें ही लगी | महर्षि उत्तटको बड़ी दया आयी ओर उन महाबुद्धिमान्
रही ओर में शरीरसे भी सदा महान् पापोका ही | मुनिने भगवान् विष्णुके चरणोदकसे उसके शरीरको
आचरण करता रहा। अब मेरा उद्धार कैसे होगा 2| सीच दिया। भगवानूके चरणोदकका स्पर्शं पाकर
भगवन्! मे किसकी शरणमे जाऊँ 2 पूर्वजन्ममें | उसके पाप नष्ट हो गये ओर वह व्याध दिव्य शरीरसे
किये हुए पापोके कारण मेरा व्याधके कुलमें जन्म | दिव्य विमानपर बैठकर मुनिसे इस प्रकार बोला।
हुआ। अव इस जीवनमें भी ढेर-के-ढेर पाप गुलिकने कहा- उत्तम व्रतका पालन करनेवाले
=== ~= ]| मुनिश्रेष्ठ उत्तङ्कजी ! आप मेरे गुरु है । आपके ही
प्रसादसे मुञ्चे इन महापातकोसे छुटकारा मिला
हे । मुनी धर ! आपके उपदेशसे मेरा संताप दूर हो
गया ओर सम्पूर्णं पाप भी तुरंत नष्ट हो गये । मुने।
आपने मेरे ऊपर जो भगवानूका चरणोदक छिडका
हे, उसके प्रभावसे आज मुदे आपने भगवान्
विष्णुके परम पदको पहुंचा दिया। विप्रवर ! आपके
द्वारा इस पापमय शरीरसे मेरा उद्धार हो गया;
इसलिये मे आपके चरणोमें मस्तक नवाता हूं।
विदन्! मेरे किये हए अपराधको आप क्षमा करं ।
एेसा कहकर उसने मुनिवर उत्तद्कपर दिव्य
"नः धः पुष्पोकी वर्षा को ओर विमानसे उतरकर तीन वार
- पिमा करके उन्हें नमस्कार किया। तदनन्तर
करके मै किस गतिको प्राप्त होऊगा ? अहो! मेरी | पुनः उस दिव्य विमानपर चढ्कर गुलिक भगवान्
आयु शीघ्रतापूर्वक नष्ट हो रही है! मैने पापोके | विष्णुके धामको चला गया। यह सव प्रत्यक्ष
निवारणके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं किया, अतः | देखकर तपोनिधि उत्तङ्कजी बडे विस्मयमें पड़ ओर
उन पापोंका फल मेँ कितने जन्मोतक भोगुगा ?'- | उन्होने सिरपर अञ्जलि रखकर लक्ष्मीपति भगवान्
इस प्रकार स्वयं ही अपनी निन्दा करते हृए | विष्णुका स्तवन किया। उनके द्वारा स्तुति करनेषर
उस व्याधने आन्तरिक संतापकी अग्निस ज्ुलसकर | भगवान् महाविष्णुने उन्हें उत्तम वर दिया ओर उस
तुरंत प्राण त्याग दिये। व्याधको गिरा हुआ देख । वरसे उत्तङ्कजी भी परम पदको प्राप्त हौ गये।
===“
उत्तङ्कके द्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति ओर भगवान्की आनज्ञासे उनका
नारायणाश्रममें जाकर मुक्तं होना
नारदजीने पृछा- महाभाग! वह॒ कौोन-सा | श्रीसनकजीने कहा-- भगवान् विष्णुके ध्यानमें
स्तोत्र था ओर उसके द्वारा भगवान् विष्णु किस | तत्पर रहनेवाले विप्रवर उन्त्कने उस समय धगवानक्े
प्रकार संतुष्ट हए ? पुण्यात्मा पुरुष उत्तङ्कजीने | चरणोदकका माहात्म्य देखकर उनकी भक्छिभावसे
भगवान्से कैसा वर प्राप्त किया? स्तुति की ।
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 2118811 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 66810011
"षिः
पा प ह क कपा" त प ककत का चक्रता कत ध जक क = = क च च प
१८० संक्षिप्त नारदपुराण
उत्तङ्कजी वबोले- जो सम्पूर्ण जगत्के
निवासस्थान ओर उसके एकमात्र बन्धु हैँ, उन
आदिदेव भगवान् नारायणको मेँ नमस्कार करता
हू। जो स्मरण करनेमात्रसे भक्तजनोंकी सारी पीडा
नष्ट कर देते हैँ, अपने हाथमे चक्र, कमल,
शार्ब्धनुष ओर खद्ध धारण करनेवाले उन महाविष्णुकी
मे शरण लेता द| जिनको नाभिसे प्रकट हए
कमलसे उत्पन्न होकर ब्रह्माजी इन सम्पूर्ण लोकोके
समुदायको सृष्टि करते हँ ओर जिनके क्रोधसे
प्रकट हुए भगवान् रुद्र इस जगत्का संहार किया
करते हे, उन आदिदेव भगवान् विष्णुको मँ प्रणाम
करता हूं। जो लक्ष्मीजीके पति है, जिनके
कमलदलके समान विशाल नेत्र हे, जिनकी शक्ति
अद्भुत हे, जो सम्पूर्ण जगतके एकमात्र कारण
तथा वेदान्तवेद्य पुराणपुरुष हैँ, उन तेजोराशि
भगवान् विष्णुको में शरण लेता हूं। जो सबके
आत्मा, अविनाशी ओर सर्वव्यापी है, जिनका नाम
अच्युत हे, जो ज्लानस्वरूप तथा ज्ञानियोंको शरण
देनेवाले हैँ, एकमात्र ज्ञानसे ही जिनके तत्तवतका
बोध होता है, जिनका कोई आदि नहीं है, यह
व्यष्टि ओर समष्टि जगत् जिनका ही स्वरूप है, वे
भगवान् विष्णु मुञ्चपर प्रसन्न हों । जिनके बल ओर
पराक्रमका अन्त नहीं हे, जो गुण ओर जातिसे
हीन तथा गुणस्वररूप हँ, ज्ञानियोमें श्रेष्ठ, नित्य
तथा शरणागतोंको पीडा दूर करनेवाले है, वे
दयासागर परमात्मा मुञ्चे वर प्रदान करं । जो स्थूल
ओर सूक्ष्म आदि विशेष भेदोसे युक्त जगत्की
यथायोग्य रचना करके अपने बनाये हए उस
जगते स्वयं ही अन्तर्यामीरूपसे प्रविष्ट हए हैँ
वह परमेश्वर आप ही हैं । हे अनन्त शक्ति-सम्पत्न
परमात्मन्! वह सब जगत् आप ही हैँ; क्योंकि
आपसे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं है । भगवन्!
आपका जो शुद्ध॒स्वरूप है वह इन्दरियातीत,
मायाशन्य, गुण ओर जाति आदिसे रहित, निरञ्जन,
निर्मल ओर अप्रमेय हे। ज्ञानी संत-महात्मा उस
परमार्थस्वरूपका दर्शन करते हैँ । जैसे एक ही
सुवर्णसे अनेक आभूषण बनते हैँ ओर उपाधिके
भेदसे उनके नाम ओर रूपमें भेद हो जाता है
उसी प्रकार सबके आत्मस्वरूप एक ही सर्वेश्वर
उपाधि-भेदसे मानो भिन्न-भिन्न रूपोमें दृष्टिगोचर
होते हे । जिनको मायासे मोहित चित्तवाले अज्ञानी
पुरुष आत्मारूपसे प्रसिद्ध होते हए भी उनका
दर्शन नहीं कर पाते ओर मायासे रहित होनेपर वे
ही उन सर्वात्मा परमेश्वरको अपने ही आत्माके
रूपमे देखने लगते है, जो सर्वत्र व्यापक, ज्योतिः-
स्वरूप तथा उपमारहित हे, उन विष्णुभगवान्को मे
प्रणाम करता हूं। यह सारा जगत् जिनसे प्रकट हआ
हे, जिनके ही आधारपर स्थित है ओर जिनसे ही
इसे चेतनता प्राप्त हई हे ओर जिनका ही यह स्वरूप
हे, उनको नमस्कार है। जो प्रमाणकी परहंचसे परे
हे, जिनका दूसरा कोई आधार नहीं है, जो स्वयं ही
आधार ओर आधेयरूप हैं, उन परमानन्दमय
चेतन्यस्वरूप भगवान् वासुदेवको मँ नमस्कार करता
हू। सबकी हदयगुहामे जिनका निवास है, जो
देवस्वरूप तथा योगियोद्रारा सेवित हैँ ओर प्रणवमें
उसके अर्थ एवं अधिदेवतारूपमें जिनकी स्थिति है,
उन योगमार्गे आदिकारण परमात्माको मेँ नमस्कार
करता हूं। जो नादस्वरूप, नादके बीज, प्रणवरूप,
सत्स्वरूप अविनाशी तथा सच्विदानन्दमय हँ, उन
तीक्ष्ण चक्र धारण करनेवाले भगवान् विष्णुको मँ
प्रणाम करता हूं। जो जरा आदिसे रहित, इस
जगते साक्षी, मन-वाणीके अगोचर, निरञ्जन तथा
अनन्त नामसे प्रसिद्ध हे, उन विष्णुरूप भगवानूको
म प्रणाम करता हूं । इन्द्रिय, मन, वुद्धि, सत्व, तेज,
बल, धृति, क्षेत्र ओर क्षत्रज्ञ-इन सबको भगवान्
वासुदेवका स्वरूप कहा गया है। विद्या ओर
((-0. 1८111551 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद्
१४९
अविद्या भी उन्हीके रूप हें। वे ही परात्पर
परमात्मा कहे गये हें । जिनका आदि ओर अन्त
नहीं हे तथा जो सबका धारण-पोषण करनेवाले
है, उन शान्तस्वरूप भगवान् अच्युतकी जो महात्मा
शरण लेते हे, उन्हें सनातन मोक्ष प्राप्त होता हे।
जो श्रेष्ठ, वरण करनेयोग्य, वरदाता, पुराण, सुरुष,
सनातन, सर्वगत तथा सर्वस्वरूप हैँ, उन भगवान्को
मे पुनः प्रणाम करता हूं, पुनः प्रणाम करता हू,
पुनः प्रणाम करतौ हू, पुनः प्रणाम करता हू।
जिनका चरणोदक संसाररूपी रोगको दूर करनेवाला
वेद्य हे, जिनके चरणोकी धूल निर्मलता (अन्तः-
शुद्धि) का साधन है तथा जिनका नाम समस्त
पापोंका निवारण करनेवाला है, उन अप्रमेय पुरुष
श्रीहरिकी में आराधना करता दहू। जो सदूरूप,
असदूरूप, सदसद्रूप ओर उन सबसे विलक्षण हैँ
तथा जो श्रेष्ठ एवं श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठतर हे, उन
अविनाशी भगवान् विष्णुका मै भजन करता हू।
जो निरञ्जन, निराकार, सर्वत्र परिपूर्णं परमव्योममें
विराजमान, विद्या ओर अविद्यासे परे तथा
हदयकमलमें अन्तर्यामीरूपसे निवास करनेवाले
हे, जो स्वयं प्रकाश, अनिर्देश्य (जाति, गुण ओर
क्रिया आदिसे रहित), महानूसे भी परम महान्,
सृक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म, अजन्मा, सब प्रकारक
उपाधियोंसे रहित, नित्य, परमानन्द ओर सनातन
परब्रह्म हँ, उन जगन्निवास भगवान् विष्णुकी में
शरण लेता हू। क्रियानिष्ट॒ भक्त जिनका भजन
करते हैँ, योगीजन समाधिम जिनका दर्शन करते
हें तथा जो पूज्यसे भी परम पूज्य एवं शान्त हे,
उन भगवान् श्रीहरिको मं शरण लेता हूं। विद्वान्
पुरुष भी जिन्हें देख नहीं पाते, जो इस सम्पूर्ण
जगत्को व्याप्त करके स्थित ओर सबसे श्रेष्ठ है
उन नित्य अविनाशी विभुको मँ प्रणाम करता दहू।
अन्तःकरणके संयोगसे जिन्हं जीव कहा जाता है
ओर अविद्याके कार्यसे रहित होनेपर जो परमात्मा
कहलाते हे, यह सम्पूर्णं जगत् जिनका स्वरूप है
जो सवके कारण, समस्त कमकि फलदाता, श्रेष्ठ,
वरण करनेयोग्य तथा अजन्मा हैं, उन परात्पर
भगवान्को मै प्रणाम करता हूं। जो सर्वज्ञ
सर्वगत, सर्वान्तर्यामी, ज्ञानस्वरूप, ज्लानके आश्रय
तथा ज्ञानमें स्थित हे, उन सर्वव्यापी श्रीहरिका में
भजन करता हू। जो वेदोके निधि दै, वेदान्तके
विज्ञानद्वारा जिनके परमार्थस्वरूपका भली भति
निश्चय होता है, सूर्य ओर चन्द्रमाके तुल्य जिनके
प्रकाशमान नेत्र हें, जो पेश्चर्यशाली इन्द्ररूप हैँ
आकाशम विचरनेवाले पक्षी एवं ग्रह- नक्षत्र आदि
जिनके स्वरूप हे तथा जो खगपति (गरुड)-
स्वरूप है, उन भगवान् मुरारिको मेँ प्रणाम करता
हूं। जो सवके ईशर, सवमें व्यापक, महान्
वेदस्वरूप, वेद-वेत्ताओमें श्रेष्ठ. वाणी ओर मनकी
पहुचसे परे, अनन्त शक्तिसम्पत्र तथा एकमात्र ज्ञानके
ही द्वारा जाननेयोग्य हे, उन परम पुरुष श्रीहरिका मं
भजन करता हू। जिनकी सत्ता सर्वत्र परिपूर्ण है, जो
इन्द्र, अग्नि, यम, नितऋति, वरुण, वायु, सोम, ईशान,
सूर्य तथा पुरन्दर आदिके द्वार स्वयं ही सव लोकांकी
रक्षा करते हे, उन अप्रमेय परमेश्वरकी मे शरण लेता
हू। जिनके सहस्रं मस्तक, सहस्नं पैर, सहस्तो
भुजां ओर सहसो नेत्र है, जो सम्पूर्णं यज्ञोसे सेवित
तथा सबको संतोष प्रदान करनेवाले है, उन
उग्रशक्तिसम्पन्न आदिपुरुष श्रीहरिको मं प्रणाम करता
ह| जो कालस्वरूप, काल-विभागके हेतु, तीनों
गर्णेसे अतीत, गुणस, गुणप्रिय, कामना पूर्ण करनेवाले,
सङ्गरहित, अतीन्द्रिय, विश्वपालक, तृष्णाहीन्, निरीह,
रेष्ठ, मनके द्वारा भी अगम्य, मनोमय ओर अन्नमय
स्वरूप, सवमें व्याप्त, विज्ञानसे सम्पन्न तथा शक्तिशाली
है, जो वाणीके विषय नहीं हो सकते तथा जो
सवके प्राणस्वरूप हैँ, उन भगवानूक्रा पै भजन
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 6810011
९१४२ संक्षिप्त नारदपुराण
करता हूं। जिनके रूपको, जिनके बल ओर | ह, मोहसे व्याकुल हू, सैकड़ों कामनाओंने मुज्ञ
प्रभावको, जिनके विविध कर्मोको तथा जिनके | बोध रखा है। में अकौर्तिभागी, चुगला, कृतघ्न,
प्रमाणको ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जानते, उन | सदा अपवित्र, पापपरायण तथा अत्यन्त क्रोधी हू ।
आत्मस्वरूप श्रीहरिकी स्तुति में कैसे कर सकता | दयासागर! मुञ्च भयभीतकी रक्षा कीजिये। मेँ
हूं ? में संसार-समुद्रमे गिरा हुआ एक दीन मनुष्य । बार-ार आपकी शरण लेता हूः ।
१. नतोऽस्मि नारायणमादिदेवं जगन्निवासं जगदेकबन्धुम् । चक्राव्जशार्ङ्खासिधरं महान्तं स्मृतार्तिनिष्नं शरणं प्रपद्ये ॥
यत्नाभिजान्जप्रभवो विधाता सृजत्यमुं लोकसमुच्चयं च । यत्क्रोधजो हन्ति जगच्च रुद्रस्तमादिदेवं प्रणतोऽस्मि विष्णुम् ॥
पद्यापतिं पद्मदलायताक्षं विचित्रवीर्यं निखिलेकहेतुम् । वेदान्तवेद्यं पुरुषं पुराणं तेजोनिधिं विष्णुमहं प्रपन्नः ॥
आत्माक्षरः सर्वगतोऽच्युताख्यो ज्ञानात्मको ज्ञानविदां शरण्यः । ज्ञानैकवेद्यो भगवाननादिः प्रसीदतां व्यष्टिसमष्टिरूपः ॥
अनन्तवीर्यो गुणजातिहीनो गुणात्मको ज्ञानविदां वरिष्ठः । नित्यः प्रपन्नार्तिहरः परात्मा दयाम्बुधिमे वरदस्तु भूयात्॥
यः स्थूलसूक्ष्मादिविशेषभेदैर्जगद्यथावत्स्वकृतं प्रविष्टः । त्वमेव तत्सर्वमनन्तसारः त्वत्तः परं नास्ति यतः परात्मन् ॥
अगोचरं यत्तव॒ शुद्धरूपं मायाविहीनं गुणजातिहीनम् । निरञ्जनं निर्मलमप्रमेयं पश्यन्ति सन्तः परमार्थसंज्ञम्॥
एकेन हेप्रैव विभूषणानि यातानि भेदत्वमुपाधिभेदात् । तथेव सर्वेश्वर एक एव प्रदृश्यते भिन्न इवाखिलात्मा॥
यन्मायया मोहितचेतसस्तं पश्यन्ति नात्मानमपि प्रसिद्धम्। त एव मायारहितास्तदेव पश्यन्ति सर्वात्मकमात्परूपम्॥
विभुं ज्योतिरनोपम्यं विष्णुसंज्ञं नमाम्यहम्। समस्तमेतदुद्धूतं यतो यत्र॒ प्रतिष्ठितम्॥
यतथैतन्यमायातं यद्रूपं तस्य वै नमः। अप्रमेयमनाधारमाधाराधेयरूपकम् ॥
परमानन्दचिन्मात्रं वासुदेवं नतोऽस्म्यहम् । हद्गुहानिलयं देवं योगिभिः परिसेवितम् ॥
योगानामादिभूतं तं नमामि प्रणवस्थितम्। नादात्मकं नादबीजं प्रणवात्मकमव्ययम्॥
सन्रावं सच्चिदानन्दं तं वन्दे तिग्मचक्रिणम्। अजरं साक्षिणं त्वस्य ह्यवाड्मनसगोचरम्॥
निरञ्जनमनन्ताख्यं विष्णुरूपं नतोऽस्म्यहम् । इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्वं तेजो बलं धृतिः ॥
वासुदेवात्मकान्याहः क्षत्रं क्षेत्रज्ञमेव च। विद्याविद्यात्मकं प्राहुः परात्परतरं तथा॥
अनादिनिधनं शान्तं सर्वधातारमच्युतम् । ये प्रपन्ना महात्मानस्तेषां मुक्तिर्हि शाश्वती ॥
वरं वरेण्यं वरदं पुराणं सनातनं सर्वगतं समस्तम्।
नतोऽस्मि भूयोऽपि नतोऽस्मि भूयो नतोऽस्मि भूयोऽपि नतोऽस्मि भूयः ॥
यत्पादतोयं भवरोगवेद्यो यत्पादपांशुर्विमलत्वसिद्ध्यै । यन्नाम दुष्कर्मनिवारणाय तमप्रमेयं पुरुषं भजामि ॥
सद्रूपं तमसद्रूं सदसद्रूपमव्ययम्। तत्तद्विलक्षणं श्रेष्ठं त्रे्ठच्छेष्ठतरं भजे॥
निरञ्जनं निराकारं पूर्णमाकाशमध्यगम्। परं च विद्याविद्याभ्यां हदम्बुजनिवासिनम्॥
स्वप्रकाशमनिर्देश्यं महतां च॒ महत्तरम् । अणोरणीयांसमजं सर्वोपाधिविवर्जितम्॥
यन्नित्यं परमानन्दं परं ब्रह्म सनातनम्। विष्णुसंज्ञं जगद्धाम तमस्मि शरणं गतः॥
यं भजन्ति क्रियानिष्ठा यं पश्यन्ति च योगिनः । पूज्यात्पूज्यतरं शान्तं गतोऽस्मि शरणं प्रभुम् ॥
यं न पश्यन्ति विद्वांसो य एतद् व्याप्य तिष्ठति । सर्वस्मादधिकं नित्यं नतोऽस्मि विभुमव्ययम् ॥
अन्तःकरणसंयोगाज्ीव इत्युच्यते च॒ यः। अविद्याकार्यरहितः परमात्मेति गीयते ॥
सर्वात्मकं सर्वहेतु सर्वकर्मफलप्रदम् । वरं वरेण्यमजनं प्रणतोऽस्मि परात्परम् ॥
सर्वज्ञं सर्वगं शान्तं सर्वान्तर्यामिणं हरिम् । ज्ञानात्मकं ॒ज्ञाननिधि ज्ञानसंस्थं विभुं भजे॥
नमाम्यहं वेदनिधिं मुरारिं वेदान्तविनज्ञानसुनिश्चितार्थम् । सूर्यन्दुवत्प्रोज्वलनेत्रमि न्द्रं खगस्वरूपं च पतिस्वरूपम्॥
सर्वेश्वरं सर्वगतं महान्तं वेदात्मकं वेदविदां वरिष्ठम् । तं वाड्मनोऽचिन्त्यमनन्तशक्तिं ज्ञानैकवेद्यं पुरुषं भजामि ॥
इनदराग्रिकालासुरपाशिवायुसोमेशमार्तण्डपुरन्दराद्यैः । यः पाति लोकान्परिपूर्णभावस्तमप्रमेयं शरणं प्रपद्ये ॥
सहस्रशीर्षं च सहस्रपादं सहस्रवाहुं च सहख्नेत्रम्। समस्तयज्ञैः परिजुष्टमाद्यं नतोऽस्मि तुष्टप्रदमुग्रवीर्यम्॥
कालात्मकं कालविभागहेतुं गुणत्रयातीतमहं गुणक्ञम् । गुणप्रियं कामदमस्तसङ्गमतीन्धियं विश्वभुजं वितृष्णम् ॥
निरीहमग्यं मनसाप्यगम्यं मनोमयं चान्नमयं निरूढम् । विज्ञानभेदं प्रतिपन्नकल्पं न वाङ्मयं प्राणमयं भजामि ॥
न यस्य रूपं न बलप्रभावौ न यस्य कर्माणि न यत्प्रमाणम् 1 जानन्तिदेवाः कमलेद्धवाद्याःस्तोष्याम्यहं तं कथमात्मरूपम्॥
((-0. 1/८111141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
महर्षिं उत्तङ्कके द्वारा इस प्रकार प्रसन्न किये
जानेपर परम दयालु तथा तेजोनिधि भगवान् लक्ष्मीपतिने
उन्हे प्रत्यक्ष दर्शन दिया । उनके श्रीअद्खोकी कान्ति
अलसीके फूलकी भोति श्याम थी । दोनों नेत्र खिले
हुए कमलको शोभा धारण करते थे। मस्तकपर
किरीट, दोनों कानोमे कुण्डल, गलेमें हार ओर
भुजाओमें केयूरकी अपूर्व शोभा हो रही थी । उन्होने
वक्षःस्थलपर श्रीवत्सचिह्न ओर कोस्तुभमणि धारण
कर रखी थी। सुवर्णमय यज्ञोपवीत उनके वाये
कंधेपर सुशोभित हो रहा था। नाकमें पहनी हुई
मुक्तामणिको प्रभासे उनके श्रीअङ्गोकी श्याम कान्ति
ओर वद् गयी थी। वे श्रीनारायणदेव पीताम्बर
धारण करके वनमालासे विभूषित हो रहे थे।
तुलसीके कोमल दलोँसे उनके चरणारविन्दोंकी
१४३
मागो । साधुशिरोमणे ! मेँ तुमपर प्रसन्न
तुम्हारे लिये कुछ भी असम्भव नहीं है।' भगवान्
अर्चना को गयी थी। उनके श्रीविग्रहका महान् | चक्रपाणिके इस कथनको सुनकर महर्षिं उत्त्कन
प्रकाश सब ओर छा रहा था। करिप्रदेशमें किंकिणी
ओर चरणोमे नूपुर आदि आभूषण उनकी शोभा
बढा रहे थे। उनको फहराती हुई ध्वजामें गरुडका
चिह्न सुशोभित था। इस रूपमे भगवान्का दर्शन
करके विप्रवर उत्तङ्के पृथ्वीपर दण्डकी भाति
पड़कर उन्हे साष्टाङ्ग प्रणाम किया* ओर आनन्दके
ओंसुओंसे श्रीहरिके दोनों चरणोंको नहला दिया।
फिर वे एकाग्रचित्त होकर बोले-' मुरारे! मेरी
रक्षा कोजिये, रक्षा कीजिये ।' तब परम दयालु
पुनः प्रणाम किया ओर उन देवाधिदेव जनार्दनसे
इस प्रकार कहा-' भगवन्! मुञ्चे मोहमें क्यो डालते
हें 2 देव! मुखे दूसरे वरोसे क्या प्रयोजन है 2 मेरी तो
जन्म-जन्मान्तरोमें भी आपके चरमं ही अविचल
भक्ति वनी रहे।' तब जगदीश्वर भगवान् विष्णुने
एवमस्तु" (एसा ही होगा) यह कहकर शद्भुके
सिरेसे उत्तङ्कजीके शरीरका स्पर्श कराया ओर
उन्हें वह दिव्य ज्ञान दे दिया जो योगियोके लिये
भी दुर्लभ है। तदनन्तर पुनः स्तुति करते हुए
भगवान् महाविष्णुने मुनिश्रेष्ट उत्तङ्को उठाकर | विप्रवर उत्तङ्कसे देवदेव जनार्दनने उनके सिरपर
छातीसे लगा लिया ओर कहा-' वत्स ! कोई वर । हाथ रखकर मुसकराते हुए कहा।
संसारसिन्धौ पतितं कदर्यं मोहाकुलं कामशतेन बद्धम्! अकीर्तिभाजं पिशुनं कृतघ्नं सदाशुचिं पापरतं प्रमन्युम्।
दयाम्बुधे पाहि भयाकुलं मां पुनः पुनस्त्वां शरणं प्रपद्ये ॥ (ना० पूर्व° ३८1 ३-३८)
१. अतसीपुष्पसंकाशं
श्रीवत्सकोस्तुभधरं
पीताम्बरधरं देवं
किद्भिणीनृपुराद्यैश्च शोभितं
फु्पट्कजलोचनम्। किरीटिनं कुण्डलिनं
हेमयज्ञोपवीतिनम् । नासाविन्यस्तमुक्ताभवर्धमानतनुच्छविम् ॥
वनमालाविभूषितम्। तुलसीकोमलदलैर्चिताद्विं
गरुडध्वजम् । दृष्टा ननाम विद्रद्रो दण्डवत्क्षितिमण्डले॥
हारकेयूरभूषितम् ॥
महाद्युतिम् ॥
(ना० पूर्व ३८ । ४०--४३)
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 60810011
९८६४
संक्षिप्त नारदपुराण
श्रीभगवान् बोले- जो मनुष्य तुम्हारे द्वारा किये
हुए स्तोत्रका सदा पाठ करेगा, वह सम्पूर्णं कामनाओंको
प्राप्त करके अन्तमं मोक्षका भागी होगा।
नारदजी ! ब्राह्यणसे एेसा कहकर भगवान्
लक्ष्मीपति वहीं आन्तर्धान हो गये । फिर उत्तङ्कजी
भी वहसे बदरिकाश्रमको चले गये। अतः सदा
देवाधिदेव भगवान् विष्णुकी भक्ति करनी चाहिये ।
हरिभक्ति श्रेष्ठ कही गयी हे । वह सम्पूर्णं मनोवाच्छित
फलोको देनेवाली हे । मुने । नरनारायणके आश्रममें
जाकर उत्तङ्कजी क्रियायोगमें तत्पर हो प्रतिदिन
भक्तिभावसे भगवान् माधवको आराधना करने
लगे। वे ज्ञान-विन्ञानसे सम्पन्न थे। उनका द्वेतभ्रम
नाश हो चुका था। अतः उन्होने भगवान् विष्णुके
दुर्लभ परम पदको प्राप्त कर लिया। भक्तोंका
सम्मान बढानेवाले जगदीश्वर भगवान् नारायण
पूजन, नमस्कार अथवा स्मरण कर लेनेपर भी
जीवको मोक्ष प्रदान करते हैंः। अतः इहलोक
ओर परलोकमें सुख चाहनेवाला मनुष्य अनन्त,
अपराजित श्रीनारायणदेवका भक्तिपूर्वक पूजन करे ।
जो इस उपाख्यानको पढ़ता अथवा एकाग्रचित्त
होकर सुनता हे, वह भी सम्पूर्णं पापोसे मुक्त हो
भगवान् विष्णुके धामे जाता हे।
नः
१
भगवान् विष्णुके भजन-पूजनकी महिमा
श्रीसनकजी क्हते है- विप्रवर नारद । अव
पुनः भगवान् विष्णुका माहात्म्य सुनो; वह सर्व-
पापहारी, पवित्र तथा मनुष्योको भोग ओर मोक्ष
देनेवाला हे। अहो ! संसारमें भगवान् विष्णुकी कथा
अद्भुत हे। वह श्रोता, वक्ता तथा विशेषतः भक्तजनेकि
पापोका नाश ओर पुण्यका सम्पादन करनेवाली हे।
जो श्रेष्ठ मानव भगवद्धक्तिका रसास्वादन करके
प्रसन्न होते है, उने मे नमस्कार करता हूं। उनका
सङ्ग करनेसे साधारण मनुष्य भी मोक्षका भागी होता
हे । मुनिश्रेष्ठ! जो संसार-सागरके पार जाना चाहता
हो, वह भगवद्धक्तोके भक्तोंकी सेवा करे, क्योकि
वे सव पापोको हर लेनेवाले हें । दर्शन, स्मरण,
पूजन, ध्यान अथवा प्रणाममात्र कर लेनेपर भगवान्
गोविन्द दुस्तर भवसागरसे उद्धार कर देते हैँ । जो
सोते, खाते, चलते, ठहरते, उठते ओर बोलते हुए
भी भगवान् विष्णुके नामका चिन्तन करता है, उसे
प्रतिदिन बारम्बार नमस्कार हे । जिनका मन भगवान्
विष्णुकी भक्तिमें अनुरक्त है, उनका अहोभाग्य है,
अहोभाग्य ह; क्योकि योगिर्योके लिये भी दुर्लभ
मुक्ति उन भक्तोके हाथमे ही रहती हेर ।
विप्रवर नारद ! जानकर या बिना जाने भी जो
लोग भगवान्को पूजा करते हे, उन्हें अविनाशी
भगवान् नारायण अवश्य मोक्ष देते है । सब भाई-
वन्धु अनित्य हें । धन-वैभव भी सदा रहनेवाला
नहीं हे ओर मृत्यु सदा समीप खडी रहती
हे- यह सोचकर धर्मका संचय करना चाहिये।
९. पूजितो नमितो वापि संस्मृतो वापि मोक्षदः । नारायणो
२. संसारसागरं
ततुं य इच्छेन्मुनिपुद्भव। स भजेद्धरिभक्तानां
मानवर्धनः ॥
(ना० पूर्व° ३८ । ५७)
भक्तान्वे पापहारिणः॥
जगन्नाथो भक्तानां
दृष्टः स्मृतः पूजितो वा ध्यात प्रणमितीऽपि वा । समुद्धरति गोविन्दो दुस्तराद् भवसागरात् ॥
स्वपन् भुञ्जन् ब्रजंस्तिघ्ठन्नु्िषठ्॑च वरदस्तथा । चिन्तयेद्यो हरेनमि तस्म॒॑नित्यं नमो नमः॥
अहो भाग्यमहो भाग्यं विष्णुभक्तिरतात्मनाम् । येषां मुक्तिः करस्थैव योगिनामपि दुर्लभा॥
(ना० पूर्व ३९1 ५-८)
३. अनित्या वान्धवाः सर्वे विभवो नैव शाश्रतः। नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥
(ना० पूर्वं° ३९। ४९)
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181/185। (01661010. 14111260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद्
१९४५
मूर्खलोग मदसे उन्मत्त होकर व्यर्थं गर्वं करते हे ।
जब शरीरका ही विनाश निकट है तो धन
आदिकी तो बात ही क्या कही जाय ? तुलसीकं
सेवा दुर्लभ है, साधु पुरुषोंका सङ्ग दुर्लभ ह ओर
सम्पूर्णं भूतोके प्रति दयाभाव भी किसी विरलेको
ही सुलभ होता है । सत्सङ्ग, तुलसीको सेवा तथा
भगवान् विष्णुको भक्ति-ये सभी दुर्लभ हं।
दुर्लभ मनुष्य-शरीरको पाकर विद्वान् पुरुष उसे
व्यर्थं न गँवाये। जगदीश्वर श्रीहरिकौ पूजा करे।
द्विजोत्तम! इस संसारमें यही सार है । मनुष्य यदि
दुस्तर भवसागरके पार जाना चाहता है तो वह
भगवान्के भजनमें तत्पर हो जाय । यही रसायन हे।
भेया! भगवान् गोविन्दका आश्रय लो। प्रिय मित्र! इस
कार्यम विलम्ब न करो; क्योकि यमराजका नगर
निकट ही हे। जो महात्मा पुरुष सबके आधार,
सम्पूर्णं जगतकरे कारण तथा समस्त प्राणियेकि अन्तर्यामी
भगवान् विष्णुकी शरण ले चुके है, वे निस्संदेह
कृतार्थ हो गये है। जो लोग प्रणतजनोको पीड्का नाश
करनेवाले भगवान् महाविष्णुकी पूजा करते है, वे
वन्दनीय है। जो विष्णुभक्तं पुरुष निष्कामभावसे
परमेश्वर श्रीहरिका यजन करते है, वे इक्रौस
पीटियोके साथ वैकुण्ठधाममें जाते ह । जो कुछ
भी न चाहनेवाले महात्मा भगवद्धक्तको जल
अथवा फल देते है, वे ही भगवान्के प्रेमी हे । जो
कामनारहित होकर भगवान् विष्णुके भक्तों तथा
भगवान् विष्णुका भी पूजन करते है, वे ही अपने
जिसके घरमे सदा भगवत्पूजापरायण पुरुष निवास
करता हे, वहीं सम्पूर्णं देवता तथा साक्षात् श्रीहरि
विराजमान होते है। ब्रह्मन्! जिसके घरमे तुलसी
पूजित होती है, वहं प्रतिदिन सव प्रकारके श्रेयकी
वृद्धि होती है। जहां शालग्रामशिलारूपमें भगवान्
केशव निवास करते है, वहाँ भूत, वेताल आदि ग्रह
वाधा नहीं पहंचाते। जहां शालग्रामशिला विद्यमान है
वह स्थान तीर्थ है, तपोवन हे, क्योकि शालग्रामशिलामें
साक्षात् भगवान् मधुसुदन निवास करते हे। त्रह्यन्।
पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र तथा छः अद्गोसहित
वेद-ये सब भगवान् विष्णुके स्वरूप कहे गये हें।
जो भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुकी चार् वार प्रिमा
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कर तेते है वे भी उस परम पदको प्राप्त होते हं
चरणोकी धूलसे सम्पूर्णं विश्वको पवित्र कते हैः । । जहाँ समस्त कर्मबन्धनोका नाश हो जाता है"
१. ये यजन्ति स्पृहाशून्या हरिभक्तान् हरिं तथा । त एव भुवनं सर्वे पुनन्ति स्वाड्त्रि पांशुना ॥
(ना० पूर्व ३९। ६४)
२. भक्त्या कुर्वन्ति ये विष्णोः प्रदक्षिणचतुष्टयम् । तेऽपि . यान्ति परं स्थानं सर्वकर्मनिवर्हणम्॥
(ना० पूर्व० ३९। ७१)
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१४६
संक्षिप्त नारदपुराण
इन्द्र ओर सुधर्मका संवाद, विभिन्न मन्वन्तरोके इन्द्र ओर देवताओंका वर्णन तथा
भगवत्-भजनका माहात्म्य
श्रीसनकजी कहते है मुने! इसके बाद मे भगवान्
विष्णुकी विभूतिस्वरूप मनु ओर इन्द्र॒ आदिका वर्णन
करूगा। इस वैष्णवी विभूतिका श्रवण अथवा कीर्तन
करनेवाले पुरुषोका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है।
एक समय वैवस्वत मन्वन्तरके भीतर ही गुरु
वृहस्पति ओर देवताओंसहित इन्द्र सुधर्मके निवास-
स्थानपर गये । देवर्षे! बृहस्पतिजीके साथ देवराजको
आया देख सुधर्मने आदरपूर्वक उनकी यथायोग्य पूजा
को। सुधर्मसे पूजित हो इन्द्रने विनयपूर्वक कहा।
इन्द्र॒ बोले- विदन्! यदि आप बीते हुए
ब्रह्मकल्पका वृत्तान्त जानते हैँ तो बताइये । मै यही
पूछनेके लिये गुरुजीके साथ आया हू ।
देवराज इन्द्रके एेसा कहनेपर सुधर्म हंस पड़ा
ओर उसने विनयपूर्वक पूर्वकल्पकी सब बातोँका
विधिवत् वर्णन किया।
सुधर्मने कहा-- इन्द्र! एक सहस्र चतुर्युगीका
ब्रह्माजीका एक दिन होता है ओर उनके एक दिनमें
चौदह मनु, चौदह इन्द्र॒ तथा पृथक्-पृथक् अनेक
प्रकारके देवता हुआ करते है । वासव ! सभी इन्र ओर
मनु आदि तेज, लक्ष्मी, प्रभाव ओर बलमें समान ही
होते ह । मे उन सबके नाम बतलाता हूं एकाग्रचित्त
होकर सुनो। सबसे पहले स्वायम्भुव मनु हृए।
तदनन्तर क्रमशः स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रवत,
चाक्षुष, सातवें वैवस्वत मनु, आट सूर्यसावर्णि ओर
नवे दक्षसावर्णि हें । दसवें मनुका नाम ब्रह्मसावर्णि
ओर ग्यारहर्वेका धर्मसावर्णि है। तदनन्तर बारहवे
रुद्रसावर्णि तथा तेरहवें रोचमान हए। चोदहवें मनुका
नाम भौत्य बताया गया है। ये चोदह मनु है।
देवराज! अव मे देवताओं ओर इन्द्रोका वर्णन
करता हूं सुनो। स्वयम्भू मन्वन्तरमें देवतालोग यामके
नामसे विख्यात ॒थे। उनके परम बुद्धिमान् इन्द्रकी
शचीपति नामसे प्रसिद्धि थी। स्वारोचिष मन्वन्तरं
पारावत ओर तृषित नामके देवता थे। उनके स्वामी
इन््रका नाम विपश्चित था। वे सब प्रकारकी सम्पदाओंसे
समृद्ध थे। तीसरे उत्तम नामक मन्वन्तसे सुधामा, सत्य,
शिव तथा प्रतर्दन नामवाले देवता थे। उनके इनदर
सुशान्ति नामसे प्रसिद्ध॒ थे। चौथे तामस मन्वन्तरमे
सुपार, हरि, सत्य ओर सुधी -ये देवता हए थेः।
१. विष्णुपुराणमें भी तामस मन्वन्तरके ये ही देवता बताये गये है । वरहाँका मूल पाठ इस प्रकार है-
तामसस्यान्तरे देवाः सुपाराः
हरयस्तथा । सत्याश्च सुधियश्चैव सप्तविंशतिका गुणाः ॥
शिविरिन्द्रस्तथा चासीत् “““““ ।
(३1 १। १६-१७)
माकण्डेयपुराणमें तामस मन्वन्तरके देवता सत्य, सुधी, हरि तथा सुरूप बताये गये है ओर इन्द्रका नाम "शिखी ' कहा
गया है।
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 8118801 \/8181185। (01661011. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
शक्र। उन देवताओंके इन्द्रका नाम उस समय
शिवि था। ्पोचवें (रेवत) मन्वन्तरमें अमिताभ
आदि देवता थे ओर पांचवें देवराजका नाम विभु
कहा गया है। छठे (चाक्षुष) मन्वन्तरमें आर्य
आदि देवता बताये गये हे । उन सबके इन्द्रका
नाम मनोजव था। इस सातवें वैवस्वत मन्वन्तरमें
आदित्य, वसु तथा रुद्र आदि देवता हँ ओर
सम्पूर्ण भोगोँसे सम्पन्न आप ही इन्द्र हे । आपका
विशेष नाम पुरन्दर बताया गया है। आठवें
सूर्यसावर्णि मन्वन्तरमें अप्रमेय तथा सुतप आदि
होनेवाले देवता बताये जाते हे । भगवान् विष्णुकौ
आराधनाके प्रभावसे राजा बलि उनके इन्द्र होगे ।
नवे दक्षसावर्णि मन्वन्तरमें पार आदि देवता होगे
ओर उनके इन्द्रका नाम अद्भुत बताया जाता है।
दसवें ब्रह्मसावर्णि मन्वन्तरमें सुवासन आदि देवता
कहे गये हैँ । उनके इन्द्रका नाम शान्ति होगा।
ग्यारहवें धर्मसावर्णि मन्वन्तरमे विहङ्गम आदि
देवता होगे ओर उनके इन्द्र वृष नामसे प्रसिद्ध
होगे । बारहवें रुद्रसावर्णि मन्वन्तरमें हरित आदि
देवता तथा ऋतुधामा नामवाले इन्द्र होगे। तेरह
रोचमान या रौच्य नामक मन्वन्तरमें सुत्रामा आदि
देवता होगे। उनके महापराक्रमी इन्द्रका नाम
दिवस्पति कहा जाता है । चौदहवें भौत्य मन्वन्तरमें
चाक्षुष आदि देवता होगे ओर उनके इन्द्रको शुचि
नामसे प्रसिद्धि होगी । देवराज! इस प्रकार मेने
भूत ओर भविष्य मनु, इन्द्र॒ तथा देवताओंका
यथार्थं वर्णन किया है। ये सव ब्रह्माजीके एक
दिनमें अपने अधिकारका उपभोग करते हें।
सम्पूर्णं लोकों तथा सभी स्वर्गेमिं एक ही तरहक
सृष्टि कही गयी है । उस सृष्टिके विधाता बहुत हे ।
उनकी संख्या यहां कौन जानता है ? देवराज! मेरे
ब्रह्मलोकमें रहते समय बहुत-ये ब्रह्मा आये .ओर
चले गये। आज गँ उनको संख्या वतानमे असमर्थ
[ 1183 ] सं० ना० पुर ६--
१४७
हू। इस स्वर्गलोकमें आकर भी मेरा जितना समय
बीता है, उसको सुनो-'आवतक चार मनु बीत
गये, कितु मेरी समृद्धिका विस्तार बढता ही
गया । प्रभो! अभी मुञ्चे सौ करोड़ युगोतक यहीं
रहना है । तत्पश्चात् मैं कर्मभूमिको जाऊंगा ।'
महात्मा सुधर्मकि एेसा कहनेपर देवराज मन-
ही-मन बडे प्रसन्न हुए ओर निरन्तर भगवान्
विष्णुकी आराधनामें लग गये । यद्यपि देवतालोग
स्वर्गका सुख भोगते ह तथापि वे सव इस
भारतवर्षमें जन्म पानेके लिये लालायित रहते हे ।
जो भगवान् नारायणकौ पूजा करते हैँ, उन
महात्माओंकी पूजा सदा ब्रह्मा आदि देवता किया
करते हैं। जो महात्मा सब प्रकारके संग्रह-
परिग्रहका त्याग करके निरन्तर भगवान् नारायणके
चिन्तनमें लगे रहते हँ, उन्हे भयङ्कर संसारका
बन्धन कैसे प्राप्त हो सकता है? यदि कोई उन
महापुरुषोके सङ्गका लोभ रखते हँ तोवे भी
मोक्षके भागी हो जाते है । जो मानव प्रतिदिन सब
प्रकारकी आसक्तियोका त्याग करके गरुडवाहन
भगवान् नारायणकी अर्चना करते हँ, वे सम्पूर्ण
पापराशियोसे सर्वथा मुक्त होकर हर्षपूर्ण हदयस
भगवान् विष्णुके कल्याणमय पदको प्राप्त होते हं ।
जो मनुष्य आसक्तिरहित तथा पर-अवर (उत्तम-
मध्यम, शुभ-अशुभ)-के जाता ह ओर निरन्तर
देवगुरु भगवान् नारायणका चिन्तन करते रहते हे,
उस ध्यानसे उनके अन्तःकरणको सारी पापराशि
नष्ट हो जाती है ओर वे फिर कभी माताके
स्तनोंका दृध नहीं पीते। जो मानव भगवानूको
कथा श्रवण करके अपने समस्त दोष-दुर्गुण दूर
कर चुके हँ ओर जिनका चित्त भगवान् श्रीकृष्णके
चरणारविन्दोंको आराधनामें अनुरक्त है, वे अपने
शरीरके सद्धं अथवा सम्भापणये भी संसार्को
पवित्र करते हं, अतः सदा श्रीहरिकौ दही पूजा
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९४८
करनी चाहिये । ब्रह्मन्! जेसे नीची भूमिमें इधर-
उधरका सारा जल (सिमट-सिमटकर) एकत्र हो
जाता है, उसी प्रकार जहां भगवत्पूजापरायण शुद्धचित्त
महापुरुष रहते हे, वहीं सम्पूर्ण कल्याणका वास
होता है‹। भगवान् विष्णु ही सबसे त्रे्ठ बन्धु हे ।
संक्षिप्त नारदपुराण
वे ही सर्वोत्तम गति हं । अतः उन्ीको निरन्तर पूजा
करनी चाहिये, क्योकि वे ही सबको चेतनाके कारण
हे। मुनिश्रेष्ठ! तुम स्वर्ग ओर मोक्षफलके दाता
सदानन्दस्वरूप निरामय भगवान् श्रीहरिको पूजा
करो । इससे तुम्हे परम कल्याणक प्राति होगी ।
~
१ 0 0 |
चारों युगोकी स्थितिका संक्षेपसे तथा कलिधर्मका विस्तारसे वर्णन एवं
भगवन्नामको अद्भुत महिमाका प्रतिपादन
नारदजीने कहा- मुने ! आप तात्विक अ्थेकि
ज्ञानमें निपुण दै। अब मं युगोंको स्थितिका
परिचय सुनना चाहता हू ।
श्रीसनकजीने कहा- महाप्रास् ! साधुवाद, तुमने
बहुत अच्छी बात पूरी है। मुने! तुम सम्पूर्ण
लोकोंका उपकार करनेवाले हो । अच्छा, अब मं
समस्त जगतके लिये उपकारी युग-धर्मका वर्णन
आरम्भ करता हू । किसी समय तो पृथ्वीपर उत्तम
धर्मको वृद्धि होती हे ओर किसी समय वही
विनाशको प्राप्त होने लगता है। साधुशिरोमणे।
सत्ययुग, त्रेता, द्वापर ओर कलियुग-ये चार युग
माने गये है; इनकी आयु बारह हजार दिव्य
वर्षोकी समञ्लनी चाहिये । वे चारों युग उतने ही
सौ वर्षोकी संध्या ओर संध्यांशसे युक्त होते हँ ।
इनको कला-संख्या सदा एक-सी ही जाननी
चाहिये। पहले युगको सत्ययुग कहते है, दूसरेका
नाम त्रेता हे, तीसरेका नाम द्वापर है ओर अन्तिम
युगको कलियुग कहते हैँ । इसी क्रमसे इनका
आगमन होता है। विप्रवर! सत्ययुगमें देवता,
दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा सर्पोका भेद नहीं
था। उस समय सब-के-सव देवताओंके समान
स्वभाववाले थे! सब प्रसन्न ओर धर्मनिष्ठ थे।
कृतयुगमे क्रय-विक्रयका व्यापार ओर वेदोका
विभाग नहीं था । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वेश्य तथा शृद्र-
सभी अपने-अपने कर्तव्यके पालनमें तत्पर रहकर
सदा भगवान् नारायणकौ उपासना करते थे। सभी
अपनी योग्यताके अनुसार तपस्या ओर ध्यानम
लगे रहते थे। उनमें काम, क्रोध आदि दोष नहीं
थे। सब लोग शम-दम आदि सद्गुणोमें तत्पर थे।
सवका मन धर्मसाधनमें लगा रहता था। किसीमें
ईर्ष्या तथा दूसरोके दोष देखनेका स्वभाव नहीं
था। सभी लोग दम्भ ओर पाखण्डसे दूर रहते थे।
सत्ययुगके सभी द्विज सत्यवादी, चारो आश्रमोके
धर्मका पालन करनेवाले, वेदाध्ययनसम्पन्न तथा
सम्पूर्णं शास्त्रौकि ज्ञानमें निपुण थे। चारों आश्रमोवाले
अपने-अपने कमकि द्वारा कामना ओर फलासक्तिका
त्याग करके परम गतिको प्राप्त होते थे। सत्ययुग
भगवान् नारायणका श्रीविग्रह अत्यन्त निर्मल एवं
शुक्लवर्णका होता है । मुनिश्रेष्ठ! त्रेतामें धर्म एक पादसे
हीन हो जाता है। (सत्ययुगकी अक्षा एक चोथाई
कम लोग धर्मका पालन करते है।) भगवानूके
शरीरका वर्णं लाल हो जाता है। उस समय जनताको
१. ये मानवा हरिकथाश्रवणास्तदोषाः कृष्णाद्घ्रिपद्मभजने रतचेतनाश्च।
ते वै पुनन्ति च जगन्ति शरीरसद्गात् सम्भाषणादपि ततो हरिरेव पृज्यः॥
हरिपूजापरा यत्र महान्तः शुद्धवुद्धयः। तत्रैव सकलं भद्रं यथा निप्रे जलं द्विज॥
(ना० पूर्व ४०। ५३-५४)
((-0. 1/८111141/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-प्रथम पाद
१४९
कु क्लेश भी होने लगता हे । त्रेतामें सभी द्विज
क्रियायोगमें तत्पर रहते हें । यज्ञ-कर्ममिं उनकी
निष्ठा होती है। वे नियमपूर्वकं सत्य बोलते,
भगवान्का ध्यान करते, दान देते ओर न्याययुक्त
प्रतिग्रह भी स्वीकार करते हं। मुनीश्वर! द्वापरमें
धर्मके दो ही पेर रह जाते हैं । भगवान् विष्णुका
वर्णं पीला हो जाता है ओर वेदके चार विभाग हो
जाते हें । द्विजोत्तम ! उस समय कोई-कोई असत्य
भी बोलने लगते हे । ब्राह्मण आदि वणमिंसे कुछ
लोगोमें रागद्वेष आदि दुर्गुण आ जाते हें।
विप्रवर! कुछ लोग स्वर्गं ओर अपवर्गके लिये
यज्ञ करते हे, कोई धनादिकी कामनाओमें आसक्त
हो जाते हँ ओर कुछ लोगोंका हदय पापसे मलिन
हो जाता हे। द्विजश्रेष्ठ! द्वापरमें धर्म ओर अधर्म
दोनोंको स्थिति समान होती है। अधर्मके प्रभावसे
उस समयक प्रजा क्षीण होने लगती हे। मुनी श्वर
कितने ही लोग द्वापर आनेपर अल्पायु भी होगे।
ब्रह्मन्! कुछ लोग दूसरोको पुण्यमें तत्पर देखकर
उनसे डाह करने लगेगे। कलियुग आनेपर धर्मका
एक ही पैर शेष रह जाता है । इस तामस युगके
प्राप्त होनेपर भगवान् श्रीहरि श्याम रगके हो जाते
है। उसमे कोई विरला ही धर्मात्मा यज्ञोका
अनुष्ठान करता है ओर कोई महान् पुण्यात्मा ही
क्रियायोगमें तत्पर रहता हे । उस समय धर्मपरायण
मनुष्यको देखकर सव लोग ईर्ष्या ओर निन्दा करते
हे । कलियुगमें त्रत ओर सदाचार नष्ट हो जाते है ।
ज्ञान ओर यज्ञ आदिको भी यही दशा होती है । उस
समय अधर्मका प्रचार होनेसे जगते उपद्रव होते
रहते हँ । सव लोग दूसरोके दोप वतानेवाले ओर
स्वयं पाखण्डपूर्णं आचारमें तत्पर होते हे ।
नारदजीने कहा- मुने! आपने संक्षेपसे ही
युगधर्मोका वर्णन किया है, कृपया कलिका
विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये; क्योकि आप धर्मजेमिं
श्रेष्ठ हे । मुनिश्रेष्ट ! कलियुगमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य
तथा शद्रोका खान-पान ओर आचार-व्यवहार
केसा होगा?
श्रीसनकजीने कहा- सब लोकोंका उपकार
करनेवाले मुनिश्रेष्ठ । सुनो, मे कलि-धर्मोका यथार्थ
एवं विस्तारपूर्वक वर्णन करता ह| कलि बड़ा
भयङ्कर युग दै। उसमे सब प्रकारके पातकोंका
सम्मिश्रण होता है अर्थात् पापोंकी बहुलता होनेके
कारण एक पापमें दूसरा पाप शामिल हो जाता है।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ओर श्र धर्मसे मह मोड
लेते हें । घोर कलियुग प्राप्त होनेपर सभी द्विज
वेदोसे विमुख हो जाते हं । सभी किसी-न-किसी
वहानेसे धर्ममे लगते हे । सब दूसरोके दोष बताया
करते हें । सवका अन्तःकरण व्यर्थं अह्कारसे
दूषित होता हे । पण्डित लोग भी सत्यसे दूर रहते
हें । "में ही सबसे बड़ा हू" इस प्रकार सभी परस्पर
विवाद करते हे । सब मनुष्य अधर्ममिं आसक्त ओर
वितण्डावादी होते है। इन्हीं कारणोंसे कलियुगे
सब लोग स्वल्पायु होगे। ब्रह्मन्! थोड़ी आयु
होनेके कारण मनुष्य शास्त्रोका अध्ययन नहीं कर्
सकेगे ओर विद्याध्ययनशून्य होगे। उनके द्वारा
बार-बार अधर्मपूर्णं वर्ताव होता हे। उस समयकी
समस्त पापपरायण प्रजा अवस्था-क्रमके विपरीत
मरने लगेगी । ब्राह्मण आदि सभी वर्णके लोगों
परस्पर संकरता आ जायगी। मूढ मनुष्य काम-
क्रोधके वशीभूत हो व्यर्थके संतापसे पीडित हगि।
कलियुगमें सवर वणेकि लोग शद्रके समान हो जाये ।
उत्तम नीच हो जार्येगे ओर नीच उत्तम। शासकगण
केवल धन-संग्रहमं लग ॒जा्येगे ओर अन्यायपूर्ण
वर्ताव करगे। वे अधिक कर् लगाकर प्रजाको पीड
दगे। द्विज लोग शुद्रेकि मर्द ढाने लगेगे ओर पति
अपनी धर्मपलि्यकि होते हुए भी व्यभिचारं फैसकर्
परायी स्त्रिये संगमन करेगे। पुत्र पितासे ओर
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१.५०
सारी स्त्रियों पतिसे द्वेष करणी । सब लोग परस्त्रीलम्पर
ओर पराये धनमें आसक्त होगे। मछूलीके मांससे
जीवन-निर्वाह करेगे ओर बकरी तथा भेडका भी
दूध दुहेगे। नारदजी ! घोर कलियुगमें सब मनुष्य
पापपरायण हो जा्येगे। सभी लोग श्रेष्ठ पुरुषोमे दोष
देखेगे ओर उनका उपहास करेगे । नदि्योके तटपर
भी कुदालसे खोदकर अनाज बो्येगे। पृथ्वी फलहीन
हो जायगी । बीज ओर फूल भी नष्ट हो जा्यंगे ।
युवतिं प्रायः वेश्याओंके लावण्य ओर स्वभावको
अपने लिये आदर्श मानकर उसकी अभिलाषा
करेगी । ब्राह्मण धर्म बेचनेवाले होगे, स्त्रियां अपना
शरीर वेर्चेगी अर्थात् वेश्यावृत्ति करेगी तथा दूसरे
द्विज वेदोका विक्रय करनेवाले ओर शुद्रोके-से
आचरणमे तत्पर होगे। लोग श्रेष्ठ पुरुषों ओर
विधवाओके भी धन चुरा लेगे । ब्राह्मण धनके लिये
लोलुप होकर व्रतोका पालन नहीं करेगे। लोग
व्यर्थके वाद-विवाद फैसकर धर्मका आचरण
छोड वे्टेगे। द्विजलोग केवल दम्भके लिये पितरोका
श्राद्ध आदि कार्य करेगे । नीच मनुष्य अपात्रोको ही
दान देगे ओर केवल दूधके लोभसे गौओमि प्रेम
करगे। विप्रगण स्नान-शोच आदि क्रिया छोड देगे।
अधम द्विज असमयमें (मुख्यकाल विताकर) संध्या
आदि कर्म करे । मनुष्य साधुं तथा ब्राह्यणोकी
निन्दामें तत्पर रहेगे।
नारदजी ! प्रायः किसीका मन भगवान् विष्णुके
भजनमें नहीं लगेगा । द्विजलोग यज्ञ नहीं करेगे तथा
दुष्ट राजकर्मचारी धनके लिये द्विजोको भी पीरेगे।
मुने! घोर कलियुगमें सब लोग दानसे मह मोड़ लेगे
ओर ब्राह्मण पतितोंका दिया हुआ दान भी ग्रहण
कर लेगे। कलिके प्रथम पादमें भी मनुष्य भगवान्
विष्णुको निन्दा करेगे ओर युगके अन्तिम भागमें तो
कोई भगवान्का नामतक नहीं लेगा। कलिमें
द्विजलोग श्रोकी स्त्रियोसे संगम करगे, विधवाओंसे
संक्षिप्त नारदपुराण
व्यभिचारके लिये लालायित होगे ओर श्रौके
घरको बनी हुई रसोई भोजन कररेगे। वेदोक्त
सन्मार्गका त्याग करके कुमार्गपर चलने ल्गेगे ओर
चारों आश्रमोकी निन्दा करते हुए पाखण्डी हो
जा्येगे। श्रलोग द्विजोंकी सेवा नहीं करेगे ओर
पाखण्ड-चिह्न धारण करके वे द्विजातियोके धर्मको
अपनायेगे। गेरुआ वस्त्र पहने, जटा बढ़ाये ओर
शरीरम भस्म रमाये शुद्रलोग इयूठी युक्तया देकर
धर्मका उपदेश करेगे । दूषित अन्तःकरणवाले शूदर
संन्यासी बनेगे। मुने! कलियुगमें लोग केवल सूदसे
जीवन-निर्वाह करनेवाले होगे। धर्महीन अधम
मनुष्य पाखण्डी, कापालिक एवं भिक्षु बनेगे।
द्विजश्रेष्ठ! श्र ऊचे आसनपर बैठकर द्विजोको
धर्मका उपदेश करेगे। ये तथा ओर भी बहुत-से
पाखण्डमत प्रचलित होगे, जो प्रायः वेदोकी निन्दा
करेगे । कलिमें प्रायः धर्मके विध्वंसक मनुष्य गाने-
वजानेमे कुशल तथा शूद्रके धर्मका आश्रय लेनेवाले
हगि। सबके पास थोड़ा धन होगा । प्रायः सभी व्यर्थके
चिह्न धारण करनेवाले ओर वृथा अहंकारसे दूषित हगि।
कलिके नीच मनुष्य दूसरका धन हडपनेवाले होगे।
प्रायः सभी सदा दान लगे ओर उनका स्वभाव जगत्को
बुरे मार्गपर् ले जानेवाला होगा। सभी अपनी प्रशंसा
ओर दूसरोकी निन्दा करनेवाले हगि। नारदजी ! कलियुगमे
अधर्म ही लोगोका भाई-बन्धु होगा। वे सब-के-
सब विश्चासघाती, क्रूर ओर दयाधर्मसे शून्य होगे।
विप्रवर! घोर कलियुगमें बड़ी-से-बड़ी आयु सोलह
वर्षको होगी ओर पांच वर्की कन्याके वच्चा पैदा
होगा। लोग सात या आट वर्षकी अवस्थामें जवान
कहलायेगे। सभी अपने कर्मका त्याग करनेवाले
कृतघ्न तथा धर्मयुक्त आजीविकाको भंग करनेवाले
होगे। कलियुगमें द्विज प्रतिदिन भीख मोगनेवाले
हगि। वे दूसरोका अपमान करेगे ओर दूसरके ही घरमे
रहकर प्रसत्र हग । इसी प्रकार दूसरोकी निन्दामें तत्पर
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पूर्वभाग-प्रथम पाद
तथा व्यर्थं विश्वास दिलानेवाले लोग सदा
माता ओर पुत्रोकी निन्दा करेगे। वाणीसे धर्मकी
वात करेगे, किंतु उनका मन पापमें आसक्त होगा।
धन, विद्या ओर जवानीके नशेमें मतवाले हो सब
लोग दुःख भोगते रहंगे। रोग-व्याधि, चोर-डाकु
तथा अकालसे पीडित होगे। सबके मनमें अत्यन्त
कपट भरा होगा ओर अपने अपराधका विचार न
करके व्यर्थं ही दूसरोपर दोषारोपण करेगे। पापी
मनुष्य धर्ममार्गका संचालन करनेवाले धर्मपरायण
पुरुषका तिरस्कार करेगे। कलियुग आनेपर म्लेच्छ
जातिके राजा होगे। शुद्र लोग भिक्षासे जीवन-निर्वाह
करनेवाले होगे ओर द्विज उनकी सेवा-शुश्रूषामें
संलग्न रहेगे। इस सङ्कटकालमें न कोई शिष्य होगा,
न गुरु; न पुत्र होगा, न पिता ओर न पती होगी न
पति। कलियुगे धनीलोग भी याचक होगे ओर
द्विजलोग रसका विक्रय करे। धर्मका चोला पहने हए
मुनिवेषधारी द्विज नहीं बेचनेयोग्य वस्तुओंका विक्रय
तथा अगम्या स्त्रीके साथ समागम करेगे। मुने।
नरकके अधिकारी द्विज वेदों ओर धर्मशास्त्रोकी निन्दा
करते हए शद्रवृत्तिसे ही जीवन-निर्वाह करगे ।
कलियुगमें सभी मनुष्य अनावृष्टिसे भयभीत होकर
आकाशकी ओर अखं लगाये रख ओर श्ुधाके भयसे
कातर बने र। उस अकालके समय मनुष्य कन्द, पत्ते
ओर फल खाकर रही ओर अनावृष्टि अत्यन्त दुःखित
होकर आत्मधात कर ठेगे। कलियुगे सब लोग
कामवेदनासे पीडित, नाटे शरीखाले लोभी, अधर्मपरयण,
मन्दभाग्य तथा अधिक संतानवाले हगि। स्तर्यो अपने
शरीरका ही पोषण करनेवाली तथा वेश्याअकि सीन्दर्य
ओर स्वभावको अपनानेवाली होगी । वे पतिके वचर्नोका
अनादर करके सदा दूसरकि घरमे निवास कशी । अच्छे
कु्लेकी स्त्रयो भी दुरचारिणी होकर सदा दुण्चारियसि ही
सेह कशी ओर अपने पुर्पेकि प्रति असद्व्यवहार
करनेवाली हेगी। चोर आदिके भयसे ड हृए लोग
१५९
अपनी रक्षाके लिये काष्ट-यन्त्र अर्थात् काठके मजबूत
किवाड् बनायेगे। दुर्भिक्ष ओर करकी पीडसे अत्यन्त
पीडित हुए मनुष्य दुःखी होकर गेहं ओर जौ आदि
अन्नसे सम्पन्न देशमे चले जायेगे। लोग हदयमें निषिद्ध
कर्मका संकल्प लेकर ऊपरसे शुभ वचन वोलेगे। अपने
कार्यकी सिद्धि होनेतक ही लोग बन्धुता (सोहार्द) प्रकट
के। संन्यासी भी मित्र आदिके स्रेह-सम्बन्धसे वधे
रहेगे ओर अन्न-संग्रहके लिये लोगोको चेले बना्येगे।
स्त्रियों दोनों हा्थोसे सिर खुजलाती हुई बदधंकी तथा
पतिकी आश्ञाका उल्द्न करी। जिस समय द्विज
पाखण्डी लोर्गोका साथ करके पाखण्डपूर्णं वाते
करनेवाले हो जायगे, उस समय कलियुगका वेग ओर
वदेगा। जब द्विज-जातिकी प्रजा यज्ज ओर होम करना
छोड देगी, उसी समयसे वुद्धिमान् पुरुपोको कलियुगकी
वृद्धिका अनुमान कर लेना चाहिये।
नारदजी ! कलियुगके बदनेसे पापको वृद्धि
होगी ओर छेटे बालकोंकी भी मृत्यु होने लगेगी ।
सम्पूर्णं धमेकि नष्ट हो जानेपर यह जगत् श्रीहीन हो
जायगा । विप्रवर! इस प्रकार मने तुम्हं कलिका स्वरूप
बतलाया है। जो लोग भगवान् विष्णुकी भक्तिमं तत्पर
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 8118811 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6681001
१५२
हे, उन्हं यह कलियुग कभी बाधा नहीं देता।
सत्ययुगमें तपस्याको, त्रेतामें भगवान्के ध्यानको,
द्वापरमें यज्ञको ओर कलियुगमे एकमात्र दानको ही
ष्ठ॒ बताया गया हे। सत्ययुगमें जो पुण्यकर्म दस
वषमिं सिद्ध होता हे, त्रेतामे एक वर्ष ओर द्वापरमें एक
मासमे जो धर्म सफल होता हे, वही कलियुगमें एक
ही दिन-रातमे सिद्ध हो जाता हे। सत्ययुगमे ध्यान,
तरेतामे यजोद्वारा यजन ओर द्वापरमें भगवानूका पूजन
करके मनुष्य जिस फलको पाता हे, उसे ही कलियुगमें
केवल भगवान् केशवका कीर्तन करके पा लेता हैः ।
जो मनुष्य दिन-रात भगवान् विष्णुके नामका कीर्तन
अथवा उनकी पूजा कसते ह, उन्हं कलियुग बाधा नहीं
देता है। जो मानव निष्काम अथवा सकामभावसे "नमो
नारायणाय'का कीर्तन करते है उनको कलियुग बाधा
नहीं देता। घोर कलियुग आनेपर भी सम्पूर्णं जगत्कर
आधार एवे परमार्थस्वरूप भगवान् विष्णुका ध्यान
करनेवाला कभी कष्ट नहीं पाता। अहो! सम्पूर्णं ध्मेसि
रहित भयंकर कलियुग प्राप्त होनेपर जिन्हेनि एक वार
भी भगवान् केशवका पूजन कर लिया हे, वे वड
सोभाग्यशाली हे। कलियुगमें वेदोक्त कर्मोका अनुष्टन
करते समय जो कमी-वेशी रह जाती है, उस दोषके
निवारणपूर्वक कर्ममें पूर्णता लानेवाला यहं केवल
भगवानूका स्मरण ही है। जो लोग प्रतिदिन 'हरे।
केशव । गोविन्द! जगन्मय! वासुदेव !' इस प्रकार
कीर्तन करते है, उन्हे कलियुग बाधा नहीं पहुचाताः।
अथवा जो “शिव! शङ्कर! रुद्र! ईश! नीलकण्ठ]
त्रिलोचन!" इत्यादि महादेवजीके नामका उच्चारण करते
संक्षिप्त नारदपुराण
है उन्हं भी कलियुग बाधा नहीं देता । नारदजी ! ' महादेव ।
विरूपाक्ष । गङ्गाधर! मृड! ओर अव्यय!" इस प्रकार जो
शिव-नामोका कीर्तन करते है वे कृतार्थ हो जाते है-
अथवा जो ' जनार्दन ! जगन्नाथ } पीताम्बरधर! अच्युत !'
इत्यादि विष्णु-नामोंका उच्चारण करते हैँ, उन्हं इस
संसारम कलियुगसे भय नहीं हे। विप्रवर ! घोर कलियुग
आनेपर संसारम मनुष्योको पुत्र, स्त्री ओर धन आदि
तो सुलभ है, किंतु भगवान् विष्णुकी भक्ति दुर्लभ हे।
जो वेदमार्गसे बहिष्कृत, पापकर्मपरायण तथा मानसिक
शुद्धिसे रहित हे, ठेसे लोगोका उद्धार केवल भगवानूके
नामसे ही होता हे। मनुष्यको चाहिये कि अपने
अधिकारके अनुसार यथाशक्ति सम्पूर्णं वैदिक कर्मोका
अनुष्ठन करे उन्हे भगवान् महाविष्णुको समर्पित
कर दे ओर स्वयं उन्हीं नारायणदेवकी शरण होकर रहे।
परमात्मा महाविष्णुको समर्पित कयि हए कर्म उनके
स्मरणमात्रसे निश्चय ही पूर्ण हो जते हं। नारदजी ! जो
भगवान् विष्णुके स्मरणमे लगे ह ओर जिनका चित्त
भगवान् शिवके नाममें अनुरक्त हे, उनके समस्त
कर्म अवश्य पूर्णं हो जाते हं। भगवन्नाममे
अनुरक्तचित्तवाले पुरुषोंका अहोभाग्य है, अहोभाग्य
हे। वे देवताओके लिये भी पूज्य हैं । इसके
अतिरिक्त अन्य अधिक बातें करनेसे क्या लाभ?
अतः मे सम्पूर्ण लोकोके हितकी ही बात कहता
हू कि भगवन्नामपरायण मनुष्योको कलियुग कभी
बाधा नहीं दे सकता । भगवान् विष्णुका नाम ही, नाम
ही मेरा जीवन है। कलियुगमें दूसरी कोई गति नही
हे, नहीं हे, नहीं हैर ।
(म {२१७४
प्रथम पाद सम्पूर्णं
(+= # 9
१. यत्कृते दशभिर्वर्पैसतरेतायां शरदा च यत् । द्वापरे यच्च मासेन ह्यहोरात्रेण तत्कलौ ॥
ध्यायन् कृते यजन् यजैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् । यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकोर्त्यं केशवम्॥
२. न्यूनातिरिक्तदोषाणां
हरे केशव
कलौ वेदोक्तकर्मणाम् । हरिस्मरणमेवात्र
गोविन्द वासुदेव जगन्मय । इतीरयन्ति ये नित्यं न हि तान्वाधते कलिः ॥
(ना० पूर्व० ४१। ९१-९२)
सम्पूर्णत्वविधायकम्॥
(ना० पूर्व० ४१। ९९-१००)
३. हरेनमिव नामैव नामैव मम जीवनम् । कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥
(ना० पूर्व० ४१। ११५)
((-0. 1/८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
द्वितय पद
सृष्टिततत्वका वर्णन, जीवकी सत्ताका प्रतिपादन ओर आश्रमोके आचारका निरूपण
श्रीनारदजीने पृछा-- सनन्दनजी ! इस स्थावर-
जङ्गमरूप जगत्को उत्पत्ति किससे हुई है ओर
प्रलयके समय यह किसमें लीन होता है 2
श्रीसनन्दनजी बोले-नारदजी! सुनो, में
भरद्वाजके पूछनेपर भृगुजीने जो शास्त्र बताया है
वही कहता हू |
भृगुजी बोले- भरद्वाज! महर्षियोने जिन
पूर्वपुरुषको मानस-नामसे जाना ओर सुना है, वे
आदि-अन्तसे रहित देव “ अव्यक्त नामसे विख्यात
हें । वे अव्यक्त पुरुष शाश्चत, अक्षय एवं अविनाशी
हे; उन्हींसे उत्पन्न होकर सम्पूर्ण भूत-प्राणी जन्म
ओर मृत्युको प्राप्त होते हैं । उन स्वयम्भू भगवान्
नारायणने अपनी नाभिसे तेजोमय दिव्य कमल
प्रकट किया। उस कमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए जो
वेदस्वरूप है, उनका दूसरा नाम विधि है । उन्होने
ही सम्पूर्ण प्राणियोके शरीरकी रचना की है । इस
प्रकार इस विराट् विश्वके रूपमे साक्षात्. भगवान्
विष्णु ही विराज रहे हे, जो अनन्त नामसे विख्यात
है । वे सम्पूर्णं भूतोमें आत्मारूपसे स्थित हे । जिनका
अन्तःकरण शुद्ध नहीं है, एसे पुरुषोके लिये उनका
ज्ञान होना अत्यन्त कठिन हे।
भरद्राजजीने पृछा- जीव क्या है ओर कैसा
है 2 यह मे जानना चाहता हूं । रक्त ओर मांसके
संघात (समूह) तथा मेद-सनायु ओर अस्थियोके
संग्रहरूप इस शरीरके नष्ट होनेपर तो जीव कहीं
नहीं दिखायी देता।
भृगुने कहा- मुने! साधारणतया पाच भृतोसे
निर्मित किसी भी शरीरको यहाँ एकमात्र अन्तरात्मा
धारण करता है । वही गन्ध, रस, शब्द, स्पर्श, रूप
तथा अन्य गुणका भी अनुभव करता हे । अन्तरात्मा
सम्पूर्णं अङ्खकोमें व्याप्त रहता है। वही इसमें
होनेवाले सुख-दुःखका भी अनुभव करता है । इस
शरीरके पचो तत्त्व जव अलग-अलग हो जाते
हे, तब वह इस देहको त्यागकर अदृश्य हो जाता
हे। चेतनता जीवका गुण बतलाया जाता है। वह
स्वयं चेष्टा करता है ओर सबको चेष्टामें लगाता
हे। मुने! देहका नाश होनेसे जीवका नाश नहीं
होता। जो लोग देहके नाशसे जीवके नाशकी वात
कहते हे, वे अज्ञानी ह ओर उनका यह कथन
मिथ्या है । जीव तो इस देहसे दूसरी देहम चला
जाता है । तत्त्वदर्शी पुरुष अपनी तीव्र ओर सूक्ष्म
वुद्धिसे ही उसका दर्शन करते हें । विद्वान् पुरुष
शुद्ध एवं सात्विक आहार करके सदा रातके
पहले ओर पिछले पहरमें योगयुक्त तथा विशुद्ध-
चित्त होकर अपने भीतर ही आत्माका दर्शन
करता हे।
मनुष्यको सब प्रकारके उपायोंसे लोभ ओर
क्रोधको काबू करना चाहिये। सव स्ानोमें
यही पवित्र ज्ञान है ओर यही आत्मसंयम दै ।
लोभ ओर क्रोध सदा मनुष्यके श्रेयका विनाश
करनेको उद्यत रहते हं । अतः सर्वथा उनका
त्याग करना चाहिये। क्रोधसे सदा लक्ष्मीको
वचावे ओर मात्सर्यसे तपकौ रक्षा करे। मान
ओर अपमानसे विद्याको बचावे तथा प्रमादसे
आत्माको रक्षा करे। ब्रह्मन्! जिसके सभी कार्यं
कामनाओकि बवन्धनसे रहित होते है तथा त्यागके
लिये जिसने अपने सर्वस्वकौ आहुति दे दी है
वही त्यागी ओर वुद्धिमान् है । किसी भी प्राणीकी
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१५४
हिसा न करे, सबसे मैत्रीभाव निभाता रहे ओर
सग्रहका त्याग करके बुद्धिके द्वारा अपनी इन्द्रियोको
जीते। एेसा कार्य करे जिसमें शोकके लिये स्थान
न हो तथा जो इहलोक ओर परलोकमें भी
भयदायकः न हो। सदा तपस्यामे लगे रहकर
इन्दरियोका दमन तथा मनका निग्रह करते हुए
मुनिवृकत्तिसे रहे। आसक्तिके जितने विषय हँ, उन
सबमे अनासक्तं रहे ओर जो किसीसे पराजित
नहीं हुआ, उस परमेश्वरको जीतने (जानने या
प्राप्त करने) -को इच्छा रखे । इद्दियोसे जिन-जिन
वस्तुओंका ग्रहण होता है, वह सब व्यक्त है । यही
व्यक्तको परिभाषा हे । जो अनुमानके द्वारा कुर-
कुछ जानी जाय उस इद्दरियातीत वस्तुको अव्यक्त
जानना चाहिये । जबतक (ज्ञानकी कमीके कारण)
पूरा विश्वास न हो जाय, तबतक ज्ञेयस्वरूप
परमात्माका मनन करते रहना चाहिये ओर पूर्ण
विश्वास हो जानेपर मनको उसमे लगाना चाहिये
अर्थात् ध्यान करना चाहिये। प्राणायामके द्वारा
मनको वशमें करे ओर संसारकी किसी भी
वस्तुका चिन्तन न करे। ब्रह्मन्! सत्य ही त्रत,
तपस्या तथा पवित्रता है, सत्य ही प्रजाकी सृष्टि
करता हे । सत्यसे ही यह लोक धारण किया जाता
हे ओर सत्यसे ही मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते है९ ।
असत्य तमोगुणका स्वरूप है, तमोगुण मनुष्यको
नीचे (नरके) ले जाता है। तमोगुणसे ग्रस्त
मनुष्य अज्ञानान्धकारसे आवृत होनेके कारण
ज्ञानमय प्रकाशको नहीं देख पाते । नरकको तम
ओर दुष्प्रकाश कहते हैँ । इहलोककी सृष्ट
शारीरिक ओर मानसिक दुःखोंसे परिपूर्णं है । यहां
जो सुख हें वे भी भविष्यमें दुःखको ही लानेवाले
हे । जगत्को इन सुख-दुःखोंसे संयुक्त देखकर
संक्षिप्त नारदपुराण
विद्वान् पुरुष मोहित नहीं होते । बुद्धिमान् पुरुषको
चाहिये कि वह दुःखसे छूटनेका प्रयल करे ।
प्राणियोको इहलोक ओर परलोकमें प्राप्त होनेवाला
जो सुख हे, वह अनित्य है। मोक्षरूपी फलसे
बढ़कर कोई सुख नहीं हे । अतः उसीकी अभिलाषा
करनी चाहिये। धर्मके लिये जो शम-दमादि
सद्गुणोका सम्पादन किया जाता है, उसका
उदेश्य भी सुखकौ प्राति ही है । सुखरूप प्रयोजनकी
सिद्धिके लिये ही सभी कर्मोका आरम्भ किया
जाता है। किंतु अनृत (्ूठ) से तमोगुणका
प्रादुर्भाव होता है। फिर उस तमोगुणसे ग्रस्त
मनुष्य अधर्मके ही पीछे चलते है, धर्मपर नहीं
चलते। वे क्रोध, लोभ, मोह, हिंसा ओर असत्य
आदिसे आच्छादित होकर न तो इस लोकमें सुख
पाते है, न परलोकमें ही। नाना प्रकारके रोग,
व्याधि ओर उग्र तापसे पीडित होते हैँ। वध,
वन्धनजनित क्लेश आदिसे तथा भूख, प्यास ओर
परिश्रमजनित संतापसे संतप्त रहते हैँ। वर्षा,
ओंधी, अधिक गरमी ओर अधिक सर्दकि भयसे
चिन्तित होते हँ । शारीरिक दुःखोसे दुःखी तथा
बन्धु-धन आदिके नाश अथवा वियोगसे प्राप्त
होनेवाले मानसिक शोकोसे व्याकुल रहते हैँ ओर
जरा तथा मृत्युजनित कष्टसे या अन्य इसी प्रकारके
क्लेशोसे पीडित रहा करते हें । स्वर्गलोकमें जबतक
जीव रहता है सदा उसे सुख ही मिलता है । इस
लोकमें सुख ओर दुःख दोनों हँ । नरकमें केवल
दुःख-ही-दुःख बताया गया है । वास्तविक सुख
तो वह परमपद-स्वरूप मोक्ष ही है।
भददराजजी बोले ब्रह्यर्षियनि पूर्वकालमें जो
चार आश्रमोका विधान किया है, उन आश्रमेकि अपने-
अपने आचार क्या ह 2 यह बतानेकी कृपा करें ।
१. सत्यं व्रतं तपः शौचं सत्यं विसृजते प्रजा ॥ सत्येन धार्यते लोकः स्व: सत्येनैव गच्छति।
(ना० पूर्व० ६३ । ८१-८२)
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
भृगुजीने कहा-- मुने! जगत्का ।
करनेवाले भगवान् ब्रह्माजीने पहलेसे ही धर्मकी
रक्षाके लिये चार आश्र्मोका उपदेश किया है। उन्मेसे
गुरुकुलमें निवास ही पहला आश्रम बतलाया जाता
हे। इस आश्रममें शोच, संस्कार, नियम तथा त्रतके
नियमपूर्वक पालनमें चित्त लगाकर दोनों संध्याओकि
समय उपासना करनी चाहिये । सूर्यदेव तथा अग्निदेवका
उपस्थान करे। आलस्य छोड़कर गुरुको प्रणाम करे ।
गुरुमुखसे वेदका श्रवण ओर अभ्यास करके अपने
अन्तःकरणको पवित्र करे। तीनों समय स्नान करके
ब्रह्मचर्यपालन, अग्निहोत्र तथा गुरु-शुश्रूषा करे। प्रतिदिन
भिक्षा मोगे ओर भिक्षामें जो कुछ प्राप्त हो, वह सब
गुरुके अर्पित कर दे तथा अपने अन्तरात्माको भी
गुरुके चरणेमे अर्पित कर दे। गुरुके वचन ओर
आज्ञका पालन करनेमे कभी प्रतिकूलता न दिखाये- सदा
आज्ञापालनके लिये तेयार रहे तथा गुरुकी कृपासे प्राप्त
हुए वेद-शास्त्रौके स्वाध्यामें तत्पर रहे। इस विषयमे
यह उक्ति प्रसिद्ध है-जो द्विज गुरुकी आराधना
करके वेदका ज्ञान प्राप्त करता है, उसे स्वर्गरूप
फलकी उपलब्धि होती है ओर उसका सम्पूर्ण मनोरथ
सिद्ध हो जाता हे।
दूसरे आश्रमको गार्हस्थ्य कहते ह । उसके
सदाचारका जो स्वरूप है, उसकी पूर्णरूपसे व्याख्या
करगे! जो गुरुकुलसे लौटे हुए सदाचारपरायण सरातक
है ओर धर्मानुष्टानका फल चाहते है, उनके लिये
गृहस्थ-आश्रमका विधान हे। इसमे धर्म, अर्थं ओर
काम-तीनोकी प्राति होती है। यहा त्रिवर्ग-साधनकी
अपेक्षा रखकर निन्दित कर्मके परित्यागपूर्वक
उत्तम (न्याययुक्त) कर्मसे धनोपार्जन करे । वेदोके
स्वाध्यायद्रारा, उपलब्ध हई प्रतिष्ठासे अथवा
ब्रह्यर्पिनिर्मित मार्गसे प्राप्त हए धनके द्वार या
समुद्रसे उपलब्ध हए द्रव्यद्रारा अथवा नियमेकि
अभ्यास तथा देवतके कृपाप्रसादसे मिली हूईं सम्पचिद्राय
१५५
गृहस्थ पुरुष अपनी गृहस्थी चलावे। गृहस्थ-आश्रमको
सम्पूर्णं आश्रमोका मूल कहते है । गुरुकुलमें निवास
करनेवाले ब्रह्मचारी, संन्यासी तथा अन्य लोग जो
संकलित त्रत, निमय एवं धर्मका अनुष्ठान करनेवाले
है, उन सबका आधार गृहस्थ-आश्रम है। उनके
अतिरिक्त भी गृहस्थ-आश्रममें भिक्षा ओर बलिवैश्च.
आदिका वितरण चलता रहता हे। वनाप्रस्थोके लिये
भी आवश्यक द्रव्य-सामग्री गृहस्थाश्रमसे ही प्राप्त होती
है। प्रायः ये श्रेष्ठ पुरुष उत्तम पथ्य अन्नका सेवन करते
हुए स्वाध्यायके प्रसद्गसे अथवा तीर्थयात्राके लिये
देश-दर्शनके निमित्त इस पृथ्वीपर धूमते रहते है।
गृहस्थको उचित है कि उठकर उनकी अगवानी करे,
उनके चरणेमें मस्तक जुकाय, उनसे ईरप्यारहित वचन
बोले, उनके लिये आवश्यक वस्तुओंका दान करे,
उन्हें सुख ओर सत्कारपूर्वक आसन दे तथा उनके
लिये सुखसे सोने ओर खाने-पीनेको सुव्यवस्था करे।
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इस विषयमे यह उक्ति है-जिसके घरसे अतिथि
निराश होकर लौट जाता है, उसे वह अपना पाप दे
उसका पुण्य लेकर चला जाता हैः । इसके सिवा,
इस आश्रमम यज्च-कर्मोद्वारा देवता तृप्त होते है,
१. अतिधिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते। स दत्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति ॥
(ना० पूर्व० ४३। ११३)
((-0. 1/८1111(4/5511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
१५६.
संस्षिप्त नारदपुराण
श्राद्ध एवं तर्पणसे पितरोकी तृप्ि होती है, विद्याके
बार-बार श्रवण ओर धारणसे ऋषि संतुष्ट होते हँ ओर
संतानोत्पादनसे प्रजापतिको प्रसन्नता होती है। इस
विषयमं है-इस आश्रमम सम्पूर्ण भूतोके लिये
वात्सल्यका भाव होता हे। देवता ओर अतिधियोका
वाणीद्रारा स्तवन किया जाता हे। इसमें दूसरोको
सताना, कष्ट देना या कठोरता करना निन्दित है । इसी
तरह दूसरोको अवहेलना तथा अपनेमें अहंकार ओर
दम्भका होना भी निन्दित ही माना गया हे। अहिंसा,
सत्य ओर अक्रोध- ये सभी आश्रमके लिये तप है।
जिसके गृहस्थ-आश्रममें प्रतिदिन धर्म, अर्थ, कामरूप
त्रिवर्गका सम्पादन होता हे, वह इस लोकमें सुखका
अनुभव करके श्रेष्ठ पुरुषोंकी गतिको प्राप्त होता है । जो
गृहस्थ उञ्छवृत्तिसे रहकर अपने धर्मके पालनमें तत्पर
है ओर काम्यसुखको त्याग चुका है, उसके लिये
स्वर्गलोक दुर्लभ नहीं हे।
वानप्रस्थी भी धर्मका अनुष्ठान करते हए पुण्य
तीर्थो तथा नदियों ओर ज्जरेकि आसपास रहते रै;
वर्नोमिं रहकर तपस्या करते ओर घूमते है। ग्रामीण वस्त्र,
भोजन ओर उपभोगका वे त्याग कर देते है। जंगली
अन्न, फल, मूल ओर पत्तोका परिमित एवं नियमित
भोजन करते हे। अपने स्थानपर ही वेठते हैँ ओर पृथ्वी,
पत्थर, सिकता, ककड तथा बालुपर सो जते है । काश,
कुश, मृगचर्म तथा वल्कलसे ही अपने शरीरको ढकते
ह। केश, दादी, मछ, नख तथा लोम धारण किये रहते
हें । नियत समयपर स्नान करते ओर शुष्क बलिवैश्च एवं
होमका शास्त्रोक्त समयपर अनुष्न कसते है। समिधा,
कुशा, पुष्प-संचय तथा सम्मार्जन आदि कार्येपिं ही
विश्राम पाते है। सदी, गरमी तथा वायुके आघातसे उनके
शरीरकी साय त्वचार्एं फी होती है। अनेक प्रकारके
नियम ओर योगचर्यकि अनु्ठनसे उनके शरीरका मांस
ओर रक्त सूख जाता हे ओर वे अस्थि-चर्मावशिष्ट होकर
धर्यपर्वक सत्वगुणके योगसे शरीर धारण करते हे। जो
ब्रहर्षियोारा विहित इस व्रतचर्याका नियमपूर्वक पालन
करता हे, वह अग्रिकी भोति सम्पूर्ण दोषौको जला देता
हे ओर दुर्जय लोकोपर अधिकार प्राप्त कर लेता है।
अव संन्यासियोंका आचार बतलाया जाता है। धन,
स्त्री तथा राजोचित सामग्नियोमे जो अपना सेह बना
हुआ है, उस स््ेह-वन्धनको काटकर तथा अग्निहोत्र
आदि कर्मोका विधिपूर्वक त्याग करके विरक्त एवं
जिज्ञासु पुरुष संन्यासी होते है । वे ठेले, पत्थर ओर
सुवर्णको समान समञ्जते हे । धर्म, अर्थ ओर काममयी
प्रवृत्तियों उनकी बुद्धि आसक्त नहीं होती । शत्रु, मित्र
ओर उदासीनोके प्रति उनकी दृष्टि समान रहती है। वे
स्थावर, जरायुज, अण्डज ओर स्वेदज प्राणियोके प्रति
मन, वाणी ओर क्रियाद्वारा कभी द्रोह नहीं करते । उनका
कोई एक निवासस्थान नहीं होता । वे पर्वत, नदी-तट
वृक्ष मूल तथा देवमन्दिर आदि स्थानेमें ठहरते ओर
विचरते हुए कभी किसी समूहके पास जाकर रहते हँ
अथवा नगर या गोवमें विश्राम करते हे । क्रोध, दर्प, लोभ,
मोह, कृपणता, दम्भ, निन्दा तथा अभिमानके कारण उनसे
कभी हिंसा नहीं होती । इस विषयमे एेसा कहा है-जो
मुनि सम्पूर्ण भूतोको अभयदान देकर स्वच्छन्द विचरता ह
उसको कभी उन सब प्राणिर्योसे भय नहीं होताः ।
ब्राह्मण संन्यासी अग्रिहोत्रको अपने शरीरमें स्थापित
करके शरीररूपी अग्रिको तृप्त करनेके लिये भिक्षात्ररूपी
हविष्यकी आहुति अपने मुखमें डालता है ओर उसी
शरीरसंचित अग्रिद्रारा उत्तम लोकम जाता हे।
अपने संकल्पके अनुसार बुद्धिको संयममें रखनेवाला
जो पवित्र ब्राह्मण शास्त्रोक्तविधिसे संन्यास-आश्रममें
विचरता ठै, वह ईधनरहित अग्रिकी भति परम
शान्तिमय ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हे ।
कका 1 1२१0४०२
१. अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्वा यश्चरते मुनिः। न तस्य सर्वभूतेभ्यो भयमुत्पद्यते क्रचित् ॥ (ना० पूर्व° ४३। १२५)
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/81/81/185। (01661011. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
१५७
उत्तम लोक, अध्यात्मतत्तव तथा ध्यानयोगकका वर्णन
भरद्वाजजी बोले- महर्षे । इस लोकसे
एक लोक यानी प्रदेश सुना जाता है। मं उस
उत्तम लोकको जानना चाहता हूं आप उसके
विषयमे बतलानेकी कृपा कर ।
भृगुजीने कहा-उत्तरमें हिमालयके पास
सर्वगुणसम्पन्न पुण्यमय प्रदेश हे, जो पुण्यदायक,
क्षेमकारक ओर कमनीय है । वही “उत्तम लोक"
कहा जाता है। वहकि मनुष्य पापकर्मसे रहित,
पवित्र, अत्यन्त निर्मल, लोभ-मोहसे शून्य तथा
उपद्रवरहित हें । वह प्रदेश स्वगकि समान हे । वहां
सात्विक शुभ गुण बताये गये हैँ । वहाँ समय
आनेपर ही मृत्यु होती है (अकाल मृत्यु नहीं
होती) । रोग वहकि मनुष्योका स्पर्श नहीं करता।
वहां किसीके मनमें परायी स्त्रीके लिये लोभ नहीं
होता। सब लोग अपनी ही स्त्रीसे प्रेम रखनेवाले
हे। उस देशम धनके लिये दूसरोंका वध नहीं
किया जाता। उस प्रदेशमे अधर्म अच्छा नहीं माना
जाता। किसीको धर्मविषयक संदेह नहीं होता।
वहां किये हुए कर्मका फल प्रत्यक्ष मिलता है।
इस लोकमें तो किन्हीके पास जीवन-निर्वाहमात्रके
लिये सब सामग्री उपलब्ध हे ओर कोई-कोई बडे
परिश्रमसे जीविका चलाते ह । यहाँ कुछ लोग
धर्मपरायण ठै, कुछ लोग शठता करनेवाले हैँ
कोई सुखी हे, कोई दुःखी; कोई धनवान् है, कोई
निर्धन । इस लोकमें परिश्रम, भय, मोह ओर तीव्र
क्षुधाका कष प्राप्त होता है । मनुष्योके मनमें धनके
लिये लोभ रहता है, जिससे अस्ञानी पुरुष मोहित
होते हं । कपट, शठता, चोरी, परनिन्दा, दोषदृष्टि,
दूसरोपर चोट करना, हिंसा, चुगली तथा
मिथ्याभाषण-इन दुर्गुणोका जो सेवन करता है,
उसको तपस्या नष्ट होती है। जो विद्वान् इनका
१५८
आचरण नहीं करता उसकी तपस्या बढती है । इस
लोकमे धर्म ओर अधर्म-सम्बन्धी कर्मके लिये
नाना प्रकारकी चिन्ता करनी पड़ती है। लोकमें
यह कर्मभूमि है। यहां शुभ ओर अशुभ कर्मं
करके मनुष्य शुभ कर्मोका शुभ फल ओर अशुभ
कर्मोका अशुभ फल पाता है। पूर्वकालमें यहाँ
प्रजापति ब्रह्मा, अन्यान्य देवता तथा महर्षियोने
यज्ञ ओर तपस्या करके पवित्र हो ब्रह्लोक प्राप्त
किया था। पृथ्वीका उत्तरीय भाग सबसे अधिक
पवित्र ओर शुभ है । यहां जो पुण्य कर्म करनेवाले
मनुष्य हे, वे यदि सत्कार (शुभ फल) चाहते हैँ
तो पृथ्वीके उस भागमें जन्म पाते हैं । कुछ लोग
कमनुसार पशु-पक्षी आदिकी योनियोमें जन्म
लेते है, दूसरे लोग क्षीणायु होकर यहीं भृतलपर
नष्ट हो जाते हैं। जो एक-दूसरेको खा जानेके
लिये उद्यत रहते है, एेसे लोभ ओर मोहमें डवे
हुए मनुष्य यहीं चक्र लगाते रहते ह, उत्तर
दिशाको नहीं जाते। जो गुरुजनोंकी सेवा करते
ओर इन्दरियसंयमपूर्वक ब्रह्मचर्यके पालनमें तत्पर
होते है, वे मनीषी पुरुष सम्पूर्णं लोकोंका मार्ग
जानते ह । इस प्रकार मेने ब्रह्माजीके बताये हुए
धर्मका संक्षेपसे वर्णन किया है। जो जगत्के धर्म
ओर अधर्मको जानता ठै, वही बुद्धिमान् है।
भटट्वाजजीने कहा-- तपोधन ! पुरुषके शरीरें
अध्यात्म-नामसं जिस वस्तुका चिन्तन किया
जाता है, वह अध्यात्म क्याहै ओर कैसा है। यह
मुञ्चे बताइये ।
भृगुजी बोले ब्रह्यपं ! जिस अध्यात्मके तिषयमें
पृछ रहे हो, उसको व्याख्या करता दू । तात ! वह
अतिशय कल्याणकारी सुखस्वरूप टै । अध्यात्मज्ञानका
जो फल मिलता टै--वह है सम्पूर्णं प्राणि्योका
((-0. 1/८1111(4/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
९५८
हित। पृथ्वी, वायु, आकाश, जल ओर पाँचवाँ
तेज-ये पोच महाभूत है, जो सब प्राणियोँकी
उत्पत्ति ओर लयके स्थान है। जो भूत जिससे
उत्पन्न होते हैँ, वे फिर उसीमें लीन हो जाते हें ।
जेसे समुद्रसे लहर उठती है ओर फिर उसीमें
लीन हो जाती है, उसी प्रकार ये महाभूत क्रमशः
अपने-अपने कारणरूप अन्य भूतोंसे उत्पन्न होते
ओर प्रलयकाल आनेपर फिर उन्हीमे लीन हो
जाते हें। जसे कष्ुभआ अपने अङ्खोको फेलाकर
फिर उन्हें समेट लेता हे, उसी प्रकार भूतात्मा
परमेश्वर अपने रचे हए भूतोंको पुनः अपनेमे लीन
करते ह । महाभूत पांच ही हं । सम्पूर्णं प्राणियोकौ
उत्पत्ति करनेवाले परमात्माने समस्त प्राणियोमें
उन्दी पोंचों भूतोको भलीभाति नियुक्त किया है
कितु जीव उन परमात्माको नहीं देखता हे ।
शब्द, कान ओर शरीरके चछिद्र-ये तीनां
आकाशसे प्रकट हए हें! स्पर्श, चेष्टा ओर
त्वचा-ये तीन वायुके कार्य हें। रूप, नेत्र ओर
पाक-इन तीन रूपोमे तेजकी उपलब्धि कही
जाती हे। रस, क्लेद (गीलापन) ओर जिह्ा- ये
तीन जलके गुण बताये गये हैँ । गन्ध, नासिका
ओर शरीर-ये तीन भूमिके कार्य है । इन्दरियरूपमें
पच ही महाभूत हैँ ओर छठा मन हे । इस प्रकार
श्रोत्रादि पोच इन्द्रियोका ओर मनका ही परिचय
दिया गया हे। बुद्धिको सातवां तत्त्व कहा गया
हे । क्षेत्रज्ञ आठर्वाँ हे। कान सुननेके लिये ओर
त्वचा स्पर्शका अनुभव करनेके लिये है । रसका
आस्वादन करनेके लिये रसना (जिह्वा) ओर गन्ध
ग्रहण करनेके लिये नासिका हे। नेत्रका काम
देखना हे । मन संदेह करता दै । वुद्धि निश्चय
करनेके लिये है ओर क्षेत्रज्ञ साक्षीकी भांति स्थित
हे। दोनों पेरोसे ऊपर सिरतक-जो कुछ भी
नीचे-ऊपर है, सबको वह क्षेत्रज्ञ ही देखता हे ।
सस्षिप्त नारदपुराण
कषेत्रज्ञ (आत्मा) व्यापक है। इसने इस सम्पूर्ण
शरीरको बाहर-भीतरसे व्याप्त कर रखा दहै।
पुरुष ज्ञाता है ओर सम्पूर्णं इन्द्रियां उसके लिये
ज्ञेय हें; तम, रज ओर सतत्व-ये सारे भाव
पुरुषके आश्रित हें । जो मनुष्य इस अध्यात्मज्ञानको
जान लेता हे, वह भूतोके आवागमनका विचार
करके धीरे-धीरे उत्तम शान्ति पा लेता हे। पुरुष
जिससे देखता है, वह नेत्र है । जिससे सुनता है,
उसे श्रोत्र (कान) कहते हैं । जिससे सूंघता है,
उसका नाम प्राण (नासिका) है। वह जिह्वासे
रसका अनुभव करता है ओर त्वचासे स्पर्शको
जानता हे । बुद्धि सदा ज्ञान या निश्चय कराती है।
पुरुष जिससे कुछ इच्छा करता है, वह मन हे।
बुद्धि इन सबका अधिष्ठान है । अतः पोच विषय
ओर पच इन्धियां उससे पृथक् कही गयी हैँ । इन
सवका अधिष्ठाता चेतन क्षेत्रज्ञ इनसे नहीं देखा जाता।
प्रीति या प्रसन्नता सत्त्वगुणका कार्य हे । शोक
रजोगुण ओर क्रोध तमोगुण है। इस प्रकार ये तीन
भाव हें । लोकमें जो-जो भाव है, वे सब इन तीनों
गुणोमें आबद्ध ह । सत्त्व, रज ओर तम-ये तीन
गुण सदा प्राणियोके भीतर रहते है । इसलिये सव
जीवोमें सात्विकी, राजसी ओर तामसी-यह तीन
प्रकारकी अनुभूति देखी जाती हे । तुम्हारे शरीर
अथवा मनमें जो कुछ प्रसन्नतासे संयुक्त है, वह
सव सात्विक भाव है। मुनिश्रेष्ठ! जो कुछ भी
दुःखसे संयुक्त ओर मनको अप्रसन्न करनेवाला हं
उसे रजोगुणका ही प्रकाश समञ्चो । इससे अतिरिक्त
जो कुछ मोहसे संयुक्त हो ओर उसका आधार
व्यक्त न हो तथा जो ज्ञानमें न आता हो, वह
तमोगुण है-एेसा निश्चय करे । हर्ष, प्रीति, आनन्द,
सुख एवं चित्तको शान्ति-इन भावोको सात्विक
गुण समञ्लना चाहिये। असंतोष, परिताप, शोक,
लोभ तथा असहनशीलता- ये रजोगुणके चिह हं ।
((--0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/81185। (01661011. 14111260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
अपमान, मोह, प्रमाद, स्वप्र, तन्द्रा आदि भाव
तमोगुणके ही भिन्न-भिन्न कार्य हेँं। जो बहुधा
दोषको ओर जाता है, उस मनके दो स्वरूप
है- याचना करना ओर संशय । जिसका मन अपने
अधीन है, वह इस लोकम तो सुखी होता ही है,
मरनेके बाद परलोकमें भी उसे सुख मिलता हे।
सत्त्व (बुद्धि) तथा क्षेत्रज्ञ (पुरुष) - ये दोनों
सूक्ष्म हैँ । जिसे इन दोनोंका अन्तर (पार्थक्य)
ज्ञात हो जाता है, वह भी इहलोक ओर परलोकमें
सुखका भागी होता है। इनमें एक तो गुर्णोको
सृष्टि करता है ओर एक नहीं करता । सत्त्व आदि
गुण आत्माको नहीं जानते, किंतु आत्मा सब
प्रकारसे गुणोंको जानता है। यद्यपि पुरुष गुणका
द्रष्टामात्र है, तथापि बुद्धिके संसर्गसे वह अपनेको
उनका स्रष्टा मानता है। इस प्रकार सत्त्व ओर
पुरुषका संयोग हुआ है, कितु इनका पार्थक्य
निश्चित है। जब बुद्धि मनके द्वारा इन्द्रियरूपी
रखती है, उस समय आत्मा प्रकाशित होने लगता
है। जो मुनि प्राकृत कर्मोका त्याग करके सदा
१५९
आत्मामं ही रमण करता है, वह सम्पूर्ण भूतोका
आत्मा होकर उत्तम गतिको प्राप्त होता रहता है।
जैसे जलचर पक्षी जलसे लिप्त नहीं होता, उसी
प्रकार शुद्धवुद्धिपुरुष लिप्त नहीं होता । वह सम्पूर्ण
प्राणिर्योमें अनासक्तभावसे रहता है। इस प्रकार
अपनी बुद्धिद्वारा विचार करके मनुष्य अनासक्त-
भावसे व्यवहार करे। वह हर्ष-शोकसे रहित हो
सभी अवस्थाओंमें सम रहे । ईर्प्या-द्वेषको त्याग
दे। बुद्धि ओर चेतनकौ एकता है, यही हदयकी
सुदृढ ग्रन्थि है। इसको खोलकर विद्वान् पुरुष
सुखी हो जाय ओर संशयका उच्छेद करके सदाके
लिये शोक त्याग दे। जैसे मलिन मनुष्य गद्खामें
स्नान करके शुद्ध होते हँ, उसी प्रकार श्रेष्ठ विद्वान्
इस कज्लानगद्धामें गोता लगाकर निर्मल हो जाते
है-एेसा जानो । इस तरह जो मनुष्य इस उत्तम
अध्यात्म- ज्ञानको जानते है, वे कैवल्यको प्राप्त
होते है । एेसा समञ्जकर सब मनुष्य सम्पूर्ण भूतोके
आवागमनपर दृष्टि रखते हए बुद्धिपूर्वक विचार
करे। इससे धीरे-धीरे शान्ति प्राप्त होती हे।
जिनका अन्तःकरण पवित्र नहीं है, वे मनुष्य
भिन्न-भिन्न विषयोंकी ओर प्रवृत्त हुई इन्दियोमे
यदि पृथक्-पृथक् आत्माकी खोज करना चाहें तो
उन्हें इस प्रकार आत्माका साक्षात्कार नहीं हो
सकता। आत्मा तो इन सब इन्द्रिय, मन ओर
बुद्धिका साक्षी होनेके कारण उनसे परे है-एेसा
जान लेनेपर ही मनुष्य ज्ञानी हो सकता है। इस
तत्त्वको जान लेनेपर मनीषी पुरुष अपनेको कृतकृत्य
मानते ह । अज्ञानी पुरुषोंको जो महान् भय प्राप्त
होता है, वह ज्ञानिर्योको नहीं प्राप्त होता। जो
फलकी इच्छा ओर आसिका त्याग करके कर्म॑
करता है, वह अपने पूर्वकृत कर्मबन्धनको जला
देता है । एेसा पुरुष यदि कर्म करता है तो उसका
किया हुआ कर्म प्रिय अथवा अप्रिय फल नहीं
((-0. 1/८11114<511॥1 8118811 \/8181185। 01661101. 01411260 0 60810011
१६०
उत्पन्न कर सकता। यदि मनुष्य अपनी आयुभर
लोकको सताता है तो कर्ममें लगे हए उस
पुरुषका वह अशुभ कर्म उसके लिये यहाँ अशुभ
फल ही उत्पन्न करता हे । देखो, कुशल (पुण्य)
कर्म करनेसे कोई भी शोकमें नहीं पडता, परंतु
यदि उससे पाप वनता हे तो सदाके लिये भयपूर्ण
स्थान प्राप्त होता है।
भरद्राजजी बोले-- ब्रह्मन्! मुञ्चे अभयपदको
सिद्धिके लिये ध्यानयोग बताइये । जिस तत्त्वको
जानकर मनुष्य आध्यात्मिक, आधिदैविक ओर
आधिभोतिक तीनों तापोसे मुक्त हो जाता है
उसका मुञ्चे उपदेश कीजिये । |
भृगुजीने कहा- मुने! में तुम्हें ध्यानयोग
बतलाता दहं। (यद्यपि) वह चार प्रकारका हे
(किंतु यहां एक ही बताया जाता है), जिसे
जानकर महर्षिगण इस जगते शाश्वत सिद्धिको
प्राप्त होते हें। योगी लोग भलीभोति अभ्यासमें
लाये हुए ध्यानका जिस प्रकार अनुष्ठान करते हँ
वैसा ही ध्यान करके सानतृप्त महर्षिगण संसारदोषसे
मुक्त हो गये हें । उन मुक्त पुरुषोंका पुनः इस
संसारम आगमन नहीं होता। वे जन्मदोषसे रहित
हो अपने शुद्ध स्वरूपमें स्थित हो गये हैँ । उनपर
शीत-उष्ण आदि द्न्द्ोका प्रभाव नहीं पड़ता। वे
सदा अपने विशुद्ध स्वरूपमें स्थित, सब प्रकारके
बन्धनोसे मुक्त तथा परिग्रहशुन्य ह । अनासक्ति
आदि गुण मनको शान्ति प्रदान करनेवाले है ।
अनेक प्रकारक चिन्ताओंसे पीडित मनको
ध्यानके द्वारा एकाग्र करके ध्येय वस्तुमे स्थित
करे। इद्दियसमुदायको सब ओरसे समेट करके
ध्यानयोगी मुनि काष्टकी भति स्थित हो जाय।
कानसे किसी शब्दको न ग्रहण करे। त्वचासे
स्पर्शका अनुभव न करे। नेत्रसे रूप न देखे तथा
जिह्वासे रसोका आस्वादन न करे। नासिकाद्रारा
संक्षिप्त नारदपुराण
सब प्रकारके गन्धोंको ग्रहण करना भी त्याग दे।
पोंचों विषय पाचों इन्दरियोको मथ डालनेवाते हे ।
तत्त्ववेत्ता पुरुष ध्यानके द्वारा इन विषयोकी अभिलाषा
छोड़ दे । तदनन्तर सशक्त एवं बुद्धिमान् पुरुष पांच
इन्द्रियोको मनमे लीन करके पचो इद्धियोंसहित
इधर-उधर भटकनेवाले मनको ध्येय वस्तुमे एकाग्र
करे। मन चारों ओर विचरण करनेवाला हे।
उसका कोई दृढ आधार नहीं है । पाचों इन्धियोके
द्वार उसके निकलनेके मार्ग हें । वह अजितेन्द्रिय
पुरुषके लिये बलवान् ओर जितेन्द्रियके लिये
निर्बल हे। धीर पुरुष पूर्वोक्त ध्यानके साधनमें
शीघ्रतापूर्वक मनको एकाग्र करे। जब वह इन्द्रिय
ओर मनको अपने वशमें कर लेता है तो उसका
पूर्वोक्त ध्यान सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार मने
यहाँ प्रथम ध्यानमार्गका वर्णन किया हे।
इसके नाद् पहलेसे वशमें किया हुआ मनसहित
इन्दरियवर्ग पुनः अवसर पाकर स्फुरित होता है,
ठीक इसी तरह जैसे बादलमें बिजली चमकती
है । जिस प्रकार पत्तेपर रखी हुई जलकी बंद सब
ओरसे चञ्चल एवं अस्थिर होती है, उसी प्रकार
प्रथम ध्यानमागमिं साधकका चित्त भी चञ्चल होता
हे । क्षणभरके लिये कभी एकाग्र होकर कुछ देर
ध्यानमार्गमिं स्थिर होता है, फिर भ्रान्त होकर
वायुकी भति आकाशम दौड लगाने लगता ह।
परंतु ध्यानयोगका ज्ञाता पुरुष इससे ऊबे नहीं ।
वह क्लेश, चिन्ता, ईर्ष्या ओर आलस्यका त्याग
करके पुनः ध्यानके द्वारा चित्तको एकाग्र करे । प्रथम
ध्यानमार्गपर चलनेवाले मुनिके हदयमे विचार,
वितर्क एवं विवेकको -त्पत्ति होती हे। मन उद्विग्र
होनेपर उसका समाधान करे। ध्यानयोगी मुनि कभी
उससे चिन्न या उदासीन न हो। ध्यानद्वारा अपना
हित-साधन अवश्य करे। इन इन्ियोको धीरे-धीरे
शान्त करनेका प्रयत्न करे । क्रमशः इनका उपसंहार
((-0. 41114551 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
१६१
करे। एेसा करनेपर इनकी पूर्णरूपसे शान्ति हो | मनुष्य ध्यानके साधनमें रम जाता है । इस प्रकार
जायगी । मुनी श्वर ! प्रथम ध्यानमाग्मिं पंचं इन्दियों
ओर मनको स्थापित करके नित्य अभ्यास
करनेसे ये स्वयं शान्त हो जाते हँ । इस प्रकार
आत्मसंयम करनेवाले पुरुषको जिस सुखकी
प्राति होती हे, वह किसी लौकिक पुरुषार्थं ओर
१ 7 क |
ध्यानका अभ्यास करनेवाले योगीजन निरामय
मोक्षको प्राप्त होते हेँ।
सनन्दनजी कहते है -- ब्रह्मन्! महर्षिं भृगुके
इस प्रकार कहनेपर परम धर्मात्मा एवं प्रतापी
भरद्वाज मुनि बड़ विस्मित हुए ओर उन्होने
भृगुजीको बड़ी प्रशंसा कौ।
--#
पञ्चशिखवक्ा राजा जनकक्ो उपदेश
सूतजी कहते हैं -- ब्राह्यणो ! सनन्दनजीका
मोक्षधर्मसम्बन्धी वचन सुनकर तत्त्व नारदजीने
पुनः अध्यात्मविषयक उत्तम बात पृष्छी।
नारदजी बोले- महाभाग ! मेने आपके बताये
हए अध्यात्म ओर ध्यानविषयक मोक्ष-शास्त्रको
सुना, यह सब बार-बार सुननेपर भी मुञ्चे तृपि
नहीं हो रही है (अधिकाधिक सुननेकी इच्छा
बढ़ती जा रही है) । सर्वज्ञ मुने! जीव अविद्याके
बन्धनसे जिस प्रकार मुक्त होता है, वह उपाय
बताइये । साधु पुरुषोने जिसका आश्रय ले रखा है
उस मोक्ष-धर्मका पुनः वर्णन कीजिये।
सनन्दनजीने कहा-- नारद ! इस विषयमे विद्वान्
पुरुष इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते
ह । जिससे यह ज्ञात होता है कि मिथिलानेश
जनकने किस प्रकार मोक्ष प्राप्त किया था। यह
उस समयक बात है, जब मिधथिलामें जनकवंशी
राजा जनदेवका राज्य था। जनदेव सदा ब्रह्मकी
प्राति करानेवाले धर्मोका ही चिन्तन किया करते
थे । उनके दरवारमें एक सौ आचार्य बराबर रहा
करते थे, जो उन्हें भिन्नर-भित्न आश्रमोके धर्मोका
उपदेश देते रहते थे। “इस शरीरको त्याग देनेके
पश्चात् जीवको सत्ता रहती हे या नहीं 2 अथवा
देह-त्यागके वाद उसका पुनर्जन्म होता है या
नहीं 2" इस विषयमे उन आचार्योका जो सुनिश्चित
सिद्धान्त था, वे लोग आत्मतत्त्वके विषये जैसा
विचार उपस्थित करते थे, उससे शस्त्रानुयायी
राजा जनदेवको विशेष संतोष नहीं होता था। एक
वार कपिलाके पुत्र महामुनि पञ्चशिख सम्पूर्ण
पृथ्वीको परिक्रमा करते हुए मिथिलार्मे आ पहुंचे ।
वे सम्पूर्णं संन्यास-धममकि ज्ञाता ओर तत्तवज्ञानके
निर्णयमें एक सुनिश्चित सिद्धान्तके पोषक थे।
उनके मनम किसी प्रकारका संदेह नहीं था। वे
निर्द्र होकर विचरा करते थे। उन्हें ऋषियों
अद्वितीय बताया जाता है। कामना तो उन्हेंद्भी
नहीं गयी थी । वे मनुष्योके हदयमें अपने उपदेशद्रारा
अत्यन्त दुर्लभ सनातन सुखको प्रतिष्टा करना
चाहते थे। सांख्यके विद्वान् तो उन्हें साक्षात् प्रजापति
महर्षिं कपिलका ही स्वरूप समह्लते ह । उन्दँ
देखकर एेसा जान पडता था, मानो सांख्यशास्त्रके
प्रवर्तक भगवान् कपिल स्वयं पञ्चशिखके रूपमे
आकर लोगोको आश्चर्यमें डाल रहे है । उन्हँ आसुरि
मुनिका प्रथम शिष्य ओर चिरञ्जीवी बताया जाता
हे। एक समय उन्होने महर्षिं कपिलके मतका
अनुसरण करनेवाले मुनियोकी विशाल मण्डलीमें
जाकर सवमं अन्तर्यामीरूपसे स्थित परमार्थस्वरूप
अव्यक्त ब्रह्मके विपयमं निवेदन किया था ओर
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/81/81185। (01661010. 01411260 0 6810011
१६२
संक्षिप्त नारदपुराण
क्षेत्र तथा कषेत्रज्ञका अन्तर स्पष्टरूपसे जान लिया
था। यही नहीं, जो एकमात्र अक्षर एवं अविनाशी
ब्रह्य नाना रू्पोमिं दिखायी देता हे, उसका ज्ञान भी
आसुरिने उस मुनिमण्डलीमें प्राप्त किया था,
उन्हीके शिष्य पञ्चशिख थे, जो देव-कोरिके पुरुष
होते हुए भी मानवीके दृधसे पले थे। कपिला
नामको एक ब्राह्मणी थी, जो पति-पुत्र आदि
कुटुम्बके साथ रहती थी; उसीके पुत्रभावको प्राप्त
होकर वे उसके स्तनोंका दूध पीते थे। अतः
कपिलाका दूध पीनेके कारण उनकी कापिलेय
सं्ला हुई । उन्होने नैष्ठिक (ब्रह्यमें निष्ठा रखनेवाली)
बुद्धि प्राप्त को थी 1 कापिलेयकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें
यह बात मुञ्चे भगवान् ब्रह्माजीने बतायी थी।
उनके कपिलापुत्र कहलाने ओर सर्वज्ञ होनेका
यही उत्तम वृत्तान्त है। धर्मज्ञ पञ्चशिखने उत्तम
ज्ञान प्राप्त किया था। वे राजा जनकको सौ
आचार्योपर समान भावसे अनुरक्त जानकर उनके
दरबारमें गये । वर्ह जाकर उन्होने अपने युक्तियुक्त
वचनोंसे उन सब आचार्योको मोहित कर दिया।
उस समय महाराज जनक कपिलानन्दन पञ्चशिखका
ज्ञान देखकर उनके प्रति आकृष्ट हो गये ओर
अपने सौ आचार्योको छोडकर उन्हीके पीछे
चलने लगे। तब मुनिवर पञ्चशिखने राजाको
धर्मानुसार चरणोमं पड़ा देख उन्हें योग्य अधिकारी
मानकर परम मोक्षका उपदेश किया, जिसका
साख्य-शास्त्रमे वर्णन हे । उन्होने “ जातिनिर्वेद "९
का वर्णन करके ' कर्मनिर्वेद ^? का उपदेश किया।
तत्पश्चात् ' सर्वनिर्वेद'२ को बात बतायी। उन्होने
कहा- जिसके लिये धर्मका आचरण किया जाता
हे, जो क्मेकि फलका उदय होनेपर प्राप्त होता
है, वह इहलोक या परलोकका भोग नश्वर है।
उसपर आस्था करना उचित नहीं । वह मोहरूप
चञ्चल ओर अस्थिर है।
कुछ नास्तिक एेसा कहा करते है कि
' देहरूपी आत्माका विनाश प्रत्यक्ष देखा जा रहा
हे, सम्पूर्ण लोक इसका साक्षी है; फिर भी यदि
कोई शास्त्र-प्रमाणकी ओर लेकर देहसे भिन्न
आत्माकी सत्ताका प्रतिपादन करता है तो वह
परास्त ही है; क्योंकि उसका कथन लोकानुभवके
विरुद्ध है । आत्माके स्वरूपका अभाव हो जाना
ही उसको मृत्यु है। जो लोग मोहवश आत्माको
देहसे भिन्न मानते है, उनकी वह मान्यता ठीक
नहीं हे । यदि एेसी वस्तुका भी अस्तित्व मान
लिया जाय, जो लोकमें सम्भव नहीं है अर्थात्
यदि शास्त्रके आधारपर यह स्वीकार किया जाय
कि शरीरसे भिन्न कोई अजर-अमर आत्मा है, जो
स्वर्ग आदि लोकें दिव्य सुख भोगता है, तब तो
१. जन्मके समय गर्भवास आदिके कारण जो कष्ट होता है, उसपर विचार करके शरीरसे वैराग्य हाना “ जातिनिर्वेद' हे।
२. कर्मजनित क्लेश-नाना योनि्योकी प्राप्ति एवं नरकादि यातनाका विचार करके पाप तथा काम्य कर्मसि विरत होना
कर्मनिर्वेद' है। ३. इस जगत््की छोटी-से-छोरी
वस्तुभसे लेकर ब्रह्मलोकतकके भोगोकी क्षणभद्रूरता ओर दुःखरूपताका
विचार करके सव ओरसे विरक्त होना " सर्वानिर्वेद ' कहलाता है।
((-0. /11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
१६३
वदीलोग, जो राजाको अजर-अमर कहते रै,
उनको वह बात भी ठीक माननी पड़गी। सारांश
यह है कि जेसे वंदीलोग आशीर्वादमें उपचारतः
राजाको अजर-अमर कहते हे, उसी प्रकार
शास्त्रका वह वचन भी ओपचारिक ही है। नीरोग
शरीरको ही अजर-अमर ओर यहकि प्रत्यक्ष
सुख-भोगको ही स्वर्गीय सुख कहा गया है । यदि
आत्मा हे या नहीं- यह संशय उपस्थित होनेपर
अनुमानसे उसके अस्तित्वका साधन किया जाय
तो इसके लिये कोई एेसा ज्ञापक हेतु नहीं
उपलब्ध होता, जो कहीं व्यभिचरित न होता हो;
फिर किस अनुमानका आश्रय लेकर लोक-
व्यवहारका निश्चय किया जा सकता है। अनुमान
ओर आगम-इन दोनों प्रमाणोंका मूल्य प्रत्यक्ष
प्रमाण है। आगम या अनुमान यदि प्रत्यक्ष
अनुभवके विरुद्ध है तो वह कुछ भी नहीं है
उसको प्रामाणिकता स्वीकार नहीं को जा सकती ।
जिस किसी भी अनुमानमें ईश्वर, अदृष्ट अथवा
नित्य आत्माको सिद्धिके लिये कौ हई भावना भी
व्यर्थं है; अतः नास्तिकोके मतमें शरीरसे भिन्न
जीवका अस्तित्व नहीं हे, यह वात स्थिर हुई ।
जेसे वटवृक्षके बीजमें पत्र, पुष्प, फल, मूल तथा
त्वचा आदि अन्तर्हित होते ह, जेसे गायके द्वारा
खायी हुई घासमेसे घी, दूध आदि प्रकट हो जाते
है तथा जिस प्रकार अनेक ओषध-द्रव्योका पाक
एवं अधिवासन करनेसे उसमें नशा पैदा करनेवाली
शक्ति आ जाती है, उसी प्रकार वीर्यसे ही शरीर
आदिके साथ चेतनता भी प्रकट होती है।'
(इस नास्तिक मतका खण्डन इस प्रकार
समञ्जना चाहिये) मरे हए शरीरमं जो चेतनताका
अतिक्रमण देखा जाता है, वही देहातिरिक्त आत्मके
अस्तित्वमें प्रमाण है । यदि चेतनता देहका ही धर्म
होता तो मृतक शरीरमें भी उसकी उपलब्धि
होती । मृत्युके पश्चात् कुछ कालतक शरीर तो
रहता हे, पर उसमे चेतनता नहीं रहती। अतः
चेतन आत्मा शरीरसे भिन्न है-यह सिद्ध होता है।
नास्तिक भी रोग आदिक निवृत्तिके लिये मन््रजप
तथा तान्त्रिक-पद्धतिसे देवता आदिक आराधना
करते हे । वह देवता क्या है ? यदि पाञ्चभौतिक दै
तो घट आदिकौ भोति उसका दर्शन होना चाहिये
ओर यदि वह भौतिक पदार्थोसि भिन्न है तो
चेतनकी सत्ता स्वतः सिद्ध हो गयी । अतः देहसे
भिन्न आत्मा है- यह प्रत्यक्ष अनुभवसे सिद्ध हो
जाता है; ओर देह ही आत्मा है, यह प्रत्यक्ष
अनुभवके विरुद्ध जान पड़ता है । यदि शरीरकी
मृत्युके साथ आत्माकी भी मृत्यु मान ली जाय,
तव तो उसके किये हए कर्मोका भी नाश मानना
पडगा; फिर तो उसके शुभाशुभ कर्मोका फल
भोगनेवाला कोई नहीं रह जायगा ओर देहकी
उत्पत्तिमे अकृताभ्यागम (बिना किये हुए कर्मका
ही भोग प्राप्त हआ एेसा) माननेका प्रसङ्ग
उपस्थित होगा। ये सब प्रमाण यह सिद्ध करते हँ
कि देहातिरिक्त चेतन आत्माकी सत्ता अवश्य है ।
नास्तिकोकी ओरसे जो हेतुभूत दृष्टान्त दिये गये है,
वे मूर्तं पदार्थं हँ । मूर्तं जड-पदार्थसे मूर्तं जड-
पदार्थकी ही उत्पत्ति होती है-- यही उनके द्वारा
सिद्ध होता हे। जेसे काष्ठसे अग्रिको उत्पत्ति आदि।
पञ्चभूतोंसे आत्माकौ उत्पत्तिकी भोति यदि
मूर्तसे अमूर्तकी उत्पत्ति मानी जाय तो पृथ्वी आदि
मूर्तं भूतोंसे अमूतं आकाशकी भी उत्पत्ति स्वीकार
करनी पडेगी, जो असम्भव है। अतः स्थूल
भूतोके संयोगसे अमूर्तं चेतन आत्माकी उत्पत्ति
सर्वथा असम्भव है।
आत्माको सत्ता न माननेपर लोकयात्राका
निर्वाह नहीं होगा। दान, धर्मके फलकी प्राप्िके
लिये कोई आस्था नहीं रहेगी; क्योकि वैदिक
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शष
शब्द तथा लौकिक व्यवहार सब आत्माको ही
सुख देनेके लिये हें। इस प्रकार मनमें अनेक
प्रकारके तर्क उठते है ओर उन तर्को तथा
युक्तियोसे आत्माकी सत्ता या असत्ताका निर्धारण
कुछ भी होता नहीं दिखायी देता। इस प्रकार
विचार करते हुए भिन्न-भिन्न मतोंकी ओर दोडनेवाले
लोगोको बुद्धि कहीं एक जगह प्रवेश करती ठै
ओर वहीं वृक्षको भोति जड़ जमाये जीर्णं हो
जाती हे। इस प्रकार अर्थं ओर अनर्थसे सभी
प्राणी दुःखी रहते हैं। केवल शास्त्र ही उन्हें
खींचकर राहपर लाते हं, ठीक उसी तरह, जैसे
महावत हाथीपर अङ्कुश रखकर उन्हें कावृमे किये
रहते हँ । बहुत-से शुष्क हदयवाले लोग एेसे
विषयोंकी लिप्सा रखते है, जो अत्यन्त सुखदायक
हों; किन्तु इस लिप्सामे उन्हें भारी-से-भारी
दुःखोका ही सामना करना पड़ता है ओर अन्तमें
वे भोगोको छोड़कर मृत्युके ग्रास बन जाते हैँ । जो
एक दिन नष्ट होनेवाला है, जिसके जीवनका कुछ
ठिकाना नही, एेसरे अनित्य शरीरको पाकर इन
बन्धु-वान्धवों तथा स्त्री-पुत्रादिसे क्या लाभ है?
यह सोचकर जो मनुष्य इन सबको क्षणभरमें
वेराग्यूर्वक त्यागकर चल देता है, उसे मूत्युके
बाद फिर जन्म नहीं लेना पड़ता पृथ्वी, आकाश,
जल, अग्रि ओर वायु-ये सदा शरीरकी रक्षा
करते रहते हे, इस बातको अच्छी तरह समञ्च
लेनेपर इसके प्रति आसक्ति कैसे हो सकती है ?
जो एक दिन मृत्युके मुखमें पडनेवाला है, एेसे
शरीरसे सुख करां ?
पञ्चशिखने पिर कहा- राजन्! अब मेँ उस
परम उत्तम सांख्यशात्रका वर्णन करता हूं, जिसका
नाम है-सम्यड्मन (मनको संदेहरहित करनेवाला),
उसमें त्यागकौ प्रधानता हे । तुम ध्यान देकर सुनो।
उसका उपदेश तुम्हारे मोक्षमे सहायक होगा। जो
संक्षिप्त नारदपुराण
लोग मुक्तिके लिये प्रयलशील हों, उन सबको
चाहिये कि सम्पूर्ण सकाम कर्मोका ओर धन
आदिका भी त्याग करे। जो त्याग किये विना व्यर्थं
ही विनीत (शम-दमादि साधनोमें तत्पर) होनेका
ज्जूठा दावा करते हे, उन्हें दुःख देनेवाले अविद्यारूप
क्लेश प्राप्त होते रहते हे । शस्त्रोमें द्रव्यका त्याग
करनेके लिये यज्ञ आदि कर्म, भोगका त्याग करनेके
लिये त्रत, दैहिक सुखोके त्यागके लिये तप ओर
सब कुछ त्यागनेके लिये योगके अनुष्टानकी आज्ञा
दी गयी है। यही त्यागकी सीमा है। सर्वस्व-
त्यागका यह एकमात्र मार्ग ही दुःखोसे छुटकारा
पानेके लिये उत्तम बताया गया है । इसका आश्रय
न लेनेवालोंको दुर्गति भोगनी पड़ती हे।
छठे मनसहित पांच ज्ञानेनद्धिर्यां बतायी हँ,
जिनको स्थिति बुद्धिम है, इनका वर्णन करके
पोच कर्मेन्द्रियोका निरूपण करता हूं। दोनों हाथ
काम करनेवाली इन्द्रिय है। दोनों पैर चलने-
फिरनेका कार्य करनेवाली इन्द्रिय हैं। लिङ
मैथुन-जनक सुख ओर संतानोत्पादन आदिके
लिये हे। गुदा नामक इन्दरियका कार्य मलत्याग
करना है। वाकू्-इन्द्रिय शब्दविशेषका उच्चारण
करनेके लिये हे। मनको इन पचसे संयुक्त माना
गया हे । इस प्रकार पाच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मद्धिय
ओर मन-ये सब मिलकर ग्यारह इद्दियां हैँ । इन
सबको मनरूप जानकर बुद्धिके द्वारा शीघ्र इनका
त्याग कर देना चाहिये । श्रवणकालमें श्रोत्ररूपी
इन्द्रिय, शब्दरूपी विषय ओर चित्तरूपी कर्ता-इन
तीनका संयोग होता है। इसी प्रकार स्पर्श, रूप,
रस तथा गन्धके अनुभवकालमें भी इन्द्रिय, विषय
एवं मनका संयोग अपेक्षित है । इस तरह तीन-
तीनके पाच समुदाय हैँ । ये सब गुण कहे गये है ।
इनसे शब्दादि विषयोंका ग्रहण होता है ओर
इसीके लिये ये कर्ता, कर्म ओर करणरूपी त्रिविध
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 81188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
भाव वारी-वारीसे उपस्थित होते है । इनमेसे एक-
एकसे सात्विक, राजस ओर तामस तीन-तीन भेद
होते हें । हर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख ओर चित्तकी
शान्ति-ये सब भाव बिना किसी कारणके हों
किसी कारणवश होः, सात्विक गुण माने गये है ।
असंतोष, संताप, शोक, लोभ तथा क्षमाका अभाव-ये
किसी कारणसे हों या अकारण-रजोगुणके चिह ह ।
अविवेकः, मोह, प्रमाद, स्वप्र ओर आलस्य-ये किसी
तरह भी क्योंन हौ, तमोगुणके ही नाना रूप हैर।
जो इस मोक्ष-विद्याको जानकर सावधानीके
साथ आत्मतत्वका अनुसंधान करता है, वह जलसे
कमलके पत्तेकी भोति कर्मके अनिष्ट फलोसे कभी
लिप्त नहीं होता। संतानोके प्रति आसक्ति ओर
भित्न-भिन्न देवताअकि लिये सकाम यज्चोका अनु्न-ये
सब मनुष्यके लिये नाना प्रकारके दूद् बन्धन हें।
जव वह इन वन्धनसे दृूटकर दुःख-सुखको चिन्ता
छोड देता हे, उस समय सर्वश्रेष्ठ गति (मुक्ति) प्राप्त
कर लेता हे। श्रुतिके महावाक्योका विचार ओर
शास्त्रम बताये हए मद्गलमय साधनोका अनुष्ठान
करनेसे मनुष्य जरा तथा मृत्युके भयसे रहित होकर
सुखसे रहता हे । जव पुण्य ओर पापका क्षय तथा
उनसे मिलनेवाले सुखदुःखादि फलोका नाश हो
जाता दै, उस समय सब वस्तुओंको आसक्तिसे
१६५
रहित पुरुष आकाशके समान निर्लेप एवं निर्गुण
आत्माका साक्षात्कार कर लेता है। जो शरीरम
आसक्ति न रखकर उसके प्रति अपनेपनका अभिमान
त्याग देता हे, वह दुःखसे रूट जाता हे । जैसे वृक्षके
प्रति आसक्ति न रखनेवाला पक्षी जलमें गिरते हए
वृक्षको छोडकर उड् जाता है, उसी प्रकार जो
शरोरको आसक्तिको छोड चुका है, वह मुक्त पुरुष
सुख ओर दुःख दोनोंका त्याग करके उत्तम गतिको
प्राप्त होता हे।
आचार्य पञ्चशिखके बताये हुए इस अमृतमय
ज्ञानको सुनकर राजा जनक उसे पूर्णरूपसे विचार
करके एक निध्ित सिद्धान्तपर पर्हच गये ओर
शोकरहित हो बड़ सुखसे रटने लगे। फिर् तो उनकी
स्थिति एेसी हो गयी कि एक वार मिथिलानगरीको
आगसे जलती देखकर भूपालने स्वयं यह उद्गार
प्रकट किया कि “इस नगरके जलनेसे मेरा कुद भी
नहीं जलता।' महामुनि नारदजी! इस अध्यायं
मोक्षततत्वका निर्णय किया गया हे। जो सदा इसका
स्वाध्याय ओर चिन्तन करता रहता है, वह दुःख-
शोकसे रहित हो कभी किसी प्रकारके उपद्रवका
अनुभव नहीं करता तथा जिस प्रकार राजा जनक
पञ्चशिखके समागमसे इस ज्ञानको पाकर मुक्त हो गये
थे, उसी प्रकार वह भी मोक्ष प्राप्त करता हे।
(१0109
१. मनमें हर्ष, प्रीति आदि भावोंका उदय जव किसी अभीष्ट वस्तुक प्रापि आदिसे होता टदै तो उसे कारणवश
हआ कहा गया है ओर जव वैराग्य आदिसे स्वतः उक्तं भारवोका उदय हो तो उसे अकारण माना गया दै।
२. महाभारत शान्तिपर्व अध्याय २१८ ओर २१९ मं भी यही प्रसद्भ आया है! २१९ के २८ वँ श्लोकतक यह प्रसङ्ग
ज्यो-का-त्यों हे। इसके आगे महाभारतमें प्रह श्लोक अधिक टै, जो इस प्रसद्भकी दृष्टि अत्यन्त आवश्यक दहै । नाखदपुराणक
स्लोक सतहत्तरके बाद ही उन श्लोर्कोका भाव अपेक्षित टै। अतः प्रसङ्गको पूर्तिकि लिये यहां उन श्लोर्कौ॑मे कुक संक्षिप्त
भाव दिया जाता है।
'शव्दका आधार श्रत्रेद्धिय है अर् श्रोत्रेद्धियक्ा आधार आकाश ठै, अतः वह आकाशरूप ही दै। इमी प्रकार त्वचा, नेत्र,
जिह्व ओर नासिर्का भी क्रमशः स्पर्श, रूप, रस ओर गन्धका आश्रय तथा अपने आधारभूत महाभूतेकि स्वरूप ई । इन सबका
अधिष्ठन है मन; इसलिये सव्र-के-सव मनःस्वरूप है} क्योकि जब सव इद्धिर्योका कार्य एक समय प्रारम्भ होता दै, तब उन
सबके विषययोको एक साथ अनुभव केके लियं मन ही सवमं अनुगतरूपसं उपस्थित रहता है; अतः मनक्रो ग्यारदवीं इद्धिय
कहा गया है ओर बुद्धि वारहर्वीं मानी गयी दै । स प्रकार समस्त प्राणी अनादिं अविद्याकरे कारण स्वभावतः व्यवहारपरायण
हा रहे है । एसी दशामें जानद्रारा अविद्याकी निवृत्ति हो जाती दै । तव केवल सनातन आत्ा ही रह जाता है । जैसे नद ओर
समुद्रमें मिलकर अपने नाम-रूपक्रौ त्याग देती है, उसरी प्रकार समस्त प्राणी अपने नाम ओर रूपको त्यागकर
महत्स्वरूपमे प्रतिष्ठित देते ई । यदी उनका मोक्ष दै।
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संक्षिप्त नारदपुराण
त्रिविध तापोसरे छूटनेका उपाय, भगवान् तथा वासुदेव आदि शब्दोंकी व्याख्या,
परा ओर अपरा विद्याका निरूपण, खाण्डिक्य ओर केशिध्वजकी कथा,
केशिध्वजद्रारा अविद्याके बीजका प्रतिपादन
सूतजी कहते हे- महर्पियो ! उत्तम अध्यात्मज्ञान
सुनकर उदारवुदधि नारदजी बडु प्रसन्न हए।
उन्होने पुनः प्रश्र किया।
नारदजी बोले- दयानिधे ! में आपको शरणमे
हू्। मुने! मनुष्यको आध्यात्मिक आदि तीनों
तापोका अनुभव न हो, वह उपाय मुञ्चे बतलाहये।
सनन्दनजीने कहा- विद्वन्! गर्भम, जन्मकालमें
ओर बुदढापा आदि अवस्थाओमें प्रकर होनेवाले
जो तीन प्रकारके दुःख-समुदाय हँ, उनकी एकमात्र
अमोघ एवं अनिवार्य ओषधि भगवान्की प्राप्ति ही
मानी गयी हे। जव भगवत्प्राति होती है, उस
समय एेसे लोकोत्तर आनन्दकी अभिव्यक्ति होती
हे, जिससे बढ़कर सुख ओर आह्वाद कहीं हे ही
नहीं । यही उस भगवत्प्राप्तिको पहचान है । अतः
विद्वान् मनुप्योको भगवान्कौ प्रातिके लिये अवश्य
प्रयत्न करना चाहिये । महामुने! भगवत्प्रा्तिके दो
ही उपाय बताये गये ह- ज्ञान ओर (निष्काम)
कर्म। ज्ञान भी दो प्रकारका कहा जाता है। एक
तो शास्त्रके अध्ययन ओर अनुशीलनसे प्राप्त होता
हे ओर दूसरा विवेकसे प्रकर होता है । शब्दब्रह्म
अर्थात् वेदका ज्ञान शास्त्र्ञान है ओर परब्रह्
परमात्माका वोध विवेकजन्य ज्ञान है। मुनिश्रष्ठ।
मनुजीने भी वेदार्थकरा स्मरण करके इस विषयमें
जो कुछ कहा हे, उसे में स्पष्ट बताता हू सुनो।
जानने योग्य ब्रह्म दो प्रकारका है- एक शब्द्रह्
ओर दूसरा परब्रह्म । जो शब्दब्रह्म (शास्त्रजञान) -में
पारङ्गत हो जाता है, वह विवेकजन्य ज्ञानद्वारा
परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है*। अथर्ववेदकौ श्रुति
कहती है कि दो प्रकारकी विद्यां जानने योग्य
हे-- परा ओर अपरा। परासे निर्गुण-सगुणरूप
परमात्माकी प्रापि होती हे। जो अव्यक्त, अजर,
चेष्टारहित, अजन्मा, अविनाशी, अनिर्देश्य (नाम
आदिसे रहित), रूपहीन, हाथ-पैर आदि अद्धँसे
शून्य, व्यापक, सर्वगत, नित्य, भूतोका आदिकारण
तथा स्वयं कारणहीन हे, जिससे सम्पूर्णं व्याप्य
वस्तुं व्याप्त है, समस्त जगत् जिससे प्रकट हुआ
है एवं ज्ञानीजन ज्लानदृष्टिसे जिसका साक्षात्कार
करते हे, वही परमधामस्वरूप ब्रह्य है । मोक्षकौ
इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको उसीका ध्यान करना
चाहिये । वही वेदवाक्योद्वारा प्रतिपादित, अतिसुक्ष्म
भगवान् विष्णुका परम पद है। परमात्माका वह
स्वरूप ही " भगवत्" शब्दका वाच्यार्थं है ओर
` भगवत्" शब्द उस अविनाशी परमात्माका वाचक
कहा गया हे । इस प्रकार जिसका स्वरूप बतलाया
गया हे, वही परमात्माका यथार्थ तत्त्व है । जिससे
उसका ठीक-ठीक बोध होता हे, वही परा विद्या
अथवा परम ज्ञान है। इससे भिन्न जो तीनों वेद हैँ
उन्हे अपर ज्ञान या अपरा विद्या कहा गया हे।
ब्रह्मन्! यद्यपि वह ब्रह्म किसी शब्द या
वाणीका विषय नहीं है, तथापि उपासनाके लिये
` भगवान् इस नामसे उसका कथन किया जाता
हे । देवर्षे! जो समस्त कारणोका भी कारण है,
उस परम शुद्ध महाभृति नामवाले परतब्रह्मके लिये
ही भगवत् शब्दका प्रयोग हुआ ठै। ' भगवत्!
१. दवे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ (ना० पूर्व० ४६। ८)
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
१६७
शब्दके *भ' कारके दो अर्थ है-सम्भर्ता ( |
पोषण करनेवाला) तथा भर्ता (धारण करनेवाला) ।
मुने! "ग ' कारके तीन अर्थ है- गमयिता (प्रेरक),
नेता (सञ्चालक) तथा सरष्टा (जगत्की सृष्टि
करनेवाला) । 'भ' ओर 'ग' के योगसे "भग
शब्द बनता हे, जिसका अर्थ इस प्रकार है- सम्पूर्ण
एरय, सम्पूर्ण धर्म, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण श्री,
सम्पूर्ण ज्ञान तथा सम्पूर्णं वैराग्य-इन छःका नाम
' भग ' हे‹। उस सर्वात्मा परमेश्वरम सम्पूर्ण भूत-
प्राणी निवास करते हँ तथा वह स्वयं भी सब
भूतोमें वास करता है, इसलिये वह अव्यय
परमात्मा ही ' व ' कारका अर्थं है। साधुशिरोमणे।
इस प्रकार ` भगवान् ' यह महान् शब्द परब्रह्यस्वरूप
भगवान् वासुदेवका ही बोध करानेवाला है।
पूज्यपदका जो अर्थं है, उसको सूचित करनेकी
परिभाषासे युक्त यह भगवत्-शब्द परमात्माके
लिये तो प्रधानरूपसे प्रयुक्त होता है ओर दूसरोके
लिये गौणरूपसे। जो सब प्राणियोंकी उत्पत्ति ओर
प्रलयको, आवागमनको तथा विद्या ओर अविद्याको
जानता है, वही भगवान् कहलाने योग्य हे । त्याग
करने योग्य अवगुण आदिको छोडकर जो अलौकिक
ज्ञान, शक्ति, बल, एेशर्य, वीर्य ओर तेज आदि
सदुण हं, वे सभी भगवत् शब्दके वाच्यार्थ हं । उन
परमात्मामें सम्पूर्णं भूत वास करते हँ ओर वह भी
समस्त भूतोमे निवास करता है, इसीलिये उसे
` वासुदेव ' कहा गया हैर । पूर्वकालमें खाण्डिक्य
जनकसे उनके पषछनेपर केशिध्वजने भगवान्
अनन्तके वासुदेव नामको यथार्थं व्याख्या इस
१. एेश्र्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः । जानवैराग्ययोश्चव षण्णां
प्रकार कौ थी । परमात्मा सम्पूर्णं भृतोमें वास करते
हँ ओर वे भृतप्राणी भी उनके भीतर रहते है तथा
वे परमात्मा ही जगत्के धारण-पोषपण करनेवाले
ओर स्रष्टा हैँ; अतः उन सर्वशक्तिमान् प्रभुको
` वासुदेव ' कहा गया हेर। मुने! जो सम्पूर्ण
जगत्के आत्मा तथा समस्त आवरणोसे परे है, वे
परमात्मा सम्पूर्णं भूतोंको प्रकृति, प्राकृत विकार
तथा गुण ओर दोषोंसे ऊपर उठे हुए हैँ । पृथ्वी
ओर आकाशके बीचमें जो कुछ स्थित है, वह
सब उन्हीसे व्याप्त है। सम्पूर्णं कल्याणमय गुण
उनके स्वरूप हँ । उन्होने अपनी शक्तिके लेशमात्रसे
सम्पूर्ण भूतसमुदायको व्याप्त कर रखा ठै। वे
अपनी इच्छामात्रसे मनके अनुकूल अनेक शरीर
धारण करते हँ ओर सरे जगत्का हित-साधन
करते रहते हं । वे तेज, बल, एश्र्य, महान् जान,
उत्तम वीर्य ओर शक्तिं आदि गुणोकी एकमात्र
राशि हैं । प्रकृति आदिसे भी परे है ओर उन
समस्त कार्य-कारणोके स्वामी परमेश्वरे समस्त
क्लेशोका सर्वथा अभाव है। वे सवका शासन
करनेवाले ईश्वर है। व्यष्टि ओर समष्टि जगत्
उन्हींका स्वरूप है। वे ही व्यक्त टह ओरवेही
अव्यक्त। वे सवके स्वामी, सम्पूर्णं सृष्टिके ज्ञाता,
सर्वशक्तिमान् तथा परमेश्वर नामसे प्रसिद्ध है।
जिसके द्वारा निर्दोष, विशुद्ध निर्मल तथा एकरूप
परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार अथवा वोध
होता है, उसीका नाम ज्ञान है ओर इसके विपरीत
जो कुछ हे, वह अज्ञान कहा गया है । भगवान्
पुरुषोत्तमका दर्शन स्वाध्याय ओर संयमसे होता
भग इतीरणा ॥
(ना० पूर्° ४६ । १७)
२. उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम् । वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति॥
ज्ञानशक्तिबलैश्चर्यवीर्यतेजास्यशेषतः
सर्वाणि तत्र॒ भूतानि वसन्ति परमात्मनि । भूतेषु
। भगवच्छब्दवाच्यानि विना
हेयैर्गुणादिभिः ॥
वासुदेवस्ततः स्मृतः ॥
(ना० पूर्व ४६। २१-२३)
वसनादेव
३. भूतेषु वसते सोऽन्तर्वसन्त्यत्र॒ च तानि यद् ।धाता विधाता जगतां वासुदैवस्ततः प्रभुः॥
(ना० पूर्० ४६ । २५)
((-0. 1/८11114<511॥ 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 66810011
१६८
संक्षिप्त नारदपुराण
हे । ब्रह्मकौ प्रापिका कारण होनेसे वेदका भी नाम
ब्रह्म ही है। इसीलिये वेदोंका स्वाध्याय किया
जाता हे। स्वाध्यायसे योगका अनुष्ठान करे ओर
योगसे स्वाध्यायका अभ्यास करे। इस प्रकार
स्वाध्याय ओर योग-दोनों साधनोंका सम्पादन
होनेसे परमात्मा प्रकाशित होते हैँ । उनका दर्शन
करनेके लिये स्वाध्याय ओर योग दोनों नेत्र हैं।
नारदजीने पूछा-- भगवन्! जिसके जान लेनेपर
मं सर्वाधार परमेश्वरका दर्शन कर स्कं, उस
योगको मे जानना चाहता हूं । कृपा करके उसका
वर्णन कीजिये ।
सनन्दनजीने कहा-- पूर्वकालमें केशिध्वजने
महात्मा खाण्डिक्य जनकको जिस प्रकार योगका
उपदेश दिया था, वही मेँ तुम्हें बतलाता हूं ।
नारदजीने पूछा-- ब्रह्मन्! खाण्डिक्य ओर
केशिध्वज कौन थे? तथा उनमें योगसम्बन्धी
बातचीत किस प्रकार हुई थी?
सनन्दनजीने कहा-नारदजी ! पूर्वकालमें
धर्मध्वज जनक नामक एक राजा हो गये हेँ।
उनके वड् पुत्रका नाम अमितध्वज था। उसके
छोटे भाई कृतध्वजके नामसे विख्यात थे। राजा
कृतध्वज सदा अध्यात्मचिन्तनमें ही अनुरक्त रहते
थे। कृतध्वजके पुत्र केशिध्वज हुए। ब्रह्मन्! वे
अपने सद्ञ्ञानके कारण धन्य हो गये थे। अमितध्वजके
पुत्रका नाम खाण्डिक्य जनक था। खाण्डिक्य
कर्मकाण्डमें निपुण थे। एक समय केशिध्वजने
खाण्डिक्यको परास्त करके उन्हें राज्यसिंहासनसे
उतार दिया। राज्यसे भ्रष्ट॒होनेपर खाण्डिक्य
थोडी-सी साधन-सामग्री लेकर पुरोहित ओर
मन्त्रियोके साथ एक दुर्गम वनमें चले गये । इधर
केशिध्वजने ज्ञाननिष्ठ होते हए भी निष्कामभावसे
अनेक यज्ञोका अनुष्ठान किया। योगवेत्ताओमें श्रेष्ठ
नार्दजी ! एक समय केशिध््रज जव यज्ञम लगे
हुए थे, उनको दूध देनेवाली गायको निर्जन वनमें
किसी भयङ्कर व्याघ्रने मार डाला । व्याघ्रद्वारा गौको
मारी गयी जानकर राजाने ऋत्विजोंसे इसका
प्रायश्चित्त पूछा-' इस विषयमे क्या करना चाहिये ?'
ऋत्विज् बोले-' महाराज ! हम नहीं जानते । आप
कशेरुसे पूछ्िये ।' नारदजी ! जब राजाने कशेरुसे
यह बात पृषछी तो उन्होने भी वेसा ही उत्तर देते
हए कहा-' राजेन्द्र! मे इस विषयमे कुछ नहीं
जानता। आप शुनकसे पृचिये, वे जानते होगे।'
तव राजाने शुनकके पास जाकर यही प्रशन किया ।
मुने! प्रश्र सुनकर शुनकने भी वैसा ही उत्तर
दिया-' राजन्! इस विषयमे न तो कशेरु कुछ
जानते हं ओर न में। इस समय पृथ्वीपर दूसरा
कोई भी इसका ज्ञाता नहीं है । एक ही व्यक्ति इस
वातको जानता हे, वह है तुम्हारा शत्रु "खाण्डिक्य,
जिसे तुमने परास्त किया हे।' मुने! शुनककी यह
वात सुनकर राजाने कहा- अच्छा तो अब में अपने
शतुसे ही यह वात पषछछनेके लिये जाता हूं। यदि वह
मुञ्चे मारदेगातो भी इस यक्ञका फल तो प्राप्त ही
हो जायगा । मुनिश्रेष्ठ! यदि मेरा वह शत्रु पू्छनेपर
मुञ्ञे प्रायश्चित्त बतला देगा तब तो यह यज्ञ
साद्गोपाद्ग पूर्णं होगा ही।' एेसा कहकर राजा
केशिध्वज काला मृगचर्म धारण किये रथपर बैठे
ओर जहो महाराज खाण्डिक्य रहते थे, उस वनमे
गये। खाण्डिक्यने अपने उस शत्रुको आते देख धनुष
चदा लिया ओर क्रोधसे ओंखं लाल करके कहा।
खाण्डिक्य बोले- अरे! क्या तू काले मृगचर्मको
कवचके रूपमे धारण करके हमें मारेगा ?
केशिध्वजने कहा- खाण्डिक्यजी । मे आपसे
एक सदेह पृषछनेके लिये आया हूं। आपको
मारनेके लिये नहीं आया हूं
तदनन्तर परम बुद्धिमान् खाण्डिक्यने अपने
समस्त मन्त्रियों ओर पुरोहितके साथ एकान्तम
((-0. 1/1114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
सलाह को । मन्त्रियोने कहा-' यह शतु इस समय
हमारे वशमें हे, अतः इसे मार डालना चाहिये।
इसके मारे जानेपर यह सारी पृथ्वी आपके अधीन
हो जायगी ।' यह सुनकर खाण्डिक्य उन सबसे
बोले-' निःसंदेह एेसी ही बात है। इसके मारे
जानेपर यह सारी पृथ्वी अवश्य मेरे अधीन हो
जायगी । परंतु इसे पारलौकिक विजय प्राप्त होगी
ओर मुञ्चे सम्पूर्णं पृथ्वी। यदि इसे न माङ तो
पारलौकिक विजय मेरी होगी ओर इसे सारी
पृथ्वी मिलेगी । पारलौकिक विजय अनन्तकालके
लिये होती है तथा पृथ्वीकी जीत थोडे ही दिन
रहती है । इसलिये मँ तो इसे मारूगा नहीं । यह
जो कुछ पू्ेगा उसे बतलाऊगा।' एेसा निश्चय
करके खाण्डिक्य जनक अपने शत्रुके समीप गये
ओर इस प्रकार बोले-“ तुम्हं जो कुछ पूना हो
वह सब पृछ लो, मँ बताऊगा।' नारदजी।
खाण्डिक्यके एेसा कहनेपर केशिध्वजने होमसम्बन्धी
गायके मारे जानेका सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता
दिया ओर उसके लिये कोई त्रतरूप प्रायरिचत्त
पृछा! खाण्डिक्यने भी वह सम्पूर्णं प्रायरिचत्त
१६९
जिसका कि उसके लिये विधान था, केशिध्वजको
विधिपूर्वक बता दिया। सब बातें जान लेनेपर
महात्मा खाण्डिक्यकी आज्ञा ले केशिध्वजने
यज्ञभूमिको प्रस्थान किया ओर वहां पहुंचकर
८ क्रमशः प्रायश्चित्तका सारा कार्य पूर्ण किया। फिर
धीरे-धीरे यज्ञ समापतत होनेपर राजाने अवभृथस्नान
किया। तत्पश्चात् कृतकार्य होकर राजा केशिध्वजने
मन-ही-मन सोचा-' मैने सम्पूर्णं ऋत्वि्जोका
पूजन तथा सन सदस्योका सम्मान किया। साथ
ही याचकोंको भी उनकी मनोवाच्छित वस्तुएँ दीं ।
इस लोकके अनुसार जो कुछ कर्तव्य था वह सव
मेने पूरा किया। तथापि न जाने क्यों मेरे मनमें
एेसा अनुभव होता है कि मेरा कोई कर्तव्य अधूरा
रह गया हे ।' इस प्रकार सोचते-सोचते राजाके
ध्यानमें यह बात आयी कि मैने अभीतक
खाण्डिक्यजीको गुरुदक्षिणा नहीं दी है । नारदजी ।
तव वे रथपर बैठकर फिर उसी दुर्गम वनमें गये,
जहां खाण्डिक्य रहते थे। खाण्डिक्यने पुनः उन्हें
आते देख हथियार उठा लिया। यह देख राजा
केशिध्वजने कहा-“खाण्डिक्यजी ! क्रोध न कीजिये।
मै आपका अहित करनेके लिये नही, गुरुदक्षिणा
देनेके लिये आया हू। आपके उपदेशके अनुसार
मैने अपना यज्ञ भलीभति पूरा कर लिया हे।
अतः अब मँ आपको गुरुदक्षिणा देना चाहता हू ।
आपकी जो इच्छा हो, मांग लीजिये ।'
उनके एेसा कहनेपर खाण्डिक्यने पुनः अपने
मन्त्ियोसे सलाह ली ओर कहा-"यह मुञ्च
गुरुदक्षिणा देना चाहता है, म इससे क्या मोग? '
मन्त्रियोने कहा-* आप इससे सम्पूर्णं राज्य मोग
लीजिये।' तब राजा खाण्डिक्यने उन मन्तर्योसि
हंसकर कहा-' पृथ्वीका राज्य तो थोडे ही
समयतक रहनेवाला है, उसे मेरे-जैसे लोग कैसे
मोग सकते है? आपका कथन भी ठीक ही दहै,
((-0. 1/(11114/5511॥ 81188 \/8181185। 01661100. 01411260 0 6810011
१९७०
क्योकि आपलोग स्वार्थ-साधनके मन्त्री है । परमार्थं
क्या ओर केसा है 2 इस विषयमे आपलोगोको विशेष
ज्ञान नहीं हे।' एेसा कहकर वे राजा केशिध्वजके पास
आये ओर इस प्रकार बोले-' क्या तुम निश्चय ही
गुरुदक्षिणा दोगे ?' उन्होने कहा-* जी हँ ।' उनके
एसा कहनेपर खाण्डिक्यने कहा-“आप अध्यात्मज्ञानरूप
परमार्थविद्याके ज्ञाता हें। यदि मुञ्चे अवश्य ही
गुरुदक्षिणा देना चाहते हं तो जो कर्म सम्पूर्णं क्लेर्शोका
नाश करनेमे समर्थ हो, उसका उपदेश कीजिये ।'
केशिष्वजने पृच्छा- राजन्! आपने मेरा निष्कण्टक
राज्य क्यो नहीं मांगा ? क्योकि क्षत्रियोके लिये राज्य
मिलनेसे बढ़कर प्रिय वस्तु ओर कोई नहीं हे ।
खाण्डिक्य बोले-केशिध्वजजी ! मेने आपका
सम्पूर्णं राज्य क्यो नहीं मोगा, इसका कारण
सुनिये । विद्वान् पुरुष राज्यकी इच्छा नहीं करते।
षत्रियोका यह धर्महै कि वे प्रजाकी रक्षा करें
ओर अपने राज्यके विरोधियोका धर्मयुद्धके द्वारा
वध करे। में इस कर्तव्यके पालनमें असमर्थ हो
गया था, इसलिये यदि आपने मेरे राज्यका
अपहरण कर लिया है तो इसमें कोई दोषकी बात
नहीं हे। यह राजकार्यं अविद्या ही हि। यदि
समञ्पूर्वक इसका त्याग न किया जाय तो यह
बन्धनका ही कारण होती है। यह राज्यकी चाह
जन्मान्तरके कर्मोद्वारा प्राप्त सुख-भोगके लिये
होती है। अतः मुञ्चे राज्य लेनेका अधिकार नहीं
हे। इसके सिवा क्षत्रियोका किसीसे याचना करना
धर्म नहीं है । यह साधु पुरुषोका मत है । इसलिये
अविद्याके अन्तर्गत जो आपका यह राज्य है
उसको याचना मैने नहीं कौ है। जिनका चित्त
ममतासे आकृष्ट है ओर जो अहंकाररूपी मदिराका
पान करके उन्मत्त हो रहे है, वे अज्ञानी पुरुष ही
राज्यको अभिलाषा करते हे।
केशिध्वजने कहा- मे भी विद्यासे मृत्युके
संक्षिप्त नारदपुराण
पार जानेको इच्छा रखकर कर्तव्यबुद्धिसे राज्यको
रक्षा ओर निष्कामभावसे अनेक प्रकारके यज्ञोका
अनुष्टान करता हू । कुलनन्दन ! बड़ सोभाग्यकी बात
हे कि आपका मन विवेकरूपी धनसे सम्पन्न हुआ
हे, अतः आप अविद्याका स्वरूप सुनँ- अविद्यारूपी
वृक्षक उत्पत्तिका जो बीज है, यह दो प्रकारका
है-अनात्मामें आत्मवुद्धि ओर जो अपना नहीं है
उसे अपना मानना अर्थात् अहंता ओर ममता।
जिसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है तथा जो मोहरूपी
अन्धकारसे आवृत हो रहा हे, वह देहाभिमानी
जीव इस पाञ्चभौतिक शरीरम "में" ओर "मेरे"
पनको दृढ भावना कर लेता हे, परतु जब आत्मा
आकाश, वायु, अग्रि, जल ओर पृथ्वी आदिसे
सर्वथा पृथक् हे तो कौन बुद्धिमान् पुरुष शरीरमें
आत्मवुद्धि करेगा ? जब आत्मा देहसे परे है तो
देहके उपभोगमें आनेवाले गृह ओर क्षेत्र आदिको
कौन बुद्धिमान् पुरुष “ यह मेरा है ' एेसा कहकर
अपना मान सकता है 2 इस प्रकार इस शरीरके
अनात्मा होनेसे इसके द्वारा उत्पन्न किये हुए पुत्र,
पोत्र आदिमे भी कौन विद्वान् अपनापन करेगा?
मनुष्य सारे कर्म शरीरके उपभोगके लिये ही
करता हे; किंतु जव यह देह पुरुषसे भिन्न हे तो
वे कर्म केवल बन्धनके ही कारण होते हें । जेसे
मिद्रीके घरको मनुष्य मिद्री ओर जलसे ही
लीपते-पोतते ह, उसी प्रकार यह पार्थिव शरीर
भी अन्न ओर जलको सहायतासे ही स्थिर रहता
है। यदि पञ्चभूतोका बना हुआ यह शरीर पाञ्चभोतिक
पदार्थोसि ही पृष्ट होता है तो इसमें पुरुषके लिये
कौन-सी गर्वं करनेकी बात है। यह जीव अनेक
सहस्र जन्मोसे संसाररूपी मार्गपर चल रहा है
ओर वासनारूपी धूलसे आच्छादित होकर केवल
मोहरूपी श्रमको प्राप्त होता हे । सौम्य ! जिस समय
ज्ञानरूपी गरम जलसे इसको वह वासनारूपी धूल
((-0. 1\॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद १७१
धो दी जाती है, उसी समय इस संसारमार्गे | प्राप्त कर लेता है। यह ज्ञानमय विशुद्ध आत्मा
पथिकका मोहरूपी श्रम शान्त हो जाता हे। उस | निर्वाणस्वरूप ही हे। इस प्रकार मैने आपको अविद्याका
मोहरूपी श्रमके शान्त होनेपर पुरुषका अन्तःकरण | बीज बतलाया है। अविद्याजनित क्लेशको नष्ट
निर्मल होता हे ओर वह निरतिशय परम निर्वाणपदको । करनेके लिये योगके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं दै।
2.2
१ 7 7
मुक्तिप्रद योगका वर्णन
सनन्दनजी कहते है -- नारदजी ! केशिध्वजके
इस अध्यात्मज्ञानसे युक्त अमृतमय वचनको सुनकर
खाण्डिक्यने पुनः उन्हें प्रेरित करते हुए कहा।
खाण्डिक्य बोले- योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महाभाग
केशिध्वज ! आप निमिवंशमें योगशास्त्रके विशेष्
हे अतः आप उस योगका वर्णन कीजिये।
केशिध्वजने कहा- खाण्डिक्यजी ! में योगका
स्वरूप बतलाता हू, सुनिये। उस योगमें स्थित
होनेपर मुनि ब्रह्मम लीन होकर फिर अपने
स्वरूपसे च्युत नहीं होता। मन ही मनुष्योके
बन्धन ओर मोक्षका कारण हे। विषयोमें आसक्त
होनेपर वह बन्धनका कारण होता है ओर
विषयोंसे दूर हटकर वही मोक्षका साधक बन
जाता हे*। अतः विवेकन्ञानसम्पन्न विद्वान् पुरुष
मनको विषयोसे हटाकर परमेश्वरका चिन्तन करे।
जसे चुम्बक अपनी शक्तिसे लोहेको खींचकर
अपनेमें संयुक्त कर लेता हे, उसी प्रकार ब्रह्यचिन्तन
करनेवाले मुनिके चित्तको परमात्मा अपने स्वरूपमं
लीन कर लेता है। आत्मन्ञानके उपायभूत जो
यम-नियम आदि साधन है, उनकी अपेक्षा रखनेवाली
जो मनको विरि गति है, उसका ब्रह्मके साथ
संयोग होना ही ' योग ' कहलाता है । जिसका योग
इस प्रकारकौ विशेपतावाले धर्मे युक्त होता हे
वह योगी "मुमुक्षु कहलाता है । पहल-पहटल
योगका अभ्यास करनेवाला योगी “ युज्ञान ' कहलाता
हे। ओर जव उसे परब्रह्म परमात्माकी प्रापि हो
जाती ठे, तव वह !विनिष्पन्रसमाधि' (युक्त)
कहलाता हे। यदि किसी विघ्रदोपसे उस पूर्वोक्त
योगी (युञ्जान) -का चित्त दूषित हो जाता है तो
दूसरे जन्मोमे उस योगश्रष्टकी अभ्यास करते
रहनेसे मुक्ति हो जाती है। 'विनिष्पन्रसमाधि'
योगी योगको अग्रिसे अपनी सम्पूर्णं कर्मराशिको
भस्म कर डालता हे । इसलिये उसी जन्ममें शीघ्र
मुक्ति प्राप्त कर लेता है । योगीको चाहिये कि वह
अपने चित्तको योगसाधनके योग्य बनाते हए
ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय तथा अपरिग्रहका
निष्कामभावसे सेवन करे । ये पांच यम है। इनके
साथ शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा परब्रह्म
परमात्मामे मनको लगाना-इन पाच निय्मोका
पालन करे। इस प्रकार ये पांच यम ओर पच
नियम बताये गये हैं । सकामभावसे इनका सेवन
किया जाय तोये विशिष्ट फल देनेवाले होते है
ओर निष्कामभावसे करिया जाय तो मोक्ष प्रदान
करते हे।
यतलशील साधकको उचित है कि स्वस्तिक,
सिद्ध, पद्म आदि आसनोपेसे किसी एकका आश्रय
ले यम ओर नियम नामक गुणोंसे सम्पत्न हो
नियमपूर्वक योगाभ्यास करे! अभ्यासमे साधक जो
१.मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धस्य व्िषयासद्भि मुक्तिर्तिषयं तथा।
(ना० पूर्घ० ८४५। ४)
((-0. 1\/॥८11114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
९७२
संक्षिप्त नारदपुराण
प्राणवायुको वशमें करता हे, उस क्रियाको प्राणायाम
समञ्जना चाहिये। उसके दो भेद है-सबीज ओर
निर्बीज (जिसमें भगवानके नाम ओर रूपका आलम्बन
हो, वह सबीज प्राणायाम है ओर जिसमें ठेसा कोई
आलम्बन नहीं हे, वह निर्बीज प्राणायाम कहलाता
हे) । साधु पुरुषोके उपदेशसे प्राणायामका साधन
करते समय जब योगीके प्राण ओर अपान एक
दूसरेका पराभव करते (दवाते) हे, तब क्रमशः रेचक
ओर पूरक नामक दो प्राणायाम होते ह ओर इन
दोनोका एक ही समय संयम (निरोध) करनेसे
कुम्भक नामक तीसरा प्राणायाम होता है । राजन्।
जव योगी सबीज प्राणायामका अभ्यास करता है, तव
उसका आलम्बन सर्वव्यापी अनन्तस्वरूप भगवान्
विष्णुका साकाररूप होता है। योगवेत्ता पुरुष प्रत्याहारका
अभ्यास (इन्दियोको विषयोंको ओरसे समेटकर अपने
भीतर लानेका प्रयत्न) करते हए शब्दादि विषयमे
अनुरक्त हई इन्धियोको रोककर उन्हं अपने चित्तकी
अनुगामिनी बनावे। एेसा करनेसे अत्यन्त चञ्चल
इद्धियों भलीभोति वशमें हो जाती है । यदि इद्धया
वशमें नहीं हँ तो कोई योगी उसके द्वारा योगका साधन
नहीं कर सकता 1 प्राणायामसे प्राण-अपानरूप वायु
ओर प्रत्याहारसे इद्ि्योको अपने वशमें करके चित्तको
उसके शुभ आश्रयमें स्थिर करे।
खाण्डिक्यने पृछा- महाभाग ! बताहुये, चित्तका
वह शुभ आश्रय क्या हे, जिसका अवलम्बन करके
वह सम्पूर्ण दोषोकी उत्पत्तिको नष्ट कर देता है।
केशिध्वजने कहा-- राजन्! चित्तका आश्रय ब्रह्म
हे। उसके दो स्वरूप हँ मूर्तं ओर अमूर्तं अथवा
अपर ओर पर। भूपाल! संसारम तीन प्रकारकी
भावनां हँ ओर उन भावनाओकि कारण यह जगत्
तीन प्रकारका कहा जाता हे। पहली भावनाका नाम
` कर्मभावना' है, दूसरीका "ब्रह्मभावना ' हे ओर तीसरीका
"उभयात्मिका भावना" हे। इनमेंसे पहलीमें कर्मक
भावना होनेके कारण वह “कर्मभावात्मिका' हे,
दूसरीमं ब्रह्मको भावना होनेसे वह "ब्रह्मभावात्मिका'
कहलाती हे ओर तीसरीमे दोनों प्रकारकी भावना
होनेसे उसको "उभयात्मिका ' कहते हें । इस तरह तीन
प्रकारकी भावात्मक भावनां हे । ज्ञानी नेश! सनक
आदि सिद्ध पुरुष सदा ब्रह्मभावनासे युक्त होते हे।
उनसे भिन्न जो देवताओंसे लेकर स्थावर-जङ्गमपर्यन्त
सम्पूर्ण प्राणी है, वे कर्मभावनासे युक्त होते हे।
हिरण्यगर्भ, प्रजापति आदि सच्चिदानन्द ब्रह्मका बोध
ओर सृष्टिरचनादि कर्मोका अधिकार-दोनोसे युक्त है;
अतः उनमें ब्रह्मभावना एवं कर्मभावना दोनोकी ही
उपलब्धि होती हे।
राजन्! जवतक विशेष भेदज्ञानके हेतुभूत सम्पूर्ण
कर्म क्षीण नही हो जाते, तभीतक भेदद्श मनुष्योको
दृष्टिमि यह विश्च तथा परब्रह्म भिन्न-भिन्न प्रतीत होते
ह । जहां सम्पूर्णं भेदोका अभाव हो जाता है, जो
केवल सत् हे ओर वाणीका अविषय है तथा जो
स्वयं ही अनुभवस्वरूप हे, वही ब्रह्मज्ञान कहा
गया हे२। वही अजन्मा एवं निराकार विष्णुका
१. प्राणायामके तीन अङ्ग है- पूरक, रेचक ओर कुम्भक । नासिकाके एक चिद्रको वंद करके दूसरेसे जो वायुको
भीतर भरा जाता है, इस क्रियाको पूरक कहते हँ, इससे प्राणवायुका दबाव पड्नेसे अपानवायु नीचेकी ओर दबती है;
यही प्राणके द्वारा अपानका पराभव है । जव नासिकाके दूसरे छिद्रको वंद करके पहलेसे वायुको बाहर निकाला जाता
हि, उसे रेचक कहते है । इसमें प्राणवायुके बाहर निकलनेसे अपानवायु ऊपरको उठती है, यही अपानद्वार प्राणका पराभव
हे । भीतर भरी हुई वायुको जव नासिकाके दोनों छिद्र बंद करके कुछ कालतक रोका जाता है, उस समय प्राण ओर
अपान दोनों नियत स्थान ओर सीमां अवरुद्ध रहते है। यही इन दोनोका संयम या निरोध है। इसीका नाम कुम्भक है।
२. अक्षीणेषु समस्तेषु विशेषज्ञानकर्मसु । विश्वमेतत्परं चान्यद् भदधिन्नदृशां नृप॥
प्रत्यस्तमितभेदं यत् सत्तामात्रमगोचरम् । वचसामात्पसंवेद्यं तज्ज्ञानं ब्रह्यसंजितम्॥
(ना० पूर्व० ४७। २७-२८)
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
१७२
परम स्वरूप है, जो उनके विश्वरूपसे सर्वथा
विलक्षण हे । राजन्! योगका साधक पहले उस
निर्विशेष स्वरूपका चिन्तन नहीं कर सकता,
इसलिये उसे श्रीहरिके विश्वमय स्थूलरूपका ही
चिन्तन करना चाहिये । भगवान् दहिरण्यगभ, इन्द्र,
प्रजापति, मरुद्रण, वसु, रुद्र, सूर्य, तारे, ग्रह, गन्धर्व,
यक्ष ओर दैत्य आदि समस्त देव-योनि्योँ; मनुष्य,
पशु, पर्वत, समुद्र, नदी, वृक्ष, सम्पूर्णं भूत तथा
प्रधानसे लेकर विशेषपर्यन्त उन भूतोके कारण तथा
चेतन-अचेतन, एक पैर, दो पैर ओर अनेक पेरवाले
जीव तथा विना पैरवाले प्राणी-ये सवर भगवान्
विष्णुके त्रिविध भावनात्मक मूर्तरूप हं । यह सम्पूर्ण
चराचर जगत् परतब्रह्यस्वरूप भगवान् विष्णुका उनको
शक्तिसे सम्पन्न ' विश्च' नामक रूप हे ।
शक्ति तीन प्रकारकी बतलायी गयी है-परा,
अपरा ओर कर्मशक्ति। भगवान् विष्णुको पराशक्ति"
कहा गया है। क्षत्र" अपराशक्ति है तथा
अविद्याको कर्मनामक तीसरी शक्ति माना गया हे ।
राजन्। क्षेत्रज्ञ शक्ति सब शरीरोमे व्याप्त हे; परतु
वह इस असार संसारमें अविद्या नामक शक्तिसे
आवृत हो अत्यन्त विस्तारसे प्राप्त होनेवाले सम्पूर्ण
सांसारिक क्लेश भोगा करती हे। परम बुद्धिमान्
नरेश! उस अविद्या-शक्तिसे तिरोहित होनेके कारण
वह ्रेत्रज्ञ-शक्ति सम्पूर्णं प्राणिरयोमें तारतम्यसे
दिखायी देती है । वह प्राणहीन जड़ पदार्थोमं बहुत
कम है। उनसे अधिक वृक्ष-पर्वत आदि स्थावरोमें
स्थित है। स्थावरोंसे अधिक सर्पं आदि जीवोमें
ओर उनसे भी अधिक पक्षियों अभिव्यक्त हुई
है । पक्षियोकी अपेक्षा उस शक्तिमें मृग बदे-चदे
है ओर मृगोसे अधिक पशु हं । पशुओंको अपेक्षा
मनुष्य परम पुरुष भगवान्की उस श्ेत्र्ञ-शक्तिसे
अधिक प्रभावित हें । मनुप्योसे भी बद हुए नाग,
गन्धर्व, यक्ष आदि देवता ह । देवताओंसं भी इन्दर
ओर इन्द्रसे भी प्रजापति उस शक्तिम बद है।
प्रजापतिकी अपेक्षा भी हिरण्यगर्भं ब्रह्माजीमं भगवानूकों
उस शक्तिका विशेष प्रकाश हुआ हे। राजन्! ये
सम्पूर्ण रूप उस परमेश्वरके ही शरीर हं । क्योकि ये
सब आकाशकी भोति उनकी शक्तिसे व्याप्त हे।
महामते! विष्णु नामक त्रह्मका दूसरा अमूर्तं (निराकार)
रूप हे, जिसका योगीलोग ध्यान करते है ओर
विद्वान् पुरुष जिसे "सत्" कहते हें । जनेश्वर!
भगवान्का वही रूप अपनी लीलासे देव, तिर्यक्
ओर मनुष्य आदि चे्टाओंसे युक्त सर्वशक्तिमय रूप
धारण करता हे । इन रूपोमें अप्रमेय भगवान्को जो
व्यापक एवं अव्याहत चेष्टा होती ठे, वह सम्पूर्ण
जगत्के उपकारके लिये ही होती दै, कर्मजन्य नहीं
होती । राजन्! योगके साधकको आत्मशुद्धिके लिये
विश्ररूपभगवान्के उस सर्वपापनाशकर स्वरूपका ही
चिन्तन करना चाहिये । जेसे वायुका सहयोग पाकर
प्रज्वलित हई अग्रि ऊची लपटें उठाकर तृणसमृहको
भस्म कर डालती हे, उसी प्रकार योगियोके चित्तम
विराजमान भगवान् विष्णु उनके समस्त पापांकरो
जला डालते ह । इसलिये सम्पूर्णं शक्तियकि आधारभूत
भगवान् विष्णुम चित्तको स्थिर करे यही शुद्ध
धारणा है।
राजन्! तीनों भावनाओंसे अतीत भगवान् विष्णु
ही योगियोंकी मुक्तिके लिये इनके सव ओर
जानेवाले चञ्चल चित्तके शुभ आश्रय है । पुरुषसिंह ।
भगवानूके अतिरिक्त जो मनके दूसरे आश्रय सम्पूर्ण
देवता आदि है, वे सब अशुद्ध हं । भगवान्का
मूर्तरूप चित्तको दूसरे सम्पूर्ण आश्रयोसे निःस्पृह
कर देता है-चित्तको जो भगवान्में धारण करना-
स्थिरतापूर्वक लगाना टे, इसे ही ' धारणा" समञ्जन
चाहिये । नरेश! विना किसी आधारके धारणा नहीं
हो सकती; अतः भगवानूक्रे सगुण-साकार स्वरूपका
जिस प्रकार चिन्तन करना चाहिये, वह बतलाता
((-0. 1\/॥८11114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
१७४
हू, सुनो । भगवान्का मुख प्रसन्न एवं मनोहर हे ।
उनके नेत्र विकसित कमलदलके समान विशाल एवं
सुन्दर ह । दोनों कपोल बडे ही सुहावने ओर चिकने
हे। ललाट चौडा ओर प्रकाशसे उद्द्रासित है। उनके
दोनों कान बराबर है ओर उनमें धारण किये हए
मनोहर कुण्डल कंधेके समीपतक लटक रहे है । प्रीवा
शङ्ककी-सी शोभा धारण करती है। विशाल वक्षः-
स्थलमें श्रीवत्सका चिह सुशोभित हे। उनके उदरमें
तिरद्गाकार त्रिवली तथा गहरी नाभि है। भगवान्
विष्णु बड़ी-बड़ी चार अथवा आठ भुजा धारण
करते हें। उनके दोनों ऊरु तथा जंघे समानभावसे
स्थित ह ओर मनोहर चरणारविन्द हमारे सम्मुख
स्थिरभावसे खड हें । उन्होने स्वच्छ पीताम्बर धारण
कर रखा हे। इस प्रकार उन ब्रह्मस्वरूप भगवान्
विष्णुका चिन्तन करना चाहिये। उनके मस्तकपर
किरीट, गलेमें हार, भुजाओमें केयूर ओर हाथोमें कड़
आदि आभूषण उनकी शोभा बद्धा रहे ह । शार्खधनुष,
पाञ्चजन्य शङ्ख, कौमोदकी गदा, नन्दक खन्ध,
सुदर्शन चक्र, अक्षमाला तथा वरद् ओर अभयकी
१-तद्रूपप्रत्यया
संक्षिप्त नारदपुराण
मुद्रा-ये सब भगवानके करकमलोकी शोभा बद्ते हे।
उनकी अगुलि्येमें रलमयी मुद्रिकां शोभा दे रही हे।
राजन्! इस प्रकार योगी भगवानूके मनोहर स्वरूपम
अपना चित्त लगाकर तबतक उसका चिन्तन करता रहे,
जबतंक उसी स्वरूपमें उसकी धारणा दुढ न हो जाय।
चलते-फिरते, उटठते-बेटते अथवा अपनी इच्छके
अनुसार दूसरा कोई कार्य करते समय भी जब वह धारणा
चित्तसे अलग न हो, तब उसे सिद्ध हुई मानना चाहिये।
इसके दृट् होनेपर बुद्धिमान् पुरुष भगवान्के एसे
स्वरूपका चिन्तन करे, जिसमें शङ्ख, चक्र, गदा तथा
शार्ड्खं धनुष आदि आयुध न हों । वह स्वरूप परम
शान्त तथा अक्षमाला एवं यज्ञोपवीतसे विभूषित हो।
जब यह धारणा भी पूर्ववत् स्थिर हो जाय तो
भगवानूके किरीट, केयूर आदि आभूषणोसे रहित
स्वरूपका चिन्तन करे । तत्पश्चात् विद्वान् साधक अपने
चित्तसे भगवानूके किसी एक अवयव (चरण या
मुखारविन्द)-का ध्यान करे। तदनन्तर अवयर्वोका
चिन्तन छोड़कर केवल अवयवी भगवानके ध्यानम
तत्पर हो जाय । राजन्! जिसमे भगवान स्वरूपकी
ही प्रतीति होती हे, एेसी जो अन्य वस्तुओंकी इच्छासे
रहित ध्येयाकार चित्तकी एक अनवरत धारा रै,
उसीको "ध्यान ' कहते है । वह अपने पूर्व यम-नियम
आदि छः अद्खसे निष्पन्न होता है। उस ध्येय
पदार्थका ही जो मनके द्वारा सिद्ध होनेयोग्य कल्पनाहीनं
(ध्याता, ध्येय ओर ध्यानकी विपुटीसे रहित) स्वरूप
ग्रहण किया जाता है, उसे ही "समाधि" कहते हैः ।
राजन्! प्राप्त करनेयोग्य वस्तु है परब्रह्म परमात्मा ओर
उसके समीप पर्हंचानेवाला सहायक है पूर्वोक्त
समाधिजनित विज्ञान तथा उस परमात्मातक पर्हुंचनेका
पात्र है सम्पूर्ण कामनाओंसे रहित आत्मा । कषेत्रज्ञ कर्ता
चैकसंततिश्चान्यनिःस्पृहा। तद्ध्यानं प्रथमैरङ्खः षड्भिर्निष्पाद्यते नृप॥
तस्यैव कल्पनाहीनं स्वरूपग्रहणं हि यत्। मनसा ध्याननिष्पाद्यं समाधिः सोऽभिधीयते ॥
(ना० पूर्व० ४७1 ६६-६७)
((-0. 1/८111104/5511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
१७५
हे ओर ज्ञान करण है; अतः उस ज्ञानरूपी करणके द्वारा
वह प्रापक विज्ञान उस क्षत्रज्ञका मुक्तिरूप कार्य
सिद्ध करके कृतकृत्य होकर निवृत्त हो जाता हे।
उस समय वह भगवद्धावमयी भावनासे पूर्णं हो
परमात्मासे अभिन्न हो जाता हे। वास्तवमें क्षत्र
ओर परमात्माका भेद तो अञ्ञानजनित ही हे। भेद
उत्पन्न करनेवाले अज्ञानके सर्वथा नष्ट हो जानेपर आत्मा
ओर ब्रह्मे भेद नहीं रह जाता । उस दशामें भेदवुद्धि
कोन करेणा। खाण्डिक्यजी ! इस प्रकार आपके प्र्रके
अनुसार मेने संक्षेप ओर विस्तारसे योगका वर्णन किया।
अव में आपका दूसरा कोन कार्य करू?
खाण्डिक्य बोले- राजन्! आपने योगद्रारा
परमात्मभावको प्राप्त करनेके उपायका वर्णन किया।
इससे मेरा सभी कार्य सम्पन्न हो गया। आज आपके
उपदेशसे मेरे मनकी सारी मलिनता नए हो गयी।
मेने जो ' मेरे" शब्दका प्रयोग किया, यह भी असत्य
ही हे, अन्यथा ज्ञेय तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुप
तो यह भी नहीं कह सकते । “मं ' ओर मेरा" यह
वुद्धि तथा अहंता-ममताका व्यवहार भी अविद्या ही
हे। परमार्थं वस्तु तो अनिर्वचनीय टै, क्योकि वह
वाणीका विषय नहीं हैः । केशिध्वजजी ! आपने जो
इस अविनाशी मोक्षदायक योगका वर्णन किया है
इसके द्वारा मेरे कल्याणके लिये आपने सव कुछ
कर दिया।
सनन्दनजी कहते है-- ब्रह्मन्! तदनन्तर राजा
खाण्डिक्यने यथोचितरूपसे महाराज के शिध्वजका
पूजन किया ओर वे उनसे सम्मानित होकर पुनः
अपनी राजधानीमे लौट आये । खाण्डिक्य भगवान्
विष्णुमे चित्त लगाये हए योगसिद्धिके लिये
विशालापुरी (वदरिकाश्रम)-को चले गये। वहाँ
यम-नियम आदि गुणोंसे युक्त हो उन्होने भगवानूकी
अनन्यभावसे उपासना कौ ओर अन्तमें वे अत्यन्त
निर्मल परन्रह्म परमात्मा भगवान् विष्णुम लीन हो
गये । नारदजी ! तुमने आध्यात्मिक आदि तीनों
तापोंको चिकित्सके लिये जो उपाय पृचछा धा,
वह सव मेने वबताया।
राजा भरतका मृगरीरमें आसक्तिके कारण मृग होना, फिर ज्ञानसम्पन्न ब्राह्मण
होकर जडवृत्तिसे रहना, जडभरत ओर सोवीरनरेशका संवाद
नारदजी बोले- महाभाग। मेने आध्यात्मिक
आदि तीनों तापोको चिकित्साका उपाय सुन लिया
तथापि मेरा मन अभी भ्रमे भटक रहा हे। वह
शीघ्रतापूर्वक स्थिर नहीं हो पाता। ब्रह्मन्! आप
दूसरोको मान देनेवाले हें । बताइये, यदि दुष्टलोग
किसीके मनके विपरीत वर्ताव करें तो मनुष्य उसे
केसे सह सकता है?
सूतजी कहते है-- नारदजीका यह कथन
सुनकर ब्रह्मपुत्र सनन्दनजीको बड़ा हर्षं हुआ।
उन्हें राजा भरतके चरित्रका स्मरण हो आया ओर
वे इस प्रकार बोले।
सनन्दनजीने कटहा- नारदजी ! म इस विषयं
एक प्राचीन इतिहास कर्टरगा, जिसे सुनकर तुम्हारे
भ्रान्त मनको वदी स्थिरता प्राप्त होगी। मुनिश्रेष्ठ
प्राचीन कालम भरतनामसे प्रसिद्ध एक राजा हुए
ध, जो ऋषभदेवजीके पुत्र थे ओर जिनके नामपर
इस देशको * भारतवर्ष" कहते हैँ । राजा भरतने
वाप-दादोके क्रमसे चले आते हए राज्यको पाकर
१. अहं ममेत्यविद्येयं व्यवहारस्तथानयोः । परयार्धम्त्वसंलाप्यो वचसां गोचरो न यः; ॥
(ना० पूर्व० ४७। ५4)
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 8118811 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
९७६
उसका धर्मपूर्वक पालन किया। जेसे पिता अपने
पुत्रको संतुष्ट करता है, उसी प्रकार वे प्रजाको
प्रसन्न रखते थे। उन्होने नाना प्रकारके यज्ञोका
अनुष्टान करके सर्वदेतरस्वरूप भगवान् विष्णुका
यजन क्छिया। वे खदा भगवानृक्रा ही चिन्तन करते
ओर उन्हीमें मन लगाकर नाना सत्क्मेमिं लगे
रहते थे । तदनन्तर पुत्रको जन्म देकर विद्वान् राजा
भरत विषयोंसे विरक्त हो गये ओर राज्य त्यागकर
पुलस्त्य एवं पुलह मुनिके आश्रमको चले गये।
उन महर्षियोका आश्रम शालग्राम नामक महाक्षेत्रे
था। मुक्तिक इच्छा रखनेवाले बहुत-से साधक
उस तीर्थका सेवन करते थे । मुने! वहीं राजा भरत
तपस्यामे संलग्न हो यथाशक्ति पूजनसामग्री जुटाकर
उसके द्वारा भक्तिभावसे भगवान् महाविष्णुकी
आराधना करने लगे । नारदजी ! वे प्रतिदिन प्रातः-
काल निर्मल जलमें स्नान करते तथा अविनाशी
परत्रह्मको स्तुति एवं प्रणवसहित वेद-मन्त्रोका
उच्चारण करते हुए भक्तिपूर्वक सूर्यदेवका उपस्थान
करते थे। तदनन्तर आश्रमपर लौटते ओर अपने
ही लाये हुए समिधा, कुशा तथा मद्री आदि
द्रव्योसे ओर फल, फूल, तुलसीदल एवं स्वच्छ
जलसे एकाग्रतापूर्वक जगदीश्वर भगवान् वासुदेवकी
पूजा कसते थे। भगवानूकी पूजाके समय वे
भक्तिके प्रवाहमें डूब जाते थे।
एक दिनको बात है, महाभाग राजा भरत
प्रातःकाल स्नान करके एकाग्रचित्त हो जप करते
हुए तीन मुहूर्तं (छः घड़ी) -तक शालग्रामीके
जलमे खड. रहे । ब्रह्मन्! इसी समय एक प्यासी
हरिणी जल पीनेके लिये अकेली ही वनसे नदीके
तटपर आयी । उसका प्रसवकाल निकट था। वह
प्रायः जल पी चुकी थी, इतनेमें ही सब प्राणियोको
भय देनेवाली सिंहको गर्जना उच्यस्वरसे सुनायी
पडी । फिर तो वह उस सिंहनादसे भयभीत हो
संक्षिप्त नारदपुराण
2 = ५
= भ्र द्यी
म वस न
नदीके तटको ओर उछल पड़ी । बहुत ऊंचाईकी
ओर उछलनेसे उसका गर्भं नदीमें ही गिर पडा
ओर तरङ्गमालाओमें इूबता-उतराता हआ वेगसे
बहने लगा। राजा भरतने गर्भसे गिरे हए उस
मृगके बच्चेको दयावश उठा लिया। मुनीश्वर!
उधर वह हरिणी गर्भ गिरनेके अत्यन्त दुःखसे
ओर बहुत ऊचे चटनेके परिश्रमसे थककर एक
स्थानपर गिरे पड़ी ओर वहीं मर गयी। उस
हरिणीको मरी हुई देख तपस्वी राजा भरत मृगके
वच्वेको लिये हए अपने आश्रमपर आये ओर
प्रतिदिन उसका पालन-पोषण करने लगे। मुने।
उनसे पोषित होकर वह मृगका बच्चा बढ़ने लगा।
उस मृगमें राजाका चित्त जैसा आसक्त हो गया
था, वेसा भगवान भी नहीं हुआ। उन्होने अपने
राज्य ओर पुत्रको छोड़ा, समस्त भाई- बन्धुओंको
भी त्याग दिया, परंतु इस हरिनके वच्चेमे ममता
पैदा कर ली। उनका चित्त मृगकी ममताके
वशीभूत हो गया था; इसलिये उनकी समाधि भद्ध
हो गयी । तदनन्तर कुछ समय बीतनेपर राजा भरत
मृत्युको प्राप्त हृए। उस समय जैसे पुत्र पिताको
((-0. /८1114<511॥ 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 68110011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद १७७
उन्मत्त-सा ही प्रकट करते थे, भीगे हुए चने ओर
उड़द, बड़े, साग, जंगली फल ओर अन्नके दाने
देखता है, उसी प्रकार वह मृगका बच्चा
बहाते हुए उनको ओर देख रहा था। राजा भी
प्राणोका त्याग करते समय उस मृगकौ ही ओर
देख रहे थे। द्विजश्रेष्ठ ! मृगकी भावना करनेके
कारण राजा भरत दूसरे जन्ममें मृग हो गये। किंतु
पूर्वजन्मकौ बातोंका स्मरण होनेसे उनके मनमें
संसारको ओरसे वैराग्य हो गया। वे अपनी मोको
त्यागकर पुनः शालपग्राम-तीर्थमे आये ओर सूखे
घास तथा सूखे पत्ते खाकर शरीरका पोषण करने
लगे। एेसा करनेसे मृगशरीरकी प्राति करानेवाले
कर्मका प्रायश्चित्त हो गया; अतः वहीं अपने
शरीरका त्याग करके वे जातिस्मर (पूर्वजन्मकी
वातोका स्मरण करनेवाले) ब्राह्मणके रूपमे उत्पन्न
हुए। सदाचारी योगियोके श्रेष्ट एवं शुद्ध कुलमें
उनका जन्म हुआ। वे सम्पूर्णं विज्ञानसे सम्पन्न
तथा समस्त शास्त्रोके तत्त्वज्ञ हुए।
मुनिश्रेष्ठ । उन्होने आत्माको प्रकृतिसे परे देखा।
महामुने ! वे आत्मज्ञानसम्पन्न होनेके कारण देवता
आदि सम्पूर्णं भूतोको अपनेसे अभिन्न देखते थे।
उपनयनसंस्कार हो जानेपर वे गुरुके पाये हुए
वेद-शास्त्रका अध्ययन नहीं करते थे। किन्हीं
वेदिक कर्मोको ओर ध्यान नहीं देते ओर न
शास्त्रोका उपदेश ही ग्रहण करते थे। जब कोई
उनसे बहुत पृछ-ताछ करता तो वे जडके समान
गेवारोकी-सी वोलीमें कोई बात कह देते थे।
उनका शरीर मैला-कुचैला होनेसे निन्दित प्रतीत
होता था। मुने! वे सदा मलिन वस्र पहना करते
थे। इन सव कारणोंसे वहकि समस्त नागरिक
उनका अपमान किया करते थे। सम्मान योगसम्पत्तिकों
अधिक हानि करता है ओर दूसरे लोगोसे अपमानित
होनेवाला योगी योगमागमिं शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त
कर लेता है-एेसा विचार करके वे परम वुद्धिमान्
ब्राह्मण जन-साधारणमें अपने-आपको जड ओर
आदि जो-जो सामयिक खाद्य वस्तु मिल जाती,
उसीको बहुत मानकर खा लेते थे। पिताकी मृत्यु
होनेपर भाई-भतीजे ओर बन्धु-बान्धवोने उनसे
खेतीवारीका काम कराना आरम्भ किया। उन्हीके
दिये हुए सडे-गले अन्नसे उनके शरीरका पोषण
होने लगा। उनका एक-एक अद्ख वैलके समान मो
था ओर काम-काजमें वे जडकी भांति जुते रहते थे।
भोजनमात्र ही उनका वेतन था; इसलिये सब लोग
उनसे अपना काम निकाल लिया करते थे।
ब्रह्मन्। एक समय सौवीर-राजने शिविकापर
आरूढ हो इक्षुमती नदीके किनारे महर्षिं कपिलके
श्रेष्ठ आश्रमपर जानेका निश्चय किया था। वे
मोक्षधर्मके ज्ञाता महामुनि कपिलसे यह पृछछना
चाहते थे कि इस दुःखमय संसारमें मनुष्योके
लिये कल्याणकारी साधन क्या है? उस दिन
राजाको बेगारमें बहुत-से दूसरे मनुष्य भी पकड़े
गये थे। उन्हीके बीच भरतमुनि भी वेगारमें
पकड़कर लाये गये। नारदजी ! वे सम्पूर्णं ज्ञानके
एकमात्र भाजन थे। उन्हें पूर्वजन्मको बातोंका
स्मरण था; अतः वे अपने पापमय प्रारनब्धका क्षय
करनेके लिये उस शिविकाको कंथधेपर उठाकर
ढोने लगे। बुद्धिमानोमें श्रेष्ठ जडभरतजी (शुद्र
जीवोंको बचानेके लिये) चार हाथ अआगेकी भूमि
देखते हुए मन्दगतिसे चलने -लगे; किंतु उनके
सिवा दूसरे कहार जल्दी-जल्दी चल रहे थे।
राजाने देखा कि पालकी समान गतिसे नहीं चल
रही है, तो उन्होने कहा-' अरे पालकी ढोनेवाले
कहारो ! यह क्या करते हो ? सब लोग एक साथ
समान गतिसे चलो।' किंतु इतना कहनेपर भी
जब शिविकाको गति पुनः वैसी ही विषम
दिखायी दी, तब राजाने ङटकर पृछा-“ अरे! यह
((-0. 1/८11114<511॥1 8118811 \/81/81185। (01661101. 01411260 0 6810011
९७८
क्या हे? तुमलोग मेरी आज्ञाके विपरीत चलते
हो ?' राजाके बार-बार एेसे वचन् सुनकर पालकी
ढोनेवाले कहारोने जडभरतकी ओर संकेत करके
कहा- "यही धीरे-धीरे चलता हे ।'
राजाने पूछा- अरे! क्या तू थक गया ? अभी
तो थोड़ी ही दूरतक तूने मेरी पालकी ढोयी है।
क्या तुञ्चसे यह परिश्रम सहन नहीं होता ? वैसे तो
तू बड़ा मोया-ताजा दिखायी देता है।
ब्राह्मणने कहा-- राजन्! न में मोटा हूँ ओर
न मेने आपको पालकी ही ढोयी है। नतो मेँ
धका हू ओर न मुञ्ञे कोई परिश्रम ही होता है।
इस पालकोको ढोनेवाला कोई दूसरा ही है ।
राजा बोले- मोटा तो तू प्रत्यक्ष दिखायी देता
है ओर पालको तेरे ऊपर अब भी मौजूद है ओर
बोञ्च ढोनेमे देह धारियोंको परिश्रम तो होता ही है ।
ब्राह्मणने कहा- राजन्! इस विषयमे मेरी
वात सुनो। “सबसे नीचे पृथ्वी हे, पृथ्वीपर दो
पैर है, दोनाँ पैरोपर दो जद्कं है, उन जद्भपर दो
ऊरु हैँ तथा उनके ऊपर उदर है । फिर उदरके
ऊपर छाती, भुजाएं ओर कंधे है ओर कंधोंपर
यह पालको ररी गयी है । एेसी दशामें मेरे ऊपर
भार केसे रहा ? पालके भी जिसे तुम्हारा कहा
जाता हे, वह शरीर रखा हुआ है । राजन्! मै तुम
ओर अन्य सवर जीव पञ्चभूतोंद्रारा ही ढोये जाते
हे तथा यह भूतवर्गं भी गुणोके प्रवाहमें पड़कर
ही बहा जा रहा हे । पृथ्वीपते। ये सत्त्व आदि
गुण भी कर्मोकि वशीभूत है ओर वह कर्म
समस्त जीवोमें अविद्याद्रारा ही संचित है।
आत्मा तो शुद्ध, अक्षर, शान्त, निर्गुण ओर
प्रकृतिसे परे है। वह एक ही सम्पूर्णं जीरववोमे
व्याप्त है । उसकी वृद्धि अथवा हास कभी नहीं
होता। जव आत्मामे न तो वृद्धि होती है ओर
न हास ही, तव तुमने किस युक्तिसे यह बात
संक्षिप्त नारदपुराण
कही है कित् मोटा हे। यदि क्रमशः पृथ्वी, पैर,
जङ्घा, ऊरु, करि तथा उदर आदि अङ्खोपर
स्थित हुए कधेके ऊपर रखी हुई यह शिबिका
मेरे लिये भाररूप हो सकती है तो उसी प्रकार
तुम्हारे लिये भी तो हो सकती है। राजन्! इस
युक्तिसे तो अन्य समस्त जीवने भी न केवल
पालको उठा रखी है, बल्कि सम्पूर्णं पर्वत, वृक्ष,
गृह ओर पृथ्वी आदिका भार भी अपने ऊपर ले
रखा हे । राजन्! जिस द्रव्यसे यह पालकी बनी
हुड हे, उसीसे यह तुम्हारा, मेरा अथवा अन्य
सबका शरीर भी बना है, जिसमें सबने ममता
बढा रखी है ।
सनन्दनजी कहते है-एेसा कहकर वे
ब्राह्मणदेवता कधेपर पालकी लिये मौन हो गये।
तब राजाने भी तुरत पृथ्वीपर उतरकर उनके
दोनों चरण पकड लिये।
राजाने कहा--हे विप्रवर ! यह पालकी छोडकर
आप प्ररे ऊपर कृपा कौजिये ओर बताइये, यह
छद्मवेश धारण किये हुए आप कौन है ? किसके
पुत्र हं 2 अथवा आपके यहां आगमनका क्या
कारण हे 2 यह सब आप मुञ्जसे कहिये।
ब्राह्मण बोले- भूपाल! सुनो-मैं कौन हू,
यह बात बतायी नहीं जा सकती ओर तुमने जो
यहो आनेका कारण पृछा, उसके उत्तरम यह
निवेदन है कि कहीं भी आने-जानेका कर्मं
कर्मफलके उपभोगके लिये ही हुआ करता है।
धर्मधिर्मजनित सुख-दुःखोंका उपभोग करनेके
लिये ही जीव देह आदि धारण करता हे । भूपाल।
सब जीवोंकी सम्पूर्णं अवस्थाओंके कारण केवल
उनके धर्म ओर अधर्म ही है।
राजाने कहा- इसमे सदेह नहीं कि सब
क्मेकि धर्म ओर अधर्म ही कारण ह ओर
कर्मफलके उपभोगके लिये एक देहसे दूसरी देहमें
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद १७९
नृपश्रेष्ठ । इसमेसे लकड्योके समूहको अलग कर
दो ओर फिर खोजो--तुम्हारी पालकी कहां है 2
इसी प्रकार छातेकी शलाकाओं-(तिल्ियों-) को
पृथक् करके विचार करो, छाता नामकी वस्तु
कहां चली गयी ? यही न्याय तुम्हारे ओर मेरे
ऊपर लागू होता है (अर्थात् मेरे ओर तुम्हारे शरीर
जाना होता हे, किंतु आपने जो यह कहा कि
कोन हूं" यह बात बतायी नहीं जा सकती, इसी
बातको सुननेकी मुस्े इच्छा हो रही है।
ब्राह्मण बोले-- राजन्! अहं ' शब्दका उच्चारण
जिह्वा, दन्त, ओठ ओर तालु ही करते है, किंतु
ये सव “अहं नहीं हैँ; क्योकि ये सब उस
शब्दके उच्चारणमात्रमे हेतु हे । तो क्या इन जिह्वा | भी पञ्चभूतसे अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं है) ।
आदि कारणोके द्वारा यह वाणी ही स्वयं अपनेको | पुरुष, स्त्री, गाय, बकरी, घोडा, हाथी, पक्षी ओर
` अहं ' कहती हे ? नही; अतः एेसी स्थितिमें "तू | वृक्ष आदि लौकिक नाम कर्मजनितं विभिन्न
मोटा हे ' एसा कहना कदापि उचित नहीं । राजन्! | शरीरोके लिये ही रखे गये हैँ-एेसा जानना
सिर ओर हाथ-पैर आदि लक्षणोवाला यह शरीर | चाहिये। भूपाल! आत्मा न देवता है, न मनुष्य है, न
आत्मासे पृथक् ही है; अतः इस “अहं ' शब्दका | पशु है ओर न वृक्ष ही है। ये सब तो शरीरोंकी
प्रयोग में कहां ओर किसके लिये कर ? नृपश्रेष्ठ ! | आकृतियोके भेद हैँ, जो भिन्न-भिन्न ककि
यदि मुञ्चसे भिन्न कोई ओर भी सजातीय आत्मा | अनुसार उत्पन्न हुए हैँ । राजन्! लोकम जो राजा,
हो तो भी "यह में हू ओर यह अन्य है-एेसा | राजाके सिपाही तथा ओर भी जो-जो एेसी वस्तुं
कहना उचित हो सकता था। जब सम्पूर्णं शरीरोमें | हँ, वे सब काल्पनिक हैँ, सत्य नहीं हँ । नरेश!
एक ही आत्मा विराजमान है, तव “आप कौन हैँ | जो वस्तु परिणाम आदिके कारण होनेवाली किसी
ओर मे कौन हू" इत्यादि प्रश्रवाक्य व्यर्थ ही हैँ । | नयी संज्ञाको कालान्तरमें भी नहीं प्राप्त होती, वही
नरेश! (तुम राजा हो, यह पालको है ओर ये | पारमार्थिक वस्तु है। विचार करो, वह क्या है 2
सामने पालको ढोनेवाले खड़े हैँ तथा यह जगत् | तुम समस्त प्रजाके लिये राजा हो, अपने पिताके
आपके अधिकारमें है एेसा जो कहा जाता है, | पुत्र हो, शत्नुके लिये शत्रु हो, पल्नीके लिये पति
वह वास्तवमे सत्य नहीं है । वृक्षसे लकड़ी पैदा | ओर पुत्रके लिये पिता हो। भूपाल! बताओ, मँ
हई ओर उससे यह पालकी वनी, जिसपर तुम | तुम्हे क्या कहूं 2 महीपते! तुम क्या हो 2 यह सिर
बैठते हो। यदि इसे पालकौ ही कहा जाय तो | हो या ग्रीवा अथवा पेट या पैर आदि्मेसे कोई हो
इसका ' वृक्ष" नाम अथवा "लकड़ी" नाम कहाँ | तथा ये सिर आदि भी तुम्हारे क्या है ? पृथ्वीपते।
चला गया ? यह तुम्हारे सेवकगण एेसा नहीं कहते | तुम सम्पूर्णं अवयवस पृथक् स्थित होकर
कि महाराज पेड़पर चदे हुए हँ ओर न कोई तुम्हें | भलीभोति विचार करो कि यैं कौन दूँ। नेश।
लकडीपर ही चदा हुआ बतलाता हे। सब लोग | आत्म-तत्त्व जब इस प्रकार स्थित है, जब सबसे
पालकीमें ही वैठा हुआ बतलाते है; कितु पालकी | प्रथक् करके ही उसका प्रतिपादन किया जा
क्या है-लकदियोंका समुदाय । वही अपने लिये | सकता है, तो म उसे “ अहं ' इस नामसे कैसे ता
एक विशेष नामका आश्रय लेकर स्थित है। | सकता हूँ?
[ 1183 ] संर ना० पु०७-
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
१८०
संक्षिप्त नारदपुराण
जडभरत ओर सौवीरनरेशका संवाद-परमार्थका निरूपण तथा ऋभुका
निदाघको अद्वैतन्ञानका उपदेश
सनन्दनजी कहते है- नारदजी ! ब्राह्मणका
परमार्थयुक्त वचन सुनकर सौवीर-नरेशने विनयसे
नग्न होकर कहा ।
राजा बोले-- विप्रवर! आपने सम्पूर्ण जीवेपें
व्याप्त जिस विवेक-विज्ञानका दर्शन कराया है, वह
प्रकृतिसे परे ब्रह्मका ही स्वरूप है । परंतु आपने जो
यह कहा कि भे पालको नहीं ढोता हूं ओर न
मुञ्जपर पालकोका भार ही है । जिसने यह पालकी
उठा रखी है, वह शरीर मुङसे भिन्न है । जीवोंकी
प्रवृत्ति गुणोकी प्रेरणासे होती है ओर ये गुण
क्मेसि प्रेरित होकर प्रवृत्त होते ह। इसमें मेरा
कर्तृत्व क्या हे 2 परमार्थके ज्ञाता द्विजश्रेष्ठ । आपकी
वह बात कानमे पडते ही मेरा मन परमार्थका
जिज्ञासु होकर उसे प्राप्त करनेके लिये विहल हो
उठा है। महाभाग द्विज! में पहलेसे ही महर्षि
कपिलके पास जाकर यह पृछनेके लिये उद्यत
हुआ था कि इस जगत् श्रेय क्या है, यह मुख
बताइये । किंतु इसके बीचमें ही आपने जो ये बातें
कही है, उन्हे सुनकर मेरा मन परमार्थश्रवणके
लिये आपकी ओर दौड रहा है । महर्षिं कपिलजी
सर्वभूतस्वरूप भगवान् विष्णुके अंश हैँ ओर
संसारके मोहका नाश करनेके लिये इस पृथ्वीपर
उनका आगमन हुआ है-एेसा मुञ्चे जान पड़ता
हे। वे ही भगवान् कपिल मेरे हितकी कामनासे
यहां आपके रूपमें प्रत्यक्ष प्रकर हुए हैँ, तभी तो
आप एेसा भाषण कर रहे हैँ । अतः ब्रह्मन्! मेरे
मोहका नाश करनेके लिये जो परम श्रेय हो, वह
मुञ्ञे बताइये; क्योकि आप सम्पूर्णं विज्ञानमय
जलकी तरगोके समुद्र जान पडते हैँ ।
ब्राह्मणने कहा-- भूपाल! क्या तुम श्रेयकी ही
बात पूछते हो ? या परमार्थ जाननेके लिये प्रश्र करते
हो ? राजन्! जो मनुष्य देवताकी आराधना करके
धन-सम्पत्ति चाहता हे, पुत्र तथा राज्य (एवं
स्वर्ग)-की अभिलाषा करता है, उसके लिये तो वे
ही वस्तु श्रेय हे; परतु विवेकी पुरुषके लिये
परमात्माको प्राति ही श्रेय है। स्वर्गलोकरूप फल
देनेवाला जो यज्ञ आदि कर्म है, वह भी श्रेय ही है;
परतु प्रधान श्रेय तो उसके फलक इच्छा न करनेमें
ही हे। भूपाल! योगयुक्त तथा अन्य पुरुषोंको भी
सदा परमात्माका चिन्तन करना चाहिये; क्योकि
परमात्माका संयोगरूप जो श्रेय है, वही वास्तविक
श्रेय है । इस प्रकार श्रेय तो अनेक है, सैकड़ों ओर
हजारो प्रकारके है; कितु वे सब परमार्थं नहीं हँ ।
परमार्थ मं बतलाता हू, सुनो-यदि धन ही परमार्थ
होता तो धर्मके लिये उसका त्याग क्यों किया जाता
तथा भोगोको प्रा्िके लिये उसका व्यय क्यों किया
जाता ? नरेश्वर! यदि इस संसारम राज्य आदिक
((-0. 1/111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
१८१
प्राप्तिको परमार्थं कहा जाय तो वे कभी रहते हँ
ओर कभी नहीं रहते हें; इसलिये परमार्थको भी
आगमापायी मानना पड़गा। यदि ऋण्वेद, यजुर्वेद
ओर सामवेदके मन्त्रंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञकर्मको
तुम परमार्थं मानो तो उसके विषयमे मेँ जो कहता
हु, उसे सुनो । राजन्! कारणभूत मृत्तिकासे जो
कर्म उत्पन्न होता है, वह कारणका अनुगमन
करनेसे मृत्तिकास्वरूप ही समज्ञा जाता हे। इस
न्यायसे समिधा, घृत ओर कुशा आदि विनाशशील
द्रव्योद्रारा जो क्रिया सम्पादित होती है, वह भी
अवश्य ही विनाशशील होगी; परंतु विद्वान् पुरुष
परमार्थको अविनाशी मानते हे । जो क्रिया नाशवान्
पदार्थोसे सम्पन्न होती है, वह ओर उसका फल
दोनों निस्संदेह नाशवान् होते है । यदि निष्काम-
भावसे किया जानेवाला कर्म स्वर्गादि फल न
देनेके कारण परमार्थ माना जाय तो मेरे विचारसे
वह परमार्थभूत मोक्षका साधनमात्र है ओर साधन
कभी परमार्थ हो नहीं सकता (क्योकि वह साध्य
माना गया है) । राजन्! यदि आत्माके ध्यानको ही
परमार्थं नाम दिया जाय तो वह दूसरोसे आत्माका
भेद करनेवाला है; किंतु परमार्थमें भेद नहीं होता।
अतः राजन्! निस्संदेह ये सब श्रेय ही है, परमार्थ
नहीं । भूपाल ! अव में संक्षेपसे परमार्थका वर्णन
करता हू सुनो-
नरेश्वर ! आत्मा एक, व्यापक, सम, शुद्ध,
निर्गुण ओर प्रकृतिसे परे हे, उसमे जन्म ओर
वृद्धि आदि विकार नहं ह । वह सर्वत्र व्यापक
तथा परम ज्ञानमय है। असत् नाम ओर जाति
आदिसे उस सर्वव्यापक परमात्माका न कभी संयोग
हुआ, न है ओर न होगा ही। वह अपने ओर
दूसरेके शरीरोमें विद्यमान रहते हए भी एक ही
हे । इस प्रकारका जो विशेष ज्ञान है, वही परमार्थ
हे । दैतभावना रखनेवाले पुरुष तो अपरमार्थदशी
ही हें । जेसे बोसुरीमें एक ही वायु अभेदभावसे
व्याप्त हे; किंतु उसके छिद्रोके भेदसे उसमें षड्ज,
ऋषभ आदि स्वरोका भेद हो जाता है, उसी प्रकार
उस एक ही परमात्माके देव, मनुष्य आदि अनेक
भेद प्रतीत होते हैँ। उस भेदक स्थिति तो
अविद्याके आवरणतक ही सीमित है। राजन्! इस
विषयमे एक प्राचीन इतिहास सुनो-
निदाघ नामक ब्राह्मणको उपदेश देते हुए
महामुनि ऋभुने जो कुछ कहा था, उसीका इसमें
वर्णन हे । परमेष्टी ब्रह्माजीके एक ऋभु नामक पुत्र
हुए। भूपते! वे स्वभावसे ही परमार्थतत्त्वके ज्ञाता
थे । पूर्वकालमे पुलस्त्यमुनिके पुत्र निदाघ उनके
शिष्य हुए थे। ऋभुने वड़ी प्रसत्रताके साथ
निदाघको सम्पूर्णं तत्त्वज्ञानका उपदेश दिया था।
समस्त ज्ञानप्रधान शास्त्रोका उपदेश प्राप्त कर लेनेपर
भी निदाघकी अद्वितमें निष्ठा नहीं हुई । नरेश्वर! ऋभुने
निदाघकी इस स्थितिको ताड लिया था। देविका
नदीके तटपर वीरनागर नामक एक अत्यन्त समृद्धिशली
ओर परम रमणीय नगर था, उसे महर्षि पुलस्त्यने
वसाया था। उसी नगरमे पहले महर्षिं ऋभुके शिष्य
योगवेत्ता निदाघ निवास करते थे। उनके वहाँ रहते
हए जब एक हजार दिव्य वर्षं व्यतीत हो गये, तव
महर्षिं ऋभु अपने शिष्य निदाघको देखनेके लिये
उनके नगरमे गये। निदाघ बलिवैश्वदेवके अन्तमं
द्वारपर वैठकर अतिधियोंकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
वे ऋभुको पाद्य ओर अर्घ्य देकर अपने घरमे ले
गये ओर हाथ-पैर धुलाकर उन्हें आसनपर विटठाया।
तत्पश्चात् द्विजश्रेष्ठ निदाघने आदरपूर्वकं कहा-
“ विप्रवर ! अव भोजन कीजिये ।'
ऋभु बोले-- द्विजश्रेष्ठ ! आपके घरमे भोजन
करने योग्य जो-जो अन्न प्रस्तुत हो, उसका नाम
वबतलाइये ।
निदाधने कटहा-- द्विजश्रेष्ठ! मेरे घरमे सत्तु
((-0. 1/८1111(4<511॥1 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
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संक्षिप्त नारदपुराण
जौकी लपसी ओर बाटी बनी है। आपको इनमेंसे
जो कुछ रुचे, वही इच्छानुसार भोजन कीजिये ।
ऋभु बोले-- ब्रह्मन्! इन सबमें मेरी रुचि
नहीं हे । मुञ्चे तो मीठा अन्न दो । हलुआ, खीर ओर
खोंडके बने हुए पदार्थ भोजन कराओ।
निदाघने अपनी स्त्रीसे कहा- शोभने! हमारे
घरमे जो अच्छी-से-अच्छी भोजन-सामग्री उपलब्ध
हो, उसके द्वारा इन अतिथि-देवताके लिये मिष्टान्न
बनाओ।
पतिके एेसा कहनेपर ब्राह्मणपत्नीने स्वामीकी
आज्ञाका आदर करते हुए ब्राह्मण देवताके लिये
मीठा भोजन तेयार किया। राजन्! महामुनि ऋभुके
इच्छानुसार मिष्टान्न भोजन कर लेनेपर निदाघने
विनीतभावसे खड होकर पूरछछा।
निदाध बोले-- ब्रह्मन्! किये, भोजनसे आपको
भली भोति तृपति हुई 2 आप संतुष्ट हो गये न ? अव
आपका चित्त पूर्णतः स्वस्थ है न 2 विप्रवर! आप
कहकि रहनेवाले हैँ, कर्हां जानेको उद्यत हँ ओर
कहोसे आपका आगमन हुआ है ? यह सव बताइये ।
ऋभुने कहा-- ब्रह्मन्! जिसे भूख लगती है
उसीको अनन भोजन करनेपर तृति भी होती हे।
मुञ्चे तो न कभी भूख लगी ओर न तृपति हुई । फिर
मुञ्चसे क्यों पृते हो 2 जठराग्रिसे पार्थिव धातु
(पहलेके खाये हए पदार्थ) -के पच जानेपर
क्षुधाको प्रतीति होती है। इसी प्रकार पिये हुए
जलके क्षीण हो जानेपर मनुष्योको प्यासका
अनुभव होता हे । द्विज! ये भूख ओर प्यास देहके
ही धर्म हं, मेरे नहीं। अतः मुञ्ञे कभी भूख
लगनेको सम्भावना ही नहीं हे । इसलिये मुञ्चे तो
सर्वदा तृपति रहती ही हे । ब्रह्मन्! मनकी स्वस्थता
ओर संतोष-ये दोनों चित्तके धर्म (विकार) है।
अतः आत्मा इन ध्मेसि संयुक्त नहीं होता ओर
तुमने जो यह पूरा है कि आपका निवास करां
है, आप कहां जार्यगे ओर आप कँसे आते
हे-इन तीनों प्रश्रोके विषयमे मेरा मत सुनो।
आत्मा सबमें व्याप्त हे। यह आकाशकी भाति
सर्वव्यापक हे, अतः इसके विषयमे करसि आये,
कहां रहते हँ ओर कहाँ जायँगे-- यह प्रश्र कैसे
सार्थक हो सकता हे ? इसलिये मे न जानेवाला हुँ
ओर न आनेवाला। (तू, में ओर अन्यका भेद भी
शरीरको लेकर ही है) वास्तवमें नतूतूहै, न
अन्य अन्यदहे ओरनमें में हूं (केवल विशुद्ध
आत्मा ही सर्वत्र विराजमान है)। इसी प्रकार
मीठा भी मीठा नहीं हे। मैने जो तुमसे मिष्टानके
लिये पृछा था उसमें भी मेरा यही भाव था कि
देखू ये क्या कहते है । द्विजश्रेष्ठ । इस विषयमें मेरा
विचार सुनो। मीठा अन्न भी तृप्त हो जानेके बाद
मीठा नहीं लगता तो वही उद्वेगजनक हो जाता हे।
कभी-कभी जो मीठा नहीं है, वह भी मीठा
लगता है अर्थात् अधिक भूख होनेपर फीका अन्न
भी मीठा (अमृतके समान) लगता है। एेसा
कोन-सा अन्न हे, जो आदि, मध्य ओर अन्त-- तीनों
कालमें रुचिकर ही हो। जेसे मिट्रीका घर
मिट्रीसे लिपनेपर स्थिर होता हे, उसी प्रकार यह
पार्थिव शरीर पार्थिव परमाणुओंसे पृष्ट होता हे।
जौ, गेह, मूंग, घी, तेल, दृध, दही, गुड ओर
फल आदि सभी भोज्य-पदार्थ पार्थिव परमाणु ही
तो हं (इनमेसे कौन स्वादिष्ट है ओर कोन नहीं) ।
अतः एेसा समञ्चकर जो मीठे ओर बे-मीटेका विचार
करनेवाला हे, उस मनको तुम्हं समदर्शी बनाना
चाहिये; क्योकि समता ही मोक्षका उपाय है।
राजन्! ऋभुके ये परमार्थयुक्त वचन सुनकर
महाभाग निदाघने उन्हे प्रणाम करके कहा-'ब्रह्यन्।
आप प्रसन्न होडये ओर बताइये, मेरा हितसाधन
करनेके लिये यहां पधारे हए आप कौन दै?
आपके इन वचनोंको सुनकर मेरा सम्पूर्णं मोह नष्ट
((-0. /८111(4/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
१८३
हो गया है।'
ऋभु बोले--द्विजश्रेष्ठ ! में तुम्हारा आचार्य
ऋभु हू ओर तुम्हें तत्त्वको समञ्लनेवाली वुद्धि
देनेके लिये यहो आया था। अब मैं जाता हूं।
कुछ परमार्थ हे, वह सब मैने तुम्हें बता दिया । इस
प्रकार परमार्थ-तत्वका विचार करते हए तुम इस
सम्पूर्ण जगत्को एकमात्र वासुदेवसं्ञक परमात्माका
स्वरूप समञ्लो। इसमे भेदका सर्वथा अभाव हे।
ब्राह्यण जडभरत कहते है- तदनन्तर निदाघने
` बहुत अच्छा" कहकर गुरुदेवको प्रणाम किया
ओर बड़ी भक्तिसे उनको पूजा की । तत्पश्चात् वे
निदाघकी इच्छा न होनेपर भी वहसे चले गये ।
नरे श्र! तदनन्तर एक सहस्र दिव्य वर्ष बीतनेके
बाद गुरुदेव महर्षिं ऋभु निदाघको ज्ञानोपदेश
करनेके लिये पुनः उसी नगरम आये। उन्होने
नगरसे बाहर ही निदाघको देखा। वरहांका राजा
बहुत बड़ी सेना आदिके साथ धूम-धामसे नगरमे
प्रवेश कर रहा था ओर निदाघ मनुष्योकी भीड़-
भाड्से दूर हटकर खड़े थे। वे जंगलसे समिधा
ओर कुशा लेकर आये थे ओर भूख-प्याससे उनका
गला सूख रहा था। निदाघको देखकर ऋभु उनके
समीप गये ओर अभिवादन करके बोले-' बाबाजी ।
आप यहां एकान्तमें कैसे खडे हैँ 2
निदाघ बोले--विप्रवर। आज इस रमणीय
नगरमे यहोकि राजा प्रवेश करना चाहते हैँ । अतः
यहां मनुष्योको यह बहुत बड़ी भीड़ इकदी हो
गयी है । इसीलिये मं यहां खड़ा हृ ।
ऋभुने पूछा-- द्विजश्रेष्ठ ! आप य्हाँको बातोके
जानकार मालूम होते है । अतः बताइये, यहां राजा
कौन है ओर दूसरे लोग कौन हँ?
निदाघ बोले- यह जो पर्वतशिखरके समान
ऊंचे ओर मतवाले गजराजपर चढा हआ है, वही
राजा है ओर दूसरे लोग उसके परिजन हं ।
ऋभुने पृछ-- महाभाग! मेने हाथी तथा रजाको
एक ही साथ देखा हे। आपने विशेषरूपसे इनका पृथकू-
पृथक् चिह नहीं बताया; इसलिये म॑ पहचान न सका।
अतः आप इनकी विशेषता बतलाइये। मै जानना चाहता
हूं कि इनमें कौन राजा है ओर कौन हाथी ?
निदाघ बोले- ब्रह्मन्! इनमें यह जो नीचे है
वह हाथी है ओर इसके ऊपर ये राजा वैठे रह।
इन दोनोमे एक वाहन है ओर दूसरा सवार । भला,
वाह्य-वाहक-सम्बन्धको कौन नहीं जानता 2
ऋभुने पूछा- ब्रह्मन्! जिस प्रकार म अच्छी
तरह समञ्ञ सक, उस तरह मुञ्चे समञ्चाइये।
"नीचे ' इस शब्दका क्या अभिप्राय है ओर ऊपर"
किसे कहते हं 2
ब्राह्मण जडभरत कहते है-ऋभुके एेसा
कहनेपर निदाघ सहसा उनके ऊपर चद् गये ओर
इस प्रकार वोले-' सुनिये, आप मुञ्जसे जो कुछ
पृच्छ रहे हँ, वह अब समञ्चाकर् कहता हूँ । इस
समय मँ राजाको भोति ऊपर हूँ ओर श्रीमान्
गजराजकी भति नीचे। ब्राह्मणदेव ! आपको भलीभति
समञ्चानेके लिये ही मने यह दृष्टान्त दिखाया दहै ।
((-0. 1/८11114<511॥1 8118811 \/81811851 01661101. 01411260 0 6810011
९८
संक्षिप्त नारदपुराण
ऋभुने कहा-- द्विजश्रेष्ठ । यदि आप राजाके
समान ह ओर मैं हाथीके समान हूं तो यह बताइये
कि आप कौन है ओरमे कोन हू?
व्राह्मण कहते है-ऋभुके एेसा कहनेपर
निदाघने तुरंत ही उनके दोनों चरणोमें मस्तक
नवाया ओर कहा-' भगवन्! आप निश्चय ही मेरे
आचार्यपाद महिं ऋभु हँ; क्योकि दूसरेका हदय
इस प्रकार अद्वेत-संस्कारसे सम्पन्न नहीं है, जैसा
कि मेरे आचार्यका। अतः मेरा विश्वास है, आप
मेरे गुरुजी ही यहो पधारे हए है ।
ऋभुने कहा-- निदाघ ! पहले तुमने मेरी बडी
सेवा-शुश्रूषा कौ हे । इसलिये अत्यन्त स्ेहवश में
तुम्हे उपदेश देनेके लिये तुम्हारा आचार्य ऋभु ही
यहो आया हूं। महामते! समस्त पदार्थमिं अद्वैत
आत्मवुद्धि होना ही परमार्थका सार हे । मेने तुम्हें
संक्षेपसे उसका उपदेश कर दिया।
व्राह्मण जडभरत कहते है-- विद्वान् गुरु महर्षि
ऋभु निदाघसे एेसा कहकर चले गये । निदाघ भी
उनके उपदेशसे अद्रेतपरायण हो गये ओर सम्पूर्ण
प्राणियोंको अपनेसे अभिन्न देखने लगे । ब्रह्मर्षि
निदाघने इस प्रकार ब्रह्यपरायण होकर परम मोक्ष
प्राप्त कर लिया। धर्मञ्च नरेश! इसी प्रकार तुम भी
आत्माको सनमें व्याप्त जानते हए अपनेमें तथा
शत्रु ओर मित्रम समान भाव रखो।
सनन्दनजी कहते है-- ब्राह्यणके एेसा कहनेपर
राजाओमे श्रेष्ठ सोवीर-नरेशने परमार्थकी ओर
दृष्टि रखकर भेदवुद्धि त्याग दी ओर वे ब्राह्मण भी
पूर्वजन्मकौ वातोंका स्मरण करके बोधयुक्त हो
उसी जन्ममें मुक्त हो गये। मुनीश्वर नारद । इस
प्रकार मेने तुम्हें परमार्थरूप यह अध्यात्मज्ञान
वताया हे। इसे सुननेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय ओर
वैश्योको भी यह मुक्ति प्रदान करनेवाला है।
नम 21 १५9२४
शिक्षा-निरूपण
सूतजी कहते है- सनन्दनजीका एेसा वचन
सुनकर नारदजी अतृप्त-से रह गये। वे ओर भी
सुननेके लिये उत्सुक होकर भाई सनन्दनजीसे बोले।
नारदजीने कहा- भगवन्! मैने आपसे जो
कुछ पृछा हे, वह सब आपने बता दिया। तथापि
भगवत्सम्बन्धी -चर्चाको बारंबार सुनकर भी मेरा
मन तृप्त नहीं होता--अधिकाधिक सुननेके लिये
उत्कण्ठित हो रहा हे । सुना जाता है, परम धर्मज्ञ
व्यास-पुत्र शुकदेवजीने आन्तरिक ओर बाह्य-सभी
भोगोसे पूर्णतः विरक्त होकर बड़ी भारी सिद्धि
प्राप्त कर ली । ब्रह्यन्! महात्माओंकी सेवा (सत्सङ्ग)
किये विना प्रायः पुरुषको विज्ञान (तत्व-ज्ञान)
नहीं प्राप्त होता, किंतु व्यासनन्दन शुकदेवने
बाल्यावस्थामें ही ज्ञान पा लिया; यह केसे सम्भव
हुआ 2 महाभाग । आप मोक्षशास्त्रे तत्त्तको जाननेवाले
हे । मे सुनना चाहता हूं, आप मुञ्चसे शुकदेवजीका
रहस्यमय जन्म ओर कर्मं कदिये।
सनन्दनजी बोले- नारद ! सुनो, मे शुकदेवजीको
उत्पत्तिका वृत्तान्त संक्षेपसे कहूगा । मुने । इस वृत्तान्तको
सुनकर मनुष्य ब्रह्मततत्तका ज्ञाता हो सकता है।
अधिक आयु हो जानेसे, बाल पक जानेसे, धनसे
अथवा बन्धु-बान्धववसे कोई बड़ा नहीं होता।
ऋषि-मुनियोने यह धर्मपूर्ण निश्चय किया है कि
हमलोगोमे जो “अनूचान ' हो, वही महान् है ।
नारदजीने पूषछा-सवको मान देनेवाले विप्रवर !
पुरुष “अनूचान ' कैसे होता है ? वह उपाय मुञ्च
बताइये; क्योकि उसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा
कौतूहल है।
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
१८५
सनन्दनजी बोले-- नारद ! सुनो, मँ अनूचानका
लक्षण बताता हू, जिसे जानकर मनुष्य अद्भोंसहित
वेदोका जाता होता हे। शिक्षा, कल्प, व्याकरण,
निरुक्त, ज्योतिष तथा छन्दःशास्त्र--इन छःको विद्वान्
पुरुष वेदाङ्ग कहते हें । धर्मका प्रतिपादन करनेमें
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद ओर अथर्ववेद-ये चार
वेद ही प्रमाण बताये गये हें। जो श्रेष्ठ द्विज गुरुसे
छहों अद्धोंसहित वेदोका अध्ययन भलीभोति करता
हे, वह ' अनूचान ' होता हे; अन्यथा करोड ग्रन्थ च
लेनेसे भी कोई “अनूचान नहीं कहला सकता।
नारदजीने कहा- मानद । आप अद्भंसहित इन
सम्पूर्णं वेदोके महापण्डित हें । अतः मुञ्चे अद्धो ओर
वेदोका लक्षण विस्तारपूर्वक बताइये ।
सनन्दनजी बोले--त्रह्यन्! तुमने मुर प्रश्रका
यह अनुपम भार रख दिया । में संक्षेपसे इन सबके
सुनिश्चित सार-सिद्धान्तका वर्णन करूगा। वेदवेत्ता
ब्रह्र्षियोने वेदोकी शिक्षामें स्वरको प्रधान कहा है;
अतः स्वरका वर्णन करता हू, सुनो-स्वर-शास्त्रोके
निश्चयके अनुसार विशेषरूपसे आर्चिक (ऋ्सम्बन्धी),
गाधिक (गाथा-सम्बन्धी) ओर सामिक (साम-
सम्बन्धी) स्वर-व्यवधानका प्रयोग करना चाहिये ।
ऋचाओमे एकका अन्तर देकर स्वर होता है।
गाथाओमें दोके व्यवधानसे ओर साम-मन्त्रोपें तीनके
व्यवधानसे स्वर होता हे। स्वरोका इतना ही
व्यवधान सर्वत्र जानना चाहिये। ऋक्, साम ओर
यजुर्वेदके अङ्गभूत जो याज्य-स्तोत्र, करण ओर
मन्त्र आदि यासिकोद्रारा यज्ञेमें प्रयुक्त होते है,
शिक्षा-शास्त्रका ज्ञान न होनेसे उनमें विस्वर (विरृद्ध
स्वरका उच्चारण) हो जाता टै। मन्त्र यदि यथार्थ
स्वर ओर वर्णसे हीन हो तो मिथ्या-प्रयुक्त होनेके
कारण वह उस अभीष्ट अर्थका बोध नहीं कराता;
इतना ही नही, वह वाकूरूपी वज्र यजमानकी हिंसा
कर देता है-जेसे “इन्द्रशत्रु" यह पद स्वरभेदजनित
अपराधके कारण यजमानके लिये ही अनिष्टकारी
हो गया९। सम्पूर्ण वाङ्मयके उच्चारणके लिये
वक्षःस्थल, कण्ठ ओर सिर-ये तीन स्थान हेँ। इन
तीनोको सवन कहते हँ, अर्थात् वक्षःस्थानमें नीचे
स्वरसे जो शब्दोच्चारण होता है, उसे प्रातःसवन
कहते हँ; कण्ठस्थानमें मध्यम स्वरसे किये हए
शब्दोच्चारणका नाम माध्यन्दिनिसवन है तथा मस्तकरूप
स्थानमें उच्च स्वरसे जो शब्दोच्चारण होता टै, उसे
तृतीयसवन कहते हे । अधरोत्तरभेदसे सप्तस्वरात्सक
सामके भी पूर्वोक्त तीन ही स्थान हैं। उरोभाग,
कण्ठ तथा सिर-ये सातां स्वरोके विचरण-स्थान
हे । किंतु उरःस्थलमें मन्द्र॒ ओर अतिस्वारकी ठीक
अभिव्यक्ति न होनेसे उसे सातों स्वरोंका विचरण-
स्थल नहीं कहा जा सकता; तथापि अध्ययनाध्यापनके
लिये वैसा विधान किया गया है । (ठीक अभिव्यक्ति
न होनेपर भी उपांशु या मानस प्रयोगमें वर्णं तथा
स्वरका सूक्ष्म उच्चारण तो होता ही है।) कठ,
कलाप, तैत्तिरीय तथा आह्वरक शाखाओंमं ओर
तऋवेद तथा सामवेदमें प्रथम स्वरका उच्चारण
करना चाहिये । ऋग्वेदी प्रवृत्ति दूसरे ओर तीस
स्वरके द्वारा होती है। लौकिक व्यवहारयें उच्च ओर
मध्यमका संघात-स्वर होता दै । आहवरक शाखावाले
तृतीय तथा प्रथमम उच्चारित स्वरोंका प्रयोग करते
१. तैत्तिरीय शाखाकौ कृष्णयजुः संहिताके द्वितीय काण्डम पञ्चम प्रपाटकके द्वितीय अनुवाकको प्रथम पञ्चशतीमें मन्त्र
आया है--' स्वहेन्द्रशत्ररवर्धस्व ।' पौराणिक कथाके अनुसार त्वष्टा प्रजापतिने * इन्द्रके शत्रु" वृत्रके अभ्युदयके लिये इस
मन््रका उच्चारण किया था। " इन्द्रस्य शत्रुः ' इस विग्रहके अनुसार षष्ठी-समासमं समाप्ान्तप्रयुक्त अन्तोदात्तका उच्चारण
अभीष्ट था; परेतु प्रयोगे पूर्वपदप्रकृतिस्वर-- आधयुदात्त बोला गया; अतः वहे बहव्रीहिके अर्थका प्रकाशक टो गया । इसलिये
"इन्द्र है शत्रु (संहारक) जिसका वह ' एेसा अर्थ निकरलनेके कारण वृत्रासुर ही इन्द्रके हाधसे मारा गया।
((-0. 1\/॥11114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0\ 6810011
९८६
संक्षिप्त नारदपुराण
हें । तैत्तिरीय शाखावाले द्वितीयसे लेकर पञ्चमतक
चार स्वरोंका उच्चारण करते हे । सामगान करनेवाले
विद्वान् प्रथम (षड्ज), द्वितीय (ऋषभ), तृतीय
(गान्धार), चतुर्थं (मध्यम), मन्द्र (पञ्चम), क्रुष्ट
(धैवत) तथा अतिस्वार (निषाद)-इन सातां
स्वरोका प्रयोग करते हें । द्वितीय ओर प्रथम-ये
ताण्डी (ताण्ड्यपञ्चविंशादि ब्राह्यणके अध्येता कोथुम
आदि शाखावाले) तथा भाल्ववी (छन्दोग शाखावाले)
विद्वानोके स्वर हँ तथा शतपथ ब्राह्मणमें आये हुए
ये दोनों स्वर वाजसनेयी शाखावालोके द्वारा भी
प्रत्युक्त होते हे । ये सब वेदोमें प्रयुक्त होनेवाले
स्वर विशेषरूपसे बताये गये हं । इस प्रकार
सार्ववेदिक स्वर-संचार कहा गया हे।
अब मैं सामवेदक स्वर-संचारका वर्णन करूगा।
अर्थात् छन्दोग विद्वान् सामगानमें तथा ऋक्पाठमें
जिन स्वरोका उपयोग करते हैं, उनका यहां
विशेषरूपसे निरूपण किया जाता है । यर्हां श्लोक
थोडे होगे; कितु उनमें अर्थ-विस्तार अधिक
होगा। यह उत्तम वेदाङ्गका विषय सावधानीसे
श्रवण करनेयोग्य है । नारद ! मने तुम्हं पहले भी
कभी तान, राग, स्वर, ग्राम तथा मूर्च्छनाओंका
लक्षण बताया है, जो परम पवित्र, पावन तथा
पुण्यमय है । द्विजातियोंको ऋग्वेद, यजुर्वेद ओर
सामवेदके स्वरूपका परिचय कराना-इसे ही
शिक्षा कहते ह । सात स्वर, तीन ग्राम, इक्तोस मूर्च्छना
ओर उनचास तान-इन सबको स्वर-मण्डल कहा
गया है। षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम,
धैवत तथा सातवों निषाद-ये सात स्वर है। षड्ज,
मध्यम ओर गान्धार-ये तीन ग्राम कहे गये हेै।
भूर्लोकसे षड्ज उत्पन्न होता है, भुवर्लोकसे मध्यम
प्रकट होता है तथा स्वर्ग एवं मेघलोकसे गान्धारका
प्राकस्य होता है। ये तीन ही ग्राम-स्थानं ह।
स्वरोके राग-विशेषसे ग्रामोके विविध राग कहे
गये हे। साम-गान करनेवाले विद्वान् मध्यम-
ग्राममें बीस, षड्जग्राममें चौदह तथा गान्धारग्राममें
पंद्रह तान स्वीकार करते हैं। नन्दी, विशाला,
सुमुखी, चित्रा, चित्रवती, सुखा तथा बला-ये
देवताओंको सात मूर्च्छना जाननी चाहिये।
आप्यायिनी, विश्चभृता, चन्द्रा, हेमा, कपर्दिनी,
मेत्री तथा बार्हती- ये पितरोकी सात मूर्च्छना हे ।
षडजस्वरमें उत्तर मन्द्रा, ऋषभमे अभिरूढता (या
अभिरुद्रता) तथा गान्धारमें अश्वक्रान्ता नामवाली
तीसरी मूर्च्छना मानी गयी है । मध्यमस्वरमें सौवीरा,
पञ्चममें हषिका तथा धेवतमें उत्तरायता नामको
मूर्च्छना जाननी चाहिये । निषादस्वरमें रजनी नामक
मूर्च्छनाको जाने । ये ऋषियोकी सात मूर्च्छना हे ।
गन्धर्वगण देवताओंको सात मूर्च्छनाओंका आश्रय
लेते हें । यक्षलोग पितरोंकी सात मूर्च्छनाएं अपनाते
है, इसमे संशय नहीं है । ऋषियोंको जो सात
मूर्च्छना है, उन्हें लौकिक कहा गया है- उनका
अनुसरण मनुष्य करते हें । षड्जस्वर देवताओंको
ओर ऋषभस्वर ऋषि-मुनियोको तृप्त करता ह ।
गान्धारस्वर पितरोको, मध्यमस्वर गन्धर्वोको तथा
पञ्चमस्वर देवताओं, पितरों एवं महर्षियोंको भी
संतुष्ट करता हे । निषादस्वर यक्षोंको तथा धैवत
सम्पूर्ण भूत-समुदायको तृप्त करता है। गानको
गुणवृत्ति दस प्रकारकी है अर्थात् लौकिकवैदिक
गान दस गुणोंसे युक्त ह । रक्त, पूर्ण, अलंकृत,
प्रसनन, व्यक्त, विक्रुष्ट, श्लक्ष्ण, सम, सुकुमार तथा
मधुर-ये ही वे दसों गुण हँ । वेणु, वीणा तथा
पुरुषके स्वर जहाँ एकमे मिलकर अभिन्न-से
प्रतीत होते है ओर उससे जो रञ्जन होता है,
उसका नाम "रक्त" है। स्वर तथा श्रुतिको पूर्ति
करनेसे तथा छन्द एवं पादाक्षरोके संयोग (स्पष्ट
उच्चारण) -से जो गुण प्रकट होता है, उसे "पूर्णं
कहते ह । कण्ठ अर्थात् प्रथम स्थानमें जो स्वर
((-0. 1\/॥11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
स्थित है, उसे नीचे करके हदयमें स्थापित करना
ओर ऊचे करके सिरमें ले जाना- यह ' अलंकृत!
कहलाता है। जिसमें कण्ठका गद्गदभाव निकल
गया है ओर किसी प्रकारको शङ्का नहीं रह गयी
है, वह "प्रसन्न" नामक गुण है। जिसमें पद,
पदार्थ, प्रकृति, विकार, आगम, लोप, कृदन्त,
तद्धित्त, समास, धातु, निपात, उपसर्ग, स्वर,
लिङ्क, वृत्ति, वार्तिक, विभक्त्यर्थं तथा एकवचन,
बहुवचन आदिका भलीभोति उपपादन हो, उसे
' व्यक्त ' कहते हैँ । जिसके पद ओर अक्षर स्पष्ट हों
तथा जो उच्च स्वरसे बोला गया हो, उसका नाम
^ विद्कृष्ट ' हे । द्रुत (जल्दबाजी ) ओर विलम्बित-
दोनों दोषोंसे रहित, उच्च, नीच, प्लुत, समाहार,
हेल, ताल ओर उपनय आदि उपपत्तियोसे युक्त
गीतको “श्लक्ष्ण' कहते है । स्वरोके अवाप-निर्वाप
(चढाव-उतार)-के जो प्रदेश ह, उनका व्यवहित
स्थानों जो समावेश होता हे, उसीका नाम ˆ सम!
है । पद, वर्ण, स्वर तथा कुहरण (अव्यक्त अक्षरोको
कण्ठ दबाकर बोलना)-ये सभी जिसमें मृदु- कोमल
हो, उस गीतको ' सुकुमार ' कहा गया है । स्वभावसे
ही मुखसे निकले हए ललित पद एवं अशक्षरोके
गुणसे सम्पन्न गीत "मधुर ' कहलाता हे । इस प्रकार
गान इन दस गुणोसे युक्त होता हे।
इसके विपरीत गीतके दोष बताये जाते है-इस
विषयमे ये श्लोक कहे गये हैँ । शङ्भित, भीषण,
भीत, उद्घुष्ट, आनुनासिक, काकस्वर, मूर्धगत
(अत्यन्त उच्च स्वरसे सिरतक ॒ चदढाया हुआ
अपूर्णगान), स्थान-विवर्जित, विस्वर, विरस, विश्लिष्ट
विषमाहत, व्याकुल तथा तालदहीन-ये चौदह
गीतके दोष हैं। आचार्यलोग समगानको इच्छा
करते है । पण्डितलोग पदच्छेद (प्रत्येक पदका
विभाग) चाहते है । स्त्रियाँ मधुर गीतकी अभिलाषा
करती है ओर दूसरे लोग वि्रुष्ट (पद ओर
९८७
अक्षरके विभागपूर्वक उच्च स्वरसे उच्चारित) गीत
सुनना चाहते हें । "षड्जस्वरका रंग कमलपत्रके
समान हरा है। ऋषभस्वर तोतेके समान कुछ
पीलापन लिये हरे रंगका है। गान्धार सुवण्कि
समान कान्तिवाला है। मध्यमस्वर कुन्दके सदृश
शैतवर्णका है । पञ्चमस्वरका रंग श्याम है । धेवतको
पीले रगका माना गया हे। निषादस्वरमे सभी रंग
मिले हुए हें । इस प्रकार ये स्वरोके वर्णं कहे गये
हें । पञ्चम, मध्यम ओर षड्ज-ये तीनों स्वर
ब्राह्मण माने गये हैँ । ऋषभ ओर धैवत-ये दोनों
ही क्षत्रिय हैँ । गान्धार तथा निषाद-ये दोनों स्वर
आधे वैश्य कहे गये हँ ओर पतित होनेके कारण
ये आधे शूद्र ह । इसमें संशय नहीं है । जहां
ऋषभके अनन्तर प्रकट हुए षड्जके साथ धेवतसहित
पञ्चमस्वर मध्यमरागमें प्राप्त होता है, उस निषादसहित
स्वरग्रामको "षाडव ' या 'षाड्जव' जानना चाहिये।
यदि मध्यमस्वरमें पञ्चमका विराम हो ओर अन्तरस्वर
गान्धार हो जाय तथा उसके बाद क्रमसे ऋषभ,
निषाद एवं पञ्चमका उदय हो तो उस पञ्चमको भी
एेसा ही (षाडव या पाड्जव) समञ्चे। यदि
मध्यमस्वरका आरम्भ होनेपर गान्धारका आधिपत्य
(वृद्धि) हो जाय, निषादस्वर बारंबार जाता-आता
रहे, धैवतका एक ही बार उच्चारण होनेके कारण
वह दुर्बलावस्थामें रहे तथा षड्ज ओर ऋषभकौ
अन्य पाँचोके समान ही स्थिति हो तो उसे
"मध्यम ग्राम" कहते ह । जहां आरम्भे षड्ज
हो ओर निषादका थोडा-सा स्पर्श किया गया हो
तथा गान्धारका अधिक उच्चारण हुआ हो, साथ
ही धैवतस्वरका कम्पन- पातन देखा जाता हो
तथा उसके वाद् दूसरे स्वरोका यथारुचि गानं
किया गया हो, उसे “षड्जग्राम' कहा गया है।
जहौ आरम्भं पद्ज हो ओर इसके बाद् अन्तरस्वर-
संयुक्त काकली देखी जाती हो अर्थात् चार बार
((-0. 1/८11114<511॥1 8118811 \/81/81185।1 (01661101. 01411260 0 6810011
१९८८
संक्षिप्त नारदपुराण
केवल निषादका ही श्रवण होता हो, पञ्चम स्वरमें
स्थित उस आधारयुक्त गीतको श्रुति कैशिक
जानना चाहिये । जव पूर्वोक्त कैशिक नामक
गीतको सब स्वरोंसे संयुक्त करके मध्यमसे उसका
आरम्भ किया जाय ओर मध्यममें ही उसकी
स्थापना हो तो वह 'केशिक मध्यम' नामक
ग्रामराग होता डै। जहां पूर्वोक्तं काकली देखी
जाती हो ओर प्रधानता पञ्चम स्वरकी हो तथा शोष
दूसरे-दूसरे स्वर सामान्य स्थितिमें हों तो कश्यप
ऋषि उसे मध्यम ग्रामजनित ‹ केशिक राग ' कहते
हें । विद्वान् पुरुष “गा का अर्थ गेय मानते हँ ओर
'ध' का अर्थं कलापूर्क बाजा बजाना कहते हें
ओर रेफसहित * ब ' का अर्थ वाद्य-सामग्री कहते
हे । यही " गान्धर्व' शब्दका लक्ष्यार्थं है! जो
सामगान करनेवाले विद्वानोका प्रथम स्वर हे, वही
वेणुका मध्यम स्वर कहा गया है। जो उनका
द्वितीय स्वर हे, वही वेणुका गान्धार स्वर है ओर
जो उनका तृतीय हे, वही वेणुका ऋषभ स्वर
माना गया हे। सामग विद्वानोके चौथे स्वरको
वेणुका षड्ज कहा गया हे । उनका पञ्चम वेणुका
धवत होता है। उनके छठेको वेणुका निषाद
समञ्जना चाहिये ओर उनका सात्वं ही वेणुका
पञ्चम माना गया हे। मोर षड्ज स्वरम बोलता है।
गाये ऋषभ स्वरमें रेभाती है, भेड ओर बकरियां
गान्धार स्वरम बोलती ह। तथा क्रौञ्च (कुरर)
पक्षी मध्यम स्वरमें बोलता हे। जब साधारणरूपसे
सव प्रकारके फूल खिलने लगते हें, उस वसन्त
ऋतुमे कोयल पञ्चम स्वरम बोलती हे। घोड़ा
धवत स्वरम हिनहिनाता है ओर हाथी निपाद
स्वरम चिग्घाडता हे । पडज स्वर कण्टसे प्रकट
होता हे। ऋषभ मस्तकसे उत्पन्न होता हे, गान्धारका
उच्चारण मुखसहित नासिकासे होता है ओर
मध्यम स्वर हदयसे प्रकट होता हे । पञ्चम स्वरका
उत्थान छाती, सिर ओर कण्ठसे होता है । धैवतको
ललाटसे उत्पन्न जानना चाहिये तथा निषादका
प्राकस्य सम्पूर्णं संधियोसे होता है। षड्ज स्वर
नासिका, कण्ठ, वक्षःस्थल, तालु, जिह्वा तथा
दोंतोके आश्रित है। इन छः अङ्खोसे उसका जन्म
होता हे। इसलिये उसे “ षड्ज ' कहा गया है।
नाभिसे उठी हई वायु कण्ठ ओर मस्तकसे
टकराकर वृषभके समान गर्जना करती है । इसलिये
उससे प्रकट हुए स्वरका नाम ऋषभ ' हे । नाभिसे
उठी हई वायु कण्ठ ओर सिरसे टकराकर पवित्र
गन्ध लिये हए बहती है। इस कारण उसे
' गान्धार ' कहते हे । नाभिसे उठी हुई वायु ऊरु
तथा हदयसे टकराकर नाभिस्थानमें आकर मध्यवती
होती हे। अतः उससे निकले हुए स्वरका नाम
"मध्यम ' होता हे। नाभिसे उठी हुई वायु वक्ष,
हदय, कण्ठ ओर सिरसे टकराकर इन पोच
स्थानोसे स्वरके साथ प्रकट होती है। इसलिये
उस स्वरका नाम ' पञ्चम" रखा जाता है। अन्य
विद्वान् धवत ओर निषाद-इन दो स्वरोको छोडकर
शेष पच स्वरोको पाचों स्थानोंसे प्रकट मानते हे ।
पोचों स्थानोमें स्थित होनेके कारण इन्हें सव
स्थानम धारण किया जाता है। षड्ज स्वर
अग्रिके द्वारा गाया गया हे। ऋषभ ब्रह्माजीके द्वारा
गाया कहा जाता हे। गान्धारका गान सोमने ओर
मध्यम स्वरका गान विष्णुने किया है। नारदजी ।
पञ्चम स्वरका गान तो तुम्हीने किया है, इस
बातको स्मरण करो। धैवत ओर निषाद-इन दो
स्वरोंको तुम्बुरुने गाया हे । विद्वान् पुरुषोनि ब्रह्माजीको
आदि- षड्ज स्वरका देवता कहा है । ऋषभका
प्रकाश तीखा ओर उदीप्त है, इसलिये अग्निदेव ही
उसके देवता है । जिसके गान करनेपर गौं संतुष्ट
होती है, वह गान्धार है ओर इसी कारण गौएं ही
उसको अधिष्ठात्री देवी हैँ । गान्धारको सुनकर गौं
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
पास आती है, इसमें संदेह नहीं हे । पञ्चम स्वरके
देवता सोम हँ, जिन्हें ब्राह्यणोका राजा कहा गया हे
जेसे चन्द्रमा शुक्लपक्षमे बढता है ओर कृष्णपक्षमें
घटता है, उसी प्रकार स्वरग्राममें प्राप्त होनेपर जिस
स्वरका हास होता ओर वृद्धि होती ठै तथा इन
पूर्वोत्पन्न स्वरोकी जहां अतिसंधि होती है, वह
धवत है। इसीसे उसके धैवतत्वका विधान किया
गया हे । निषादमें सब स्वरोंका निषादन (अन्तर्भाव)
होता है, इसीलिये वह निषाद कहलाता हे । यह सव
स्वरोको अभिभूत कर लेता है- ठीक उसी तरह,
जेसे सूर्य सब नक्षत्रोको अभिभूत करता हे; क्योकि
सूर्य ही इसके अधिदेवता हें ।
काठकी वीणा तथा गात्रवीणा-ये गान-जातिमें
दो प्रकारकी वीणां होती है। नारद ! सामगानके
लिये गात्रवीणा होती है, उसका लक्षण सुनो।
गात्रवीणा उसे कहते है, जिसपर सामगान करनेवाले
विद्वान् गाते हैँ । वह अंगुलि ओर अङ्गु्ठसे रञ्जित
तथा स्वर-व्यञ्जनसे संयुक्त होती है। उसमें अपने
दोनों हा्थोको संयममें रखकर उन्हे धुटनोपर रखे
ओर गुरुका अनुकरण करे, जिससे भिन्न वुद्धि न
हो । पहले प्रणवका उच्चारण करे, फिर व्याहति्योका।
तदनन्तर गायत्नी मन्त्रका उच्चारण करके सामगान
प्रारम्भ करे। सब अंगुलिर्योको फैलाकर स्वरमण्डलका
आरोपण करे। अंगुलियोसे अद्गुष्ठका ओर अङ्गु्ठसे
अगुलियोका स्पर्श कदापि न करे। अगुलियोको
विलगाकर न रखे ओर उनके मूलभागका भी स्पर्शं
न करे, सदा उन अंगुलियोकि मध्यपर्वमें अगृठेके
अग्रभागसे स्पर्शं करना चाहिये। विभागके ज्ञाता
पुरुषको चाहिये कि मात्रा-द्विमात्रा-वृद्धिके विभागक
लिये बाय हाथकी अंगुलियोसे द्विमात्रका दर्शन
कराता रहे। जहाँ त्रिरेखा देखी जाय, वहां संधिका
निर्देश करे; वह पर्व है, एेसा जानना चाहिये । शेष
अन्तर-अन्तर है। साममन्त्रमें (प्रथम ओर द्वितीय
१८९
स्वरके बीच) जौके बराबर अन्तर करे तथा
ऋचाओमें तिलके बराबर अन्तर करे । मध्यम पर्वापिं
भलीभोति निविष्ट किये हुए स्वरोका ही निवेश करे।
विद्वान् पुरुष यहाँ शरीरके किसी अवयवको कंपाये
नहीं । नीचेके अरङ्ग ऊरु, जदा आदिको सुखपूर्वक
रखकर उनपर दोनों हाथोको प्रचलित परिपाटीके
अनुसार रखे (अर्थात् दाहिने हाथको गायके कानके
समान रखे ओर बाययंको उत्तानभावसे रखे) । जैसे
बादलोमें बिजली मणिमय सूत्रकी भोति चमकती
दिखायी देती है, यही विवृत्तियों (पदादि विभागों )-
के छेद्-बिलगाव- स्पष्ट निर्देशका दृष्टान्त है । जैसे
सिरके बालोपर कैची चलती है ओर बालको पृथक्
कर देती है, उसी प्रकार पद ओर स्वर आदिका
पृथक् -पृथक् विभागपूर्वक बोध कराना चाहिये ।
जैसे कद्ुभआ अपने सब ॒ अद्भको समेट लेता है
उसी प्रकार अन्य सब चेषएटा्ओंको विलीन करके मन
ओर दृष्टि देकर विद्वान् पुरुष, स्वस्थ, शान्त तथा
निर्भीक होकर वर्णोका उच्चारण करे। मन्त्रका
उच्चारण करते समय नाककी सीधमें पूर्वं दिशाकी
ओर गोकर्णे समान आकृतिमें हाथको उटाये रखे
ओर हाथके अग्रभागपर दृष्टि रखते हुए शस्त्रके
अर्थका निरन्तर चिन्तन करता रहे। मन््र-वाक्यको
हाथ ओर मुख दोनोसे साथ-साथ भलीभोति
प्रचारित करे। वर्णोका जिस प्रकार द्रुतादि वृत्तिसे
आरम्भं उच्चारण करे, उसी प्रकार उन्हें समाप्त भी
करे। (एक ही मन्त्रमं दो वृकत्ति्योकी योजना न करे।)
अभ्याघात, निर्घात, प्रगान तथा कम्पन न करे,
समभावसे साममन्त्रोका गान करे। जसे आकाशमें
श्येन पक्षी सम गतिसे उडता है, जसे जलें
विचरती हुई मछलियां अथवा आकाशमें उडते हुए
पक्षि्योकि मार्गका विशेष रूपसे पता नहीं चलता, उसी
प्रकार सामगानर्मे स्वरगत श्रुतिके विशेष स्वरूपका
अवधारण नीं होता । सामान्यतः गीतमात्रकी उपलब्धि
((-0. 1/111141/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
९९०
होती हे। जेसे दहीमें घी अथवा काठके भीतर अग्नि
छिपी रहती है ओर प्रयतसे उसकी उपलब्धि भी
होती है, उसी प्रकार स्वरगत श्रुति भी गीतमें छिपी
रहती दहै, प्रयत्नसे उसके विशेष स्वरूपकी भी
उपलब्धि होती हे । प्रथम स्वरसे दूसरे स्वरपर जो
स्वर-संक्रमण होता है, उसे प्रथम स्वरसे संधि
रखते हुए ही करे, विच्छेद करके न करे ओर न
वेगसे ही करे। जेसे छाया एवं धूप सुक्ष्म गतिसे
धीरे-धीरे एक स्थानसे दूसरे स्थानपर जाते हैन
तो पूर्वस्थानसे सहसा सम्बन्ध तोड़ते है ओर न नये
स्थानपर ही वेगसे जाते है, उसी प्रकार स्वर-
संक्रमण भी सम तथा अविच्छिन्न भावसे करे। जब
प्रथम स्वरको खींचते हुए द्वितीय स्वर होता है, तव
उसे “कर्षण ' कहते हं । विद्वान् पुरुष निम्नाङ्धित छः
दोषोसे युक्त कर्षणका त्याग करे, अनागत तथा
अतिक्रान्त अवस्थामें कर्षण न करे। द्वितीय स्वरके
आरम्भसे पहले उसकी अनागत अवस्था है, प्रथम
स्वरका सर्वथा व्यतीत हो जाना उसकी अतिक्रान्तावस्था
हि; इन दोनों स्थितियोमें प्रथम स्वरका कर्षण न
करे। प्रथम मात्राका विच्छेद करके भी कर्षण न
करे। उसे विषमाहत- कम्पित करके भी द्वितीय
स्वरपर न जाय । कर्षणकालमें तीन मात्रासे अधिक
स्वरका विस्तार न करे। अस्थितान्तका त्याग करे
अर्थात् द्वितीय स्वरमें भी त्रिमात्रायुक्त स्थिति करनी
चाहिये, न कि दो मात्रासे ही युक्त। जो स्वर
स्थानसे च्युत होकर अपने स्थानका अतिवर्तन
(लद्कन) करता है, उसे सामगान करनेवाले विद्वान्
^ विस्वर' कहते है ओर वीणा बजाकर गानेवाले
गायक उसे ' विरक्त' नाम देते है। स्वयं अभ्यास
करनेके लिये द्रुतवृत्तिसे मन्त्रोच्चारण करे । प्रयोगके
लिये मध्यम वृत्तिका आश्रय ले ओर शिष्योके
उपदेशके लिये विलम्बित वृत्तिका अवलम्बन करे।
इस प्रकार शिक्षाशस्त्रोक्त विधिसे जिसने ग्रन्थ
संक्षिप्त नारदपुराण
(सामगान) को ग्रहण किया है, वह विद्वान् द्विज
ग्रनथोच्वारणकी शिक्षा लेनेवाले शिष्योको हाथसे ही
अध्ययन कराये ।
क्रुष्ट (सप्तम एवं पञ्चम) स्वरका स्थान मस्तकमें
हे। प्रथम (षड्ज) स्वरका स्थान ललारमें हे।
द्वितीय (ऋषभ) स्वरका स्थान दोनों भोहोकि
मध्यमे हे। तृतीय (गान्धार) स्वरका स्थान दोनों
कानमे हें । चतुर्थं (मध्यम) स्वरका स्थान कण्ठ
हे। मन्द्र॒ (पञ्चम) -का स्थान रसना बतायी जाती
हे। (मनद्रस्योरसि तूच्यते-इस पाठके अनुसार
उसका स्थान वक्षःस्थल भी है।) अतिस्वार नामवाले
नीच स्वर (निषाद) का स्थान हदयमें बताया जाता
हे। अद्गुष्ठके शिरोभागमें क्रुष्ट (सपतम-पञ्चम) का
न्यास करना चाहिये । अङ्गु्ठमे ही प्रथम स्वरका भी
स्थान बताया गया है। तर्जनीमें गान्धार तथा
मध्यमामें ऋषभक स्थिति हे। अनामिकामें षड्ज
ओर कनिष्ठिकामें धैवत हैँ । कनिष्ठाके नीचे मूल
भागमें निषाद स्वरकी स्थिति बताये। मन्द्र स्वरसे
सर्वथा पृथक् न होनेसे निषाद "अपर्व' हे । उसका
पृथक् ज्ञान न होनेके कारण उसे ' असं्च' कहा गया
हे तथा उसमे लिङ्ग, वचन आदिका सम्बन्ध न
होनेसे उसे “ अव्यय" भी कहते है । अतः मन्द्र ही
मन्दीभूत होकर “परिस्वार' (निषाद) कहा गया है।
क्रुष्ट स्वरसे देवता जीवन धारण करते ह ओर
प्रथमसे मनुष्य; द्वितीय स्वरसे पशु तथा तृतीयसे
गन्धर्वं ओर अप्सरा जीवन धारण करती ह । अण्डजं
(पक्षी) तथा पितृगण चतुर्थ-स्वरजीवी होते ह।
पिशाच, असुर तथा राक्षस मन्दस्वरसे जीवन-निर्वाह
करते ह । नीच अतिस्वार (निषाद)-से स्थावर-
जद्भमरूप जगत् जीवन धारण करता है। इस प्रकार
सामिक स्वरसे सभी प्राणी जीवन धारण करते है।
जो दीप्ता, आयता, करुणा, मृदु तथा मध्यम
श्रुतियोका विशेषज्ञ नहीं है, वह आचार्य कहलानेका
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
अधिकारी नहीं हे । मन्द्र (पञ्चम), द्वितीय, चतुर्थ,
अतिस्वार (षष्ठ) ओर तृतीय-इन पाच स्वरोको
श्रुति दीप्ता" कही गयी है । (प्रथमकौ श्रुति मृदु
हे) ओर सप्तमकी श्रुति "करुणा" है। अन्य जो
"मृदु , ' मध्यमा" ओर “ आयता नामवाली श्रुतयो हैँ
वे द्वितीय स्वरमें होती है । मेँ उन सबके पृथक् -
पृथक् लक्षण बताता हू। नीच अर्थात् तृतीय स्वर
परे रहते द्वितीय स्वरकी आयता श्रुति होती है,
विपर्यय अर्थात् चतुर्थं स्वर परे रहनेपर उक्त
स्वरकौ मृदुभूता श्रुति होती है। अपना स्वर परे हो
ओर स्वरान्तर परे न हो तो उसको मध्यमा श्रुति
होती है। यह सब विचारकर सामस्वरका प्रयोग
करना चाहिये । क्रुष्ट स्वर परे होनेपर द्वितीय
स्वरमें स्थित जो श्रुति है, उसे 'दीप्ता' समञ्चे।
प्रथम स्वरमें हो तो वह " मृदु ' श्रुति मानी गयी हे ।
यदि चतुर्थ स्वरमें हो तो वही श्रुति मृदु कहलाती
है। तथा मन्द्र स्वरम हो तो दीपा होती है।
सामकी समाति होनेपर जिस किसी भी स्वरमें
स्थित श्रुति दीप्ता ही होती है। स्वरके समाप्त
होनेसे पहले आयतादि श्रुतिका प्रयोग न करे।
स्वर समाप्त होनेपर भी जवतक गानका विच्छेद न
हो जाय, दो स्वरोके मध्यमे भी श्रुतिका प्रयोग न
करे । हस्व तथा दीर्घं अक्षरका गान होते समय भी
श्रुति नहीं करनी चाहिये (केवल प्लुतमें ही श्रुति
कर्तव्य है) तथा जरह घुट-संज्ञक स्वर हो, वहां
भी श्रुतिका प्रयोग न करे। तालव्य इकारका ˆ आ"
"इ ' भाव होता है ओर “आ उ' भाव होता है; ये
दो प्रकारकी गतिर्या हं ओर ऊष्म वर्ण श षस
के साथ जो त्रिविध पदान्त सन्धि है-ये सव
मिलकर पोच स्थान हैँ; इन स्थानों घुट-संजक
स्वर जानना चाहिये (इनमें श्रुति नहीं करनी
१९१
चाहिये) । श्रुतिस्थानोमें जहो स्वर ओर स्वरान्तर
समाप्त न हए हों तथा जो हस्व, दीर्घं एवं “घुट
सं्ञाके स्थल है, वे सव श्रुतिसे रहित हैँ, उनमें
श्रति नहीं करनी चाहिये । वहो स्वरसे ही श्रुतिवत्
कार्य होता है।
(सामव्यतिरिक्त स्थलों) उदात्त स्वरमें ' दीप्ता"
नामवाली श्रुतिको जाने। स्वरितमें भी विद्वान् लोग
' दीपा' कौ ही स्थिति मानते हें । अनुदात्तमें ' मृदु"
श्रुति जाननी चाहिये। गान्धर्व गानमें श्रुतिका
अभाव होनेपर भी स्वरको ही श्रुतिके समान
करना चाहिये, वहां स्वरमें ही श्रुतिका वैभव
निहित है। उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, प्रचयः तथा
निघातर-ये पांच स्वरभेद होते है।
इसके बाद म आर्चिकके तीन स्वरोका
प्रतिपादन करता हूं। पहला उदात्त, दूसरा अनुदात्त
ओर तीसरा स्वरित है। जिसको उदात्त कहा गया
है, वही स्वरितसे परे हो तो विद्वान् पुरुष उसे
प्रचय कहते हे । वहां दूसरा कोई स्वरान्तर नहीं
होता। स्वरितके दो भेद है-वर्ण-स्वार तथा
अतीत-स्वार। इसी प्रकार वर्णं भी मात्रिक एवं
उच्यरितके पश्चात् दीर्घं होता हे । प्रत्यय-स्वाररूप
प्रत्ययका दर्शन होनेसे उसे सात प्रकारका जानना
चाहिये। वह क्या, कहां ओर कैसा है, इसका
ज्ञान पदसे प्राप्त करना चाहिये । दाहिने कानमें
सातो स्वरोंका श्रवण करावे। आचार्यनि पुत्रं ओर
शिष्योके हितकौ इच्छासे ही इस शिक्षाशास्त्रका
प्रणयन किया हे। उच्च (उदात्त)-से कोई उच्चतर
नहीं है ओर नीच (अनुदात्त) -से नीचतर नहीं है ।
फिर विशिष्ट स्वरके रूपमे जो "स्वार" संज्ञा दी
जाती है, उसमें स्वारका क्या स्थान है? (इसके
उत्तरमे कहते टै- ) उच्च (उदात्त) ओर नीच
१-स्वरितसे आगे स्वरित ही हौ तो उनकी ' प्रचय ' संजा होती दै । २- प्रचय पर हो तो स्वरितका आनन होनेसे उसकी
' निघात ' संज्ञा होती है । प्रचय न हो, तव तो शुद्ध ' स्वदित' दी रहता ह ।
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
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संक्षिप्त नारदपुराण
(अनुदात्त)-के मध्यमे जो 'साधारण' यह श्रुति
हे, उसीको शिक्षाशास्त्रके विद्वान् स्वार-संज्ञामें
" स्वार ' नामसे जानते हें । उदात्तमें निषाद ओर
गान्धार स्वर हे, अनुदात्तमे ऋषभ ओर धेवत स्वर
हें । ओर ये- षड्ज, मध्यम तथा पञ्चम-स्वरितमें
प्रकट होते हें । जिसके परे "क ओर 'ख' है तथा
जो जिह्वामूलीयरूप प्रयोजनको सिद्ध करनेवाली
हे, उस “ऊष्मा* (ईक ईख)-को "मात्रा" जाने।
वह अपने स्वरूपसे ही "कला! है (किसी दूसरे
वर्णका अवयव नहीं हे। इसे उपध्मानीयका भी
उपलक्षण मानना चाहिये) ।
जात्य, क्षेप्र, अभिनिहित, तेरव्यञ्जन, तिरोविराम,
प्रश्लिष्ट तथा सातवां पादवृत्त-ये सात स्वार ह,
अव में इन सब स्वारोका पृथक्-पृथक् लक्षण
बतलाता हू। लक्षण कहकर उन सबके यथायोग्य
उदाहरण भी बताऊगा। जो अक्षर “य' कार ओर
"व कारके साथ स्वरित होता है तथा जिसके
आगे उदात्त नरह होता, वह “ जात्य ' स्वार कहलाता
हे। जब उदात्त “इ' वर्ण ओर “उ' वर्णं कहीं
पदादि अनुदात्त अकार परे रहते सन्धि होनेपर “य!
"व ' के रूपमे परिणत हो स्वरित होते है, तो वहाँ
सदा "क्षेप्र" स्वारका लक्षण समञ्जना चाहिये । “ए
ओर “ ओ" इन दो उदात्त स्वरोंसे परे जो वकारसदहित
अकार् निहित (अनुदात्तरूपमें निपातित) हो ओर
उसका जहां लोप (ए'कार या "उकार में अनुप्रवेश)
होता हे, उसे ' अभिनिहित ' स्वार माना जाता हेै।
छन्दमे जहां कहीं या जो कोई भी एेसा स्वरित
होता है, जिसके पूर्वमे उदात्त हो, तो वह सर्वं
बहुस्वार-( सर्वत्र बहुलतासे होनेवाला स्वर)
' तेरव्यञ्जन ' कहलाता है । यदि उदात्त अवग्रह हो
ओर अवग्रहसे परे अनन्तर स्वरित हो तो उसे
' तिरोविराम' समञ्जना चाहिये । जहां उदात्त ' इ "कारको
अनुदात्त इ "कारसे संयुक्त देखो, वर्ह विचार लो
कि ' प्रश्लिष्ट ' स्वार है । जहा स्वर अक्षर अकारादिमं
स्वरित हो ओर पूर्वपदके साथ संहिता विभक्त हो,
उसे पादवृत्त स्वारका शास्त्रोक्त लक्षण समञ्जना
चाहिये ।
` जात्य ' स्वारका उदाहरण है-' स जात्येन!
इत्यादि । श्रुष्टी+ अग्ने =श्रु्यग्ने आदि स्थले क्षेप्र
स्वार हे। 'वे मन्वत' इत्यादिमें ‹ अभिनिहित'
स्वार जानना चाहिये । उ+ऊतये=ऊतये, वि+ईतये=
वीतये इत्यादिमें " तेरव्यञ्जन' नामक स्वार है।
' विस्कभिते विस्कभिते" आदि स्थलोमें ' तिरोविराम'
हे । ' हि इन्द्र गिर्वणः ' = हीन्द्र° ' इत्यादिमें ' प्रश्लिष्ट"
स्वार हे । ' क ईम् कई वेद ' इत्यादिमें ' पादवृत्त"
नामक स्वार है। इस प्रकार ये सब सात स्वार हे।
जात्य स्वरोको छोडकर एक पूर्ववर्तीं उदात्त
अक्षरसे परे जो भी अक्षर हो, उसकी स्वरित संज्ञा
होती है। यह स्वरितका सामान्य लक्षण बताया
जाता हे। पूर्वोक्त चार स्वार उदात्त अथवा एक
अनुदात्त परे रहनेपर शास्त्रतः ' कम्प ' उत्पन्न करते
हं । (जिसका स्वरूप चल हो, उस स्वारका नाम
कम्प हे) इसका उदाहरण है ' जुहग्रिः।' “उप
त्वा जुह्"„, 'उप त्वा जुहो मम' इत्यादि।
पूर्वपद !इ'कारान्त हो ओर परे 'उ'कारकी
स्थिति हो तो मेधावी पुरुष वहां ! हस्व कम्प!
जाने-इसमं संशय नहीं हे । यदि “उ 'कारद्रययुक्त
पद परे हो तो इकारान्त पदमे दीर्घ कम्प
जानना चाहिये । इसका दृष्टान्त है -' शग्ध्युषू'
इत्यादि । तीन दीर्घं कम्प जानने चाहिये, जो
संध्यक्षरोमे होते हे । उनके क्रमशः उदाहरण ये
है-मन्या। पथ्या। न इन्द्राभ्याम्। शेष हस्व कटे
गये हे । जव अनेक उदात्तोके बाद कोई अनुदात्त
प्रत्यय हो तो एक उदात्त परे रहते दूसरे-तीसरे
उदात्तको “शिवकम्प' संज्ञा होती है अर्थात् वह
शिवकम्पसंज्ञक आद्युदात्त होता है। किंतु वह
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
उदात्त प्रत्यय होना चाहिये । जहां दो, तीन, चार
आदि उदात्त अक्षर हों, नीच-अनुदात्त हो ओर
उससे पूर्वं उच्च अर्थात् उदात्त हो ओर वह भी
पूर्ववर्तीं उदात्त या उदात्तोंसे परे हो तो वहा विद्वान्
पुरुष "उदात्त' मानते हें । रेफ या ' ह "कारमं कहीं
द्वित्व नहीं होता-दो रेफ या दो “ह कारका प्रयोग
एक साथ नहीं होता। कवर्ग आदि वगेकि दूसरे
ओर चौथे अक्षरोमें भी कभी द्वित्व नहीं होता।
वग्कि चौथे अक्षरको तीसरेके द्वारा ओर दूसरेको
प्रथमके द्वारा पीडित न करे। आदि, मध्य ओर
अन्त्य (क, ग, ङ आदि)-को अपने ही अशक्षरसे
पीडित (संयुक्त) करे। यदि संयोगदशामें अनन्त्य
(जो अन्तिम वर्ण नहीं हे, वह “ग ^कार आदि)
वर्ण पहले हो ओर ' न 'कारादि अन्त्य वर्ण बादमें
होतो मध्यमेयम(यवरलजमङ णन)
अक्षर स्थित होता हे, वह पूर्ववर्तीं अक्षरका सवर्णं
हुआ करता हे पूर्ववर्तींशषसतथायरल
व-इन अक्षरोसे संयुक्त वर्गान्त्य वर्णोको देखकर
यम निवृत्त हो जाते है- ठीक वैसे ही, जसे चोर-
डाकुओंको देखकर राही अपने मारगसि लौट जाते
हें । संहितामें जब वगकि तीसरे ओर चौथे अक्षर
संयुक्त हों तो पदकालमें चतुर्थं अक्षरसे ही आरम्भ
करके उत्तर पद होगा। दूसरे, तीसरे ओर "ह कार -
इन सबका संयोग हो तो उत्तरपद हकारादि ही
होगा। अनुस्वार, उपध्मानीय तथा निह्वामूलीयके
अक्षर किसी पदमे नहीं जाते, उनका दो वार
उच्चारण नहीं होता । यदि पूर्वमे र या ह अक्षरसे
संयोग हो तो परवर्ती अक्षरका द्वित्व हो जाता हे।
जहां संयोगमें स्वरित हो तथा उद्धुत (नीचेसे ऊपर
जाने) -में ओर पतन (ऊचेसे नीचे जाने) -मं
स्वरित हो, वहाँ पूर्वाङ्गको आदिमे करके (नीचमं
उच्चत्व लाकर) पराद्गके आदिमं स्वरितका संनिवेश
करे। संयोगके विरत (विभक्त) होनेपर जो उत्तरपदम
१९३
असंयुक्त व्यञ्जन दिखायी दे, उसे पूर्वाङ्गं जानना
चाहिये तथा जिस व्यञ्जनसे उत्तरपदका आरम्भ
हो, उसे पराद्क समञ्च । संयोगसे परवर्ती भागको
स्वरयुक्त करना चाहिये, क्योकि वह उत्तम एवं
संयोगका नायक ठै, वहीं प्रधानतया स्वरकी
विश्रान्ति होती हे तथा व्यञ्जनसंयुक्त वर्णका पूर्वे
अक्षर स्वरित है; उसे विना स्वरके ही बोलना
चाहिये । अनुस्वार, पदान्त, प्रत्यय तथा सवर्णपद्
परे रहनेपर होनेवाला द्वित्व तथा रेफस्वरूप
स्वरभक्ति- यह सब पूर्वाङ्गं कहलाता हे । पादादिमें,
पदादिमें, संयोग तथा अवग्रहोमें भी 'य' कारके
द्वित्वका प्रयोग करना चाहिये; उसे "य्य" शब्द
जानना चाहिये । अन्यत्र य! केवल “य ' के रूपम
ही रहता है। पदादिमें रहते हुए भी विच्छेद
(विभाग) न होनेपर अथवा संयोगके अन्तमं
स्थित होनेपर र ह रेफविशिष्ट य-इनको छोडकर
अन्य वर्णोका अयादेश (द्वित्वाभाव) देखा जाता
है । स्वयं संयोगयुक्त अक्षरको गुरु जानना चाहिये ।
अनुस्वारयुक्त तथा विसर्गयुक्त वर्णका गुरु होना तो
स्पष्ट ही है । शेष अणु (हस्व) दै । "हि" “गो
इनमें प्रथम संयुक्त ओर दूसरा विसर्गयुक्त ह।
संयोग ओर विसर्ग दोनोके आदि अक्षरका गुरुत्व
भी स्पष्ट है । जो उदात्त है, वह उदात्त ही रहता
है; जो स्वरित हे, वह पदमं नीच (अनुदात्त)
होता है। जो अनुदात्त हे, वह तो अनुदात्त रहता
ही है; जो प्रचयस्थ स्वर है, वह भी अनुदात्त हो
जाता हे। विभिन्न मन््रमें आये हुए “अग्निः, “सुतः
“मित्रम्, “इदम्, ' वयम्, ' अया”, ` वहा", ' प्रियम्,
"दूतम्" “चृतम्', ' चित्तम्" तथा ˆ अभि" ये पद
नीच (अर्थात् अनुदात्तसे आरम्भ) होते है।
"अक", "सुत! "यत्त", 'कलश', “शत तथा
'पवित्र'-इन शब्दाम अनुदात्तसे श्रुतिका उच्चारण
प्रारम्भ किया जाता है। "हरि", "वरुण", * वरेण्य ^,
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"धारा" तथा ! पुरुष'-इन शब्दोमें रेफायुक्त स्वर
ही स्वरित होता हे। ' विश्वानर ' शब्दमे नकारयुक्त
ओर अन्यत्र ' नर ' शब्दोमें रेफयुक्त स्वर ही स्वरित
होता हे । परंतु * उदुत्तमं त्वं वरुण” इत्यादि वरुण-
सम्बन्धी दो मन्त्रोमें 'व' कार ही स्वरित होता है,
रेफ नहीं । “उरु धारा मरं कृतम्” “उरु धारेव
दोहने ' इत्यादि मन्त्रोमें ' धारा'का *धाकार' ही
स्वरित होता है, रेफ नहीं । (यह पूर्वं नियमका
अपवाद है) हस्व या दीर्घ जो अक्षर यहाँ स्वरित
होता हे, उसकी पहली आधी मात्रा उदात्त होती
है ओर शेष आधी मात्रा उससे परे अनुदात्त होती
हे (पाणिनिने भी यही कहा है-' तस्यादित
उदात्तमर्धहस्वम् ' [१।२।३२]) कम्प, उत्स्वरित
ओर अभिगीतके विषयमे जो द्विस्वरका प्रयोग
होता है, वहो हस्वको दीरघके समान करे ओर
हस्व कर्षण करे। पलक मारनेमें जितना समय
लगता हे, वह एक मात्रा हे । दूसरे आचार्य एेसा
मानते हं कि बिजली चमककर जितने समयमे
अदृश्य हो जाती है, वह एक मात्रा" का मान हे ।
कुछ विद्वानोका एेसा मत है कि ऋ, छ अथवा श
के उच्चारणमें जितना समय लगता है, उतने
कालको एक मात्रा होती है। समासमं यदि
अवग्रह (विग्रह या पद-विच्छेद) करे तो उसमें
समासपदको संहितायुक्त ही रखे; क्योकि वहां
जिससे अक्षरादिकरण होता हे,उसी स्वरको उस
समास-पदका अन्त मानते है । सर्वत्र, पुत्र, मित्र,
सखि, अद्रि, शतक्रतु, आदित्य, प्रजातवेद, सत्यति,
गोपति, वृत्रहा, समुद्र-ये सभी शब्द अवग्राह्य
(अवग्रहके योग्य) हें । ' स्वर्युवः', “देवयुवः,
अरतिम्", "देवतातये ', ' चिकितिः', “ चुक्रुधम्'-इन
सबमे एक पद होनेके कारण पण्डितलोग अवग्रह
नहीं करते। अक्षरोके नियोगसे चार प्रकारकी
विवृत्तियां जाननी चाहिये, एेसा मेरा मत है । अव
संक्षिप्त नारदपुराण
तुम मुञ्जसे उनके नाम सुनो- वत्सानुसृता, वत्सानुसारिणी,
पाकवती ओर पिपीलिका। जिसके पूर्वपदे हत्व
ओर उत्तरपदमें दीर्घ हे, वह हस्वादिरूप बचूडोसे
अनुगत होनेके कारण “ वत्सानुसृता' विवृत्ति कही
गयी हे । जिसमें पहले ही पदमें दीर्घं ओर उत्तर
पदमे ` हस्व हो, वह ' वत्सानुसारिणी ' विवृत्ति हे।
जहां दोनों पदमे हस्व ठे, वह “पाकवती ' कहलाती
हे तथा जिसके दोनों पदोमें दीर्घं हे, वह “पिपीलिका
कही गयी है। इन चारों विवृत्तियोमें एक मात्राका
अन्तर होता है। दूसरोके मतमें यह अन्तर आधा
मात्रा है ओर किन्हीके मतमें अणु मात्रा है। रेफ
तथा श ष स-ये जिनके आदिमे हो, एेसे प्रत्यय
परे होनेपर ' मकार" अनुस्वारभावको प्राप्त होता है।
यवलपरे हों तो वह परसवर्णं होता है ओर
स्पर्शवर्ण परे हों तो उन-उन व्गेकि पञ्चम वर्णको
प्राप्त होता हे। नकारान्त पद पूर्वमे हो ओर स्वर परे
हो तो नकारक द्वारा पूर्ववतीं आकार अनुरञ्जित होता
है, अतः उसे “रक्त कहते हैँ (यथा ' महरिअसि'
इत्यादि) । यदि नकारान्त पद पूर्वमे हो ओर य व
हि आदि व्यञ्जन परे हों तो पूर्वको आधी मात्रा-अणु
मात्रा अनुरञ्जित होती हे! पूर्वमे स्वरसे संयुक्त
हलन्त नकार यदि पदान्तमें स्थित हो ओर उसके
परे भी पद हो तो वह चार रूपोंसे युक्त होता है।
कहीं वह रेफ होता है, कहीं रंग (या रक्त) बनता
हे, कहीं उसका लोप ओर कहीं अनुस्वार हो लाता
है (यथा “ भवांश्चिनोति*ें रेफ होता है। ' मर्ह ३
असि' में रग है । ' महाँ इन्द्र' में “न' का लोप हुआ
है। पूर्वका अनुनासिक या अनुस्वार हआ है)।
“रग' हदयसे उठता है, कांस्यके वाद्यकी भाति
उसकी ध्वनि होती है। वह मृदु तथा दो मात्राका
( दीर्घ) होता है । दधन्वों २ यह उदाहरण है । नारद ।
जेसे सौरा देशकी नारी “अरां ' बोलती है, उसी
प्रकार “रंग' का प्रयोग करना चाहिये- यह मेरा
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
मत हे। नाम, आख्यात, उपसर्ग तथा निपात-इन
चार प्रकारके पदोके अन्तमें स्वरपूर्वक गडद्व
ङ्णनमषस-ये दस अक्षर "पदान्त" कहे गये
हें । उदात्त स्वर, अनुदात्त स्वर ओर स्वरित स्वर
जहाँ भी स्थित हों, व्यञ्जन उनका अनुसरण करते
हैं । आचार्यलोग तीनों स्वरोकी ही प्रधानता बताते
हें । व्यञ्जनोंको तो मणियोके समान समञ्च ओर
स्वरको सूत्रके समान; जैसे बलवान् राजा दुर्बलके
राज्यको हडप लेता है, उसी प्रकार बलवान् दुर्बल
व्यञ्जञनको हर लेता है । ओभाव, विवृत्ति, श, ष,
स, र, जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय-ये ऊष्माकीं
आठ गतिया हे । ऊष्मा (सकार) इन आठ भावोमें
परिणत होता है। संहितामें जो स्वर-प्रत्यया विवृत्ति
होती है, वहाँ विसर्ग समञ्चे अथवा उसका तालव्य
होता है। जिसकी उपधामें संध्यक्षर (ए, ओ, एए,
ओ) हों एेसी सन्धिमें यदि य ओर व लोपको
प्राप्त हए हों तो वहाँ व्यञ्जननामक विवृत्ति ओर
स्वरनामक प्रतिसंहिता होती है। जहां ऊष्मान्त
विरत हो ओर सन्धिमें 'व' होता हो, वहां जो
विवृत्ति होती है, उसे ' स्वर विवृत्ति" नामसे कहना
चाहिये । यदि 'ओ' भावका प्रसंधान हो तो उत्तर
पद ऋकारादि होता है; वैसे प्रसंधानको स्वरान्त
जानना चाहिये । इससे भिन्न उष्माका प्रसंधान होता
है (यथा “ वायो ऋ" इति। यहाँ ओभावका प्रसंधान
है । ' क इह ' यहां ऊष्माका प्रसंधान है) । जब श
षस आदि परे हो, उस समय यदि प्रथम (वगकि
पहले अक्षर) ओर उत्तम (वर्गके अन्तिम अक्षर)
पदान्तमें स्थित हों तो वे द्वितीय स्थानको प्राप्त होते
है । ऊप्मसंयुक्त होनेपर अर्थात् सकारादि परे
होनेपर प्रथम जो तकार अदि अक्षर है, उनको
द्वितीय (थकार आदि)-की भति दिखाये-थकार
आदिकी भति उच्चारण करे, उन्हें स्पष्टतः थकार्
आदिके रूपें ही न समञ्च ले। उदाहरणक
१९५
लिये-' मत्स्यः, क्षुरः" ओर “अप्सराः ' आदि
उदाहरण हँ । लौकिक श्लोक आदिमे छन्दका
ज्ञान करानेके लिये तीन हेतु है- छन्दोमान, वृत्त
ओर पादस्थान (पदान्त) । परंतु ऋचाएं स्वभावतः
गायत्री आदि छन्दोंसे आवृत हें । उनकी पाद-गणना
या गुरु, लघु एवं अक्षरोको गणना तो छन्दोविभागको
समञ्चनेके लिये ही है; उन लक्षणोके अनुसार ही
ऋचां हों, यह नियम नर्ही है। लौकिक छन्द ही
पाद ओर अक्षर-गणनाके अनुसार होते है। ऋलर्णं
ओर स्वरभक्तिमें जो रेफ है, उसे अक्षरान्तर मानकर
छन्दको अक्षर-गणना या मात्रागणनामे सम्मिलित
करे। कितु स्वरभक्तियोमें प्रत्ययके साथ रेफरहित
अक्षरकी गणना करे । ऋवर्णमें रेफरूप व्यज्जनकी
प्रतीति पृथक् होती है ओर स्वररूप अक्षरकौ
प्रतीति अलग होती है। यदि 'ऋ' से ऊष्माका
संयोग न हो तो उस ऋकारको लघु अक्षर जाने।
जहो ऊष्मा (शकार आदि) -से संयुक्त होकर ऋकार
पीडित होता है, उस ऋवर्णको ही स्वर् होनेपर भी
गुरु समञ्जना चाहिये; यहां ' तृचम्" उदाहरण है।
(यहां ऋकार लघु है।) ऋषभ, गृहीत, वृहस्पति,
पृथिवी तथा निर््ऋति-इन पाच शब्दोमे ऋकार
स्वर ही है, इसमे संशय नहीं है। श, प, स, ह,
र-ये जिसके आदिमे हो, एेसे पदमे द्विपद सन्धि
होनेपर कहीं "इ' ओर “उ से रहित एकपदा
स्वरभक्ति होती हे, वह क्रमवियुक्त होती है।
स्वरभक्ति दो प्रकारकी कही गयी है- ऋकार तथा
रेफ उसे अक्षरचिन्तकोने क्रमशः ' स्वरोदा' ओर
'व्यञ्जनोदा' नाम दिया है।श, ष, स के विषयमे
स्वरोदया एवं विवृता स्वरभक्ति मानी गयी है ओर
हकारके विषयमे विद्वान् लोग व्यञ्जनोदया एतं
संवृता स्वरभक्ति निश्चित करते है (दोनके क्रमशः
उदाहरण है-“ऊर्पति, अर्हति) । स्वरभक्तिका प्रयोग
करनेवाला पुरुष तीन दोपांको त्याग दे--इकार,
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
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उकार तथा ग्रस्तदोष। जिससे परे संयोग हो ओर
जिससे परे छ हो, जो विसर्गसे युक्त हो, द्विमात्निक
( दीर्घ) हो, अवसानमें हो, अनुस्वारयुक्त हो तथा
घुडन्त हो-ये सव्र लघु नहीं माने जाते।
पथ्या (आर्या) छन्दके प्रथम ओर तृतीय पाद
बारह मात्राके होते हैं। द्वितीय पाद अठारह
मात्राका होता है ओर अन्तिम (चतुर्थ) पाद पंद्रह
मात्राका होता है। यह पथ्याका लक्षण बताया
गया; जो इससे भिन्न है, उसका नाम विपुला है |
अक्षरम जो हस्व हे, उससे परे यदि संयोग न
हो तो उसको "लघु" संज्ञा होती है । यदि हस्वसे
परे संयोग हो तो उसे गुरु समञ्च तथा दीर्घ
अक्षरोको भी गुरु जाने। जहाँ स्वरके आते ही
विवृति देखी जाती हो, वहां गुरु स्वर जानना
चाहिये; वहां लघुकी सत्ता नहीं है । पदोके जो
स्वर हे, उनके आठ प्रकार जानने चाहिये- अन्तोदात्त,
आद्युदात्त, उदात्त, अनुदात्त, नीचस्वरित, मध्योदात्त,
स्वरित तथा द्विरुदात्त-ये आठ पद-संज्ञाएं हें ।
` अग्निर्वृत्राणि" इसमे 'अग्निः' अन्तोदात्त दै।
' सोमः पवते" इसमे ' सोमः ' आद्युदात्त है । "प्र वो
यहम्" इसमें "प्र उदात्त ओर “ वः ' अनुदात्त है ।
बलं न्युब्जं वीर्यम्" इसमे ' वीर्यम्" नीचस्वरित
हे । "हविषा विधेम ' इसमें "हविषा मध्योदात्त है ।
भूर्भुवः स्वः" इसमें स्वः" स्वरित है। “ वनस्पतिः '
मे “व' कार ओर 'स्प' दो उदात्त होनेसे यह
द्विरुदात्तका उदाहरण है। नाममें अन्तर एवं
मध्यमे उदात्त होता है । निपातमें अनुदात्त होता हे।
उपसर्गमे आद्य स्वरसे परे स्वरित होता दै तथा
आख्यातमें दो अनुदात्त होते हं । स्वरितसे परे जो
धार्य अक्षर है (यथा ' निहोता सत्सि" इसमें "ता
स्वरित हे, उससे परे "सत्सि" ये धार्य अक्षर हैँ),
वे सव प्रचयस्थान है; क्योकि " स्वरित" प्रचित
होता है । वहाँ आदिस्वरितका निघात स्वर होता
संक्षिप्त नारदपुराण
हे । जहां प्रचय देखा जाय, वहाँ विद्वान् पुरुष
स्वरका निघात करे। जहो केवल मृदु स्वरित हो,
वहं निघात न करे। आचार्य-कर्म पाँच प्रकारका
होता है- मुख, न्यास, करण, प्रतिज्ञा तथा उच्वारण।
इस विषयमे कहते हैँ, सप्रतिज्ञ उच्चारण ही श्रेय
है। जिस किसी भी वर्णका करण (शिक्षादि
शास्त्र) नहीं उपलब्ध होता हो, वहां प्रतिज्ञा
( गुरुपरम्परागत निश्चय) -का निर्वाह करना चाहिये;
क्योकि करण प्रतिज्ञारूप ही है। नारद! तुम,
तुम्बुरु, वसिष्ठजी तथा विश्वावसु आदि गन्धर्व भी
सामके विषयमे शिक्षाशास्त्रोक्त सम्पूर्ण लक्षणोको
स्वरको सृक्ष्मताके कारण नहीं जान पाते।
जठराग्निको सदा रक्षा करे। हितकर (पथ्य)
भोजन करे। भोजन पच जानेपर उषःकालमें
नीदसे उठ जाय ओर ब्रह्मका चिन्तन करे।
शरत्कालमें जो विपुवद्योग (जिस समय दिन-
रात बराबर होते हैँ) आता हे, उसके बीतनेके
बाद जबतक वसन्त ऋतुको मध्यम रात्रि उपस्थित
न हो जाय तवबतक वेदोकि स्वाध्यायके लिये उषः-
कालमें उठना चाहिये । सबेरे उठकर मौनभावसे
आम, पलाश, विल्व, अपामार्ग अथवा शिरीष-
इनमेसे किसी वृक्षक टहनी लेकर उससे दोतुन
करे। खेर, कदम्ब, करवीर तथा करंजकी भी
दोतुन ग्राह्य है। कटि तथा दूधवाले सभी वृक्ष
पवित्र ओर यशस्वी माने गये है । उनकी दोतुनसे
इस ॒पुरुषकी वाक्-इन्दरियमें सुृक्ष्मता (कफको
कमी होकर सरलतापूर्वक शब्दोच्चारणको शक्ति)
तथा मधुरता (मीठी आवाज) आती है। वह
व्यक्ति प्रत्येक वर्णका स्पष्ट उच्चारण कर लेता है,
जेसी कि " प्राचीनोदवत्रि' नामक आचार्यक मान्यता
हे। शिष्यको चाहिये वह नमकके साथ सदा
त्रिफलाचूर्णं भक्षण करे । यह त्रिफला जठराग्रिको
प्रज्वलित करनेवाली तथा मेधा (धारणशक्ति)-को
((-0. 1/८1114<511॥1 8118811 \/8181185। 01661101. 01411260 0 68110011
पूर्व भाग-द्वितीय पाद
बटानेवाली है । स्वर ओर वण्कि स्पष्ट उच्चारणमें
भी सहयोग करनेवाली है। पहले जठरानलकी
उपासना अर्थात्-मल-मूत्रादिका त्याग करके
आवश्यक धर्मो (दोतुन, स्नान, संध्योपासन)-का
अनुष्ठान करनेके अनन्तर मधु ओर घी पीकर शुद्ध
हो वेदका पाठ करे। पहले सात मन्त्रोको उपांशुभावसे
(विना स्पष्ट बोले) पढे, उसके बाद मन्द्रस्वरमें
वेदपाठ आरम्भ करके यथेष्ट॒स्वरमें मन्त्रोच्चारण
करे। यह सब शाखाओंके लिये विधि दहै।
प्रातःकाल एसी वाणीका उच्चारण न करे, जो प्राणोका
उपरोध करती हो; क्योकि प्राणोपरोधसे वैस्वर्य
(विपरीत स्वरका उच्चारण) हो जाता है। इतना
ही नहीं, उससे स्वर ओर व्यञ्जनका माधुर्य भी
लुप्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं हे । कुतीर्थसे
प्राप्त हुईं दग्ध (अपवित्र) वस्तुको जो दुर्जन पुरुष
खा लेते है, उनका उसके दोषसे उद्धार नहीं
होता-ठीक उसी तरह, जैसे पापरूप सर्पके
विषसे जीवनक रक्षा नहीं हो पाती। इसी प्रकार
कुतीर्थं (बुरे अध्यापक) -से प्राप्त हुआ जो दग्ध
(निष्फल) अध्ययन है, उसे जो लोग अशुद्ध
वणेकि उच्वारणपूर्वक भक्षण (ग्रहण) करते हैँ
उनका पापरूपी सर्पके विषकी भति पापी उपाध्यायसे
मिले हुए उस कुत्सित अध्ययनके दोपसे छुटकारा
नहीं होता। उत्तम आचार्यसे प्राप्त अध्ययनको
ग्रहण करके अच्छी तरह अभ्यासमें लाया जाय तो
वह शिष्यमें सुप्रतिष्ठित होता है ओर उसके द्वारा
सुन्दर मुख एवं शोभन स्वरसे उच्चारित वेदकं
बड़ी शोभा होती है। जो नाक, आंख, कान
आदिके विकृत होनेसे विकराल दिखायी देता है
जिसके ओठ लंबे-लंबे हैं, जो सब वात नाकसं
ही बोलता है, जो गद्रद-कण्ठसे बोलता है अथवा
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जिसकी जीभ वंधी-सी रहती है अर्थात् जो सुक-
रुककर बोलता हे, वह वेदमन्त्रोके प्रयोगका
अधिकारी नहीं हे। जिसका चित्त एकाग्र है
अन्तःकरण वशमें हे ओर जिसके दाति तथा ओष्ठ
सुन्दर हं, एेसा व्यक्ति यदि स्रानसे शुद्ध हो गाना
छोड़ दे तो वह मन्तराक्षरोका ठीक प्रयोग कर
सकता है। जो अत्यन्त क्रोधी, स्तब्ध, आलसी
तथा रोगी ह ओर जिनका मन इधर-उधर फैला
हुआ है, वे पाँच प्रकारके मनुष्य विद्या ग्रहण नहीं
कर पाते। विद्या धीरे-धीरे पदी जाती दहै। धन
धीरे-धीरे कमाया जाता हे, पर्वतपर धीरे-धीरे
चदूना चाहिये । मार्गका अनुसरण भी धीरे-धीरे
ही करे ओर एक दिनमें एक योजनसे अधिक्र न
चले। चीरी धीरे-धीरे चलकर सहस्रं योजन
चली जाती है। किंतु गरुड भी यदि चलना शुरू
न करे तो वह एक पग भी आगे नहीं जा सकता।
पापीको पापदूपित वाणी प्रयोगो (वेदमन्त्र) -का
उच्चारण नहीं कर सकती- ठीक उसी तरह, जसे
बातचीतमे चतुर सुलोचना रमणी बहरेके आगे
कुछ नहीं कह सकती । जो उपांशु (सूक्ष्म)
उच्चारण करता टै, जो उच्वारणमें जल्दबाजी
करता है तथा जो डरता हआ-सा अध्ययन करता
है, वह सहस्र रूपों (शब्दोच्चारण) -के विषयमे
सदा संदेहमें ही पड़ा रहता ठै । जिसने केवल
पुस्तकके भरोसे पदा है, गुरुके समीप अध्ययन
नहीं किया टे, वह सभामें सम्मानित नहीं होता-वेये
ही, जैसे जारपुरुषसे गर्भ धारण करनेवाली स्त्री
समाजे प्रतिष्ठा नहीं पाती । प्रतिदिन व्यय किये
जानेपर अञ्जनको पर्वतराशिका भी क्षय हो जाता
है ओर दीमकोके द्वारा थोड़ी-थोडी मिट्रीके
संग्रहसे भी वहत ऊचा वल्मीक बन जाता है, इस
१. शिक्षा- संग्रमे जो नारदी-शिक्षा संकलित हुई टै, उसमें इस श्लोकका पाट इस प्रकार है --
न॒हि पार्ण्णिहता वाणी प्रयोगान् वकुमर्हति। वधिरस्येव तल्पस्था विदग्धा वामलोचना ॥
((-0. 1/८1111(4/5511॥ 81188 \/81/81185। (01661101. 01411260 0 60810011
९९८
संक्षिप्त नारदपुराण
दृष्टान्तको सामने रखते हुए दान ओर अध्ययनादि | ही विद्या प्राप्त कर सकता हे । शठ प्रकृतिके मनुष्य
सत्कममिं लगे रहकर जीवनके प्रत्येक दिनको
सफल बनावे- व्यर्थं न बीतने दे। कीडे चिकने
धूलकणोंसे जो बहुत ऊचा वल्मीक बना लेते हैँ
उसमें उनके बलका प्रभाव नहीं है, उद्योग ही
कारण हे। विद्याको सहस्रं बार अभ्यासमें लाया
जाय ओर सेकडों बार शिष्योको उसे पढाया
जाय, तब वह उसी प्रकार जिह्वाके अग्रभागपर आ
जायगी, जैसे जल ऊचे स्थानसे नीचे स्थानमें
स्वयं बह आता हे। अच्छी जातिके घोडे आधी
रातमें भी आधी ही नींद सोते हँ अथवा वे आधी
रातमें सिर्फ एक पहर सोते है, उन्हींकी भोति
विद्याथियोके नेत्रोमें चिरकालतक निद्रा नहीं ठहरती ।
विद्यार्थी भोजनमें आसक्त होकर अध्ययनमें विलम्ब
न करे। नारीके मोहमें न फंसे । विद्याको अभिलाषा
रखनेवाला छात्र आवश्यकता हो तो गरुड ओर
हंसको भाति बहुत दूरतक भी चला जाय।
विद्याथीं जनसमूहसे उसी तरह डरे, जेसे सर्पसे
डरता हे । दोस्ती बढानेके व्यसनको नरक समञ्जकर
उससे भी दूर रहे । स्तरियोसे उसी तरह बचकर
रहे, जैसे राक्षसियोंसे। इस तरह करनेवाला पुरुष
विद्यारूप अर्थक सिद्धि नहीं कर पाते। कायर
तथा अहकारी भी विद्या एवं धनका उपार्जन नहीं
कर पाते। लोकापवादसे डरनेवाले लोग भी विद्या
ओर धनसे वञ्चित रह जाते हें तथा ' जो आज नहीं
कल" करते हुए सदा आगामी दिनक प्रतीक्षामें
बेटे रहते हे, वे भीन विद्या पढ पाते हैन धन
ही लाभ करते है । जेसे खनतीसे धरती खोदनेवाला
पुरुष एक दिन अवश्य पानी प्राप्त कर लेता है
उसी प्रकार गुरुकी निरन्तर सेवा करनेवाला छात्र
गुरुम स्थित विद्याको अवश्य ग्रहण कर लेता है।
गुरुसेवासे विद्या प्राप्त होती है अथवा बहुत धन
व्यय करनेसे उनकी प्रापि होती है। अथवा एक
विद्या देनेसे दूसरी विद्या मिलती है; अन्यथा
उसकी प्रापि नहीं होती । यद्यपि बुद्धिके गुणोंसे
सेवा किये विना भी विद्या प्राप्त हो जाती है;
तथापि वन्ध्या युवतीकी भोति वह सफल नहीं
होती । नारद! इस प्रकार मेने तुमसे शिक्षाग्रन्थका
संक्षेपसे वर्णन किया है। इस आदिवेदाङ्गको
जानकर मनुष्य ब्रह्मभावकी प्रापिके योग्य हो जाता
हे। (पूर्वभाग--द्वितीय पाद, अध्याय ५०)
८५2६-५ =#
वेदक द्वितीय अङ्क कल्पका वर्णन- गणेशपूजन, ग्रहशान्ति
तथा श्राद्धका निरूपण
सनन्दनजी क्छहते है- मुनीश्वर! अव मँ
कल्पग्रन्थका वर्णन करता हू; जिसके विज्ञानमात्रसे
मनुष्य कर्ममे कुशल हो जाता है। कल्प पच
प्रकारके माने गये है--नक्षत्रकल्प, वेदकल्प,
संहिताकल्प, आदधिरसकल्प ओर शान्तिकल्प।
नक्षत्रकल्पमे नक्षत्रोके स्वामीका विस्तारपूर्वक
यथार्थ वर्णन किया गया हे; वह यहां भी जानने
योग्य हे । मुनीश्वर ! वेदकल्पमे ऋगादि-विधानका
विस्तारसे वर्णन है-जो धर्म, अर्थ, काम ओर
मोक्षकी सिद्धिके लिये कहा गया हे । संहिताकल्पमें
तत्त्वदर्शी मुनियोने मन्त्रोके ऋषि, छन्द ओर
देवताओंका निर्देश किया है। आद्भिरसकल्पमें
स्वयं ब्रह्माजीने अभिचार-विधिसे विस्तारपूर्वक
छः कर्मोका वर्णन किया है। मुनिश्रेष्ठ ! शन्तिकल्पमे
दिव्य, भौम ओर अन्तरिक्ष-सम्बन्धी उत्पा्तोक
पृथक् -पृथक् शान्ति बतायी गयी है । यह संक्षेपसे
((-0. 1\/॥८111(4/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद १९९
यह देखकर ब्रह्मा आदि सब देवताओनि वेदीकी
रक्षाके लिये उसपर समिधासहित अग्निकी स्थापना
को । नारद! यज्घसे दक्षिण दिशामें दानव आदि स्थित
होते हँ; अतः उनसे यज्ञकी रक्षके लिये ब्र्माको
यज्ञवेदीसे दक्षिण दिशमें स्थापित करना चाहिये।
नारद । उत्तर दिशामें प्रणीता-प्रोक्षणी आदि सब
यज्ञपात्र रखे । पश्चिममे यजमान रहे ओर पूर्वदिशामे
सव ब्राह्यणोको रहना चाहिये। जुएमे, व्यापारमे ओर
यज्ञकर्ममं यदि कर्ता उदासीनचित्त हो जाय तो उसका
वह कर्म नष्ट हो जाता है-- यही वास्तविक स्थिति है।
यज्ञकर्ममे अपनी ही शाखाके विदान् ब्राह्यणोको ब्रह्मा
ओर आचार्य बनाना चाहिये । अन्य ऋत्विजेकि लिये
कोई नियम नही है, यथालाभ उनका पूजन करना
चाहिये । तीन-तीन अंगुलकी दो पवित्री होनी चाहिये।
चार अगुलकौो एक प्रोक्षणी, तीन अंगुलकी एक
आज्यस्थाली ओर छः अंगुलकी चरुस्थाली होनी
चाहिये। दो अंगुलका एक उपयमन कुश ओर एक
अगुलका सम्मार्जन कुश रखे । सुव छः अंगुलका
ओर सुच् सदे तीन अंगुलका बताया गया है।
| प्रादेशमात्र (अगृठेसे लेकर तर्जनीके
शिरोभागतकके नापको) हों। पूर्णपात्र छः अंगुलका
हो। प्रोक्षणीके उत्तर भागम प्रणीता-पात्र रहे ओर वह
आठ अगुलका हो। जो कोई भी तीर्थं (सरोवर),
समुद्र ओर सरिताएं हँ, वे सब प्रणीता-पात्रमें स्थित
होते है; अतः उसे जलसे भर दे। द्विजश्रेष्ठ! वस्त्रहीन
वेदी नग्न कही जाती है; अतः विद्वान् पुरुष उसके
चारों ओर कुश विदछाकर उसके ऊपर अग्रिस्थापन
करे। इनद्रका वज्र, विष्णुका चक्र ओर महादेवजीका
त्रिशूल- य तीनां कुशरूपसे तीन ‹पवित्रच्छेदन'
वनते ह। पवित्रीसे ही प्रोक्षणीको प्रणीताके
जलसं संयुक्त करना चाहिये। अतः पवित्र-
कल्पके स्वरूपका परिचय दिया गया है, अन्य
शाखाओमिं इसका विशेष रूपसे पृथक्-पृथक् निरूपण
किया गया है। द्विजश्रष्ठ। गृहकल्प सबके लिये
उपयोगी हे, अतः इस समय उसीका वर्णन करगा।
सावधान होकर सुनो। पूर्वकालमें ' ॐकार' ओर
अथ' शब्द-ये दोनों ब्रह्माजीके कण्टका भेदन
करके निकले थे, अतः ये मङ्गल-सूचक है। जो
शास्त्रोक्त कर्मोका अनुष्ठान करके उन्हँ ऊचे उठाना
चाहता हे, वह "अथ ' शब्दका प्रयोग करे । इससे वह
कर्म अक्षय होता है। परिसमूहनके लिये परिगणित
शाखावाले कुश कहे गये है, न्यून या अधिक संख्यामे
उन्हं ग्रहण करनेपर वे अभीष्ट कर्मको निष्फल कर देते
हे । पृथ्वीपर जो कृमि, कीट ओर पतंग आदि भ्रमण
करते है, उनकी रक्षाके लिये परिसमूहन कहा गया है।
ब्रह्मन्! वेदीपर जो तीन रेखाएं कही गयी है, उनको
बराबर बनाना चाहिये; उन्हें न्यूनाधिक नहीं करना
चाहिये; एेसा ही शास्त्रका कथन है । नारद ! यह पृथ्वी
मधु ओर कैटभ नामवाले दैत्योके मेदेसे व्याप्त है,
इसलिये इसे गोबरसे लीपना चाहिये । जो गाय वन्ध्या,
दुष्ट, दीनाद्धी ओर मृतवत्सा (जिसके बडे मर जाते
हो, एेसी) हो, उसका गोबर यज्ञके कार्यमें नहीं लाना
चाहिये, एसी शास्त्रको आज्ञा है। विप्रवर। जो पतद्ग
आदि भयंकर जीव सदा आकाशमें उड़ते रहते है
उनपर प्रहार करनेके लिये वेदीसे मिद्री उठानेका
विधान हे। सुवाके मूलभागसे अथवा कुशसे वेदीपर
रेखा करनी चाहिये। इसका उदेश्य है अस्थि, कण्टक,
तुष-केशादिसे शृद्धि। एेसा ब्रह्माजीका कथन है।
द्विजश्रेष्ठ। सब देवता ओर पितर जलस्वरूप है अतः
विधिज्ञ ऋषि-मुनियेनि जलसे वेदीका प्रोक्षण करनेकी
आज्ञा दी है। सौभाग्यवती स्तरियेकि द्वारा ही अग्नि
लानेका विधान है। शुभदायक मृण्मय पात्रको जलसे
धोकर उस अग्नि रखकर लानी चाहिये । वेदीपर | निर्माण अत्यन्त पुण्यदायक कर्म कहा गया है ।
रा हुजा अमृतकलश दैत्याय हड्प लिया गया, | आज्यस्थालौ पलमात्रकी बनानी चादिये। कुम्डारक
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२०७०
चाकपर गढ़ा हुञा मिद्ीका पात्र ' आसुर ' कहा
गया है। वही हाथसे बनाया हुआ-स्थालीपात्र
आदि हो तो उसे “दैविक' माना गया है । सरुवसे
शुभ ओर अशुभ सभी कर्म होते है । अतः उसकी
पवित्रताके लिये उसे अग्निम तपानेका विधान
हे। सुवको यदि अग्रभागकी ओरसे थाम लिया
जाय तो स्वामीको मृत्यु होती है। मध्यमे पकड़ा
जाय तो प्रजा एवं संततिका नाश होता है ओर
मूलभागमें उसे पकड्नेसे होताकी मृत्यु होती है;
अतः विचार कर उसे हाथमे धारण करना
चाहिये। अग्नि, सूर्य, सोम, विरञ्चि (ब्रह्माजी),
वायु तथा यम-ये छः देवता सुवके एक-एक
अगुलमे स्थित हं । अग्रि भोग ओर धनका नाश
करनेवाले है, सूर्य रोगकारक होते हैं । चन्द्रमाका
कोई फल नहीं हे । ब्रह्माजी सब कामना देनेवाले
हं, वायुदेव वृद्धिदाता हँ ओर यमराज मृत्युदायक
माने गये हे (अतः सरुवको मूलभागकी ओर तीन
अंगुल छोडकर चौथे-पांचवें अंगुलपर पकड़ना
चाहिये) । सम्मार्जन ओर उपयमन नामक दो कुश
बनाने चाहिये । इनमेंसे सम्मार्जन कुश सात शाखा
(कुश)-का ओर उपयमन कुश ्पोचका होता
हे । सुव तथा सुक् -निर्माण करनेके लिये श्रीपर्णी
(गंभारी), शमी, खदिर, विकङ्कत (कंटाई) ओर
पलाश-ये पोच प्रकारके काष्ट शुभ जानने चाहिये।
हाथभरका सुवा उत्तम माना गया है ओर तीस
अगुलका सुक् । यह ब्राह्यणोके सुव ओर सुक् के
विषयमे बताया गया है; अन्य वर्णवालोके लिये
एक अंगुल छोटा रखनेका विधान ठै । नारद ।
शूद्रो, पतितों तथा गर्दभ आदि जीवोके दृष्टि-
दोषका निवारण करनेके लिये सब पात्रके प्रोक्षणकी
विधि हे । विप्रवर ! पूर्णपात्र-दान किये विना यज्ञमें
छिद्र उत्पन्न हो जाता है ओर पूर्णपात्रकी विधि
कर देनेपर यज्ञक पूर्तिं हो जाती है। आठ मुदरीका
संक्षि नारदपुराण
"किञ्चित्" होता है, चार किञ्चित्का ‹ पुष्कल '
होता है ओर चार पुष्कलका एक "पूर्णपात्र" होता
हे, एेसा विद्वानोंका मत हे । होमकाल प्राप्त होनेपर
अन्यत्र कहीं आसन नहीं देना चाहिये । दिया जाय
तो अग्निदेव अतृप्त होते ओर दारुण शाप देते हेँ।
` आघार ' नामको दो आहुतियों अग्निदिवकी नासिका
कही गयी हे । ' आज्यभाग' नामवाली दो आहुतियाँ
उनके नेत्र हे । "प्राजापत्य ' आहुतिको मुख कहा
गया है ओर व्याहति होमको कटिभाग बताया
गया हे । पञ्चवारुण होमको दो हाथ, दो पैर ओर
मस्तक कहते हँ । विप्रवर! ' स्विष्टकृत् ' होम तथा
पूर्णाहुति- ये दो आहुतिं दोनों कान हैं । अग्निदेवके
दो मुख, एक हदय, चार कान, दो नाक, दो
मस्तक, छः नेत्र, पिङ्गल वर्ण ओर सात जिह्वां
हें । उनके वाम-भागमें तीन ओर दक्षिण-भागमें
चार हाथ हें। सुक्, सुवा, अक्षमाला ओर
शक्ति- ये सब उनके दाहिने हाथोमें हें । उनके
तीन मेखला ओर तीन पैर है । वे घृतपात्र लिये
हुए हँ । दो चंवर धारण करते है । भेड़पर चदे हुए
हे । उनके चार सींग है । बालसूर्यके समान उनकी
अरुण कान्ति हे । वे यज्ञोपवीत धारण करके जटा
ओर कुण्डलोसे सुशोभित है । इस प्रकार अग्निके
स्वरूपका ध्यान करके होमकर्म प्रारम्भ करे। दृध,
दही, घी ओर घृतपक्त या तैलपक्त पदार्थका जो
हाथसे हवन करता है, वह ब्राह्मण ब्रह्महत्यारा
होता हे (इन सबका सुवासे होम करना चाहिये) ।
मनुष्य जो अन्न खाता हे, उसके देवता भी वही
अन्न खाते हैं । सम्पूर्णं कामनाओंकी सिदधिके
लिये हविष्यमे तिलका भाग अधिक रखना
उत्तम माना गया है । होममें तीन प्रकारकी मुद्रां
वतायी गयी है-मृगी, हंसी ओर सूकरी।
अभिचार-कर्ममें सूकरी-मुद्राका उपयोग होता
है ओर शुभकर्ममें मृगी तथा हंसी नामवाली
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
मुद्राएं उपयोगे लायी जाती हैँ । सब ।
सुकरी-मुद्रा बनती है। हंसी-मुद्रामें कनिष्ठिका
अगुलि मुक्त रहती है ओर मृगी नामवाली मुद्रा
केवल मध्यमा, अनामिका ओर अङ्गुषठदवारा सम्पन्न
होनेवाली कही गयी है। पूर्वोक्त प्रमाणवाली
आहुतिको पाचों अंगुलि्योसे लेकर उसके द्वारा
अन्य ऋत्विजोके साथ हवन करे। हवन-
सामग्रीमें दही, मधु ओर घी मिलाया हुआ तिल
होना चाहिये । पुण्यकमममिं संलग्र होनेपर अपनी
अनामिका अंगुलि कुशोकी पवित्री अवश्य
धारण करनी चाहिये ।
भगवान् सुद्र ओर ब्रह्माजीने गणेशजीको "गणपति!
पदपर विठाया ओर कर्मोमिं विघ्न डालनेका कार्य
उन्हे सोप रखा है । वे विघ्नेश विनायक जिसपर
सवार होते हँ, उस पुरुषके लक्षण सुनो। वह
स्वप्रमे बहुत अगाध जलमें प्रवेश कर जाता है
मूड मुडाये मनुष्योको तथा गेरुआ वस्त्र धारण
करनेवाले पुरुषोको देखता है। कच्चा मांस खानेवाले
गृध्र आदि पक्षियों तथा व्याघ्र आदि पशुओंपर
चदृता है । एक स्थानपर चाण्डालो, गदहों ओर
ऊंटोके साथ उनसे धिरा हुआ बैठता है। चलते
समय भी अपने-आपको शतरुओंसे अनुगत मानता
है-उसे एेसा भान होता है कि शत्रु मेरा पीछा
कर रहे हे । (जाग्रत्-अवस्थामे भी) उसका चित्त
विक्षिप्त रहता है । उसके द्वारा किये हए प्रत्येक
कार्यका आरम्भ निष्फल होता है। वह अकारण
खिन्न रहता है । विघ्नराजका सताया हुआ मनुष्य
राजाका पुत्र होकर भी राज्य नहीं पाता। कुमारी
कन्या अनुकूल पति नहीं पाती, विवाहिता स्त्रीको
"क क > का व = - क ~
२०९१
अभीष्ट पुत्रको प्रापि नहीं होती । श्रत्रियको आचार्यपदं
नहीं मिलता, शिष्य स्वाध्याय नहीं कर पाता,
वेश्यको व्यापारमे ओर किसानको खेतीमे लाभ
नहीं हो पाता।
एसे पुरुषको किसी पवित्र दिन एवं शुभ
मुहूर्तम विधिपूर्वक स्नान कराना चाहिये। पीली
सरसों पीसकर उसे घीसे ढीला करे ओर उस
मनुष्यके शरीरमें उसीका उवटन लगाये। प्रियङ्गु
नागकेसर आदि सव प्रकारकी ओषधियों ओर
चन्दन, अगुरु, कस्तूरी आदि सव प्रकारकी सुगन्धित
वस्तुओंको उसके मस्तके लगाये। फिर उसे
भद्रासनपर बिठाकर उसके लिये ब्राह्मणोसे शुभ
स्वस्तिवाचन (पुण्याहवाचन) कराये। अश्वशाला,
गजशाला, वल्मीक (वोबी), नदीसद्घम तथा जलाशयसये
लायी हई पांच प्रकारकी मिट्री, गोरोचन, गन्ध
(चन्दन, कुंकुम, अगुरु आदि) ओर गुग्गुल-ये
सब वस्तुं जलमें छोडे ओर उसी जलमें छोडे, जो
गहरे ओर कभी न सूखनेवाले जलाशयसे एक रंगके
चार नये कलशोदरारा लाया गया हो । तदनन्तर लाल
रगके वृषभचर्मपर भद्रासन: स्थापित करे। (इसी
भद्रासनपर यजमानको बैठाकर ब्राह्मणोसे पूर्वोक्त
स्वस्तिवाचन करना चाहिये । इसके सिवा स्वस्तिवाचनक
अनन्तर जिनके पति ओर पुत्र जीवित हो, एेसी
सुवेशधारिणी स्त्रियोद्रारा मद्गल-गान कराते हुप्
पूर्वदिशावर्तीं कलशको लेकर आचार्य निप्राङ्कित
मन्त्रसे यजमानका अभिषेक करे)
सहस्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं कृतम्।
तेन त्वामभिषिच्छामि पावमान्यः पुनन्तु ते॥ `
"जो सहसो नेत्रां (अनेक प्रकारकी शक्तियो) -
"नीमि त कि
१. पूर्वोक्त गन्थ- ओषधादिसदित चार कलशोमिं आम्र आदिके पट्यव रखकर उनके कण्ठमें माला पहनाये, उन चन्दनम
चित करे ओर नूतन वस्त्र विभूषिते करके उन कलशोको पूर्वादि चारो दिशाओं स्थापित कर दे । फिर पवित्र एवं लिपी -
पुती वेदीपर पच दगोसे स्वस्तिक बनाकर लाल रंगका वृषभचरम, जिसका लोम उनस्कौ ओर तथा ग्रीवा पूर्वक्ी ओर,
विद्धाये ओर उसके ऊपर श्ैत वस््रसै आच्छादित काष्निर्मित आसन रखे । यष्टी भद्रासन ड । |
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
२०२
से युक्त है, जिसको सैकड़ों धाराँ (बहुत-से
प्रवाह) हँ ओर जिसे महर्षियोने पावन बनाया है,
उस पवित्र जलसे में तुम्हारा अभिषेक करता हू ।
पावमानी ऋचाएे तथा यह पवित्र जल तुम्हें पवित्र
करें (ओर विनायकजनित विघ्रको शान्ति हो) ।'
(तदनन्तर दक्षिण दिशामें स्थित द्वितीय कलश
लेकर नीचे लिखे मन्त्रको पढते हए अभिषेक
करे)
भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः।
भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः॥
"राजा वरुण, सूर्य, वृहस्पति, इन्द्र, वायु तथा
सपर्षिगण तुम्हें कल्याण प्रदान करे।'
(फिर तीसरा पश्चिम कलश लेकर निग्राङ्कित
मन्त्रसे अभिषेक करे-)
यत्ते केशेषु दौभग्यं सीमन्ते यच्च मूर्धनि।
ललाटे कर्णयोरश्ष्णोरापस्तद् घ्नन्तु सर्वदा ॥
"तुम्हारे केशो, सीमन्तमे, मस्तकपर, ललाटमें,
कानोमें ओर नेत्रोमे भी जो दुर्भाग्य (या अकल्याण)
हे, वह सब सदाके लिये जल शान्त कर दे।'
(तत्पश्चात् चौथा कलश लेकर पूर्वोक्तं तीनों
मन्त्र पढ़कर अभिषेक करे। इस प्रकार स्नान
करनेवाले यजमानके मस्तकपर वाये हाथमे लिये
हए कुशोको रखकर उसपर गूलरकी सुवासे सरसोका
तेल उठाकर डाले, उस समय निग्राङ्किति मन्त्र
पदे- ) ' ॐ मिताय स्वाहा । ॐ संमिताय स्वाहा।
ॐ शालाय स्वाहा । ॐ कटकटाय स्वाहा । ॐ
कूष्माण्डाय स्वाहा । ॐ राजपुत्राय स्वाहा ।' मस्तकपर
होमके पश्चात् लौकिक अग्रिमे भी स्थालीपाककी
विधिसे चरु तैयार करके उक्त छः मन्त्रोसे ही उसी
अग्रिमे हवन करे। फिर होमशेष चरद्रारा बलिमन्त्रोको
पठकर इन्द्रादि दिक्पालोको बलि भी अर्पित करे।
तत्पश्चात् कृताकृत आदि उपहार-द्रव्य भगवान्
विनायकको अर्पित करके उनके समीप रहनेवाली
संक्षिप्त नारदपुराण
माता पार्वतीको भी उपहार भेट करे। फिर
पृथ्वीपर मस्तक रखकर " तत्पुरुषाय विद्महे ।
वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।' इस
मन्त्रसे गणेशजीको ओर ! सुभगायै विदमहे।
काममालिन्यै धीमहि । तन्नो गौरी प्रचोदयात्।' इस
मन्त्रसे अम्बिकादेवीको नमस्कार करे। फिर
गणेशजननी अम्बिकाका उपस्थान करे । उपस्थानसे
पूर्वं फूल ओर जलसे अर्घ्य देकर दूर्वा, सरसां
ओर पुष्पसे पूर्ण अञ्जलि अर्पण करे । (उपस्थानका
मन्त्र इस प्रकार है-)
रूपं देहि यशो देहि भगं भगवति देहि मे।
पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे॥
" भगवति। मुञ्चे रूप दो, यश दो, कल्याण
प्रदान करो, पुत्र दो, धन दो ओर सम्पूर्णं कामना्ओंको
पूर्णं करो ।'
पार्वतीजीका उपस्थान करके धूप, दीप, गन्ध,
माल्य, अनुलेप ओर नैवेद्य आदिके द्वारा उमापति
श्रीभगवान् शङ्करको पूजा करे। तदनन्तर श्वत वस्त्र
धारण करके शेत चन्दन ओर मालासे अलंकृत हो
ब्राह्मणोको भोजन कराये ओर गुरुको भी दक्षिणासहित
दो वस्त्र अर्पित करे।
इस प्रकार विनायकको पूजा करके लक्ष्मी,
शान्ति, पुष्टि, वृद्धि तथा आयुको इच्छा रखनेवाले
वीर्यवान् पुरुषको ग्रहोको भी पूजा करनी चाहिये।
सूर्य, सोम, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु
तथा केतु-इन नवों ग्रहोकी क्रमशः स्थापना
करनी चाहिये । सूर्यकौ प्रतिमा तोबेसे, चनद्रमाकी
रजत (या स्फटिक) -से, मङ्गलको लाल चन्दनसे,
बुधकी सुवर्णसे, गुरुकी सुवर्णसे, शुक्रकी रजतसे,
शनिकी लोहेसे तथा राहु-केतुको सीसेसे बनाये,
इससे शुभकी प्राति होती है। अथवा वस्त्रपर
उनके-उनके रंगके अनुसार वर्णकसे उनका चित्र
अङ्कित कर लेना चाहिये । अथवा मण्डल बनाकर
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
२०३
उनमें गन्ध (चन्दन-कुंकुम आदि)-से ग्रहोकी
आकृति बना ले। ग्रहोके रगके अनुसार ही उन्हें
फूल ओर वस्त्र भी देने चाहिये । सबके लिये
गन्ध, बलि, धूप ओर गुग्गुल देना चाहिये । प्रत्येक
ग्रहके लिये (अग्रिस्थापनपूर्वकः) समन्त्रक
होम करना चाहिये । “आ कृष्णेन रजसा० ' इत्यादि
सूर्य देवताके, “इमं देवाः ०" इत्यादि चन्द्रमाके,
` अग्रिर्मर्धां दिवः ककुत्०' इत्यादि मङ्गलके,
` उद्बुध्यस्व ० ' इत्यादि मन्त्र बुधके, ' बृहस्पते
अति यदर्यः० " इत्यादि मन्त्र वृहस्पतिके, "अन्नात्
परिखुतो० ' इत्यादि मन्त्र शुक्रके, "शन्नो देवी०!
इत्यादि मन्त्र शनैश्चरके, ' काण्डात् काण्डात्!
इत्यादि मन्त्र राहुके ओर “केतुं कृण्वन्नकेतवे '
इत्यादि मन्त्र केतुके हैँ । आक, पलाश, खेर,
अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्वा ओर कुशा-ये
क्रमशः सूर्यं आदि ग्रहोंकी समिधा हे । सूर्यादि
ग्रहोमेसे प्रत्येकके लिये एक सौ आठ या अद्भाईस
वार मधु, घी, दही अथवा खीरकी आहुति देनी
चाहिये। गुड मिलाया हुआ भात, खीर, हविष्य
(मुनि-अन्न), दूध मिलाया हुआ साठीके चावलका
भात, दही-भात, घी-भात, तिलचूर्णमिश्चित भात,
माष (उडद) मिलाया हआ भात ओर विचड़ी-
इनको ग्रहके क्रमानुसार विद्वान् पुरुष ब्राह्मणके
लिये भोजन दे। अपनी शक्तिके अनुसार यथाप्राप्त
वस्तुओंसे ब्राह्यणोंका विधिपूर्वक सत्कार करके
उनके लिये क्रमशः धेनु, शङ्ख, वैल, सुवर्ण, वस्त्र,
अश्च, काली गौ, लोहा ओर बकरा-ये वस्तुं
दक्षिणाम दे। ये ग्रहोकी दक्षिणां बतायी गयी हे ।
जिस-जिस पुरुषके लिये जो ग्रह जब अष्टम
आदि दुष्ट स्थानोमें स्थित हो, वह पुरुष उस
ग्रहकी उस समय विशेष यत्रपूर्वक पूजा करे।
ब्रह्माजीने इन ग्रहोको वर दिया है कि “जो तुम्हारी
पूजा करे, उनकी तुम भी पूजा (मनोरथपूर्तिपूर्वक
सम्मान) करना। राजाओंके धन ओर जातिका
उत्कर्षं तथा जगत्कौ जन्म-मृत्यु भी ग्रहोके ही
अधीन है; अतः ग्रह सभीके लिये पूजनीय हैँ । जो
सदा सूर्यदेवको पूजा एवं स्कन्दस्वामीको तथा
महागणपतिको तिलक करता है, वह सिद्धिको
प्राप्त होता हे। इतना ही नहीं, उसे प्रत्येक कम्में
सफलता एवं उत्तम लक्ष्मीकी प्राति होती है। जो
मातृयाग किये विना ग्रहपूजन करता है, उसपर
मातृकाएं कुपित होती ह ओर उसके प्रत्येक
कार्यम विघ्न डालती हें । शुभकी इच्छा रखनेवाले
मनुष्योको ` वसोः पवित्रम्०' इस मन्त्रसे वसुधारा
समर्पित करके प्रत्येक माङ्गलिक कर्ममें गौरी
आदि मातृकाओंको पूजा करनी चाहिये । उनके
नाम ये है-गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री,
विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, मातृकां
वैधृति, धृति, पुष्टि, इष्टि ओर तुष्टि । इनके साथ
अपनी कुलदेवी ओर गणेशजी अधिक है । वृद्धिके
अवसरोपर इन सोलह मातृकाओंको अवश्य पूजा
करनी चाहिये। इन सबकी प्रसन्नताके लिये
क्रमशः आवाहन, पाद्य, अर्घ्य, (आचमनीय),
स्नान, (वस्त्र), चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप,
फल, नैवेद्य, आचमनीय, ताम्बूल, पूगीफल, आरती
तथा दक्षिणा-ये उपचार समर्पित करने चाहिये ।
अब मैं पितृकल्पका वर्णन करूगा, जो धन
ओर संततिकी वृद्धि करनेवाला हे। अमावस्या,
अष्टका, वृद्धि (विवाहादिका अवसर), कृष्णपक्ष,
दोनों अयनोकि आरम्भका दिन, श्राद्धीय द्रव्यकी
उपस्थिति, उत्तम ब्राह्मणको प्रापि, विषुवत् योग,
सूर्यकी संक्रान्ति, व्यतीपात योग, गजच्छाया,
चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा श्राद्धके लिये रुचिकरा
होना-ये सभी श्राद्धके समय अथवा अवसर के
गये ह । सम्पूर्णं वदोके ज्ानमें अग्रगण्य, श्रोत्रिय,
व्रह्मवेत्ता, युवक, मन्त्र ओर त्राह्यणरूप वेदका
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तत्त्वत, ज्येष्ठ सामका गान करनेवाला, त्रिमधुः,
त्रिसुपर्णं, भानजा, ऋत्विक् , जामाता, यजमान,
श्वशुर, मामा, त्रिणाचिकेतः, दौहित्र, शिष्य, सम्बन्धी,
बान्धव, कर्मनिष्ठ, तपोनिष्ठ, पञ्चाप्रिसेवी", ब्रह्मचारी
तथा पिता-माताके भक्त ब्राह्मण श्राद्धको सम्पत्ति
हें । रोगी, न्यूनाङ्ख, अधिकाङ्ख, काना, पुनर्भूकी
संतान, अवकौर्णीं (ब्रह्मचर्य-आश्रममें रहते हुए
ब्रह्मचर्य भग करनेवाला), कुण्ड (पतिके जीते-
जी पर-पुरुषसे उत्पन्न को हुई संतान), गोलक
(पतिको मूृत्युके बाद जारज संतान), खराब
नखवाला, काले दोतवाला, वेतन लेकर पटढानेवाला,
नपुंसक, कन्याको कलङ्भित करनेवाला, स्वयं
जिसपर दोषारोपण किया गया हो वह, मित्र-द्रोही,
चुगलखोर, सोमरस बेचनेवाला, बड़े भाईके
अविवाहित रहते विवाह करनेवाला, माता, पिता
ओर गुरुका त्याग करनेवाला, कुण्ड ओर गोलकका
अन्न खानेवाला, शाद्रसे उत्पन्न, एक पतिको छोड़कर
आयी हई स्त्रीका पति, चोर ओर कर्मभ्रष्ट-ये
ब्राह्मण श्राद्धमे निन्दित है (अतः इनका त्याग
करना चाहिये) ।
श्राद्धकर्ता पुरुष मन ओर इन्द्रियोको वशमें
रखकर, पवित्र॒ हो, श्राद्धसे एक दिन पहले
ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। उन ब्राह्मणोको भी
उसी समयसे मन, वाणी, शरीर तथा क्रियाद्वारा
पूर्ण संयमशील रहना चाहिये । श्राद्धके दिन
अपराहकालमें आये हुए ब्राह्मणोका स्वागतपूर्वक
पूजन करे। स्वयं हाथमं कुशको पवित्री धारण
किये रहे। जब ब्राह्यणलोग आचमन कर लें, तब
उन्हे आसनपर व्रिठाये । देवकार्यं अपनी शक्तिके
अनुसार युग्म (दो,चार, छः आदि संख्यावाले)
संक्षिप्त नारदपुराण
ब्राह्यणोंको ओर श्राद्धमे अयुग्म (एक, तीन, पांच,
आदि संख्यावाले) ब्राह्मणोको निमन्त्रित करे । सव
ओरसे धिरे हुए गोबर आदिसे लिपे-पुते पवित्र
स्थानमें, जहो दक्षिण दिशाको ओर भूमि कुछ
नीची हो, श्राद्ध करना चाहिये । वैश्चदेव-श्राद्धमें
दो ब्राह्मणोको पूर्वाभिमुख बिठाये ओर पितृकार्यमें
तीन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख। अथवा दोनोमें
एक-एक ब्राह्मणको ही सम्मिलित करे । मातामहोके
श्राद्धमे भी एेसा ही करना चाहिये। अर्थात् दो
वैश्चदेव-श्राद्धमे ओर तीन मातामहादि श्राद्धमे
अथवा उभयपक्षमे एक-ही-एक ब्राह्मण रखे ।
वैश्वदेव-श्राद्धके लिये ब्राह्यणका हाथ धुलानेके
निमित्त उसके हाथमे जल दे ओर आसनके लिये
कुश दे। फिर ब्राह्मणसे पके" मे विश्देवोका
आवाहन करना चाहता हूं ।' तब ब्राह्मण आज्ञा
दे-' आवाहन करो ।' इस प्रकार उनको आज्ञा
पाकर “ विश्वेदेवास आगत० ' इत्यादि ऋचा पदकर
विश्चेदेवोंका आवाहन करे । तब ब्राह्यणके समीपको
भूमिपर जौ विखेरे। फिर पवित्रीयुक्त अर्ध्यपात्रमे
“शं नो देवी० ' इस मन्त्रसे जल छोड, ' यवोऽसि०
इत्यादिसे जौ डाले, फिर विना मन्त्रके ही गन्ध
ओर पुष्प भी छोड़ दे। तत्पश्चात् “या दिव्या आपः'
इस मन्त्रसे अर्घ्यको अभिमन्त्रित करके ब्राह्मणक
हाथमें संकल्पपूर्वक अर्घ्य दे ओर कहे-' अमुकश्राद्ध
विश्वेदेवाः इदं वो हस्तार्घ्य नमः ।' यों कहकर वह
अर्ध्यजल कुशयुक्त ब्राह्मणक हाथमे या कुशापर
गिरा दे। तत्पश्चात् हाथ धोनेके लिये जल देकर
क्रमशः गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा आच्छादन
वस्त्र अर्पण करे; पुनः हस्तशुद्धिके लिये जल दे।
(विश्वेदेवाको जो कुछ भी दे, सव्यभावसे उत्तराभिमुख
१. "मधु वाता ' इत्यादि तीन ऋचाओंका जप ओर तदनुकूल व्रतका आचरण करनेवाला २. त्रिसौपर्णी ऋचा्ओंका
अध्येता ओर तत्सम्बन्धी त्रतका पालन करनेवाला ।३. त्रिणाचिकेत- संज्ञक त्रिविध अग्रिविद्याको जाननेवाला ओर तदनुकूल
व्रतक्रा पालक। ४. सभ्य, आवसथ्य तथा त्रिणाचिकेत-इन पोच अग्रिर्योका उपासक ।
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पूर्व भाग-द्वितीय पाद
होकर दे ओर पितरोको प्रत्येक वस्तु |
दक्षिणाभिमुख होकर देनी चाहिये) ।
वेश्वदेवकाण्डके अनन्तर यज्ञोपवीत अपसव्य
करके पिता आदि तीनके लिये तीन द्विगुण-भुग्र
कुशोको उनके आसनके लिये अप्रदक्षिण-क्रमसे
दे । फिर पूर्ववत् ब्राह्यणोकी आज्ञा लेकर "उशन्तस्त्वा० '
इत्यादि मन्त्रसे पितरोका आवाहन करके “ आयन्तु
न:० ' इत्यादिका जप करे। ' अपहता असुरा रक्षासि
वेदिषदः० ' यह मन्त्र पढ कर सब ओर तिल विख ।
वेश्वदेव-श्राद्धमें जो कार्य जौसे किया जाता है, वही
पितृश्राद्धमें तिलसे करना चाहिये । अर्ध्य आदि पूर्ववत्
करे। संस्रव (ब्राह्मणके हाथसे चुए हुए जल)
पितृपात्रमें ग्रहण करके भूमिपर दक्षिणाग्र कुश रखकर
उसके ऊपर उस पात्रको अधोमुख करके दलका दे
ओर कहे पित्रभ्यः स्थानमसि ।' फिर उसके ऊपर
अर्घ्यपात्र ओर पवित्रक आदि रखकर गन्ध, पुष्प,
धूप, दीप आदि पितरोको निवेदित करे।
इसके वाद “अग्नौ करण ' कर्म करे । घीसे तर
किया हुआ अन्न लेकर ब्राह्यणोंसे पृटठे" अग्नौ
करिष्ये (मे अग्रिमे इसको आहुति देना चाहता
हू) । तब ब्राह्मण इसके लिये आज्ञा दे । इस प्रकार
आज्ञा लेकर वह पिण्डपितृयक्ञको भति उस
अन्रको दो आहति दे (उस समय ये दो मन्त्र
क्रमशः पदटे-अग्रये कव्यवाहनाय स्वाहा नमः।
सोमाय पितृमते स्वाहा नमः) । फिर होमशेष
अन्नरको एकाग्रचित्त होकर यथाप्राप्त पात्रोमे- विशेषतः
चोदीके पात्रोमें परोसे। इस प्रकार अन्न परोसकर
" पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानम्० " इत्यादि मन्त्र पढ़कर
पात्रको अभिमन्त्रित करे। फिर “इदं विष्णु०'
इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके अन्नम ब्राह्यणके
अगृठेका स्पर्शं कराये। तदनन्तर तीनों व्याहतिर्योसहित
गायत्रीमच्र तथा "मधु वाता० ' इत्यादि तीन ऋचा्ओका
जप करे ओर ब्राह्मणोसे कहे-' आप सुखपूर्वक
२०५
अन्नं ग्रहण करें ।' फिर वे ब्राह्मण भी मौन होकर
प्रसन्नतापूर्वक भोजन करे। उस समय यजमान
क्रोध ओर उतावलीको त्याग दे ओर जवतक
ब्राह्मणलोग पूर्णतः तृप्त न हो जायं, तवबतक पूछ
पूषछकर प्रिय अन्न ओर हविष्य उन्हें परोसता रहे।
उस समय पूर्वोक्त मन्त्रोका तथा पावमानी आदि
ऋचाओंका जप या पाठ करते रहना चाहिये।
तत्पश्चात् अन्न लेकर ब्राह्यणोसे पूरे" क्या आप
पर्णं तृप्त हो गये ?' ब्राह्मण कहे-' हौ, हम तृप्त हो
गये।' यजमान फिर पृषे" शेष अन्न क्या किया
जाय ?' ब्राह्मण कहे--'इष्टजनोके साथ भोजन
करो ।' उनको इस आज्ञाको “ बहुत अच्छा ' कहकर
स्वीकार करे। फिर हाथमे लिये हए अन्नको
ब्राह्मणोके आगे उनको जूठनके पास ही दक्षिणाग्र
कुश भूमिपर रखकर उन कुशोपर तिल-जल
छोडकर वह अन्न रख दे। उस समय “ये
अग्रिदग्धाः०' इत्यादि मन््रका पाट करे। फिर
ब्राह्मणोके हाथमे कुल्ला करनेके लिये एक-एक
वार जल दे। फिर पिण्डके लिये तैयार किया हुआ
सारा अन्न लेकर दक्षिणाभिमुख हो पिण्डपितृयन्ञ-
कल्पके अनुसार तिलसहित पिण्डदान करे । इसी
प्रकार मातामह आदिके लिये पिण्ड दे। फिर्
ब्राह्यणोके आचमनार्थं जल दे, तदनन्तर ब्राह्यणोसे
स्वस्तिवाचन कराये ओर उनके हाथमे जल देकर
उनसे प्रार्थनापूर्वक कहे-आपलोग “ अक्षय्यमस्तु"
कहं । तव ब्राह्मण ' अक्षय्यम् अस्तु" बोले । इसके
वाद् उन्हे यथाशक्ति दक्षिणा देकर कहे-' अब मँ
स्वधावाचन कराऊंगा।' ब्राह्मण कहे“ स्वधावाचन
कराओ।' इस प्रकार उनकी आज्ञा पाकर पितरों
ओर मातामहादिके लिये “आप यह स्वधावाचन
कर, एसा कहे । तब ब्राह्मण वोले-“अस्तु स्वधा ।'
इसके अनन्तर पृथ्वीपर जल सींचे ओर ' विश्वेदेवाः
प्रीयन्ताम्" यों कहे । ब्राह्मण भी इस वाक्यको
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दुहराये-" प्रीयन्तां विश्वेदेवाः ।' तदनन्तर ब्राह्मणोकी
आज्ञासे श्राद्धकर्ता निम्राङ्कित मन्त्रका जप करे-
दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः सन्ततिरेव च।
श्रद्धा च नो मा विगमद् बहु देयं च नोऽस्त्विति॥
"मेरे दाता बद्ध । वेद ओर संतति बदे । हमारी
श्रद्धा कम नहो ओर हमारे पास दानके लिये
बहुत धन हो ।'
यह कहकर ब्राह्यणोसे नम्रतापूर्वक प्रिय वचन
बोले ओर उन्हे प्रणाम करके विसर्जन करे" वाजे-
वाजे० ' इत्यादि ऋ चाओंको पढ़कर प्रसन्नतापूर्वक
विसर्जन करे। पहले पितरोंका, फिर विश्वेदेवोंका
विसर्जन करना चाहिये । पहले जिस अर्घ्यपात्रमें
संलवका जल डाला गया था, उस पितृपात्रको
उत्तान करके ब्राह्यणोंको विदा करना चाहिये।
ग्रामको सीमातक ब्राह्यणोके पीछे-पीछे जाकर
उनके कहनेपर उनकी परिक्रमा करके लौटे ओर
पितृसेवित श्राद्धान्नको इष्टजनोके साथ भोजन करे ।
उस रात्रिम यजमान ओर ब्राह्मण-दोनोंको ब्रह्मचारी
रहना चाहिये ।
इसी प्रकार पुत्र-जन्म ओर विवाहादि वृद्धिके
अवसरोपर प्रदक्षिणावृत्तिसे नान्दीमुख पितरोका
यजन करे । दही ओर बेर मिले हुए अन्नका पिण्ड
दे ओर तिलसे किये जानेवाले सब कार्य जौसे
करे। एकोदिष्ट श्राद्ध विना वेैश्वदेवके होता है।
उसमे एक ही अर्ध्यपात्र तथा एक ही पवित्रकं
दिया जाता है । इसमें आवाहन ओर अग्नौकरणकी
क्रिया नहीं होती । सब कार्य जनेऊको अपसव्य
रखकर किये जाते हें । ' अक्षय्यमस्तु" के स्थानमें
“उपतिष्ठताम्' का प्रयोग करे । “ वाजे-वाजे" इस
मन्रसे ब्राह्मणका विसर्जन करते समय “ अभिरम्यताम्'
यों कहे ओर ये ब्राह्यणलोग "अभिरताः स्मः ' एेसा
, उत्तर दे। सपिण्डीकरण श्राद्धमे पूर्वोक्त विधिसे
अर्ध्यसिद्धिके लिये गन्ध, जल ओर तिलसे युक्त
संक्षिप्त नारदपुराण
चार अर्ध्यपात्र तैयार करे। (इनमेसे तीन तो
पितरोके पात्र है ओर एक प्रेतका पात्र होता है।)
इनमें प्रेतके पात्रका जल पितरोके पात्रोमें डाले।
उस समय "ये समाना०' इत्यादि दो मन्त्रोका
उच्चारण करे।, शेष क्रिया पूर्ववत् करे। यह
सपिण्डीकरण ओर एकोद्दिष्ट श्राद्ध माताके लिये
भी करना चाहिये। जिसका सपिण्डीकरणश्राद्ध
वर्षं पूर्णं होनेसे पहले हो जाता है, उसके लिये
एक वर्षतक ब्राह्मणको सान्नोदक कुम्भदान देते
रहना चाहिये । एक वर्षतक प्रतिमास मृत्युतिथिको
एकोदिष्ट करना चाहिये; फिर प्रत्येकः वर्षमे एक
बार क्षयाहतिथिको एकोद्दिष्ट करना उचित हे।
प्रथम एकोद्दिष्ट तो मरनेके बाद ग्यारहवें दिन
किया जाता हे। सभी श्राद्धमे पिण्डोंको गाय,
बकरे अथवा लेनेकी इच्छावाले ब्राह्यणोंको दे देना
चाहिये । अथवा उन्हें अग्रिमे या अगाध जलमें
डाल देना चाहिये। जबतक ब्राह्मणलोग भोजन
करके वहसि उठ न जायं, तबतक उच्छिष्ट
स्थानपर ज्ञाड् न लगाये। श्राद्धमे हविष्यान्नके
दानसे एक मासतक ओर खीर देनेसे एक वर्षतक
पितरोको तृपति वनी रहती है। भाद्रपद कृष्णा
त्रयोदशीको विशेषतः मघा नक्षत्रका योग होनेपर
जो कुछ पितरोके निमित्त दिया जाता है वह
अक्षय होता हे। एक चतुर्दशीको छोड़कर प्रतिपदासे
अमावास्यातकको चौदह तिधियोमें श्राद्ध-दान
करनेवाला पुरुष क्रमशः इन चोदह फलोको पाता
है-रूप-शीलयुक्त कन्या, बुद्धिमान् तथा रूपवान्
दामाद, पशु, श्रेष्ठ पुत्र, द्यूत-विजय, खेतीमें लाभ,
व्यापारमे लाभ, दो खुर ओर एक खुरवाले पशु,
ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पुत्र, सुवर्ण, रजत, कुप्यक
(त्रपु-सीसा आदि), जाति-भाईयोमें श्रेष्ठता ओर
सम्पूर्ण मनोरथ । जो लोग शस्त्रद्वारा मारे गये हो,
उन्हीके लिये उस चतुर्दशी तिथिको श्राद्ध प्रदान
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
किया जाता हे। स्वर्ग, संतान, ओज, शर्य, क्षेत्र,
बल, पुत्र, श्रेष्ठता, सौभाग्य, समृद्धि, प्रधानता,
शुभ, प्रवृत्तचक्रता (अप्रतिहत शासन), वाणिज्य
आदि, नीरोगता, यश, शोकहीनता, परम गति,
धन, वेद, चिकित्सामें सफलता, कुप्य (त्रपु-
सीसा आदि), गौ, बकरी, भेड, अश्च तथा
आयु--इन सत्ताईस प्रकारके काम्य पदार्थोको
क्रमशः वही पाता है जो कृत्तिकासे लेकर
भरणीपर्यन्त प्रत्येक नक्षत्रम विधिपूर्वक श्राद्ध
करता है तथा आस्तिक, श्रद्धालु एवं मद-मात्सर्य
आदि दोषोंसे रहित होता है। वसु, रुद्र ओर
आदित्य- ये तीन प्रकारके पितर श्राद्धके देवता
हे। ये श्राद्धसे संतुष्ट किये जानेपर मनुष्योके
पितरोको तृप्त करते हँ । जब पितर तृप्त होते है
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तव वे मनुष्योको आयु, प्रजा, धन, विद्या, स्वर्ग,
मोक्ष, सुख तथा राज्य प्रदान करते हे । इस प्रकार
मेने कल्पाध्यायका विषय थोडमें बताया है । वेद
तथा पुराणान्तरसे विशेष बातें जाननी चाहिये।
मुनीश्वर! जो विद्वान् इस कल्पाध्यायका चिन्तन
करता हे, वह इस लोकम कर्म-कुशल होता ठै
ओर परलोकमें शुभ गति पाता दै। जो मनुष्य
देवकार्य तथा पितृकार्यमं इस कल्पाध्यायका भक्तिपूर्वक
श्रवण करता हे, वह यज्ञ ओर श्राद्धका पूरा फल
पाता हे। इतना ही नही, वह इस लोकें धन,
विद्या, यश ओर पुत्र पाता है तथा परलोकमें उसे
परम गति प्राप्त होती है। अवर मँ वेदके मुखस्वरूप
व्याकरणका संक्षेपसे वर्णन करूगा। एकग्रचित्त
होकर सुनो। (पूर्वभाग, द्वितीय पाद, अध्याय ५१)
(भ 109
व्याकरण-णास््रक्ा वणन
सनन्दन उवाच
अथ व्याकरणं वध्ये संक्षेपात्तव नारद।
सिद्धरूपप्रबन्धेन मुखं वेदस्य साम्प्रतम्॥ ९॥
सनन्दनजी कहते ह- अव म शब्दके
सिद्धरूपोंका उद्वे करते हए तुमसे संक्षेपमें
व्याकरणका वर्णन करता हृ; क्योंकि व्याकरण
वेदका मुख हे॥ १॥
सुप्िडन्तं पदं विप्र सुपां सप्त विभक्तयः।
स्वौजसः प्रथमा प्रोक्ता सा प्रातिपदिकात्मिका॥ २॥
विप्रवर। सुबन्तः ओर तिडन्त पदको शब्द कहते
है (जिसके अन्तमं " सुप्' प्रत्यय हौ, वह सुबन्त
कहलाता है) । सुपृकी सात विभक्तिं हं। उनमंसे
प्रथमा (पहली) विभक्ति सु. ओ, जस्-इस प्रकार
बतायी गयी हे (“सु' प्रथमाका एकवचन है, “ओ'
द्विवचन दे ओर ' जस्" बहुवचन है) । प्रथमा विभक्ति
प्रातिपदिक (नाम) स्वरूप मानी गयी है॥ २॥
सम्बोधने च लिङ्खादावुक्ते कर्मणि कर्तरि।
अर्थवत्प्रातिपदिकं धातुप्रत्ययवर्जिंतम्॥ ३॥
१. रामः, हरिम्, पितुः, रमायाः, ज्ञानम् इत्यादि । २. तिङ् विभक्ति जिसके अन्तमं हो, उसे तिडन्त कहते दै ।
तिङ्के दो विभाग है- परस्मैपद ओर आत्मनेपद । इन दोनेमिं तीन पुरुष होते है--प्रथम, मध्यम तथा उम । प्रत्येक
पुरुषमें तीन वचन होते है- एकवचन, द्विवचन ओर वहुवचन ! परस्मेपदके प्रथम पुरुषसम्बन्धी प्रत्यय इस प्रकार
है--' तिप्, तस्, अन्ति।' ये क्रमशः एकवचन, द्विवचन तथा वहुवचन हैं । इसी प्रकार आगे भी समङ्ञना चाहिये ।
आत्मनेपदके प्रथम पुरुषमें ' ते, आते, अन्ते ' ये प्रत्यय होते है । इस प्रकार दोनों पदोकि तीनों पुरुषसम्बन्धी प्रत्य्योका
मृलमे ही उल्लेख हआ दै । यहाँ संक्षेपसे दिग्दर्शन कराया गया दै । ति" से लेकर “महे ' तकके समस्त प्रत्य्योका
संक्षिप्त नाम "तिद" है। ये जिसके अन्तम हों, वह ' तिडन्त ' है । उसीकी ' पद" संज्ञा होती टै । उदादरण-' धवति"
( होता है), "पपाठ" (पदा). ' गमिष्यति" ( जायगा), ` एधते" (वरद्ता ई) इत्यादि ।
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२०८
सम्बोधनमेः प्रथमा विभक्तिका प्रयोग होता-है;
जहां प्रातिपदिककछ अतिरिक्त लिङ्गः, परिमाणः ओर
वचन आदिका बोध कराना हो, वहां भी प्रथमा
विभक्तिका ही प्रयोग होता है। उक्त कर्ममें (जहां
कर्म वाच्य हो, उसमे) तथा उक्त कतार्मिः (जहां
कर्ता वाच्य हो, उसमे) भी प्रथमा विभक्तिका ही
प्रयोग होता हे। धातु ओर प्रत्ययसे रहित सार्थक
शब्दको प्रातिपदिक संज्ञा होती टे॥३॥
अमोशसो द्वितीया स्यात् तत्कर्म क्रियते च यत्।
द्वितीया कर्मणि प्रोक्तान्तरान्तरेण संयुते ।॥ ४॥
अम्, ओ, शस्--यह द्वितीया विभक्ति हे (यहो
भी ˆ अम्' आदिको क्रमशः एकवचन, द्विवचन ओर
बहुवचन समञ्चना चाहिये) । जो किया जाता हे, उसे
कर्म कहते हे। अनुक्तः कर्ममें द्वितीया विभक्तिका
प्रयोग कहा गया हे (कर्तृवाच्य वाक्ये कर्म अनुक्त
होता है, वहां उसकी प्रधानता नहीं रहती, इसीलिये
उसे अनुक्त' कहा गया है) । “ अन्तरा, “ अन्तरेण'
इन शब्दोका जिसके साथ संयोग या अन्वय हो, उस
शब्दमें द्वितीया विभक्तिका प्रयोग करना चाहिये ॥८॥
टाभ्याम्भिसस्तृतीया स्यात् करणे कर्तरीरिता।
येन क्रियते तत्च्छरणं स कर्ता स्यात्करोति यः॥ ५॥
सक्षिप्त नारदपुराण
भी पूर्ववत् एकवचन आदिका विभाग समञ्चना चाहिये) ।
करणम ओर अनुक्त“ कर्तम तृतीया विभक्ति
वतायी गयी हे । जिसकी सहायतासे कार्य किया जाता
हे, उसका नाम करण है ओर जो कार्य करता है, उसे
कर्ता कहते हँ (जिस वाक्यमें कर्मकी प्रधानता होती
हे, वहां कर्ता अनुक्त माना गया है) ॥५॥
डभ्याम्भ्यसश्चतुधीं स्यात्सम्प्रदाने च कारके ।
यस्मै दित्सां धारयेद्वे रोचते सम्प्रदानकम्॥ ६॥
' >, ^ भ्याम् ' ' भ्यस्'- यह चतुर्थीं विभक्ति
हे। इसका प्रयोग सम्प्रदान कारकमें होता है। जिस
व्यक्तिको कोई वस्तु देनेकी इच्छ मनमें धारण की जाय,
उसकी "सम्प्रदानः ' संज्ञा होती हे तथा जिसको कोई
वस्तु रुचिकर प्रतीत होती है, वह भी सम्प्रदान^२ है
( सम्प्रदानमें चतुर्थी विभक्ति होती हे) ॥६॥
पञ्चमी स्यान्डसिभ्याम्भ्यो ह्यपादाने च कारके।
यतोऽपेति समादत्ते अपादाने च यं यतः ॥७॥
डसि „ ' भ्याम्', ' भ्यस्" यह पञ्चमी विभक्ति
हे । इसका प्रयोग अपादान कारकमें होता हे । जहस
कोई जाता हे, जिससे कोई किसी वस्तुको लेता
हे तथा जिस स्थानसे कोई वस्तु अलग कौ जाती
या स्वतः अलग होती हे, विभाग या अलगावकों
उस सीमाको अपादान कारक कहते हे ॥ ७॥
"टा", *भ्याम्', "भिस् यह तृतीया विभक्ति हे (यहं
१. * सम्बोधनमं प्रथमा विभक्तिका प्रयोग होता है- हे राम" इत्यादि । २.“ तटः " ' तरी ', ' तटम् ' । ३. परिमाणका उदाहरण
द्रोणो व्रीहिः ' (एक दोन धान है ) इत्यादि हे । ४." एकः ', "द्रौ ', ' बहवः ' । ५. “ हरिः सेव्यते ' (श्रीहरि भक्तोद्रारा सेवित होते
हे), * लक्ष्या सेवितः ' (भगवान् विष्णु लक्ष्मीद्रारा सेवित हे) इत्यादि । ६. “रामः करोति" (राम करते है) । ७. धातुसे रहित
इसलिये कहा गया कि “ अहन्" इत्यादि पदोमें प्रातिपदिक संजा होकर ' न" लोप न हो जय । प्रत्ययरहित कहनेका कारण यह
हे कि हरिषु ^ ' करोपि ' इत्यादिमें भी " सु" कौ प्रातिपदिक संज्ञा न हो जाय । यदि प्रातिपदिक संज्ञा हो जाती तो ओत्सगिक
एकवचन लाकर पद संज्ञा करनेपर उक्त उदाहरणम दन्त्य “स ' के स्थानमें' मूर्धन्य ' ष ' नहीं हो पाता; क्योकि पदादि ' स ' कारके
स्थानम“ प' कार होनेका निषेध है ।प्रत्ययके निषेधसे प्रत्ययान्तका भी निषेध समञ्चना चाहिये । इससे “ हरिषु" इत्यादि समुदायकी
प्रातिपदिक संज्ञा नहीं होगी । सार्थक शब्दको ही प्रातिपदिक संजा होती है, निरर्थककी नहीं । इसलिये “ धनम्, वनम् इत्यादिमें
प्रत्येक अक्षरको अत्नग-अलग ' प्रातिपदिक" संज्ञा नहीं दो सकती। |
८. ' हरिं भजति ' (श्रीहरिको भजता हे) । इत्यादि वाक्योपें ' हरि ' इत्यादि पद अनुक्त ठै; इसलिये उनमें द्वितीया
विभक्तिका प्रयोग होता है । ९. इसका उदाहरण हे * अन्तरा त्वां मां हरिः ' (तुम्हारे ओर मेरे भीतर भी भगवान् है ) 1" अन्तरेण
हरि न सुखम्" (भगवान्के विना सुख नहीं है ) इत्यादि । १०-११.* रामेण बाणेन हतो वाली ' (श्रीरामने बाणसे वालीको
मारा) इस वाक्यमें राम अनुक्त कर्ता ह ओर बाण करण । अतः इन दोनोमें तृतीया विभक्तिका प्रयोग हुआ है । १२. "ब्राह्यणाय
गां ददाति" (ब्राह्मणको गाय देता है) इस वाक्ये ब्राह्मण सम्प्रदान टै, इसलिये उपरमे चतुथी हई है 1
१३. इसका उदाहरण है-“ हरये रेचते भक्तिः" (भगवान्को भक्ति पसनद टै) । १४. इसके उदाहरण इस प्रकार है-
प्रामादपेति' (गोवसे दूर जाता है), "देवदत्त यज्ञदत्तात् पुस्तकं समादत्ते" (देवदत्त यञ्दत्तसे पुस्तक लेता है), “ पात्रात् ओदनं गृह्यति"
(चर्तनसे भात लेता है), " अश्वात् पतति' (घोडेसे गिरता है), ' पर्वतात् नदी निस्सरति" (पर्वतसे नदी निकलती है) इत्यादि।
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
२०९
ङसोसामश्च षष्ठी स्यात्स्वामिसम्बन्धमुख्यके।
डयोस्सुपः सप्तमी तु स्यात्सा चाधिकरणे भवेत्॥ ८ ॥
ङस्" ' ओस्! ' आम्'- यह षष्ठी विभक्ति
हे । जहाँ स्वामी-सेवक आदि सम्बन्धकौः प्रधानता
हो, वहां (भेदके) षष्ठी विभक्तिका प्रयोग होता
हे। "डि, ' ओस् ' ' सुप्'- यह सप्तमी विभक्ति है ।
इसका प्रयोग अधिकरण कारकमें होता हे ॥ ८।
आधारे चापि विप्रेन रक्षार्थानां प्रयोगतः।
ईप्सितं चानीप्सिताद् यत्तदपादानकं स्मृतम्॥ ९॥
विप्रवर! आधार्मेः भी सप्तमी होती है। भयार्थकः
तथा रक्ार्थक^ धातुओंका प्रयोग होनेपर भयके
कारणको अपादान संञा होती है। इसी प्रकार
वारणार्थकः धातुओंका प्रयोग होनेपर अनीप्सितसे
(जो अभीष्ट नहीं है, उससे) रक्षणीय जो अभीष्ट
वस्तु ह, उसको अपादान संज्ञा होती है ॥९॥
पञ्चमी पर्यपाङ्योगे इतरर्तेऽन्यदिङ्मुखे।
एतेर्योगि द्वितीया स्यात्कर्मप्रवचनीयकः ॥ ९०॥
परि, अप, आङ्, इतर, ऋते, अन्य (आरात्)
तथा दिग्वाचक शब्द-इन सबके योगमें भी पञ्चमी
विभक्ति होती हे । ' कर्मप्रवचनीय ' संज्ञावाले शब्दके
साथ योग होनेपर द्वितीया विभक्ति होती हे॥ १०॥
लक्षणेत्थंभूतेऽभिरभागे चानुपरिप्रति।
अन्तरेषु सहार्थं च हीने ह्युपश्च कथ्यते ॥ ९१॥
लक्ष्ण, इत्थम्भूताख्यानः, भागः° तथा वीप्सा“
इन सवक अभिव्यक्तिके लिये प्रयुक्त हए प्रति,
परि, अनु-इन अव्ययोंकी ' कर्मप्रवचनीय" संज्ञा
होती है। “ भाग' अर्थको छोडकर शेप जो लक्षण
आदि अर्थ हे, उनको अभिव्यक्तिके लिये प्रयुक्त
होनेवाला “अभिः२' अव्यय भी “कर्मप्रवचनीय
होता हे । हीन^* अर्थको प्रकाशित करनेवाला “ अनु"
तथा “हीन ' ओर “अधिकः?*' अर्थक प्रकट करनेके
लिये प्रयुक्त “उप ' अव्यय भी “कर्मप्रवचनीय ' होते
हे । अन्तर अर्थात् मध्य“ अर्थं तथा सहार्थं यानी
तृतीया * विभक्तिका अर्थ व्यक्त करनेके लिये प्रयुक्त
हुआ "अनु" शब्द भी “कर्मप्रवचनीय ' हे । (इन सवके
योगमें द्वितीया विभक्ति होती है) ॥ ११॥
द्वितीया च चतुथी स्याच्चेष्टायां गतिकर्मणि ।
अप्राणिषु विभक्ती द्वे मन्यकर्मण्यनादरे ॥ १२॥
गत्यर्थक-‡ धातुओकि कर्मं द्वितीया ओर
चतुथी दोनों विभक्तियां प्रयुक्त होती है, यदि
गमनकौ चेष्टा प्रकट होती हो। (परंतु मार्ग या
उसका वाचक शब्द यदि गत्यर्थक धातुका कर्म
१. * गृहस्य स्वामी" (घरक स्वामी), ' राज्ञः सेवकः" (गजाका सेवक), दशरथस्य पुत्रः' ( दशरथके पुत्र), “ सीतायाः पर्तिः'
(सीताके पति) इत्यादि। २. ' गृहे वसति" (घरमं रहता है) । ३. आधार तीन प्रकारके है- आओपश्लोपिकः वैषविक ओर् अभिव्यापक ।
इनके क्रमशः उदाहरण इस प्रकार है) । ४. " कटे आस्ते" ( चाईपर वैठता है) " मोक्षे इच्छा अस्ति" (मोक्षविषयक इच्छा है),
' सर्वस्मिन् आत्मा अस्ति" (सवमें आत्मा है) । चौयद्विभेति' (चोरोसे डरता है)। ५. ' पापाद् रक्षति (पापस बचाता दै) ।
६. "यवेभ्यो गां वारयति" ( जौसे गायको हयता है) 1७. ' परि हरेः संसारः" (श्रीहरिसे संसार अलग है), * अप हरेः सवे दोषाः" (सव
दोष भगवानूसे दूर है), “आ मुक्तेः संसारः" (जवतक मोक्ष न हो, तभीतक संसार है), इतरः कृष्णात्" (कृष्णस भिन्न), " ऋते
भगवतः ' (भगवानके विना), “अन्यः श्रीरामात्' (श्रीयमसे भित्र), "आगत् वनात्" (वनसे दूर् या समीप), "पूर्वौ ग्रामात्" (गतस
पूर्व) इत्यादि उदाहरण समञ्चन चाहिये। ८. उदाहरण-' वृक्ष प्रति परि अनु वा विद्योतते विद्युत् (वृक्षकी ओर् विजली चमकती
है) । यहो वृक्षक प्रकाशित होनेसे विजलीकी चमकका ज्ञान होता है, अतः वृक्ष लक्षण है। किसीके मतम विद्युता विद्योतन टी
लक्षण है, इसे व्यक्त करेवाले प्रति, परि अथवा अनु किसके भी योगम द्वितीया ही होगी। ९. ' भक्तो विष्णुं प्रति, परि, अनु
वा।' (यह श्रीविष्णुका भक्त है) । यहाँ “ इत्थंभूत' का अर्थं हे किसी विशेषणको प्राप्त। भक्तत्वरूप विशेषणको प्राप्त पुस्यके कथनं
प्रयुक्त प्रति आदि अव्यय कर्मप्रवचनीय हकर ' विष्णु" शब्दे युक्त हा उसमे द्वितीया विभक्ति लते हे। १०. लक्ष्मीर्हरिं प्रति, परि, अनु
वा। इसका अर्थ हआ लक्ष्मीजी भगवान् श्रीहरिकी वस्तु है, उनपर उन्हीका अधिकार है, वे श्रीहरिका भाग ह । ११. मृलमे ' वीप्सा"
का प्रयोग न होनेपर भी 'लक्षणेत्थभूत०' (पा० सु० १। ४। ९०)-के आधारपर उसका ग्रहण किया गया दै! उसका अर्थं है
व्याप्ति । उदाहरण है-' वृक्षं वृक्षं प्रति सिञ्चति (एक-एक पेद्को सींचता है), "परि सिञ्चति,
अनु सिञ्चति" काभीप्रयोगहो
सकता । १२. उदाहरण--हरिमभि वतति। १३. अनु हरि मुः! इसका अर्थ दे-दैत्य भगवानूमे हीन ई। १४. * अधिक ' अर्थे
जहो "उप" है, वहाँ सप्तमी विभक्ति हाती है । " हीन' अर्थम जहाँ "उप" ट, उसके योगम द्वितीया होती टै। यथा-“उप हरिं
सुराः“-देवता भगवानूमे हीन ह । १५. उदाहरण-"हदयमनु हरिः ' भगवान् हृदयके भीतर टै । १६. उदाहरण- नदीमन्ववसिता
सेना। नद्या सह सम्बद्ेत्यर्थः (सेना नदीसे सम्बद्ध है) ! १७. उदाहरण ग्रामं प्रमाय वा गच्छति" (रगौँवको जाता है )
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२१०५
सक्षिप्त नारदपुराण
हो तो उसमें चतुर्थी नहीं होती, केवल द्वितीया होती
हेˆ। यह चतुर्थीका निषेध तभी लागू होता है, जव
पथिक मार्गपर चल रहा हो । यदि वह गलत रास्तेसे
जाकर अच्छा रास्ता पकड़ना चाहता हो तव
चतुर्थीका प्रयोग भी हो ही सकता हेः) जानार्थक
"मन्" धातुका क्रर्म यदि कोई प्राणिधितन्न वस्तु हो
ओर अनादर अर्थ प्रकट करनाहो तो उसमें भी
द्वितीया ओर चतुर्थी दोनों विभक्तियोँ होती हैँ * ॥ १२॥
नमःस्वस्तिस्व्धास्वाहालंवषड्योग ईरिता।
चतुर्थी चेव तादर्थ्ये तुमर्थाद्धाववाचिनः॥ १३॥
नमः, स्वस्ति, स्वधा, स्वाहा, अलम्, वषट्-इन
सव अव्यय शब्दके योगमें चतुथी विभक्तिके
प्रयोगका विधान है“ । तादर्थ्यमे अर्थात् जिस वस्तुके
लिये कोई कार्यं किया जाता है, उस “वस्तु*के
बोधक शब्दमें चतुर्थी विभक्ति होती है^ । ' तुमुन्" के
अर्थम प्रयुक्त अव्ययभित्न भावार्थक प्रत्ययान्त शब्दम
भी चतुथी विभक्तिका ही प्रयोग होना चाहिर्येः ॥ १३॥
तृतीया सहयोगे स्यात्कुत्सितेऽद् विशेषणे ।
काले भावे स्रप्तमी स्यादेतेयोगि च षष्ठ्यपि ॥ १४॥
स्वामीश्चवराधिपतिभिः साक्षिदायादसूतकेः।
निर्धारणे द्वे विभक्ती षष्ठी हेतुप्रयोगके ॥ १५॥
सह ' तथा उसके पर्यायवाची शब्दंसे योग
होनेपर तृतीया विभक्ति होती है (इसी प्रकार
सदृशार्थक शब्दोके योगमें भी तृतीया होती है) ।
यदि कोई विकृत अङ्ग विशेषणरूपसे प्रयुक्त हआ
हो तो उसमे भी तृतीया विभक्ति होती हैः! जहां
एक क्रियाके होते समय दूसरी क्रिया लक्षित होती
हो, वहां सप्तमी विभक्ति होती है । ' स्वामी"
' ईश्चर', ' अधिपति! साक्षी, "दायाद 'प्रसूत'
(तथा ' प्रतिभू')-इन शब्दके योगमें सप्तमी ओर
पष्ठी दोनों विभक्तिं होती है*' । जिस समुदायमेसे
किसी एकको जाति-सम्बन्धी, गुण-सम्बन्धी, क्रिया-
सम्बन्धी अथवा किसी विशेष नामवाले व्यक्तिसम्बन्धी
विशेषताका निश्चय करना हो, उस समुदायबोधक
शब्दम सप्तमी ओर षष्ठी दोनों विभक्त्या होती हैः ।
"हेतु ' शब्दका प्रयोग करके यदि हेत्वर्थका प्रकाशन
किया जाय तो षष्ठी विभक्ति होती हे"२ ॥ १४-१५॥
स्मृत्यर्थकर्मणि तथा करोतेः प्रतियलके।
हिंसार्थानां प्रयोगे च कृति कर्मणि कर्तरि ॥ ९६॥
स्मरणार्थक क्रियाओकि कर्ममें शेषषष्ठी होती
हेः४। ' कृ" धातुके कर्ममें भी शेषषष्ठीका विधान हे।
यदि प्रतियत्न (गुणाधान या संस्कार) सूचित होता
हो“ । ' हिंसा" अर्थवाते धातुओंका प्रयोग होनेपर
उनके कर्ममिं शेषषष्ठी होती है“: । कृदन्त शब्दका
१. यथा-' पन्थानं गच्छति" (राह चलता है) । २. यथा-"उत्पथेन पथे गच्छति (अच्छी राह पकडुनेके लिये वुरे रास्तेसे
जाता है) । ३. यथा-न त्वा तृणं मन्य, तृणाय वा" (म तुद तृणके बराबर भी नहीं समञ्चता) । वार्तिककारके तमे यहो प्राणिभित्'
को हयकर ' नौका, अन्न, शुक, शृगाल--इन शब्दको छोड़कर ' इतना बढा देना चाहिये । इससे * न त्वाम् अत्नं मन्ये" इत्यादि स्थलों
प्राणिधिन्न होनेपर भो चतुथी नहीं होगी ओर “न त्वां शुने मन्ये इत्यादि स्थले “प्राणी " होनेपर भी चतुर्थी हो जायगी । ४. क्रमशः
उदाहरण इस प्रकार ह -“ हरये नमः। स्वस्ति प्रजाभ्यः । अप्रये स्वाहा । पितृभ्यः स्वधा! अलं मल्लो मल्लाय । वषट् इनद्राय । ५.
यथा--' मुक्तये हरि भजति (मोक्षके लिये भगवानूका भजन करता है) । ६. यागाय याति- यष्ट यातीत्यर्थः ( यज्ञके लिये जाता है) ।
७. यथा- पुत्रेण सहागतः पिता (पुत्रके साथ पिता आया है) । यहोँ सह ' के योगमें तृतीया हुई हे । इसी प्रकार ' साकम् ' सार्धम् ,
` समम्'-इन शब्दकि योगमे भी तृतीया जाननी चाहिये। ८." सदृश ', "तुल्य , "सम ', “निभ, " सदृक्ष" * नीकाश", ' संकाश ^ * उपमित '
आदि शब्द सदृशार्थक हैः इनके योगमे भो तृतीया होती है, यधा-मेषेन सदृशः श्यामो हरिः (भगवान् विष्णु मेधके समान श्याम है) ।
९ . यथा- अक्ष्णा काणः (ओंखका काना), कर्णेन वधिरः (कानका बहरा ), पादेन खञ्च: (पैरका लंगड़ा) इत्यादि। १०. यथा- गोषु
दुहामानासु गतः (जव गौं दुही जाती थी, उस समव गया) । ११ . गवां गोषु वा स्वामी । मनुष्याणां मनुष्येषु वा ईश्वरः--इत्यादि उदाहरण
हे । १२. यथा-नृणां नृषु वा ब्राह्मणः शरेष्ठः । गवां गोषु वा कृष्णा बहुक्षीरा । गच्छता गच्छत्सु वा धावन् शीघ्रः । छात्राणां छत्रेषु वा। त्रः
पटुः-ये उदाहरण ह । १३. यथा- अन्नस्य हेतोर्वसति । १४. मातुः स्मरति, मातुः स्मरणम् आदि उदाहरण हि । शेषत्वेन विवक्षित हानेपर
ही षष्ठो हाती है । विवक्षा न होनेषर ' मातरं स्मरति इस प्रकार द्वितीया विभक्ति ही होगी । १५. वा
एधोदकस्योपस्कुरुते। १६. महिं पाणिनिने यहा -' जासिनिप्रहणनाटक्राधपिषां हिंसायाम्" (२।३।५६) इस सूदा हिंसा-३
परिगणित धातुरभेक्को ही ग्रहण किया है। उदाहरणके लिये “ चौरस्योज्जासनम्' ' चौरस्य प्रणिहननम्' निहननम्, प्रहणनं वा
" चौरस्योत्राटनम्। ' “ चौरस्य क्राथनम्।' “ चौरस्य पेषणं वा ।' इत्यादि प्रयोग है ।
(-0. 1/८11114<511॥1 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 68110011
पूर्व भाग-द्वितीय पाद
योग होनेपर कर्ता ओर कर्ममें षष्ठी होती हे° ॥ १६॥
न कर्तुंकर्मणोः षष्ठी निष्ठादिप्रतिपादने।
एता वे द्विविधा ज्ञेयाः सुवबादिषु विभक्तिषु ।
भूवादिषु तिडन्तेषु लकारा दश वे स्मृताः ॥ ९७॥
यदि निष्ठा आदिका प्रतिपादन करनेवाले प्रत्ययोसे
युक्त शब्दका प्रयोग हो तो कर्ता ओर कर्मे षष्ठी
नहीं होती?। ये विभक्तिर्याँ दो प्रकारकी जाननी
चाहिये- सुप् ओर तिङ्। ऊपर सुवादि विभक्तियोके
विषयमे वर्णन किया गया हे । क्रियावाचक !भू'
'वा' आदि शब्द ही तिङ् विभक्तियोके साथ
संयुक्त होनेपर तिडन्त कहे गये हें । इनमें दसः
लकार बताये गये हें ॥ १७॥
तिप्तसन्तीति प्रथमो मध्यः सिपृथस्थ उत्तमः।
मिव्वस्मसः परस्यै तु पदानां चात्मनेपदम्॥ १८ ॥
(प्रत्येक लकारमें परस्मैपद ओर आत्मनेपद-ये
दो पद होते हें । प्रत्येक पदमे प्रथम, मध्यम ओर
उत्तम-ये तीन पुरुष होते हं ।) ˆतिप्' "तस्
' अन्ति" यह प्रथम पुरुष है। “सिप्' *थस्!
' थ'- यह मध्यम पुरुष है तथा मिप्" *वस्,'
' मस्" यह उत्तम पुरुष है (प्रत्येक पुरुषे जो
तीन-तीन प्रत्यय हे, वे क्रमशः एकवचन, द्विवचन
ओर बहुवचन है) । ये सब परस्मैपदके प्रत्यय हें ।
अब आत्मनेपद बताया जाता ठै ॥ १८॥
ते आतेऽन्ते प्रथमो मध्यः से आथे ध्वे तथोत्तमः।
ए वहे मह आदेशा ज्ञेया ह्यन्ये लिडादिषु।॥ १९॥
"ते" “ आते" अन्ते" यह प्रथम पुरुष हे । ' से!
' आथे" ' ध्वे" यह मध्यम पुरुष है 1 ' ए" * वहे ' ' महे'
यह उत्तम पुरुष है। ये "लट्" लकारके स्थानें
२९९
होनेवाले आदेश हे । ' लिट्" आदि लकारोके स्थानें
होनेवाले प्रत्ययरूप आदेश दूसरे है, उन्हें (अन्य
व्याकरणसम्बन्धी ग्रन्थोसे) जानना चाहिये ॥ १९॥
नाभ्रि प्रयुज्यमाने तु प्रथमः पुरुषो भवेत्।
मध्यमो युष्मदि प्रोक्त उत्तमः पुरुषोऽस्मदि ॥ २०॥
जहां ' युष्मद् "अस्मद्" शब्दके अतिरिक्त
अन्य कोई भी नाम (सं्ञा-शब्द) उक्त कर्ता या
उक्त कर्मके रूपमे प्रयुक्त होता हो, वहां प्रथम पुरुष
होता हे । ' युष्मद् ' शब्द उक्त कर्ता या उक्त कर्मके
रूपमे प्रयुक्त हो तो मध्यम पुरुष होता है ओर
" अस्मद् ' शब्दका उक्त कर्ता या उक्त कर्मके रूपमें
प्रयोग हो तो उत्तम पुरुप कहा गया हे ॥ २०॥
भूवाद्या धातवः प्रोक्ताः सनाद्यन्तास्तथा ततः।
लडीरितो वर्तमाने भूतेऽनद्यतने तथा॥२१॥
मास्मयोगे च लङ््वाच्यो लोडाशिषि च धातुतः ।
विध्यादौ स्यादाशिषि च लिडिन्तो द्विविधो मुने ॥ २२॥
क्रिया-बोधक 'भू' “ वा' आदि शब्दोको ' धातु'
कहा गया है । ' सन्" आदि प्रत्यय जिनके अन्तमें
हो, उनकी भी धातु संज्ञा हे । धातुआंसे वर्तमानकालमं
लदट्लकारका विधान है। अनद्यतन (आजसे पहलेके)
भूतकालमें लङ् लकार होता है तथा 'मा' ओर स्म'
इन दोनोके योगमें लङ् (ओर लुङ्) लकार होता टै
यह बताना चाहिये । आशीर्वाद ओर विधि" आदि
अर्थमें धातुसे लोर् लकारका विधान है। विधि
आदि अर्थमें तथा आशीर्वादमें लिङ् लकारका भी
प्रयोग होता है, किंतु विधिलिङ् ओर आशिष्-
लिङ्के धातु-रूपोमें अन्तर होता है । मुने ! इसीलिये
वह दो प्रकारका माना गया है॥ २१-२२॥
१. यथा-' कृष्णस्य कृतिः ' यहाँ ' कृष्ण" कर्तां है, उसमें षष्ठी हुई है । "जगतः कर्ता कृष्णः ' इसमे “जगत्” कमं
है, यहां कर्ममें पष्ठ हई टै । २. आदि पदसे ' न लोकाव्ययनिष्टालर्थतूनाम्' (पा० सु° २।३।६९) ईस सूत्रम निर्दिष्ट
स्थलोको ग्रहण करना चाहिये। निष्का उदाहरण यह है-, विष्णुना हता दैत्याः ' (विष्णुपे दैत्य मारे गये) । "दैत्यान् हतवान्
विष्णुः ' (दैत्योको विष्णुने मारा) । इसमें कृदन्त शब्दका योग नेसे विष्णुशब्दमं पष्ठीकौ प्राति थौ, जो इस निषेधसे
व्राधित हो गयी। ३. लट्, लिट् लुट्. लृट्, लेट्, लोट्, लु लिदुः लुङ तथा लृङ्- य दस्र लकार है । इनर्म॑से पांचवें
लकार्क प्रयोग केवल वेदर्म हेता रै। ८. सन्, क्यच्, काम्यच्, क्यटु; क्यप, आचारक्रिप, णिच्, यदु यक्, आय, ई यद्
तथा णिड्-ये वारह प्रत्यय सनादि कटलाते है । ५. विधि (प्रेरणा या आज्ञा), निमन्त्रण (श्राद्ध आदिमे नियुक्ति या
न्योता), आमन्त्रण (इच्छानुसार आज्ञा देना) तथा अधीष्ट (सत्कार्पूरणं व्यवहार )-इनको विध्यादि कटते है ।
[ 1183 ] सं० ना० पु° ८--
0) (11111९51 ©118\/811 \/218185। (0601100. [14111260 0 €6810011
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संक्षिप्त नारदपुराण
लिडतीते परोक्षे स्याच्छुस्तने लुड् भविष्यति ।
स्यादेवाद्यतने लृट् च भविष्यति तु धातुतः ॥ २३॥
परोक्ष भृतकालमें लिट् लकारका प्रयोग होता हे।
आजके वाद होनेवाले भविष्यमें ' लुट् 'का प्रयोग किया
जाता हे। आज होनेवाले भविष्यमे (तथा सामान्य
भविष्यकालमें भी) धातुसे लृट् लकार होता हे ॥ २३॥
भूते लुङतिपत्तौ च क्रियाया लृङ् प्रकीर्तितः।
सिद्धोदाहरणं विदि संहितादिपुरःसरम्॥ २४॥
सामान्य भूतकालमे लुङ् लकारका प्रयोग
करना चाहिये । हेतुहेतुमद्धाव आदि जो लिङ्के
निमित्त हे, उन्हीके होनेपर भविष्य-अर्थमे लृङ्
लकारका प्रयोग होता है; किंतु यदि क्रियाकी
असिद्धि सूचित होती हो तभी एेसा होना उचित
हे। मुने! [अव संधिका प्रकरण आरम्भ करते
हे-] संधिके सिद्ध उदाहरण संहिता आदि
ग्रन्थोके अनुसार समञ्ञो ॥ २४॥
दण्डाग्रं च दधीदं च मधूदकं पितृषभः।
होतृकारस्तथा सेयं लाङ्कलीषा मनीषया ॥ २५॥
गङ्धोदकं तवल्कार ऋणार्णं च मुनीश्वर।
शीतार्तश्च मुनिश्रेष्ठ सेन्द्रः सौकार इत्यपि ॥ २६॥
पहले स्वर-संधिके उदाहरण दिये जाते है-
दण्ड+अग्रम्-दण्डाग्रम् (डंडेका सिरा)। दधि+
इदम्=दधीदम् (यह दही) । मधु+उदकम्-मधूदकम्
(मधु ओर जल) । पितु+ऋषभः =पितृषभः (पितृवर्गमे
ष्ठ) । होतृ+लृकारः = होतृकारः (होताका लृकार)" ।
इसी प्रकार 'मनीषा'के साथ 'लाङ्गलीषा' भी
सिद्धसंधि हे । मुनी श्वर ! गद्गा+उदकम्-गङ्खोदकम्
(गङ्गाजल), तव+लृकारः= तवल्कारः (तुम्हारा
लृकार), सा+इयम्= सेयम् (वह यह- स्त्री) ।'
स+ए्द्रः=सेन्द्रः (वह इन्द्रका भाग) । स+ओकारः=
सौकारः (वह ओकार) । ऋण+ऋणम्-ऋणार्णम्
(ऋणके लिये ऋण) । शीत+ऋतः= शीतार्तः (शीतसे
युक्त) । कृष्ण+एकत्वम्कृष्णेकत्वम् ( कृष्णकी एकता) ।
गद्धा+ओधः=गङ्खोघः (गद्खाकी जलराशिका प्रवाह)-ये
वृद्धि संधिके उदाहरण ह" ॥ २५-२६॥
वध्वासनं पित्रर्थो नायको लवबणस्तथा।
त आद्या विष्णवे ह्यत्र तस्मा अघो गुरा अधः ।॥ २७॥
दधि+अत्र=दध्यत्र (यहां दही दै), वधू+
आसनम् वध्वासनम् ( बहुका आसन), पितृ+
अर्थः=पित्रर्थः (पिताका धन), लु*+आकृतिः= लाकृतिः
(देवजातिकी माताका स्वरूप)-ये यणूसंधिके
उदाहरण रहै" । (हरे+ए=हरये- भगवानके लिये) ।
ने+अकः=नायकः (स्वामी) । लो+अणः=लवणः
(नमक) । (पौ+अकः =पावकः-अग्नि)- ये अयादि
१. ये पांच उदाहरण दीर्धसंधिके हं । नियम यह है कि अ, इ, उ, ऋ ओर लु-ये स्वर दीर्घं हां या हस्व, यदि अपने सवर्ण
स्वरको समीप एवं परवती पायें तो दोनों मिल जाते है ओर उन दोनेकि स्थानपर एक ही दीर्घस्वर हो जाता है। ऋ ओर लु असमान
क भी परस्पर सवर्णं माने गये हे । अतः ऋ+लृके मिलनेपर एक ही ' ऋ' बनता है, जैसा कि * होतृकारः ' मं दिखाया
गया है।
२. लाद्गल+ ईपा~लाद्गलीपा। मनस्+ईषा-मनीपा । ये ही इनके पदच्छेद हैँ । पहलेमें ' लाङ्कल' शब्दके अन्तका अ' ईपाके
इकारमें मिलकर तद्रूप हो गया दै । दूसरमे *मनस्' के अन्तका * अस्” भाग ईपाके ईकारका स्वरूप वन गया है । एेसी संधिको
पररूप कहते है । * मनीपा' का अर्थं वुद्धि ओर ' लाद्गलीपा' का अर्थं हरिस-हलका ईपादण्ड हि। वार्तिककारने मनीपा आदि
शव्दाको “शकन्धू " आदि गण (समुदाय) -मं सम्मिलित क्रिया है। एसे शब्द जो प्राचीन ग्रन्थोमिं प्रयुक्त हए ह ओर जिनके
साधनक कोई विशेष पद्धति नहीं टै, उन्हं निपातनात् सिद्ध माना गया दै।
३. ये गुणसंधिके उदाहरण है । नियम यह है कि *अ' या * आ' से परे इ" "उ" अथवा * ऋ" हों तो वह क्रमशः *ए' * ओ"
अथवा “ अर्' रूप धारण करता है। ये आदेश दो अक्षरकि स्थानपर अकेले होते है।
४. नियम यह हे कि“ अ' अथवा ' आ! से पर"ए' * ओ' अधवा "ऋ! हा तो दो अक्षरेकि स्थानपर क्रमशः "ए, ' ओ' एवं ' आ" अदेव
हेते है। "ए" या *ओ' की जगह “ए 'ओर' दै ता भो वैसा ही रूप बनता है। ' ऋ' के स्थानें "आर् होनेके स्थल परिगणित ठै।
५. नियम यह है कि “इ' “उ, *ऋ' 'लृ'-ये चार अक्षर दीर्घं हां या हस्व, इनसे पे कोई भी असवर्ण (असमान)
स्वर होनेपर इन “इ' कार आदिके स्थानपर क्रमशः य्, व्. २, ल् आदेश होते दै।
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
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पूवं भाग-द्वितीख पाद
२९१३
संधि कहलाते हेः । ते+आद्याः=त आद्याः (वे प्रथम
हे) । विष्णो+एयत्र=विष्ण एह्यत्र (भगवन् विष्णो! यहां
पधारिये) । तस्मे+अर्घः= तस्मा अर्धः (उनके लिये
अर्घ्य) । गुरो+अधः=गुरा अधः (गुस्के समीप नीचे) ।
इन उदाहरणम यलोप ओर वलोप हुए है ॥ २७॥
हरेऽव विष्णोऽवेत्येषादसो मादप्यमी अघाः ।
शोरी एतो विष्णु इमौ दुर्गे अमू नो अर्जुनः ॥ २८॥
आ एवं च प्रकृत्येते तिष्ठन्ति मुनिसत्तम ।
हरे+अव=हरेऽव (भगवन्! रक्षा कीजिये) ।
विष्णो+अवन विष्णोऽव (विष्णो! रक्षा कीजिये) ।
यह पूर्वरूप संधि है*। अदस् शब्दसम्बन्धी मकारसे
परे यदि दीर्घ 'ई' ओर "ऊ! हों तो वे ज्यों-के-
त्यों रह जाते हे। इस अवस्थाको प्रकृतिभाव
कहते है । जैसे अमी+अघाः (ये पापी है),
शोरी+एतो-(ये दोनों श्रीकृष्ण-बलराम दहै),
विष्णू+इमी=(ये दोनों विष्णुरूप है), दुर्गे+अमू्=
(ये दोनों दुर्गारूप हैँ) । ये भी प्रकृतिभावके ही
उदाहरण हें (^ नो+अर्जुनः (अर्जुन नहीं है),
आ^एवम् (एेसा ही है )- इनमें भी सन्धि नहीं
होतीः। मुनिश्रेष्ठ नारद ! “ अमी+अघाः' से लेकर
य्हातकके सभी उदाहरण एेसे है, जो अपनी
प्रकृतावस्थामें ही रहते हें ॥ २८ १/२॥
षडत्र षण्मातरश्च वाक्छ्ूरो वाग्धरिस्तथा॥ २९॥
अव व्यञ्जन सन्धिके उदाहरण दिये जाते दे।
पट्+अत्र=-पडत्र (यहां छः हैँ) । पट्+मातरः=
पण्मातरः“ (छः माताए) । वाक्+शुरः = वाक्ुरः“
(बोलनेमं बहादुर) । वाकू+हरिः= वाग्घरिः “° ( वाणीरूप
भगवान्) ॥ २९॥
१. नियम यह है कि ए", ' ओ", "ए", ' ओ "इनसे परे कोई भी स्वर हो तो इनके स्थानम क्रमशः ' अय्, अव्,
आय्, ओर आव्" आदेश होते हे ।
२. नियम यह है कि कोई भी स्वर परे रहनेपर अवर्णपूर्वक पदान्त य, व का लोप हो जाता है । यहा पूर्वोक्तं नियमानुसार
पहले अय्, अव्आदि अदेश होते है; फिर अभी वताये हुए निवमके अनुसार य, व का लोप हो जाता दै। यां “य'-
लोप या “व' लोप होनेपर *त आद्या" “विष्ण एत्र" आदिमं पुनः दीर्घ एवं गुण आदि संधि नहीं हो सकती; क्योकि इनं
संधियोकी दृष्टिं य-लोप, व-लोप असिद्ध है; इसलिये इनको प्रवृत्ति ही नहीं होती । सारांश यह कि इन स्थर्लोमिं पुनः
संधिका निषेध है।
३. नियम यह है कि पदान्त एकार ओर ओकारके बाद यदि हस्व अकार हो तो वह पूर्ववर्त स्वरमं मिल जाता है।
४. इस उदाहरणम यण्सन्धि प्राप्न हई धी; किंतु अभी बताये हए नियमकर अनुसार प्रकृतिभाव नेसे सन्धि नही दुई ।
८५. पूर्वके दो उदाहरणोमिं यण्कौ ओर आन्तिम उदाहरणम पूर्वरूप प्राति थी; परेतु सन्धिका तिपेध हो गया । नियम
यह है कि ईकारान्त, ऊकारान्त ओर एकागन्त द्विवचनका प्रकृतिभाव होता है; अतः वहाँ सन्धि नहीं होती दै।
६. पटलेमें पूर्वरूप ओर दूसरेमं वृद्धि सन्धिको प्राति थी; परंतु प्रकृतिभाव हो गया । नियम यह है कि ओकारान्त
निपात ओर एक स्वरवाले निपात जेस ह, वैसे ही रह जाते है।
७. इसमें पट् के !ट्' को जगह इद् हृआदै। तियमयहदैकिड, भ.घ,द्धु.ख, फट्, थ,च.टत्,कःप,श,
प, स-इनपेंसे यदि कोई अक्षर पदान्ते हा तो उसके स्थानमें ज, व्र. ग, इ, द-इनमंसे कोई अक्षर योग्यताक अनुसार हाता
हे। योग्यताका अभिप्राय स्थानको समानतासे है) जसे 'ट्' का स्थान मूधा है, अतः उसकी जगह मृधां स्थानक्रा “ इ' अक्षर
ही हुभआ।* ज, “ ब" आदिके स्थान भिन्न है, इसलिये वे नदीं हृए। ८. उसमं "ट् " को जगह "ण्" आदेश हुआ दै । * क' से लेकर
'म' तक्के किसी भी अक्षरके वाद् यदि अनुनासिक वर्णं (ड्ञ,ण, न, म) दातो पूर्ववत अश्व यदि पदान्तमं द ता उसके
स्थानम अनुनासिक हो जाता है। जो अक्षर जिस वर्गका है, उसके स्थानं उसो वर्गक्रा पाचर्वा अश्चर अनुनासिक दता दै।
इसीलिये उक्त उदाहरणमें ट्" की `जगह उसी वर्गका पचर्वा अक्षर" णु टना! ९. यदा " श्' के स्थानमें "द" हुआ है । ऊपर लिखे
हए *श्च' से "प' तक्के अक्षरेकरि बाद यदि "य्" हा तो उसको जग "द्" दा जता दै; विनत उस “णश! के वाद कीट स्वर् अधवा
"ह, य, व, रये अश्वर हने चादिये। यही टस स्थिक नियम दे। १०. उपर्युक्त "इ से "प' तक्के अश्षगके बाद यदि "द"
तो उस "ह" के स्थानं पूर्ववत अक्षरे वर्गच्छर चथा वर्ण द जता दै। टस नियपक्र अनुखार् उक्त उदाहरणम् “कृ! के चाद् "ह'
हेनेसे "ट स्थाने कवर्गका चौथा अश्र "य्" ह गया दै ओर "कः कौ जगह पूर्वन नियमानुपार् "ग्" हो गया ।\
((-0. 1/८1114<511॥ 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 6810011
२९४
हरिश्ोते विभुश्चिन्त्यस्तच्छेषो यच्यरस्तथा।
प्रश्रस्त्वथ हरिष्षष्ठुः कृष्णष्टीकत इत्यपि ।॥ ३०॥
हरिस्+शेते= हरिश्शेते. (श्रीहरि शयन करते
हे) । विभुस्*चिन्त्यः=विभश्चिन्त्यःः (सर्वव्यापी परमेश्वर
चिन्तन करने योग्य हे) । तत्+शेषः= तच्छेषः (उसका
शेष) । यत्*चरः=यच्चरः* (जिसमे चलनेवाला) ।
प्रश्+नःनप्रश्नः* (सवाल) । हरिस्+षष्टः=हरिष्यष्ठः°
( श्रीहरि छट हे) तथा कृष्णः+टीकते-कृष्णष्टीकतेः
(श्रीकृष्ण जाते हं) इत्यादि ॥ ३०॥
भवान्षषटश्च षट् सन्तः षट् ते तल्लेप एव च।
चक्रिश्छिन्धि भवाज्छोरिभवाञ्छोरिरिहेत्यपि।॥ ३९॥
भवान्+षष्ठः (आप छठे हे) । इसमें पूर्व
नियमके अनुसार प्राप्त होनेपर तवर्गका टवर्ग नहीं
होता. । इसी तरह पट् सन्तः (छः सत्पुरुष) ओर
संक्षिप्त नारदपुराण
मेरा बन्धन काटिये) । भवान्+शोरिः=भवाच्छोरिः,
भवाञ्शोरिः इह (आप श्रीकृष्ण यर्हँ हें),
( भवाञ्च्छोरिः,भवाञ्च्शोरिः) इस पदच्छेदमें ये
चार रूप बनते है ‹२॥३१॥
सम्यङ्डनन्तोऽङ्गच्छाया कृष्णं वन्दे मुनीश्वर ।
तेजांसि मंस्यते गङ्का हरिष्छेत्तामरश्शिवः॥ ३२॥
सम्यङ््अनन्तः=सम्यड्डनन्तः (अच्छे शेषनाग),
सुगण्+ईशः= सुगण्णीशः (अच्छे गणकोके स्वामी) ।
सन्+अच्युतः=सन्नच्युतः, ˆ "(नित्य सत्स्वरूप श्रीहरि) ।
अङ्ग+छाया=अद्गच्छाया-* (शरीरको परछाई)
कृष्णम्+वन्दे=कृष्णं वन्दे“ (-श्रीकृष्णको प्रणाम करता
हू) । तेजान्*सि= तेजांसि (तेज), मन्+स्यते= मंस्यते“
(मानेगे) । गं+गा=गङ्खा** (देव-नदी गङ्का) ।
मुनीश्वर नारद! य्हातक व्यञ्जन-सन्धिका वर्णन
हआ । अब विसर्ग-सन्धि प्रारम्भ करते हे। हरिः+ छेत्ता
पट् ते (वे छः ठै) इत्यादिमें भी एत्व नहीं हआ
हे । तत्+लेपः=तल्लेपः* (उसका लेप) । | हरिश्छेत्ता (श्रीहरि बन्धन कारेवाले है) । अमर+शिवः
चक्रिन्+छिन्धि=चक्रिश्छिन्धि-* (चक्रधारी प्रभो! | = अमरश्शिवः*“ (भगवान् शिव अमर है) ॥ ३२॥
१-२-३-४. शकार ओर चवर्गका योग हानेपर सकार ओर तवर्गके स्थानम क्रमशः शकार ओर चवर्ग होते हे । इस
नियमकर अनुसार पूर्वं दो उदाहरणोमिं * स्" की जगह ' श्" हुआ है ओर शेष दों तवर्गकी जगह चवर्ग हुआ हे। शेषके
शकारका छकार हुआ हे। नियम * वाक्छरः मं, बताया गया है । ५. शके वाद तवर्ग हो तो उसकी जगह चवर्ग नहीं होता;
अतः प्रश्रः" में न ज्यो-का-त्यों रह गया है। ६- ७. पकार ओर् टवर्गसे संयोग होनेपर सकार ओर तवर्गके स्थानें क्रमशः
पकार ओर टवर्ग होते ह । इस नियमके अनुसार दोनों उदाहरणेमिं "स" को जगह "प ' हुआ है।
८. क्योकि पकार परे रहनेपर तवरग्के टवर्ग होनेका निषेध हे।
९. क्याकि पदान्त टवर्गसे परे नाम्-भिन्न सकार ओर् तवर्गके स्थानमें षकार ओर टवर्ग नहीं होते। एेसा निपेध हे।
१०. यहां तकारक स्थानमें लकार आदेश हृआ। नियम यह है कि लकार परे रहनेपर तवर्गके स्थानरमे "ल्" हो जाता है।
११. इसमें “न् ' के स्थानमें “र', "र ' का विसर्गं एवं उसका दन्त्य * स्" होकर फिर छकारके योगमें सका तालव्य
"श्" हो गया तथा उसके पूर्वं अनुस्वार एवं अनुनासिक हुआ। नियम यह है कि छ, ठ, थ, च, ट, त~-ये अक्षर परे हां
तो नान्त पदक नकारका “२' हो, ओर उसके पूर्व स्वरका विकल्पसे अनुनासिक अथवा ^२्' से पे अनुस्वारका आगम हो।
१२. नियम यह है कि शकार परे रहनेपर् नान्त पदके आगे * त्" बट् जाता हे। शेष पस्िर्तन पवीक्त नियमके अनुसार हेते है।
१३. इन उदाहरणम ड, ण्, न् एकसे दा हो गये हं । नियम यह हे कि हस्वसे परे यदि *ड* “ण् या “न्' हो ओर
उसके वाद भी कोई स्वरहोतोवे एकसेदो हो जते रै।
१४. यहां छ के पहले आधा च् बट् गया है। नियम यह है कि ह स्वसे पर छ होनेपर उसके पहले आधा च् बट् जाता
है। १५. यहां म् के स्थानमें अनुस्वार हौ गया दै। कोई भी हल् अक्षर परे हो तो पदान्तमें स्थित म् का अनुस्वार हौ जाता है।
१६. यहां अपदान्त न् का अनुस्वार हुआ दै । नियम यह है कि इल् पर रहनेपर अपदान्त न् म् कम अनुस्वार हता है। लपे इतने
अक्षर अते हउ, भ,घ,दट,ध।,ज,व,ग,द,द,ख,.फ.षद.ठ,थ,च,टखत,क),प,. श, प, स, ह। १७. यहां
अपदान्तं अनुस्वारका परसवर्ण हुजआटहे।र, श, प, स, ह-इनको छोडकर कोई भी हल् अक्षर परे रहनेपर अपदान्त
अनुस्वारका नित्य परसवणं (परवर्ती अक्षरक्र वर्गका पञ्चम वर्ण) होता है- यह नियम टै। १८. इन दोनों उदाहरणम
विसगकरि स्थानमें दन्त्य “स् होकर श्चुत्व सन्धिके नियमसे तालव्य “ण् हो गया। नियम यह टै कि विस्गकि स्थानमें
सृ हो जाता दि खर् परे रहनेपर। उपर्युक्त अक्गेमिं 'ख' से 'स' तकके अक्षरोको खर कहते है।
((-0. 1/८111141/5511॥ 81188 \/8181185। 01611010. 01411260 0 6810011
पूर्व भाग-द्वितीय पाद
राम> काम्यः कृपरपूज्यो हरिः पूज्योऽर्च्य एव हि।
रामो दृष्टोऽबला अत्र सुप्ता दृष्टा इमा यतः ॥ ३३॥
रामः+काम्यः=रामकाम्यः (श्रीराम कमनीय
हे) । कृपः+पृज्यः=कृप पूज्यः (कृपाचार्य पूज्य
हे) । पूज्यस्+ अर्च्यः =पूज्योऽर्च्यः (पूजनीय ओर
अर्चनीय) । रामस्+दृष्टः=रामो दृष्टः (राम देखे गये
हे) । अबलास्+अत्र-अबला अत्र (यहाँ अवल
हे) । सुपास्+दृष्टाः= सुप्ता दृष्टाः (सोयी देखी गयीं) ।
इमास्+अतः=इमायतः* (ये स्त्रियो है, अतः) ॥ ३३॥
विष्णुर्नम्यो रविरयं गीर्फलं प्रातरच्युतः।
भक्तेर्वन्दयोऽप्यन्तरात्मा भो भो एष हरिस्तथा ।
एष शारी सैष रामः संहितेवं प्रकोर्तिता ॥२४॥
विष्णुः+नम्यः=विष्णुर्नम्यः (श्रीविष्णु प्रणामके
योग्य हैं) । रविः+अयम्-रविरयम् (ये सूर्य हँ)
गीः+फलम्=-गी फलम् (वाणीका फल) ।
प्रातर्+अच्युतः=प्रातरच्युतः (प्रातःकाल श्रीहरि)।
भक्तेस्*वन्द्यः = भक्तैर्वन्द्यः ( भक्तजनेके द्वारा वन्दनीय
ह) । अन्तर्+आत्मा=अन्तरात्मा (जीवात्मा या अन्तर्यामी
परमात्मा) । भोस्+भोः=भो भोः (हे हे)-ये सव
उदाहरण पूर्वोक्त नियमोसे ही वन जाते ह । एषस्+हरिः
२९१५
=एष हरिः (ये श्रीहरि टै) । एपस्+शाद्खी एष
णार्द्खी * (ये शार्ङ्गधारी हरि हं) । सस्*एपस्*रामः
=सेष रामः (वही ये श्रीराम है)। इस प्रकार
संहिता (सन्धि) -का प्रकरण बताया गया है ॥ ३४॥
(अव सुवन्तका प्रकरण आरम्भ करते हए
पहले स्वरान्त शब्दोंका शुद्ध रूप देते हें । उसमें
भी एक श्लोकद्वारा मङ्गलाचरणके लिये श्रीरामका
स्मरण करते हुए “राम ' शब्दके प्रायः सभी विभक्तियाकि
एक-एक रूपका उल्लेख कसते है-)
रामरेणाभिहितं करोमि सततं रामं भजे सादरं
रामेणापहतं समस्तदुरितं रामाय तुभ्यं नमः।
रामान्मुक्तिरभीप्सिता मम सदा रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे रज्यतु मे मनः सुविशदं हे रम तुभ्यं नमः॥ ३५॥
"मे श्रीरामके द्वारा दिये हए आदेशका सदा
पालन करता दहूं। श्रीरामका आदरपूर्वकं भजन
करता हुं। रामने (मेरा) सारा पाप हर लिया।
भगवान् श्रीराम । तुम्हें नमस्कार हे। मुञ्च श्रीरामसे
मोक्षकी प्राति अभीष्ट है । मे सदाके लिये श्रीरामका
दास हूं। मेरा निर्मल मन श्रीराममें अनुरक्त हो। हे
श्रीराम ! तुम्हं नमस्कार है ॥ ३५॥
१. यहाँ विसर्गके स्थानमें ~एेसा चिह्न हो गया है। विसगकि बाद क, ख, या प, फ होनेपर विसर्गकरौ यह अवस्था
होती है। २. यहाँ "स्" के स्थानमें "रु" होकर "रु" के स्थानम "उ" हुआ दै । फिर गुणसन्थिके नियमसे ओकार हानेपर
" अर्च्यः ' के अकारका पूर्वरूप हो गया है। यहां नया नियम यह जानना है कि पदान्त "स्" के स्थानमें "र" हाता टै ओर
अप्लुत अकारसे पे होनेपर उस रु" का “उ' हो जाता है। एेसा तभी होता टै, जव उस “र' के वाद भी कोई अप्लुत
अकार या 'हश्' हो। ह, य, व, रल,ज,म,ङण,न,्,भ,घ,ढ,ध्,ज, व, ग, ड, द-इन अक्षरकि समुदायको
“ हश्" कहते है । ३. यहां अभी बताये गये नियमके अनुसार " स' को “रु' करके फिर उसका उत्व हुओआ। तत्पश्चात् गुण
होकर "रामो" वना। ४. इन सव उदाहरणेपें 'स्' के स्थानं पूर्ववत् “₹' होता है; फिर "रु" के स्थानम य्" होकर पूर्व
दो उदाहरणमिं उसका लोप हो जाता दै। ओर अन्तिम उदाहरणमं “य्' * अ ' मं मिल जाता है । यहां स्मरण रखने योग्य
नियम यह है- भो, भगो, अघो तथा अवर्णपूर्वक "रु" के स्थानमं “य्' होता है अश् परे रहनेपर। ओर हल् परे रहनेषर्
उस "यूका लोप हो जाता है। सम्पूर्णं स्वरवर्ण तथाह,य,व,र,ल्,अ.म, ङण, न, ख, भ,घ,दढ, ध्, ज, व,
ग, ड, द-ये सभी अक्षर 'अश्' के अन्तर्गत है। ५. एतत् ओर तत् शब्दसि पर “ सु" विभक्तिके "स" कारका लोप दी
जाता है हल् पर रहनेपर। इस नियमके अनुसार यहा "स्" का लोप ५ गया है । ६. यहा एष रामः" की सिद्ध त पूर्ववत्
हो जाती है; किंतु ' सस्" के " सु" का लोप करनेके लिये एक विशेष नियम हे-' सस्' के ˆ सु का लाप हाता दे अच्
परे रहनेपर, यदि उसके लोप होनेके बाद ही श्लोकके पादकौ पृरतिं होती हो तब । जैसे-सैष रामः समायाति (वही
ये श्रीराम आते ह) । ७. कहीं-कहीं इस अंशका पाठ इस प्रकार मिलता दै-' रामौ राजमणिः सदा विजयते ।' प्रथमा
विभक्तिके रूपकी दृष्टिसे यही पाठ ठीक जान पटृता है । ८. ' गम" शब्दका रूप सव विभक्तयो इस प्रकार समञ्चना
चाहिये-रामः रामौ रामाः! रामम् रामौ रामान्। रमेण रामाध्याम् रामः। रामाय रामाभ्याम् रमेध्यः। रामात्, रपादू
रामाभ्याम् रामेभ्यः । रामस्य रामयो; रमाणाम्। रामे रामयाः गमेषु । टे रमद्धै गमी टै रमाः।
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२९६
संक्षिप्त नारदपुराण
सर्व इत्यादिका गोपाः सखा चेव पतिर्हरिः ॥ ३६॥
सर्वं आदि शब्द सर्वनाम: माने जाते हे ।* ' गोपाः "का
अर्थ हे गोओंका पालन करनेवाला । सखाका अर्थ हे
मित्र। यह ' सखि ' शब्दका रूप हैः । पतिका अर्थ हे
स्वामी *। हरि शब्दका अर्थ हे भगवान् विष्णुः ॥ ३६॥
सुश्रीभनुः स्वयम्भूश्च कर्ता रा गोस्तु नोरिति।
अनडवान्गोधुग्लिट् च द्रौ त्रयश्चत्वार एव च ॥ ३७॥
जो उत्तम श्रीसे सम्पन्न हो, उसे सुश्री कहते
हे *। भानुका अर्थ हे सूर्य ओर किरणः । स्वयम्भूका
अर्थं हे स्वयं प्रकट होनेवाला। इसका प्रयोग प्रायः
शब्द धनका वाचक है* । पुँल्लिङद्धमें ' गो" शब्दका
अर्थं बेल होता है ओर स्त्रीलिङ्घमे गायः२ | ' नौ'
शब्द ॒नौकाका वाचक हे^२। यर्हतक स्वरान्त
पल्लङ्क शब्दके रूप दिये गये हें ।
अब हलन्त पुँल्लिङ्ग शब्दके रूप दिये जा
रहे हे । गाड़ी खींचनेवाले बैलको अनड्वान् कहते
हे । यह अनडुहृशब्दका रूप हे" । गाय दुहनेवालेको
गोधुक् कहते हें । मूल शब्द गोदुह है“+। लिह्
शब्दका अर्थ हे चारटनेवाला^^ | ' द्वि' शब्द संख्या
दोका, "त्रि" शब्द तीनका ओर ' चतुर् ' शब्द चारका
ब्रह्माजीके लिये होता है*। काम करनेवालेको
कर्ता कहते हं । यह ' कर्तृ ' शब्दका रूप हे“ । "रे!
वाचक है। इनमेसे पहला केवल द्विवचने ओर
शेष दोनों केवल बहुवचनमें प्रयुक्त होते है“ ॥३७॥
१. इसी प्रकरणम आगे (श्लोक ४७-४८ में) सर्वनाम शब्द गिनाये गये है । २. इनमें सर्व शब्दका रूप इस
प्रकार है- सर्वः सर्व सर्वे । सर्वम् स्वौ सर्वान् । सर्वेण सर्वाभ्याम् सर्वेः । सर्वस्मै सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः । सर्वस्मात् सर्वाभ्याम्
सर्वेभ्यः । सर्वस्य सर्वयोः सर्वेषाम्। सर्वस्मिन् सर्वयोः सर्वेषु । अन्य सर्वनामोके रूप भी प्रायः एेसे ही होते है।
३. इसके रूप इस प्रकार ह- गोपाः गोपौ गोपाः । गोपाम् गोपौ गोपः । गोपा गोपाभ्याम् गोपाभिः। गोपे गोपाभ्याम्
गोपाभ्यः। गोपः गोपाभ्याम् गोपाभ्यः। गोपः गोपोः गोपाम्। गोपि गोपोः गोपासु । हे गोपाः हे गोपौ हे गोपाः । ४. सखि
शब्दके पूर रूप इस प्रकार है- सखा सखायौ सखायः । सखायम् सखायौ सखीन्। सख्या सखिभ्याम् सखिभिः । सख्ये सखिभ्याम्
सखिभ्यः । सद्युः सखिभ्याम् सखिभ्यः । सख्युः सख्योः सखीनाम्। सख्यौ सख्योः सखिपु। हे सखे हे सखायो हे सखायः।
५. इसके दो विभक्तियोमें रूप इस प्रकार होते है- पतिः पती पतयः । पतिम् पती पतीन्। शेष विभक्तियोपमें सखि शब्दके
समान रूप होते ह । सम्बोधनमें हे पते हे पती हे पतयः-इस प्रकार रूप जानने चाहिये । ६.इसके रूप इस प्रकार
हे-हरिः हरी हरयः। हरिम् हरी हरीन्। हरिणा हरिभ्याम् हरिभिः । हरये हरिभ्याम् हरिभ्यः । हरेः हरिभ्याम् हरिभ्यः।
हरेः हर्योः हरीणाम्। हरौ हर्योः हरिषु । हे हरे हे हरी हे हरयः । ७. इसके रूप इस प्रकार हँ- सुश्रीः सुश्रियौ
सुश्रियः । सुश्रियम् सुश्रियौ सुश्रियः । सुश्रिया सुश्रीभ्याम् सुश्रीभिः। सुश्रिये सुश्रीभ्याम् सुश्रीभ्यः। सुश्रियः सुश्रीभ्याम्
सुश्रीध्यः। सुश्रियः सुश्रियोः सुश्रियाम्। सुश्रियि सुश्रियोः सुश्रीषु। हे सुश्रीः हे सुश्रियौ हे सुश्रियः। ८. इसके रूप इस
प्रकार है- भानुः भानू भानवः। भानुम् भानू भानृन्। भानुना भानुभ्याम् ३ भानुभिः । भानवे भानुभ्यः २। भानोः २ भान्वोः २
भानूनाम्। भानौ भानुपु। हे भानो हे भानू हे भानवः। ९. स्वयम्भू शब्दके रूप इस प्रकार है-- स्वयम्भूः स्वयम्भुवौ २ स्वयम्भुवः
२। स्वयम्भुवम्। स्वयम्भुवा स्वयम्भृभ्याम् ३। स्वयम्भृभिः। स्वयम्भुवे स्वयम्भूभ्यः २। स्वयम्भुवः २। स्वयम्भुवोः २।
स्वयम्भुवाम्। स्वयम्भुवि स्वयम्भूषु । १०. इसके पुरे रूप इस प्रकार है-- कर्ता कर्तारौ २ कर्तारः । कर्तारम् कतृन्। कर्त्रा क्ृभ्याम्
३ कतृभिः। करर कर्तृभ्यः २। कतुः २। कत्रः २ करतृणाम्। कर्तार कतृषु। है कर्तः हे कतार हे कर्तारः । ११. उसके रूप इस
प्रकार है-राः रायौ २ रायः २1 रायम्। राया राभ्याम् ३ राभिः। राये राभ्यः २। रायः २। रायोः १२. रायाम्। रायि रासु!
सम्बोधने प्रथमावत्। २. दोना लिङ्गम इसके एक-से ही रूप होते है, जो इस प्रकार है--गौः गावौ २ गावः। गाम् गाः
। गवा गोभ्याम् ३ गोभिः। गवे गोभ्यः २। गोः २। गवोः २ गवाम्। गवि गोषु। हे गौः हे गावौ हे गावः। १३. इसका
प्रयोग स्त्रीलिद्घमें होता है, तथापि यर्हा पुदिङ्घके प्रकरणम इसे लिखा गया है, प्रकरणके अनुसार ‹ सुनौ ' शब्द यहां
ग्रहण करना चाहिये । इसके रूप इस प्रकार है- नीः नावौ २ नावः २। नावम्। नावा नौभ्याम् ३ नौभिः। नावे नौभ्यः २।
नावः २। नावोः २ नावाम्। नावि नौपु। १४. इसके परे रूप इस प्रकार है- अनड्वान् अनड्वाहौ २ अनद्वाहः। अनद्वाहम्
अनडुहः । अनड्हा अनड्ुद्धयाम् ३ अनङ्द्धिः। अनडुहे अनदुद्धयः २। अनडुहः २। अनडुहोः २ अनदुहाम्। अनडुहि
अनडुत्सु । सम्बोधनके एकवचनमं हे अनड्वन्। १५. इसके रूप इस प्रकार होते है- गोधुक् गोधुग् गोदुहौ २ गोदुहः
२। गोदुहम्। गोदुहा गोधुगभ्याम् गोधुग्भिः। गोदुहे गोधुग्भ्यः २। गोदुहः २। गोदुहोः २ गोद्हाम्। गोदुहि गोधुश्ु। १६.
इसके रूप इस प्रकार दै-लिट् लिड् लिहौ लिहः २। लिहम्। लिहा लिड्भ्याम् ३ लिद्भिः । लिहे लिड्भ्यः २। लिहः
२। लिहोः २ लिहाम्। लिहि लिट्सु लिल्त्सु। १७. रूप क्रमशः इस प्रकार है- द्रौ २ द्वाभ्याम् ३ द्वयोः २। त्रयः । त्रीन्।
त्रिधिः। त्रिभ्यः २। त्रयाणम्। त्रिषु चत्वारः । चतुरः । चतुर्षिः। चतुभ्यंः २! चतुर्णाम्। चतुषु ।
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 21188 \/8181/185। (0166101. 01411260 0 6810011
~ ~ _ & ~
पूर्व भाग-द्वितीय पाद
२१७
राजा पन्थास्तथा दण्डी ब्रह्महा पञ्च चाट च।
अष्टौ अयं मुने सम्राट् सुराइविश्रदवपुष्मतः॥३८ ॥
राजा राजन्-शब्दका रूप हे{। पन्थाः कहते
हैं मार्गको । यह पथिन् शब्दका रूप हैः । जो दण्ड
धारण करे, उसे दण्डी कहते हे । ब्रह्महन् शब्द
ब्राह्मणघातीके अर्थमें प्रयुक्त होता टे*। पञ्चन्-
शब्द पंचका ओर अष्टन् शब्द आठका वाचक हे ।
ये दोनों बहुवचनान्त होते हैˆ। अयम्का अर्थ हे
यह; यह "इदम् ' शब्दका रूप हेः । ' सम्राट् ' कहते
हें बादशाह या चक्रवर्तीं राजाकोः। सुराञ् शब्दके
रूप- सुराट् सुराजो सुराजः इत्यादि हें । शेष रूप
सम्राज् शब्दकी भति जानने चाहिये । इसका अर्थ
हे- अच्छा राजा। विभ्रत्का अर्थ हे धारण-पोपण
करनेवाला-। वपुष्मत् ( वपुष्मान्) का अर्थं टे
शरीरधारी ॥३८॥
प्रत्यञ्च-शब्दका अर्थं हे प्रतिकूल या पीछे
जानेवाला ' भीतरको ओर! भी अर्थं हे । पुमान्का
अर्थं हे पुरुप, जो पुंस्-शब्दका रूप हे ˆ ˆ । महान्
कहते हं श्रष्टको ` । धीमान्का अर्थं हे बुद्धिमान्।
( धीमत्-शब्दके रूप वपुष्मत् शब्दकी भाति जानने
चाहिये ।) विद्वानूका अर्थं हे पण्डितः- । पष् शब्द
का वाचक ओर बहुवचनान्त दे । (इसके रूप
इस प्रकार हं- पट् षड् २। पड्भिः । पद्भ्यः २।
पण्णाम्। पट्सु पट्त्सु ।) जो पदनेको इच्छा करे,
उसे “पिपठीः"*' कहते हें। दोःका अर्थं हे
भुजा ` । उशनाका अथं ह शुक्राचायं *। अदस्
शब्दका अथ हः `यह' या "वह'। ये अजन्त
(स्वरान्त) ओर हलन्त पृं्िद्क शब्द कटे गये ॥ ३९ ॥
राधा सर्वा गतिर्गोपी स्त्री श्रीर्धनुर्वधुः स्वमा।
गौनौरुपानदद्योर्गोवत् ककुप्संवित्तु वा क्वचित् ॥ ४०॥
शब्दंका दिग्दर्शन कराते है।
प्रत्यङ् पुमान् महान् धीमान् विद्वान्पट् पिपटीश्च दोः आव स्त्रीलिद्धः
उशनासाविमे प्रोक्ताः पुंस्यच्ल्विरामकाः॥ ३९॥ | राधाका अर्थं हे भगवान् श्रीकृष्णकी आह्वादिनी
१. इसके पुरे रूप इस प्रकार ठै- राजा राजानौ २ राजानः । राजानम् राज्ञः। राज्ञा गजध्याम् ३ राजभिः । रज्ञे गजेभ्यः २। ग्नः
२। रज्ोः २ राज्ञाम् । राजि राजनि राजसु। हे राजन् हे राजानी हे राजानः। २. शेष रूप इम प्रकार समद्यने चहिये-- पन्थान २ पन्थान;
पन्थानम् पथः । पथा पथिभ्याम् ३ पथिभिः । पथ पथिभ्यः २। पथः २। पथोः २ पधाम्। पथि पथिषु । उ. इसका मृल शब्द दण्डिन्
टे, जिसके रूप इस प्रकार है- दण्डी दण्डिनी २ दण्डिनः २। दण्डिनम्। दण्डिना दण्ड्भ्याम् ३ दण्डिभिः । दण्््नि दण्डिभ्यः २। दण्डन;
२। दण्डिने २ दण्डिनाम्। दण्डि दण्डिपु। हे दण्डिन्। ४. इसके रूप इस प्रकार दै-्रह्यहा त्रद्दणौ २ ब्रद्यदणः । ब्रह्यहणम् ब्रह्मन्न; । ब्रह्मघ्ना
ब्रह्मह भ्याम् ब्रह्महभिः । ब्रघ्ने ब्रह्मभ्यः २। ब्रद्यघ्रः २। ब्र्यघ्राः २ ब्रद्यघ्राम्। त्र्यनि ब्र्महसु। ५. इनके रुप इस प्रकार है - पञ्च २।
पञ्चभिः । पञ्चभ्यः २। पञ्चानाम्। पञ्चसु । अष्ट २ अग्र २। आष्टाभिः आभिः । अष्राभ्यः २ अष्भ्यः २। अष्रारम्। अआ्ठामु अघम 1६. इसके
पूरे रूप इस प्रकार है-- अयम् इमो इमे। इमम् इमो इमान्। अनेन आभ्याम् ३ एभिः । अस्यै एष्य: अस्मात्। अस्य अनयः २ एषाम् । आस्मि
एषु। ७. सम्राज् शब्दके रूप इस प्रकार हे- सम्राट् सम्राट् सप्राजी २ सप्रजः २। सप्राजम्। सप्राजा सप्राद्भ्याम् ३ मप्रादूभिः) मप्राज
सप्रादृभ्यः २। सप्राजः २। सप्राजीः २ सप्राजाम्। सप्रानि सप्राटूमु। ८. इसक्र ल्प इस प्रकार रै-विश्रत् विध्रती २ विध्रत
२। विभ्रतम्। विभ्रता विश्रद्धयम् ३ व्रिश्रद्धिः। विभ्रते विध्रद्धयः २। विभ्रतः २। विभ्रतोः २ विश्रताम्। विध्रति विश्रत्सु। ९. इस शब्दके
रूप इस प्रकार है- वपुष्मान् वपुप्मन्ती २ वपुष्मन्तः वपुप्मन्तम् वपुष्मतः । वपुष्मता वपुष्मद्धयम् ३ वपृष्मद्धिः । वपुष्मते वपुष्मद्धयः२।
वपुष्मतः २। वपुप्मतोः २ वपुप्मताम्। वपुप्मति वपुप्मत्यु। टै वपुप्मन्। १०. इसके रूप इस प्रकार है--प्रत्यङ प्रत्यञ्ची २ प्रत्यञ्चः । प्रत्यञ्चम्
प्रतीचः । प्रतीचा प्रत्यग्भ्याम् ३ प्रत्यग्भिः । प्रतीचे प्रत्यग्भ्यः २। प्रतोचः २। प्रतीचोः २ प्रतीचाम्। प्रतीचि प्रत्यक्रु। ५१. इसके पररूप टस
प्रकार है-पुमान् पुमांसी २ पुमांसः। पुमांसम् पुंसः । पुंसा पुम्भ्याम् ३ पुम्मिः। पुंसे पुम्भ्यः २। पुमः २। पुंसोः २ पुंसाम् । पुंसि पुंमु।द
पुमन्! १२. महत्-णब्दके रूप इस प्रकार ईै- महान् महानी २ महान्तः । महान्तम् महतः । महता महदृभ्याम् ३ महद्भिः महते महेद्धयः २।
महतः २। महताः २ महताम्। महति महत्सु । १३. विद्रम्-शब्दकर रूप टस प्रकार जानने चदिय- विद्वान् विद्रामीर विद्र: । विद्रसम् विदुष
। विदुषा विद्रद्धयम् ३ विद्रद्धिः। विदू विद्रदभ्यः २। विदुषः २। विदुः २ विदुषाम्। विदुषि विद्रत्सु। दै विद्रन्। ५४. इसके परस्प
इस प्रकार है-- पिपठीः पिपटिषं २ पिपटिपः। पिपटिषम् पिपदिपः। पिपटिषा पिपटीभ्यम् ३ पिपटीधिः। पिपदिप पिपलोभ्यः २। पिपिष
२। पिपटिषोः २ पिपदिपाम्। पिपदिपि पिप्यु पिपदीःयु1। १५८. देप ख्दके रूप इस प्रकर है-दीः दधौ २ दीपः । देषम् देष्णः देषः । दष्णा
दोषा देर््याम् ३ दोर्भिः । दोष्णे दपि दभ्यं; २। दीष्णः २ दपः २। देष्णैः २ दयोः २ देष्णम् देषाम्। देष्णि देपि द्यु दैःसु! १.३ शब्दके
हप टस प्रकार है- उना उणनमी २ उशनसः २। टशनमम्। उशनसा उणनोाध्यम् उ उशनेभिः । उशनम -उ्नोभ्यः २1 उनम; २। उशनमे
२ उशनसाम् । उणशनमि -उशनम्यु उणनःम्ु। १५. इसके ल्प द्म प्रकार दै--न्नमी मृ आमी । अमुम् मू अमून्। अमुना अमृध्याम्
भमीभिः। अमुष्मै अमृभ्याम् अमीभ्यः अमुष्मात् अमृथ्याम् अमीध्य। अमुष्य अमुयोः भमोपाम् । अमुध्िन् अमुयोः अमीषु 1
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 81188 \/818/185। (01661011. 01411260 0 6810011
२९८ सक्षिप्त नारदपुराण
शक्ति, जो उनको भी आराध्या होनेसे "राधा" कहलाती | रुग्विडद्धाः स्वयां तपः कुलं सोमपमश्ि च।
हे । सर्वाका अर्थ है सब (स्त्री) । " गतिः का अर्थ | ग्रामण्यम्बु खलप्वेवं कर्तृ चातिरि वातिनु ।॥४९॥
हे- गमन, मोक्ष, प्राति या ज्ञानः । ' गोपी ' शब्द प्रेम- रक्“ नाम हे रेगका । विर् “-शब्द् वैश्यका वाचक
५]
भक्तिको आचार्यरूपा गोपिर्योका वाचकः हे । स्त्रीका | है। उद्ाःरव्का अर्थं ॒है उत्तम प्रकाश या प्रकाशित
अर्थ हे नारी*। * श्री" शब्द लक्ष्मीका वाचक हैः । | होनेवाली। ये शब्द स्त्री-लिद्धमे प्रयुक्त हेते है।
धेनुका अर्थ दूध देनेवाली गाय है*। वधूका अर्थ हे | अब नपुंसकलिङ्क शब्दोंका परिचय देते हे ।
जाया अथवा पुत्रवधूˆ । स्वसा कहते हे बहिनको। गो- | तपस्" -शब्द तपस्याका वाचक है । कुल.
शब्दका रूप स्त्रीलिङ्खमं भी प्ि्गके समान होता हे। | शब्द वंश या समुदायका वाचक है । सोमप^^-
नौ-शब्दका रूप पहले दिया जा चुका हे। उपानहः“ | शब्दका अर्थ हे सोमपान करनेवाला । ' अक्षिका "२०
शब्द जूतेका वाचक हे। द्यो° स्वर्गका वाचक है। | अर्थ हे अंखि। गँवके नेताको ग्रामणी कहते
ककुभ् ` शब्द दिशाका वाचक है। संबिद्ः*-शब्द | हे । अम्बुःः-शब्द जलका वाचक हे । खलपूरका
वुद्धि एवं ज्ञानवता वाचक हे ॥४०॥ अर्थं है खलिहान या भूमि साफ करनेवाला।
१. इसके रूप या है रधा राधे रधाः। राधाम् राधे यधाः। राधया रधाभ्याम् राधाभिः। राधायै रधाभ्याम् रधाभ्यः। राधायाः
गधाभ्याम् राधाभ्यः । राधायाः राधयोः राधानाम्। राधायाम् राधयोः रधासु। हे रधे हे राधे हे राधाः। २. इस शब्दके रूप इस प्रकार
हं । चतुर्थके एकवचनर्मे- सर्वस्यै । पञ्चमी ओर ष्टके एकवचनमे-सर्वस्याः। पष्ठीके बहुवचनमे--सर्वासाम्। समीके
एकवचनमं-सर्वस्याम्। शेष सभी रूप "राधा" शब्दकी ही भति होगि। ३. गति शब्दके रूप यों समड्ने चाहिये- गतिः गती
गतयः। गतिम् गतो गतीः। गत्या गतिभ्याम् ३ गतिभिः । गत्ये गतये गतिभ्यः २। गत्याः २ गतेः २। गत्योः २ गतीनाम्। गत्याम्
९. । हे गते हे गती हे गतयः । ४. गोपी-शब्दके रूप इस प्रकार ह-- गोपी गोप्यौ २ गोप्यः। गोपीम् गोपीः । गोप्या गोपीभ्याम्
३ गोपोभिः। गोप्य गोपीभ्यः २। गोप्याः २ गोप्योः २ गोपीनाम्। गोप्याम् गोपीषु। हे गोपि हे गोप्यो हे गोप्यः । ५. इस शब्दके रूप
इस प्रकार है- स्त्र स्त्रियौ २ स्ियः। स्त्रियम् स्त्रीम् स्त्रियः स्त्रीः । स्त्रिया स्त्रीभ्याम् ३। स्त्रीभिः । स्त्रिये स्त्रीभ्यः २। स्त्रियाः २।
स्त्रियोः २ स्त्रीणाम् । स्त्रियाम् स्त्रीपु। हे सि हे स्त्रियौ हे स्वियः। ६. उसके रूप इस प्रकार है- श्रीः श्रियो २ श्रियः २। त्रियम्।
त्रिया श्रीभ्याम् ३ श्रीभिः श्रियै श्रिये श्रीभ्यः २। त्रिया: २। श्रियः २। श्रियोः २ श्रीणाम् श्रियाम्। श्रियाम् त्रियि श्रीषु। हे श्रीः हे
त्रिय हे त्रियः। ७. इसके रूप गति शब्दकी तरह हंगि। यथा-धनुः धेनू धनवः। धेन्वै धेनवे इत्यादि। ८. इस शब्दके रूप इस
प्रकार ह- वधुः वध्वौ वध्वः। रेष रूप गोपी-शब्दकी तरह समञ्ञने चाहिये । वहो “ई' के स्थानमें “य्' होता हे, यहा "ऊ' के
स्थानमं ` व् होगा। इतना ही अन्तर है। ९. इसके रूप कर्वृ-शब्दके समान होते हे। केवल द्वितीयाके वहृवचनरे “स्वसृ: ' एेसा रूप
हेता हे--इतना ही अन्तर हे। १०. उसके रूम इस प्रकार ह --उपानत् उपानद् उपानहौ २ उपानहः २। उपानहम्। उपानहा उपानद्भ्याम्
३ उपानद्धिः। उपानहे उपानद्धयः २। उपानहः २1 उपानहोः २ उपानहाम्। उपानहि उपानत्सु 1११. दिव्-शब्दके रूप गो--शब्दके
[५
समान समञ्चने चाहिये। १२. इसके रूप--ककुप् ककुब् ककुभौ २ ककुभः २। ककुभम्। ककुभा कुच्भ्याम् इत्यादि है । सपतमीके
बहुवचनमं ककुप्सु रूप हाता है। १३. इसके रूप-संवित् संविद् संविदो संविदः इत्यादि है। १४. इसके रूप है-स्क् रुग् रुजौ
२ रुजः २। रुजम्। रुजा रू्याम् इत्यादि। १५. इसके रूप है- विर् विड् विशौ विशः इत्यादि। १६. इसके रूप है-उद्ाः उद्धासौ
उद्ासः इत्यादि। ९७. नपुसकलिद्खमं प्रथमा ओर द्वितीया विभक्तिके रूप एकसे ही होते है ओर तृतीयासे लेकर सतमीतकके रूप
पल्िङ्के समान हाते है । तपस्-शब्दके रूप इस प्रकार समञ्चन चाहिये- तपः तपसी तपांसि। ये तीनों रूप प्रथमा ओर द्वितीया
विभक्तिमं प्रयुक्त होते हं। शेष रूप उशनस्छके समान होगि। १८. रूप ये है- कुलम् कुले कुलानि। शेष रामवत्। १९. प्रथमा-द्वितीया
विभक्तियोमं इसके रूप है सोमपम् सोमपे सोमपानि । शेष रामवत्। २०. इसके रूप प्रथम दो विभक्तियेमिं है - अक्षि अर्षिणी
अक्षीणि। शेष पांच विभक्तियेकि एकवचने क्रमशः इस प्रकार रूप है- अक्ष्णा । अक्षणे। अक्ष्णः । अक्ष्णः । अक्षि अक्षणि।
शेष रूप हरि-शब्दके समान जानने चाहिये । २१. पुिद्गमें इसके रूप ग्रामणीः ग्रामण्यौ ग्रामण्यः इत्यादि होते है । यदि कोई
कुल (खानदान) गोवका अगु हो तो यह शब्द नपुंसकलिब्गमे प्रयुक्त होता है । उस दशाम इसके रूप इस प्रकार होगे- ग्रामणि
ग्रामणिनी ग्रामणीनि । तृतीयासे सप्तमीतकके एकवचनर्म “ग्रामण्या ग्रामणिना । ग्रामप्ये ग्रामणिने । ग्रामण्यः २ ग्रमणिनः २ । ग्रामण्याम्
ग्रामणिनि--ये रूप ह। शेष रूप पुष्िद्रवत् हेत है। २२. इसके रूप-- अम्बु अम्बुनी अम्बूनि इत्यादि है। ५ सप्तमीतकके
एकवचनमं क्रमशः अम्बुना। अम्बुने। अम्बुनः २। अम्बुनि- ये रूप होते ह। शेप रूप भानुवत् है । २३. मे इसके रूप
"खलपूः खलप्वौ खलप्वः' इत्यादि होते है। जब यह किसी साधन या ओजारका वाचक होता है तो नपुंसके प्रयुक्त होता
है । उसमं इसके रूप इस प्रकार ह-खलपु खलपुनो खलपूनि। इसमे भी तृतीयासे सप्तमीतक एकवचनमें ` खलपुना, खलपुने,
खलपुनः २, खलपुनि“-ये रूप अधिक होते है। शेष रूप पुंिद्गवत् है ।
((-0. 1/८111(4/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
कर्तृः-शब्द कर्ताका वाचक है । जो धनकी सीमाको
लोघ गया हो, उस कुलको अतिरि कहते हे ।
पानी नावकौ शक्तिसे बाहर हो, जिसे नावसे भी
पार करना असम्भव हो, उसे “अतिनु*' कहते
हें ॥ ४१॥
स्वनडुच्य तिमलद्यु वाश्चत्वारीदमेव च।
एतदब्रह्माहश्च दण्डी असृच्छिच्चितत्यदादि च ॥ ४२॥
जिस कुल या गृहमे गाड़ी खींचनेवाले अच्छे
वैल हों, उसको ' स्वनडुत्ः' कहते हें । जिस दिन
आकाश साफ हो, उस दिनको विमलद्यु* कहते
हें । वार्ः-शब्द जलका वाचक है । चतुर् शब्दका
रूप नपुंसकलिङ्घमे केवल प्रथमा ओर द्वितीयामें
' चत्वारि ' होता है, शेष पुंट्िद्धवत्। इदम्-शब्दके
रूप नपुंसकम इस प्रकार है-इदम् इमे इमानि,
शेष प्िद्धवत्। एतत्-शब्दके रूप पुंल्लिगमे-एषः
एतो एते इत्यादि सर्वशब्दके समान होते हे ।
नपुंसकम केवल प्रथम दो विभक्तियोमें ये रूप
है- एतत् एते एतानि । ब्रह्मन्-शब्दके रूप नपुंसकमं
"ब्रह्य ब्रह्मणी ब्रह्माणि" हें । शेष पुंल्लिङ्गवत् ।
अआहन्^-शब्द दिनका वाचक है । दण्डिन्-शब्दके
नपुंसकमें "दण्डि दण्डिनी दण्डीनि' ये रूप हेँ।
शेष पुंषिङ्गवत्। असृक् *-शब्द रक्तका वाचक हे ।
किम्-शब्दके रूप पु्िद्गमें "कः कौ के " इत्यादि
२९९
सर्ववत् होते हेँ। नपुंसकम केवल प्रथम दो
विभक्तिमें "किम् के कानि'-ये रूप होते है।
चित्-शब्दके रूप “चित् चिती चित्ति, चिता
चिद्भ्याम् चिद्धि: ' इत्यादि होते हें । त्यद् आदि“
शब्दके रूप पंल्लिङ्घमें “स्यः त्यौ ते" इत्यादि
सर्ववत् होते हें । नपुंसकमें ' त्यत् त्ये त्यानि" ये
रूप होते हें ॥ ४२॥
एतद् वेभिद्रवाग् गवाङ् गोअग् गोङ्् गोग् गोड्।
तिर्यग्यकृच्छकृच्यैव दद द्धवत्पचत्तुदत् ॥ ४३॥
(इदम् ओर) एतत्-शब्दके रूप अन्वादेशे“
द्वितीया, टा ओर ओस् त्रिभक्तियोपमें कुछ भिन्न होते
हे । पंिद्धमें ! एनम् एनौ एनान्, एनेन एनयोः ।'
नपुंसकमें * एनत् एने एनानि" ये रूप दें । अन्वादेश
न होनेपर पूर्वोक्त रूप होते हे । वेभित्-शब्दके
रूप इस प्रकार है-' बेभित् वेभिद् वेभिदी बेधिदि
(यहां नुम् नहीं होता) । वेभिदा वेभिद्धयाम्
वेभिद्धिः ' इत्यादि । गवाकृ-शब्दके रूप गति ओर
पूजा-अर्थके भेदसे अनेक होते हे । गति- पक्षमं
गवाकृका अर्थं हे गायके पास जानेवाला ओर
पूजा-पक्षमे उसका अर्थ हे गो-पूजक। प्रथमा ओर
द्वितीया विभक्तियोमे उसके उभयपक्षीय रूप इस
प्रकार है-एकवचनमे ये नौ रूप हते है-गवाक्
गवाग् गोअक् गोअग् गोक् गोग् गवाङ्् गोभटुः
१. इसका रूप पुहद्गमं वताया गया है। नपुंसकम * क्तं कततृणी कर्तृणि!-ये रूप हते टै। तृतीयामे सप्तमीतकके
एकवचनमें दो-दो रूप होते हं। यथा-कर्तृणा कर्त्रा । कर्तृणे कर्त्र । कर्तृणः २ कर्तुः २। कर्तृणि कर्तरि। शेष रूप पिद्गवत्
ह । २. इसके ' अतिरि अतिरिणी अतिरीणि' ये रूप हं! तृतीया विभक्तिसे इस प्रकार रूप चलते है--अतिरिणा, अतिराध्याम्
३ अतिराभिः। अतिरिणे अतिगाभ्यः २। अतिरिणः २। अतिरिणोः २ अतिरीणाम्। अतिरिणि अतिासु। ३. इसके रूप इस
प्रकार ै-' अतिनु अतिनुनी अतिनृति। तृतीयासे सप्तमीतकके एकवचनमं-* अतिनुना, अतिनुने, अतिनुनः २, अतिनुनि'-
ये रूप होति है । शेष भानुवत्। ४. रूप इस प्रकार है--स्वनदुत् स्वनदुही स्वनद्वांहि। शेष पिद्गवत्। “4. रूप इस प्रकार
है--विमलद्यु विमलदिवी विमलदिवि। तृतीया आदि विभक्तियोमे *विमलदिवा विमलद्युभ्याम्' इत्यादि रूप होते ै।
६. इसके रूप इस प्रकार है -* वाः वारी वारि । वारा वार्भ्याम् वाभिः ' इत्यादि । ७. पुग इसके सव रूप इस
प्रकार है--त्रह्या, ब्रद्याणौ, ब्रह्माणः । ब्रह्माणं ब्रह्माणी ब्रह्मणः । ब्रह्मणा ब्रह्यध्याम् ब्रह्मधिः । त्रह्यण ब्रह्मध्याम् ब्रह्मभ्यः ।
ब्रह्मणः ब्रह्यध्याम् ब्रह्मभ्यः । ब्रह्यणः ब्रह्मणो; ब्रद्मणाम्। ब्रह्मणि ब्रह्मणो ब्रह्मसु । ८. इसके रूप इस प्रकार है -' अटः
अही अहानि। अहा अहोभ्याम् अहोभिः" इत्यादि । सप्तमोके एकवचनमं अद्धि, अहनि-ये दो ख्प होते दै। ९. इसके
रूप इस प्रकार है--' असृक् असृजी भसृञि। अगुजा असृग्भ्याम् अमूभिः इन्यादि । १०. त्यद्, तद, यदू, एतद्, इदम्,
अदस्, एक, द्वि-ये त्यदादि कहलाते टै । ११. एकक विपयमें दु्ारा करौ हृं चर्चा अन्वद्ेण दै, जैमे--' यद आया,
द्ये भोजन दो" इस वाक्यमें “इसे ' अन्वादेश दुा।
((-0. 1/८11114<511॥1 8118811 \/8181185। 01661101. 0141260 0 68110011
२२०
गोड द्विवचनमं चार रूप हेते है गोची गवाञ्ची गोअञ्ची
गोञ्ची । बहुवचनमे तीन रूप है--गवाच्चि गोच्ि ओर
गेच्ि । प्रथमा ओर द्वितीया विभक्तियेमिं ये ही रूप होते
हे त॒तीयासे लेकर सप्तमीके एकवचनमें सर्वत्र चार-
चार रूप हेते है गोचा गवाञ्चा गोअच्चा गोञ्चा ' इत्यादि ।
भ्याम्, भिस् ओर भ्यसमें छः-छः रूप होते है--
गवाग्भ्याम् गोअग्भ्याम् गोग्भ्याम् गवाङ्भ्याम् गोअङ्भ्याम्
गोङ्भ्याम् इत्यादि । सप्तमीके बहुवचनमं भी न रूप
होते हे-गवाद्श्ु गोअङ्क्षु गोङ्श्चु, गवाक्ष गोअङ्पु
गोङ्पु गवाक्ष गोअक्षु गोक्षु। इस प्रकार कुल एक सौ
नौ रूप होते हे. । तिर्यक्-शब्द पशु-पक्षियोका वाचक
हे। यकृत् -शनब्द कलेजा तथा उससे सम्बन्ध रखनेवाली
वीमारीका बोधक हे। शकृत्"-शब्द विष्ाका वाचक हे।
ददत्-शब्दका रूप पुंिद्भमें विभ्रत् शब्दकी तरह होता
हे। नपुंसकमें "ददत् ददती, ददन्ति ददति" ये रूप
होते है। शेष पलिद्गवत्। भवत्" शब्दका अर्थ है
पृज्य। शतृ प्रत्ययान्त * भवत्" शब्दके रूप पिद्गमे
` भवन् भवन्तौ भवन्तः ' इत्यादि होते हं । शेष पूर्ववत्।
स्त्रीलिङ्खमं ' भवन्ती भवन्त्यो भवन्त्य ' इत्यादि गोपीके
समान रूप हे। नपुंसकम पूर्ववत् ह । पचत्-शब्दका रूप
सभी लिद्धोमं शत॒-प्रत्ययान्त “ भवत्" शब्दके समान
होता हे। तुदत्-शब्द पुदिद्भमें पचत्शब्दके ही समान हे।
संक्षिप्त नारदपुराण
स्त्रीलिद्खमे डीप् प्रत्यय हेनपर उसके दो रूपम हेते है तुदती
ओर त॒दन्ती, फिर इन दोनेक्रि रूप गोपी-शब्दकी भति
चलते हं। नपुंसकमें प्रथम दो विभक्तियेक्रि रूप इस प्रकार
हे तुदत् तुदती तुदन्ती तुदन्ति । शेष पूंिद्धवत्॥ ४३॥
दीव्यद्धनुश्च पिपठीः पयोऽदःसुपुमांसि च।
गुणद्रव्यक्रियायोगांस्त्रिलिङ्कांश्च कति ब्रुवे ॥ ४४॥
दीव्यत्-शब्दके रूप सभी लिद्धोमें पचतूके
समान हें । धनुप्-शब्दके रूप इस प्रकार है-धनुः
धनुषी धनृपि। धनुषा धनुर्भ्याम् इत्यादि । पिपदिष्-
शब्दके रूप नपुंसकम इस प्रकार है-' पिपठीः
पिपठिषी पिपठीपि' शेष पंहिङ्गवत्। पयस्-शब्दके
रूप तपस्-शब्दके समान होते हें । यह दूध ओर
जलका वाचक है। अदस्*-शब्दके पिङ्ग रूप
बताये जा चुके हें । जिस कुलमें अच्छे पुरुष होते
हे, उसे सुपुम्' कहते हैं । अन हम कुछ से
शब्दंका वर्णन करते हे, जो गुण, द्रव्य ओर क्रियाके
सम्बन्धसे तीनों लिङ्खोमे प्रयुक्त होते हें ॥ ४४॥
शुक्तः कीलालपाश्चैव शुचिश्च ग्रामणीः सुधी।
पटुः स्वयम्भूः कर्ता च माता यैव पिता चना॥ ४५॥
सत्यानायुरपुंसश्च मतभ्रमरदीर्धपात्।
धनाढ्यसोम्यो चागर्हस्तादृक् स्वर्णमथो वहु ॥ ४६॥
शुक्त कीलालपा, शुचि, ग्रामणी, सुधी, पटु,
१. कुछ मनीषी विद्वान् इसमें ५२७ रूपाकी उद््रावना कसते हँ। २. पंह्टद्गमं इसके ' तियंङ् तिर्यञ्चौ ' इत्यादि प्रत्यङ् -
शब्दको तरह रूप हाते हे । द्वितीयके बहवचनम ' तिरश्चः ' रूप हाता हे। तृतीया आदिमं ' तिरश्चा तिर्यग्भ्याम्" इत्यादि रूप
हाते है। नपुंसकम * तिर्यक् तिरश्ची तिर्यचि ' रूप होते हे । पृजा-पक्षमं ' तिर्यदुः तिर्यञ्ची तिर्यचि ' रूप होते है । शेष रपंिद्गवत्।
३. इसके रूप होते टदै- यकृत् यकृती यकृन्ति। यकृता यकृद्धयाम् इत्यादि । * यकन्" आदेश होनेपर “ यकाति' रूप
केवल *शस्' विभक्तिमें हाता टै । तृतीया आदिक एकवचनमें “ यक्रा' आदि रूप अधिक होते ह । ४. इसके रूप
भो यकृत्-शब्दकौ भति ही हाते है । “५. इसके तीनां लिद्घमिं रूप हति है । पँष्टिद्वमें * भवान् भवन्तौ भवन्तः ' इत्यादि
"ध्रीमत्' शब्दके समान रूप दै । स्त्रीलिद्घमें ' भवती भवत्यौ भवत्यः ' इत्यादि गोपी -शव्दके समान रूप होते टै । नपुंसकम
दा विभक्तियेमिं उसक्र ' भवत् भवती भवन्ति" रूप होत है । शेष रपृिद्रचत्। ६. स्त्रीलिदट्वमें इसक़ पुर रूप टस प्रकार है-- असौ
अम् अमूः। अमूम् अमृ अमृः। अमुया अमूभ्याम् ३ अमूभिः ¦ अमुष्यै अमूभ्यः २। अमुष्याः २। अमुयोः २ अमृषाम्। अमुष्याम्
अमूषु ॥ नपुसकलिद्धमें प्रथम दो विभक्तियोक रूप “ अदः अमृ अमूनि" टै । शेष पुिद्गवत्। 3. सुपुम् सुपुंसी सुपुमांसि।
गे विभक्तियेोमं पुस् -णब्दकी तरह रूप टेति ट। ८. "शुक्त" ( सीप या मुतुी ) शब्दके पैष्टिद्रूप-- शुक्तः शुक्तौ शुक्तः ।
शुक्तं शुक्तौ शुक्तान् । णुक्तन णुक्ताभ्यां युक्तः । शुक्ताय शुक्ताभ्याम् गुक्तध्यः ¦ गुक्तात् णुक्ताध्यां शुक्तेभ्यः । शुक्तस्य शुक्तयोः
शुक्तानाम्। शुक्ते शुक्तयोः शुक्तेषु । ह शुक्त शुक्तौ णुक्ताः। इस प्रकार टे । स्त्रलिट्रपं ' णुक्ता शुक्ते णुक्ताः ' इत्यादि “गधा के समान
रूप है। नपुमकमं ' शुक्तं शुक्ते शुक्तानि ये प्रधमा ओरं द्वितीया विधक्तिके रप हं। शेष प्टिद्धवत् रूप हे।
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद २२१
स्वयम्भू तथा कर्ता । मात्र-शब्द यदि परिच्छिन्वाचक हो | सर्व विश्चोभये चोभो अन्यान्यतेतराणि च ॥४७॥
तो तीनों लिङ्गोमे प्रयुक्त होता हे। इसके पुं्िद्धरूप-- | डतरो डतमो नेमस्त्वत्समौ त्वसिमावपि।
माता, मातारो, मातारः' इत्यादि; नपुंसकरूप- मातृ, | पूर्वः परावरौ चैव दक्षिणश्चोत्तराधरौ ॥ ४८ ॥
मातृणी, मातृणि"' इत्यादि ओर स्त्रीलिद्गरूप-' मातरी, | अपरः स्वोऽन्तरस्त्यत्तद्यदेवेतत्किमम्रावयम्।
मात्रयो मात्र्यः' हें। जननीवाची मातृ-शब्द नित्य- | युष्पदस्मच्य प्रथमश्चरमोऽल्पस्तयार्धकः ॥ ४९॥
स्त्रीलिङ्ग है। इसके रूप इस प्रकार है-' माता मातरो | नेम: कतिपयो द्वे निपाताः स्वरादयस्तथा।
मातरः । मातरम् मातरो मातृ: ' इत्यादि। इसके शेष रूप | उपसर्गविभक्तिस्वरप्रतिरूपाश्चाव्ययाः ॥५०॥
स्वसु-शब्दके समान हे। पित्र-शब्द यदि कुलका अव सर्वनामशब्दोको सूचित करते है- सर्व,
विशेषण हो तो नपुंसकम प्रयुक्त हो सकता हे। अन्यथा | विश्च, उभय, उभ, अन्य, अन्यतर, इतर, उतर,
वह नित्य पिङ्गं हे। इसके रूप “पिता पितरो पितरः । | उतम, नेम, त्व, त्वत्, सम, सिम, पूर्व, पर, अवर,
पितरम् पितरो पितृन्" इत्यादि है । शेष कर्तृशब्दके समान | दक्षिण, उत्तर, अधर्, अपर, स्व, अन्तर, त्यत्,
समञ्ने चाहिये। नृ-शब्द नित्य प्क है ओर उसके | तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, किम्, एक, द्वि,
सभी रूप पितृ-शब्दके समान है। केवल षष्ठीके | युष्मद्, अस्मद्, भवत्। ये सर्वनाम दँ ओर इनके
बहुवचनमें इसके दो रूप होते है "नृणाम् नृणाम्, '। | रूप प्रायः* सर्व-शब्दके समान दही टै । प्रथम,
सत्य, अनायुष्, अपुंस्, मत, भ्रमर, दीर्घपात्, | चरम, तय, अल्प, अर्ध, कतिपय ओर नेम-इन
धनाढ्य, सोम्य, अगर्ह, तादृक्, स्वर्ण, बहु-ये | शब्दके प्रथमाके बहुवचनमें दो रूप होते है
शब्द भी तीनों लिद्धोमें प्रयुक्त होते हे *॥४६॥ | यथा-- प्रथमे प्रथमाः, चरमे चरमाः इत्यादि ।
१. *कीलालपा' (जल पीनेवाला) के सभी रूप गोपाके समान है। ओर नपुंसकम कुलके समान रूप हते है । शुचि"
(पवित्र) शब्दके पुि्गरूप हरिके समान हैँ स्त्रीलिद्घरूप "गति" के समान ओर नपुंसकरूप वारि" के समान है। ग्रामणी
(ग्रामका नेता) के पंिद्गरूप बताये गये है । स्त्रीलिङ्गरूप भी प्रायः वे ही हैं । नपुंसकके भी बताये जा चुके हे । "सुधी
शब्दका अर्थ हे श्रेष्ठ वुद्धिवाला तथा विद्वान् । पं्िद्ग ओर स्त्रीलिद्गमे ' सुधीः सुधियौ, सुधियः" इत्यादि रूप होते है ।
नपुंसकमें ' सुधि, सुधिनी, सुधीति' इत्यादि रूप हें । ' पट्" (समर्थ) -के पुि्व रूप "भानु" के समान, स्त्रीलिङ्ग "धनु
के समान ओर नपुंसकरूप “पटू पटूनी पटूनि' है; शेष भानुवत्। ' स्वयम्भू" (ब्रह्मा) -के पुंिद्धरूप बताये गये है, स्त्रीलिद्गमं
भी वैसे ही होते है। नपुंसकम “ स्वयम्भु वयम्भुनी स्वयम्भूनि ' रूप हाते है। शेष पंिद्गवत्। कर्तृ" शब्दके पुद्टि्ध ओर नपुंसक
रूप बताये गये है। स्त्रीलिद्धमं गोपी ' शब्दके समान ' कर्त्री ' शब्दके रूप चलते है ।
२. ` सत्य ` शब्द् जब सामान्यतः सत्य भापणके अथमं आता टे, तवर नपुंसक होता है ओर विशेषणरूपम प्रयुक्तं हानपर
विशेष्यके अनुसार तीनां लिङ्खोम प्रयुक्त होता है । इसके रपुिद्गरूप-- सत्यः सत्यौ सत्याः-इत्यादि रामवत् है । स्त्रीलिद्धरूप--गधक
समान है- सत्या सत्ये सत्याः । नपुंसकरूप-' सत्यम् सत्ये सत्यानि ' है । शेष रामवत्! * अनायुप्' शब्दका अर्थं है आयुदीन ।
पदिद्वपे-' अनायुः, अनायुपी, अनायुषः ' इत्यादि । स्त्रलिद्भमे भी ये ही रूप है । नपुंसकलिद्भमं ' अनायुः आनायुपी अनायुपि'
इत्यादि। ' अपुंस्" का अर्थं है, पुरुपरहित । पि्रमे- अपुमान् इत्यादि, स्त्रीलिद्भमं " अपुंस्का" आदि तथा नपुंसकम * अपुम्
इत्यादि रूप होते है । मतका अर्थं है-“ अभिमत, राय आदि । ' मतः! मता। मतम्" ये क्रमशः पिङ्ग आदिके रूप है । * भ्रमर “की
अर्थं हे भौरा या चृमकर शब्द करनेवाला । प्म भ्रमरः, स्त्रीलिद्भमें भ्रमरो, नपुंसकम श्रमरम्, इत्यादि रूप हाते ट । जिसके
पैर बडे हो, वह " दीर्घपात्" ह। तीनां लिद्भमिं ' दीर्घपात्" यही प्रथम रूप हे। * धनाद्य' का अर्थं हे धनी । धनादयः, धनाद्ध्या
धनाद्यम्-वे क्रमशः तीनों लिद्धोके प्रथम रूप टै। " सोम्य" का अर्थं है शान्त, मृदु स्वभावव्राला। रूप धनाद्यक् दी तुल्य
अगर्ह' का अर्थ ह निन्दारहित । रूप पूर्ववत् दे । ' तादूण्' शब्दका अर्थं टै, ' वैसा ' । इसके “ तादृक् तादृशौ तादृशः ' इत्यादि प्ट
ओर स्त्रीलिद्घमं मिं रूप हते है, नपुंसकमें तादक् तादूशौ तादूणि रूप होत द । स्वर्णका अर्थं हे सोना । रूप धनाद्यतरत् है । तीन
लिद्भमिं "वहु" के रूप क्रमशः बहवः । बह्वयः । वहूनि इत्यादि हं ।
३. प्रायः इसलिये कडा गया कि कुच्ध शब्दाकि रूपमं की -कटी अनर है। जसे प्व पर अवर दश्चिणं अपर उत्तर अधर--य व्यवस्था
ओर अस्मे द सर्वनाम माने जते ह । जच सखा द्य अथवा व्यवस्थाभित्र अर्थम इन् शब्दोका प्रेण द वं दनक स्प "सर्व" ख्यक
समान न देर् "राम ' शब्दके समान द्य जता टै। यथा-दभ्षिणाः गायकाः, उनगः कुरवः । यटा दक्षिण-शब्ड कुशल अर्यमं ओर् उनग-
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२२२
स्वरादि ओर निपात तथा उपसर्ग, विभक्ति
एवं स्वरके प्रतिरूपक शब्द अव्ययसंज्ञक होते
है ॥ ४७-५०॥
तद्िताश्चाप्यपत्यार्थे पाण्डवाः श्रेधरस्तथा।
गार्ग्यो नाडायनात्रेयो गाङ्खयः पेतुष्वस््रीयः ॥५९॥
अव तद्धित-प्रत्ययान्त शब्दोंका उल्लेख करते
हे । निम्राङ्किति शब्द अपत्यवाचक संज्ञाके रूपमें
प्रयुक्त होते हं । पाण्डव, श्रेधर, गार्ग्य, नाडायन,
आत्रेय, गाद्धेय, पेतृष्वसीयः ॥ ५१॥
देवतार्थे चेदमर्थ नदर ब्राह्मो हविर्बलिः।
क्रियायुजोः कर्मकत्रोधोरियः कोद्कुमं तथा ॥५२॥
निग्राङ्किति शब्द देवतार्थक ओर इदमर्थक प्रत्ययसे
युक्त हे । यथा-- णेन्द्रं हविः, ब्राह्मो बलिः । क्रियाम
संयुक्त कर्म ओर कर्तसि तद्धित प्रत्यय होते है--धुरं
वहति इति धोरेयः। जो धुर् अर्थात् भारको वहन
करे, वह धौरेय हे। य्ह धुर् शब्द कर्म हे ओर
वहन-क्रियामें संयुक्त भी है, अतः उससे “एय ' यह
तद्धित प्रत्यय हुआ। आदि स्वरकी वृद्धि हई ओर
` धौरेय" शब्द सिद्ध हुआ। इसी प्रकार कुङ्कुमेन रक्त
वस्त्रम्--इसमे कुड्कुम शब्द “रगना" क्रियाका कर्ता
हे ओर वह उसमें सयुक्त भी हे । अतः उससे तद्धित
अण् प्रत्यय होकर आदिपदकी वृद्धि हई ओर
"कोडम' शब्द सिद्ध हआ ॥५२॥
संक्षिप्त नारदपुराण
भवाद्यथं तु कानीनः क्षत्रियो वैदिकः स्वकः ।
स्वार्थे चोरस्तु तुल्यार्थे चन्द्रवन्मुखमीक्षते ॥५३॥
अव *भव' आदि अर्थेमिं होनेवाले तद्धित
प्रत्ययोका उदाहरण देते हे- कन्यायां भवः कानीनः
जो अविवाहिता कन्यासे उत्पन्न हआ हो, उसे
' कानीन '* कहते हें । क्षत्रस्यापत्यं जातिः क्षत्रियः ।
्षत्रकुलसे उत्पन्न उसी जातिका बालक श क्षत्रियः '
कहलाता हे । वेदे भवः वेदिकः । इक-प्रत्यय ओर
आदि स्वरकी वृद्धि हुई है । स्व एव स्वकः । यहाँ
स्वार्थमें “क ' प्रत्यय हे। चोर एव चौरः, स्वार्थमें
अण् प्रत्यय हुआ है। तुल्य-अर्थमें वत् प्रत्यय
होता है। यथा- चन्द्रवन्मुखमीक्षते- चन्द्रमाके समान
मुख देखता हे । चन्द्र+ वत् चन्द्रवत् ॥ ५३ ॥
ब्राह्मणत्वं ब्राह्मणता भावे ब्राह्मण्यमेव च।
गोमानधनी च धनवानस्त्यर्थं प्रमितो कियान्॥ ५४॥
भाव-अर्थमें त्व, ता ओर य प्रत्यय होते हे यथा-
ब्राह्मणस्य भावः ब्राह्मणत्वम् ब्राह्मणता, ब्राह्यण्यम्।
अस्त्यर्थे मतुप् ओर इन् प्रत्यय होते है-गोः
अस्यास्ति इति गोमान्। धनमस्यास्ति इति धनी
(जिसके पास गो हो, वह “गोमान्” जिसके पास
धन हो, वह “धनी ' हे) । अकारान्त, मकारान्त
तथा मकारोपध शब्दसे एवं ज्चयन्त शब्दसे परे मतके
'म'का "व! हो जाता है- यथा धनमस्यास्ति इति
शब्द देशकी संस्ामं प्रयुक्त हए हैँ । व्यवस्था ओर असंज्ञामे यद्यपि ये सर्वनामसं्क होते है, तथापि प्रथमे बहुवचने तथा पञ्चमी
ओर सप्तमीके एक चनम इनकी सर्वनामसंज्ञा वैकल्पिक होती हे। अतः उन स्थलेमिं दा-दा रूप हेते है-एक सर्ववत् दूसरा
रामवत्। यथा- पूर्वे पूर्वाः, पूर्वस्मात्, पूर्वात्, पूर्वस्मिन् पूर्वे ' इत्यादि। शेष सभी रूप सर्ववत् हैं । ज्ञाति ओर धनसं
भिन्न अर्थमें ' स्व " शब्दका रूप भी पूर्वादि शब्दकि समान ही होता है। बाह्य ओर परिधानीय (पहननेयोग्य वस्त्र) अर्थमे
प्रयुक्त अन्तर शब्दका रूप भी पूर्वादिके ही समान होता है। डतर ओर डतम शब्द प्रत्यय हं। अतः तदन्त शब्द
ही यहां सवादिमें गृहीत होते हं, यथा- यतर यतम ततर ततम कतर कतम इत्यादि।
१. इनके मशः अर्थं इस प्रकार है पाण्डुपुत्र, श्रीधर-पुत्र, गर्गको संतानपरम्परा, नडगोत्रमं उत्पन्न संतान,
अत्रि-पुत्र, गद्गापुत्र ( भीष्म) तथा बुआका पुत्र। वहां प्रथम दोमं अण्. तीसरे यञ्, चौथेमे आयन, पाच, छटमं
एय ओर सात्ववेमे ईय प्रत्यय हए हं । प्रत्येकमें आदि स्वरको वृद्धि हुई है। तद्धित शब्दम ' कृत्तद्धितसमासाश्च'
( कृदन्त, तद्धितान्त ओर समासकी प्रातिपदिक संजा होती है) इस नियमसे प्रातिपदिक संज्ञा करके सु आदि
विभक्तियों आती रै । २. एन्द्र हविः का अर्थं है-इस हविष्यके देवता इन्दर हैं । ब्राह्मो बलिः का अर्थं है-य॒ह
ब्रह्माके लिये वलि है । एकमे देवता-अर्थमें अण् प्रत्यय हुआ है ओर दसम तस्य इदम्” (उसका यह) इस अथमं
अण् प्रत्यय हुआ दे । दोनोमें आदि स्वरकी वृद्धि हुई दे । ३.महर्पिं व्यास ओर कर्णं कानीन थे। कन्या-शब्दसं
अण् होनेपर कन्या-शब्दके स्थानमें कनीन आदेश होता है ओर आदिपदकी वृद्धि होनेसे कानीन वनता हे । ६,
त्र -इय ~ क्षत्रियः । "त्र" के *अ' का लोप होकर् वह “इय' के 'इ' में मिलादै। ५. मतुपूमे उप्का लोपा
जाता दै, फिर श्रीमान् - शब्दकी तरह रूप चलते टे । धनिन् शब्दका रूप दण्डिन्-शब्दके समान समञ्जना चाहियं।
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पूर्व भाग-द्वितीय पाद
२२३
धनवान्। परिमाण-अर्थमे 'इदम्', "किम्", “ यत्,
' तत्, ' एतत्'-इन शब्दोंसे वतुप् प्रत्यय होता हे,
कितु “इदम्' ओर "किम्" शब्दोँसे परे वतुप्के
वकारका "इय्" आदेश हो जाता हे । दृक्, दृश्,
वतु-ये परे हों तो इदम्के स्थानमें 'ई' तथा
'किम्'के स्थानमें 'कि' हो जाते हे । किं परिमाणं
यस्य स कियान्- यहो परिमाण-अर्थमे वतुप्-
प्रत्यय, इयादेश तथा 'कि"-भाव करनेसे कियान्
वनता हे। इसका अर्थं है-' कितना! ॥ ५४॥
जातार्थे तुदिलः श्रद्धालुरन्नत्ये तु दन्तुरः।
स्रग्वी तपस्वी मेधावी मायाव्यस्त्यर्थ एव च ॥५५॥
अव जातार्थमें होनेवाले प्रत्ययोंका उदाहरण
देते हे । तुन्दः संजातः अस्य तुन्दिलः । जिसको तोद
हो जाय, उसे "तुन्दिल" कहते हँ । तुन्द+इल =
तुन्दिलि। श्रद्धा संजाता अस्य इति श्रद्धालुः।
श्रद्धा+आलु। (इसी प्रकार दयालु, कृपालु आदि
वनते हें ।) दांतोकी ऊंचाई व्यक्त करनेके लिये
दन्त शब्दसे उर-प्रत्यय होता ठे। उन्नताः दन्ता
अस्य इति दन्तुरः (ऊचे दोतवाला) । अस्, माया,
मेधा तथा सरज्-इन शब्दोसे अस्त्यर्थमें विन्
प्रत्यय होता है। इनके उदाहरण क्रमसे तपस्वी,
मायावी, मेधावी (बुद्धिमान्) ओर सरग्वी हं।
खग्वीका अर्थं माला धारण करनेवाला हे ॥५५॥
वाचालश्चैव वाचाटो बहुकुत्सितभाषिणि।
ईषदपरिसमापतौ कल्पव्देशीय एव च ॥५६॥
खराव वाते अधिक बोलनेवालेके अर्थम वाच्
शब्दसे "आल! ओर “आट' प्रत्यय होते हें।
कुत्सितं बहु भाषते इति वाचालः, वाचाटः । ईपत्
(अल्प) ओर असमापिके अर्थमं कल्पप्, देश्य
ओर देशीय प्रत्यय होते ट ॥५६॥
कविकल्पः कविदेश्यः प्रकारवचने तथा।
पटुजातीयः कुत्सायां वैद्यपाशः प्रशंसने ॥ ५७॥
वेद्यरूपो भूतपूर्वे मतो दृष्टचरो मुन।
प्राचुर्यादिष्वन्नमयो मृन्मयः स्त्रीमयस्तथा ॥५८ ॥
जेसे- ईषत्, ऊनः कविः कविकल्पः 5
कविदेश्यः, कविदेशीयः । जहां प्रकार बतलाना
हो, वहो किम् ओर सर्वनाम आदि शब्दोसे "था"
प्रत्यय होता हे । तेन प्रकारेण तथा। तत्+था=तथा।
त्यदादि शब्दोंका अन्तिम हल्, निवृत्त होकर वे
अकारान्त हो जाते हं, विभक्ति परे रहनेपर।
(था, दा, त्र, तस् आदि प्रत्यय विभक्तिरूप माने
गये हे) । इस नियमके अनुसार तत्के स्थानें त
हो जानेसे “ तथा' वना। जहां किसी विशेष
प्रकारके व्यक्तिका प्रतिपादन हो, वहां जातीय
प्रत्यय होता हे। यथधा-पटुप्रकारः-पटुजातीयः।
पट्-शब्दसे जातीय प्रत्यय हआ। किसीकौ हीनता
प्रकाशित करनेके लिये संज्ञाशब्दसे पाश प्रत्यय
होता हे। जेसे- कुत्सितो वेद्यः वैद्यपाशः (खराब
वेद्य) । प्रशंसा-अर्थमें रूप प्रत्यय दहता दै।
यथा- प्रशस्तो वैद्यः वैद्यरूपः (उत्तम वैद्य) ।
मुनिवर नारदजी ! भूतपूर्वं अर्थको व्यक्तं करनके
लिये चर प्रत्यय हाता हे । यथा-पूर्वं दृष्ट दृष्टचरः
(पहटलेका देखा हआ) ।
प्राचुर्यं (अधिकता) ओर विकारार्थ आदि
व्यक्त करनेके लिये मय प्रत्यय होता दै।
जेसे- अन्नमयो यज्ञः । जिसमे अधिक अन्न व्यय
किया जाय, वह अन्नमय यज्ञ ठै। यहां अन्न-
शब्दसे मयट् प्रत्यय हुआ। इसी प्रकार मृन्मयः
अश्च: (सिद्रीका घोड़ा) तथा स्त्रीमयः पुरुषः
इत्यादि उदाहरण समञ्जने चाहिये ॥ ५७-५८८ ॥
जातार्थे ललितोऽत्यर्थं श्रेयाज्छष्टश्च नारद।
कृष्णतरः शुक्लतमः किम् आख्यानतोऽव्ययात्॥५९॥
किन्तरां चैवातितरामपि द्यच्यैस्तरामपि।
परिमाणे जानुदघ्नं जानुद्धयसपित्यपि॥६०॥
जात- अधमे तारकादि शब्दो इत प्रत्यय
हाता टै। यधा-लञ्ना संजाता अम्य इति
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लज्ितः* (जिसके मनमें लज्ना पेदा हो गयी हो,
उसे लज्ित कहते हें ) । नारदजी ! यदि बहु तोमेसे
किसी एकको आधिक विशेषता बतानी हो तो तम
ओर ईष्ट प्रत्यय होते है ओर दोमेसे एकक
विशेषता बतलानी हो तो तर ओर ईयसु प्रत्यय
होते हें । ईयसुमे उकार इत्संज्ञक हे । अयम् एषां
अतिशयेन प्रशस्यः श्रेष्ठः (यह इन सवमें अधिक
प्रशंसनीय हे, अतः श्रेष्ठ है) । द्योः प्रशस्य श्रेयान्
(दोमेंसे जो एक अधिक प्रशंसनीय हे, वह श्रेयान्
कहलाता है । यहो भी प्रशस्य+ईयस्-श्रेयस् (पूर्ववत्
श्र आदेश हुआ) । इसके रूप इस प्रकार है-- श्रेयान्
श्रेयांसो श्रेयांसः । श्रयांसम् श्रेयांसौ श्रेयसः । श्रेयसा
श्रेयोभ्याम् श्रेयोभिः इत्यादि। इसी प्रकार जो
दोमेसे एक अधिक कृष्ण हे, उसे कृष्णतर ओर
जो बहुतोमेंसे एक अधिक शुक्ल हे, उसे शुक्लतम
कहते हे। कृष्ण+तर~कृष्णतर । शुक्ल+तम~=शुक्लतम ।
किम्, क्रियावाचक शब्द (तिडन्त) ओर अव्ययसे
परे जो तम ओर तर प्रत्यय है, उनके अन्तमें आम्
लग जाता हे । उदाहरणके लिये किंतराम्, अतितराम्
तथा उच्चैस्तराम् इत्यादि प्रयोग हे । प्रमाण (जल
आदिके माप) व्यक्त करनेके लिये द्वयस, दघ्न
ओर मात्र प्रत्यय होते हे । जानु प्रमाणम् अस्य इति
जानुदपघ्रं जलम् (जो घुटनेतक आता हो, उस
जलको जानुदश्न कहते हे) जानु+दघ्र=जानुदघ्न।
इसी प्रकार जानुद्रयसम् ओर जानुमात्रम्-ये प्रयोग
भी होते हं ॥५९-६०॥
जानुमात्रं च निद्द्धरि बहूनां च द्वयोः क्रमात्।
कतमः कतरः संख्येयविशेषावधारणे ॥६१९॥
संक्षिप्त नारदपुराण
द्वितीयश्च तृतीयश्च चतुर्थः षष्ठपच्चमो ।
एकादशः कतिपयथः कतिथः कति नारद् ॥ ६२॥
दोमेंसे एकका ओर बहतोमेसे एकका निश्चय
करनेके लिये "किम्" "यत्" ओर ‹ तत् ' शब्दोंसे
क्रमशः डतर ओर उतम प्रत्यय होते हे । यथा-- भवतोः
कतरः श्यामः (आप दोनोमें कोन श्याम हे?)
भवतां कतमः श्रीरामः ? (आपलोगोमे कोन श्रीराम
हे ?) । संख्या (गणना) करनेयोग्य वस्तुविशेषका
निश्चय करनेके लिये द्वि-शब्दसे द्वितीय, त्रि-
शब्दसे तृतीय, चतुर्-शब्दसे चतुर्थं ओर षष्-
शब्दसे षष्ठ रूप बनते हं । इनका अर्थ क्रमशः इस
प्रकार है--दूसरा, तीसरा, चोथा ओर छटा।
पञ्चन्, सप्तन्, अष्टन्, नवन् ओर दशन्-इन
शब्दोंके !न्' कारको मिटाकर 'म'कार बट् जाता
ठे, जिससे पञ्चम, सप्तम, अष्टम, नवम, दशम रूप
वनते हें । एकादशन्से अष्टादशन्तक उक्त अर्थमें
'न्" कारका लोप होकर सभी शब्द अकारान्त हो
जाते है, जिनके "राम ' शब्दके समान रूप होते हं ।
यथा एकादशः द्वादशः इत्यादि । नारदजी ! कति
ओर कतिपय शब्दोंसे थ-प्रत्यय होता हे, जिससे
कतिथः ओर कतिपयथः पद बनते हे ॥ ६१-६२॥
विशश्च विशतितमस्तथा शततमादयः।
द्वेधा द्वेधा द्विधा संख्या प्रकारेऽथ मुनी श्वर ॥ ६३॥
बीसवेके अर्थमें विंशः ओर विंशतितमः“ ये
टो रूप होते है । शत आदि संख्यावाचक शब्दोंसे
(तथा मास, अर्धमास एवं संवत्सर शब्दस) नित्य
तम ' प्रत्यय होता हे। यथा-शततमः (एकशततमः,
मासतमः, अर्धमासतमः, संवत्सरतमः) । मुनीश्वर ।
१. ईकार ओर तद्धित पर रहनेपर असंज्ञक इवर्ण ओर् अवर्णका लोप हो जाता है, इस नियमके अनुसार * लजा+इत'
हस स्थितिमं "अ "का लोप हो जाता है। २. प्रशस्य~इष्ट-शरठ (-प्रशस्य-शब्दके स्थानम ' श्र "आदेश हो जाता हे, फिर गुण
करनेसे श्रष्ट-शब्द नता है) । ३. किम्. डतर, किम्^डतम । यहाँ टकार इत्संज्ञक है । डित् प्रत्यय परे रहनेपर पूर्ववर्ती शब्दके
रिभागका लोप होता है। अन्तिम स्वर ओर उसके वादके हल् अक्षर भी "टि" कहलाते ह 1 ' किम्' मं "क" छाडकर “इम्
भाग "रि" है। उसका लोप हुआ। क् अतर-क्ः अतम मिलकर "कतर" ओर ˆ कतम ' शब्द बने । इसी प्रकार यतर्, यतम,
ततर, ततम-ये शब्द भो वनते ह। ४. 'व्रि-तीय' इस अवस्थापें "त्रि" के स्थाने सम्प्रसारण-पूर्वरूप होकर ' तृतीय! रूप
चनता है। “^. इससे आगेकी सभी संख्याओंमें इसी प्रकारके दो रूप होति है । साटवेकि अर्थम कवल ' षष्टितम ' शब्द बनता
टे। उससे अगेकी संख्यामिं भी यदि आदिमं दूसरी संख्याका प्रयोग न हो तो केवल तम प्रत्ययक्रा विधान ह।
यथा- सप्ततितमः, अशीतितमः, नवतितमः; इत्यादि। आदिमे संख्या लग जनेपर तौ ' विंशः विंशतितमः ' की भति दो-दो रूप
हति ही है-जेमे एकषष्टः एकपषितिमः इत्यादि ।
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त [मी ह ` 1 ह म क त
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
क्रियाके प्रकारका बोध करानेके लिये संख्यावाचक
शब्दसे स्वार्थमें ' धा ' प्रत्यय होता है जेसे (एकधा)
द्विधा, त्रिधा इत्यादिः ॥ ६३ ॥
क्रियावृनत्तौ पञ्चकृत्वो द्विस्तिर्बहुश इत्यपि।
द्वितयं त्रितयं चापि संख्यायां हि द्वयं त्रयम्॥ ६४॥
क्रियाकी आवृत्तिका बोध करानेके लिये कृत्वस्
प्रत्यय होता है ओर "स्" कारका विसर्ग हो जाता
हे । यथा- पञ्चकृत्वः (पांच वार), द्विःर, त्रिः
(दो वार्, तीन बार) । बहु-शब्दसे * धा, शस् एवं
कृत्वस् ' तीनों ही प्रत्यय होते हं-यथा बहुधा,
बहुशः, बहुकृत्वः। संख्याके अवयवका वोध
करानेके लिये ^ तय ' प्रत्यय होता हे । उदाहरणके
लिये द्वितय, त्रितय, चतुष्टय ओर पञ्चतय आदि
शब्द हें। द्वि ओर त्रि शब्दोंसे आगे जो "तय!
प्रत्यय हे, उसके स्थानमें विकल्पसे अय हो जाता
हे; फिर द्वि ओर त्रि शब्दके इकारका लोप होनेसे
द्य, त्रय शब्द वनते हे ॥ ६४॥
कुटीरश्च शमीरश्च शुण्डारोऽल्पार्थके मतः।
स्त्रेणः पौस्नस्तुण्डिभश्च वृन्दारककृषीवलो ॥ ६५॥
कुटी, शमी ओर शुण्डा शब्दसे छोटेपनका
वोध करानेके लिये “र' प्रत्यय होता हे। छोटी
कुटीको कुटीर कहते है । कुटी+र=कुटीरः । इसी
प्रकार छोटी शमीको शमीर ओर छोटी शुण्डाको
शुण्डार कहते हें । शुण्डा-शब्द हाथीकी सूंड ओर
मद्यशाला (शराबखाने)-का बोधक हे । स्त्री ओर
पुंस् शब्दोंसे न् प्रत्यय होता है। आदि स्वरको
वृद्धि होती है । जकार इत्संज्ञक है । नके स्थानमें
२२५
ण होता हे। इस प्रकार स्त्रेण शब्द बनता ह । जिस
पुरुषमे स्त्रीका स्वभाव हो तथा जो स्त्रीमे अधिक
आसक्त हो, उसे स्तरण कहते दैँं। पुंस्+न,
आदिवृद्धिपेस्न (पुरुषसम्बन्धी ) । तुण्ड आदि शब्दासे
अस्त्यर्थमें ' भ! प्रत्यय होता हे। तुण्डि+भतुण्डिभः
(बी हुई नाभिवाला) । शद्ध ओर वृन्द शब्दोँसे
अस्त्यर्थे ' आरक ' प्रत्यय होता है । शृद्ध+ आरक=
शृद्धारकः (पर्वत) । वृन्द+ आरक् वृन्दारकः (देवता) ।
रजस् ओर कृपि आदि शब्दोंसे “बल ' प्रत्यय होता
हे, रजस्वला स्त्री, कृषीवलः (किसान) ॥ ६५ ॥
मलिनो विकटो गोमी भोरिकिबिधमुत्कटम्।
अवटीटोऽवनाटश्च निविडं चेक्षुशाकिनम्॥ ६६ ॥
निविरीसमेषुकारिभक्तं विद्याचणस्तथा।
विद्याच्चुर्बहुतिथं पर्वतः शूद्भिणस्तथा ॥ ६७॥
स्वामी विषमं रूप्यं चोपत्यकाधित्यका तथा।
चिल्लश्च चिपिटं चिक्कं वात्रूलं कुतुपस्तथा ॥ ६८ ॥
बलूलश्च हिमेलुश्च कहिकश्चोपडस्ततः।
ऊर्णायुश्च मरुत्तश्चैकाको चर्मण्वती तथा ॥ ६९॥
ज्योत्स्ना तमिस््राऽष्टीवच्य कक्षीवद्रुमण्वती ।
आसन्दीवच्य चक्रोवत्तृष्णीकां जल्पतक्यपि ॥७०॥
मल-शब्दसे अस्त्यर्थमें इन प्रत्यय होता हे।
मलम् अस्यास्ति इति मलिनः (मलयुक्त) । मल+इन
अकार-लोप=मलिन। सम्, प्र, उद् ओर वि-इनसं
कट प्रत्यय होता ठै.-यथा संकटः, प्रकटः,
उत्कटः, विकटः । गो-शब्दसे मिन्-प्रत्यय हाता
ठे। अस्त्यर्थमे- गो+मिन्-गोमी (जिसके पास
गौं हों, वह पुरुष) ज्योत्छा (र्चादनी ), तमिस्रा
१. द्वि ओर त्रि शब्दोके इकारका विकल्पसे एकार भी हो जाता है। यथधा-द्वेधा, त्रेधा। द्वि ओर त्रि शब्दे
"धम् ' प्रत्यय ओर आदिस्वरकी वृद्धि-येदो कार्य आर भी होति ह) यथा-दरधम्, तरैधम्।
२. धा, धा, त्र, तस्, कृत्वस् आदि प्रत्यव जिन शब्दके अन्तमं लगते है, वे तद्धितान्त अव्यय माने जते है।
३. द्वि, त्रि ओर चतुर् णब्दोंसे कृत्वसं न होकर केवल ' सुच् ' प्रत्यय होता टै। इसमं क्रबल "स" रहता
है ओर “उ^कार तथा ' च् कारकौ ' उत्सं" हौ जाती ट । प्रयोगमें सकारका विसर्गं हो जाता दै । चतुर् ~ शब्दके
जआगेस "स्का लोप होता टै ओर "र" का विसर्ग दहो जाताटहै। इस प्रकार् क्रमशः द्विः त्रिः चतुः--ये रूप
वनते रै) ये तीनों अव्यय रै।
((-0. 1/८11114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
२२६
संक्षिप्त नारदपुराण
(अंधेरी रात), श्द्धिण, (शृङ्खगवाला), ऊर्जस्विन्
(ओजस्वी), ऊर्जस्वल, गोमिन्, मलिन ओर
मलीमस (मलिन)-ये शब्द मत्वर्थमें निपातन-
सिद्ध हें । ' भोरिकिविधम्' इसकी व्युत्पत्ति यों
हे- भोरिकीणां विषयो देशः- भोरिकिविधम् (भोरिकि
नामवाले वर्ग-विशेषके लोगोका देश) । एेषुकारीणाम्
विषयो देशः-एेषुकारिभक्तम् (एेषुकारि- बाण
बनानेवाले लोगोंका देश) । इन दोनों उदाहरणोमें
क्रमशः 'विध' एवं “भक्त प्रत्यय हुए हे
भौरिक्यादि तथा ेषुकार्यादि शब्दोसे “विध ' एवं
“ भक्त ' प्रत्यय होनेका नियम हे । उत्कटम्- इसकी
सिद्धिका नियम पहले बताया गया है, नासिकाकौ
निचाई व्यक्त करनेके लिये “अव' उपसर्गसे'
टीर', 'नाट' ओर "भ्रट! प्रत्यय होते हैं । तथा नि
उपसर्गसे ' विड ' ओर ' विरीस' प्रत्यय होते हें।
इसके सिवा “नि से “इन ओर “पिर ' प्रत्यय भी
होते हे । "इन '-प्रत्यय परे होनेपर ' नि'के स्थानम
चिक् आदेश हो जाता हे ओर “पिट प्रत्यय परे
होनेपर “नि'के स्थानमें 'चि' आदेश होता हे।
मूलोक्त उदाहरण इस प्रकार है- अवटीटः, अवनाटः
(अवभ्रटः) =नीची नाकवाला पुरुष। निविडम्
(नीची नाक), निविरीसम्, चिकिनम्, चिपिटम्,
चिक्तम्-इन सवका अर्थ नीची नाक है। जिसके
ओंखसे पानी आता हो, उसको "चिव" ओर
"पिल्ल" कहते है । ल प्रत्यय है ओर क्लिन्नर-शब्द
प्रकृति है- जिसके स्थानमें चि ओर पिय
आदेश हए हैं । पैदा करनेवाले खेतके अर्थमें
पेदावार-वाचक शब्दसे शाकट ओर शाकिन प्रत्यय
होते हे । जेसे “इक्षुशाकटम् ' ' इक्रुशाकिनम्' । उसके
दवारा विख्यात है, इस अर्थम चञ्चु ओर चण
प्रत्यय होते है) जो विद्यासे विख्यात है, उसे
"विद्याचण' ओर “ विद्याचञ्यु' कहते हें । बहु आदि
शब्दंसे 'तिथ' प्रत्यय होता हे, पूरण अर्थमें।
बहूनां पूरणम् इति=बहुतिथम्। शृद्धिण-शब्द् पर्वतका
वाचक हे, इसे निपात-सिद्ध बताया जा चुका हे।
एेशर्यवाचक स्व-शब्दसे आमिन् प्रत्यय होता
हे- स्व+आमिन्-स्वामी (अधीश्वर या मालिक) ।
“रूप ' शब्दसे आहत ओर प्रशंसा अर्थमें 'य'
प्रत्यय होता है। यथा विषमम्, आहतं वा
रूपमस्यास्तीति- रूप्यः कार्षापणः (खराब पैसा),
रूप्यम् आभूषणम् (खराब भूषण) इत्यादि।
+उप' ओर “अधि' से त्यक प्रत्यय होता है,
क्रमशः समीप एवं ऊचाईको भूमिका बोधक
होनेपर। पर्वतके पासको भूमिको "उपत्यका,
(तराई) कहते हैँ ओर पर्वतके ऊपरकी (ऊंची)
भूमिको "अधित्यका" कहते हें । “ वात' शब्दस
'ऊल' प्रत्यय होता है, असहन एवं समूहके
अर्थमें। वातं न सहते वातूलः । जो हवा न सह
सके, वह ' वातूल ' हे। वात+ऊल, अलोप वातूलः।
वातके समूह (ओधिी)-को भी ! वातूल ' कहते
हें । ' कुत्" शब्दसे !डुप' प्रत्यय होता है, डकार
इत्संज्ञक, रिलोप। हस्वा कुतूः कुतुपः (चमडेका
तेलपात्र-कुप्पी) । बलं न सहते (बल नहीं
सहता)-इस अर्थम बल-शब्दसे ' ऊल '-प्रत्यय
होता है। बल+ऊल=-बलूलः। हिमं न सहते
(हिमको नदीं सहता) इस अर्थमें हिमसे एलु
प्रत्यय होता है। हिम+एलु=हिमेलुः। अनुकम्पा-
अर्थम मनुष्यके नामवाचक शब्दसे “इक' एवं
अड ' आदि प्रत्यय होते हँ तथा स्वरादि प्रत्यय
परे रहनेपर पूर्ववत शब्दके द्वितीय स्वरसे आगेके
सभी अक्षर लुप्त हो जाते हँ । यदि द्वितीय स्वर
सन्धि-अक्षर हो तो उसका भी लोप हो जाता हे।
इन सब नियमोके अनुसार ये दो उदाहरण
है- अनुकम्पितः कहोडः=कहिकः। अनुकम्पितः
उपेन््रदत्तः=उपडः । ' ऊर्णायुः ' का अर्थं है ऊनवाला
जीव (भेड् आदि) अथवा ऊनी कम्बल आदि।
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
त २
क ऋ 7 नको जित्य
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
२२७
"ऊर्णा 'से युस् प्रत्यय होकर "ऊर्णायुः ' वना हे ।
पर्वं ओर मरुत् शब्दोंसे त प्रत्यय होता हे।
पर्व+ त= पर्वतः (पाड) । मसुत्+त= मरुत्तः (मरु
नामक पौधा अथवा महाराज मरुत्त) । एक शब्दसे
असहाय-अर्थमें आकिन्, कन् ओर उसका लुक्,
ये तीनों कार्य वारी-बारीसे होते है । एक+आकिन्
एकाकी । एक+क=एककः । कनूका लोप होनेपर
एकः । इन सबका अर्थ-अकेला, असहाय हे ।
चर्मण्वती एक नदीका नाम है। (इसमे चर्मन्
शब्दसे मतुप्, मकारका वकारादेश, नलोपका
अभाव ओर णत्व आदि कार्य निपातसिद्ध ह।
स्त्रलिङ्गबोधक डीप् प्रत्यय हुआ है) । “ ज्योत्ा'
ओर ` तमिखा' निपात-सिद्ध ह, यह वात गोमीके
प्रसङ्गमे कही गयी है। इसी प्रकार अष्ठीवत्,
कक्षीवत्, रुमण्वत्, आसन्दीवत् तथा चक्रौवत्-ये
शब्द भी निपात-सिद्ध हें । यथा-आसन्दीवान्
ग्रामः, अष्ठीवान् नाम ऋषिः, चक्रवान् नाम राजा,
कक्षीवान् नाम ऋषिः, रुमण्वान् नाम पर्वतः।
तृष्णीं शब्दसे काम् प्रत्यय होता है, अकच्के
प्रकरणमें । तृष्णीकाम् आस्ते (चुप वैठता हे) ।
मित् कार्य अन्तिम स्वरके बाद होता है । तिङ्न्त,
अव्यय ओर सर्वनामसे “रि' के पहले अकच्
होता है, चकार इत्संज्ञक है । इस नियमके अनुसार
' जल्पति" इस तिडन्त पदके इकारसे पहले अकच्
होनेसे "जल्पतकि (बोलता है) रूप वनता
ठे ॥ ६६-७०॥
कंवः कम्भश्च कंयुश्च कन्तिः कन्तुस्तथैव च।
कन्तः कयश्च शंवश्च शम्भः शंयस्तथा पुनः ॥ ७१॥
शन्तिः शन्तुः शन्तशंयौ तथाहयुः शुभयुवत्।
कम् ओर शम्-ये मकारान्त अव्यय हे । कमका
अर्थं जल ओर सुख टै, शम्का अर्थं सुख ह । इन
दोनसे सात प्रत्यय हेति है-व, भ, युस्, ति, तु, त
ओर यस्। युस् ओर यसूका सकार इत्संञ्चक ट । इन
सवके उदाहरण क्रमशः इस प्रकार टं- कवः,
कम्भः, केयुः, कन्तिः, कन्तुः, कन्तः, कयः । शंवः,
शंभः, शंयुः, शन्तिः, शन्तुः, शन्तः, शयः । अहम्- यह
मकारान्त अव्यय अहंकारके अर्थमें प्रयुक्त होता हे
ओर शुभम्- यह मकारान्त अव्यय शुभ-अर्थमं
हे । इनसे ' युस्'-प्रत्यय होता हे, सकार इत्संज्ञक
हे । अहम्+यु= अहंयुः (अहंकारवान्), शुभम्+ यु=
शुभयुः (शुभयुक्त पुरुष ) ॥७१॥
भवति वभूव भविता भविष्यति भवत्वभवद्धवेच्यापि॥७२॥
भूयादभूदभविष्यल्लादावेतानि रूपाणि)
अत्ति जघासात्तात्स्यत्यत्वाददद्यादद्धिरघसदात्स्यत्॥ ७३॥
(अव तिडन्तप्रकरण प्रारम्भ करके कुच धातुभेकि
रूपोंका दिग्दर्शन कराते है। वैयाकरणोने दस प्रकारके
धातु-समुदाय माने है, उन्हे 'नवगणी या दसगणी'
के नामसे जाना जाता है। उनके नाम हं--भ्वादि,
अदादि, जुहोत्यादि, दिवादि, स्वादि, तुदादि, रुधादि,
तनादि, क्रयादि तथा चुरादि। भ्वादिगणकरे सभी
धातुओकि रूप प्रायः एक प्रकार एवं एक शलीकर
होते है, दूसरे-दूसे गणोके धातु भी अपने-अपने
ढंगमें एक ही तरहके होते हं । यहां सभी गणक
एक-एक धातुके नौ लकारोमें एक-एक रूप दिया
जाता है। शेष धातु ओर उनके रूपोंका ज्ञान विदान्
गुरुसे प्राप्त करना चाहिये ।) भू " धातुके ल् लकारमं
‹ भवति भवतः भवन्ति" इत्यादि रूप बनते हं। लिट्
लकारमं “बभूव बभूवतुः बभूवुः ' इत्यादि, लु
“भविता भवितारौ भवितारः ' इत्यादि, लद ' भविष्यति
भविष्यतः भविष्यन्ति" इत्यादि, लोटरमं ' भवतु भवतात्
भवताद् भवताम् भवन्तु इत्यादि, लद्लकारमं " अभवत्
अभवताम् अभवन्" इत्यादि। विधिलिड्ं ˆ भवेत्
भवेताम् भवेयुः" इत्यादि, आशिप् लि द्म भयात्
"भूयास्ताम् भूयासुः ' इत्यादि लुड्मं ' अभूत् अभूताम्
अभूवन्" इत्यादि तथा लृङ् लकारमं अभविष्यत्
अभविष्यताम् अभविष्यन्" इत्यादि-वे सव रूप
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
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संक्षिप्त नारदपुराण
होते हे । ' भू" धातुका अर्थं सत्ता है, * भवति'का
अर्थं “होता है'-एेसा किया जाता है । अव अदादि
गणके “अद् धातुका पूर्ववत् प्रत्येक लकारमें
एक-एक रूप दिया जाता हे, “अद् ' धातु भक्षण
अर्थमें प्रयुक्त होता हे। अत्ति। जघास। अत्ता।
अत्स्यति । अत्तु । आदत्। अद्यात्। अद्यात्। अघसत्
आत्स्यत् ॥ ७२-७३ ॥
जुहोति जुहाव जुहवाच्छकार होता होष्यति जुहोतु ।
अजुहोज्नुहुयाद्धूयादहोपीदहोष्यदीव्यति ।
दिदेव देविता देविष्यति दीव्यतु चादीव्यदीव्येदीव्याद्वे ॥ ७४॥
अदेवीददेविष्यत्सुनोति सुषाव सोता सोष्यति वे।
सुनोत्वसुनोत् सुनुयात्सूयादसावीदसोष्यत् तुदति च ॥ ७५॥
तुतोद तोत्ता तोत्स्यति तुदत्वतुदतुदेत्तुद्याद्धि।
अतोत्सीदतोत्स्यदिति च रुणद्धि रुरोध रोद्धा रोत्स्यति वै ॥ ७६॥
रुणद्ध्वरुणद्रुन्ध्याद्रुध्यादरौत्सीदरोत्स्यच्च 1
तनोति ततान तनिता तनिष्यति तनोत्वतनोत्तनुयाद्दि ॥ ७७॥
तन्यादतनीच्यातानीदतनिष्यत् क्रीणाति चिक्राय क्रेता
क्रेष्यति क्रीणात्विति च। अक्रीणात् क्रीणीयात्
क्रीयादक्रषीदक्रेष्यच्योरयति चोरयामास चोरयिता
चोरयिष्यति चोरयत्वचोरयच्योरयेच्योर्याद्-
चूचुरदचोरयिष्यदित्येवं दश वे गणाः ॥ ७८ ॥
जुहोत्यादि गणमें “हु ' धातु प्रधान हे । इसका
प्रयोग अग्निमें आहुति डालनेके अर्थमें या देवताको
तृप्त करनेके अर्थमें होता है। इसका प्रत्येक
लकारमें रूप इस प्रकार है-जुहोति। जुहाव,
जुहवाञ्चकार, जुह वाम्बभूव, जुहवामास। होता।
होप्यति। जुहोतु। अजुहोत्। जुहुयात्। हयात्।
अहोपीत्। अहोप्यत्। दिवादि गणमें ' दिव ' धातु
प्रधान हे । इसके अनेक अर्थ है-- क्रीडा, विजयकी
इच्छा, व्यवहार, द्युति, स्तुति, मोद, मद, स्वप्न,
कान्ति ओर गति। इसके रूप पूर्ववत् विभिन्न
लकारोमें इस प्रकार ह--दीव्यति। दिदेव । देविता ।
देविष्यति। दीव्यतु। अदीव्यत्। दीव्येत्। दीव्यात्।
अदेवीत्। अदेविष्यत्! स्वादिगणमें “सु' धातु
प्रधान हे। यह मूलतः ' षुञ् ' धातुके नामसे प्रसिद्ध
हे । इसका अर्थ है अभिषव अर्थात् नहलाना, रस
निचोड़ना, नहाना एवं सोमरस निकालना। रूप
इस प्रकार हेँ- सुनोति। सुषाव । सोता । सोष्यति।
सुनोतु असुनोत्। सुनुयात्। सूयात्। असावीत्।
असोष्यत्। ये परस्मैपदके रूप ह; आत्मनेपदमें
सुनुते, ' सुषुवे ' इत्यादि रूप होते हे । तुदादिगणमें
"तुद् ' धातु प्रधान हे, जिसका अर्थ हे पीड़ा देना।
रूप इस प्रकार है-- तुदति । तुतोद । तोत्ता । तोत्स्यति।
तुदतु । अतुदत्। तुदेत्। तुद्यात्। अतौत्सीत्। अतोत्स्यत्।
रुधादिगणमें “रुध्' धातु प्रधान हे, जिसका अर्थ
है-रूधना, बाड लगाना, घेरा डालना या रोकना।
रूप इस प्रकार है-- रुणद्धि । रुरोध । रोद्धा । रोत्स्यति ।
रुणद्धु । अरुणत्। रुन्ध्यात्। रुद्धयात्। अरौत्सीत्।
अरोत्स्यत्।' तनादिगणमें ‹ तन्' धातु प्रधान हे।
इसका अर्थं हे विस्तार करना, फैलाना; रूप इस
प्रकार टहैं-तनोति। ततान। तनिता। तनिष्यति।
तनोतु। अतनोत्। तनुयात्। तन्यात्। अतनीत्, अतानीत्।
अतनिष्यत्' । क्रयादिमें क्री-धातु प्रधान है- जिसका
अर्थं हे खरीदना, एक द्रव्य देकर दूसरा द्रव्य
लेना। रूप इस प्रकार ठहै-क्रोणाति। चिक्राय।
क्रेता। क्रेष्यति। क्रोणातु। अक्रोणात् क्रोणीयात्।
क्रोयात्। अक्रेषीत् । अक्रेष्यत् । चुरादिगणमें “ चुर्!
धातु प्रधान हे, जिसका अर्थं हे चुराना; रूप इस
१. यह उभयपदीय धातु है । मूलमं केवल परस्मपदीय रूप दिया गया है । इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार
हे- रुन्धे । रुरुधे । रोद्धा । रोत्स्यते । रन्धाम्। अरुन्ध। रुन्धीत । रोत्सी्ट । अरुद्ध । अरोत्स्यत।
२. यह भो उभयपदीय धातु है । इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है- तनुते । तेने । तनिता। तनिष्यते । तनुताम्
अतनुत । तन्वीत । तनिपी्ट । अतत, अतनिष्ट । अतनिष्यत।
> चणा -गत्मनेपदीय रूप इस प्रकार है--क्रोणीते। चिक्रिये । क्रेता । क्रेष्यते । क्रीणीताम्। अक्रीणीत । क्रीणीत।
कपा । नक्र । अक्रप्यत।
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 8118 8/1 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
पूवंभाग-द्वितीय पाद्
प्रकार है-- चोरयति । चोरयामास, चोरयाञ्चकार्,
चोरयाम्बभूव । चोरयिता। चोरयिष्यति। चोरयतु ।
अचोरयत्। चोरयेत्। चोर्यात्। अचूचुरत् ।
अचोरयिष्यत्* । इस प्रकार ये धातुओंके दस गुण
माने गये हें ॥ ७४-७८ ॥
प्रयोजके भावयति सनीच्छायां बुभूषति।
क्रियासमभिहारे तु पण्डितो बोभूयते मुने ॥७९॥
प्रयोजकके व्यापारमे प्रत्येक धातुसे णिच्
प्रत्यय होता है । ! च' कार ओर ण! कार इत्संस्चक
हे । णिच् प्रत्यय परे रहनेपर स्वरान्त अद्धकौ वृद्धि
होती है। भू से णिच् करनेपर भू+इ वना; फिर
वृद्धि ओर आव् आदेश करनेपर भावि वना, उससे
धातुसम्बन्धी अन्य कार्य करनेपर भावयति रूप
बनता दै। जो कर्ताको प्रेरणा दे, उसे प्रयोजक
कहते है । जेसे-' चैत्रः पण्डितो भवति" (चेत्र
पण्डित होता हे), ' तं मैत्रः अध्यापनादिना प्रेरयति"
(उसे मेत्र पटाने आदिके द्वारा पण्डित होनेमे
प्ररणा देता है ) । इस वाक्यमें चेत्र प्रयोज्य कर्ता हे
ओर मत्र प्रयोजक कर्ता है। इस प्रयोजकके
व्यापारमें ही णिच् प्रत्यय होता है; इसलिये
उसीके अनुसार प्रथम, मध्यम आदि पुरुषकां
व्यवस्था एवं क्रिया होती है। प्रयोज्य कर्ता
प्रयोजकके व्यापारमें कर्म बन जाता है, इसलिये
उसमें द्वितीया विभक्ति होती है ओर प्रयोजक
कतमिं प्रथमा विभक्ति। यथा-' मैत्रः यत्रं पण्डितं
भावयति" (मैत्र चैत्रको पण्डित बनानेमें योग देता
है) । इसी प्रकार अन्य धातुओंसे भी प्रेरणार्थक
प्रत्यय होता है । यथा-' छात्रः पठति, गुरूः प्रेरयति
इति गुरुः छात्रं पाठयति ' ( छात्र पट्ता है, गुरु उसे
प्रेरित करता है; इसलिये गुरु छात्रको पदाता हं ) ।
इच्छा-अर्थमें "सन् ' प्रत्यय हाता हं “ भवितुम्
२२९
इच्छति वुभूषति ' ( होनेकी इच्छा करता है ) । इसी
प्रकार पद्, गम्, आदि अन्य धातुओंसे भी इच्छा-
अर्थमें पिपठिषति (पदढनेकी इच्छा करता है),
जिगमिषति (जाना चाहता हे) - इत्यादि सन्नन्त
रूप होते हे। मुने! क्रिया-समभिहारमे एक
स्वरवाले हलादि धातुसे "यङ्" प्रत्यय होता टे, इस
नियमके अनुसार भू-धातुसे यद्प्रत्यय होनेपर
धातुका द्वित्व होता हे; क्योकि सन् ओर यङ्् परे
रहनेपर धातुके द्वित्व होने (एकमे दो हो जाने) -
का नियम है। फिर धातु-प्रत्ययसम्बन्धी अन्य
कार्य करनेपर बोभूयते रूप बनता हे। यथा--*देवदक्तः
पण्डितो बोभूयते (देवदत्त बड़ा भारी पण्डित हो
रहा हे) । ' बार-बार ' या * अधिक" अर्थका बोध
कराना ही क्रियासमभिहार कटलाता है। इम
तरहके प्रयोगको यडन्त कहते है । पद् ओर गम्
आदि धातुओंमे यङ्-प्रत्यय करनेपर पापठयते,
(वार-बार या बहुत पटृता हे) । जङ्गम्यते (वार-
वार या बहुत जाता हे) इत्यादि रूप होते ट ॥ ५९॥
तथा यङ्लुकि विप्रद्ध बोभवीति च पठ्यते ।
पुत्रीयतीत्यात्मनीच्छायां तथाचारेऽपि नारद ।
अनुदात्तङितो धातोः क्रियाविनिमये तथा॥८०॥
यद-प्रत्ययका लुक् (लोप होना) भी देखा
जाता है। उस दशाम बोभवीति, बोभोति, पापटठीति
ओर जद्घमीति इत्यादि रूप होते हं । इन रूपोकं
यद्ुलुगन्त रूप कहते हें । अर्थं यडन्तके ही समान्
होते हे । * आत्मनः पुत्रम् इच्छति" (अपने लिये पुत्र
चाहता ह ) । इस वाक्यमे पुत्रकी इच्छा व्यक्त होती
है । एेसे स्थलोमं इच्छा-क्रियाके कर्मभूत शब्दस
क्यच्-प्रत्यय होता है। ककरार् ओर चकारकी
इत्संज्ञा होती दै। उपर्युक्त उद्दाहरणमं पुत्र-शब्दसे
क्यच् -प्रत्यय करनेपर पुत्र+य इस अवस्थामें पुत्रमं
१. इसका आत्मनेपदीय रूप इस प्रकार टै- चोर्यते ¦ योरयाञ्चक्र, योरयामार, चीरयाम्बभूवे ¦ चोरयिता । चोरयिष्यते ।
चोरयताम्। अचोरयत । चोरयेत। चोरविषाष्ट ! अचूचुरत् । भचीरविष्यत
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 8118811 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
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"त्र'के अकारका इ हो जाता हे, फिर ' पुत्रीय" कौ
धातुसंज्ञा करके तिङन्तके समान रूप चलते हे । इस
प्रकार ' पुत्रीयति" इत्यादि रूप होते हे । ' पुत्रीयति का
अर्थ हे--अपने लिये पुत्र चाहता हे । एसे प्रयोगको
नामधातु कहते हें । नारदजी ! कर्मभूत उपमानवाचक
शब्दसे आचार-अर्थमे भी क्यच् होता हे।
यथा-“पुत्रमिवाचरति पुत्रीयति छात्रम् (गुरुजी
छात्रके साथ पुत्रका-सा वर्ताव करते हे) |
अव आत्मनेपदका प्रकरण आरम्भ करते हे ।
जिस धातुमें अनुदात्त स्वर ओर कारको इत्संज्ञा
होती टै, उससे आत्मनेपदके प्रत्यय होते हे ।
यथा-एधते, वर्धते इत्यादि । ये अनुदात्तेत् हे । त्रेङ्
पालने- यह डित् धातु हे, इसके केवल आत्मनेपदमें
"त्रायते" इत्यादि रूप होते दहं । जहां क्रियाका
विनिमय व्यक्त होता हो, वहां भी आत्मनेपद होता
हे। यथा-- व्यतिलुनीते (दृसरेके योग्य लवनरूप
कार्य दूसरा करता हे) ॥ ८०॥
निविशादेस्तथा विप्र विजानीद्यात्मनेपदम्।
परस्मेपदमाख्यातं शेषात् कर्तरि शाव्दिकेः ॥८१॥
विप्रवर! निपूर्वक विश्" एवं वि ओर परापूर्वक
` जि' इत्यादि धातुओंसे भी आत्मनेपद ही जानो ।
यथा- निविशते, विजयते, पराजयते इत्यादि । भाव
ओर क्ममें प्रत्यय होनेपर भी आत्मनेपद ही होता
हे । आत्मनेपदक जितने निमित्त है, उन्हें छोड़कर
शेष धातुओंसे कतपिं परस्मैपद होता है-एेसा
वैयाकरणोंका कथन हे॥ ८१॥
जित्स्वरितेतश्च उभे यक्च स्याद्धावकर्मणोः।
जिन धातुओपें ' स्वरित" ओर ञ् ' की इत्संसा
हुई हो, उनसे परस्मेपद ओर आत्मनेपद दोनों होते
हे । यथा-' खनति, खनते । श्रयति, श्रयते ' इत्यादि ।
(अव भाव-कर्म-प्रकरण आरम्भ करते हं- )
भाव ओर कर्ममिं धातुसे यक् प्रत्यय होता हे।
भावमें प्रत्यय होनेपर क्रियामें केवल ओत्सर्गिक
संक्षिप्त नारदपुराण
एकवचन होता है ओर सदा प्रथम पुरुषके ही
एकवचनका रूप लिया जाता हे । उस दशामें कर्ता
तृतीयान्त होता है। भू धातुसे भावमें प्रत्यय
करनेपर ' भूयते" रूप होता हे । वाक्यम उसका
प्रयोग इस प्रकार है-' त्वया मया अन्येश्च भूयते।'
सकर्मक धातुसे कर्ममिं प्रत्यय होनेपर कर्म उक्त हो
जाता हे, अतः उसमें प्रथमा विभक्ति होती हे ओर
अनुक्त कतमिं तृतीया विभक्तिका प्रयोग होता हे।
कतकि अनुसार ही क्रियामें पुरुष ओर वचनकौ
व्यवस्था होती है । यथा--' चेत्रः आनन्दमनुभवति
इति कर्मणि प्रत्यये चेत्रेणानन्दोऽनुभूयते ' (चेत्रसे
आनन्दका अनुभव किया जाता या आनन्द भोगा
जाता है) चेत्रस्त्वामनुभवति, चैत्रेण त्वमनुभूयसे,
(चेत्रसे तुम अनुभव किये जाते हो) चेत्रो मामनुभवति,
चेत्रेणाहमनुभूये' (चेत्रसे मे अनुभव किया जाता
हू) इत्यादि उदाहरण भाव-कर्मके हे।
सोकर्यातिशयं चैव यदा द्योतयितुं मुने ॥ ८२॥
विवक्ष्यते न व्यापारो लक्ष्ये कर्तुस्तदापरे ।
लभन्ते कर्तृतां पश्य पच्यते ह्योदनः स्वयम्॥८३॥
साध्वसिश्छिनत््येवं स्थाली पचति वे मुने।
धातोः सकर्मकात् कर्तृकर्मणोरपि प्रत्ययाः ॥८४॥
मुने ! जव अतिशय सौकर्य प्रकाशित करनेके
लिये लक्ष्यमें कतकि व्यापारको विवक्षा नहीं रह
जाती, तब कर्म ओर करण आदि दूसरे कारक ही
कर्तृभावको प्राप्त होते हें। यथा-' चैत्रो वद्धिना
स्थाल्यामोदनं पचति" (चैत्र आगसे बटलोईमं
भात पकाता है) --इस वाक्यमें जब चैत्रके कर्तृत्वकीं
विवक्षा न रहे ओर करण आदिके कर्तृत्वको
विवक्षाहो जायतोवे ही कर्ता हो जाते हं ओर
तदनुकृल क्रिया होती हे। यथा--' वद्धिः पचति!
(आग पकाती हे) । यहाँ करण ही कर्तारूपमं
प्रयुक्त हुआ टै । * स्थाली पचति" (वरलोई पकाती
है )- यहाँ अधिकरण ही कतकि रूपमं प्रयुक्त
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पू्वभाग-द्वितीय पाद
२३१
हुआ हे । ` ओदनः स्वयं पच्यते ' (भात स्वयं पकता
हे) -- यहां कर्म ही कर्तरूपमें प्रयुक्त हआ है । जव
कर्म ही कर्तारूपमे प्रयुक्त हो तो कतमिं लकार होता
हे; परेतु कर्मवद्धाव होनेसे यक् ओर आत्मनेपद
आदि ही होते हैं । अतः ' पचति" न होकर ' पच्यते!
रूप होता हे। एेसे प्रयोगको कर्म-कर्तृप्रकरणके
अन्तर्गत मानते हे । दूसरा उदाहरण इस प्रकार है-
"असिना साधु छिनत्ति" (तलवारसे अच्छी तरह
काटता है)-इस वाक्यमें उपर्युक्त नियमानुसार
करणमं कर्तृत्वको विवक्षा होनेपर एेसा वाक्य
वनेगा-' साधु असिश्छिनत्ति" (तलवार अच्छा कारती
हे) । मुने! सकर्मक धातु भी कर्मकर्म अकर्मक हो
जाता हे, अतः उससे भाव तथा क्तमिं भी लकार
होता हे। यथा भावे-- पच्यते ओदनेन । कर्तरि-- पच्यते
ओदनः । सम्प्रदान ओर अपादान कारकमिं कर्तृत्वको
विवक्षा कभी नहीं को जाती, क्योकि यह अनुभवके
विरुद्ध है । सामान्य स्थितिमें सकर्मक धातुसे ' कर्ता"
ओर कर्मे प्रत्यय होते हें॥ ८२-८४॥
तस्माद् वाकर्मकाद्धिप्र भावे कर्तरि कोर्तिताः।
फलव्यापारयोरेकनिष्ठतायामकर्मकः ॥ ८५॥
धातुस्तयो्धर्मिभेदे सकर्मक उदाहतः ।
गोणे कर्मणि दुह्यादेः प्रधाने नीहकृष्वहाम्॥ ८६ ॥
बुद्धिभक्षार्थयोः शब्दकर्मकाणां निजेच्छया ।
प्रयोज्यकर्मण्यन्येषां ण्यन्तानां लादयो मताः ॥ ८७॥
विप्रवर! वही धातु यदि अकर्मक हो तो
उससे “ भाव ' ओर ' कर्ता" में प्रत्यय कहे गये है ।
सभी धातुओंके फल ओर व्यापार-ये दो
अर्थ हें । ये दोनों जहाँ एकमात्र कतमिं ही मौजूद
हों, उन धातुओंको अकर्मक कहते हे । जेसे-भू-
धातुका अर्थं ॒सत्ता है। सत्ताका तात्पर्य टै-
आत्मधारणानुकृल व्यापार । इसमे आत्मधारणरूप
फल ओर तदनुकूल व्यापार दोनों केवल कतमिं
ही स्थित हें; अतः भू-धातु अकर्मक हे।
जहां फल ओर व्यापार दोनों भित्न-भित्न धमममिं
स्थित हो, वरहो धातुको सकर्मक माना गया है।
जेसे-" पच्" धातुका अर्थ है--विक्लित्यनुकूल व्यापार
(चावल आदिको गलानेके अनुरूप प्रयत्न) । इसमें
विक्लित्ति (गलना) यह फल है, जो चावलमें होता
हे ओर इसके अनुकूल जो चृल्हेमं आग जलाने
आदिका व्यापार हे, वह कतमं है; अतः पच्!
धातु सकर्मक हुआ हे । ' दुह" आदिः धातुओकि दो
कर्म होते हे। यथा-'गां दोग्धि पयः (गायसे दूध
दहता हे)-इसमें गाय गोण कर्म है ओर दृध प्रधान
कर्म । दुह आदि धातुओके गौण कर्ममें ही प्रत्यय
होता है। यथा-' गोर्दुह्यते पयः, बलिर्याच्यते वसुधाम्'
इत्यादि । नी, ह, कृष् ओर वह--इन चार् धातु ओके
प्रधान कर्ममें प्रत्यय होता दै। यथा-' अजां ग्रामं
नयति इस वाक्यमं अजा प्रधान कर्मं ओर ग्राम
गोण कर्म हे। प्रधान कर्ममे प्रत्यय होनेपर वाक्यका
स्वरूप इस प्रकार होगा-' अजा ग्रामं नीयते।' सानार्धक
ओर भक्षणार्थक धातुअके एवं शब्दकर्मक धातु आकि
ण्यन्त होनेपर उनसे प्रधान या अप्रधान किसी भी
कर्ममें अपनी इच्छाके अनुसार प्रत्यय कर सकते है।
यथा-' बोध्यते माणवकं धर्मः, माणवको धर्मम् इति
वा।' अन्य गत्यर्थक एवं अकर्मक धातुभकि ण्यन्त
होनेपर उनके प्रयोज्य कर्ममें लकार आदि प्रत्यय माने
गये है । यथा-' मासमास्यते माणवकः ' ॥ ८+.--८७॥
फलव्यापारयोर्धातुराश्रये तु तिडः स्मृताः।
फले प्रधानं व्यापारस्तिङर्थस्तु विशेषणम्॥ ८८ ॥
धातु फल ओर व्यापाररूप अर्थक बोधक
होता है। जसे-भृ-धातु आत्मधारणरूप फल
ओर तदनुकूल व्यापारका बोधकर टै। फलं ओर
१. दुह्, याच्, पच्, दण्ड्, रध्, प्रच्छ्, चि, ब्रू, णाम्, जि, मध, मुपू-ये दुह् आदिके अन्तर्गत दै, इनके दौ ..
क्म होते हैं। इसी प्रकार नी, ह, कृष् ओर वह-टनके भीदौ क्रमंद्दोते र|
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व्यापार दोनोंका जो आश्रय हे, उसमें अर्थात् कर्ता
एवं कर्ममें (तथा भावमें भी) तिङ्-प्रत्यय होते
ठै, फलमें व्यापारकी ही प्रधानता हे, तिङर्थरूप
जो फल है वह उस व्यापारका विशेषण होता हे।
जेसे-' पचति" इस क्रियाद्वारा चावल आदिके
गलनेका प्रतिपादन होता हे। यहां विक्लित्तिरूप
फलके अनुकूल जो अग्निप्रज्वालन ओर फत्कारादि
व्यापार हे, उनके आश्रयभूत कतमिं प्रत्यय हुआ हे।
"ओदनः पच्यते" इत्यादिमं फलाश्रयभूत कर्ममे तिङ्
प्रत्यय होनेके कारण ओदनमें प्रथमा विभक्ति हे॥ ८८ ॥
एधितव्यमेधनीयसिति कृत्ये निदर्शनम्।
भावे कर्मणि कृत्याः स्युः कृतः कर्तरि कीर्तिताः ॥ ८९ ॥
कर्ता कारक इत्याद्या भृते भूतादि कीर्तितम्।
गम्यादि गम्ये निर्दिष्टं शेषमद्यतने मतम्॥ ९०॥
(अव कृदन्त-प्रकरण प्रारम्भ करते हं--कृत्-
प्रत्यय जिसके अन्तमें हो, वह कृदन्त हे । ण्वुल्, तृच्,
जो कृत्य, क्त ओर खलर्थ प्रत्यय हे, वे केवल भाव
ओर कर्ममें ही होते हें। तव्यत्, तव्य, अनीयर्
केलिमर् आदि प्रत्यय कृत्य कहलाते ह । घञ् आदि
प्रत्यय भाव, करण ओर अधिकरणमें होते हे।
सामान्यतः कृत्-प्रत्यय ' कर्ता ' में प्रयुक्त होते टे । यहा
पहले कृत्य प्रत्ययोके उदाहरण देते है- ) एधितव्यम्
ओर एधनीयम्- ये कृत्य प्रत्ययके उदाहरण हे।
"कृत्य ' भाव ओर कर्ममें तथा "कृत्" कर्तामं वताय
गये हे । "त्वया मया अन्यैश्च एधितव्यम्", यहां भावमें
तव्य ओर अनीयर् प्रत्यय हुए हँ । कमम प्रत्ययका
उदाहरण इस प्रकार समञ्मना चाहिये । ' छात्रेण पुस्तकं
पठनीयम्! ' ग्रन्थः पठितव्यः ' इत्यादि कर्ममं प्रत्यय
होनेसे कर्तमिं तृतीया विभक्ति ओर कर्ममं प्रथमा
विभक्ति हई हे। कर्ता, कारकः इत्यादि ' कृत्! प्रत्ययके
उदाहरण है । यथा-' रामः कर्ता! "ब्रह्मा कारकः ' यां
कर्तमिं "तृच्" ओर * ण्वुल्! प्रत्यय हए है। “ वु'क स्थानम
संक्षिप्त नारदपुराण
अक् अदेश होता हे। णु. ल्. च् आदिकी इत्संञञा होती
हे। “ क्त' ओर ' क्तवतु" ये प्रत्यय भूतकालमें हेते है।
यथा-' भूतः भूतवान्' इत्यादि; ओर ' गम्य ' आदि शब्द
भविष्यत् अर्थम निर्द्र हुए ह । शेप शब्द वर्तमान
कालमें प्रयुक्त होने योग्य माने गये हे ॥ ८९-९०॥
अधिस््रीत्यव्ययीभावे यथाशक्ति च कोर्तितम्।
रामाश्रितस्तत्पुरुपे धान्यार्थो यूपदारु च ॥ ९१॥
व्यापघ्रभी राजपुरुषोऽक्षशोण्डो द्विगुरुच्यते ।
पञ्चगवं दशग्रामी त्रिफलेति तु रूढितः ॥ ९२॥
(अव समासका प्रकरण आरम्भ कसते है) समास
चार प्रकारके माने गये है-अव्ययीभाव, तत्पुरुष,
बहुत्रीहि ओर द्व । " तत्पुरुष" का एक विशिष्ट भेद
' कर्मधारय ' ओर कर्मधारयका एक विशिष्ट भेद द्विगु '
हे। भृतपूर्वः इत्यादि स्थलेमिं जो समास टे, उसका कोई
नाम नहीं निर्देश किया जा सकता । अतः उसे केवल
समासमात्र जानना चाहिये । जिसमें प्रथम पद अव्यय
हु वह समास अव्ययीभाव हेता हे। अथवा अव्ययीभावके
अधिकारमें जो समासविधायक वचन है, उनके अनुसार
जहां समास हुआ है, वह अव्ययीभाव समास हे।
अव्ययीभाव अव्ययसंजक होता हे। अतः सभी
विभक्तियेपिं उसका समान रूप हे। अकारान्त
अव्ययीभावमें विभक्तियोका ' अम्' आदेश हो जाता हे,
परंतु पञ्चमी विभक्तिको छोडकर एेसा होता हे। तृतीया
ओर सप्तमीमं भा अमृभाव वैकल्पिक हे। यथा अपदिशम्
अपदिशे इत्यादि । अधिस्त्रि ओर यथाशक्ति आदि पद
अव्ययीभाव समासके अन्तर्गत बताये गये हे । द्वितीयान्तसे
लेकर सप्तम्यन्त तकके पद सुबन्तके साथ समस्त होते
हे ओर वह समास तत्पुरुष हाता हे । तत्पुरुपके उदाहरण
इस प्रकार टै- रामम्+ आश्रितः=रामाध्चितः । धान्येन
अर्थः= धान्यार्थः युपाय+ दारु=युपदारः। व्याप्रात्+ भीः =
व्याघ्रभोः गज्ञः+पुरुपः=राजपुरुपः। अक्षपु-शेण्डः=
अक्षशौण्डः इत्यादि । जिसमं संख्यावाचक शब्द पूर्वम
हो, वह "द्विगु" कहा गया है। ' पञ्चानां गवां समाहारः
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
२३३
पञ्चगवम्।' दशानां ग्रामाणां समाहारः दशग्रामी (यहां | स्वतन््ररूपसे “ भज" इस क्रियापदसे अन्वित होते है।
स्त्रीलिद्धसूचक ‹ डीप्" प्रत्यय हुआ है) । "त्रयाणां
फलानां समाहारः त्रिफला" (इसमं स्त्रीत्वसूचक
"टाप् प्रत्यय हुआ है) । त्रिफला-शब्द ओंवले, ट
ओर बहेडेके लिये रूढ (प्रसिद्ध) हे ॥ ९१-९२॥
नीलोत्पलं महाषष्ठी तुल्यार्थे कर्मधारयः ।
अब्राह्मणो नचि प्रोक्तः कुम्भकारादिकः कृतः ॥ ९२ ॥
समानाधिकरण तत्पुरुषको * कर्मधारय ' संज्ञा
होती टे। उसके दोनों पद प्रायः विशेष्य-विशेषण
होते हे । विशेषणवाचक शब्दका प्रयोग प्रायः पहले
होता हे । ' नीलं च तत् उत्पलं च=नीलोत्पलम्, महती
चासो षष्ठी च=महापष्ठी 1" जहां “न शब्द किसी
सुबन्तके साथ समस्त होता है, वह “नञ् तत्पुरुष"
कहलाता हे। ' न ब्राह्मणः अब्राह्मणः ' इत्यादि । कुम्भकार
आदि पदोमे "उपपद तत्पुरुष" समास है ॥९३॥
अन्यार्थे तु बहुत्रीहो ग्रामः प्राप्तोदको द्विज ।
पञ्चग् रूपवद्धार्यो मध्याह्वः ससुतादिकः॥ ९४॥
विप्रवर। जहां अन्य अर्थकी प्रधानता हो, उस
समासकी बहु्रीहिमें गणना होती है। "प्राप्तम् उदकं
यं स प्राप्तोदको ग्रामः' (जं जल पहुंचा हो, वह
ग्राम "प्राप्तोदक" है) । इसी तरह-' पञ्च गावो यस्य स
पच्चगुः। रूपवती भार्या यस्य स रूपवद्भार्यः।'
मध्याहः-पद तत्पुरुष समास हे। ' सुतेन सह आगतः
ससुतः' आदि पद बहुत्रीहि समासके अन्तर्गत ह ॥ ९४॥
समुच्यये गुरु चेशं भजस्वान्वायये त्वट ।
भिक्षामानय गां चापि वाक्यमेवानयोभ्वित्॥ ९५॥
चार्थयें न्ध समास होता हे। “ च' के चार अर्थ
है समुच्चय, अन्वाचय, इतरेतरयोग ओर समाहार ।
परस्पर निरपेक्ष अनेक पर्दाका एकमं अन्वय होना
' समुच्चय ' कहलाता हे। समुच्चयमं “ईशं गुर च
भजस्व' यह वाक्य हे। इसमं ईश ओर गुरु दानां
०
८ = ^ र र“
इश-पदका क्रियाके साथ अन्वय हो जानेपर पुनः
क्रियापदकी आवृत्ति करके गुरुपदका भी उसमं अन्वय
होता हे। यही उन दोनोकी निरपेक्षता है। समास
साकाङ्क्ष पर्दोमं होता हे। अतः समुच्चय - वाक्यम दवन
समास नहीं होता है । जहां एक प्रधान ओर दूसरा
अप्रधानरूपसे अन्वित हो, वहो अन्वाचय होता है- जसे
"भिक्षामट गाञ्चानय' इस वाक्यमं भिक्षके लिये गमन
प्रधान है ओर गोका लाना अप्रधान या आनुपद्धिक कार्य
हे। अतः एकार्थीभावरूप सामर्थ्य न होनेसे अन्वाचयमें
भी द्नद्ध समास नहीं होता। समुचय ओर अन्वाचये
वाक्यमात्रका ही प्रयोग होता है॥ ९५॥
इतरेतरयोगे तु रामकृष्णौ समाहतो ।
रामकृष्णं द्विज द्वौ द्वौ ब्रह्म चैकमुपास्यते ॥ ९६ ॥
उद्धूत अवयव-भेद-समृहरूप परस्पर अपिक्षा
रखनेवाले सम्मिलित पदोंका एकधर्मावच्छ्तिमं अन्वय
होना इतरेतरयोग कहलाता है। अतः इसमं सामर्थ्य
होनेके कारण समास होता हे, यथा-'रामकृष्णौ भज'
इस वाक्यमें 'रामश्च-कृष्णश्च=रामकृष्णौ ' इस प्रकार
समास है। इतरेतरयोग द्रनद्धमे समस्यमान पदार्थगत
संख्याका समुदायमें आरोप होता है। इसलिये वहां
द्विवचनान्त या बहुवचनान्तका प्रयोग देखा जाता दे।
समृहको समाहार कहते है । वां अवयव्गत भद
तिरोहित होता हे। यथा-' रामश्च कृष्णण्चेत्यनयोः
समाहारः रामकृष्णम्।' समाहार द्रनद्धमं अवयवगते
संख्या समुदायमें अणेपित नहीं होती। इमलिये
एकत्व-वुद्धिसे एकवचनान्तका प्रयोग किया जाता
दे। समाहारं नपुंसकलिङ्ग होता हे । विप्रवर! इतस्तस्योगमं
राम ओर कृष्ण दोनों दो है ओर समाहारं उनकी
एकता टै, इसलिये कि ब्रह्मरूपमे उन एकं
मानकर उनकी उपासना की जाती टै॥९६॥
* * “° " ~~ ^~
ति श्रीवृहन्ारदीयपुराणे पूर्वभागे कृहदुणट्याने द्वितीकपादं व्याकरणतिरूपणं नाम द्विपद्ाथनमोऽध्यावः ॥५२॥
((-0. 1/८111104/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
संक्षिप्त नारदपुराण
निरुक्त-वर्णन
सनन्दनजी कहते ह -- अव में निरुक्तका वर्णन
करता हू, जो वेदका कर्णरूप उत्तम अङ्क हे । यह
वेदिक धातुरूप ठे, इसे पच प्रकारका बताया गया
टे ॥ १॥ उसमें कहीं वर्णका आगम होता हे, कहीं
वर्णका विपर्यय होता हे, कहीं वर्णोका विकार
होता है ओर कहीं वर्णका नाश माना गया
हे ॥२॥ नारद! जहां वणंकि विकार अथवा
नाशद्वारा जो धातुक साथ विशेष अर्थका प्रकाशक
संयोग होता हे, वह पाँचवाँ उत्तम योग कहा गया
हे ॥३॥ वर्णके आागमसे "हंसः: ' पदकी सिद्धि
होती हे। वर्णेकर विपर्यय (अदल-वदल)-से
"सिंहः: ' पद सिद्ध होता हे । वर्णविकारसे ' गृढोत्माः '
को सिद्धि होती हे। वर्णनाशसे “पृषोदर; ' सिद्ध
होता हे ॥ ४॥ ' भ्रमर“ ' आदि शब्दोमें ्पोचर्वाँं योग
समञ्जना चाहिये । वेदामे लौकिक नियमोंका विकल्प
या विपर्यय कहा गया हे । यहां पुनर्वसुः ' पदको
उदाहरणके रूपमे रखना चाहिये ॥ ५ ॥ ' नभस्वत्"
मं “ वत्' प्रत्यय परे रहते भसंज्ञा हो जानेसे " स'का
रुत्व नहीं हुआ। ( वार्तिक भी हे-' नभोऽद्धिरोमनुषां
वत्युपसंख्यानम्') ` वृषन् अश्चो यस्य सः' इस
विग्रहमं बहुत्रीहि समास होनेपर ' वृपन्+अश्वः'
इस अवस्थामे अन्तर्वर्तिनी विभक्तिका आश्रय
लेकर पदसंज्ञा करके नकारका लोप प्राप्त था,
कितु ' वृषण् वस्वश्वयोः ' इस वार्तिकके नियमानुसार
भसंज्ञा हो जानेसे न लोप नहीं हुआ; अतः
` वृपणश्चः' यही वेदिक प्रयोग हे। (लोकमें
"वृपाश्चः' होता हे।) कहीं-कहीं आत्मनेपदके
स्थानम परस्मेपदका प्रयोग होता हे। यथा-प्रतीपमन्य
ऊर्भिर्युध्यति' यहो ' युध्यते" होना चाहिये, किंतु
परस्मेपदका प्रयोग किया गया हे। 'प्र' आदि
उपसर्ग यदि धातुके पहले हों तो उनको उपसर्ग
एवं गतिसंज्ञा होती हे; किंतु वेदमें वे धातुके
वादमं या व्यवधान देकर प्रयुक्त होनेपर भी
"उपसर्ग ' एवं "गति कहलाते हँ- यथा "हरिभ्यां
याह्योक आ। आ मन्दरेरिन्द्र हरिभिर्याहि1' यहां
" आयाहि ' के अर्थमें ' याहि+आ' का व्यवहित
तथा पर प्रयोग हे। दूसरे उदाहरणमें आ~+याहिके
बीचमें बहुत-से पदोंका व्यवधान है ॥ ६॥ वेदमें
विभक्तियोका विपर्यास देखा जाता हे, जेसे- दक्षा
जुहोति”; यहां ' दुधि ' शब्द “हु ' धातुका कर्म ह
उसमं द्वितीया होनी चाहिये, किंतु "तृतीया च
होश्छन्दसि ' इस नियमके अनुसार कर्ममें तृतीया
१. हन्तीति हंसः ' इस व्युत्पत्तिके अनुसार हन्-धातुके आगे (* वृतृवदिहनि० ' इत्यादि उणादि सूत्रसे) “स^का आगम
होनेसे "हंस" शब्द वनता हे। २. * हिसि हिंसायाम्" इस धातुसे "हिनस्तीति" इस व्युत्पत्तिके अनुसार कर्त्र्थमें अच्
प्रत्यय करनेपर पहले “हिंसः ' वनता है, फिर ' पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम् 'के आदेशानुसार “ह के स्थानमें “स ' ओर
"स" के स्थानमं “ह ' आ जानेसे ' सिंहः ' पद सिद्ध होता है। ३. ' गृढ-आत्मा' इस अवस्थामें आ! विकृत हो “उ'
के रूपमं परिणत हुजा ओर गुण होनेसे ' गुढात्मा" बना। (एष सर्वेषु भूतेषु गृढोत्मा न प्रकाशते) । ४. " पृषोदरः! में
" पृषद् "उदरः ' यह पदच्छेद टै । ' पृपादरादीनि यथोपदिष्म्'के आदेशानुसार यदा तकारका लोप (नाश) हुआ तथा गुण
होनेसे पृषोदरः ' सिद्ध हुआ है । ५. * भ्रमतीति भ्रमरः ' यहाँ ' भ्रमु अनवस्थाने 'से “ अर्तिकमिभ्रमिचमिदेविवासिभ्यश्चित्'
इस उणादि सूत्रके आनुसार " अर' प्रत्यय हानेसे भ्रमर ' शब्द सिद्ध होता है । किन्हीं विद्वानेकि मतमें ' भ्रमन् रौति इस
व्युत्पत्तिके अनुसार * भ्रमर' शब्द वनता है । इसमें ' भ्रम्. अतृ-रु- अच्" इस अवस्थामें "तुका लोप “रुं उका लोप
करनस भ्रमर 'की सिद्धि होती है। ६. लौकिक प्रयोगमं ' पुनर्वसु" शब्द नित्य द्विवचनान्त हि, कितु वेदमें ' छन्दसि
पुनवस्वरिकवचनम् ' क नियमानुसार इसका एकवचनान्त प्रयोग भी होता है।
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
हो गयी हे । अभ्युत्सादयामकः ' इसमें अभि+उतूपूर्वक
सद् ' धातुसे लुङ् लकारमें ! आम्' ओर “आक '-
का अनुप्रयोग हुआ है (लोकमें ' अभ्युदपीपदत्!
रूप बनता है)। "मा त्वाग्निर्घ्वनयीत्' इसमें
' नोनयति ध्वनय०' इत्यादि वैदिक सूत्रके द्वारा
च्लिके चङ्भावका निषेध होता हे । माङ्के योगमें
अट् आट्” न होनेसे ! ध्वनयीत्" रूप हुआ हे
(लोकमें घटादि ध्वन धातुका रूप अदिध्वनत्'
होता हे ओर चुरादिका रूप “ अदध्वनत्' होता
हे) । ! ध्वनयीत्" इत्यादि प्रमुख उदाहरण हे ।
' निष्टर्क्य ० ' इत्यादि प्रयोग वेदमें निपातनसे सिद्ध
होते हें । ' छन्दसि निष्टर्क्यं ' इत्यादि सूत्र इसमें
प्रमाण हें । यहाँ “निस् पूर्वक कृत्" धातुसे ऋुपधाच्च'
सूत्रके अनुसार ' क्यप्' प्राप्त था; परतु 'ण्यत्!
प्रत्यय हुआ हे; साथ ही ' कृत ' मे आदि-अन्तका
विपर्यय होनेसे ' तृक ' रूप वना। फिर गुण होनेसे
तर्क्य हुआ। 'निस्' के “स्' का पत्व हुआ ओर
त्व होकर "निष्टर्क्य" सिद्ध हआ। "गृभाय!
इत्यादि प्रयोग वैकल्पिक “ शायच्” होनेसे वनते
ठे । ह-धातुसे शायच् हुआ ओर " हग्रहोर्भश्छन्दसि"
के आदेशानुसार "ह ' के स्थानमें *भ' हो गया तो
"गृभाय ' वना-' गृभाय जिहया मधु' ॥ ७ ॥ शास्त्रकार
सुप्, तिङ उपग्रह (परस्मेपद-आत्मनेपद), लिङ्ग,
पुरुप, काल, हल्, अच्, स्वर, कतृं, (कारक)
ओर यङ्--इन सवका व्यत्यय (विपर्यय) चाहते
हे, वह भी बाहलकसे सिद्ध होता हे ॥८ ॥ “रात्री '
शब्दमें “रात्रेधाजसौ ' (पा० सू° ४।१।३१) इस
नियमके अनुसार रात्रि-शब्दसे ङीप्-प्रत्यय हुआ
है । (लोकमें “कृदिकारादक्तिनः 'से ङीप् होकर
अन्तोदात्त होता है ।) ' विभ्वी ' में भी विभु-शब्दमे
+ भुवश्च ' के नियमानुसार ङीप् हुआ टै। "कद्रूः!
पदमे “ कद्रुकमण्डल्वोश्छन्दसि" मे ऊ प्रत्यय
हुआ है। "आविषए्यो वधते" त्यादि स्थलेपि
२३५
' अविछए्यस्योपसंख्यानं छन्दसि" के नियमानुसार
"आविस्" अव्यय से 'त्यप्' यह तद्धित-प्रत्यय
हुआ हे। ' वाजसनेयिनः ' में “ वाजसनेयेन प्रोक्तमधीयते"
इस व्युत्पत्तिके अनुसार वाजसनेय-शब्दमे
"शोनकादिभ्यश्छन्दसि ' सूत्रके द्वारा “णिनि ' प्रत्यय
हआ है॥९॥ "कर्णेभिः "में "बहुलं छन्दसि" के
नियमानुसार "भिस्" के स्थानमें एस्" आदेश नहीं
हुआ हे । ' यशोभग्यः ' पदमें “ वेशोयश आदेर्भगाद्यल'
इस सूत्रसे " यल् ' प्रत्यय हुआ है । इत्यादि उदाहरण
जानने चाहिये । ' चतुरक्षरम् ' पदसे चार अक्षरवाले
आश्रावय' “अस्तु श्रोपट्' आदि पदोंको ओर
संकेत किया गया हे। अक्षर-समृह वाच्य दहो तो
"छन्दस्" शब्दसे “ यत्' प्रत्यय होता है-- दन्दस्य: '
यह उदाहरण है । "देवासः में “ आज्जयेरसुक् '
इस नियमके अनुसार "अमुक" का आगम हुआ
हे। ' सर्वदेव ' शब्दसे स्वार्थमें “ तातिल् ' प्रत्यय
होता है। * सविता नः सुवतु सर्वदेवतातिम्' इस
उदाहरणम “ सर्वदेव ' शब्दसे ! तातिल्" प्रत्यय
होनेपर * सर्वदेवताति' शब्दको सिद्धि होती ह।
"युष्मद् , ' अस्मद् ' शब्दोसे सादृश्य- अर्थमें ' वतुप्”
प्रत्यय होता हे। इस नियमसे "त्वावतः ' पदक्री
सिद्धि हुई हे । “ त्वावतः ' का पर्याय हे ' त्वत्सदृशान्'
(तुम्हारे सदृश) ॥ १०॥ “उभयाविनम्' इत्यादि
पदों * बहलं छन्दसि" के निय्रमसे मत्वर्थमें विनि
प्रत्यय हुआ है । ' छन्दोविन्प्रकरणे° ' इत्यादि नियमे
उभय शब्दके अकारका दीर्घं होनेसे “उभयाविनम्'
रूप वना है। प्रत, पूर्वं आदि शब्दोंमे इवार्थे
थाल्" प्रत्यय होता हे, इस नियमसे ' प्रतलथा'
वनता है । इसी प्रकार "पूर्वथा" आदि भी हं वेदं
" ऋच् ' ब्द पर दोनेपर त्रिका सम्प्रसारण होता दै
शरीरं उतन्तरपदक्र आदिका लोप हो जाता दै । "तिस्र
ऋचो यस्मिन्" तत् तृचं सृक्तम्। जिसमे तीन
ऋचां हा, उस सूक्ता नाम "तृच्", दै । 'त्रि+ऋच्'
((-0. 1\/॥८111104/5511८1 81188 \/8181185। (01661011. 01411260 0 60810011
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संक्षिप्त नारदपुराण
टस अव्रस्थामें /त्रि'का सम्प्रमारण होनेपर "तु!
वना ओर ऋच्के ऋका लोप हो गया तो ' तृचम्!
सिद्ध हो गया। “ इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथाम्' यहां
` अप' उपसर्गके साथ ' स्पृध" धातुके लङ् लकारमें
प्रथम पुरुषके द्विवचनका रूप हे । ' अपस्पृधेथाम् '
यह निपातनसे सिद्ध होता हे । रेफका सम्प्रसारण
ओर अलोप निपातनसे ही होता हे। माङ्का योग
न होनेपर भी अडागमका अभाव हुआ हे (लोकमें
इसका रूप “ अपास्पर्धथाम्' होता हे) । ` वसुभिर्नो
अव्यात्" इत्यादिमें * अव्यादवद्या० ' इत्यादि सूत्रके
अनुसार व्यपर “अ' परे होनेपर एङ् (ओ)-का
प्रकृतिभाव हुआ हे। "आपो अस्मान् मातरः '
इत्यादि प्रयोग भी “आपो जुषाणो० ' आदि नियमके
अनुसार प्रकृति-भावसे सिद्ध होते हें । आकार परे
रहनेपर * आपो ' आदिमे प्रकृतिभाव होता हे ॥ ११॥
' समानो गर्भः सगर्भस्तत्र भवः सगर्भ्यः।' यहां
` समानस्य सः" इत्यादि सूत्रसे समानका स
आदेश हुआ हे । ' सगर्भसयुथसनुताद्यत्' से यत्-
प्रत्यय हुआ है । ' अष्टापदी ' यहो “छन्दसि च'-के
नियमानुसार उत्तरपद परे रहते अष्टन्के ! न 'का
` आ' आदेश हो गया हे। “ऋतो भवम् ऋत्व्यम्'- जो
तऋतुमं हो, उसे “ त्रह्व्य' कहते हं । ' ऋह्व्यवास्त्व्यः '
इत्यादि सूत्रसे निपातन करनेपर * ऋत्व्यम्' पदकं
सिद्धि होती हे। अतिशयेन “ऋजु ' इति रजिष्टम्'- जो
अत्यन्त ऋजु (कोमल या सरल) हो, उसे
"रजिष्ठ' कहा गया है । ' विभापर्जेश्छिन्दसि' के
नियमानुसार इष्ट, इमन् ओर ईयस् परे रहनेपर
ऋजुके ' ऋ'के स्थानमें “र' होता हे । ' ऋजु+इष्ठ'
इस अवस्थामें ऋके स्थानम "र" तथा उकार लोप
होनेसे 'रजिष्ट ' शब्द बना हे । ' त्रिपञ्चकम् '- त्रीणि
पञ्चकानि यत्र॒ तत् ' त्रिपञ्चकम्" इस विग्रहके
अनुसार बहुत्रीहिसमास करनेपर ' त्रिपञ्चकम् कों
सिद्धि होती दे । हिरण्ययेन सविता रथेन" इस
मन््र-वाक्यमें ` ऋत्व्यवास्त्व्य ' आदि सूत्रके अनुसार
हिरण्य-शब्दसे ' मयद् ' प्रत्यय ओर उसके "म
का लोप निपातन किया जाता है । इससे ' हिरण्यय '
शब्दको सिद्धि होती हे। 'इतरम्'- वेदमें इतर
शब्दसे “अद््ड' का निषेध है। अतः 'सु' का
अम्" आदेश होनेसे ' इतरम् ' पद सिद्ध होता हे ।
यथा-' वार््रघ्रमितरम्' । ` परमे व्योमन्" यहाँ ' व्योमनि
रूप प्राप्त था; किंतु ' सुपां सुलुक् ' इत्यादि नियमसे
ङि-विभक्तिका लुक् हो गया ॥ १२ ॥ "उर्विया" कों
जगह “उरुणा' रूप प्राप्त था। ' टा' का इया" आदेश
होनेसे "उर्विया ' रूप बना ' इयाडियाजीकाराणामुप-
संख्यानम्' इस वार्तिकसे य्ह “इयाज्' हुआ है।
" स्वप्रया 'के स्थानम ' स्वप्रेन' यह रूप प्राप्त था,
कितु ' सुपां सुलुक्०' इत्यादि नियमके अनुसार
` टा" का *अयाच्' हो गया; अतः ' स्वप्रया" रूप
वना। ' वारयध्वम्' रूप प्राप्त था, कितु !ध्वमो
ध्वात्" सूत्रसे ध्वम्" के स्थानमें ध्वात्" आदेश
होनेसे * वारयध्वात् ' हो गया । ' अदुहत ' के स्थानम
" अदुह यह वेदिक प्रयोग हे । ' लोपस्त आत्मनेपदपु'
इस सूत्रसे तलोप ओर “ बहुलं छन्दसि" से रुट्का
आगम हुआ हे। 'वै' पादपूर्तिकि लिये हे। ' अवधिषम्'
यह रूप प्राप्त धा, इसके स्थानमें ' वधीं ' रूप हुआ
हे। यहां “अम् 'का “म्” आदेश ओर अडागमका
अभाव तथा “ईट्' का आगम हुआ है-वर्धीं
वृत्रम्। ' यजध्वेनं '- यहां “ यजध्वम्+एनम्' इस
दशामें “ध्वम् के "म्' का लोप होकर वृद्धि होनेसे
उक्त रूपकी सिद्धि हुई है। " तमो भरन्त एमसि"- यहां
"इमः ' के स्थानमें “इदन्तो मसि ' इस सूत्रके अनुसार
' एमसि ' रूप हुआ हे । ' स्विनः स्रात्वी मलादिव '-
इस मन्त्रम 'स्नात्वा' रूप प्राप्त था; कितु
"स्नात्व्यादयश्च '- इस सूत्रके अनुसार उसके स्थानं
'स्तरात्वी ' निपातन हुआ । ' गत्वाय '- गत्वाके स्थानम
^ क्त्वो यक्" सूत्रके अनुसार “यक्'का आगम
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्व भाग-द्वितीय पाद
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होनेसे उक्त पद सिद्ध होता हे। 'अस्थभिः' में
अस्थि-शब्दके इ 'को ' अनङ्' आदेश होकर नलोप
हो गया हे। “छन्दस्यपि दृश्यते" इस नियमसे
हलादि विभक्ति परे रहनेपर भी *अनङ्' आदेश
होता हे ॥ १३॥ "गोनाम्" यहां आम्-विभक्ति परे
रहते नुट्का आगम हुआ है। किसी छन्दके
पादान्तमं गो-शब्द हो तो प्रायः षष्टी-बहुवचनमें
वहाँ नुट्का आगम हो जाता है। ' अपरिह्वृताः '
यहा ' हु हवरेश्छन्दसि 'से प्राप्त हए ' हृ" आदेशका
अभाव निपातित हुआ हे। ' ततुरिः" "जगुरिः
इत्यादि पद भी "बहुलं छन्दसि" के नियमसे
निपातनद्रारा सिद्ध होते है। 'ग्रसिताम्' 'ग्रसु'
अदनेका निष्ठान्त रूप है । यहां इदट्का निषेध प्राप्त
था, किंतु निपातनसे इट् हो गया हे। इसी प्रकार
' स्कभित' आदिको भी समञ्लना चाहिये । ' पश्च!
यहां ' जसादिषु छन्दसि वा वचनं०' इत्यादिसे
वैकल्पिक धि-संज्ञा होनेके कारण धि-संज्ञाके
अभावमे यण् होनेसे "पश्च" रूप बना है। इसी
तरह “ दधद्” यह दधातिके स्थानम निपातित हु
हे; लेट्का रूप हे । 'दधद्रलानि दाशुषे" यह मन्त्र
हे । ' बभूथ ' यह लिट् लकारके मध्यम पुरुपका
एकवचन हे। वेदम इसके इट्" का अभाव
निपातित हुआ हे । " प्रमिणन्ति'- यहाँ ' प्रमीणन्ति'
रूप प्राप्त था । ' मीनातेर्निगमे ' सूत्रसे हस्व हो गया।
" जवीवृधत्'-' नित्यं छन्दसि" से चङ् परे रहते
उपधा ऋवर्णका !ऋ'-भाव नित्य होता हे ॥ १४॥
"मित्रयुः * यहाँ दीर्घका निपेध होता है। "दुष्ट
इवाचरति ' इस अर्थमे क्यच् पर रहते दुष्र शब्दका
'दुरस्' आदेश होता हे । * दुरस्युः ' यदह निपातनात्
सिद्ध रूप हे । इसी प्रकार द्रविणस्युः ' इत्यादि भी
हे । वेदमें “ क्त्वा" परे रहते हाधातुका “हि ' आदेश
विकल्पसे होता है। !हि' आदेश न होनेषर
“घुमास्था० ' इत्यादि सृत्रसे “ आ' के स्थानम “ई'
हो जाता है; अतः "हित्वा" ओर “हीत्वा' दोनों
रूप होते हे । “ सु" पूर्वक धा-धातुये ! क्त प्रत्यय
परे होनेपर *इत्व ' निपातन किया जाता है; इससे
` सुधितम्' रूप बनता है-यथा "गर्भं माता सुधितं
वक्षणासु ।' ' दाधर्ति", ' दर्धर्ति" ओर " दर्धर्षि" आदि
रूप निपातनसे सिद्ध हे । ये ^ धृ '-धातुके यङ्लुगन्त
रूप हे । ' स्ववद्धिः ' अव-धातुसे असुन् करनेपर
` अवस्' रूप होता है। 'शोभनमवो येषां ते
स्ववसः, तैः स्ववद्धिः' यह उसकी व्युत्पत्ति है ।
" स्ववःस्वतवसोरुषसश्चेष्यते ' इस वार्तिकये भकारादि
प्रत्यय परे रहते ' स्ववस्" आदि शब्दके "स्" का
।त्' हो जाता हे । प्रसवार्थक "सू" धातुके लिट्में
ससूवेति निगमे" सूत्रसे ' ससूव ' यह निपातसिद्ध
रूप हे । यथा-" गृष्टिः ससूव स्थविरम् ' । * सुधित'
इत्यादि सूत्रसे “ धत्स्व ' के स्थानम *धिस्व ' निपातित
होता है-*धिस्व वन्नं दक्षिण इन्द्रहस्ते "॥ १५ ॥
'प्रप्रायमग्निः' यहां "प्रसमुपोदः पादपूरणे" मे
पादपूर्तिके लिये "प्र" उपसर्गका द्वित्व हो गया है।
"हरिवते हर्यश्वाय" यहां ' छन्दसीरः ' से ' मतुप्" के
'म' का 'व' हुआ हे । "अक्षण्वन्तः ' मं अक्षि-
शब्दसे मतुप्, “छन्दस्यपि दृश्यते" से अनदः
आदेश तथा "अनो नुट् ' से "नुट्" का आगम हुआ
हे। “सुपथिन्तरः' मे 'नाद्घस्य' से नुट्" का
आगम विशेष कार्य हे। “रथीतरः ' में “इद्रथिनः'
से 'ई' हुआ है। 'नसत्तम्' मं नयपूर्वक सद्-
धातुसे निष्ामें नत्वका अभाव निपातित हुआ दै।
इसी प्रकार सूत्रोक्तं ' निपत्त' आदि शब्दको जानना
चाहिये । ' अप्नरेव'-इसमें ' अप्रम्' शब्द् ईपत्
अर्थम हे । वेदम सकारका वैकल्पिक रेफ़ निपातित
हुआ हे। ' भुवरथो इति" यहाँ * भुवश्च मदाव्याहतेः '
यं भुवसूके "स्'का "र्" हुजा है ॥१६॥ "ब्रुहि
यां ' तरि प्रेप्य० ' इत्यादि सूत्रसे उकार प्लुत हा
टे। वधा- अग्रयऽनुत्रूरि। ' अद्यामावास्येत्यारत्थ'
(-0. 1\/॥(111104/5511॥1 21188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 60810011
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संक्षिप्त नारदपुराण
यहां ' निगृह्यानुयोगे च ' इस सूत्रसे वाक्यके “रि "का
प्लुतभाव होता हे। 'अग्रीत्प्रपणे परस्य च' इस
सूत्रसे आदि ओर परका भी प्लुत होता है।
उदाहरणके लिये “ ओरेश्रा ३ वय" इत्यादि पद हे ।
इन सब्में प्लुत हुआ हे। 'दाश्चान्' आदि पद्
क्वसु- प्रत्ययान्त निपातित होते हे । ‹ स्वतवान्!
शब्दके नकारका विकल्पसे "रु" होता हे, पायु-
शब्द परे रहनेपर- स्वत्वं पायुरग्ने ।' ' त्रिभि
देव सवितः ।' यहां ' त्रिभिस्+त्वम्' इस दशामें
'युष्पत्तत्ततक्षुष्वन्तःपादम्' इस सूत्रमं स्" के
स्थानमें “प् होकर एत्व होनेसे ' त्रिभिष्टम्' बनता
हे । "नृभिष्टतः' यहो ' स्तुतस्तोमयोश्छन्दसि' इस
सूत्रसे ' नृभिस्' के 'स्' का*प्' होकर एत्व हुआ
हे ॥ १७॥ ' अभीपुणः' यहां ' सुजः' सूत्रसे *स्'
का*प्' हुआ हे । * ऋतापाहम्' में ' सहः पृतनताध्यां
च' इस सूत्रसे ' स्'का मूर्धन्य आदेश हुआ ह।
'न्यपीदत्' यहां भी ' निव्यभिभ्योऽड्व्यवाये वा
छन्दसि" इस सूत्रसे 'स' का मूर्धन्य हुआ हे।
" नृमणाः ` इस पदमे ' छन्दस्युदवग्रहात्' सूत्रसे * न'
का “ण' हुआ हे। बाहुलक चार प्रकारके होते
हे-- कहीं प्रवृत्ति हाती टे, कहीं अप्रवृत्ति होती ह,
कहीं वैकल्पिक विधि है ओर कहीं अन्यथाभाव
हाता हे। इस प्रकार सम्पूर्णं वेदिक पद-समुदाय
सिद्ध है। क्रियावाची ' भू" “वा' आदि शब्दोंकी
* धातु" संज्ञा जाननी चाहिये । *भू' आदि धातु
परस्मेपदी माने गये हे ॥ १८-१९॥ एध ' आदि
छत्तीस धातु उदात्त एवं आत्मनेपदी टदै (इन्दं
' अनुदात्तेत्" माना गया है) । मुने! ' अत' आदि
सेतीस धातु परस्मेपदी ठं ॥२०॥ शीकृ आदि
चयालीस धातु आत्मनेपदमे परिगणित हुए हं।
फक्क आदि पचास धातु उदात्तेत् ( परस्मैपदी)
कहे गये है ॥२९१९॥ वर्च आदि इक्कोस धातु
अनुदानैत् ( आत्मनेपदी) बताये गये हें । "गुपू
आदि बयालीस धातु 'उदात्तेत्' (परस्मैपदी) कहे
गये हें ॥ २२ ॥ ' घिणि' आदि दस धातु शाब्दिकोद्वारा
' अनुदात्तेत्" कहे गये हे । “ अण्" आदि सत्ताईस
धातु ' उदात्तेत्" बताये गये हें ॥ २३॥ “ अय ' आदि
चोतीस धातु वेयाकरणोदरारा अनुदात्तेत् (आत्मनेपदी)
माने गये हें । ' मव्य ' आदि बहत्तर धातु उदात्तानुबन्धी
कहे गये हें ॥ २४॥ धावु" धातु अकेला ही
' स्वरितेत्" कहा गया हे । क्षुध्" आदि बावन धातु
' अनुदात्तेत्" कहे गये हें ॥ २५॥ ' घुपिर्' आदि
अटठासी धातु ' उदात्तेत्" माने गये हें । ‹ द्युत ' आदि
वाईस धातु ' अनुदात्तेत् ' स्वीकार किये गये हं ॥ २६॥
घरटादिमें तेरह धातु ' पित्" ओर “ अनुदात्तेत्" कहे
गये हैं । तदनन्तर ' ज्वर ' आदि बावन धातु उदात्त
बताये गये हें ॥ २७॥ “ राजू" धातु ' स्वरितेत्" हे।
उसके वाद "भ्राजृ" भ्राश् ओर भ्लाश्र'-ये तीन
धातु ' अनुदात्तेत्" कहे गये हैं । तदनन्तर ' स्यमु'
ध्रातुसे लेकर आगे सभी आद्युदात्त एवं उदाततेत्
(परस्मैपदी) हें ॥ २८ ॥ फिर एकमात्र ' षह ' धातु
' अनुदात्तेत् ' तथा अकेला ' रम ' धातु ' आत्मनेपदी '
है । उसके वाद ' सद" आदि तीन धातु “उदात्तेत्
टे । फिर कुच' आदि चार धातु भी “उदात्ेत्
(परस्मेपदी) ही ठै ॥ २९॥ इसके वाद ! हिक्क'
आदि पतीस धातु ' स्वरितत्' हे । "श्रिञ्" धातु
स्वरितेत् हे । “ भृञ्" आदि चार धातु भी स्वरितेत्
ही है ॥ ३० ॥ ' धेट्" आदि छियालीस धातु परस्मेपदी
कहे गये हें । ' स्मिङ्' आदि अठारह धातु आत्मनेपदी
माने गये हें ॥ ३१॥ फिर ' पूडः आदि तीन धातु
अनुदात्तेत् कहे गये हे । “ हृ' धातु परस्मैपदी हे।
फिर 'गुप'से लेकर तीन धातु आत्मनेपदी ह ॥ ३२॥
"रम ' आदि धातु अनुदात्तेत् हैँ ओर “ जिध्िविदा'
उदात्तेत् दै । स्कम्भु आदि पंद्रह धातु परस्मैपदी
टं ॥ २३३ ॥ * कित ' धातु “उदात्तेत्' दै । ' दान ' ' शान '- ये
दो धातु उभयपदी टैँं। 'पच' आदि नौ धातु
((-0. 1/८1114<511॥1 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 68110011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद्
स्वरितेत् (उभयपदी) हें । वे परस्मैपदी (ओर
आत्मनेपदी दोनों) माने गये हें ॥ ३४॥ फिर तीन
स्वरितेत् धातु हैं । परिभाषणार्थक वद ओर
वच" धातु परस्मैपदी है । ये एक हजार छः धातु
_ भ्वादि कहे गये हें ॥ ३५॥
अद' ओर "हन्" धातु परस्मेपदी कहे गये हे
' द्विष ' आदि चार धातु स्वरितेत् माने गये हे ॥ ३६॥
यहां केवल ‹ चक्षिङ' धातु आत्मनेपदी कहा गया
है । फिर “ईर ' आदि तेरह धातु अनुदात्तेत् हे ॥ २७॥
मुने! वैयाकरणोने “पूङ् ओर “शीङ्-इन दो
धातुओंको आत्मनेपदी कहा है। फिर "षु" आदि
सात धातु परस्मैपदी बताये गये हे ॥ ३८ ॥ मुनीश्वर !
यहां एक "ऊर्णुञ्" धातु स्वरितेत् कहा गया हे। “दु '
आदि तीन धातु परस्मैपदी बताये गये हे ॥ ३९॥
नारद ! केवल रञ्" धातुको शाब्दिकोने उभयपदी
कहा है ॥४०॥ "रा" आदि अठारह धातु परस्मेपदी
माने गये हें। नारद! फिर केवल “इङ् धातु
आत्मनेपदी कहा गया है ॥ ४१ ॥ उसके बाद " विद '
आदि चार धातु परस्मेपदी माने गये ह । जिष्वप्
शये" यह धातु परस्मैपदी कहा गया हे ॥४२॥ मुने।
' श्वस ' आदि धातु मेने तुम्हें परस्मेपदी कहे हें ।
"दीधीङ ओर “वेवीड्- ये दो धातु आत्मनेपदी
माने गये है ॥ ४३ ॥ षस" आदि तीन धातु "उदात्तेत्!
है । मुनिश्रेष्ठ! “ चर्करीतं च' यह यद्लुगन्तका प्रतीक
है। यह अदादि माना गया हे। "हड् धातु अनुदात्तेत्
कहा गया हे ॥ ४४॥ इस प्रकार अदादि गणमं तिहत्तर
धातु बताये गये 5 न
हु" आदि चार धातु (हु, भी, ही अर पृ)
परस्मैपदी माने गये हैँ ॥ ४५ ॥ * भृञ्" धातु स्वरितेत्
ओर “ ओहाक्" धातु उदात्तेत् टै। माङ् ओर
' ओहाङ्- ये दोनों धातु अनुदात्तेत् ट । दानार्धक
"दा" ओर धारणार्थक " धा'-इनमें स्वरितक इत्संजा
२३९
कहे गये हें । ' घृ" आदि बारह धातु परस्मैपदी माने
गये हं ॥४७॥ इस प्रकार ह्वादि (जुहोत्यादि) गणम
वाईस धातु कहे गये हे।
"दिव्" आदि पचीस धातु परस्मैपदी कहे गये
हे ॥ ४८ ॥ नारद ! "पूङ् आदि “दूङ्- ये आत्मनेपदी
हे । ' पूड़' आदि सात धातु ओदित् ओर आत्मनेपदी
माने गये हें ॥४९॥ विप्रवर ! ' लीङ्* आदि धातु
यहां आत्मनेपदी बताये गये हैँ । श्यति (शो) आदि
चार धातु परस्मेपदी ह ॥ ५० ॥ मुने! “जनी ' आदि
पंद्रह धातु आत्मनेपदी हे । ' मृष" आदि पच धातु
' स्वरितेत्" कटे गये हें ॥५१॥ "पद ' आदि ग्यारह
धातु आत्मनेपदी हँ । यहां वृद्धि-अर्थमें ही अकर्मक
"राध" धातुका ग्रहण हे। यह स्वादि ओर चुरादिगणर्मं
भी पटा गया हे॥५२॥ राध आदि तेरह धातु
उदात्तेत् कहे गये हं । तत्पश्चात् रध आदि आढठ धातु
परस्मैपदी बताये गये ह ॥५३॥ शम आदि छियालीस
धातु उदाततेत् कहे गये हं । इस प्रकार दिवादि एक
सौ चालीस धातु माने गये हे ॥५४॥
“सु' आदि नौ धातु स्वरितेत् कहे गये ह ।
मुने ! ' दु' आदि सात धातु परस्मैपदी बताये गये
हे ॥ ५५ ॥ ' अश ' ओर ' एटिघ' ये दो धातु अनुदात्तेत्
कहे गये हैं । यहाँ ' तिक” आदि चौदह धातु ओंको
परस्मेपदी माना गया है ॥५६॥ विप्रवर! स्वादिगणमें
कुल वत्तीस धातु बताये गये है।
मुनिश्रेष्ठ ! ' तुद ' आदि छः स्वरितेत् हं ॥५७॥
ऋषी ' धातु उदात्तेत् है ओर "जुपी' आदि चार्
धातु आत्मनेपदी हैँ । "व्रश्च" आदि एक सौ पाच
धातु उदात्तेत् कहे गये हें ॥ ५८ ॥ मुनीश्वर ! यहां
केवल "गुरी" धातु अनुदात्तेत् बताया गया हे । “णु!
आदि चार धातु परस्मैपदी माने गये हें ॥५९॥
' कुङ्' धातुको “ अनुदात्तेत्" कहा गया है । यहीं
कुटादिगणकौ पूर्ति हुई टे । ' पृङ् ओर ' मृड्'-ये
हुई है ॥ ४६॥ "णिजिर्" आदि तीन धातु स्वरितेत् । आत्मनेपदी धतु है। 'रि' ओर पि' ये चछ
((-0. 1\॥(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 66810011
२४० संक्षिप्त नारदपुराण
धातुतक परस्मैपदमें गिने गये हें ॥ ६० ॥ "दृङ्
' धृङ्" ये दो धातु आत्मनेपदी कटे गये हैं । मुने !
प्रच्छ" आदि सोलह धातु परस्मैपदी बताये गये
हं ॥६१॥ मुने! फिर 'मिल' आदि छः धातु
स्वरितेत् कहे गये हें । इसके बाद “कृती ' आदि
धातुओंको भी मनीषी पुरुषोने उभयपदी कहा है।
प्रातिपदिकसे धात्वर्थमें णिच् ओर प्रायः सब वातें
इष्ठ प्रत्ययकी भोति होती हें । तात्पर्य यह कि ‹ इष्ठ"
प्रत्यय परे रहते जेसे प्रातिपदिक, पुंवद्भाव, रभाव,
रिलोप, विन्मतुब्लोप, यणादिलोप, प्र, स्थ, स्फ
आदि आदेश ओर भसंज्ञा आदि कार्य होते है,
तीन धातु परस्मेपदी हें ॥६२॥ इस प्रकार तुदादिमें
एक सौ सत्तावन धातु है । ह
# वा
रुध' आदि नौ धातु स्वरितेत् हें । कृती!
धातु परस्मेपदी दहै। 'जिडइन्धी 'से तीन धातुतक
अनुदात्तेत् कहे गये हें । तत्पश्चात् “शिष पिष '
आदि बारह धातु उदात्तेत् हं । इस प्रकार रुधादि-.
ध्रातु
क प
तनु" धातुसे लेकर सात धातु ' स्वरितेत्” कहे
गये हे । "मनु" ओर 'वनु'-ये दोनों आत्मनेपदी
हे । ' कृञ्" धातु स्वरितेत् कहा गया दे ॥ ६५॥
विप्रवर ¦ इस प्रकार वैयाकरणोने तनादिगणमें दस
धातुओंकौ गणना की है।
"क्रो आदि सात धातु उभयपदी है । मुनीश्वर
स्तम्भु' आदि चार सौत्र (सूत्रोक्त) धातु परस्मैपदी
कहे गये हे । ! क्रूञ्' आदि बाईस धातु उदात्तेत्
कहे गये हें ॥ ६६-६७॥ ' वृङ् धातु आत्मनेपदी
हे । * श्रन्थ ' आदि इक्कीस धातु परस्मैपदी ह ओर
"ग्रह ' धातु स्वरितेत् हे ॥ ६८ ॥ इस प्रकार विद्वानोने
क्रयादिगणमें बावन धातु गिनाये हेै।
^` चुर आदि एक सौ छततीस धातु जित् (उभयपदी)
माने गये हें ॥६९ ॥ मुने ! चित आदि अठारह (या
अड़तीस 2) आत्मनेपदी माने गये दै । ‹ चर्च'से
लेकर ' धृष" धातुतक “ चित्" (उभयपदी) -कहे गये
हें ॥ ७० ॥ इसके बाद अड्तालीस अदन्त धातु भी
उभयपदी ही है । * पद ' आदि दस धातु आत्मनेपदमें
परिगणित हुए हें ॥७१॥ यहाँ सूत्र आदि आठ
उसी प्रकार णि" परे रहते भी सब कार्य
होगे ॥ ७२॥ “उसे करता है, अथवा उसे कहता
हे ' इस अर्थमें भी प्रातिपदिकसे णिच् प्रत्यय होता
हे । प्रयोजक व्यापारमें प्रेषण आदि वाच्यहोँं तो
धातुसे णिच् होता है। कर्तृ- व्यापारके लिये जो
करण हे, उससे धात्वर्थमे णिच् होता है। चित्र
आदि आठ धातु उदात्तेत् हें। किंतु 'संग्राम'
धातुको शब्दशास्त्रके विद्वानोने अनुदात्तेत् माना हे।
स्तोभ आदि सोलह धातु अदन्त धातुओंके निदर्शन
हे ॥ ७२३-७४॥ “ बहुलमेतननिदर्शनम्"- इसमें जो
बहुल शब्द आया है, उससे अन्य जो सूत्रोक्तं
लौकिक ओर वैदिक धातु हँ, उन सबका ग्रहण
होता है। सभी धातु सव गणोमें हँ ओर सबके
अनेक अर्थ हें ॥ ७५॥ इन धातुओंके अतिरिक्त
सानादिः प्रत्यय जिनके अन्मे हो, उनकी भी
धातु-संज्ञा होती है। नामधातु भी धातु ही है।
नारद ! इस प्रकार अनन्त धातुओंकी उद्रावना हो
सकती है । यहो संक्षेपसे सव कुछ बताया गया
हे । इसका विस्तार तत्सम्बन्धी ग्रन्थे हे ॥ ७६॥
(उपदेशावस्थामें एकाच् अनुदात्त धातुसे परे
वलादि आर्धधातुकको इट्का आगम नहीं होता ।
जिनमें यह निषेध लागू होता है, उन धातुओंको
"अनिट्" कहते हैँ । उन्हीं अनिट् या एकाच्
अनुदात्त धातुओंका यहाँ संग्रह किया जाता है-)
अजन्त धातुओमें--ऊकारान्त, ऋकारान्त, यु, र,
१. सन्. क्यच्, काम्यच्, क्यङ् क्यष्, आचारक्तिप्, णिच्, यङ यक्, आय, इयङ् णिङ्-ये बारह प्रत्यय
सनादि कहलाते दं ।
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद्
ष्णु, शीङ् खु, नु, क्षु, शि, डीङ श्रिञ्, वृदः
वृञ्-इन सबको छोडकर शेष सभी अनुदात्त
(अर्थात् अनिट्) माने गये हें ॥ ७७॥ शक्ल, पच्,
मुच्, रिच्, वच्, विच्, सिच्, प्रच्छ, त्यज्.
निजिर्, भज्, भञ्ज्, भुज्, भ्रस्ज्, मस्ज्, यज्, युज्,
रुज्, रञ्ज्, विजिर्, स्वञ्ज, सञ्ज्, सृञ्ज॥७८॥ अद्,
षद्, खिद्, छिद्, तुद्, नुद्, पद्, भिद्. विद्
(सत्ता), विद् (विचारणे), शद्, सद्, स्विद्,
स्कन्द, हद्, क्रुध्, दुध्, वुघ्॥७९॥ वन्ध्, युध्,
रुध्, राध्. व्यध्, शुध्, साध्, सिध्, मन् (दिवादि),
हन्, आप्, क्षिप्, क्षुप्, तप्, तिप्, स्तृप्, दृप्॥ ८०॥
लिप्, लुप् वप्, शप्, स्वप्, सृप्, यभ, रभ्, लभ्,
गम्, नम्, यम्, रम्, क्रुश् दंश्, दिश्, दृश्, मृश्
रिश्, रुश्, लिश, विश्, स्पृश्, कृष्॥ ८१॥
त्विष्, तुष्, द्विष्, दुष्, पुष्, पिष्, विष्, शिष्,
शुष्, श्लिष्, घस्, वस्, दह्, दिह, दुह्, नह्, मिह,
रुह, लिह् तथा वह् ॥८२॥ ये हलन्तोमें एक सौ
२२४१
दो धातु अनुदात्त माने गये हें । ' च ' आदिक निपात
सं्ञा होती हे । ' प्र' आदि उपसर्ग "गति" कहलाते
हे । भिन्न-भित्न दिशा, देश ओर कालमें प्रकट हए
शब्द् अनेक अ्थेकि बोधक होते है । विप्रवर! वे
देश-कालके भेदसे सभी लिखों प्रयुक्त होते है ।
यहां गणपाठ, सूत्रपाठ, धातुपाठ तथा अनुनासिकपाठ-
"पारायण कहा गया है। नारद ! वैदिक ओर लौकिक
सभी शब्द नित्यसिद्ध है॥८३-८५॥ फिर वैयाकरणा
जो शब्दका संग्रह किया जाता है, उसमें उन शव्दका
पारायण ही मुख्य हेतु हे (पारायण-जनित पुण्यलाभके
लिये ही उनका संकलन होता है) । सिद्ध शब्दोका ही
प्रकृति, प्रत्यय, अदेश ओर आगम आदिके द्वार
लघुमार्गसे सम्यक् निरूपण किया जाता है। इस
प्रकार तुमसे निरुक्तका यत्किंचित् ही वर्णन किया
गया है। नारद | इसका पूर्णरूपसे वर्णन तो कोई भी
कर ही नहीं सकता ॥ ८६-८८॥ (पूर्वभाग द्वितीयपाद
अध्याय ५३)
* र ~ ॥। ड
(ग 4-;-- ++
त्रिस्कन्ध ज्यौतिषके वर्णन-प्रसद्धमे गणितविषयका प्रतिपादन
सनन्दन उवाच
ज्यौतिषाङ्क प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा।
यस्य विज्ञानमात्रेण धर्मसिद्धिभ्वित्रृणाम्॥ १॥
त्रिस्कन्धं ज्योतिषं शास्त्रं चतुर्लक्षमुदाहतम्।
गणितं जातकं विप्र संहितास्कन्धसंजितम्॥ २॥
गणिते परिकर्माणि खगमध्यस्फुटक्रिये।
अनुयोगश्चन्द्रसूर्यग्रहणं चोदयास्तकम्॥ ३॥
छाया शृद्कोन्नतियुती पातसाधनमीरितम्।
श्रीसनन्दनजी कहते है-- देवर्षे । अव मं ज्योतिष
नामक वेदाङ्गका वर्णन करूगा, जिसका पूर्वकालमं
साक्षात् ब्रह्माजीने उपदेश किया है तथा जिसके
विज्ञानमात्रसे मनुष्योके धर्मक सिद्धि हो सकती
हे ॥ १॥ ब्रह्मन्! ज्योतिषशास्त्र चार लाख श्लोकोंका
बताया गया है। उसके तीनः स्कन्ध है, जिनके नाम
ये है- गणित (सिद्धान्त), जातक (होरा) ओर
संहिता ॥ २॥ गणितमें परिकर्म, ग्रहोके मध्यम एवं
स्पष्ट करनेकी रीतियाँ बतायी गयी ह । इसके सिवा
अनुयोग (देश, दिशा ओर कालका ज्ञान), च््रप्रहण,
सूर्यग्रहण, उदय, अस्त, छायाधिकार, चन््र-शद्धोत्नति,
ग्रहयुति (ग्रहोंका योग) तथा पात् (महापातनसूर्य-
१. किसी-किसीके मतसे ज्यौतिषके पाँच स्कन्ध है- सिद्धान्त, होरा, संहिता, स्वर ओर सामुद्रिक। सिद्धान्तको
ही गणित कहते है । होराका ही दुसरा नाम जातक दै।
२. योग, अन्तर, गुणन, भजन, वर्ग, वर्गमृल, घन ओर चनमृल--वे परिकमं कटै गये है ।
३. द्वितीयाको जो चन्द्रोदय होता टै, उसमें कभी चनद्दधमाका दक्षिण सगि ओर कभी उत्तर सींग (नोक) ऊपरको
उठा रहता है, उसीको ' चन््रशद्भौत्रति' कट्टा गया है । ज्यौतिषमं उसके परिणामका विचार किया गया है।
((-0. 1\1(111104/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661011. 01411260 0 60810011
र >~
२४२
संक्षिप्त नारदपुराण
चनद्रमाके क्रान्तिसाम्य)-का साधन-प्रकार कहा
गया हे ॥३-२ ॥
जातके राशिभेदाश्च ग्रहयोनिवियोनिजे॥४॥
निषेकजन्मारिष्टानि ह्यायुर्दायो दशाक्रमः।
कर्माजीवं चाष्टवर्गो राजयोगाश्च नाभसाः॥५॥
चन्द्रयोगाः प्रत्रज्याख्या राशिशीलं च दूक्फलम्।
ग्रहभावफलं चैवाश्रययोगप्रकीण्कि ॥ ६॥
अनिष्टयोगाः स्त्रीजन्मफलं निर्याणमेव च।
नष्टजन्मविधानं च तथा द्रेष्काणलक्षणम्॥ ७॥
जातकस्कन्धमें राशिभेद, ग्रहयोनि, (ग्रहोंको
जाति, रूप ओर गुण आदि) वियोनिज (मानवेतर-
जन्मफल), गर्भाधान, जन्म, अरिष्ट, आयुर्दाय,
दशाक्रम, कर्माजीव (आजीविका), अष्टकवर्ग,
राजयोग, नाभसयोग, चन्द्रयोग, प्रव्रज्यायोग, राशिशील,
ग्रहदृष्टिफल, ग्रहोके भावफल, आश्रययोग, प्रकीर्ण,
अनिष्टयोग, स्त्रीजातक-फल, निर्याण (मृत्युविषयक
विचार), न्ट-जन्म-विधान (अज्ञात जन्म-कालको
जाननेका प्रकार) तथा द्रेष्का्णोध्के. स्वरूप-इन
सव विष्योका वर्णन है ॥ ४-७॥
संहिताशास्त्ररूपं च ग्रहचारोऽब्दलक्षणम्।
तिधथिवासरनक्षत्रयोगतिथ्यद्धसंज्ञकाः ॥ ८ ॥
मुहूर्तोपग्रहाः सूर्यसंक्रान्तिर्गोचरः क्रमात्।
चन्द्रतारावलं चैव सर्वलग्नार्तवाहयः॥ ९॥
आधानपुंसस्रीमन्तजातनामान्नभुक्तयः 1
चौलं कर्णच्छिदा मोञ्ञी क्षुरिकाबन्धनं तथा॥ १०॥
समावर्तनवेवाहप्रतिष्ठासदमलक्षणम् 1
यात्रा प्रवेशनं सद्योवृष्टिः कर्मविलक्षणम्॥ ९९॥
उत्पत्तिलक्षणं चैव सर्वं संक्षेपतो ल्रुवे।
अब संहितास्कन्धके स्वरूपका परिचय दिया
जाता हे । उसमें ग्रहचार (ग्रहोकी गति), वर्षलक्षण,
तिथि, दिन, नक्षत्र, योग, करण, मुहूर्त, उपग्रह,
सूर्य -संक्रान्ति, ग्रहगोचर, चन्द्रमा ओर ताराका
बलं, सम्पूर्ण लग्नां तथा ऋतुदर्शनका विचार,
गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण,
अन्नप्राशन, चूडाकरण, कर्णवेध, उपनयन, मैज्जीबन्धन
(वेदारम्भ), क्षुरिकाबन्धन, समावर्तन, विवाह, प्रतिष्ठा,
गृहलक्षण, यात्रा, गृहप्रवेश, तत्काल वृष्टिज्ञान,
कम्वेलक्षण्य तथा उत्पत्तिका लक्षण-इन सब
विषयोंका संक्षेपसे वर्णन करूगा (८- ११ = ॥
एकं दश शतं चेव सहस््नरायुतलक्षकम्॥ १२॥
प्रयुतं कोटिसंन्ञा चार्बुदमन्जं च रखर्वकम्।
निखर्व च महापद्रं शद्भुर्जलधिरेव च ॥ ९३॥
अन्त्यं मध्यं परान्धं च संज्ञा दशगुणोत्तराः ।
क्रमादुत्क्रमतो वापि योगः कार्योऽन्तरं तथा ॥ ९४॥
हन्यादुणेन गुण्यं स्यात् तेनेवोपान्तिमादिकान्।
शुद्धयेब्दधरो यद्रुणश्च भाज्यान्त्यात् तत्फलं मुने ॥ ९५॥
[अव गणितका प्रकरण प्रारम्भ किया जाता है- ]
एक (इकाई), दश (दहाई), शत (सेकडा), सहस्र
(हजार), अयुत (दस हजार), लक्ष (लाख), प्रयुत
(दस लाख), कोटि (करोड), अर्बुद (दस करोड),
अन्न (अरब), खर्व (दस अरब), निखर्व (खर्व),
महापद्म (दस खर्व), शङ्कु (नील), जलधि (दस
नील), अन्त्य (पद्य), मध्य (दस पदम), परार्ध
(शङ्ख) इत्यादि संख्यावोधक संज्ञा उत्तरोत्तर
दसगुनी मानी गयी हे । यथास्थानीय अङ्कोका योग या
। अन्तर क्रम या व्युतक्रमसे करना चाहिये ॥१२-- १४॥
१. राशिके तृतोय भाग (१० अंश)-कौ द्रेष्काण" संज्ञा है।
२. यथा- २+५*३२+१९३+१८*१०*१००- इन्हें क्रम या व्युत्क्रम (इकाई या सैकड़ाकी ओर)-से जोडा
जाय, समान स्थानीय अङ्का परस्पर योग किया जाय- अर्थात् इकाईको इकाईके साथ ओर दहाई आदिके दहाई
आदिके साथ जोड़ा जाय तो सर्वथा योगफल ३६० ही होगा। इसी प्रकार १००००-२३६० इसमे ३६० को १००००
के नीचे लिखकर पूर्ववत् समान स्थानीय अङ्कमेसे उसी स्थानवाले अङ्कको क्रम या व्युत्क्रमसे भी घटाया जाय तो
शेष सर्वथा ९६४० ही होगा।
((-0. 1\॥(111104/5511॥1 2118811 \/8/81/185। (01661011. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
२२४३
~~ ~
गुण्यके अन्तिम अङ्कको गुणकसे गुणना चाहिये गया हे । विद्वान् पुरुष उसीको कृति कहते हे ।
फिर उसके पार्श्ववर्ती अङ्कको भी उसी गुणकसे
गुणना चाहिये । इस तरह आदि अङ्कतक गुणन
करनेपर गुणनफल प्राप्त हो जाता है९, मुने! इसी
प्रकार भागफल जाननेके लिये भी यत्न करे।
जितने अङ्कसे भाजकके साथ गुणा करनेपर
भाज्यमेंसे घट जाय, वही अङ्क लब्धि अथवा
भागफल होता हैः ॥ १५॥
समाद्घातो वर्गः स्यात् तमेवाहुः कृतिं बुधाः ।
अन्त्यात्तु विषमातत्यक्त्वा कृति मूलं न्यसेत्पृथक्॥ १६॥
द्विगुणेनामुना भक्ते फलं मूले न्यसेत् क्रमात्।
तत्कृतिं च त्यजद्धिप्र मूलेन विभजेत् पुनः ॥ १७॥
एवं मुहर्वर्गमूलं जायते च मुनीश्चर।
दो समान अङ्कखोके गुणनफलको वर्गं कहा
(जेसे ४ का वर्गं ४८४ = १६ ओर ९ का वर्ग
९९८१ होता है) * [ वर्गमूल जाननेके लिये
दाहिने अङ्कसे लेकर वाये अङ्कतक अर्थात् आदिसे
अन्ततक विषम ओर समका चिह्न कर देना
चाहिये। खड़ी लकौरको विषमका ओर पड़ीको
समका चह माना गया हे]। अन्तिम विषममें
जितने वर्ग घर सके उतने घटा देना चाहिये । उस
वर्गका मूल लेना ओर उसे पृथक् रख देना
चाहिये ॥ १६॥ फिर द्विगुणित मूलसे सम अङ्कं
भाग दे ओर जो लब्धि आवे उसका वर्ग विषममें
घटा दे, फिर उसे दूना करके पङ्क्तिमें रख दे।
मुनी धर! इस प्रकार बार-बार करनेसे पङ्क्तिका
आधा वर्गमूल होता हे ॥ १७ ॥
१. यहोपर “ अङ्कानां वामतो गतिः ' इस उक्तिके अनुसार आदि-अन्त समञ्जने चाहिये । जैसे-' १३५५८१२ ' इसमें
१३५ गुण्य हे ओर १२ गुणक हे । गुण्यका अन्तिम अङ्क हुआ १ उसमे १२ से गुणा पहले होगा, फिर उसके बादवाले
३ के साथ फिर ५ के साथ। यथा-- --६्ास्तवमं यह गुणन-शेली उस समयक हे, जब लोग धूल विदाकर उसपर
अङ्गुलिसे गणित किया करते थे। आधुनिक शैली उससे भिन्न है । रूप-विभाग ओर स्थान-विभागसे इस गुणनके
अनेक प्रकार हो जाते हँ; इसका विस्तार लीलावतीमें देखना चाहिये ।
२. १६२० >१२= १३५ भागफल हआ। जेसे-
भाजक भाज्य भागफल
१२)१६२०८१३५
२
रं
३६
६9
६०
4
३. वर्गं या कृति निकालनेके ओर भी बहुत-से प्रकार लीलावतीमें दिये गये है ।
४. जेसे १६३८४ का वर्गमूल उपर्युक्त विधिसे निकालनेपर १२८ आता है-
[
१२८
२५६ पंक्ति
अद्कंको स्थापनकर् दार्यंसे वायं
तरफ खडी-पड़ी रेखा देकर विषम-
सम अद्ध समञ्जना चादिये।
१६३ ८४
६
क्व
|<“
6९ ९41
॥
+
५
१९२
द्द
६४
[4
हष
। ० ९--. क |
[ 1183 1 ७० तार पु ९ठ८० (1114९511 2118\//811 \/2/810185। (01166100. [1411766 0 66810011
२४४ संक्षिप्त नारदपुराण
समत्यङ्कहतिः प्रोक्तो घनस्तत्र विधिः पदे ॥ ९८ ॥ | घटा दे, इस प्रकार बार-बार करनेसे घनमृलः? सिद्ध
प्रोच्यते विषमं त्वाद्यं समे द्वे च ततः परम्।
विशोध्यं विषमादन्त्याद्घनं तन्मूलमुच्यते ॥ १९॥
त्रिनिघ्यापतं म्रूलकृत्या समं मूले न्यसेत् फलम्।
तत्कृतिञ्चान्त्यनिहतान्रिघ्नीं चापि विशोधयेत्।। २०॥
घनं च विषमादेवं घनमूलं मुहुभवित्।
समान तीन अङ्कोके गुणनफलको * घन'* कहा
गया हे। अब घनमूल निकालनेकी विधि बतायी
जाती है-दाहिनेके प्रथम अङ्कपर घन या विपमका
चिह (खड़ी लकोरके रूपमे) लगावे, उसके वामभागे
पार्वतीं दो आङ्कोपर (पड़ी लकीरके रूपमे) अघन
या समका चिह् लगावे। इसी प्रकार अन्तिम अङ्कतक
एक घन (विषम) ओर दो अघन (सम)-के चिह
लगाने चाहिये । अन्तिम या विपम घनमें जितने घन
घट सके उतने घटा दे। उस घनको अलग रखें ।
उसका घनमूल ले ओर उस घनमूलका वर्गं करे, फिर
उसमे तीनसे गुणा करे। उससे आदि अकम भाग दे,
लब्धिको अलग लिख ले, उस लब्धिका वर्गं करे
ओर उसमें अन्त्य (प्रथम मूलाङ्क) एवं तीनसे गुणा
करे, फिर उसके वादके अङ्के उसे घटा दे तथा
अलग रखी हई लब्धिके घनको अगले घन अङ्कं
होता है॥ १८--२०-३ ॥
अन्योन्यहारनिहतौ हरांशौ तु समच्छिदा ॥ २९॥
लवा लवधघ्नाश्च हरा हरघ्ना हि सवर्णनम्।
भागप्रभागे विज्ञेयं मुने शास्त्रार्थचिन्तकेः ॥ २२॥
अनुबन्धेऽपवाहे चैकस्य चेदधिकोनकः।
भागास्तलस्थहारेण हारं स्वांशाधिकेन तान्॥ २३॥
ऊनेन चापि गुणयेद्धनर्णं चिन्तयेत् तथा।
कार्यस्तुल्यहरांशानां योगश्चाप्यन्तरो मुने ॥ २४॥
अहारराशो रूपं तु कल्पयेद्धरमप्यथ।
अंशाहतिश्छेदघातहद्धिन्नगुणने फलम् ॥ २५॥
छेदं चापि लवं विदन् परिवर्त्य हरस्य च।
शेषः कार्यो भागहारे कर्तव्यो गुणनाविधिः॥ २६॥
भिन्न अद्धके परस्पर हरसे हर (भाजकः) ओर
अंश (भाज्य) दोनोंको गुण देनेसे सबके नीचे बराबर
हर' हो जाता हे। भागप्रभागमें अंशको अंशसे ओर
हरको हरसे गुणा करना चाहिये। भागानुबन्ध एवं
भागापवाह्मे- यदि एक अङ्क अपने अंशसे अधिक
या ऊन होवे तो तलस्थ हरसे ऊपरवाले हरको गुण
देना चाहिये। उसके बाद अपने अंशसे अधिक ऊन
किये हुए हरसे (अर्थात् भागानुबन्धमें हर अंशका योग
१. जैसे उ का घन हआ ३,५३५३-२७।
२. उदाहरण इस प्रकार है-
१९६८३ का घनमूल निकलना हे । मूलोक्तं विधिके अनुसार इसको क्रिया इस प्रकार होगी-
{ से 1
अ ८.५.
1
१९ हट ट चत. उख संतं ३
८ २कावर्गं ~= ४
२५८२५८३ = १२१११६२७ = घनमूल 1 ~ ^
८ ७कावर्ग ४९
३२८ ४ + ^~ 3८
७०८७५२८३ २९ ९८ > 3३ = २९४
३६३
४५८७०५५ = ३.४३
३. यथधा- र ड , ॐ यहाँ परस्पर हरसे हर ओर अंश दोनोको गुणित किया जाता है। जिस हरसे गुणा करते हैः
वह अपने सिवा दूसरे हर ओर अंशको ही गुणित करता है। जैसे
२ इस प्रकार यहां सबका हर समान हो गया । एेसा करके
६ ही भित्राङ्कौका योग या अन्तर किया जाता है। यथा-
, >> न < 4 ~
¢ म (1
१ 1
>“ >!
ह ॥।
५
११
र्
४. किसी भागको जोडनेको भागानु्न्ध ओर घटानेको भागापवाह कहते है ।
११९१ १२.८६ २६ १३
की 8 क वरि ऋ री |
२६ २४ १२
((-0. 1\/॥८11104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्व भाग-द्वितीय पाद
करके ओर भागापवाहमें हर अंशका अन्तर करके)
अंशको गुण देना चाहिये। एेसा करनेसे भागानुबन्ध
ओर भागापवाहका फल सिद्ध होगाः। जिसके
नीचे हर न हो उसके नीचे एक हरकी कल्पना
करनी चाहिये । भिन्न गुणन-साधनमें अंश-अंशका
गुणन करना ओर हर-हरके गुणनसे भाग देना
चाहिये । इससे भिन्न गुणनमें फलकी सिद्धि होगी ।
(यथा २/७८३/८ यहो २ ओर ३ अंश हँ ओर ७,
८ हर है, इनमें अंश-अंशसे गुणा करनेपर
२.३६ हुआ ओर हर-हरके गुणनसे ७८८५६
हुआ। फिर ६५६ करनेसे ६/५६ जिसे दोसे
काटनेपर ३/२८ उत्तर हुआ) ॥ २१-२५॥ विद्वन्
भिन्न संख्याके भागमें भाजकके हर ओर अंशको
परिवर्तित कर (हरको अंश ओर अंशको हर बनाकर)
फिर भाज्यके हर-अंशके साथ गुणन-क्रिया करनी
चाहिये, इससे भागफल सिद्ध होता हे। (यथा
३/८ ४/५ में हर ओर अंशके परिवर्तनसे ३/८५५
४= १५/३२ यही भागफल हआ) ॥ २६॥
हरांशयोः कृती वर्गे घनौ घनविधौ मुने।
पदसिद्धये पदे कुर्यादथो खं सर्वतश्च खम्॥ २७॥
भिन्नाङ्कके वर्गादि-साधनमें यदि वर्गं करना
२४५
हो तो हर ओर अंश दोनोंका वर्गं करे तथा घन
करना हो तो दोनोका घन करे। इसी प्रकार
वर्गमूल निकालना हो तो दोनोंका वर्गमूल ओर
घनमूल निकालना हो तो भी दोनोका घनमूल
निकालना चाहिये। (यथा-३/७ का वर्ग हुआ
९/४९ ओर मूल हुआ ३/७, इसी प्रकार ३/७ का
घन हुआ २७/३४३ ओर मूल हआ ३/७) ॥ २७॥
छेदं गुणं गुं छेदं वर्ग मूलं पदं कृतिम्।
ऋणं स्वं स्वमृणं कुर्यद्दृश्ये राशिप्रसिद्धये॥ २८॥
अथ स्वाशाधिकोने तु लवाढयोनो हरो हर।
अंशस्त्वविकृतस्तत्र विलोमे शेषमुक्तवत्॥ २९॥
विलोमविधिसे राशि जाननेके लिये दृश्यमें
हरको गुणक, गुणकको हर, वर्गको मूल, मृलको
वर्ग, ऋणको धन ओर धनको ऋण बनाकर अन्तमं
उलटी क्रिया करनेसे राशि (इष्ट संख्या) सिद्ध होती
हे । विशेषता यह है कि जहां अपना अंश जोडा
गया हो वरहा हरमे अंशको जोड़कर ओर जहां
अपना अंश घटाया गया हो, वहां हरमे अंशको
घटाकर हर कल्पना करे ओर अंश ज्यो-का-त्यों
रहे । फिर दुश्य राशिमें विलोम क्रिया उक्त रीतिसे
करे तो राशि सिद्ध होती है ॥ २८-२९॥
१. उदाहरणके लिये यह प्रश्र ै- १/८ का १/३ उस्मेपे घटाओ ओर शेषका १/२ उसी शेषमं जोड़ो, इसकी न्यास-
विधि (लिखनेकी रीति) इस प्रकार होगी-
१८८ १,८३.८२ _ १.
१/२ ८५२५३ ८ उत्तर हुआ।
* १/२
२. उदाहरणके लिये यह प्रश्र लीजिये- वह कौन-सौ संख्या है, जिसको तीनसे गुणा करके उसमे अपना ३/८ जोड देते
है, फिर सातका भाग देते टं, पुनः अपना १/३ घटा देते ठै, फिर उसका वर्गं करते ह, पुनः उस ५२ घटाकर उसका मूल
तेते है, उसमे ८ जोड़कर १० का भाग देते हैँ तो २ लब्धि होती टै। उस संख्या अथवा राशिको निकालना है। इसमं मृलोक्त
नियमके अनुसार इस प्रकार क्रिया को जायगी-
गुणक ३ हर
धन ३2८४ अपना ३८७ ऋण {४७-६३-८४
हर ७ गुणक २१५७१४७
ऋण १२३ अपना १/२ धन॒ १४.७२१
वर्ग = मूल १९६१४
ऋण ८५२ ध्न १४४.५२= १९६
मूल = वर्ग १२१४४
धन ८ ऋण २०-८०१२
हर् १० गुणक २८१०८२०
दुश्य २
८४-३२-२८ गि
अतः विलोम गणितको विधिसे वह संख्या २८ निश्चित दुई ।
((-0. 1/८111141/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
२४६ सक्षिप्त नारदपुराण
उदिष्टराशिः संश्चुण्णो हर्तोऽशे रहितो युतः। दोनों संख्याओंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये* ॥ ३१॥
इष्टध्नदृष्टमेतेन भक्तं राशिरितीरितम्॥३०॥ | गजघ्नीष्टकृतिर्व्येका दलिता चेष्टभाजिता।
अभीष्ट संख्या जाननेके लिये इष्ट॒ राशिकी | एकोऽस्य वगो दलितः सेको राशिः परो मतः॥३२॥
कल्पना करनी चाहिये । फिर प्रश्रकर्तकि कथनानुसार | द्विगुणेष्टहतं रूपं सेष्ट प्राग्रूपकं परम्।
उस राशिको गुणा करे या भाग दे। कोई अंश | वर्गयोगान्ते व्येके राश्योर्वगो स्त एतयोः ॥ ३३॥
घटानेको कहा गया हो तो घटावे ओर जोडनेको | इष्टवर्गकृतिश्चेष्टघनोऽष्टघ्नौ च सैककः।
कहा गया हो तो जोड़ दे अर्थात् प्रश्रमें जो-जो क्रियाँ | आद्यः स्यातामुभे व्यक्ते गणितेऽव्यक्त एव च॥ ३४॥
कही गयी हो, वे ईष्टराशिमे करके फिर जो राशि वर्गकर्मगणितरमे" इष्टका वर्गं करके उसमें आठसे
निष्पन्न हो, उससे कल्पित इष्ट-गुणित दृष्टम भाग दे, | गुणा करे, फिर एक घटा दे, उसका आधा करे।
उसमे जो लब्धि हो, वही इष्ट राशि हैः ॥३०॥ | तत्पश्चात्-उसमें इष्टसे भाग दे तो एक राशि सात
योगोऽन्तरेणोनयुर्तोऽर्धितो राशी तु संक्रमे। होगी । फिर उसका वर्ग करके आधा करे ओर उसमें
राश्यन्तरहतं वर्गान्तरं योगस्ततश्च तो ॥३९॥ | एक जोड दे तो दूसरी संख्या ज्ञात होगी *॥ ३२॥
संक्रमण-गणितमें (यदि दो संख्याओंका योग ओर | अथवा कोई इष्ट-कल्पना करके उस द्विगुणित इष्टसे
अन्तर ज्ञात हो तो) योगको दो जगह लिखकर एक | १ में भाग देकर लब्धिमें इष्टको जोड तो प्रथम संख्या
जगह अन्तरको जोड़कर आधा करे तो एक संख्याका | होगी ओर दूसरी संख्या १ होगी। ये दोनों संख्याएं वे
ज्ञान होगा ओर दूसरी जगह अन्तरको घयकर आधा करे | ही होगी, जिनके वगकि योग॒ ओर अन्तरम एक
तो दूसरी संख्या ज्ञात होगी--इस प्रकार दोनों राशियाँ | घटनेपर भी वर्गाङ्क ही शेष रहता हे*॥ ३२॥ किसी
(संख्यार्णं) ज्ञात हो जाती हैः । वर्गसंक्रमणमें (यदि दो | इष्टके वर्गका वर्ग तथा पृथक् उसीका घन करके
संख्याओंका वर्गान्तर तथा अन्तर ज्ञात हो तो) वर्गान्तमे | दोनोंको पृथक्-पृथक् आटठसे गुणा करे। फिर पहलेमे
अन्तरसे भाग देनेपर जो लब्धि आती है, वही उनका | एक जोड तो दोनों संख्या ्ञात होगी । यह विधि
योग हे; योगका ज्ञान हो जानेपर फिर पूर्वाक्त प्रकारसे । व्यक्त ओर अव्यक्त दोनों गणितेमिं उपयुक्त है" ॥ ३४॥
१. इसको स्पष्टरूपसे जाननेके लिये यह उदाहरणात्मक पश्र प्रस्तुत किया जाता है- वह कौन-सी संख्या है, जिसे ५ से गुणा
करके उसे उसीका तृतीयांश घटाकर दससे भाग देनेपर जो लब्धि हौ उसमें राशिके १/३, १/२, १/४ भाग जोडनेसे ६८ होता है। इसमं
गुणक ५। ऊन १/३ । हर १०। युक्त हनेवाले राश्यंश १/३, १/२, १/४ ओर दृश्य संख्या ६८ है। कल्पना कीजिये कि इष्ट रशि ३ हि।
इसमे प्रश्रकतकि कथनानुसार ५ से गुणा किया तो १५, इसमे अपना १/३ अर्थात् ५ घय दिया तो १० हुआ। इसमें दससे भाग दिया
तो १ लब्धि अङ्क हुआ, उसमे कल्पित रशि ३ के १/२, १/२, १/४ जोडनेसे १/१५३/३*२/२३८४-१२५१२+१८*९५१/१२१७/
= 3 =-=
४ हुआ। फिर दृश्य ६८ में कल्पित इष्ट ३ से गुणा किया ओर १७/४ से भाग दिया तो ६८५३८४४८ यही इष्ट संख्या हुई।
२. जैये किसीने पृरछ-वे दोनों कौन-सी संख्यां हैँ, जिनका योग १०१ ओर अन्तर २५ है? यहाँ योगको दो जगह लिखा-
१०१ १०९१
` २५. जोडा ` इद्र घटाया
१२६२-६३ ७६-५२-३८ उत्तर- वे दोनों संख्याएं ६३ एवं ३८ है ।
३. उदाहरणके लिये यह प्रश्र है--जिन दो संख्याओंका अन्तर ८ ओर वर्गान्तर ४०० हि, उन्ह वताओ। ४००२८५० यह योग
हुआ ५०५८०२२९ एक संख्या । ५०-८-२=२१ दूसरी संख्या हुई । अथवा वर्गान्तरमें राशियोगका भाग देनेसे अन्तर ज्ञात होगा।
यथा--४००५०=८ यह राश्यन्तर है। फिर पूर्वोक्त प्रक्रियासे दोनो राशियों ज्ञात ोगी।
र व दो संख्याओंका वर्ग ओर वर्गान्तर के दोनेमिं पृथक्-पृथक् १ घयनेपर भी वर्गा ही शेष रहता है उसको
1 ॥ ह |
५. कल्पना कीजिये कि षट १/२ है, उसका वर्ग हुआ १/४ उसको आटसे पण णा किया तो २ हआ। उसमं १ घटयकर् आधा
किया तो १/२ हुआ, उसमें इष्ट १/२ से भाग दिया तो १ हुआ-यह प्रथम संख्या है। उसका वर्गं किया तो एक ही हुआ। इसका
आधा करनेसे १/२ हुआ। इसमे एक जोडुनेसे ३/२ हआ यह दूसरी संख्या हुई ।
६. कल्पना कीजिये कि इष्ट १ है, उसको दोसे गुणा किया तो २ हभ, उसमे १ म भाग दिया तो १२/१-१.८१/२-१/२
हुआ। उसमे इष्ट १ जोड़ दिया तो १ १/२-३/२ प्रथम संख्या तिकल आयी ओर दूसरी संख्या.१ है ही। ६
७. कल्पना कीजिये कि इष्ट २ है। इसके वर्गका वर्गं हुआ १६ ओर उसका धन हआ ८। दनको अलग-अलग ८ से गुणा कले-
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/81/81185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
गुणघ्नमूलोनयुते सगुणार्धकृतेः पदम्।
२४७
तो जोड करके) उसके द्वारा पृथक्-पृथक् दृश्य ओर मूल
दृष्टस्य च गुणर्धोनयुतं व्गीकृतं गुणः ॥ ३५॥ | गुणकम भाग दे; फिर इस नूतन दृश्य ओर मूलगुणकसे
यदा लवोनयुग्राशिर्दृश्यं भागोनयुग्भुवा।
भक्तं तथा मूलगुणं ताभ्यां साध्योऽथ व्यक्तवत्॥ ३६॥
गुणकर्म अपने इष्टड्गुणित मूलसे ऊन या युक्त
होकर यदि कोई संख्या दृश्य हुई हो तो मूल गुणकके
आधेका वर्ग दृश्य-संख्यामे जोड़कर मूल लेना चाहिये।
उसमे क्रमसे मूल गुणकके आधा जोड्ना ओर घटाना
चाहिये। (अर्थात् जहो इषटगुणितमूलसे ऊन होकर दृश्य
हो वहां गुणकार्धको जोड़ना तथा यदि इष्टगुणितमूलयुक्त
होकर दुश्य हो तो उक्त मूलमें गुणकार्धं घटना चाहिये)
फिर उसका वर्ग कर लेनेसे प्रश्रकर्ताकी अभीष्ट रशि
(संख्या) सिद्ध होती हेः । यदि राशि मूलोन या मूलयुक्त
होकर पुनः अपने किसी भागसे भी ऊन या युत होकर
दृश्य हेती हो तो उस भागको १ मे उन या युत कर् (यदि
भाग उन हुआ ह्ये तो घय के ओर यदि युत हुआ हो
पूर्ववत् रशिका साधन करना चाहिये ॥ ३५-३६॥
प्रमाणेच्छे सजातीये आद्यन्ते मध्यगं फलम्।
इच्छाघ्नमाद्यहृ्स्वेष्टं फलं व्यस्ते विपर्ययात्॥ ३७॥
(त्रेराशिकमे) प्रमाण ओर इच्छा ये समान
जातिके होते है, इन्हें आदि ओर अन्तमें रखे, फल
भिन्न जातिका हे, अतः उसे मध्यमे स्थापित करे।
फलको इच्छासे गुणा करके प्रमाणके द्वारा भाग
देनेसे लब्धि इष्टफल होती है। (यह क्रम त्रैराशिक
बताया गया है।) व्यस्त त्रैराशिकमें इससे विपरीत
क्रिया करनी चाहिये । अर्थात् प्रमाण-फलको प्रमाणसे
गुणा करके इच्छासे भाग देनेपर लब्धि इष्टफल
होती है। (प्रमाण, प्रमाण-फल ओर इच्छा-इन
तीन राशियोंको जानकर इच्छाफल जाननेकी क्रियाको
त्रराशिक कहते हे ।) ° ॥२७॥
पर एक हुआ १२८ ओर दूस हआ ६४1 यहां पहले १ जोडुनेसे १२९ हआ, यह पहली संख्या है ओर ६४ दूसरी संख्या हुई
१. यदि कोई पृछ किसी हंस-समूहके मूलका सपतगुणित आधा (७/२) भाग सरोवरके तरपर चला गया ओर बचे हए २ हंस जलमं
ही त्ीडय कसते देखे गये तो उन हंसौकी कुल संख्या कितनी थी ? यहां मूल गुणक ७/२ है। दृष्ट संख्या २ है। गुणार्धं हभ ५/४ उसका
वर्ग हुआ ४९/१६ उससे दृष्ट २ का योग करनेपर ८१/१६ हआ। इसका मूल हुआ ९/४ फिर इसे गुणार्धं ७/४ से युक्त किया तो १६/४४
हुआ, इसका वर्गं किया तो १६ हआ, यही हसकुलका मान है। (यह मूलोन दृषएटका उदाहरण है।)
भागोन दृष्टका उदाहरण इस प्रकार है-किसी व्यक्तिने अपने धनका आधा १/२ अपने पुत्रको दिया ओर धन-संख्याके मूलका १२
गुना भाग अपनी स्त्रीको दे दिया। इसके बाद उसके पास १०८०) बच गये तो बताओ उसके सम्पूर्ण धनकी संख्या क्या है ?
उत्तर--इस प्रमे मूलगुणक १२ है ओर १/२ भागसे ऊन दृष्ट १०८० है। अतः मूल स्लेकमें वर्णित रीतिके भनृमार सार भागकोौ एकमे
घटानेसे १--१/२-१/२ हआ इससे मूल गुणक १२ ओर दृश्य १०८० म भाग देनेसे क्रमशः नवीन मूलगुणक २४ अर नवीन टूश्य २१६०
हभ। पुनः उपर्युक्त रतिसे इस मूलगुणकके अधे १२ के वर्गं १४४ को दश्यरमे जोङसे २३०४ हूआ। इसके मूल ४८ मे गुणक २८४ के अधे १२
क्रे जोडसे ६० हभ ओर उसका वर्ग ३६०० हआ; यही उत्तर है।
भागयुत दृषटका उदाहरण-एक भगवद्भक्त प्रातःकाल जितनी संख्यामें हसिमका जप करते है; उस संख्यके पञ्चमाशर्मे उसी जपसंख्यके
मूलका १२ गुना जोडुनेसे जो संख्या हो, उतना जप सायंकाले करते है यदि दोनों समयकी जपसंख्या मिलकर १३२०० है ते प्रातःकाल
सायंकालकी पृथक्-पृथक् जपसंख्या बताइये ।
उत्तर-- यहाँ मूलगुणक १२ ओर भाग १/५से युत दृष्ट १३२०० है। अतः उक्त रीतिके अनुसार भागको १ मँ जोध गया तो ६/५ हुभा।
इससे मूलगुणक १२ आर दृश्य १३२०० में भाग देनेपर नवीन मूलगुणक १० ओर नवीन दृश्य ११००० हुआ। उपर्युक्त रीतिक्रे अनुसार गुणक्के
आधे ५ के वर्ग २५ को नवीन दृश्ये जोडुनेपर ११०२५ हुआ। इसक्रा मूल १०५ हआ। इसमं नवीन गुणकके आधे ५ कौ घटानेसे १००
हुआ। इसका वर्ग १०००० ह। यही प्रातः जपसंख्या हई । शेष ३२०० सायंकालकी जपसंख्या हूई।
२. उदाहरणके लिये यह प्रश्र है-यदि पाच सपय १०० आम मिलते है ते सात र्पयेमं कितने मि्लेगे ? इस प्रक्रमे 4 प्रमाण
है, १०० प्रमाण-फल है ओर ७ इच्छा है। प्रमाण ओर इच्छा एक जाति (रूपया) तथा प्रमाण-फल भित्र जाति (आम) 21 भरदिपं
प्रमाण, मध्यमे फल ओर अन्ते इच्छाकी स्थापना की गयी-५) में १०० आम तो ७) में कितने ? यहा प्रमाण-फल १०० कौ इच्छसे
गुणा करके प्रमाणसे भाग दिया जायगा तो १००४० = १४० यह इच्छाफल हुआ (अर्थात् सात रुपयेकरे १४० आम हुए) ।
जँ इच्छकी वृद्धम फलकी वृद्धि ओर इच्छके हयम फलका हस हो, वां क्रम-ग्रगशिक होता दै। जहाँ इच्छकी वृद्धिर्मे फलका
हवस ओर इच्छके हासे फलकी वृद्धि ह, वह व्यस्तव्रैयशिक होता है। वैसे स्थलम् प्रमाणफलक्न प्रमाणमे गुणा करके उसमे इच्छके द्राय
भाग देनेसे इच्छाफल होता है। इस प्रकारके व्यस्त-तररयशिकके कुछ परिगणित स्थल है-“ जीवानां वयसो मील्य तैील्ये वर्णस्य टैमने। भागहर
च गशीनां व्यस्तं त्रैयशिकं भवेत्॥' अर्थात् जीर्वोकी वयस्छते मूल्यर्म, उत्तमके साध अधम् मेशलवाले सेनेके तौले तथा किसी सव्ये भिन्न-
भित्र भाजकये भाग दैनेमें व्यस्तत्रैररिक होता है। एक उदाहरण लीजिये- ३ आदमी मिलकर १० दिनम एक काम पुय कसौद्ैतो
((-0. 1\/॥८1114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
२४८ संक्षिप्त नारदपुराण
पञ्चराश्यादिक्रऽन्योन्यपश्च कृत्वा फलच्छिदाम्। करके (प्रमाण-पक्षवालेको इच्छा-पक्षमे ओर इच्छा-
बहुराशिवधे भक्ते फलं स्वल्पवधेन च ॥ ३८ ॥ | पक्षवालेको प्रमाण-पक्षमे रखकर) अधिक राशियोके
इष्टकर्मविधेर्मलं च्युतं मिश्रात् कलान्तरम्। घातमं अल्पराशिके घातसे भाग देनेपर जो लब्धि आवे
मानघ्नकालश्चातीतकालघ्नफलसंहताः ॥ ३९॥ | वही इच्छफल हैः ॥ ३८ ॥ मिश्रधनको इष्ट मानकर
स्वयोगभक्ता मिश्रघ्नाः सम्प्रयुक्तदलानि च। इष्टकर्मसे मूलधनका ज्ञान करः उसको मिश्रधनमें
पञ्चरशिक, सप्तरशिक (नवरशिकः एकादशयशिक) | घटनेसे कलान्तर (सूद) समञ्ना चाहिये ।* अपने-
आदिमं फल ओर हरोको परस्पर पक्षम परिवर्तन । अपने प्रमाण धनसे अपने-अपने कालको गुणा
१५आदमी कितने दिनमें करेगे 2 यहाँ १०५८३१५ करनेसे उत्तर आया २; अतः २ दिनमें काम पृरा करगे।
१. इसका प्रश्रात्मक उदाहरण इस प्रकार है- यदि १ मासमे १००) के ५) व्याज होते है तो १२ महीनेमें १६) के
कितने होगे 2 इसका न्यास इस प्रकार टै-
प्रमाण-पक्ष इच्छा-पक्ष २ अल्प बहुत
परस्पर पक्षनयन करके इस प्रकार
१ १२ १ १२
(२५ १६ न्यास किया गया। १०० १६
॥। ° ० ५
बहुराशिके घात (गुणन) से- १२८१६५५=९६०
अल्पराशिके धात (गुणन) से- १८१००१००
९६०.-१००-९०.-९ 2 रुपये व्याज हए ।
इसी तरह मूलधन तथा व्याज जानकर काल बताना चाहिये ओर काल तथा व्याज जानकर मूलधन बताना चाहिये।
सप्तराशिकका उदाहरण इस प्रकार है- यदि ४ हाथ चौडी ओर ८ हाथ लम्बी १० दरियोंका मूल्य १००) रुपया है
तो ८ हाथ चौडी तथा १० हाथ लम्बी २० दरि्योका मूल्य क्या होगा?
प्रमाण-पक्ष इच्छा-पक्ष । अल्पराशि बहुराशि
ट ८ अन्योन्य पक्ष-नयनसे ट ८
८ १० ८ १०
१० २० १० २०
१०० १००
श्लोकोक्त रीतिके अनुसार ८८१०८२०८१०० पाचि सौ रुपये । यही उत्तर हुआ । इसी प्रकार नवराशिक आदिको
भी जानना चाहिये । ४,८८.८१०
२. उदाहरण यह है- १ मासमे १००) के ५) व्याजके हिसावसे यदि बारह मासमे मूलधनसहित व्याज १०००) हए
तो अलग-अलग मूलधन ओर व्याजको संख्या बताओ। इष्टकर्मसे मूलधन जाननेके लिये इष्ट ५ कल्पित मूलधन ओर दृश्य
१००० पिश्रधन दै । यहाँ कल्पित मूलधनसे पञ्चराशिकद्वारा व्याज जाननेके लिये न्यास-
= (409 )
१ १२ परस्पर पक्षनयनसे १ १२ बहुरशिके घात (गुणन) -मे स्वल्पराशिके
१०० ५ १०० ५ घात (गुणन) से भाग देनेपर
८५ १1 ५ ८५4 १ र >९५>८८५ ४ ३
ध ९. देनेसे १००
३. कल्पित व्याज हुआ । कल्पित मिश्रधन ५,३=८, इससे इष्टगुणित दृश्ये भाग देनेसे उद्िष्ट मूलधन १०००२८५ ६२५)
इसको पिश्रधन ९००० में घटानेसे ३७५) व्याजके हुए । संक्षेपसे इस प्रकार न्यास करना चाहिये- ८
१ १२ लब्धिक्रमसे मूल ६२५)
१ ©© १ 0999 ल्याज ३५५५ )
५५ (५,
अथवा इष्टकर्मसे कल्पित ईष्ट १
पूर्वोक्त रीतिसे कलान्तर (सूद) ३/५ इससे युक्त १८८५
१०००-५. = ९०० ~+ ६२५) मूलधन १०००--६२५-३७५) व्याज
%
((-0. 1/८111141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्व भाग-द्वितीय पाद
२४९
करना, उसमे अपने-अपने व्यतीत काल ओर | करनेसे इच्छा-पक्षमे फलके चले जनेसे इच्छापक्ष
फलके घात (गुणा)-से भाग देना, लब्धिको
पृथक् रहने देना, उन सवमें उन्हीके योगका
पृथक्-पृथक् भाग देना तथा सबको मिश्रधनसे
गुणा कर देना चाहिये। फिर क्रमसे प्रयुक्त
व्यापारमें लगाये हए धनखण्डके प्रमाण ज्ञात होते
है२॥ ३९३ ॥
बहुराशिफलात् स्वल्पराशिमासफलं बहु ॥ ४०॥
चेद्राशिजफलं मासफलाहतिहतं चयः।
पञ्चराशिकादिमे फल ओर हरको अन्योन्य पक्षनयन
बहुराशि ओर प्रमाण-पक्ष स्वल्पराशि माना गया है।
इसी गणितके उदाहरणम जब्र इच्छाफल जानकर
मूलधन जानना होगा तो फलोको परस्पर पक्षमें
परिवर्तन करनेसे प्रमाण-पक्ष (स्वल्पराशि) का
फल ही बहुराशि (इच्छापक्ष)-से अधिक होगा । यहां
राशिजफलको इष्टमास ओर प्रमाण-फलके गुणनसे
भाग देनेपर मूलधन होता है२॥ ४० ३ ॥
क्षेपा पिश्रहताः क्चेपयोगभक्ताः फलानि च ॥४१॥
भजेच्छिदोऽशेस्तेर्मिश्रे रूपं कालश्च पूर्तिकृत्।
१. उदाहरणके लिये यह प्रश्र है-किसीने अपने ९४) रुपये मूलधनके तीन भाग करके एक भागको माहवारी पांच
रुपये सैकडे व्याज, दूसरे भागको तीन रुपये ओर तीसरे भागको चार रुपये सैकड व्याजपर दिया। क्रमशः तीनों भागों
सात, दस ओर पच मासमे बराबर व्याज पिले तो तीनों भागोको अलग-अलग संख्या वताओं।
भाग १ भाग २
प्रमाणकाल १ व्यतीतकाल ७
प्रमाण धन १००
प्रमाण फल ५
प्रमाण धन १००५
प्रमाण फल ३
प्र० का० १व्य० का०१०
भाग ३ पिश्रधन (सम्मिलित
प्र० करार १ व्य० क्रा० ५ मूलधन)
प्रमाण धन १०० ९.४
प्रमाण फल ४
अपने प्रमाणकाल ओर प्रमाणधनके गुणनफलमें व्यतीतकाल ओर प्रमाण-फलके गुणनफलसे भाग देनेपर--
१००२१ १०० १५
३५१० `
९१०००९१ =१०० २०
न |
३० ` ३
१००८१ १०५० ५
८५ ˆ २० १
इनमें इनके योग २३५/२१ से भाग देने ओर मिश्रधन (९४) -से गुणा करनेपर पृथक्-पृथक् भाग इस प्रकार हीते है-
२०.२३५, २०.२९.९४
७ १ ७ २३५
++
२३२ २१ २३२ २३५
५ २३५ ५८२१८ १४.४२ यह तृतीय भाग हुआ।
९ ६९५ ६९ ९९५८२
=२४ यह प्रथम भाग हृआ।
=२८ यह द्वितीय भाग हआ।
२. उदाहरण-एक मासमे १००) मृलधनका ५) रुपया व्याज होता है तो १२ मासमे १६ रुपयेका कितना होगा ?
उत्तरार्थं न्यास-
प्रमाण इच्छा
१ १२
१०० १६
८५ ‰
१२८१६५८५
श्लोकोक्त रीतिके अनुसार-
अन्योन्य पक्षनयनसे
स्वल्प राशि व्रहुराशि
१ १२
१०० १६
८५
८८
= ~~ =दुच्छाफल।
५4
((-0. 1/८11141/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
२५०
संक्षिप्त नारदपुराण
(पूंजीके ट्कड़)-को पृथक्-पृथक् मिश्रधनसे
गुण देना ओर उसमें प्रक्षेपके योगसे भाग देना
चाहिये। इससे पृथकू-पृथक् फल ज्ञात होते ह ।९
वापी आदि पूरणके प्रश्रमे- अपने-अपने अंशेसे
हरमे भाग देना, फिर उन सबके योगसे १ में भाग
देनेपर वापीके भरनेके समयका ज्ञान होता
है२॥४१९३॥
गुणो गच्छेऽसमे व्येके समे वर्गोऽर्धितेऽन्ततः ॥ ४२॥
यद् गच्छान्तफनलं व्यस्तं गुणवर्गभवं हि तत्।
व्येकं व्येकगुणापतं च प्राणघ्नं मानं गुणोत्तरे॥ ४३॥
(द्विगुणचयादि-वृद्धिमें फलका साधन )- (जह
द्विगुण-त्रिगुण आदि चय हो वर्हँ) पद यदि
विषम संख्या (३, ५, ७ आदि) हो तो उसमें १
घटाकर गुणक लिखे। यदि पद सम हो तो
आधा करके वर्गचिह लिखे । इस प्रकार एक
घटाने ओर आधा करनेमें भी जब विषमाङ्क हो
तब गुणकचिह्, जव समाङ्क हो तब वर्गचिह
करना एवं जबतक पदकी कुल संख्या समाप्त न हो
जाय तबतक करते रहना चाहिये। फिर अन्त्य
चिहसे उलटा गुणज ओर वर्गफल साधन करके
इसी उदाहरणम मूलधन जाननेके लिये-
न्यास-
प्रमाण-पक्ष
मास १
धनराशि १००
फ़ल ५
यहां फल ओर हरके अन्योन्य पक्षनयन करनेसे-
बहुराशि स्वल्पराशि
पमाण इच्छा
मास १ १२
घन १००५ 4
2६८ ५५
५
"बहुराशिफलात्' इत्यादि ४० वें श्लोकके अनुसार--
१८१००८४८
सस १९८ मत
इच्छा-पक्ष
१२९ मास
>
४८=इच्छाफल (५ वीं राशि)
^
१. मान लीजिये कि ३ व्यापारियेकि क्रमसे ५१, ६८, ८५ रुपये मूलधन है । तीनोने एक साथ मिलकर व्यापारसे ३००)
रुपये प्राप्त किये तो इन तीनोके पृथक्-पृथक् कितने धन होगे 2 यहाँ मूलोक्तं नियमके अनुसार प्रक्षेपों (५१, ६८, ८५)-
को मिश्रधन ३०० से गुणाकर प्रक्षेपोके योग २०४ के द्वारा भाग देनेपर लब्धिक्रमसे तीनेकि पृथक्-पृथक् भाग हए।
यथा-प्रथमका
भाग द ७५॥ द्वितीयका भाग- ~ २००१००॥। तृतीयका भाग~< य २००-६२५॥
२. कल्पना कीजिये कि एक रना या नल किसी तालाबको १ दिन (१२ घटे) में, दूसरा
दिनम, तीसरा > दिनमें
ओर चौथा १/६ दिनमें अलग-अलग खोलनेपर भर देता है तो यदि चारों एक ही साथ खोल दिये जायं तो दिनके कितने
भागम तालाबको भगे।
मूलोक्तं रीतिसे अपने-अपने अंशसे हरमे भाग देनेसे , ३, ३, ९,
र ३ ६
इनके योग १२/१ से १ में भाग देनेपर श हआ।
अर्थात् १ दिनके १२ वें भागमें (१ धंटेमें) तालाब भर जायगा।
((-0. 1/(111141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद् २५१
आद्य चिहतक जो फल हो, उसमें १ घटाकर (क्षेत्रव्यवहार-प्रकरण) -- भुज ओर कोरिके
शेषम एकोन गुणकसे भाग देना चाहिये । | वर्गयोगका मूल कर्ण होता है, भुज ओर कण्कि
लब्धिको आदि अङ्कसे गुणा करनेपर सर्वधन | वर्गान्तरका मूल कोरि होता है तथा कोटि एवं
होता है*॥४२-४३॥ कर्णके वर्गान्तरका मूल भुज होता है- यह बात
भुजकोटिकृतेर्योगमूलं कर्णश्च दोभवित्। त्रिभुज अथवा चतुर्भुज क्षेत्रके लिये कही गयी हैर।
श्रुतिकोटिकृतेरन्तः पदं दोःकर्णवर्गयोः ॥ ४४॥ | अथवा राशिके अन्तरवर्में उन्हीं दोनों राशियोका
विवराद् यत्पदं कोटिः क्षत्रे त्रिचतुरस्नके । द्विगुणित घात (गुणनफल) जोड़ दं तो वर्गयोग
राश्योरन्तरवर्गेण द्विघ्ने घाते युते तयोः ॥ ४५॥ | होता है अथवा उन्हीं दोनों राशियोके योगान्तरका
वर्गयोगोऽथ योगान्तर्हतिर्वर्गान्तरं भवेत्। घात वर्गान्तर होता है ॥४४-४५ ६ ॥
१. कल्पना कोजिये कि किसी दाताने किसी याचकको पहले दिन २ रुपये देकर उसके बाद प्रतिदिन द्विगुणित करके
देनेका निश्चय किया तो बताइये कि उसने ३० दिनमें कितने रुपये दान किये।
उत्तर- यहां आदि=२, गुणात्मकचय=२, पद=३० है । पद सम अंक है । अतः आधा करके १५ के स्थानें वर्गचिह
लगाया, यह विषमाङ्क हुआ, अतः उसमं १ घटाकर १४ के स्थानमें गुणकचिह लिखा । फिर यह सम हो गया, अतः आधा
७ करके वर्गचिह किया, इस प्रकार पद-संख्याकी समापिपर्यन्त न्यास किया । न्यास देखिये-
न्यास- अन्तमें गुणचिह्न हुआ। वहां गुणकाङ्क २ को रखकर उलटा प्रथम
१५ वर्ग १०७३७४१८२४ | चिहतक गुणक-वर्गज फल-साधन किया तो १०७३७४१८२४
१४ गुण ३२७६८ हआ।
७ वर्गं १६३८४ इसमे एक घटाकर एकोनगुण (१)-से भाग देकर आदि
६ गुण १२८ (२)-से गुणा किया तो २,१४,७४,८३,६४६ रुपये सर्वधन
३ वर्ग ६४ हुआ।
२ गुण ८
१ वर्गं ४
9 गण
२
२. लीलावती (क्ेत्रव्यवहार श्लोक १,२)-में इस विषयको इस प्रकार स्पष्ट किया है- त्रिभुज या चतुर्भुजमें जब एक
भुजपर दूसरा भुज लम्बरूप हो, उन दोनो एक (नीचेकौ पड़ी रेखा)-को ' भुज" ओर दूसरी (ऊपरकी खड़ी रेखा)-को
"कोरि" कहते हैँ । तथा उन दोनेकि वर्गयोग मूलको "कर्ण" कहते हें । भुज ओर कर्णका वर्गान्तिर मूल कोरि तथा कौटि
ओर कर्णका वर्गान्तर मूल भुज होता है । यथा-' क, ग, च" यह एक त्रिभुज है । "क, ग ' इस गेखाको कोरि कहते दै ।
“ग, च" इस रेखाका नाम भुज है, "क, च' का नाम कर्णं हे।
क
उदाहरण- जैसे प्रश्र हुआ कि जिस जात्य त्रिभुजं कोटि~४,
भुज-३ है वहांका कर्णमान क्या होगा? तथा भुज ओर् कर्ण
“ जानकर कोटि वठाओं ओर कोटि, कर्णं जानकर भुज बताओ।
ग च
उक्त रीतिसे ४ का वर्ग १६ ओर ३ का वर्गं ९, दोनोके योग २५ का मूल ५ यह कर्णं हुआ। एवं कर्णं ५ ओर भुज
३, इन दोनोके वर्गान्त २५-९=१६, इसका मूल ४ कोरि हई तथा कर्णक वर्ग २५ मं कोटिक वर्गं १६ को घटाकर् शेष
९ का मूल ३ भुज हुआ।
इसी प्रकार सर्वत्र जानना चाद्ये ।
जैसे ३ ओर-४येदं ~ ~ „~ = २४ यें दोना राशिर्योका अन्तर वर्म (+ ६, २
३. जैसे ३ ओर ४ ये दो राशियाँ ह । इन दो्नकि दूने गुणनफलमं ३५४८२२४ में दोना राशिर्याका अन्तर वगं (४-३)=(१)}=१
मिलानेसे २४,१-२५ यह दोनों रशियेकि वर्गयोग (३१.(४१-९*१६-२५ के वराबर् है तथा उन्हीं दोनों राशियंकरि योगान्तर् घात
(३,४)५(४-३) ७१७ यह दोनों राशियेकि वर्गान्तर १६-९=७ के बरावर है। (` यद निशान वर्गका है ।
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 81188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 6810011
२५२ संक्षिप्त नारदपुराण
व्यास आकृतिसंश्चुण्णोऽद्रयाप्तः स्यात् परिधिर्मुने। ४६॥ मुने ! व्यासको २२ सेगुणदेना ओर ऽसे भाग
ज्याव्यासयोगविवराहतमूलोनितोऽर्धितः । देना चाहिये, इससे स्थूल परिधिका ज्ञान होता
व्यासः शरः शरोनाच्य व्यासाच्छरगुणात् पदम्॥ ४७॥ | हे* ॥ ४६ ॥ ज्या (जीवा) ओर व्यासका योग एक
द्विघ्नं जीवाथ जीवार्धवर्गे शरहते युते। जगह रखना ओर अन्तरको दूसरी जगह रखना
व्यासो वृत्ते भवेदेवं प्रोक्तं गणितकोविदेः ॥ ४८ ॥ । चाहिये । फिर इन दोनोंका घात (गुणा) करना
१. नारदपुराणक्के इस गणितविभागमें क्षेत्रव्यवहारको चर्चामात्र होकर दूसरे विषय आ गये है; त्रिभुजादि क्षेत्रफलका विवेचन
न हानसं यह प्रकरणा अधूरा-सा लगता हे। जान पड़ता हे, इस विपयके श्लोक लेखकके प्रमादसे छूट गये है; अतः रिपपणीमे
संक्षपतः उक्तं न्यूनताको पूर्तिं को जाती हे।
त्रिभुजे भुजयोयागस्तदन्तरगुणो हतः । भुवा लब्ध्या युतोना भूरि च दलिता पृथक् ॥
आबाधे भुजयोर्ञेये क्रमशश्ाधिकाल्पयोः । स्वावाधाभुजयोर्वर्गान्तरान्मृलं च लम्बकः ॥
लम्बभूमिहतेरर्ध्ं प्रस्फुटं त्रिभुजे फलम् । ततो वबहुभुजान्तःस्थत्रिभुजेभ्यश्च तत्फलम् ॥
(त्रिभुजादि क्षेत्रफलानयन) त्रिभुजका फल जानना हो तो उसके तीन भुजोमे एक को भूमि ओर शेष दोको भुज मानकर
क्रिया करे। वधा- दोनों भुजके योगको उन्हीं दोनोकि अन्तरसे गुणा करके गुणनफलमें भूमिसे भाग देनेपर जो लब्धि हो, उसको
भूमिमं जोड़कर आधा करे तो बड़ भुजकी *आवाधा' होती है ओर उसी लब्धिको भूमिम घटाकर आधा करनेसे लघुभुजकी
आबाधा ' होती हे। अपने-अपने भुज ओर आवाधाके ' वर्गान्तर ' करके शेपका मूल लेनेसे लम्बका मान प्रकर होता हे । लम्ब
ओर भूमिके गुणनपलका आधा त्रिभुजका क्षेत्रफल होता है।
उदाहरण- कल्पना कोजियं कि किसी त्रिभुजमं तीनों भुजोके मान क्रमसे १३, १४, १५ है तो उस त्रिभुजका क्षेत्रफल क्या
होगा? तो यहां १४ को भूमि ओर १३, १५ को भुज मानकर क्रिया होगी। यथा-दोनों भुजके योग २८ को उन्हीं दोनोके अन्तर
२ सं गुणा करपर् ५६ हुआ। इसमं भृमि १४ के द्वारा भाग देनेसे लब्धि ४ हई । इस चारको भूमि १४ में जोड़कर आधा करनेसे
९ हुआ- यह बड़ भुजको ' आवाधा' का मान हे । एवं भृमिं लब्धिको घटाकर आधा करनेसे ५ हुआ। यह लघुभुजकी ' आबाधा
हई । भुज ओर् आव्वाधाके वर्गान्तर (२२५-८१=१४४) अथवा (१६९-२५=१४४) का मूल १२ हआ। यह लम्बका मान है।
लम्ब ओर भूमिके गुणनफल (१२५१४) = १६८ का आधा ८४ हआ, यह उक्त त्रिभुजका क्षेत्रफल है।
इस प्रकार त्रिभुज फलानयनको रोति जानकर बहु भुजक्ेत्रमे एक कोणसे दूसरे कोणतक कर्ण्ेखाको भूमि ओर उसके आश्रित
दो भुजोको भुज मानकर फल निकाला जायगा । चतुर्भुजमं दोनो त्रिभुजोके फलको जोडनेसे क्षेत्रफलकी सिद्धि होगी एवं पञ्चभुजमें
३ त्रिभुज वनेगे ओर उन तीनो त्रिभुजोके फलका योग करनेसे फल सिद्ध होगा । इसी प्रकार पड्भुज आदिमे भी समञ्ना चाहिये।
विशेष वक्तव्य--तीन रेखाओंसे वना हुआ क्षत्र त्रिभुज कहलाता है। उन तीनों रेखाओं नीचेकी रेखाको भूमि ओर दोनों
वगलकी दो रेखाओंको ' भुज ' कहते है ।
(लम्ब-) ऊपरके कोणसे भूमितक सीधी रेखाको लम्ब कहते है ।
(आबाधा-) लम्बसे विभक्त भूमिके खण्ड (जो लम्बके दोनों ओर ह) दोनों भुजोंकी “ आबाधा" कहलाते है । निप्राद्भत
्षत्रमे स्पष्ट देखिये- ४ ३ ४
भु भुः
भम ५ । भूति १४
वृत्तक्षेत्रमे परिधि ओर व्यासके गुणनफलका चतुर्थशि क्षेत्रफल होता है। जेसे-
जिस वृत्तक्षेत्रमे व्यासमान ७ ओर परिधि २२ है, उसका
क्षेत्रफल जानना है तो परिधि २२ को व्यास ७ से गुणा करनेपर
१५४ हआ। इसका चतुर्थाश ३८ होता है । यही क्षेत्रफल हुआ।
२. जसे पृ गया कि जिस वु्तक्षेत्रका व्यास १४ है वहो परिधिका
अ ग॒ मान क्या होगा तथा जिसमें ८८ परिधि है, वह व्यासमान क्या होगा? तो
उक्त रीतिकै अनुसार व्यास १४ करो २२ से गुणा के गुणनफलमं ७से
भाग देनेपर २२८१४ +. परिधिमान स्थूल हुआ।
||
((-0. 1\/॥८11104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
२५३
चाहिये । उस गुणनका मूल लेना ओर उसको व्यासमें
घटा देना चाहिये । फिर उसका आधा करे, वही ' शर '
होगा । व्यासमें शरको घटाना, अन्तरको शरसे गुण
देना, उसका मूल लेना ओर उसे दूना करना चाहिये
तो * जीवा! हो जायगी । जीवाका आधा करके उसका
वर्ग करना, शरसे भाग देना ओर लब्धिमें शरको जोड
देना चाहिये, तो व्यासका मान होगाः ॥ ४७-४८ ॥
करनेपर गुणनफल "प्रथम ' कहलाता है । परिधिका
वर्गं करना, उसका चौथा भाग लेना, उसे पचसे
गुणा करना ओर उसमे "प्रथम' को घटा देना
चाहिये। यह भाजक होगा। चतुर्गुणित व्यासको
प्रथमसे गुण देना, यह भाज्य हुआ। भाज्यमें भाजकसे
भाग देना, यह जीवा हो जायगी? ॥ ४९ ‡ ॥ व्यासको
चारसे गुणा करके उसमें जीवाको जोड़ देना, यह
भाजक हुआ। परिधिके वर्गको जीवाकी चोथाई
ओर पोचसे गुण देना, यह भाज्य हुआ। भाजकसे
भाज्यमे भाग देना, जो लब्धि आवे, उसे परिधिवग्कि
चतुर्थाशमें घटा देना ओर शेषका मृल लेना, उसे
लब्धोनवृत्तवर्गाड्प्रः पदेऽर्धात् पतिते धनुः। वृत्त (परिधि) के आधेमें घटा देनेपर तौ धनु
परिधिसे चापको घटाकर शेषमें चापसे ही गुणा । (चाप) होगा ॥५०३॥
१. उदाहरणार्थ प्रश्र-जिस “ वृत्त" का व्यास १० है, उसमें यदि 'जीवा' कामान £ टै तो “शर' कामान क्या दहोगा2
"शर" का ज्ञान हो तो जीवा बताओ तथा "जीवा" ओर “शर' जानकर व्यासका मान वताओ।
उत्तर-क्रिया- मूलोक्तं नियमके अनुसार व्यास ओर जीवाका योग १०५६=१६ हुआ। व्यास ओर जीवाका अन्तर १०-६४
= हुआ। दोनका गुणनफल १६५४०६४ हुभआ। इसका मूल ८
हुआ। इसे व्यास १० में घटाया तो २ हुआ। इसका आधा किया
तो १ “शर' (बाण) हुआ। व्यास १० मंशर १ घटायातो ९
हुआ। इसे शर १ से गुणा किया तो ९ हुआ। इसका मृल लिया
तो ३ हआ। इसे द्विगुण किया तो £ जीवाका प्रमाण हुआ। इसी
तरह "जीवा" ओर “शर! का ज्ञान होनेपर जीवा ६ के आधे ३
का वर्ग कियातो ९ हआ। इसमे शर १ से भाग दिया ओर
लब्धम शरको जोड़ दिया तो हू * ‡- १० हुआ। यही
व्यासका मान दै।
२. उदाहरण-जिस वृत्तका व्यासार्धं १२० (अर्धात् व्यास २४०) है, उस वृत्तके अष्टादशांश क्रमसे १, २, ३, ४, ५, ६,
७, ८, ९ से गुणित यदि चापमान हो तो अलग-अलग सबको जीवा बताओं।
उत्तर--क्रिया-व्यासमान २४० । इसपरसे परिधि ७५४। इसका अटारहवां भाग ४२ क्रमसे एकादि गुणित ४२, ८४, १२६, १६८,
२१०, २५२, २९४, ३३६ ओर ३७८- ये ९ प्रकारके चापमान हए । मूल-सूत्रके अनुसार इन चाप ओर परिधिपरसे जौ जीवाअकि
मान होगे, वे ही किसी तुल्याङ्कसे अपवर्तित चाप ओर अपवर्तित परिधिसे भो हेगि। अतः ४२ से अपवर्तन कर्पर परिधि १८ तथा
चापमान १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९ हए। अव प्रथम जीवामान साधन -करना है, ते प्रथम अपवर्तित चाप १ को परिधिसे बदाकर
शेकरो चाप १ से गुणा कसेपर १७ यह "प्रथम ' या * आद्य ' संक हुआ। तथा परिधिवगं चतुर्थांशको ५ से गुणा कर् 54“ = ४०५
इसमे आद्य १७ को घटाकर शेय ३८८ से चतुरगुणित व्यासद्राय गुणित "प्रथम" मं भाग देनेसे ~~ -४२ लब्धि दई । यद
( स्वल्पान्तरसे) प्रथम जीवा हई । एवं द्वितीय चाप २ को परिधि्मे घटाकर शेषको चापसं गुणा कर देनेपर ३२ यह “ म
या "आद्य ' हआ। इसे पञ्चगुणित परिधिव्गके चतुर्थांश ४०५ में घटाकर रोप ३७३ यं चतुर्मुणित व्यासद्वारा गुणित प्रधम ' ध
भाग देनेपर >«-‰‡‡ =८२ लब्धि हूई। स्वल्पान्तरसे यही द्वितीय जीवा. हुई। इसी प्रकार अन्य जीवाका भी साधन करना चरिये।
३. अव जीवोमान जानकर चापमान जाननेकी विधि वताते है-जैसे प्रत्न हुआ कि २४० व्यासवाले वृतत्े जीवामान ४२ ओर
८२ है तो इनके चापमान क्या हेगि ? (उनस्-क्रिया-- ) यथा- जीवा ८२ । वृत्त व्यास २४०। यहा लाघवके लिये परिधिमान अपवर्तित
ही लिया; अतः इसपरतसे भी चापमान अपवर्तित ही आर्वेगे। अवर श्लेव्तानुसार ३२४ को जीवकि चतुधार ८२८४ आओ ५ मे
गुणा केषर ->2 ~~ =८१५८२५५-३३२६० हआ। इसर्म चनुर्मुणित व्यासते युक्छ जीवा १०४२ दग भाग देनपर् लब्धि स्वल्पान्तमे
३२ हई । इसे परिधिवग्कि चतुर्थांश ८१ मेँ घरनेसे ८९ हज । इसका मूल ७ हआ । इसे अपवर्तित परिधिके आधे ९ मँ घरानेसे शेय
२ वह अपवर्तित द्वितीय चाप हुभआ। अतः अपवर्तना्क ४२ मे गुणा कर् देनेपर वास्तविक चाप २८४२०८४ हुआ।
चापोननिघ्नः परिधिः प्रागाख्यः परिधेः कृतेः।
तुयशिन शरघ्नेनाद्योनेनाद्यं चतुर्गुणम्॥ ४९॥
व्यासघ्नं प्रभजद्विप्र ज्यका संजायते स्फुटा।
ज्याङ्घ्नीषु्नो वृत्तवगौऽव्धिघ्नव्यासाद्यमोर्विहत्।॥।५०॥
((-0. 1/८111(4<511॥ 8118811 \/81811851 (01661101. 0141260 0 66810011
२५५४
संक्षिप्त नारदपुराण
स्थूलमध्याण्वन्नवेधो वृत्ताद्काशेशभागिकः॥५९॥
वृत्ताङ्कांशकृतिर्वेधनिघ्नी घनकरा मितौ ।
वारिव्यासहतं देर्घ्य वेधाङ्कुलहतं पुनः ॥५२॥
रखखखेन्दुरामविहतं मानं द्रोणदि वारिणः।
विस्तारायामवेध्यानामङ्गुल्योऽन्योन्यताडिताः ॥५३॥
रसाङ्काभ्राव्धिभिर्भ॑क्ता धान्ये द्रोणादिका मितिः।
उत्सेधव्यासदेर्घ्याणामङ्कलान्यश्मनो द्विज ॥ ५४ ॥
मिथोध्नानि भजेत् खाक्षेशग्रणादिमितिभवित्।
विस्ताराद्यड्गुलान्येवं मिथोध्नान्ययसां भवेत्॥ ५५ ॥
बाणेभमार्गणेर्लब्धं द्रोणाद्यं मानमादिशोत्।
(अन्नादि राशि-व्यवहार) राशि-व्यवहारमें स्थूल,
मध्यम, सूक्ष्म, अन्रराशियेमें क्रमशः उनकी परिधिका
नवमांश, दशमांश ओर एकादशांश वेध होता हे ।
परिधिका षष्ठांश लेकर उसका वर्गं करना ओर
उसे वेधसे गुण देना चाहिये । उसका नाम ' घनहस्त'
होगा-। जलके व्यास (चोडाई)-से लंबाईको गुण
देना, फिर उसीको गहराईके अंगुल-मानसे गुण देना
तथा ३१०० से भाग देना चाहिये । इससे जलका
द्रोणात्मक मान ज्ञात होगाः॥ ५१-५२ रे॥ चौडाई
गहराई ओर लंबाईके अंगुलात्मक मानको परस्पर
गुण देना ओर उसमें ४०९६ से भाग देना तो अन्नका
द्रोणादि मान होगा । ऊंचाई, व्यास (चोडाई) ओर
लंबाईके अंगुलात्मके मानको परस्पर गुण देना ओर
११५० से भाग देना चाहिये; वह पत्थरका द्रोणात्मक
मान होगा|“ विस्तार आदिके अंगुलात्मक मानको
परस्पर गुणा करना चाहिये ओर ५८५ से भाग देना
चाहिये, तो लब्धि लोहेके द्रोणात्मक मानका सूचक
होती है ५ ॥५३-५५ लु ॥
१. उदाहरणकर लिये प्रश्र- समतल भूमिमें रखे हुए स्थूल धान्यकी परिधि यदि ६० हाथ है तो उसमें कितने घनहस्त (खारी-
प्रमाण) हगि ? तथा सक्षम धान्य ओर् मध्यम धान्यकी परिधि भी यदि ६० हाथ हों तो उनके अलग-अलग खारी-प्रमाण क्या होगि ?
उत्तर-क्रिया-- मूलोक्तं नियमके अनुसार परिधि-मानका दशमांश £ यह मध्यम धान्यका वेध हुआ परिधिके पष्ठांश १० के वर्गको
वेधस गुणा कटनेपर १००८६६०० घनहस्त-मान हए । एवं सूक्ष्म धान्यका वेध हः है। इससे परिधिके पष्टठंशके वर्ग १०० को गुण
देनेसे सक्षम धान्यक्र घनहस्त-मान ~<= ५४५ ~+ हुए । तथा स्थूल धान्यका वेध ‰ है। इससे परिधिके पष्टंशके वर्गको गुण देनेपर
स्थूल धान्यके घनहस्त-मान ~= ६६६ > हुए।
२. उदाहरणार्थं प्रश्र-किसी बावलीकी लंबाई ६२ हाथ, चौडाई २० हाथ ओर गहराई १० हाथ है तो बताओ, उस बावलीमें
कितने द्रोण जल है?
उत्तर- यहां मूलोक्त नियमके अनुसार इस प्रश्रको यों हल करना चाहिये- पहले हाथके मापको अंगुलके मापमें परिणत करनेके
लिये उसे २८ से गुणा करना चाहिये। ६२२४१४८८ अंगुल लंबाई है। २०८२४४८० अंगुल चौडाई टै। १०५२४२४० अगुल
गहराई है। इन तीनेकि परस्पर गुणनसे १४८८४८०२ ४०=१७१४१७६०० गुणनफल हआ। इसर्मे ३१०० से भाग दिया तो
“> १०९००-५५२९६ लब्थि हई । इतने ही द्रोण जल उस बावलीमें है।
३. उदाहरणके लिये प्रश्र-किसी अन-राशिकी लंबाई ६४ अंगुल, चौडाई ३२ अंगुल ओर ऊचाई १६ अंगुल है तो उसका
दरोणात्मक मान क्या है 2 अर्थात् वह अत्नरशि कितने द्रोण होगी ?
मूलक्थित नियमके अनुसार ६४५३२८१६ इनके परस्पर गुणनसे ३२७६८ गुणनफल हआ । इसमें ४०९६ से भाग देनेपर
-=८ लब्धि हुई । उत्तर निकला किं वह अन्नराशि ८ द्रोण है।
४. उदाहरणकत लिये प्रश्र-किसी पत्थरके टुकडेकी लंबाई २३, चौडाई २० ओर ऊंचाई १० अंगुल है तो वह पत्थर कितने
द्रोण वजनका है ? (उत्तर) मूलोक्त नियमके अनुसार लंबाई आदिको परस्पर गुणित किया--२३२०८१० तो गुणनफल ४६०० हुआ।
इसमे ११५० से भाग देनेपर लब्धि ४ हुई । अतः ४ द्रोण उस पत्थरके टुकडेका मान होगा ।
५. जैसे कि सीने पृरछा-किसी लोह-खण्डकी लंबाई ११७ अंगुल, चीड़ाई १०० अंगुल ओर ऊंचाई ५ अंगुल है तो उसका
वजन कितने द्रोण होगा ? (उत्तर) लंबाई आदिक परस्पर गुणित किया-११७८१००५५८५०० इस गुणनफलमें ५८५ से भाग दिया
><>-१०० लब्नि हुई । अतः १०० द्रोण उस लोहिका परिमाण है।
((-0. ८1114551 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २५५
दीपशङ्कूतलच्छिद्रघ्नः शङ्कर्भां भवेन्मुने ॥५६॥ | भाग देना तो छयाका मान होगा । शङ्क ओर दीपतलके
नरोनदीपकशिखोच्यभक्तो ह्यथ भोद्धूते। अन्तरसे शङ्कको गुण देना ओर छायासे भाग देना; फिर
शङ्कौ नृदीपाधश्छद्रघने दीपौच्च्यं नरान्विते॥५७॥ | लब्धि शङ्खको जोड़ देना तो दीपककी ऊचाई हो
विशङ्कदीपौच्चगुणा छाया शङ्कद्धूता भवेत्। जायगी । शङ्करहित दीपकको ऊचाईसे छायाको गुण
दीपशङ केवन्त चाथच्छायाग्रविवरघ्नभा ॥ ५८ ॥ | देना ओर शङ्कसे भाग देना ओर तो शङ्क तथा दीपकका
मानान्तरहता भूमिः स्यादथो भूनराहतिः। अन्तर सात होगा । छायाग्रके अन्तरसे छयाको गुण देना
प्रभाप्ता जायते दीपशिखौच्च्यं स्यात् त्रिरशिकात्॥५९॥ | छायाके प्रमाणान्तरसे भाग देना तो * भू' होगी । ' भू" ओर
एतत्संक्षेपतः प्रोक्तं गणिते परिकर्मकम्। शङ्कका घात (गुणा) करना ओर छयासे भाग देना तो
ग्रहमध्यादिकं वक्ष्ये गणिते नातिविस्तरात्॥ ६०॥ | दीपककी ऊंचाई होगी*। उपर्युक्त सव वातोंका ज्ञान
छाया-साधनमें प्रदीप ओर शङ्कतलका जो | तरैराशिकसे ही होता हे। यह परिकर्मगणित नि
अन्तर हो उससे शङ्कुको गुण देना ओर दीपकको | संक्षपसे कहा। अव ग्रहका मध्यादिक गणित वताता
ऊचाईमे शङ्कको घटाकर उससे उस गुणित शङ्कं ह, वह भी अधिक विस्तारसे नहीं ॥ ५६-६०॥
१. उदाहरणके लिये यह प्रश्न है- शङ्क ओर दीपके वचकौ भूमिका मान ३ हाथ ओर दीपककौ ऊंचाई ७/२ हाय दै
तो वारह अंगुल (१/२ हाथ) शङ्भुको छाया क्या होगी ?
इस क्षत्रमें * अ' से “उ' तक दीपकको ऊंचाई है। 'ग' से 'त' तक शङ्कुह। अ त्कः ग शङ्क आर दीपतलका
अन्तर हे ।
र यहा शङ्कुको शङ्कु -दीपान्तर-भूमि-मानसे गुणा किया तो १/२५३-३/२ यद गुणनफल
हुआ। फिर दीपकको ऊँचाईमें शङ्को घटाया तो -- ॐ -३ यदह शेष हुआ। पूर्वक्त
गुणनफल ३/२ में शङ्क घटायी हुई दीपककौ ऊंचाई ३ से भाग दिया तो १/२ लब्धि हुई
क न ग यही छायाका मान है।
अ त
२. यदि शद्ध १/२ हाथ, शद्भुदीपान्तर भृमि ३ हाथ अर् छाया १६ अगुल ह ता दरापको ऊचाई कितनी होगी 2 इस प्रश्रकरा
उत्तर यों है-शङ्कुको शड्ुदीपान्तरसे गुणा किया तो १/२५३-३/२ हंआ। इसमं छाया १६ अगुल अधात् २ हाथमे भाग दिया
तो ३/२२/३-३८२५३/२-९/४ हुआ। इसमं शद्ध १/२ को जौड् दिया तो ११८४-२ ३/४ हाथ दापकको ऊचाई हई ।
३. उपर्युक्त दीपककी ऊचाई ११/४ मसे शङ्कु १/२ को चाया तौ ११/४-१/२-९/४ रेष हुआ । इससे छायाको गुणित किया
तो ९/४५२/३-१/२ हेआ, इसमे शङ्कसे भाग दिया तो ३ लब्भि हई । अतः शङ्कुं ओर् दीपके बीचकी भूमि ३ हाथक्रौ टे।
४. अभ्यासार्थं प्रश्र-१२ अगुलके शङ्कौ छाया १२ अंगुल धी, फिर उसी शङ्कुको छायाग्रका ओर २ हाय बढ़ाकर रखनेसे
दूसरी छाया १६ अँगुल हई तो छायाग्र ओर दीपतलके बीचकी भूमिका मान कितना होगा ? तथा दीपकी ऊचाई कितनी होगी ?
उत्तर-यहा प्रथम शङ्ुसं दूसर शङ्कु्तक भूमिका मान २ हाथ। प्रधम छाया १२ हाध
द्वितीय छाया २/३ हाथ । शद्ध-अन्तर २ म॑ प्रथम छया १/२ को घटाकर शय ३/२ मं द्वितीय
छाया २/३ को जोडनेते १३/६ वह छायाग्रका अन्तर् हुआ । तथा छयान्तर २/३-१/२=१/
६ हआ । अब मूलोक्तं नियमके अनुसार प्रथम छाया १/२ को छायग्रान्तरसे गुणा क्रिया तौ
१/२५८१३/६१२८१२ हआ । इसमें छायान्तर १/६ से भाग दिया तौ १३.६२५६८१-१३/२
(या ६ १/२) यह प्रथम भृमिमान हुआ। इमी प्रकार् द्वितीय छाया २/३ मे छयाग्रान्तर प
१३८६ कौ गुणा करके छायान्तर् १/६ से भाग देनपर द्वितीय भूमिमान २६८३ दुआ। तथा
प्रथम भूमिमान १३/८२ कौ शद्धे गुणा कर गुणन्ठ्ल् १३८८ म॑ प्रथम दयाम भाग दैनेपर.&
लब्धि १३८२ यह दोपकको हुई । इसी प्रकार द्वितीय भूमिये भी दीपक्छकी ऊन्चाई् ^
इतनी हौ होती है।
॥
((-0. 1\॥८11114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
२५६
संक्षि नारदपुराण
युगमानं स्मृतं विप्र खचतुष्करदार्णवाः ।
तदशांशास्तु चत्वारः कृताख्यं पदमुच्यते ॥ ६१॥
त्रयस्त्रेता द्वापरो द्वौ कलिरेकः प्रकीर्तितः।
मनुः कृताब्दसहिता युगानामेकसप्ततिः ॥ ६२॥
विधर्दिने स्युर्विप्रन्र मनवस्तु चतुर्दश ।
तावत्येव निशा तस्य विप्रेन्द्र परिकीर्तिता ॥ ६३॥
स्वयम्भुवः सृष्िगतानब्दान् सम्पिण्ड्य नारद् ।
रखचरानयनं कार्यमथवेष्टयुगादितः ॥ ६४॥
विप्रवर! चारों युगोका सम्मिलित मान तेतालीस
लाख बीस हजार वर्ष बतलाया गया हे। उसके
दशांशमें चारका गुणा करनेपर सत्ययुग नामक पाद
होगा। (उसका मान १७ लाख २८ हजार वर्षं हे) ।
द्शांशमे तीनका गुणा करनेपर (१२९६००० वर्ष)
त्रेता नामक पाद होता हे। दशांशमें दोका गुणा
करनेपर (८६००० वर्ष) द्वापर नामक पाद होता
है ओर उक्त दशांशको एकगुना ही रखनेपर
(४३२००० वर्प) कलियुग नामक पाद कहा गया
हे । कृतान्दसहित (एक सत्ययुग अधिक) इकहत्तर
चतुर्युगका एक मन्वन्तर होता है ॥ ६१-६२॥
ब्रह्मन्! ब्रह्माजीके एक दिनमें चौदह मनु होते है
ओर उतने ही समयक उनको एक रात्रि होती
हे ॥ ६३ ॥ नारद ! ब्रह्माजीके वर्तमान कल्पमें जितने
वर्षं बीत गये हं, उन्हे एकत्र करके ग्रहानयन
(ग्रह-साधन) करना चाहिये । अथवा इष्ट युगादिसे
ग्रह-साधन करे ॥ ६४॥
युगे सूर्यज्ञशुक्राणां खचतुष्करदार्णवाः।
कुजार्किगुरूशीपघ्राणां भगणाः पूर्वयायिनाम्॥ ६५ ॥
इन्दो रसाग्रित्रित्रीषुसप्तभृधरमार्गणाः।
दस्रन्यष्टरस्राट्भाक्षिलोचनानि कुजस्य तु॥ ६६॥
बुधशीघ्रस्य शान्यर्तुखाद्वित्यद्धनगेन्दवः।
बृहस्पतेः रदस््राक्षिवेदषडवह्यस्तथा ॥ ६७॥
सितशीघ्रस्य षट्सपत्रियमाश्चिखभृधराः।
शनेर्भुजङ्कषट्पञ्चरसवेदनिशाकराः ॥ ६८ ॥
चन्द्रोच्यस्याग्निशून्याश्चिवसुसर्पार्णवा युगे।
वामं पातस्य वस्वग्नियमाश्चिशिखिदस्नकाः ॥ ६९॥
एक युगमे पूर्व दिशाकौ ओर चलते हुए सूर्य,
लुध ओर शुक्रके ४३२०००० 'भगण' होते हें ।
तथा मङ्गल, शनि ओर बृहस्पतिके शीघ्रोच्च भगण
भी उतने ही होते हे ॥ ६५ ॥ एक युगमें चनद्रमाके
भगण ५७७५३३३६ होते हे । भौमके २२९६८३२,
वबुधके शीघ्रोच्चके १७९३७०६०, वृहस्पतिके
३६२४२२०, शुक्रके शीप्रोच्चके ७०२२३७६, शनिके
१८४६५६८ तथा चन्द्रमाके उच्चके भगण ४८८२०३
होते हें । चन्द्रमाके पातकी वामगतिसम्बन्धी भगणोकी
संख्या २३२२२३८ हे ॥ ६६-६९॥
उदयादुदयं भानोरभूमिसावनवासराः।
वसुद्धयष्टाद्िरूपाद्भधसप्ताद्रितिथयो युगे ॥७०॥
षड्वह्धित्रिहुताशाङ्धतिथयश्चाधिमासकाः ।
तिधिक्षया यमा्थाश्चिद्धयष्टव्योमशराश्चिनः ॥ ७९॥
खचतुष्कसमुद्राष्टकुपच्च रविमासकाः।
षटूत्र्यग्नित्रयवेदाग्रिपञ्च शुश्रांशुमासकाः ॥७२॥
प्राग्गतेः सूर्यमन्दस्य कल्पे सप्ताष्टवह्मयः।
कोजस्य वेदखयमा बौधस्या्टर्तुवह्मयः ॥७३॥
खरखरन्ध्राणि जेवस्य शौक्रस्यार्थगुणेषवः।
गोऽग्रयः शनिमन्दस्य पातानामथ वामतः ॥ ७४॥
मनुदस््रास्तु कोजस्य बोधस्याष्टाष्टसागराः।
कृताद्रिचन्द्रा जेवस्य शौक्रस्याग्रिखनन्दकाः ॥७५॥
निपातस्य भगणाः कल्पे यमरसर्तवः।
सूर्यके एक उदयसे दूसरे उदयपर्यन्त जो
दिनका मान होता है, उसे भौमवासर या सावन
वासर कहते हे । वे एक महायुग (चतुर्युग) -मं
१५.७७९१७८२८ होते हं। (चान्द्र दिवस
१६०३००००८० होते ह) । अधिमास १५९३३३६
होते टै तथा तिधिक्षय २५०८२२५२ होते
हे ॥ ७०-७१॥ रविमासोकी संख्या ५१८४००००
हे। चादर मास ५३४३३३३६ हते है ॥७२॥ पूर्वाभिमुखं
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 8118811 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
गतिक क्रमसे एक कल्पमें सूर्यके मन्दोच्च भगण
२८७, मद्गलके मन्दोच्च भगण, २०४, वुधके
मन्दोच्च ३६८, गुरुके मन्दोच्च ९००, शुक्रके
मन्दोच्च ५३५ तथा शनिके मन्दोच्च भगण ३९
होते हेँं। अब मङ्गल आदि ग्रहोके पातोंकी
विलोमगति (पञश्चिम-गमन)-के अनुसार एक कल्पमें
होनेवाले भगण बताये जाते हें ॥७३-७४॥ भौमपातके
भगण २१४, वुधपातके भगण ४८८, गुरुपातके
भगण १७४, भृगुपातके भगण ९०३ तथा शनिपातके
भगण ६६२ होते हे ॥ ७५ र ॥
वर्तमानयुगे याता वत्सरा भगणाभिधाः ॥७६॥
मासीकृता युता मासेर्मधुशुक्लादिभिर्गतेः।
पृथक्स्थास्तेऽधिमासघ्नाः सूर्यमासविभाजिताः ॥७७॥
लब्धाधिमासकेर्यक्ता दिनीकृत्य दिनान्विता।
द्विष्ठास्तिधिक्षयाभ्यस्ताश्चाद्रवासरभाजिताः ॥ ७८ ॥
लब्धोनरात्रिरहिता लङ्कायामार्धरात्रिकः।
सावनो द्युगणः सूर्याद् दिनमासाव्दपास्ततः ॥७९॥
सप्तभिः क्षयितः शेषः सूर्यादयो वासरेश्वरः।
मासाब्ददिनसंख्यापतं द्वित्रिघं रूपसंयुतम्॥८०॥
सप्तोद्धूतावशेषौ तौ विज्ञेयौ मासवर्षपौ ।
वर्तमान युग (जिस युगम, जिस समयके
अहर्गण या ग्रहादिका ज्ञान करना हो उस समय)-
में सृष्ट्यादि काल या युगादिकालसे अबतक जितने
वर्षं बीत चुके हों, वे सूर्यके भगण होते हे।
२५७
भगणको वारहसे गुणा करके मास बनाना चाहिये ।
उसमे ' वर्तमान वर्षके" चेत्र शुक्ल प्रतिपदासे लेकर
वर्तमान मासतक जितने मास बीते हो, उनकी
संख्या जोड़कर योगफलको दो स्थानें रखना
चाहिये । द्वितीय स्थानमें रखे हुए मासगणको युगके
उपर्युक्त अधिमासोकी संख्यासे गुणा करके गुणनफलपें
युगके सूर्यमासोको संख्यासे भाग दे। फिर जो
लब्धि हो, उसे अधिमासकी संख्या माने ओर
उसको प्रथम स्थानस्थित मासगणमें जोडे। (योगफल
बीते हुए चान्द्रमासोंकी संख्याका सूचक होता है)
उस संख्याको तीससे गुणा करे (तो गुणनफल
तिथि-संख्याका सूचक होता हे), उसमें वर्तमान
मासको शुक्ल प्रतिपदासे ईष्टतिथितककी संख्या
जोड, (जोडनेसे चान्द्र दिनकी संख्या ज्ञात होती टै)
इसको भी दो स्थानेमें रखे । दूसरे स्थानमें स्थित
संख्याको युगके लिये कथित तिधिक्षय-संख्यासे
गुणा करे। गुणनफलमें युगकी चान्द्र दिन (तिथि)
संख्याके द्वारा भाग दे। जो लब्धि हो, वही
तिधिक्षय-संख्या है, उसको प्रथम स्थानमें स्थित
चान्द्र दिन-संख्या्मेसे घटा दे तो अभीष्ट दिनका
लंकार्धर्रिकालिक सावन दिनगण (अहर्गण) होता
हैः । इससे दिनपति, मासपति ओर वर्पपतिका जान
करे ॥७६--७९॥ यथा-दिनगणमें ७ से भाग
देनेपर शेष वचे हुए १ आदि संख्याके अनुसार रवि
१. इस प्रकार अहर्गण-साधनमें कदाचित् एक दिन अधिक या न्यून भी होता है, उस स्थितिमं १ घटाकर या
जोड़कर अहर्गण ग्रहण करे ।
कलियुगादिसे अहर्गणका उदाहरण-शाके १८७५ कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा शुक्रवारको अहर्गण बनाना टै तो
कलियुगादिसे गत युधिष्ठिरसंवत्की वर्षसंख्या ३१७९ गे शके १८७५ जोड्नेसे ५०५४ हुआ; इसको १२ गुणा करनेसे
६०६४८ हुआ। इसमें चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे गत मास-संख्या ७ जोड्नेपर ६०६५५ सौर मासरगण हृए। इसको पृथक्
युगको अधिमास-संख्या १५९३३३६ से गुणा करनेपर ९६६४३७९५०८० हुआ। इसमं युगकी सौर माससंख्या
५१८४०००० से भाग टेनेपर् लब्धि अधिमास- संख्या १८६४ को पृथक्स्थित ओर मासगण ६०६५५ मं जोड्नेमे ६२५१९
यह चान्द्र मास-संख्या हुई । इसको ३० से गुणा करके गुणनफलमे तिथिसंख्या १५ जोडुनेसे १८५५५८५ यह चादर
दिनसंख्या हई । इसको युगकी क्षय-तिधिसंख्या २५०८२२५२ सं गुणा करके गुणनफल ४७०८३८९५६ १७४२० में युगकरी
चादर दिनसंख्या १६०३००००८० से भाग देनेपर लब्धि तिधिक्षयसंख्या २९३४५ को उपर्युक्तं चादर दिनसंख्या
१८७५५८५ में चटानेसे १८४६२३८ अहर्गण हुए । इसमें ७ का भाग देनेसे २ शेप बचते दै; जिससे शुक्र आदि गणनाके
अनुसार शनिवार आता है; किंतु होना चाहिये १ शेष (शुक्रवार); इसलिये इसमें १ घटाकर वास्तविक अहर्गण
१८४६२३७ हआ। प्रस्तुत उदाहरणर्मे पूर्णिमाका क्षय हनेके कारण १ दिनका अन्तरं पड़ा दै ।
((-0. 1/८11114<511॥ 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
२५८
आदि वारपति समडने चाहिये । तथा दिनगणमें ३०
से भाग देकर लब्धिको २ से गुणा करके गुणनफलमें
१ जोड़ दे। फिर उसमें ७ से भाग देकर १ आदि
शेष होनेपर रवि आदि मासपति समञ्च । इसी प्रकार
दिनगणमें ३६० से भाग देकर लब्धिको ३ से गुणा
करके गुणनफलत्नमें १ जोड़, फिर उसमें ७ से भाग
देनेपर १ आदि शेष संख्याके अनुसार रवि आदि
' वर्तमान ' वर्षपति होते हैः ॥ ८०-~॥
ग्रहस्य भगणाभ्यस्तो दिनराशिः कुवासररेः ॥८१९॥
विभाजितो मध्यगत्या भगणादिर्ग्रहो भवेत्।
एवं स्वशीघ्रमन्दोच्या ये प्रोक्ताः पूर्वयायिनः॥ ८२॥
विलोमगतयः पातास्तद्वच्यक्राद् विशोधिताः।
( मध्यमग्रहज्ञान )- युगकेलिये कथित भगणकी
संख्यासे दिनगणको गुणा करे । गुणनफलमें युगकी
कुदिन (सावनदिन)-संख्यासे भाग देनेपर भगणादिः
ग्रह लंकार्धरात्रिकालिक होता हे। इसी प्रकार
पूर्वाभिमुख गतिवाले जो शीप्रोच्च ओर मन्दोच्च कहे
संक्षिप्त नारदपुराण
गये हे, उनके भगणके द्वारा उनका भी साधन होता
हे* । विलोम (पश्चिमाभिमुख) गतिवाले जो ग्रहोके
पातभगण कहे गये हँ, उनके द्वारा इसी प्रकार
जो पात सिद्ध हों, उनको १२ राशिमें घटानेसे
शेषको मेषादि-क्रमसे राश्यादिपात समञ्ना
चाहिये*॥८१-८२ त ॥
योजनानि शतान्यष्टौ भूकणों द्विगुणानि तु॥८३॥
तद्वर्गतो दशगुणात् पदं भूपरिधिभ्वित्।
लम्बज्याघ्नस्तिजीवाप्तः स्फुटो भूपरिधिः स्वकः ॥ ८४॥
( भूपरिधिप्रमाण )- पृथ्वीका व्यास १६००
योजन हे । इस (१६००) -के वर्गको १० से गुणा करके
गुणनफलका मूल भूमध्यपरिधि होता है; अर्थात्
वर्गमूलको जो संख्या हो, उतने योजनको पृथ्वीको
परिधि जाननी चाहिये । इस भूमध्य-परिधिकी संख्याक
अपने-अपने लम्बांश-ज्यासे गुणा करके उसमें त्रिज्या
(३४३८) -से भाग देकर जो लब्धि हो, वह स्पष्ट
भूपरिधिकौ योजन-संख्या होती है* ॥ ८३-८४॥
१. कलियुगके आदिमे शुक्रवार था, इसलिये कलियुगादि अहर्गणमें ७ का भाग देनेसे १ आदि शेष होनेपर
शुक्र आदि वारपति होते ह । मासपति जाननेके लिये अहर्गण १८४६२३७ में ३० से भाग देकर लब्धि ६१५४१
को २ से गुणा करनेपर १२३०८२ हआ। इसमे १ जोड़कर ७ का भाग देनेसे शेष २ रहे, अतः शुक्रसे दवितीय शनि
वर्तमान मासपति हुआ।
एवं अहर्गणमें ३६० का भाग देकर लब्धि ५१२८ को ३ से गुणा कर गुणनफल १५३८४ मे १ जोड़कर १५३८५
हआ। इसमे ७ का भाग देनेसे शेष ६ रहे; अतः शक्रादि गणनासे बुध वर्तमान वर्षपति हआ।
२. प्रथम लव्धि.भगण होती है । शेषको १२ से गुणा करके गुणनफलपें युग-कुदिनसे भाग देनेपर जो लब्धि होगी,
वह राशि है। पुनः शेषको ३० से गुणा करके गुणनफलमें युग-कुदिनसे भाग देनेपर जो लब्धि हो वह अंश है। अंश-
शेष ६० से गुणा करके गुणनफलमें कुदिनका भाग देनेसे लब्धि कला होती है। कला-शेषको ६० से गुणा करके पूर्ववत्
युग-कुदिनसे भाग देनेपर जो लब्धि हो, वह विकला होती है। इनमें भगणको छोडकर राश्यादि ही ग्रह कहलाता है । इस
प्रकार मध्यम ग्रह होता है।
३. उदाहरण- जैसे युगके सूर्यभगण ४३२०००० को अहर्गण १८४६२३७ से गुणा करनेपर ७९७५.७४३८४००००
हुआ। इसमें युगके कुदिन १५७७९१७८२८ से भाग देनेपर लब्ध भगण ५०५४ हुए। शेष ९४७१३७२८८ को १२ से
गुणा कर गुणनफल ११३६५६४७८५६ में कुदिनका भाग देनेसे लब्धि राशि ७ हुई । राशिशेष ३२०२२२६६० कौ ३०
से गुणा करके गुणनफल ९६०६६७९८०० में कुदिनका भाग देनेसे लब्ध अंश ६ हआ। अंश-शेष १३९१७२८३२ को
६० से गुणा करके गुणनफल ८३५०३६९९२० में कुदिनसे भाग देनेपर लब्धि कला ५ हई । कलाशेष ४६०७८०७८०
को ६० से गुणा कर गुणनफल २७६४६८४६८०० मेँ कुदिनका भाग देनेसे लब्धि विकला १८ हुई । एवं भगण प्रयोजनं
नहीं आता है, इसलिये उसको छोड़कर राश्यादि फल ७।६।५1। १८ यह लङ्कार्धरत्रिकालिक मध्यम सूर्य हुआ। इसी
प्रकार अपने-अपने भगणद्वारा सब ग्रह, उच्च ओर पातका साधन होता है । तथा पातकी विपरीत गति होती है। अहर्गणद्वाय
साधित पातको १२ राशिमं घटानेसे शेषको मेषादि-क्रमसे राश्यादि-पात समञ्चना चाहिये, यह बात अगे कही जायगी।
४. इस प्रकार साधित ग्रहरेखादेशीय होता है। इसमें आगे कहे हृए देशान्तर- संस्कार करनेसे स्वदेशीय मध्यम ग्रह होता है।
५. यथधा- १६०० के वर्गको १० गुना करनेसे २,५६,००००० हुआ। इसका मूल (स्वल्पान्तरसे) ५०५८ हुआ। इतना ही
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/81185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्व भाग-द्वितीय पाद
२५९
तेन देशान्तराभ्यस्ता ग्रहभुक्तिर्विभाजिता।
कलादि तत्फलं प्राच्यां ग्रहेभ्यः परिशोधयेत्॥ ८५ ॥
रेखाप्रतीचीसंस्थाने प्रक्षिपेत् स्युः स्वदेशजा : ।
राक्षसालयदेवौकःशेलयोर्मध्यसूत्रगाः ॥ ८६॥
अवन्तिकारोहितकं यथा सन्निहितं सरः।
वारप्रवृत्तिः प्राग्देशे क्षपार्धऽभ्यधिके भवेत्॥ ८७॥
तदेशान्तरनाडीभिः पश्चादूने विनिर्दिशेत्
( ग्रहोमें देशान्तर-संस्कार )- ग्रहकी कलादि
मध्यम गतिको देशान्तर-योजन (रेखादेशसे जितने
योजन पूर्व या पश्चिम अपना स्थान हो उस) -से गुणा
करके गुणनफलमें ' स्पष्टभूपरिधि-योजन' के द्वारा
भाग देनेपर जो लब्धि हो, वह कला आदि है । उस
लब्धिको रेखासे पूर्व देशमें पूर्वसाधित ग्रहमें घटानेसे
ओर पश्चिम देशमें जोडनेसे स्वस्थानीय अर्धरात्रिकालिक
ग्रह होता हे ॥८५-५॥
(रेखा-देश )- लङ्कासे सुमेरुपर्वतपर्यन्त
याम्योत्तर-रेखामे जो-जो देश (स्थान) हे, वे रेखा-
देश कहलाते हें । जेसे उज्जयिनी, रोहितक, कुरुक्षेत्र
आदि ॥ ८६ ॥
( वार-प्रवृत्ति )-- भूमध्यरेखासे पूर्वदेशमें रखा-
योजन स्थूलमानसे मध्यभूपरिधिका प्रमाण है।
देशीय मध्यरात्रिसे, देशान्तर घटीतुल्य पीछे ओर
रेखासे पश्चिम देशमें मध्यरात्रिसे देशान्तर घरीतुल्य
पूर्वं ही वार-प्रवृत्ति (रवि-आदि वारोका आरम्भ)
होती हे ॥ ८७२६॥
इष्टनाडीगुणा भुक्तिः षष्ट्या भक्ता कलादिकम्।॥ ८८ ॥
गते शेोद्धयं तथा योज्यं गम्ये तात्कालिको ग्रह।
भयक्रलिप्ताशीत्यंशं परमं दक्षिणोत्तरम् ॥ ८९ ॥
विक्षिप्यते स्वपातेन स्वक्रान्त्यन्तादनुष्णगुः।
तन्नवांशं द्विगुणितं जीवस्त्रिगुणितं कुजः॥ ९०॥
बुधशुक्रार्कजाः पातेर्विक्षिप्यन्ते चतुर्गणम्।
( इष्टकालमें मध्यम ग्रह जाननेकी विधि )-
मध्यरात्रिसे जितनी घड़ी बाद ग्रह बनाना हो, उस
संख्यासे ग्रहकी कलादि गतिको गुणा करके
गुणनफलमे ६० से भाग देकर लच्धितुल्य कलादि
फलको पूर्वसाधित ग्रहमं जोडनेसे तथा जितनी
घडी मध्यरात्रिसे पूर्वं ग्रह बनाना हो, उतनी
संख्यासे गतिको गुणा करके गुणनफलमं ६०ये
भाग देकर कलादि फलको पूर्वसाधित ग्रहमं
घटानेसे इषटकालिक ग्रह होता है२॥ ८८ ~॥
( चन्द्रादि ग्रहोके परम विक्षेप )- भचक्रकला
[1 र कर रो
[न
गोरखपुरमें स्पष्ट भूपरिधि-साधन- यदि लम्बांश ६३। १५. है, तो उसकी ज्या आगे ९३, ९७ श्लोके वर्णित् रीतिके
अनुसार ३०७० हई । मध्यभूपरिधि ५०५८ को गोरपुरकौ लम्बज्या ३०७० से गुणा कर् गुणनफल १५५२८०६० मं त्रिज्या
३४२८ का भाग देनेसे लब्धि ४५१६ स्पष्ट भूपरिधि हुई ।
देशान्तर-कालज्ञान इस प्रकार होता है-गणितद्वारा सिद्ध चद्रग्रहण-स्पर्शकालसे जितने घडी -पलक पश्चात् स्पशं
होता हे, उतनी ही घड़ीको रेखादेशसे "पूर्वं देशान्तर" तथा जितनी घडी पहले ग्रहणका स्पशं होता टे, उतना घड़ाका
' पश्चिम देशान्तर" समस्मा जाता है। गोरखपुरमे इस प्रकारसे १ घड़ी ओर १३ पल पूर्वदेशान्तर है। ध
इस देशान्तर-पलसे देशान्तर-योजनका ज्ञान त्रैराशिकसे होता है-जैसे ३६०० पलमें स्पष्ट भृपरिधियोजन ८५१६ टै ती
देशान्तर-पलमें कितना होगा ? इस प्रकार गोरखपुरमे देशान्तर ७३ पलद्वाय रेखादेशसे देशान्तर-योजन दन
च्वि चे,
इसके द्वारा ग्रहमं देशान्तरसंस्कार होता है।
४५१६», ७३ <
~ =९९१ द्ुजा।
रेखादेशसे गोरखपुरके पूर्व देशान्तर-योजन ९१ को सूर्यकी मध्यगतिकला ५९। ८ से गुणा कर् गुणनफल ५३८१ ।
८ मं स्पष्ट भृपरिधि- योजन ४५१६ से भाग देनेपर लब्धि कलादि १। ११ हई । इसको अहर्गणसाधित मध्यम सुय 51
६। ५। १८ में पूर्वं देशान्तर होनेके कारण घटानेसे ७। ६। ४1 ७ यह मध्यरात्रिकालिक मध्यम सूर्यं हुआ।
१. पात (राह) मं देशान्तरसंस्कार विपरीत होता है!
२. रेखा-देशके मध्यरात्रि-समयसे ही सृ्टिका आरम्भ माना गया है; इसलिये रेखा-देशके मध्यरात्रि-समयमं हौ
वारप्रवेश होता है।
३. मान लीजिये, शुक्रवार मध्यरत्रिकालिक ग्रह जानकर अग्रिम प्रातः छः बजेका मध्यम सूर्य बनाना है तो-दष्काल ६
धेय (१५ बद) हृजा। इसलिये सू्धक कलादि गत ५९। ८ कर ९५ स गुणा क्के ६० कतर भाग देनेसे लब्धि १४ कला
८७ विकलाको मध्यरत्रिके सूर्य ७। ६। ८। ७ मं जोट्नेसे ७। ६। १८। ५४- यह शनिवारके प्रातः छ: वजेका
मध्यम सूर्य हा।
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 81188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 6810011
२६०
(२१६००) -के ८० वों भाग (२७०) कलापर्यन्त
क्रान्तिवृत्त (सूर्यके मार्ग) -से परम दक्षिण ओर उत्तर
चन्द्रमा विक्षिप्त होता (हटता) हे । एवं गुरु ६० कला,
मद्धल ९० कला, बुध, शुक्र ओर शनि-ये तीनों
१२० कलापर्यन्त ऋ्रान्तिवृत्तसे दक्षिण ओर उत्तर हटते
रहते है ॥ ८९-९०-॥
राशिलिप्ताष्टमो भागः प्रथमं ज्याद्धमुच्यते ॥ ९९॥
तत्तद् विभक्तलब्धोनमिश्रितं तद् द्वितीयकम्। `
आद्यो नेव क्रमात् पिण्डान् भक्त्वा लव्धोनसंयुताः ।। ९२॥
खण्डकाः स्युश्चतुर्विश्यार्दधपण्डाः क्रमादमी ।
परमापक्रमज्या तु सप्तरन्धगुणेन्दवः॥९३॥
तदरुणा ज्या त्रिजीवाप्ता तच्चापं क्रान्तिरुच्यते।
( अभीष्ट जीवास्ाधनके लिये उपयोगी २४
जीवासाधन )- ९ राशि-कला १८०० का आटा
भाग (२२५ कला) प्रथम जीवार्धः होता हे। उस
संक्षिप्त नारदपुराण
(प्रथम जीवार्ध) से प्रथम जीवार्धमिं भाग देकर
लव्धिको प्रथम जीवार्धमें ही घटाकर शेष (प्रथमखण्ड)
को प्रथम जीवार्धमें ही जोड्नेसे द्वितीय जीवार्ध
होता हे। इसी प्रकार प्रथम जीवासे ही द्वितीय
जीवामें भाग देकर लब्धिको द्वितीय खण्डमें घटाकर
शेषको द्वितीय जीवार्धमे जोड़नेसे तृतीय जीवार्धं
होता हे। इसी तरह आगे भी क्रिया करनेसे क्रमशः
२४ जीवार्धं सिद्धः होते हे ॥ ९१-९२ म) ॥
इस प्रकार सूर्यकी परमक्रान्तिज्या १३९७ होती
हे । इस (परमक्रान्तिज्या) -से ग्रहकी ज्या ( भुजज्या)
को गुणा करके त्रिज्याके द्वारा भाग देनेसे ' इष्टक्रान्ति-
ज्या" होती हे। उसका चाप बनानेसे !इष्टक्रान्ति'
(मध्यमा) कहलाती ह ॥ ९३द्॥
ग्रह संशोध्य मन्दोच्यात् तथा ्ीप्राद्विशोध्य च ॥ ९४॥
शेषं केन्द्रपदं तस्माद्धुजज्या कोटिरेव च।
१. सूर्य ओर अन्य ग्रहोके मार्गेका योगस्थान ( चौराहा) पात कहलाता है । जव ग्रह अपने मार्गपर चलता हुआ पात-स्थानमें
आता हे, उस समय वह क्रान्तिवृत्त होनेके कारण अपने स्थानम ही होता हे; क्योकि सव ग्रहोकि स्थान क्रान्तिवृत्तमे ही होते हें!
पाते-स्थानसे आगे-पीट्े होनेपर क्रान्तिवृत्तसे जितनी दूर विक्षिप्त होते (हटते) है, उतना उस ग्रहका “ विक्षेप (शर) कहलाता है।
सूर्यके मार्गको " क्रान्तिमण्डल' ओर अन्य ग्रटकरि मार्गक्रो उन-उन ग्रोक्ता ' विमण्डल' कहते हें तथा चनद्रमाके पातस्थानको ही “ राहु"
ओर "केतु" कहते है।
२. जीवा, जया, शिञ्जिनी, मौर्वी गुण, रज्ु-ये पर्यायवाचक शब्द
टै । ज्यौतिपमें चाप ओर जीवाके द्वारा ही ग्रहगणित होता है; क्योकि
ग्रहका मार्ग वृत्ताकार है। वृत्त परिधिका खण्ड चाप कहलाता है। जेसे
अ, ग, प, ल, अ यह वर्तुल मार्गं वृत्तपरिधि है। इसमें अ-क, अ-
ग आदि परिधिखण्ड चाप कहलाते ह । जैसे अ, इ, क चापरहैतो
अ, क सरलरेखा अ, इ, क, चापकी पूर्णज्या कहलाती है तथा अ, त,
सरलरेखा अ, इ, क चापकौ उत््रमज्या तथा क, त रेखा अ, इ, क
चापका जीवार्धं वा ज्यार्धं कहलाती है । इसीको अर्ध्या भी कहते हे ।
गणितमे अर्धज्या (ज्यार्ध)-से ही काम लिया जाता है; इसलिये
ज्योतिपग्रन्थमे ज्यार्धको ही ज्या-जीवा= मौर्वीं आदि कहते ह । वे जीवार्ध
या जीवा वृत्तके चतुर्थशमें ही वनते ट । इस वृत्तके चतर्थाशको पद कहा गया है । अतः सम्पूर्णं वृत्तम ४ पद होते हं । १,
३ विषम ओर २, ८ सम पद कहलाते हैं!
वृत्तकी सम्पूर्णं परिधिमें १२ राशि या ३६० अंण होते है; इसलिये एक-एक पद्मे तीन-तीन राशि या ९० अंश होते है।
प्रथम ओर तृतीय पदमं गत चापको भुज ओर गम्य चापकर कोरि कहते है तथा द्वितीय ओर चतुर्थं पदमे गत चापको कोटि ओर
गम्य चापको ही भुज कहते हं । जसे--प्रथम पदं "अ क"=भुज ओर "क ग^=कोरि है तथा द्वितीय पदमे ग च~ कोटि ओर
च प~भुज है । प्रत्येक पदमं चापको ९० अंशमें घटानेसे शेप उस चापकी कोरि होती है; इसलिये क ग चाप~=अ क चापकों
कोरि, तथा कन -रल रेखा कोरिज्या हे एवं सम (द्वितीय) पदममे च र भुजज्या ओर च व कोरिज्या कटलाती है । इसी क्रमसं
तृतीय ओर चतुर्थं पदमे भुजज्या ओर कारिज्या समञ्चनी चादिये । केवल "ज्या" शब्दसे सर्वत्र भुजग्या ही समञ्ची जाती है।
३. उदराहरण-जसे--प्रथमज्या २२५ प्रथमज्या २२५ से भाग देकर लब्धि १ कौ प्रथमज्यामं घराकर २२४ (प्रथम
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
२६१
गताद्धुजज्याविषमे गम्यात् कोटिः पदे भवेत्॥ ९५॥
युग्मे तु गम्याद्राहुज्या कोटिज्या तु गताद् भवेत्।
लिप्तास्ततत्वयमेरभक्ता लब्धं ज्यापिण्डकं गतम्॥ ९६ ॥
गतगम्यान्तराभ्यस्तं विभजेत्तत्वलोचनेः।
तदवाप्षफलं योज्यं ज्यापिण्डे गतसंज्ञके ॥ ९७॥
स्यात्क्रमज्या विधिरयमुत्क्रमज्यास्वपि स्मृतः।
ज्यां प्रोह्य शेषं तत्त्वाश्चिहतं तद्विवरोग्दूतम्॥ ९८ ॥
संख्याततत्वा्िसंव्गे संयोज्य धनुरुच्यते।
( * भुजज्या ' ओर' कोटिज्या ' बनानेको रीति-- )
ग्रहोको अपने-अपने मन्दोच्चमे घटानेसे शेष उस ग्रहका
"मन्द् केन्द्र' तथा शीघ्रोच्चमें घटानेसे शेष उस ग्रहका
“शीघ्र केन्द्र" कहलाता है। उस राश्यादि केन्द्रक
' भुजज्या' ओर ` कोरिज्या' बनानी चाहिये । विषम (१,
३) पदमे "गत ' चापकी जीवा भुजज्या ओर “गम्य!
चापकी जीवा कोरिज्या कहलाती है ।* सम (२, ४)
पदमे" गम्य' चापको जीवा" भुजज्या' ओर' गत" चापकी
जीवा 'कोरिज्या' होती हैः ॥ ९४-९५ ले ॥
( इष्टज्या-साधन-विधि )- जितने राश्यादि
चापकाो जीवा बनाना हो, उसकी कला बनाकर उसमें
२२५ से भाग देकर जो लब्धि हो, उतनी संख्या (सिद्ध
२४ ज्या-पिण्डमें) गत ज्यापिण्डकी संख्या समञ्चे।
शेष कलाको ' गत ज्या' ओर ' गम्य ज्या ' के अन्तरसे
गुणा करके २२५ से भाग देकर लब्ध कलादिको
गत ज्या'-पिण्डमें जोडनेसे "अभीष्ट ज्या' होती
ह । 'उत््रमज्या' भी इसी विधिसे बनायी जाती
हेर ॥ ९६-९७ ॥
( जीवासे चापवनानेकी विधि )- इष जीवाकीं
कलाम सिद्ध जीवापिण्डोमेंसे जितनी संख्यावाली
जीवा घटे, उसको घटाना चाहिये । शेप कलाको २२५
से गुणां करके गुणनफलमें गत, गम्य जीवाके
अन्तरसे भाग देकर जो लब्धि कलादि हो, उसको
घटायी हई सिद्ध-जीवा-संख्यासे गुणित २२५ में
जोडनेसे इष्टज्याका चाप होता है“ ॥ ९८ =|
रवेर्मन्दपरिध्यंशा मनवः शीतगो रदाः॥ ९९॥
खण्ड) हआ। इसको प्रथमज्यार्मे जोड़नेसे २२४+२२५-४४९ यह द्वितीय जीवा हई । द्वितीय जीवा ४४९ म प्रथमज्या २२५ का भाग
देकर लब्धि २ को प्रथम खण्ड २२४ मेँ घटनेसे शेष २२२ द्वितीय खण्ड हुआ; इसको द्वितीय जीवापें जोटनेसे ६७१ तृतीय जीवा
हई । फिर तृतीय जीवाम प्रथमज्यासे भाग देकर लब्धि ३ को द्वितीय खण्डे घटनेसे शेष २१९ तृतीय खण्ड हुआ। इसको वृतीय जीवा
६७१ मे जोडनेसे ८९० यह चतुर्थ जीवा हई । इसी प्रकार आगे भी साधन करनेषर निम्द्भित सिद्ध २४ ज्यार्धकी कलार होती
है- २२५, ४४९, ६७१, ८९०, ११०५. १३१५, १५२०, १७१९, १९१०, २०९३, २२६५, २४३१, २५८५. २५७२८, २८५९, २९५८,
३०८४, ३१७७, २२५६, ३३२१, ३३७२, ३४०९, ३४३१ तथा ३४३८। ये १ पदमे (३ रारिमें) २४ च्यार्ध-पिण्ड ईह ।
१. ३ राशि ८९० अंश)-का १ पद होता है । उस पदमे ' गत" चापको घटानेसे शेष "गम्य चाप कलाता है । जरे
सूर्यराश्यादि ८। १०। १५1 २५ है, उसका मन्दोच्च २। १७। ३५। ४० टै तौ मन्दोच्चमे सूर्यको घटानसे राश्यादि शेष ६।
७। १७। १५ केन्द्र हुआ। वहाँ केन्द्र ६ राशिसे अधिक दै, अतः तृतीय (विषम) पदमे पड़ा। इसलिये तृतीय पदक गतांशादि
७1 १७। १५ को ९० अशमे घटनेसे अंशादि ८२1 ४२। ४५- ये "गम्य ' अंशादि हुए।
२. जैसे स्वल्पान्तरसे सूर्यका मन्दोच्च २। १७।४८।५४ है । इसमें मध्यम सूयं ७।६।१८।५८ को घटानेते रोष ७।११।
३०। ० यह मन्द केन्द्र हुआ। यह ६ राशिसे अधिक होनेके कारण तुलादिमें पड़ा तथा तृतीय पदमे होनेके कारण इसर्मे ६ रशि
चटाकर शेष १। ११।३०। ० यह भुज हुआ। इसको ९० अय (३ राशि) मे घटानेसे शेष १1 १८। ३०। ° यह कोटि दुई ।
भुजज्या वनानेके लिये अगे कही हई रीतिसे राश्यादि भुज १। ११। ३० करौ कला वनानेसे २४९० कला दुई । इसमे
२२५ से भाग देनेपर् लव्थि गतज्या ११ दुई । शेष २५ कौ गतज्या, एष्यज्या (१९ वीं ओर १२ वी ज्या) -के अन्तर् (२४३१-
२२६७) = १६४ से गुणा करनेपर २४६० ह आ। इसमे २२५ का भाग देनेपर लब्ि ११ कलाको गतज्या २२६७ मं जोदुनेमे
सूर्यकी भुजज्या २२७८ हई ! इसी प्रकार कोटिकौ कलाद्रारा कोटिज्या २६५५ दुई ।
३. जैसे परम क्रान्ति २४ अंशक्रौ कला १४४० में २२५ का भाग दैनेसे लब्ि £ 'गतज्या^- संख्यः हुई, जिसका प्रमाण
१३१५ है । शेप कला ९० कौ "गत्तज्या' ' एष्यज्या क अन्तर (१५२०-१३१५-२०५)-म गुणा कर् उसमं २२५ से भाग दैनेषर्
लब्धि ८२ को गतज्या १३१५ मँ जोडुनेसे १३९० यह परम करानि (२४ अंश)-की ज्या हुई। ४
८. जैसे परमक्रान्तिज्याका चापर वनाना टै, तो परमक्रानिग्या १३९७ मं कथित छदी जीवः १३१५ को घटाकर
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
२६२
युग्मान्ते विषमान्ते तु नखलिपोनितास्तयोः।
युग्मान्तेऽर्थाद्रयः खराग्निसुराः सूर्या नवार्णवाः ॥ ९००॥
ओजे द्वयगा वसुयमा रदा रुद्रा गजाब्धय ।
कुजादीनामतः शेघ्या युग्मान्तेऽर्थाग्रिदस्रकाः ॥ १०९॥
गुणाग्निचन्द्रा खनगा द्विरसाक्षीणि गोऽग्रयः।
ओजान्ते द्वित्रियमला द्विविश्चै यमपर्वताः॥ १०२॥
रर्तुदस्रा वियद्ेदाः शीपघ्रकर्मणि कीर्तिताः ।
ओजयुग्मान्तरगुणा भुजज्या त्रिज्ययोद्धूता ॥ १०३॥
युग्मवृत्ते धनर्ण स्यादोजादूनाधिके स्फुटम्
(रवि ओर चन्द्रमाके मन्दपरिध्यंश )- समपदके
अन्तमं सूर्यके १४ अंश ओर चन्द्रमाके ३२ अंश
मन्दपरिधि मान होते ह ओर विषमपदके अन्तमें २०
कला कम अर्थात् सूर्यके १३। ४० ओर चन्द्रमाके
३१।४० मन्दपरिध्यंश हैँ ॥ ९९-६॥
( मङलादि ग्रहोकी मन्द ओर शीघ्र परिधि)-
समपदान्तमे मद्गलके ७५, वुधके ३०, गुरुके ३३,
शुक्रके १२ ओर शनिके ४९ तथा विषमपदान्तमें
म्गलके ७२, बुधके २८, गुरुके ३२, शुक्रके ११
ओर शनिके ४८ मन्द परिध्यंश हें । इसी प्रकार
समपदके अन्तम मद्धलके २३५, बुधके १३३,
गुरुके ७०, शुक्रके २६२ ओर शनिके ३९ तथा
विपमपदान्तमे म द्लके २३२, बुधके १३२, गुरुके
७२, शुक्रके २६० ओर शनिके ४० शीघ्र परिध्यंश
कटे गये हैं ॥ १००-१०२ ३े॥
( अभीष्ट स्थानमें परिधिसाधन-- ) अभीष्ट
स्थानमे मन्द या शीघ्र परिधि बनानी हो तो उस ग्रहकों
भुजज्याको विषम-समपदान्त-परिधिके अन्तरसे गुणा
करके गुणनफलमें त्रिज्या (३४३८) -से भाग देकर
जो अंशादि लब्धि हो, उसको समपदान्त-परिधिमें
संक्षिप्त नारदपुराण
जोड़ने या घटानेसे (विषमपदान्तसे समपदान्त कम
हो तो जोड़ने अन्यथा घटानेसे ) इष्टस्थानमें स्पष्ट मन्द्
या शीघ्र परिध्यंश होते ९ ॥ १०३द॥
तद्रुणे भुजकोटिज्ये भगणांशविभाजिते ।॥ १०४॥
तद्धूजज्याफलधनुर्मान्दं लिप्तादिकं फलम्।
शेष्यं कोटिफलं केन्द्रे मकरादौ धनं स्मृतम्॥१०५॥
संशोध्रयं तुत्रिजीवायांकरक्यदो कोटिजंफलम्।
तद्राहुफलवर्गेक्यान्मूलं कर्णश्चलाभिधः ॥९०६॥
त्रिज्याभ्यस्तं भुजफलं चलकर्णविभाजितम्।
लब्धस्य चापं लिप्तादिफलं शेप्र्यमिदं स्मृतम्॥९०७॥
एतदाद्ये कुजादीनां चतुर्थे चेव कर्मणि।
मान्दं कर्मेकमर्कैन्द्रो भोमादीनामथोच्यते ९०८ ॥
ष्यं मान्दं पुनर्मान्दं शष्पं चत्वार्यनुक्रमात्।
( भुजफल-कोटिफल-साधन-- ) इस प्रकार
साधित स्पष्ट परिधिसे ग्रहकौी “ भुजज्या' ओर
"कोरिज्या' को पृथक्-पृथक् गुणा करके भगणांश
(३६०) -से भाग देकर लब्ध (भुजज्यासे) भुजफल
ओर (कोरिज्यासे) कोरटिफल होते हैँ । एवं मन्द
परिधिद्रारा मन्दफल ओर शीघ्र परिधिद्रारा शीघ्र
फल समड्लने चाहिये। यहाँ मन्द परिधिवश भुजज्याद्वारा
जो भुजफल आवे, उसका चाप बनानेसे मन्द
कलादि फल होता है२॥ १०४ -३े॥
( शीघ्र कर्णसाधन-- ) पूर्वविधिसे शीघ्र परिधिद्रार
जो कोटिफल आवे, उसको मकरादि केन्द्र हो तो
त्रिज्या (३४३८) -में जोडे। कर्कादि केन्र हो तो
घटावे। जोड़ या घटाकर जो फल हो, उसके वर्गे
शीघ्र भुजफलके वर्गको जोड़ दे। फिर उसका मूल
लेनेसे शीघ्र कर्ण होता हे ॥ १०५-१०६॥
( शीघ्र फलसाधन- ) पूर्वविधिसे साधित शीघ्र
शेष ८२ को २२५ खे गुणाकर गत, गम्य ज्याके अन्तर २०५ से भाग देनेपर लब्धि ९० को ६२२५१३५० में जोडनेसे
१४४० हु आ। इसको अंश वनानेसे २४ परम क्रान्ति-अंश हुए।
९. जेसे- सूर्यकी भुजज्या २२७८ को विपम-सम परिधिके अन्तर २० से गुणा करनेपर ४५५६० हुआ । इसमें ३४३८ का
भाग देनेसे लब्धि १३ कलाको समपदान्त परिधि-अंश १४ मं घटनेसे १३1 ४७ सूर्यकी स्पष्ट मन्द परिधि हूई।
२. जैसे-सूर्यव्की भुजज्या २२७८ को स्पष्ट मन्द परिधि १३। ४७ से गुणा कर ३१३९८ । २६ ह आ। इसमें ३३० का
भाग देनेसे लब्धि कलादि ८७। १३ यह भुजफल हुआ। यह २२५ से कम है, अतः इसका चाप भी इतना ही हुआ ओर
यही सूर्यका कलादि मन्दफल हुआ। इसके अंशादि बनानेसे १। २७। १३ हुआ, इसको तुलादि केन्द्र होनेके कारण मध्यम
सूयं ७। ६। १८। ५५४ में घटानेसे शेप ७। ४। ५१1 ४९ यह स्पष्ट सूर्यं हआ।
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
भुजफलको त्रिज्यासे गुणा करके शीघ्र कर्णके द्वारा
भाग देनेपर जो कलादि लब्धि हो, उसके चाप
वनानेसे शीघ्र ' भुजफल' होता है । यह शीघ्रफल
मद्गलादि ५ ग्रहोमे प्रथम ओर चतुर्थं कर्ममें संस्कृत
(धन या ऋण) किया जाता हे ॥ १०७द्॥
रवि ओर चन्द्रमामें केवल एक ही मन्दफलका
संस्कार (धन या ऋण) किया जाता है । मुने ! अव
मङ्गलादि ५ ग्रहोके संस्कारका वर्णन करता हूं । उनमें
प्रथम शीघ्रफलका, द्वितीय मन्दफलका, तृतीय भी
मन्दफलका ओर चतुर्थं शीघ्रफलका संस्कार किया
जाता है ॥ १०८-द॥
अजादिकेन्द्रे सर्वेषां शेष्ये मान्दे च कर्मणि।॥ १०९॥
धनं ग्रहाणां लिप्तादि तुलादावृणमेव तत्।
अर्कबाहुफलाभ्यस्ता ग्रहभुक्तिर्विंभाजिता ॥ १९०॥
भचक्रकलिकाभिस्तु लिप्ताः कार्या ग्रहेऽर्कवत्।
( संस्कारविधि-- ) शीघ्र या मन्द केन्द्र मेषादि
(६ राशिके भीतर) हो तो शीघ्रफल ओर मन्दफल
जोड़े जाते है । यदि तुलादि केन्द्र (६ राशिसे ऊपर)
हो तो घटाये जाते हैँ ॥ १०९द्॥
( रविभुजफल-संस्कार-- ) प्रत्येक ग्रहकों
गतिकलाको पृथक्-पृथक् सूर्यके मन्द भुजफल-
कलासे गुणा करके उसमें २१६०० के द्वारा भाग
देनेसे जो कलादि लब्धि हो, उसको पूर्वसाधित
उदयकालिक ग्रहोमें रविमन्दफलवत् संस्कार
(मन्दफल धन हो तो धन, ऋण हो तो ऋण) करना
चाहिये। इससे स्पष्ट सूर्योदयकालिक ग्रह॒ होते
है९॥ ११०-ड्॥
स्वमन्दभक्तिसंशुद्धर्मध्यभुक्तेर्निंशापतेः ॥ १९१॥
ग्रहभुक्तेः फलं कार्य ग्रहवन्मन्दकर्मणि।
२६३
दोर्ज्यान्तरगुणा भुक्तिस्तत्त्वनेत्रोद्धूता पुनः ॥ ११२॥
स्वमन्दपरिधिक्षुण्णा भगणांशोद्धूताः कलाः।
ककदिौ तु धनं तत्र मकरादावृणं स्मृतम्॥ ११३॥
मन्दस्पफुटीकृतां भुक्ति प्रोच्य शीप्रोच्च भुक्तितः।
तच्छेषं विवरेणाथ हन्यात्रिज्यान्त्यकर्णयोः ॥ ११४॥
चलकर्णहतं भुक्तौ कर्णे त्रिज्याधिके धनम्।
ऋणमूनेऽधिके प्रोज्डच शेषं वक्रगतिभ्वेत्॥ ११५॥
( स्पष्टग्रहगतिसाधनार्थगतिफल-- ) चन््रमध्यगतिमें
चन्द्रमन्दोच्चगतिको घटाकरउससे (अर्थात् चन््रकेद्ध-
गतिसे) तथा अन्य ग्रहोकी (स्वल्पान्तरसे) अपनी-
अपनी गतिसे द्यी मन्दस्पषएटगतिसाधनमें फल साधन
करे। यथधा-उक्त गति (चन्द्रकी केन्द्रगति ओर अन्य
ग्रहोंकी गति) को दोर्ज्यान्तर (गम्यज्या ओर गतज्याके
अन्तर) -से गुणा करके उसको २२५ के द्वारा भाग
देकर लब्धिको अपनी-अपनी मन्दपरिधिसे गुणा करके
भगणांश (३६०) -के द्वारा भाग देनेसे जो कलादि फल
लब्धि हो, उसको कर्कादि (३ से ऊपर ९ गाशिके
भीतर) केन्द्र हो तो मध्यगतिमें धन करने (जोडने)
तथा मकरादि (९ राशिसे ऊपर ३ रारितक) केन्द्र हो
तो घटानेसे मन्दस्पष्ट गति होती दै।* पुनः इस
मन्दस्पष्ट गतिको अपनी शीघ्रोच्च गतिमं घराकर् शेषको
त्रिज्या तथा अन्तिम शीघ्रकण्कि अन्तरसे गुणा करके
पूर्वसाधित शीघ्रकर्णकि द्वारा भाग देनैसे जो लब्धि
(कलादि) हो, उसको यदि कर्ण त्रिज्यासे अधिक हो
तो मन्दस्पष्ट गतिमें धन करने (जोड़ने) ओर अल्प हो
तो धटानेसे स्पष्ट गति होती है। यदि साधित
ऋणगतिफल मन्दस्पष्ट गतिरे अधिक हो तो उसी
(ऋणगतिफल) -में मन्दस्पष्ट गतिको घटाकर जौ
वचे, वह वक्रगति होती है । इस स्थितिमं वह ग्रह वक्र-
=
१. पूर्वसाधित मध्यम या स्पष्ट सूर्यं मध्यमार्कोदयकालिक होता दै । उसको स्पष्ट सूर्योदयकालिक बनानेके लिये
भुजफल-संस्कार किया जाता टै। जैसे-सूर्यके भुजफल ८७। १३ को सूर्यकी स्यष्टगति ६०॥ ४७ सं गुणा करनेषर्
५३०१। २० हआ। इसमें २१६०० का भाग देनेसे लब्थि कलादि ०। १५ अर्थात् १५ विकलाक स्पष्ट सृयमं मन्दफल
ऋण होनेके कारण घटानेसे स्पष्ट सूर्योदयकालिक स्पष्ट सूर्यं ७। ४। ५१। २६ हआ।
२. ग्रहकी केन्द्रगतिके द्राय मन्दस्यष्टगतिफल साधन होता है । वहो चन््रमाकी अधिक गति होनेके कारण केन्दरगति ग्रहण
की जाती है। अन्य ग्रहकी १ दिनं मन्दोच्च गति शून्य होनेके कारण ग्रहगतिके तुल्य ही कन्द्रगति होती है तथा रवि ओरं
चनद्धमाकी मन्दस्पष्ट गति ही स्पष्ट गति होती है। मद्गलादि ग्रहकि शीघ्रोच्चवश शीघ्र गतिफलका पुनः संस्कार करनेमे स्य
गति होती है।
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
२६
गति रहता है.।॥१११-११५॥
कृतर्तुचन्रर्वेदेद्धेः शन्यत्येकेर्गुणाष्टिभिः।
शतरुदरेश्चतुर्थेषु केन्द्राशेर्भूसुतादयः॥ ११६॥
वक्रिणश्चक्रशुद्धेस्तेरशेरुज््मन्ति वक्रताम्।
क्रान्तिज्या विषुवद्धाध्नी क्षितिज्या द्वादशोद्धूता ॥ ९९७॥
त्रिज्यागुणा दिनव्यासभक्ता चापं चरासव।
तत्कार्मुकमुदक्क्रान्तो धनहीने पृथक् स्थिते॥ १९८ ॥
स्वाहोरात्रचतुभगि दिनरात्रिदले स्मृते।
याम्यक्रान्तौ विपर्यस्ते द्विगुणे तु दिनक्षपे ॥ ९९९॥
( ग्रहोकी वक्र केन्द्रांश-संख्या-- ) मङ्गल अपने
चतुर्थ शीघ्रकेन्द्रांश १६४मे, बुध १४४ केन्द्रांशमे, गुरु
१३० केन्द्रांशमे, शुक्र १६२ केन्द्रांशमें ओर शनि ११५
शीघ्केन्द्रशमें वक्रगति होता है। अपने-अपने
वक्रकेन्द्रशको ३६० में घटानेसे शेषके तुल्य केन्द्रांश
होनेपर फिर वह मार्ग-गति होता है२॥११६-६॥
( कालज्ञान-- ) रवि-क्रान्तिज्याको पलभार से
गुणा करके गुणनफलमें १२ से भाग देनेपर लब्धि
'कुज्या' होती हे । उस (कुज्या)-को त्रिज्यासे गुणा
करके द्युज्या (क्रान्तिको कोटिज्या) से भाग देकर
संक्षिप्त नारदपुराण
लब्धि (चरज्या)-के चाप बनानेसे चरासु" होते हें ।
उस चर-चापको यदि उत्तर क्रान्ति हो तो १५ घटीमें
जोडनेसे दिनार्धं ओर १५ घरीमें घटानेसे रात्र्यर्धं होता
हे । दक्षिणक्रान्ति हो तो विपरीत (यानी १५ घरीमें
घटानेसे दिनार्धं ओर जोडनेसे रात्रयर्ध) होता है।
दिनार्धको दूना करनेसे दिनमान ओर रात्यर्धको दूना
करनेसे रात्निमान होता हे“ ॥११७- ११९ ॥
भभोगोऽ्टशतीलिप्ताः खाश्चिशेलास्तथा तिथेः ।
ग्रहलिप्ता भभोगापता भानि भुक्त्या दिनादिकम्॥ १२०॥
रवीन्दुयोगलिप्ताभ्यो योगा भभोगभाजिताः।
गतगम्याश्च षष्िघ्यो भुक्तियोगाप्तनाडिकाः ॥ १२९॥
अकोनचन्द्रलिप्ताभ्यस्तिथयो भोगभाजिताः।
गता गम्याश्च षष्टिघ्यो नाडयो भुक्त्यन्तरो्रूताः ॥ १२२॥
(पञ्चाङ्ग-साधन--) ८०० कला एक-एक
` नक्षत्रका ओर ७२० कला एक-एक तिथिका भोगमान
होता हे । (अतः ग्रह किस नक्षत्रमें हे, यह जानना
हो तो) राश्यादि ग्रहको कलात्मक बनाकर उसमें
भभोग (८००) के द्वारा भाग दनेसे जो लब्धि हो,
उसके अनुसार अश्चिनी आदि गत नक्षत्र समञ्जनं
१. जैसे सूर्यको गति ५९।८ को गत-एष्यज्याके अन्तर १६४ से (जो भुजज्यासाधनमें गतैप्यज्यान्तर हुआ था) गुणा करनेपर
९३९७। ५२. हआ। इसमं २२५ से भाग देनेपर लव्धिकला ४३ को मन्दपरिधि १३। ४७ से गुणा करके गुणनफल ५९२। ४१
मं ३६० से भाग देनेपर लव्धिकलादि गतिफल १। ३९ हआ। इसको कर्कादि केन्द्र होनेके कारण सूर्यकी मध्यगति ५९। ८ मे
जोडनेसे ६०1 ४७ यह मन्दस्पष्ट गति हुई; यही सूर्यकी स्पष्ट गति भी होती है।
२. जैसे मद्घलके वक्रकेन्द्रंश १६४ को ३६० में घटानेसे शेष १९६ मार्ग-केनद्रांश हए। इससे सिद्ध हुआ कि जब मद्गलका
शीप्रकेन्द्रांश १६४ से १९६ तक रहता है, तबतक मङ्गल वक्र रहता है। इसी प्रकार सव ग्रहकि मागकिन्द्रांश समञ्जने चाहिये।
३. ३० घदीका दिन हो तौ उस दिनके दोपहरमे बारह अङ्गुल शङ्कुकी छायाका नाम "पलभा' है।
४. दीर्घं अक्षरके दस बार उच्चारणमें जितना समय लगता हे, उतना काल १ असु (प्राण) कहलाता है । ६ असुका १ पल
ओर ६० पलको १ घडी होती है! अतः चरासुमें ६ के भाग देकर, पल वनाकर् दिनमान साधन करना चाहिये।
५५. क्रान्ति बनानेमें अयनांश जोड़ना होता हे, इसलिये १३२ वें श्लोकके अनुसार अयनांश-साधन किया जाता हे । अहर्गण
१८४६२३७ कौ ६०० से गुणा कर गुणनफल ११०७७४८२२०० में युग-कुदिन १५७७९१७८२८ से भाग दनेपर लब्धि राश्यादि ८।
१२। ४४८ हई । इसके भुज २। १२। ४४ के अंशादि ७२।४८ को ३ से गुणा कर गुणनफल २१८। १२ मं १० से भाग देनेपर लब्धि
अंशादि २१९। ४९। १२ यह अयनांश हृआ। इस अयनांशको स्पष्टसूर्यं ७। ४।५१। १२ में जोडुनेसे सायन सूर्य ७। २६। ४०। २४
हुआ, इसका भुज १। २६।४०। २४ है ओर इस भुजको ज्या २८७२ हृई। इस भुजज्याको परमक्रन्तिज्या १३९७ से गुणा कर् गुणनफल
४०१२१८४ में त्रिज्या ३४३८ से भाग देनेपर लब्धि ११६७ ऋन्तिज्या हई । इसकी चापकला ११९१ के अंश १९। ५१ ऋन्त्य॑श हुए।
इनको ९० अशमे घटानेसे रेष ७०। ९ क्रान्तिका कोटिचाप हुआ। इसकी ज्या ३२३३ हई, इसको द्युज्या कहते है।
गोरखपुरकी पलभा ६ के वर्गं ३६ को १२ के वर्ग १४८ मं जोडुनेसे १८० हआ। इसका मूल स्वल्पान्तरसे १३ + पलकर्णं
हुआ। क्रान्तिज्या ११६७ को पलभा ६ से गुणा कर गुणनफल ७००२ में १२ से भाग देनेपर लब्धि स्वल्पान्तरसे ५८३ कुज्या
हई । इसको त्रिज्या ३४३८ से गुणा कर गुणनफल २००४३५८ मं द्युज्या ३२३३ से भाग देनेपर लब्धि ६२० चरज्या हुई । इसका
चाप ६२६ यह चरासु हआ, इसमें ६ से भाग देनेपर लब्ध चरपल १०४ हए; इनकी घडी १। ४४ हुई । इसको सायनसुयक
दक्षिणगोलमें रहनेके कारण १५ घडीमें घटानेसे १३1 १६ यह दिनार्धं ओर चरको १५ घडीमें जोडुनेसे रात्य्धं १६। ४४
हुआ) दिनार्धको दूना करनेसे घर्यादि २६। ३२ दिनमान हआ. तथा रात्रय्धको टूना करनेसे ३३। २८ रत्रिमान हुआ।
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
चाहिये । शेष कलादिसे ग्रहकी गतिके द्वारा उसकी
गत ओर गम्यघटीको समञ्जना चाहिये ॥१२०॥
उदयकालिक स्पष्टरवि ओर चन्द्रका योग करके
उसको कलामें भभोग (८००) -के द्वारा भाग देकर
लब्धि-गत विष्कुम्भ आदि योग होते हे । शेष वर्तमान
योगकी गतकला है। उसको ८०० में घटा देनेसे
गम्यकला होती हे । उस गत ओर गम्यकलाको ६०
से गुणा करके उससे रवि ओर चन्द्रकी गति-कलाके
योगसे भाग देनेपर गत ओर गम्यघटी होती हैर ॥ १२१॥
स्पष्टचन्द्रमें स्पष्टसूर्यको घटाकर शेष राश्यादिकी
कला बनाकर उसमें तिथिभोग (७२०)-से भाग
देनेपर लब्धि गततिथि-संख्या होती है । शेष वर्तमान
तिथिकी गतकला है। उसको ७२० में घटानेसे
गम्यकला होती हे । गत ओर गम्यकलाको पृथक्
६० से गुणाकर चन्द्र ओर रविके स्पष्ट गत्यन्तरसे
भाग देकर लब्धि-क्रमसे भुक्त (गत) ओर गम्य
घटी होती हें । (पञ्चाङ्खमें वर्तमान तिथिके आगे
२६५
गम्यघटी लिखी जाती है ) २ ॥१२२॥
तिथयः शुक्लप्रतिपदो याता द्विघ्रा नगोद्धूताः।
शेषं बवो बालवश्च कोलवस्तैतिलो गरः ॥ १२३॥
वणिजश्च भवेद्धिष्टिः कृष्णभूतापरार्द्धतः।
शकुनिर्नागश्च चतुष्पदः किस्तुघ्नमेव च।॥ १२४॥
( तिधिमें करण जाननेकी रीति- ) शुक्लपक्षकी
प्रतिपदादि गत-तिथि-संख्याको दूना करके ७ के द्वारा
भाग देनेसे १ आदि शेषमें क्रमसे १ बव, २ वालव,
३ कोलव, ४ तेतिल, ५ गर, ६ वणिज, ७ विष्ट
(भद्रा)-ये करण वर्तमान तिधिके पूरवर्धिमें होते है|
(ये ७ करण शुक्ल प्रतिपदाके उत्तरार्धसे कृष्ण १४
के पूर्वार्धतक (२८) तिधियेमें ८ आवृत्ति कर् आते
हे। इसलिये ये ७ चर करण कहलाते ह । कृष्णपक्ष
१४ के उत्तरार्धसे शुक्ल प्रतिपदाके पूर्वार्धितक, क्रमे
१ शकुनि, २ नाग, ३ चतुष्पद ओर ४ किंस्तुघ्न-ये
चार स्थिर करण होते ह *॥१२२-१२४॥
शिलातलेऽम्बुसंशुद्धे वन्रलेपेऽपि वा समे।
१. उदाहरण- जैसे स्पष्टचन््रमाकी गति ८१९, राश्यादि २।१०।१५।२५ है, तो इसको कलात्मक बनानेसे ४२१५।२५ हई । कलापं
८०० के द्वारा भाग देनेसे लब्धि ५ हुई । यह गत नक्षत्र अश्चिनीसे ५. वे मृगशिराका सुचक है। शेष २१५। २५ यह वर्तमान आर्द्रा नक्षत्रकी
गतकला हुई । इसको भभोग (८००) -में घरानेसे शेष ५८४। ३५ यह आर्द्रक गम्यकला हुई । इस प्रकार उदयकालिक चन््रकलासे
नक्षत्रकी गम्यकलाद्वारा त्रराशिकसे नक्षत्रकी गम्यघरी साधनकर पञ्चाङ्गमें लिखी जाती है । त्रयशिक इस प्रकार ै- यदि चन्द्रगतिकलामें
६० घड़ी तो गत, गम्यकलामें क्या ? इसका उत्तर आगे श्लोक १२२ की रिणी देखिये, तिधि, वार, नक्षत्र, योग ओर करण-इन ५
को पञ्चाङ्ग कहते है । स्पष्टचन्द्रमासे उक्त रीतिद्वाय साधित नक्षत्र ही पञ्चाद्गोपयोगी नक्षत्र होता है। अर्थात् वही नक्षत्र पञ्चाद्वमं लिखा जाता है।
२. योग-साधन-- स्पषटसूर्य ओर चनद्रमाके योग ७।२९।५७।४० की कला १४३९७।४० में ८०० से भाग दनेपर लब्धि १७ गत
योग व्यतीपात हुआ; शेष ७९७।४० यह वर्तमान वरीयान् योगका भुक्त हआ; इसको ८०० कलामे घटनेसे रोष २।२० वरीयानूक्ता भोग्य
हुआ । उपर्युक्त विधिसे भुक्त ७९७।४० ओर भोग्य २।२० कलाको पृथक्-पृथक् ६० घड़ीसे गुणा कर गुणनफलमं सूर्य ओर चन््रमाकी
गतिके योग ८७६।३६ से भाग देनेपर लब्ि क्रमशः भुक्त घडी-पल ५४। ३५ ओर भोग्य घदी-पल ०।९ हूई।
३. जैसे आद्रा नक्षत्रकी गम्यकला ५८४। ३५ है तो उसको ६० से गुणा करनेसे गुणनफल ३५०७५ मं चन्द्रगतिकला ८१९
से भाग देनेपर लब्धि घस्यादि ४२। ४९ यह आद्राका गम्य (उदयसे आगेका) मान हुआ।
तिथि-साधन-यदि उदयकालमे चन्रमा ६। २४। १५। २३, सूर्य १।५। ४२1 ३७, चन्द्रगति ८१९। ०, सूर्य-गति ७1 ३६
है तो चन्रमा ६। २४। १५।३ में सूर्य १।५।४२। ३७ को घयनेसे शेष ५। १८। ३२। २६ की कला १०११२। २६ म॑ ७२०
से भाग देनेपर लब्धि १४ गत तिथि हई; रेष ०।३२। २६ पूर्णिमाकी गत कलादि है। इसको ७२० कलामं घयनेसे शेष ६८७1 ३४
पूर्णिमाकी भोग्य कलादि हूई। गत कला ३२। २६ करो ६० से गुणा कर गुणनफल १९४६ मं चद्धमा ओर् सूर्यकी गत्यन्तरकला ७६१ ।
२४ सं भाग देनेपर लव्ध घदी-पल २। ३३ ष तिधिका भुक्त हुआ। तथा भोग्य कला ६८७। 3८ को ६० से गुणाकर गुणनफल
४१२५४ में गत्यन्तरकला ७६१। २४ से भाग देनेपर लव्य घट्यादि ५४। १२ पूर्णिमा तिथिका भोग्य (सूर्वादयसे आगेका मान) हुभा।
४. जैसे शुक्लपक्षकी द्वादशीमें करणका जान प्राप्त करना है तो गत तिथि-संख्या ११ को दूना करनेमे २२ हुआ । इसमं ७ मे
भाग देनेपर शेष १ रहा। अतः द्वादशीके पूर्वाधमिं बव ओर उत्तररधमे बालव नामक करण हुभआ। कृष्ण पश्चकी तिथि-संख्यमं १५ जोटुकर्
तिधि-संख्या ग्रहण करनी चाहिये। जैसे कृष्ण पक्षकी द्वादशी करण जानना द्ये तो गत तिधि-संख्या २६ को २ से गुणा करके
गुणनफल ५२ मे ७ से भाग देनेपर शेष ३ एहा। अतः द्वादशके पूरवाधमं तीस कौलव ओर उनगृर्धमं चौथा तेतिल नामक करण हुभा।
५. तिधिमानका आधा करण कहलाता है । इसलिये एक-एक तिथिं २, २ करण होत ह । बवादि ७ चर करण ओर
शकुनि आदि ८ स्थिर करण ह!
((-0. 1\/॥८1114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
२६६
तत्र शङ्कूवङ्गुलैरष्टिः समं मण्डलमालिखेत्॥ ९२५॥
तन्मध्ये स्थापयेच्छाङ्क कल्पनाद्वादशाङ्कुलम्।
तच्छायाग्रं स्पृशेद्यत्र वृत्ते पूर्वापरार्दधयोः ॥ ९१२६॥
तत्र विन्दुं विधायोभौ वृत्ते पूर्वापराभिधौ।
तन्मध्ये तिमिना रेरा कर्तव्या दक्षिणोत्तरा ॥ १२७॥
याम्योत्तरदिशोर्मध्ये तिमिना पूर्वपश्चिमा।
दिङ्मध्यमस्स्येः ससाध्या विदिशस्तद्रदेव हि॥ १२८॥
चतुरस्रं बहिः क्छुर्यात् सूतरर्मध्याद्विनिःसृतैः।
भुजसूत्राङ्कलैस्तत्र दत्तरिष्टप्रभा स्मृता ॥ ९२९॥
प्राक्पश्चिमाभ्रिता रेखा प्रोच्यते सममण्डले।
उन्मण्डले च विषुवन्मण्डले परिकीर्त्यते ॥ १३०॥
रेखा प्राच्यपरा साध्या विषुवद्धाग्रगा तथा।
इष्टच्छायाविषुवतोर्मध्यमग्राभिधीयते ॥ १३१॥
( दिकसाधन-- ) जलसे संशोधित (परीक्षित)
शिलातल या वच्रलेप (समेट) से सम बनाये हुए
भूतलमें जिस अङ्गुलमानसे शङ्क बनाया गया हो,
उसी अङ्गुलमानसे अभीष्ट त्रिज्याङ्गुलसे वृत्त बनाकर
उसके मध्य (केन्द्र) में समान द्वादश विभाग
(कल्पित अङ्गुल) -से बने हुए शङ्कको स्थापना
करे।उस शङ्खको छायाका अग्र भाग दिनके पूर्वारधमिं
जहां वृत्त-परिधिमें स्पर्श करे, वहां पश्चिम बिन्दु जाने
ओर दिनके उत्तरार्धमें फिर उसी शङ्कुको छायाका
अग्र भाग जहां वृत्तपरिधिको स्पर्श करे, वरहो पूर्व बिन्दु
समञ्च । इस प्रकार पूर्वं ओर पश्मिम बिन्दुका ज्ञान करे।
अर्थात् उन दोनों विन्दुओमे एक सरल रेखा खीचनेसे
पूर्वापर-रेखा होगी । उस पूर्वापररेखाके दोनों अग्रोको
केन्द्र मानकर दो वृत्तार्धं बनानेसे मत्स्याकार होगा।
उसके मुख एवं पुच्छमे रेखा करनेसे दक्षिणोत्तर-रेखा
होगी । यह दक्षिणोत्तरेखा केन्द्रविन्दुमें होकर जाती
हे । यह रेखा जहां वृत्तमें स्पर्श करे, वहाँ दक्षिण तथा
उत्तर दिशाके विन्दु समञ्च । फिर इस दक्षिणोत्तर-
रेखापर पूर्व -युक्ति से मत्स्योत्पादनद्वारा पूर्वापर-रेखा
बनावे तो यह रेखा केन्द्रविन्दुमें होकर ठीक पूर्व ओर
संक्षिप्त नारदपुराण
पञश्चिम-बिन्दुका वृत्तम स्पर्शं करेगी । इस प्रकार चार
दिशाओंको जानकर पुनः दो-दो दिशाओंके मध्यबिन्दुसे
मत्स्योत्पादनद्वारा विदिशाओं (कोणों)-का ज्ञान
करना चाहिये ॥ १२५- १२८ ॥
(इस प्रकार वृत्तम दिशाओंका ज्ञान होनेपर)
वृत्तके बाहर चारों दिशाओके बिन्दु ओंसे स्पश्रेखाद्वारा
चतुरस्र (चतुर्भुज) बनावे। वृत्तके मध्यकेन्द्रसे
भुजाङ्गुलतुल्य ( भुजको दिशामें उत्तर या दक्षिण)
विन्दुपर छायारेखा होती है। उस छायारेखाको
पूर्वापर-रेखाके समानान्तर बनावे । पूर्वापिर-रेखा,
पूर्वापर- वृत्त, उन्मण्डल ओर नाडी वृत्तके धरातलमें
होती हे । इसलिये क्षितिज धरातलगत वृत्तके केन्द्रसे
पूर्वापररेखा खींचकर फिर पलभाग्र विन्दुगत पूर्वापरके
समानान्तर रेखा बनावे । इस प्रकार इष्ट-छायाग्रगत
तथा पलभारेखाके बीच (अन्तर) -को “ अग्रा" कहते
हे ॥ १२९- १३१॥
शङ्धच्छायाकृतियुतेर्मूलं कर्णोऽस्य वर्गतः।
प्रज्जय शङ्धकृतिं मूलं छाया शडूर्विपर्ययात्॥ ९३२॥
शङ्क (१२) -के वर्गमें छायाके वर्गको जोड़कर
मूल लेनेसे छायाकर्णं होता हे ओर छायाकर्णके वर्गमें
शङ्कके वर्गको घटानेसे मूल छाया होती है तथा
छायाके-घटानेसे मूल शङ्क होता है९॥१३२॥
्रिंशत्कृत्वो युगे भानां चक्रं प्राक् परिलम्बते।
तदूुणाद्धूदिनैर्भक्ताद द्युगणाद्यदवाप्यते ॥ १३३॥
तरोस्तरिघ्नादशाप्तांणा विज्ञेया अयनाभिधाः।
तत्सस्कृताद्रहात्क्रान्तिच्छायाचरदलादिकम् ॥१३४॥
( अयनांश-साधन-- ) एक युगमें राशिचक्र
सृष्ट्यादि स्थानसे पूर्वं ओर पञश्चिमको ६०० बार
चलित होता है। जो उसके भगण कहलाते हे ।
इसलिये अहर्गणको ६०० से गुणा करके युगके
कुदिनसे भाग देकर राश्यादि-फलसे भुज बनावे।
उस भुजको ३ से गुणा करके १० के द्वारा भागदे तो
लब्धि अयनांश होती है । इस अयनांशको अहर्गणद्वारा
१. क्योकि शङ्ककोटि, छायाभुज ओर इन्हीं दोनोकि वर्गयोगका मूल छायाकर्णं कहलाता है।
((-0. 1/11104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
साधित ग्रहमें जोड़कर क्रान्ति, छाया ओर चरखण्ड
आदि बनाने चाहिये* ॥१३३-१३४॥
शङ्धच्छायाहते त्रिज्ये विषुवत्कर्णभाजिते।
लम्बाक्षज्ये तयोश्चापि लम्बाक्षौ दक्षिणो सदा॥ १३५॥
स्वाक्षाक्पिक्रमयुतिर्दिक्साम्येऽन्तरमन्यथा।
शेषा नतांशाः सूर्यस्य तद्वाहज्या च कोटिजा ॥ १३६॥
शङ्कमानाङ्गलाभ्यस्ते भुजत्रिज्ये यथाक्रमम्।
कोटिज्यया विभज्याप्ते छायाकर्णावहर्दले ॥ १३७॥
( लम्बांश ओर अक्षांश-साधन-- ) शङ्क(१२)
ओर पलभाको पृथक्-पृथक् त्रिज्यासे गुणां करके
उसमें पलकर्णसे भाग देनेपर लब्धि क्रमशः
'लम्बज्या' ओर ' अक्षज्या' होती हे । दोनोके चाप
बनानेसे ' लम्बांश' ओर " अक्षांश ' होते है । इनको
दिशा सर्वदा दक्षिण समञ्जी जाती है ` ॥ १३५॥
( सूर्य-ज्ञानसे मध्याह-छाया-साधन-- ) अपने
अक्षांश ओर सूर्यके क्रान्त्यंश दोनों एक दिशाको ओर
हों तो योग करनेसे ओर यदि भिन्न दिशाके हों तो
दोनोंको अन्तर करनेसे शेष सूर्यका ' नतांश ' होता हे ।
२६७
भुजज्या ओर त्रिज्याको पृथक्-पृथक् शङ्कमान (१२)
से गुणा करके उसमें कोरिज्यासे भाग दैनेपर लब्धि
क्रमशः मध्याहकालमें छाया ओर छायाकण्कि मानका
सूचक होती हे * ॥ १३६-१३७॥
स्वाक्षार्कनतभागानां दिक्साप्येऽन्तरमन्यथा।
दिग्भेदे पक्रमः शेषस्तस्य ज्या त्रिज्यया हता ॥ १३८ ॥
परमापक्रमज्याप्ा चापं मेषादिगो रविः।
कर्कर्यादो प्रोच्य चक्राद्धत्तिलादो भार्धसंयुतात्॥ १३९॥
मृगादौ प्राज्य चक्रात्तु मध्याह्वेऽ्कः स्फुटो भवेत्।
तन्मान्दमसकृद्रामं फलं मध्यो दिवाकरः ॥ १४० ॥
( मध्याह्न-छायासे-सूर्यसाधन- )अपने' अक्षांश '
ओर मध्याहकालिक सूर्यके “नतांश' दोनों एक
दिशाके हों तो अन्तर करनेसे ओर यदि भिन्न दिशाके
हों तो योग करनेसे जो फल हो, वह सूर्यकी ‹ क्रान्ति"
होती है ।' क्रान्तिज्या ' को ' त्रिज्या *से गुणा करके उसमें
'परमक्रान्तिज्या' (१३९७) -से भाग दनेपर् लव्ध
सूर्यकी ' भुजज्या ' होती है । उसके चाप बनाकर मेषादि
३ राशिमें सूर्य हों तो वही स्पष्ट सूर्य होता है“ । ककरदिं
उस ' नतांश' की ' भुजज्या ' ओर ' कोरिज्या ' बनावे । | ३ राशिमें हों तो उस चापको & राशिमे घटानेसे,
१. अयनांश-साधनका उदाहरण काल-साधनमें पहले बतलाया जा चुका हे । प #
२. जैसे- १२ अङ्गुल शङ्को त्रिज्याका ३४३८ से गुणा कर् गुणनफल ४१२५६ मे पलकणं १३“ ङ = दू
र ६५७
से भाग
देनेपर लब्धि ३०७९ लम्बज्या हई, इसकी चापकला ३८१४ में ६० से भाग देनेपर् अंशादि ६३। ३८ लम्वांश हुभा। इसका
९० अशमे घटानेसे २६। २६ अक्षांश हुआ।
३. यदि मध्याहकालिक राश्यादि ०।९।५१ सायन सूर्य है तो उस दिन गोरखपुरमं मध्याहकालिक छयाका प्रमाण क्या दगा ?
उत्तर- सायन सूर्य ०।९।५१ की भुजकला ५९१ की ज्या ५८७ को परमक्रान्तिज्या १३९७ से गुणा करके गुणनफल
८२००३९ में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेसे लब्धि सूर्यकी क्रान्तिज्या २३८ कलाका चाप भो स्वल्पान्तरसं इतना हा दुरा।
अतः इसके अंश बनानेसे ३। ५८ यह सूर्यकी अंशादि क्रान्ति सूर्यके उत्तर गोलमें होनेके कारण उत्तरकी हुई । अतः अक्षांश
२६। २६ ओर क्रान्त्यंश ३।५८ का अन्तर करनेसे २२। २८ यह नतांश हुआ। इसको ९० अशर्म घटानेमे नतांशकी कारि
६७।३२ हई । नतांशकी भुजज्या १३०८ ओर कोरिज्या ३१७८ हुई। भुजज्या १३०८ कौ १२ से गुणा कर् गुणनफल १५६९६
में कोरिज्यासे भाग देनेपर लब्थि स्वल्पान्तरसे ५ अङ्गुल मध्याहकालिक छयाका प्रमाण हर। क
४. गोरखपुरमे सायन मेष-संक्रान्तिके वाद वैशोख कृष्णपक्षे यदि मध्याहके समय १२ अल्गुल शङ्क छाया ५
अङ्गुल उत्तर दिशाकी है तो उस दिन राश्यादि स्पष्ट सूर्यं क्या होगा ?
उत्तर-छाया ५ के वर्ग २५ में शङ्कु १२ का वर्गं ९४८ जोढनेस १६९ हआ। इसका वर्गमूल १३ छया-कर्णं हओ,
छया ५ को त्रिज्यासे गुणा करके गुणनफल ३४३८५५१७१९० छाया कर्णं १३ का भाग देनेसे लब्धि १३२२ मूरयकौ नतज्या
हुई । इसका चाप १३५८ हु आ। इसको अंशात्मक वनानेसे २२। ३८ सूर्यका नतांश हुआ। यह उत्तर छाया होनेके कारण
दक्षिण दिशाका हुआ। अतः इसकौ गोरखपुरके अक्षांश २६। २६ मं घटानेसं ३। ४८ यह सूर्यकी क्रान्ति हुई, इसकी
कला २२८ की ज्या भी इतनी ही हूर । इस क्रान्तिज्या २२८ क्रो त्रिज्यमे गुणा कके गुणनफलमं परमन्रन्तिज्या १३९७
से भाग देनेपर लब्धि ५६१ सूर्यकी भजज्या हुई । इसकी चापकला ५६३ कौ अंशादि वनानेसे ०1 ९। २३ राश्यादि पूर्य
हुआ, यही मेषादि ३ राशिके भीतर होनेके कारण उस दिन मध्याहकालिक सायनमुयं दु आ।
((-0. 1/८11114<511॥1 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
२६८
तुलादि ३ राशिमें हों तो ६ राशिमें जोड़नेसे ओर
मकरादि ३ राशिमें हों तो १२ राशिमें घटानेसे जो योग
या अन्तर हो, वह मध्याहमें स्पष्ट सूर्य होता हे । उस
स्पष्ट सूर्यसे विपरीत क्रियाद्वारा मन्दफलसाधन कर
बार-बार संस्कार करनेसे मध्यम सूर्यका ज्ञान होता
हे ॥ १३८- १४० ॥
ग्रहोदयाप्राणहता खख्टेकोद्धूता गतिः।
चक्रासवो लव्धयुताः स्वाहोरात्रासवः स्मृताः ॥ १४१॥
( ग्रहोके अहोरात्र-मान-- ) जिस राशिमें तत्काल
ग्रह हो, उस राशिके उदयमानसे उस ग्रहकी गतिको
गुणा करके उसमे १८०० से भाग देकर लब्ध असुको
" अहोरात्रासु' (२१६००) -में जोड़नेपर उस ग्रहका
अहोरात्रमान होता हे । (असुसे पल ओर घडी बना
लेनी चाहिये ।) ` ॥१४१॥
त्रिभद्युकण्द्धिगुणाः स्वाहोरात्रार्दधभाजिताः।
क्रमादेकद्वित्रिभज्यास्तच्यापानि पृथक् पथक् ॥ ९४२ ॥
स्वाधोऽधः प्रविशोध्याथ मेषाल्लङ्कोदयासवः।
खागाष्टयोऽर्थगोऽगेकाः शरत्र्यद्ृहिमांशवः ॥ १४२ ॥
स्वदेशचरखण्डोना भवन्तीष्टोदयासवः।
संक्षिप्त नारदपुराण
व्यस्ता व्यस्तेर्युताः स्वे; स्वे: कर्कटाद्यास्ततस्त्रयः ॥ ९४४॥
उत्क्रमेण षडवैते भवन्तीष्टास्तुलादयः।
राशियोके उदयमान- १ राशि, २ राशि, ३
राशिको ज्याको पृथक्-पृथक् परमाल्पद्युज्या!
(परमक्रान्तिको कोरिज्या)-से गुणा करके उसमें
अपनी-अपनी द्युज्या ( क्रान्तिकोरिज्या) से भाग देकर
लब्धिरयोके चाप बनावे । उनमें प्रथम चाप मेषका उदय
(लङ्खोदय)-मान होता हे । प्रथम चापको द्वितीय चापमें
घटानेपर शेष वृषका उदयमान होता है एवं द्वितीय
चापको तृतीय चापमें घटाकर जो शेष रहे, वह मिथुनका
लङ्खोदयमान होता हे। यथा-- १६७० असु मेषका,
१७९५ वृषका तथा १९३५ मिथुनका सिद्ध
लङ्खोदयमान हैर । इन तीनोमें क्रमसे अपने देशीय
तीनों चरखण्डोंको घटावे तो क्रमशः तीनों अपने
देशके मेष आदि तीन राशियोके उदयमान होते हे ।
पुनः उन्हीं तीनों लङ्कोदयमानोंको उत्क्रमसे
रखकर--इन तीनोमें अपने देशके तीनों चरखण्डोको
उत््रमसे जोडनेपर कर्क आदि २ राशियोके
स्वदेशोदयमान होते ह एवं मेषादि कन्यापर्यन्त ६
१. जैसे स्पष्ट सूर्य ०।९।५१। १५ हो, उसकी गतिकला ५८ हो तो उसको मेषके स्वदेशोदयमान १३१० असुसे
गुणा करके गुणनफल ७५९८० में १८०० से भाग देनेपर लब्धि ४२ असु हुई । उसको अहोरात्रासु (२१६००) में जोडनेसं
२१६४२ असु सूर्यके अहोरात्रका प्रमाण हुआ। इसका पल बनानेसे ३६०७ अर्थात् नाक्षत्र अहोरात्रसे सूर्यका अहोरात्र
७ पल अधिक हुआ। इसी प्रकार सब ग्रहोके अहोरात्रमान समञ्ञे।
२. राशियोके लङ्कोदयमान-साधनका उदाहरण-एक राशि (१८०० कला) -की ज्या १७१९ उसकी द्युज्या ३३५१ तथा
परमाल्पद्युज्या ३१३९ कला हे तो एक राशिज्या १७१९ को परमाल्पद्युज्या ३१३९ से गुणा करके गुणनफल ५२३९५९४१
मं एक राशिकी युज्या ३३५१ से भाग देकर लब्धि एक राशि उदयज्या १६१० हुई । इसका चाप मेषका उदयासु स्वल्पान्तरसे
१६७० हुआ। इसी प्रकार आगे अपनी-अपनी ज्या ओर द्युज्यासे साधन करके राशियेकि उदयासु लिखे गये ह । यथा-
न
ये उदयमान अनुसंख्यामें हँ । इनमें ६ के भाग देनेसे पलात्मक होते है। यथा-मेषोदयासु= १६७०, अतः
मेपोदयपल=*‰ ~२७८ स्वल्पान्तरसे। एवं अन्य मान निप्राङ्कित चित्रे देखिये।
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/81/81185। (01661011. 01411260 0 6810011
पूर्व भाग-द्वितीय पाद
राशियोके उदयमान सिद्ध होते हे । पुनः ये ही उत्क्रमसे
तुलादि ६ राशियोके मान होते हे ` ॥ १४२-- १४४ ई ॥
गतभोग्यासवः कार्याः सायनात् स्वेष्टभास्करात्॥ १४५ ॥
स्वोदयासुहता भुक्तभोग्या भक्ताः खवद्धिभिः।
अभीष्टधटिकासुभ्यो भोग्यासूप्रविशोधयेत्॥ १४६ ॥
तद्वदेवेष्यलग्रासूनेवं यातांस्तथोत्क्रमात्।
शेषं चेत् त्रिंशताभ्यस्तमशुद्धेन विभाजितम्॥ ९४७॥
भागयुक्तं च हीनं च व्ययनांशं तनुः कुजे।
लग्र-साधन-इष्टकालिक सायनांश सूर्यके
भक्तांश ओर भोग्यांशद्वारा ' भुक्तासु " ओर ' भोग्यासु'
कासाधन करना चाहिये । (यथा-- भुक्तांशको सायन
सूर्यके स्वदेशोदयमानसे गुणा करके ३० का भाग
देनेपर लब्धि “भुक्तासु' ओर भोग्यांशको
स्वदेशोदयमानसे गुणा करके उसमे ३० के द्वारा भाग
देनेपर लब्धि ' भोग्यासु ' होते है । इष्ट घटीके " असु"
बनाकर उसमें ' भोग्यासु ' को घटावे, घटाकर जो शेष
बचे, उसमें अग्रिम राशियोमेसे जितनेके स्वदेशोदयमान
घटे, उतने घटावे। (अथवा) इसी प्रकार “इष्टासु ' में
२६९
" भुक्तासु' घटाकर शेषमें, गत राशियोके उत््रमसे
उनके जितने स्वदेशोदयमान घटे, घटावे। जिस
राशितकका मान घट जाय, वर्हातक ! शुद्ध ' ओर
जिसका मान नहीं घटे, वह ' अशुद्ध ' संक होती हे।
वचे हुए “इष्टासु' को ३० से गुणा करके “ अशुद्ध '
राशिके उदयमानसे भाग देकर लब्ध अंशादिको
(भोग्य-क्रम-विधि हो तो) शुद्ध राशिसंख्यामें
जोड़ने ओर (भुक्त-उत्क्रम-विधि हो तो) अशुद्ध
राशिकी संख्यामें घटानेसे “ सायन लग्र' होता हे।
उसमे आयनांश घटानेसे फलकथनोपयुक्त उदयलग्र
होता है २ ॥१४५-- १४७ ‡ ॥
प्राक् पश्चात्रतनाडीभिस्तद्वल्लद्धोदयासुभिः ॥ ९४८ ॥
भानो क्षयथधने कृत्वा मध्यलग्रं तदा भवेत्।
भोग्यासूनूनकस्याथ भुक्तासूनधिकस्य च ॥ १४९॥
सपिण्डयान्तरलमग्रासूनेवं स्यात्कालसाधनम्।
( मध्य-दशम लग्र-साधन- ) इसी प्रकार पूर्व
नतकालासु' से लद्कोदयद्रारा अंशादि साधन करके
उसको सूर्यम घटानेसे तथा पश्चिम ' नतकालासु' ओर
१. उदाहरण-पलमान ६ है, वहां चरखण्ड-क्रमसे पलात्मक ६०।४८। २० हुए । इनको क्रम-उत्क्रमसे पलात्मक
लङ्कोदयमें घटने ओर जोड़नेसे £ पलभादेशीय (स्वदेशोदय)-मान हृए। चक्रम देखिये-
२. जैसे- यदि कल्पित आयनांश १८। १० ओर सूर्य १।५।५२। ४० है तो उनका योग सायन सूर्य १। २४।
२।४० हुआ। इष्ट काल बड़ी-पल १०।२० है 1 अतः सूर्यके वृषराशि-भोग्यांश ५।५७। २० ओर इष्ट कालामु ३७२०
हए। सूर्यके भोग्यांश ५। ५७।२० को वृषराशिके स्वोदयासु संख्या १५०७ से गुणा करनेपर् ३७२०। ८५८९९ ३०६४०
को ६० से सवर्णन करनेपर ८९७५। १। २० हआ। इसमें ३० का भाग देनेसे लब्धि २९९। १०। ३ भोग्यासु दुई।
इसको इष्टकालासु ३७२० में.यटानेसे ३४२०1 ४९।५७ हुआ। इसमें वृषके परवती मिथुनके स्वोदयासु १८१५ को धटानेसे
शेष १६०५।४९।५७ हुआ। इसमे कर्कका स्वोदयासु-२०५५ नहीं घटता टै; इसलिये ककराशि अशुद्ध. ओर मिधुन शुद्ध
संक हुआ। शेष असु १६०५॥ ४९1 ५७ को ३० से गुणा करनेपर ४८१७४। ५८। ३० हुआ। इसमे अशुद्ध कर्क्के
स्वोदयमान २०५५ का भाग दैनेसे लब्ध अंशादि २३। २६। ३२ में शुद्धरशि (मिथुन) सख्या ३ जोडुनेसे ३। २३। २६।
३२ हआ। इसमें आयनांश १८। १० कौ घटानेसे २। ५1 १६। ३२ यह लग्र हञा।
लग्र बनाने विशेषता यह टै कि यदि सूर्योदयसे उष्टकालद्वारा लग्र नाना हौ तो सायन सूर्यके भोग्यांरद्रारा तथा
दष्टकालको ६० घड़ीमं घटाकर शेषकालद्रारा बनाना हो त मूर्यके भुक्छशद्राय ही उपर्य विधिसे लग्र बनाना चाहिये।
(-0. 1\॥(11114/5511॥1 2118811 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 66810011
२७०
लङ्कोदयद्वारा (त्रेराशिकसे) अंशादि साधन करके
सूर्यमें जोड्नेसे मध्य (दशम=आकाशमध्य) लप्र
होता हे‹॥ १४८ ई ॥
( लग्र ओर स्पष्ट-सूर्यको जानकर इष्टकाल-
साधन- ) लग्र ओर सूर्य इन दोनोमे जो ऊन
(पीछे) हो, उसके “ भोग्यांश ' द्वारा * भोग्यासु' ओर
जो अधिक (आगे) हो उसके भुक्तांशद्वारा ' भुक्तासु'
साधनकर दोनोंको जोड़े तथा उसमे उन दोनों
(लग्न ओर सूर्य)-केर बीचमें जो राशियों हो,
उनके उदयासुओंको जोड़े तो 'इष्टकालासु' होते
हेग ॥ १४९ ३ ॥
विराहवर्कभुजांशाश्चेदिन््राल्पाः स्याद्रृहो विधोः ॥ ९१५०॥
तेंऽशाः शिवघ्राः शैलाप्ता व्यग्वकाशः शरोऽङ्लेः।
अर्क विधुर्विधुं भूभा छादयत्यथ छन्नकम्॥ ९५९॥
छाद्यच्छादकमानार्धं शरोनं ग्राह्यवर्जितम्।
तत् खच्छन्नं च मानेक्यार्धं शराढ्यं दशाहतम्॥ ९५२॥
छन्नक्षमस्मान्मूलं तु स्वाङ्खोनं ग्लोवपुर्हतम्।
संक्षिप्त नारदपुराण
स्थित्य्छं घटिकादि स्याद् व्यगुवाह्वशसंमितेः ॥ ९५३ ॥
इष्टेः पलेस्तदूनाढ्यं व्यगावूनेऽर्कषडगृहात्।
तदन्यथाधिके तस्मिन्नेवं स्पष्टे मुखान्त्यगे ॥ १५४॥
( ग्रहण-साधन-- ) पर्वान्त कालमें स्पष्ट सूर्य,
चन्द्र ओर राहुका साधन करे । सूर्यमें राहुको घटाकर
जो शेष बचे, उसके भुजांश यदि श४ से अल्पहो तो
चन्द्रग्रहण^+को सम्भावना समञ्च ॥१५०॥ उन
भुजाशोंको ११ से गुणा कर ७ से भाग देनेपर लब्धि-
अङ्क अङ्गुलादि ' शर ' होता हे ॥ १५०३ ॥
सूर्यको चन्द्रमा ओर चन्द्रमाको भूभा (पृथिवीकौ
छाया) छादित करती हे । इसलिये सूर्यग्रहणमें सूर्य
छाद्य ओर चन्द्रमा छादक तथा चन्द्रग्रहणमें चन्द्रमा
छाद्य, भूभा छादक (ग्रहणकर््री ) हे-एेसा समञ्ना
चाहिये । अव छन्न (ग्रास) मान कहते है- छाद्य ओर
छेदकके विम्बमानका योग करके उसके आधेमें
“शर' घटानेसे “ छन्न ' (ग्रास) मान होता है । यदि
ग्रासमान ग्राह्य (छाद्य) -से अधिक हो तो उसमें
१. उदाहरण-- यदि पूर्वं नतकालासु' ३७५० ओर “सायन सूर्य' ६।५।४।१० है तो भुक्त-प्रकारसे ओर ' लङ्कोदय' दवाय
दशम लग्रका साधन इस प्रकार होगा-सूर्यके “ भुक्ताश' ५।४।१० को तुलारशिके “ लज्खेदय ' १६७० से गुणा करनेपर गुणनफल
८४६५ हुआ) इसमें ३० का भाग देनेसे भागफल २८२ सूर्यके भुक्तासु हृए। इनको “ नतकालासु' ३७५० में घटानेसे
शेष २४६८ रहा। उसमे सूर्यसे पीछेकी कन्याराशिके लङ्कोदयासु १७९५ को घटानेपर शेष १६७३ रहा। इसमें सिंहका
लङ्कोदयासु १७९५ नहीं घटता है, अतः यह सिंह अशुद्ध संक हआ। अब शेष असु १६७३ को ३० से गुणा करके
गुणनफल ५०१९० मे अशुद्ध उदयासु १७९५ का भाग देनेसे लब्ध अंशादि २७। ५७। ३९ हए । इनको अशुद्ध राशि-
संख्या ५ में घटानेपर शेष ४।२। २। २१ सायन दशम लग्न हुआ।
२. यहां आगे रहनेवाला अधिक ओर पीछे रहनेवाला ऊन समञ्चा जाता है । एवं दोनोके अन्तर ६ राशिसे अल्पवाला
ग्रहण करना चाहिये । यदि सूर्य अधिक रहे तो रत्नि शेष इषटकाल समञ्लना चाहिये।
३. उदाहरणार्थं प्रश्न-यदि सायनसूर्य १। २४।४५। ० ओर सायन लग्र ३।५।२०।३० है तो इषटकाल क्या होगा ?
उत्तर- यहां लग्र अधिक है, इसलिये लग्रके भुक्तांश ५। २०।३० को कर्कराशिके ‹ स्वदेशोदयासु" २०५५ से गुणा
करनेपर गुणनफ़ल १०९७७ हुए। उसमें ३० का भाग देनेपर ३६५। ५४३६६ लग्रके ' भुक्तासु' हृए। तथा सूर्यके भोग्यांश
५। १५। ° को वृषराशिके ' स्वदेशोदयासु" १५०७ से गुणा कर गुणनफल ७९११ मेँ ३० से भाग देनेपर लब्ध सूर्यके भोग्यामु
२६४ हृए। लप्रके * भुक्तासु' ३६६ ओर सूर्यके ' भोग्यासु' २६४ के योग ६३० में मध्यकी राशि मिथुनके ‹ स्वदेशोदयासु'
१८१५ जोडनेसे २४४५ "इष्टकालासु" हए । इनम ६ का भाग देनेपर लब्धि पल ४०७। ३० हए । इनमें ६० का भाग देनेपर
लब्ध षर्यादि ६। ४७1 ३० व इषटकाल हआ।
४. चन्द्रग्रहणमें पूर्णिमा ओर सूर्यग्रहणमें अमावास्या पर्वं कहलाता है।
५. सूर्य ओर चन्द्रग्रहणका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-ग्रह जिस मामं घूमता हआ पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करता
है, वह (मार्ग) उस ग्रहकी कक्षा कहलाता है । पृथ्वीसे सूर्यकी कक्षा दूर ओर चन्द्रकी कक्षा समीप है। इसलिये सूर्य
ओर पृथ्वीके बौचमें ही चन्द्रमा घूमता रहता है ।
जिस दिशामें सूर्य रहता है, उससे विरुद्ध या सामनेकी दिशां पृथ्वीकी छाया रहती है । जिस प्रकार सूर्य 9
है, उसी प्रकार उक्त छाया भी घूमती है ओर उसकी लंबाई चन्द्रकक्षासे अआगेतक बद्री हुई होती है। पृथ्वी गोल
कारण चन्द्रकक्षामें पृथ्वीकी छाया भी गोलाकार ही होती है। वह सूर्यसे सर्वदा ६ राशिपर ही घूमती रहती है।
((-0. 1/८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २७१
छाद्यको घटाकर जो शेष बचे, उतना खच्छन्न | मानेक्यार्धं (छाद्य-छादकके विम्ब-योगार्ध) में
(खग्रास) समञ्चना चाहियेः । शर जोड़कर १० से गुणा करे । फिर ग्रासमानसे गुणा
चन्द्रमा अपनी क्षामे घूमता हुआ जव सूर्यके साथ एक दक्षिणोत्तर रेखामें स्थित हाता टै, उस समय दर्शान्ति
(अमावास्याके अन्त ओर शुक्ल प्रतिपदाके आरम्भको संधि) - काल कहलाता हे। तथा जव सूर्यसे चन्रमा ६ राशि अगे
पहुंच जाता टै, उस समयको पूर्णिमान्त काल कहते है।
चन्द्रमाका विम्ब जलमय है, उसके जिस भागपर सूर्यकी किरणें पड़ती है वह भाग तेजेयुक्त
(उज्ज्वल) दीख पडता है। अतः उसके द्वा रत्रिमे भी अन्धकासका निवारण होता है।
सर्वभरास् चनद्-ऋणका द्य ऊपर कहा गया है कि सूर्यसे ६ राशिपर पृथ्वीकी छाया धृमती है ओर चन्द्रमाके मूर्यसे £ राशिपर
पर्हुचनेपर पूर्णिमा होती है; इसलिये जिस पूर्णिमामें चन्द्रमा पृथ्वीकी छायासे अगल-वगल हाकर चला
॥ जाता है, उसमं चद्रग्रहण नहीं होता है। तथा जिस पूर्णिमामें चन्द्रमा पृथ्वीकी छायामं पड़ जाता है,
६६९१ उस समय उसपर सूर्यकी किरणें नहीं पड्ती हं; अतः चद्मा पूर्णं अदृश्य हो जाता है ओर वह
> ' सर्वग्रास' या "खग्रास" ' चद्धग्रहण" कहलाता है। जिस पूर्णिमामं चद्रमाका कु ही भाग पृथ्वी
| ~
7. ६ >, छायामें पड़ता है, उस समय उतने ही भागके अदृश्य होनेके कारण उसे ' खण्डग्रहण ' कहते है । इसीलिये
; (डे २ > चद््र्रहण पूर्णिमाको ही होता हे। । + 3
८ ( सूर्यग्रहण-- ) ऊपर बताया गया हे कि चद्धमा पृथ्वी ओर सूर्य ब्रीचमं घूमता है ओर मूर्थक
समीप एक दक्षिणोत्तर रेखामं पड़ता है उस दिन चन्धमके ऊप भागं सूर्यकी किरणं पटृती दै (नीच
भागमें जिसे हम देखते ह, नहीं) । यही कारण हे कि अमालास्याके दिन हमं चद्माका दर्शन नहीं हाता
हे। रत्रिमे सूर्यके साथ ही चद्धमा भी पृरथ्वीके नीचे चला जाता दे।
जिस अमावास्याको पृथ्वी ओर सूर्यके मध्यमे चन्द्रमा आ जाता ह, उस दिन उसमे आच्छरदित
होकर सूर्यका विम्ब अदृश्य हो जाता हे; ठीक उसी तरह, जसे मेकं खण्टसे आवृत होन पर् वह
अदृश्य होता है। इस प्रकार चन्द्रविम्बसे जव सूर्यका सम्पूर्ण या न्यूनाधिक भाव अदूश्य होता है ती
क्रमशः उसे ' सर्वग्रास' या “खण्ड सूर्यग्रहण" कहते है।
गण्ड मूरयप्रहणका दृश्य
4)
| अमावास्यामें चन्द्रमाकौ छाया पृथ्वीकी ओर होती है, उस छायामं जो भूभाग पडता है,
| उसके लिये सम्पूर्णं सूर्य -विम्ब अदृश्य हो जाता है, अतः वहं सर्वग्रास सूर्यग्रहण होता है;
। अन्यत्र खण्ड-ग्रास। चित्र देखिये।
। | पुराणों जो सूर्यग्रहण ओर चनद्रग्रहणमें राहु कारण बतलाया गया है, वह इस अभिप्रायसे
| | है-अमृत-मन्थनके समय जव राहुका सिर काटकर अलग कर दिया गया, उस समय 1
मु पीनेके कारण उसका मरण नहीं हुआ। वह एकसे दो हो गया। ब्रह्माजीने उन दोनोरपसं एक
^ ` (राहु )-को चन्द्रमाकौ छायाम ओर दूसरे (केतु)-को पृथ्वीका छायाम रहनैके लिये स्थान
दिया। अतः ग्रहण-समयमें राहु ओर केतु सूर्यं ओर चन्द्रमाके समीप ही रहता है । अतः
छायारूप राहु-केतुके द्वारा ही ग्रहणका वर्णन किया गया है।
१. मान लीजिये पूर्णिमान्तकाल घट्यादि ४०।४८ ओर उस समयका स्य सूर्य राश्यादि ८। ०। १२१६, चद्धरमा
२। ०। १२। १ तथा राहु ७। २८। २३। १८ टै तो स्पष्ट सूर्यं ८। ०। १२। ६ मं गहु ७। २८। २३। १८ को चटानैसे
०। १।४८।४८ व्यगु हुआ; यह ३ रशिसे कम टै, अतः इसका भुजांश इतना ही अर्थात् १।४८। ४८ हुआ । यह १४ अशसे
कम है, इसलिये ग्रहणकी सम्भावना निध्चित दुई । व्यगुके भुजांश १। ४८। ८८। को ११ सं गृणा करक गुणनफल १९ ५६।
४८ में ७ का भाग देनेपर भागफल २। ^०। "शर ' हुआ। यह व्यगुके उतर गौलमं निके कारण उर दिशाका हुा।
यहो श्रीसनन्दन मुनिने चन्द्रादिके मध्यम विम्ब प्रसिद्ध नेसे स्पष्ट विम्बका साधन-प्रकार् नहीं कहा है। अतः
सरलतापूर्वक समञ्लनेके लिये चद्ध, रवि ओर भृभा (पृथ्वकी छया) के विम्ब -साधनक्रा प्रकार यदह दिखलाया जाता टै।
((-0. 1\॥(11114/5511॥1 21188 \/818/185। (01661010. 01411260 0 60810011
२७२
संक्षिप्त नारदपुराण
करके गुणनफलका जो मूल हो उसमे अपना
षष्टांश घटाकर शेषमें चन्द्र-विम्बसे भाग देनेपर
लब्धि-प्राप्त घटी आदिको स्थित्यर्ध* समञ्च ।
इस स्थित्यर्धको दो स्थानोमे रखे। व्यगु
(व्यग्वर्क-राह घटाया हुआ सूर्य) यदि &
या १२ राशिसे ऊन हो तो द्विगुणित व्यगु
भुजांशतुल्य पलको प्रथम स्थानगत स्थित्यर्धमें
घटावे ओर द्वितीय स्थानवालेमे जोड़े । यदि व्यगु
६ या १२ से अधिक हो तो विपरीत क्रमसे
(प्रथम स्थानम जोड़ने ओर द्वितीय स्थानमें
घटानेसे) स्पर्श ओर मोक्षकालिक स्पष्ट स्थित्यर्धं
होते हैँ ॥ १५१-- १५४॥
ग्रासे नखाहते छाद्यमानापे स्युर्विंशोपकाः।
पूर्णान्तं मध्यमत्र स्यादृर्शान्तेऽङ्ख त्रिभोनकम्।॥। ९५५ ॥
पथक् तत्क्रान्त्यक्षभागसस्कृतो स्युर्नताशकाः।
तद् द्विद्धयंशकृतिर्दिप्री बूनाधरकियुता हरः ॥ १५६॥
गतिदवघ्रीशापाङ्गुलमुखतनुः
चचान्द्रीगतिरपहता
रदाद्या
नृपाश्चोना
स्यात्
विधोर्भक्तिर्वेदाद्रिभिरपहता
भूभा
त्रिभोनाङ्खार्कविश्लेषांशाशोनघ्राः पुरन्दराः
हराप्ता लम्बनं स्वर्णं वित्रिभेऽर्काधिकोनके ॥ १५७॥
विश्चघ्रलम्बनकलाद्योनस्तु तिथिवद् व्यगुः।
शरोऽतो लम्बनं षड्घ्नं तल्लवाद्योनवित्रिभात्।॥ ९५८॥
नतांशास्तदशांशोनघ्रा धृत्यस्तद्धिवर्जितेः।
सष्टन्देलिपतैः षड्भिस्तु भक्ता नतिर्नतांशदिक् ॥ ९५९ ॥
तयोनाढ्यो हि भित्नैकदिक् शरःस्फुटतां व्रजेत्।
ततश्छन्नस्थितिदले साध्ये स्थित्यर्धषड्ढतिः ॥ ९६०॥
अंशास्तेर्वित्रिभं द्विष्टं रहितं सहितं क्रमात्।
विधाय ताभ्यां संसाध्ये लम्बने पूर्वत्तयोः॥ १६९॥
पूवोक्ते संस्कृते ताभ्यां स्थित्यद्धं भवतः स्पफुटे।
ताभ्यां हीनयुतो मध्यदर्शः कालौ मुखान्तगो ॥ ९६२॥
( ग्रहणक्ता विंशोपक ( विस्वा) फल- )
अज्गुलादि ग्रासमानको २० से गुणा करके गुणनफलमें
अङ्गुलात्मक छाद्यमानसे भाग दे, जो लब्धि अवे,
वह विंशोपक फल होता हैर।
खररुचो
विम्बमुदितम्।
लोचनकरे-
स्यादिनगतिनगांशेन रहिता ॥
( श्रीविश्वनाथ दैवज्ञ)
सूर्यकी गतिको २ से गुणा करके गुणनफलमें १९ से भाग देनेपर जो लब्धि आवे, उतना ही सूर्यका अङ्गुलादि विम्बमान
होता हे तथा चद्मराकी गतिकलामे ७४ से भाग देनेपर जो लब्धि हो, उतने अ्गुलादि चन्रविम्बका मान होती हे। चद्द्रमाकी
गतिमें ७१६ घटाकर शेषम २२ से भाग देनेपर लब्धिको ३२ में जोड; फिर उसमें सूर्यगतिके सप्तमांशको घटानेसे भूभा
(पृथ्वीकी छाया) होती हे।'
यथा--स्यष्ट सूर्यगति ६१९। ११९ ओर चन्द्रगति ८२४।५ है तो उक्त रीतिसे सूर्यगतिके द्विगुणित १२२। २२ में ११ से भाग
देनेपर भागफल १९। ७ सूर्यविम्ब हुआ। तथा चन्द्रि ८२४। ५ मं ७६ से भाग देनेपर भागफल ११। ८ चन्दरविम्ब
हआ। चन्द्रगति ८२४। ५ मे ७१६ घयकर शेष १०८। ५ में २२ से भाग देनेपर लब्धि ४। ५५ में ३२ जोडुनेसे २६। ५५
ह; इसमें सूर्यगति ६१।११ का सप्तमांश ८। ४४ घयनेसे शेष २८। ११ भूभाका विम्ब हुआ । अव खाद्य (चद्ध)
ओर छदक
(भूभा)-के विम्बके योग ११। ८+२८। ११-३९। १९ के आधे १९। ३९ मे पूर्वसाधित शर २।५० को धयनेसे शेष १६।
४९ ग्रसमान हआ; यह छाद्य (चन्र) विम्वसे अधिक है अतः इस चद्रविम्ब ११।८ को घयनेसे शेष ५।५१ खग्रास हुभ।
१. स्पर्शकालसे मोक्षकालका जो अन्तर है, उसे स्थिति कहते है । अतः उसका आधा मध्यम स्थित्यर्थं कहलाता है।
स्पर्शकालसे मध्यकालतक स्पर्शस्थित्यर्धं ओर मध्यकालसे मोक्षकालतक मोक्षस्थित्यर्धं कहलाता है।
२. जैसे- छाद्य (चन्दर) ओर छादक (भूभा)-के विम्बयोग ३९।१९ के आधे १९।३९ मेँ शर २।५० को जोड्नेपर
२२1 २९ हआ; इसको १० से गुणा करनेसे गुणनफल २२४।५० को ग्रासमान १६। ४९ से गुणा करनेपर ३७८०। ५६।
८५५ हज | इसके
मूल ६१। २९ में अपने ही षष्ठंश १०। १५ को घटानेपर शेष ५१। १४ मं चन््रमाके विम्ब ११। ८
का भाग दिया तो लब्धि घस्यादि पल ४। ३६ स्थित्यर्धं हुआ।
व्यगुभुजांश १1 ४८1४८ को २ से गुणा करनेपर गुणनफल ३। ३७। ३६ पल अर्थात् स्वल्पान्तरसे ४ पल हुए । इन
पलोको व्यगु (राहु घटे हुए सूर्य) -के ०=१२ राशिसे अधिक होनेके कारण स्थित्यर्थं ४। ३६ में जोड़नेसे
४ । ८० ओर स्थित्यर्धमें ४ पल घटानेसे ४। ३२ मोक्षस्थित्वर्धं हआ।
३. जैसे- ग्रासमान १६।४९ को २० से गुणा करनेपर गुणनफल ३३६। २० में छाद्यमान ११।८ से भाग दिया
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
( सूर्यग्रहणमें विशेष लम्बन-घषटी-साधन-- )
पर्वान्तकालमें ग्रहणका मध्य होता हे । सूर्यग्रहणमें दर्शान्त
कालिक लग्र बनाकर उसमें तीन राशि घटानेसे "वित्रिभ'
या 'त्रिभोन' लग्र कहलाता है । उसको पृथक् रखकर
उसको क्रान्ति ओर अक्षाशके संस्कार (एक दिशामें
योग, भिन्न दिशामें अन्तर) करनेसे ' नतांश' होता ठे।
उसका २२ वों भाग करके वर्गं कसना चाहिये। यदि २ से
कम हो तो उसीमे, यदि २ से अधिक हो जाय तो २ घयकर
शेषके आधेको उसी (वर्ग) -मे जोड़कर पुनः १२ में जोडनेसे
"हार" होता हे। 'त्रिभोन' लग्र ओर सूर्यके अन्तरांशके
दशमाशको १४ मं घयकर् शेषको उसी दशमांशसे गुणा करे ।
उसमे पूर्वसाधित हारसे भाग देनेपर लव्धितुल्य घस्यादि
लम्बन होता है। यह (लम्बन) यदि वित्रिभ सूर्यसे
अधिक हो तो धन, अल्प हो तो ऋण होता हे। अर्थात्
साधित दर्शन्तकालमें इस लम्बनको जोडने-घटानेसे
पृष्टस्थानीय दर्शान्तकाल होता ह ॥ १५५- १५७ ॥
घस्यादि लम्बनको १३ से गुणा करनेपर गुणनफ़ल
तो लब्ध ग्रहणविंशोपक बल ३०। १३ हआ। जब विंशोपक २० होता है तो ग्रहणका पुराणोक्त साधारण फल हाता
२७३
कलादि होता हे। उसको व्यग्वर्कमें जोट या घटाकर
` शर" वनावे तो (पृष्ठीय दर्शन्तकालिक) शर (स्पष्ट)
होता हे। तथा घरयादि लम्बनको ६ से गुणा करके
गुणनफलको अंशादि मानकर वित्रिभमं जोड या घटाकर
नतांश-साधन करे । नतांशके दशमांशको १८ मं घटाकर
शेषको उसी दशमांशसे गुणा करे; गुणनफलको ६ अंश
१८ कलामें घटाकर जो शेष वचे, उससे गुणनफलमें ही
भाग देनेसे लब्धि अङ्गुलादि नतांशको दिशाकौ ही नति
होती है। इस नति ओर पूर्वं साधित शर दोनोके संस्कार
(भिनन दिशा हो तो अन्तर, एक दिशा हो तो योग) -से
स्पष्ट शर होता हे । सूर्यग्रहणमें उसी शरसे ओर स्थित्यर्धं
वनावे। स्थित्यर्धको & से गुणा करके अंशादि
गुणनफलको वित्रिभमे घटावे ओर दूसरे स्थानमें जेदे।
इन दोनों परसे पूर्वविधिसे प्रथक् लम्बनसाधन करके
क्रमशः पूर्वविधिसे साधित स्पशं ओर मोक्षकालमें
संस्कार करनेसं स्पष्ट पृष्टस्थानीय स्पर्शं ओर मोक्षकाल
होते हे *॥ १५८--१६२॥ ।
= न
[1 श
हे । यदि विंशोपक २० से कम दहो तो कथित फल बलके अनुसार अल्प ओर २० सं अधिक हो तो कथित फल
अधिक होता हे।
१. उदाहरण- जहाँ दक्षिण अक्षांश २५। २६। ४२, स्पष्ट दर्शान्तकाल घटी-पल १३। ४, दशान्तकालिक स्पष्ट मूर्थ
८। ५। २६। २५, स्पष्ट चन्द्रमा ८।५। २६1 २०, राहु २। ११। ४१। १८, स्म सूर्यगति ६१। १५ ओर स्पष्ट चनद्रगति
७२६। ३० है तो उक्त घटी-पलको इष्ट मानकर लग्र वनानेसे ११। २। ४६ १७ लप्र हुआ। इस ३ राशि घटानेषर त्रिभोन
लग्र (वित्रिभ) ८। २।४६। १७ हुआ। पूर्वोक्त रीतिके अनुसार साधन करनेपर इसकी ऋन्ति २३। ३८। १० हई; यह वित्रिभक
दक्षिण गोले होनेके कारण दक्षिण दिशाकी हुई । अतः इसको दक्षिण दिशाके अक्षांश २५। २६। ४२ मं जौडुनेपर 1
४।५२ नतांश हुए। उक्त नतांशके २२ वें भाग २। १३।५९१ करा वर्ग करनेषर् ४।५८ हभ, यह २ सं अधिक द, इमलिवर
इसमे २ को घयनेपर शेष २।५८ हुआ। इसके आधे १। २९ क्रो उसी वर्गं ४1 ५८ मं जौुनेसे ६। २७ हुञओआ। ईस १२ मं
जोड्नेपर १८। २७ ' हार' हुआ। तथा वित्रिभ लग्र ८। २। ४६। १७ ओर् सूर्यं ८। ५। २६। २ के अन्तरोश॒ २।४०। ८
का दशमांश ०। १६ हुआ। इसको १४ में घानेपर शेष १३। ४४ टा । इसको उसी दशमां ०। १६ स गुणा कगनपर् गुणनफल
२। ३९ हआ। इसे हार १८। २७ का भाग देनेपर भागफल ०। ११ हुआ; यह (ग्यारह पल) लम्बन दुभा। सूर्य्र वित्रिभ
अल्प होनेके कारण दर्शान्त घटी १३। ८ में इसन लम्बन १९१ पलको घयनेसे पषस्थानीय घय्यादि दर्शान्तकाल १२। ५३ दुआ।
अव घस्यादि ०। ११ लम्बनको १३ से गुणा किया तो गुणनफल २। २३ कलादि हुआ। उक्तं लम्यनके ऋष
होनेके कारण सूर्य ८। ५। २६। २५ में राहु २। ११1 ४१। १८ का अन्तर करनेसं व्यग्वकं ५। २३। ४५। ७ हु आ।
इसमें २। २३ कलादिको घटानेपर ५। २३। ४२। ४४ पृष्टस्थानीय व्यग्वकं हुआ! इसको £ राशिमें घटानेपर् शेष ०।
६। १७। १६ यही भुजांश हआ। इसको पूर्वोक्त शर- साधन-विधिके अनुसार ११ से गुणा करके ७ का भाग देनेपर्
लब्ध अद्गलादि ९।५२ शर हआ। यह व्यगुके उत्तर गोलमं (£ राशिसं कम) होनेके कारण उत्तर दिशाका हुआ)
फिर लम्बन ०।११ को से गुणा करनेपर गुणनफल अंशादि १।६ को (ऋणलप्बन होनेके कारण) वित्रिभ
लप्र ८। २। ४६। १७ में घटानेपर ८। १।८०। १७ दुआ ¦ इसमे क्रन्ति-साधन-विधिके अनुसार दक्षिण दिशाकी
क्रान्ति २३। ३४। ३५। हई । इसको दक्षिण दिशके अश्वांश २५।.२६ ! ६२ मं जदुनेये ८९1 १। १७ दक्षिण दिशका
पृषठस्थानीय (स्पष्ट) नतांश हआ। इस न्तांशमं १० क्रा भाग दनपर् लब्ध कलादि ८। ५८६ करौ १८ घटानेसे भेष
१३। ६ रहा। इसको उक्त दशमांश ४। ५८ च दही गुणा करनपर ६८। १९५ कलादि दुआ; इसक्रे अश १।५। ११
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६१
७ संक्षिप्त नारदपुराण
अर्का घना विश्च ईशा नवपञ्चदशांशकाः। प्रतिविम्बके अन्तर-प्रमाणको दृष्टिको ऊचार्हसे भाग
कालांशास्तेरूनयुक्ते रवौ ह्यस्तोदयो विधोः ॥ १६३॥ | देकर लब्धिको १२ से गुणा करनेपर उस समय उस
दृष्टा ह्यादौ खेटविम्बं दूगोच्यं लम्बमेश्य च। ग्रहको छायाका प्रमाण होता हे‹॥ १६४॥
तल्लम्बपातविम्बान्तर्दूगोच्याप्तरविघ्रभा ॥ १६४॥ | अस्ते सावयवा लेया गतेष्यास्तिथयो वुधेः।
( ग्रहोके उदयास्तकालांश- ) १२, १७, १३, | शरेन्द्राप्तोत्तराशा सा संस्कृताकपिमेर्विधोः ॥ ९६५॥
१९१, ९, १५ ये क्रमसे चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र | षोडशघ्रतिधिर्हीना स्वध्रतिथ्याक्षभाहता ।
ओर शनिके कालांश हैं । अपने-अपने कालांशतुल्य | व्यस्तेषु क्रान्तिभागेश्च दविघ्रतिथ्या हता स्फुटम्॥ १६६॥
सूर्यसे पीछे ग्रह होते हँ तो अस्त ओर कालांशतुल्य | संस्कारदिक्छ वलनमङ्कुलाद्यं॑ प्रजायते ।
सूर्यसे आगे होते हें तो उदय होता है । (अर्थात् ग्रह | स्वेष्वंशोनाः सितं तिथ्यो बलनाशोत्नतं विधोः ॥ ९६७॥
अपने-अपने कालांशके भीतर सूर्यसे पीछे या आगे | शृद्गमन्यन्नतं वाच्यं वलनाङ्गुललेखनात्।
जवतक रहते हँ, तवबतक सूर्य साननिध्यवश अस्त | ( चनद्रशृद्धोत्रति-ज्ञान-- ) सूर्यास्त-समयमें
(अदृश्य) रहते हें) ॥ १६३ ॥ सावयव गत ओर एष्य तिथिका साधन करे । उस
( ग्रहोके प्रतिविम्बद्वारा छायासाधन-- ) सम | सावयव तिथिको १६ से गुणा करके उसमें तिथिके
भूमिमें रखे हए दर्पण आदिमे ग्रहोके प्रतिविम्बको | वर्गको घटाकर शेषको स्वदेशीय पलभासे गुणा करे।
देखकर दृष्टिस्थानसे भूमिपर्यन्त लम्ब पातकर | गुणनफलमें १५ से भाग देकर लब्धि (फल)-कौ
दृष्टिको ऊचाईका मान समञ्ञे। लम्बमूल ओर । दिशा उत्तर समञ्ञे। उसमें सूर्यको क्रान्तिका यथोक्त
को ६ अंश १८ कलमे घटानेपर ५। १३। ४९ हुआ। इससे उपर्युक्त गुणनफल ६४। ११ में भाग देनेपर लब्धि १२। १८
अङ्कुलादि नति हई । दक्षिण नतांश होनेके कारण इसकी दिशा दक्षिण हुई ओर पूर्वसाधित अङ्गुलादि शर् ९।५२ यह उत्त
दिशाका हे; अतः भिन्न दिशा होनेके कारण दोनोंका अन्तर २। २६ अङ्गुलादि स्पष्ट शर हुआ। इसं स्पष्ट शरके द्वार चद्ग्रहणकी
भोति ग्रासमान आदि साधन कलेके लिये सूर्यस्पष्ट गति ६१। १५ को २ से गुणा कर गुणनफलमें ११९ का भाग देनेपर सूर्यविम्ब ११।
८ हआ ओर चन््रस्पष्ट गति ७२६। ३० में ७४ का भाग देनेपर चन््रविम्ब ९।४९ हुआ। इन दोनोंका योगका आधा किया तो १०।
२८ हभ, उसमे स्पष्ट शर २। २६. को घयनेपर शेष अद्भुलादि ८। २ यह ग्रासमान हआ।
अव्र स्थिति-घटी-साधन् करके लिये सूर्य ओर चेद्धके विम्बयोगार्धं १०। २८ मं स्पष्ट शर २।२६ को जोडनेपर योगफल
१२। ५४ हुआ। इसको १० से गुणा करनेपर गुणनफल १२९। ० को ग्रासमान ८।२ से गुणा किया तो गुणनफल १०३६। १८
हआ। इसके मूल ३२। ११ में इसके पष्ठंश ५।२२ को घटानेपर शेष २६।४९ में चद्धविम्ब ९।४९ का भाग देनेपर लब्धि घट्यादि
२। ४४ स्थिति-घय हूई।
अव स्थिति-घटी २। ४८ को ६ से गुणा करके गुणनफल अंशादि १६। २४ को वित्रिभ लप्र ८। २। ४६। १७ मेँ घनेसे
७। १६।२२। १७ स्पर्शकालिक वित्रिभ हुआ। तथा दर्शन्तकालकी गति ६१। १५ को स्थिति-घटरी २।४४ द्वग गुणा कर्के गुणनफल
१६७ मं ६० का भाग देनेपर लब्धि २। ४७ को दर्शन्तकालिक सूर्य ८। ५। २६। २५ मँ घटनेपर स्पर्शकलिक सूर्यं ८।५। २३। ३८
हभआ। इन स्पर्शकालिक सूर्यं ओर वित्रिभ लग्रके द्वार पूर्वदरित विधिसे स्पर्शकालिक ऋणलम्बन १। १७ घय्यादि हुभ।
इसी प्रकार स्थिति-घटी २। ४८ को ६ से गुणा करनेपर अंशादि फल १६। २४ को वित्रिभ लप्र ८।२। ४६। १७ में जोडुनेसे
मोक्षकालिक वित्रिभ लग्र ८। १९1 १०। १७ हुआ। एवं सूर्यगति ६१। १५ को स्थिति-घटी २।४४ से गुणा कर् गुणनफल १६७
मे ६० का भाग देनेपर भागफल २। ४७ को सूर्य ८।५। २६। २५ मं जोडुनेसे मोक्षकालिक स्पष्ट सूर्य ८।५। २९। २२ हुआ।
इन दोनों (वित्रिभ ओर सूर्य) के द्वार पूर्वकथितं विधिसे मोक्षकालिक धनलम्बन (सूर्यये वित्रिभ अधिक होनेके कारण) घय्यादि
० । ५६ हुआ।
अव दर्शन्तकाल १३।४ मं स्थिति-घटी २।४८ को चटानेसे १०। २० मध्यमस्पर्शकाल हआ, इसमें स्पर्शकालिक ऋणलम्बन
१1 १७ को घरानेसे ९।३ स्पष्ट (भृपृष्स्थानीय) स्यर्शकाल हआ तथा दर्शन्तकालमें स्थिति-घटी जोडनेपर मध्यम दर्शान्तकाल
१५। ४८ हुआ। एवं इसमे मोक्षकालिक धनलम्बन ०। ५६ जोडनेपर १६। ४४ स्यष्ट मोक्षकाल हुआ।
१. उदाहरण--यदि समभूमिसे लम्बमान (दृष्टिकी ऊंचाई) ७२ _ अद्भल. ओर द्रष्टा तथा प्रतिविम्बका अन्तर
भृमिमान ९६ अङ्कुल हे, तो उक्त रीतिके अनुसार भूमिमान ९६ को दृष्टिकी ऊंचाई ७२ से भाग देकर १२ से गुणा करनेपर
“~: =१६ अद्कल छायाप्रपाण हुआ।
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 14111260 0 66810011
पूर्व भाग-द्वितीय पाद
संस्कार (एक दिशामें योग, भिन्न दिशामें अन्तर)
करे। तथा चन्द्रमाके शर ओर क्रान्तिका विपरीत
संस्कार करके जो फल हो उसमें द्विगुणित तिथिसे
भाग देनेपर जितनी लब्धि हो, उतना अङ्गुल
संस्कार-दिशाका वलन होता है । चन्द्रमासे जिस
दिशामें सूर्य रहता हे, वही संस्कारको दिशा समञ्ञी
जाती हे । तिथिमें अपना पञ्चमांश घटानेसे शुक्ल
(चनद्रके धेत भाग)-का अङ्गुलादि मान होता हे।
वलनको जो दिशा होती है, उस दिशाका चनदरशृद्ख
उन्नत ओर अन्य दिशामें नत होता है। तदनुसार
परिलेख करना चाहिये* ॥ १६५-- १६७ ३ ॥
पड्र्त्वगाङ्वशिखाः कर्णशेषहताः पृथक् ॥ १६८ ॥
प्रकृत्याकाद्कसिद्धाग्रिभक्ताः लब्धोनसंयुताः।
त्रिज्याधिकोने श्रवणे वपूंषि व्रिहताः कुजात्॥ ९६९॥
ऋज्वोरनृज्चोर्विवरं गत्यन्तरविभाजितम्।
वक्र्ज्वोर्गतियोगाप्तं गम्येऽतीते दिनादिकम्॥ १७०॥
स्वनत्या संस्कृतो स्वेषु दिक्साम्येऽन्येऽन्तर युतिः ।
याम्योदक््खेटविवरं मानैक्यार्धाल्पकं यदा ॥ ९७१॥
तदा भेदो लम्बनाद्यं स्फुटार्थं सूर्यपर्ववत्।
२७९५
( ग्रहयुति-ज्ञानार्थ मद्कलादि पांच ग्रहोके
विम्बसाधन-- ) मद्धलादिके ५, ६, ७, ९, ५ इन
मध्यमविम्बमानोको क्रमसे मङ्गलादि ग्रहकि कर्णशेष
(त्रिज्या ओर अपने-अपने शीघ्र कर्णि अन्तर)-से
गुणा करके गुणनफलको २ स्थानें रखे। एक स्थानम
क्रमसे मङ्गलादि ग्रहके २९१, १२, ६, २४ ओर ३ का
भाग देकर लब्धिको द्वितीय स्थानमें स्थित गुणनफलमें
यदि कर्णं त्रिज्यासे अधिक हो तो घटवे, यदि त्रिज्यासे
अल्प हो तो जोड़े, फिर उसमें ३ से भाग देनेपर क्रमशः
मङ्गलादि ग्रहकि विम्ब-प्रमाण होते है ।
( ग्रहो की युतिके गत-गम्य दिन-साधन- )
जिन दो ग्रहोके युतिकालका ज्ञान करना हो, वे दोनों
मार्गीं हो, अथवा दोनों वक्री हां तो दोनों ग्रहोकी
अन्तर-कलामें दोनोको गत्यन्तर-कलासे भाग देना
चाहिये । यदि एक वक्र ओर एक माग हो तो दोनोकीं
गति-योगकलासे भाग देना चाहिये । फिर जो लब्धि
आवे, वह ग्रहयुतिके गत या गम्य दिनादि है।
( ग्रहोंकी युतिमें भेद-ज्ञान-- ) जिन दो ग्रहोकी
युति होती हो, उन दोनोके अपनी-अपनी नतिसे
इस प्रकार रत्रिमे मङ्गलादि ग्रहंकी छायाका प्रमाण समञ्चा जाता हे, जो ग्रहयुति आदिमं उपयुक्त होती है।
१. उदाहरण-शुक्लपक्षकी द्वितीयामें सायंकालिक चनद्रमाकौ शद्धोत्नति जाननेके लिये मान लीजिये उस समयक
सावयव (घडीसहित) तिधि २। ३०, सूर्यकी उत्तरक्रान्ति १०, चन्द्रमाका उत्तर शर ५ ओर चद््रमाको उत्तर क्रान्ति ६ हो
तो कथित रीतिसे सावयव तिथि २।३० को १६ से गुणा कर गुणनफल ४० में सावयव तिधिके वर्गं ६। १५ क्रे घयानेमे शेय
३३। ४५ रहा; इसके पलभा ६ से गुणा कर गुणनफल २०२। ३० म १५ से भाग देनेपर लब्धि १३। ३० यह उत्तर दिशाका
फल हुआ। इसमें सूर्यकी उत्तरक्रान्ति १० (एक दिशा होनेके कारण) जोडुनेसे २३1 ३० हआ। तथा (एक दिशा हानेके
कारण) चन्द्रमाके उत्तर शर ५ ओर उत्तरक्रान्ति ६ इन दोनकि योग ११ को उत्तर दिशाके फल १३। ३० मं विपरीत
संस्कार करने (घयने)-से शेष २।३० रहा। इसे द्विगुणित तिथि २। ३०५२५ से भाग देनेपर लब्ध व ०। ३०
स्पष्ट वलन हआ; यह चन्द्रमसे सूर्यको दक्षिण दिशामं होनेके कारण दक्षिण दिशाका हुआ। एवं सावयव रिध २। ३०
मे अपना पञ्चमांश ०।३० षटनेसे २। ० अब्गुलादि शुक्लमान हुआ। इस प्रकार उस दिन दक्षिण दिशाका चन््रृ्ग उतरत हुर।
२. यहाँ त्रिज्याका प्रमाण ११ ग्रहण करना चाहिये ।
३. जैसे- यदि मद्भलका शीघ्रकर्णं १३ है तो त्रिज्या ११ ओर कर्णं १३ के अन्तर २ से मङ्गलके मध्यम विम्बमान
५ को गुणा करनेपर १० हुआ; इसमें २१ का भाग देकर भागफल ०। २९ को (त्रिज्यासे कर्णि अधिक होनेके कारण)
गुणनफल १० मे घटानेपर शेष ९। ३१ मं ३ का भाग दिया तो फल अङ्गुलादि ३। १० मङ्गलका स्पष्ट विम्बमान् हुआ।
इसी प्रकार अन्य ग्रहोका भो जान लेना चाहिये!
४. जैसे- मङ्गल ओर शुक्रका युतिसमय जानना है तौ कल्पना कौजिये कि उस दिन स्पष्ट म्ल ७। १५५। २०1 २५,
मद्गलकी स्पष्ट गति ४०। १२, स्पष्ट शुक्र ७। १०।३०। २५ तथा शुक्रकी स्पष्ट गति ७०। १२ है तो यदा शीघ्र (अधिक)
गतिवाला शुक्र मद्धलसे अल्प (पीद्े) टै, अतः दोनाकौ युति भावी है-एेपा निश्चित हृभा। ये दोनों मागीं हा तो उक्त
रीतिसे मङ्गल ७। १५। २०। २५ पं शुक्र ७। १०। ३०। २५ क्रो घटाकर शेष ०। ४1५ कलाम शुक्रगति ७०। १२ ओर
मङ्गलगति ४०। १२ के अन्तर ३० गत्यन्त-कलासे भाग देनेपर लब्धि ०।९।४० गम्य दिनादि दईं अर्थात् इतने समयके
बाद योग होनेवाला दै।
[ 1183 ] सं० ना० पु० १०-
((-0. 1८111551 8118281 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
२७६
संस्कृत शर (भूपृष्ठस्थानाभिप्रायिक शर) एक
दिशाके हों तो अन्तर, यदि भिन्न दिशाके हो तो योग
करनेसे दोनों ग्रहोंका अन्तर (दक्षिणोत्तरान्तर)
होता है । यह अन्तर यदि दोनोके विम्बमान-
योगार्धसे अल्प हो तो उनके योगमें भेद (एकसे
दूसरा आच्छादित) होता हे। इसलिये इनमें
नीचेवालेको छादक ओर ऊपरवालेको छाद्य
मानकर सूर्यग्रहणके समान ही लम्बन, ग्रासमान
आदि साधन करना चाहिये ॥ १६८-- १७१ द ॥
एकायनगतौ स्यातां सूर्याचन्द्रमसौ यदा।
तद्युते मण्डले ब्रछान्त्योस्तुल्यत्वे वेधृताभिधः॥ १७२॥
विपरीतायनगतौ चन्द्राकौ क्रान्तिलिपिकाः।
समास्तदा व्यतीपातो भगणा तयोर्युतौ ॥ १७३॥
भास्करेन्द्रोभचन्छान्तश्चक्रार्धावधि संस्थयोः।
दूकूतुल्यसाधितांशादियुक्तयोः स्वावपक्रमो ॥ ९७४॥
अथोजपदगस्येन्दोः ऋान्तिर्विक्षपेसंस्कृता।
यदि स्यादधिका भानोः क्रान्तेः पातो गतस्तदा ॥ ९७५ ॥
न्यूना चेत्स्यात्तद्दा भावी वामं युग्मपदस्य च।
पदान्यत्वं विधोः ऋान्तिर्विक्षेपाच्चेद् विशुद्धयति ॥ १७६ ॥
क्रान्त्योज्यं त्रिज्ययाभ्यस्ते परमापक्रमोद्धूते।
तच्यापातरमर््ध वा योज्यं भाविनि शीतगौ ॥१९७७॥
शोध्यं चन्द्राद्रते पाते तत्सूर्यगतिताडितम्।
चन्द्रभुक्त्या हृतं भानौ लिप्तादि शशिवत्फलम्॥ ९७८ ॥
तद्रच्छशाड्धपातस्य फलं देयं विपर्ययात्।
कर्मेतदसकृत्तावत्क्रान्ती यावत्समे तयोः ॥ ९७९॥
( पाताधिव्छार--पातकी संञ्ञा-- ) जब सूर्य ओर
चन्द्रमा दोनों एक ही अयन (याम्यायन-दक्षिणायन
अथवा सौम्यायन-उत्तरायण)-में हों तथा उन
दोनोके राश्यादि योग १२ राशि हो तो उस स्थितिमें
दोनोके क्रान्तिसाम्य होनेपर वैधृति नामका पात
कहलाता हे । तथा जब दोनों भिन्न (पृथक्-पृथक्)
अयनमें हों ओर दोनोंका योग ६ राशि हो तो उस
संक्षिप्त नारदपुराण
स्थितिमें दोनोके क्रान्तिसाम्य होनेपर व्यतीपात नामक
पात होता हे ।
जब सूर्य-चन्द्रका अन्तर चक्र (०) या ६ राशि
हो, उस समयमे तात्कालिक अयनांशादिसे युक्त सूर्य
ओर चन्द्रमाको अपनी-अपनी क्रान्तिका साधन करे।
यदि शर-संस्कृत चनद्रमाकौ क्रान्ति (स्पष्टा क्रान्ति)
तात्कालिक सूर्यको क्रान्तिसे अधिक हो तथा चन्द्रमा
यदि विषम पदमे हो तो पातकालको गत (बीता
हुआ) समञ्जना चाहिये । यदि विषमपदस्थ चनद्रमाकौ
शर-संस्कृत क्रान्तिसि अल्प हो तो पातकालको भावी
(होनेवाला) समञ्जना चाहिये । यदि चन्द्रमा समपदमें
हो तो इससे विपरीत (सूर्यकी क्रान्तिसे चन्द्रमाकौ
स्पष्ट क्रान्ति अधिक हो तो भावी, अल्प हो तो गत)
पातकाल समञ्े । यदि स्पष्ट क्रान्ति बनानेमें चन्द्रमाके
शरमं क्रान्ति घटायी जाय तो इस स्थितिमें चन्द्रमा-
के विम्ब ओर स्थानमें पदकी भिन्नता होती हे।
( स्फुट-क्राम्ति-साम्य-ज्ञान-प्रकार-- ) सूर्य ओर
चन्द्रमा दोनोको ' क्रान्तिज्या ' को त्रिज्यासे गुणा करके
उसमें परम क्रान्तिज्यासे भाग देकर जो लब्धियां
हो, उन दोनोके चाप बनाये । उन दोनों चापोंका जो
अन्तर हो उसको सम्पूर्णं या अर्धं (कुछ न्यून)
करके गम्य पात हो तो चनद्रमामें जोड; गतपात हो
तो घटावे। पुनः उपर्युक्त चापके अन्तर या उसके
खण्डको सूर्यकी गतिसे गुणा करके गुणनफलमे
चन्द्रगतिसे भाग देकर जो लब्धि (कलादि) हो,
उसको चन्द्रमाके समान ही सूर्यमें संस्कार करे
(गम्यपात हो तो जोडे, गतपात हो तो घटावे)।
इसी प्रकार (सूर्यं फलवत्=उक्त चापान्तरको
चन्द्रपातकी गतिसे गुणा करके उसमें चन्द्रगतिसे
भाग देकर) लब्धिरूप चन्द्रपातके कलादि फलको
चन्द्रपात (राहु) -में विपरीत संस्कार करे (गत-
पातमें जोड, गम्य पातमें घटावे) तो पातकालासन्न
१. जब दो ग्रहोके क्रान्तिवृत्त एक ही समान (पूर्वापर अन्तरका अभाव) होता है, तब उन दोनंको युति
(योग) समद्ली जाती है। ग्रहोकि इस प्रकार परस्पर योगसे शुभाशुभ फल संहितास्कन्धमे कहा गया है । इसीलिये
ग्रहयुति-समयका ज्ञान आवश्यक है।
((-0. 1/८1114<511॥ 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २७७
समयक सूर्य, चन्द्रमा ओर चन्द्रपात होते हे । फिर इस प्रकार ऋन्ति-साम्य हानिपर पात समञ्लना चाहिये।
इन तीनों (रवि, चन्द्र ओर चनद्रपात) के द्वारा उपर्युक्त | यदि उपर्युक्त क्रियाद्वारा प्राप्त अंशादिसे युक्त या हीन
क्रियाको तनतक बार-बार करता रहे जबतक दोनोंको | किया हुआ चन्रमा अर्धरात्रिकालिक साधित चन्द्रमासे
क्रान्ति सम न हो जाय ॥१७२- १७९ ॥ अल्प (पीछे) हो तो पातकालको “गत' समञ्च ओर
क्रान्त्योः समत्वे पातोऽथ प्रक्षिप्तांशोनिते विधो। यदि अधिक (आगे) हो तो पातकालको भावी समद्चे।
हीनेऽदधरात्रिकाद्यातो भावी तात्कालिकेऽधिके।॥ ९८०॥ ( अर्धरात्रिसे गत, गम्य पातकालका ज्ञान- )
स्थिरीकृतार्द्धरात्रे््ोर्दयोर्तिवरलिपिकाः । उपर्युक्त क्रियाद्वारा स्थिरीकृत (पातकालिक)
षष्ठिन्यश्चन्रभुक्टयाप्ताः पातकालस्य नाडिकाः ॥ १८१॥ | चन्द्रमा ओर अर्धरात्रिकालिक चन्द्रमा जो हों-इन
१. यदि सायन सूर्य ५। २६।४०। ० सायन चन्द्र ०। २।५। ०, पात (राहु ) ०।५।२८५। ०, सूर्यगति ६०। १८५, चद्धगति
७८३। १५ ओर राहु-गति ३। ११ ठे तो चन्द्र ०।२।५। ° ओर पात ०। ५। २५। ° के योग ०।७।३० सपातचन््रकी
भुजकला ४५० कीं ज्या ४४९ हुई । इसको चन्द्रमाके परम शर २७० से गुणा कर गुणनफल १२९१२३० में त्रिज्या ३४३८से
भाग देनेपर लब्धि चन्द्रमाकी शरकला ३६ हर; इसका चाप भी इतना ही हुआ। केवल चन्द्रमा ०।२।५। ° की भुजज्या
१२५ कलाको परमक्रान्तिज्या १३९७ से गुणा कर गुणनफल १७८४६२५ मं त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेपर लब्धि ५०
चन्द्रमाकी क्रान्तिज्या हुई; इसका चाप भी इतना ही हुआ। अतः चद्द्रमाके शर ३६ क्रान्ति ५० का योग करनेसे ८६ चदद्धमाकी
स्पष्ट क्रान्ति हई। ।
तथा राश्यादि सूर्य ५। २६।४०। ° को ६ राशिमं घटानेरमं भुज ०।३।२०।० की कला २०० की ज्या इतनी ही हूई।
इसको परमक्रान्तिज्या १३९७ से गुणा कर गुणनफल २७९४०० मं त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेपर लब्धि ८१ सूर्यकी ऋन्तिज्या
हई; इसका चाप भी इतना ही होनेके कारण यही सूर्यकी ऋन्ति हुई ।
सूर्यकी क्रान्तिसे विषम (प्रथम) पदस्थित चनद्रमाको क्रान्ति अधिक है, इसलिये यहां गतपात निशित हुआ तथा
सूर्य ओर चन्द्रमाके भिन्न अयन ( चन्द्रमाके उत्तरायण ओर सूर्यके दक्षिणायन) -मं होने एवं दोनोकि राश्यादियोग ६ राशि
होनेके कारण इस क्रान्तिसाम्यका नाम व्यतीपात हुआ।
अव, चन्द्र-क्रान्तिज्या ८६ को त्रिज्या २४३८ से गुणा कर गुणनफल २९५६६८ में परमक्रान्तिज्या १३९७ का भाग
देनेपर लब्धि २११ चन््रमाकौ भुजज्या हुई; इसका चाप भी स्वल्पान्तरसे इतना ही हुआ। एवं सूर्यकी क्रातिज्या ८१ को
त्रिज्या ३४३८ से गुणा कर गुणनफल २०४७८ में परमक्रान्तिज्या १३९७ का भाग देनेपर लब्धि सूर्यकी भुजज्या १९२ हुई;
इसका चाप भी इतना ही हुआ।
सूर्य ओर चद्भमाके चारपोका अन्तर केसे (२११- १९२) १९ कला हुई । इसके आधे (स्वल्पान्तरसे) १० कौ
मध्यरत्रिकालिक चन्रमा ०।२। ५। ° म घयनेसे पातासत्रकलिक चन्रमा ०। १।५५। ° हुआ। तथा उसी अन्तयार्धकला १०
कतर सूर्यकी गति ६०। १५ से गुणा कर गुणनफल ६०२। ३० मेँ चद्धगति ७८३। १५ का भाग देनेपर लब्धिफल १ कलाक
मध्यरत्रिकालिक सूर्य ५। २६। ४० में घयनेसे ५। २६। ३९ हआ। एवं उसी अन्तयार्धकला १० को गहुकी गति ३।११ से
गुणा कर् गुणनफल ३१। ५० में चन्द्रि ७८३। १५ का भाग देनेपर लब्धि ° हई । इसका विपरीत संस्कार करनेपर भी
मध्यरप्रिकालिक गहुके तुल्य ही तत्कालीन राह ०। ५। २५ हुआ।
अव, पातासन्नकालिक चन्द्र ०। १।५८५। ०, सूर्य ५1 २६। ३९। ० ओर गहु ०।५। २५। ० रहे। इनके द्राण पुनः ऋन्ति-
साधन किया जाता है। चन्रमा ०। १1 ५५। ° की भुजज्या ११५ को परमक्ऋन्तिज्या १३९७ से गुणा कर गुणनफल १६०६५८५
पे त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेपर लब्धि ४६ चन््रक्रान्तिज्या हई; इसका चाप भी इतना ही हुआ। तथा चद ०। १। ५५। °
ओर राहु ०1 ५। २५। ° का योग करनेसे सपातचन्द्र॒ ०।७। २० कौ भुजज्या ४४० को चनद्रके परमशर २७०
से गुणा कर गुणनफल १९१८८०० मे त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेपर लब्धि (स्वल्पान्तरसे) ३५ चन्द्रशरज्या हुई;
इसका चाप बनानेसे इतना ही चन्द्रश हुआ। चन्द्रशर ३५ को चन्दरक्रान्ति ४६ में जोढुनेसे ८१ कला दुई, इसका
अंश बनानेसे १। २१ चनद्रमाकी स्पष्क्रान्ति हुई। एवं तत्कालीन सुर्य ५। २६। ३९ कौ भुजज्यां २०१ को
परमक्रान्तिज्या १३९७ से गुणा कर् गुणनफल २८०७९२७ में त्रिज्या ३४३८ का भाग देनेपर लब्धि ८१ सूर्यकी
क्रान्तिज्या हुई; इसका चाप भी इतना ही दु आ। इसको अंशात्मक वनानेसं १। २१ सूर्यकी क्रान्ति दई । अतः यहाँ
सूर्यं ओर चन्द्रमाकी क्रान्तियोमं समता हई ।
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/818185। (01661010. 01411260 0 6810011
२७८
संक्षिषत नारदपुराण
दोनोंकी अन्तरकलाको ६० से गुणा करके
गुणनफलमें चन्द्रक गति-कलासे भाग देनेपर जो
लब्धि हो, उतनी घटी अर्धरात्रिसे पीके या आगे (गत
पातमे पीछे, गम्य पातमें आगे) तक पातकालकी
घड़ी समड्ली जाती हेः ॥ १८०-१८१॥
रवीनदरो्मानयोगार््धं षष्ठ्या संगुण्य भाजयेत्।
तयोभुक्त्यन्तरेणाप्तं स्थित्यर्थं नाडिकादि तत्॥ ९८२॥
पातकालः स्फुटो मध्यः सोऽपि स्थित्यद्धवर्जितः।
तस्य सम्भवकालः स्यात्तत्संयुक्तोऽन्त्यसंस्चितः ॥ ९८३ ॥
आद्यतकालयेर्मध्यः कालो सेयोऽतिदारुणः।
प्रज्वलज्ज्वलनाकारः सर्वकर्मसु गर्हितः॥ १८४॥
इत्येतद्रणिते क्छिखित्प्रोक्तं संक्चेपतो द्विज ।
जातकं वच्मि समयाद्राशिसंज्ञापुरःसरम्॥ १८५ ॥
( पातके स्थितिकाल, आरम्भ तथा अन्तकालका
साधन-- ) सूर्य तथा चन्द्रमाके विम्बयोगार्धको
६० से गुणा करके गुणनफलमे सूर्य-चन्द्रकी
गत्यन्तरकलासे भाग देकर जो लब्धि हो वह
पातको स्थित्यर्धं घड़ी होती हे। इसको पातके
स्पष्ट मध्यकालमे घटनेसे पातका आरम्भकाल
होता है ओर जोडनेसे अन्तकाल होता हैः।
पातके आरम्भकालसे अन्तकालतक जो मध्यका
काल ठे, वह प्रज्वलित अग्निक समान
अत्यन्त दारुण (भयानक) होता हे। जो सब
कार्यमे निषिद्ध है। ब्रह्यन्। इस प्रकार मेने
गणितस्कन्धमें संक्षेपसे कुछ (उपयोगी ) विषयोंका
प्रतिपादन किया हे। अब (अगले अध्यायमें)
राशियोके संज्ञादि कथनपूर्वक जातकका वर्णन
करूगा ॥ १८२- १८५ ॥
॥ इति श्रीब्रह्ारदीयपुराणे पूर्वभागे कृहदुख्याने द्वितीयफादे ज्यौतिषगणितव्णनं नाम
चतु; पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४॥
(न=
त्रिस्कन्ध ज्योतिषका जातकस्कन्थ
सनन्दनजी कहते है- नारद ! मेष आदि राशियों
कालपुरुषके क्रमशः मस्तक, मुख, बाहु, हदय,
उदर, कटि, वस्ति ( पंड्) , लिङ्ग, ऊरु, जानु,
जङ्खा ओर दोनों चरण हें ॥ १॥ मङ्गल, शुक्र, बुध,
चन्द्रमा, सूर्य, बुध, शुक्र, मङ्गल, गुरु, शनि, शनि
तथा गुरु-ये क्रमशः मेष आदि राशियोके अधीश्वर
(स्वामी) हे ॥ २ ॥ विषम राशियोमें पहले सूर्यक,
फिर चन्द्रमाको होरा बीतती है तथा सम राशियों
पहले चन्द्रमाकी, फिर सूर्यकी होरा बीतती है।
आदिके दश अंशतक उसी राशिका द्रेष्काण होता
हे ओर उस राशिके स्वामी ही उस द्रेष्काणके
स्वामी होते हें। ग्यारहसे वीसवें अंशतक उस
राशिसे पाचवीं राशिका द्रेष्काण होता है ओर
उसके स्वामी ही उस द्वेष्काणके स्वामी होते है;
इसी प्रकार अन्तिम दश अंश (अर्थात् २१ से ३०
वें अंशतकः) उस राशिसे नवम राशिका द्रेष्काण
होता है ओर उसीके स्वामी उस द्रेष्काणके स्वामी
कहे गये हैं ॥३॥ विषम राशियोमें पहले पोच
१. क्रान्तिसाम्य (पात) काल-साधन-मध्यकालिक चन्द्रमा ०।२।५। ° ओर स्थिरीकृत क्रान्तिसाम्य-(पात)
कालिक चन्द्रमा ०1 १।५५। ० को अन्तरकला १० को ६०से गुणा कर गुणनफल ६०० में चन््रगति ७८३। १५ का भाग
देनेपर (स्वल्पान्तरसे) लब्धि १ घड़ी हुई । इसको (गतपात होनेके कारण) मध्यरत्रि घड़ी ४५। १५ में घटानेसे शेष ४४।
१५ पातका मध्यकाल हुआ।
२. क्रान्ति-साम्य-साधनमें कथित सूर्यकी गति ६०। १५५ द्रा सूर्यविम्ब १०।५७ हुआ एवं चन्द्रगति ७८३। १५ हारा
चन्द्रविम्ब १०। ३५ हुआ। इन दोनोके योग २०। ९२ के आधे १०। ४६ को ६० से गुणा कर गुणनफल ६४६ मे सूर्यं
ओर चन्द्रमाकी गतिके अन्तर ७२३ से भाग देनेपर लब्धि (स्वल्पान्तरसे) १ घड़ी हुई; यह पातकालकी स्थित्यर्थं घडी
हई । इसको पातमध्यकाल ४४। १५ में घटानेसे शेष ४३। १५ आरम्भकाल एवं जोड्नेसे ४५। १५ पातका अन्तकाल हुआ।
((-0. 1\/॥८1114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
अंशतक मङ्गल, फिर पांच अंशतक शनि, फिर
आठ अंशतक बृहस्पति, फिर सात अंशतक बुध
ओर अन्तिम पोच अंशतक शुक्र त्रिंशांशेश कहे
गये हें । सम राशियोमे इसके विपरीत क्रमसे
पहले पांच अंशतक शुक्र, फिर सात अंशतक
बुध, फिर आठ अंशतक बृहस्पति, फिर पाच
अंशतक शनि ओर अन्तिम पाच अंशतक मङ्गल
त्रिंशांशेश बताये गये हैँ ॥४॥ मेष आदि राशियोके
नवमांश मेष, मकर, तुला ओर कर्कसे प्रारम्भ होते
२७९
हे (यथा- मेष, सिंह, धनुकै मेषसे; वृष, कन्या,
मकरके मकरसे; मिथुन, तुला ओर कुम्भके
तुलासे तथा कर्क, वृश्चिक ओर मीनके नवमांश
कर्कसे चलते है ।)२५ अंशके द्वादशांश होते हैँ
जो अपनी राशिसे प्रारम्भ होकर अन्तिम राशिपर
पूरे होते ह ओर उन-उन राशियोके स्वामी ही उन
द्वादशांशोके स्वामी कहे गये हें । इस प्रकार ये
राशि, होरा आदि षड्वर्गः कहलाते ह ॥५॥
वृष, मेष, धनु, कर्क, मिथुन ओर मकर-ये
९. गृह (राशि), होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश तथा त्रिंशांश-ये षड्वर्गं कहे गये हँ । जिन राशियोके जो
स्वामी है, वे ही राशियों उन ग्रहोके घर हैँ । एक राशिमें ३० अंश होते है । उनमेसे पंद्रह अंशको एक होरा होती
है। एक राशिमें दो होरां होती ह । दश अंशका द्रेष्काण होता है, अतः एक राशिमें तीन द्रेष्काण व्यतीत
होते है । ३९ अंशका एक नवमांश होता हे । राशिमे नौ नवमांश होते हैँ । २६ अंशका एक द्वादशांश होता
है; राशिमें बारह द्वादशांश होते है । एक-एक अंशका त्रिंशांश होता है, इसीलिये उसका यह नाम है।
राशि-स्वामी-ज्ञानार्थ- चक्र
तृ का को
ना | जक्त] र| डप [च | सूय [ ब [ र
रू
(राश्यर्ध) होरा-ज्ञानार्थ-चक्र
वृश्चिक | धनु |मकर | कुम्भ | मीन
तक्र
१८-३9
तक | चन्द्र | रवि । चन्द्र चन्र | रवि | चन्ध | रवि | चन्ध| रवि | चन्द्र
(राशितृतीयांश) द्रेष्काण-ज्ञानार्थ- चक्र
(ध मेप । वृष | मिथुन | कर्क | सिंह | कन्या | तुला | वृध्िक| धनु ¦ मकर | कुम्भ | मीन
१-१० १२ । राशि
प बुध | चन्र | सूयं |वुध | शुक्र | मङ्गल शनि | गुरु | स्वामी ।
११-२० १ ४ शि |
ध | शकर _(मब्रल | गर तपन्वलत् कति ( गुट _|मङ्गत। कर (सुध चन (स्वामी
२ ३ ४ ५4 ६ ॥५। ८
गुर |शति | शनि | गुर् | मरद्गल| शुक्र | व्रुध | चन्द्र | मूर्यं | बुध | शुक्र | मङ्गल | स्वामी |
((-0. 1\/॥८111104/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
२८० संक्षिप्त नारदपुराण
(कितु मिथुन पृष्ठोदय नहीं है ) । शेष राशियोंकी
दिन संज्ञा है (वे दिनमें बली ओर शीर्षोदय माने
राशियोमें नवमांश-ज्ञानार्थ- चक्र
सि ( कन्या | तुला [वृथिक | धः कुम्भ | मौन
मद्गल| शनि | शुक्र | चन्द्र (ज शनि | शुक्र | चन्द्र | मङ्गल चन्द्र
२ १९१ ८ ५ २ ११ ८ ५4 २ १९१ ८ ५
य | दष | ण | गः गर | द | देण य | यर ३
4 ।य गुर 1२ वुध वुच्
७ ४ १ १० ट १ १० ७
स
[व १९८ ५ र ११९ | ८
पं | स शत ह सूम |स
६ ३ १२ ९ ६ २ १२९ ९
हल श | यु उ [भह | अनि | च (जनः | भल
शनि चन्द्र | मङ्गल।| शनि | शुक्र शनि
८ ^ र १९१ ८ ५ र्
२ १२ ९ ६ ३ १२ ९ ६ 2
वुध | गुरु | गुर | बुध 4 14 || 1८ |
द्वादशांश
रात्रिसंज्ञक हं अर्थात् रातमें बली माने गये है- ये
पृष्ठभागसे उदय लेनेके कारण पृष्ठोदय कहलाते हें
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गुर् | शनि । शनि | गुरु
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
गये है); मीन राशिको उभयोदय कहा गया है । मेष
आदि राशियों क्रमसे क्रूर ओर सौम्य (अर्थात् मेष
आदि विषम राशियां क्रूर ओर वृष आदि सम राशियां
सोम्य) हं ॥ ६ ॥ मेष आदि राशियों क्रमसे पुरुष, स्त्री
ओर नपुंसक होती हँ (नवीन मतमें दो विभाग हे, मेष
आदि विषम राशियां पुरुष ओर वृष आदि सम राशियों
स्त्री है) । इसी प्रकार मेष आदि राशियां क्रमशः चर,
स्थिर ओर द्विस्वभावमें विभाजित हँ (अर्थात् मेष
चर, वृष स्थिर ओर मिथुन द्विस्वभाव हैँ, कर्क चर्,
सिंह स्थिर ओर कन्या द्विस्वभाव हें । इसी क्रमसे शेष
राशियोंको भी समञ्च) । मेष आदि राशियां पूर्वं आदि
दिशाओमें स्थित हँ (यथा- मेष, सिंह, धनु पूर्वमे;
वृष कन्या, मकर दक्षिणमे; मिथुन, तुला, कुम्भ पश्चिमम
ओर कर्क, वृश्चिक, मीन उत्तरमें स्थित हे )*। ये सव
अपनी-अपनी दिशामें रहती हे ॥७॥ सूर्यका उच्च
मेष, चन्द्रमाका वृष, मङ्गलका मकर, बुधका कन्या,
गुरुका कर्क, शुक्रका मीन तथा शनिका उच्च तुला हे ।
२८९
सूर्यका मेषमें १० अंश, चन्द्रमाका वृषमें ३ अंश,
मङ्गलका मकरमें २८ अंश, बुधका कन्यामें १५ अंश,
गुरुका कर्कमें ५ अंश, शुक्रका मीनमें २७ अंश तथा
शनिका तुलामें २० अंश उच्चांश (परमोच्च) है ॥ ८ ॥
सूर्यादि ग्रहोको जो उच्च राशियों कही गयी हैँ, उनसे
सातवीं राशि उन ग्रहोका नीच स्थान हे।
चरमें पूर्वं नवमांश वर्गेत्तिम है। स्थिरमं मध्य
( पोचर्वाँ) नवमांश ओर द्विस्वभावमें अन्तिम (न्वा)
नवमांश वर्गोत्तम है। तनु (लग्न) आदि बारह भाव
हें ॥ ९ ॥ सूर्यका सिंह, चन्द्रमाका वृष, मङ्गलका मेष,
वबुधका कन्या, गुरुका धन, शुक्रका तुला ओर शनिका
कुम्भ यह मूल त्रिकोण कहा गया है । चतुर्थं ओर
अष्टभावका नाम चतुरस्र है । नवम ओर पञ्चमका
नाम त्रिकोण है॥१०॥ द्वादश, अष्टम ओर षष्टका
नाम त्रिक है; लघ्न चतुर्थ, सप्तम ओर दशमका नाम
केन्र है। दिपद, जलचर, कीट ओर पशु-ये राशियां
क्रमशेः केन्द्रमे बली होती हँ (अर्थात् द्विपद लग्रे,
विषम राशियोपें त्रिंशांश-
[अश [५ [५
स्वामी | मङ्गल | शनि | गुरु | बुध | शुक्र
सम राशियोमिं त्रिंशश-
८/५
स्वामी | शुक्र मद्गल
१. मेषादि राशिर्योके रूप-गुण आदिका बोधक चक्र
राशियां
स्थान
भुज | हदय | पेट
द्विपदादि चतुष्पद | चतुष्पद |
वर्ण । रक
षा 1110111
द <
ल [क [उम `
जल [कर ` र ` [समय [कर [य कर [संय करर [ स्य
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इ
ुरुय/ स्त्री । पुरुष
| चर् | स्थिर | द्विस्व०
((-0. 1\/॥८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
२८२
जलचर चतुर्थमं, कोट सात्मं ओर पशु दसवेमे बलवान्
माने गये है) ॥ ११ ॥ केनद्रके बादके स्थान (२, ५, ८,
११ ये) 'पणफर' कहे गये हं । उसके बादके ३, ६, ९,
१२- ये आपोक्लिम कहलाते हे । मेषका स्वरूप रक्तवर्णं,
वृषका श्वेत, मिथुनका शुकके समान हरित, कर्कका
पाटल (गुलाबी), सिंहका धूम्र, कन्याका पाण्डु (गौर),
तुलाका चितकबरा, वृध्िकका कृष्णवर्ण, धनुका पीत,
मकरका पिङ्ख, कुम्भका बभ्रु (नेवले) के सदृश ओर
मीनका स्वच्छ वर्णं हे। इस प्रकार मेषसे लेकर सब
राशिर्योकी कान्तिका वर्णन किया गया है। सब राशियां
स्वामीकी दिशाकी ओर ्युकी रहती ह । सूर्याश्रित राशिसे
दूसंर्का नाम वेशि ' हे॥ १२-१३॥
( ग्रहोकि शील, गुण आदिका निरूपण-- ) सूर्यदेव
कालपुरुषके आत्मा, चन्द्रमा मन, मङ्गल पराक्रम, बुध
वाणी, गुरु जान एवं सुख, शुक्र काम ओर शनैश्चर दुःख
हे ॥ १४॥ सूर्य- चन्द्रमा राजा, मङ्गल सेनापति, बुध
राजकुमार, बृहस्पति तथा शुक्र मन्त्री ओर शनैश्चर सेवक
या दूत है, यह ज्योतिष शस्त्रके श्रेष्ठ विद्वानोका मत
हे ॥ १५ ॥ सूर्यादि ग्रहकि वर्णं इस प्रकार है। सूर्यका तप्र,
चन्रमाका शुक्ल, मद्खलका रक्त, बुधका हरिति, वृहस्पतिका
पीत, शुक्रका चित्र (चितकवरा) तथा शनैश्चरका काला
है। अग्नि, जल, कार्तिकेय, हरि इद्र, इन्द्राणी ओर
ब्रह्मा-ये सूर्यादि ग्रहेकि स्वामी है॥ १६॥ सूर्य, शुक्रः
मङ्खल, राह, शनि, चन्द्रमा, बुध तथा वृहस्पति-ये
संक्षिप्त नारदपुराण
क्रमशः पूर्व, अग्निकोण, दक्षिण, नैर्रह्यकोण, पिम,
वायव्यकोण, उत्तर तथा ईशनकोणके स्वामी ह। क्षीण
चन्द्रमा, सूर्य, मङ्गल ओर शनि-ये पापग्रह है--इनसे
युक्त होनेपर बुध भी पापग्रह हो जाता हे ॥ १७॥ बुध ओर
शनि नपुंसक ग्रह हे । शुक्र ओर चन्द्रमा स्त्रीग्रह हैं । शेष
सभी (रवि, मङ्गल, गुरु) ग्रह पुरुष है । मङ्गल, बुध, गुरः,
शुक्र तथा शनि- ये क्रमशः अग्नि, भूमि, आकाश, जल
तथा वायु-इन तत््वेकि स्वामी है ॥ १८ ॥ शुक्र ओर गुरु
ब्राह्मण वर्णके स्वामी ह। भोम तथा रवि क्षत्रिय वण्कि
स्वामी है। चन्द्रमा वैश्य वर्णके तथा बुध शूद्र वण्कि
अधिपति हं। शनि अन्त्यजेकि तथा राहु म्लेच्छंकि स्वामी
हे॥ १९॥ चन्धमा, सूर्य ओर वृहस्पति सत्वगुणकेः बुध ओर
शुक्र रजोगुणके तथा मङ्गल ओर शनैश्चर तमोगुणके स्वामी
हे । सूर्य देवताओके, चन्रमा जलके, मद्कल अग्निक; बुध
क्रीडविहारके; वृहस्पति भूमिके शुक्र कोषके; शनैश्चर शयनके
तथा राहु ऊसरके स्वामी ह ॥ २० ॥ स्थूल (मोटे सूतसे वना
हआ), नवीन, अग्निसे जला हुआ, जलसे भीगा हआ,
मध्यम (न नया न पुयना), सुदृढ (मजबूत) तथा फय
हआ, इस प्रकार क्रमसे सूर्य आदि ग्रहोका वस्त्र हे। तप्र
( तोबा), मणि, सुवर्ण कसा, चदी, मोती ओर लेहा- य
क्रमशः सूर्य आदि ग्रहकि धातु ह । शिशिर, वसन्त, ग्रीप्म,
वर्षा, शरद् ओर हेमन्त-ये क्रमसे शनि, शुक्र, मङ्गल,
चन्द्र, बुध तथा गुरुको ऋतु हें । लग्रमे जिस ग्रहका
द्रेष्काण हो, उस ग्रहकी ऋतु समद्जी जाती हैः ॥ २१-२२॥
१. सूर्यके द्वेष्काणसे ग्रीप्मऋतु समञ्जी जाती है। सूर्य आदि ग्रहोके जाति, शील आदिको निग्राद्धित चक्रमे देखिये-
अध्किर `
ति तरि रां
वध मित र
11. पुरुप _ | स्त्र | नपुसक
हल ^ (अपन | उत्तर | एेशान्य । आग्रेय | पश्चिम
गृह सि तला ` जक
(क सत्व त्व ~ तमः - 3 रज
स्मन [- दैवालब [जलाशय `
। आत्मादि | अत्मा । मन_ _ |
अग्नि [जल [कक
_ धातु | अस्थि | शोणित त्वचा | वसा [वीय
तमं
भण्डार-स्थान | शयन-स्थान
कासा
मा् |
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
( ग्रहोकी दृष्टि- ) नारद ! सभी ग्रह अपने-
अपने आश्रितस्थानसे ३, १० स्थानको एक
चरणसे; ५, ९ स्थानको दो चरणसे; ४, ८
स्थानको तीन चरणसे ओर सप्तम स्थानको चार
चरणसे देखते हे । किंतु ३, १० स्थानको शनि;
५, ९ को गुरु तथा ४, ८ को मङ्गल पूर्ण दृष्टिसे
ही देखते हें । अन्य ग्रह केवल सप्तम स्थानको ही
पूर्णं दृष्टि (चारों चरणों) से देखते हें ॥ २३॥
( ग्रहोके कालमान-- ) अयन (६ मास), मुहूर्त
(२ घडी), अहोरात्र, ऋतु (२ मास), मास, पक्ष
तथा वर्ष-ये क्रमसे सूर्य आदि ग्रहोके कालमान
हे। तथा कटु (मिर्च आदि), लवण, तिक्त
(निम्बादि), मिश्र (सब रसोंका मेल), मधुर,
आम्ल (खट्वा) ओर कषाय (कसैला)- ये क्रमशः
सूर्य आदि ग्रहोके रस हें ॥ २४॥
( ग्रहोकी स्वाभाविक बहुसम्मत मेत्री- )
ग्रहोके जो अपने-अपने मूल त्रिकोण स्थान कहे
गये हें, उस (मूल त्रिकोण) स्थानसे २, १२, ५.
९, ८, ४ इन स्थानके तथा अपने उच्च स्थानोके
स्वामी ग्रह मित्र होते है ओर इनसे भिन्न (मूल
२८३
त्रिकोणसे १, ३, ६, ७, १०, ११) स्थानोके स्वामी
शत्रु होते हे।
( मतान्तरसे ग्रह-मेत्री-- ) सूर्यका बृहस्पति,
चन्द्रके गुरु-बुध, मद्गलके शुक्र-बुध, वबुधके
रविको छोड़कर शेष सब ग्रह, गुरुके मद्गलको
छोडकर सब ग्रह, शुक्रके चन्द्र-रविको छोडकर
अन्य सब ग्रह ओर शनिके मङ्गल- चनद्र-रविको
छोडकर शेष सभी ग्रह मित्र होते हं । यह मत
अन्य विद्वानोंद्रारा स्वीकृत है।
( ग्रहोकी तात्कालिक मेत्री- ) उस-उस समयमें
जो-जो दो ग्रह २, १२।३, ११। ४, १०-- इन
स्थानोमें हों वे भी परस्पर तात्कालिक मित्र होते
है । (इनसे भिन्न स्थानमें स्थित ग्रह तात्कालिक शत्र
होते है) इस प्रकार स्वाभाविक मैत्रीमे (मृल
त्रिकोणसे जिन स्थानके स्वामीको मित्र कहा गया
हे-उनमे) दो स्थानोके स्वामीको मित्र, एक
स्थानके स्वामीको सम ओर अनुक्त स्थानके स्वामीको
शत्रु समञ्च । तदनन्तर तात्कालिक मित्र ओर शत्रुका
विचार करके दोनोके अनुसार अधिमित्र, मित्र, सम,
शत्रु ओर अधिशत्रक निश्चय करना चाहिये! ॥ २५-२७॥
१. यथा- दोनों प्रकारोसे जो ग्रह मित्र हो वह अधिमित्र, जो मित्र ओर सम हो वह मित्र, जो मित्र ओर शत्रो वह
सम, जो शत्रु ओर सम हो वह शत्रु तथा जो दोनों प्रकारोसे शत्रु हो वह अधिशत्र, होता है । इस तरह ग्रहमैत्री पच प्रकारकी
मानी गयी है।
ग्र्होको नैसर्सिक मैत्रीका बोधक चक्र
ग्रह | सूर्य | चन्द्र॒ | मद्गल | बुध | गुरु | शुक्र
जैसे-इस कुण्डलीमें मूर्यसे द्वितीय, तृतीय ओर चतुर्थं स्थानम क्रमशः बुध, शुक्र ओर मङ्गल है । इसलिये
ये तीनों सू्यके मित्र हए अन्य ग्रह शत्रु हृए्। इसी प्रकार चन्द्रमसे तृतीय, चतुर्थ, एकादश ओर दशम स्थानम शनि,
गुरु, शुक्र ओर मङ्गल ई, इसलिये ये चा चद्रमाके तात्कालिक मित्र दए; अन्य ग्रह शत्रु हए । इस तरह सव
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 8118811 \/8181185। (01661011. 01411260 0 6810011
२८६
( ग्रहोके बलक्छा कथन-- ) अपने-अपने उच्च,
मूल, त्रिकोण, गृह ओर नवमांशमें ग्रहोकि स्थानसम्बन्धी
बल होते हे । बुध ओर गुरुको पूर्वं (उदय-लग्र)में
रवि ओर मङ्गलको दक्षिण (दशम भाव)-में,
शनिको पश्चिम (सप्तम भाव) -में ओर चन्द्र तथा
शुक्रको उत्तर (चतुर्थ भाव) -में दिकृसम्बन्धी बल
प्राप्त होता हे । रवि ओर चन्द्रमा उत्तरायण (मकरसे
६ राशि) -में रहनेपर तथा अन्य ग्रह वक्र ओर
समागममें (चनद्रमाके साथ) होनेपर चेष्टाबलसे
युक्त समञ्मे जाते हें । तथा जिन दो ग्रहोमें युति
होती है, उनमें उत्तर दिशामें रहनेवाला भी
चेष्टाबलसे सम्पन्न समञ्ञा जाता ठै॥ २८-२९॥
चन्द्रमा, मङ्गल ओर शनि ये रात्रिमे, बुध दिन ओर
रात्रि दोनोमे तथा अन्य ग्रह (रवि, गुरु ओर शुक्र)
दिनमें बली होते हें । कृष्णपक्षमें पापग्रह ओर
शुक्लपक्षमे शुभग्रह बली होते हें। इस प्रकार
विद्वानोनि ग्रहोका कालसम्बन्धी बल माना है ॥ ३०॥
शनि, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, चन्द्रमा तथा रवि-
ये उत्तरोत्तर बली होते हें । इस प्रकार यह ग्रहोका
ग्रहोकी तात्कालिक यैत्री चक्रमे देखिये-
संक्षिप्त नारदपुराण
नैसर्गिक (स्वाभाविक) बल हे ॥ ३०९ ॥
( वियोनि जन्म-ज्ञान-- ) (प्रश्न, आधान या
जन्म-समयमें) यदि पापग्रह निर्बल हो, शुभग्रह
बलवान् हों, नपुंसक (बुध, शनि) केन्द्रमे हों
तथा लग्रपर शनि या बुधकौ दृष्टि हो तो तात्कालिक
चन्द्रमा जिस राशिके द्वादशांशमें हो, उस राशिके
सदृश वियोनि (मानवेतर प्राणी )-का जन्म जानना
चाहिये। अर्थात् चन्द्रमा यदि वियोनि राशिके
द्वादशांशमें हो तब वियोनि प्राणियोका जन्म
समञ्लना चाहिये । अथवा पापग्रह अपने नवमांशमें
ओर शुभग्रह अन्य ग्रहोके नवमांशमें हो तथा
निर्बल वियोनि राशि लग्नमें हो तो भी विद्वान्
पुरुष वियोनि या मानवेतर जीवके ही जन्मका
प्रतिपादन करं ॥ ३१-३३ ₹॥
( वियोनिके अङ्कखोमें राशिस्थान-- ) १ मस्तक,
२ मुख, गला (गर्दन), ३ पैर, कंधा, ४ पीठ,
५ हदय, ६ दोनों पार, ७ पेट, ८ गुदा-मार्ग,
९ पिछले पैर, १० लिङ्क, ११ अण्डकोश, १२
चूतड तथा पुच्छ-इस प्रकार चतुष्पद आदि (पशु-
तात्कालिक मेत्रीका बोधक चक्र
| |
शु. श. बु. शु. मशु
तात्कालिक ओर नैसर्गिक मैत्री-चक्र लिखकर उसमे पञ्चधा मैत्री इस प्रकार देखी जाती है । यथा-सूर्यका
चन्द्रमा नैसर्गिक मित्र है तथा तात्कालिक शत्रु हुआ है, अतः चन्द्रमा सूर्यका सम हुआ। मङ्गल नैसर्गिक
मित्र ओर तात्कालिक मित्र है, अतः अधिमित्र हृआ। बुध नैसर्गिक सम ओर तात्कालिक मित्र है, अतः मित्र
ही रहा। गुरु नैसर्गिक मित्र ओर तात्कालिक शत्नु है, अतः सम हुआ। शुक्र नैसर्गिक शत्रु ओर तात्कालिक मित्र
है, अतः सम हआ। शनि नैसर्गिक शत्रु ओर तात्कालिक भी शत्रु है, अतः शनि सूर्यका अधिशतु
हुआ। इसी प्रकार इन दोनों चक्रोंसे सव ग्रहोको पञ्चधा मैत्री देखकर ही उन्हें परस्पर मित्र, शत्रु या सम
समञ्ना चादिये।
((-0. 1/८11111/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0\ 6810011
पूर्व भाग-द्वितीय पाद
२८५
पक्षी) -के अङ्खोमं मेषादि राशियोके स्थान हें ॥ ३४।
( वियोनि वर्ण-ज्ञान- )-लग्रमे जिस ग्रहका
योग हो उस ग्रहके समान ओर यदि किसीका
योगन हो तो लग्रके नवमांश (राशि-राशिपति)-
के समान वियोनिका वर्णं (श्याम, गौर आदि
रंग) कहना चाहिये। बहुत-से ग्रहोके योग या
दृष्टि हों तो उनमें जो बली हों या जितने बली हो,
उनके सदृश वर्णं कहना चाहिये । लग्नके सप्तम
भावमें ग्रह हो तो उस ग्रहके समान (उस ग्रहका
जेसा वर्ण कहा गया है वेसा) चिह्न उस
वियोनिके पीठ आदि अङ्खोमें जानना चाहिये ॥ ३५ ॥
( पक्षिजन्म-ज्ञान-- ) ग्रहयुत लग्रमे प्षद्रेष्कोणः
हो अथवा बुधका नवमांश हो या चरराशिका
नवमांश हो तथा उसपर शनि या चन्द्रमा अथवा
दोनोंकी दृष्टि हो तो क्रमशः शनि ओर चनद्रमाकी
दृष्टिसे स्थलचर ओर जलचर पक्षीका जन्म समञ्जना
चाहिये ॥ ३६॥
( वृक्षादि जन्म-ज्ञान-- ) यदि लग्र, चन्द्र, गुरु
ओर सूर्य-ये चारों निर्बल हों तो वृक्षोका जन्म
जानना चाहिये । स्थल या जल-सम्बन्धी वृक्षोके
भेद लग्रांशके अनुसार समञ्जे चाहियेः। उस
स्थल या जलचर नवांशका स्वामी लग्रसे जितने
नवमांश अगे हो उतनी ही स्थल या जलसम्बन्धी
वृक्षोकौ संख्या जाननी चाहिये ॥ २७-३८ ॥ यदि
उक्त अंशके स्वामी सूर्य हों तो अन्तःसार (सखु,
शीशम आदि), शनि हो तो दुर्भग (किसी
उपयोगमें न आनेवाले कुर्कुस, फरहद आदि खोटे
वृक्ष), चन्द्रमा हो तो दूधवाले वृक्ष, मङ्गल दहो तो
कोटिवाले, गुरु हो तो फलवान् (आम आदि),
बुध हो तो विफलं (जिसमें फल नहीं होते एेसे)
वृक्ष, शक्र हो तो पुष्पके वृक्षों (गेंदा, गुलाब
आदि)-का जन्म समञ्जना चाहिये। चन्द्रमाके
अंशपति होनेसे समस्त चिकने वृक्ष (देवदार
आदि) तथा मङ्गलके अंशपति होनेपर कड्ए वृक्ष
( निम्बादि)-का भी जन्म समञ्ना चाहिये । यदि
शुभग्रह अशुभ राशिमे हो तो खराब भूमिसे सुन्दर
वृक्ष ओर पापग्रह शुभ राशिमें हो तो सुन्दर भूमिं
खराव वृक्षका जन्म देता है। इससे अर्थतः यह
वात निकली कि यदि कोई शुभग्रह अंशपति हो
ओर वह शुभराशिमें स्थित हो तो सुन्दर भूमिं
सुन्दर वृक्षका जन्म होता है ओर यदि पापग्रह
अंशपति होकर पापराशिं स्थित हौ तो खराब
भूमिमें कुत्सित वृक्षका जन्म होता है। इसके
सिवा, वह अंशपति अपने नवमांशसे आगे जितनी
संख्यापर अन्य नवमांशमें हो, उतनी ही संख्याम
ओर उतने ही प्रकारके वृक्षका जन्म समञ्जना
चाहिये ॥ ३९-४०३ ॥
( आधान-ज्ञान- ) प्रतिमास मङ्गल ओर
चन्द्रमाके हेतुसे स्त्रीको ऋतुधर्म हुआ करता है।
जिस समय चन्द्रमा स्त्रीकी राशिसे नेष्ट (अनुपचय)
स्थानमें हो ओर शुभ पुरुषग्रह (वृहस्पति) -से
देखा जाता हो तथा पुरुपकी राशिसे अन्यथा
(इष्ट=उपचयः स्थाने) हो ओर वृहस्पतिसे दृष्ट
हो तो उस स्त्रीको पुरुषका संयोग प्राप्त होता है*।
१. पक्षिदरेष्काणका वर्णन आगे (अन्तमं) किया जायगा।
२. सारांश यह कि जलचर-राशिका अंश हौ तो जलकरे ओर स्थल-राशिका अंश हो तो स्थलके वुक्च जानने चािये।
३. जन्मराशिसे ३। ६। १०। ११ ये उपचय तथा अन्य स्थान अनुपचय कहलाते है ।
४, आशय यह टै कि चन्द्रमा जलमय ओर मद्भल रक्तं एवं पित्त प्रकृतिका दै। इसलिये ये दोनों रजोधर्मके
हेतु होते है । जिस समय स्त्रीके अनुपचय-स्थानमें चन्रमा हो, उस समय यदि उसपर मङ्गलकौ दृष्टि होती दै तो
वह रज गर्भधारणमे समर्थं होता है । यदि उमपर गुरुकी भी दृष्टि हो जाय तो उस स्त्रीको पुरुपके संयोगसे निश्चय
ही सत्पुत्रकी प्रापि होती दै।
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (0166101. 01411260 0 6810011
२८६
संक्षिप्त नारदपुराण
आधान-लग्रसे सप्तम भावपर पापग्रहका योग या
दृष्टि हो तो रोषपूर्वक ओर शुभग्रहका योग एवं
दृष्टि हो तो प्रसन्नतापूर्वक पति-पलीका संयोग
होता हे॥ ४१-४२॥ आधानकालमें शुक्र, रवि,
चन्द्रमा ओर मङ्कल अपने-अपने नवमांशमे हो,
गुरु लग्रसे केन्द्र या त्रिकोणमें हो तो वीर्यवान्
पुरुषको निश्चय ही संतान होती हि ॥ ४३ ॥ यदि
सूर्यसे सप्तम भावमें मङ्गल ओर शनिहोंतो वे
पुरुषके लिये तथा चन्द्रमासे सप्तममें हों तो स्त्रीके
लिये रोगप्रद होते हे । सूर्यसे १२, २ में शनि ओर
मङ्गल हों तो पुरुषके लिये ओर चन्द्रमासे १२, २
मेये दोनों हों तो स्त्रीके लिये घातक होते हे।
अथवा इन (शनि-मद्गल) -में एकसे युत ओर
अन्यसे दृष्ट रवि हो तो वह पुरुषके लिये ओर
चन्द्रमा यदि एकसे युत तथा अन्यसे दृष्ट हो तो
वह स्त्रीके लिये घातक होता है॥४४॥
दिनमें गर्भाधान हो तो शुक्र मातृग्रह ओर सूर्य
पितृग्रह होते हें । रात्रिम गर्भाधान हो तो चन्द्रमा
मातृग्रह ओर शनि पितृग्रह होते ह । पितृग्रह यदि
विषम राशिमें हो तो पिताके लिये ओर मातृग्रह
सम राशिमें हो तो माताके लिये शुभकारक होता
हे। यदि पापग्रह वारहवें भावमें स्थित होकर
पापग्रहसे देखा जाता ओर शुभग्रहसे न देखा जाता
हो, अथवा लग्रमे शनि हो तथा उसपर क्षीण
चन्द्रमा ओर मद्कलकौ दृष्टि हो तो गर्भाधान होनेसे
स्त्रीका मरण होता है। लग्र ओर चन्द्रमा दोनों या
इनमेसे एक भी दो पापग्रहोके बीचमें हो तो
गर्भाधान होनेपर स्त्री गरभकि सहित (साथ ही) या
पृथक् मृत्युको प्राप्त होती है । लग्र अथवा चन्द्रमासे
चतुर्थं स्थानमे पापग्रह हो, मङ्गल अष्टम भावमें हो
अथवा लग्रसे ४, १२ वें स्थानमे मङ्गल ओर शनि
हों तथा चन्द्रमा क्षीणो तो भी गर्भवती स्त्रीका
मरण होता हे। यदि लग्रमे मङ्गल ओर सप्तममें
रवि हों तो गर्भवती स्त्रीका शस्त्रद्वारा मरण होता है।
गर्भाधानकालमें जिस मासका स्वामी अस्त हो, उस
मासमे गर्भका साव होता है; इसलिये इस प्रकारके `
लग्रको गर्भाधानमें त्याग देना चाहिये ॥ ४५--४९॥
आधानकालिक लग्र या चन्द्रमाके साथ अथवा
इन दोनोँसे ५, ९, ७, ४, १० वें स्थानमें सब
शुभग्रह हों ओर २३, ६, ११ भावमें सब पापग्रह
हों तथा लग्र ओर चन्द्रमापर सूर्यकी दृष्टिहो तो
गर्भं सुखी रहता है ॥५०॥ रवि, गुरु चन्द्रमा ओर
लग्र-ये विषम राशि एवं विषम नवमांशमें हों
अथवा रवि ओर गुरु विषम राशिमें स्थित हों तो
पुत्रका जन्म समञ्जना चाहिये । उक्त सभी ग्रह यदि
सम-राशि ओर सम-नवमांशमें हों अथवा मङ्गल,
चन्द्रमा ओर शुक्र-ये सम-राशिमें हों तो विज्ञजनोंको
कन्याका जन्म समञ्जना चाहिये । अथवा वे सब
द्विस्वभाव राशिमें हों ओर बुधसे देखे जाते हों तो
अपने-अपने पक्षके यमल (जुडवीं संतान) -के
जन्मकारक होते है । अर्थात् पुरुषग्रह दो पुत्रोके
ओर स्त्रीग्रह दो कन्याओंके जन्मदायक होते है।
(यदि दोनों प्रकारके ग्रह हों तो एक पुत्र ओर एक
कन्याका जन्म समञ्चना चाहिये ।) लग्रसे विषम
(३, ५ आदि) स्थानोमें स्थित शनि भी पुत्रजन्म-
कारक होता हे ॥ ५१-५३॥
क्रमशः विषम एवं सम-राशिमें स्थित रवि
ओर चन्द्रमा अथवा बुध ओर शनि एक-दूसरेको
देखते हों, अथवा सम-राशिस्थ सूर्यको विषम-
राशिस्थ मङ्गल देखता हो या विषम-सम राशिस्थ
लग्र एवं चनद्रमापर मङ्गलकी दृष्टि हो अथवा
चन्द्रमा सम-राशि ओर लग्र विषम-राशिमें स्थित
हो तथा उनपर मङ्गलको दृष्टि हो अथवा लग्र,
चन्द्रमा ओर शुक्र-ये तीनों पुरुषराशिके नवमांशमें
हों तो इन सब योगों नपुंसकका जन्म होता
है ॥५४३॥
((-0. 1/८11114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
२८७
शुक्र ओर चन्द्रमा सम-राशिमें हों तथा
मङ्गल, लग्र ओर वृहस्पति विषम-राशिमें स्थित
होकर पुरुषग्रहसे देखे जाते हों अथवा लग्र एवं
चन्द्रमा सम-राशिमें हों या पूर्वोक्त बुध, मङ्गल, लग्र
एवं गुरु सम-राशिमे हों तो ये यमल (जुडवी)
संतानको जन्म देनेवाले होते हें ॥ ५५३ ॥
यदि बुध अपने (मिथुन या कन्याके) नवमांशमें
स्थित होकर द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रह ओर लग्रको
देखता हो तो गभमिं तीन संतानोंकी स्थिति
समञ्जनी चाहिये। उनमें दो तो बुध-नवमांशके
सदृश होगे ओर एक लग्रांशके सदृश। यदि बुध ओर
लप्र दोनों तुल्य नवमांशमें हों तो तीनों संतानोंको
एक-सा ही समञ्जना चाहिये ॥५६२ ॥
यदि धनु-राशिका अन्तिमांश लग्र हो,
उसी अंशमें बली ग्रह स्थित हों ओर बलवान्
बुध या शनिसे देखे जाते हों, तो गर्भमें बहुत
( तीनसे अधिक) संतानोंकी स्थिति समञ्चनी
चाहिये ॥ ५७ ई ॥
( गर्भमासोके अधिपति-- ) शुक्र, मङ्गल,
वृहस्पति, सूर्य, चन्द्रमा, शनि, बुध, आधान-
लग्रेश, सूर्यं ओर चन्द्रमा-ये गर्भाधानकालसे
लेकर प्रसवपर्यन्त १० मासोके क्रमशः स्वामी हें।
आधान-समयमे जो ग्रह बलवान् या निर्बल होता
है, उसके मासभे उसी प्रकार शुभ या अशुभ फल
होता है ॥ ५८२ ॥ बुध त्रिकोण (५, ९) -में हो
ओर अन्य ग्रहं निर्बल हो तो गर्भस्थ शिशुके दो
मुख, चार पैर ओर चार हाथ होते हे। चन्द्रमा
वृषमें हो ओर अन्य सब्र पापग्रह राशि-संधिमं हों
तो बालक गंगा होता टै। यदि उक्त ग्रहांपर शुभ
ग्रहोकी दृष्टि हो तौ वह वालक अधिक दिनोमं
जायय 9 = चका (आ ~ कन = = ज रः कि @
बोलता हे॥५९-६०॥ मङ्गल ओर शनि यदि
बुधको राशि नवमांशमे हों तो शिशु गभ्में ही
दोतसे युक्त होता है। चन्द्रमा कर्कराशिमें होकर
लग्रमे हो तथा उसपर शनि ओर मद्भलकी दृष्टि
हो तो गर्भस्थ शिशु कुबड़ा होता है। मीन राशि
लग्रमे हो ओर उसपर शनि, चन्द्रमा तथा मद्गलकी
दृष्टिहो तो गर्भका बालक पङ्गु होता है। पापग्रह
ओर चन्द्रमा राशिसंधिमें हों ओर उनपर शुभ-
ग्रहको दृष्टि न हो तो गर्भस्थ शिशु जड (मूर्ख)
होता है। मकरका अन्तिम अंश लग्रमे हो ओर
उसपर शनि, चन्द्रमा तथा सूर्यकी दृष्टिदहौ तो
गर्भका बच्चा वामन (बौना) होता है। पञ्चम तथा
नवम लग्रके द्रेष्काण पापग्रह हो तो जातक
क्रमशः पैर, मस्तक ओर हाथसे रहित होता
ठे ॥ ६१-६२॥
गर्भाधानके समय यदि सिंह लमग्रमे सूर्य ओर
चन्द्रमा हों तथा उनपर शनि ओर मङ्गलकी दृष्टि
हो तो शिशु नेत्रहीन होता है। यदि शुभ ओर
पापग्रह दोनोको दृष्टि हो तो ओंखमें फली होती
हे। यदि लग्रसे वारहवें भावमें चन्रमा दहो तो
वालकका वाम नेत्र ओर सूर्यो तो दक्षिण नेत्र
नष्ट होता है । ऊपर जो अशुभ योग कहे गये है,
उनपर शुभग्रहको दृष्टि हो तो उन योगोके फल
पूर्णं नहीं होते ह (एसी परिस्थितिमें देवाराधन
एवं चिकित्सा आदि यन्नांसे अशुभ फलका निवारण
हो जाता है) ॥६३ ई ॥
यदि आधानलग्रमे शनिका नवमांश हो ओर
शनि सप्तम भावमें हो तो तीन वर्पपर प्रसव होता
ठे । यदि इसी स्थितिमें चन्द्रमा हो (अर्थात् लग्रमें
चन्द्रमाका नवमांश हो ओर चन्द्रमा सप्तम भावं
१. अर्थ् या तौ तीनों पुत्रै यातीनों कन्या्णंद्ी रहै, एेसा समद्चे। अन्यथा बुध पुल्प नवमांणमेद्टोतोदो
पुत्र ओर एक कन्या, स्त्री नवमांश होतो दौ कन्या ओर् एक पुत्र समञ्च।
२. अन्य जातकग्रन्थोमिं ९, १० मासके स्वामी क्रममे चन्द्र ओर युवं कटे गये ठै) यद उखसे विपरीत दै।
(-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 60810011
२८८
संक्षिप्त नारदपुराण
स्थित हो) तो बारह वर्षपर प्रसव होता है। इन
योगोंका विचार जन्मकालमे भी करना चाहिये
॥ ६४-६५ ॥ जआधानकालमें जिस द्वादशांशमें चन्द्रमा
हो, उससे उतनी ही संख्या आगे राशिमें चन्द्रमाके
जानेपर बालकका जन्म होता हे। द्वादशांशभुक्त
अंशादिको दोसे गुणा करके उसमें ५ से भाग देनेपर
लब्धि राश्यादि मानक सूचक होती हैः ॥ ६६-६७॥
( जन्मज्ञान-- ) (शिशुको जन्म-कुण्डलीमें)
यदि चन्द्रमा जन्मलग्रको नहीं देखता हो तो
पिताके परोक्षमे बालकका जन्म समञ्जना चाहिये ।
इसी योगमें यदि सूर्य चर राशिमें मध्य (दशम)
भावसे अगे (११, १२) -में अथवा पीके (९, ८)-
मे हो तो पिताके विदेश रहनेपर पुत्रका जन्म
समञ्जना चाहिये । (इससे यह सिद्ध होता है कि
यदि सूर्य स्थिर राशिमें हो तो स्वदेशमें रहते हृए
पिताके परोक्षमे ओर द्विस्वभाव राशिमें हो तो
स्वदेश ओर परदेशके मध्य स्थानें पिताके
रहनेपर बालकका जन्म होता है।)
लग्रमे शनि ओर सप्तम भावमें मङ्गल हो
अथवा बुध ओर शुक्रके बीचमें चन्द्रमाहोतोभी
पिताके परोक्षमे शिशुका जन्म समञ्जना चाहिये।
पापग्रहको राशिवाले लग्रमें चन्द्रमा हो अथवा वह
वृश्िकके द्वेष्काणमें हो तथा शुभग्रह २। १९१
भावम स्थित हों तो सर्पका या सर्पसे वेष्टित
मनुष्यका जन्म समञ्जना चाहिये ॥ ६८-७०॥
मुनिश्रेष्ट ! यदि सूर्य चतुष्पद राशिमें हो ओर शेष
ग्रह बलयुक्तं हों तो एक ही कोशमें लिपटे हुए दो
शिशुओंका जन्म समञ्जना चाहिये । शनि या मद्खलसे
युक्त सिंह, वृष या मेष लग्र हो तो लग्रके
नवमांशको राशि जिस अङ्गकी हो, उस अङ्गं
नालसे लिपटे हए शिशुका जन्म समञ्ना चाहिये।
यदि लग्न ओर चन्द्रमापर गुरुकी दृष्टि न हो
१. इस विषयको स्पष्ट समञ्चनेके लिये एक उदाहरण प्रस्तुत किया जाता टै । मान लीजिये, वैशाखकी पूर्णिमाको
वृहस्पतिवारको रातमें ग्यारह दण्ड शून्य पल (११। ०) गर्भाधानका समय दहै । तत्कालीन चनद्रमाकी राशि ७, अंश
९, कला ३० ओर विकला १० है । यहां चन्द्रमा वृश्चिक राशिके चौथे द्वादशांशमें है । वृ्चिकमें चौधा द्वादशांश कुम्भ
राशिका होता है, अतः कुम्भसे चतुर्थं राशि वृषमें दैनिक चन्द्रेमाके आनेपर दसवें मास फाल्गुनमें बालकका जन्म
होगा; एेसा फल समञ्जना चाहिये। किंतु कृत्तिकाके तीन चरण, रोहिणीके चारों चरण तथा मृगशिरके दो चरण, इस
प्रकार नौ चरणोको वृष राशि होती है। उस दशामें किस नक्षत्रके किस चरणमें चन्द्रमाके आनेपर जन्म होगा, यह प्रश्न
उट सकता हे । अव इसका समाधान किया जाता है-- पूर्वोक्त चन्द्रमाकी राश्यादिमें भुक्त द्रादशांशमान (९।२३०।
१०)-(७। ३०)=(२। ०। १०)=(१२०। १०)=१२० कला (स्वल्पान्तरसे) मान लिया गया। ““ अर्धाल्पि
त्याज्यमर्धाधिके रूपं ग्राह्यम्" इस नियमसे (१०) को छोड़ दिया। यर्हपर एक द्वादशांश-खण्डपर् एक राशि प्रमाण
होता है-यह स्पष्ट है । इसी आधारपर (१२० कला) सम्बन्धी चरणमान अनुपातसे ला रहे है; जब कि एक हवादशांश
खण्डकला-प्रमाण (२1 ३०)=(१५० कला) -में एक राशिका कलामान १८०० पाते है तो १२० यं कितना होगा-इस
तरह ‰<‰>-= १२५८१२० १४४०1 एक राशिमें नौ चरण होते हँ ओर चरणका कलामान २०० कला होता है, अतः
चरण जाननेके लिये {€= ‡-& (७ २) । यहाँ लब्धि ओर शेषपर दृष्टिपात करनेसे यह ज्ञात होता टै कि वृषराशिके
आठवें चरणमें अर्थात् मृगशिरा नक्षत्रके प्रथम चरणमें चन्द्रमाका प्रवेश होनेपर बालकका जन्म होगा।
जन्मका इष्टकाल जाननेकी विधि-गर्भाधानकरालिक लग्र ९। १०1 २५1 ° है । इसमें मकरराशिका चौथा नवमांश
है, जो उससे चतुर्थ मेषराशिका है । मेषराशि रातमें बली होती है, अतः रातमें जन्म होगा। इसलिये रत्रिगत इष्टकालका
ज्ञान करना चाहिये । यर्हँपर राशियोको दिन-रत्रि-संजाके अनुसार एक नवमांशका प्रमाण दिन या रात्रिका पृरा प्रमाण
होता है। अतः त्रैराशिक क्रिया की गयी-एक नवमांश प्रमाण (३ अंश २० कला-२०० कला) -में गभधिन रात्रिमान यदि
२८। ° दण्ड मिलता है तो लप्रके चतुर्थं नवमांशके भुक्तं कलामान २५ें कितना होगा 2 इस तरह २८५२५ .३। ३०
घट्यादि मान हुजा। अर्थात् ३ दण्ड ३० पल रात बीतनेपर जन्म हागा; एेसा निधय हुआ। इसी तरह अर्न्उदाहरणोको
भी समञ्जना चाहिये।
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
२८९
अथवा चन्द्रमा सूर्यसे संयुक्त हो तथा उसे गुरु
नहीं देखता हो अथवा चन्द्रमा पापग्रह ओर सूर्यसे
संयुक्त हो तो शिशुको पर-पुरुषके वीर्यसे उत्पन्न
समञ्जना चाहिये। यदि दो पापग्रह पापराशिमें
स्थित होकर सूर्यसे सप्तम भावम हों तो सूर्यके चर
आदि राशिके अनुसार विदेश, स्वदेश या मामं
बालकका जन्म समञ्जना चाहिये। पूर्णं चन्द्रमा
अपनी राशिमें हो, बुध लमग्रमें हो, शुभग्रह चतुर्थ
भावमें हो अथवा जलचर राशि लग्र हो ओर
उससे सप्तम स्थानमें चन्द्रमा हो तो नौकापर
शिशुका जन्म समञ्जना चाहिये। नारद! यदि
जलचर राशि लग्रको जलचर राशिस्थ पूर्णं चन्द्रमा
देखता हो अथवा वह १०, ४ या लग्रमे हो तो जलमें
प्रसव होता है, इसमें संशय नहीं । यदि लग्र ओर
चन्द्रमासे शनि बारहवें भावमें हों, उसपर पापग्रहकीं
दृष्टि हो तो बालकका कारागारमें जन्म होता हे।
तथा कर्क या वृश्चिक लमग्रमें शनि हो ओर उसपर
चन्द्रमाको दृष्टि हो तो गह्मे बालकका जन्म
समञ्जना चाहिये । जलचर राशिस्थ शनि लग्रमे हो
तथा उसपर बुध, सूर्य या चन्द्रमाकी दृष्टि हो तो
क्रमशः क्रीडास्थान, देवालय ओर ऊसर भूमिं
शिशुका प्रसव समञ्जना चाहिये। यदि मङ्गल
बलवान् होकर लग्रगत शनिको देखता हो तो
श्मशान-भूमिमे, चन्द्रमा ओर शुक्र देखते हों तो
रम्य स्थानमें, गुरु देखता हो तो अग्रिहोत्रगृहमे,
सूर्य देखता हो तो राजगृह, देवालय ओर गोशाला
तथा बुध देखता हो तो चित्रशालामें बालकका
जन्म समञ्जना चाहिये ॥७१-५७९॥
यदि लग्रमें चरराशि हो तो मार्गमे लग्रराशिके
कथित स्थानके* समान स्थानमे बालकका जन्म
होता है। यदि लग्रमें स्थिर राशि हो तो स्वदेशके
ही उक्त स्थानमें जन्म होता है तथा यदि लग्र
राशि अपने नवमांशमे हो तो स्वगृहमें ही वैसे
स्थानमें जन्म होता है । मङ्गल ओर शनिसे त्रिकोण
(५, ९) -में अथवा सप्तम भावमें चन्द्रमाहो तो
जातकको माता त्याग देती है । यदि उसपर गुरुकी
दृष्टिहो तो त्यक्त होनेपर भी दीर्घायु होता है।
पापग्रहसे दृष्ट चन्द्रमा यदि लमग्रमे हो ओर मङ्गल
सप्तम भावमें स्थित हो तो मातासे त्यक्त होनेपर
जातक मर जाता है। अथवा पापदृष्ट चन्द्रमा यदि
शनि-मद्गलसे वं भावसे स्थित हो तो भी
शिशुको मृत्यु हो जाती है। यदि चन्द्रमा शुभग्रहसे
देखा जाता हो तो बालक दूसरेके हाथमे जाकर
सुखी होता है । यदि पापसे ही दृष्ट हो तो दूसरेके
हाथमे जानेपर भी हीनायु होता है ॥ ८०-८२॥
पितृसंसक ग्रह बली हो तो पिताके घरमे ओर
मातृसंज्ञक ग्रह बली हो तो माता (अर्थात् माता)
के घरमे जन्म समञ्ञना चादिये। मुने! यदि
शुभग्रह नीच स्थानमें हो तो वृक्षादिके नीचे तृण-
पत्रादिकी कुटीमे जन्म समञ्ना चाहिये । शुभग्रह
नीच स्थानमें हो ओर लग्र अथवा चन्द्रमापर एक
स्थानस्थित शुभग्रहोकी दृष्टिन हो तो निर्जन
स्थानमें प्रसव होता है। यदि चन्द्रमा शनिकौ
राशिके नवमांशमे स्थित होकर चतुर्थं भावमें
विद्यमान हो तथा शनिसे दृष्टया युत दहो तो
प्रसवकालमें 'प्रसूतिका' का शयन पृथिवीपर
समञ्जना चाहिये। शीर्षोदय राशि लग्र हो तो
शिरकी ओरसे तथा पृष्ठोदय राशि लग्र हो तो पृष्ठ
(पैर)-की ओरसे शिशुका जन्म होता है । चन्द्रमासे
चतुर्थं स्थानमें पापग्रह हो तो माताके लिये कष
समञ्जना चाहिये ॥ ८३- ८५ ॥
जन्मसमयमें सव ग्रहोकी अपेक्षा शनि बलवान्
१. राशि-स्थान पहले दिये हए राशिम्वरूप-वबोधक चक्रम देखिये ।
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 6810011
२९० संक्षिप्त नारदपुराण
हो तो सूतिका गृह पुराना, किंतु संस्कार किया
हुआ समञ्जना चाहिये । मङ्गल बली हो तो जला
हुआ, चन्द्रमा बली हो तो नया ओर सूर्य बली हो
तो अधिक काष्टसे युक्त होकर भी मजबूत नहीं
होता। बुध बली हो तो प्रसवगृह बहुत चित्रोसे
युक्त, शुक्र बली हो तो चित्रोसे युक्त नवीन ओर
मनोहर तथा गुरु बली हो तो सूतिकाका गृह सुदृढ
समञ्जना चाहिये ॥ ८६-८७॥
लग्रमें तुला, मेष, कर्क, वृश्चिक या कुम्भहो
तो (वास्तु भूमिम) पूर्वभागमें; मिथुन, कन्या, धनु
या मीन हो तो उत्तर भागमें, वृष हो तो पश्चिम
भागमं तथा मकर या सिंह हो तो दक्षिण भागमें
सूतिकाका घर समञ्चना चाहिये ॥ ८८ ॥
( गृहराशियोके स्थान-- ) घरक पूर्वं आदि
दिशाओमें मेष आदि दो-दो राशियोंको ओर चारों
कोणेमं चागो द्विस्वभाव राशिर्योको समञ्च । सूतिकागृहके
समान ही सूतिकाके पलंगमें भी लग्र आदि
भावोको समञ्ञे। वहां ३, ६, ९ ओर १२ वें
भावको क्रमशः चारों पायोमें समञ्जना चाहिये।
चन्द्रमा ओर लग्रके बीचमें जितने ग्रह हों उतनी
उपसूतिकाओंकोः प्रसवकालमें उपस्थिति समञ्चनी
चाहिये। दृश्य चक्रार्धमिं (सप्तम भावसे आगे
लग्रतक) जितने ग्रह हों, उतनी उपसूतिकाओंको
घरसे बाहर समञ्ञे ओर अदृश्य चक्रार्धमे (लग्रसे
आगे सप्तमपर्यन्त) जितने ग्रह हों, उतनी
उपसूतिकाओंकी उपस्थिति घरके भीतर रहती हे ।
बहुत-से आचार्यो ओर मुनियोने इससे भिन्न मत
प्रकट किया हे। (अर्थात् दृश्य चक्रार्धमें जितने
ग्रह हों उतनी उपसूतिकाओंको धरके भीतर तथा
अदृश्य चक्रार्धमें जितने ग्रह हों, उतनीको घरके
बाहर कहा हे) ॥२ ८९-९०॥
लग्रमे जो नवमांश हो, उसके स्वामी ग्रहके
सदश अथवा जन्मसमयमें जो ग्रह सबसे बली
हो, उसके समान शिशुका शरीर समञ्चना चाहिये।
इसी प्रकार चन्द्रमा जिस नवमांशमें हो उस
राशिके समान वर्णं (गौर आदि) समञ्ना चाहिये।
एवं द्वेष्काणवश लग्र आदि भावोंसे जातकके
मस्तक आदि अङ्ग-विभाग जानना चाहिये।
यथा-लग्रमें प्रथम द्रेष्काण हो तो लग्र मस्तक,
२। १२ नेत्र, ३।११ कान, ४।१० नाक, ५।९
कपोल, ६।८ हनु (दुड़ी) ओर ७ (सप्तम) भाव
मुख । द्वितीय द्रेष्काण हो तो लग्र कण्ट, २। १२
कंधा, ३। ११ पसली, ४। १० हदय, ५। ९ भुज,
६। ८ पेट ओर ७ नाभि। तृतीय द्रेष्काण हो तो
लग्र वस्ति (नाभि ओर लिङ्कके मध्यका स्थान),
२।१२ लिङ्ग, गुदमार्ग, ३। १२ अण्डकोश, ४। १०
जघ, ५। ९ घुटना, ६। ८ पिण्डली ओर सप्तम
भाव पैर समञ्चना चाहिये ॥ ९१-९३॥
जिस अङ्गकी राशिमें पापग्रह हो, उस अङ्गे
व्रण ओर यदि उसपर शुभ ग्रहकी दृष्टि हो तो उस
अङ्घमें चिह्न (तिल मशक आदि) समञ्जना चाहिये।
पापग्रह अपनी राशि या नवमांशमें, अथवा स्थिर
राशिमें हो तो जन्मके साथ ही त्रण होता हं
अन्यथा उस ग्रहको दशा-अन्तर्दशामे आगे चलकर
व्रण होता है। शनिके स्थानमें वात या पत्थरके
आघातसे, मङ्गलके स्थानमें विष, शस्त्र ओर
अग्रिसे, बुधके स्थानमें पृथ्वी (मिट) -के आघातसे,
सूयश्रित अङ्खमें काष्ठ ओर पशुसे, क्षीण चनद्राश्रित
अङ्खमें सींगवाले पशु ओर जलचरके आघातसे
व्रण होता है। जिस अङ्गकी राशिमें तीन पापग्रह
९. प्रसूता स्त्रीके पास रहकर उसे सहयोग दनेवाली स्त्रियोको "उपसूतिका' कहते ह ।
२. सपतमसे आगे लग्रतक क्षितिजके ऊपर होनेसे दृश्य चक्रार्धं कहलाता दै ।
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
२९९१
हो, उस अङ्गम निश्ितरूपसे ब्रण होता ही दै
षष्ठ भावमें पापग्रह हो तो उस राशिके आश्रित
अङ्घमें व्रण होता हे । यदि उसपर शुभग्रहकी दृष्टि
हो तो उस अङ्घमें तिल या मसा होता है। यदि
शुभग्रहका योग हो तो उस अङद्धमें चिह्न (दाग)
मात्र होता है ॥ ९४-९६२॥
( ग्रहोके स्वरूप ओर गुणका वर्णन-- )
सूर्यकौ आकृति चतुरस्रः हे, शरीरकी कान्ति ओर
नेत्र पिङ्गल हें । पित्तप्रधान प्रकृति है ओर उनके
मस्तकपर थोड़-से केश ह । चन्द्रमाका आकार
गोल हे; उनकी प्रकृतिमें वात ओर कफकी
प्रधानता है, वे पण्डित ओर मृदुभाषी है तथा
उनके नेत्र वड़े सुन्दर है । मङ्गलको दृष्टि क्रूर है
युवावस्था है, पित्तप्रधान प्रकृति है ओर वह
चञ्चल स्वभावका हे । बुधको प्रकृतिमे कफ, पित्त
ओर वातको प्रधानता हे, वह हास्यप्रिय ओर
अनेकार्थक शब्द बोलनेवाला हे। वृहस्पतिकौ
अद्गकान्ति, केश ओर नेत्र पिङ्गल हं, उनका
शरीर बड़ा है, प्रकृतिमें कफकौ प्रधानता है ओर
वे बड़ बुद्धिमान् हें । शुक्रके अङ्ग ओर नेत्र सुन्दर
है, मस्तकपर काले घुंघराले केश हँ ओर वे
सर्वदा सुखी रहनेवाले हं । शनिका शरीर लम्बा
ओर नेत्र कपिश वर्णे है, उनकी वातप्रधान
प्रकृति है, उनके केश कठोर हं ओर वे वड
आलसी हें ॥ ९७--१००॥
( ग्रहोके धातु-- ) सनायु (शिरा), हड़ी, शोणित,
त्वचा, वीर्य, वसा ओर मज्वा-ये क्रमशः शनि, सूर्य,
चन्द्र, बुध, शुक्र, गुरु ओर मद्गलके धातु ह ॥ १०१॥
( अरिषटकथन- ) चन्द्रमा, लग्र ओर पापग्रह-
ये राशिके अन्तिमांशमें हों अथवा चन्द्रमा ओर
तीनों पापग्रह ये लग्रादि चारों कन्दरोमें हों तथा
कर्क लग्र हो तो जातककी मृत्यु होती टै। दो
पापग्रह लग्र ओर सप्तम भावमें हों तथा चन्द्रमा
एक पापग्रहसे युक्त हो ओर उसपर शुभग्रहकी
दृष्टि न हो तो शिशुका शीघ्र मरण होता है ॥१०२-
१०३॥ क्षीण चन्द्रमा १२ वें भावमें हो, पापग्रह
लग्र ओर अष्टम भावमें हों तथा शुभग्रह केन्द्रे
न हों तो उत्पन्न शिशुकौ मृत्यु होती है। अथवा
पापयुक्त चन्द्रमा सप्तम, द्वादश या लग्रमे स्थित
हो तथा उसपर केन्द्रसे भिन्नस्थानमें स्थित
शुभग्रहकी दृष्टिन दहो तो जातककी मृत्यु होती
हे । यदि चन्द्रमा ६, ८ स्थानमें रहकर पापग्रहसे
देखा जाता हो तो शिशुका शीघ्र मरण होता है।
शुभग्रहसे दृष्ट होतो ८ वर्षमे ओर शुभ तथा
पापग्रह दोनोंसे दृष्ट हो तो ४ वर्षमे जातककी
मृत्यु हो जाती है। क्षीण चन्द्रमा लपग्रमे तथा
पापग्रह ८, १, ४,७, १० में स्थित हों तो उत्पन्न
बालकका मरण होता है । अथवा दो पापग्रहोके
बीचमें होकर चन्द्रमा ४, ७, ८ स्थानमें स्थित हो
या लग्र ही दो पापग्रहोके बीचमें हो तो
जातककी मृत्यु होती है। पापग्रह ७, ८ मेंहाों
ओर उनपर शुभग्रहकौ दृष्टिन दहो तो मातासहित
शिशुको मृत्यु होती है। राशिके अन्तिमांशमें
चन्द्रमा पापग्रहसे अदृष्ट हो तथा पापग्रह त्रिकोण
(५, ९)-में हो अथवा लग्रमे चन्द्रमा ओर
सप्तमे पापग्रह हो तो शिशुका मरण होता है।
राहुग्रस्त चन्द्रमा पापग्रहसे युक्त हो ओर मङ्गल
अष्टम स्थानमें स्थित हो तो माता ओर शिशु
दोनोंकी मृत्यु होती है । इसी प्रकार राहुग्रस्त सूर्य
यदि पापग्रहसे युक्त हो तथा बली पापग्रह अष्टम
भावमें स्थित हो तो माता ओर शिशुका शस्त्रसे
मरण होता ठे ॥ १०४-- १०९॥
१. जिसकी लम्बाई- चौड़ाई बराबर हो, वह चौकोर वस्तु ' चतुरख्र' कहलाती दै ।
(-0. 1\/1(11114/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 6681001
२९२
संक्षिप्त नारदपुराण
( आयुर्दायकथन-- ) चन्द्रमा ओर बृहस्पतिसे
युक्त कर्क लग्र हो, बुध ओर शुक्र केन्द्रे हों ओर
शेष ग्रह (रवि, मङ्कल एवं शनि) २३, ६, ११
स्थानमें हों तो एेसे योगमें उत्पन्न जातककी आयु
बहुत अधिक होती हे । मीन लग्रमे मीनका नवमांश
हो, बुध वृषमें २५ कलापर हो तथा शेष सब ग्रह
अपने-अपने उच्च स्थानमें हों तो जातकको आयु
परम (१२० वर्षं ५ दिनक) होती हे । लग्रेश बली
होकर केन्द्रमे हो, उसपर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो
बालक धनसहित दीर्घायु होता है । चन्द्रमा अपने
उच्चमें हो, शुभग्रह अपनी राशिमें हो, बली लग्रेश
लग्रमें हो तो जातकको ६० वर्षकी आयु होती है ।
केन्द्रमं शुभग्रह हों ओर अष्टम भाव शुद्ध (ग्रहरहित)
हो तो ७० वर्षको आयु होती है । शुभग्रह अपने-
अपने मूल त्रिकोणमें हों, गुरु अपने उच्चमें हो तथा
लग्रेश बलवान् हों तो ८० वर्षकी आयु होती है ।
सबल शुभग्रह केन्द्रे हों ओर अष्टम भावमें कोई
ग्रह न हो तो ३० वर्षको आयु होती है । अष्टमेश
नवम भावमे हो, बृहस्पति अष्टम भावमें रहकर
पापग्रहसे दृष्ट हों तो २४ वर्षकी आयु होती है।
लग्रेश ओर अष्टमेश दोनों अष्टम भावमें स्थित हों तो
२७ वर्षको आयु होती है। लग्रमें पापग्रहसहित
वृहस्पति हां, उसपर चन्द्रमाको दृष्टि हो तथा
अष्टममे कोई ग्रह न हो तो २२ वर्षकी आयु
समञ्जन चाहिये । शनि नवम भाव या लप्रमेहो,
शुक्र केन्द्रमे हो ओर चन्द्रमाश्रेयार्मेंहोतो
१०० वर्षको आयु होती है । वृहस्पति कर्कमें होकर
केन्द्रे हो अथवा वृहस्पति ओर शुक्र दोनों केन्द्रमे
हों तो १०० वर्पकी आयु समञ्चनी चाहिये । अष्टमेश
लग्रमे हो ओर अष्टम भावमें शुभग्रह न हो तो ४०
वर्षको आयु होती है। लग्रेश अष्टम भावमें ओर
अष्टमेश लग्रमें हो तो ५ वर्षकी आयु होती हे । शुक्र
ओर वृहस्पति एक राशिमें हों अथवा बुध ओर
चन्द्रमा लग्र या अष्टम भावमें हों तो ५० वर्षकी
आयु होती हे ॥ ११०-११८॥
मुने! मेने इस प्रकार ग्रहयोग-सम्बन्धसे
आयुर्दायका प्रमाण कहा है। अव गणितद्वारा
स्पष्टायुर्दायका वर्णन करता हू। (सूर्य, चन्द्रमा
ओर लग्रमेसे) यदि सूर्य अधिक बली हो तो
पिण्डायु, चन्द्रमा बली हो तो निसर्गायु ओर लग्र
वली हो तो अंशायुका साधन करना चाहिये।
उसका साधन-प्रकार मेँ बतलाता' हूं ॥ ११९३ ॥
( पिण्डायु ओर निसर्गायुकाः साधन-- ) सूर्य
आदि ग्रह अपने-अपने उच्चमें हों तो क्रमशः १९,
२५, १५, १२, १५, २१ ओर २० वर्षं पिण्डायुके
प्रमाण होते ह तथा २०, १, २, ९, १८, २०, ५०
ये क्रमशः सूर्यादि ग्रहोके निसर्गायुर्दायके प्रमाण
होते है ॥ १२०-१२१॥
पिण्डायु ओर निसर्गायुमे आयु-साधन करना
हो तो राश्यादि ग्रहमं अपने उच्चको घटाना
चाहिये । यदि वह ६ राशिसे अल्प हो तो उसको
१२ राशिमे घटाकर ग्रहण करं। उसके अंश
वनानेसे वह आयुर्दाय-साधनमें उपयोगी होता है ।
जो ग्रह शत्रुके गृहमे हो उसके अंशोमें उसीका
तृतीयांश घटावे। यदि वह ग्रह वक्रगति न हो तभी
एसा करना चाहिये । (यदि ग्रह वक्रगति हो तो
शतुगृहमं रहनेपर भी तृतीयांश नहीं घटाना चाहिये)
तथा शनि ओर शुक्रको छोडकर अन्य ग्रह अस्त
१-' पिण्डाय" वह है, जिसमे उच्च ओर नीच स्थानें आयुके पिण्ड (मान-संख्या)-का निर्देश किया हआ
है, उसके द्वारा इष्टस्थानस्थित ग्रहसे आयुका साधन किया जाता है।
२-'निसर्गायु' वह रहै, जो ग्रहोके निसर्गं (स्वभाव) -से ही सिद्ध है, जिसमें कभी परिवर्तन नहीं होता।
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 6810011
पूर्व भाग-द्वितीय पाद
२९३
हों तो उनके अंशोमें आधा घटा देना चाहिये । | होती है। पुनः शेषको ३० से गुणा करके ३६० के
(शनि ओर शुक्र अस्त हों तो भी उनके अंशेमें
आधा नहीं घटाना चाहिये ।) यदि किसी ग्रहमें
दोनों हानि प्राप्त हो (अर्थात् वह शत्रुगृहमें हो ओर
अस्त भी हो) तो उसमे अधिक हानिमात्र करे
(अर्थात् केवल आधा घटवे, तृतीयांश नहीं) । यदि
लग्नमे पापग्रह हो तो उसकी राशिको छोडकर
केवल अंशादिसे आयुर्दायके अंशको गुणा करके
गुणनफलमें ३६० का भाग देकर लब्ध अंशादिको
पूर्वोक्त अंशमें घटावे। इस प्रकार पापग्रहके समस्त
लब्धाश घटावे। यदि उसमें शुभग्रहका योग या दृष्ट
हो तो लन्धांशका आधा घटाना चाहिये । इस तरह
आगे बताये जानेवाले प्रकारसे आयुर्दाय-साधन
योग्य स्पष्ट अंश उपलब्ध होते हे ॥ १२२- १२५॥
( पिण्डायु-साधन-- ) उन स्पष्टंशोको अपने-
अपने पूर्वोक्त गुणक (उच्चस्थ वर्प-संख्या १९
आदि)-से गुणा करके गुणनफलमें ३६० से भाग
देनेपर लब्धि वर्ष-संख्या होती है । शेषको १२ से
गुणा करके ३६० से भाग देनेपर लब्धि मास-संख्या
१. यदि लग्र-राश्यादि ३। १५। २०। ३० ओर स्पष्र
ग्रहोक्ा उच्यादिबोधक चक्र
13 १३.२३ चन्र [ मङ्गल उम [ स [ सना रम
१
२५ २०
|
| | ६५ | १२ |६५ | २९|२० | १ | २०
द्वारा भाग देनेपर लब्धि दिन-संख्या होगी । फिर
शेषको ६० से गुणा कर ३६० से भाग देनेपर
लब्धि घटी एवं पलादि रूप होगी: ॥ १२६-१२७॥
( लग्रायु-साधन-- ) लग्रको राशिर्याको छोडकर
अंशादिको कला बनाकर २०० से भाग देनेपर
लब्धि वर्प-संख्या होगी । शेपको १२ से गुणाकर
२०० से भाग देनेपर लब्धि मास-संख्या होगी ।
पुनः पूर्ववत् ३० आदिसे गुणा करके हरसे भाग
देनेपर लब्धि दिनादिकी सूचक होगी? ॥१२८- ॥
( अंशायुर्दाय*-साधन-- >) लग्रसहित ग्रोके
पृथकपृथक् अंश बनाकर ४० से भाग देकर जो
शेष बचे उसे आयुर्दाय-साध्चनोपयोगी अंशादि
समञ्च; उसमे जो विशेष संस्कार कर्तव्य दै
उसका वर्णन करता हू । लमग्रमें ग्रहको घटावे। यदि
शेष ६ राशिसे अल्प हो तो उसमें निप्राद्भित
संस्कार विशेष करना चाहिये, अन्यथा नहीं । यदि
घटाया हुआ ग्रह ६ राशिसं अल्प ओर १ राशिसे
अधिक हो तो उन अंशोंसे ३० में भाग देकर
~ 1 आः ज जा का = = क ज जा
सूर्य १०। १५। १०। २० है तो उपर्युक्त रीतिके अनुसार
सूर्यकी राश्यादिमें सूर्यकी उच्च राश्यादि ०। १० को
घटानेपर १०। ५। १०। २० रहा । यह ६ राशिसं अधिक
टै, इसलिये इसीको अंशात्मक वनानेसे ३०५। १०। २०
हुआ । सूर्यं शत्रुके घरमे नहीं दे, इसलिय इसमं संस्कार-
विशेष न करके इसी अंशादिको सूर्यके उच्स्थानीय
आयुमान १९ से गुणा करनेपर गुणनषरल ५७९८।१६।२०
मं ३६० का भाग देनेपर लब्ध वर्ष १६ हुए । शेष ३८।
१६। २० को १२ से गुणा कर गुणनफल ४५९ । १६॥। °
मं ३६० का भाग दैनेपर लव्ध मास १ हुभआ। मास-शेष
९९। १६ कौ ३० से गुणा करनेपर गुणनफल २९५६ मं ३६० करा भाग दैनेपर लब्ध दिन ८ हुए। शेष ९६ को ६०
से गुणा करके गुणनफल ५७६० मे ३६० का भाग देनेपर लब्ि घड़ी १६ दई; शेष ० रहा। इस प्रकार सूर्यमे आयुमान
वर्षादि १६। १।८। १६। ० हुआ। इमी तरह सव ग्रहोका आयु-साधन कर लेना चादिये।
२. लग्रायु-साधन-लयग्रकौ रशिको छोडकर अंशादि
१५। २०। ३० को कलात्मक वरनानेसे ९२०। ३० हुआ।
इसमं २०० का भाग देनेपर लव्य वर्षं ८ हुए । शेय १२०।३० को १२ से गुणा करनेपर् गुणनफल २४४६ । ० में २००का
भाग देनेसे लब्ध मास ७ हुए। शप ४६ को ३० से गुणा करके गुणनफल १३८० मं २०० क्रा भाग दैनेपर लब्ध
दिन & हए शेष १८० कौ ६० से गुणा करनपर् गुणनफल १०८०० मं २०० का भाग दैनेसे लब्थि ५४ चदु दई ।
इस प्रकार लग्रायुमान वर्षादि ४1 ७।६।५४६। ० दु्ा।
३. "अंशायु' वह है, जौ ग्रहक्रि अंश (नवमांश) - द्वारा अनुपाते जानी जाती दै।
((-0. 1/(1111(4<511॥ 81188 \/81811851 (01661101. 01411260 0 66810011
ह व 0 1 1 णि
२९४
संक्षिप्त नारदपुराण
लब्धिको १ में घटावे ओर शेषको गुणक समञ्चे।
यदि ग्रह घटाया हुआ लग्र १ राशिसे अल्पहो तो
उन्हीं अंशोमें ३० का भाग देकर लब्धिको १ में
घटानेसे शेष गुणक होता हे । इस प्रकार शुभग्रहके
गुणकको आधा करके गुणक समञ्च ओर पाप-
ग्रहके समस्त गुणकोको ग्रहण करे। फिर इस
प्रकारके गुणकोसे उपर्युक्त आयुर्दायके अंशको गुणा
करे तो संस्कृत अंश होता हे। यह संस्कार कहा
गया है। इस संस्कृत आयुर्दायके अंशको कलात्मक
बनाकर २०० से भाग देकर लब्धिको वर्ष समञ्चे।
फिर शेषको १२ से गुणा करके गुणनफलमें २००का
भाग दनेसे लब्धिको मास समञ्चे। तत्पश्चात् शेषम
३० आदिसे गुणा करके २०० का भाग देनेसे
लब्धिको दिन एवं घटी आदि समञ्चेः |
लग्रके आयुर्दाय अंशादिको ३ से गुणा करके
गुणनफलमे १० का भाग देनेसे जो लब्धि हो, वह
वर्षं हे । फिर शेषको १२ आदिसे गुणा करके १०
से भाग देनेपर जो लब्धि हो उसे मासादि समञ्च ।
(लग्रको आयुमें इतनी विशेषता है कि) यदि लग्र
सबल हो तो लग्रकी जितनी भुक्त राशिसंख्या हो
उतने वर्षं ओर अधिक जोडे। तथा अंशादिको २
से गुणा करके ५ का भाग देकर लब्धिको मास
समञ्जकर उसे भी जोडे तथा शेषको ३० आदिसे
गुणा करके हरसे भाग देकर जो लब्धि आवे,
उसके तुल्य दिनादि रूप फल भी जोड तो लमग्रायु
स्पष्ट होती हे*। यह क्रिया पिण्डायु ओर निसर्गायुमें
नहीं की जाती हे ॥१२९--१३५३॥
( दशा-निरूपण-- ) लग्र, सूर्य ओर चन्द्रमा-
इन तीनोमे जो अधिक बली है, प्रथम उसीकी
दशा होती हे। फिर उससे केन्द्रस्थित ग्रहोकी,
तदनन्तर 'पणफर' स्थित ग्रहोंको, तत्पश्चात्
आपोक्लिम ' स्थित ग्रहोकी दशा होती हे । कनद्रादि-
स्थित ग्रहोमे बलके अनुसार ही पूर्व-पूर्वं दशा
होती है। एक स्थानमें स्थित दो या तीन ग्रहोमे
यदि बलको समानता हो तो उनमें जिसको
अधिक आयु हो उसको प्रथम दशा होती हेै।
आयुके वर्षादिमें भी समता हो तो जिस ग्रहका
सूर्य-सान्निध्यसे प्रथम उदय हुआ हो, उसको
१. अंशायु-साधन-- स्पष्ट राश्यादि सूर्य १०। १५। १०। २० को अंशात्मक बनानेसे ३१५। १०। २० में ४०
का भाग देनेपर शेष ३५। १०। २० हुआ। यह साधनोपयोगी अंशादि हु आ। इसमें संस्कारविरोष करनेके लिये सूर्य
१०। १५। १०। २० लग्र ३। १५। २०। ३० मं न घर सकनेके कारण नियमानुसार १२ राशिमें जोड़कर घटानेसे
शेष ५। ०। १०। १० यह ६ राशिसे कम ओर १ राशिसे अधिक है, इसलिये इस शेषके अंशादि १५०। १०।
१० से ३० में भाग देनेपर लब्ध अंश ° हआ। शेष ३० को ६० से गुणा कर् गुणनफल १८०० मेँ उक्त भाजकका
भाग देनेपर लब्धि-कला ११ हई । शप १४८।८।१० को ६० से गुणा कर गुणनफल ८८८८ । १०में उक्त अंशादि
भाजकसे भाग देनेपर तृतीय लब्धि ५९ हुई । इस प्रकार लब्धिमान अंशादि ०। ११। १५ हआ। इसको १ अशमे
घटानेसे शेष ०। ४८। १ यह गुणक हुआ। सूर्य पापग्रह है, अतः इस गुणकसे आयुसाधनोपयोगी अंशादि ३५।
१०।२० को गुणा करनेषर गुणनफल २८।८।५१ यह संस्कृत अंशादि हुआ । इसको कलात्मक बनानेसे १६८८।
५१ हुआ । इसमं २००का भाग दनेपर लब्ध वर्प ८ हुए। शेष ८८।५१ को १२ आदिसे गुणा कर गुणनफलमें
२०० का भाग देकर पूर्ववत् मासादि निकालनेसे आयुमान वदि ८। ५। ९। ५५। ४८ हुआ।
२. लग्रका अंशायु-साधन- लग्र ३। १५। २०। ३० के अंशादि वनानेसे १०५। २०। ३० हुए । इनमें ४० का
भाग देनेपर बचे हुए २५। २०। ३० को ३०से गुणा करके गुणनफ़ल ७६। १। ३० में १० का भाग दिया तो लव्ध
७ वर्षं हुए। शेष ६।१। ३० को १२से गुणा करके गुणनफल ७२। १८। ० में १० का भाग देनेपर लब्ध ७ मास
हुए मास-शेप २।१८ को ३० से गुणा कर गुणनफल ६९। ० में १० का भाग देनेपर लब्ध ६ दिन हुए। शेष
९ क्रो ६० से गुणा कर गुणनफल ५४० मं १० का भाग देनेपर लब्धि ५४ घडी हुई। इस प्रकार लप्रका
अंशायुर्दायमान वर्षादि ७। ७। ६। ५४६। ° दहुआ।
((-0. 1/८11114<511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
प्रथम दशा होती ह ॥१३६-१३७॥
( अन्तर्दशा-कथन-- ) दशापति पूर्णदशाका
पाचक होता है, तथापि उसके साथ रहनेवाला ग्रह
आधे (ङ) का, दशापतिसे त्रिकोण (५, ९) -मे
रहनेवाला तृतीयांश (३) का, सप्तममें रहनेवाला
सप्तमांश () का, चतुरस्न (४। ८) -में रहनेवाला
चतुर्थांश (ॐ ) अन्तर्दशाका पाचक होता है। इससे
सिद्ध है कि इन स्थानोंसे भिन्न स्थानमें स्थित
ग्रहोको अन्तर्दशा नहीं होती है\॥ १३८- ॥
( अन्तर्दशा-साधनके गुणक-) मूल
दशापतिका ८४, उसके साथ रहनेवालेका ४२,
त्रिकोणमें रहनेवालेका २८, सप्तममें रहनेवालेका
१२ तथा चतुर्थ-अष्टममें रहनेवालेका २१ गुणक
कहा गया हे। वर्षादि रूप दशा-प्रमाणको अपने-
अपने गुणकसे गुणा करके सब गुणककि योगसे भाग
देनेपर जो लब्धि आवे, वह वर्ष होता हे। शेषको १२,
३० आदिसे गुणा करके गुणनफलमें गुणकके योगसे
भाग देनेपर जो लब्धि आवे, वह मास-दिन आदिका
सूचक होती हैः । नारदजी ! इसी प्रकार अन्तर्दशामं
२९५
उपदशाके मान समञ्जने चाहिये ॥ १३९-- १४१२ ॥
( दशाफल- ) दशारम्भ-करालमें यदि चन्रमा
दशापतिके मित्रको राशि, स्वोच्च, स्वराशि या
दशापतिसे १, ४, ७, ३, १०, ११ में शुभ स्थानमें
हो तो जिस भावमें चन्द्रमा हो, उस भावकी
विशेषरूपसे पुष्टि करता हुआ शुभ फल देता है ।
इन स्थानोंसे भिन्न स्थानें हो तो उस भावका
नाशक होता हे ॥ १४२-१४३ ॥ पहले जिस ग्रहके
जो द्रव्य बताये गये हँ, भाव ओर राशियोमें जो
उन ग्रहोकी दृष्टि तथा योगका फल कहा गया दै
एवं आजीविका आदि जो-जो फल बताये गये हैँ
उन सबका विचार उस ग्रहक्तो दशामें करना
चाहिये । जो ग्रह पापदशामें प्रवेशके समय अपने
शत्रुसे देखा जाता हो, वह विपत्तिकारक (अत्यन्त
अशुभ फल देनेवाला) होता है तथा जो शुभग्रह
मित्रसे दृष्ट हो ओर शुभवर्गमें रहकर तत्काल
बलवान् हो, वह सब आपत्ति (दुष्ट फल)-को
नष्ट कर देता है । जिसका (आगे बताया जानेवाला)
अष्टक वर्गज फल पूर्ण शुभ हो तथा जो ग्रह लप्र
१ 6 के.
~
९1. %<
प
१. यहाँ लग्र, सुर्य ओर चनद्द्रमा--इन तीनीमिं लग्र
बली दै, इसलिये प्रथम दशा लग्रकी होगी; पिर उससे
केन््रादिस्थित ग्रहोकी। तथा लग्रकी दशामें प्रथम अन्तर्दशा
लग्रकी, आगे फिर बलक्रमसे शुक्र ओर बुधकी अन्तर्दशा
होगी । यहां दशापति लग्र है, इसलिये इसके गुणकाङ्क ८४
से दशावर्षादि ११। १।१९१ को गुणा कर् गुणनफल ९३३।
६। २४ में गुणकयोग १८७ का भाग देनेपर लब्ध वपं ४
हृए। शेष १८५। ६। २४ को १२ से गुणा कर् गुणनफल
२२२६। ९। १८ मं १८७ का भाग देनेपर लब्ध ११ माम
हृए। शेष १६९।९। १८ को ३० से गुणा कर गुणनफल
५०९४ मे १८७ का भाग देनेपर लब्ध २७ दिन हुए । शेष
४३ को ६० से गुणा कर् गुणनफल २५८० मं १८७ का
भाग देनेपर लब्धि १३ घड़ी हुई । शेष १४९ को ६० से
गुणा कर गुणनफल ८९४० मं १८७ का भाग दैनेपे लब्ध
४७ पल हुए । इस प्रकार लव्य वर्षादि ४। ११।२७। १३।
४७ यह लग्रकी दशाम लग्रकौ अर्न्दशाका मान हुआ।
इसी प्रकार अन्य ग्रहकि भी अपने-अपने गुणकम
दशामानको गुणा करके गुणनफलमें गुणकयोगका भाग
देकर अन्तर्दशाका मान साधने करना चादिये।
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। 01661010. 01411260 0\ 6810011
२९६
या चनद्रमासे १, ३, ६, १०, ११ में, स्वोच्च
स्थानमे, स्वराशिमे, अपने मूल त्रिकोणमें तथा
मित्रक राशिमें हो, उसका अशुभ फल भी मध्यम
हो जाता है, मध्यम फल श्रेष्ठ हो जाता है तथा
शुभ फल तो अत्यन्त श्रेष्ठ होता है । यदि वह ग्रह
इससे भिन्न स्थानमें हो, तो उसके पाप-फलको
वृद्धि होती है ओर उसका शुभ फल भी अल्प
हो जाता है। इन फलोंको भी ग्रहके बलाबलको
समञ्ञकर तदनुसार स्वल्प या अधिक समञ्जन
चाहिये ॥ १४४- १४८ ॥
( लग्र-दशा-फल- ) चर लमग्रमे प्रथम, द्वितीय,
तृतीय द्रेष्काण हो तो क्रमसे लग्रको दशा शुभ,
मध्यम ओर अशुभ फल देनेवाली होती हे।
द्िस्वभाव लग्र हो तो इससे विपरीत फल होता है
(अर्थात् प्रथमादि द्रेष्काणमें क्रमसे अशुभ, मध्यम
ओर शुभ फल देनेवाली दशा होती है) । स्थिर
लग्र हो तो प्रथमादि द्रेष्काणमें अशुभ, शुभ ओर
मध्यम फल देनेवाली दशा होती हे। लग्र यदि
अपने स्वामी, गुरु ओर बरुधसे युक्त एवं दृष्ट हो
तो उसकी दशा शुभप्रद होती है। यदि वह
पापग्रहसे युक्त या दृष्ट हो अथवा पापके मध्यमे
हो तो उसकी दशा अशुभ फल देनेवाली होती
है ॥ १४९-१५०॥
( अष्टक-वर्ग-कथन-- ) सूर्यं जन्म-कालिक
स्वाध्रित राशिसे १। २। १०।४।८।११।९। ७
इन स्थानोमें शुभ होता है । मङ्गल ओर शनिसे भी
इन्हीं स्थानों रहनेपर वह शुभ होता हे । शुक्रसे
७।१२।६ मे, गुरुसे ९।५।११।६ मे, चन्द्रमासे
१०।३।११।६ में, बुधसे इन्हीं १०।३। ११।६
स्थानोमे ओर १२। ५।९ म॑ भी वह शुभ होता
हे । लप्रसे ३।६।१०।११। १२। ४ इन स्थानोमें
सूर्यं शुभ होता ह ॥ १५१-१५२॥
चन्द्रमा लग्रसे &, ३, १०, ११ स्थानो;
संक्षिप्त नारदपुराण
मङ्गलसे २, ५, ९ सहित इन्हीं ६, ३, १०, ११
स्थानोमे; अपने स्थानसे ३, ६, १०, ११, ७, शमे;
सूर्यसे ३, ६, १०, ११, ७, ८ में; शनिसे ६, ३,
१९१, ५ में; बुधसे ५, ३, ८, १, ४, ७, १० मे;
गुरुसे १, ४, ७, १०, ८, ११, १२ में ओर शुक्रसे
४, ५, ९, ३, ११, ७, १० इन स्थानोमे शुभ होता
हे ॥ १५३-१५४॥
मङ्गल सूर्यसे ३, ६, १०, ११, ५ में; लग्रसे
३, ६, १०, १९, १ मे; चन्द्रमासे ३, ६, ११ मे;
अपने आश्रित स्थानसे ९, ४, ७, १०, ८, ११, २ मे;
शनिसे ९, ८, ११, १, ४, ७, १० मे; बुधसे ६, ३,
५, ११; शुक्रसे ६, १९, २, ८ में ओर गुरुसे १०, ११,
१२, £ स्थानोमे शुभ होता हे ॥ १५५-१५६॥
बुध शुक्रसे ५, ३ सहित २, १, ८, ९, ४, १९
स्थानाोमें; शनि ओर मद्गलसे १०, ७ सहित
२, १, ८, ९, ४ ओर ११ वें स्थाने; गुरुसे
१२, ६, ११, ८ वें स्थानोमे; सूर्यसे ९, १९, ६,
५, १२ वें स्थानो; अपने आश्रित स्थानसे १, ३,
१०, ९, १९१, ६, ५, १२ वें स्थानोमें; चन्द्रमासे
६, १०, ११, ८, ४, १० मैं ओर लग्रसे १ तथा
पूर्वोक्त ६, १०, ११, ८, ४, १० स्थानोमे शुभ
होता है ॥ १५७-१५८ ॥
गुरु मङ्गलसे १०, २, ८, १, ७, ४, ११
स्थानोमे; अपने आश्रित स्थानसे ३ सहित पूर्वोक्त
(१०, २, ८, १, ७, ४, ११) स्थानोमे; सूर्यसे ३, ९
सहित पूर्वोक्तं (१०, २, ८, १, ७, ४, ११)
स्थाने; शुक्रसे ५, २, ९, १०, ११, ६ मे; चन्द्रमासे
२, ११, ५, ९, ७ में; शनिसे ५, ३, ६, रमं;
वुधसे ९, ४, ५, ६, २, १०, १, ११ में तथा लग्रसे
७ सहित पूर्वोक्तं (९।४, ५, ६, २, १०, १, ११)
स्थानम शुभ होता है ॥ १५९-१६०॥
शुक्र लग्रसे १, २, ३, ४, ५, ११, ८, ९
स्थानोमें; चनद्रमासे भी इन्हीं स्थानों (१, २, ३,
((-0. 1/८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
४, ५, ११, ८, ९) -मे ओर १२ वें स्थानमें; अपने
आश्रित स्थानसे १० सहित उक्त (१, २, ३, ४,
५, ११, ८, ९) स्थानोमे; शनिसे ३, ५, ९, ४,
१०, ८, १९ स्थानोमे; सूर्यसे ८, ११, १२
स्थानोमे; गुरुसे ९, ८, ५, १०, ११ स्थानम;
बुधसे ५, २३, ११, ६, ९ स्थानोमें ओर मद्गलसे
३, ६, ९, ५, ११ तथा बारहवें स्थानोमें शुभ होता
हे ॥ १६१-१६२॥
शनि अपने आश्रित स्थानसे ३, ५, १९१, ६ मेः;
मङ्गलसे १०, १२ सहित पूर्वोक्त (२, ५, ११, ६)
स्थानो; सूर्यसे १, ४, ७, १०, ११, ८, २ मे;
लग्रसे ३, ६, १०, ११, १, ४ मे; बुधसे ९, ८,
११, ६, १०, १२ मे; चनद्रमासे ११, ३, ६ मे;
शुक्रसे ६, ११, १२ में ओर गुरुसे ५, ११, ६
स्थानोमें शुभ होता हे ॥ १६३-१६४॥
उपर्युक्त स्थानोमें ग्रह रेखा-प्रद ओर अनुक्त
स्थानोमें बिन्दुप्रद होते हैं*। जो ग्रह लग्र या
चन्द्रमासे वृद्धि या उपचय स्थान (३, ६, १०,
११) में हों, या अपने मित्रगृहमे, उच्च स्थानमें
तथा स्वराशिमें स्थित हों, उनके द्वारा शुभ फलक
२९७
अधिकता होती है ओर इनसे भिन्न स्थानोमें जो
ग्रह हों, उनके द्वारा अशुभ फलकी अधिकता
होती हे ॥ १६५॥
( एकादि रेखावाले स्थानका फल- ) उक्त
प्रकारसे जिस स्थानें एक रेखा हो, वहां ग्रहके
जानेपर कष्ट होता है । दो रेखावाले स्थानम जानेसे
धनका नाश होता है। तीन रेखावालेमे जानेसे
क्लेश होता है। चार रेखावाले स्थानें ग्रहके
पहुंचनेसे मध्यम फल होता है (शुभ-अशुभ
फलकी तुल्यता होती है) । पांच रेखावाले स्थानमें
सुखको प्राति, छः रेखावालेमे धनका लाभ, सात
रेखावाले स्थानमें सुख तथा आठ रेखावाले स्थानमं
चारवश ग्रहके जानेपर अभीष्ट फलकी सिद्धि
होती है ॥ १६६॥
( आजीविका-कथन-- ) जन्मकालिक लग्र
ओर चन्द्रमासे १०बें स्थानमें यदि सूर्य आदि ग्रह
हों तो क्रमसे पिता-माता, शत्रु, मित्र, भाई, स्त्री
ओर नौकरके द्वारा धनका लाभ होता हे। जन्मलम्र,
जन्मकालिक चन्द्र तथा जन्मकालिक सूर्य-इन
तीनोंसे दशम स्थानके स्वामी जिस नवमांशमें हों
१. बालकके जन्मकाले जो ग्रहस्थिति है, उसमें ग्रहकी निजश्रित राशिसे विचार करके इस प्रकार रेखा ओर विन्दुका जान
प्रात कना चाहिये। अर्थात् इस तरह रेखा ओर विन्दु लगानेसे जिस स्थानम अधिक रेखाकी संख्या हो, उस स्थानम चाखश ग्रहके
जानेसे शुभ फल होता है ओर जिसमें बिन्दुकी संख्या अधिक हो, उस स्थाने ग्रहके जानेसे अशुभ फलक प्राति होती है।
सूर्यका अष्टकवर्ग-चक्र देविये-
^
॥8०।० ७
७ गु
1० 1०9०9०1
१०
२ 12 = ० 199
१शु.
७० {99 19 |
०9० 9 11119959
१९१ मु.
189 ° ©
यहाँ रेखा ओर बिन्दु
लगाकर सूर्यका अष्टकवर्ग-
चक्र अद्भत किया गया है।
इसमें वृष, कन्या, धनु ओर
मीनर्मे रेखा अधिक होनैके
कारण ये राशियों शुभ है
तथा मिथुन, सिंह, तुला ओर
कुम्भर्मे रेखा ओर विन्दु तुल्य
होनेके कारण ये मध्यम है
एवं शेष कर्क, वृश्चिक, मकरं
ओर मेष--ये अधिक विन्दु
होनेके कारण अशुभ है।
२ म.
|॥९०।॥
१२
((-0. 1/८111104/5511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
२९८
उस नवमांशके अधिपतिको वृत्तिसे आजीविका
समञ्चनी चाहिये। यथा-उक्त दशम स्थानके
स्वामी सूर्यके नवमांशमें हों तो तृण (पत्र
पुष्पादि), सुवर्ण, ओषध, ऊन (ऊनी वस्त्र) तथा
रेशम आदिसे जीविका समञ्च । चन्द्रमाके नवमांशमें
हों तो खेती, जलज (मोती, मृगा, शङ्क, सीप
आदि) ओर स्त्रीके द्वारा जीविका चलती हे।
मङ्गलके नवमांश हों तो धातु, अस््र-शस्त्र ओर
साहससे जीवन-निर्वाह होता हे । बुधके नवमांशमें
हों तो काव्य, शिल्पकलादिसे, गुरुके नवमांशमें
हों तो देवता ओर ब्राह्यणोके द्वारा तथा लोहा-
सोना आदिके खानसे, शुक्रके नवमांशमें हों तो
चोदी, गौ तथा रत्न आदिसे ओर शनिके नवमांशमें
हों तो परपीडन, परिश्रम ओर नीच कर्मद्रारा
धनकी प्राति होती हे ॥ १६७- १६९ ॥
(राजयोगका वर्णन- ) शनि, सूर्य, गुरु
ओर मद्गल-ये चारों यदि अपने-अपने उच्चमें
हों ओर इन्हीमे कोई एक लग्रमे हों तो इन चारों
लग्रोमे जन्म लेनेवाले बालक राजा होते है। लग्र
अथवा चन्द्रमा वर्गोत्तम नवमांशमें हो ओर उसपर
४,५या ६ ग्रहको दृष्टिदहो तो इसके २२ भदमें
२२ प्रकारके राजयोग होते है। मङ्गल अपने
उच्चमें हो, रवि ओर चन्द्रमा धनराशिमें हों ओर
मकरस्थ शनि लग्रमे हो तो जातक राजा होता हे ।
उच्च (मेष) -का रवि लग्रमे हो, चन्द्रमासहित
शनि सप्तम भावम हो, वृहस्पति अपनी राशि (धनु
या मीन)-में हो तो जन्म लेनेवाला राजा होता
हे ॥ १७०-१७१॥ शनि अथवा चन्द्रमा अपने
उच्वराशिका होकर लग्रमे हों, पष्ठ भावमें सूर्य
ओर बुध हो, शुक्र तुलामे, मङ्गल मेषमें ओर गुरु
संक्षिप्त नारदपुराण
कर्कमे हो तो इन दोनों लग्रोमे जन्म लेनेसे शिशु
राजा होते हे । उच्चस्थ! मङ्गल यदि चन्द्रमाके
साथ लग्रमे हो तो भी जातक राजा होता हे।
चन्द्रमा वृष लग्रमें हो ओर सूर्य, गुरु तथा शनि
ये क्रमसे ४, ७, १०बें स्थानमें हों तो जातक राजा
होता हे। मकर लग्रमे शनि हो ओर लग्रसे ३, £,
९ एवं १२ वे भावमें क्रमशः चन्द्रमा, मङ्गल, बुध
तथा बृहस्पति हों तो जन्म लेनेवाला बालक राजा
होता है ॥ १७२-१७३॥
गुरुसहित चन्द्रमा धनमें ओर मङ्गल मकरमें
हो तथा बुध या शुक्र अपने उच्चमें स्थित होकर
लपग्रमे विद्यमान हों तो उन दोनों योगोमें जन्म
लेनेवाला शिशु राजा होता है। बृहस्पतिसहित
कर्क लग्र हो, बुध, चन्द्रमा तथा शुक्र तीनों ११बं
भावमें हों ओर सूर्य मेषमें हो- तो जातक राजा
होता हे । चन्द्रमासहित मीन लग्र हो, सूर्य, शनि,
मङ्गल-ये क्रमसे सिंह, कुम्भ ओर मकरमें हों तो
उत्पन्न बालक राजा होता है। मङ्गलसहित मेष
लग्र हो, वृहस्पति कर्कमें हो अथवा कर्कस्थ
वृहस्पति लमग्रमे हो तो जातक नरेश होता हे।
मङ्गल ओर शनि पञ्चम भावे, गुरु, चन्द्रमा तथा
शुक्र चतुर्थं भावमें ओर बुध कन्या लग्रमे हों तो
जन्म लेनेवाला शिशु राजा होता है ॥ १७४- १७६॥
मकर लग्रमे शनि हो तथा मेष, कर्क, सिंह-ये
अपने-अपने स्वामीसे युक्त हो, शुक्र तुलामें
ओर बुध मिथुनमें हों तो बालक यशस्वी राजा
होता है ॥ १७७॥ मुनी श्वर ! इन बताये हुए योगोमें
जन्म लेनेवाला जिस किसीका पुत्र भी राजा
होता है। तथा अगे जो योग बताये जार्येगे,
उनमें जन्म लेनेवाले राजकुमारको ही राजा
१. पहले उच्चस्थ मद्भलादिके लग्रमे रहनेसे "राजयोग" कहा गया है । इसलिये यहाँ भी जो चन्द्रमासहित मङ्गलको
लग्रे स्थित कटा गया है, उससे उनके उच्चस्थभावकी ही अनुवृत्ति समञ्ञनी चाहिये । अन्य मुनियोनि मकरस्थ मङ्गलके
लप्रमे होनेसे "राजयोग ' कहा रै।
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पूर्व भाग-द्वितीय पाद
समञ्ना चाहिये । (यदि अन्य व्यक्ति इस योगमें
उत्पन्न हुआ हो तो वह राजाके तुल्य होता हे
राजा नहीं ।) ॥ १७८ ॥
तीन या अधिक ग्रह बली होकर अपने-अपने
उच्च या मूल त्रिकोणमें हों तो बालक राजा होता
हे। सिंहमें सूर्य, मेष लग्रे चन्द्रमा, मकरमें
मङ्गल, कुम्भे शनि ओर धनुमें वृहस्पति हो तो
उत्पन्न शिशु भूपाल होता हे। मुने! शुक्र अपनी
राशिमें होकर चतुर्थं स्थानमें स्थित हों, चन्द्रमा
नवम भावमें रहकर शुभ ग्रहसे दष्ट या युक्त हों
तथा शेष ग्रह ३, १, ११बें भावमें विद्यमान हों तो
जातक इस वसुधाका अधीश्वर होता है। बुध
सबल होकर लग्रमे स्थित हों, बलवान् शुभग्रह
नवम भावमें स्थित हों तथा शेष ग्रह ९, ५, ३,
६, १० ओर ११वें भावमें हो तो उत्पन्न बालक
धर्मात्मा नरेश होता है। चन्द्रमा, शनि ओर
बृहस्पति क्रमशः दसवें, ग्यारहवें तथा लग्रमे
स्थित हो, बुध ओर मङ्गल द्वितीय भावमे तथा
शुक्र ओर रवि चतुर्थं भावमें स्थित हों तो जातक
भूपाल होता हे । वृष लग्रमे चन्द्रमा, द्वितीयमें गुरु,
११ वेमे शनि तथा शेष ग्रह भी स्थित हों तो
वालक नरेश होता हे ॥ १७९- १८३ ॥
चतुर्थं भावे गुरु, १० वें भावमें रवि ओर
चन्द्रमा, लग्रमे शनि ओर ११वें भावमें शेष ग्रह
हों तो उत्पन्न शिशु राजा होता है। मद्धल ओर
शनि लप्रमें हों, चन्द्रमा, गुरु, शुक्र, रवि ओर
बुध-ये क्रमसे ४, ७, ९, १० ओर ११ वेमंहों
तो ये सव ग्रह एेसे बालकको जन्म देते है, जो
भावी नरेश होता है। मुनीश्वर! ऊपर कटे हुए
योगोमें उत्पन्न मनुष्यके दशम भाव या लग्रे जो
ग्रह॒ हो, उसकी दशा-अन्तर्दशा आनेपर उसे
२९९
राज्यकौ प्रापि होती हे। इन दोनों स्थानीमें ग्रह न
हो तो जन्म-समयमें जो ग्रह बलवान् ही, उसकी
दशामें राज्यलाभ समञ्जना चाहिये तथा जो ग्रह
जन्म-समयमें शत्नु-राशि या अपनी नीच राशिमें
हो, उसकी राशिमें क्लेश, पीड़ा आदिकी प्रापि
होती हे ॥ १८४-१८५२ ॥
( नाभसः\ योग-कथन-- ) समीपवर्ती दो
केन्द्रस्थानोमें ही (रविसे शनिपर्यन्त) सव ग्रह हों
तो *गदा' नामक योग होता है। केवल लग्र ओर
सप्तम दो ही स्थानोमें सव ग्रह हों तो शकट” योग
होता है। दशम ओर चतुर्थमें ही सव ग्र्होकी
स्थिति हो तो 'विहग' (पक्षी) योग होता है।
५, ९ ओर लग्र-इन तीन ही स्थानोमें सव ग्रह
हों तो “ शृद्धाटक' योग होता है। इसी प्रकार यदि
लग्र भिन्न स्थानसे त्रिकोण स्थानोमें ही सव ग्रह
हों तो "हल ' नामक योग होता है ॥ १८६-१८७॥
लग्र ओर सप्तमे सब शुभ ग्रह हों अथवा चतुर्ध-
दशममें सब पापग्रह हों तो दोनों स्थितियोमें * वञ्र'
योग होता हे। इसके विपरीत यदि लग्र, सप्तममं
सव पापग्रह अथवा चतुर्थ, दशममं सव शुभग्रह
हों तो “यव ' योग, होता हे । यदि चारों केन्द्रं सव
(शुभ ओर पाप)-ग्रह मिलकर वैदे हों ती
"कमल ' योग होता है ओर केद्रस्थानसे बाहर
(चारों पणफर अथवा चारों आपोक्लिमस्थानोमे)
ही सव ग्रह स्थित हों तो * वापी" नामक योग होता
है ॥१८८ ॥ लग्रसे लगातार ४ स्थान (१, २, ३,
४) में ही सव ग्रह मौजुद हों तो “युप' योग होता
है। चतुर्थसे चार स्थान (४, ५, ६, ७) -ें ही
सव ग्रह स्थित हों तो शर्" योग होता है । सप्तमसे
८ स्थान (७, ८, ९, १०)-पें ही सव ग्रहोकी
स्थिति हो तो *शक्ति' योग होता टै ओर दशमसे
[0 ०० षषी भी यो 77 | ऋ आः कर ककः च = जकः = कक क
लिये गये है।
ओर केतुकौ छोडकर केवलं मूर्यं आदि साते ग्रह दही
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३3००
संक्षिप्त नारदपुराण
४ स्थान (१०, १९१, १२, १)-में ही सब ग्रह
मोजूद हों तो "दण्ड ' योग होता है ॥ १८९ ॥ लग्रसे
क्रमशः सात स्थानो (१, २, ३, ४, ५, ६, ७)-में
सब ग्रह हों तो “नौका' योग, चतुर्थं भावसे
आरम्भ करके लगातार सात स्थानोमें सातो ग्रह हों
तो 'कूट' योग, सप्तम भावसे आरम्भ करके
लगातार सात स्थानोमें सातों ग्रह विद्यमान हों तो
छत्र" योग ओर दशमसे आरम्भ करके सात
स्थानोमं सब ग्रह स्थित हों तो * चाप" नामक योग
होता हे। इसी प्रकार केन्द्रभिन्न स्थानसे आरम्भ
करके लगातार सात स्थानोमे सब ग्रह हों तो
' अर्धचन्द्र नामक योग होता है॥१९०॥
लग्रसे आरम्भ करके एक स्थानका अन्तर
देकर क्रमशः (१, ३, ५, ७, ९ ओर ११ इन)
६ स्थानोमें ही सव ग्रह स्थित हों तो “चक्र
नामक योग होता है ओर द्वितीय भावसे लेकर
एक स्थानका अन्तर देकर क्रमशः ६ स्थानों (२,
४, ६, ८, १०, १२)-में ही सव ग्रह मोजूद हों
तो "समुद्र नामक योग होता हेै।
७ से १ स्थानतकमें सब ग्रहोके रहनेपर
क्रमशः वीणा आदि नामवाले ७ योग होते हैँ
जेसे-७ स्थानोमें सव ग्रह हों तो “वीणा ६
स्थानोमं सब ग्रह हों तो दाम" ५ स्थानोमें सब
ग्रह हों तो “पाश', ४ स्थानोमे सब ग्रह हों तो
'कषित्र, ३ स्थानोमें सव ग्रह हों तो 'शूल", २
स्थानोमे सव ग्रह हों तो 'युग' ओर एक ही
स्थानमें सब ग्रह हों तो “गोल” नामक योग होता
हे । सब ग्रह चरराशिमें हों तो "रज्जु", स्थिर राशिमें
हों तो "मुसल" ओर द्विस्वभावमें हों तो *नल'
नामक योग होता है। सव शुभग्रह केन्दरस्थानोमं
हों तो माला" ओर सब पापग्रह केन्द्रस्थानोमें हों
तो “ सर्प" नामक योग होता है॥ १९१-१९३॥
(इन योगोमरे जन्म लेनेवालोके फल- )
रस्नुयोगमें जन्म लेनेवाला बालक ईरप्यावान् ओर
राह चलने (यात्रा करने या घूमने-फिरने)-कौी
इच्छावाला होता हे । मुसलयोगमें उत्पन्न शिशु धन
ओर मानसे युक्त होता हे । नलयोगमें उत्पन्न पुरुष
अङ्गहीन, स्थिरलुद्धि ओर धनी होता हे । मालायोगमें
पैदा हुआ मानव भोगी होता है तथा सर्पयोगमें
उत्पन्न पुरुष दुःखसे पीडित होता हे॥ १९४॥
वीणायोगमें जिसका जन्म हुआ हो, वह मनुष्य
सव कार्योमिं निपुण तथा सङ्गीत ओर नृत्यमें रुचि
रखनेवाला होता हे । दामयोगमें उत्पन्न मनुष्य दाता
ओर धनाढ्य होता हे । पाशयोगमें उत्पन्न धनवान्
ओर सुशील होता है। केदार (क्षेत्र) -योगमें पैदा
हुआ खेतीसे जीविका चलानेवाला होता है तथा
शूलयोगमें उत्पन्न पुरुष शूरवीर, शस्त्रसे आघात न
पानेवाला ओर अधन (धनहीन) होता है । युगयोगमें
जन्म लेनेवाला पाखण्डी तथा गोलयोगमें उत्पन्न
मनुष्य मलिन ओर निर्धन होता हे ॥ १९५-१९६॥
चक्रयोगमें जन्म लेनेवाले पुरुषके चरणों
राजा लोग भी मस्तक ज्जुकाते हैं। समुद्रयोगमें
उत्पन्न पुरुष राजोचित भोगोसे सम्पन्न होता है।
अर्धचनद्रमे पैदा हुआ बालक सुन्दर शरीरवाला
तथा चापयोगमें उत्पन्न शिशु सुखी ओर शूरवीर
होता हे ॥ १९७ ॥ छत्रयोगमें उत्पन्न मनुष्य मित्रोका
उपकार करनेवाला तथा कूटयोगमें उत्पतन मिथ्याभाषी
ओर जेलका मालिक होता है । नौकायोगमें उत्पन्न
पुरुष निश्चय ही यशस्वी ओर सुखी होता है।
यूपयोगमें जन्म लेनेवाला मनुष्य दानी, यज्ञ
करनेवाला ओर आत्मवान् (मनस्वी ओर जितात्मा)
होता है । शरयोगमें उत्पन्न मनुष्य दूसरोको कष्ट
देनेवाला ओर गोपनीय स्थानोंका स्वामी होता
हे । शक्तियोगमें उत्पन्न नीच, आलसी ओर निर्धन
होता है तथा दण्डयोगमें उत्पन्न पुरुष अपने प्रियजनोपे
वियोगका कष्ट भोगता है ॥ १९८-१९९॥
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पूर्व भाग-द्वितीय पाद्
३०१
( चन््रयोगका कथन-- ) यदि चन्द्रमासे द्वितीयमें
सूर्यको छोडकर कोई भी अन्य ग्रह हो तो
' सुनफा' योग होता है । द्वादशमं हो तो “अनफा!
ओर दोनों (२,१२) स्थानोमें ग्रह हों तो ‹ दुरुधरा'
योग समञ्जना चाहिये, अन्यथा (अर्थात् २, १२ मं
कोई ग्रह नहीं हों तो) 'केमद्रम' योग होता
हे ॥ २००॥
( उक्त योगोंका फल-- ) ' सुनफा' योगमें
जन्म लेनेवाला पुरुष अपने भुजबलसे उपार्जित
धनका भोगी, दाता, धनवान् ओर सुखी होता हे ।
'अनफा' योगमें उत्पन्न मनुष्य रोगहीन, सुशील,
विख्यात ओर सुन्दर रूपवाला होता हे । ' दुरुधरा'
योगमें जन्म लेनेवाला भोगी, सुखी, धनवान्, दाता
ओर विषयोँसे निःस्पृह होता है तथा 'केमद्रुम'
योगमें उत्पन्न मनुष्य अत्यन्त मलिन, दुःखी, नीच
ओर निर्धन होता है॥ २०१-२०२॥
( द्विग्रहयोगफल-- ) मुने! सूर्यं यदि चन्द्रमासे
युक्त हो तो भंति-भांतिके यन्त्र (मशीन) ओर
पत्थरके कार्यमें कुशल बनाता है। मद्लसे युक्त
हो तो वह बालकको नीच कर्मे लगाता ठे
बुधसे युक्त हो तो यशस्वी, कार्यकुशल, विद्वान्
एवं धनी बनाता है, गुरुसे युक्त हो तो दूसरोके
कार्य करनेवाला, शुक्रसे युक्त हो तो धातुओं
(तोवा आदि)-के कार्यमें निपुण तथा पात्र-
निर्माण-कलाका जानकार बनाता हे ॥ २०३-२०४॥
चन्द्रमा यदि मङ्गलसे युक्त हो तो जातक कूट
वस्तु (नकली सामान), स्त्री ओर आसव-
अरिष्टादिका क्रय-विक्रय करनेवाला तथा माताका
द्रोही होता है । बुधके साथ चन्द्रमा हो तो उत्पन्न
शिशुको धनी, कार्यकुशल तथा विनय ओर
कौर्तिसे युक्त करता है; गुस्से युक्त हो तो
चञ्चलबुद्धि, कुलमें मुख्य, पराक्रमी ओर अधिक
धनवान् बनाता है । मुने ! यदि शुक्रसे युक्त चन्द्रमा
हो तो बालकको वस्त्रनिर्माण-कलाका ज्ञाता बनाता
है ओर यदि शनिसे युक्त हो तो वह बालकको
एेसी स्त्रीके पेटसे उत्पन्न कराता है, जिसने पतिके
मरनेपर या जीते-जी दूसरे पतिसे सम्बन्ध स्थापित
कर लिया हो ॥ २०५-२०६॥
मङ्गल यदि बुधसे युक्त हो तो उत्पन्न हुआ
बालक बाहुसे युद्ध करनेवाला (पहलवान) होता
हे। गुरुसे युक्त हो तो नगरका मालिक, शुक्रसे
युक्त हो तो जुआ खेलनेवाला तथा गायोंको
पालनेवाला ओर शनिसे युक्त हो तो मिथ्यावादी
तथा जुआरी होता हे ॥ २०७॥
नारद । बुध यदि वृहस्पतिसे युक्त हो तो
उत्पन्न शिशु नृत्य ओर सद्गीतका प्रेमी होता हे।
शुक्रसे युक्त हो तो मायावी ओर शनिसे युक्त हो
तो उत्पन्न मनुष्य लोभी ओर क्रूर होता दै ॥ २०८॥
गुरु यदि शुक्रसे युक्तं हो तो मनुष्य विद्वान्,
शनिसे युक्त हो तो रसोइया अथवा घडा बनानेवाला
( कुम्हार) होता है । शुक्र यदि शनिके साधहोतो
मन्द दृष्टिवाला तथा स्त्रीके आश्रयसे धनोपार्जन
करनेवाला होता है ॥ २०९॥
( प्रव्रज्यायोग-- ) यदि जन्म-समयमं चार
या चारसे अधिक ग्रह एक स्थानमें बलवान् हां
तो मनुष्य गृहत्यागी संन्यासी होता है । उन ग्रहों
मङ्गल, वुध, गुरु, चन्द्रमा, शुक्र, शनि ओर सूर्यं
वली हों तो मनुष्य क्रमशः शाक्य (रक्त-वस्त्रधारी
बौद्ध), आजीवक (दण्डी), भिक्षु, (यती), वृद्ध
(वृद्धश्रावक), चरक (चक्रधारी), अही (नप्र)
ओर फलाहारी होता है । प्रव्रज्याकारक ग्रह यदि
अन्य ग्रहसे पराजित हो तो मनुष्य उस प्रव्रज्यामे
गिर॒ जाता है। यदि प्रत्रज्याकारक ग्रह सूर्य
सात्निध्यवश अस्त हो तो मनुष्य उसको दीक्षा ही
नहीं लेता ओर यदि वह ग्रह बलवान् हो तो
उसक्छी "प्रव्रज्या ' में प्रीति रहती दै । जन्मराशीशको
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३०२
यदि अन्य ग्रह नहीं देखता हो ओर जन्मराशीश
यदि शनिको देखता हो अथवा निर्बल जन्मराशीशको
शनि देखता हो या शनिके द्रेष्काण अथवा मङ्गल
या शनिके नवमांशमें चन्द्रमा हो ओर उसपर
शनिको दृष्टिहो तो इन योगो विरक्त होकर
गृहत्याग करनेवाला पुरुष संन्यास-धर्मको दीक्षा
तेता हे ॥ २१०-२१३॥
( अश्विन्यादि नक्षत्रोपे जन्मक्ा फल- )
अश्चिनी नक्षत्रम जन्म हो तो बालक सुन्दर रूपवाला
ओर भूषणप्रिय होता है। भरणीमें उत्पन्न शिशु सब
कार्य करनेमे समर्थं ओर सत्यवक्ता होता हे।
कृत्तिकामें जन्म लेनेवाला अमिताहारी, परस्त्रीमें
आसक्त, स्थिरवुदधि ओर प्रियवक्ता होता हे।
रोहिणीमे पेदा हुआ मनुष्य धनवान्; मृगशिरामें
भोगी; आद्रमिं हिसास्वभाववाला, शट ओर अपराधी;
पुनर्वसुमें जितेन्द्रिय, रोगी ओर सुशील तथा पुष्यमें
कवि ओर सुखी होता ह ॥ २१४-२१५॥ आश्लेषा
नक्षत्नमे उत्पन्न मनुष्य धूर्त, शठ, कृतघ्न, नीच
ओर खान-पानका विचार न रखनेवाला होता हे ।
मघामें भोगी, धनी तथा देवादिका भक्त होता हे।
पूर्वा फाल्गुनीमें दाता ओर प्रियवक्ता होता है।
उत्तरा फाल्गुनीमे धनी ओर भोगी; हस्ते चोरस्वभाव,
ढीठ ओर निर्लज्ज तथा चित्राम नाना प्रकारके
वस्त्र धारण करनेवाला ओर सुन्दर नेत्रंसे युक्त
होता हे । स्वातीमें जन्म लेनेवाला मनुष्य धर्मात्मा
ओर दयालु होता है । विशाखामें लोभी, चतुर ओर
क्रोधी; अनुराधामें भ्रमणशील ओर विदेशवासी;
ज्येष्ठामे धर्मात्मा ओर संतोषी तथा मूलमें धनीमानी
ओर सुखी होता हे । पूर्वाषाद्में मानी, सुखी ओर
इष्ट; उत्तराषादमें विनयी ओर धरमत्मा; श्रवणमें
धनी, सुखी ओर लोकमें विख्यात तथा धनिष्ठामें
दानी, शूरवीर ओर धनवान् होता है । शतभिषामें
शत्रुको जीतनेवाला ओर व्यसनमें आसक्त;
संक्षिप्त नारदपुराण
पूर्वभाद्रपदमें स्त्रीके वशीभूत ओर धनवान्; उत्तर-
भाद्रपदमें वक्ता, सुखी ओर सुन्दर तथा रेवतीमें
जन्म लेनेवाला शूरवीर, धनवान् ओर पवित्र हृदयवाला
होता हे ॥ २१६-२२०॥
( मेषादि चन्द्रराशिमे जन्मका फल- )
मेषराशिमें जन्म लेनेवाला कामी, शूरवीर ओर
कृतज्ञ; वृषमें सुन्दर, दानी ओर क्षमावान्; मिथुनमें
स्त्रीभोगासक्त द्यूतविद्याको जाननेवाला तथा कर्कराशिमे
स्त्रीके वशीभूत ओर छोटे शरीरवाला होता है।
सिहराशिमें स्त्रीदवेषी, क्रोधी, मानी, पराक्रमी, स्थिरबुद्वि
ओर सुखी होता हे। कन्याराशिमें धर्मात्मा, कोमल
शरीरवाला तथा सुबुद्धि होता हे । तुलाराशिमें उत्पन्न
पुरुष पण्डित, ऊचे कदवाला ओर धनवान् होता है ।
वृश्चिकराशिमे जन्म लेनेवाला रोगी, लोकमें पूज्य
ओर क्षत (आघात) -युक्त होता हे। धनुमें जन्म
लेनेवाला कवि, शिल्पक्ञ ओर धनवान्; मकरमें कार्य
करनेमे अनुत्साही, व्यर्थ घूमनेवाला ओर सुन्दर
नेत्रोसे युक्त; कुम्भमें परस्त्री ओर परधन हरण करनेके
स्वभाववाला तथा मीनमें धनु-सदश (कवि ओर
शिल्पन्ञ) होता हे ॥ २२१-२२३॥
यदि चन्द्रमाकौ राशि बली हो तथा राशिका
स्वामी ओर चन्द्रमा दोनों बलवान् हों तो ऊपर
कहे हुए फल पूर्णरूपसे संघटित होते है-एेसा
समञ्जना चाहिये । अन्यथा विपरीत फल (अर्थात्
निर्बल हो तो फलका अभाव या बलके अनुसार
फलमें भी तारतम्य) जानना चाहिये । इसी प्रकार
अन्य ग्रहोको राशिके अनुसार फलका विचार
करना चाहिये ॥ २२४॥
( सूर्यादि ग्रह-राशि-फल-- ) सूर्य यदि मेष-
राशिमें हो तो जातक लोकमें विख्यात होता है।
वृषमें हो तो स्त्रीका द्वेषी, मिथुनमें हो तो धनवान्,
कर्कमे हो तो उग्र स्वभाववाला, सिंहमें हो तो
मूर्ख, कन्याम हो तो कवि, तुलामें हो तौ कलवार,
((-0. 1\॥11114/5511॥1 21188 \/8181185। (0166101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
वृश्िकमें हो तो धनवान्, धनुमें हो तो लोकपूज्य,
मकरे हो तो लोभी, कुम्भे हो तो निर्धन ओर
मीनमें हो तो जातक सुखसे रहित होता हे ॥ २२५॥
मङ्गल यदि सिंहे हो तो जातक निर्धन,
कर्कमें हो तो धनवान्, स्वराशि (मेष, वृश्चिक) -में
हो तो भ्रमणशील, बुधराशि (कन्या-मिथुन) -में
हो तो कृतज्ञ, गुरुराशि (धनु-मीन) में हो तो
विख्यात, शुक्रराशि (वृष-तुला) -में हो तो परस्त्रीमे
आसक्त, मकरमें हो तो बहुत पुत्र ओर धनवाला तथा
कुम्भमें हो तो दुःखी, दुष्ट ओर मिथ्यास्वभाववाला
होता हे ॥ २२६३ ॥
बुध यदि सूर्यको राशि (सिंह)-में हो तो
स्त्रीका द्वेषी, चन्द्रराशि (कर्क) -मे हो तो अपने
परिजनोका देषी, मङ्गलको राशि (मेष-वृश्चिक) -मं
हो तो निर्धन ओर सतत्वहीन, अपनी राशि (मिथुन-
कन्या) -में हो तो बुद्धिमान् ओर धनवान्, गुरुको
राशि (धनु-मीन)-मे हो तो मान ओर धनसे
युक्त, शुक्रकी राशि (वृष-तुला) -मं हो तो पुत्र
ओर स्त्रीसे सम्पन्न तथा शनिको राशि (मकर-
कुम्भ) -में हो तो ऋणी होता है ॥ २२७ ३ ॥
गुरु यदि सिंहमें हो तो सेनापति, कर्कमें हो तो
स्त्री-पुत्रादिसे युक्त एवं धनी, मङ्गलकी राशि (मेष-
वृश्चिक) -में हो तो धनी ओर क्षमाशील, बुधकं
राशि (मिथुन-कन्या) -में हो तो वस्त्रादि विभवसे
युक्त, अपनी राशि (धनु-मीन) -में हो तो मण्डल
(जिला)-का मालिक, शुक्रको राशि (वृष-तुला)-
मेहो तो धनी ओर सुखी तथा शनिको राशि
(मकर-कुम्भ) -में हो तो मकरमें ऋणवान् ओर
कुम्भे धनवान् होता है ॥ २२८ ३ ॥
शुक्र सिंहमें हो तो जातक स्त्रीद्रारा धन-लाभ
कोरारी
३०३
करनेवाला, कर्कमें हो तो घमण्ड ओर शोकसे
युक्त, मङ्गलकी राशि (मेप-वृधिक)-मेहो तो
बन्धुओंसे द्वेष रखनेवाला, बुधकी राशि (मिथुन-
कर्क)-में हो तो धनी ओर पापस्वभाव, गुरुकी
राशि (धनु-मीन) -में हो तो धनी ओर पण्डित,
अपनी राशि (वृष-तुला) -में हो तो धनवान् ओर
क्षमावान् तथा शनिको राशि (मकर-कुम्भ)-में
हो तो स्त्रीसे पराजित होता है ॥ २२९३
शनि यदि सिंहमें हो तो पुत्र ओर धनसे रहित,
कर्कमें हो तो धन ओर संतानसे हीन, मद्गलकी राशि
(मेष-वृध्चिक) -मं हो तो निर्बुद्धि ओर मित्रहीन,
वुधको राशि (मिथुन-कन्या)-मं हो तो प्रधान रक्षक;
गुरुको राशि (धनु-मीन) मे हो तो सुपुत्र, उत्तम
स्री ओर धनसे युक्त, शुक्रकी राशि (व्रप-तुला) -मं
हो तो राजा ओर अपनी राशि (मकर-कृम्भ) -मेंहो
तो जातक ग्रामका अधिपति होता है॥ २३० ३॥
( चनद्रपर दृष्टिका फल- ) मेषस्थित चन्द्रमापर
मङ्गल आदि ग्रहोको दृष्टि हो तो जातक क्रमसे
राजा, पण्डित, गुणवान्, चोर-स्वभाव तथा निर्धनः
होता हे॥ २३१॥
वृषस्थ चनद्रमापर मङ्गल आदि ग्रहोकौ दृष्टि
हो तो क्रमसे निर्धन, चोर-स्वभाव, राजा, पण्डित
तथा प्रेष्य (भृत्य) होता है। मिथुनराशिमं स्थित
चन्द्रमापर मङ्गल आदि ग्रहोंकी दृष्टि हो तो मनुष्य
क्रमशः धातुओंसे आजीविका करनेवाला, राजा,
पण्डित, निर्भय, वस्त्र बनानेवाला तथा धनहीन
होता है । अपनी राशि (कर्क) -में स्थित चन्द्रमापर
यदि मङ्गलादि ग्रहोकी दृष्टि हो तो जन्म लेनेवाला
शिशु क्रमशः योद्धा, कवि, पण्डित, धनी, धातुसे
जीविका कसेवाला तथा नेत्ररेगी होता टै । सिंहरशिस्थ
नि
१. मद्लकी दृषटिसे भूप, वुधकी दृष्टिमे ज (पण्डित), गुल्को दृष्टिसे गुणी, शुक्रको दृष्टस चौर-स्वभाव
तथा शनिकी दृष्टिसे अस्व (निर्धन) कहा गया ह । सूर्यकी दृषटटिका फल अनुक्तं होनके कारण उसे शनिके ही
तुल्य समञ्जना चाहिये ।
मै
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 21188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
३०७
चन्द्रमापर यदि बुध्वादि ग्रहोको दृष्टि हो तो मनुष्य
क्रमशः ज्योतिषी, धनवान्, लोकमें पूज्य, नाई,
राजा तथा नरेश होता है। कन्या-राशिस्थित
चन्द्रमापर बुध आदि ग्रहोकी दृष्टि हो तो शुभग्रहों
(बुध, गुरु, शक्र )-की दृष्टि होनेपर जातक
क्रमशः राजा, सेनापति एवं निपुण होता हे ओर
अशुभ (शनि, मद्धल, रवि)-को दृष्टि होनेपर
स्त्रीके आश्रयसे जीविका करनेवाला होता हे।
तुला-राशिस्थ चन्द्रमापर यदि बुध आदि (बुध,
गुरु, शुक्र)-को दृष्टि हो तो उत्पन्न बालक क्रमसे
भूपति, सोनार ओर व्यापारी होता है तथा शेषग्रह
(शनि, रवि ओर मङ्गल)-को दृष्टि होनेपर वह
हिसाके स्वभाववदला होता हे ॥ २३२-२३४॥
वृश्चिक-राशिस्थ चन्द्रमापर बुध आदि ग्रहोको
दृष्टि होनेपर क्रमस्रे जातक दो संतानका पिता,
मृदुस्वभाव, वस्त्रादि की रंगा करनेवाला, अद्गहीन
निर्धन ओर भूमिपति होता हे। धन-राशिस्थ
चन्द्रमापर बुध तदि शुभग्रहोकी दृष्टि हो तो
उत्पन्न बालक क्रम्रशः अपने कुल, पृध्वी तथा
जनसमृहका पालक होता हे। शेष ग्रहों (शनि,
रवि तथा मङ्गल)-को दृष्टि हो तो जातक दम्भी
ओर शट होता हे ॥ २ २५ ॥ मकर-राशिस्थित चन्द्रमापर
बुध आदिक दृष्टि हो तो वह क्रमशः भूमिपति,
पण्डित, धनी, लोक्छमें पूज्य, भूपति तथा परस्त्रीमें
आसक्त होता है। कृम्भ-राशिस्थ चन्द्रमापर भी
उक्त ग्रहोंकी दृष्टि होनेपर इसी प्रकार (मकर-
राशिस्थके समान) फल समञ्जना चाहिये । मीन-
राशिस्थ चन्द्रमापर शुभग्रहों (बुध, गुरु ओर
शुक्र)-की दृष्टि हो तो जातक क्रमशः हास्यप्रिय,
राजा ओर पण्डित होता दै। (तथा शेष ग्रहों
(पापग्रहो )-की दृष्टि होनेपर अनिष्ट फल समञ्चना
संक्षिप्त नारदपुराण
चाहिये ।) ॥ २३६॥ होरा (लग्र) के स्वामीकौ
होरामें स्थित चन्द्रमापर उसी होरामें स्थित ग्रहोंकी
दृष्टि हो तो वह शुभप्रद होता हे। जिस तृतीयांश
(द्रेष्काण) -में चन्द्रमा हो उसके स्वामीसे तथा
मित्र-राशिस्थ ग्रहोसे युक्त या दृष्ट चन्द्रमा शुभप्रद
होता हे । प्रत्येक राशिमें स्थित चन्द्रमापर ग्रहोंको
दृष्टि होनेसे जो-जो फल कहे गये हैं, उन
राशियोके द्वादशांशमें स्थित चन्द्रमापर भी उन-उन
ग्रहोको दृष्टि होनेसे वे ही फल प्राप्त होते हे ।
अव नवमांशमे स्थित चन्द्रमापर भिन्न-भित्न
ग्रहोकी दृष्टिसे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन करता
हू। मङ्गलके नवमांशमें स्थित चन्द्रमापर यदि
सूर्यादि ग्रहोंको दृष्टि हो तो जातक क्रमशः ग्राम
या नगरका रक्षक, हिंसाके स्वभाववाला, युद्धम
निपुण, भूपति, धनवान् तथा ज्जगड़ालू होता हे ।
शुक्रके नवमांशमें स्थित चन्द्रमापर सूर्यादि ग्रहोको
दृष्टि हो तो उत्पन्न बालक क्रमशः मूर्ख, परस्त्रीमे
आसक्त, सुखी, काव्यकर्ता, सुखी तथा परस्त्रीमें
आसक्ति रखनेवाला होता हे। बुधके नवमांशमें
स्थित चन्द्रमापर यदि सूर्यादि ग्रहोकी दृष्टि हो तो
बालक क्रमशः नर्तक, चोरस्वभाव, पण्डित, मन्त्री,
सद्गीतन्ञ तथा शिल्पकार होता है । अपने (कर्क)
नवमांशमें स्थित चन्द्रमापर यदि सूर्यादि ग्रहोंकी
दृष्टि हो तो वह छोटे शरीरवाला, धनवान्, तपस्वी,
लोभी, अपनी स्त्रीको कमाईपर पलनेवाला तथा
कर्तव्यपरायण होता हे । सूर्यके नवमांश (सिंह) -
मे स्थित चन्द्रमापर यदि सूर्यादि ग्रहोकी दृष्टि हो
तो बालक क्रमशः क्रोधी, राजमन्त्री, निधिपति या
मन्त्री, राजा, हिसाके स्वभाववाला तथा पुत्रहीन
होता है । गुरुके नवमांशमें स्थित चनद्रमापर सूर्यादि
ग्रहोकी दृष्टि हो तो बालक क्रमशः हास्यप्रिय,
१. सूर्यादि क्रममे सूर्य, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि इस प्रकार छः ग्रह तथा वुधादिमें बुध, गुर, शुक्र, शनि,
रवि, मङ्गल इस प्रकार छः ग्रह समञ्ने चाहिये ।
((-0. 1/८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद्
२०५
रणे कुशल, बलवान्, मन्त्री, धर्मात्मा
धर्मशील होता है । शनिके नवमांशमें स्थित चन्द्रमापर
यदि सूर्यादि ग्रहोकी हो तो जातक क्रमशः
अल्पसंतति, दुःखी, अभिमानी, अपने कार्यमें
तत्पर, दुष्ट स्त्रीका पति तथा कृपण होता है । जिस
प्रकार मेषादि राशि या उसके नवमांशमें स्थित
चन्द्रमापर सूर्यादि ग्रहोके दृष्टि-फल कहे गये है,
इसी प्रकार मेषादि राशि या नवमांशमें स्थित
सूर्यपर चन्द्रादि ग्रहोकी दृष्टिसि भी प्राप्त होनेवाले
फल समञ्जने चाहिये ॥ २३७- २४३ ॥
(फलोमे न्यूनाधिक्य-- ) चन्द्रमा यदि वर्गोत्तम
नवमांशमें हो तो पूर्वोक्तं शुभ फल पूर्ण, अपने
नवमांशमें हो तो मध्यम (आधा) ओर अन्य
नवमाशमें हो तो अल्प समञ्चना चाहिये । (इसीसे
यह भी सिद्ध हो जाता है कि जो अशुभ फल कहे
गये हे, वे भी विपरीत दशामें विपरीत होते हें
अर्थात् वर्गेत्तिममें चन्द्रमा हो तो अशुभ फल
अल्प, अपने नवमांशमें हो तो आधा ओर अन्य
नवमांशमें हो तो पूर्णं होते हं।) राशि ओर
नवमांशके फलोमें भिन्नता होनेपर यदि नवमांशका
स्वामी बली हो तो वह राशिफलको रोककर ही
फल देता हे ॥ २४४३ ॥
( द्वादश भावगत ग्रहोके फल- ) सूर्यं यदि
लग्रमे हो तो शिशु शूरवीर, दीर्घसूत्री (देरसे काम
करनेके स्वभाववाला), दुर्बल दृष्टिवाला ओर
निर्दय होता है। यदि मेषमें रहकर लप्रमे हो तो
धनवान् ओर नेत्ररोगी होता है ओर सिंह लग्रे हो
तो रात्र्यन्ध (रतौधीवाला), तुलालमग्रमे हो तो अधा
ओर निर्धन होता है। कर्क लग्रमें हो तो जातककी
ओंखमे फली होती है ।
द्वितीय भावम सूर्य हो तो बालक वहुत धनी,
राजदण्ड पानेवाला ओर मुखका रोगी होता हे।
तृतीय स्थानमें हो तो पण्डित ओर पराक्रमी होता
हे। चतुर्थं स्थानमें सूर्य हो तो सुखहीन ओर
पीडायुक्त होता है। सूर्य पञ्चम भावमें हो तो
मनुष्य धनहीन ओर पुत्रहीन होता हे । षष्ठ भावमें
हो तो बलवान् ओर शत्रुओंको जीतनेवाला होता
हे । सप्तम भांवमें स्थित हो तो मनुष्य अपनी स्त्रीसे
पराजित होता है । अष्टम भावमें हो तो उसके पुत्र
थोडे होते हँ ओर उसे दिखायी भी कम ही देता
है । नवम भावमें हो तो जातक पुत्रवान्, धनवान्
ओर सुखी होता है। दशम भावमें हो तो विद्वान्
-| ओर पराक्रमी तथा एकादश भावमें हो तो अधिक
धनवान् ओर मानी होता है। यदि द्वादश भावमें
सूर्य हो तो उत्पन्न बालक नीच ओर धनहीन होता
हे ॥ २४५- २४९ ॥
चन्द्रमा यदि मेष लग्रे हो तो जातक गंगा,
बहिरा, अंधा ओर दूसरोका दास होता है । वृष
लग्रमे हो तो वह धनी होता हे। द्वितीय भावमें
हो तो विद्वान् ओर धनवान्, तृतीय भावे हो तो
हिंसाके स्वभाववाला, चतुर्थं स्थानमे हो तो उस
भावके लिये कहे हए फलों (सुख, गृहादि) -
से सम्पन्न, पञ्चम भावम हो तो कन्यारूप
संतानवाला ओर आलसी होता है। छठे भावम
हो तो बालक मन्दाग्रिका रोगी होता है, उसे
अभीष्ट भोग बहुत कम मिलते ह तथा वह उग्र
स्वभावका होता है । सप्तम भावम हो तो जातक
ईर्प्यावान् ओर अत्यन्त कामी होता है । अष्टम
भावमें हो तो रोगसे पीडित, नवम भावमें हो तो
मित्र ओर धनसे युक्त, दशम भावमें हो तो
धर्मात्मा, बुद्धिमान् ओर धनवान् होता हे।
एकादश भावमें हो तो उत्पन्न शिशु विख्यात,
वुद्धिमान् ओर धनवान् होता है तथा द्वादश
भावम हो तो जातक क्षुद्र ओर अङ्खहीन होता
है ॥ २५०-२५२ ६ ॥
म्ल लग्रमं हो तो उत्पन्न शिशु क्षत शरौरवाला
(-0. ॥\॥(1111(॥<511॥ ©118\/8॥1 81891185 (0611011 लग्र हो \/ ©6810011
३०६
संक्षिप्त नारदपुराण
होता हे । द्वितीय भावमें हो तो वह कदन्नः भोजी
तथा नवम भावमें हो तो पापस्वभाव होता हे।
इनसे भिन्न (३, ४, ५, ६, ७, ८, १०, ११, १२)
स्थानोमं यदि मङ्गल हो तो उसके फल सूर्यके
समान ही होते हैँ ॥ २५३३ ॥
बुध लग्रमे हो तो जातक पण्डित होता हे।
द्वितीय भावमें हो तो शिशु धनवान्, तृतीय शवमें
हो तो दष्ट स्वभाव, चतुर्थं भावमें हो तो पण्डित,
पञ्चम भावमें हो तो राजमन्त्री, षष्ठ भावमें हो तो
शत्रुहीन, सप्तममें हो तो धर्मज्ञता, अष्टम भावमें हो
तो विख्यात गुणवाला ओर शेष (९, १०, १९१, १२)
भावम हो तो जेसे सूर्यके फल कहे गये है, वेसे ही
उसके फल भी समञ्ने चाहिये ॥ २५४३ ॥
वृहस्पति लम्रमें हो तो जातक विद्वान्, द्वितीय
भावे हो तो प्रियभाषी, तृतीय भावे हो तो
कृपण, चतुर्थमे हो तो सुखी, पञ्चममें हो तो विन्ञ,
षष्ठममं हो तो शत्रुरहित, सप्तममें हो तो सम्पत्तियुक्त,
अष्टममे हो तो नीच स्वभाववाला, नवममें हो तो
तपस्वी, दशममें हो तो धनवान्, एकादशमें हो तो
नित्य लाभ करनेवाला ओर द्वादशमे हो तो दुष्ट
हदयवाला होता है ॥ २५५ ₹ ॥ शुक्र लग्रे हो तो
जातक कामी ओर सुखी, सप्तम भावमें हो तो
कामी तथा पञ्चम भावम हो तो सुखी होता है ओर
अन्य भावों (२, ३, ४, ६, ८, ९, १०, ११,
१२)~ में हो तो वह उत्पन्न बालकको बृहस्पतिके
समान ही फल देता है ॥ २५६६॥
शनि लग्रमे हो तो जातक निर्धन, रोगी,
कामातुर, मलिन, बाल्यावस्थामें रोगी ओर आलसी
होता है। किंतु यदि अपनी राशि (मकर-कुम्भ)
या अपने उच्च ( तुला)मं हो तो जातक भूपति,
ग्रामपति, पण्डित ओर सुन्दर शरीरवाला होता है ।
अन्य (द्वितीय आदि) भावोमें सूर्यके समान ही
शनिके भी फल होते हें ॥ २५७-२५८ ॥
( फलमें न्यूनाधिकत्व-- ) शुभग्रह यदि अपने
उच्चमें हों तो पूर्णरूपसे उपर्युक्त फल प्राप्त होता हे।
यदि अपने मूल त्रिकोणमें हो तो तीन चरण, अपनी
राशिमे हो तो आधा, मित्रके गृहमे हो तो एक चरण
तथा शत्रुको राशिमें हो तो उससे भी कम फल प्राप्त
होता हे ओर नीचमें या अस्तहो तो कुछ भी फल
नहीं होता हे। (इस प्रकार शुभ ग्रहके फल कहनेसे
सिद्ध होता है कि पापग्रहका फल इसके विपरीत
होता है । अर्थात् पापग्रह नीचमें या अस्त हो तो पूर्ण
फल, शत्रु-राशिमें तीन चरण, मित्र-रारिमें आधा,
अपनी राशिमें एक चरण, अपने मूल त्रिकोणमे
उससे भी अल्प ओर अपने उच्चमे हो तो अपना
कुछ भी फल नहीं देता है) ॥ २५९ ३ ॥
( स्वराशिस्थ ग्रहफल- ) यदि अपनी राशिमें
एक ग्रह हो तो जातक अपने पिताके सदृश
धनवान् ओर यशस्वी होता हे। दो ग्रह अपनी
राशिमें हां तो बालक अपने कुलमें श्रेष्ठ, तीन ग्रह
हों तो बन्धुओंमें माननीय, चार ग्रह हों तो विशेष
धनवान्, पाच ग्रह हों तो सुखी, छः ग्रह हों तो
भोगी ओर यदि सातं ग्रह अपनी राशिमें स्थित हां
तो जातक राजा होता है॥ २६० ह ॥
यदि अपने मित्रकी राशिमें एक ग्रह हो तो
जातक दूसरेके धनसे पालित, दो ग्रह हों तो
मित्रके द्वारा पोषित ओर तीन ग्रह हों तो वह
अपने बन्धुओंके द्वारा पालित होता है । यदि चार
ग्रह मित्रराशिमें हों तो बालक अपने बाहुबलसे
जीवननिर्वाह करता है। पांच ग्रह हों तो बहुत
लोगोंका पालन करनेवाला होता है। छः ग्रह हां
तो सेनापति ओर सातं ग्रह मित्रराशिमें हों तो
जातक राजा होता है ॥ २६१ ₹ ॥
पापग्रह यदि विषम राशि ओर सूर्यकी होरा
१. कोदो, मड्जा आदि नि्न्रेणीके अन्नको कदन्न (कु+अत्न) कहते द ।
((-0. 1\/॥८1111(4/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद्
(राश्यर्ध)-पे हों तो जातक लोकमें विख्यात,
महान् उद्योगी, अत्यन्त तेजस्वी, बुद्धिमान्, धनवान्
ओर बलवान् होता है । तथा शुभग्रह यदि समराशि
ओर चन्द्रमाकौ होराम हों तो जातक कान्तिमान्,
मृदु (कोमल) शरीरवाला, भाग्यवान्, भोगी ओर
बुद्धिमान् होता है । यदि पापग्रह समराशि ओर
सूर्यको होरामें हों तो पूर्वोक्त फल मध्यम (आधा)
होता है। एवं शुभ यदि विषमराशि ओर सूर्यकौ
होरामें हों तो ऊपर कहे हुए फल नहीं प्राप्त होते
ठे ॥ २६२-२६४॥
चन्द्रमा यदि अपने या अपने मित्रके द्रेष्काणमें
हो तो जातक सुन्दर स्वरूपवाला ओर गुणवान्
होता है । अन्य द्रेष्काणमें हो तो उस द्रेष्काणको
राशि ओर द्रेष्काणपतिके सदुश ही फल प्राप्त होता
है। (सारांश यह है कि उस द्रेष्काणका स्वामी
यदि चन्द्रमाका मित्र हो तो तीन चरण फल
मिलतारहे, समदहोतो दो चरण (आधा) फल
मिलता है तथा शत्रु हो तो एक चरण फल होता
है ।) यदि सर्पं द्रेष्काण, शस्त्र द्रेष्काण, चतुष्पद
द्रेष्काण ओर पक्षी द्वेष्काणमें चन्द्रमा हो तो
जातक क्रमशः उग्र-स्वभाव, हिसाके स्वभाववाला,
गुरुकी शय्यापर वैठनेवाला ओर भ्रमणशील
होता है ॥ २६५-२६६ ई ॥
( लग्रनवमांश राशिफल- ) लग्रमे मेषका
नवमांश हो तो जातक चोरस्वभाव, वृष-नवमांश
हो तो भोगी, मिथुन-नवमांश हो तो धनी, कर्क-
नवमांश हो तो बुद्धिमान्, सिंह-नवमांश हो तो
राजा, कन्या-नवमांश हो तो नपुंसक, तुला-नवमांश
हो तो शत्रुको जीतनेवाला, वृध्चिक-नवमांश हो तो
बेगारी करनेवाला, धनुका नवमांश हो तो दासकर्मं
करनेवाला, मकर-नवमांश हो तो पापस्वभाव, कुम्भ-
३०७
नवमांश लग्रमें हो तो बुद्धिहीन होता है । किंतु यदि
वर्गोत्तम नवमांश (अर्थात् जो राशि हो उसीका
नवमांश भी) हो तो वह जातक इन (चोरस्वभाव
आदि सब)-का शासक होता है। (जसे मेष-
नवमांशमें उत्पन्न मनुष्य चोरस्वभाव होता है, कितु
यदि मेष राशिमें मेषका नवमांश हो तो वह
चोरस्वभाववालोंका शासक होता है, इत्यादि ।) इसी
प्रकार मेषादि राशियोके द्वादशांशमें मेषादि राशि्योके
समान फल प्राप्त होते ह ॥ २६७-२६८ ॥
( मङ्ल आदि ग्रहोके त्रिंशांशफल-- ) मङ्गल
अपने त्रिंशांशमें हो तो जातक स्त्री, बल, आभूषण
तथा परिजनादिसे सम्पन्न, साहसी ओर तेजस्वी
होता है । शनि अपने त्रिंशांशमें हो तो रोगी, स्त्रीके
प्रति कुटिल, परस्त्रीमें आसक्त, दुःखी, वस्त्रादि
आवश्यक सामग्रीसे सम्पन्न, किंतु मलिन होता है ।
गुरु अपने त्रिंशांशमें हो तो जातक सुखी, बुद्धिमान्,
धनी, कीर्तिमान्, तेजस्वी, लोकमें मान्य, रोगहीन,
उद्यमी ओर भोगी होता है। बुध अपने त्रिंशांशमं
हो तो मनुष्य मेधावी, कलाकुशल, काव्य ओर
शिल्पविद्याका ज्ञाता, विवादी, कपटी, शास्त्रतत्त्वज्ञ
तथा साहसी होता है । शुक्र अपने त्रिंशांशमं हो तो
जातक अधिक संतान, सुख, आरोग्य, सौन्दर्य
ओर धनसे युक्त, मनोहर शरीरवाला तथा अजितेन्द्रिय
होता है ॥ २६९- २७३॥
( सूर्य-चन्द्र-फल-- ) मद्गलके त्रिंशांशे सूर्यं
हो तो जातक शूरवीर, चन्द्रमा हो तो दीर्घसूत्री,
वुधके त्रिंशांशमें सूर्य हो तो जातक कुटिल ओर
चन्द्रमा हो तो हिंसाके स्वभाववाला होता है।
गुरुके त्रिंशांशमें रवि हो तो गुणी ओर चन्द्रमा हो
तो भी गुणी होता है। शुक्रके त्रिंशंशमें सूर्य हो
तो बालक सुखी ओर चन्द्रमा हो तो विद्रान् होता
नवमांश हो तो हिंसाके स्वभाववाला ओर मीन- | है । शनिके त्रिंशांशमं रवि हो तो सुन्दर शरीरवाला
९. द्रेष्काणनिरूपणपं देखिये ।
[ 1183 ] स्ना पुर १ ९८ठ0. \/1/11(115511(1 ©118५/811 \/818189। (01661100. 10411260 0 6810011
३०८
तथा चन्द्रमा हो तो सर्वजनप्रिय होता हे ॥ २७४ ॥
(कारक ग्रह-- ) अपने-अपने मूल त्रिकोण,
स्वराशि या स्वोच्चमें स्थित ग्रह यदि केन्द्रमें हो
तो वे सव परस्पर कारक (शुभफलदायक)होते
है, उनमें दशम स्थानमें रहनेवाला सबसे बटकर
कारक होता हे॥ २७५ ॥
( शुभजन्मलक्चषण-- ) लग्र या चन्द्रमा वर्गोत्तम
नवमांशमें हो या वेशि (सूर्यसे द्वितीय) स्थानमें
शुभग्रह हो अथवा केन्द्रोमे कारक ग्रह हों तो जन्म
शुभप्रद होता हे। अर्थात् इस स्थितिमें जन्म लेनेवाला
बालक सुखी ओर यशस्वी होता हे ॥ २७६ ॥ गुरु,
जन्मराशि ओर जन्म-लग्रेश ये सभी या इनर्मेसे
एक भी केन्द्रमे हो तो जीवनके मध्यभागमें
सुखप्रद होते हें । तथा पृष्ठोदय राशिमें रहनेवाला
ग्रह॒ वयसके अन्तमें, द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रह
वयस्के मध्यमं ओर शीर्षोदय राशिस्थ ग्रह पूर्ववयसूमे
अपने-अपने फलं देते हें ॥ २७७॥ ।
( ग्रहगोचरफलत्नसमय-- ) सूर्यं ओर मङ्गल ये
दोनो राशिमं प्रवेश करते ही अपने राशि-सम्बन्धी
(गोचर) फल देते हे । शुक्र ओर बृहस्पति राशिके
मध्यमं जानेपर ओर चन्द्रमा तथा शनि ये दोनों
राशिके अन्तिम तुतीयांशमें पहंचनेपर अपने शुभ
या अशुभ गोचर फल देते हें । तथा बुध सर्वदा
(आदि, मध्य, अन्तमे) अपने शुभाशुभ फलको
देता हे ॥ २७८ ॥
( शुभाशुभ योग-- ) लग्र या चन्द्रमासे पञ्चम
ओर सप्तम भाव शुभग्रह ओर अपने स्वामीसे युक्त
यादृष्टहों तो जातकको उन दोनों (पुत्र ओर
स्त्री)-का सुख सुलभ होता हे, अन्यथा नहीं ।
तथा कन्या लग्रमे रवि ओर मीन लग्रे शनि हो
संक्षिप्त नारदपुराण
तो ये दोनों स्त्रीका नाश करनेवाले होते हैँ । इसी
प्रकार पञ्चम भाव (मेष-वृश्चिकसे अतिरिक्त राशि)-
मे मङ्गल हो तो पुत्रका नाश करनेवाला होता है।
यदि शुक्रसे केन्द्र (१, ४, ७, १०) -में पापग्रह हों
अथवा दो पापग्रहोके बीचमें शुक्र हों, उनपर
शुभग्रहका योग या दृष्टि नहीं हो तो उस
जातकको स्त्रीका मरण अग्रिसे या गिरनेसे होता
हे । लग्रसे १२, ६ भावोमे चन्द्रमा ओर सूर्य हों
तो वह स्त्रीसहितः एक नेत्रवाले (काण) पुरुषको
जन्म देता हे। एेसा मुनियोने कहा है । लग्रसे
सप्तम या नवम, पञ्चममें शुक्र ओर सूर्य दोनों हों
तो उस जातकको स्त्री विकल (अङ्गहीना)
होती हे ॥ २७९-२८२॥
शनि लमग्रमे ओर शुक्र सप्तम भावमें राशिसन्धि
(कर्क, वृश्चिक, मीनके अन्तिमांश) में हों तो वह
जातक वन्ध्या स्त्रीका पति होता है। यदि पञ्चम
भाव शुभग्रहसे युक्त या दृष्टन हो, लग्रसे १२, ७मे
ओर लग्रमे यदि पापग्रह हों तथा पञ्चम भावम
क्षीण चन्द्रमा स्थित हों तो वह पुरुष पुत्र ओर
स्त्रीसे रहित होता है। शनिके वर्गं (राशि-
नवांश) -में शुक्र सप्तम भावमें हो ओर शनिसे दृष्ट
हो तो वह जातक परस्त्रीमे आसक्त होता है । यदि
वे दोनों (शनि ओर शुक्र) चनद्रमाके साथ होतो
वह स्वयं परस्त्रीमे आसक्त ओर उसकी पत्री
परपुरुषमं आसक्त होती हे ॥ २८३-२८४३ ॥
शुक्र ओर चन्द्रमा दोनों सप्तम भावमें हों तो
जातक स्त्रीहीन अथवा पुत्रहीन होता है। पुरुष
ओर स्त्री ग्रह सप्तम भावे हों ओर उनपर
शुभग्रहोको दृष्टि हो तो पति-पतरी दोनों परिणताङ्ग
(परमायुर्दाय भोगकर वृद्धावस्थातक जीनेवाले)
१. आशय यह है कि पूर्वकेन््र (१ लग्र) में हों तो वयस्के आरम्भमें, मध्यकेन्द्र (४, १०) यें हों तो मध्य
वयस् (युवावस्था) में, यदि पश्चिम केन्द्र (७)में हों तो अंतिम वयसे सुखप्रद होते है । इससे सिद्ध है कि जिसके
जन्म-समयमें तीन केन््रोमं शुभग्रह हों, वह जीवनपर्यन्त सुखी रहता ई।
२. सारांश यह कि पुरुष तो काना होता ही है, उसे स्त्री भी कानी ही मिलती है।
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
३०९
होते हें । दशम, सप्तम ओर चतुर्थ भावमें क्रमशः
चन्द्रमा, शुक्र ओर पापग्रह हों तो जातक
नाशक होता है । अर्थात् उसका वंश नष्ट हो जाता
हे। बुध जिस द्रेष्काणमें हो उसपर यदि केन्द्र
स्थित शनिको दृष्टि हो तो जातक शिल्पकलामें
कुशल होता है। शुक्र यदि शनिके नवमांशमें
होकर द्वादश भावमें स्थित हो तो जातक दासीका
पुत्र होता हे । सूर्य ओर चन्द्रमा दोनों सप्तम भावमें
रहकर शनिसे दृष्ट हों तो जातक नीच स्वभाववाला
होता हे। शुक्र ओर मङ्गल दोनों सप्तम भावमें
स्थित हों ओर उनपर पापग्रहकी दृष्टि हो तो
जातक वातरोगी होता है। कर्क या वृश्चिकके
नवमांशमें स्थित चन्द्रमा यदि पापग्रहसे युक्त हो
तो बालक गुप्त रोगसे ग्रस्त होता है। चन्द्रमा यदि
पापग्रहोके बीचमें रहकर लप्रमे स्थित हो तो
उत्पन्न शिशु कुष्ठरोगी होता है। चन्द्रमा दशम
भावम, मङ्गल सप्तम भावमें ओर शनि यदि वेशि
( सूर्यसे द्वितीय) स्थानमें हो तो जातक विकल
(अङ्गहीन) होता है। सूर्य ओर चन्द्रमा दोनों
परस्पर नवमांशमें हों तो बालक शृलरोगी होता
हे। यदि दोनों किसी एक ही स्थानमे हों तो कृश
(क्षीणशरीर) होता है। यदि सूर्य, चन्द्रमा, मङ्गल
ओर शनि-ये चारों क्रमशः ८, ६, २, १२
भावोमें स्थित हों तो इनमें जो बली हौ, उस
ग्रहके दोष (कफ, पित्त ओर वात-सम्बन्धी
विकार) -से जातक नेत्रहीन होता है। यदि ९,
११, ३, ५-इन भावोमे पापग्रह हों तथा उनपर
शुभग्रहकी दृष्टि नहीं हो तो वे उत्पन्न शिशुके
लिये कर्णरोग उत्पन्न करनेवाले होते हैँ । सप्तम
भावमें स्थित पापग्रह यदि शुभग्रहसे दृष्ट न हों
तो वे दन्तरोग उत्पन्न करते है । लग्रमें गुरु ओर
सप्तम भावे शनि हो तो जातक वातरोगसे
पीडित होता टहै। ४ या ७ भावे मद्धल ओर
लग्रमे वृहस्पति हो अथवा शनि लग्रमे ओर
मङ्गल ९, ५, ७ भावम हो अथवा बुधसहित
चन्द्रमा १२ भावमें हो तो जातक उन्मादरोगसे
पीडित होता है ॥ २८५--२९३ ३ ॥
यदि ५, ९, २ ओर १२ भावों पापग्रह हों
तो उस जातकको बन्धन प्राप्त होता है (उसे
जेलका कष्ट भोगना पडता है) । लग्रमे जैसी राशि
हो उसके अनुकूल ही बन्धन समञ्लना चाहिये।
(जेसे चतुष्पद राशि लग्र हो तो रस्सीसे बवंधकर,
द्विपदराशि लग्र हो तो बेडीसे वंधकर तथा जलचर
राशि लग्र हो तो बिना बन्धनके ही वह जेलमें रहता
हे ।) यदि सर्प, शृङ्खला, पाशसं्ञक द्रेष्काण लग्रमें
हों तथा उनपर बली पापग्रहकीं दृषटिहोतो भी
पूर्वोक्त प्रकारसे बन्धन प्राप्त होता है। मण्डल
(परिवेष) -युक्त चन्द्रमा यदि शनिसे युक्त ओर
मङ्गलसे देखा जाता हो तो जातक मृगी रोगसे
पीडित, अप्रियभाषी ओर क्षयरोगसे युक्तं होता है।
मण्डल (परिवेष) -युक्त चन्द्रमा यदि दशम भावस्थित
सूर्य, शनि ओर मङ्गलसे दृष्ट हो तो जातक भृत्य
(दूसरेका नौकर) होता है; उनम भी एकसे दृष्ट हो
तो श्रेष्ठ दोसे दृष्ट हो तो मध्यम ओर तीनोपरे दृष्ट हो
तो अधम भृत्य होता है॥ २९४-२९६॥
( स्त्रीजातककी विशेषता-- ) ऊपर कहे हुए
पुरुष जातकके जो-जो फल स्त्री-जातकपें सम्भव
हां, वे वैसे योगमें उत्पन्न स्त्रीमात्रके लिये समञ्जे
चाहिये। जो फल स्त्रीमें असम्भव हो, वे सव
उसके पतिम समञ्जने चाहिये । स्त्रीके स्वामीकी
मृत्युका विचार अष्टम भावसे, शरीरके शुभाशुभ
फलका विचार लग्र ओर चन्द्रमासे तथा सौभाग्य
ओर पतिके स्वरूप, गुण आदिका विचार सप्तम
भावसे करना चाहिये ॥ २९७ ई ॥ स्त्ीके जन्मसमये
लग्र ओर चन्द्रमा दोनों समराशि ओर सम नवमांशमें
हां तो वह स्त्री अपनी प्रकृति (स्त्रीस्वभाव) -से
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२९०
संक्षिप्त नारदपुराण
युक्त होती हे। यदि उन दोनों (लग्र ओर चन्द्रमा)
पर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो वह सुशीलतारूप आभूषणसे
विभूषित होती हे। यदि वे दोनों (लग्र तथा चन्द्रमा)
विषमराशि ओर विषम नवमांशमें हों तो वह स्त्री
पुरुषसदृश आकार ओर स्वभाववाली होती है । यदि
उन दोनापर पापग्रहको दृष्ट हो तो स्त्री पापस्वभाववाली
ओर गुणहीना होती दै ॥२९८ ई ॥
लग्र ओर चन्द्रमाके आश्रित मङ्गलकी राशि
(मेष-वृश्चिक) -में यदि मङ्गलका त्रिंशांश हो तो
वह स्त्री बाल्यावस्थामें ही दुष्ट-स्वभाववाली होती
हे। शनिका त्रिंशांश हो तो दासी होती है। गुरुका
त्रिशांश हो तो सच्चरित्रा, बुधका त्रिंशांश हो तो
मायावती (धूर्त) ओर शुक्रका त्रिंशांश हो तो वह
उतावली होती है। शुक्रराशि (वृष-तुला) -में स्थित
लग्र या चन्द्रमामं मङ्गलका त्रिंशांश हो तो नारी बुरे
स्वभाववाली, शनिका त्रिंशांश हो तो पुनर्भूः (दूसरा
पति करनेवाली), गुरुका त्रिंशांश हो तो गुणवती,
बुधका त्रिंशांश हो तो कलाओंको जाननेवाली ओर
शुक्रका त्रिशांश हो तो लोकमें विख्यात होती हे ।
बुधराशि (मिथुन-कन्या) -मे स्थित लग्र या चद्द्रमामं
यदि मद्धलका त्रिंशाश हो तो मायावती, शनिका हो
तो हीजड़ी, गुरुका हो तो पतिव्रता, बुधका हो तो
गुणवती ओर शुक्रका हो तो चञ्चला होती हे। चन््र-
राशि (कर्क) -में स्थित लग्र या चन्द्रमामें यदि
मङ्खलका त्रिंशांश हो तो नारी स्वेच्छाचारिणी,
शनिका हो तो पतिके लिये घातक, गुरुका हो तो
गुणवती, बुधका हो तो शिल्पकला जाननेवाली ओर
शुक्रका त्रिशांश हो तो नीच स्वभाववाली होती है।
सिंहराशिस्थ लग्र या चनद्रमामें यदि मङ्गलका
त्रिंशांश हो तो पुरुषके समान आचरण करनेवाली,
शनिका हो तो कुलटा स्वभाववाली, गुरुका हो तो
रानी, बुधका हो तो पुरुषसदृश बुद्धिवाली ओर
शुक्रका त्रिंशांश हो तो अगम्यगामिनी होती है।
गुरुराशि (धनु-मीन)-स्थित लग्र या चन्द्रमामें
मङ्खलका त्रिंशांश हो तो नारी गुणवती, शनिका हो
तो भोगोमें अल्प आसक्तिवाली, गुरुका हो तो
गुणवती, बुधका हो तो ज्ञानवती ओर शुक्रका
त्रिंशांश हो तो पतिव्रता होती है। शनिराशि
(मकर-कुम्भ) स्थित लग्र या चन्द्रमामें मङ्गलका
त्रिंशांश होतो स्त्री दासी, शनिका हो तो नीच
पुरुषमें आसक्त, गुरुका हो तो पतिव्रता, बुधका हो
तो दुष्ट-स्वभाववाली ओर शुक्रका त्रिंशांश हो तो
संतान-हीना होती है। इस प्रकार लग्र ओर
चन्द्राश्रित राशियोके फल ग्रहोके बलके अनुसार
न्यून या अधिक समञ्चने चाहिये ॥ २९९ - -२०४॥
शुक्र ओर शनि ये दोनों परस्पर नवमांशमें
(शुक्रके नवमांशमें शनि ओर शनिके नवमांशमें
शुक्र) हों अथवा शुक्रराशि (वृष-तुला) लग्रमे
कुम्भका नवमांश हो तो इन दोनों योगोमें जन्म
लेनेवाली स्त्री कामाग्रिसे संतप्त हो स्त्रियोसे भी
क्रीडा करती है ॥ ३०५॥
( पतिभाव-- ) स्त्रीके जन्मलग्रसे सप्तम भावम
कोई ग्रह नहीं हो तो उसका पति कुत्सित होता हे।
सप्तम स्थान निर्बल हो ओर उसपर शुभग्रहकी दृष्ट
नहीं हो तो उस स्त्रीका पति नपुंसक होता है। सप्तम
स्थानम बुध ओर शनि हों तो भी पति नपुंसक होता
हे। यदि सप्तम भावमें चरराशि हो तो उसका पति
परदेशवासी होता है। सप्तम भावमें सूर्य हो तो उस
स्त्रीको पति त्याग देता हे। मङ्गल हो तो वह स्त्री
बालविधवा होती है। शनि सप्तम भावमें पापग्रहसे
दृष्ट हो तो वह स्त्री कन्या (अविवाहिता) रहकर ही
वृद्धावस्थाको प्राप्त होती है ॥ ३०६-२३०७॥
१. "पुनभ कहनेसे यह सिद्ध हुआ कि उसका जन्म शूद्रकुलं होता है; क्योकि शुद्रजाति्ें स्त्रीके
पुनर्विवाहकी प्रथा है।
((-0. 1\॥८111104/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
यदि सप्तम भावमें एकसे अधिक पापग्रह हो
तो भी स्त्री विधवा होती हे, शभ ओर पाप दोनों
हों तो वह पुनर्भू होती है। यदि सप्तम भावम
पापग्रह निर्बल हो ओर उसपर शुभग्रहकी दृष्टि न
होतो भी स्त्री अपने पतिद्रारा त्याग दी जाती हे
अन्यथा शुभग्रहकी दृष्टि होनेपर वह पतिप्रिया
होती हे ॥ ३०८ ॥
मद्गलके नवमांशमें शुक्र ओर शुक्रके नवमांशमें
मङ्गल हो तो वह स्त्री परपुरुषमे आसक्त होती हे ।
इस योगमें चन्द्रमा यदि सप्तम भावम हो तो वह
अपने पतिक आज्ञासे कार्य करती है ॥ ३०९॥
यदि चन्द्रमा ओर शुक्रसे संयुक्त शनि एवं
मङ्गलकी राशि (मकर, कुम्भ, मेष ओर वृध्चिक)
लग्रमे हं तो वह स्त्री कुलया-स्वभाववाली होती हे।
यदि. उक्त लग्रपर पापग्रहकी दृष्टि हो तो वह स्त्री
अपनी मातासहित कुलटा-स्वभाववाली होती हे।
यदि सप्तम भावमें मद्गलका नवमांश हो ओर उसपर
शनिकी दृष्टि हो तो वह नारी रोगयुक्त .योनिवाली होती
है। यदि सप्तम भावमें शुभग्रहका नवमांश हो तव तो
वह पतिकी प्यारी होती है। शनिको राशि या नवमांश
सप्तम भावमें हो तो उस स्त्रीका पति वृद्ध ओर मूर्खं
होता है। सतम भावमें मद्गलको राशि या नवमांश हो
तो उसका पति स्त्रीलोलुप ओर क्रोधी होता हे।
ब्ुधकी राशि या नवमांश हो तो विद्वान् ओर सब
कार्यमें निपुण होता हे। गुरुकी राशि या नवमांश हो
तो जितेन्द्रिय ओर गुणी होता हे। चन्द्रमाकी राशि या
नवमांश हो तो कामी ओर कोमल होता है। शुक्रकी
राशि या नवमांश हो तो भाग्यवान् तथा मनोहर
स्वरूपवाला होता है । सूर्यकी राशि या नवमांश सप्तम
भावमें हो तो उस स्त्रीका पति अत्यन्त कोमल ओर
अधिक कार्य करनेवाला होता है ॥ ३१०--३१२ ३ ॥
शुक्र ओर चन्द्रमा लग्रमं हों ते वह स्त्री सुख
तथा ईप्यावाली होती है । यदि बुध ओर चन्रमा लप्रमं
२९१९
हों तो कलाओंको जाननेवाली तथा सुख ओर गुणोसे
युक्त होती हे। शुक्र ओर बुध लग्रे हा तो सौभाग्यवती,
कलाओंको जाननेवाली ओर अत्यन्त सुन्दरी होती है।
लग्रमं तीन शुभग्रह हां तो वह अनेक प्रकारके सुख, धन
ओर गुरणोमि युक्त होती है ॥ २१३३१४३ ॥
पापग्रह अष्टम भावम हो तो वह स्त्री अष्टमेश
जिस ग्रहके नवमांश हो उस ग्रहके पूर्वकथित
बाल्य आदि वयसे विधवा होती है। यदि द्वितीय
भावमें शुभग्रह हों तो वह स्त्री स्वयं ही स्वामीके
सम्मुख मूत्युको प्राप्त होती हे। कन्या, वृश्चिक, सिंह
या वृष राशिमें चन्द्रमा हो तो स्त्री थोड़ी संततिवाली
होती हे । यदि शनि मध्यम बली तथा चन्द्रमा, शुक्र
ओर बुध ये तीनों निर्बल हों तथा शेष ग्रह (रवि,
मङ्गल ओर गुरु) सवल होकर विषम राशि-लग्रमे
हां तो वह स्त्री कुरूपा होती है॥ ३१५-३१७॥
गुरु, मङ्गल, शुक्र, बुध ये चारों बली होकर
समराशि लग्रमे स्थित हां तो वह स्त्री अनेक
शास्त्रोको ओर ब्रह्मको जाननेवाली तथा लोकमें
विख्यात होती हे ॥ ३१८ ॥
जिस स्त्रीके जन्मलग्रसे सप्तममें पापग्रह हो
ओर नवम भावमें कोई ग्रह हो तो स्त्री पूर्वकथित
नवमस्थ ग्रहजनित प्रव्रज्याको प्राप्त होती है। इन
(कहे हुए) विषयोका विवाह, वरण या प्रश्नकालमं
भी विचार करना चाहिये ॥ ३१९॥
( निर्याण ( मृत्यु ) विचार-- ) लग्रसे अष्टम भावक
जो-जो ग्रह देखते है, उनमें जो बलवान् हो उसके धातु
(कफ, पित्त या वात)-के प्रकोपसे जातक (स्त्री-
पुरुष )-का मरण होता हे। अष्टम भाव्ये जो रशि हो,
वह काल पुरुषके जिस अद्ध (मस्तकादि) -मं पड़ती
हो; उस अद्खमं रोग होनेसे जातककी मृत्यु होती है।
वहुत ग्रहोकी दृष्टि या योग हो तो उन-उन ग्रहोये
सम्बन्ध रखनेवाले रोगोसे मरण होता है! यथा
अष्टममे मुर्यदहों तो अग्रिसे, चन्द्रमाहीं तो
((-0. 1/८1111(4/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
२३९२
जलसे; मङ्गल हों तो शस्त्रघातसे, बुध हों तो
ज्वरसे, गुरु हों तो अज्ञात रोगसे, शक्र हों तो
प्याससे ओर शनि हों तो भूखसे मरण होता हे ।
तथा अष्टम भावमें चर राशि हो तो परदेशमें, स्थिर
राशि हो तो स्वस्थानमें ओर द्विस्वभाव राशि हो
तो मार्गमे मृत्यु होती हे। सूर्यं ओर मङ्गल यदि
१०, ४ भावम हों तो पर्वत आदि ऊचे स्थानसे
गिरकर मनुष्यको मृत्यु होती है ॥ ३२०-३२२॥
४, ७, १० भावम यदि शनि, चन्द्र, मङ्गल
हों तो कूपमें गिरकर मरण होता है । कन्या-राशिमें
रवि ओर चन्द्रमा दोनों हो, उनपर पापग्रहकी दृष्टि
हो तो अपने सम्बन्धीके द्वारा मरण होता है । यदि
उभयोदय (मीन) लग्रमे चन्द्रमा ओर सूर्य दोनों
हों तो जलमें मरण होता है। यदि मङ्गलकी
राशिमें स्थित चन्द्रमा दो पापग्रहोके बीचमें हो तो
शस्त्र या अग्रिसे मृत्यु होती हे ॥ ३२२३-३२४॥
मकरमें चन्द्रमा ओर कर्के शनि हों तो
जलोदररोगसे मरण होता है। कन्याराशिमें स्थित
चन्द्रमा दो पापग्रहोके बीचमें हों तो रक्तशोषरोगसे
मृत्यु होती है । यदि दो पापग्रहोके बीचमें स्थित
चन्द्रमा, शनिको राशि (मकर ओर कुम्भ) -में हों
तो रजु (रस्सी), अग्रि अथवा ऊचे स्थानसे
गिरकर मृत्यु होती है। ५, ९ भावमिं पापग्रह हो
ओर उनपर शुभग्रहकी दृष्टि न हो तो बन्धनसे
मृत्यु होती है। अष्टम भावमें पाश, सर्पं या निगड
द्रेष्काण हो तो भी बन्धनसे ही मृत्यु होती है।
पापग्रहके साथ वेठा हुआ चन्द्रमा यदि कन्याराशिमें
होकर सप्तम भावमें स्थित हो तथा मेषमें शुक्र
ओर लप्रमे सूर्य हो तो अपने घरमे स्त्रीके
निमित्तसे मरण होता है। चतुर्थं भावमें मङ्गल या
सूर्य हो, दशम भावमें शनि हो ओर लग्र, ५, ९
भावोमें पापग्रहसहित चन्द्रमा हो अथवा चतुर्थ
भावमे सूर्यं ओर दशमे मङ्गल रहकर क्षीण
संक्षिप्त नारदपुराण
चनद्रमासे दृष्ट हों तो इन योगो काष्ठसे आहत
होकर मनुष्यकी मृत्यु होती हे । यदि ८, १०, लग्र
तथा ४ भावोमें क्षीण चन्द्रमा, मङ्गल, शनि ओर
सूर्य हों तो लाठीके प्रहारसे मृत्यु होती है । यदि
वे ही (क्षीण चन्द्रमा, मङ्गल, शनि तथा सूर्य)
१०, ९ लग्र ओर ५ भावोमें हों तो मुद्र आदिके
आघातसे मृत्यु होती है। यदि ४, ७, १० भावोमे
क्रमशः मङ्गल, रवि ओर शनि हों तो शस्त्र, अग्नि
तथा राजाके द्वारा मृत्यु होती है। यदि शनि,
चन्द्रमा ओर मङ्गल-ये २, ४, १० भावोमे हों तो
कोड़के क्षतसे शरीरका पतन (मरण) होता है।
यदि दशम भावमें सूर्य ओर चतुर्थं भावमें मङ्गल
हों तो सवारीपरसे गिरनेके कारण मृत्यु होती है।
यदि क्षीण चन्द्रमाके साथ मङ्गल सप्तम भावमें हो
तो यन्त्र (मशीन) -के आघातसे मृत्यु होती है।
यदि मङ्गल, शनि ओर चनद्रमा-ये तुला, मेष
तथा शनिको राशि (मकर-कुम्भ) -में हों अथवा
क्षीण चन्द्रमा, सूर्य ओर मङ्गल-ये १०, ७, ४
भावोमे स्थित हो तो विष्ठाके समीप मृत्यु होती है।
क्षीण चन्द्रमापर मद्गलकी दृष्टि हो ओर शनि
सप्तम भावम हो तो गुह्य (बवासीर आदि) -रोग
या कोड़ा, शस्त्र, अग्रि अथवा काठके आघातसे
मरण होता है। मङ्गलसहित सूर्य सप्तम भावे
शनि अष्टममें ओर क्षीण चन्द्रमा चतुर्थं भावमें हों
तो पक्षीदरारा मरण होता है। यदि लग्र, ५, ८, ९
भावोमें सूर्य, मङ्गल, शनि ओर चन्द्रमा हों तो
पर्वत-शिखरसे गिरनेके कारण अथवा वज्रपातसे
या दीवार गिरनेसे मृत्यु होती है ॥ ३२५-२३३५॥
लग्रसे २२ वा द्रेष्काण अर्थात् अष्टम भावका
द्रेष्काण जो हो, उसका स्वामी अथवा अष्टम
भावका स्वामी-ये दोनों या इनर्मेसे जो बली हो,
वह अपने गृर्णोसे (पूर्वोक्त अग्रिशस्त्रादिद्वारा)
मनुष्यके लिये मरणकारक होता है। लग्रे जो
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
नवमांश होता हे, उसका स्वामी जो ग्रह हो उसके
समान स्थान (अर्थात् वह जिस राशिमें हो उस
राशिका जैसा स्थान बताया गया हे, वेसे स्थान)
तथा उसपर जिस ग्रहका योग या दृष्टि हो उसके
समान स्थानमे, परदेशमें मनुष्यका मरण होता है
तथा लग्रके जितने अंश अनुदित (भोग्य) हो, उन
अशमे जितने समय होः, उतने समयतक मरणकालमें
मोह होता है । यदि उसपर अपने स्वामीकी दष्ट
हो तो उससे द्विगुणित ओर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो
उससे त्रिगुणित समयपर्यन्त मोह होता है । इस
विषयकी अन्य बातें अपनी वुद्धिसे विचारकर
समञ्जन चाहिये ॥ ३३६-३३७ ९ ॥
(शव-परिणाम-- ) अष्टम स्थानम जिस
प्रकारका द्रेष्काण हो उसके अनुसार देहधारीकी
मृत्यु ओर उसके शवके परिणामपर विचार करना
चाहिये। यथा-अग्रि (पापग्रह)-का द्रेष्काण हो
तो मृत्युके बाद उसका शव जलाकर भस्म किया
जाता है। जल (सौम्य) द्रेष्काण हो तो जलमें
फेका जानेपर वह वहीं गल जाता हे । यदि सौम्य
द्रेष्काण पापग्रहसे युक्त या पाप द्रेष्काण शुभग्रहसे
युक्त हो तो मुर्दा न जलाया जाता है, न जलम
गलाया जाता है, अपितु सूर्यकिरण ओर हवासे
सूख जाता है। यदि सर्पं द्रेष्काण अष्टम भावमं
हो तो उस मुर्देको गीदड़ ओर कोए आदि नोंचकर
खाते हैं ॥ ३३८३॥
( पूर्वजन्मस्थिति- ) सूर्यं ओर चन्द्रमामे जो
अधिक बलवान् हो, वह जिस द्रेष्काणमें स्थित
हो उस द्रेष्काणके स्वामीके अनुसार पूर्वजन्मकौ
स्थिति समञ्ली जाती है। यथा--उक्त द्रेष्काणका
स्वामी गुरु हो तो जातक पूर्वजन्ममें देवलोकमें
था । चन्द्रमा या शुक्र द्रेष्काणका स्वामी हो तो वह
२३१३
पितृलोकमें था। सूर्य या मङ्गल द्रेष्काणका स्वामी
हो तो वह जातक पहले जन्ममें भी मर्त्यलोके
ही था ओर शनि या बुध हो तो वह पहले
नरकलोकमें रहा है-एेसा समञ्चना चाहिये । यदि
उक्त द्रेष्काणका स्वामी अपने उच्चमें हो तो जातक
पूर्वजन्ममें देवादि लोकमें श्रेष्ट था। यदि उच्च ओर
नीचके मध्यमे हो तो उस लोकमें उसकी मध्यम
स्थिति थी ओर यदि अपने नीचे हो तो वह उस
लोकमें निप्रकोरिकी अवस्थामें था-एेसा उच्च
ओर नीच स्थानके तारतम्यसे समञ्जना चाहिये ।
( गति- भावी जन्मकी स्थिति-- ) षष्ठ ओर
अष्टम भावके द्रेप्काणोके स्वामीमेसे जो अधिक
बली हो, मरनेके बाद जातक उसी ग्रहके (पूर्वदर्शित)
लोकम जाता है तथा सप्तम स्थानम स्थित ग्रह
बली हो तो वह अपने लोकम तले जाता हे।
( मोक्षयोग-- ) यदि वृहस्पति अपने उच्वमं होकर
६, १, ४, ७, ८, १० अथवा १२ मं शुभग्रहके
नवमांशमें हो ओर अन्य ग्रह निर्बल हों तो
मरण होनेपर मनुष्यका मोक्ष होता दै। यह
योग जन्म ओर मरण दोनों कालोँसे दखना
चाहिये ॥ ३३९- ३४१ २ ॥
( अज्ञात जन्म-समयको जाननेका प्रकार- )
जिस व्यक्तिके आधान या जन्मका समय अज्तात
हो, उसके प्रश्र-लग्रसे जन्म-समय समञ्जना चाहिये ।
परश्र-लग्रके पूर्वार्धं (१५ अंशतक) -में उत्तरायण
ओर उत्तरार्धं (१५ अंशके बाद) -में दक्षिणायन
जन्मका समय समङ्लना चाहिये । व्यश (द्रेष्काण)
द्वारा क्रमशः लग्र, ५, ९ राशिमे गुरु समञ्चकर
फिर प्रश्रकतकि वयसूके अनुसार वर्षमानकौ
कल्पना करनी चाहिये । लग्रमे सूर्यं हो तो
ग्रीप्मऋतु, अन्यथा अन्य ग्रहोके ऋतुका वर्णन
१. ३० अशमि मध्यममानसे दो घंटा (५ घटी) समय होता है; उसी अनुपातसे समय समञ्चना चाहिये ।
२. अगे (पृष्ट ३१६ में) द्रेष्काणके स्वरूप देखिये ।
३. अर्थात् लग्रमे प्रथम द्रेष्काण हो ते प्रश्रकतक्रि जन्म-समयमें लग्रयशिमे ही गुरु था, द्वितीय द्रेष्काण हौ तो प्रश्रलप्रसे
५वीं यशि, तृतीय द्रेष्काण हो तो प्रश्रलग्रसे श्वं ररिमं जन्मकालीन गुरुको स्थिति समञ्चे। फिर वतमान समयमे गुर्की
राशितक गिनकर वर्ष-संख्या बनावे । इस प्रकार संख्या १२ मे कम दी होगी ! टतने वर्षका वयस् यदि प्रश्रकतकि अनुमानसे
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संक्षिप्त नारदपुराण
पहले किया जा चुका हे। अयन ओर ऋतुमें
भिन्नता हो तो चन्द्रमा, वुध ओर गुरुको ऋतुओकि
स्थानमें क्रमसे शुक्र, मङ्गल, शनिकी ऋतु परिवर्तित
करके समञ्जना चाहिये तथा ऋतु सर्वथा सूर्यको
राशिसे ही (सौरमाससे ही) ग्रहण करनी चाहिये ।
इस प्रकार अयन ओर ऋतुके ज्ञान होनेपर लग्रके
( दिन-रात्रि जन्म-च्ान-- ) प्रश्च लग्रमे दिनसं्ञकः
रात्रि-सं्षक राशियां हों तो विलोमक्रमसे (दिनसं्क
राशिमें रात्रि -ओर रात्रिसंज्ञक राशिमें दिन) जन्मका
समय समञ्जना चाहिये ओर लग्रके अंशादिसे
अनुपातः द्वारा इष्ट घट्यादिको समञ्ना चाहिये ।
( जन्म-लमग्रज्ञान-- ) केवल जन्म-लग्र जाननेके
्रेष्काणमें पूर्वार्धं हो तो ऋतुका प्रथम मास,
उत्तरार्धं हो तो द्वितीय मास समञ्ना चाहिये तथा
द्रेष्काणके पूर्वार्धं या उत्तरार्धके भुक्ताशोंसे अनुपातः
द्वारा तिथि (सूर्यके गत अंशादि)का ज्ञान करना
चाहिये ॥ ३२४२-३ ४४ - ॥
ठीक हो तो ठीक माने, नहीं तो उस संख्यामें १२ जोड्ता जाय । जब प्रश्रकर्तकि वयस्के अनुसार वर्ष-संख्याका अनुमान
हो जाय तो उस संख्याको वर्तमान संवत् घयनेसे प्रश्रकर्ताका जन्मसंवत् होगा। उस संवते गुरु उस राशि मिलेगा ही,
चाहे १ वर्ष आगे मिले या पीछे। जहां उस रशिमें गुरु मिले, वही प्रश्रकर्ताका जन्म-संवत्सर समञ्चना चाहिये। फिर उक्त
रोतिसे अयनका ज्ञान करना चाहिये।
१. अनुपात इस प्रकार है कि ५ अंशको कला (३००) -में ३० तिथि (अंश) ह तो भुक्त द्रेष्काणार्धाशको कलामें
क्या होगी?
इसकी उत्तर-क्रिया नीचे देखिये- |
मान लीजिये, किसी अनाथ-वालकको अपने जन्म-समयका ज्ञान नहीं है। उसकी उप्र अनुमानसे ८ या ९ वर्षकी
` भ्रतीत होती है। उसने अपना जनम-समय जाननेके लिये संवत् २०१० ज्येष्ठ शुक्ला पूर्णिमा गुरुवारको प्रश्र किया। उस
समयकी लप्र-राश्यादि २। १४। ४५ है ओर वृहस्पति-राश्यादि १।१८।२।५ (वृष रशिर्म) है। यहो लग्रे द्वितीय द्रेष्काण
है, अतः लप्र (मिथुन) - से पांचवीं तुला राशिमें उसके जन्म-समयमें बृहस्पतिकी स्थिति ज्ञात हुई । प्रश्र-समयका बृहस्पति
वृषमें है, जो तुलासे ८वीं संख्यामें हे, इसलिये गत वर्ष-संख्या ७ हुई, इससे ज्ञात हआ कि आजसे ७, १९ तथा ३१ इत्यादि
वर्ष पूर्व बृहस्पतिकी तुलामं स्थिति हो सकती है, क्योकि वृहस्पति एक राशिमें एक वर्धं रहता है। परंतु इन (७, १९,
३१) संख्याओमिं ७ संख्या ही प्रश्रकर्ताकी उश्रके समीप होनेके कारण आजसे ७ वर्ष पूर्वं जन्म-समय स्थिर हुआ। इसलिये
प्रश्र-संवत् २०१० में ७ घटानेसे शेष २००३ जन्मका संवत् निश्चित हुआ। उस संवत्के पञ्चाद्घको देखा तो तुलां बृहस्पतिकी
स्थिति ज्ञात हुई । राशिके पूर्वार्धे प्रश्रलग्र है, अतः जन्मका समय उत्तरायण सिद्ध हुआ। तथा प्रश्रलग्रे शुक्रका द्रेष्काण
है, अतः वसन्त ऋतु होनेका निश्चय हुआ। प्रश्रकालमं द्वितीय द्रेष्काणका पूर्वार्धं होनेके कारण वसन्त ऋतुका प्रथम मास
(सौर चैत्र) जन्मका मास निशित हुआ।
फिर प्रश्रलप्रस्थ द्रेष्काणके गतांशादि ४। ४५। ० की कला २८५ को ३० से गुणा कर गुणनफल ८५५० में ३००
का भाग देनेसे लब्ध २८। ३० यह मीनमें सूर्यके भुक्तांश हए। अतः मेषसे ११ वीं राशि जोडनेपर जन्मकालका स्पष्ट सूर्य
१९१९।२८।३० हुओआ। यह चैत्र शुक्ला ११ शुक्रवारको मिलता है, अतः प्रश्रकर्ताका वही जन्म-मास ओर संवत् निचित हआ।
अब इषटकाल जाननेके लिये उस दिन उदयकालिक स्पष्ट सूर्य-राश्यादि ११। २८। १५। २० तथा सूर्यकी गति ५८।
४५ ह तो निश्चित किये हुए जन्मकालिक सूर्यं ११। २८।३०। ० ओर उदयकालिक सूर्य ११। २८। १५। २० के अन्तर
१४। ४० कलाको ६० से गुणा कर गुणनफल ८८० मं सूर्यकी गति ५८। ४५ का भाग देनेपर लब्धि घय्यादि १४। ५९
हुई । यह जन्म सूर्यसे अधिक होनेके कारण उदयकालके वादका इषटकाल हुआ। इसके द्वारा तात्कालिक अन्य ग्रह ओर
लग्रादि द्वादश भावोका साधन करके जन्म-पत्र बनता है, वह नष्ट जन्म-पत्र कहलाता है, उससे भी असली जन्म-पत्रके
समान ही फल घटित होता है।
२. यहां अनुपात एेसा है कि ३० अशमे दिनमान या रात्रिमानकी धरी तो लप्र भुक्तांशमें क्या?
लिये प्रश्रकर्ता प्रश्र करे तो लग्रसे (१, ५, श्म)
जो राशि बली हो, वही उसका जन्म-लग्र
समञ्जना चाहिये अथवा वह जिस अङ्कका स्पर्श
करते हुए प्रश्र करे, उस अङ्खगकी राशिको ही
जम-लग्र कहना चाहिये ।
((-0. ८1114551 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद्
( जन्म-राशि-च्रान-- ) जन्म-राशि जाननेके लिये
प्रश्र करे तो प्रश्र-लमग्रसे जितने अगे चन्द्रमा हो,
चन्द्रमासे उतने ही आगे जो राशि हो वह पूषछनेवालेक
जन्मराशि समञ्जनी चाहिये ॥ २४५-३४६ ॥
( प्रकारान्तरसे अस्चात जन्मकालादिका ज्ञन-- )
प्रश्रलग्रमे वृष या सिंह हो तो लमग्रराश्यादिको
कलात्मक बनाकर १० से गुणा करे। मिथुन या
वृश्िकहोतो८ से, मेषयातुलाहो तो ७ से, मकर
याकन्यादहोतो ५ से गुणा करे। शेष राशियों
(कर्क, धन, कुम्भ, मीन) -मेसे कोई लग्रहो तो
उसकी कलाको अपनी संख्यासे (जैसे कर्कको ४
से) गुणा करे। यदि लम्रमे ग्रह दहो तो फिर उसी
गुणनफलको ग्रहगुणकोसे भी गुणा करे। जेसे-
वृहस्पति हो तो १० से, मङ्गल होतो ८ से, शुक्र
होतो७से, बुध हो तो ५ से, अन्य ग्रह (रवि,
शनि ओर चन्द्रमा) होतो ५ से गुणा करे। इस
प्रकार लग्रकी राशिके अनुसार गुणन तो निश्चित ही
रहता है। यदि उसमें ग्रह हो तभी ग्रहका गुणन भी
करना चाहिये । जितने ग्रह हो, सबके गुणकसे गुणा
करना चाहिये इस प्रकार गुणनफलको श्रुवपिण्ड
२९१५
मानकर उसको ७ से गुणाकर २७ के द्वारा भाग
देकर १ आदि शेषके अनुसार अश्चिनी आदि जन्म-
नक्षत्र समञ्जने चाहिये । इस प्रणालीमें विशेषता यह
है कि उक्त रीतिसे आयी हुई संख्याम कभी ९
जोड़कर ओर कभी ९ घटाकर नक्षत्र लिया जाता `
हे।* तथा उक्त ध्रुवपिण्डको १० से गुणा करके
गुणनफलसे वर्ष, ऋतु ओर मास समञ्च । पक्ष ओर
तिथि जाननी हो तो ध्रुवपिण्डको ८ से गुणा करके
२ से भाग देकर एक शेष हो तो शुक्लपक्ष ओर दो
शेष हो तो कृष्णपक्ष समञ्च । इसमें भी ९ जोड या
घटाकर ग्रहण करना चाहिये। अर्थात् गुणनफलमें ९
जोड़ या ९ घटाकर भाग देना चाहिये । इसी प्रकार
पक्षज्लान होनेपर गुणनफलमें ही १५ से भाग देकर
शेषके अनुसार प्रतिपदा आदि तिथि समद्चे तथा
अहोरात्र जानना हो तो श्रुवपिण्डको ७ से गुणा
करके दोसे भाग देकर एक शेष हो तो दिन ओर
दो शेष हो तो रात्रि समञ्चे। लग्र-नवांश, इष्ट-घडी
तथा होरा जानना हो तो ध्रुवपिण्डको ५ से गुणा करके
अपने-अपने विकल्पसे (अर्थात् लग्र जाननेके लिये
१२से, इष्ट घडी ` जाननेके लिये ६० से (अथवा
१. ९ जोडने-घटानेका नियम यह है कि प्रश्रलग्रमे प्रथम द्रेष्काण हो तो ९ जोड़कर, तीसरा द्रेष्काण हो तो
९ घटाकर तथा मध्य द्रेष्काण हो तो यथाप्राप्त नक्षत्र ग्रहण करे।
२. यथा- गुणनफलमें १२० का भाग देकर शेष तुल्य वर्धं तथा इसी गुणनफलमें ६ का भाग देकर शेषके अनुसार
शिशिरादि ऋतु जाने एवं मास जानना हो तो गुणनफलमें १२ से भाग देकर शेष तुल्य चैत्रादि मास समञ्च । यदि ऋतुजान
होनेपर मास जानना हो तो उक्त गुणनफलमें दोसे भाग देकर एक शेषमें प्रथम ओर दो शेषमें द्वितीय मास समह ।
२. जैसे- संवत् २०१० चैत्र शुक्ला ५ गुरुवारको अनुमानतः ३० वर्षको अवस्थावाले किसी पुरुषने अपना अज्ञात
जन्म-समय जाननेके लिये प्रश्र किया। उस समयकी लग्र-(वृष) राश्यादि १। ५। २९ है ओर लग्रमे कोई ग्रह नर्ही है
तो लप्र-रश्यादिकी २१२९ कलाको वृषलग्रके गुणकाङ्क १० से गुणा करनेपर २१२९० यह श्रुवपिण्ड हुआ। लप्र कोई
ग्रह नहीं है, अतः दूसय गुणक नर्ही प्राप्त हआ । अव प्रश्रकर्ताकी गत वर्ष-संख्मा जाननेके लिये श्रुवपिण्डको फिर १० से गुणा
करके गुणनफल २९१२९०० में १२० का भाग देनेसे शेष २० वर्ष-संख्या हुई; परेतु यह संख्या अनुमानसे कुछ न्यून है,
अतः लग्रे प्रथम् द्रेष्काण होनेके कारण आगत शेषम ९ जोडनेसे २९ हआ । यही सम्भावित वर्षं होनेके कारण प्रश्रकर्ताकि
` जन्मसे गत वर्षं हुए। इस संख्याको वर्तमान संवत् २०१० मं घटानेपर शेष १९८१ यह प्रश्रकर्ताका जन्म-संवत् हुआ।
पुनः मास जाननेके लिये दशगुणित ध्रुवपिण्डमं ९ जोडा गया तो २१२९०९ हृआ। इसमें १२ का भाग देनेसे शेष ५५ रहा।
अतः चैत्रसे पौचवोँ श्रावण जन्म-मास हआ । पक्ष जाननेके लिये श्रुवपिण्ड २१२९० को ८ से गुणा कर् गुणनफल १७०३२०
मं ९ जोड़कर २ का भाग देनेसे १ शेष रहनेके कारण शुक्लपक्ष हुआ। तिथि जाननेके लिये उसी अष्टगुणित एवं नवयुत
ध्रुवपिण्ड १७०३२९ मेँ १५ का भाग देनेपर शेष ८ रहा, अतः चतुर्थी तिधि हई । इष्ट घटी जाननेके लिये ध्रुवपिण्ड २१२९०
को ५ से गुणाकर गुणनफलमे ९ जोढ्कर योगफल १०६४८५९ म ६० का भाग देनेपर शेष १९ रहा। वही इष्ट घडी हुई।
इस प्रकार संवत् १९८१ श्रावण शुक्ला ४ कौ गतघटी १९ (बदु बीतनेपर) प्रश्रकताका जन्म-समय निश्चित हुभआ।
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661011. 01411260 0 66810011
३९१६
संक्षिप्त नारदपुराण
दिन या रात्रिका ज्ञान होनेपर दिनमान या रात्रिमान-
घटीसे), नवमांशके लिये ९ से तथा होराके लिये
२ से भाग देकर शेषद्वारा सबका सान करना
चाहिये । इस प्रकार जिनके जन्म-समय आदिका
ज्ञान न हो उनके लिये इन सब बातोंका विचार
करना चाहिये ॥ ३ ४७- ३५० ॥
( द्रेष्काणका स्वरूप-- ) हाथमे फरसा लिये
हुए काले रंगका पुरुष, जिसकी अंखिं लाल हों
ओर जो सब जीवोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हो,
मेषके प्रथम द्रेष्काणका स्वरूप है। प्याससे
पीडित एक पैरस्रे चलनेवाला, घोडेके समान
मुख, लाल वस्त्रधारी ओर घडेके समान आकार-- यह
मेषके द्वितीय द्रेष्काणका स्वरूप हे। कपिलवर्णं,
क्ररदृष्टि, क्रूरस्वभाव, लाल वस्त्रधारी ओर अपनी
प्रतिज्ञा भङ्ग करनेवाला- यह मेषके तृतीय द्रेष्काणका
स्वरूप है। भूख ओर प्याससे पीडित, कटे-टे
घुंघराले केश तथा दृधके समान धवल वस्त्र- यह
वृषके प्रथम द्वेष्काणका स्वरूप है । मलिनशरीर,
भूखसे पीडित, बकरेके समान मुख ओर कृषि
आदि कार्योमिं कुशल- यह वृषके दूस द्रेष्काणका
रूप है। हाथीके समान विशालकाय, शरभ्के
समान पैर, पिङ्गल वर्णं ओर व्याकुल चित्त-यह
वृषके तीसरे द्रेपष्काणका स्वरूप हे । सुईसे सीने-
पिरोनेका काम करनेवाली, रूपवती, सुशीला तथा
संतानहीना नारी, जिसने हाथको ऊपर उठा रखा
हे, मिथुनका प्रथम द्रेष्काण है। कवच ओर
धनुष धारण किये हुए उपवनमें क्रीडा करनेकों
इच्छासे उपस्थित गरुडसदृश मुखवाला पुरुष
मिथुनका दूसरा द्रेष्काण है। नृत्य आदिक
कलामें प्रवीण, वरुणके समान र्नोके अनन्त
भण्डारसे भरा-पूरा, धनुर्धर वीर पुरुष मिथुनका
तीसरा द्रेष्काण हे। गणेशजीके समान कण्ठ,
शूकरके सदृश मुख, शरभके-से पैर ओर वनमें
रहनेवाला-- यह कर्कके प्रथम द्वेष्काणका रूप है।
सिरपर सर्पं धारण किये, पलाशकी शाखा पकड़कर
रोती हुई कर्कशा स्त्री-- यह कर्कके दूस द्रेष्काणका
स्वरूप हे। चिपटा मुख, सर्पसे वेष्टित, स्त्रीकौ
खोजमें नौकापर बैठकर जलमें यात्रा करनेवाला
पुरुष- यह कर्कके तीसरे द्रेष्काणका रूप
हे ॥ ३५१-३५६ ॥ सेमलके वृक्षके नीचे गीदड़
ओर गीधको लेकर रोता हुआ कुत्ते-जेसा मनुष्य- यह
सिंहके प्रथम द्रेष्काणका स्वरूप है। धनुष ओर
कृष्ण मृगचर्म धारण किये, सिंह-सदुश पराक्रमी
तथा घोडके समान आकृतिवाला मनुष्य- यह
सिंहके दूसरे द्रेष्काणका स्वरूप हे। फल ओर
भोज्यपदार्थं रखनेवाला, लंबी दादीसे सुशोभित,
भालू-जेसा मुख ओर वानरोके-से चपल स्वभाववाला
मनुष्य-सिंहके तृतीय द्रेष्काणका रूप हे । फूलसे
भरे कलशवाली, विद्याभिलाषिणी, मलिन वस्त्रधारिणी
कुमारी कन्या- यह कन्या राशिके प्रथम द्रेष्काणका
स्वरूप है । हाथमे धनुष, आय-व्ययका हिसाब
रखनेवाला, श्याम- वर्णं शरीर, लेखनकार्यमें चतुर
तथा रोएसे भरा मनुष्य- यह कन्या राशिके दूसरे
्रेष्काणका स्वरूप है। गेरि अद्धोंपर धुले हए
स्वच्छ वस्त्र, ऊचा कद, हाथमे कलश लेकर
देवमन्दिरकी ओर जाती हुई स्त्री-- यह कन्या
राशिके तीस द्रेष्काणका परिचय हे ॥ ३५७-३५९॥
हाथमे तराजू ओर बटखेरे लिये बाजारमें वस्तुं
तौलनेवाला तथा वर्तन-भांड़ोंकी कीमत कूतनेवाला
पुरुष तुलाराशिका प्रथम द्रेष्काण ठहै। हाथमे
कलश लिये भूख-प्याससे व्याकुल तथा गीधके
समान मुखवाला पुरुष, जो स्त्री-पुत्रके साथ
१. पुराणोमें शरभके आठ पैर कहे गये है ओर उसे व्याघ्र-सिंहसे भी अधिक बलिष्ठ एवं भयङ्कर बताया गया
है; परेतु यह अव कहीं उपलब्ध नहीं होता। शरभका दूसरा अर्थं ऊट भी है।
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 2118811 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
विचरता है, तुलाका दूसरा द्रेष्काण हे। हाथमे
धनुष लिये हरिनका पीछा करनेवाला, किन्नरके
समान चेष्टवाला, सुवर्णकवचधारी पुरुष तुलाका
तृतीय द्रेष्काण है। एक नारी, जिसके पैर नाना
प्रकारके सर्पं लिपटे होनेसे श्वेत दिखायी देते हे,
समुद्रसे किनारेकी ओर जा रही है, यही वृश्चिकके
प्रथम द्रेष्काणका रूप है। जिसके सब अङ्ग
स्पेसि ठके हँ ओर आकृति कद्एके समान हे
तथा जो स्वामीके लिये सुखकी इच्छा करनेवाली
है; एेसी स्त्री वृश्चिकका दूसरा द्रेष्काण हे।
मलयगिरिका निवासी सिंह, मुखाकृति कद्ुए-
जेसी है, कुत्ते, शूकर ओर हरिन आदिको डरा रहा
ठे, वही वृश्चिकका तीसरा द्रेष्काण हे ॥ ३६०-३६२॥
मनुष्यके समान मुख, घोडे-जेसा शरीर, हाथमे
धनुष लेकर तपस्वी ओर यज्ञोकी रक्षा करनेवाला
पुरुष धनुराशिका द्रेष्काण हे । चम्पापुरुषके समान
कान्तिवाली, आसनपर वैटी हई, समुद्रके रलोको
वदानेवाली, मञ्जोले कदको स्त्री धनुका दूसरा
द्रेष्काण है। दाटी- मं बढ़ाये, आसनपर बेटा
हुआ, चम्पापुष्पके सदृश कान्तिमान्, दण्ड, पट
वस्त्र ओर मृगचर्म धारण करनेवाला पुरुष धनुका
तीसरा द्रेष्काण है । मगरके समान दात, रोएसे भरा
शरीर तथा सूअर-जैसी आकृतिवाला पुरुष मकरका
प्रथम द्रेष्काण है। कमलदलके समान नेत्रोवाली,
आभूषण-प्रिया श्यामा स्त्री मकरका दूसरा द्रेष्काण
९१६०
7 - (~, 6
२३९१७
हे । हाथमे धनुष, कम्बल, कलश ओर कवच
धारण करनेवाला किन्नरके समान पुरुष मकरका
तीसरा द्रेष्काण हे ॥ ३६३-३६६॥ गीधके समान
मुख, तेल, घी ओर मधु पीनेकी इच्छावाला,
कम्बलधारी पुरुष कुम्भका प्रथम द्रेष्काण है । हाथमें
लोहा, शरीरम आभूषण तथा मस्तकपर भोंड (वर्तन)
लिये मलिन वस्त्र पहनकर जली गाडीपर बेटी
हुई स्त्री कुम्भका दूसरा द्रेष्काण हे । कानमं वड़-
बड़े रोम, शरीरमें श्याम कान्ति, मस्तकपर किरीट
तथा हाथमे फल-पत्र धारण करनेवाला वर्तनका
व्यापारी कुम्भका तीसरा द्रेष्काण हे । भूषण वनानेके
लिये नाना प्रकारके रत्नोको हाथमे लेकर समुद्रमे
नौकापर बैठा हुआ पुरुष मीनका प्रथम द्रेष्काण
हे । जिसके मुखकी कान्ति चम्पाके पुष्पके सदृश
मनोहर ठै, वह अपने परिवारके साथ नौकापर
बैठकर समुद्रके बीचसे तटको ओर आती हुई स्त्री
मीनका दूसरा द्रेष्काण है । गङ्केके समीप तथा चौर
ओर अग्निसे पीडित होकर रोता हआ, सर्पसे वेत,
नग्र शरीरवाला पुरुष मीन राशिका तीसरा द्रेष्काण
है। इस प्रकार मेषादि बारहा राशियोमें हनेवाले
छत्तीस द्रेष्काणांशके रूप क्रमसे बताये गये है।
मुनिश्रेष्ठ नारद ! यह संक्षेपमं जातक नामक स्कन्ध
कहा गया है। अब लोक-व्यवहारके लिये उपयोगी
संहितास्कन्धका वर्णन सुनो-- ॥ ३६७- २७० ॥
(पूर्वभाग द्वितीय पाद अध्याय ५५)
१३
०
>^ १
त्रिस्कन्ध ज्यौतिषका संहिताप्रकरण ( विविध उपयोगी विषयोंका वर्णन )
सनन्दनजी बोले- नारदजी । चैत्रादि मासोमं
क्रमशः मेषादि राशियोमें सूर्यको संक्रान्ति होती
होता हे । सूर्यके मेषराशि-प्रवेशके समय जो वार
हो, वह सेनापति (या मन्त्री) होता ईै। कर्क
है९। चैत्र शुक्ल प्रतिपदाके आरम्भमें जो वार | राशिकौ संक्रान्तिके समय जो वार हो, वह सस्य
(दिन) हो, वही ग्रह उस (चान्द्र) वर्षका राजा
(धान्य)-का अधिपति होता है । उक्त वर्षं आदिका
१. जैसे मेषमें सूर्यके रहते जो अमावास्या हाती दै, वर्ह चैत्रकौ समाति समञ्जी जाती है एवं वृषादिके सूर्यमें
वैशाखादि मास समङञ्लना चाहिये।
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/818/185। (01661010. 01411260 0 66810011
३९१८
संक्षिप्त नारदपुराण
अधिपति यदि सूर्य हो तो वह मध्यम (शुभ ओर
अशुभ दोनो) फल देता हे । चन्द्रमा हो तो उत्तम
फल देता हे। मङ्कल अधिपति हो तो अनिष्ट
(अशुभ) फल देनेवाला होता है । बुध, गुरु ओर
शुक्र-ये तीनों अति उत्तम (शुभ) फलकी प्रापि
करानेवाले होते हें । शनि अधिपति हो तो अशुभ
फल होता हे । इन ग्रहोके बलाबल देखकर तदनुसार
इनके न्यून या पूर्णं फल समञ्जन चाहिये ॥ १-३॥
( धूमकेतु--पुच्छलतारा आदिके फल- )
यदि कदाचित् कर्हीसे सूर्य-मण्डलमें दण्ड (लाठी),
कबन्ध (मस्तकहीन शरीर) को या कोलके
आकारवाले केतु ( चिह्र) देखनेमें आवे, तो वहां
व्याधि, भ्रान्ति तथा चोरोके उपद्रवसे धनका नाश
होता हे । छत्र, ध्वज, पताका या सजल मेघखण्ड-
सदृश अथवा स्फुलिद्ग (अग्रिकण) सहित धूम
सूर्यमण्डलमे दीख पड़, तो उस देशका नाश होता
हे । शुक्ल, लाल, पीला अथवा काला सूर्यमण्डल
दीखनेमे आवे, तो क्रमसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वेश्य
ओर शूद्र वर्णोको पीड़ा होती है। मुनिवर! यदि
दो, तीन या चार प्रकारके रंग सूर्यमण्डलमें दीख
पड, तो राजाओंका नाश होता हे। यदि सूर्यकी
ऊर्ध्वगामिनी किरण लाल रंगकी दीख पडे, तो
सेनापतिका नाश होता हे । यदि उसका पीला वर्ण
हो तो राजकुमारका, शेत वर्ण हो तो राजपुरोहितका
तथा उसके अनेक वर्णं हों तो प्रजाजनोंका नाश
होता है । इसी तरह धूम्र वर्णं हो तो राजाका ओर
पिशङ्ग (कपिल) वर्णं हो तो मेघका नाश होता
हे । यदि सूर्यकी उक्त किरणें नीचेकी ओर हो, तो
संसारका नाश होता है ॥४-७ ₹॥
सूर्यं शिशिर ऋतु (माघ-फात्गुन) -मं तोविके
समान (लाल) दीख पड, तो संसारके लिये शुभ
(कल्याणकारी) होता हं । एेसे ही वसन्त (चैत्र-
वैशाख) -में कुंकुमवर्ण, ग्रीप्ममें पाण्डु ( श्ेत-
पीत-मिश्चित) -वर्ण, वषमिं अनेक वर्ण, शरद्-
ऋतुमे कमलवर्ण तथा हेमन्तमें रक्तवर्णका सूर्यविम्ब
दिखायी दे, तो उसे शुभप्रद समञ्जना चाहिये।
मुनिश्रेष्ठ नारद! यदि शीतकालमें (अगहनसे
फरल्गुनतक) सूर्यका विम्ब पीला, वषमिं (श्रावणसे
कातिकतक) श्वेत (उजला) तथा ग्रीष्ममें ( चेत्रसे
आपाद्तक) लाल रगका दीख पडे, तो क्रमसे रोग,
अवर्षण तथा भय उपस्थित करनेवाला होता है।
यदि कदाचित् सूर्यका आधा विम्ब इन्द्रधनुषके
सदृश दीख पड़ तो राजाओंमें परस्पर विरोध बढता
हे । खरगोशके रक्तके सदृश सूर्यका वर्णं हो तो शीघ्र
ही राजाओंमें महायुद्ध प्रारम्भ होता है । यदि सूर्यका
वर्णं मोरकी पांखके समान हो, तो वहं बारह
वर्षोतक वर्षा नहीं होती है। यदि सूर्य कभी
चन्द्रमाके समान दिखायी दे, तो वहकि राजाको
जीतकर दूसरा राजा राज्य करता है। यदि सूर्य
श्याम रगका दीख पड़ तो कीडोंका भय होता है।
भस्म समान दीख पड़े तो समूचे राज्यपर भय
उपस्थित होता हे ओर यदि सूर्यमण्डलमें छिद्र
दिखायी दे, तो वहंकि सवसे बड़ सम्राट्की मृत्यु
होती है। कलशके समान आकारवाला सूर्य देशम
भूखमरीका भय उपस्थित करता हे । तोरण-सदृश
आकारवाला सूर्य ग्राम तथा नगरोका नाशक होता
हे । छत्राकार सूर्य उदित हो तो देशका नाश ओर
सूर्य-विम्ब खण्डित दीख पड़ तो राजाका नाश
होता हे ॥ ८--१४॥
यदि सूर्योदय या सूर्यास्तिके समय विजलीकी
गड़गड़ाहट ओर वच्रपात एवं उल्कापात हो तो
राजाका नाश या राजाओमिं परस्पर युद्ध होता है।
यदि पंद्रह या सादे सात दिनतक दिनमें सूर्यपर
तथा रातमें चन्द्रमापर परिवेष (मण्डल) हो
अथवा उदय ओर अस्त-समयमें वह अत्यन्त
रक्तवर्णका दिखायी दे, तो राजाका परिवर्तन होता
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद्
३१९
हे ॥ १५-१६॥ उदय या अस्तके समय यदि सूर्य
शस्त्रके समान आकारवाले या गदहे, ऊंट आदिके
सदुश अशुभ आकारवाले मेघसे खण्डित-सा
प्रतीत हो तो राजाओमें युद्ध होता है॥ १७॥
( चद्द्रुङ्कोत्रति-फल-- ) मीन तथा मेष राशिमें
यदि (द्वितीया-तिथिको उदयकालमे) चन्द्रमाका
दक्षिण शृद्ख उन्नत (ऊपर उठा) हो तो वह
शुभप्रद होता हे। मिथुन ओर मकरमें यदि उत्तर
शङ्खं उन्नत हो तो उसे श्रेष्ठ समञ्लना चाहिये । कुम्भ
ओर वृषमें यदि दोनों शृङ्ग समहोंतो शुभहे।
कर्क ओर धनुमें यदि शूद्क शरसदृश हो तो शुभ
हे। वृश्चिक ओर सिंहमें भी धनुष-सदृश हो तो
शुभ है तथा तुला ओर कन्यामें यदि चन्द्रमाका
शृद्ख शूलके सदृश दीख पड़े तो शुभ फल
समञ्चना चाहिये । इससे विपरीत स्थितिमें चन्द्रमाका
उदय हो तो उस मासमे पृथ्वीपर दुर्भिक्ष, राजाओमं
परस्पर विरोध तथा युद्ध आदि अशुभ फल प्रकट
होते हे॥ १८-१९-३॥
पूर्वाषाढ, उत्तराषाढ, मूल ओर ज्येष्ठा-इन
नक्षतरोमें चन्द्रमा यदि दक्षिण दिशामें होः तो
जलचर, वनचर ओर सर्पका नाश तथा अग्निका भय
होता है । विशाखा ओर अनुराधामें यदि दक्षिणभागमं
हो तो पापफल देनेवाला होता है। मघा ओर
विशाखामें यदि चन्द्रमा मध्यभागमें होकर चले तो
भी सोम्य (शुभ) -प्रद होता हे । रेवतीसे मृगशिरापर्यन्त
६ नक्षत्र 'अनागत' आद्रसि अनुराधापर्यन्त बारह
नक्षत्र ' मध्ययोगी ' ओर वासव (ज्येष्ठा) से नौ नक्षत्र
'गतयोगी ' हे । इनमें भी चन्द्रमा उत्तर भागमें रहनेपर
शुभप्रद होता हे ॥ २०-२२ : ॥
भरणी, ज्येष्ठा, आश्लेषा, आद्रा, शतभिषा ओर
स्वाती ये अर्धभोग (४०० कला), ध्रुव (तीनों
उत्तरा, राहिणी), पुनर्वसु ओर विशाखा-ये सार्धकभोग
(१२०० कला) तथा अन्य नक्षत्र सम (पूर्ण)
भोग (८०० कला) हें ` । साधारणतया चन्द्रमाकी
दक्षिण शृद्धोत्रति अशुभ ओर उत्तर शृद्धोन्नति
शुभप्रद है। तिथिके अनुसार चन्द्रमामें शुक्ल न
होकर यदि शुक्लतामें हानि (कमी) हो तो
प्रजाके कार्योमिं हानि ओर शुक्लतामें वृद्धि (अधिकता)
हो तो प्रजाजनकी वृद्धि होती है*। समतामें समता
समञ्जनी चाहिये । यदि चन्द्रमाका विम्ब मध्यम
मानसे विशाल (बड़ा) देखनेमें आवे तो सुभिक्षकार्क
(सस्ती लानेवाला) ओर छोटा दीख पडे तो
दुर्भिक्षकारक (महंगी या अकाल लानेवाला)
होता है । चन्द्रमाका शद्ध अधोमुख हौ तो शस्त्रका
भय लाता है। दण्डाकार हो तो कलह (राजा-
प्रजामें युद्ध) होता हे। चन्द्रमाका शद्ध अथवा
विम्ब मद्घलादि ग्रहों (मङ्गल, बुध, गुर्, शुक्र
तथा शनि)-से आहत (भदित) दीख पडे तो
क्रमशः क्षेम, अनादि, वर्षा, राजा ओर प्रजाका
नाश होता दे॥ २३-२६ ; ॥
( भोम-चार-फल-- ) जिस नक्षत्रम मद्गलका
उदय हो, उससे सातवें, आठवें या नवं नक्षत्रमे
१. दिशाका ज्ञान तात्कालिक शरके ज्ञानसे होता है। इसकी विधि पृष्ठ २३६ मं देखिये।
२. राशि-मण्डलमें सव नक्षत्रोका भोग ८०० कलाक बरावर दै । परेतु प्रत्येक नक्षत्रविभागमं योगतागक्रा स्थान जहां पडता
है, वहाँ उसका भोग-स्थान कहलाता दहै। वह छः नक्षत्रेमिं मध्यभागमें पडता है ओर छ: नक्षत्रम आगे तद् जाता दै। जिसका
वास्तविक मान क्रमते ३९५ कला १५ विकला ओर ११८५ कला ५२ विकला है, जो स्वल्पान्तस्ये ४०० ओर १२००
मान लिये गये है। क्रमशः इन्द हौ “ अनागत" ओर गतयोगी ' कटा गया दै । शेष नक्षत्रेकि भोगस्थान अन्तिमांशमं ही पडते
है; अतः इनके मान ८०० कला है। ये ही मध्ययोगी है!
३. प्रतिपदाके अन्तमं (शुक्ल-द्वितीयारम्भमं) चन्द्रमा दृश्य हौ तो समता, उससे पश्चात् दृश्य हो तौ हानि ओर पूर्व
दृश्य हो तो वृद्धि समञ्ची जाती है।
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
३२०
संक्षिप्त नारदपुराण
वक्र हो तो वह “उष्ण' नामक वक्र होता हे।
उसमें प्रजाको पीड़ा ओर अग्निका भय प्राप्त होता
हे। यदि उदयके नक्षत्रसे दसं, ग्यारहवें तथा
बारहवें नक्षत्रम मङ्कल वक्र हो तो वह "अश्वमुख!
नामक वक्र होता है। उसमे अन्न ओर वर्षाका
नाश होता हे। यदि तेरहवें या चोदहवें नक्षत्रमें वक्र
हो तो “ व्यालमुख * वक्र कहलाता है। उसमे भी
अन्न ओर वर्षाका नाश होता हे । पंद्रहवें या सोलहवें
नक्षत्रम वक्र हो तो 'रुधिरमुख ' वक्र कहलाता है ।
उसमे मद्धल दुर्भिक्ष, क्षुधा तथा रोगको बढाता हे।
सत्रहवे या अद्रारहवें नक्षत्रम वक्र हो तो वह
"मुसल ' नामक वक्र होता है। उससे धन-धान्यका
नाश तथा दुर्भिक्षका भय होता है। यदि मङ्गल
पूर्वाफल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें उदित होकर
उत्तराषादमें वक्र हो तथा रोहिणीमें अस्त हो तो
तीनों लोकोके लिये नाशकारी होता है। यदि मङ्गल
श्रवणमें उदित होकर पुष्यमें वक्रगति हो तो धनकी
हानि करनेवाला होता हे ॥ २७-३३॥
मङ्गल जिस दिशामें उदित होता है, उस
दिशाके राजाके लिये भयकारक होता है । यदि
मघा-नक्षत्रके मध्य होकर चलता हुआ मङ्गल
उसीमे वक्र हो जाय तो अवर्पण (वर्षाका
अभाव) ओर शस्त्रका भय लाता है तथा राजाके
लिये विनाशकारी होता है। यदि मङ्गल मघा,
विशाखा या रोहिणीके योगताराका भेदन करके
चले तो दुर्भिक्ष, मरण तथा रोग लानेवाला होता
हे। उत्तरा फाल्गुनी, उत्तरापाढ, उत्तर भाद्रपद,
रोहिणी, मूल, श्रवण ओर मृगशिरा-इन नक्षत्रोके
बीचमें तथा रोहिणीके दक्षिण होकर मङ्गल चले
तो अनावृष्टिकारक होता है । मङ्गल सव नक्षत्रोके
उत्तर होकर चले तो शुभप्रद है ओर दक्षिण होकर
चले तो अशुभ फल देनेवाला तथा प्रजामें कलह
उत्पन्न करनेवाला होता है ॥ ३४- २७ ६ ॥
( बुध-चार-फल-- ) यदि कदाचित् ओंधी,
मेघ आदि उत्पात. न होनेपर (शुद्ध आकाशे) भी
वुधका उदय देखनेमे न आवे तो अनावृष्टि,
अग्रिभय, अनर्थं ओर राजाओमें युद्धकी सम्भावना
समञ्चनी चाहिये । धनिष्ठा, श्रवण, उत्तराषाढ, मृगशिरा
ओर रोहिणीमें चलता हुआ बुध यदि उन नक्षत्रोके
योगताराओंका भेदन करे तो वह लोकें बाधा
ओर अनावृष्टि आदिके द्वारा भयकारी होता है।
यदि आद्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा ओर मघा-इन
नक्षत्रोमें बुध दृश्य हो तो दुर्भिक्ष, कलह, रोग तथा
अनावृष्टि आदिका भय उपस्थित करनेवाला होता
हे । हस्तसे छः (हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा,
अनुराधा तथा ज्येष्ठा) नक्षत्रोमें बुधके रहनेसे
लोकमे कल्याण, सुभिक्ष तथा आरोग्य होता हे।
उत्तर भाद्रपद, उत्तरा फाल्गुनी, कृत्तिका ओर
भरणीमं विचरनेवाला बुध वैद्य, घोडे ओर व्यापारियोंका
नाश करनेवाला होता हे । पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ
ओर पूर्व भाद्रपदमें विचरता हुआ बुध यदि इन
नक्षत्रोके योगताराओंका भेदन करे तो क्षुधा, शस्त्र,
अग्रि ओर चोरोसे प्राणियोको भय प्राप्त होता
हे ॥ ३८- ४३ ॥
भरणी, कृत्तिका, रोहिणी ओर स्वाती-इन
नक्षत्रोमें वुधकी गति ' प्राकृतिकी ' कही गयी है।
आद्रा, मृगशिरा, आश्लेषा ओर मघा-इन नक्षत्रे
बुधको गति " मिश्रा" मानी गयी है । पूर्वा फाल्गुनी,
उत्तरा फाल्गुनी, पुष्य ओर पुनर्वसु-इनमें बुधकी
संक्षिप्ता' गति कही गयी । पूर्वं भाद्रपद, उत्तर
भाद्रपद, रेवती ओर अश्िनी-इनमें बुधकी ‹ तीक्ष्णा'
गति होती है। उत्तराषाद्, पूर्वाषाद ओर मूलमें
उनको “योगान्तिका' गति मानी गयी है। श्रवण,
चित्रा, धनिष्ठा ओर शतभिषामें ' घोरा" गति ओर
विशाखा, अनुराधा तथा हस्त-इन नक्षत्रोमें बुधकौ
` पाप' सं्ञक गति होती है । इन प्राकृत आदि सात
((-0. 1\/॥11104/5511॥1 81188 \/8181185। (0166101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
२२१
प्रकारको गतियोमें उदित होनेपर जितने दिनतक
बुध दृश्य रहता है, उतने ही दिन उनमें अस्त
होनेपर अदृश्य रहता है । उन दिनोकी संख्या
क्रमसे ४०, ३०, २२, १८, ९, १५ ओर ११ हे।
बुध जब प्राकृत गतिमें रहता है, तब संसारमें
कल्याण, आरोग्य ओर सुभिक्ष (अन्न-वस्त्र
आदिक वृद्धि) करता है। मिश्र ओर संक्षिप्त
गतिमे मध्यम फल देता है तथा अन्य गतियोमें
अनावृष्टि (दुर्भिक्ष)-कारक होता है। वैशाख,
श्रावण, पौष ओर आषादमें उदित होनेपर बुध
पापरूप फल देता है ओर अन्य मासोमें उदित
होनेपर वह शुभ फल देता है। आश्चिन ओर
कातिकमें बुधका उदय हो तो शस्त्र, दुर्भिक्ष ओर
अग्निका भय प्राप्त होता हे । यदि उदित हुए बुधको
कान्ति चांदी अथवा स्फटिकके समान स्वच्छ हो
तो वह श्रेष्ठ फल देनेवाला होता है ॥ ४४-५२॥
( वृहस्पति-चार-फल- ) कृत्तिका आदि दो-
दो नक्षत्रोके आश्रयसे कार्तिक आदि मास होते है;
परंतु अन्तिम (आश्चिन), पञ्चम (फाल्गुन) ओर
एकादश (भाद्रपद)-ये तीन नक्षत्रोसे पूर्णं होते
है । इसी प्रकार बृहस्पतिका जिन नक्षत्रे उदय
होता है, उन नक्षत्रोंसे (मासके अनुसार ही)
संवत्सरोके नाम होते हें । उन संवत्सरोमें कार्तिक
ओर मार्गशीर्षं नामक संवत्सर प्राणियोके लिये
अशुभ फलदायक होते है । पौष ओर माघ नामक
संवत्सर शुभ फल देनेवाले होते हे । फाल्गुन ओर
चैत्र नामक संवत्सर मध्यम (शुभ-अशुभ दोनों)
फल देते हँ । वैशाख शुभप्रद ओर ज्येष्ठ मध्यम
फल देनेवाला होता हे। आषाढ मध्यम ओर
श्रावण श्रेष्ठ होता है तथा भाद्रपद भी कभी श्रेष्ठ
होता है ओर कभी नहीं होता; परंतु आशिन
संवत्सर तो प्रजाजनोके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ होता
हे । मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार संवत्सरोका फल समञ्चना
चाहिये ॥५३--५५३ ॥
वृहस्पति जव नक्षत्रोके उत्तर होकर चलता है
तव॒ संसारमें कल्याण, आरोग्य तथा सुभिक्ष
करनेवाला होता हे। जव नक्षत्रोके दक्षिण होकर
चलता हे, तब विपरीत परिणाम (अशुभ, रोगवृद्धि
तथा दुर्भिक्ष) उपस्थित करता है तथा जव मध्य
होकर चलता है, उस समय मध्यम फल प्रस्तुत
करता है। गुरुका विम्ब यदि पीतवर्ण, अग्रिसदृश,
श्याम, हरित ओर लाल दिखायी दे तो प्रजाजनोमिं
क्रमशः व्याधि, अग्रि, चोर, शस्त्र ओर अस्त्र का
भय उपस्थित होता है। यदि गुरुका वर्णं धृरएके
१. कृत्तिका आदि नक्षत्रम पूर्णिमा होनेसे मासोके कार्तिक आदि नाम होते ह। नीचे चक्रम देखिये-
२. जौ हाथमे धारण किये हुए ही चलाया जाता है, वह शस्त्र है; जैसे तलवार आदि; तथा जो हाथमे केककर
चलाया जाता है, वह अस्त्र कहलाता है, जैसे बाण ओर् वंदृककी गोली आदि।
((-0. 1\1(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 60810011
३२२
संक्षिप्त नारदपुराण
समान हो तो वह अनावृष्टिकारक होता है । यदि
गुरु दिनमे (प्रातः-सायं छोडकर) दृश्य हो तो
राजाका नाश, रोगभय अथवा राष्का विनाश होता
हे। कृत्तिका तथा रोहिणी ये संवत्सरके शरीर हे ।
पूर्वापाढ ओर उत्तराषाद् ये दोनों नाभि ह, आद्रा
हदय ओर मघा संवत्सरका पुष्प है । यदि शरीर
पापग्रहसे पीडित हो तो दुर्भिक्ष, अग्रि ओर
वायुका भय उपस्थित होता ह । नाभि पापग्रहसे
युक्त हो तो क्षुधा ओर तृषासे पीडा होती है । पुष्प
पापग्रहसे आक्रान्त हो तो मूल ओर फलोंका नाश
होता हे। यदि हदय-नक्षत्र पापग्रहसे पीडित हो
तो अन्नादिका नाश होता हे। शरीर आदि शुभग्रहसे
संयुक्त हों तो सुभिक्ष ओर कल्याणादि शुभ फल
प्राप्त होते हं ॥ ५६-६१॥ यदि मघा आदि नक्षत्रोमें
वृहस्पति हो तो वह क्रमशः शस्य-वृद्धि, प्रजामें
आरोग्य, युद्ध, अनावृष्टि, द्विजातियोको पीडा,
गौओंको सुख, राजाओंको सुख, स्त्री-समाजको
सुख, वायुका अवरोध, अनावृष्टि, सर्पभय, सुवृष्ट,
स्वास्थ्य, उत्सववृद्धि, महार्घ, सम्पत्तिको वृद्धि,
देशका नाश, अतिवृष्टि, निर्वेरता, रोग-वृद्धि, भयकी
हानि, रोगभय, अन्नको वृद्धि, वर्षा, रोगकी वृद्धि,
धान्यकी वृद्धि ओर अनावृष्टिरूप फल देता
ठे ॥ ६२-६४॥
( शुक्र-चार-फल- ) शुक्रके तीन मार्ग
है- सोम्य (उत्तरा), मध्य ओर याम्य. (दक्षिण) ।
इनमेसे प्रत्येकमें तीन-तीन वीधियोँ हैँ ओर एक-
एक वीथीमे वारी-बारीसे तीन-तीन नक्षत्र आते
हें । इन नक्षत्रोको अश्चिनीसे आरम्भ करके जानना
चाहिये । इस प्रकार उत्तरसे दक्षिणतक शुक्रके
मागमे क्रमशः नाग, इभ, एेरावत, वृष, उद्र,
खर, मृग, अज तथा दहन-ये नौ वीथयो
हेः ॥ ६५-६६ ॥ उत्तरमार्गकी तीन वीथियोमें विचरण
करनेवाला शुक्र धान्य, धन, वृष्टि ओर शस्य
(अन्नको फस्ल)-इन सब वस्तुओंको पुष्ट एवं
परिपूर्णं करता हे । मध्यमार्गकी जो तीन वीधियों
हे, उनमें शुक्रके जानेसे सब अशुभ ही फल प्राप्त
होते हे । मघासे पाच नक्षत्रोमें जब शुक्र जाता हे
तो पूर्वं दिशामें उठा हुआ मेघ सुवृष्टिकारक तथा
शुभप्रद होता है। स्वातीसे तीन नक्षत्रतक जब
शुक्र रहता हे तव पश्चिम दिशा (देश) -में मेघ
सुवृष्टिकारक ओर शुभदायक होता है। शेष सब
नक्षत्रोमे उसका फल विपरीत (अनावृष्टि ओर
दुर्भिक्ष करनेवाला) होता है। शुक्र जब बुधके
साथ रहता है तो सुवृष्टिकारक होता हे । कृष्णपक्षको
अष्टमी, चतुर्दशी ओर अमावास्यामें यदि शुक्रका
उदय या अस्त हो तो पृथ्वी जलसे परिपूर्ण होती
हे। गुरु ओर शुक्र परस्पर सप्तम राशिमें हों तथा
एक पूर्वं वीथीमे ओर दूसरा पश्चिम वीधथीमें
१. शुक्रके ३ मार्ग ओर ९ वीधियाँं इस प्रकार ह-
र (य
अश्विनी
मृगशिरा
आश्लेषा
इभ
कृत्तिका
((-0. 1/(111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
३२३
विद्यमान हो तो वे दोनों देशमें अनावृष्टि तथा
दुभिक्ष लानेवाले ओर राजाओंमें परस्पर युद्ध
करनेवाले होते हें । मङ्गल, बुध, गुरु ओर
शनि यदि शुक्रसे आगे होते है तो युद्ध,
अतिवायु, दुर्भिक्ष ओर अनावृष्टि करनेवाले
होते हे ॥ ६&७-७२ ॥ पूर्वाषाद, अनुराधा, उत्तरा
फाल्गुनी, आश्लेषा, ज्येष्ठा-इन नक्षत्रोमे शुक्र
हो तो वह सुभिक्षकारक होता हे। मूलमें हो
तो शस्त्रभय ओर अनावृष्टि देनेवाला होता हे ।
उत्तर भाद्रपद ओर रेवतीमें शुक्रके रहनेपर भय
प्राप्त होता हे ॥ ७३ ॥
( शनि-चार-फल- ) श्रवण, स्वाती, हस्त,
आद्रा, भरणी ओर पूर्वां फाल्गुनी-इन नक्षत्रोमें
विचरनेवाला शनि मनुष्योके लिये सुभिक्ष, आरोग्य
तथा खेतीकी उपज बदढानेवाला होता हे ॥ ७४॥
जन्मनक्षत्रसे प्रारम्भ करके मनुष्याकृति शनि-
चक्रके मुखमे एक, गदाम दो, सिरमें तीन,
नेत्रोमे दो, हदयमें पांच, वाये हाथमे चार, वाये
परमे तीन, दक्षिण पादमें तीन तथा दक्षिण हाथमे
चार-इस तरह नक्षत्रोंकी स्थापना करे । शनिका
वर्तमान नक्षत्र जिस अङ्खमे पडे, उसका फल
निमप्रलिखितरूपसे जानना चाहिये । शनि-नक्षत्र
मुखे हो तो रोग, गुदामें हो तो लाभ, सिरमें
हो तो हानि, नेत्रमे हो तो लाभ, हदयमें हो तो
सुख, वाये हाथमे हो तो बन्धन, वाये पैरमें हो
तो परिश्रम, दाहिने पैरमेहोतो श्रेष्ठ यात्रा ओर
दाहिने हाथमे हो तो धन-लाभ होता है। इस
प्रकार क्रमशः फल कहे गये हैँ ॥ ७५-७७॥
बहुधा वक्रगामी होनेपर शनि इन फलोंकी
प्रापि कराता ही है। यदि वह सम मार्गपर
हो तो फल भी मध्यम होता है ओर यदि
वह शीष्रगति हो तो
होते हें ॥ ७८ ॥
( राहु-चार-फल-- ) भगवान् विष्णुने अपने
चक्रसे राहुका मस्तक काट दिया तो भी अमृत पी
लेनेके कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई; अतः उसे
ग्रहके "पदपर प्रतिष्ठित कर लिया गया ॥७९॥ वह
त्रह्मजीके वरसे सम्पूर्णं पर्वा (पूर्णिमा ओर अमावास्या)-
के समय चन्द्रमा ओर सूर्यको पीड़ा देता है; किंतु
“शर ' तथा “अवनति! अधिक होनेके कारण वह
उन दोनाोँसे दूर ही रहता है ॥ ८०॥ एक सूर्यग्रहणके
वाद् दूसरे सूर्यग्रहणका तथा एक चन्दरग्रहणके बाद
दूसरे चन्द्रग्रहणका विचार छः मासपर पुनः कर
लेना चाहिये । प्रति छः मासपर क्रमशः ब्रह्मादि सात
देवता पर्वेश (ग्रहणके अधिपति) होते है । उनके
नाम इस प्रकार है-ब्रह्मा, चन्द्रमा, इनदर, कुबेर,
वरुण, अग्नि तथा यम। ब्राह्यपर्वमें ग्रहण होनेपर
पशु, धान्य ओर द्विजोंकी वृद्धि होती टे ॥ ८१-८२॥
चन्द्रपर्वमें ग्रहणदहोतोभीरेसाही फल दहोतादै
विशेषता इतनी ही है कि लोगोको कफस पीड़ा
होती है । इन्द्रपर्वमें ग्रहण होनेपर राजाओमिं विरोध,
जगतमें दुःख तथा खेती-बारीका नाश होता है।
वारुणपर्वमें ग्रहण होनेपर राजाओंका अकल्याण
ओर प्रजाजनोंका कल्याण होता है ॥ ८३-८४॥
अग्रिपर्वमें ग्रहण हो तो वृष्टि, धान्यवृद्धि तथा
कल्याणक प्रापि होती है ओर यमपर्वमे ग्रहण
होनेपर वर्षका अभाव, खेतीकी हानि तथा
दुरधिक्षरूप फल प्राप्त होते हँ ॥ ८५॥ वेलाहीन
समयमे अर्थात् वेलासे पहले ग्रहण हो तो
खेतीकी हानि तथा राजाओंको दारुण भय प्राप्त
होता है ओर “अतिवेल' कालमें अर्थात् वेला
विताकर ग्रहण हो! तो फूलोंकी हानि होती है,
उततम फल प्रप्त
१. गणितसे ग्रहणका जो समय प्राप्त होता हो उससे पहले ग्रहण होना 'वेलाहीन' दै ओर उमे चिताकर् जो
ग्रहण होता दै, वह “ अतिवेल" कहलाता टै ।
((-0. 1/८11114<511॥ 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 68110011
३२४
संक्षिप्त नारदपुराण
जगत्मे भय होता है ओर खेती चौपट हो जाती
हे ॥ ८६ ॥ जब एक ही मासमे चन्द्रमा-सूर्य--दोनोका
ग्रहण हो तो राजाओमें विरोध होता है तथा धन
ओर वृष्टिका विनाश होता है॥ ८७॥ ग्रहण लगे
हए चन्द्रमा ओर सूर्यका उदय अथवा अस्त हो तो
वे राजाओं ओर धान्योका विनाश करनेवाले होते
हें । यदि चन्द्रमा ओर सूर्यका सर्वग्रास ग्रहण हो
तो वे भूखमरी, रोग तथा अग्रिका भय उपस्थित
करनेवाले होते हे ॥ ८८ ॥ उत्तरायणमें ग्रहण हो तो
ब्राह्मणों ओर क्षत्रियोकी हानि होती है तथा
दक्षिणायनमें ग्रहण होनेपर अन्य वण्के लोगोंको
हानि पहंचती है। सूर्य या चनद्रमाके विम्बके
उत्तर, पूर्तं आदि भागमें यदि राहुका दर्शन हो
(स्पर्श देखनेमें आवे) तो वह क्रमशः ब्राह्मण,
कषत्रिय, वैश्य ओर शद्रोको हानि पहुंचाता हे ॥ ८९ ॥
इसी तरह ग्रहणके समय ग्रासके ओर मोक्षके भी
दस-दस भेद होते हं; जिनको सूक्ष्म गतिको
देवता भी नहीं जान सकते, फिर साधारण
मनुप्योकी तो बात ही क्या हे॥९०॥ गणितद्वारा
ग्रहोको लाकर उनके ' चार ' (गतिमान, स्पर्शं ओर
मोक्ष कालको स्थिति ) -पर विचार करना चाहिये।
जिससे उन ग्रहोद्रारा ग्रहणकालके शुभ ओर
अशुभ लक्षण (फल)-को हम देख ओर जान
सकर ॥ ९१॥ अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि
उस समयका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये अनुसंधान
करे। धूम-केतु आदि तारोका उदय ओर अस्त
मनुष्योके लिये उत्पातरूप होता है॥९२॥ वे
उत्पात दिव्य, भौम ओर अन्तरिक्ष भेदसे तीन
प्रकारके हें। वे शुभ ओर अशुभ दोनों प्रकारके
फल देनेवाले हे । आकाशम यक्नको ध्वजा, अस्त्र-
शस्त्र, भवन ओर वड हाथीके सदृश तथा खंभा,
त्रिशूल ओर अङ्कश- इन वस्तुओंके समान जो
केतु दिखायी देते है, उन्हें आन्तरिक्ष" उत्पात
कहते हे। साधारण ताराके समान उदित होकर किसी
नक्षत्रके साथ केतु हो तो “दिव्य ' उत्पात कहा गया
हे । भूलोकसे सम्बन्ध रखनेवाले ( भूकम्प आदि)
उत्पातोंको ‹ भोम' उत्पात कहते हें ॥ ९३-९४॥
केतुतारा एक होकर भी प्राणियोंको अशुभ फल
देनेके लिये भिन्न-भिन्न रूप धारण करता है।
जितने दिनोतक आकाशमें विविधरूपधारी केतु
देखनेमें आता हे, उतने ही मास या सौर वर्षोतक
वह अपना शुभाशुभ फल देता हे। जो दिव्य केतु
हे, वे सदा प्राणियोंको विविध फल देनेवाले होते
हं ॥ ९५-९६ ॥ हस्व, चिकना ओर प्रसन्न (स्वच्छ)
श्रेत रङ्गका केतु सुवृष्ट देता है। शीघ्र अस्त
होनेवाला विशाल केतु अवृष्टि देता हे ॥ ९७॥
इन्द्रधनुषके समान कान्तिवाला धूमकेतु तारा अनिष्ट
फल देता है। दो, तीन या चार रूपमे प्रकट
त्रिशूलके समान आकारवाला केतु राका विनाशक
होता हे ॥ ९८ ॥ पूर्वं तथा पश्चिम दिशमें सूर्य-
सम्बन्धी केतु मणि, हार एवं सुवर्णके समान
देदीप्यमान दिखायी दे तो उन दिशाओंके राजाओंकी
हानि होती ह ॥ ९९ ॥ पलाश, विम्बफल, रक्त ओर
तोतेकी चोच आदिके समान वर्णका केतु अग्रिकोणमे
उदित हो तो शुभ फल देनेवाला होता है ॥ १००॥
भूमिसम्बन्धी केतुओंकी कान्ति जल एवं तेलक
समान होती है। वे भूखमरीका भय देनेवाले हे ।
चन्द्रजनित केतुओंका वर्णं श्वेत होता दै। वे
सुभिक्ष ओर कल्याण प्रदान करनेवाले होते है ॥ १०१॥
ब्रह्मदण्डसे उत्पन्न तथा तीन रग ओर तीन अवस्थाओंसे
युक्त धूमकेतु नामक पितामहजनित (आन्तरिक्ष)
केतु प्रजाओंका विनाश करनेवाला माना गया
है ॥ १०२॥ यदि ईशानकोणमें श्वेतवर्णे शुक्रजनित
केतु उदित हों तो वे अनिष्ट फल देनेवाले होते है ।
शिखारहित एवं कनकनामसे प्रसिद्ध शनैश्चरसम्बन्धी
केतु भी अनिष्ट फलदायक है ॥ १०३ ॥ गुरुसम्बन्धी
((-0. 1/८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
^
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३२५
केतुओंकी विकच संज्ञा हे। वे दक्षिण दिशामें
प्रकट होनेपर भी अभीष्ट साधक माने गये हे।
उसी दिशामें सक्षम तथा शुक्लवर्णवाले बुधसम्बन्धी
केतु हों तो वे चोर तथा रोगका भय प्रदान
करनेवाले हे ॥ १०४॥ कुट्कनामसे प्रसिद्ध मङ्गल-
सम्बन्धी केतु लाल रंगके होते हैँ । उनकी आकृति
सूर्यके समान होती है । वे भी उक्त दिशामे उदित
होनेपर अनिष्टदायक होते दहं । अग्रिके समान
कान्तिवाले अग्निसम्बन्धी केतु विश्वरूप नामसे
प्रसिद्ध है । वे अग्रिकोणमें उदित होनेपर सुखद
होते है ॥ १०५ ॥ श्याम वर्णवाले सूर्यसम्बन्धी केतु
अरुण कहलाते हैँ । वे पाप अर्थात् दुःख देनेवाले
होते हें । रीछके समान रंगवाले शुक्रसम्बन्धी केतु
शुभदायक होते हैं ॥ १०६॥ कृत्तिका तारामे उदित
हुआ धूमकेतु निश्चय ही प्रजाजनोंका नाश करता
है । राजमहल, वृक्ष ओर पर्वतपर प्रकट हुआ केतु
राजाओंका नाश करनेवाला होता है॥ १०७॥
कुमुद पुष्पके समान वर्णवाला कोमुद नामक केतु
सुभिक्ष लानेवाला होता हे । संध्याकालमें मस्तकसहित
उदित हआ गोलाकार केतु अनिष्ट फल देनेवाला
होता है ॥ १०८ ॥
( कालमान-- ) ब्राह्म, देव, मानव, पित्र्य,
सौर, सावन, चान्द्र, नाक्षत्र तथा वार्हस्पत्य-ये नौ
मान होते हैं ॥ १०९॥ इस लोके इन नौ मानोमेसे
पाचके ही द्वारा व्यवहार होता है! किंतु उन नवं
मानोंका व्यवहारके अनुसार पृथक्-पृथक् कायं
बताया जायगा ॥ ११० ॥ सौर मानसे ग्रहांको सव
प्रकारकी गति (भगणादि) जाननी चाहिये । वर्पाका
समय तथा स्त्रीके प्रसवका समय सावन मानसे
ही ग्रहण किया जाता है ॥ १११ ॥ वपकि भीतरका
घटीमान आदि नाक्षत्र मानसे ही लिया जाता हे।
यज्ञोपवीत, मुण्डन, तिथि एवं वर्पशक्रा निर्णय
तथा पर्व, उपवास आदिका निश्चय चान्द्रं मानसं
किया जाता दै। बार्हस्पत्य मानसे प्रभवादि संवत्सरका
स्वरूप ग्रहण किया जाता हे ॥ ११२-११३ ॥ उन-
उन मानोके अनुसार बारह महीनोंका उनका
अपना-अपना विभिन्न वर्षं होता हे। वृहस्पतिकों
अपनी मध्यम गतिसे प्रभव आदि नामवाले साठ
संवत्सर होते हें ॥ ११४॥ प्रभव, विभव, शुक्ल,
प्रमोद, प्रजापति, अद्धभिरा, श्रीमुख, भाव, युवा,
धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृष,
चित्रभानु, सुभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित्,
सर्वधारी, विरोधी, विकृत, खर, नन्दन, विजय,
जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्ब, विलम्ब, विकारी,
शर्वरी, प्लव, शुभकृत्, शोभन, क्रोधी, विश्वावसु,
पराभव, प्लवङ्ग, कीलक, सौम्य, समान, विरोधकृत्
परिभावी, प्रमादी, आनन्द, राक्षस, अनल, पिङ्गल,
कालयुक्त, सिद्धार्थ, रोद्र, दुर्मति, दुन्दुभि, सुधिरोद्रारी,
रक्ताक्ष, क्रोधन तथा क्षय--ये साठ संवत्सर जानने
चाहिये। ये सभी अपने नामके अनुरूप फल
देनेवाले है । पाँच वर्पोका युग होता है। इस तरह
साठ संवत्सरोमें बारह युग होते हे ॥ १६५- १२१ ॥
उन युगेकि स्वामी क्रमशः इस प्रकार जानने चहिये-
विष्णु, वृहस्पति, इद्र, लोहित, त्वष्ट, अदिवुध्नय
पितर विश्वेदेव, चन्रमा, इन्द्रानि, अश्चिनीकुमार तथा
भग। इसी प्रकार युगके भीतर जे पाँच वर्षं होते हं
उनके स्वामी क्रमशः अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, ब्रह्मा
ओर शिव है ॥१२२-१२३॥
संवत्सरके राजा, मन्त्री तथा धान्येशरूप ग्रहोके
बलावलका विचार करके तथा उनको तात्कालिक
स्थितिको भी भलीभंति जानकर संवत्सरका फल
समञ्जना चाहिये ॥ १२४॥ मकरादि छः राशियों
छः मासतक सूर्यके भोगसे सौम्यायन (उत्तरायण)
होता है! वह दैवताओंका दिन ओर ककदि छः
राशि्वोें छः मासतकः मुर्यक्रे भोगसे दक्षिणायन
+
होता है, चह देवता आंकी रात्रि दै ॥ १२५ ॥ गृहप्रवैश,
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/818/185। (01661010. 01411260 0 6810011
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संक्षिप्त नारदपुराण
विवाह, प्रतिष्ठा तथा यज्ञोपवीत आदि शुभकर्म
माघ आदि उत्तरायणके मासमे करने चाहिये ॥ १२६॥
दक्षिणायनमे उक्त कार्य गर्हित (त्याज्य) माना
गया है, अत्यन्त आवश्यकता हो तो उस समय
पूजा आदि यन्न करनेसे शुभ होता है*। माघसे
दो-दो मासोकी शिशिरादि छः ऋतुं होती हे ॥ १२७॥
मकरसे दो-दो राशियोमें सूर्यभोगके अनुसार क्रमशः
शिशिर, वसन्त ओर ग्रीष्म- ये तीन ऋतु उत्तरायणमें
होती है ओर कर्कसे दो-दो राशियोमे सूर्यभोगके
अनुसार क्रमशः वर्षा, शरद् ओर हेमन्त- ये तीन
ऋतु दक्षिणायनमें होती हे ॥ १२८ ॥ शुक्लपक्षकी
प्रतिपदासे अमावास्यातक ‹ चान्द्र मास" होता दै।
सूर्यको एक संक्रान्तिसे दूसरी संक्रान्तितिक ' सौर
मास" होता हे। तीस दिनोंका एक सावन मास'
होता है ओर चनद्रमाद्धारा सव नक्षत्रोके उपभोगमें
जितने दिन लगते हं, उतने अर्थात् २७ दिनोंका
एक ' नाक्षत्र मास" होता हे ॥ १२९ ॥ मधु, माधव,
शुक्र, शुचि, नभः, नभस्य, इप, उर्ज, सहाः,
सहस्य, तप ओर तपस्य-ये चैत्रादि बारह मासोंकी
संज्ञाएं हे । जिस मासक पौर्णमासी जिस नक्षत्रसे
युक्त हो, उस नक्षत्रके नामसे ही उस मासका
नामकरण होता हे। (जेसे जिस मासकी पूर्णिमा
चित्रा नक्षत्रसे युक्त होती ठै, उस मासका नाम
चेन्न ' होता है ओर वह पौर्णमासी भी उसी नामसे
विख्यात होती हे, जैसे चत्री, वैशाखी आदि।)
प्रत्येक मासके दो पक्ष क्रमशः देवपक्ष ओर
पितृपक्ष हे, अन्य विद्वान् उन्हें शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष
कहते ह ॥ १३०-१३२॥ वे दोनों पक्ष शुभाशुभ
कार्येमिं सदा उपयुक्त माने जाते ह । त्र्या, अग्रि,
विरञ्चि, विष्णु, गोरी, गणेश, यम, सर्प, चन्द्रमा,
कातिकेय, सूर्य, इन्द्र, महेन्द्र, वासव, नाग, दुर्गा
दण्डधर, शिव, विष्णु, हरि, रवि, काम, शंकर,
कलाधर्, यम, चन्द्रमा (विष्णु, काम ओर शिव)- ये
सव शुक्ल प्रतिपदासे लेकर क्रमशः उनतीस
तिथियोके स्वामी होते हैं। अमावास्या नामक
तिथिके स्वामी पितर माने गये हे।
( तिथियोंकी नन्दादि पांच संज्ना-- ) प्रतिपदा
आदि तिधथियोंकी क्रमशः नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता
ओर पूर्णा-ये पोच संज्ञाएं मानी गयी हें । पंद्रह
तिथियोमें इनको तीन आवृत्ति करके इनका
पृथक्-पृथक् ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । शुक्लपक्षमे
प्रथम आवृत्तिकी (१, २, ३, ४, ५- ये) तिथियों
अधम द्वितीय आवृत्तिको (६, ७, ८, ९, १०- ये)
तिथियाँ मध्यम ओर तृतीय आवृत्तिकी (११, १२,
१३, १४, १५- ये) तिथियों शुभ होती हें । इसी
प्रकार कृष्णपक्षकी प्रथम आवृत्तिकी नन्दादि तिथियों
इष्ट (शुभ), द्वितीय आवृत्तिक मध्यम ओर तृतीय
आवृत्तिको अनिष्प्रद (अधम) होती हें। दोनों
पक्षोकी ८, १२, ६, ४, ९, १४-ये तिथियाँ
पक्षरन्ध्र कही गयी हें । इन्हे अत्यन्त रूक्ष कहा
गया हे । इनमें क्रमशः आरम्भकी ४, १४, ९, ९,
२५ ओर ५ घड्यां सव शुभ कार्योमिं त्याग देने
योग्य हैं। अमावास्या ओर नवमीको छोडकर
अन्य सव विपम तिथियों (३, ५, ७, ११, १३)
सब कार्योमिं प्रशस्त ह । शुक्लपक्षकी प्रतिपदा
मध्यम हे (कृष्ण पक्षकी प्रतिपदा शुभ है)।
पष्ठीमं तेल, अष्टमीमें मांसः चतुर्दशीमें क्षीर एवं
पूर्णिमा ओर अमावास्यामें स्त्रीका सेवन त्याग दे।
१. ' मार्गशीर्षमपीच्छन्ति विवाहे केऽपि कोविदाः ।'
" कुछ विद्वान् अगहनमें भी विवाह होना ठीक मानते है" इस मान्यताके अनुसार ' गहन ' में दक्षिणायन होनेपर
भी विवाह हौ सकता दै ।
२. मांस तो सवके लिय सदा ही त्याज्य टै, किंतु जो मांसाहारी है उन्दं भौ ष्टमीको तो मांस त्याग ही देना चादिवे।
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पूर्व भाग-द्वितीय पाद
३२७
अमावास्या, षष्ठी, प्रतिपदा, द्वादशी, सभी पर्वं ओर
नवमी-इन तिथियोमें कभी दातौन नहीं करना
चाहिये । व्यतीपात, संक्रान्ति, एकादशी, पर्व, रवि
ओर मङ्गलवार तथा पष्ठी तिथि ओर वैधृति-
योगमे अभ्यञ्जन (उबटन)-का निषेध है। जो
मनुष्य दशमी तिथिमें ओंवलेसे स्नान करता है
उसको पुत्रकौ हानि उठानी पड़ती है । त्रयोदशीको
ओंवलेसे स्नान करनेपर धनका नाश होता है ओर
द्वितीयाको उससे खान करनेवालोके धन ओर पुत्र
दोनोका नाश होता है। इसमें संशय नहीं हे ।
अमावास्या, नवमी ओर सप्तमी-इन तीन तिथियों
ओंवलेसे स्नान करनेवालोके कुलका विनाश होता
हे ॥ १३३-- १४४३ ॥
जो पूर्णिमा दिनमें पूर्ण चन्द्रमासे युक्त हो
(अर्थात् जिसमें रात्रिके समय चन्द्रमा कलाहीन
हो) वह पूर्णिमा "अनुमती ' कहलाती है ओर जो
रात्रिम पूर्ण चन्द्रमासे युक्त हो वह "राका" कहलाती
हे । इसी प्रकार अमावास्या भी दो प्रकारकी होती
हे । जिसमें चनद्रमाकी किंचित् कलाका अंश शेष
रहता हे, वह ' सिनीवाली ' कही गयी है तथा जिसमें
चनद्रमाकी सम्पूर्णं कला लुप्त हो जाती है, वह
अमावास्या ' कुहू कहलाती हे“ ॥ १४५-१४६॥
( युगादि तिधिर्यो- ) कार्तिक शुक्लपक्षकों
नवमी सत्ययुगकी आदि तिथि है (इसी दिन
सत्ययुगका प्रारम्भ हआ था), वैशाख शुक्लपक्षको
पुण्यमयी तृतीया त्रेतायुगकी आदि तिथि है।
माघको अमावास्या द्वापरयुगकी आदि तिथि ओर
भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी कलियुगको आदि तिथि
हे। (ये सव तिथियाँ अति पुण्य देनेवाली कही
गयी हे) ॥ १४७-१४८ ॥
( मन्वादि तिधियो-- ) कार्तिकशुक्ला द्वादशी.
आश्चिनशुक्ला नवमी, चेत्रशुक्ला तृतीया, भाद्रपदशुक्ला
तृतीया, पौपशुक्ला एकादशी, आषादृशुक्ला दशमी,
माघशुक्ला सप्तमी, भाद्रपदकृष्णा अष्टमी, श्रावणकी
अमावास्या, फाल्गुनको पूर्णिमा, आपादकी पूर्णिमा,
कार्तिकको पूर्णिमा, ज्येष्टकौ पौर्णमासी ओर चैत्रकी
पूर्णिमा-ये चौदह मन्वादि तिथियाँ है। ये सव
तिथियों मनुष्योके लिये पितृकर्म (पार्वण-श्राद्ध) -
मे अत्यन्त पुण्य देनेवाली हैँ ॥ १४९- १५१ - ॥
(गजच्छाया-योग-- ) भादोकेः कृष्णपक्षकी
(शुक्लादि क्रमसे भाद्रकृष्ण ओर कृष्णादि क्रमये
आशिन कृष्ण पक्षकी ) त्रयोदशीमें यदि सूर्य हस्त-
नक्षत्रमे ओर चन्द्रमा मघामें हो तो ' गजच्छाया" नामक
योग होता ह; जो पितरोके पार्वणादि श्राद्ध कर्ममें
अत्यन्त पुण्य प्रदान करनेवाला है ॥ १५२२ ॥
किसी एक दिनमें तीन तिथियोंका स्पर्श हो
तो क्षयतिथि तथा एक ही तिथिका तीन दिनमें
स्पर्शं हो तो अधिक तिथि (अधितिधि) होती है।
ये दोनों ही निन्दित है। जिस दिन सूर्यादयसे
सूर्यस्तिपर्यन्त जो तिथि रहती है, उस दिन वह
"अखण्ड तिथि" कहलाती है । यदि सूर्यास्तिसे पूर्व
ही समाप्त होती है तो वह “खण्ड तिथि" कही
जाती हे॥ १५३३१५४ - ॥
( श्चणतिथिकथन-- ) प्रत्येक तिधिमं तिथि-
मानका पंद्रहवां भाग ^ क्षणतिधि' कहलाता हे ।
(अर्थात् प्रत्येक तिधिमें उसी तिथिसे आरम्भ
करके पंद्रह तिधि्योकि अन्तर्भोग होते हं।) तथा
उन क्षणतिधियोका भी आधा क्षण तिथ्यर्धं (क्षण
[की
१. अमावास्या प्रायः दौ दिन हुआ करती टै । उनमें प्रथम दिनको “ सिनीवाली ' ओर दूसरे दिनकी " कु ' होती
है। चतुर्दशीयुक्ता अमावास्याका क्षय न हो तो वह सिनीवाली होती टै।
२.“ अमावास्यान्त' मासक दृष्टिसे यां भादाका कृष्णपश्न कटा गया है । जहां पूर्णिमान्त मास माना जाता ै
वहकि लिये इस भादाका अर्धं आश्चिन समञ्जना चादिये।
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३२८
करण) होता हे ` ॥ १५५५ २ ॥
( वारप्रकरण-- ) रवि स्थिर, सोम चर,
मर््गल क्रूर, बुध अखिल (सम्पूर्ण), गुरु लघु,
शुक्र मृदु ओर शनि तीक्ष्ण धर्मवाला हे।
( वारोमें तेल लगानेका फल-- ) जो मनुष्य
रविवारको तेल लगाता हे, वह रोगी होता है।
सोमवारको तेल लगानेसे कान्ति बदती हे।
मद्गलको व्याधि होती हे। बुधको तेलाभ्यङ्गसे
सौ भाग्यको वृद्धि होती हे । गुरुवारको सौभाग्यकौ
हानि होती है, शुक्रवारको भी हानि होती हे तथा
शनिवारको तेल लगानेसे धन-सम्पत्तिको वृद्धि
होती हे ॥ १५६- १५८ ॥
( रवि आदि वारोंका आरम्भकाल- ) जिस
समय लङ्कामें (भूमध्यरेखापर ) सूर्योदय होता है
उसी समयसे सर्वत्र रवि आदि वारोका आरम्भ
होता है। उस समयसे देशान्तर ( लङ्कोदयकालसे
अपने उदय कालका अन्तर) ओर चरार्धं घटीतुल्य
आगे या पीछे अन्य देशमें सूर्योदय हआ करता
हेः ॥ १५९ ॥ जो ग्रह बलवान् होता हे, उसके वारम
जो काई भी कार्य किया जाता हे, वह सिद्ध हुआ
करता हे; कितु जो ग्रह बलहीन (जातक-अध्यायमें
कहे हुए बलसे रहित) होता है, उसके वारमं बहुत
यन्न करनेपर भी कार्य सिद्ध नहीं होता हे ॥ १६०॥
संक्षिप्त नारदपुराण
सोम, बुध, वृहस्पति ओर शुक्र सम्पूर्णं शुभ कार्येमिं
शुभप्रद होते हें, अन्य वार (शनि, रवि ओर मङ्गल)
क्रूर कर्ममें इष्टसिद्धिदायक होते हें ॥ १६१॥
सूर्यका वर्ण लाल है, चन्द्रमा गौर वणि है,
मङ्गल अधिक लाल हे, बुधकौ कान्ति दूर्वादलके
समान श्याम है, गुरुका वर्णं सुवर्णके सदृश पीत
हे, शुक्र शेत ओर शनि कृष्ण वरण्कि हेः;
इसलिये उन ग्रहोके वारोमें इनके गुण ओर
वणक अनुरूप कार्य ही सिद्ध एवं हितकर
होते हें |
( निन्द्य मुहूर्त-- ) रविवारसे आरम्भ करके-
रविमें ७, ५, £; सोममें ६9, मङ्गलमें ८,
३, २; बुधम ४, २, ५; गुरुवारमें ३, १, ८;
शुक्रवारमें २, ७, ३ ओर शनिमें १, ६, ८-ये
प्रहराधं क्रमशः कुलिक, उपकुलिक ओर वारवेला
कहे गये हें । इनका मान आधे पहरका समञ्चना
चाहिये ॥ १६२- १६५॥
( प्रत्येक वारमें श्चषणवार-कथन-- ) जिस वारम
क्षणवार जानना हो उस वारमें प्रथम क्षणवार उसी
वारपतिका होता हे। उससे छठे वरेशका द्वितीय,
उससे भी छृटेका तृतीय, इस प्रकार छ्टे-छटेके
क्रमसे दिन-रातमें २४ क्षणवार (कालहोरा या होरा)
होते है । एक-एक क्षणवारका मान ढाई-ढाई घटी
१. जैसे प्रतिपदाका भोगमान (आरम्भसे अन्ततक) ६० घड़ी है तो उस तिधिमेँ आरम्भसे ४ घडी प्रतिपदा है,
उसके बादकी ४ घड़ी द्वितीया है ओर उसके बादकी ४ घड़ी तृतीया है । इसी प्रकार आगे भी चतुर्थीं आदि सव
तिधि प्राप्त होती ह। इसी तरह द्वितीयामं भी द्वितीया आदि सव तिथियोका भोग समञ्लना चाहिये तथा क्षणतिधिमें
भी २-२ घड़ी क्षणकरणका मान समङ्ञना चाहिये । इसका प्रयोजन यह है कि जिस तिथिमें जो कार्य शुभ या अशुभ
कहा गया है, वह क्षणतिधिमें भी शुभ या अशुभ समञ्जना चाहिये । जैसे चतुर्दशीमें क्षौर कराना अशुभ कहा गया
हे तो तृतीया आदि अन्य तिधियोमे भी जव चतुर्दशी क्षणतिधिके रूपमे प्राप्त हो तो उसमें क्षौर कराना अशुभ होता
है तथा चतुर्दशीमे भी आवश्यक हो तो अन्य तिधिके भोगसमयमें क्षौर करानेमे दोष नहीं समज्ञा जायगा। विशेष
आवश्यक शुभ कार्यमं ही तिथि ओर क्षणतिधिका विचार करना चादिये।
२. इससे सिद्ध होता है कि अपने-अपने सूर्योदयकालसे देशान्तर ओर चरार्धकाल आगे या पीद्टे वारप्रवेश
हुआ करता है।
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३२९
(या १ घंटा) हेः ॥ १६६-१६७॥
( क्षणवारका प्रयोजन -- ) जिस वारमें जो
कर्म शुभ या अशुभ कहा गया है, वह उसके
क्षणवारमें भी उसी प्रकार शुभ-अशुभ समञ्जना
चाहिये ॥ १६७ > ॥
( नक्षत्राधिपति-कथन-- ) १ दस्र (अशचिनी-
कुमार), २ यम, ३ अग्रि, ४ ब्रह्मा, ५ चन्दर,
६ शिव, ७ अदिति, ८ गुरु, ९ सर्प, १० पितर,
११ भग, १२ अर्यमा, १३ सूर्य, १४ विश्वकर्मा,
१५ वायु, १६ इन्द्र ओर अग्नि, १७ पित्र, १८
इन्द्र, १९ राक्षस (नितऋति), २० जल, २१
विश्वेदेव, २२ ब्रह्मा, २३ विष्णु, २४ वसु, २५
१. दिन-रातमें होरा जाननेका चक्र-
वरुण, २६ अजैकपाद, २७ अदहिर्बुध्य ओर २८
पूषा-ये क्रमशः (अभिजित्सहित) अश्विनी
आदि २८ नक्षत्रोके स्वामी कटे गये
हे ॥ १६८- १७०॥
( नक्षत्रोके मुख-- ) पूर्वाफल्गुनी, पूर्वापाद्,
पूर्व भाद्रपद, मघा, आश्लेषा, कृत्तिका, विशाखा,
भरणी, मूल-ये नौ नक्षत्र अधोमुख (नीचे
मुखवाले) हैं । इनमें विलप्रवेश (कुआं, भूविवर
या पाताल आदिमे जाना), गणित, भूतसाधन,
लेखन, शिल्प (चित्र आदि) कला, कुओं खोदना
तथा गाडे हए धनको निकालना आदि सव कार्य
सिद्ध होते हैं ॥ १७१-१७२॥
सोम_ | मङ्गल
१ रवि सोम मङ्गल
२ शुक्र शति . रवि
३ वध गुरु शुक्र
: सोम मद्भल बुध
५ शनि रवि सोम
६ गुरु शुक्र शनि
७ मङ्गल बुध गुरु
८ रवि सोम मद्गल
९ शुक्र शनि रवि
१० बुध गुरु शुक्र
११ सोम मङ्गल बुध
१२ शनि रवि सोम
१३ गुरु शुक्र शनि
१४ मद्भल व्रुध गुरु
१५ रवि सोम मद्भल
१६ शुक्र शि रवि
१७ बुध गुरु शुक्र
१८ सोम मद्कल बुध
१९ शनि रवि सोम
२० गुर् शुक्र शनि
२१ मङ्गल व्रुध गुरु
२२ रवि सोम मद्घत
२३ शुक्र शनि रवि
रट बुध गुर शुक्र
| शानि
बुध | गुरु शुक्र 2 वन्- 1
बुध गुरु ( शनि र
सोम मङ्गल बुध गुरु
शनि रवि सोम मद्भल
गुरु शुक्र शनि रवि |
मङ्गल बुध गुरु शुक्र |
रवि सोम मङ्गल बुध |
शुक्र शनि रवि सोम
बुध गुरु शुक्र शनि
सोम मङ्गल बुध गुर
शनि रवि सोम मद्गल
गुर शुक्र शनि रवि
मद्ल ब्ध गुरु शुक्र
रवि सोम मद्गल बुध
शुक्र शनि रवि सोम
बुध | गुरु शुक्र शनि
सोम मङ्गल वुध गुर
शति रवि सोम मदत
, गुर शुक्र शनि रवि
म्ल वुध गुर शुक्र
रवि सोम मद्भल बुध
शुक्र शनि ए्वि सोम
बुध गुरु शुक्र शि
सोम मद्र बुध गुर्
| रवि सौम मद्भल
क्षणवार (हरिश) जाननेका प्रकार यह है कि जिस दिन हरिश (क्षणवार)-का विचार कगना हो, उस दिनकर
प्रथम घंटा उसी दिनका क्षणवार होता है। इसमे आगे उसये छटै-छटे दिनका क्षणवार समञ्ञे। जैसे रविवारमं
वारप्रवेश-कालसे पहला घंटा रविका, दूसरा घंटा रवि छट शुक्रका, तीसरा वंटा शुक्रसे छठे बुधका इत्यादि क्रमं
ऊपर चक्रमं देखिये।
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३३०
अनुराधा, मृगशिरा, चित्रा, हस्त, ज्येष्ठा, पुनर्वसु,
रेवती, अश्विनी ओर स्वाती-ये नौ नक्षत्र तिर्यक्
(सामने) मुखवाले हे। इनमे हल जोतना, यात्रा
करना, गाडी बनाना, पत्र लिखकर भेजना, हाथी, ऊट
आदिको सवारी करना, गदहे, वेल आदिसे चलनेवाले
रथ बनाना, नौकापर चलना तथा भैस, घोडे आदि-
सम्बन्धी कार्य करने चाहिये ॥ १७३-१७४॥
रोहिणी, श्रवण, आद्रा, पुष्य, शतभिषा, धनिष्ठा,
उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषादढ तथा उत्तर भाद्रपद्-ये नौ
नक्षत्र ऊर्ध्वमुख (ऊपर मुखवाले) कहे गये हे।
इनमे राज्याभिषेक, मङ्गल (विवाहादि) -कार्य,
गजारोहण, ध्वजारोपण, मन्दिर-निर्माण, तोरण (फाटक)
बनाना, बगीचे लगाना ओर चहारदीवारी बनवाना
आदि कार्य सिद्ध होते हं ॥ १७५- १७६ ॥
( नक्षत्रोको धुवादि संज्ञा- ) रोहिणी, उत्तरा
फाल्गुनी, उत्तरापाढ् ओर उत्तर भाद्रपद--ये ध्रुवनामक
नक्षत्र हे । हस्त, अश्चिनी ओर पुष्य-ये क्षिप्रसंज्ञक
हे । विशाखा ओर कृत्तिका-ये दोनों साधारणसंज्ञक
हे । धनिष्ठा, पुनर्वसु, शतभिषा, स्वाती ओर श्रवण-ये
चरसंस्क हे । मृगशिरा, अनुराधा, चित्रा तथा रवती- ये
मृदुनामक नक्षत्र हें । पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वापाद्, पूर्व
भाद्रपद ओर भरणी-ये उग्रसं्ञक नक्षत्र हे। मूल,
आद्रा, आश्लेषा ओर ज्येष्टा-ये तीक्ष्णनामक नक्षत्र
हें । ये सब अपने नामके अनुसार ही फल देते हे
(इसलिये इन नक्षत्रे इनके नामके अनुरूप ही
कार्य करने चाहिये) ॥ १७७-१७८ -्॥
( कण्वेध-पुहूर्त-- ) चित्रा, पुनर्वसु, श्रवण, हस्त,
रेवती, अधिनी, अनुराधा, धनिष्ठा, मृगशिरा ओर
पुष्य--इन नक्षत्रोमं कर्णवेध हितकर हाता हे ।
` (हाथी ओर घोडे सम्बन्धी कार्य-)
अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा
ओर स्वाती-इनमें तथा स्थिरसंजक नक्षत्रोमे
हाथीसम्बन्धी सव कृत्य करने चाहिये; तथा
संक्षिप्त नारदपुराण
इन्हीं नक्षत्र मे घोडेके भी सब कृत्य शुभ होते
है; किंतु रविवारको इन कृत्यका त्याग कर
देना चाहिये ॥ १७९-१८१॥
( अन्य पशुकृत्य-- ) चित्रा, शतभिषा, रोहिणी
तथा तीनों उत्तरा-इन नक्षत्रोमें पशुओंको कींसे
लाना या ले जाना शुभ है। परंतु अमावास्या,
अष्टमी ओर चतुर्दशीको कदापि पशुओंका कोई
कृत्य नहीं करना चाहिये ॥ १८२॥
( प्रथम हलप्रवाह-हल जोतना-- ) मृदु,
धुव, क्षिप्र ओर चरसं्ञक नक्षत्र, विशाखा, मघा
ओर मूल-इन नक्षत्रोमें वेलोद्रारा प्रथम वार हल
जोतना शुभ होता हे । सूर्य जिस नक्षत्रे हो, उससे
पिछले नक्षत्रसे तीन नक्षत्र हलके आदि (मूल) -
मे रहते हं । इनमें प्रथम वार हल जोतने-जुतानेसे
वैलका नाश होता है। उसके आगे तीन नक्षत्र
हलके अग्रभागमें रहते हे । इनमें हल जोतनेसे
वृद्धि होती है । उससे आगेके पोच नक्षत्र उत्तर
पार्श्वम रहते हं, इनमें लक्ष्मीप्रा्ि होती है । तीन
शृलोमे नौ नक्षत्र रहते ह; इनमें हल जोतनेसे
कृपककी मृत्यु होती है। उससे आगे पोच
नक्षत्रोमें सम्पत्तिकी वृद्धि होती है; फिर उससे
आगेके तीन नक्षत्रोमें प्रथम बार हल जोतनेसे श्रेष्ठ
फल प्राप्त होते दै ॥ १८३- १८५ ॥
( बीज-वपन-- ) मृदु, ध्रुव ओर क्िप्रसं्ञक
नक्षत्र, मघा, स्वाती, धनिष्ठा ओर मूल-इनमें
धान्यके बीज वोना श्रेष्ठ होता हे। इस बीज-
वपनमे राहु जिस नक्षत्रम हो, उससे तीन नक्षत्र
लाद्गल- चक्रके अग्रभागमें रहते हं । इन तीनों
वबीज-वपनसे धान्यका नाश होता है। उससे
आगेके तीन नक्षत्र गलेमें रहते ह, उनमें बीज-
वपनसे जलकी अल्पता होती है। उससे अगेके बारह
नक्षत्रे उदरमं रहते टै, उनमं बीज वोनेमे धान्यकौ
वृद्धि हाती दे। उससे अनेके चार नक्षत्र लाद्भलमं
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
रहते हँ, इनमें निस्तण्डुलत्व होता है (अर्थात्
धानमें दाने नहीं लगते, केवल भूसीमात्र रह जाती
हे) । उससे अगेके पाँच नक्षत्र नाभिमें रहते हैँ
इनमें प्रथम बीज-वपनसे अग्रिभय प्राप्त होता है।
इस चक्रका विचार बीज-वपनमें अवश्य करना
चाहिये ॥ १८६- १८८ ॥
( रोगविमुक्तका स्नान-- ) स्थिरसं्ञक, पुनर्वसु,
आश्लेषा, रेवती, मघा ओर स्वाती-इन नक्षत्रे
तथा सोम ओर शुक्रके दिन रोगमुक्त पुरुषको
पहले-पहल स्नान नहीं करना चाहिये ॥ १८९ ॥
( नृत्यारम्भ-- ) उत्तराफल्गुनी, उत्तराद्, उत्तर
भाद्रपद, अनुराधा, ज्येष्ठा, धनिष्ठा, शतभिषा, पुष्य,
हस्त ओर रेवती-इन नक्षत्रोमें नृत्यारम्भ (नास्य-
विद्याका प्रारम्भ) उत्तम कहा गया दहै ॥ १९०॥
रेवतीसे छः नक्षत्र पूरवार्धयोगी, आद्रासि वारह
नक्षत्र मध्ययोगी ओर धनिष्ठासे नौ नक्षत्र परार्धयोगी
है । इनमेंसे पूर्वयोगीमे यदि वर ओर कन्या-दोनोकि
नक्षत्र पडते हों तो स्त्रीका स्वामीमें अधिक प्रेम
होता है। मध्ययोगीमें हों तो दोनोमें परस्पर
समान प्रेम होता है ओर परार्धयोगीमें दोनोके
नक्षत्र हों तो स्त्रीमें पतिका अधिक प्रेम होता
है ॥ १९१ - ॥
( वृहत्, सम ओर अधम नक्षत्र-- ) शतभिषा,
आद्रा, आश्लेषा, स्वाती, भरणी ओर च्येष्ठा-ये
छः नक्षत्र जघन्य (अधम) कहे गये है । ध्रुवसंज्ञक,
पुनर्वसु ओर विशाखा-ये नक्षत्र वृहत् (रेष्ठ)
कहलाते हैँ तथा अन्य नक्षत्र समसं्ञक हं । इनका
विंशोपक मान क्रमशः ३०, ९० ओर ६० घडी
कहा गया है ॥१९२-१९३ ॥ यदि द्वितीया तिथिको
३२३१
वृहत्सं्क नक्षत्रम चन्द्रोदय हो तो अन्नका भाव
सस्ता होता है। समसंज्ञक नक्षत्रम चन्द्रदर्शन हो
तो अन्नादिके भावमं समता होती है ओर जघन्यसंञ्ञक
नक्षत्रम चन्द्रोदय हो तो उस महीनेमें अन्नका भाव
महंगा हो जाता है ॥ १९३ - ॥
( यात्रा करनेवालेको जय तथा पराजय देनेवाले
नक्षत्र-- ) अश्चिनी, कृत्तिका, मृगशिरा, पुष्य,
मूल, चित्रा, श्रवण, तीनों उत्तरा, पूर्वाफल्गुनी,
मघा, विशाखा, धनिष्ठा --इतने नक्षत्र कुलसंजक
हें । रोहिणी, ज्येष्ठा, पुनर्वसु, स्वाती, रेवती, हस्त,
अनुराधा, पूर्वं भाद्रपद, भरणी ओर आश्लेषा--ये
नक्षत्र अकुलसंक हैं । शेष नक्षत्र कुलाकुलसंजक
है । इनमें कुलसंसक नक्षत्रम विजयको इच्छासे
यात्रा करनेवाले राजाको पराजय होती हे । अकुलसंञ्चक
नक्षत्रोमें यात्रा करनेसे वह निश्चय ही शत्रुपर
विजय प्राप्त करता है ओर कुलाकुलसंसक नक्षत्रम
युद्धार्थं यात्रा करनेपर शत्रुओंके साथ सन्धि होती
है । अथवा यदि युद्ध हुआ तो भी दोनोमं समानता
सिद्ध होती है (किसी एक पक्षकी हार या जीतं
नहीं होती ) ॥ १९४- १९७३ ॥
( त्रिपुष्कर, द्विपुष्कर योग-- ) रवि, शनि या
मद्भलवारमें भद्रा, (२, ७, १२) तिथि तथा विषम
चरणवाले नक्षत्र (कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी,
विशाखा, उत्तरापाद् ओर पूर्वं भाद्रपद) हों तो
(इन तीनोके संयोगसे) , त्रिपुष्कर' नामक योगं
होता हे! तथा उन्हीं रवि, शनि ओर मद्धलवार्
एवं भद्रा तिधियोमें दो चरणवाले नक्षत्र ( मृगशिरा,
चित्रा ओर धनिष्ठा) हों तो 'द्विपुष्कर' योग होता
हे। त्रिपुष्करयोग त्रिगुणित (तीन गुने) ओर
ए क क की ` प म गि र र त स म स
१. वास्तवमें किसी भी नक्षत्रका ५६ चटीसे कम ओर ६६ घटीसे अधिक काल-मान नहीं होता । यहा जो ' वृहत्"
संज्ञक नक्षत्रोका ९० घटी (४५ मुहूर्त), समसंज्ञक नक्षघ्रोका ६० घटी (३० मुहूर्तं) ओर जघन्यसंजक नक्षत्रोका
३० घटी (१५ मुहूर्त) समय यताया गया टै, वह क्रमणः सस्ती, समता ओर मर्हेणीका सृचक है ।
२-३.
अन्य संहितामें चनिष्ठा नक्षत्र अकुलगणमें, ज्येष्टा कुलगणमें रीर मृल कुलाकुलगणमं लिया णया टै।
((-0. 1/८1111(4<511॥ 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0\ 68110011
३२३२
द्विपुष्करयोग द्विगुणित (दुगुने) लाभ ओर हानिको
देनेवाले है । अतः इनमें किसी वस्तुको हानि हो
तो उस दोषकी शान्तिके लिये तीन गोदान या
तीन गौओंका मूल्य तथा द्विपुष्कर दोषकौ
शान्तिके लिये दो गोदान या दो गौओंका मूल्य
ब्राह्मणोंको देना चाहिये । इससे उक्त (तिथि,
वार ओर) नक्षत्र-सम्बन्धी दोषका निवारण हो
जाता है॥ १९८-१९ ~ ॥
( पुष्य नक्षत्रकी प्रशंसा- ) पापग्रहसे विद्ध या
युक्त होनेपर भी पुष्य नक्षत्र बलवान् होता है ओर
विवाह छोड़कर वह सब शुभ कर्ममिं अभीष्ट फल
देनेवाला है ॥ २०३ ॥
( नक्षत्रम योग-ताराओंकी संख्या- ) अश्विनी
आदि (अभिजित्सहित) अद्राईस नक्षत्रोमें क्रमशः
२, द २९ ४२/1५, ५ ९
११४८ २,९९ ९,,२; २४, २००, ९,
२ ओर ३२ योगताराएं होती है । अपने-अपने
आकाशीय विभागम्े जो अनेक ताराओंका पुञ्ज
होता हे, उसमे जो अत्यन्त उदीप्त (चमकोली)
ताराएं दीख पड़ती हैँ, वे ही योगताराएं कहलाती
हे ॥ २०१-२०३॥
( नक्षत्रोसे वृक्षोव्छी उत्यत्ति-- ) जितने भी वृष
अर्थात् श्रेष्ठ वृक्ष हँ उनको उत्पत्ति अश्चिनीसे हई
है । भरणीसे यमक ८ जुडे हुए दो) वृक्ष, कृत्तिकासे
उदुम्बर (गूलर), रोहिणीसे जामुन, मृगशिरासे
खैर, आद्रसि काली पाकर, पुनर्वसुसे बांस, पुष्यसे
पीपल, आश्लेषासे नागकेसर, मघासे बरगद, पूर्वा-
फाल्गुनीसे पलाश, उत्तराफाल्गुनीसे रुद्राक्षका वृक्ष,
हस्तसे अरिष्ट (रीटखीका वृक्ष), चित्रासे श्रीवृक्ष
(बेल), स्वातीसे अर्जुन वृक्ष, विशाखासे विकङ्कत
(जिसकी लकडीसे कलछियां बनती ह), अनुराधासे
बकुल (मौलश्री), ज्येष्ठासे विष्टिवृक्ष, मूलसे सर्ज
(शालका वृक्ष), पूर्वाषाढसे वञ्जल (अशोक),
संक्षिप्त नारदपुराण
उत्तराषादढसे कटहल, श्रवणसे आक, धनिष्टसे शमीवृक्ष,
शतभिषासे कदम्ब, पूर्व भाद्रपदसे आग्रवृक्ष, उत्तर
भाद्रपदसे पिचुमन्द (नीमका पेड) तथा रेवतीसे
महुआकी उत्पत्ति हुई हे। इस प्रकार ये नक्षत्रसम्बन्धी
वृक्ष कहे गये हें ॥ २०४-२१०॥
जब जिस नक्षत्रम शनैश्चर विद्यमान हो, उस
समय उस नक्षत्र-सम्बन्धी वृक्षका यतपूर्वक पूजन
करना चाहिये ॥ २११ २ ॥
( योगोके स्वामी-- ) यम, विश्वेदेव, चन्द्र,
ब्रह्मा, गुरु, चन्द्र, इन्द्र, जल, सर्प, अग्रि, सूर्य, भूमि,
रुद्र, ब्रह्मा, वरुण, गणेश, रुद्र, कुबेर, विश्वकर्मा,
मित्र, षडानन, सावित्री, कमला, गौरी, अशिनीकुमार,
पितर ओर अदिति-ये क्रमशः विष्कम्भ आदि
सत्ताईस योगोके स्वामी है ॥ २१२३ ॥
( निन्य योग-- ) वैधृति ओर व्यतीपात-ये
दोनों महापात हैँ, इन दोनोंको शुभ का्येमिं सदा
त्याग देना चाहिये। परिघ योगका पूर्वार्धं ओर
वच्रयोगके आरम्भको तीन घडि्यां, गण्ड ओर
अतिगण्डको छः घडी, व्याघात योगको ९ धड़
ओर शूल योगकी ५ घड़ी सब शुभ कार्योमिं
निन्दित है।
( खार्जूरचक्र-- ) इन नौ निन्द्य योगों (वेधृति,
व्यतीपात, परिघ, विष्कम्भ, वज्र, गण्ड, अतिगण्ड,
व्याघात ओर शूल) -में क्रमशः पुनर्वसु, मृगशिरा,
मघा, आश्लेषा, अश्चिनी, मूल, अनुराधा, पुष्य
ओर चित्रा-ये नौ मूर्धा (मस्तक) -के नक्षत्र माने
गये हैँ । एक ऊर्ध्वरेखा लिखे, फिर उसके उपर
तेरह तिरी रेखा अङ्कित करे । यह ‹ खार्जूस्चक्र'
कहलाता है। इस चक्रमे ऊपर कहे हए निन्य
योगो उनके मूर्धगत नक्षत्रको रेखाके मस्तकके
ऊपर लिखकर क्रमशः २८ नक्षत्रोको लिखे । इसमें
यदि सूर्य ओर चन्द्रमा एक रेखामें विभिन्न भागमें
पड तो उन दोनोंका परस्परका दृष्टिपात *एकार्गल'
(-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661011. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
दोष कहलाता है, जो शुभकार्यमें त्याज्य है, परतु
यदि सूर्यं ओर चनद्रमामें कोई एक अभिजिते हो
तो वेध-दोष नहीं होता हे ॥ २१२३- २१७ ९ ॥
( प्रत्येक योगमें अन्तर्भोग-- ) १२ पलरहित
२ घडीके मानसे एक-एक योगमें सत्ताईस योग
बीतते हें ॥ २१८२ ॥
( करणके स्वामी ओर शुभाशुभ-विभाग-- )
इन्द्र, ब्रह्मा, मित्र, विश्वकर्मा, भूमि, हरितप्रिया
(लक्ष्मी), कीनाश (यम), कलि, रुद्र, सर्पं तथा
मरुत्-ये ग्यारह देवता, क्रमशः बव आदि (बव,
बालव, कोलव, तेतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि,
चतुष्पद, नाग ओर किंस्तुघ्र-इन) ग्यारह करणेकि
स्वामी हें । इनमें ववसे लेकर छः करण शुभ होते
है । किंतु “ विष्टि" नामक करण क्रमसे आया हो या
विपरीतक्रमसे, किसी भी दशामे वह मङ्गलकार्यमे
शुभ नहीं हे ॥ २१९-२२० ३ ॥
( विष्टिके अङ्खोमे घटी ओर फल-- ) विष्टिके
मुखमें पांच घटी, गलेमे एक, हदयमें ग्यारह,
नाभिमें चार, करिमें छः ओर पुच्छमे तीन
घडियाँ होती हैं । मुखकी घडियोमें कार्य आरम्भ
करनेसे कार्यकौ हानि होती है। गलेको घड्में
मृत्यु, हदयको घड्ीमें निर्धनता, करिकौ घड़ीमें
उन्मत्तता, नाभिको घड़ीमें पतन तथा पुच्छकी
घडीमें कार्य करनेसे निश्चय ही विजय (सिद्धि)
प्राप्त होती है। भद्रके बाद जो चार स्थिर
करण हैँ, वे मध्यम है, विशेषतः नाग ओर
चतुष्पद् ॥ २२१९- २२३ ॥
( मुहूर्त-कथन-- ) दिनम क्रमशः रुद्र, सर्पं,
मित्र, पितर, वसु, जल, विश्वेदेव, विधि (अभिजित्),
ब्रह्या, इन्द्र, इन्द्राग्रि, राक्षस, वरुण, अर्यमा ओर
२३३
भग-ये पंद्रह मुहूर्तं जानने चाहिये । रात्रिम शिव,
अजपाद, अहिर्बुध्य, पूषा, अधिनीकुमार, यम
अग्रि, ब्रह्मा, चन्द्रमा, अदिति, वृहस्पति, विष्णु,
सूर्य, विश्वकर्मा ओर वायु-ये क्रमशः पंद्रह मुहूर्त
व्यतीत होते हे । दिनमानका पंद्रह भाग दिनके
मुहूर्तका मान हे ओर रात्रिमानका पंद्रह्वं भाग रात्रिके
मुहूर्तका मान समङ्जना चाहिये; इनसे दिन तथा रात्िमं
क्षण-नक्षत्रका विचार करे* ॥ २२४- २२६ ३ ॥
( वारोमें निन्द्य मुहूर्त-- ) रविवारको अर्यमा,
सोमवारको ब्राह्म तथा राक्षस, मङ्गलवारको पितर
ओर अग्रि, बुधवारको अभिजित् , गुरुवारको राक्षस
ओर जल, शुक्रवारको त्राह्य ओर पितर तथा शनिवारको
शिव ओर सर्पं मुहूर्तं निन्द्य माने गये है; इसलिये
इन्हें शुभ कार्येपिं त्याग देना चाहिये ॥ २२७-२२८॥
( महूर्तका विशेष प्रयोजन-- ) जिस-जिस
नक्षत्रम यात्रा आदि जो-जो कर्म शुभया अशुभ
कहे गये ठै; वे कार्य उस-उस नक्षत्रके स्वामीके
मुहूर्तमिं भी शुभ या अशुभ होते है । एसा समञ्जकर
उस मुहूर्ते सदा वैसे कार्य करने या त्याग देने
चाहिये ॥ २२९॥
( भूकम्पादि संज्ञाओंसे युक्त नक्षत्र-- ) मूर्यं
जिस नक्षत्रमे हो, उससे सातवें नक्षत्रको भूकम्प,
पाँचवेंकी विद्युत्, आठवेंकी शूल, दसर्वेको अशनि,
अटारहवेंकी केतु, प॑द्रह्वेकी दण्ड, उन्नीसर्वेको
उल्का, चौदहवेकी निर्घातपात, इक्षीसर्वेको मोह,
वाईसवेको निर्घात, तेईसवेकी कम्प, चौवीसर्वेकी
कुलिश तथा पचीसर्वेकी परिवेष संज्ञा समञ्चनी
चाहिये; इन संज्ञाओसि युक्त चन्द्र-नक्षत्रोमं शुभ
कर्म नहीं करने चाहिये ॥ २३०-२३२ ३ ॥
सूर्यके नक्षत्रसे आश्लेषा, मधा, चित्रा, अनुराधा,
१. उदाहरण- जिस समय ब्र्याका मुहूर्तं हो, उस समय उसीका क्षण-नक्षत्र होता है । जैसे-दिनमें न्वा मुदूर्त
ब्रह्माका है ओर दिनमान ३० घडीका है तो १६ घड़ीके बाद १८ घडीतक ब्रह्माजीके ही नक्षत्र (रेदिणी) -को क्षण-
नक्षत्र समञ्जना चाहिये । इसलिये दिनमें नवम मुहूर्तं "ब्राह्म" या रौहिण" कटलाता टै, जौ श्राद्धमे श्रेष्ठ माना गया &।
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
३२४
संक्षिप्त नारदपुराण
रेवती तथा श्रवणतक्को जितनी संख्या हो, उतनी
ही यदि अश्चिनीसे चन्द्र-नक्षत्रतकको संख्या हो
तो उसपर दुष्टयोगक्ा सम्पात अर्थात् रुद्रके प्रचण्ड
अस्त्रका प्रहार होता है। अतः उसका नाम
` चण्डीशचण्डायुध' योग है । उसमें शुभ कर्म नहीं
करना चाहिये ॥ २३३२-२३४ ९ ॥
( क्रकचयोग-- ) प्रतिपदादि तिथिकी तथा
रवि आदि वारको संख्या मिलानेसे यदि १३ हो
तो वह क्रक्चयोग होता हे जो शुभ कार्यमें
अत्यन्त निन्दित माना गया हे ॥ २३५ - ॥
( संवर्तयोग-- > रविवारको सप्तमी ओर बुधवारको
प्रतिपदा हो तो ` संवर्तयोग' जानना चाहिये। यह
शुभ कार्यको नष्ट करनेवाला हे ॥ २३६ 5 ॥
( आनन्दादि योग- ) १ आनन्द, २ कालदण्डः
र धूम्र, ४ धाता, ५ सुधाकर (सोम्य), £ ध्वाङ्क्ष,
७ केतु, ८ श्रीवत्स, ९ वज्र, १० मुद्रर, ११ छत्र, १२
मित्र, १२३ मानस, १४ पद्य, १५ लुम्ब, १६ उत्पात,
१७ मृत्यु, १८ काण, १९ सिद्धि, २० शुभ, २१
अमृत, २२ मुसल, २३ अन्तक (गद), २४ कुञ्जर
(मातङ्ग), २५ राक्षस्र, २६ चर, २७ सुस्थिर ओर २८
वर्धमान-ये क्रमश पठित २८ योग अपने-अपने
नामके समान ही फ़ल देनेवाले कहे गये हें।
( इन योगोंको जाननेकी रीति- ) रविवारको
अश्चिनी नक्षत्रसे, सोमवारको मृगशिरासे,
मङ्गलवारको आश्लेषासे, बुधवारको हस्तसे,
गुरुवारको अनुराधासे, शुक्रवारको उत्तराषाढसे
ओर शनिवारको -शतभिपासे आरम्भ करके उस
दिनके नक्षत्रतक गणना करनेपर जो संख्या हो, उसी
संख्यावाला योग उस दिन होगाः ॥ २३७-२४१॥
( सिद्धियोग-- ) रविवारको हस्त, सोमवारको
मृगशिरा, मद्गलवारको अधिनी, बुधवारको अनुराधा,
बृहस्पतिवारको पुष्य, शुक्रवारको रेवती ओर शनिवारको
रोहिणी हो तो सिद्धियोग होता है ॥ २४२ ‡॥
रवि ओर मङ्गलवारको नन्दा (१।६। ११),
शुक्र ओर सोमवारको भद्रा (२। ७। १२),
बुधवारको जया (३। ८। १३), गुरुवारको रिक्ता
(४।९। १४) ओर शनिवारको पूर्णा (५। १०। १५)
हो तो मृत्युयोगः होता है । अतः इसमें शुभ कर्म
न करे ॥ २४३ र ॥
(सिद्धयोग-- ) शुक्रवारको नन्दा, बुधवारको भद्रा,
मङ्गलवास्को जया, शनिवारको र्का ओर गुरुवारको पूर्णा
तिथि हो तो “सिद्धयोग" कहा गया है॥ २४ र ॥
( दग्धयोग-- ) सोमवारको एकादशी, गुरुवारको
षष्ठी, बुधवारको तृतीया, शुक्रवारको अष्टमी, शनिवारको
नवमी तथा मङ्गलवारको पञ्चमी तिथि हो तो
` दग्धयोग ' कहा गया हे ॥ २४५-२४६ ॥
( ग्रहोके जन्मनक्षत्र-- ) रविवारको भरणी,
सोमवारको चित्रा, मङ्गलवारको उत्तराषाढ, बुधवारको
धनिष्ठा, गुरुवारको उत्तराफाल्गुनी, शुक्रवारको ज्येष्ठा
ओर शनिवारको रेवती-ये क्रमशः सूर्यादि ग्रहोके
जन्मनक्षत्र होनेके कारण शुभ कार्यके विनाशक
होते हें ॥ २४७ : ॥
यदि रवि आदि वामं विशाखा आदि चार-चार
नक्षत्र हों अर्थात् रविवास्को विशाखासे, सोमको पूर्वाषाद्से,
मङ्गलको धनिष्से, बुधको खतीसे, गुर्वारको रहिणीसे,
शुक्रको पुष्यसे ओर शनिको उत्तरा फाल्गुनीसे चार-
चार नक्षत्र हों तो क्रमशः उत्पात, मृत्यु, काण तथा
सिद्ध नामक योग कटे गये है ॥ २४८ ३॥
१. संक्षिप्त उदाहरण- जसे रविवारको अश्विनी हो तो आनन्द, भरणी हो तो कालदण्ड इत्यादि। सोमवारको
मृगशिरा हो तो आनन्द, आद्रा हो तो कालदण्ड। एसे ही मङ्गलादि वारोमें कथित आश्लेषादिसे गिनकर योगोँका
निश्चय करना चाहिये!
२. अन्य संहिताञ्ओोमं इसका नाम मृत्युयोग आया है, इसलिये वैसा लिखा गया है । मूलमें कोई संज्ञा न देकर
इन्हें अशुभ वताया है ओर इनमें शुभ कर्मको त्याज्य कहा है।
((-0. 1/८1114<511॥ 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
३३५५
( परिहार-- ) ये जो ऊपर तिथि ओर वारके | ७ घोड़ा, ८ कृत्ता, ९ बकरा, १० वैल ओर ११
संयोगसे तथा वार ओर नक्षत्रके संयोगसे अनिष्टकारक
योग बताये गये है, वे सब हूणेकि देश-भारतके
पश्चिमोत्तर-भागमे, बंगालमें ओर नेपाल देशमें ही त्याज्य
हें । अन्य दशेमे ये अत्यन्त शुभप्रद हें ॥ २४९ ~ ॥
( सूर्यसंक्रान्तिकिथन-- ) रवि आदि वारोमें
सूर्यको संक्रान्ति होनेपर क्रमशः घोरा, ध्वांक्षी,
महोदरी, मन्दा, मन्दाकिनी, मिश्रा तथा राक्षसी-ये
संक्रान्तिके नाम होते है । उक्त घोरा आदि संक्रान्तियों
क्रमशः शूद्र, चोर, वैश्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय, गौ
आदि पशु तथा चारों वर्णसि अतिरिक्त मनुष्योको
सुख देनेवाली होती हं । यदि सूर्यकी संक्रान्ति
पूर्वाह्नमें हो तो वह क्षत्रियोको हानि पहुंचाती हे ।
मध्याहमे हो तो ब्राह्मणोको, अपराह्नमें हो तो
वेश्योको, सूर्यास्त-समयमें हो तो श्रोको, रात्रिके
प्रथम प्रहरमें हो तो पिशाचोंको, द्वितीय प्रहरमें हो
तो निशाचरोको, तृतीय प्रहरमें हो तो नाय्यकारोको,
चतुर्थ प्रहरमें हो तो गोपालकोंको ओर सूर्योदय-
समयमे हो तो लिरङ्गधारियों (वेशधारी बहुरूपियो
पाखण्डियों अथवा आश्रम या सम्प्रदायके चह धारण
करनेवाला) को हानि पर्हुचाती है ॥ २५०-२५३ २ ॥
यदि सूर्यको मेष-संक्रान्ति दिनमें हो तो
संसारमें अनर्थं ओर कलह पैदा करनेवाली हे।
रात्रिमे मेष-संक्रान्ति हो तो अनुपम सुख ओर
सुभिक्ष होता है तथा दोनों संध्याओंके समय हो
तो वह वृष्टिका नाश करनेवाली है ॥ २५४ ; ॥
( करण-संक्ऋन्तिविश सूर्यके वाहन-भोजनादि- )
बव आदि ग्यारह करणोमं संक्रान्ति होनेपर क्रमशः १
सिंह, २ वाघ, ३ सूअर, ४ गदहा, ५ हाथी, ६ भसा,
१. नीचे चक्रमे स्पष्ट देखिये-
उत्तरा फाल्गुनी
हस्त
चित्रा
पुनर्वसु | पूर्वां फाल्गुनी स्वाती
मुर्गा- ये सूर्यके वाहन होते ह तथा १ भुशुण्डी, २
गदा, ३ तलवार, ४ लाटी, ५ धनुष, ६ वरी, ७
कुन्त (भाला), ८ पाश, ९ अङ्कुश, १० अस्त्र (जो
फेका जाता हे) ओर ११ बाण-इन्हं क्रमशः सूर्यदेव
अपने हाथोमें धारण करते है। १ अन्न, २ खीर, ३
भिक्षान्न, ४ पकवान, ५ दूध, ६ दही, ७ मिठाई, ८
गुड़, ९ मधु, १० घृत ओर ११ चीनी-ये वव
आदिको संक्रान्तिमं क्रमशः भगवान् सूर्यके हविष्य
(भोजन) होते हे ॥ २५५- २५७ < ॥
( सूर्यको स्थिति-- ) वव, वणिज, विष्टि,
वालव ओर गर-इन कारणोमें सूर्यं वैठे हुए,
कोलव, शकुनि ओर किर्तुघ्र--इन करणोपें खडे
हए तथा चतुष्पद, तेतिल ओर नाग-इन तीन
करणोमें सोते हए, संक्रान्ति करते (एक राशिसे
दूसरी राशिमें जाते) हों तो इन तीनों अवस्थाओंकी
संक्रान्तिमे प्रजाको क्रमशः धर्म, आयु ओर वषकि
विषयमे समान, श्रेष्ट ओर अनिष्ट फल प्राप्त होते
हें तथा ऊपर कहे हए अस्त्र, वाहन ओर भोजन
तथा उससे आजीविका या व्यवहार करनेवाले
मनुप्यादि प्राणियोका अनिष्ट होता है एवं जिस
प्रकार सोये, वैदे, खडे हए संक्रान्ति होती ह
उसी प्रकार सोये, वैठे ओर खड हुए प्राणियोंका
अनिष्ट होता दै ॥ २५८-२६० ई ॥
नक्चत्रोकी अन्धाक्षादि संज्ञा रोहिणी नक्षत्रसे
आरम्भ करके चार-चार नक्षत्रोको क्रमशः अन्ध,
मन्दनेत्र, मध्यनेत्र ओर सुलोचन माने ओर पुनः
आगे इसी क्रमसे सूर्यके नक्षत्रतक गिनकर न्षत्रोको
अन्ध आदि चार संज्ञां समञ्चेः।
पूर्वाषाद धनिष्ठा | रती
उत्तरापाद् | शतभिषा | भश्चिनी
अभिजित् | पूर्वं भाद्रपद | भरणी
क्ण | उत्त भाद्रपद | कृतिका ,
जनो ऋ आदि कयः तः चज ओ कनके क `> +कः ॐ ॥ 1
विशाखा
अनुराधा
ज्येष्ठा
मूल
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 81188 81811851 (01661010. 01411260 0 6810011
३३६
( संक्रान्तिकी विशेष संज्ञा- ) स्थिर राशियां
(वृष, सिंह, वृ्िक ओर कुम्भ) -में सूर्यको
संक्रान्तिका नाम ' विष्णुपदी ', द्विस्वभाव राशियों
(मिथुन, कन्या, धनु ओर मीन) -में ' षडशीतिमुखा",
तुला ओर मेषमें “ विषुव" (विषुवत्), मकरमं
'सोम्यायन' ओर कर्कमें ' याम्यायन' संज्ञा होती
है ॥ २६१-२६३ २ ॥
( पुण्यकाल-- ) याम्यायन ओर स्थिर राशियोकी
(विष्णुपद) संक्रान्तिमे संक्रान्तिकालसे पूर्वं १६
घडी, द्विस्वभाव राशियोंकी षडशीतिमुखा ओर
सौम्यायन-संक्रान्तिमे संक्रान्तिकालके पश्चात् १६
घड़ी तथा विषुवत् (मेष, तुला) संक्रान्तिमे मध्य
(संक्रान्ति-कालसे ८ पूर्वं ओर ८ पश्चात्)-कौ
१६ घड़ीका समय पुण्यदायक होता हे ॥ २६४॥
सूर्योदयसे पूर्वको तीन घड़ी प्रातः-संध्या तथा
सूयस्तिके बादकी तीन घड़ी सायं-संध्या कहलाती
है। यदि सायं-सध्यामें याम्यायन या सौम्यायन
कोई संक्रान्ति हो तो पूर्वं दिनमें ओर प्रातः-
संध्यामें संक्रान्ति हो तो पर दिनमें सूर्योदयके बाद
पुण्यकाल होता हे ॥ २६५ ॥
जव सूर्यकी संक्रान्ति होती है, उस समय
प्रत्येक मनुष्यके लिये जेसा शुभ या अशुभ चन्द्रमा
होता है, उसीके अनुसार इस महीनेमें मनुष्योको
चन््रमाका शुभ या अशुभ फल प्राप्त होता है ॥ २६६ ॥
किसी संक्रान्तिके चाद सूर्य जितने अंश भोगकर
उस संक्रान्तिकि नागे अयनसंक्रान्ति करे, उतने
समयतक संक्रान्ति या ग्रहणका जो नक्षत्र हो, वह
संक्षिप्त नारदपुराण
तथा उसके आगे-पीरेवाले दोनों नक्षत्र उपनयन
ओर विवाहादि शुभ कार्योमिं अशुभ होते है।
संक्रान्ति या ग्रहणजनित अनिष्ट फलों (दोषों) -
को शान्तिकि लिये तिलोंकौ देरीपर तीन
त्रिशूलवाला त्रिकोण-चक्र लिखे ओर उसपर
यथाशक्ति सुवर्ण रखकर ब्राह्मणोंको दान
दे ॥ २६७- २६९ ॥
( ग्रह-गोचर-- ) ताराके बलसे चन्द्रमा बली
होता है ओर चनद्रमाके बली होनेपर सूर्य बली हो
जाता है तथा संक्रमणकारी सूर्यके बली होनेसे
अन्य सब ग्रह भी बली समञ्च जाते हें ॥ २७०॥
मुनी श्र! अपनी जन्मराशियोंसे ३, ११, १०,
६ स्थानमें सूर्यं शुभ होता है; परंतु यदि क्रमशः
जन्मराशिसे ही ९, ५, ४ तथा १२ वें स्थानमें
स्थित शनिके अतिरिक्त अन्य ग्रहोँसे वह विद्ध न
हो तभी शुभ होता है२। इसी प्रकार चन्द्रमा
जन्मराशिसे ७, ६, ११, १, १० तथा ३ में शुभ
होते ह; यदि क्रमशः २, १२, ८, ५, ४ ओर ९
वेमे स्थित बुधसे भिन्न ग्रहोसे विद्ध न हों । मङ्गल
जन्मराशिसे ३, १९, ६ में शुभ हँ; यदि क्रमशः
१२, ५ तथा ९ वें स्थानमें स्थित अन्य ग्रहसे विद्ध
न हों । शनि भी अपनी जन्मराशिसे इन्हीं ३, १९,
६ स्थानोमें शुभ है; यदि क्रमशः १२, ५ ९
स्थानोमें स्थित सूर्यके सिवा अन्य ग्रहोँसे विद्ध न
हों । बुध अपनी जन्मराशिसे २, ४, ६, ८, १०
ओर ११ स्थानोमें शुभ हों; यदि क्रमशः ५, ३,
९, १, ८ ओर १२ स्थानें स्थित चन्द्रमाके सिवा
१. भाव यह है कि तारा ओर ग्रहके बलको देखकर किसी कार्यको आरम्भ करनेका आदेश है । यदि अपनी
तारा बलवती हो तो निर्बल चन्द्रमा भी बली माना जाता है तथा रविशुद्धि-विचारसे यदि अपने चन्द्रमा बली हों
तो निर्बल सूर्य भी बली हो जाते है एवं सूर्यके बली होनेपर अन्य ग्रह अनिष्ट भी हो तो इष्टसाधक हो जाते ह ।
इसलिये इन्हीं तीनों ( तारा, चन्द्रमा तथा रवि) के बल देखे जते रै 1
२. सब ग्रहोके जितने शुभ स्थान कहे गये है, क्रमशः उतने ही उनके वेध-स्थान भी कहे गये है । जैसे सूर्य
तीसरेमे शुभ होता है; किंतु यदि नर्वेमं कोड ग्रह हो तो विद्ध हो जाता है; इसी प्रकार अन्य शुभ-स्थान ओर वेध-
स्थान समञ्लने चाहिये ।
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
अन्य किसी ग्रहसे विद्ध न हों। मुनीश्वर! गुरु
जन्मराशिसे २, ११, ९, ५ ओर ७ इन स्थानोमें
शुभ होते हे; यदि क्रमशः १२, ८, १०, ४ ओर
३ स्थानोमें स्थित अन्य किसी ग्रहसे विद्ध न हों।
इसी प्रकार शुक्र भी जन्मराशिसे १, २, ३, ४, ५,
८, ९, १२ तथा ११ स्थानोमें शुभ होते हँ; यदि
क्रमशः ८, ७, १, १०, ९, ५, १९१, ६, ३ स्थानोमें
स्थित अन्य ग्रहसे. विद्ध न होः ॥ २७१-२७६॥
जो ग्रह गोचरमें वेधयुक्त हो जाता है, वह
शुभ या अशुभ फलको नहीं देता; इसलिये वेधका
विचार करके ही शुभ या अशुभ फल समञ्जना
चाहिये ॥ २७७ ॥ वामवेध होने (वेध-स्थानमें ग्रह
ओर शुभ स्थानमें अन्य ग्रहके होने)-से दुष्ट
(अशुभ) ग्रह भी शुभकारक हो जाता है। यदि
दुष्ट ग्रह भी शुभग्रहसे दष्ट हो तो शुभकारक हो
जाता है तथा शुभप्रद ग्रह भी पापग्रहसे दृष्ट हो तो
अनिष्ट फल देता हे । शुभ ओर पाप दोनों ग्रह यदि
अपने शत्रुसे देखे जाते हों अथवा नीच राशिमें या
अपने शत्रुकी राशिमे हों तो निष्फल हो जाते हे ।
इसी प्रकार जो ग्रह अस्त हो वह भी अपने शुभ
या अशुभ फलको नहीं देता है । ग्रह यदि दुष्ट-
स्थानमें हो तो यततपूर्वक उसकी शान्ति कर लेनी
चाहिये। हानि ओर लाभ ग्रहोके ही अधीन है,
इसलिये ग्रहोकी विशेष यत्नपूर्वक पूजा करनी
चाहिये ॥ २७८- २८०६ ॥
सूर्यं आदि नवग्रहोकी तुष्टिके लिये क्रमशः
मणि (पद्मराग-लाल), मुक्ता (मोती), विद्रुम
(मगा), मरकत (पन्ना), पुष्पराग (पोखराज),
वज्र (हीरा), नीलम, गोमेद-रन्न एवं वैट्र्य
३३७
(लहसनिया) धारण करना चाहिये ॥ २८१-२८२॥
( चनद्र-शुदधिमें विशेषता-- ) शुक्लपक्षके प्रथम
दिन प्रतिपदामें जिस व्यक्तिके चन्द्रमा शुभ होते
है, उसके लिये शुक्लपक्ष ओर कृष्णपक्ष दोनों ही
शुभद होते हँ । अन्यथा (यदि शुक्ल प्रतिपदामें
चन्द्रमा अशुभ हो तो) दोनों पक्ष अशुभ ही होते
हे । (पहले जो जन्मराशिसे २, ९, ५ वें चनद्रमाको
अशुभ कहा गया है, वह केवल कृष्णपक्षमें ही
होता है।) शुक्ल पक्षम २, ९ तथा ५ वें स्थानमें
स्थित चन्द्रमा भी शुभप्रद ही होता है, यदि वह
६, ८, १२वे स्थानोमें स्थित अन्य ग्रहोसे विद्ध न
हो ॥ २८२३-२८४॥
( तारा-विचार-- ) अपने-अपने जन्मनक्षत्रसे
नौ नक्षत्रोतक गिने तो क्रमशः १ जन्म, २ सम्पत्,
३ विपत्, ४ क्षेम, ५. प्रत्यरि, ६ साधक, ७ वध,
८ मित्र तथा ९ परम मित्र-इस प्रकार ९ ताराएं
होती हैँ । फिर इसी प्रकार आगे गिननेपर १० से
१८ तक तथा १९ से २७ तक क्रमशः वे ही ९
ताराएं होंगी । इनमें १, ३, ५ ओर ७वीं तारा अपने
नामके अनुसार अनिष्ट फल देनेवाली होती है ।
इन चारों ताराओमें इनके दोषकी शान्तिके लिये
ब्रह्य्णोको क्रमशः शाक, गुड्, लवण ओर तिलसहित
सुवर्णका दान देना चाहिये। कृष्णपक्षे तारा
बलवती होती है ओर शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बलवान्
होता है ॥ २८५-२८७॥
( चन्द्रमाकी अवस्था-- ) प्रत्येक राशिं
चनद्रमाकी बारह-बारह अवस्थाएं होती ह, जो
यात्रा तथा विवाह आदि शुभ कार्योमिं अपने
नामके सदृश ही फल देती है ।
१. भाव यह है कि ऊपर जो ग्रहोके शुभ ओर वेध-स्थान कहे गये ठै, उनम मनुर्प्योको अपनी-अपनी जन्मराशिसे
शुभ स्थानम ग्रहोकि जानेसे शुभ फल ओर वेध-स्थानमें जानेसे अशुभ फल प्राप्त होते है । विशेषता यह है कि शुभ
स्थाने जानेपर भी यदि उन ग्रहोके वेध-स्थानेमिं कोई अन्य ग्रह हो तो वे शुभ नर्हीं होते है, तथा शुभ ओर वेध-
स्थानेसि भिन्न स्थानमें रहनेपर ग्रह मध्यम फल देनेवाले होते है । इसी वातकरो संक्षेपमें आगे कहते ईै।
((-0. 1/(11114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 60810011
२३८
( अवस्थाका ज्ञान-) अभीष्ट दिनमें गत
नक्षत्र-संख्याको ६० से गुणा करके उसमें वर्तमान
नक्षत्रकी भुक्त (भयात) घडीको जोड दे, योगफलको
चारसे गुणा करके गुणनफलमे ४८५ का भाग दे। जो
लब्धि आवे, उसमे पुनः १२ से भाग देनेपर १
आदि शेषके अनुसार मेषादि राशि्योमें क्रमशः
प्रवास, नष्ट, मृत, जय, हास्य, रति, मुदा, सुति,
भक्ति, ज्वर, कम्प ओर सुस्थिति-ये बारह गत
अवस्थाएे सूचित होती हँ । ये अपने-अपने नामके
समान फल देनेवाली होती हें ॥ २८८-२८९ ॥
( मेषादि ल्मे कर्तव्य-- ) पदटू-बन्धन
(राजसिंहासन, रजमुकुट आदि धारण), यात्रा,
उग्र कर्म, संधि, विग्रह, आभूषणधारण, धातु,
खानसम्बन्धी कार्य ओर युद्धकर्म-ये सब मेष
लग्रमे आरम्भ करनेसे सिद्ध होते ह ॥ २९० ॥ वृष
लग्रमें विवाह मङ्कलकर्म, गृहारम्भ आदि स्थिर-
कर्म, जलाशय, गृहप्रवेश, कृषि, वाणिज्य तथा
. पशुपालन आदि कार्य सिद्ध होते हें ॥ २९१॥
मिथुन लग्रमे कल्ला, विञ्ञान, शिल्प, आभूषण,
युद्ध संश्रव (कर्ति साधक कर्म), राज-कार्य,
विवाह, राज्याभिषेक आदि कार्य करने चाहिये ॥ २९२॥
कर्क लग्रमें वापी, कूप, तडाग, जल रोकनेके
लिये बोध, जल निकालनेके लिये नाली बनाना,
पौष्टिक कर्म, चित्रकारी तथा लेखन आदि कार्य
करने चाहिये ॥ २९३ ॥ सिंह लग्रमे ईख तथा
धान्यसम्बन्धी सब -कार्य, वाणिज्य (क्रय-विक्रय),
हार, कृषिकर्म तथा सेवा आदि कर्म, स्थिर कार्य,
साहस, युद्ध तथा आभूषण बनाना आदि कार्य
संक्षिप्त नारदपुराण
सम्पन्न होते हें ॥ २९४ ॥ कन्या लग्नमें .विद्यारम्भ,
शिल्सकर्म, ओषधिनिर्माण एवं सेवन, आभूषण-
निर्माण ओर उसका धारण, समस्त चर ओर स्थिर
कार्य, पौष्टिकं कर्म तथा विवाहादि समस्त शुभ
कार्य करने चाहिये ॥ २९५ ॥ तुला लग्रमे कृषिकर्म,
व्यापार, यात्रा, पशुपालन, विवाह-उपनयनादि संस्कार
तथा तोलसम्बन्धी जितने कार्य है, वे सब सिद्ध
होते हँ ॥ २९६ ॥ वृश्चिक लग्रे गृहारम्भादि समस्त
स्थिर कार्य, राजसेवा, राज्याभिषेक, गोपनीय ओर
स्थिर कर्मोका आरम्भ करना चाहिये ॥ २९७॥ धनु
लग्रमे उपनयन, विवाह, यात्रा, अश्चकृत्य, गजकृत्य,
शिल्पकला तथा चर, स्थिर ओर मिश्रित कार्योको
करना चाहिये ॥ २९८ ॥ मकर लग्रमे धनुष बनाना,
उसमें प्रत्यञ्चा बांधना, बाण छोडना, अस्त्र बनाना
ओर चलाना, कृषि, गोपालन, अश्चकृत्य, गजकृत्य
तथा पशुओंका क्रय-विक्रय ओर दास आदिक
नियुक्ति-ये सब कार्य करने चाहिये ॥ २९९॥
कुम्भ लग्रमें कृषि, वाणिज्य, पशुपालन, जलाशय,
शिल्पकर्म, कला आदि, जलपात्र (कलश आदि)
तथा अस्त्र-शस्त्रका निर्माण आदि कार्य करना
चाहिये ॥ ३०० ॥ मीन लप्र्मे उपनयन, विवाह, राज्याभिषेक,
जलाशयकी प्रतिष्ठ, गृहप्रवेश, भूषण, जलपात्रनिर्माण
तथा अश्चसम्बन्धी कृत्य शुभ होते ह ॥ २०१॥
इस प्रकार मेषादि लग्रोके शुद्ध (शुभ स्वामीसे
युक्त या दृष्ट) रहनेसे शुभ कार्य सिद्ध होते हे ।
पापग्रहसे युक्त या दृष्ट लग्र हो तो उसमें केवल
क्रूर कर्म ही सिद्ध होते है, शुभ कर्म नहीं ॥ २०२॥
वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, मीन, तुला ओर
१. जैसे रोहिणी नक्षत्रकी १२ घरी बीत जानेपर चन्द्रमाको क्या अवस्था होगी 2 यह जानना है तो गत नक्षत्र
संख्या ३ को ६० से गुणा करके गुणनफल १८० मेँ रोहिणीकी गत (भुक्त) घटी १२ जोडनेसे १९२ हआ। इसे
चारसे गुणा करके गुणनफल ७६८ मेँ ^ का भाग देनेपर लब्धि १७ हई । इसमे पुनः १२से भाग देनेपर शेष ५
रहा । अतः उस समय पांच अवस्थाएं गत होकर छटी अवस्था वर्तमान है । वृष राशिमें नष्ट आदिक क्रमसे गणना
होती है; अतः उक्तं गणनासे छठी अवस्था “ मुदा" सूचित हौती टै।
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 2118811 \/8/8/185। (01661011. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
धनु-ये शुभग्रहकी राशि होनेके कारण शुभ हें
तथा अन्य (मेष, सिंह, वृश्चिक, मकर ओर
कुम्भ-- ये) पापराशियाों हँ ॥ ३०३ ॥ लग्रपर जेसे
(शुभ या अशुभ) ग्रहोंका योग या दृष्टि हो उसके
अनुसार ही लग्र अपना फल देता है । यदि लमग्रमें
ग्रहके योग या दृष्टिका अभावदहो तो लग्र अपने
स्वभावके अनुकूल फल देता हे ॥ ३०४॥ किसी
लग्रके आरम्भमें कार्यका आरम्भ होनेपर उसका
पूर्ण फल मिलता है । लग्रके मध्यमे मध्यम ओर
अन्तमे अल्प फल प्राप्त होता है। यह बात सब
लमग्रोमे समञ्जनी चाहिये ॥ ३०५ ॥ कार्यकतकि लिये
सर्वत्र पहले लग्रनल, उसके बाद चन्द्रबल देखना
चाहिये । चन्द्रमा यदि बली हो ओर सप्तम भावमें
स्थित हो तो सब ग्रह बलवान् समञ्च जाते
ह ॥ ३०६ ॥ चन्द्रमाका बल आधार ओर अन्य
ग्रहोके बल आधेय हैँ । आधारके बलपर ही
आधेय स्थिर रहता हे ॥ ३०७॥ यदि चन्द्रमा शुभदायक
हो तो सब ग्रह शुभ फल देनेवाले होते हे । यदि
चन्द्रमा अशुभ हो तो अन्य सब ग्रह भी अशुभ
फल देनेवाले हो जाते हें । लेकिन धन-स्थानके
स्वामीको छोडकर ही यह नियम लागू होता हे;
क्योकि यदि धनेश शुभ हो तो वह चनद्रमके अशुभ
होनेपर भी अपने शुभ फलको ही देता हे ॥ ३०८॥
लग्रके जितने अंश उदित हो गये (-क्षितिजसे
ऊपर आ गये) हों, उनमें जो ग्रह हो वह लग्रके
फलको देता है । इससे यह भी सिद्ध होता है कि
लग्रके जितने भावांश हों, उनके भीतर रहनेवाला
ग्रह लग्रभावका फल देता है तथा उससे अगे-
पीछे हो तो लग्रराशिमें रहता हआ भी अगे-
पीके भावका फल देता है। लगप्रके कथित्
अंशसे जो ग्रह आगे बद जाता है, वह द्वितीय
भावका फल देता है। इस प्रकार सव भावों
ग्रहोंकी स्थिति ओर फलकी कल्पना करनी
[ 1183 1 सं० ना० पुर १२-
३३९
चाहिये। सव गुणोसे युक्त लग्र तो थोडे दिनोमें
नहीं मिल सकता; अततः स्वल्प दोप्र ओर अधिक
गुणोसे युक्त लग्रको ही सब कार्येमिं सर्वदा ग्रहण
करना चाहिये; क्योकि अधिक दोषोसे युक्त कालको
ब्रह्माजी भी शुद्ध नहीं कर सकते; इसलिये थोडे
दोषसे युक्त होनेपर भी अधिक गुणवाला लग्र-काल
हितकर होता है ॥ ३०९--३९१३ ॥
( स्त्रियोके प्रथम रजोदर्शन- ) अमावास्या,
रिक्ता (४, ९, १४), ८, ६, १२ ओर प्रतिपदा-इन
तिथियोमें परिघ योगके पूर्वार्धमे, व्यतीपात ओर
वैधृतिमे, संध्याके समय, सूर्य ओर चन्द्रक ग्रहणकालमं
तथा विष्टि (भद्रा) -में स्त्रीका प्रथम मासिकधर्म
अशुभ होता है । रवि आदि वारोमें प्रथम रजोदर्शन
हो तो वह स्त्री क्रमशः रोगयुक्ता, पतिकी प्रिया,
दुःखयुक्ता, पुत्रवती, भोगवती, पतित्रता एवं क्लेशयुक्त
होती है ॥ ३१२-३१४॥ भरणी, कृत्तिका, आद्रा,
पूर्वा फाल्गुनी, आश्लेषा, विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाद
ओर पूर्व भाद्रपद-ये नक्षत्र तथा चेत्र, कार्तिक,
आषाढ ओर पौष-ये मास प्रथम मासिकधर्ममें
अनिष्टकारक कहे गये है । भद्रा, सूर्यको संक्रान्ति,
निद्रा-अवस्था--रात्रिकाल, सूर्यग्रहण तथा चन्र
ग्रहण-ये सब प्रथम मासिकधर्ममें शुभ नहीं हं ।
अशुभ योग, निन्द्य नक्षत्र तथा निन्दितं दिने
प्रथम मासिकधर्म हो तो बह स्त्री कुलद स्वभाववाली
होती है ॥ ३१५-२३१६॥ इसलिये इन सब दोपोंकी
शान्तिके लिये विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह
तिल, घृत ओर दूवसि गायत्री-मन्तरद्वारा १०८ वार
आहुति करे तथा सुवर्णदान, गोदान एवं तिलदान्
करे ॥ ३१७॥
( गभाधान-संस्कार-- ) मासिकधर्मके आरम्भसे
चार रात्रिया गर्भाधानमें त्याज्य है । सम रत्रियोमे
जव चन्द्रमा विषमराशि ओर विषम नवमांशमें हो,
लग्रपर पुरुषग्रह (रवि, मङ्गल तथा बृहस्पति)-की
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३४०
दृष्टि हो" तो पुत्रार्थी पुरुष सम (२, ४, ६, ८, १०,
१२) तिथि्योमे, रेवती, मूल, आश्लेषा ओर मघा--इन
नक्षत्रोको छोडकर अन्य नक्षत्रम उपवीती ओर अनग्र
(सवस्त्र) होकर स्त्रीका सङ्क करे॥ ३१८-२१९॥
( पुंसवन ओर सीमन्तोन्नयन-- ) प्रथम गर्भं
स्थिर हो जानेपर तृतीय या द्वितीय मासमे पुंसवन
कर्म करे। उसी प्रकार ४, ६ या८ वें मासमे उस
मासके स्वामी जब बली हों तथा स्त्री-पुरुष
दोनोंको चन्द्रमा ओर ताराका बल प्राप्त हो तो
सीमन्त-कर्म करना चाहिये। रिक्ता तिथि ओर
पर्वको छोडकर अन्य तिधियोमें ही उसको करनेकी
विधि है। मङ्गल, बृहस्पति तथा रविवारमे, तीक्ष्ण
ओर मिश्रसंज्ञक नक्त्रंको छोडकर अन्य नक्षत्रोमें
जब चन्द्रमा विषमराशि ओर विषमराशिके नवमांशमें
हो, लग्रसे अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहवर्जित) हो,
स्त्री-पुरुषके जन्म-लग्रसे अष्टम राशिलपग्र न हो
तथा लग्रमे शुभग्रहका योग ओर दृष्ट हो, पापग्रहकी
दृष्टि न हो एवं शुभग्रह लग्रसे ५, १, ४, ७, ९,
१० मं ओर पापग्रह ६, ११ तथा ३ में हों एवं
चन्द्रमा १२, ८ तथा लग्रसे अन्य स्थानोमें हो तो
उक्त दोनों कर्म (पुंसवन ओर सीमन्तोन्नयन)
करने चाहिये ॥ ३२०-३२४॥ यदि एक भी बलवान्
पापग्रह लग्रसे १२, ५ ओर ८ भावमें हो तो वह
सीमन्तिनी स्त्री अथवा उसके गर्भका नाश कर
देता है ॥ ३२५॥
(जातकर्म ओर नामकर्म ) जन्मके समयमे
ही जातकर्म कर लेना चाहिये । किसी प्रतिबन्धकवश
उस समय न कर सके तो सूतक बीतनेपर भी
उक्त लमग्रमे पितरोका पूजन (नान्दीमुख कर्म)
करके बालकका जातकर्म-संस्कार अवश्य करना
चाहिये एवं सूतक बीतनेपर अपने-अपने कुलकी
रीतिके अनुसार बालकका नामकरण-संस्कार भी
करना चाहिये । भलीभोति सोच-विचारकर देवता
संक्षिप्त नारदपुराण
आदिका वाचक, मङ्गलदायक एवं उत्तम नाम
रखना चाहिये। यदि देश-कालादि-जन्य किसी
प्रतिबन्धसे समयपर कर्मन हो सके तो समयके
बाद जब गुरु ओर शुक्रका उदय हो, तब उत्तरायणमें
चर, स्थिर, मृदु ओर क्षिप्र सं्तक नक्षत्रोमें शुभग्रहके
वार (सोम, बुध, गुरु ओर शुक्र) -में पिता ओर
बालकके चनद्रबल ओर ताराबल प्राप्त होनेपर शुभ
लग्र ओर शुभ नवांशमे, लग्रसे अष्टम भावमें कोई
ग्रह न हो तब बालकका जातकर्म ओर नामकर्म
संस्कार करने चाहिये ॥ ३२६- ३२९ ^ ॥
( अन्न-प्राशन-- ) बालकोंका जन्मसे ध्वे या
८ वें मासमे ओर बालिकाओंका जन्मसे ५वें या
जवे मासमे अन्नप्राशनकर्मं शुभ होता है। परतु
रिक्ता (४, ९, १४), तिधिक्षय, नन्दा (१, ६,
११), १२, ८-इन तिधथियोंको छोडकर (अन्य
तिधथियोमे) शुभ दिनमें चर, स्थिर, मृदु ओर
क्षिप्रसंज्चक नक्षत्रम लग्रसे अष्टम ओर दशम स्थान
शुद्ध ॒(ग्रहरहित) होनेपर शुभ नवांशयुक्त शुभ
राशिलग्रमे, लग्रपर शुभग्रहका योग या दष्ट
होनेपर जब पापग्रह लग्रसे ३, ६, ११ भावमें ओर
शुभग्रह १, ४, ७, १०, ५, ९ भावमें हो तथा
चन्द्रमा १२, ६, ८ स्थानसे भिन्न स्थानमें हो तो
पूर्वाह्न-समयमे बालकोंका अन्नप्राशनकर्म शुभ
होता है ॥ ३३०-३३४॥
( चूडाकरण-- ) बालककि जन्मसमयसे तीसरे
या पांचवें वर्षमे अथवा अपने कुलके आचार-
व्यवहारके अनुसार अन्य वर्षमासमें भी उत्तरायणमे,
जब गुरु ओर शुक्र उदित हों (अस्त न हों), पर्व
तथा रिक्तासे अन्य तिथियोमे, शुक्र, गुर, सोमवारमे,
अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, मृगशिरा, ज्येष्ठा, रेवती,
हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठ ओर शतभिषा-इन
नक्षत्रों अपने-अपने गृह्यसूत्रमे बतायी हुई विधिके
अनुसार चूडाकरणकर्म करना चाहिये । राजाओकि
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पूवं भाग-द्वितीय पाद
२२४१
पट बन्धन, बालकोके चूडाकरण, अन्नप्राशन ओर
उपनयनमें जन्म-नक्षत्र प्रशस्त (उत्तम) होता है
अन्य क्मेमिं जन्मनक्षत्र अशुभ कहा गया दै।
लग्रसे अष्टम स्थान शुद्ध हो, शुभ राशिलप्रहो,
उसमे शुभग्रहका नवमांश हो तथा जन्मराशि या
जन्मलग्रसे अष्टम राशिलग्र न हो, चन्द्रमा लग्रसे
६, ८, १२ स्थानोंसे भिन्न स्थानें हो, शुभग्रह
२, ५, ९, १, ४, ७, १० भावमें हों तथा पापग्रह
३, ६, १९१९ भावमें हों तो चूडाकरण कर्म प्रशस्त
होता है ॥ ३३५--३३९२ ॥
( सामान्य क्चौर-कर्म-- ) तेल लगाकर तथा
प्रातः ओर सायं संध्याके समयमे क्षौर नहीं कराना
चाहिये । इसी प्रकार मङ्गलवारको तथा रात्रिमे भी
क्षोरका निषेध है। दिनमें भी भोजनके बाद क्षौर
नहीं कराना चाहिये । युद्धयात्रामें भी क्षौर कराना
वर्जित है । शय्यापर बैठकर या चन्दनादि लगाकर
क्षोर नहीं कराना चाहिये। जिस दिन कहींकी
यात्रा करनी हो, उस दिन भी क्षौर न करावे तथा
क्षौर करानेके बाद उससे नवे दिन भी क्षौर न
करावे। राजाओंके लिये क्षौर करानेके बाद उससे
५ वें-५ वें दिन क्षौर करानेका विधान दै।
चूडाकरणमें जो नक्षत्र-वार आदि कहे गये है, उन्हीं
नक्षत्रों ओर वार आदिमे अथवा कभी भी क्षौरमें
विहित नक्षत्र ओर वारके उदय (मुहूर्तं एवं क्षण) -
मेँ क्षौर कराना शुभ होता है ॥ ३४०-३४१ ट ॥
( ्षौीरकर्ममें विशेष-- ) राजा अथवा ब्राह्यणांकी
आनज्ञासे यक्षम, माता-पिताके मरणमे, जलसे दटनेपर
तथा विवाहके अवसरपर निषिद्ध नक्षत्र, वार एवं
तिथि आदिमे भी क्षौर कराना शुभप्रद कहा गया है।
समस्त मङ्गल कार्यमि, मन्गलार्थं इष्ट देवताके समीप
्षुरोको अर्पण करना चा्हियेः ॥ ३४२-३४३ ॥
( उपनयन -- ) जिस दिन उपनयनका मुहूर्त
स्थिर हो, उससे पूर्व ९वें,७वें,५वेंया तीसरे
दिन उपनयनके लिये विहित नक्षत्र (या उस नक्षत्रके
मुहूर्त) -मं शुभ वार ओर शुभ लग्रमे अपने घरोको
चंदवा, पताका ओर तोरण आदिसे अच्छी तरह
अलंकृत करके, त्राह्मणोद्वारा आशीर्वचन, पुण्याहवाचन
आदि पुण्य कार्य कराकर, सौभाग्यवती स्त्रियोके
साथ, माङ्गलिक वाजा वजवाते ओर मङ्गलगान
करते-कराते हुए घरसे पूर्वात्तिर-दिशा (ईशानकोण)-
मे जाकर पवित्र स्थानसे चिकनी मिद्री खोदकर ले
ले ओर पुनः उसी प्रकार गीत-वाद्यके साथ घर
लोर आवे। वहो मिटरी या ्बांसके वर्तनमें उस मिद्रीको
रखकर उसमें अनेक वस्तुओंसे युक्त ओर भति-
भोतिके पुष्पोसे सुशोभित पवित्र जल डाले । (इसी
प्रकार ओर भी अपने कुलके अनुरूप आचारका
पालन करे) ॥ ३४४- ३४७ ॥ ग भधान अथवा जन्मये
आठवें वर्षमे ब्राह्मण-बालकोँ का, ग्यारहवें वर्पमें
क्षत्रिय बालकोंका ओर बारहवें वर्षमे वैश्य-
वालकोंका मौञ्जीबन्धन (यज्ञोपवीत संस्कार) होना
चाहिये ॥ ३४८ ॥ जन्मसे पांचवें वर्षमे यजोपवीत-
संस्कार करनेपर बालक वेद-शास्त्र-विशारद तथा
श्रीसम्पन्न होता हे । इसलिये उसमें ब्राह्मण-बालकका
उपनयन-संस्कार करना चाहिये ॥ ३४९ ॥ शुक्र ओर
वृहस्पति निर्बल हों तब भी वे बालकके लिये शुभदायक
होते ह । अतः शास्त्रोक्त वर्मं उपनयनसंस्कार
अवश्य करना चाहिये । शास्त्रने जिस वर्षमे उपनयनकी
आज्ञा नहीं दी है, उसमें वह संस्कार नहीं करना
चाहिये ॥ ३५० ॥ गुरु, शुक्र तथा अपने वेदकी शाखाके
स्वामी-ये दृश्य हों-अस्त न हुए हों तो उत्तरायणमें
उपनयनसंस्कार करना उचित है । बृहस्पति, शुक्र,
मङ्गल ओर बुध-ये क्रमशः ऋक्, यजुः, साम
१. चूडाकरण या उपनयनमं क्षुरमे ही कार्यं होता है, इसलिये उसके रक्षार्थं लोग अपने-अपने कुलदेवताके पास
्षुरको समर्पण करते ह।
((-0. 1/८1111(4<511॥ 8118811 \/8181185। (01661101. 0141260 0 6810011
३४२ संक्षिप्त नारदपुराण
ओर अथर्ववेदके अधिपति हे ॥ ३५१ ॥ शरद्, ग्रीष्म
ओर वसन्त-ये व्युत््रमसे द्विजातियोके उपनयनका
मुख्य काल हँ अर्थात् शरद् ऋतु वैश्योके, ग्रीष्म
्षत्रियोके ओर वसन्त ब्राह्यणोके उपनयनका मुख्य
काल हे । माघ आदि पाच महीनोमे उन सबके लिये
उपनयनका साधारण काल हे ॥ ३५२ ॥ माघ मासमे
जिसका उपनयन हो वह अपने कुलोचित आचार
तथा धर्मका ज्ञाता होता है। फाल्गुनमे यज्ञोपवीत
धारण करनेवाला पुरुष विधिज्ञ तथा धनवान् होता
हे । चैत्रमें उपनयन होनेपर ब्रह्मचारी वेद-वेदा्गोंका
पारगामी विद्वान् होता हे ॥ ३५३ ॥ वैशाख मासमे
जिसका उपनयन हो, बह धनवान तथा वेद, शास्त्र
एवं विविध विद्याओमें निपुण होता हे ओर ज्येष्ठमें
यज्ञोपवीत लेनेवाला द्विज विधिज्ञोमें श्रेष्ठ ओर बलकान्
होता हे ॥ ३५४॥
शुक्लपक्षमे द्वितीया, पञ्चमी, त्रयोदशी, दशमी
ओर सप्तमी तिथियों यज्ञोपवीतसंस्कारके लिये
ग्राह्य हे । एकादशी, षष्ठी ओर द्वादशी- ये तिथियाँ
अधिक श्रेष्ठ है । शेष तिधियोंको मध्यम माना गया
हे। कृष्णपक्षमें द्वितीया, तृतीया ओर पञ्चमी ग्राह्य
हं । अन्य तिथियों अत्यन्त निन्दित है ॥ २५५-२३५६ ॥
हस्त, चित्रा, स्वाती, रेवती, पुष्य, आद्रा, पुनर्वसु,
तीनों उत्तरा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, अश्चिनी,
अनुराधा तथा रोहिणी-ये नक्षत्र उपनयन-संस्कारके
लिये उत्तम है ॥ ३५७ ॥ जन्मनक्षत्रसे दस्वों " कर्म '
संज्ञक है, सोलहवांँ ' संघात ' नक्षत्र है, अटारहवां
"समुदय" नक्षत्र है, तेईस्वां " विनाश' कारक है
ओर पचीसवां ' मानस ' हे। इनमे शुभ कर्म नहीं
आरम्भ करने चाहिये । गुरु, बुध ओर शुक्र-इन
तीनोके वार उपनयनमें प्रशस्त ह । सोमवार ओर
रविवार ये मध्यम माने गये हैं । शेष दो वार मङ्गल
ओर शनैर निन्दित हं । दिनके तीन भाग करके
उसके आदि भागमें देव-सम्बन्धी कर्म (यन्ञ-
पूजनादि) करने चाहिये ॥ ३५८-३६०॥ द्वितीय
भागमें मनुष्य-सम्बन्धी कार्य (अतिथि-सत्कार
आदि) करनेका विधान हे ओर तृतीय भागम
पेतृक कर्म (श्राद्ध-तर्पणादि)-का अनुष्ठान करना
चाहिये । गुरु, शुक्र ओर अपनी वैदिक शाखाके
अधिपति अपनी नीच राशिमे या उसके किसी
अंशमें हों अथवा अपने शत्रुको राशिमें या उसके
किसी अंशमें स्थित हों तो उस समय यज्ञोपवीत
लेनेवाला द्विज कला ओर शीलसे रहित होता है ।
इसी प्रकार अपनी शाखाके अधिपति, गुरु एवं
शुक्र यदि अपने अधिशत्रु-गृहमें या उसके किसी
अंशम स्थित हों तो ब्रह्मचर्यब्रत (यज्ञोपवीत)
ग्रहण करनेवाला द्विज महापातकी होता हे । गुरु,
शुक्र एवं अपनी शाखाके अधिपति ग्रह॒ यदि
अपनी उच्च राशि या उसके किसी अंशमें हो,
अपनी राशि या उसके किसी अशमे हों अथवा
केन्द्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (५, ९) -मे
स्थित हों तो उस समय यञ्चोपवीत लेनेवाला
ब्रह्मचारी अत्यन्त धनवान् तथा वेद-वेदाङ्खोका
पारङ्गत विद्वान् होता हे ॥ ३६१-३६४॥ यदि गुरु,
शुक्र अथवा शाखाधिपति परमोच्च स्थानमें हों
ओर मृत्यु (आठरवों) स्थान शुद्ध हो तो उस समय
ब्रह्मचर्यत्रत ग्रहण करनेवाला द्विज वेद-शास्त्रमे
' निष्णात" होता हे ॥ ३६५॥ गुरु, शुक्र अथवा
शाखाधिपति यदि अपने अधिमित्रगृहमें या उसके
उच्च गृहमे अथवा उसके अंशे स्थित हों तो
यज्ञोपवीत लेनेवाला ब्रह्मचारी विद्या तथा धनसे
सम्पन्न होता हे ॥ ३६६ ॥ शाखाधिपतिका दिन हो,
बालकको शाखाधिपतिका बल प्राप्त हो तथा
शाखाधिपतिका ही लग्र हो-ये तीन बातें उपनयन-
संस्कारमं दुर्लभ है ॥ ३६७॥ उसके चतुर्थाशमें
चन्द्रमा हों तो यज्ञोपवीत लेनेवाला बालक विद्यामें
निपुण होता है; किंतु यदि वह पापग्रहके अंशम
((-0. 1\॥८1114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661011. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३४१३
अथवा अपने अंशमें हो तो यज्ञोपवीती द्विज सदा
दरिद्र ओर दुःखी रहता हे ॥ ३६८ ॥ जब श्रवणादि
नक्षत्रम विद्यमान चन्द्रमा कर्कके अंश-विशेषमें
स्थित हो तो ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण करनेवाला द्विज
वेद, शास्त्र तथा धन-धान्य-समृद्धिसे सम्पन्न होता
हे ॥ ३६९ ॥ शुभ लग्र हो, शुभग्रहका अंश चल
रहा हो, मृत्युस्थान शुद्ध हो तथा लग्र ओर मृत्यु-
स्थान शुभग्रहोंसे संयुक्त हो अथवा उनपर शुभग्रहांको
दृष्टि हो, अभीष्ट स्थानमें स्थित वृहस्पति, सूर्य
ओर चन्द्रमा आदि पांच बलवान् ग्रहोंसे लग्रस्थान
संयुक्त या दृष्ट हो अथवा स्थान आदिके वलसे
पूर्ण चार ही शुभग्रहयुक्त ग्रहोद्रारा लग्रस्थान देखा
जाता हो ओर वह इक्तीस महादोषोंसे रहित हो तो
यज्ञोपवीत लेना शुभ हे । शुभग्रहोसे संयुक्त या दृष्ट
सभी राशिर्यां शुभ हे ॥ २७०-२७२॥ वे शुभ
राशियों शुभ ग्रहके नवांशमें हों तो त्रतबन्ध
(यज्ञोपवीत) -में ग्राह्य है, कितु कर्कराशिका अंश
शुभ ग्रहसे युक्त तथा दष्ट होतो भी कभी ग्रहण
करने योग्य नहीं है ॥ ३७२ ॥ इसलिये वृष ओर
मिथुनके अंश तथा तुला ओर कन्याके अंश शुभ
हें। इस प्रकार लग्रगत नवांश होनेपर ब्रतबन्ध
उत्तम बताया गया है ॥ ३७४॥ तीसरे, छठे ओर
ग्यारहवें स्थानमें पापग्रह हो, छटा, आट्वां ओर
बारहवा स्थान शुभग्रहसे खाली हो ओर चन्द्रमा
छठे, आठवें, लग्र तथा वारहवें स्थानम न हों तो
उपनयन शुभ होता है ॥ ३७५ ॥ चन्द्रमा अपने उच्च
स्थानमें होकर भी यदि व्रती पुरुषके व्रतबन्ध-
मुहूर्त-सम्बन्धी लप्रमे स्थित हो तो वह उस
बालकको निर्धन ओर क्षयका रोगी बना देता
है ॥ ३७६ ॥ यदि सूर्यं केन्द्रस्थानमें प्रकाशित हों तो
यज्ञोपवीत लेनेवाले बालकोके पिताका नाश हो
जाता है। पाच दोरपोसे रहित लग्र उपनयनमें
शुभदायक होता है ॥ ३७७ ॥ वसन्त ऋतुके सिवा
ओर कभी कृष्णपक्षमे, गलग्रहे, अनध्यायके दिन,
भद्रामे तथा षष्ठीको बालकका उपनयन-संस्कार
नहीं होना चाहिये ॥ ३७८ ॥ त्रयोदशीसे लेकर चार,
सप्तमीसे लेकर तीन दिन ओर चतुर्थी ये आठ
गलग्रह अशुभ कहे गये हें ॥ ३७९ ॥
( क्षुरिका-बन्धनकर्म-- ) अव मँ क्षत्रियोकि
लिये क्षुरिका-बन्धन कर्मका वर्णन करूगा, जो
विवाहके पहले सम्पन्न होता हे । विवाहके लिये
कहे हए मासोमे, शुक्लपक्षमे, जवकि वृहस्पति,
शुक्र ओर मङ्गल अस्त न हों, चन्द्रमा ओर ताराका
बल प्राप्त हो, उस समय मौञ्जीवन्धनके लिये
बतायी हुई तिथियोमे, मङ्गलवारको छोडकर शेष
सभी दिनोमें यह कर्म किया जाता है। कर्ताका
लग्रगत नवांश यदि अष्टमोदयसे रहित न हो,
अष्टम शुद्ध हो; चन्द्रमा छठे, आठवें ओर बारहववेमें
न होकर लग्रमें स्थित हों; शुभग्रह दूसरे, पांचवे,
नवे, लग्र, चतुर्थ, सप्तम ओर दशम स्थानेमिं हों;
पापग्रह तीसरे, ग्यारहवं ओर छठे स्थानम हों तो
देवताओं ओर पितरोंकी पूजा करके क्षुरिका-
बन्धनकर्म करना चाहिये ॥ ३८०-३८३ ॥ पहले
देवताओंके समीप क्षुरिका (कटार) -की भली भति
पूजा करे। तत्प्ात् शुभ लक्षणोसे युक्त उस
्षुरिकाको उत्तम लग्रे अपनी करिमें बोधे ॥ २८४॥
क्षुरिकाकी लम्बाईके आधे (मध्यभाग) पर जी
विस्तारमान हो उससे क्षुरिकाके विभाग करे। वे
छेदखण्ड (विभाग) क्रमसे ध्वज आदि आय
कहलाते हैँ । उनकी आट सं्ाएं ह-- ध्वज, धृप्र,
सिंह, धा, वृष, गर्दभ, गज ओर ध्वाद्क्ष । ध्वज
नामक आयमें शत्रुका नाश होता ह ॥ ३८५ ॥ धूम्र
आयम घात, सिंह नामक आयम जय, श्वा
(कुत्ता) नामक आयमें रोग, वृष आयम धनलाभः,
गर्दभ आयमं अत्यन्त दुःखकी प्राति, गज आयमें
अत्यन्त प्रसन्नता ओर ध्वाङ्क्ष नामक आयम धनका
((-0. 1/८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
३४४
नाश होता हे। खद्ध॒ ओर छुरीके मापको अपने
अङ्ुलसे गिने ॥ ३८६-३८७॥ मापके अङ्गुलोमेसे
ग्यारहसे अधिक हो तो ग्यारह घटा दे। फिर शेष
अङ्गुलोके क्रमशः फल इस प्रकार दै ॥ ३८८ ॥
पुत्र-लाभ, शत्रुवध, स्त्रीलाभ, शुभगमन, अर्थहानि,
अर्थवृद्धि, प्रीति, सिद्धि, जय ओर स्तुति ॥ ३८९ ॥
छुरी या तलवारमें यदि ध्वज अथवा वृष
आय-विभागके पूर्वभाग्में नष्ट (भङ्ग) हो, तथा
सिंह ओर गज-आयके मध्यभागमें तथा कुकुर
ओर काक-आयके अन्तिम भागमें एवं धूम्र ओर
गर्दभ आयके अन्तिम भागमें नष्ट हो जाय तो शुभ
नहीं होता हे । (अतः एेसी छुरी या तलवारका
परित्याग कर देना चाहिये; यह बात अर्थतः सिद्ध
होती हे) ॥ ३९ ६ ॥
( समावर्तन -- ) उत्तरायणमें जव गुरु ओर
शुक्र दोनों उदित हों, चित्रा, उत्तराफाल्गुनी,
उत्तराषाद्, उत्तर भाद्रपद, पुनर्वसु, पुष्य, रेवती,
श्रवण, अनुराधा, रोहिणी-ये नक्षत्र हों तथा
रवि, सोम, बुध, गुरु ओर शुक्रवारमेंसे कोई वार
हो तो इन्हीं रवि आदि पाँच ग्रहोंकी राशि, लग्र
ओर नवमांशमे, प्रतिपदा, पर्व, रिक्ता, अमावास्या,
तथा सप्तमीसे तीन तिथि-इन सव तिथियोंको
छोडकर अन्य तिथियों गुरुकुलसे अध्ययन
समाप्त करके रको लौटनेवाले जितेन्द्रिय
द्विजकुमारका समावर्तन-संस्कार (मुण्डन-हवन
आदि) करना चाहिये ॥ २९१-३९३ ३ ॥
( विवाहकथन-- ) विप्रवर! सब आश्रमोमें यह
गृहस्थाश्रम ही श्रेष्ठ है । उसमें भी जव सुशीला धर्मपत्नी
पराप्त हो तभी सुख होता हे। स्त्रीको सुशीलताकी प्राति
तभी होती है, जव विवाहकालिक लप्र शुभ हो।
इसलिये म साक्षात् ब्रह्माजीद्वारा कथित लग्र-शुद्धिको
संक्षिप्त नारदपुराण
विचार करके कहता हं ॥ ३९४३९५६ ॥
प्रथमतः कन्यादान करनेवालोंको चाहिये कि
वे किसी शुभ दिनको अपनी अञ्जलिमें पान,
फूल, फल ओर द्रव्य आदि लेकर ज्यौतिषशास्त्रके
ज्ञाता समस्त शुभ लक्षणोसे सम्पन्न, प्रसन्नचित्त
तथा सुखपूर्वक बेठे हुए विद्वान् ब्राह्मणके समीप
जाय ओर उन्हें देवताके समान मानकर भक्तिपूर्वक
प्रणाम करके अपनी कन्यके विवाह-लग्रके विषयमे
पूरे ॥ ३९६-३९७॥
(ज्योतिषीको चाहिये कि उस समय लग्र
ओर ग्रह स्पष्ट करके देखे--) यदि प्रश्रलग्रमें
पापग्रह हो या लग्रसे सप्तम भावमें मङ्गल हो तो
जिसके लिये प्रश्र किया गया है, उस कन्या ओर
वरको ८ वर्षके भीतर ही घातक अरिष्ट प्राप्त होगा,
एेसा समञ्जना चाहिये। यदि लग्रमे चन्द्रमा ओर
उससे सप्तम भावमें मङ्गल हो तो ८ वर्षके भीतर ही
उस कन्याके पतिको घातक कष्ट प्राप्त होगा-एेसा
समञ्चे। यदि लग्रसे पञ्चम भावमें पापग्रह हो ओर वह
नीचराशिमें पापग्रहसे देखा जाता हो तो वह कन्या
कुलया स्वभाववाली अथवा मृतवत्सा होती है, इसमे
संशय नहीं हे ॥ ३९८-४००॥ यदि प्रश्रलग्रसे
२, ५, ७, ११ ओर १० वें भावमें चन्द्रमा हो तथा
उसपर गुरुको दृष्टि हो तो समञ्लना चाहिये कि
उस कन्याको शीघ्र ही पतिकी प्राति होगी ॥४०१॥
यदि प्रश्रलग्रमें तुला, वृष या कर्क राशि हो तथा
वह शुक्र ओर चन्द्रमासे युक्त हो तो विवाहके
विषयमे प्रश्र करनेपर वरके लिये कन्या (पत्नी)
लाभ होता है अथवा सम राशि लग्र हो, उसमें
समराशिका ही द्रेष्काण हो ओर सम राशिका
नवमांश तथा उसपर चन्द्रमा ओर शुक्रकी दृष्टि हो
तो वरको पत्रीकी प्रापि होती है ॥४०२-४०३॥
१. छुरी या तलवारको मुदरीकी ओर पूर्वं ओर अग्रकी ओर अन्त समञ्लना चाहिये।
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पूर्व भाग-द्वितीय पाद
इसी प्रकार यदि प्रश्रलग्रमे पुरुषराशि ओर
पुरुषराशिका नवमांश हो तथा उसपर पुरुषग्रह
(रवि, मङ्गल ओर गुरु)-कौ दृष्टि हो तो जिनके
लिये प्रश्र किया गया है, उन कन्याओंको पतिकी
प्राति होती हे ॥ ४०४॥
यदि प्रश्रसमयमें कृष्णपक्ष हो ओर चन्द्रमा
सम राशिमें होकर लग्रसे छठे या आठवें भावमें
पापग्रहसे देखा जाता हो तो (निकट भविष्यमें)
विवाह-सम्बन्थ नहीं हो पाता है ॥४०५॥ यदि
प्रश्रकालमें शुभ निमित्त ओर शुभ शकुन देखने-
सुननेमें आवें तो वर-कन्याके लिये शुभ होता है
तथा यदि निमित्त एवं शकुन आदि अशुभ हों तो
अशुभ फल होता हे ॥ ४०६॥
( कन्या-वरण- ) पञ्चाङ्क (तिथि, वार, नक्षत्र,
योग, करण) -से शुद्ध दिनम यदि वर ओर
कन्याके चन्द्रबल तथा ताराबल प्राप्त हों तो
विवाहके लिये विहित नक्षत्र या उसके मुहूर्तम
वरको चाहिये कि अपने कुलके श्रेष्ठ जनोके साथ
गीत, वाद्यको ध्वनि ओर ब्राह्मणोके आशीर्वचन
(शान्ति-मन्त्रपाठ) आदिसे युक्त होकर विविध
आभूषण, शुभ वस्त्र, फूल, फल, पान, अक्षत,
चन्दन ओर सुगन्धादि लेकर कन्याके घरमे जाय
ओर विनीत भावसे कन्याका वरण करे । (कन्याका
वरण वरके बडे भाई अथवा गुरुजनको करना
चाहिये ।) उसके बाद कन्याका पिता प्रसन्नचित्त
होकर अभीष्ट वरको कन्यादान करे ॥ ४०७-४०९॥
कन्याके पिताको चाहिये कि अपनी कन्यासे
श्रेष्ठ, कुल, शील, वयस्, रूप, धन ओर विद्यास
युक्तं वरको वरके वयसूसे छोरी रूपवती अपनी
कन्या दे। कन्यादानसे पूर्वं सब गुणोकी आश्रयभूता,
तीनों लोकों सबसे अधिक सुन्दरी, दिव्य गन्ध,
माला ओर वस्त्रसे सुशोभित, सम्पूर्णं शुभ लक्षणोसे
युक्त तथा सब आभृषणोसे मण्डित, अमूल्य
२२४५
मणिमालाओंसे दसों दिशाओंको प्रकाशित करती
हई, सहस्नं दिव्य सहेलियोसे सुमेविता सर्वगुणसम्पन्ना
शची (इन्द्राणी) -देवीकी पूजा करके उनसे प्रार्थना
करे-' हे देवि! हे इन्द्राणि! हे देवेद्रप्रियभामिनि।
आपको मेरा नमस्कार हे। देवि! इस विवाहम
आप सौभाग्य, आरोग्य ओर पुत्र प्रदान करं ।' इस
प्रकार प्रार्थना करके पूजाके बाद विधानपूर्वक
ऊपर कहे हुए गुणयुक्त वरके लिये अपनी कुमारी
कन्याका दान करे ॥ ४१०-४१४॥
(कन्या-वरकी वर्षशुदधि-- ) कन्याके
जन्मसमयसे सम वमिं ओर वरके जन्मसमयसे
विषम व्षेमिं होनेवाला विवाह उन दोनेकि प्रेम
ओर प्रसन्नताको बढानेवाला होता है। इससे
विपरीत (कन्याके विषम ओर वरके सम वर्षमे)
विवाह वर-कन्या दोनोके लिये घातक होता
हे ॥ ४१५ ॥
( विवाहविहित मास-- ) माघ, फाल्गुन, वैशाख
ओर चज्येष्ठ-ये चार मास विवाहे श्रेष्ठ तथा
कार्तिक ओर मार्गशीर्ष ये दो मास मध्यम है।
अन्य मास निन्दित है ॥ ४१६॥
सूर्यं जव आद्रा नक्षत्रे प्रवेश करे तवसे दस
नक्षत्रतक (अर्थात् आद्रसि स्वातीतकके नक्षत्रोमें
जवबतक सूर्य रहें, तबतक) विवाह, देवताकी
प्रतिष्ठा ओर उपनयन नहीं करने चाहिये । वृहस्पति
ओर शुक्र जव अस्त हों, बाल अथवा वृद्ध हां
तथा केवल वृहस्पति सिंहराशि या उसके नवममांशमं
हो, उस समय भी ऊपर कहे हुए शुभ कार्यं नहीं
करने चाहिये ॥ ४१७-७१८॥
( गुरु तथा शुक्रके बाल्य ओर वृद्धत्व -- )
शुक्र जव पश्चिममे उदय होता है तो दस दिन ओर
पूर्वमे उदय होता टै ती तीन दिन तक बालक
रहता है तथा जव पश्चिममें अस्त होनेको रहता है
तो अस्तसे पोच दिन पहले ओर पूर्वमे अस्त होनेसे
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२४६
संक्षिप्त नारदपुराण
पंद्रह दिन पहले वृद्ध हो जाता है। गुरु उदयके
बाद पंद्रह दिन बालक ओर अस्तसे पहले पंद्रह
दिन वृद्ध रहता हे ॥ ४१९ ॥
तबतक भगवान् हषीकेश शयनावस्थाभ्में हों
तवतक तथा भगवानूके उत्सव (उत्थान या
जन्मदिन) -मे भी अन्य मङ्खलकार्य नहीं करने
चाहिये ॥ ४२० ॥ पहले गरभके पुत्र ओर कन्याके
जन्ममास, जन्मनक्षत्र ओर जन्म-तिथि-वारमें भी
विवाह नहीं करना चाहिये । आद्य गर्भको कन्या
ओर आद्य गरभके वरका परस्पर विवाह नहीं
कराना चाहिये तथा वर-कन्यामें कोई एक ही
ज्येष्ठ (आद्य गर्भका) हो तो ज्येष्ठ मासमे विवाह
श्रेष्ठ हे। यदि दोनों ज्येष्ठ हों तो ज्येष्ठ मासमे
विवाह अनिष्टकारक कहा गया हे ॥ ४२१-४२२॥
( विवाहमें वर्ज्य-- ) भूकम्पादि उत्पात तथा
सर्वग्रास सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण हो तो उसके
बाद सात दिनतकका समय शुभ नहीं हे। यदि
खण्डग्रहण हो तो उसके बाद तीन दिन अशुभ
होते ह । तीन दिनका स्पर्श करनेवाली (वृद्धि)
तिथि, क्षयतिथि तथा ग्रस्तास्त (ग्रहण लगे चन्दर,
सूर्यका अस्त) हो तो पूर्वके तीन दिन अच्छे नहीं
माने जाते हें । यदि ग्रहण लगे हुए सूर्य, चन्द्रका
उदय हो तो बादके तीन दिन अशुभ होते हे।
संध्यासमयमें ग्रहण हो तो पहले ओर बादके भी
तीन-तीन दिन अनिष्टकारक हैँ तथा मध्य रात्निमें
ग्रहण हो तो सात दिन (तीन पहलेके ओर तीन
बादके ओर एक ग्रहणवाला दिन) अशुभ होते
हे ॥ ४२३-४२४॥ मासके अन्तिम दिन, रिक्ता,
अष्टमी, व्यतीपात ओर वैधृतियोग सम्मूर्णं तथा
परिघ योगका पूर्वार्ध--ये विवाहमें वर्जित हे ॥ ४२५॥
(विहित नक्षत्र-- ) रेवती, रोहिणी, तीनों उत्तरा,
अनुराधा, स्वाती, मृगशिरा, हस्त, मघा ओर
मूल- ये ग्यारह नक्षत्र वेधरहित हों तो इन्ीमिं
स्त्रीका विवाह शुभ कहा गया है ॥ ४२६ ॥ विवाहमें
वरको सूर्यका ओर कन्याको वृहस्पतिका बल
अवश्य प्राप्त होना चाहिये । यदि ये दोनों अनिष्टकारक
हों तो यतपूर्वक इनकी पूजा करनी चाहिये ॥ ४२७॥
गोचर, वेध ओर अष्टकवर्ग-सम्बन्धी बल उत्तरोत्तर
अधिक हेर । इसलिये गोचरबल स्थूल (साधारण)
माना जाता हे। अर्थात् ग्रहोका अष्टकवर्ग-बल
ग्रहण करना चाहिये। प्रथम तो वर-कन्याके
चन्द्रवल ओर ताराबल देखने चाहिये । उसके बाद
पञ्चाङ्ग (तिथि, वार आदि)-के बल देखे । तिथिमं
एक, वारमें दो, नक्षत्रम तीन, योगमें चार ओर
करणमें पोच गुने बल होते हें । इन सबको अपेक्षा
मुहूर्तं बली होता है। मुहर्तसे भी लग्र, लग्रसे भी
होरा (राश्यर्ध), होरासे द्रेष्काण, द्रेष्काणसे नवमांश,
नवमांशसे भी द्वादशांश तथा उससे भी त्रिंशांशे
बली होता है। इसलिये इन सबके बल देखने
चाहिये ॥ ४२८-४३१॥
विवाहमें शुभग्रहसे युक्त या दृष्ट होनेपर सब
राशि प्रशस्त हे । चन्द्रमा, सूर्य, बुध, बृहस्पति तथा
शुक्र आदि पांच ग्रह जिस राशिके इष्ट हो, वह लप्र
शुभप्रद होता है । यदि चार ग्रह भी बली होंतोभी
उन्हें शुभप्रद ही समञ्जना चाहिये ॥४२२-४२३॥
मुने! जामित्र (लग्रसे सप्तम स्थान) शुद्ध
(ग्रहवर्जित) हो तथा लग्र इक्तीस दोषोंसे रहित हो
तो उसे विवाहमें ग्रहण करना चाहिये। अब मं
१. आषाढ शुक्ला ११ से कार्तिक शुक्ला ११ तक भगवान् हषीकेशके शयनका काल है।
२. अर्थात् गोचरबल एक, वेधबल दो ओर अष्टकवर्ग-बल तीनके बराबर है ।
३. जातक अध्यायमें देखिये। अभिप्राय यह है कि नक्षत्रविहित (गुणयुक्त) न मिले तो उसका मुहूर्तं लेना चाहिये।
यदि लग्ररशि निर्बल हो तो उसके नवमांश आदिका बल देखकर निर्बल लग्रको भी प्रशस्त समञ्लना चाहिये।
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
उन इच्छीस दोषोके नाम, स्वरूप ओर फलका
संक्षेपसे वर्णन करता हू, सुनो-- ॥ ४३४ ३ ॥
( विवाहके इक्षीस दोष-- ) पञ्चाङ्ग-शुद्धिका
न होना, यह प्रथम दोष कहा गया है । उदयास्तकौ
शुद्धिका न होना २, उस दिन सूर्यको संक्रान्तिका
होना ३, पापग्रहका षड्वर्गं रहना ४, लग्रसे छठे
भावमें शुक्रकी स्थिति ५, अष्टममें मङ्गलका रहना
६, गण्डान्त होना ७, कर्तरीयोग ८, बारहवे, छठे
ओर आठवें चनद्रमाका होना तथा च्द्रमाके साथ
किसी अन्य ग्रहका होना ९, वर-कन्याकी जन्मराशिसे
अष्टम राशि लग्र हो या दैनिक चन्द्रराशि हो १०,
विषघरी ११, दुर्मूर्त १२, वार-दोष १३, खा्जूर
१४, नक्षत्रैकचरण १५, ग्रहण ओर उत्पातके नक्षत्र
१६, पापग्रहसे विद्ध नक्षत्र १७, पापसे युक्त नक्षत्र
१८, पापग्रहका नवमांश १९, महापात २० ओर
वैधृति २१- विवाहम ये २९१९ दोष कहे गये
हें ॥ ४३५- ४३८ २ ॥
मुने! तिथि, वार, नक्षत्र, योग ओर करण-इन
पोँचोंका मेल “पञ्चाङ्ग ' कहलाता है । उसकी शुद्धि
' पञ्चाङ्ग "शुद्धि कहलाती है । जिस दिन पञ्चाङ्गके
दोष हों, उस दिन विवाहलग्र बनाना निरर्थक हे।
इस प्रकारका लग्र यदि पाँच इष्ट ग्रहोसे युक्त हो
तो भी उसको विषमिश्रित दूधके समान त्याग देना
चाहिये ॥ ४३९- ४४० २ ॥ लग्र या उसके नवमांश
अपने-अपने स्वामीसे युक्त या दृष्ट न हों अथ्वा
परस्पर (लग्रेशसे नवमांश ओर नवमांशपतिसे
लग्रेश) युक्त या दृष्ट न हों अथवा अपने स्वामीके
शुभग्रह मित्रसे युक्त या दृष्ट न हों तो वरके लिये
घातक होते है*। इसी प्रकार लग्रे सप्तम ओर
उसके नवमांशमें भी ये दोनों यदि अपने-अपने
स्वामीसे अथवा परस्पर युक्त या दृष्ट नहीं हो या
^ ३ ४७
अपने-अपने स्वामीके शुभ मित्रसे युक्तयादृष्टन
हों तो उस दशामें विवाह होनेपर वह वधूके लिये
घातक हे ॥ ४४१-४४२ २ ॥
सूर्यकी संक्रान्तिके समयसे पूर्वं ओर पश्चात्
सोलह-सोलह घडी विवाह आदि शुभ कार्योमिं
त्याज्य है । लग्रका षड्वर्गं (राशि, होरा, द्रैष्काण,
नवमांश, हादशांश तथा त्रिंशांश) शुभ हो तो
विवाह, देवप्रतिष्ठा आदि कार्यमिं श्रेष्ठ माना गया
हे ॥ ४४३-४४४॥
लग्रसे छठे स्थानमें शुक्र हो तो वह “ भृगुषष्ठ'
नामक दोष कहलाता है । उच्चस्थ ओर शुभ ग्रहसे
युक्त होनेपर भी उस लग्रको सदा त्याग देना
चाहिये । लप्रसे अष्टम स्थानमें मङ्गल हो तो यह भोम
महादोप" कहलाता हि। यदि मङ्गल उच्वमं हो ओर
तीन शुभ ग्रह लग्रमे हाँ तो इस लग्रका त्याग नहीं
करना चाहिये (अर्थात् एेसी स्थिति अष्टम म्गलका
दोष नष्ट हो जाता है) ॥ ४४५-४४६ ॥
( गण्डान्त-दोष-- ) पूर्णां (५, १०, १५)
तिथियोकि अन्त ओर नन्दा (१, ६, ११) तिधियोकी
आदिकी सन्धिमें दो घडी 'तिथिगण्डान्त-दोष'
कहलाता है। यह जन्म, यात्रा, उपनयन ओर
विवाहादि शुभ कार्योमिं घातक कहा गया है ॥ ४४७॥
कर्क लग्रके अन्त ओर सिंह लगप्रके आदिकीं
सन्धिमे, वृश्चिक ओर धनुको सन्धिमें तथा मीन
ओर मेष लग्रकी सन्धिमें आधा घड़ी ` लग्रगण्डान्त'
कहलाता है। यह भी घातक होता हे ॥ ४४८ ॥
आश्लेषाके अन्तका चतुर्थं चरण ओर मधाका
प्रथम चरण तथा ज्येष्टाके अन्तकी १६ घड़ी ओर
मूलका प्रथम चरण एवं रेवती नक्षत्रके अन्तको
ग्यारह घडी ओर अश्चिनीका प्रथम चरण-इस
प्रकार इन दो-दो नक्षत्रोको सन्धिका काल
१. यहां घातक शब्द अशुभ-सूचक समञ्लना चाहिये अर्थात् एेसे लग्र वरको अशुभ फल प्राप्त होता ६ै।
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२३२४८
' नक्षत्रगण्डान्त' क्हलाता है। ये तीनों प्रकारके
गण्डान्त महाक्रूर होते हें ॥ ४४७-- ४४९ ३ ॥
( कर्तरीदोष-- ) लग्रसे वारहवें मागीं ओर
द्वितीयमें वक्रो दोनों पापग्रह हों तो लग्रमे अगे-
पीछे दोनों ओरसे जानेके कारण यह ' कर्तरीदोष'
कहलाता है। इसमे विवाह होनेसे यह कर्तरीदोष
वर-वधू दोनोके गालेपर द्री चलानेवाला (उनका
अनिष्ट करनेवाला) होता हे । एेसे कर्तरीदोषसे युक्त
लग्रका परित्याग व्र देना चाहिये ॥ ४५०-४५१॥
( लग्र-दोष-- ) यदि लग्रसे छठे, आठवें
तथा बारहरवेमे च्छन्द्रमा हो तो यह !लग्रदोष'
कहलाता है । एेसा लग्र शुभग्रहों तथा अन्य सम्पूर्ण
गुणोसे युक्त होनेपर भी दोषयुक्त होता है। वह
लग्र बृहस्पति ओर शुक्रसे युक्त हो तथा चन्द्रमा
उच्च, नीच, मित्र या शत्रुराशिमें (कहीं भी) हो,
तो भी यत्नपूर्वक त्याग देने योग्य हे, क्योकि यह
सब गुणोंसे युक्त होनेपर भी वर-वधूके लिये
"घातक" कहा गया है ॥ ४५२-४५३ ३ ॥
( सग्रहदोष-- ) चन्द्रमा यदि किसी ग्रहसे
युक्त हो तो ' सग्रह" नामक दोष होता है। इस
दोषमें भी विवाह नहीं करना चाहिये। चन्द्रमा
यदि सूर्यसे युक्त हो तो दरिद्रता, मङ्गलसे युक्त हो
तो घात अथवा रोग, बुधसे युक्त हो तो अनपत्यता
(संतान-हानि), गुरुसे युक्त हो तो दौभाग्य,
शुक्रसे युक्त हो तो पति-पत्रीमे शत्रुता, शनिसे
युक्त हो तो प्रव्रज्या (घरका त्याग), राहुसे युक्त
हो तो सर्वस्वहानि ओर केतुसे युक्त हो तो कष्ट
ओर दरिद्रिता होती है॥४५४-४५७॥
( पापग्रहकी निन्दा ओर शुभग्रहोकी प्रणंसा-- )
मुने! इस प्रकार समग्रहदोपमें चन्द्रमा यदि पापग्रहसे
युक्त हो तो वर-वध्ु दोनोके लिये घातक होता हे।
यदि वह शुभग्रहोसे युक्त हो तो उस स्थितिमें यदि
उच्च या मित्रकी राशिमें चन्द्रमा हो तो लग्र
संक्षिप्त नारदपुराण
दोषयुक्त रहनेपर भी वर-वधूके लिये कल्याणकारी
होता हे। परंतु चन्द्रमा स्वोच्चे या स्वराशिमें
अथवा मित्रको राशिमें रहनेपर भी यदि पापग्रहसे
युक्त हो तो वर-वधू दोनोँके लिये घातक होता
हे ॥ ४५८-४५९ ९ ॥
( अष्टमराशि लग्रदोष-- ) वर या वधूके
जन्मलमग्रसे अथवा उनकी जन्मराशिसे अष्टमराशि
विवाह-लग्रमे पडे तो यह दोष भी वर ओर
वधूके लिये घातक होता है। बह राशि या वह
लग्र शुभग्रहसे युक्त हो तो भी उस लग्रको, उस
नवमांशसे युक्त लग्रको अथवा उसके स्वामीको
यत्पूर्वक त्याग देना चाहिये ॥४६०-४६१ ३ ॥
( द्वादश राशिदोष ) वर-वधूके जन्म-लग्रया
जन्मराशिसे द्वादश राशि यदि विवाह-लम्रमे पडे
तो वर-वधूके धनकी हानि होती है । इसलिये उस
लग्रको, उसके नवमांशको ओर उसके स्वामीको
भी त्याग देना चाहिये ॥४६२ रे ॥
(जन्मलग्न ओर जन्मराशिकी प्रशंसा- ) जन्म-
राशि ओर जन्मलग्रका उदय विवाहमें शुभ होता
हे तथा दोनोके उपचय (३; ६, १०, ११) स्थान
यदि विवाह-लग्रमें हो तो अत्यन्त शुभप्रद होते
हैं ॥ ४६ ३९ ॥
( विषधटी धुवाट्ध-- ) अश्चिनीका भ्रुवाङ्क
५०, भरणीका २४, कृत्तिकाका ३०, रोहिणीका
५४, मृगशिराका १३, आरद्रका २१, पुनर्वसुका
३०, पुष्यका २०, आश्लेषाका ३२, मघाका ३०,
पूर्वाफाल्गुनीका २०, उत्तराफाल्गुनीका १८, हस्तका
२१, चित्राका २०, स्वातीका १४, विशाखाका
१४, अनुराधाका १०, ज्येष्टाका १४, मूलका ५६,
पूर्वाषादका २४, उत्तराषाढका २०, श्रवणका १०,
धनिष्टाका १०, शतभिषाका १८, पूर्त भाद्रपदका
१६, उत्तर भाद्रपदका २४ ओर रेवतीका धरुवा
२० है । इन अश्नी आदि नक्षत्रोके अपने-अपने
((-0. 1/८11141/5511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्ितीय पाद
धरुवाङ्ध तुल्य घडीके वाद ४ घड़ीतक विषधघटी
होती हे । विवाह आदि शुभ कार्येमिं विषघरिकाओंका
त्याग करना चाहिये ॥ ४६४- ४६८ ॥
रवि आदि वारोमें जो मुहूर्त निन्दित कहा गया
हे, वह यदि अन्य लाख गुणोंसे युक्त होतो भी
विवाह आदि शुभ का्येमिं वर्जनीय ही हे ॥ ४६९ ॥
रवि आदि दिनम जो-जो वार-दोष कहे गये हँ
वे अन्य सव गुणोंसे युक्त हों तो भी शुभ कार्यमें
वर्जनीय हें ॥ ४७० ॥
नक्षत्रके जिस चरणमें पूर्वोक्त ' एकार्गल दोष'
हो, उस चरण (नवांश)-से युक्त जो लग्र हो
उसमे यदि गुरु, शुक्रका योग हो तो भी विषयुक्तं
दूधके समान उसको त्याग देना चाहिये ॥ ४७१ ॥
ग्रहण तथा उत्पातसे दूषित नक्षत्रको तीन ऋतु
(छः मास) -तक शुभ कार्यमें छोड़ देना चाहिये ।
जब चन्द्रमा उस नक्षत्रको भोगकर छोड़ दे तो वह
नक्षत्र जली हुई लकड़ीके समान निष्फल हो जाता
हे अर्थात् दोष-कारक नहीं रह जाता। शुभ
काययेमिं ग्रहसे विद्ध ओर पापग्रहसे युक्त सम्पूर्ण
नक्षत्रको मदिरामिश्रित पञ्चगव्यके समान त्याग
देना चाहिये; परंतु यदि नक्षत्र शुभग्रहसे विद्ध हो
तो उसका विद्ध चरणमात्र त्याज्य है, सम्पूर्णं नक्षत्र
२४९
नही; कितु पापग्रहसे विद्ध नक्षत्र शुभकार्यमिं
सम्पूर्ण रूपसे त्याग देने योग्य हे ॥ ४७२--४७४॥
( विहित नवमांश- ) वृष, तुला, मिथुन,
कन्या ओर धनुका उत्तरार्धं तथा इन राशियेकि
नवमांश विवाहलग्रमे शुभप्रद हैँ । किसी भी लग्रमें
अन्तिमि नवमांश यदि वर्गोत्तम हो तभी उसे शुभप्रद
समञ्चना चाहिये । अन्यथा विवाह-लग्रका अन्तिम
नवमांश (२६ अंश ४० कलाके बाद) अशुभ होता
है। यहां अन्य नवमांश नहीं ग्रहण करने चाहिये;
क्योकि वे ' कुनवांश' कहलाते हं । लग्रमं कुनवांश
हो तो अन्य सब गुणोंसे युक्त होनेपर भी वह त्याज्य
हे। जिस दिन महापात (सूर्य-चन्द्रमाका क्रान्ति
साम्य) हो, वह दिन भी शुभ कार्यमें छोड देने
योग्य है; क्योकि वह अन्य सव गुणोंसे युक्त होनेपर
भी वर-वधूके लिये घातक होता है। इन दोषोसे
भिन्न विद्युत्, नीहार (कुहरा) ओर वृष्टि आदि दोष,
जिनका अभी वर्णन नहीं किया गया हे, ' स्वल्पदोष'
कहलाते हें ॥ ४७५--४७८ ॥
( लघुदोष-- ) विद्युत, नीहार, वृष्टि, प्रतिसूर्यं
(दो सूर्य-सा दीखना), परिवेष (घेरा), इन्द्रधनुष,
घनगर्जन, लत्ता, उपग्रह, पात, मासदग्ध“ तिथि,
दग्ध, अन्ध, बधिर तथा पङ्गु--इन राशियेकि लग्र राशियंकि लग्र^,
१. विशेष--यदि नक्षत्रका मान ६० घडी हो तव इतने श्रुवाङ्क ओर उसके पंद्रहवे भाग चार घटीतक " विषघदी ' का
अवस्थान मध्यममानके अनुसार कहा गया है। इससे यह स्वयं सिद्ध होता है कि यदि नक्षत्रका मान ६० घडीसे अधिक
या अल्प होगा तो विषघटीका मान ओर श्रुवाङ्क भी उसी अनुपातसे अधिक याकम हो जायगा तथा स्पष्ट भभोगमानका
पंद्रहवाँं भाग ही विषघरीका स्पष्ट मान होगा।
मान लीजिये कि पुनर्वसुका भभोगमान ५६ घड़ी है तो त्रैरशिकसे अनुपात निकालिये। यदि ६० घद्ीमं ३० श्रुवाङ्क तो
इष्ट भभोग ५६ घमं क्या होगा ? इस प्रकार ५६ से ३० को गुणा करके ६० के द्वाग॒ भाग देनेसे २८ पुनर्वसुका स्पष्ट
धुवाङ्क हआ तथा भभोग ५६ का पंद्रह भाग ३ घट ४४ पल स्पष्ट "विषषरी " हुई । इसलिये २८ बरदीके बाद ३ बद ४
पलतक विषपघरी रहेगी ।
२. किसी भी यि अपना द्यै नवमंश दे ते वह वर्गेतम कट्लाता है। जसे मेषे नेका नवमांश तथ वृषर्म वृपक्रा नवाश इत्यदि।
३. सूर्य जिस नक्षत्रमे वर्तमान हो, उसमे ५, ७, ८, १०, १४, १५, १८, १९, २१, २२, २३, २४, २५--इन सं्या्भक
किसी भी नक्षत्रं चन्द्रमा हो तो "उपग्रहदोप' कहलाता दहै ।
८. सूर्य यदि धनु या मीनमें हो तो द्वितीया, वृष या कुम्भं हो तो चतुर्थी, कर्क या मेषे हो तो यष, कन्या या मिथुने
हो तो अष्टमो, सिंह या वृश्िकर्मे हो तो दशमी तथा तुला या मके हो तो द्रादशी "दग्ध तिथि कहलाती दै ।
५. कुम्भ, मीन, वृष, मिथुन, मेष, कन्या, तुला, वृश्चिकः, धनु ओर कर्क-ये क्रमशः चैत्र आदि मासम ' दग्ध रशिर्या' है।
तुला ओर वृश्चिक--ये दोनो केवल दिनर्मं तथा धनु ओर मकर-ये दोनों केवल रत्रिर्मं ˆ बधिर" होते है । एवं
मेष, वृष ओर सिंह-ये तीनौं दिनमें तथा मिथुन, ककर, कन्या-ये तीनों रत्रि्मे "अन्ध! होते है।
दिने कुम्भ ओर रात्रिम मीन "पन्न" होते ई।
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३५०
संक्षिप्त नारदपुराण
एवं छेटे-खटे ओर भी अनेक दोष रहै; अव उनकी
व्यवस्थाका प्रतिपादन किया जाता है ॥ ४७९-४८०॥
विद्युत् (विजली ), नीहार (कुहरा या पाला),
वृष्टि (वर्षा)- ये यदि असमयमें हों तभी दोष
समञ्चे जाते हे । यदि समयपर हों (जेसे जाडेके
दिनमें पाला पड, वर्षा ऋतुमे वर्षा हो तथा सघन
मेघमें बिजली चमक, तो सब शुभ ही समञ्चे जाते
हें ॥४८१॥ यदि वृहस्पति, शुक्र अथवा बुध
इनमेसे एक भी केन्द्रमे हों तो इन सब दोषोंको
नष्ट कर देते हे । इसमे संशय नहीं हे ॥४८२॥
( पञ्चशलाका-वेध-- ) पाच रेखाएं पडी
ओर पांच रेखाएं खडी खींचकर दो-दो रेखां
कोणोमे खीचने ( बनाने)-से पञ्चशलाका-चक्रः
, बनता हे। इस चक्रके ईशान कोणवाली दूसरी
रेखामं कृत्तिकाको लिखकर अगे प्रदक्षिण-क्रमसे
रोहिणी आदि अभिजितूसहित सम्पूर्णं नक्षत्रौका उल्लेख
करे। जिस रेखामें ग्रह हो, उसी रेखाकौ दूसरी
ओरवाला नक्षत्र विद्धर समञ्चा जाता है ॥४८३ < ॥
( लत्तादोष-- ) सूर्य आदिः ग्रह क्रमशः अपने
आश्रित नक्षत्रसे आगे ओर पीछे १२, २२, ३, ७,
६, ५, ८ तथा ९ वें दैनिक नक्षत्रको लातोसे दूषित
करते है, इसलिये इसका नाम 'लत्तादोष' हे ।
( पातदोष-- ) सूर्य जिस नक्षत्रम हों उससे
आश्लेषा, मघा, खती, चित्रा, अनुराधा ओर श्रवणतककी
जितनी संख्या हो, उतनी ही यदि अश्चिनीसे दिन-
नक्षत्रतक गिननेसे संख्या हो तो वह नक्षत्र पातदोषसे
दूषित समञ्ञा जाता हे ॥ ४८४-४८५ ६ ॥
( परिहार- ) सौरा (काठियावाड) ओर
शाल्वदेशमे लत्तादोष वर्जित है। कलिद्ध
(जगन्नाथपुरीसे कृष्णा नदीतकके भूभाग), वङ्ग
(वबद्भाल), वाहक (बलख) ओर कुरु (कुरुक्षेत्र)
देशमें पातदोष त्याज्य हें; अन्य देशोमें ये दोष
त्याज्य नहीं हैँ ॥ ४८६-४८७॥ मासदग्ध तिथि
तथा दग्ध लग्र-ये मध्यदेश (प्रयागसे पश्चिम,
कुरुक्षेत्रसे पूर्व, विन्ध्य ओर हिमालयके मध्य)में
वर्जित हे । अन्य देशोमें ये दूषित नहीं हे ॥४८८॥
पङ्गु, अन्ध, काण, लग्र तथा मासमे जो शून्य
राशियों कही गयी ह, वे गोड (बङ्गालसे भुवनेश्चसतक)
ओर मालव (मालवा) देशमें त्याज्य हैं । अन्य
देशोमे निन्दित नहीं हे ॥ ४८९ ॥
( विशेष-- ) अधिक दोषोंसे दुष्ट कालको तो
ब्रह्माजी भी शुभ नहीं बना सकते हैँ; इसलिये
जिसमे थोडा दोष ओर अधिक गुण हो, एेसा
काल ग्रहण करना चाहिये ॥४९०॥
( वेदी ओर मण्डप- ) इस प्रकार वर-वधूके
लिये शुभप्रद उत्तम समयमे श्रेष्ठ लग्रका निरीक्षण
(खोज) करना चाहिये । तदनन्तर एक हाथ ऊंची,
चार हाथ लंबी ओर चार हाथ चौड़ उत्तर दिशामें
नत (कुछ नीची) वेदी बनाकर सुन्दर चिकने
चार खम्भोका एक मण्डप तैयार करे, जिसमें
चारों ओर सोपान (सीदि्योँ) बनायी गयी हों।
मण्डप भी पूर्व-उत्तरमें निम्र हो । वहां चारों तरफ
१. पञ्चरशलाकाचक्र-
य शा यु ॐ> रे अ= भ.
२. जेसे--श्रवणमें कोई ग्रह हो तो मघा नक्षत्र विद्ध
समञ्चा जायगा।
३. सूर्य, पूर्णं चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शि,
राहु ।
४. इनमें सूर्य अपनेसे आगे ओर पूर्णं चन्द्र पीठे,
फिर मद्भल आगे ओर बुध पीछ्छेके नक्षत्रोको दूषित करते
टे। एसा ही क्रम आगे भी समञ्मना चाहिये,
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पूर्व भाग-द्वितीय पाद
३५१
कदलीस्तम्भ गड हों । वह मण्डप शुक आदि
पक्षियोके चित्रोंसे सुशोभित हो तथा वेदी नाना
प्रकारके माङ्गलिक चित्रयुक्त कलशोँसे विचित्र
शोभा धारण कर रही हो । भोति-भोतिके वन्दनवार
तथा अनेक प्रकारके फूलोके शृद्खारसे वह स्थान
सजाया गया हो । एेसे मण्डपके बीच बनी हुई
वेदीपर्, जह ब्राह्मणलोग स्वस्तिवाचनपूर्वक आशीर्वाद
देते हो, जो पुण्यशीला स्त्रियों तथा दिव्य समारोोसे
अत्यन्त मनोरम जान पड़ती हो तथा नृत्य, वाद्य
ओर माङ्गलिक गीतोंकी ध्वनिसे जो हदयको
आनन्द प्रदान कर रही हो, वर ओर वधूको
विवाहके लिये विठावे ॥४९१-४९५॥
( वर-वधूको कुण्डलीका मिलान-- ) आठ
प्रकारके भकूट, नक्षत्र, राशि, राशिस्वामी, योनि
तथा वर्णं आदि सब गुण यदि ऋजु (अनुकूल या
शुभ) हों तो ये पुत्र-पौत्रादिका सुख प्रदान
करनेवाले होते हें ॥ ४९६ ॥
वर ओर कन्या दोनोंकी राशि ओर नक्षत्रे भिन्न
हों तो उन दोनोंका विवाह उत्तम होता हे ¦ दोनोकी
राशि भिन्न ओर नक्षत्र एक हो तो उनका विवाह
मध्यम होता है ओर यदि दोनोंका एक ही नक्षत्र,
एक ही राशि हो तो उन दोनोका विवाह प्राणसंकर
उपस्थित करनेवाला होता हे ॥ ४९७ < ॥
( स्त्रीदूर दोष-- ) कन्यके नक्षत्रसे प्रथम
नवक (नौ नक्षत्रों )-के भीतर वरका नक्षत्रहो तो
यह ' स्त्रीदूर ' नामक दोप कहलाता है; जो अत्यन्त
निन्दित हि । द्वितीय नवक (१० से १८ तक) -के
भीतर हो तो मध्यम कहा गया हे। यदि तृतीय
नवक (८१९ से २७ तक)-के भीतर हो तो उन
दोनोंका विवाह श्रेष्ठ कहा गया है ॥४९८ ६ ॥
( गणविचार-- ) पूर्वाफल्गुनी, पूर्वापाद्, पूर्त
भाद्रपद, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तरापाद्, उत्तर भाद्रपद,
रोहिणी, भरणी ओर आद्रा-य नक्षत्र मनुप्यगण
हे । श्रवण, पुनर्वसु, हस्त, स्वाती, रेवती, अनुराधा,
अधिनी, पुष्य ओर मृगशिरा-ये देवगण हँ तथा
मघा, चित्रा, विशाखा, कृत्तिका, ज्येष्ठा, धनिष्ठा,
शतभिषा, मूल ओर आश्लेषा--ये नक्षत्र राक्षसगण
हे ॥ ४९९-५०१॥ यदि वर ओर कन्याके नक्षत्र
किसी एक ही गणमें हों तो दोनेमें परस्पर सव
प्रकारसे प्रेम बढता है। यदि एकका मनुष्यगण
ओर दूसरेका देवगण हो तो दोनोमिं मध्यम प्रेम
होता हे तथा यदि एकका राक्षसगण ओर दूसरेका
देवगण या मनुष्यगण हो तो वर-वधू दोनोंको
मृत्युतुल्य क्लेश प्राप्त होता है ॥५०२॥
( राशिकूट-- ) वर ओर कन्याकी राशियोको
परस्पर गिननेसे यदि वे छठी ओर आटठवीं
संख्यामें पड़ती हों तो दोनोके लिये घातक है ।
यदि पांचवीं ओरे नवीं संख्यामें हों तो संतानकी
हानि होती है। यदि दूसरी ओर बारहवीं संख्यां
हों तो वर-वधू दोनों निर्धन होते ह। इनसे भिन्न
संख्यामें हां तो दोनोमें परस्पर प्रेम होता ह ॥५०३॥
( परिहार- ) द्विद्रादश (२, १२) ओर नवपञ्चम
(८९, ५) दोपमे यदि दोनोंकी राशियोंका एक ही
स्वामी हो अथवा दोनोके राशिस्वामिययोमें मित्रता
हो तो विवाह शुभ कहा गया है। परतु षड्षटक
(६, ८) -मे दोनोके स्वामी एक होनेपर भी
विवाह शुभदायक नहीं होता हे ॥५०४॥
( योनिकूट-- ) १ अश्च, २ गज, ३ मेष, ४
सर्प, ५ सर्प, ६ श्वान, ७ मार्जार, ८ मेष, ९ मार्जार,
१० मूपक, ११ मूपक, १२ गौ, १३ महिष, १४
व्याघ्र, १५ महिष, १६ व्याघ्र, १७ मृग, १८ मृग,
१९ शान, २० वानर, २१ नकुल, २२ नकुल, २३
वानर, २८ सिंह, २५ अश्च, २६ सिंह, २७ गौ तथा
२८ गज-ये क्रमशः अश्िनीसे लेकर रेवतीतक
( अभिनितूसहित) अद्राटेस नक्षत्रोकी योनिर्योँ
टे ॥ ५०८५५०६ ॥ इनमं श्वान ओर मृगे, नकुल
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३५२
ओर सर्पमे, मेष ओर वानरमे, सिंह ओर गजमे,
गौ ओर व्याघ्रमे, मूषक ओर मार्जारमें तथा महिष
ओर अश्चमें परस्पर भारी शत्रुता होती है ॥५०७॥
( वर्णकूट-- >) मीन, वृश्चिक ओर कर्कराशि
ब्राह्मण वर्ण है, इनके वादवाले क्रमशः क्षत्रिय,
वैश्य ओर शृद्र वर्णं हे\ । (एक वर्णके वर ओर
वधूमे तो विवाह स्वयंसिद्ध है ही) पुरुष-राशिके
वर्णसे स्त्री-राशिक्छा वर्ण हीन हो तो भी विवाह
शुभ माना गया है। इससे विपरीत (अर्थात्
युरुषराशिके वरण्सि स्त्रीराशिका वर्णं श्रेष्ठ) हो तो
अशुभ समञ्जना चाहिये ॥ ५०८ ॥
( नाडीविचार-- ) चार चरणवाले नक्षत्र (अधिनी,
भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा-
फाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल,
संक्षिप्त नारदपुराण
पूर्वाषाट, श्रवण, शतभिषा, उत्तर भाद्रपद, रेवती-
इन) -में उत्पन्न कन्याके लिये अशधिनीसे आरम्भ
करके रेवतीतक तीन पर्वोपर क्रम-उत््रमः से
गिनकर नाडी समञ्चे। तीन चरणवाले (कृत्तिका,
पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, विशाखा, उत्तराषाद़ ओर
पूर्वं भाद्रपद) नक्षत्रोमे उत्पन्न कन्याके लिये कृत्तिकासि
लेकर भरणीतक क्रम-उत्क्रमरे से चार पर्वोपर
गिनकर नाडीका ज्ञान प्राप्त करे तथा दो चरणोंवाले
(मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा) नक्षत्रोमें उत्पन्न कन्याकों
नाड़ी जाननेके लिये मृगशिरासे लेकर रोहिणीतक
पांच पर्वोपर क्रम-उक्क्रमभ्से गिने। यदि वर ओर
वधू दोनोके नक्षत्र एक पर्वपर पड तो वे उनके लिये
घातक हे ओर भिन्न पर्वोपर पडं तो उन्हं शुभ
समञ्ना चाहिये ॥५०९ रे ॥
१. राशियोके वर्णको स्पष्ट समञ्जनेके लिये यह कोष्ट देखं-
ब्राह्यं
२. त्रिनाडी-
| १६ | अश्चिनी | आद्रा | पुनर्वसु |उत्तराफाल्गुनी | हस्त | ज्येष्ठा मूल ।¡ शतभिषा । पूर्वं भाद्रपद
२ [ म र अततम [ सरा [ पनि `
[3 क [नं [ज म | चत्र | उल
३. चतुर्नाडी-
मघा पूर्वाफाल्गुनी | ज्येष्ठा
2. पञ्चनारी-
मूल
[२ [ रंहिनौ | ष्संणः
सुन्व [हल _ | वाखा [उत्तरपद
आद्र स्वाती
२ [मगहर स्वत [ तमया [ युव म्द [ 7 `
२ [अर [हस्त
[3 | सुन्वसु अनुराधा
2 | उत्तगपाद् | रोहिणी
को
उत मद
((-0. 1\/॥111104/5511॥1 11881 \/8181185। (01661011. 14111260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३५३
वर ओर कन्याकी कुण्डली मिलानेके लिये जो वश्य, योनि, राशिकूट, योनिकूट, वर्णकूट तथा नाडी आदिका वर्णन
किया गया है, उन सवको सुगमतापूर्वक जानने तथा उनके गुणोको समञ्नेके लिये निम्राङ्भित चक्रपर दृष्टिपात कोजिये-
शतपदचक्र
8
वृ.३
¦ 1& [२ (४
शु.र वर.१
माजा-, छग 5 मूषक
म् न ॥न १॥च
३॥ च. | २॥जा
स | न [फ | क [क [ल
श.३
1 |
[ल [द [च [ष [र [र [रर [च [च ~ स
((-0. 1८111551 81188 \/8181185। (01611010. 01411260 0 60810011
५ संक्षि नारदपुराण
३ तारागुण। वर
(१०/२० अ (६
0१८1४ १/३ ।२।१॥|२३।१॥|३|६॥|३ [३ |
मनुष्य| ६ < १॥।३|१॥|३ |१॥]३ [३
राक्षस| ० | ० | ६
३ [ररम [छा [रा [ररा
6 उ [3 [६1317] रा 18-
त्राता | ] = : = | 2 = ~<. - ३ |३ |१॥]३ [६] ३ [एड [३
| ५.८ / ५! = । (५4 © ० । ४७ 1.95 । ७।१॥१॥ |० | १॥| 9 १॥| ° | १॥ | १॥ ।
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मि. ७ | ५ | ५५ ७ (= [१ ९।३ 3 १॥ १॥ | ३ १॥ | ३ ३
५ | ० [७ [9 ५ ग्रहर्ैत्रीगुण। वर
७ | ०9 | ७ |
5 [७ र स्. चम, बुः व् रा [र
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७
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>|2[<- (य व|]
| चन्द्र । | ५ ॥.41 १ # 4 बी ॥
मल [५ [| || [३ [५
तुध ४।१।॥|५ | ॥|५।४
ह || 7२ [इ
|
शनि
४ योनिगुण। वर् विवाहे
= १ विवाहम वर्णगुण। वर्
त
(१०९९१०४
311१२
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २५५
जन्मकालिक ग्रहोौकी स्थिति तथा जन्म-नक्षत्र-सम्बन्धी आठ प्रकारके कूटद्वारा वर-वधूको कुण्डलीका मिलान
किया जाता है। यदि जन्म-लग्र या जन्म-राशि (चन्द्रमा) से १, ४,५७,८ या १२ वें स्थानम मद्गल या अन्य
पापग्रह वरकी कुण्डलीमें हों तो पत्रीके लिये ओर कन्याकौ कुण्डलीमें हों तो वरके लिये अनिष्टकारी होते है ।
यदि दोनोंकी कुण्डलियोमें उक्त स्थानोमें पापग्रहकी संख्या समान हो तो उक्त दोष नहीं माना जाता दै।
उदाहरणके लिये-
वरको कुण्डली कन्याकौ कुण्डली
¬ ] >< ~ -2
4 ३ |
रा० ६ ४ चं० गुर २ वु |
| <-> १० मं <> १२ |
श" |
९ १९१ | ~ गु° रा
------->
पुनर्वसुके चतुर्थं चरणमे जन्म पूर्वाफाल्गुनीके प्रथम चरणर्मे जन्म
यहाँ वरकी कुण्डलीमें ४ थे ओर अवे स्थानमे शनि ओर मङ्गल दो पापग्रह हैँ तथा कन्याको कुण्डलीं भी
७ वें स्थानमें शनि, मङ्गल है, जिससे दोनोके परस्पर माङ्गलिक दोष नष्ट होनेके कारण इन दोनोंका वैवादिक सम्बन्ध
रेष्ठ सिद्ध होता है। यहाँ भकूटके गुण इस प्रकार हँ-
वर् कन्या गुण
१ वर्ण- ब्राह्मण . क्षत्रिय १
२ वश्य- जलचर वनचर °
३ तारा- ५ ६ १॥
४ योनि- मार्जार मूषक ०
५ ग्रह (राशीश)- चन्द्र सूर्य ५
६ गण- देव मनुष्य ६
७ भकूरट- = १२ =
८ नाडी- १ २ ८
गुणोका योग=२१॥
इस तरह नक्षत्रमेलापकमे भी गुणोका योग २१॥ है। अठारहसे अधिक होनेके कारण इन दर्नोका विवाह -
सम्बन्ध श्रेष्ठ सिद्ध होता है।
इसी प्रकार अन्य कुण्डलिर्योसे भी ग्रह ओर् नक्षत्रका मेल देखकर विवाहका निर्णय कमना चादिये।
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 81188 81811851 (01661010. 01411260 0 6810011
३५६
( विवाहोके भद -- ) ऊपर बताये हए शुभ
समयमे (१) प्राजापत्य, (२) ब्राह्म, (३) देव
ओर (४) आर्ष-ये चार प्रकारके विवाह करने
चाहिये । ये ही चारों विवाह उपर्युक्त फल देनेवाले
होते ह। इससे अतिरिक्त जो गान्धर्व, आसुर,
पैशाच तथा राक्षस विवाह हें, वे तो सब समय
समान ही फल देनेवाले होते है ॥ ५१०-५११॥
( अभिजित् ओर गोधूलि लग्र- ) सूर्योदय-
कालमें जो लग्र रहता हे, उससे चतुर्थं लग्रका नाम
अभिजित् है ओर सातवों गोधूलि-लग्र कहलाता हे।
ये दोनो विवाहमें पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाले होते
हे ॥ ५१२ ॥ पूर्वं तथा कलिङ्ग देशवासियोके लिये
गोधूलि-लग्र प्रधान है ओर अभिजित्-लग्र तो
सब देशोके लिये मुख्य कहा गया है, क्योकि वह
सब दोषोका नाश करनेवाला हे ॥ ५१२ ॥
( अभिजित्-प्रशंसा-- ) सूर्यके मध्य आकाशम
जानेपर अभिजित् मुहूर्तं होता है, वह समस्त
दोषोको नष्ट कर देता हे, ठीक उसी तरह, जैसे
त्रिपुरासुरको श्रीशिवजीने नष्ट किया धा॥ ५१४॥
पुत्रका विवाह करनेके बाद छः मासोके
भीतर पुत्रीका विवाह नहीं करना चाहिये । एक
पुत्र या पुत्रीका विवाह करनेके बाद दूसरे पुत्रका
उपनयन भी नहीं करना चाहिये । इसी प्रकार एक
मङ्गल कार्य करनेके वाद छः मासोके भीतर दूसरा
मङ्गल कार्य नहीं करना चाहिये। एक गर्भसे
उत्पन्न दो कन्याओंका विवाह यदि छः मासके
भीतर हो तो निश्चय ही तीन वर्षके भीतर उनमेसे
एक विधवा होती है ॥५१५-५१६॥ अपने पुत्रके
साथ जिसकी पुत्रीका विवाह हो, फिर उसके
पुत्रके साथ अपनी पुत्रीका विवाह करना ' प्रत्युदराह '
कहलाता है । एेसा कभी नहीं करना चाहिये तथा
किसी एक ही वरको अपनी दो कन्यार्णँ नहीं देनी
चाहिये। दो सहोदर वरोंको दो सहोदरा कन्यां
संक्षिप्त नारदपुराण
नहीं देनी चाहिये। दो सहोदरोका एक ही दिन
(एक साथ) विवाह या मुण्डन नहीं करना
चाहिये ॥ ५१७ र ॥
( गण्डान्त-दोष-- ) पूर्वकथित गण्डान्तमें यदि
दिनमें बालकका जन्म हो तो वह पिताका, रात्निमें
जन्म हो तो माताका ओर संध्या (सायं या प्रातः)
कालमें जनम हो तो वह अपने शरीरके लिये
घातक होता है। गण्डका यह परिणाम अन्यथा
नहीं होता है । मूलमें उत्पन्न होनेवाली संतान पुत्र
हो या कन्या, श्शुरके लिये घातक होती है, किंतु
मूलके चतुर्थं चरणमें जन्म॒ लेनेवाला बालक
श्शुरका नाश नहीं करता है तथा आश्लेषाके
प्रथम चरणमें जन्म लेनेवाला बालक भी पिताका
या श्वशुरका विनाश करनेवाला नहीं होता हे।
ज्येष्ठाके अन्तिम चरणमें उत्पन्न बालक ही शशुरके
लिये घातक होता है, कन्या नहीं । किसी प्रकार
पूर्वाषाढ या मूलमें उत्पन्न कन्या भी माता या
पिताका नाश करनेवाली नहीं होती है। ज्येष्ठा
नक्षत्रमे उत्पन्न कन्या अपने पतिके बडे भाईके
लिये ओर विशाखामें जन्म लेनेवाली कन्या अपने
देवरके लिये घातक होती है ॥५१८-५२१॥
( वधू-प्रवेश-- ) विवाहके दिनसे ६, ८, १०
ओर वें दिनमें वधू-प्रवेश (पतिगृहमें प्रथम
प्रवेश) हो तो वह सम्पत्तिको वृद्धि करनेवाला
होता है । द्वितीय वर्ष, जन्म-राशि, जन्म-लग्र ओर
जन्म-दिनको छोडकर अन्य समयमे सम्मुख शुक्र
रहनेपर भी वैवाहिक यात्रा (वधू-प्रवेश) शुभ
होती हे ॥ ५२२-५२३॥
( देव-प्रतिष्ठा- ) उत्तरायणमें, वृहस्पति ओर
शुक्र उदित हों तो चैत्रको छोडकर माघ आदि
पाच मासोके शुक्लपक्षमें ओर कृष्णपक्षमें भी
आरम्भसे आठ दिनतक सब देवताओंको स्थापना
शुभदायक होती है । जिस देवताकी जो तिथि है,
((-0. ८1114551 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद्
उसमें उस देवताकी ओर २, ३, ५, ६, ७, १०
११, १२, १३ तथा पूर्णिमा-इन तिधियोमे सब
देवताओंकौ स्थापना शुभ होती है। तीनों उत्तरा,
पुनर्वसु, मृगशिरा, रेवती, हस्त, चित्रा, स्वाती,
पुष्य, अधिनी, रोहिणी, शतभिषा, श्रवण, अनुराधा
ओर धनिष्ठा-इन नक्षत्रे तथा मङ्गलवारको
छोडकर अन्य वारोमें देव-प्रतिष्ठा करनी चाहिये।
स्थापना करनेवाले (यजमान) -के लिये सूर्य, तारा
ओर चन्द्रमा बलवान् हो, उस दिनके पूर्वाह्नमे,
शुभ समय, शुभ लग्र ओर शुभ नवमांशमें तथा
यजमानको जन्मराशिसे अष्टम राशिको छोडकर
अन्य लग्रोमे देवताओंकौ प्रतिष्ठा शुभदायक होती
हे ॥ ५२४--५२९॥
मेष आदि सव राशियों शुभ ग्रहसे युक्त या
दृष्ट हों तो देवस्थापनके लिये श्रेष्ट समञ्जी जाती
हे । प्रत्येक कार्यमिं पञ्चाङ्ग (तिथि, वार, नक्षत्र,
योग ओर करण) शुभ होने चाहिये ओर लग्रसे
अष्टम स्थान भी शुभ (ग्रहवर्जित) होना आवश्यक
हे ॥५३०॥ (१) लग्रमे चन्द्रमा, सूर्य, मङ्गल,
राहु, केतु ओर शनि कतकि लिये घातक होते हें ।
अन्य (बुध, गुरु ओर शुक्र) लग्रमे धन, धान्य
ओर सव सुखोंको देनेवाले होते है । (२) द्वितीय
भावमे पापग्रह अनिष्ट फल देनेवाले ओर शुभग्रह
धनकौी वृद्धि करनेवाले होते हैं । (३) तृतीय
भावमें शुभ ओर पाप सव ग्रह पुत्र-पौत्रादि
सुखको बदढानेवाले होते हें । (४) चतुर्थं भावम
शुभग्रह शुभफल ओर पापग्रह पाप-फलको देते
हें । (५) पञ्चम भावमें पापग्रह कष्टदायक ओर
शुभग्रह पुत्रादि सुख देनेवाले होते हँ । (६) षष्ट
भावम शुभग्रह शत्रुको वदानेवाले ओर पापग्रह
शत्रुके लिये घातक होते है । (७) सप्तम भावमें
पापग्रह रोगकारक ओर शुभग्रह शुभ फल देनेवाले
होते है । (८) अष्टम भावमे शुभग्रह ओर पापग्रह
सभी कर्ता (यजमान)-के लिये घातक हाते हं।
(९) नवम भावमें पापग्रहदहोंतोवे धर्मक नर
३९५७
करनेवाले हे ओर शुभग्रह शुभ फल देनेवाले होते
ठे । (१०) दशम भावमें पापग्रह दुःखदायक ओर
शुभग्रह सुयशकौ वृद्धि करनेवाले होते दै।
(११) एकादश स्थानमें पाप ओर शुभ सव ग्रह
सव प्रकारसे लाभकारक ही होते दैं। (१२)
लग्रसे द्वादश स्थानम पाप या शुभ सभी ग्रह व्यय
(खर्च) -को वढानेवाले होते हैं ॥ ५३१-५३६॥
( प्रतिष्ठामें अन्य विशेष वात-- ) प्रतिष्टा
करानेवाले पुरोहित (या आचार्य) -को अर्थज्ञान न
हो तो यजमानका अनिष्ट होता हे । मन्त्रोका अशुभ
उच्चारण हो तो ऋत्विजो (यज्ञ करानेवार्लो ) -का
ओर कर्म विधिहीन हो तो कर्ताकी स्त्रीका अनिष्ट
होता है। इसलिये नारद ! देव~प्रतिष्ठाके समान
दूसरा शत्रु भी नहीं है। यदि लग्रमे अधिक गुण
हों ओर थोड-से दोष हों तो उसमं देवताओंकी
प्रतिष्ठा कर लेनी चाहिये । इससे कर्ता (यजमान) -
के अभीष्ट मनोरथको सिद्धि होती है। मुने! अव
मे संक्षेपसे ग्राम, मन्दिर तथा गृह आदिके
निर्माणकी वात बताता हूं ॥ ५२३७-५३९॥
( गृहनिर्माणके विषयमे ज्ञातव्य वातें-- ) गृह
आदि वनाना हो तो पहले गन्ध, वर्ण, रस तथा
आकृतिके द्वारा क्षेत्र (भूमि) -की परीक्षा कर लेनी
चाहिये । यदि उस स्थानको मिदट्रीमे मधरु (शद) -
के समान गन्ध ही तो ब्राह्मणोके, पुष्पसदृश गन्ध
हो तो क्षत्नियोके, आम्ल (खटाई) -के समान गन्ध
हो तो वैश्योके ओर मांसकी-सी गन्ध होतो वह
स्थान शुद्रोके वसनेयोग्य जानना चाहिये । वर्हँकी
म्द्रीका रण श्रेत हो तो ब्राह्मणोके, लाल हो तो
षत्रियोके, पीत (पीला) हो तो वैश्योके ओर
कृष्ण (काला) हो तो वह शुद्रौके निवासके योग्य
-टै। यदि वहकि मिद्रीका स्वाद मधुर हौ तो
्रह्मणेकि, कडवा ( मिचके समान) हो तो क्षत्रियेकि
तिक्त हो तो वैश्येकि ओर कषाय (कमैला) स्वाद दहो
तो उस स्थानक शुद्रकि निवास करनेयोग्य समङ्जना
चहिये ॥५८०-५४१ ॥ ईशान, पूर्वं ओर उत्तर दिशे
((-0. 1/८1111(4/5511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
३५८
प्लव (नीची) भूमि सबके लिये अत्यन्त वृद्धि
देनेवाली होती हे। आन्य दिशाओमें प्लव (नीची)
भूमि सबके लिये हानि करनेवाली होती हे ॥ ५४२ ॥
( गृहभूमि-परीक्षा-- ) जिस स्थानम घर बनाना
हो वहां अरति (कोहिनीसे कनिष्ठा अंगुलितक)
के बरावर लम्बाई, चौडाई ओर गहराई करके
कुण्ड बनावे। फिर उसे उसी खोदी हुई मिट्रीसे
भरे। यदि भरनेसे मिद्री शेष बच जाय तो उस
स्थानमें वास करनेसे सम्पत्तिकी वृद्धि होती हे।
यदि मिद्री कम हो जाय तो वहां रहनेसे सम्पत्तिकी
हानि होती है। यदि सारी मिद्रीसे वह कुण्ड भर
जाय तो मध्यम फल समञ्जना चाहिये ॥ ५४३ ॥
अथवा उसी प्रकार अआरलिके मापका कुण्ड वनाकर
सायंकाल उसको जलसे पूरित कर दे ओर
प्रातःकाल देखे; यदि कुण्डमें जल अवशिष्ट हो तो
उस स्थानमें वृद्धि होगी। यदि कोचड् (गीली
मिदट्री) ही बची हो तो मध्यम फल है ओर यदि
कुण्डकी भूमिम दरार पड़ गयी हो तो उस
स्थानमें वास करनेसे हानि होगी ॥ ५४४ ॥
मुने ! इस प्रकार निकास करनेयोग्य स्थानकौ
भली भोति परीक्षा करके उक्तं लक्षणयुक्तं भूमिमें
दिक्साधन (दिशाओंका ज्ञान) करनेके लिये
समतल भूमिमें वृत्त (गोल रेखा) बनावे । वृत्तके
मध्य भागमें द्वादशाङ्गुल शद्ध (बारह विभाग या
पर्वसे युक्त एक सीधी लकड ) -कौ स्थापना करे
ओर दिक्साधनविधिसे दिशाओंका ज्ञान करे।
फिर कतकि नामके अनुसार षड्वर्गं शुद्ध क्षेत्रफल
( वास्तुभूमिकौ लम्बाई-चौडाईका गुणनफल)
ठीक करके अभीष्ट लम्बाई-चौड़ाईके बराबर
( दिशासाधित रेखानुसार) चतुर्भुज बनावे। उस
चतुर्भुज रेखामार्गपर सुन्दर प्राकार (चहारदीवारी)
बनावे। लम्बाई ओर चोड़र्मे पूर्वं आदि चारों
दिशाओमे आठ-आठ द्वारके भाग होते टै।
प्रदक्षिणक्रमसे उनके निम्नाङ्किति फल हैँ । (जैसे
पर्वभागमें उत्तरसे दक्षिणतक) १- हानि, २- निर्धनता,
संक्षिप्त नारदपुराण
३- धनलाभ, ४- राजसम्मान, ५- बहुत धन, ६- अति
चोरी, ७- अति क्रोध तथा ८- भय-ये क्रमशः आठ
द्वारोके फल हें । दक्षिण दिशामें क्रमशः १- मरण,
२- बन्धन, ३- भय, ४- धनलाभः, ५- धनवृद्धि,
६- निर्भयता, ७- व्याधिभय तथा ८- निर्बलता-ये
(पूर्वसे पश्चिमतकके) आठ द्वारोके फल हे ।
पश्चिम दिशामें क्रमशः १- पुत्रहानि, २- शतरुवृद्धि,
३२- लक्ष्मीप्राति, ४- धनलाभ, ५- सोभाग्य, ६- अति
दोभाग्य, ७- दुःख तथा ८- शोक-ये दक्षिणसे
उत्तरतकके आठ द्वारोके फल हैँ । इसी प्रकार
उत्तर दिशामें (पश्चिमसे पूर्वतक) १- स्त्री-हानि,
२- निर्बलता, २- हानि, ४- धान्यलाभ, ५- धनागम,
६-सम्पत्ति-वृद्धि, ७- भय तथा ८- रोग- ये क्रमशः
आट द्वारोके फल हें ॥ ५४५-५५२॥
इसी तरह पूर्वं आदि दिशाओंके गृहादिमे भी द्वार
ओर उसके फल समञ्चन चाहिये । द्वारका जितना
विस्तार (चौडाई) हो, उससे दुगुनी ऊँची किवादं
बनाकर उन्हें घरमें (चहारदीवारीके) दक्षिण या
पश्चिम भागमें लगावे ॥ ५५३ ॥ चहारदीवारीके भीतर
जितनी भूमि हो, उसके इक्यासी पद (समान खण्ड)
बनावे । उनके बीचके नौ खण्डोमें ब्रह्माका स्थान
समञ्चे। यह गृहनिर्माणमें अत्यन्त निन्दित हे।
चहारदीवारीसे मिले हृए जो चारों ओरके ३२ भाग है
वे पिशाचांश कहलाते हं । उनमें घर बनाना दुःख,
शोक ओर भय देनेवाला होता हे । शेष अंशो (पदों) -
मे घर बनाये जायं तो पुत्र, पौत्र ओर धनकौ वृद्धि
करनेवाले होते हे ॥ ५५४-५५५ ३ ॥
वास्तुभूमिकी दिशा-विदिशार्ओकी रेखा वास्तुकी
शिर कहलाती हे। एवं व्रह्मभाग, पिशाचभाग तथा शिका
जा ज्हा योग हो, वर्ह -वर्हौँ वास्तुकी मर्मसन्धि
समञ्जनी चाहिये। वह मर्मसन्धि गृहारम्भ तथा गृह-
वेशम अनिषठकसक समद्मी जाती ै।५५६-५५५७ २ ॥
( गहारम्भपें प्रशस्त मास-- ) मार्गशीर्ष, फाल्गुन,
वैशाख, माघ, श्रावण ओर कार्तिक-ये मास गृहारम्भमें
पुत्र, आरोग्य ओर धन देनेवाले होते ई ॥ ५५८ ६ ॥
((-0. 1/८1111(4/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
( दिशाओमें वर्ग ओर वर्गेश-- ) पूर्वं आदि
आटो दिशाओं क्रमशः अकारादि आठ वर्ग होते
हिं । इन दिशावगेकि क्रमशः गरुड, मार्जार, सिंह,
श्वान, सर्प, मूषक, गज ओर शशक (खरगोश)- ये
योनियं होती हैँ । इन योनि-वगेमिं अपने पाचवें
वर्गवाले परस्पर शत्रु होते ह ^ ॥ ५५९-५६०॥
(जिस ग्राममें या जिस दिशामें घर बनाना हो,
वह साध्य तथा घर बनानेवाला साधक, कर्ता ओर
भर्ता आदि कहलाता है। इसको ध्यानमें रखना
चाहिये ।) साध्य (ग्राम)-की वर्ग-संख्याको लिखकर,
उसके पीले (वाये भागे) साधककी वर्ग-संख्या
लिखे। उसमें आठका भाग देकर जो शेष बचे,
वह साधकका धन होता है। इसके विपरीत
विधिसे (अर्थात् साधककौ वर्ग-संख्याके वायं
१. दिशा ओर वर्गं जाननेका चक्र, यथा-
परत १
21
तवर्ग | रवर्ग
सप | श्न
८ ईशान अग्निर
७ उत्तर दक्षिण ३
पवर्ग
६ वायु | मूषक नऋत्य ४
पश्चिम ५ +
३५९
भागमें साध्यकी वर्ग-संख्या रखकर जो संख्या
बने, उसमें आठसे भाग देकर शेष) साधकका
ऋण होता है। इस प्रकार ऋणकी संख्या अल्प
ओर धन-संख्या अधिक हो तो शुभ माने (अर्थात्
उस ग्राम या उस दिशामें बनाया हुआ घर रहने
योग्य है, एेसा समञ्च) २ ॥५६१८क-ख) ॥
इसी प्रकार साधकके नक्षत्र साध्यके नक्षत्रतक
गिनकर जो संख्या हो उसको चारसे गुणा करके
गुणनफलमें सातसे भाग दे तो शेष साधकका धन
होता हे ॥५६२॥
( वास्तुभूमि तथा धरके धन, ऋण, आय,
नक्षत्र, वार ओर अंशके ज्ञानका साधन-- ) वास्तुभूमि
या घरकी चौडाईको लम्बाईसे गुणा करनेपर गुणनफल
पद ' कहलाता है। उस (पद) -को (६ स्थानों
उदाहरण--अवर्ग ( अ इ उ ऋ लृ एए ओ ओ)-कौ पूर्वं दिशा ओर गरुडयोनि दै । वहसि क्रमशः दिशा गिननेपर्
पाचवीं दिशा (पश्चिम) -में तवर्ग ओर सर्पं इस अवर्ग एवं गरुडका शत्रु है। इस प्रकार परस्पर सम्मुख दिशामं शत्रुता
होती है। इसी तरह कवर्ग (क ख ग घ ङ)-की दिशा अग्निकोण ओर योनि मार्जार (विलाव) है। चवर्ग (च छ
ज ञ्च ज)-की दक्षिण दिशा ओर सिंह योनि है। टवर्ग (ट ठ ड ढ ण)-कौ नैऋत्य दिशा ओर श्वान योनि है। तवर्ग
(तथदधन)-की पश्चिम दिशा ओर सर्पं योनि है। पवर्ग (पफ वभ म)-कौ वायुकोण दिशा ओर मृषक (चृहा)
योनि है। यवर्ग (य र ल व)-की उत्तर दिशा ओर गज (हाथी) योनि है। शवर्गं (श ष स ह)-की ईशान दिशा ओ
शशक (खरगोश) योनि है। इसका प्रयोजन यह है कि अपने-अपने नामके आदि अक्षरसे अपना वर्ग समञ्ञकर दिशा
ओर योनिका ज्ञान करे। शत्रू-दिशामें अपने रहनेके लिये घर न बनावे। अर्थात् उस दिशके घरमे स्वयं व्रास॒ न करे
तथा शत्रुवर्गवाले गँवमें जाकर वास न करे इत्यादि । इसके सिवा, विशेष प्रयोजन मूल्मं कहे गये दै ।
२. उदाहरण-विचार करना है कि "जयनारायण ' नामक व्यक्तिको गोरखपुरमे बसने या व्यापार करनेमं किस
प्रकारका लाभ होगा ? तो साध्य (गोरखपुर)-को वर्ग-संख्या २ के वाये भागम साधक (जयनागयण,)-की वर्गस्य
३ रखनेसे ३२ हआ। इसर्मं ८ से भाग देनेपर शून्य अर्थात् ८ वचा, यह साधक (जयनारायण) -का धन दुआ तथा
इससे विपरीत वर्ग-संख्या २३को रखकर इसमे ८ का भाग देनेसे शेप ७ वचा । यह साधक (जयनाशयण)-का ऋण
हुआ। यहाँ ऋण ७ से धन अधिक है; अतः जयनारायणके लिये गोरखपुर निवास करनेयोग्य टै- यद सिद्ध हभा।
तात्पर्य यह किं जयनारायणको गोरखपुरर्मं ८ लाभ ओर ७ खर्च होता रहेमा।
((-0. 1\/1(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 66810011
३६०
संक्षिप्त नारदपुराण
रखकर) क्रमशः ८, ३, ९, ८, ९, ६ से गुणा करे | बनाना चाहिये। मुखसे विपरीत दिशामें घरका
ओर गुणनफलमें क्रमशः १२, ८, ८, २७, ७, ९ से
भाग दे। फिर जो शेष बचें, वे क्रमशः धन, ऋण,
आय, नक्षत्र, वार तथा अंश होते हें । धन अधिक
हो तो वह घर शुभ होता हे। यदि ऋण अधिक
हो तो अशुभ होता है तथा विषम (१, ३, ५, ७)
आय शुभ ओर सम (२, ४, ६, ८) आय अशुभ
होता है। घरका जो नक्षत्र हो, वहसि अपने नामके
नक्षत्रतक गिनकर जो संख्या हो, उसमे ९ से भाग दे।
फिर यदि शेष (तारा) ३ बचे तो धनका नाश होता
है। ५ बचे तो यशकी हानि होती है ओर ७ बचे तो
गृहकर्ताका ही मरण होता हे। घरकी राशि ओर अपनी
राशि गिननेपर परस्पर २, १२ हो तो धनहानि होती
है; ९, ५ हो तो पुत्रकी हानि होती है ओर ६, ८ हो
तो अनिष्ट होता है; जन्य संख्या हो तो शुभ समञ्जना
चाहिये । सूर्य ओर मद्धलके वार तथा अंश हो तो उस
घरमे अग्रिभय होता हे । अन्य वार-अंश हो तो सम्पूर्ण
अभीष्ट वस्तुओंकी सिद्धि होती हैः ॥ ५६२३-५६७॥
( वास्तुपुरुषकी स्थिति-- ) भादों आदि तीन-
तीन मासोमें क्रमशः पूर्वं आदि दिशाओंकी ओर
मस्तक करके बायीं करवटसे सोये हए महासर्पस्वरूप
"चर" नामक वास्तुपुरुष प्रदक्षिणक्रमसे विचरण
करते रहते है । जिस समय जिस दिशामें वास्तुपुरुषका
मस्तक हो, उस समय उसी दिशामें घरका दरवाजा
द्रवाजा बनानेसे रोग, शोक ओर भय होते है । किंतु
यदि घरमे चारों दिशाओमें दवार हो तो यह दोष नहीं
होता हे ॥ ५६८-५७० ॥
गृहारम्भकालमें नवके भीतर हाथभरके गडमे
स्थापित करनेके लिये सोना, पवित्र स्थानक रेणु
( धूलि), धान्य ओर सेवारसहित ईट घरके भीतर
संग्रह करके रखे । घरक जितनी लंबाई हो, उसके
मध्यभागमें वास्तुपुरुषकी नाभि रहती है । उसके
तीन अङ्गुल नीचे (वास्तुपुरुषके पुच्छभागको ओर)
कुक्षि रहती हे। उसमें शङ्कका न्यास करनेसे पुत्र
आदिकी वृद्धि होती हे ॥५७१-५७२ ॥
( शाद्ग्रमाण-- ) खदिर ( खेर), अर्जुन, शाल
(शाखृ), युगपन्न (कचनार) रक्तचन्दन, पलाश,
रक्तशाल, विशाल आदि वृक्षोसे किसीकी लकड़ीसे
शङ्क बनता हे। ब्राह्मणादि वणेकि लिये क्रमशः २४,
२२३, २० ओर १६ अङ्कुलके शङ्क होने चाहिये । उस
शङ्खके वरावर-बराबर तीन भाग करके ऊपरवाले
भागमें चतुष्कोण, मध्यवाले भागमें अष्टकोण ओर
नीचेवाले (तृतीय) भागमं विना कोणका (गोलाकार)
उसका स्वरूप होना उचित दै। इस प्रकार उत्तम
लक्षणोसे युक्त कोमल ओर छेदरहितु शङ्क शुभ
दिनम बनावे। उसको षड्वर्गद्रारा शुद्ध॒सूत्रसे
सूत्रितर भूमि (गृहक्षेत्र) में मृदु, ध्रुव क्षिप्रसं्क
१. उदाहरण- मान लीजिये, घरकी लंबाई २५ हाथ ओर चौड़ाई १५ हाथ है तो इनको परस्पर गुणा करनेसे
३७५ यह पद हुआ। इसको ८ से गुणा करनेपर गुणनफल ३००० हुआ। इसमे १२ का भाग देनेपर शेष ° अर्थात्
१२ धन हुआ। फिर पदको ३ से गुणा किया तो ११२५ हआ। इसमे ८से भाग देकर शेष ५ ऋण हुआ। पुनः
पद ३७५ को ९ से गुणा किया तो ३२७५ हआ। इसमे ८ से भाग देनेपर शेष ७ आय हुआ। इसी तरह पदको
८ से गुणा करनेपर ३००० हुआ। इसमे २७ से भाग दिया तो शेष ३ नक्षत्र हुआ। फिर पदको ९ से गुणा किया
तो ३२७५ हआ । इसमे ७ से भाग देनेपर शेष १ वार हआ। पुनः पद ३७५ को £ सं गुणा किया तौ २२५० हुआ।
इसमे ९ से भाग देनेपर शेष ° अर्थात् ९ अंश हुआ। यहाँ सब वस्तुं शुभ टै, केवल वार् १ रवि हुआ। इसलिये
इस प्रकारके घरमे सव्र कुछ रहते हए भी अग्निका भय रहेगा; एेसा समड्ञना चाहिये; इसलिये एेसा पद देखकर
लेना चाहिये, जिसमे सर्वथा शुभ हो।
२. पूर्वोक्त आय ओर षडवर्गादिसे शोधित गृहके चारों ओरकी लंबाई - चौडाईके प्रमाण-तुल्य सूत्रसे धिरी हई
भूमिको ही यहाँ सूत्रित कहा ह।
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (0166101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
३६१
नक्षत्रोमे, अमावास्या ओर रिक्ताको छोडकर अन्य | १० क्र, ११ शत्रुर, १२ स्वर्णद, १३ क्षय, १४ आक्रन्द,
तिथियोमे, रविवार, मङ्गलवार तथा चर लग्रको
छोडकर अन्य वारो ओर अन्य (स्थिर या द्विस्वभाव)
लग्रोमे, जब पापग्रह लग्रमे नहो, अष्टम स्थान
शुद्ध ॒(ग्रहरहित) हो; शुभ राशि लग्र हो ओर
उसमें शुभ नवमांश हो, उस लग्रमं शुभग्रहका
संयोग या दष्ट हो; एेसे समय (सुलग्र)-में
ब्राह्मणोद्वारा पुण्याहवाचन कराते हए माङ्गलिक
वाद्य ओर सौभाग्यवती स्त्रियोके मङ्गलगीत आदिके
साथ मुहूर्तं बतानेवाले देवक् (ज्योतिषके विद्वान्
ब्राह्मण ) के पूजन (सत्कार ) -पूर्वक कुक्षिस्थानमें
शङ्ककी स्थापना करे। लग्रसे केन्द्र ओर त्रिकोणमं
शुभ ग्रह तथा ३, ६, ११ में पापग्रह ओर चन्द्रमा
हो तो यह शङकुस्थापन श्रेष्ठ है ॥५७३--५७९३ ॥
घरके छः भेद होते है --१- एकशाला, २-
द्विशाला, ३- त्रिशाला, ४- चतुश्शाला, ५- सप्तशाला
तथा ६- दशशाला। इन छहों शालाओमेसे प्रत्येकके
१६ भेद होते है । उन सब भेदोके नाम क्रमशः इस
प्रकार है--१- ध्रुव, २- धान्य, ३- जय, ४- नन्द्,
५- खर ६- क्रन्त, ७- मनोप, ८ सुमुख, ९ दुर्मुख,
१. प्रस्तारस्वरूप-
संख्या स्वरूप
पूर्व, दक्षिण, पश्चिम,
१ 5 5 5
२ 1 5 $
२ $ 1 $
ट | $
५ $ $ |
६ । 5 1
७ 5 । 1
८ ।
९ $ 5 $
१०५ । 5 9
१९१ ८: । 5
१२९ 1 1 $
१३ ड $ 1
१.४ । 5 ।
१५ $ 1 1
१६ । । ।
१५ विपुल ओर १६ वाँ विजय नामक गृह होता है।
चार अक्षरोके प्रस्तारके भेदसे क्रमशः इन गृहांकी
गणना करनी चाहिये ॥५८०--५८२ ३ ॥
( प्रस्तारभेद-- ) प्रथम ४ गुरु (5) चिह्न लिखकर
उनमें प्रथम गुरुके नीचे लघु ८ ॥) चिह्न लिखे । फिर
अगे जैसा ऊपर हो उसी प्रकारके गुरु या लघु चिद
लिखना चाहिये । फिर उसके नीचे (तीसरी पड्क्तिमे)
प्रथम गुरु चिहके नीचे लघु चिह लिखकर आगे
(दाहिने भागे) जेसे ऊपर गुरु या लघु हो वैसा
ही चिह्न लिखे तथा पीछे (वाये भागमं) गुर चिहृसे
पूरा करे। इसी प्रकार पुनः-पुनः तवतक लिखता
जाय जबतक कि पंक्ति (प्रस्तार) -मे सव चिह्र लघु
न हो जाय। इस प्रकार चार दिशा होनेके कारण
८४ अक्षरोसे १६ भेद होते ह । प्रत्येक भेदमं चारों
चिहको प्रदक्षिणक्रमसे पूर्वं आदि दिशा समञ्चकर्
जर्हा-जहोँ लघु चिह पद, वरहो - वर्ह घरका द्वार ओर
अलिन्द (द्राके अगेका भाग=चवूतरा) बनाना चाहिये ।
इस प्रकार पूर्वादि दिशाओं अलिन्दके भसि १६
प्रकारके घर होते है ९।५८३-५८४ र ॥
नाम द्वारकौ दिशा
उत्तर
5 भ्रुव ऊर्ध्वं (ऊपर)
5 धान्य पर्व
$ जय दक्षिण
$ नन्द पूर्व-दक्षिण
$ खर पश्चिम
5 कन्त पूर्व-पश्चिम
5 मनोरम दक्षिण-पश्चिम
5 सुमुख पूर्व - दक्षिण-पश्चिम
। दुर्मुख उत्तर
। क्रूर पूर्व-उत्तर
। शत्रुद दक्षिण-उन्तेर
| स्वर्णद पूर्व -दकषिण-उन्तर
। क्षय पश्चिम-उन्तग
1 आक्रन्द पूर्व-पश्चिम-उत्तर
। विपुल दक्षिण-पध्चिम-उनत्तर
॥ विजय पूर्व-दक्षिण-पञ्चिम-उनर
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
२३६२
संक्षिप्त नारदपुराण
वास्तुभूमिकी पूर्वदिशामें स्नानगह, अग्निकोणमें
पाकगृह (रसोईघर), दक्षिणम शयनगृह, नेर््रह्यकोणमें
शस्त्रागार, पश्चिमम भोजनगृह, वायुकोणमें धन-
धान्यादि रखनेका घ्र, उत्तरमें देवताओंका गृह
ओर ईशानकोणमें जलका गृह (स्थान) बनाना
चाहिये तथा आग्नेयकोणसे आरम्भ करके उक्त
दो-दो घरोके बीच क्रमशः मन्थन (दूध-दहीसे
घृत निकालने) -का, घृत रखनेका, पेखानेका,
विद्याभ्यासका, स्त्रीसहवासका, ओषधका ओर
शृद्खारको सामग्री रखनेका घर बनाना शुभ कहा
गया है। अतः इन सब धरोमे उन-उन सव
वस्तुओंको रखना चाहिये ॥५८५--५८८ ३ ॥
( आ्योके नाम ओर दिशा-- ) पूर्वादि आठ
दिशाओं क्रमसे ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वान, वृक्ष,
खर (गदहा), गज ओर ध्वांक्ष (काक)-ये
आठ आय होते है ॥५८९ ॥
( घरके समीप निन्द्य वृक्ष-- ) पाकर, गूलर,
आम, नीम, बहेडा तथ्या कटिवाले ओर दुग्धवाले सव
वृक्ष, पीपल, कपित्थ (केथ), अगस्त्य वृक्ष, सिन्धुवार
(निर्गुण्डी) ओर इमली-ये सव वृक्ष घरके समीप
निन्दिति कहे गये हं । विशेषतः घरके दक्षिण ओर
पश्िम-भागमें ये सब वृक्ष हों तो धन आदिका नाश
करनेवाले होते है ॥५.९०-५९९ २ ॥
(गृह-प्रमाण- ) घरके स्तम्भ (खम्भ) घरके
पैर होते ह। इसलिये वे समसंख्या (४, ६, ८
आदि) -में होनेपर दी उत्तम कहे गये हँ; विषम
संख्यामें नहीं । घरक्को न तो अधिक ऊचा ही
करना चाहिये, न अधिक नीचा ही। इसलिये
अपनी इच्छा (निर्वाह )-के अनुसार भित्ति (दीवार)
की ऊंचाई करनी चाहिये । घरके ऊपर जो घर्
(दूसरा मंजिल) बनाया जाता है, उसमें भी इस
प्रकारका विचार करना चाहिये । घरोंकी ऊचाईके
प्रमाण आठ प्रकारके कहे गये है, जिनके नाम
क्रमशः इस प्रकार ह-१-पाञ्चाल, २-वैदेह,
३-कोरव, ४-कुजन्यकः, ५-भागध, ६-शुरसेन,
७ गान्धार ओर ८ आवन्तिक । जहाँ घरकी ऊंचाई
उसको चौोडाईसे सवागुनी अधिक होती है, वह
भूतलसे ऊपरतकका पाञ्चालमान कहलाता. है,
फिर उसी ऊचारईको उत्तरोत्तर सवागुनी बटढानेसे
वैदेह आदि सब मान होते हें । इनमें पाञ्चालमान
तो सर्वसाधारण जनके लिये शुभ हे । ब्राह्यणोके
लिये आवन्तिकिमान, क्षत्रियोके लिये गान्धारमान
तथा वेश्योके लिये कौजन्यमान है। इस प्रकार
ब्राह्मणादि वणेकि लिये यथोत्तर गृहमान समञ्चना
चाहिये तथा दूसरे मंजिल ओर तीसरे मंजिलके
मकानमें भी पानीका बहाव पहले बताये अनुसार
ही बनाना चाहिये? ॥ ५९२-५९८॥
( घरमे प्रशस्त आय- ) ध्वज अथवा गज
आयमें ऊट ओर हाथीके रहनेके लिये घर बनवावे
तथा अन्य सब पशुओंके घर भी उसी (ध्वज ओर
गज) आयमे बनाने चाहिये । द्वार, शय्या, आसन,
छाता ओर ध्वजा-इन सबो के निर्माणके लिये सिंह,
वृष अथवा ध्वज आय होने चाहिये ॥५९९ २॥
अब मं नूतनगृहमें प्रवेशके लिये वास्तुपूजाको
विधि बताता हू-घरके मध्यभागमें तन्दुल (चावल) -
पर पूर्वसे पश्चिमकी ओर एक-एक हाथ लम्बी
दस रेखाएं खीचे । फिर उत्तरसे दक्षिणकी ओर भी
उतनी ही लम्बी-चौडी दस रेखाएं बनवे। इस
९. मूलमें "कुजन्यकम्' पाठ दै; परंतु कुजन्य कोई प्रसिद्ध देश नहीं है; इसलिये प्रतीत होता है कि यहां
" कान्यकुन्जकम्" के स्थानें ' कुव्जकन्यकम्" था। फिर लेखकादिके दोपसे “ कुजन्यकम्' हो गया है।
२. पूर्वं या उत्तर प्लवभूमिमे घर बनाना प्रशस्त कहा गया है । यदि नीचेके तछचे पूर्व दिशा्मे जलस्राव हो तो ऊपरके
मंजिलमें भी पूर्वं दिशामें ही जलखाव होना चाहिये।
((-0. 1/(1111(4/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
२३६३
प्रकार उसमें बराबर-बराबर ८१ पद (कोष्ठ) होते
हें । उनमें आगे बताये जानेवाले ४५ देवताओंका
यथोक्त स्थानें नामोल्ेख करे। बत्तीस देवता
बाहर (प्रान्तके कोष्ठोमें) ओर तेरह देवता भीतर
पूजनीय होते हैं । उन ४५ देवताओंके स्थान ओर
नामका क्रमशः वर्णन करता ह| किनारेके वत्तीस
कोष्ठोमें ईशान कोणसे आरम्भ करके क्रमशः
बत्तीस देवता पूज्य हँ । उनके नाम इस प्रकार
हे-कृपीट योनि (अग्नि) १, पर्जन्य २, जयन्त,
३, इन्द्र ४, सूर्य ५, सत्य ६, भृश ७, आकाश «८,
वायु ९, पूषा १०, अनृत (वितथ) १९१, गृहक्षतः
१२, यम १३, गन्धर्व १४, भृङ्गराज १५, मृग १६,
पितर १७, दौवारिक १८, सुग्रीव १९, पुष्प-दन्त
२०, वरुण २९१, असुर २२, शेष २३, राजयक्ष्मा
२४, रोग २५, अहि २६, मुख्य २७, भल्लाटक २८,
सोम २९, सर्पं ३०, अदिति ३१९ ओर दिति ३२,-
ये चारो किनारोके देवता हैँ । ईशान, अग्रि, नैर््रहत्य
ओर वायुकोणके देवोके समीप क्रमशः आप ३३,
सावित्र ३४, जय ३५, तथा रुद्र॒ ३२६ के पद हे।
ब्रह्माके चारों ओर पूर्वं आदि आं दिशाओमें
क्रमशः अर्यमा ३७, सविता ३८, विवस्वान् ३९,
विव्ुधाधिप ४०, मित्र ४१, राजयक्ष्मा ४२, प्रथ्वीधर
४३, आपवत्स ४४ है ओर मध्यके नव पदोपें
(४५) ब्रह्याजीको स्थापित करना चाहिये। इस
प्रकार सब पदोमें ये पैतालीस देवता पूजनीय होते
है । जैसे ईशन-कोणमें आप, आपवत्स, पर्जन्य,
अग्नि ओर दिति-ये पाच देव एकपद होते है, उसी
प्रकार अन्य कोणके पोच-पांच देवता भी एक-
पदके भागी है । अन्य जो बाह्य-पटुक्तिके (जयन्त,
इन्द्र॒ आदि) बीस देवता है, वे सव द्विपद दो-दो
पदोके भागी) ह तथा त्राह्यसे पूर्व, दक्षिण, पश्चिम
ओर उत्तर दिशामें जो अर्यमा, विवस्वान्, मित्र ओर
पृथ्वीधर-ये चार देवता है, वे त्रिपद (तीन-तीन
पदोकि भागी) है, अतः वास्तु-विधिके ज्ञाता विद्वान्
पुरुषको चाहिये कि ब्रह्माजीसहित इन एकपद्,
द्विपद तथा त्रिपद देवताओंका वास्तुमन्त्र्रारा दूर्वा,
दही, अक्षत, फूल, चन्दन, धूप, दीप ओर नैवेद्यादिसे
विधिवत् पूजन करे। अथवा ब्राह्यमन्तरसे आवाहनादि
पोडश (या पञ्च) उपचारो्रारा उन्हें दो श्रेत वस्त्र
समर्पित करेरे ॥ ६००-६१३ ॥ नैवेद्यमें तीन प्रकारके
१-२. अन्य संहितामें १२ वाँ वृहत्क्षत; २४ वँ पापयक्ष्मा कहा गया है।
३. एकाशीतिपद वास्तुचक्र-
ह ^ ४ | 4 | ॐ
५५
दिति
३२
च्रल्ण
९१
३१4
दीवारिक्छ
१८
पितर
१२
ज > आकः कनको ति ककः चे
पुष्पदन्त | सुग्रीव
| > 99 १९
1 । ऋ
(-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 66810011
३६६
संक्षिप्त नारदपुराण
(भक्ष्य, भोज्य, लेह्य) अन्न माङ्गलिक गीत ओर
वाद्यके साथ अर्पण करे। अन्तमे ताम्बूल (पान-
सोपारी) अर्पण करके वास्तुपुरुषकौ इस प्रकार
प्रार्थना करे ॥ ६१४ ॥
वास्तुपुरुष नमस्तेऽस्तु भूशय्यानिरत प्रभो ।
मद्गृहं धनधान्यादिसमृद्धं कुरु सर्वदा॥
' भूमिशय्यापर शयन करनेवाले वास्तुपुरुष !
आपको मेरा नमस्कार है । प्रभो! आप मेरे घरको
धन-धान्य आदिसे सम्पन्न कीजिये ।'
इस प्रकार प्रार्थना करके देवताके समक्ष पूजा
करानेवाले (पुरोहित) -को यथाशक्ति दक्षिणा दे
तथा अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन
कराकर उन्हें भी दक्षिणा दे। जो मनुष्य सावधान
होकर गृहारम्भ या गृहप्रवेशके समय इस विधिसे
वास्तुपूजा करता हे, वह आरोग्य, पुत्र, धन ओर
धान्य प्राप्त करके सुखी होता है। जो मनुष्य
वास्तुपूजा न करके नये घरमे प्रवेश करता है, वह
नाना प्रकारके रोग, क्लेश ओर संकट प्राप्त करता
हे ॥ ६१५-६१८॥
जिसमें किंवाडं न लगी हों, जिसे ऊपरसे छत
आदिके द्वारा छाया न गया हो तथा जिसके लिये
(पूर्वोक्त रूपसे वास्तुपूजन करके) देवताओंको
बलि (नैवेद्य) ओर ब्राह्मण आदिको भोजन न
दिया गया हो, एेसे नूतन गृहमे कभी प्रवेश न
करे; क्योकि वह विपत्तियोकी खान (स्थान)
होता हे ॥ ६१९॥
( यात्रा-प्रकरण- ) अब मै जिस प्रकारसे
यात्रा करनेपर वह राजा तथा अन्य जनके लिये
अभीष्ट फलको सिद्धि करानेवाली होती है, उस
विधिका वर्णन करता हू। जिनके जन्म-समयका
ठीक-ठीक ज्ञान है, उन राजाओं तथा अन्य
जनोंको उस विधिसे यात्रा करनेपर उत्तम फलकी
प्राति होती हे। जिन मनुरष्योका जन्मसमय अज्ञात
है, उनको तो घुणाक्षरः न्यायसे ही कभी फलकी
प्राप्ति हो जाती है, तथापि उनको भी प्रश्रलग्रसे
तथा निमित्त ओर शकुन आदिद्रारा शुभाशुभ
देखकर यात्रा करनेसे अभीष्ट फलका लाभ होता
हे ॥ ६२०-६२१॥
( यात्रामे निषिद्ि तिधथिर्या- ) षष्ठी, अष्टमी,
द्वादशी, चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा
ओर शुक्लपक्षकी प्रतिपदा-इन तिधियोमें यात्रा
करनेसे दखद्रिता तथा अनिष्टकी प्राति होती है ॥ ६२२॥
( विहित नक्षत्र-- ) अनुराधा, पुनर्वसु, मृगशिरा,
हस्त, रेवती, अधिनी, श्रवण, पुष्य ओर धनिष्ठा-इन
नक्षत्रोमें यदि अपने जन्म-नक्षत्रसे सातवीं, पांचवीं
ओर तीसरी तारान होतो यात्रा अभीष्ट फलको
देनेवाली होती हे ॥ ६२३॥
( दिशाशूल- ) शनि ओर सोमवारके दिन
पूर्वं दिशाको ओर न जाय, गुरुवारको दक्षिण न
जाय, शुक्र ओर रविवारको पश्चिम न जाय तथा
बुध ओर मङ्खगलको उत्तर दिशाकी यात्रा न
करे ॥ ६२४॥ ज्येष्ठा, पूर्वभाद्रपद, रोहिणी ओर
उत्तराफाल्गुनी-ये नक्षत्र क्रमशः पूर्व, दक्षिण,
पश्चिम ओर उत्तर दिशामें शूल होते हे ।
( सर्वदिग्गमन नक्षत्र-- ) अनुराधा, हस्त, पुष्य
ओर अश्चिनी-ये चार नक्षत्र सब दिशाओंकी
यात्रामें प्रशस्त हें ॥ ६२५ ॥
( दिग्द्रार-नक्षत्र-- ) कृत्तिकासे आरम्भ करके
सात-सात नक्षत्रसमृह पूर्वादि दिशाओमें रहते हं ।
तथा अग्रिकोणसे वायुकोणतक परिघदण्ड रहता
१. जैसे घुण ( कीटविशेष) काठको खोदता रहता है तो उससे कहीं अकारादि अशक्षरका स्वरूप अकस्मात्
बन जाता है; उसी प्रकार जो अपने जन्मसमयसे अपरिचित ई, वे लग्र आदिको न जानकर भी यात्रा करते-करते
कभी संयोगवश शुभ फलके भागी हो जाते है।
((-0. 1/111(4/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
२६५
हे; अतः इस प्रकार यात्रा करनी चाहिये, जिससे
परिघदण्डका लङ्घन न होः ॥ ६२६॥
पूर्वके नक्षत्रम अग्रिकोणको यात्रा करे। इसी
प्रकार दक्षिणके नक्षत्रे अग्रिकोण तथा `प्चिम
ओर उत्तरके नक्त्रोमें वायुकोणकी यात्रा कर
सकते हे ।
( दिशाओंकी राशिर्यँ-- ) पूर्वं आदि चार
दिशाओमें मेष आदि १२ राशियां पुनः पुनः (तीन
आवृत्तिसे) आती है? ॥ ६२७॥
( लालाटिकयोग-- ) जिस दिशामें यात्रा करनी
हो, उस दिशाका स्वामी ललाटगत (सामने) हो तो
यात्रा करनेवाला लौटकर नहीं आता हे । पूर्व दिशामें
यात्रा करनेवालेको लग्रमे यदि सूर्य हो तो वह
ललारगत माना जाता हे। यदि शुक्र लग्रसे ग्यारहवें
या वारहवें स्थानम हों तो अग्रिकोणमे यात्रा
करनेसे, मङ्गल दशम भावमें हो तो दकषिणयात्रा
१. पूर्व नक्षत्रम पश्चिम या दक्षिण जानेसे परिघदण्डका
लद्भन होगा। चक्र देखिये-
(पूर्व)
& ~ मघा
अश्विनी पूर्वाफल्गुनी
रेवती उत्तराफाल्गुनी
उत्तरभाद्रपद न्तः हस्त
पूर्वभाद्रपद चित्रा
शतभिषा स्वाती ।
धनिष्ठा विशाखा
, अभिजित्, उत्तराषाट्, पूर्वापाट्, मूल, ज्येष्ठा, अनुराधा
करनेसे, राह नवे ओर आठवें भावमें हो तो
नस्ऋत्य कोणको यात्रासे, शनि सप्तम भावम हो तो
पञ्चिम-यात्रासे, चन्द्रमा पांचवें ओर छठे भावमें हो
तो वायुकोणकी यात्रासे, बुध चतुर्थं भावमेंहो तो
उत्तरकी यात्रासे, गुरु तीसरे ओर दूसरे भावमे हो तो
ईशानकोणको यात्रा करनेसे ललारगत होते है । जो
मनुष्य जीवनक इच्छा रखता हो, वह इस ललाटयोगको
त्यागकर यात्रा करे ॥ ६२८-६३२॥
लग्रमे वक्रगति ग्रह या उसके षड्वर्गं (राशि-
होरादि) हों तो यात्रा करनेवाले राजाओंकी पराजय
होती है ॥ ६३३ ॥
जव जिस अयनः में सूर्य ओर चन्द्रमा दोनों
हो, उस समय उस दिशाकी यात्रा शुभ फल
देनेवाली होती है । यदि दोनों भिन्न अयनं हों तो
जिस अयनमें सूर्य हों उधर दिनमें तथा जिस
अयनमें चन्द्रमा हों उधर रात्निमें यात्रा शुभ होती
२. दिग्रारिबोधक चक्र-
(पूर्वं)
३.मकरसे ६ राशि उत्तरायण है । इनम सूर्य- चन्द्रमा हां तो उत्तरकौ यात्रा शुभ होती है, क्योकि दोनों सम्मुख
होते ई । इससे सिद्ध होता है कि यदि पूर्य ओर चन्द्रमा दाहिने भागम प्ट तो भी यात्रा शुभ हो सकती है । इसलिये
उस समय प्चिम-यात्रा भी शुभ ही समञ्चनी चाहिये एवं कर्कसे छः राशि दक्षिणायन समश्च ।
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
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हे । अन्यथा यात्रा करनेसे यात्रीको पराजय होती
हे ॥ ६२३४ ॥
( शुक्रदोष-- > शुक्र अस्त हों तो यात्रामें
हानि होती है। यदि वह सम्मुख हो तो यात्रा
करनेसे पराजय होती हे। सम्मुख शुक्रके दोषको
कोई भी ग्रह नहीं हटा सकता है । किंतु वसिष्ठ,
कश्यप, अत्रि, भरद्वाज ओर गौतम-इन पोच
गोत्रवालोको सम्मुर्र शुक्रका दोष नहीं होता हे।
यदि एक ग्रामके भीतर ही यात्रा करनी हो या
विवाहमें जाना हो या दुर्भिक्ष होनेपर अथवा
राजाओपे युद्ध होनेपर तथा राजा या ब्राह्मणोंका
कोप होनेपर कहीं जाना पड़ तो इन अवस्थाओमें
सम्मुख शुक्रका दोप नहीं होता है। शुक्र यदि
नीच राशिमे या शात्नुराशिमे अथवा वक्रगति या
पराजितः हो तो यात्रा करनेवालोंको पराजय होती
है । यदि शुक्र अपनी उच्वराशि (मीन) -में हो तो
यात्रामें विजय होती हे ॥ ६३५- ६३८)
अपने जन्मलग्र या जन्मराशिसे अष्टम राशि
या लग्रमे तथा शत्रुको राशिसे छटी राशिमें या
लग्रमे अथवा इन सर्बके स्वामी जिस राशिमें हो,
उस लग्र या राशिमरे यात्रा करनेवालेको मृत्यु होती
हे। परंतु यदि जन्मलग्रराशिपति ओर अष्टम
राशिपतिमें परस्पर मैत्री हो तो उक्त अष्टमराशिजन्य
दोष स्वयं नष्ट हो जाता है ॥ ६३९-६४०॥
द्विस्वभाव लग्र यदि पापग्रहसे युक्त या दृष्ट हो
तो यात्रामे पराजय होती है तथा स्थिर राशि
पापग्रहसे युक्त न हो तो वह यात्रालग्रमे अशुभ
है । यदि स्थिर राशिलग्रमे शुभग्रहका योग या दृष्ट
हो तो शुभ फल होता है॥ ६४१॥
धनिष्ठा नक्षत्रके उत्तरार्धसे आरम्भ करके
` (रेवतीपर्यन्त) पच नक्षत्रोमें गृहार्थ तृण-काष्टौका
संक्षिप्त नारदपुराण
संग्रह, दक्षिणकों यात्रा, शय्या (तकिया, पलङ्ध
आदि)-का बनाना, घरको छवाना आदि. कार्य
नहीं करने चाहिये ॥ ६४२ ॥
यदि यात्रालग्रमे जन्मलग्र, जन्मराशि या इन
दोनोके स्वामी हों अथवा जन्मलग्र या जन्मराशिसे
३, ६, ११, १० वीं राशि हो तो शत्तुओंका नाश
होता हे ॥ ६४२ ॥
यदि शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला,
कुम्भ) तथा दिग्द्रार (यात्राको दिशा)-को राशि
लमग्रमें हो अथवा किसी भी लग्रमे शुभग्रहके वर्ग
(राशि-होरादि) हों तो यात्रा करनेवाले राजाके
शत्रुओंका नाश होता हे ॥ ६४४ ॥
शत्नुके जन्मलग्र या जन्मराशिसे अष्टम राशि
या उन दोनोके स्वामी जिस राशिमें हों वह राशि
यात्रालग्रमे हो तो शत्रुका नाश होता हे ॥ ६४५॥
मीन लग्ने या लग्रगत मीनके नवमांशमें
यात्रा करनेसे मार्गं (रास्ता) टेढा हो जाता हे।
(अर्थात् बहुत घूमना पडता हे।) तथा कुम्भलग्न
ओर लग्रगत कुम्भका नवमांश भी यात्रामें अत्यन्त
निन्दित हे ॥ ६४६ ॥
जलचर राशि (कर्क, मीन) या जलचर
राशिका नवमांश लग्रमे हो तो नौकाद्वारा नदी-नद
आदि मारगसे यात्रा शुभ होती हे ॥ ६४६ ३ ॥
( लग्रभावोकी सज्ञा- ) १- मूर्तिं (तन), २-
कोष (धन), ३- धन्वी (पराक्रम, भ्राता), ४-
वाहन (सवारी, माता), ५- मन्त्र (विद्या, संतान),
६- शत्रु (रोग, मामा), ७- मार्ग (यात्रा, पति-
पत्री), ८- आयु (मृत्यु), ९- मन (अन्तःकरण,
भाग्य), १०- व्यापार (व्यवसाय, पिता), ११-
प्राप्ति (लाभ), १२- अप्राति (व्यय)-ये क्रमसे
लग्र आदि १२ स्थानोकी संज्ञां हे ॥ ६४७ -६४८ ॥
१. जब मङ्गलादि ग्रहोमे किन्हीं दो ग्रहोंको एक राशिमे अंशकला बरावर हो तो दोनों युद्ध समज्ञा जाता
है। उन दोनोमे जो उत्तर रहता है, वह विजयी तथा दक्षिण रहनेवाला पराजित होता हे ।
((-0. 1/८11114<511॥ 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 68110011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
पापग्रह (शनि, रवि, मङ्गल, राह तथा केतु-ये)
तीसरे ओर ग्यारहवेंको छोडकर अन्य सब भावोमें
जानेसे भावफलको नष्ट कर देते ह‹ । तीसरे ओर
ग्यारहवें भावमें जानेसे वे इन दोनों भावोंको पुष
करते हें । सूर्य ओर मङ्गल ये दोनों दशम भावको
भी नष्ट नहीं करते, अपितु दशम भावमें जानेसे
उस भावफल (व्यापार, पिता, राज्य तथा कर्म)-
को पुष्ट ही करते हं ओर शुभग्रह (चन्द्र, बुध, गुरु
तथा शक्र) जिस भावमें जाते हँ, उस भावफलको
पुष्ट ही करते हँ; केवल षष्ठ (६) भावमे जानेसे
उस भावफल (शत्रु ओर रोग)-को नष्ट करते
हे ॥ ६४९ ॥ शुभ ग्रहोमे शुक्र सप्तम भावको ओर
चन्द्रमा लग्र एवं अष्टम (१, ८) को पृष्ट नहीं
करते हें । (अपितु नष्ट ही करते हें ।)
( अभिजित्-प्रशंसा-- ) अभिजित् मुहूर्तं (दिनका
मध्यकाल=१२ बजेसे १ घडी आगे ओर १ घडी
पीछे) अभीष्ट फल सिद्ध करनेवाला योग हे। यह
दक्षिण दिशाकी यात्रा छोडकर अन्य दिशाओंको
यात्रामे शुभ फल देता है। इस (अभिजित् मुहूर्त) -
में पञ्चाङ्ग (तिथि-वारादि) शुभनदहोतो भी यात्रामें
वह उत्तम फल देनेवाला होता है ॥ ६५०-६५१॥
( यात्रा-योग-- ) लग्र ओर ग्रहोकी स्थितिसे
नाना प्रकारके यात्रा-योग होते हें। अव उन
योगोका वर्णन करता हृ, क्योकि राजाओं (क्षत्रियो) -
को योगवबलसे ही अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है।
ब्राह्मणको नक्षत्रनलसे तथा अन्य मनु्योको मुहूर्तबलस
इष्टसिद्धि होती है । तत्करोको शकुनबलसे अपने
अभीष्टकी प्रि होती है ॥ ६५२॥ शुक्र, बुध ओर
वृहस्पति-इन तीनमेसे कोई भी यदि केन्द्र या
त्रिकोणमें हो तो “योग कहलाता है । यदि उनमंसे
दो ग्रह केन्द्र या त्रिकोणमें हों तो "अधियोग'
२६७
कहलाता हे तथा यदि तीनो लग्रसं केन्द्र
(१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (९, ५)-मेहों
तो योगधियोग कहलाता दै ॥६५३~ ॥ योगमें
यात्रा करनेवालोका कल्याण होता है । अधियोगमे
यात्रा करनेसे विजय प्राप्त होती हे ओर योगधियोगमें
यात्रा करनेवालेको कल्याण, विजय तथा सम्पतच्चिका
भी लाभ होता है ॥ ६५४२ ॥ लग्रसे दसवें स्थामे
चन्द्रमा, पष्ठ स्थानमें शनि ओर लग्रे सूर्य हों तो
इस समयमे यात्रा करनेवाले राजाको विजय तथा
शत्नुको सम्पत्ति भी प्राप्त होती है ॥ ६५५ ३ ॥ शुक्र;
रवि, बुध, शनि ओर मद्गल- ये पाचों ग्रह क्रमसे
लग्र चतुर्थ, सप्तम, तृतीय ओर पष्ठ भावमे होतो
यात्रा करनेवाले राजाके सम्मुख आये हुए शत्रुगण
आगमे पड़ी हुई लाहकी भति नष्ट हो जाते
हे ॥ ६५६६ ॥ वृहस्पति लप्रमें ओर अन्य ग्रह यदि
दूसरे ओर ग्यारहवें भावमं हां तो इस योगमं यत्रा
करनेवाले जाके शत्रुओको सेना यमराजके घर पर्हुच
जाती है ॥ ६५७ > ॥ यदि लमग्रमं शुक्र, ग्यारहवेमं एवि
ओर चतुर्थं भावमें चन्द्रमा हो तो इस यागमं यात्रा
करनेवाला राजा अपने शव्रुभंको उसी प्रकार नष्ट कर
देता टै, जसे हाधि्योकि रंडको सिंह ॥ ६५८ ३ ॥
अपने उच्च (मीन) -पें स्थित शुक्र लग्रमे ही
अथवा अपने उच्च (वृष)-का चन्रमा लाभ
(११) भावमें स्थित हो तो यात्रा करनेवाला नेश
अपने शत्नुकी सेनाको उसी प्रकार नष्टं कर देता
है, जैसे भगवान् श्रीकृष्णे पूतनाको नष्ट किया
था॥ ६५९ 5) यदि यात्राके समय शुभग्रह केन्र
या त्रिकोणमें हों तधा पापग्रह तीसरे, छठे ओर्
ग्यारहवें स्थाने हों तो यात्रा करनेवाले राजक
शत्रुकी लक्ष्मी अभिसारिकाकी भति उसके
समीप आ जाती है॥६६० - ॥ गुरु, रवि आर्
ऋक चः = चोः ऋचौ क जो =
१. जैसे पापग्रह लग्र (तनुभाव) -में रहता टै तो शरीरम कष्ट-पीड़ा देता टै तथा धन धावे धनका नाश करता
दै। किंतु जव तीसरमे रहता है तो पराक्रमको ओर ग्यारहवे रेता टै ती लाभको पुष्ट करता दै।
((-0. 1\॥८1114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
३६८
संक्षिप्त नारदपुराण
न्न ~
चनद्रमा-ये क्रमशः लप्र, ६ ओर ८मेंहोंतो
यात्रा करनेवाले राजाके सामने दर्जनोंकी मैत्रीके
समान शत्रुओंको सेना नहीं ठहरती है ॥ ६६१ ॥
यदि लग्रसे ३, ६, ११ में पापग्रह हों ओर शुभ-
ग्रह बलवान् होकर अपने उच्चादि स्थानमें (स्थित)
हों तो शत्रुको भूमि यात्रा करनेवाले राजाके हाथमे
आ जाती है ॥६६२ र ॥ अपने उच्च (कर्क) -मे
स्थित बृहस्पति यदि लग्रमे हों ओर चन्द्रमा ११
भावम स्थित हों तो यात्रा करनेवाला नरेश अपने
शत्रुको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जसे
त्रिपुरासुरको श्रीशिवजीने नष्ट किया था॥ ६६३ = ॥
शीर्पोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक
कुम्भ) राशिमें स्थित शुक्र यदि लग्रमे हों ओर
गुरु ग्यारहवें स्थानमें हों तो यात्रा करनेवाला
पुरुष तारकासुरको कार्तिकेयकी भोति अपने शत्रुको
नष्ट कर देता हे ॥ ६६३ ॥ गुरु लग्रे ओर शुक्र
किसी केद्द्रयात्रिकोणमें हों तो यात्री नेश अपने
शत्रुओंको वेसे ही भस्म कर देता है, जेसे वनको
दावानल ॥ ६६५ र ॥ यदि बुध लग्रमे ओर अन्य
शुभग्रह किसी कन्दरमें हों तथा नक्षत्र भी अनुकूल
हो तो उसमें यात्रा करनेवाला राजा अपने शत्रओंको
वैसे ही सौख लेता हे, जेसे सूर्यकी किरणे ग्रीप्म-
ऋतु क्षुद्र नदियोको सोख लेती हे ॥ ६९६ १॥
सम्पूर्ण शुभग्रह केन्द्र या त्रिकोणमें हों तथा सूर्य
या चन्द्रमा ग्यारहवें भावे स्थित हों तो यात्रा
करनेवाला नरेश अन्धकारको सूर्यकी भांति अपने
शत्रको नष्ट कर देता हे ॥ ६६७३ ॥
शुभग्रह यदि अपनी राशिमें स्थित होकर
केन्द्र (१, ४, ७, १०), त्रिकोण (५, ९) तथा
आय (११) भावम हो तो यात्रा करनेवाला राजा
रूईको अग्निके समान अपने शत्नुओंको जलाकर
भस्म कर देता हे ॥६६८) चन्द्रमा दसवें
भावम ओर वृहस्पति केन्द्रमे हों तो उसमें यात्रा
करनेवाला राजा अपने सम्पूर्णं शत्नुओंको उसी
प्रकार नष्ट कर देता हे जसे प्रणवसहित पञ्चाक्षर-
मन्त्र ( ॐ नमः शिवाय ) पाप-समूहका नाश कर
दता हे ॥ ६६९ ~ ॥ अकेला शुक्र भी यदि वर्गोत्तम
नवमाशगत लग्रमें स्थित हो तो उसमे भी यात्रा
करनेसे राजा अपने शत्नुओंको उसी प्रकार नष्ट
कर देता है, जैसे पापोंको श्रीभगवान्का
स्मरण ॥ ६७०६ ॥ शुभग्रह केन्द्र या त्रिकोणमे हों
तथा चन्द्रमा यदि वर्गोत्तम नवमांशमें हो तो
यात्रा करनेसे राजा अपने शत्रुओंको उसी प्रकार
सपरिवार नष्ट करता है, जैसे इन्द्र पर्वतोंको
॥ ६७१ = ॥ वृहस्पति अथवा शुक्र अपने मित्रक
राशिमं होकर केन्द्र या त्रिकोणमें हों तो एेसे
समयमे यात्रा करनेवाला भूपाल सर्पोको गरुड़के
समान अपने शत्नुओंको अवश्य -नष्ट कर देता
दै ॥६७२३॥ यदि एक भी शुभग्रह वर्गोत्तम
नवमांशमें स्थित होकर केन्द्रमें हो तो यात्रा करने-
वाला नरेश पाप-समृहोंको गङ्गाजीके समान अपने
शत्रुओंको क्षणभरमें नष्ट कर देता है ॥ ६७३ £ ॥ जो
राजा शत्रुओंको जीतनेके लिये उपर्युक्त राजयोगमे
यात्रा करता हे, उसका कोपानल शत्रुओंकौ
स्त्रियोके अश्रुजलसे शान्त होता है ॥ ६७४६ ॥
आश्चिन मासके शुक्लपक्षकी दशमी तिथि “विजया,
कहटलातो हे । उसमे जो यात्रा करता है, उसे अपने
शत्रुओंपर विजय प्राप्त होती दै अथवा शत्रुओंसे
सन्धि (मेल) हो जाती है। किसी भी दशमे
उसको पराजय नहीं होती है ॥ ६७५ < ॥
( मनोजय-प्रशंसा-- ) यात्रा आदि सभी कार्योमिं
निमित्त ओर शकुन आदि (लग्र एवं ग्रहयोग) -कौ
अपेक्षा भी मनोजय (मनको वशमें तथा प्रसन्न
रखना) प्रबल ह । इसलिये मनस्वी पुरुषोके लिये
यत्तपूर्वक फलसिद्धिमें मनोजय ही प्रधान कारण
होता ह ॥ ६७६ ॥
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
( यात्रामे प्रतिबन्ध-- ) यदि घरमें |
उपनयन, विवाह, प्रतिष्ठा या सूतक उपस्थित हो तो
जीवनक इच्छा रखनेवालोको विना उत्सवको समाप्त
किये यात्रा नहीं करनी चाहिये ॥ ६७७ < )
( यात्रामें अपशकुन-- ) यात्राके समय यदि
परस्पर दो भेसों या चूहोमे लडाई हो, स्त्रीसे कलह
हो या स्त्रीका मासिक धर्म हुआ हो, वस्त्र आदि
शरीरसे खिसककर गिर पडे, किसीपर क्रोध हो
जाय या मुखसे दुर्वचन कहा गया हो तो उस दशामें
राजाको यात्रा नहीं करनी चाहिये ॥ ६७८ > ॥
( दिशा, वार तथा नक्षत्र दोहद ?- ) यदि
राजा घृतमिश्चित अन्न खाकर पूर्वं दिशाकी यात्रा
करे, तिलचूर्णं मिलाया हुआ अन्न खाकर दक्षिण
दिशाको जाय ओर घृतमिश्चित खीर खाकर उत्तर
दिशाकौ यात्रा करे तो निश्चय ही वह शत्नुओंपर
विजय पाता है। रविवारको सज्िका (मिसिरी
ओर मसाला मिला हुआ दही), सोमवारको खीर,
मङ्गलवारको काजी, बुधवारको दूध, गुरुवारको
दही, शुक्रवारको दूध तथा शनिवारको तिल ओर
भात खाकर यात्रा करे तो शत्रुओंको जीत लेता हे ।
अश्चिनीमें कुल्माष (उड़दका एक भेद), भरणीमें
तिल, कृत्तिकामें उड़द, रोहिणीमें गायका दही,
मृगशिरामं गायका घी, आद्रमिं गायका दूध,
आश्लेषामें खीर, मघामें नीलकण्ठका दर्शन, हस्तमं
पा्टिक्य (साठी धान्य) -के चावलका भात, चित्रामें
प्रियङ्कु (कगनी), स्वातीमें अपूप (मालपूञ),
अनुराधामें फल (आम, केला आदि), उत्तराषाद्में
शाल्य (अगहनी धानका चावल), अभिजित्में
हविष्य, श्रवणमें कृशरान्न (खिचड़ी), धनिष्टामें
२३६९
मूंग, शतभिषामें जका आटा, उत्तरभाद्रपदमें खिचडी
तथा रेवतीमें दही-भात खाकर राजा यदि हाथी,
घोडे, रथ या नरयान (पालकी ) -पर बैठकर यात्रा
करे तो बह शत्रुओंपर विजय पाता है ओर उसका
अभीष्ट सिद्ध होता हे ॥ ६७९-६८४॥
( यात्राविधि- ) प्रज्वलित अग्रिमे तिलोसे
हवन करके जिस दिशामें जाना हो, उस दिशाके
स्वामीको उन्हीके समान रङ्गवाले वस्त्र, गन्ध तथा
पुष्प आदि उपचार अर्पण करके उन दिकृपालोके
मन्त्रोद्वारा विधिपूर्वक उनका पूजन करे) फिर
अपने ईषटदेव ओर ब्राह्मणोको प्रणाम करके
ब्राह्मणोसे आशीर्वाद लेकर राजाको यात्रा करनी
चाहिये ॥ ६८५ : ॥
( दिक्पालोके स्वरूपका ध्यान -- ) (१ पूर्वं
दिशाके स्वामी) देवराज इन्द्र शचीदेवीके साथ
एेरावतपर आरूढ हो बड़ी शोभा पा रहे है।
उनके हाथमे वचर है। उनकी कान्ति सुवर्ण-
सदृश है तथा वे दिव्य आभुषणोसे विभूषित है।
(२ अग्रिकोणके अधीश्वर) अग्रिदेवके सात हाथ,
सात जिह्वाएं ओर छः मुख ह । वे भेड्पर सवार
है, उनकी कान्ति लाल है, वे स्वाहादेवीके
प्रियतम ह तथा सरुक् -सरुवा ओर नाना प्रकारके
आयुध धारण करते ह। (३ दक्षिण दिशके
स्वामी) यमराजका दण्ड ही अस्त्र है। उनकी
अंखिं लाल है ओर वे भैसेपर आरूढ हँ । उनके
शरीरका रङ्ग कुछ लाली लिये हए सोँवला है । वे
ऊपरको ओर मुंह किये हुए हँ तथा शुभस्वरूप
हं । (४ नैऋत्यकोणके अधिपति) नित्ऋऋतिका वर्णं
नील है। वे अपने हाथोपिं ढाल ओर तलवार
१. दोहद-जिसे जिस वस्तुक विशेष चाह होती है, जिसकी प्रातिसे मन प्रसन्न हो जाता ै, बह उसका "दोहद"
कहलाता है । पूर्वं दिशाकी अचिष्ठात्रीदेवी चाहती टै कि लोग घृतमिश्रित अन्न खार्यं । रविवारका अधियति चाहता है
कि लोग रसाला (सिखरन-मिसिरी ओर मसाला मिला हुआ दही) खाय इत्यादि । इसी प्रकार अन्य वादि भी
जानना चाहिये । दोहद-धक्षण करनेसे उस वार आदिका दोप नष्ट हो जाता &।
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३७० संक्षिप्त नारदपुराण
लिये रहते हँ; मनुष्य ही उनका वाहन है । उनकी
आंखें भयंकर तथा केश ऊपरकी ओर उठे हुए
हे। वे सामर्ध्यशाली ह ओर उनकी गर्दन बहुत
बड़ी हे। (५ पञ्िम दिशाके स्वामी) वरुणकी
अद्ककान्ति पीली हे। वे नागपाश धारण करते हे ।
ग्राह उनका वाहन है । वे कालिकादेवीके प्राणनाथ
हे ओर रमय आभूषणोसे विभूषित हें । (६ वायव्य
कोणके अधिपति) वायुदेव काले रङ्गके मृगपर
आरूढ हे । अञ्जनीके पति हें, वे समस्त प्राणियोके
प्राणस्वरूप हें । उनको दो भूजाएं हँ ओर वे हाथमें
दण्ड धारण करते हं। इस प्रकार उनका ध्यान
ओर पूजन करे । (७ उत्तर दिशाके स्वामी) कुबेर
घोड्पर सवार हैं । उनकी दो भुजां है । वे हाथमे
कलश धारण करते ह । उनकी अङ्गकान्ति सुवर्णके
सदृश हे। वे चित्रलेखादेवीके प्राणवल्लभ तथा यक्षो
ओर गन्धर्वकि राजा हें । (८ ईशानकोणके स्वामी)
गौरीपति भगवान् शङ्कर हाथमे पिनाक लिये वृषभपर
आरूढ हैं। वे सबसे श्रेष्ठ देवता हैँ । उनकी
अङ्घकान्ति श्त हे। माथेपर चन्द्रमाका मुकुट
सुशोभित होता है ओर सर्पमय यज्ञोपवीत धारण
करते ह । (इस प्रकार इन सब दिक्पालोंका ध्यान
ओर पूजन करना चाहिये) ॥ ६८६-६९३५ ॥
( प्रस्थानविधि- ) यदि किसी आवश्यक
कार्यवश निश्चित यात्रा-लग्रमें राजा स्वयं न जा
सके तो छत्र, ध्वजा, शस्त्र, अस्त्र या वाहनमेसे
किसी एक वस्तुको यात्राके निर्धारित समयमे
घरसे निकालकर जिस दिशामे जाना हो, उसी
दिशाको ओर दूर रखा दे। अपने स्थानसे निर्गमस्थान
(प्रस्थान रखनेको जगह) २०० दण्ड (चार हाथकी
लग्ग) -से दूर होना उचित है। अथवा चालीस या
कम-से-कम वारह दण्डकी दूरी होनी आवश्यक
ह। राजा स्वयं प्रस्तुत होकर जाय तो किसी एक
स्थानमें सात दिन न ठहरे। अन्य (राज-मन्त्री तथा
साधारण) जन भी प्रस्थान करके एक स्थानमें छः
या पोच दिन न ठहरे। यदि इससे अधिक ठहरना
पड़ तो उसके बाद दूसरा शुभ मुहूर्तं ओर उत्तम
लग्र विचारकर यात्रा करे ॥ ६९४-६९६ ६ ॥
असमयमें (पौषसे चेत्रपर्यन्त) विजली चमके,
मेघकी गर्जना हो या वर्षा होने लगे तथा त्रिविध
(दिव्य, आन्तरिक्ष ओर भोम) उत्पात होने लग
जाय तो राजाको सात राततक अन्य स्थानोंको
यात्रा नहीं करनी चाहिये ॥ ६९७ ६ ॥
( शकुन-- ) यात्राकालमें रला नामक पक्षी,
चूहा, सियारिन, कोआ तथा कवृूतर-इनके शब्द
वामभागमें सुनायी दं तो शुभ होता है। छंद,
पिंगला (उदू), पटी ओर गदहा-ये यात्राके
समय वामभागमें हों तो श्रेष्ठ हें । कोयला, तोता
ओर भरदूल आदि पक्षी यदि दाहिने भागमें आ
जाये तो श्रेष्ठ हे । काले रंगको छोडकर अन्य सव
रगोके चोपाये यदि वाम भागमें दीख पदं तो श्रेष्ठ
हं तथा यात्रासमयमे कृकलास (गिरगिट) का
दर्शन शुभ नहीं हे ॥ ६९८-७००॥
यात्राकालमें सूअर, खरगोश, गोधा (गोह)
ओर सर्पोकी चर्चा शुभ होती है, किंतु किसी
भूली हई वस्तुको खोजनेके लिये जाना हो तो
इनको चर्चा अच्छी नहीं होती है। वानर ओर
भालु्ओंको चर्चाका विपरीत फल होता हे ॥७०१॥
यात्रामें मोर, वकरा, नेवला, नीलकण्ठ ओर
कवृतर दीख जायं तो इनके दर्शनमात्रसे शुभ होता है;
परतु लोटकर अपने नगरमे आने या घरमें प्रवेश
करनेके समय ये दर्शन दं तो सब अशुभ ही समञ्जना
चाहिये। यात्राकालमें रोदन शब्दरहित कोई शव
(मर्द) सामने दीख पड तो यात्राके उदेश्यकी सिद्धि
होती है। परंतु लौटकर घर आने तथा नवीन गृहम
प्रवेश करनेके समय यदि रोदन शब्दके साथ मुर्दा
दीख पड़ तो वह घातक होता है ॥७०२-७०३॥
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद्
( अपकुन-- ) यात्राके समय पतित, नपुंसकः,
जटाधारी, पागल, ओषध आदि खाकर वमन (उलट)
करनेवाला, शरीरमें तेल लगानेवाला, वसा, हड़ी,
चर्म, अङ्गार (ज्वालारहित अग्नि), दीर्घ रोगी, गुड,
कपास (रूई), नमक, प्रश्न (पृ्छने या टोकनेका
शब्द), तृण, गिरगिर, बन्ध्या स्त्री, कुबड़ा, गेरुआ
वस्त्रधारी, खुले केशवाला, भूखा तथा नंगा-ये
सव सामने उपस्थित हो जाये तो अभीष्ट-सिद्धि
नहीं होती हे ॥ ७०४-७०५ ॥
( शुभ शकुन-- ) प्रज्वलित अग्नि, सुन्दर
घोड़ा, राजसिंहासन, सुन्दरी स्त्री, चन्दन आदिकौ
सुगन्ध, फूल, अक्षत, छत्र, चामर, डोली या
पालकी, राजा, खाद्य पदार्थ, ईख, फल, चिकनी
मिटटी, अन्न, शहद, घृत, दही, गोबर, चूना, धुला
हुआ वस्त्र, श्भुः, धेत बेल, ध्वजा, सौभाग्यवती
स्त्री, भरा हुआ कलश, रत्न (हीरा, मोती आदि),
भृङ्गार (गङ़्आ), गौ, ब्राह्यण, नगाड़ा, मृदङ्ग,
दुन्दुभि, घण्टा तथा वीणा (बांसुरी) आदि वाद्योके
शब्द, वेदमन्त्र एवं मङ्गल गीत आदिके शब्द-ये
सब यात्राके समय यदि देखने या सुननेमें आवें तो
यात्रा करनेवाले लोगोके सव कार्य सिद्ध करते
है ॥ ७०६-७०९॥
( अपशकुन-परिहार-- ) यात्राके समय प्रथम
वार अपशकुन हो तो खडा होकर इष्टदेवका
स्मरण करके फिर चले । दूसरा अपशकुन हो तो
ब्राह्मणोको पूजा (वस्त्र, द्रव्य आदिसे उनका
सत्कार) करके चले । यदि तीसरी वार अपशकुन
हो जाय तो यात्रा स्थगित कर देनी चाहिये ॥७१०॥
( छींकके फल- ) यात्राके समय सभी
दिशाओंको छींक निन्दित है। गौकी छींक घातक
होती है, किंतु बालक, वृद्ध, रोगी या कफवाले
मनुष्यकौ छींक निष्फल होती है ॥७११॥
परस्त्रियोका स्पर्शं करनेवाला तथा ब्राह्मण
[ 1183 ] सं० ना० पु० १३-
२७९
ओर देवताके धनका अपहरण करनेवाला तथा
अपने छोडे हुए हाथी ओर घोडेको बंध लेनेवाला,
शत्रु यदि सामने आ जाय तो राजा उसे अवश्य
मार डाले; परंतु स्त्रियों तथा शस्त्रहीन मनुष्योपर
कदापि हाथ न उठावे॥७१२॥
( गृह-प्रवेश- ) नये घरमे प्रथम बार प्रवेश
करना हो तो उत्तरायणके शुभ मुहूर्तम करे । पहले
दिन विधिपूर्वक वास्तु-पूजा ओर बलि (नैवेद्य)
अर्पण करके गृहमे प्रवेश करना चाहिये ॥७१३॥
( गृह-प्रवेशमें विहित मास- ) माघ, फाल्गुन,
वैशाख ओर ज्येष्ठ-इन चार मासोमें गृहप्रवेश श्रेष्ठ
होता है। तथा अगहन ओर कार्तिक इन दो
मासोमे मध्यम होता हे।
( विहित नक्षत्र-- ) मृगशिरा, पुष्य, रेवती,
शतभिषा, चित्रा, अनुराधा ओर स्थिर-संज्ञक (तीनां
उत्तरा ओर रोहिणी) नक्षत्रोमें वृहस्पति ओर शुक्र
दोनों उदित हों तब रवि ओर मङ्गलको छोडकर
अन्य वारोमें रिक्ता (४, ९, १४) तथा अमावास्या
छोडकर अन्य तिथियों दिन या रात्रिके समय
गृहप्रवेश शुभप्रद होता है। चन्रबल ओर ताराबलसहित
उपद्रवरहित दिनके पूर्वाह्न भागमें स्थिर राशिके
नवमांशयुक्त स्थिर लग्रमे जब लग्रसे अष्टम स्थान
शुद्ध (ग्रहरहित) हो, शुभग्रह त्रिकोण या केन्दरमे
हो, पापग्रह ३, ६, ११ भावोमे हां ओर चन्द्रमा
लग्र, १२, ८, ६ इनसे भिन्न स्थानें हो, तव गृह-
प्रवेश करनेवाले यजमानको जन्मराशि, जन्मलग्र
या इन दोनेपे उपचय (३, ६, १०, १९१ वी) रिक
गृह-प्रवेश लग्रे विद्यमान होनेपर् सव प्रकारके
सुख ओर सम्पत्तिकी वृद्धि होती दै। अन्यथा
इससे विपरीत समयमे गृह-प्रवेश किया जाय तो
शोक ओर तिर्धनता प्राप्त होती है ॥७१४-७१९॥
( प्रवेश-विधि-- ) जिस नृतन गृहमे प्रवेश
करना हो, उसको चित्र आदिसे सजाकर तथा
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३७२
संक्षिप्त नारदपुराण
पुष्प-तोरण आदिसे अलंकृत करके वेद-ध्वनि,
शान्तिपाठ, सौभाग्यवती स्त्रियोके माङ्गलिक गीत
तथा वाद्य आदिक शब्दके साथ सूर्यको वाम
भागमें रखकर जलसे भरे हुए कलशको आगे
करके उसमें प्रवेष्टा करना चाहिये ॥७२०॥
( वृष्टि-विचार-- ) वर्पा-प्रवेश (आरद्रा नक्षत्रमें
सूर्यके प्रवेश)-क समय यदि शुक्लपक्ष हो,
चन्द्रमा जलचर राशिमें या लग्रसे केन्द्र (१, ४,
७, १०) -में स्थित होकर शुभग्रहसे देखे जाते हों
तो अधिक वृष्टि होती है। यदि उस समय
चन्द्रमापर पापग्रहको दृष्टि हो तो दीर्घकालमें
अल्पवृष्टि समञ्लनी चाहिये । (इससे सिद्ध होता हे
कि यदि चनद्रमापर पाप ओर शुभ दोनों ग्रहोकी
दृष्टिहो तो मध्यम वृष्टि होती है।) जिस प्रकार
चन्द्रमासे फल कहा गया है, उसी प्रकार उस
समय शुक्रसे भरी समञ्जना चाहिये। (अर्थात्
सूर्यके आरद्रा-प्रवेशके समय चन्द्रमा ओर शुक्र.
दोनोंको स्थिति देखकर तारतम्यसे फल समञ्चन
चाहिये) ॥ ७२१-.०२२॥
वषकालमें नाद्रसि स्वातीतक सूर्यके रहनेपर
चन्द्रमा यदि शुक्रसे सप्तम स्थानमें अथवा शनिसे
पञ्चम, नवम तथा सप्तम स्थानमें हो, उसपर शुभ
ग्रहको दृष्टि पड़ तो उस समय अवश्य वर्षा होती
हे ॥७२३॥
यदि बुध ओर शुक्र समीपवर्ती (एक राशिमें
स्थित) हों तो तत्काल वर्षा होती है। किंतु उन
दोनों (बुध ओर शुक्र) -के बीचमें सूर्यहों तो
वृष्टिका अभाव होता है॥७२४॥
यदि मघा आदि पोच नक्षत्रोमें शुक्र पूर्व दिशामें
उदित हों ओर स्वातीसे तीन नक्षत्रों (स्वाती,
विशाखा, अनुराधा ) -में शुक्र पश्चिम दिशामें उदित
हों तो निश्चय ही कर्षा होती है। इससे विपरीत हो
तो वर्षा नहीं समञ्चनी चाहिये ॥७२५॥
यदि सूर्यके समीप (एक राशिके भीतर
होकर) कोई ग्रह आगे या पीछे पड्तेहोंतोवे
वर्षा अवश्य करते हँ; किंतु उनकी गति वक्र न
हई हो तभी एेसा होता ह ॥७२६॥
दक्षिण गोल (तुलासे मीनतक ) -में शुक्र यदि
सूर्यसे वाम भागमें पड़ तो वृष्टिकारक होता हे।
उदय या अस्तके समय यदि आद्रमिं सूर्यका प्रवेश
हो तो भी वर्षा होती हे॥७२७॥
यदि सूर्यका आर्द्रा प्रवेश सन्ध्याके समय हो
तो शस्य (धान)-की वृद्धि होती है। यदि रात्रिमें
हो तो मनुष्योंको सब प्रकारकी सम्पत्ति प्राप्त होती
हे। यदि प्रवेशकालमें चन्द्रमा, गुरु, बुध एवं
शुक्रसे आर्द्रा भेदित हो तो क्रमशः अल्पवष्टि
धान्य-हानि, अनावृष्टि ओर धान्य-वृद्धि होती है;
इसमे संशय नहीं हे । यदि ये चारों चन्द्र, बुध, गुरु
ओर शुक्र प्रवेश-लग्रसे केन्द्रमे पडते हों तो ईति
(खेतीके टिड़ी आदि सब उपद्रव )-का नाश होता
हे ॥७२८-७२९॥
यदि सूर्यं पूर्वाषाढ् नक्षत्रे प्रवेशके समय
मेघोसे अच्छन्न हों तो आद्रसि मूलतक प्रतिदिन
वर्षां होती हे ॥७३०॥
यदि रेवतीमें सूर्यके प्रवेश करते समय वर्षा
हो जाय तो उससे दस नक्षत्र (रेवतीसे आश्लेषा) -
तक वर्षा नहीं होती है । सिंह-प्रवेशमें लग्र यदि
मङ्गलसे भिन्न (भेदित) हो, कर्क-प्रवेशमें अभिन्न
हो एवं कन्या-प्रवेशमें भिन्न हो तो उत्तम वृष्टि
होती है ॥७३१३ ॥ उत्तर भाद्रपद पूर्वधान्य, रेवती
परधान्य तथा भरणी सर्वधान्य नक्षत्र है । अश्चिनीको
सर्वधान्योका नाशक नक्षत्र कहा गया है । वर्षाकाल
(चातुर्मास्य) -मं पश्चिम उदित हए शुक्र यदि
गुरुसे सप्तम राशिमें निर्बल हों तो आद्रसि सात
नक्षत्रतक प्रतिदिन अतिवृष्टि होती हे । चन्द्रमण्डलमें
परिवेष (घेरा) हो ओर उत्तर दिशामें विजली
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद्
२३७३
दीख पडे या मेढकोके शब्द सुनायी पड़ं तो
निश्चय ही वर्षा होती है। पश्चिम भागमें लटका
हुआ मेघ यदि आकाशके बीचमें होकर दक्षिण
दिशामें जाय तो शीघ्र वर्षा होती है । विलाव अपने
नाखूनोंसे धरतीको खोदे, लोहे (तथा तोवे ओर
कांसी आदि) -में मल जमने लगे अथवा बहुत-
से बालक मिलकर सड़कोंपर पुल बोधे तोये
वषकि सूचक चिह्न हें
चीटीको पङ्क्ति छिन्न-भिन्न हो जाय, आकाशम
वहुतेरे जुगुनू दीख पडं तथा सर्पोका वृक्षपर
चटना ओर प्रसन्न होना देखा जाय तो ये सब
दुर्वृष्टि-सूचक हें ।
उदय या अस्त-समयमें यदि सूर्य या चन्द्रमाका
रग वदला हआ जान पड़ या उनकी कान्ति मधुके
समान दीख पड़े तथा बडे जोरकी हवा चलने
लगे तो अतिवृष्टि होती है ॥ ७२२--७२८ ॥
( पृथ्वीके आधार कर्मके अङ्क-विभाग-- )
कूम्देवता पूर्वक ओर मुख करके स्थित हैँ, उनके
नव अङ्खोमें इस भारत भूमिके नौ विभाग करके
प्रत्येक खण्डमें प्रदक्षिणक्रमसे विभिन्न मण्डलं
(देशों )-को समञ्चे। अन्तर्वेदीं (मध्यभाग)-में
पाञ्चालदेश स्थित हे, वही कूर्मभगवान्का नाभिमण्डल
हे। मगध ओर लाट देश पूर्वं दिशामें विद्यमान है,
वे ही उनका मुखमण्डल हें । स्त्री, कलिङ्गं ओर
किरात देश भुजा रहैं। अवन्ती, द्रविड ओर
भिह्देश उनका दाहिना पार्श्वं हें । गोड, ककण,
शाल्व, आन्ध्र ओर पौण्ड् देश-ये सब देश दोनों
अगले पैर है । सिन्ध, काशी, महाराष्ट तथा सौरा
देश पुच्छ-भाग है। पुलिन्द चीन, यवन ओर
गुर्जर-ये सब देश दोनों पिछले पैर हँ । कुरु,
काश्मीर, मद्र तथा मत्स्य-देश वाम पार्श्व हे। खस
(नेपाल) अद्ध, वद्ध, वाहीक ओर काम्बोज-ये
दोनों हाथ है ॥७३९-७४४॥
इन नवों अङ्गम क्रमशः कृत्तिका आदि तीन-
तीन नक्षत्रोंका न्यास करे। जिस अद्गुके नक्षत्रमें
पापग्रह रहते ठै, उस अक्घके देशोमे तवतक
अशुभ फल होता हे ओर जिस अङ्के नक्षत्रम
शुभग्रह रहते हे, उस अङ्गके देशोमें शुभ फल
होते हें ॥ ७४५ ॥
( मूर्ति-प्रतिमा-विकार-- ) देवताओंकी प्रतिमा
यदि नीचे गिर पड़े, जले, बार-बार रोये, गावे,
पसीनेसे तर हो जाय, हंसे, अग्रि, धुं, तेल,
शोणित, दूध या जलका वमन करे, अधोमुख हो
जाय, एक स्थानसे दूसरे स्थानमे चली जाय तथा
इसी तरहक अनेक अद्धुत बातें दीख पडं तो यह
प्रतिमा-विकार कहलाता हे। यह विकार अशुभ
फलका सूचक होता है ।
( विविध विकार- ) यदि आकाशम गन्धर्वनगर
(ग्रामके समान आकार), दिनमें ताराओंका दर्शन,
उल्कापतन, का, तृण ओर शोणितकी वर्षा,
गन्धर्वोका दर्शन, दिग्दाह, दिशाओमें धूम छा
जाना, दिन या रात्रिमें भूकम्प होना, विना आगके
स्फुल्िद्ध (अद्भार) दीखना, विना लकड़ीके आगका
जलना, रात्रिम इन्द्रधनुष या परिवेष (घेरा)
दीखना पर्वत या वृक्षादिके ऊपर उजला कौआ
दिखायी देना तथा आगकी चिनगारिर्योका प्रकट
होना आदि वातें दिखायी देने लगे, गौ, हाथी ओर
घोड़ोके दो या तीन मस्तकवाला बच्चा पैदा हो,
प्रातःकाल एक साथ ही चारो दिशाओंपं अरुणोदय-
सा प्रतीत हो, गोंवमें गीदड़ोंका दिनम बास हो,
धूम-केतुओंका दर्शन होने लगे तथा रात्रिम
कौोओंका ओर दिनमें कवृतरोका क्रन्दन हो तो ये
भयंकर उत्पात हें । वृक्षोमें विना समयके फूल या
फल दीख पड तो उस वृक्षको कार देना चाहिये
ओर उसको शान्ति कर लेनी चाहिये । इस प्रकारके
ओर् भी जो बड़-बडे उत्पात दृष्टिगोचर होते है, वे
स्थान (देश या ग्राम)-का नाश करनेवाले होते
हं । कितने ही उत्पात बातक होते है; कितने ही
शत्रुओपि भय उपस्थित करते हैं । कितने ही उत्पातेपि
भय, यश, गृत्यु, हानि, कीर्ति, मुख-दुःख ओर
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३७४ संक्षिपर नारदपुराण
ेश्र्यको भी प्राप्ति होती है। यदि वल्मीक | कर लेनी चाहिये । नारदजी । इस प्रकार संक्षेपसे मेने
(दीमकको मिटरीके ढेर) -पर शहद दीख पड़ तो | ज्योतिषशास्त्रका वर्णन किया हे। अव वेदके छह अङ्खोमे
धनको हानि होती है । द्विजश्रेष्ठ! इस तरहके सभी | श्रेष्ठ छन्दःशास्त्रका परिचय देता हूँ ॥ ७४६-७५८॥
उत्पातोमें यत्नपूर्वक कल्पोक्त विधिसे शान्ति अवश्य | (पूर्वभाग द्वितीय पाद अध्याय ५६)
^>
छन्दःशास्त्रका संक्षिप्त परिचयः
3 कहते है- नारद ! छन्द दो प्रकारके | सभी अर्थात् तीनों अक्षर गुरु हों उसे मगण
बताये जाते है- वैदिकः ओर लौकिकः । मात्रा | (555) कहा गया है । जिसका आदि अक्षर लघु
ओर वणक भेदसे वे लौकिक या वैदिक छन्द | (ओर शेष दो अक्षर गुरु) हो, वह यगण ( 155)
भी पुनः दो-दो प्रकारके हो जाते हें (मात्रिकः | माना गया है। जिसका मध्यवर्ती अक्षर लघु हो,
छन्द ओर वर्णिक छन्द) ॥ १॥ छन्दःशास्त्रके | वह रगण (515) ओर जिसका अन्तिम अक्षर गुरु
विद्रानोने मगण, यगण, रगण, सगण, तगण, | हो, वह सगण (८ ॥5) दै ॥ ३ ॥ जिसमें अन्तिम
जगण, भगण ओर नगण तथा गुरु एवं लघु-इन्दीको | अक्षर लघु हो, वह तगण (55 1) कहा गया है,
छन्दोकौ सिद्धिमे कारण वताया हे ॥ २॥ जिसमें | जहां मध्य गुरु हो, वह जगण (।5।) ओर
१. शास्त्रकारोनि द्विजातियकि लिये छहों अद्गोसहित सम्पूर्णं वेदकि अध्ययनका आदेश दिया है । उन्दीं अद्भमिंसे छन्द
भी एक अद्ग हे। इसे वेदका चरण माना गया है- छन्दः पादौ तु वेदस्य ।' (पा० शि० ४१) “अनुष्टुभा यजति, बृहत्या गायति
गायत्र्या स्तैति।' (पिं० सूत्रवृत्ति अध्याय १) (अनुष्टुप्से यजन करे, वृहती छन्दद्वारा गान करे, गायत्री छन्दसे स्तुति करे)
इत्यादि विधिर्योका श्रवण होनेसे छन्दका ज्ञान परम आवश्यक सिद्ध होता है । छन्द न जाननेसे प्रत्यवाय भी होता है; जैसा
कि छान्दोग ब्राह्मणका वचन है-' यो ह वा अविदितार्पयच्छन्दोदेवतविनियोगेन ब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा
स स्थाणुं वच्छति गतं वा पद्यते प्रमीयते वा पापीयान् भवति यातयामान्यस्य छन्दांसि भवन्ति।' (पिं° सूत्रवृत्ति अध्याय १)
( जो ऋषि, छन्द, देवता तथा विनियोगको जाने विना त्राह्यणमन्त्रसे यज्ञ कराता ओर शि्योको पदाता है, वह ट्ठि काठके
समान हो जाता है, नरकमें गिरता है, वेदोक्त आयुका पूरा उपभोग न करके वीचमें ही मृत्युको प्राप्त होता है अथवा महान्
पापका भागी होता है। उसके किये हुए समस्त वेदपाठ यातयाम (प्रभाव-शन्य व्यर्थ) हो जाते है); इसलिये छन्दका ज्ञान
अवश्य प्रात करना चाहिये। इसीके लिये इस छन्दःशास्त्रका आरम्भ हुआ हे।
२. वेदमन्त्रोमं जो गायत्री, अनुष्टुप्, वृहती ओर त्रिष्टप् आदि छन्द प्रयुक्त हुए टै, उनको वैदिक छन्द कहते ह। यथा-
तत्सवितुर्वरिण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
-- यह गायत्री छन्द है।
३. इतिहास, पुराण, काव्य आदिके पद्योमें प्रयुक्त जो छन्द है, वे लौकिक कटे गये है । यथा-
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
--यह “श्लोक अनुष्टुप् छन्द है।
४. परिगणित मात्राओंसे पर्णं हनेवाले छन्दको “ मात्रिक कहते दै । जेसे- आर्या छन्दके प्रथम ओर तृतीय पाद
वारह मात्राओंसे, द्वितीय पाद अठारह मात्राओसि ओर चतुर्थ पाद पन्द्रह मात्राओंसे पूर्ण होते ह । आयकि पूर्वार्धं सदृश
उत्तरार्ध भी हो तो "गीति" ओर उत्तरार्ध-सदृश पूर्वार्धं हो तो "उपगीति' छन्द होते है ।
आर्यका उदाहरण-
वृन्दावने सलीलं वल्गुद्रुमकाण्डनिहिततनुयष्टिः । स्मेरमुखार्पितवेणुः कृष्णो यदि मनसि कः स्वर्गः ॥
५. परिगणित अशक्षरोसे सिद्ध होनेवाले छन्दोंको वर्णिक" कहते है । यथा-
जयन्ति गोविन्दमुखारविन्दे परन्दसानद्राधरमन्दहासाः । चित्ते चिदानन्दमयं तमोघ्रममन्दमिन्दुद्रवमुद्विरन्तः ॥
-यह इन्द्रवज्रा-उपेन्द्रवज्राके मेलसे बना हआ उपजाति नामक छन्द है।
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 21188 \/8181185। (01661011. 01411260 0 60810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
३७५
जिसमें आदि गुरु हो, वह भगण (5॥)
हे। मुने! जिसमें तीनों अक्षर लघु हा, वह नगण
( ॥।) कहा गया है। तीन अक्षरोके समुदायका
नाम गण है.॥४॥ आर्या आदि छन्दोम चार
मात्रावाले पोच गण कहे गये है, जो चार
लघुवाले गणसे युक्त हेँ*। यदि लघु अक्षरसे
परे संयोग, विसर्ग ओर अनुस्वार हो तो
वह लघुकी दीर्घताका बोधक होता हैर।
इस छन्दःशास्त्रमे (ग' का अर्थं गुरु या
दीर्घं माना गया है ओर 'ल' का अर्थं
लघु समज्ञा जाता है। पद्य या श्लोकके एक
चौथाई भागको पाद कहते हें। विच्छेद या
विरामका नाम यति" हे ॥५-६॥ नारद! वृत्त
(छन्द) -के तीन भेद माने गये है-- सम वृत्त,
अर्धसम वृत्त तथा विषम वृत्त। जिसके चारों
चरणोमे समान लक्षण लक्षित होता हो, वह सम
वृत्तः कहलाता है ॥७॥ जिसके प्रथम ओर
तीसरे चरणोमें एवं दूसरे तथा चौथे चरणे
९. गणोके सम्बन्धर्मे कुछ ज्ञातव्य वाते निम्राद्भित कोष्ठकसे जाननी चादहिये-
भगण नपण
खल्ल | उड [5 | उड | | शा
बला | यव | जल | अग्र - न (=
(१ गंग सुयश आयु
(~.
मित्र
मित्र आदि भृत्य उदासीन उदासीनं
संज्ञाएं
यंदि काव्यमें एेसे छन्दको चुना गया, जो जगण आदि अनिष्टकारी गोसे संयुक्त हो तो उसकी शान्तिके लिये
प्रारम्भमे भगवद्राचक एवं देवतावाचक शब्दोका प्रयोग करना चाहिये; जैसा कि भामहका वचन दहै-
देवतावाचकाः शब्द ये च भद्रादिवाचकाः। ते सर्वे नैव निन्द्याः स्युर्दिपितो गणतोऽपि वा॥ (पिङ्गलसूत्रकी
हलायुध-वृत्तिसे उद्धुत)
"जो देवतावाचक ओर मङ्गलादिवाचक शब्द है, वे सव लिपिदोष या गणदोषसे भी निन्दित नहीं होते ।' (उनके
द्वारा उक्त दोपोका निवारण हो जाता है।)
२. यथा- सर्वगुरु अन्त्यगुरु मध्यगुरु
55 ॥5 ।5।
१ : ३
आदिगुर् चतुर्लघु
5॥ ॥॥
र ५
इन भेदोके नाम क्रमशः इस प्रकार टै-- कर्ण, करतल, पयोधर, वसुचरण ओर् विष्ठ।
३. जैसे-रामं। रामः। रामस्य । यहां रम" शब्दके "म" में हस्व अकार है, तथापि उसमं अनुस्वार ओर विसर्गका
सम्बन्ध होनेसे वह दीर्घं ही माना जाता है। इसी प्रकार ' स्य ' यह संयुक्त अक्ष परे होनेसे “रमस्य म मकारके पर्वती
अकारको दीर्घं समज्ञा जाता है। पादके अन्तमं जो लघु अक्षर हो, वह भी विकल्पसे “ गुरु" माना जाता है।
४. सम वृत्तका उदाहरण-
मुखे ते ताम्बृलं नयनयुगले कजलकला ललाटे काश्मीरं विलसति गले मौक्तिकलता ।
स्फुरत्काञ्ची शारी पृथुकटितटे हाटकमयी भजामि त्वां गौरीं नगपतिक्रिशोरीमविरतम्॥
(इस "शिखरिणी ' छन्दके चारों चरणों एक समान हस्व -दीर्घवाले सत्रह-सत्रह अक्षर है ।)
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 66810011
२३७६
संक्षिप्त नारदपुराण
समान लक्षण हों, वह अर्धसमः वृत्त है । जिसके
चारों चरणोमे एक-दूसरेसे भिन्न लक्षण लक्षित
होते हों, वह विषमः वृत्त है ॥ ८॥ एक
अक्षरके पादसे आरम्भ करके एक-एक अक्षर
वदाते हुए जबतक छव्वीस अक्षरका पाद पूरा
हो तबतक पृथक्-पृथक् छन्द बनते हें । छव्वीस
अक्षरसे अधिकका चरण होनेपर चण्डवृष्टिप्रपात
आदि दण्डकः बनते हं। तीन या छः पादोँसे
१. अर्धसम वृत्तका उदाहरण-
1॥॥ 13 13 1539 ॥॥3 ॥5 15 155
गाथा" होती है। अव क्रमशः एकसे छन्बीस
अक्षरतकके पादवाले छन्दोंकी संज्ञा सुनो ॥ ९-
१०॥ उक्ता, अत्युक्ता, मध्या, प्रतिष्ठा, सुप्रतिष्ठा,
गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप्, बृहती, पट्क्ति, त्रिष्टप्,
जगती, अतिजगती, शक्वरी, अतिशक्वरी, अष्टि,
अत्यष्टिधृति, विधृति (या अतिधृति), कृति,
प्रकृति, आकृति, विकृति, संकृति, अतिकृति
या अभिकृति तथा उत्कृति ॥ ११-१३॥
त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं रविकरगौरवराम्बरं दधाने । वपुरलककुलावृताननाव्जं विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवद्या॥ _.
यह ` पुष्पिताग्रा" छन्द हे । इसके प्रथम् ओर तृतीय चरण एक समान लुक्षणवाले बारहु- वार्ह अक्षरके ह । उनमं
२ नगण, १ रगण ओर १ यगण है ओर द्वितीय तथा चतुर्थं चरणमें एक-से लक्षणवाले तरह-तेरह अक्षर हँ । इनमें
१ नगण, २ जगृण्, ९ रगण ओर ६ गार हे।
अर्धस्षम वृत्तोमे ' पुष्पिताग्रा" के 3
हरिणप्लुता तथा वैतालीय या वियोगिनी आदि ओर भी अनेक छन्द होते है !
वैतालीय अथवा वियोगिनीके प्रथम ओर तृतीय चरणों २ सगण, १ जगण ओर. १ गुरु होते हैँ । द्वितीय ओर चतुर्थं चरमे
१ सगण, १ भगण, १ राण, १ लघु ओर १ गुरु होते हे । पादान्तमें विराम होता हे।
उदाहरण
15 1 5151] $ 53
113 । 5 19
जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णां करुणास्ति चेन्मयि।
अपराधपरम्परापरं न हि माता समुपेक्षते
सुतम्॥ -
` हरिणप्लुता' (में विपम पादोमे ३ सगण, १ दा १ गुरु होते है ओर सम पादो १ नगण, २ भगण ओर १
रगण होते ह । इसके दूसरे, चौथे पाद ट्रूतटि ही समान है।)
उद्वाह र्ण
15 ॥9 13 13 | ॥|3 ॥13
3 13
स्फुटफेनचया हरिणप्लुता ( वलिमनोज्नतरा तरणेः सुता।
कलहसकुलारवशालिनीं विहरतो हरति स्म॒ हरेमनः॥
२. विषम वृत्तका उदाहरण-
नलिनेक्षणं शशिमुखं च रुचिरदशनं घनच्छविम्। चारुचरणकमलं कमलाञितमात्रज त्रजमहेन्द्रनन्दनम्॥
(-इस उद्रता' नामक छन्दम् चारो चरणके भित्त-भिन्न लक्षण है । इसके प्रथम पादमं स, ज, स, ल; रमन, स,
ज, ग;३मंभ, न, ज्, ल, ग ओरथ्मेंस,ज, पस, ज, ग होते ह।) क
३. छब्बीस अशक्षरोसे अधिकका एक-एक चरण होनेपर जो छन्द बनता है उसे, "दण्डक" कहते हैँ । सत्ताईस अक्षरोके
दण्डकका नाम * चण्डवृष्टिप्रपात' है । इसमें दो * नगण' ओर् सात "रगण' होते ह । पादान्तमें विराम होता है।
उदाहर्ण-
इह हि भवति .दण्डकारण्यदेशे स्थितिः पुण्यभाजां मुनीनां मनोहारिणी
त्रिदशविजयिवीर्यदृप्यदृशग्रीवलक्ष्मीविरामेण
स भूमिसमः
४. आचार्य पिङ्गलक मतमें पिङ्गल सूत्रम जिनके नामका उद्वेख नहीं हआ टै.
रमण . संसेविते ।
श्रमे
> छन्दोकी , @ (५ 8 मूलमें न
एसे छन्दोकी गाथा" संज्ञा है। यहो मूलम तीन
पाद या छः पाद्के छन्दको "गाधा' कदा गया है। अतः उसके किसी विशेष लक्षण या उदाहरणका उदे नहीं किया गया।
५. (१) जिसके प्रत्यक व एक-एक अक्ष् हो, उस छन्दका नाम * उक्ता" है । इसके दो भेद होते ह । पहला गुरु
अक्षररोसं वनता हे, दूसरा लघु अक्षरसे। गुरु अक्षरोसे जो छन्द बनता है. उसका नाम पिङ्गलाचार्यने "श्री" रखा ह ।
उदाहरण-' विष्णुं वन्द् ।' लघु अशक्षरोवाले उक्ता छन्दका उदाहरण “हरिरिह ' समञ्चना चाहिये । <
(२) जिसके. प्रत्यक चरणम् दा-दो अक्षगेकौ संयोजना हो, वह “ अत्युक्तो ' नामक छन्द है । प्रस्तारसे इसके चार्
भेट् हो सकते है । यहां विस्तार-भयसे केवल एक् प्रथम भेद * स्त्री" का उदाहरण दिया जाता है । दो गुरु अक्षरोवालै चार
प्दोसे जो छन्द बनता है, उसको ' स्त्री" कहते है ।
उदाहरण- मः
५5
` अन्यस्त्रीभि; सद्धस्त्याज्यः।'
((-0. 1/८1111(4/5511॥ 81188 \/8181185। (01611011. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३७७
(३) तीन-तीन अक्षरोके चार पादोंसे मध्या” नामक छन्द बनता है । प्रस्तारसे उसके भेदकौ संख्या आठ होती है।
इसके प्रथम भेदका, जिसमे तीनों अक्षर गुरु होते ठँ, आचार्य पिङ्गलने "नारी" नाम॒ नियत किया दे।
उदाहरण-
555
१-* सर्वासां नारीणाम्। भर्ता स्यादाराध्यः ॥'
515
२- प्राणतः प्रेयसी । राधिका श्रीपतेः ॥'
यह दूसरा उदाहरण मध्याका तृतीय भेद है । इसे " मृगो" छन्द कहते है । इसके प्रत्येक चरणमं एक-एक रगण होता है।
(४) चार-चार अक्षरोके चार पादवाले छन्द-समृहका नाम ' प्रतिष्ठा" है । प्रस्तारसे इसके सोलह भेद होते है । इसके
प्रथम भेदका नाम "कन्या" हे। उदाहरण पदिये-
5951515
भास्वत्कन्या सैका धन्या। यस्याः कूले कृष्णोऽखेलत् ॥
(५) पाच-रपाच अक्षरके चार पादवाले छन्दसमुदायका नाम “सुप्रतिष्ठा दै। प्रस्तारसे इसके वत्तीस भद होते ह।
इनमें सात्वं भेद “ पंक्ति" रहै, उसे यहां वतलाया जाता है। भगण तथा दो गुरु अशक्षरोसे पंक्ति छन्दको सिद्धि होती है ।
उदाहरण-
५5|| 5 9
कृष्णसनाथा तर्णकपंक्तिः। यामुनकच्छे चारु चचार ॥
(६) जिसके चारों चरणेमिं छः-छः अक्षर हो, उस छन्द-समृहका नाम गायत्री है। प्रस्तारसे इसके चीसट भेद हाते टै । इसके
प्रथम भेदका नाम विद्युट्ेा, तेरहवें भेदका नाम तनुमध्या, सोलहर्वेका नाम शशिवदना तथा उन्तीस्वेका नाम वसुमती दै । यदा
केवल इन्हीं चरणोंका उद्टेख किया जाता हि। दो मगण (5 5 5 5 5 5) होनेसे विद्यु्ेखा, एक तगण (551) ओर एक
यगण (1 5 5) होनेसे तनुमध्या, एक नगण (1।। ) ओर एक यगण (1 ऽ 5) होनेसे शशिवदना तथा एक तेगण (5 5 ॥)
ओर एक सगण (115) होनेसे वसुमती नामक छन्द बनता है । उदाहरण क्रमशः इस प्रकार दै-
" विद्युल्लेखा" -
5553555
गोगोपीगोपानां प्रेयांसं प्राणेशम्। विद्युद्धेखावस्त्रं वन्देऽहं गोविन्दम् ॥
` तनुमध्या -
5155
प्रीत्या प्रतिवेलं नानाविधखेलम्। सेवे गततनद्रं वृन्दावनचन्द्रम्॥
` शशिवदटना'-
11155
परममुदारं विपिनविहारम्। भज प्रतिपालं व्रजपतिबालम्॥
" वसुमती -
55 1115
भक्तार्तिकदनं संसिद्धिसदनम्। नौमीन्दुवदनं गोविन्दमधुना ॥
(७) सात-सात अशक्षरोके चार् पादवाले छन्दसमुदायको “उष्णिक् ' कहा गया दै, प्रस्तारसे इसके एक सौ अदास भेद हते
ह । इनमंसे पचीसर्वां भद "मदलेखा ' ओर तीस्व भद * कुमारललिता' के नामसे प्रसिद्ध है। मगण, सगण तथा एक गुरू--इन सात
अशक्षरोसे "मदलेखा" तथा जगण, सगण ओर एक गुरुमे ' कुमारललिता' छन्दको सिद्धि होती दै। प्रथमका उदाहरण यों है-
55 51155 555 | । 55
रङ्गे बाहविरूग्णाद् दन्तीद्रानमदलेखा। लमग्राभून्मुररात्री कस्तूरीरसचर्चा ॥
(८) आठ अक्षरवाले चार परमे जौ छन्द वनते है, उनको जातिवाचक संजा * अनुष्ट्प्ण है। प्रस्तारे अनृष्रपूके
दो सौ छप्पन भेद होते है । इसके विद्युन्माला, माणवकाक्रोड, चित्रपदा, हंसर्त, प्रमाणिक्रा या नगस्वरूपिणी, समानिका,
श्लोक तथा वितान आदि अनेक भेद-प्रभेद ठै । श्लोक-छन्दके प्रत्येक चरणं छटा अक्षर गुरु ओर रपचिवां लघु होता टै!
प्रथम ओर तृतीय चरेम सात्वं अक्षर दीर्घता टै तथा द्वितीय तथा चनुर्थं चरर्णीमं वह हस्व दुश्रा कता है। शेष अश्षर्यैका
विशेष नियम न दैनेसे इस श्लोक- छदके भी बहूत- मे अवान्तर भद द्य जति ह । उपर्युक्त छदम विद्युमाल्ा अनुप प्रथम भद दै; व्थोकि
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
३७८ संक्षिप्त नारदपुराण
उसमें सभी अक्षर गुरु होते ह । इसमे चार-चार अशक्षरोपर विराम होता है । प्रमाणिका या नगस्वरूपिणी छियासीवँ भेद है। इसमें
जगण, रगण १ लघु तथा १ गुरु होते है । प्रमाणिका ओर समानिकाके सिवा अनुष्टुपके जितने भेद है, वे सव वितानके अन्तर्गत
माने जाते ह। यहां विद्युन्माला, नगस्वरूपिणी; श्लोक (अनुषटप्) तथा माणवकाक्रीडका एक-एक उदाहरण दिया जाता है-
" विद्युन्माला '-
6555
विद्युन्मालालोलान् भोगान् मुक्त्वा मुक्तौ यत्नं कुर्यात्। ध्यानोत्पननं निःसामान्यं सौख्यं भोक्तुं यद्याकाद्क्षेत्॥
' नगस्वरूपिणी '-
शिवताण्डवस्तोत्र ' नगस्वरूपिणी' छन्दमें ही लिखा गया है । उसके एक-एक पद्यमें दो-दो नगस्वरूपिणी छन्द
आ गये हे। कुछ लोग उस संयुक्तछन्दको ' पञ्चचामर' आदि नाम देते है । इसमें ज. र. ज. र. ज. ओर १ गुरु होते है।
उदाहरण यह है-
1 ऽ15॥ ऽ15| 51 5|5। 515
जटाकटाह संभ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्रोविलोलवीचिवह्वरीविराजमानमूर्द्धति।
धगद्धगद्धगज्वलल्ललारपद्रपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥
लाक
यतः प्रवृत्ति भूतानां यन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः॥
माणवकाक्रोडमें भगण, तगण, एक लघु ओर एक गुरु होते है ।
जेसे-
5|| 5 ॐ 115
आदिगतं तुर्यगतं पञ्चमकं चान्त्यगतम्। स्याद् गुरु चेत् तत् कथितं माणवकाक्रोडमिदम्॥
(९) नौ-नौ अक्षरोके चार चरणोसे सिद्ध होनेवाले छन्दसमूहका नाम “ वृहती" है । प्रस्तारसे इसके पाच सौ
बारह भेद होते है। इसके 'हलमुखी ' (१ रगण १ नगण १ सगण) तथा “ भुजद्गशिशुभृता"' (२ नगण १ भगण) भेद यहां
बतलाये जाते ह । इनमें एक तो २५१ वों भेद टै ओर दूसरा ६४ वाँ । उदाहरण क्रमशः यों है
5।5|| ||| 5
१-हस्तयोर्मधुरम्रुरलीं धारयत्नधरशयने। सन्निवेश्य रवममृतं संसृजञ्जयति स॒ हरिः ॥
||| ।। 555
२- प्रणमत नयनारामं विकचकुवलयश्यामम्। अधघहरयमुनानीरे भुजगशिरसि नृत्यन्तम् ॥
(१०) दस अश्षरके पादवाले छन्द-समुदायको " पङ्क्ति" कटते है । प्रस्तारसे इसके १०२४ भेद होते है । इसके शुद्धविराट्
पणव, रक्मवती, मयूरसारिणी, मत्ता, मनोरमा, हंसी, उपस्थिता तथा चम्पकमाला आदि अनेक अवान्तर भेद हैं। शुद्धविराट्
पद्क्तिका ३४५ वाँ भेद है । यहाँ शुद्धविराट् (मगण, सगण, जगण, १ गुरु) तथा चम्पकमालके उदाहरण दिये जते ईै-
० || 51 515
विश्च तिष्ठति कुक्षिकोटरे वक्त्रे यस्य सरस्वती सदा।
सर्वेषां प्रपितामहो गुर््रह्या शुद्धविराद् पुनातु नः॥
"चम्पकमाला' के प्रत्येक पादमें भगण, मगण, सगण ओर एक गुरु होते है तथा पाँच-पँच अक्षरोंपर विराम होता
है । प्रत्येक चरणमें इसके अन्तिम अशक्षरको कम कर देनेसे ' मणिबन्ध' छन्द हो जाता है ।
उदाहरण-
| ।5ऽ 551॥ 55
सौम्य गुरु स्यादाद्यचतुर्थं पञ्चमपष्टं चान्त्यमुपान्त्यम्।
इद्दरियबाणैर्यत्र विरामः सा कथनीया चम्पकमाला॥
(१९१) ग्यारह ~ग्यारह अक्षरके चार चरणोसे जिस छन्दसमुदायकी सिद्धि होती है, उसका नाम त्रिष्टप् है । प्रस्तारसे
इसके २०४८ भेद होते है । त्रिष्टपके दही अनेक अवान्तर भेद इन्द्रवन्रा, उपेन्द्रवद्धा, उपजाति, दोधक, शालिनी, रथोद्धता ओर
स्वागता आदि नामो प्रसिद्ध है। ये त्रिष्टपके किस संख्यावाले भेद हैँ ? इसका ज्ञान मूलोक्तं रीतिसे कर लेना चाहिये । यहाँ
उक्त सात छन्दोके लक्षण ओर उदाहरण क्रमशः प्रस्तुत किये जाते है; क्योकि प्राचीन ओर अर्वाचीन ग्रन्थोमें इनके प्रयोग
अधिक मिलते है।
(१) “इन्द्रवज्रा छन्द'-(मेर२ तगण, १ जगण ओर र गुरु होते है-)
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद् ३७९
55 | 55 || ऽ | 55
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्रनैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंन्र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥
(२) "उपेन्द्रवज्रा" (-मे १ जगण, १ तगण, १ जगण ओर दो गुरु होते है।) इन्द्रवञ्राके प्रत्येक चरणका पहला
अक्षर हस्व हो जाय तो उपेन्द्रवज्रा-छन्द बन जाता है।
| ऽ | 99 | |$ 1 ७99
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
(३) उनद्रवज्रा ओर उपेन्रवज्रा-दोनेकि मेलसे जो छन्द वता है, उसका नाम "उपजाति" है। उपजाति कोई चरण या पाद
इन्द्रवज्राका होता है, तो कोई उपेन्द्रवज्राका । प्रस्तारवश उपजातिके चौदह भेद होते है । उन भेदकि नाम इस प्रकार है- कीर्ति, वाणी,
माला, शाला, हंसी, माया, जाया, बाला, आर्द्र, भद्रा, प्रेमा, रामा, ऋद्धि तथा वुद्धि । इनका स्वरूप निप्राद्भित चक्रमे देिये-
उदाहरण-
ल ४.
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
रदे त्वमो
6 (भ 1.
प्रियः प्रियायार्हसि दैव सौदुम्॥
[£ ७1 पूर्वोक्त चक्रके अनुसार यह ˆ उपजाति! का बुद्धि नामक
भेद है । इसीको विपरीतपूर्वा ओर आख्यानकी भी कहते है ।
५ 1 इसमे पहला चरण इनद्रवज्राका ओर शेष तीन चरण उपेन्द्रवञ्राके
क है । जहाँ आदिमे तीन इन्द्रवज्राके ओर शेष ( चौथा) उपेन्द्रवज्राका
६ | उ. |इ। ध चरण हो, वहाँ "बाला" नामक उपजाति होती है।
0 र
<+ 1. 4 414 ~
(अ (६ | ७ | जवा जाया वन्द्यः स पुंसां व्रिदशाभिनन््य
कारुण्यपुण्योपचयक्रियाभिः ।
स्स् सयव
परोपकराराभरणं शरीरम् ॥
९ आद्र (४) * दोधकवृत्त' (मे तीन भगण ओर दौ गुर्
होते है-)
~ =| ५1 ५ 5॥ ऽ॥ 5॥ 55
१२ उ. | उ. ११ | प्म | दोधकमर्थविरोधकमुग्र |
स्त्रीचपलं युधि कातरचित्तम्।
| ९३|६ | १२ तपः स्वार्धपरं मतिहीनममात्यं
=) मुञति यो नृपतिः सः गुखी स्यात् ॥
ए १३ | ऋद्धिः "शालिनी" (-में मगण, तगण, तगण ओर दो गुरु
होते ईै-)
१५ ६९ १४ बुद्धि उदाहरण-
६ 5 555. 31.551 $
उपनट्टत्दा + त्रह्मज्योतिर्मर्गुण
१६ शुद्धा | उपद्वद्म | रूपं यत्तत् प्राहुरव्य्तमाद्यं त्र निर्विकारम् ।
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 60810011
३८० संक्षिप्त नारदपुराण
सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स॒ त्वं साक्षाद् विष्णुरध्यात्मदीपः॥
^रथोद्धता'- (-में रगण, नगण, रगण, एक लघु ओर एक गुरु होते है-- )
उदाहरण-
55|| ॥| 5 15 1
रामनाम जपतां कुतो भयं सर्वत्तापशमनेकभेपजम्।
पश्य तात मम गात्रसनिधौ पावकोऽपि सलिलायतेऽधुना॥
' स्वागता" ( -में रगण, नगण, भगण, दो गुरु होते हं-)
उदाहरण-
55 || 51|| 5 ऽ
कुन्ददामकृतकौतुकवेपो गोपगोधनवृतो यमुनायाम्।
नन्दसूनुरनघे तव॒ वत्सो नर्मदः प्रणयिनां विजहार ॥
इनके सिवा सुमुखी, वातोर्मी, श्रीभ्रमर-विलसित, वृन्ता, भद्रिका, श्येनिका, मौक्तिकमाला तथा उपस्थिता आदि ओर
भी अनेक छन्द हैं । इनके लक्षण, उदाहरण अन्यत्र देखने चाहिये ।
(१२) जिसके चारों चरण बारह -वारह अशक्षरोसे बनते है, उस छन्दसमुदायका नाम * जगती ' हे । प्रस्तारसे इसके ४०९६
भेद होते है । इसके भेदोमिंसे केवल वंशस्थ, इन्द्रवंशा, द्रुतविलम्वित, तोटक, भुजङ्गप्रयात, स्रग्विणी, प्रमिताक्षरा ओर वैश्वदेवी
छन्दक ही लक्षण ओर उदाहरण यहां दिये जाते हँ-
' वंशस्थ '-(-में जगण, तगण, जगण तथा रगण-ये चार गण होते हैं । पादके अन्तमं यति हे।)
उदाहरण-
1111१55
सशद्भचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्।
सहारवक्षःस्थलकोस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ॥
"इन्द्रवंशा" (-मे तगण, तगण, जगण तथा रगण प्रयुक्त होते है तथा पादान्तमे यति या विराम है । वंशस्थके प्रत्येक
चरणका पहला अक्षर गुरु कर दिया जाय तो वह इन्द्रवंशा छन्द हो जाता है ।)
उदाहरण-
1 1115
यत्कीर्तनं यत्स्मरणं यदीक्षणं यद्वन्दनं यच्छवणं यदर्हणम्।
लोकस्य सद्यो विधुनोति कल्मषं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः॥
वंशस्थ ओर इनद्रवंशाके चरणोके मेले भी चौदह प्रकारकौ "उपजाति" बनती है । पूर्वोक्त चक्रमे "उ" के स्थानम " वं
लिख दिया जाय तो बह इन्द्रवंशा तथा वंशस्थकी उपजातिका प्रस्तार-चक्र हो जायगा। इन चौदह उपजाति्योके नाम इस
प्रकार है--१- वैरासिक्छी, २- रताख्यानकौ, ३- इन्दुमा, ४- पुष्टिदा, ५- उपमेया अथवा रामणीयक, ६- सौरभेयी,
७- शीलातुरा, ८- वासन्तिका, ९- मन्दहासा, १०- शिशिरा, ११- वैधात्री, १२- शद्घुचूडा, १३- रमणा तथा १४- कुमारी।
इन सबके उदाहरण ग्रन्थान्तरोमें उपलब्ध होते ह । यहाँ प्रथम उपजातिका एक उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है, जिसे
प्रथम चरण वंशस्थका ओर शेप तीन चरण इन्द्रवंशाके हे ।
[55115111 5
किरतहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कसा आभीरकट्का यवनाः खसादयः।
येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः शुद्ध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः॥
"दरुतविलम्बित' ( -में नगण, भगण, भगण, रगण-ये चार गण होते ह । पादान्तमें यति होती है।) .
उदाहरण- |
1511515
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता वुधि विक्रमः।
((-0. 1/८111(4<511॥1 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 68110011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३८१
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥
' तोरकवृत्त'-- (में चार सगण होते है ओर पादान्तमें विराग हुआ करता है--)
उदाहरण-
|| ऽ ॥।5 115 115
अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम् । हदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥
" भुजङ्गप्रयात'-(-मे चार यगण ओर पादान्तमें विराम होते है-)
उदाहरण-- `
15 5155 155 155
अयं त्वत्कथामृष्टपीयूषनद्यां मनोवारणः क्लेशदावाग्निदग्धः।
तृषार्तोऽवगाढो न सस्मार दावं न निष्क्रामति ब्रह्मसम्पन्नवन्नः ॥
' स्रग्विणी" (में चार रगण तथा पादान्तमं विराम होते है-)
उदाहरण-
51७7 15155 5575
स्वागतं ते प्रसीदेश तुभ्यं नमः श्रीनिवास श्रिया कान्तया त्राहि नः।
त्वामृतेऽधीश नाद्धर्मखः शोभते शीर्षहीनः कबन्धो यथा पूरुषः ॥
' प्रमिताक्षरा-(-में सगण, जगण, सगण, सगण तथा पादान्तमें विराम होते है-)
उदाहरण-
1 ऽ 15 1115 115
परिशुद्धवाक्यरचनातिशयं परिपिञ्चती श्रवणयोरमृतम्
प्रमिताक्षरापि विपुलार्थवती कविभारती हरति मे हदयम् ॥
"वैश्वदेवी '- (में २ मगण ओर २ यगण होते ह तथा पांचवें, सातवें अक्षपर विराम होता है-)
उदहारण-
55555 15155
अर्चामिन्येषां त्वं विहायामराणामद्वैतेनैकं विष्णुमभ्यर्च भक्त्या ।
तत्राशेषात्मन्यर्चिते भाविनी ते भ्रातः सम्पन्नाऽऽराधना वैश्वदेवी ॥
उपर्युक्त छन्दोके अतिरिक्त वृहतीके अन्य भेद पुट, जलोद्धतगति, नत, कुसुमविचित्रा, चञ्चलाक्षिका, कान्तोत्पीडा,
वाहिनी, नवमालिनी, चन्द्रवर्त्म, प्रमुदितवदना, प्रियंवदा, मणिमाला, ललिता, मोहितोज्चला, जलधरमाला, प्रभा, मालती तथा
अभिनव तामरस आदिके भी लक्षण ओर उदाहरण ग्रन्थान्तरोमे मिलते है।
(१३) तेरह -तेरह अक्षरोके चार पादोसे सम्पन होनैवाले छन्द-समूहका नाम ' अतिजगती ' है । प्रस्तारसे इसके ८१९२
भेद होते है । अतिजगतीके भदोमें ही एक ' प्रहर्षिणी" नामक भद है । इसके प्रत्येक पादमं मगण, नगण, जगण, रगण तथा
एक गुरु होते हँ । तीन तथा दस अक्षरंपर यति होती टै। ।
उदाहरण-
55511115 15155
जागर्ति प्रसभविपाकसंविधात्री श्रीविष्णोर्ललितकपोलजा नदी चैत्।
संकीर्णं यदि भवितास्ति को विषादः संवादः सकलजगत्पितामहेन ॥
इसके सिवा क्षमा, अतिरुचिरा मत्तमयूर, गौरी, मञ्जुभाषिणी ओर चन्दिका आदि भेद भी ग्रन्थान्तरे वर्णित है । उनके
उदाहरण वहीं देखने चाहिय ।
(१४) चीदह-चौदह अक्षगेके चार पादोँवाले छन्दसमुदायको "शक्वरी ' कते दै । प्रस्तारसे इसके १६३८४ भेद होते
है । इसके भदोमिं वसन्ततिलका नामक छन्द यहाँ बतलाया जाता दै । इसमें तगण, भगण, २ जगण ओर २ गु्दोते है।
पादान्तर्मे विराम होता टै। वमन्ततिलकाकौ ही कुड विद्रान् * पिंहोत्रता' आर् "उद्र्विणी' भी कषम ई ।
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 8118 8/1 \/8181185। (0166101. 01411260 0 6810011
३८२ संक्षिप्त नारदपुराण
उदाहरण-
5 5|51115 15155
या दोहनेऽवहनने मथनोपलेपप्रङ्खेङ्खनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ ।
गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्छयो धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः ॥
इसके सिवा असंबाधा, अपराजिता तथा प्रहरणकलिता आदि ओर भी अनेक भेद हैं। उनर्मेसे प्रहरणकलिताका
उदाहरण यहाँ दिया जाता है, प्रहरणकलितामें २ नगण, १ भगण, १ नगण, १ लघु, १ गुरु होते ह । सात-सात अक्षरोपर विराम
होता है।
यथा-
। । । । । 151 1 । 1 ॥ 5
सुरमुनिमनुजेरुपचितचरणां रिपुभयचकितत्रिभुवनशरणाम्।
प्रणमत महिपासुरवधकुपितां प्रहरणकलितां पशुपतिदयिताम्॥
(१५) प॑द्रह-पंद्रह अक्षरोके चार चरणोसे सिद्ध हदोनेवाले छन्दोंका नाम ' अतिशक्वरी ' हे । प्रस्तारसे इसके ३२७६८ भद्
होते है । इन भेदोमें चन्द्रावर्ता ओर मालिनी-ये दो ही यहां बताये जाते हं । ४ नगण ओर १ सगणसे * चन्द्रावर्ता" छन्द वनता
है । इसमें सात ओर आठ अक्षरोपर विराम है। यदि छः ओर नौ अक्षरोपर विराम हो तो इसका नाम ' माला" होता है। इसी
तरह आठ ओर सात अक्षरोपर विराम होनेसे उसको 'मणिनिकर' संज्ञा होती है। चन्द्रावर्ताका उदाहरण इस प्रकार है-
। । 1 । । 11 | । 1 1 । । 15
पटुजवपवनचलितजललहरीतरलितविहगनिचयरवमुखरम्
विकसित्रकमलसुरभिशुचिसलिलं प्रविशति हरिरिह शरदि शुभसरः ॥
मालिनी'-(-मे २ नगण, १ मगण ओर २ भगण होते हे। इसमे सात ओर आठ अक्षरोपर विराम हाता ह-)
उदाहरण-
[01801551 5115.
असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥
(१६) सोलह -सोलह अशक्षरोके चार चरणोसे सिद्ध होनेवाले छन्द-समुदायक नाम “ अष्टि" हे । प्रस्तारसे इसके भेदोंको संख्या
६५५३६ होती है। इसके भेदम दाक लक्षण ओर उदाहरण यहां दिये जात है । एकका नाम है ऋषभगजविलासित ओर दूसरेका
नाम है वाणिनी। ऋषभगजविलसितमें भगण, रगण, तीन नगण तथा एक गुरु होते हँ । सात, नौ अक्षरोपर विराम होता हे।
~+ _ ॥1 <} 1 | । | । 1115
यो हरिरुच्चखान खरतरनखशिखेरदुर्जयदैत्यसिंहसुविकटहदयतटम्।
किं न्विह चित्रमेष यदखिलमपहतवान् कंसनिदेशदृप्यदूपभगजविलसितम् ॥
"वाणिनी '-- (मं नगण, जगण, भगण, जगण, रगण तथा १ गुरु होते है-)
उदाहरण-
[71101111 51155
स्फुरतु ममाननेश््य न नु वाणि नीतिरम्यं तव चरणप्रसादपरिपाकतः कवित्वम्।
भवजलराशिपारकरणक्षमं मुकुन्दं सततमहं स्तवैः स्वरचितैः स्तवानि नित्यम् ॥
(१७) सब्रह-सत्रह अक्षरोक चार चरणोावाले छन्दसमृहका नाम * अत्यष्टि ' हे । प्रस्तारसे इसको संख्या १३९१०७२ होती हे।
इसके भेदोमेसे केवल हरिणी, प्थ्वी, वंशपत्रपतित, मन्दाक्रान्ता ओर शिखरिणीके लक्षण ओर उदाहरण यहां दिये जाते है।
हरिणी ' (के प्रत्येक चरणमें नगण, सगण, मगण, रगण, सगण, एक लघु तथा एक गुरु होते दै । ६, ४, ७ अक्षरोपर
विराम होता है।)
उदाहरण-
[1115 5515515 11515
न समरसनाः काले भोगाश्चलं धनयौवनं कुरुत सुकृतं यावत्नेयं तनुः प्रविशोर्यते।
किमपि कलना कालस्येयं प्रधावति सत्वरा तरुणहरिणीसंत्रस्तेव प्लवप्रविसारिणी ॥
'पृथ्ी' (के प्रत्येक पादरमे जगण, सगण, जगण, सगण, यगण, एक लघु, एक गुरु हेते है। आट-नी अक्षयेपर विराम होता है।)
उदाहरण-
11311111 5515
हताः समितिशत्रवस्त्रिभुवने प्रकौर्णं यशः कृतश्च गुणिनां गृहै निरव्रधिर्महानुत्सवः।
त्वया कृतपरिग्रहे रधुपतेऽद्य सिंहासने तितान्तनिरवग्रहा फलवती च पृथ्वी कृता॥
((-0. 1/८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३८३
' वशपत्रपतित्' (मं भगण, रगण, नगण, भगण, नगण, एक लघु, एक गुरु होते है। दस-सात अक्ष्गेपर विराम होता है।)
उदाहरण-
| 1 91711111 11119
अद्य कुरुष्व कर्म सुकृतं यदि परदिवसे मित्र विधेयमस्ति भवतः किमु चिरयसि तत्।
जीवितमल्पकालकलनालघुतरतरलं नश्यति वंशपत्रपतितं हिमसलिलमिव ॥
"मन्दाक्रान्ता" (में मगण, भगण, नगण, तगण, तगण ओर दो गुरु होते है । ४, ६, ७ अक्षरोपर विराम होता दै। (इसके
प्रत्येक चरणके अन्तिम सात अक्षर कम कर देनेपर 'हंसी' छन्द बन जाता है ।)
उदाहरण-
१9५५ 11115 9| 9 ५ | 55
वर्हपीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं विश्रद्रासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।
रन्भ्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दैवृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्रीतकर्तिः॥
"शिखरिणी ' (-में यगण, मगण, सगण, नगण, भगण, एक लघु, एक गुरु होते है तथा ६, ११ अक्षरापर विगम होता दै।)
उदाहरण-
11 ~ 114 =
महिप्रः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी स्तुतिब्रह्यादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः।
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥
(१८) अटारह-अटठारह अक्षरोके चार चरणोंसे वननेवाले छन्द-समृहकौ संज्ञा " धृति" कही गयी दै । प्रस्तारमे इसके
२६२१४४८ भेद होते है । उनेसे एक ही भेद ' कुसुमितलतावेद्धिता' नामक छन्दका लक्षण ओर उदाहरण दिया जाता टै । इसमें
मगण, तगण, नगण ओर तीन भगण होते ह। ५, ६, ७ अक्षरोपर विराम होता है।
उदाहरण-
ऽ5555 1111551 55155
धन्यानामेताः कुसुमितलतावेद्धितोत्फुवृक्षाः सोत्कण्ठं कूजत्परभृतकलालापकोलाहलिन्यः।
मध्वादौ माद्यन्मधुकरकलोदरीतद्चङ्कारम्या ग्रामान्तः स्रोतःपरिसरभुवः प्रीतिमुत्पादयन्ति ॥
(१९) उन्नीस-उन्नीस अक्षरोके चार चरणोसे सिद्ध हीनेवाले छन्द-समुदायको “ विधृति" या * अतिधृति" कहते है।
प्रस्तारसे इसके ५२४२८८ भेद होते है । इनमेंसे एक भेद ' शार्दूलविक्रोडित' नामसे प्रसिद्ध है, जिसमें मगण, सगण, जगण,
सगण, दो तगण ओर एक गुरु होते हैँ तथा बारह ओर सात अशक्षरोपर विराम होता है।
उदाहरण-
५955 115५।५5।15 55 | 99 | $
यं ब्रह्म वस्णेन्रसद्रमर्तः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः ।।
ध्यानातस्थिततद्रतेत मनसा पश्यन्ति यं येणिनौ यस्यान्तं न विदुः सुयसुराणा देवाय तस्मै नमः॥
(२०) बीस-बीस अशक्षरोके चार पादोसे निष्पन्न होनेवाले छन्दसमृहका नाम ! कृति" है । प्रस्तारसे इसके १०४८८५५६
भेद होते है । उनमेसे रके लक्षण ओर उदाहरण यहां बतलाये जाते है । पहलेका सुवदना ओर दूसरेका नाम "वृत्त" दै।
सुवदनामे मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, भगण, १ लघु ओर १ गुर होते है। ७, ७, £ अशक्षरोपर विराम होता दै।
उदाहरण-
5 3555155 ।। ।1|1 5551115
या पीनेदरादतुद्रस्तनजघनघनाभोगालसगतिर्यस्याः कर्णावतंसोत्पलस्चिजयिनी दीम च नयने।
श्यामा सीमन्तिनीनां तिलकमिव मुखे या च त्रिभुवने प्रत्यक्षं पर्वती मे भवतु भगवती सरदात्सुचदना ॥
"वृत्त" (में एक गुर, एक लघुके क्रमसे २० अक्षर होते है । पादान्ते विराम होता दै।)
उदाहरण-
ऽ 1515151 ऽ 515 ।5ऽ।5।5।
जन्तुमात्रदुःखकारि कमं निर्मितं भवत्यनर्धेतु तेन सर्वमात्मतुल्यमीक्षमाण उत्तमं सुखं लभस्व ।
विद्धि बुद्धिपूर्वकं ममोपदैशवाक्यमेतदादरेण वृन्नमेतदुत्तमं महाकुलप्रमुतजन्मनां हिताय ॥
(२९) इक्षीस-इक्षीस अक्षरोके चार् पादीं पूर्णं होनेवाले छन्दांकी जतिवाचक्र संज्ञा "प्रकृति" है। प्रस्तारमे इसके
२०९७१५२ भेद होते है । इन्ेसये एक भेद ' सग्धरा' के नामते प्रसिद्ध टै । इसमें मगण, रगण, भगण, नगण आर तीन यगण
((-0. 1/८111(4<511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
३८४ सक्षिप्त नारदपुराण
होते है । सात-सात अअक्षरोपर विराम होता है।
उदाहरण-
9 111 15555155
ब्रह्माण्डं खण्डयन्ती हरशिरसि जटावल्िमुह्यसयन्ती स्वर्लोकादापतन्ती कनकगिरिगृहागण्डशेलात्स्खलन्ती ।
्षोणीपृष्ठे लुठन्ती दुरितचयचमूर्निर्भरं भर्त्सयन्ती पाथोधिं पूरयन्ती सुरनगरसरित्पावनी नः पुनातु ॥
(२२) बाईस-बाईस अक्षरोके चार पादोंसे परिपूर्ण होनेवाले छन्दोंका नाम "आकृति" हे । प्रस्तारसे इसको भेद-संख्या
४१९४३०४ होती है । इसके एक भेद ' भद्रक 'का उदाहरण यहां दिया जाता है । भद्रकके प्रत्येक पादमें भगण, रगण, नगण,
रगण, नगण, रगण, नगण, एक गुरु होते है । दस, बारह अक्षरोपर विराम होता हे।
उदाहरण-
०1115111. 15115111
भद्रकगीतिभिः सक्रृदपि स्तुवन्ति भव ये भवन्तमभवं भक्तिभरावनमप्रशिरसः प्रणम्य तव पादयोः सुकृतिनः।
ते परमेश्वरस्य पदवीमवाप्य सुखमाप््ति विपुलं मर्त्यभुत्रं स्पृशन्ति न पुनर्मनोहरसुरावलीपरिवृताः ॥ |
(२३) तेईस-तेईस अशक्षरोके चार-चरणोसे सिद्ध होनेवाले छन्दसमुदायको “ विकृति कहते है । प्रस्तारसे इसके८३८८६०८
भेद होते ह । इनमें ' अश्चललित' ओर * मत्ताक्रोडा' नामक दो छन्दोके उदाहरण यहां दिये जाते हैं । प्रत्येक पादमें नगण,
जगण, भगण, जगण, भगण, जगण, भगण, १ लघु १ गुरु होनेसे ' अश्वललित' छन्द होता है।
उदाहरण-
||| 15151115 ।5॥|| 515 115
पवनविधूतवीचि चपलं विलोकयति जीवितं तनुभृतां वपुरपि हीयमानमनिशं जरावनितया वशीकृतमिदम्।
सपदि निपीडनव्यतिकरं यमादिव नराधिपात्नरपशुः परवनितामवेक्ष्य कुरुते तथापि हतवबुद्धिरश्चललितम्॥
" मत्ताक्रोडा' (मं २ मगण, १ तगण, ४ नगण, १ लघु, १ गुरु होते ह। आठ ओर पंद्रह अशक्षरोपर विराम होता है।)
उदाहरण- ।
55 55 5555 ।।||1।|।|||||1ऽ
वन्दे देवं श्रीगोचिन्दं प्रणयपरवशमतिकरूणहदयं मात्रा बद्धंदाप्रा साम्ना स्कुमपि सुतमिव निजमिह सभयम्।
हन्तुं याऽऽगात्तस्यै मातुतव्यत्दतुलनिजगतिमतिविमला गा गेपीरगोपान् योऽगोपायदिह विधुततगिरिरुपचितपनतः ॥
(२४) चौबीस-चौवीस अशक्षरोके चार चर्णोसे जो छन्द बनते है, उनका नाम ' संकृति ' है । प्रस्तारसे इसके १६७७७२१६
भेद होते ह । इनमें ' तन्वी" नामक छन्दका उदाहरण दिया जाता है । उसमे भगण, तगण, नगण, सगण, २ भगण, नगण,
यगण होते हं। ५, ७, १२ अशक्षरोपर विराम होता है।
उदाहरण-
5 | 155 । 11 1115 5115111 || 55
नाध तवाहं तव पदकमलं सेवितुमेव मनसि मम कामो नाम सुधासोदरमतिमधुरं मे रसना रसयतु नितयं वै।
परेमिजना ये प्रभुग्रुणरसिकास्तेषु सदेव भवतु मम वासो देव दया दर्शय वस हदये त्व न विनेह जगति मम बन्धुः ॥
(२५) पच्चीस-पच्चीस अक्षरोके चार पादांसे सम्पन्न होनेवाले छन्दको “ अतिकृति' या ' अभिकृति" कहते है । प्रस्तारसे
इनके ३३५५३४३२ भेद होते ह । इनमेसे एक भेदका नाम ' क्रौञ्चपदा" है । उसके प्रत्येक चरणमें भगण, मगण, सगण, भगण
६ नगण तथा १ गुरु होते है। ५, ५, ८, ७ अश्षरोपर विराम होता है।
उदाहरण-
|| 55 5।। 55 ।| 111111111115
माधव भक्तिं देहयतिभक्तिं तव चरणयुगलशरणमुपगतः संहर पापं दर्शिततापं निजगुणगणरतिमुपनय नितरम्।
मोहन रूपं रम्यम नं प्रकटय शमय विपयविषमनिशं वादय वंशी मानसदंशी तिमिनिभहदयविहितवरवडिशाम्॥
(२६) छव्वीस-छन्वीस अक्षरोके चार चरर्णोसे जो छन्द बनते है, उनकी जातिवाचक संज्ञा " उत्कृति ' है । प्रस्तारसे इसके
६७१०८८६४ भेद होते है 1 इनर्मेसे दो भेद बताये जाते ह । एकका नाम ' भुजङ्गविजृम्भित' ओर दूसरेका ' अपवाह ' है।
' भुजद्गविजृम्भितः"-- (में २ मगण, १ तगण, ३ नगण, १ रगण, १ सगण, १ लघु, १ गुर होते ह । ८, ११, ७ अक्षरोपर
विराम होता है।)
((-0. 1/(111141/5511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
ये छन्दोंकी संज्ञां हं, प्रस्तारसे* इनके अनेक
भेद होते है । सम्पूर्णं गुरु अक्षरवाले पादमं प्रथम
गुरुके नीचे लघु लिखना चाहिये, फिर दाहिनी
ओरको पङ्क्तिको ऊपरको पड्क्तिके समान भर
दे । तात्पर्य यह कि शेष स्थानोमें ऊपरके अनुसार
गुरु-लघु आदि भरे। इस क्रियाको बराबर
करता जाय । इसे करते हए ऊनस्थान अर्थात् बायीं
ओरके शेष स्थानमें गुरु ही लिखे। यह क्रिया
तबतक करता रहे, जबतक कि सभी लघु
अक्षरोको प्रापि न हो जाय। इसे ' प्रस्तार' कहा
गया हैर ॥ १४-१५॥ (प्रस्तार नष्ट हो जानेपर
यदि उसके किसी भेदका स्वरूप जानना हो
तो उसे जाननेकौ विधिको नष्ट प्रत्यय" कहते
हे ।) यदि नष्ट अङ्क सम है तो उसके लिये
उदाहरण-
55555555 111 ।1|1115151। 5139
हेलोदञ्चन्यञ्चत्पादप्रकटविकटनटनभ॑रो रणत्करतालकः चास्प्रेङ्खच्चूडावर्हः
३८५५
एक लघु लिखे ओर उसव्का आधा भी यदि
सम हो तो उसके लिये पुनः एक लघु
लिखे। यदि नष्ट अङ्क विषम हो तो उसके
लिये एक गुरु लिखे ओर उसमें एक जोड़कर
आधा करे। वह आधा भी यदि विषम दहो तो
उसके लिये भी गुरु ही लिखे। यह क्रिया
तवतक करता रहे, जबतक अभीष्ट अक्षरोका
पाद प्राप्त न हो जाय । (प्रस्तारके किसी भेदका
स्वरूप तो ज्ञात हो; किंतु संख्या ज्ञात नहो तो
उसके जाननेकी विधिको “उदष्ट' कहते हें ।)
उदिष्टमें गुरु-लघु-बोधक जो चिह्न हों, उनमें
पहले अक्षरपर एक लिखे ओर क्रमशः दुसरे
अक्षरोपर दूने अङ्क लिस्वता जाय; फिर
लघुके ऊपर जो अद्ध हो, उन्हें जोड़कर उसमें
श्रुतितरलनवक्कि सलयस्तरद्भितहारधृत्।
त्रस्यत्नागस्रीभिर्भक्या मुकुलितकरकमलयुगं कृतस्तुतिरच्युतः पायाद् वरिछन्दन् कालिन्दीहदकृतनिजवसति चृहद् भुजद्गविजृम्भितम्॥
' अपवाह" (-के प्रत्येक पादमें १९ मगण, ६ नगण, १ सगण, २ गुरु होते है। ९, ६, ६, ५ अक्षयपर विराम होता है।)
उदाहरण-
955 9 ॐ
||| 1 | 11111 1 1 1 1 1 1 1 1 । 3
श्रीकण्ठं त्रिपुरदहनममृतकिरणशकलललितशिरसं रुद्रं भूतेशं हतमुनिमखमखिलभुवननमितचरण युगमीशानम् ।
सर्वज्ञं वृषभगमनमहिपतिकृतवलयरुचिकरमाराध्यं तं वन्दे भवभयभिदमभिमतफलवितरणगुरुमुमया युक्तम् ॥
१. छन्दःशास्त्रमे छः प्रत्यय होते है-१- प्रस्तार, २- नष्ट, ३- उषष्ट, ४- एकद्वयादिलगक्रिया, ५- संख्यान ओर छटा
अध्वयोग। प्रस्तारका अर्थं फैलाव; अमुक संख्यायुक्त अक्षरोसे बने हुए पादवाले छन्दके कितने ओर कौन-कौनसे भद हौ सकते
है 2 इस प्रश्नका समाधान करनेके लिये जो क्रिया की जाती है, उसका नाम प्रस्तार है। नष्ट आदिका स्वरूप अगे बतार्यगे।
२. उदाहरणके लिये चार अक्षरके पादवाले छन्दका मूलोक्तं रीतिसे प्रस्तार अद्भत किया जाता है-
(4 5555
२- 1555
३--ऽ 155
८- 1 155
८4-- 5५5 15
६- 1515
७-5 115
८-- 1115
(& ~ 555 |
१०- 15 ५।
११-51 51
१२- 11 3।
१३- 93 ।।
१८६- 15 ।। ।
२५८५-9 111
१६ 11 ।।
३. जैसे किसीके द्वारा पृछा जाय कि चार् अशक्षरके पादवाले छन्दका छटा भद क्या है ? तो इसमे जटा अङ्क सम ह; अतः
उसके लिये प्रथम एक लधु होगा (1), फिर छः का आधा करनैषर् तीन विषम अङ्क हुआ, अतः उस््रके लिये एक गुर (5)
लिखा। अव्र तीनमें एक जोड़कर आधा किया तौ दो सम अद्ध हुआ, अतः उसके लिये णिर् एक लघु (1) लिखा । उस दोक
आधा किया तो एक विषम अद्ध हुआ; अतः ठसक लिये एक गुर (८) लिखा। सवर मिलकर् ( 51५ 2) एेसा हु आ। अतः चार
अक्षरवाले छन्दके छृटे भदरमे प्रत्यक पाद्म प्रथम अनर् टघरु, दसरा गुर, तीसरा लवु ओर चौथा गुरू होगा।
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
३८६
संक्षिप्त नारदपुराण
एक ओर मिला दे तथा वही उद्दिष्ट स्वरूपकी
संख्या बतावे। एेसा पुराणवेत्ता विद्ानोंका कथन
हेˆ। (अमुक छन्दक प्रस्तारमें एक गुरुवाले या
एक लघुवाले, दो लघुवाले या दो गुरुवाले, तीन
लघुवाले या तीन गुरुवाले भेद कितने हो सकते
हे; यह पृथक् -पृथक् जाननेकी जो प्रक्रिया है,
उसे “एकद्वयादिलगक्रिया' कहते हैं ।) छन्दके
अक्षरोकी जो संख्या हो, उसमे एक अधिक
जोड़कर उतने ही एकाड्क ऊपर-नीचेके क्रमसे
लिखे। उन एकाङ्कोको ऊपरकी अन्य पडङ्क्तिमें
जोड दे; किंतु अन्त्यके समीपवर्ती अङ्कको न
जोडे ओर ऊपरके एक-एक अङ्कको त्याग दे।
ऊपरके सर्वं गुरुवाले पहले भेदसे नीचेतक गिने।
इस रीतिसे प्रथम भेद सर्वगुरु, दूसरा भेद एक गुरु
ओर तीसरा भेद द्विगुरु होता हे । इसी तरह नीचेसे
चके चदे च
ऊपरको ओर ध्यान देनेसे सवसे नीचेका सर्वलघु,
उसके ऊपरका एक लघु, तीसरा भेद द्विलघु
इत्यादि होता है । इस प्रकार ' एकद्वयादिलगक्रिया'
जाननी चाहिये । लगक्रियाके अङ्को जोड
दनेसे उस छन्दके प्रस्तारकी पूरी संख्या ज्ञात हो
जाती है। यही संख्यान प्रत्यय कहलाता है
अथवा उदष्टपर दिये हुए अङ्कोको जोड़कर उसमें
एकका योग कर दिया जाय तो वह भी प्रस्तारकी
पूरी संख्याको प्रकट कर देता है| छन्दके
प्रस्तारको अङिति करनेके लिये जो स्थानका
नियमन किया जाता है, उसे अध्वयोग प्रत्यय कहते
हे । प्रस्तारको जो संख्या हे, उसे दूना करके एक
घटा देनेसे जो अङ्क आता हे, उतने ही अंगुलका
उसके प्रस्तारके लिये अध्वा या स्थान कहा गया
हे ॥ १६--२०॥ मुने! यह छन्दोंका किंचित् लक्षण
बताया गया हे। प्रस्तारद्वारा प्रतिपादित होनेवाले
उनके भेद-प्रभेदोंकी संख्या अनन्त है ॥ २१॥
(पूर्वभाग द्वितीय पाद अध्याय ५७)
८१». + 69
१-जेसे कोई पूछे कि चार् अक्षरके पादवाले छन्दमें जहाँ प्रथम तीन गुरु ओर अन्तम एक लघु हो तो उसकौ संख्या
क्या है अर्थात् वह उस छन्दका कौन-सा भेद है ? इसको जाननेके लिये पहले उद््टिके गुरु-लघुको निम्राद्भित रीतिसे अङ्कित
करके उनके ऊपर क्रमशः द्विगुण अङ्क स्थापित करे-
१ र र्ट ८
5 > दऽ 5
तत्पश्चात् केवल लघुके अङ्क ८ मे एक ओर जोड़ दिया गया तो ९ हुआ। यही उदिष्टकी संख्या है । अर्थात् वह उस
छन्दका नवां भेद दै।
२. निप्राद्भित कोष्टकसे यह वात स्पष्ट हो जाती है-
अर्थात् चार् अक्षरवाले छन्दके प्रस्तारमे ४ लघुवाला १
भेद, एक गुरु तोन लघुव्राला ४ भेद, २ गुरु ओर दो लघुवाला
६ भेद, तीन गुरु ओर १ लघुवाला ४ भद ओर चार गुरुवाला
१ भेद होगा।
३. यथा- चार् अशक्षरके प्रस्तारमे लगक्रियाके अङ्कु
१५४६४५१ होते है, इनका योग सोलह होता दै । अतः
चार् अक्षरके पादताले छन्दके सोलह भेद होगे अथवा
उद्ष्टके अङ्क हे १,२५४.८ इसका योग हुआ १५, इनमें
एकका योग करनेसे प्रस्तारे संख्या १६ प्रकट हो जाती है।
१ ४5
१ ट ३५१।
९.1 ~ ६ ९२०२९।
१ | र | ३ ४ १०२
| ८
(० १ १ ।
((-0. 1/८11114/5511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
षि
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
३८७
शुकदेवजीका मिथिलागमन, राजभवनमें युवतियोद्रारा उनकी सेवा, राजा
जनकके द्वारा शुकदेवजीका सत्कार ओर श॒कदेवजीके साथ उनका
मोक्षविषयक संवाद
श्रीसनन्दनजीने कहा- नारदजी ! एक दिन
मोक्ष-धर्मका ही विचार करते हए शुकदेवजी
पिता व्यासदेवके समीप गये ओर उन्हें प्रणाम
करके बोले-' भगवन्! आप मोक्ष-धर्ममे निपुण
ठे, अतः मुञ्चे एेसा उपदेश दीजिये, जिससे मेरे
मनको परम शान्ति प्राप्त हो।' मुने! पुत्रकी यह
वात सुनकर महर्पिं व्यासने उनसे कहा-' वत्स ।
नाना प्रकारके धर्मोका भी तत्तत समञ्चो ओर
मोक्षशास्त्रका अध्ययन करो ।' तव शुकने पिताकी
आज्ञासे सम्पूर्ण योगशास्त्र ओर कपिलप्रोक्त
साख्यशास्त्रका अध्ययन किया। जव व्यासजीने
समञ्च लिया कि मेरा पुत्र ब्रह्यतेजसे सम्पन्न,
शक्तिमान् तथा मोक्षशास्त्रे कुशल हो गया हे
तव उन्होने कहा-' बेटा! अव तुम मिथिलानरेश
जनकके समीप जाओ, राजा जनक तुम्हें मोक्षतत्तव
पूर्णरूपसे बतला्येगे ।' पिताके आदेशसे शुकदेवजी
धर्मक निष्ठा ओर मोक्षके परम आश्रयके सम्बन्धं
प्रश्न करनेके लिये मिथिलापति राजा जनकके
पास जाने लगे। जाते समय व्यासजीने फिर
कहा-' वत्स ! जिस मार्गमं साधारण मनुष्य चलते
हो, उसीसे तुम भी यात्रा करना। मनमें विस्मय
अथवा अभिमानको स्थान न देना। अपनी योगशक्तिके
प्रभावसे अन्तरिक्षमार्गद्वारा कदापि यात्रा न करना।
सरल भावसे ही वहां जाना। मागमिं मुख-सुविधा
न देखना, विशेष व्यक्तियों या स्थानोंकी खोज न
करना; क्योकि वे आसक्ति बदानेवालै होते है ।
"राजा जनक शिष्य ओर यजमान है'-एेसा
समञ्चकर उनके सामने अहंकार न प्रकट करना।
उनके वशमें रहना। वे तुम्हारे संदेहका निवारण
करेगे । राजा जनक धर्मम निपुण तथा मोक्षशास्त्रमें
कुशल हे। वे मेरे शिष्ये, तो भी तुम्हारे लिये
जो आज्ञा दे, उसका निस्संदिग्ध होकर पालन
करना।'
पिताके एेसा कहनेपर धर्मात्मा शुकदेव मुनि
मिथिला गये। यद्यपि समुद्रोसहित सम्पूर्ण पृथ्वीको
वे आकाशमार्गसे ही लाघ सकते थे, तथापि पैदल
ही गये। महामुनि शुक विदेहनगरमें पहुचे । पहले
राजद्वारपर पहुंचते ही द्वारपालोनि उन्हे भीतर
जानेसे रोका; कितु इससे उनके मनम कोई ग्लानि
नहीं हई । नारदजी ! महायोगी शुक भूख-प्यासये
रहित हो वहीं धूपमें जा वैटे ओर ध्यानमें स्थित
हो गये । उन द्वारपालोमेस एकको अपने व्यवहारपर
वड़ा शोक हुआ। उसने देखा, शुकदेवजी दोपहरके
सूर्यकी भति यहाँ स्थित हो रहे टै, तब हाध
जोड़कर प्रणाम करिया ओर विधिपूर्वकं उनका
पूजन एवं सत्कार करके राजमहलकौ दूसरी
कक्षामें उनका प्रवेश कराया । वहो चेत्ररथ वनके
समान एक विशाल उपवन था, जिसका सम्बन्ध
अन्तःपुरसे धा। वह वन वड़ा रमणीय धा।
द्रारपालने शुकदेवजीको सारा उपवन दिखाकर
एक सुन्दर आसनपर विठाया तथा राजा जनकको
इसकी सूचना दी । मुनिश्रेष्ट । राजाने जव सुना कि
शुकदेवजी मेरे पास आये ह तो उनके हार्दिक
भावको समञ्चनेके उद्ेश्यसे उनकी सेवाके लिये
वहुत-सी युवतियोको नियुक्त किया। उन सबके
वेश व्र मनोहर थे। वे स्र-की-सबर तरुणी
ओर देखनेमं मनको प्रिय लगनेवाली धीं!
उन्होने लाल रंगकरे महीन एवं रंगीन वस्त्र धारण
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३८८
संक्षिप्त नारदपुराण
कर रखे थे। उनके अद्गोमे तपाये हुए शुद्धं | जब वे भोजन कर चुके तो उनमेसे एक-एक
सुवर्णे आभूषण चमक रहे थे। वे बातचीतमें
५.५१
थीं।
उनको संख्या पचाससे अधिक थी । उन सबने
शुकदेवजीके लिये पाद्य, अर्घ्यं आदि प्रस्तुत किये
तथा देश ओर कालके अनुसार प्राप्त हुआ उत्तम
अन्न भोजन कराकर उन्हें तृप्त किया। नारदजी।
युवतीने शुकदेवजीको अपने साथ लेकर उन्हं
वह अन्तःपुरका वन दिखलाया। फिर मनके
भावोको समञ्चनेवाली वे सब युवति्याँ हसती,
गाती हुई उदारचित्तवाले शुकदेव मुनिकी परिचर्या
करने लगीं। शुकदेवमुनिका अन्तःकरण परम
शुद्ध था। वे क्रोध ओर इद्धियोको जीत चुके थे
तथा निरन्तर ध्यानमें ही स्थित रहते थे। उनके
मनमे न हर्ष होता था, न क्रोध। संध्याका समय
होनेपर शुकदेवजीने हाथ-पैर धोकर संध्योपासना
को। फिर वे पवित्र आसनपर वैठे ओर उसी
मोक्ष-धर्मके विषयमे विचार करने लगे। रातके
पहले पहरमें वे ध्यान लगाये वैठे रहे । दूसरे ओर
तीसरे पहरमें भगवान् शुकने न्यायपूर्वक निद्राको
स्वीकार किया। फिर प्रातःकाल ब्रह्मवेलामें ही
उठकर उन्होने शोच-स्रान किया । तदनन्तर स्त्रियोसे
धिरे होनेपर भी परम बुद्धिमान् शुक पुनः
ध्यानम ही लग गये। नारदजी ! इसी विधिसे
उन्होने वह शेप दिन ओर सम्पूर्णं रात्रि राजकुलमें
व्यतीत की।
द्विजश्रष्ठ | तदनन्तर मन्त्रियोंसहित राजा जनक
पुरोहित तथा अन्तःपुरकी स्त्रियोको आगे करके
मस्तकपर् अर्घ्यपात्र लिये गुरुपुत्र शुकदेवजीके
समीप गये। उन्होने सम्पूर्णं रत्से विभूषित एक
महान् सिंहासन लेकर गुरुपुत्र शुकदेवजीको अर्पित
किया। व्यासनन्दन शुक जब उस आसनपर
विराजमान हुए, तब राजाने पहले उन्हें पाद्य
अर्पण किया, उसके बाद अर्ध्यसहित गाय निवेदन
की । महातेजस्वी द्विजोत्तम शुकने मन्त्रोच्चारणपूर्वक
को हुई उस पूजाको स्वीकार करके राजाका
कुशल-मद्गल पृष्धा। राजाका हदय ओर परिजन
सभी उदार थे। वे भी गुरुपुत्रसे कुशल-समाचार
वताकर् उनको आज्ञा ले भूमिपर वैटे। तत्पश्चात्
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
३८९
व्यासनन्दन शुकसे कुशल-मद्भल पूछछकर
राजाने प्रश्न किया--' ब्रह्मन्! किसलिये आपका
यहो शुभागमन हआ है ?'
शुकदेवजी बोले- राजन्! आपका कल्याण
हो ! पिताजीने मुञ्चसे कहा है कि "मेरे यजमान
विदेहराज जनक मोक्ष-धर्मके तत्त्वको जाननेमें
कुशल हं। तुम उन्हीके पास जाओ। तुम्हारे
हदयमे प्रवृत्ति या निवृत्तिके विषयमे जो भी संदेह
होगा, उसका वे शीघ्र ही निवारण कर देगे। इसमें
संशय नहीं हे।' अतः में पिताजीकी आज्ञासे
आपके समीप अपना हार्दिक संशय मिटानेके
लिये यहो आया हूं। आप धर्मात्माओमें श्रेष्ठ हे ।
मुञ्चे यथावत् उपदेश देनेकी कृपा करें ब्राह्यणका
इस जगत्मे क्या कर्तव्य हे ? तथा मोक्षका स्वरूप
केसा है 2 उसे ज्ञान या तपस्या किस साधनसे प्राप्त
करना चाहिये 2
राजा जनकने कहा-- ब्रह्मन्! इस जगते
जन्मसे लेकर जीवनपर्यन्त ब्राह्मणका जो कर्तव्य
हे, वह बतलाता हू, सुनो-तात। उपनयन-
संस्कारके पश्चात् ब्राह्मण-बालकको वेदेकि स्वाध्यायमं
लग जाना चाहिये। वह तपस्या, गुरुसेवा ओर
ब्रह्मचर्य-पालनमें संलग्र रहे। होम तथा श्राद्ध-
तर्पणद्वारा देवताओं ओर पितरोके ऋणसे मुक्त हो।
किसीकौ निन्दा न करे। सम्पूर्ण वेदोंका नियमपूर्वकं
अध्ययन पुरा करके गुरुको दक्षिणा दे, फिर
उनको आज्ञा लेकर द्विजबालक अपने घरको
लौटे। समावर्तन-संस्कारके पश्चात् गुरुकुले लौट
हुआ तब्राह्मणकुमार विवाह करके अपनी ही
पत्रीमं अनुराग रखते हए गृहस्थ-आश्रममं निवास
करे। किसीके दोप न देखे । न्यायपूर्वकं वतवि
करे। अग्निकी स्थापना करके प्रतिदिन आदयपूर्वकः
अग्निहोत्र करे। पुत्र ओर पौत्रोंकौ उत्पत्ति हो
जानेपर वानप्रस्थ-आश्रममें रहे ओर पहलक
स्थापित अग्निका ही विधिपूर्वक आहुतिद्रारा पूजन
करे। वानप्रस्थीको भी अतिधथि-सेवामें प्रेम रखना
चाहिये । तदनन्तर धर्मज्ञ पुरुप वनमें न्यायपूर्वक
सम्पूर्ण अग्रियोको (भावनाद्वारा) अपने भीतर ही
लीन करके वीतराग हो ब्रह्मचिन्तनपरायण संन्यास-
आश्रममे निवास करे ओर शीत, उष्ण आदि
द्न्द्रोको धैर्यपूर्वक सहन करे ।
शुकदेवजीने पृषछा-- राजन्! यदि किसीको
ब्रह्मचर्य-आश्रममें ही सनातन सान-विज्ञानकी प्रापि
हो जाय ओर हदयके रागद्वेष आदि दन्द दूर हो
गये हां तो भी उसके लिये क्या शेष तीन
आश्रमोमें निवास करना अत्यन्त आवश्यक है?
इस संदेहके विषयमे मं आपसे पृछ रहा हृं । आप
वतानेकी कृपा करे।
राजा जनकने कहा-- ब्रह्मन्! जेसे ज्ान-
विज्ञानके विना मोक्षकी प्राति नहीं होती, उसी
प्रकार सद्गुरुसे सम्बन्ध हुए बिना ज्ञानको उपलब्धि
भी नहीं होती। गुरु इस संसार-सागरसे पार
उतारनेवाले है ओर उनका दिया हुआ ज्ञान
नौकाके समान बताया गया हे। लोककी धार्मिक
मर्यादाका उच्छेद न हो ओर क्मानुष्टानको परम्पराका
भी नाश न होने पावे, इसके लिये पहलेके विद्वान्
चारों आश्रमोके धर्मोका पालन करते थ। इस
प्रकार क्रमशः अनेक प्रकारके सत्कर्मोका अनुष्ठान
करते हए शुभाशुभ कर्मोकी आसक्तिका त्याग हो
जानेपर यहीं मोक्ष प्राप्त हो जाता ठै। अनेक
जन्मोये सत्कर्म करते-करते जव सम्पूर्ण इद्धया
पवित्र हो जाती ठे, तव शुद्ध अन्तःकरणवाला
पुरुप प्रथम आश्रमम ही उत्तम मोक्षरूप ज्ञान प्राप्त
कर लेता हे। उसे पाकर् जव ब्रह्मचर्य- आश्रमपं
ही तत्वका साक्षात्कार एवं मुक्ति सुलभ हौ जाय
तव परमात्माका चाहनव्ाले जीवन्मुक्त विद्रान्के
लिये शेष तनां आश्रमेमिं जानेकी क्या आवश्यकता
((-0. /८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 60810011
३२९०
हे । विद्वान्को चाहिये कि वह राजस ओर तामस
दोषोका परित्याग कर दे ओर सात्विक मार्गका
आश्रय लेकर बुद्धिके द्वारा आत्माका दर्शन करे।
जो सम्पूर्णं भूतोंकों अपनेमें ओर अपनेको सम्पूर्णं
भूतोमे स्थित देखता है, वह संसारमें रहकर भी
उसके दोषोंसे लिप्त नहीं होता ओर अक्षय पदको
प्राप्त कर लेता हे। तात! इस विषयमे राजा
ययातिको कही हुई गाथा सुनो-
जिसे मोक्ष-शास्त्रमे निपुण विद्वान् द्विज सदा
धारण किये हए है, अपने भीतर ही उस
आत्मज्योतिका प्रकाश है, अन्यत्र नहीं। वह
ज्योति सम्पूर्णं प्राणिर्योके भीतर समान रूपसे
स्थित है। समाधिमें अपने चित्तको भलीर्भति
एकाग्र करनेवाला पुरुष उसको स्वयं देख सकता
हे । जिससे दूसरा कोई प्राणी नहीं डरता, जो स्वयं
किसी दूसरे प्राणीसे भयभीत नहीं होता तथा जो
इच्छा ओर दवेषसे रहित हो गया हे, वह ब्रह्मभावको
प्राप्त हो जाता है। जब मनुष्य मन, वाणी ओर
क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीको बुराई नहीं करता,
उस समय वह ब्रह्मरूप हो जाता है । जब मोहमें
डालनेवाली ईर्या, काम ओर लोभका त्याग करके
पुरुप अपने आपको तपम लगा देता हे, उस समय
उसे ब्रह्मानन्दका अनुभव होता हे । जब सुनने ओर
देखने योग्य विषयोमे तथा सम्पूर्णं प्राणियोके
ऊपर मनुष्यका सम्नानभाव हो जाय ओर सुख-
दुःख आदि दन्द उसके चित्तपर प्रभाव न डाल
सके, तव वह ब्रह्यको प्राप्त हो जाता है। जिस
संक्षिप्त नारदपुराण
समय निन्दा-स्तुति, लोहा-सोना, सुख-दुःख, सर्दी-
गरमी, अर्थ-अनर्थ, प्रिय-अप्रिय तथा जीवन-
मरणमें समान दृष्टि हो जाती हे, उस समय मनुष्य
ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है। जेसे कद्ुआ अपने
अद्धोंको फेलाकर फिर समेट लेता है, उसी प्रकार
संन्यासीको मनके द्वारा इन्द्रियोंपर नियन्त्रण
रखना चाहिये । जिस प्रकार अन्धकारसे व्याप्त
हआ घर दीपकके प्रकारसे स्पष्ट दीख पडता हे
उसी तरह बुद्धिरूपी दीपककी सहायतासे आत्माका
दर्शन हो सकता हे । बुद्धिमानोमें श्रेष्ठ शुकदेवजी ।
उपर्युक्त सारी बातें मुञ्चे आपमें दिखायी देती है।
इनके अतिरिक्त जो कुछ भी जानने योग्य विषय हे
उसे आप ठीक-ठीक जानते है। ब्रह्यर्षे ! में आपको
अच्छी तरह जानता हू। आप अपने पिताजीको
कृपा ओर शिक्षाके कारण विषयोसे परे हो गये हे।
उन्हीं महामुनि गुरुदेवक कृपासे मुञ्चे भी यह दिव्य
विज्ञान प्राप्त हआ है, जिससे मैं आपकी स्थितिको
पहचानता हूं । आपका विज्ञान, आपकी गति ओर
आपका एशर्य-ये सब अधिक हैँ । किंतु आपको
इस बातका पता नहीं हे । ब्रह्मन्! आपको ज्ञान हो
चुका है ओर आपकी बुद्धि भी स्थिर है; साथ ही
आपमे लोलुपता भी नहीं है; परंतु विशुद्ध
निश्चयके विना किसीको भी परब्रह्यकी प्रापि नहीं
होती । आप सुख-दुःखे कोई अन्तर नहीं समङते।
आपके मनमें तनिक भी लोभ नहीं है । आपको
न नाच देखनेकी उत्कण्ठा होती है, न गीत
सुननेको। आपका कहीं भी राग है ही नहीं । न
१. न विभेति परो यस्मान्न विभेति पराच्च यः । यश्च नेच्छति न द्ेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते स तु॥
यदा
भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥
संयोज्य तपसाऽऽत्मानमीर्प्यामुत्सृज्य मोहिनीम्। त्यक्त्वा कामं च लोभं च ततो ब्रह्यत्वमश्नुते ॥
यदा श्रव्ये च दृश्यं च सर्वभूतेषु चाव्ययम् । समो भवति निर्ढन्द्रो ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥
यदा स्तुतिं च निन्दां च समत्वेन च पश्यति । काञ्चनं चायसं चैव सुखदुःखे तथैव च॥
शीतमुष्णं तथेवार्थमनर्थ
प्रियमप्रियम् । जीवितं मरणं चैव ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥
प्रसार्येह यथाद्भाति कूर्मः संहरते पुनः। तथेन्द्रियाणि मनसा संयन्तव्यानि भिक्षुणा॥
(ना० पूर्व० ५९। २९- ३५)
((-0. 1/८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
हि
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
३९१
तो बन्धुओंके प्रति आपकी आसक्ति ठै, न
भवदायक पदार्थसि भय। महाभाग! मं देखता
ह-आपकी दृष्टम अपनी निन्दा ओर स्तुति
एक-सी है। मे तथा दूसरे मनीषी विद्वान् भी
आपको अक्षय एवं अनामय पथ (मोक्षमार्ग) -पर
स्थित मानते हैं। विप्रवर। इस लोकमें ब्राह्मण
होनेका जो फल है ओर मोक्षका जो स्वरूप है
उसीमें आपकी स्थिति हे।
सनन्दनजी कहते हे - नारद ! राजा जनककों
यह वात सुनकर शुद्ध अन्तःकरणवाले शुकदेवजी
एक दृद निश्चयपर पहुंच गये ओर वुद्धिके द्वारा
आत्माका साक्षात्कार करके उसीमें स्थित होकर
कृतार्थ हो गये । उस समय उन्हें परम आनन्द ओर
परम शान्तिका अनुभव हुआ। इसके बाद वे
हिमालय पर्वतको लक्ष्य करके चुपचाप उत्तर
दिशाकी ओर चल दिये ओर वहां पर्टंचकर
उन्होने अपने पिता व्यासजीको देखा, जो पैल
आदि शिष्योको वैदिकसंहिता पदा रहे थे। शुद्ध
अन्तःकरणवाले शुकदेव अपनी दिव्य प्रभासे
सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्होने
प्रसन्नचित्त होकर बडे आदरसे पिताके चरणोमें
प्रणाम किया। तदनन्तर उदार-वबुद्धि शुकने राजा
जनकके साथ जो मोक्षसाधनविषयक संवाद
हआ था, वह सव अपने पिताको बताया। उसे
सुनकर वेदोंका विस्तार करनेवाले व्यासजीने
हर्षोह्मसपूर्ण हदयसे पुत्रको छातीसे लगा लिया
ओर अपने पास विठाया। तत्पश्चात् पैल आदि
ब्राह्मण व्यासजीसे वेदांका अध्ययन करके उस
शेलशिखरसे पृथ्वीपर आये ओर यज्ञ कराने तथा
वेद पटानेके कार्यमें संलग्र हो गये ।
1:91;
[ऋ / + ४
8 ९ (भि क
व्यासजीका शुकदेवको अनध्यायका कारण बताते हुए ' प्रवह ' आदि सात
वायुओंका परिचय देना तथा सनत्कुमारका शुकको ज्ञानोपदेश
सनन्दजी कहते है- नारदजी ! जव पैल आदि
ब्राह्मण पर्वतसे नीचे उतर आये, तव पुत्रसहित
परम बुद्धिमान् भगवान् व्यास एकान्तम मौनभावसे
ध्यान लगाकर वैठ गये । उस समय आकाशवाणीने
पुत्रसहित व्यासजीको सम्बोधित करके कहा--
` वसिष्ट-कुलमें उत्पन्न महर्पिं व्यास! इस समय
वेद-ध्वनि क्यों नहीं हो रही है ? तुम अकेले कुछ
चिन्तन करते हृए-से चुपचाप ध्यान लगाये क्यों
वैठे हो 2 इस समय वेदोच्चारणकी ध्वनिसे रहित
होकर यह पर्वत सुशोभित नहीं हो रहा ह । अतः
भगवन्! अपने वेदज्ञ पुत्रके साथ परम प्रसन्नरचित्त
हो सदा वेदोका स्वाध्याय करो ।' आकराशवाणीद्रारा
उच्चारित यह वचन सुनकर व्यासजीने अपने पुत्र
शुकदेवजीके साथ वेदक आवृत्ति आरम्भ कर
दी। द्विजश्रेष्ठ । वे दोनों पिता-पुत्र दीर्घकालतक
वेदोंका पारायण करते रहे । इसी बीचमं एक दिन
समुद्री हवासे प्रेरित होकर बड़े जोरकौ आधी
उठी। इसे अनध्यायका हेतु समञ्कर व्यासजीने
पुत्रको वेदक स्वाध्यायसे रोक दिया। तव उन्होने
पितासे पृषरछा-' भगवन्! यह इतने जोरकी हवा
क्यो उठी थी 2 वायुदेवको यह सारी चेष्टा आप
बतानेकौ कृपा करें ।'
शुकदेवजीकी यह बात सुनकर व्यासजी
अनध्यायके निमित्तस्वरूप वायुकरे विषयमं इस
प्रकार बोले-' वेरा! तुम्हें दिव्यदृष्टि उत्पन्न हुई है,
तुम्हारा मन स्वतः निर्मल है। तुम तमोगुण तथा
र्जोगुणसे दूर एवं सत्यमे प्रतिष्ठित हए हो, अतः
अपने हदयमं वेदांका विचार करके स्वयं ही
(-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 6810011
३९२
संक्षिप्त नारदपुराण
बुद्धिद्वारा अनध्यायके कारणरूप वायुके विषयमे
आलोचना करो।
उसके सात मार्गं है । जो धूम तथा गरमीसे उत्पन्न
बादल-समूहों ओर ओलोको इधर-से-उधर ले
जाता है, वह प्रथम मार्गमे प्रवाहित होनेवाला
"प्रवह ' नामक प्रथम वायु है। जो आकाशमें
रसको मात्राओं ओर विजली आदिकी उत्पत्तिके
लिये प्रकट होता हे, वह महान् तेजसे सम्पन्न
द्वितीय वायु "आवह ' नामसे प्रसिद्ध है ओर बड़ी
भारी आवाजके साथ बहता है। जो सदा सोम-
सूर्यं आदि ज्योतिर्मय ग्रहोका उदय एवं उद्धव
करता है, मनीषी पुरुष शरीरके भीतर जिसे उदान
कहते है, जो चारों समुद्रोंसे जल ग्रहण करता हे
ओर उसे ऊपर उठाकर ' जीमृतों' को देता हे तथा
जीमूतोको जलसे संयुक्त करके उन्हं पर्जन्य" के
हवाले करता है, वह महान् वायु “उद्वह ' कहलाता
हे । जिससे प्रेरित होकर अनेक प्रकारके नीले
महामेघ घटा बोधकर जल बरसाना आरम्भ करते
हैँ तथा जो देवताओके आकाशमार्गसे जानेवाले
विमानोँको स्वयं ही वहन करता हे, वह पर्वतोंका
मान मर्दन करनेवाला चतुर्थं वायु "संवह ' नामसे
प्रसिद्ध है। जो रक्षभावसे वेगपूर्वक बहकर
वृक्षोको तोड़ता ओर उखाड़ फेकता है तथा
जिसके द्वारा संगठित हए प्रलयकालीन मेघ
बलाहक ' संज्ञा धारण करते हें, जिसका संचरण
भयानक उत्पात लानेवाला है तथा जो अपने साथ
मेघोकी घटा लिये चलता है, वह अत्यन्त
वेगवान् पञ्चम वायु “विवह कहा गया हे।
जिसके आधारपर आकाशमें दिव्य जल प्रवाहित
होते हे, जो आकाशगङ्गाके पवित्र जलको धारण
करके स्थित हे ओर जिसके द्वारा दूरसे ही प्रतिहत
होकर सहस्रं किरणोके उत्पत्तिस्थान सूर्यदेव
एक ही किरणसे युक्त प्रतीत होते हैँ, जिनसे यह
पृथ्वी प्रकाशित होती है तथा अमृतकी दिव्यनिधि
चन्द्रमाका भी जिससे पोषण होता है, उस छठे
वायुका नाम * परिवह ' हे, वह सम्पूर्ण विजयशील
तत्त्वम श्रेष्ठ हे । जो अन्तकालमें सम्पूर्णं प्राणियोके
प्राणोंको शरीरसे निकालता है, जिसके इस
प्राणनिष्कासनरूप मार्गका मृत्यु तथा वेवस्वत यम
अनुगमन मात्र करते हँ, सदा अध्यात्मचिन्तनमं
लगी हुई शान्त बुद्धिके द्वारा भलीभोति विचार या
अनुसंधान करनेवाले ध्यानाध्यासपरायण पुरुषोको
जो अमृतत्व देनेमें समर्थ हे, जिसमें स्थित होकर
प्रजापति दक्षके दस हजार पुत्र बड़े वेगसे सम्पूर्ण
दिशाओंके अन्तमें पहुंच गये तथा जिससे वृष्टिका
जल तिरोहित होकर वर्षा वंद हो जाती हं, वह
सर्वश्रेष्ठ सप्तम वायु “ परावह" नामसे प्रसिद्ध ह।
उसका अतिक्रमण करना सवके लिये कठिन है ।
इस प्रकार ये सात मरुद्रण दितिके परम अद्भुत
पुत्र है। इनकी सर्वत्र गति हे। ये सव जगह
विचरते रहते है; किंतु बडे आश्चर्यकौ वात हे कि
उस वायुके वेगसे आज यह पर्वतम श्रेष्ठ हिमालय
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
२९३
भी सहसा कप उठा हे । बेटा! यह वायु भगवान्
विष्णुका निःश्वास हे। जब कभी सहस्रा वह
निःश्वास वेगसे निकल पड़ता है, उस समय सारा
जगत् व्यथित हो उठता है। इसलिये ब्रह्मवेत्ता
पुरुष प्रचण्ड वायु (ओंधी) चलनेपर वेदका पाठ
नहीं करते हें । वेद भी भगवान्का निः श्वास ही दै ।
उस समय वेद-पाठ करनेपर वायुसे वायुको क्षोभ
प्राप्त होता हे।
अनध्यायके विषयमे यह वात कहकर
पराशरनन्दन भगवान् व्यास अपने पुत्र शुकदेवसे
बोले-* अव तुम वेद-पाठ करो।' यों कहकर वे
आकाशगङद्घाके तटपर गये। जब व्यासजी स्नान
करने चले गये, तव ब्रह्यवेत्ताओपें श्रेष्ठ शुकदेवजी
वेदोंका स्वाध्याय करने लगे। वे वेद ओर वेदाद्गोके
पारङ्गत विद्वान् थे। नारदजी ! व्यासपुत्र शुकदेवजी
जव स्वाध्याये लगे हुए थे, उसी समय वहां
भगवान् सनत्कुमार एकान्तमें उनके पास आये ।
व्यासनन्दन शुकने ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारजीका उठकर
स्वागत-सत्कार किया । विप्रेन्द ! तत्पश्चात् ब्रह्मवेत्ता ओम
्रष्ट सनत्कुमारजीने शुकदेवजीसे कहा-' महाभाग!
महातेजस्वी व्यासपुत्र! क्या कर रहे हो ?'
शुकदेवजी बोले-- ब्रह्मकुमार ! इस समय में
वेदोके स्वाध्यायमें लगा हूं। मेरे किसी अज्ञात
पुण्यके फलसे आपका दर्शन प्राप्त हुआ ह । अतः
महाभाग! मं आपसे किसी एेसे तत्त्वके विषयमे
पृठना चाहता हू जो मोक्षरूपी पुरुषार्थका साधक
हो। अतः आप कृपापूर्वक वबतावें, जिससे मुञ्चे भी
उसका ज्ञान हो।
सनत्कुमारजीने कहा-- ब्रह्मन् ! विद्याके समान
कोई नेत्र नहीं है, सत्यके तुल्य कोई तपस्या नहीं
हे, रागके समान कोई दुःख नहीं है ओर त्यागके
सदृश कोई सुख नहीं हे। पाप-कर्मसे दूर रहना,
सदा पुण्यका सञ्चय करते रहना, साधु पुरुषोकि
वर्तविको अपनाना ओर उत्तम सदाचारका पालन
करना- यह सर्वोत्तम श्रेयका साधन है। जहाँ
सुखका नाम भी नहीं हे, एेसे मानव-शरीरको
पाकर जो विषयों आसक्त होता है, वह मोहमें
डूव जाता हे । विषयोंका संयोग दुःखरूप है, वह
कभी दुःखसे छुटकारा नहीं दिला सकता । आसक्त
मनुप्यकी वुद्धि चञ्चल हो जाती है ओर मोहजालका
विस्तार करनेवाली होती है। जो उस मोहजालसे
धिर जाता है, वह इस लोक ओर परलोकमें भी
दुःखका ही भागी होता है। जो अपना कल्याण
चाहता हो, उसे सभी उपायोंसे काम ओर क्रोधको
कावूमे करना चाहिये, क्योकि वे दोनों दोष
मनुप्यके श्रेयका विनाश करनेके लिये उद्यत रहते
हे । मनुष्यको चाहिये कि तपको क्रोधसे, सम्पत्तिको
डाहसे, विद्याको मान-अपमानसे ओर अपनेको
प्रमादसे वचावे। क्रूरस्वभावका परित्याग सबसे
वडा धर्म है। क्षमा सवसे महान् बल दै।
आत्मज्ञान सर्वोत्तिम ज्ञान है ओर सत्य ही सवसं
वदकर हितका साधन हैः। सत्य बोलना सबसे
र्ठ है, किंतु हितकारक व्रात कहना सत्यसे भी
बद़कर है। जिससे प्राणियोका अत्यन्त हित होता
हो, उसीको में सत्य मानता हूं । जो नये-नये कर्मं
आरम्भ करनेका संकल्प छोड चुका है, जिसके
[व न मी किति द त
१. यहां सनत्कुमारजीने शुकदेवजीसे मिलकर उनको जो उपदेश दिया टै, वह या तौ जनककरे उपदेश दैनेके
पर्वका प्रसंग समञ्मना चाहिये अथवा ठेसा समञ्जना चादिये कि यह उपदेश सनत्कुमारजीने संसारके हितके लिये
शुकदेवजीको निमित्त बनाकर दिया टै।
२. नित्यं क्रोधात्तपो रक्नच्छियं रक्षेच्च मत्सरात् । विद्यां
मानावमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥
आनृशंस्यं परौः धर्मः क्षमा च परमं बलम् । आत्मज्ञानं परं ञानं सत्यं हि परमं हितम्
(ना० पूर्वर ६० ४८-४९)
((-0. 1/८11114<511॥1 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 68110011
३९६
संक्षिप्त नारदपुराण
मनमे कोई कामना नहीं हे, जो किसी वस्तुका
संग्रह नहीं करता तथा जिसने सव कुच त्याग
दिया हे, वही विद्वान् है ओर वही पण्डित हे । जो
अपने वशमें को हुई इन्द्रियोके द्वारा अनासक्त
भावसे विषयोंका अनुभव करता हे, जिसके
अन्तःकरणमं सदा शान्ति विराजती हे, जो निर्विकार
एवं एकाग्रचित्त हे तथा जो आत्मीय कहलानेवाले
शरीर ओर इन्द्रियोके साथ रहकर भी उनसे
एकाकार न होकर विलग-सा ही रहता ठै, वह
सब बन्धनोसे दछूटक्तर शीघ्र ही परम कल्याण प्राप्त
कर लेता हे। मुने ! जिसकी किसी भी प्राणीकी
ओर दृष्टि नहीं जाती, जो किसीका स्पर्श तथा
किसीसे बातचीत नहीं करता, उसे महान् श्रेयकी
प्रापि होती हे। किसी भी जीवको हिंसा न करे।
सब प्राणियोके साथ मित्रतापूर्णं वर्ताव करे। इस
जन्म (अथवा शरोर)-को लेकर किसीके साथ
वैरभाव न करे! जो आत्मतत्त्वका ज्ञाता तथा
मनको वशमे रख्नेवाला है, उसे चाहिये कि
किसी भी वस्तुका संग्रह न करे । मनये पूर्णं संतोप
रखे। कामना तथा चपलताको त्याग दे। इससे
परम कल्याणक सिद्धि होती है । जिन्होंने भोगोका
परित्याग कर दिया ठे, वे कभी शोकमें नहीं
पडते, इसलिये प्रत्येक मनुष्यको भोगासक्तिका
त्याग करना चाहिये । जो किसीसे भी पराजित न
होनेवाले परमात्माको जीतना चाहता हो, उसे
तपस्वी, जितेन्द्रिय, मननशील, संयतचित्त तथा
सम्पूर्णं विपयोमे अनासक्तं होना चाहिये। जो
ब्राह्मण त्रिगुणात्मक विषयमे आसक्त न होकर
सदा एकान्तवास करता हे, वह बहुत शीघ्र सर्वोत्तम
सुख (मोक्ष) प्राप्त कर लेता हे । मुने! जो मैथुनमें
सुख समञ्जनेवाले प्राणियोके बीचमें रहकर भी
(स्त्रियोसे रहित) अकेले रहनेमे ही आनन्द
मानता ह, उसे ज्लानानन्दसे तृप्त समञ्चना चाहिये।
जो ज्ञानानन्दसे पूर्णतः तृप्त हे, वह शोकमें नहीं
पड़ता। जीव सदा कर्मेकि अधीन रहता हे, वह
शुभ कर्मोसि देवता होता हे, शुभ ओर अशुभ
दोनोके आचरणसे मनुष्ययोनिमें जन्म पाता है तथा
केवल अशुभ क्मेसि पशु-पक्षी आदि नीच
योनियोमे जन्म ग्रहण करता है । उन-उन योनियोपें
जीवको सदा जरा-मूत्यु तथा नाना प्रकारके दुःखो-
का शिकार होना पड़ता है। इस प्रकार संसारम
जन्म लेनेवाला प्रत्येक प्राणी संतापकी आगमे
पकाया जाता हे।
यहां विभिन्न वस्तुओके संग्रह-परिग्रहकी कोई
आवश्यकता नहीं हे, क्योकि संग्रहसे महान् दोष
प्रकट होता हे । रेशमका कीड़ा अपने संग्रहके कारण
ही बन्धनमें पड़ता हे । स्त्री, पुत्र आदि कुटुम्बमें
आसक्त रहनेवाले जीव उसी प्रकार कष्ट पाते हें
जेसे जंगलके वृदे हाथी तालाबके दलदलमें फसकर
दुःख भोगते हं । जेसे महान् जालमे फेसकर पानीके
वाहर आये हए मत्स्य तडपते हैँ, उसी प्रकार सरेह-
जालमे फसकर अत्यन्त कष्ट उठाते हए इन
प्राणियोको ओर दृष्टिपात करो । कुटुम्ब, पुत्र, स्त्री,
शरीर ओर द्रव्यका संग्रह, यह सब्र कुछ पराया है
सव अनित्य हे। यहां अपना क्या है 2 केवल पुण्य
ओर पाप। अर्थं (परमात्मा)-की प्राप्तिके लिये
विद्या, कर्म, पवित्रता ओर अत्यन्त विस्तृत ज्ञानका
सहारा लिया जाता है। जब अर्थक सिद्धि
(परमात्माको प्रापि हो जाती है तो मनुष्य मुक्त हो
जाता है। गोँवमें रहनेवाले मनुष्यकी विषयोके
प्रति जो आसक्ति होती है, वह उसे बाँधनेवाली
रस्सीके समान है । पुण्यात्मा पुरुष उस रस्सीको
काटकर आगे परमार्थके पथपर बढ़ जाते ह; परतु
पापी जीव उसे नहीं काट पाते। यह संसार एक
नदीके समान है । रूप इसका किनारा, मन स्रोत,
स्पर्श द्वीप ओर रस ही प्रवाह है। गन्ध इस
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
३९५
नदीका कीचड्, शब्द् जल ओर स्वर्गरूपी दुर्गम
घाट है। इस नदीको मनुप्य-शरीररूपी नौकाकी
सहायतासे पार किया जा सकता हे । क्षमा इसको
खेनेवाले डड ओर धर्म इसको स्थिर करनेवाला
लंगर है। विषयासक्तिके त्यागरूपी शीघ्रगामी
वायुद्रारा ही इस नदीको पार किया जा सकता हे ।
इसलिये तुम कर्मसि निवृत्त, सब प्रकारके चन्धनोसे
मुक्त, सर्वज्ञ, सर्वविजयी, सिद्ध तथा भाव, अभावसे
रहित हो जाओ। बहुत-से जानी पुरुष संयम ओर
तपस्याके वलसे नवीन वन्धनोका उच्छेद करके
नित्य सुख देनेवाली अवाधसिद्धि (मुक्ति)-को
प्राप्त हो चुके है।
++ 1-1-00 #
शुकदेवजीको सनत्कुमारका उपदेश
सनत्कुमारजी कहते है-- शुकदेव ! शास्त्र शोकको
दूर करनेवाला हे । वह शान्तिकारक तथा कल्याणमय
हे। अपने शोकका नाश करनेके लिये शास्त्रका
श्रवण करनेसे उत्तम वुद्धि प्राप्त होती हे। उनके
मिलनेपर मनुष्य सुखी एवं अभ्युदयशील होता हे ।
शोकके हजारों ओर भयके सैकड़ों स्थान हैँ। वे
प्रतिदिन मूढ मनुप्यपर ही अपना प्रभाव डालते
हें । विद्वान् पुरुषपर उनका जोर नहीं चलताः।
अल्प बुद्धिवाले मनुष्य ही अप्रिय वस्तुके संयोग
ओर प्रिय वस्तुके वियोगसे मन-ही-मन दुःखी
होते हें। जो वस्तु भूतकालके गभमिं छिप गयी
(नष्ट हो गयी), उसके गुणका स्मरण नहीं करना
चाहिये; क्योकि जो आदरपूर्वकं उसके गुणका
चिन्तन करता हे, वह उसकी आसक्तिके बन्धनसे
मुक्त नहीं हो पाता। जहां चित्तको आसक्ति वदने
लगे, वहीं दोषदृष्टि करनी चाहिये ओर उसे
अनिष्एटको बढानेवाला समञ्ना चाहिये। एेसा
करनेपर उससे शीघ्र ही वैराग्य हो जाता टै। जो
वीती बातके लिये शोक करता हे, उसे धर्म, अर्थ
ओर यशकी प्राति नहीं होती। वह उसके
अभावका दुःखमात्र उठाता है । उससे अभाव दूर
नहीं होता। सभी प्राणियोको उत्तम पदार्थपि
संयोग ओर वियोग प्राप्त होते रहते है । किसी
एकपर ही यह शोकका अवसर नहीं आता। जो
मनुष्य भूतकालमें मरे हए किसी व्यक्ति अथवा
नष्ट हई किसी वस्तुके लिये निरन्तर शोक करता
हे, बह एक दुःखसे दूसरे दुःखको प्राप्त होता ह ।
इस प्रकार उसे दो अनर्थं भोगने पड़ते ह । यदि
कोई शारीरिक ओर मानसिक दुःख उपस्थित हो
जाय तथा उसे दूर करनेमें कोई उपाय काम न
दे सके, तो उसके लिये चिन्ता न करनी चाहिये ।
दुःख दूर करनेकी सबसे अच्छी दवा यही है कि
उसका बार-बार चिन्तन न किया जाय। चिन्तन
करनेसे वह घटता नहीं, बल्कि ओर बढता ही
जाता है। इसलिये मानसिक दुःखकरो वुद्धिके
विचारसे ओर शारीरिक कटको ओपध-सेवनद्रारा
नष्ट करना चाहिये । शास्त्रज्ञानके प्रभावसे ही एेसा
होना सम्भव ह । दुःख पड्नेपर बालकोंकी तरह
रोना उचित नहीं है । रूप, यौवन, जीवन, धन
संग्रह, आरोग्य तथा प्रियजनोका सहवास-ये
सव्र अनित्य हैं । विद्वान् पुरुषको इनमे आसक्त
नहीं होना चाहिये । आये हए संकटके लिये शोक
करना उचित नहीं है। यदि उस संकटको
टालनेका कोटं उपाय दिखलायी दै तो शोक
१. शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च। दिवसे दिवसे मृढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥
(ना० पूर्व ६१। २)
((-0. 1/८1114<511॥ 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
२३९६
संक्षिप्त नारदपुराण
छोड़कर उसे ही करना चाहिये । इसमें संदेह नहीं
कि जीवनम सुरवरको अपेक्षा दुःख ही अधिक
होता है तथापि जरा ओर मृत्युके दुःख महान् हैँ
अतः उनसे अपने प्रिय आत्माका उद्धार करे।
शारीरिक ओर मानसिक रोग सुदृढ धनुष धारण
करनेवाले वीर पुरुषके छोड हए तीखी धारवाल
वाणोंको तरह शरीरको पीडित करते हें । तृष्णासे
व्यथित, दुःखी एवं विवश होकर जीनेकी इच्छा
रखनेवाले मनुष्यका नाशवान् शरीर क्षण-क्षणमें
विनाशको प्राप्त हो रहा हे । जेसे नदियोका प्रवाह
अआगेको ओर ही बढता जाता है, पीछेकी ओर
नहीं लौटता, उसी प्रकार रात ओर दिन भी
मनुष्योको आयुका अपहरण करते हए एक-एक
करके बीतते चले जा रहे हें । यदि जीवके किये
हुए कर्मोका फल पराधीन न होता तो वह जो
चाहता, उसकी कही कामना पूरी हो जाती । बड़-
बड़ संयमी, चतुर ओर बुद्धिमान् मनुष्य भी अपने
क्मेकि फलसे वञ्चित होते देखे जाते हँ तथा
गुणहीन, मूर्ख ओर नीच पुरुप भी किसीके
आशीर्वाद विना ही समस्त कामनाओंसे सम्पन्न
दिखायी दते हं । कोई-कोई मनुष्य तो सदा
प्राणियोकी हिंसामें ही लगा रहता है ओर संसारको
धोखा दिया करता हे, कितु कहीं-कहीं एेसा पुरुप
भी सुखी देखा जाता हे । कितने ही एेसे है, जो
कोई काम न करके चुपचाप वेठे रहते हैँ, फिर
भी उनके पास लक्ष्मी अपने-आप परहंच जाती है
ओर कुछ लोग ब्रहुत-से कार्य करते है, फिर भी
मनचाही वस्तु नदीं पाते। इसमें पुरुपका प्रारब्ध
ही प्रधान है। देखो, वीर्य अन्यत्र पेदा होता है
ओर अन्यत्र जाकर संतान उत्पन्न करता टै। कभी
तो वह योनिमें पहुंचकर गर्भ धारण करानेमे समर्थ
होता है ओर कभी नहीं होता। कितने ही लोग
पुत्र-पौत्रकी इच्छा रखकर उसकी सिद्धिके लिये
यत्न करते रहते हें, तो भी उनके संतान नहीं होती
ओर कितने ही मनुष्य संतानको क्रोधे भरा हुआ
सोप समञ्जकर सदा उससे डरते रहते हैँ तो भी
उनके यहाँ दीर्घजीवी पुत्र उत्पन्न हो जाता है,
मानो वह स्वयं किसी प्रकार परलोकसे आकर
प्रकर हो गया हो। कितने ही गर्भ टएेसे हेंजो
पुत्रको अभिलाषा रखनेवाले दीन स्त्री-पुरुषोदरारा
देवताओंको पूजा ओर तपस्या करके प्राप्त किये
जाते हें ओर दस महीनेतक माताके उदरमें धारण
किये जानेके वाद् जन्म लेनेपर कुलाद्भार निकल
जाते हें। उन्हीं माङ्गलिक कृत्योसे प्राप्त हुए
बहुत-से एेसे पुत्र है, जो जन्म लेनेके साथ ही
पिताके संचित किये हुए अपार धन-धान्य ओर
विपुल भोगोके अधिकारी होते हें । (इन सबमं
प्रारब्ध ही प्रधान हेः)
जो सुख ओर दुःख दोनोंकी चिन्ता छोड देता
हे, वह अविनाशी ब्रह्मको प्राप्त होता है ओर
परमानन्दका अनुभव करता हे । धनके उपार्जनमे
वड़ा कष्ट होता है, उसकी रक्षामें भी सुख नहीं
हे तथा उसके खर्च करनेमे भी क्लेश ही होता ह
अतः धनको प्रत्येक दशामें दुःखदायक समञ्चकर
उसके नष्ट होनेपर चिन्ता नहीं करनी चाहिये।
मनुष्य धनका संग्रह करते-करते पहलेकी अपेक्षा
ऊंची स्थितिको प्राप्त करके भी कभी तृप्त नहीं
होते, वे ओर अधिक धन कमानेकी आशा लिये
हुए दी मर जाते है । इसलिये विद्रान् पुरुष सदा
संतुष्ट रहते है (वे धनकी तृष्णा नहीं पड़ते) ।
संग्रहका अन्त है विनाश, सांसारिक एशर्यकां
उन्नतिका अन्त है उस एेश्चर्यकी अवनति । संयोगका
अन्त है वियोग ओर जीवनका अन्त है मरण।
तृष्णाका कभी अन्त नहीं होता। संतोष ही परम
सुख है । अतः पण्डितजन इस लोकें संतोपको
ही उत्तम धन कहते है । आयु निरन्तर बीती जा
((-0. 1\/॥८11104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-द्ितीय पाद
रही हे । वह पलभर भी विश्राम नहीं लेती । अव
अपना शरीर ही अनित्य है, तब इस संसारकौ
दूसरी किस वस्तुको नित्य समञ्ञा जाय। जो
मनुष्य सव प्राणियोके भीतर मनसे परे परमात्माको
स्थिति जानकर उन्हीका चिन्तन करते हें, वे
संसारयात्रा समाप्त होनेपर परमपदका साक्षात्कार
करते हए. शोकके पार हो जाते हें ।
जेसे वनमें नयी-नयी घासकी खोजमें विचरते
हए अतृप्त पशुको सहसा व्याघ्र आकर दबोच लेता
हे, उसी प्रकार भोगोंको खोजमें लगे हुए अतृप्त
मनुष्यको मृत्यु उठा ले जाती हे। इसलिये इस दुःख-
से दुटकारा पानेका उपाय अवश्य सोचना चाहिये ।
जो शोक छोडकर साधन आरम्भ करता है ओर
किसी व्यसनमें आसक्त नहीं होता, उसको मुक्ति हो
जाती हे। धनी हो या निर्धन, सबको उपभोगकालमं
ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस ओर उत्तम गन्ध आदि
विषयोमें किञ्चित् सुखका अनुभव होता हे।
उपभोगके पश्चात् उनमें कुछ नहीं रहता । प्राणियोको
एक-दूसरसे संयोग होनेके पहले कोई दुःख नहीं
होता। जव संयोगके बाद प्रियका वियोग होता ह
तभी सवको दुःख हुआ करता है; अतः विवेकी
पुरुषको अपने स्वरूपमें स्थित होकर कभी भी
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शोक नहीं करना चाहिये । धेर्यके द्वारा शिश्न ओर
उदरकी, नेत्रद्रारा हाथ ओर पैरकी, मनके द्वारा
आख ओर कानको तथा सद्िद्याके द्वारा मन ओर
वाणीकी रक्षा करनी चाहिये। पूजनीय तथा अन्य
मनुप्योमे आसक्ति हटाकर शान्तभावसे विचरण
करता हे, वही सुखी ओर वही विद्वान् है । जो
अध्यात्म-विद्यामे अनुरक्त, निष्काम तथा भोगा-
सक्तिसे दूर है ओर सदा अकेला ही विचरता
रहता हे, वह सुखी होता हे । जव मनुष्य सुखको
दुःख ओर दुःखको सुख समञ्जन लगता है, उस
अवस्थामें बुद्धि, सुनीति ओर पुरुषार्थं भी उसको
रक्षा नहीं कर पाते। अतः मनुप्यको ज्ानप्रािके
लिये स्वभावतः यत्न करना चाहिये; क्योकि यत्र
करनेवाला पुरुष कभी दुःखमें नहीं पड्ता।
सनन्दनजी कहते है-- व्यासपुत्र शुकदेवसे
एेसा कहकर उनकी अनुमति ले महामुनि सनत्कुमारजी
उनसे सादर पृजित हो वहसि चले गये । योगियोमं
रेष शुकदेवजी भी अपनी स्वरूपस्थितिको भलीभति
जानकर ब्रह्मपदका अनुसंधान करनेके लिय उत्सुक
हो पिताके पास गये। पितासे मिलकर महामुनि
शुकने उन्हें प्रणाम किया ओर उनकी परिक्रमा
करके वे कैलास्तपर्वतको चले गये।
अः
न ५ 0 |
श्रीशुकदेवजीकी ऊर्ध्वगति, श्चेतद्रीप तथा वैकुण्ठधाममें जाकर शुकदेवजीके द्वारा
भगवान् विष्णुकी स्तुति ओर भगवान्की आज्ञासे शुकदेवजीका व्यासजीके
पास आकर भागवतशास्त्र पढना
सनन्दनजीने कहा- देवप! केलास-पर्वतपर जाकर
सूर्यके उदय होनेपर विद्वान् शुकदेव हाधथ-पैोको
यथोचित रीतिसे रखकर विनीतभावसे पूर्वक ओर
मुंह करके वैदे ओर योगे लग गय! उस समय
उन्हाने सव प्रकारके स द्वौ रहित परमात्माकरा दर्शन
किया। यां उस परमात्माका साक्नात्कार करके शुक्दवजी
खव खुलकर हंसे । फिर वे वायुके समान आक्राशमे
विचरने लगे। उस समय उनका तेज उदयक्रालीन
अरुणकरे समान प्रकाशित हो रहा धा। वै मन ओर
वायुके समान आगे वद् रटे थे। उस समय सवने
अपनी शक्ति तथा रोति-नीतिकरे अनुसार उनका
पजन किया। देवताश्रोनि उनपर दिव्य पुर्पोकी वर्पा
((-0. 1५८1114/5511॥1 81188 \/8181185। 01661010. 01411260 0 6810011
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की। उन्हें इस प्रकार ऊपर उठते देख गन्धर्व,
अप्सरा, महर्षिं तथा सिद्धगण सब आश्चर्यसे चकित
हो उदठे। तत्पश्चात् वे नित्य, निर्गुण एवं लिङ्गरहित
ब्रह्मपदमें स्थित हो गये। उस समय उनका तेज
धूमरहित अग्रिकी भोति उदीप हो रहा था। अगे
बदनेपर शुकदेवजीने पर्वतके दो अनुपम शिखर
देखे, जिनमें एक तो हिमालयके समान शत तथा
दूसरा मेरुके समान पीतवर्ण था । एक रजतमय था
ओर दूसरा सुवर्णमय। दोनों एक-दूसरेसे सटे हुए
ओर सुन्दर थे। नारद ! इनका विस्तार ऊपरको ओर
तथा अगल-बगलमें सो-सौ योजनका था । शुकदेवजी
दोनों शिखरोके वीचसे सहसा आगे निकल गये । वह
ष्ठ पर्वत उनकी गतिको रोक न सका। उस समय
शुकदेवजी वायुलोकसे ऊपर अन्तरिक्षम यात्रा करते
हुए अपना प्रभाव दिखाकर सर्व-स्वरूप हो सम्पूर्ण
लोकोमें विचरण करने लगे। परम योगवेत्ता शुकदेवजी
शतद्वीपमे जा पहुचे! वहां उन्होने पहले भगवान्
श्रीनारायणदेवका प्रभाव देखा । तत्पश्चात् जिन्हं वेदकी
ऋचा भी दूती फ्िरती है, उन देवाधिदेव जनार्दनका
साक्षात् दर्शन किया। दर्शनके अनन्तर शुकदेवजीने
भगवानूको स्तुति को । नारद ! उनकी स्तुतिसे प्रसन्न
होकर भगवान् बोले ।
श्रीभगवान्ने कहा- योगीन्द्र! मै सम्पूर्ण
देवताओंके लिये भी अदृश्य होकर रहता हू
फिर भी तुमने मेरा दर्शन कर लिया हे । ब्रह्मचारी
शुक! तुम सनत्कु मारजीके बताये हुए योगके
द्वारा सिद्ध हो चुके हो। अतः वायुके मार्गमे
स्थित होकर इच्छानुसार सम्पूर्ण लोकोंको देखो ।
विप्रवर! भगवान् वासुदेवके एेसा कहनेपर
शुकदेवमुनि उन्हे प्रणाम करके अखिलविश्चवन्दित
विष्णुधामको गये। नारद ! वैकुण्ठलोक विमानपर
विचरनेवाले देवताओंसे सेवित हे । उसे विरजा
नामवाली दिव्य नदीने चारों ओरसे घेर रखा हे ।
उस दिव्य धामके प्रकाशित होनेसे ही ये सम्पूर्णं
संक्षिप्त नारदपुराण
लोक प्रकाशित हो रहे है । वहां सुन्दर-सुन्दर बावडयां
बनी है, जो कमलोंसे आच्छादित रहती हें । उनके
घाट मगेके बने हुए ह, जिनमें सुवर्ण ओर रन्न जडे
हुए हें । वे सब बावडिर्या निर्मल जलसे भरी रहती
हें । वहंकि द्वारपाल चार भुजाधारी होते हें । नाना
प्रकारके आभूषण उनको शोभा वदते हें । वे सभी
विष्वक्सेनजीके अनुयायी एवं सिद्ध हं । उनकी कुमुद
आदि नामोंसे प्रसिद्धि हे। शुकदेवजीको उनमेसे
किसीने नहीं रोका। वे विना बाधा भीतर प्रवेश कर
गये । वहो उन्होनि सिद्ध-समुदायके द्वारा निरन्तर सेवित
देवाधिदेव भगवान् विष्णुका दर्शन किया । उनके चार
भुजा थीं । वे शान्त एवं प्रसन्नमुख दिखायी देते थे।
उनके श्रीअङ्खपर रेशमी पीताम्बर शोभा पर रहा था।
शद, चक्र, गदा ओर पदम मूर्तिमान् होकर भगवानूकी
सेवामें उपस्थित थे। उनके वक्षःस्थलमें भगवती लक्ष्मी
विराज रही थीं ओर कोस्तुभमणिसे वे प्रकाशित हो रहे
थे। उनके करटिभागमें करधनी, वायं कंधेपर यञ्लोपवीत,
हाथमे कड़ तथा भुजाओमिं अङ्घद सुशोभित थे। माथेपर
मण्डलाकार किरीट ओर चरणोमें नूपुर शोभा दे रहे
थे। भगवान् मधुसूदनका दर्शन करके शुकदेवने
भक्तिभावसे उनकी स्तुति की ।
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पूर्वभाग-द्वितीय पाद
३९९
शुकदेवजी बोले-- सम्पूर्ण लोकोके एकमात्र
साक्षी आप भगवान् वासुदेवको नमस्कार दै
सम्पूर्णं जगत्के बीजस्वरूप, सर्वत्र परिपूर्णं एवं
निश्चल आत्मरूप आपको नमस्कार है। वासुकि
नागको शय्यापर शयन करनेवाले शेतद्वीपनिवासी
श्रीहरिको नमस्कार हे। आप हंस, मत्स्य, वाराह
तथा नरसिंहरूप धारण करनेवाले हें । ध्रुवके आराध्यदेव
भी आप ही हँ। आप सांख्य ओर योग दोनोके
स्वामी हैँ । आपको नमस्कार है। चारों सनकादि
आपके ही अवतार हैं । आपने ही कच्छप ओर
पृथुरूप धारण किया हे । आत्मानन्द ही आपका
स्वरूप हे । आप ही नाभिपुत्र ऋषभदेवजीके रूपमे
प्रकट हुए हें । जगत्को सृष्टि, पालन ओर संहार
करनेवाले आप ही हें। आपको नमस्कार हेै।
भृगुनन्दन परशुराम, रघुनन्दन श्रीराम, परात्पर
श्रीकृष्ण, वेदव्यास, बुद्ध तथा कल्कि भी आपके
ही स्वरूप हैं । आपको नमस्कार है। कृष्ण,
बलभद्र, प्रद्युम्न ओर अनिरुद्ध-इन चार व्यूहोके
रूपमे आप ही विराज रहे हे । जानने ओर चिन्तन
करने योग्य परमात्मा भी आप ही हे । नरनारायण,
शिपिविष्ट तथा विष्णु नामसे प्रसिद्ध आपको नमस्कार
हे। सत्य ही आपका धाम हे । आप धामरहित हे ।
गरुड आपके ही स्वरूप है । आप स्वयंप्रकाश,
ऋभु (देवता), उत्तम त्रतका पालन करनेके लिये
विख्यात, उत्कृष्ट धामवाले ओर अजित हे । आपको
नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्च आपका स्वरूप है ।
आप ही विश्वरूपमें प्रकट हे । सृष्टि, पालन ओर
संहार करनेवाले भी आप ही हं । यज्ञ ओर उसके
भोक्ता, स्थूल ओर सुक्ष्म तथा याचना करनेवाले
वामनरूप आपको नमस्कार है । सूर्य ओर चन्द्रमा
आपके नेत्र हं । साहस्र, ओज ओर बल आपसे
भिन्न नहीं हं । आप यज्चोद्रारा यजन करने योग्य,
साक्षी, अजन्मा तथा अनेक हाथ, पैर ओर
मस्तकवाले हें । आपको नमस्कार है । आप लक्ष्मीके
स्वामी, उनके निवासस्थान तथा भक्तोके अधीन
रहनेवाले हैं । आप शार्ङ्गं नामक धनुष धारण
करते हे । आठ! प्रकृतियोंके अधिपति, त्र्या
तथा अनन्त शक्तियोंसे सम्पन्न आप परमेश्वरको
नमस्कार हे । बृहदारण्यक उपनिषद्के हारा आपके
तत्तका बोध होता हे । आप इद्दियोके प्रेरक तथा
जगत्स्रष्टा ब्रह्मा हे । आपके नेत्र विकसित कमलके
समान हें । क्षेत्रज्ञके रूपमे आप ही प्रकाशित हो
रहे हैं । आपको नमस्कार है । गोविन्द, जगत्कर्ता
जगन्नाथ, योगी, सत्य, सत्यप्रति्च, वैकुण्ठ ओर
अच्युतरूप आपको नमस्कार है । अधोक्षज, धर्म,
वामन, त्रिधातु, तेजःपुञ्ज धारण करनेवाले, विष्णु,
अनन्त एवं कपिलरूप आपको नमस्कार दै।
आप ही विरिख्ि नामसे प्रसिद्ध ब्रह्माजी है।
तीन शिखरोंवाला त्रिकूट पर्वत आपका ही स्वरूप
हे । ऋग्वेद, यजुर्वेद ओर सामवेद आपके अभिन्न
विग्रह हे । एक सींगवाले शृद्खी ऋषि भी आपका
ही विभूति है । आपका यश परम पवित्र है तथा
सम्पूर्ण वेद-शास्त्र आपसे ही प्रकट हुए ह।
आपको नमस्कार है। आप वृषाकपि (धर्मको
अविचल रूपसे स्थापित करने वाले विष्णु, शिव
ओर इन्द्र) हैं। सम्पूर्णं समृद्धियोसे सम्पन्न
तथा प्रभु सर्वशक्तिमान् है । यह सम्पूर्णं विश्च
आपकी ही रचना ह । भूर्लोक, भुवर्लोक ओर
स्वर्लोक आपके ही स्वरूप ह । आप टैत्योँका
नाश करनेवाले तथा निर्गुण रूप हें । आपको
नमस्कार हे। आप निरञ्जन, नित्य, अव्यय
ओर अक्षररूप ह । शरणागतवत्सल ईश्वर!
१. गीताके अनुसार आठ प्रकृति्योकि नाम इस प्रकार ै- भूमि, जल, ऊघ्नि, वायु, आकाश, मन, वुद्धि तथा अहङ्कार ।
(-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 66810011
०99
सस्षिप्त नारदपुराण
आपको नमस्कार है। आप मेरी रक्षा कोजियेः ।
इस प्रकार स्तुति करनेपर प्रणतजनोंपर दया
करनेवाले शङ्ख, शक्र ओर गदाधारी भगवान्
विष्णु शुकदेवजीसे इस प्रकार बोले ।
श्रीभगवान्ने कहा- उत्तम त्रतका पालन करनेवाले
महाभाग व्यासपुत्र। मै तुमपर बहुत प्रसन्न हू। तुम्हं विद्या
ओर भक्ति दोनों प्रात हो। तुम सानी ओर साक्षात् मेरे
स्वरूप हो । ब्रह्मन्! तुमने पहले शतद्वीपमें जो मेय स्वरूप
देखा हे, वह मे ही हूं। सम्पूर्ण विश्चकी रक्षके लिये मे वहां
स्थित हू। मेरा वही स्वरूप भिन्नभित्र अवतार धारण
करनेके लिये जाता हे। महाभाग! मोक्षधर्मका निरन्तर
चिन्तन करनेसे तुम सिद्ध हो गये हो । जेसे वायु तथा सूर्य
आकाशमें विचरण करते हे, उसी प्रकार तुम भी समस्त
्रष्ठ लोकें भ्रमण कर सकते हो । तुम नित्य मुक्तस्वरूप
हो। में ही सबको शरण देनेवाला हूं। संसायमें मेरे प्रति
भक्ति अत्यन्त दुर्लभ है। उस भक्तिको प्राप्तं कर लेनेपर
ओर कुछ पाना शेष नहीं रहता। (वह तुमको प्राप्त हो
गयी) बदस्किश्रम्मे नरनारायण ऋषि कल्पान्त कालतकके
लिये तपस्यामें स्थित हैं। उनकी आज्ञासे उत्तम व्रतका
पालन करनेवाले तुम्हारे पिता व्यास भागवत्-शाखका
सम्पादन करेगे। अतः तुम पृथ्वीपर जाओ ओर उस
शास्रका अध्ययन करो। इस समय वे गन्धमादन पर्वतपर
तपस्या करते हें।
नारदजी ! भगवानूके एेसा कहनेपर शुकदेवजीने
उन चार भुजाधारी श्रीहरिको नमस्कार किया ओर वे
पिताके समीप लोट गये। तदनन्तर शुकदेवको अपने
निकट देख परम प्रतापी पराशरनन्दन भगवान् व्यासका
मन प्रसन्न हो गया। वे पुत्रको पाकर तपस्यासे निवृत्त
हो गये। फिर॒ भगवान् नारायण ओर नरश्रेष्ट नरको
नमस्कार करके शुकदेवजीके साथ अपने आश्रमपर
आये । मुनीश्वर नारद् ! तुम्हारे मुखसे भगवान् नारायणका
अदेश पाकर उन्होने अनेक प्रकारके शुभ उपाख्यानोसे
युक्त दिव्य भागवतसंहिता बनायी, जो वेदके तुल्य
माननीय तथा भगवद्धक्तिको बदढानेवाली है । व्यासजीने
वह संहिता अपने निवृक्तिपरायण पुत्र शुकदेवको
पायी । व्यासनन्दन भगवान् शुक यद्यपि आत्माराम
है तथापि उन्होनि भक्तौको सदा प्रिय लगनेवाली उस
संहिताका बडे उत्साहसे अध्ययन किया । अनघ! इस
प्रकार ये मोक्षधर्म बतलाये गये, जो पाठकों ओर
श्रोताओकि हदयमें भगवानूकी भक्ति बढानेवाले हे ।
(द ६५4
की की क्क दे
१. शान्तं प्रसन्नवदनं
पीतकौशेयवाससम् । शङ्खचक्रगदापदचैमूर्तिमद्धिरुपासितम् ॥
वक्षःस्थलस्थया लक्ष्या कौस्तुभेन विराजितम् । करिसूत्नब्रह्यसूत्रकटकाङ्गदभूषितम् ॥
भ्राजत्किरीरबलयं मणिनृपुरशोभितम्। ददर्शं सिद्धनिकरेः सेव्यमानमहरनिंशम्॥
तं दृष्टा भक्तिभावेन तुष्टाव मधुसूदनम् । नमस्ते वासुदेवाय सर्वलोकैकसाक्षिणे॥
जगद्रीजस्वरूपाय पूर्णाय निभृतात्मने । हरये वासुकिस्थाय श्रैतद्वीपनिवासिने ॥
हसाय मत्स्यरूपाय वाराहतनुधारिणे । नृसिंहाय ध्रुवेज्याय सांख्ययागेश्चराय च ॥
चतुःसनाय कूर्माय पृथवे स्वसुखात्मने । नाभेयाय जगद्धात्रे विधात्रेऽन्तकराय च॥
भाग्विन्द्राय रामाय राघवाय पराय च । कृष्णाय वेदकर््रै च वुद्धकल्किस्वरूपिणे॥
चतुर्व्युहाय वेद्याय ध्येयाय परमात्मने । नरनारायणाख्याय शिपिविष्टाय विष्णवे ॥
ऋतधाम्ने विधाम्े च सुपर्णाय स्वरोचिषे । ऋभवे सुत्रताख्याय सुधाम्ने चाजिताय च॥
विश्वरूपाय विश्वाय
सृष्टिस्थित्यन्तकारिणे । यज्ञाय यज्ञभोक्त्रे च स्थविष्ठायाणवेऽर्धिने॥
आदित्यसोमनेत्राय सह ओजोबलाय च । ईज्याय साक्षिणेऽजाय वबहुशीर्षाड््रिवाहवे ॥
श्रीशाय श्रीनिवासाय भक्तवश्याय शार्द्िणे । अष्टप्रकृत्यधीशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ॥
वबृहदारण्यवेद्याय हषीकेशाय वेधसे । पुण्डरीकनिभाक्षाय क्षत्र्ञाय विभासिने॥
गोविन्दाय जगत्कर्त्रे जगत्राधाय योगिने । स्त्याय सत्यसंधाय वैकुण्ठायाच्युताय च॥
अधोक्षजाय धर्माय वामनाय त्रिधातवे । धृतार्चिषे विष्णवे तेऽनन्ताय कपिलाय च॥
विरिञ्चये त्रिककुदे ऋग्यजुःसापमरूपिणे । एकभशृद्गाय च शुचिश्रवसे शास्त्रयोनये ॥
वृषाकपय ऋद्धाय प्रभवे विश्वकर्मणे । भूर्भुवःस्वःस्वरूपाय दैत्यघ्ने निर्गुणाय च॥
निरञ्जनाय नित्याय ह्यव्ययायाक्षराय च । नमस्ते पाहि मामीश शरणागतवत्सल ॥
(ना० पूर्व ६२। ४७-६५)
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 66810011
तूती पद
शेवदर्शनः के अनुसार पति, पशु एवं पाश आदिका वर्णन तथा दीक्षाकी महत्ता
शोनकजी बोले- साधु सूतजी ! आप सम्पूर्ण
शास्त्रोके विज्ञ पण्डित हें । विदन् ! आपने हमलोगोको
श्रीकृष्णकथारूपी अमृतका पान कराया हे। भगवानूके
प्रेमी भक्त देवर्षिं नारदजीने सनन्दनके मुखसे
मोक्षधर्मोका वर्णन सुनकर पुनः क्या पृछा?
ब्रह्माजीके मानस-पुत्र सनकादि मुनीश्वर उत्तम
सिद्धपुरुष हँ । वे लोगोके उद्धारमें तत्पर होकर
सम्पूर्ण जगते विचरते रहते हँ । महाभाग,
श्रीनारदजी भी सदा श्रीकृष्णके भजनमें संलग्र
रहते हं ओर उन्दीके शरणागत भक्त हें । उन
सनकादि ओर नारदका समागम होनेपर सम्पूर्ण
लोकोंको पवित्र करनेवाली कोन-सी कल्याणमयी
कथा हुई, यह बतानेको कृपा करे ?
सूतजीने कहा- भृगुश्रेष्ठ ! सनन्दनजीके द्वारा
प्रतिपादित सनातन मोक्षधर्मोका वर्णन सुनकर
नारदजीने पुनः उन मुनियोँसे पृछा ।
नारदजी बोले- मुनी श्वरो ! किन मन्त्रसे भगवान्
विष्णुको आराधना कौ जानी चाहिये । श्रीविष्णुके
चरणारविन्दोंकौ शरण लेनेवाले भक्तजनोंको किन
देवताओंको पूजा करनी चाहिये। विप्रवरो ।
भागवततन््रका तथा गुरु ओर शिष्यके सम्बन्धको
स्थापित करके उन्हे अपने-अपने कर्तव्यके पालनकीं
प्ररणा देनेवाली दीक्षाका वर्णन कीजिये। तथा
साधकोद्रारा पालन करने योग्य प्रातःकाल आदिके
जो-जो कृत्य हों, उन सबको भी हरमे वताहये ।
अनुष्ठानसे परमात्मा श्रीहरि प्रसन्न होते हँ, उनका
आपलोग मुञ्जसे वर्णन करें|
सूतजी कहते ह -- महात्मा नारदका यह वचन
सुनकर सनत्कुमारजी बोले ।
सनत्कुमारजी कहते है- नारद! सुनो, मैं
तुमसे भागवततन्त्रका वर्णन करूगा । जिसे जानकर
साधक निर्मल भक्तिके द्वारा अविनाशी भगवान्
विष्णुको प्राप्त कर लेता है । (अव पहले शैवतन्त्रका
१. *शेव-महातन्त्र' के “ शैवागम " ' शैवदर्शन तथा ' पाशुपत-दर्शन ' आदि अनेक नाम है। इस अध्यायं इसीके गिग
तत्त्वौका विशद विवेचन किया गया दै। यहां भूमिकारूपसे उक्त दर्शनकी कुछ मोटी -मोटी बातें प्रस्तुत की जाती हं, जिनसे
पाशुपतसिद्धान्त ओर इस अध्यायमें वर्णित विषयको हदयद्गम कलमे सुविधा होगी । शैवागमके अनुसार तीन पदार्थं (पशु
पाश तथा पशुपति) ओर चार पाद या साधन (विद्या, क्रिया, योग तथा चर्या) है। जैसा कि तन््र-तत््र्ञेका कथन
है-' त्रिपदार्थं चतुष्पादं महातन्त्रम् “““
गुरुसे नियमपूर्वक मन्त्रोपदेश लेनेको दीक्षा कहते है । यह दीक्षा मनर, मन््रे्वर् ओर विद्येश्वर आदि पशुअकि जानके
बिना नहीं हो सकतो। इसी ज्ञानसे पशु, पाश तथा पशुपतिका टीक-ठीक निर्णय होता दै; अतः परमपुरुषार्धकी हेतुभूता
दीक्षामें उपकारक उक्त ज्ञानका प्रतिपादन कसेवाले प्रथम पादका नाम "विद्या" है। भिन्न-भित्न अधिकारियोके अनुसार
भित्न-भित्न प्रकारकी दीक्षा होती है। अतः अनेक प्रफारको साद्धोपाद्ग दीक्षाओके विधि-विधानका परिचय करनवाले
द्वितीय पादको "क्रिया" पाद कहा गया है। परंतु यम, नियम, आसन आदि अष्टाङ्गयोगके विना अभीष्टप्रसि नहीं हो
सकती, अतः ' क्रिया" पादके पश्चात् “योग नामक तीसरे पादकौ आवश्यकता समञ्जकर् उसका प्रतिपादन किया गया
है। योगकी सिद्धि भी तभी होती है, जव शास्त्रविहित कर्मोका अनुष्ठान ओर निषिद्ध कर्मोका सर्वथा त्याग हो, अतेः
इन सव कमकि प्रतिपादक “ चर्या" नामक चतुर्थं पादका वर्णन दै।
पति या पशुपति
करने, न करने ओर् अन्यथा करनेमें समर्थ, नित्य, निर्गुण, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी, सर्वधा स्वतन्त्र, परम सर्व,
परम एेशर्यस्वरूप, नित्यमुक्त, नित्य- निर्मल, निरतिशय ज्ञानशक्ति ओर क्रियाशक्छिमे सम्पत्र तथा सवपर् अनुग्रह करनेवाले
भगवान् महेश्वर परम शिव ही "पति" या ' पशुपति" है । महेश्वरे पच कृत्य है-मृष्टि, स्थिति, संहार, तिगोभाव्र तथा
अनुग्रह । यद्यपि विद्येश्वर इत्यादि मुक्त जीव भी शिवभावकरो प्रात हो जते है, किंतु ये सव स्वतन्त्र नहीं होते, अपितु
परमेश्चरके अधीन रहते है । उपासनाके लिये जहाँ परमेश्चर् रिवके खकार रूपका वर्णन है, वाँ भी उनका भगीर प्राक्त
((-0. 1\॥८1111(4/5511॥ 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
४०२
संक्षिप्त नारदपुराण
वर्णन करते है ।) शेव-महातन्त्रमे तीन पदार्थं ओर
चार पादोंका वर्णन हे, एेसा विद्वान् पुरुष कहते हें ।
भोग, मोक्ष, क्रिया ओर चर्या-ये शेवमहातन्त्रमे चार
पाद (साधन) कहे गये हे । पदार्थ तीन ही है- पशुपति,
पशु तथा पाश; इनमे एकमात्र शिवस्वरूप परमात्मा
ही "पशुपति ' हं ओर जीवको "पशु" कहा गया हे ।
नारद ! देखो, जवतक स्वरूपके अन्ञानको सूचित
करनेवाले मोह आदिसे सम्बन्ध बना रहता है, तवतक
इन सव जीवोको "पशु" संज्ञा मानी गयी हे। उनका
पशुत्व द्वैतभावसे युक्त है। इन पशुओके जो पाश
अर्थात् बन्धन है, वे पांच प्रकारके माने गये है।
उनमेसे प्रत्येकका लक्षण बताया जायगा । पशुके तीन
भेद है-' विज्ञानाकल', " प्रलयाकल' ओर “सकल '।
इनमे प्रथम अर्थात् विज्ञानाकल पशु" "मल" संयुक्त
(मलरूप पाशसे आबद्ध) होता है । दूसरा “ प्रलयाकल
पशु' 'मल' ओर “कर्म'--इन दो पारशोसे संयुक्त
(बद्ध) होता हे। तीसरा अर्थात् " सकल पशु" "मल",
` माया" तथा 'कर्म'-इन तीन पाशोसे वधा हुआ
कहा गया है। उक्त त्रिविध पशुम जो पहला-
विज्ञानाकल हे, उसके दो भेद होते है-' समप्त-
कलुष" ओर ' असमाप्तकलुष ' । दूसरे-प्रलयाकल
पशुके भी दो भेद कहे गये हें“ पक्र-मल'
ओर “अपक्र-मल' (अर्थात् पक्रपाशदय ओर
अपक्रपाशद्य) । विज्ञानाकल ओर प्रलयाकल ये
दोनों जीव (पशु) शुद्ध मार्गपर स्थित होते हैँ ओर
सकल जीव कला आदि तत्त्वोके अधीन होकर
विभिन्न लोकोमे कर्मानुसार प्राप्त हए तिर्यक््-मनुष्यादि
शरीरोमे भ्रमण करता है। पाश पांच प्रकारके
बताये गये है-'मलज, ' कर्मज “मायेय ' (मायाजन्य),
' तिरोधानशक्तिज' ओर ' विन्दुज'। जेसे भूसी
चावलको ढके रहती ठै, उसी प्रकार एक भी
' मल ' पुरुषको अनेक शक्ति- दृक् -शक्ति (ज्ञान)
ओर क्रियाशक्तिका आच्छादन कर लेता हे ओर
यही जीवात्माओंके लिये देहान्तरकी प्रा्िमें कारण
होता है। धर्म ओर अधर्मका नाम है कर्म, जो
विचित्र फल-भोग प्रदान करनेवाला है। यह
` कर्म प्रवाहरूपसे नित्य हे । बीजाङ्कर-न्यायसे इसको
स्थिति अनादि मानी गयी हे । इस प्रकार ये प्रथम
दो (मलज ओर कर्मज) पाश बताये गये । ब्रह्मन्।
अव मायेय" आदि पाशोंका वर्णन सुनो।
9 = ----
नहीं हे। वह निर्मल तथा कर्मादि बन्धनोसे नित्यमुक्त होनेके कारण शाक्त (शक्तिस्वरूप एवं चिन्मय) है । उपनिषदे
महे श्चरके मन्त्रमय स्वरूपका वर्णन है । शेवदर्शनमें यह बात स्पष्ट शब्दो कही गयी है-' मलाद्यसम्भवाच्छाक्तं
व्मु्नेतादृशं प्रभोः।' " तद्वपुः पञ्चभिर्मन््रैः 1" इत्यादि ।
पशु
जीवात्मा या क्षेत्रज्ञका ही नाम "पशु" है । पशु उसे कहते हँ जो पाशोद्रारा बंधा ठो-“ पाशनाच्च पशवः ।' जीव
भी पाशबद्ध है, इससे उसे "पशु" कहते हं । वह वस्तुतः अणु नहीं, व्यापक दै । नित्य है । ' आत्मनो विभुनित्यता"
यह शैवतन्त्रको स्पष्ट घोषणा है; परंतु पशु (जीव) दशमे यह परिच्छिन्न ओर सीमित शक्तिसे युक्त है, तथापि यह
` सांख्य ' के पुरुषकी भोति अकर्ता भी नहीं है; क्योकि पाशोसे मुक्त होकर शिवत्वको प्राप्त हो जानेपर यह भी
निरतिशय ज्ञानशक्ति ओर क्रियाशक्तिसे सम्पन्न हो जाता है । पशु तीन प्रकारका है-' विज्ञानाकल", "प्रलयाकल' तथा
` सकल '। (१) जौ परमात्माके स्वरूपको पहचानकर जप, ध्यान तथा संन्यासद्वारा अथवा भोगद्रारा कर्मोका क्षय
कर डालता है ओर कर्मोका क्षय हो जानेके कारण जिसको शरीर ओर इन्दिय आदिका कोई बन्धन नहीं रहता,
उसमं केवल मलरूपी पाश (बन्धन) रह जाता है, उसे विज्ञानाकल' कहते है । मल तीन प्रकारके होते
है-आणव-मल, कर्मज-मल तथा मायेय-मल। विज्ञानाकलमें केवल आणव मल रहता टै। वह विज्ञान
(तत्त्वज्ञान) -द्वारा अकल-कलारहित (कलादि भोग-बन्धनोसे शन्य) हो जाता है, इसलिये उसकी ' विज्ञानाकल'
संज्ञा होती है। (२) जिस जीवात्माके देह, इन्द्रिय आदि प्रलयकालमें लीन हो जाते है, इससे उसमें मायेय मल
तो नहीं रहता, परंतु आणव ओर कर्मज-ये दो मलरूपी पाश (बन्धन) रह जाते रै, वह प्रलयकालमें ही अकल
(कलारहित) होनेके कारण ' प्रलयाकल' कहलाता है । (३) जिस जीवात्मामें आणव, मायेय ओर कर्मज- तीनों
मल (पाश) रहते है, वह कला आदि भोग-बन्धनोसे युक्त होनैके कारण 'सकल' कहा गया है।
विज्ञानाकल पशु (जीव) -के भी दो भद है-' समाप्त-कलुष" ओर * असमाप्त-कलुष'। (१) जीवात्मा जो कर्म
((-0. 1/(111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
४०३
(' विन्दुज पाश अपरामुक्ति-स्वरूप है ओर | अनुग्रह करनेके लिये विश्चकी सृष्टि करते समय
शिव-स्वरूपकी प्राति करानेवाला हे, उसका स्वरूप
यह हे--) सत्. चित् ओर आनन्द जिनका स्वरूपभूत
वैभव हे, वे एकमात्र सर्वव्यापी सनातन परमात्मा ही
सवके कारण तथा सम्पूर्णं जीवोके पतिरूपसे विराज
रहे हे । जो मने तो आता है, किंतु प्रकट नर्ही होता
ओर संसारसे निवृत्ति (वैराग्य) प्रदान करता हे; तथा
दुक् -शक्ति ओर क्रियाशक्तिके रूपमे जो स्वयं ही
विद्यमान हे, वह उत्कृष्ट शेव तेज हे। इसके सिवा,
जिस शक्तिसे समर्थं होकर जीव परमात्माके समीप
दिव्य भोगसे सम्पन्न होता ओर पशु-समुदायकी
कोिसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है, परमात्माक
उस एकान्तस्वरूपा आद्या शक्तिको चिद्रूपा कहते हे ।
इसका प्रथम उन्मेष नादके रूपमे हुआ है, जो शान्ति
आदिसे युक्त तथा भुवन-स्वरूप है । विप्रवर ! वह
शक्ति- तत्तत सावयव बताया गया है । इससे जनशक्ति
ओर क्रियाशक्तिका तथा उत्कर्षं ओर अपकर्षका
प्रसार एवं अभाव होता है; अतः यह तत्त्व सदा
शिवरूप है । जहो दृक् -शक्ति तिरोहित होती है ओर
क्रियाशक्ति बद जाती हे, वह ईश्वर नामक तत्व
कहा गया है; जो समस्त मनोर्थोका साधक है
जहां क्रियाशक्तिका तिरोभाव ओर ज्ानशक्तिका
उद्रेक होता है, वह विद्याततत्त कहलाता दै। जो
सानस्वरूप एवं प्रकाशक है। नाद, विन्दु ओर
सकल-ये सत्-नामक तत्तवके आश्रित है । आठ
उस चिद्रूपा शक्तिसे उत्कर्षको प्राप्त हुआ ' विन्दु' दुक् | विद्येश्वरगण ईशततत्वके ओर सात करोड “मन््र' गण
(ज्ञान) ओर क्रिया-स्वरूप होकर शिव-नामसे प्रतिपादित
होता है, उसीको सम्पूर्ण तत्त्वोका कारण बताया गया
हे। वह सर्वत्र व्यापक तथा अविनाशी है। उसीमें
संनिहित हई इच्छा आदि सम्पूर्णं शक्तियों उसके
सकाशसे अपना-अपना कार्य करती है । मुने ! इसलिये
यह सबपर अनुग्रह करनेवाला है। जड ओर चेतनपर
विद्यातत्वके आश्रित हें । ये सब तत्व शुद्धमा्गके
नामसे कहे गये हैं । यहां ईश्वर साक्षात् निमित्त
कारण हैं। वे ही विन्दुरूपसे सुशोभित हो यहां
उपादानकारण वनते हैँ । पाँच प्रकारके जो पाश है
उनका कोई समय न
निश्चित क्रम नहीं हे; उनका व्यापार दैखकर ही
ध्वे के च्वि
होनेके कारण उनका कोई
करता है, उस प्रत्येक कर्मक तह मलपर जमती रहती है । इसी कारण उस मलका परिपाक नहीं होने पाता, किंतु
जव कर्मोका त्याग हो जाता है, तब तह न जमनेके कारण मलका परिपाक हो जाता है ओर जीवात्मा सरि कलुष
समाप्त हो जाते है, इसीलिये वह ' समाप्त-कलुष' कहलाता है। एेसे जीवात्मार्ओंको भगवान् आट प्रकारके ' विदयेश्र्
पदपर पहुंचा देते है, उनके नाम ये है-
" अनन्तश्चैव सृक्ष्मश्च तथैव च शिवोत्तमः। एकनेत्रस्तथवैकरुद्र्चापि
त्रिमूर्तिकः॥
श्रीकण्टश्च शिखण्डी च प्रोक्ता विद्येश्चरा इमे ।!
(१) अनन्त, (२) सूक्ष्म, (३) शिवोत्तम, (४) एकनेत्र, (५) एकरुद्र, (६) त्रिमूर्ति, (७) श्रीकण्ड ओर
(८) शिखण्डी ।
(२) " असमाप्त-कलुष' वे है, जिनकी कलुषराशि अभी समाप्त नहीं हुईं दै । एेसे जीवात्माओंको परमेश्वर मन्र' स्वरूप
दे देता है। कर्म तथा शरीरसे रहित किंतु मलरूपी पाशमें बंधे हए जीवात्मा ही मनत्र है ओर इनकी संख्या सात कडु
है। ये सब अन्य जीवात्मार्ओपर अपनी कृपा करते रहते टै । तत््व-प्रकाश नामक ग्रन्में उपर्युक्त विषयके संग्राहक शलोक
इस प्रकार है-
पशवस्त्रिविधाः प्रोक्ता विज्ञानप्रलयाकलौ सकलः । मलयुक्तस्तत्राद्यो मलकर्मयुतो द्वितोयः स्यात्।
मलमायाकर्मयुतः सकलस्तेषु द्विधा
आद्याननुगृह्य शिवो
भवेदाद्यः । आद्यः समाप्तकलुषोऽसमाप्तकलुषो द्वितीयः स्यात्।
तिदयेशत्वे नियोजयत्यष्रौ । मन्त्राश्च करोत्यपरान् ते चोक्ताः कोटयः सप्त॥
"प्रलयाकल' भी दो प्रकारक होते ई--' पक्तपाशद्रय' ओर ' अपक्रपाशद्रय '। (१) जिनके मल तथा कर्मरूपी दोनों
पाशोंका परिपाक हो गया है, वे ' पक्तपाशद्वय ' मोक्षको प्रास हो जते है । (२) " अपक्रपाशद्रय ' जीव पुयष्टक देह धारण
करके नाना प्रकारके कर्माको करते हुए नाना योनियमिं घूमा करते टै ।
"सकल ' जीवोके भी दौ भेद ह--' पक्र- कलुष ओर * अपक्र-कलुप'। (१) जैसे-जैसे जीव्रात्माके मल, कर्म
[1183 ] सं० ना० पु० १४--
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कयाय
०9
उनको कल्पना को जाती हे। वास्तवमें विचित्र
शक्तियोसे युक्त एक ही शिव नामक तत्त्व
विराजमान है। वह शक्तियुक्त होनेसे ' शाक्त" कहा
गया हे । अन्तःकरणकी वृत्तियोके भेदसे ही अनेक
प्रकारकी कल्पनार्एँ को गयी हे, प्रभु शिव जड-
चेतनपर अनुग्रह करने लिये विविध रूप धारण
करके अनादि मलसे आबद्ध जीवोपर कृपा करते
है । सबपर दया करनेवाले शिव सम्पूर्णं जीवोंको
भोग ओर मोक्ष तथा जडवर्गको अपने व्यापारमें
लगनेको शक्ति-सामर्थ्य देते हें । भगवान् शिवके
समान रूपका हो जाना ही मोक्ष है, यही चेतन
जीवोंपर ईशध्रका अनुग्रह हे। कर्म अनादि होनेके
कारण सदा वर्तमान रहते है; अतः उनका भोग
किये विना भी भगवत्कृपासे मोक्ष हो जाता है।
इसीलिये भगवान् शङ्करको अनुग्राहक (कृपा
करनेवाला) कहा गया हे । अविनाशी प्रभु जी्वोके
भोगके लिये सक्षम करणेद्वारा अनायास ही जगत्की
उत्पत्ति करते हं । कोई भी कर्ता किसी भी कार्यमें
उपादान ओर करणोके विना नहीं देखा जाता।
(अव “मायापाश'का प्रसङ्ग है-) यहाँ
शक्तियों ही करण हँ । मायाको उपादान माना गया
है। वह नित्य, एक ओर कल्याणमयी है । उसका
संक्षिप्त नारदपुराण
न आदि है न अन्त; वह माया अपनी शक्तिद्वारा
मनुष्यों ओर लोकोंकी उत्पत्तिका सामान्य कारण
हे। माया अपने कर्मो्वारा स्वभावतः मोहजनक
होती है। उससे भिन्न "परा माया" है, जो सूक्ष्म
एवं व्यापक है। इन विकारयुक्त कार्योसि वह
सर्वथा परे मानी गयी ह । विद्याके स्वामी भगवान्
शिवे जीवके कर्मोको देखकर अपनी शक्तियोसे
मायाको क्षोभमें डालते ओर जीवोके भोगके लिये
मायाके द्वारा ही शरीर एवं इन्दरियोकी सृष्टि करते
है । अनेक शक्तियोसे सम्पन्न माया पहले कालतत्वकी
सृष्टि करती है। भूत, भविष्य ओर वर्तमान
जगत्का संकलनं तथा लय करती है! तदनन्तर
माया नियमन-शक्तिस्वरूपा नियतिको सृष्टि करती
हे । यह सबको नियममें रखती है; इसलिये नियति
कही गयी है। तत्पश्चात् सम्पूर्णं विश्वको मोहरे
डालनेवाली आदि-अन्तरहित नित्य माया "कला!
ततत्वको जन्म देती है; क्योकि एक ओरसे मनुष्योके
मलक कलना करके वह उनमें कर्तृत्व-शक्ति
प्रकट करती है; इसीलिये इसका नाम कला है ।
यह कला ही ' काल' ओर “ नियति" के सहयोगसे
पृथ्वीपर्यन्त अपना सारा व्यापार करती है। वही
पुरुषको विषयोंका दर्शन अनुभव करानेके लिये
तथा माया-इन पाशोका परिपाक बढता जाता. ठै, वैसे-वैसे ये सब पाश शक्तिहीन होते जाते है । तब ये पक्त-
कलुष जीवात्मा “मन्त्रश्वर' कहलाते है। सात करोड मन्त्ररूपी जीव-विशेषोके, जिनका ऊपर वर्णन हो चुका है,
अधिकारी ये ही ११८ मन्त्रेश्वर जीव है । (२) अपक्र-कलुप जीव भवकूपमें गिरते है ।
पाश
नारदपुराणमें शैव-महातन्त्रको मान्यताके अनुसार पाँच प्रकारके पाश बताये गये ह -- ८१) मलज, (२)
कर्मज, (३) मायेय (मायाजन्य), (४) तिरोधान-शक्तिज ओर (५) विन्दुज 1 आधुनिक शैवदर्शनमें चार प्रकारके
पाशोका उदेख है- मल, रोध, कर्म तथा माया । रोधशक्ति या तिरोधानशक्ति एक ही वस्तु है । “ विन्दु " मायास्वरूप
है, बह “शिव -तत्त्व ' नामसे भी जानने योग्य है। यद्यपि शिवपदप्राप्िरूप परम मोक्षकी अपेक्षासे वह भी पाश ही
है, तथापि विदयेश्वरादि पदकी प्राति्मे परम हेतु होनेके कारण विन्दु-शक्तिको “ अपरा मुक्ति" कहा गया है, अतः
उसे आधुनिक शैवदर्शनमें "पाश" नाम नहीं दिया गया है । इसलिये यहां शेष चार पाशों (मल, कर्म, रोध ओर
माया) -के ही स्वरूपका विचार किया जाता है-(१) जो आत्माकी स्वाभाविक ज्ञान तथा क्रिया-शक्िको ठक ले,
वह “मल ' (अर्थात् अज्ञान) कहलाता है । यह मल आत्मस्वरूपका केवल आच्छादन ही नहीं करता; किंतु जीवात्माको
बलपूर्वक दुष्कर्मेमिं प्रवृत्त करनेवाला पाश भी यही है। (२) प्रत्येक वस्तुमे जो सामर्थ्यं है, उसे शिव-शक्ति" कहते
है, जेसे अग्रिमे दाहक-शक्ति। यह शक्ति जैसे पदार्थमें रहती है, वैसा ही भला, बुरा स्वरूप धारण कर लेती ह; अतः
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पूर्वभाग-तृतीय पाद
प्रकाशस्वरूप ‹ विद्या" नामक तत्त्व उत्पन्न करती
है। विद्या अपने कर्मसे ज्ञानशक्तिके आवरणका
भेदन करके जीवात्माओंको विषयोंका दर्शन कराती
हे, इसलिये वह कारण मानी गयी है; क्योकि वह
विद्या भोग्य उत्पन्न करती है, जिससे पुरुष
उद्भुद्धशक्ति होकर परम करणके द्वारा महत्-तत्त्व
आदिको प्रेरित करके भोग्य, भोग ओर भोक्ताकौ
उद्रावना करता है। अतः वह विद्या परम करण
हे। भोक्ता पुरुषको भोग्य वस्तुकी प्रतीति करानेसे
विद्याको !करण' कहा गया है । बुद्धिके द्वारा जो
चेतन-जीवको विषयका अनुभव होता है, उसीको
' भोग" कहते हें । संक्षेपसे विषयाकारा बुद्धि ही
सुख-दुःख आदिके रूपमे परिणत होती है।
भोक्ताको भोग्य वस्तुका अनुभव अपने-आप ही
होता है। विद्या उसमें सहायकमात्र होती हे।
यद्यपि बुद्धि सूर्यकी भाति प्रकाशमात्र करनेवाली
हे, तथापि कर्मरूप होनेके कारण उसमें स्वयं
कर्तृत्व नहीं है। वह करणान्तरोकी अपेक्षासे ही
पुरुषको विषयोंका अनुभव करानेमें समर्थ होती
हे । पुरुष स्वयं ही करण आदिसे सम्बन्ध स्थापित
करता ओर भोगोकी उत्कण्ठासे स्वयं ही बुद्धि
०८५
आदिको प्रेरित करता है। साथ ही उन बुद्धि
आदिको शुभाशुभ चेष्टाओंसे प्राप्त होनेवाले फलका
उसीको भोग करना पड़ता ठै । इसलिये पुरुषका
कर्तृत्व सिद्ध होता है। यदि उसमें कर्तृत्व न
स्वीकार किया जाय तो उसके भोक्रृत्वका कथन
भी व्यर्थं होता है। इसके सिवा, प्रधान पुरुषके
द्वारा आचरित सब कर्म निष्फल हो जाता। यदि
पुरुष करण आदिका प्रेरक न हो ओर उसमें
कर्तत्वका अभाव हो तो उसके द्वारा भोग भी
असम्भव ही हं । इसलिये पुरुष ही यहाँ प्रवर्तक
है। उसका करण आदिका प्रेरक होना विद्याके
द्वारा ही सम्भव माना गया है।
तदनन्तर कला दृद वञ्रलेपके सदृश रागक
उत्पन्न करती है, जिससे उस वज्रलेप-रागयुक्त
पुरुषमें भोग्य वस्तुके लिये क्रियाप्रवृत्ति उत्पत
होती है, इसलिये इसका नाम राग है। इन सव
तत्त्वोंसे जब यह आत्मा भोक्रृत्व-दशाको पहुंचाया
जाता है, तब वह पुरुष नाम धारण करता दै।
तत्पश्चात् कला ही अव्यक्त प्रकृतिको जन्म देती
है । जो पुरुषके लिये भोग उपस्थित करती है, वह
अव्यक्त ही गुणमय सप्तग्रन्थिः-विधानका कारण
पाशमें रहती हई यह शक्ति जब आत्माके स्वरूपको ढकं लेती है, तब यह ' रोध-शक्ति' या ' तिरोधान-पाश'
कहलाती है। इस अवस्थामं जीव शरीरको आत्मा मानकर शरीरके पोषणमें लगा रहता है, आत्माके उद्धारका प्रयत्न नही
करता। (३) फलक इच्छासे किये हुए “ धर्मधिर्म ' रूप कर्मोको ही ' कर्मपाश' कहते है। (४) जिस शक्तिम प्रलयके समय
सब कुछ लीन हो जाता है तथा सृष्टिकि समय जिस्मेसे सब कुछ उत्पन्न हो जाता है, वह ' मायापाश ' है। अतः इन पाशंपिं
बधा हुआ पशु जब. तच्ज्ञानद्राग इनका उच्छेद कर डालता है, तभी वह परम शिवतत्व अर्थात् पशुपतिपदको प्राप होता है।
दीक्षा
दीक्षा ही शिवत्व-प्रा्िका साधन है । सर्वानुग्राहक परमेश्वर ही आचार्य-शरीरमें स्थित होकर दीक्षाकरणद्रारा जीवको
परम शिवतत्त्वको प्राति कराते है; एसा ही कहा भी है-
“योजयति परे तत्त्वे स दीक्षयाऽऽचार्यमूर्तिस्थः।'
" अपक्र-पाशद्वय प्रलयाकल' जीव तथा * अपक्त-कलुप सकल ' जीव जिस पुर्यष्टक देहको धारण करते है, वह
पञ्चभूत तथा मन्, बुद्धि, अर्हंकार-इन आठ तत्त्वोसे युक्त होनेके कारण पुर्यष्टक कहलाती हे । पूर्यष्टक शरीर छत्तीस
तत्त्वोसे युक्त होता है । अन्तर्भोगके साधनभूत कला, काल, नियति, विद्या, राग, प्रकृति ओर गुण-ये सात तत्व, पञ्चभूत,
पञ्चतन्मात्रा, दस इद्धया, चार अन्तःकरण ओर पाच शब्द आदि विपय-ये छत्तीस तत्त है 1 अपक्रपाशद्रय जीवं
जो अधिक पुण्यात्मा है, उन्हें परम दयालु भगवान् महेश्वर भुवनेश्वर या लोकपाल बना दैते है।
नारदपुराणके इस अध्यायमं इन्हीं उपर्युक्त तर्वोका क्रम या व्युत्रमसे विवेचन किया गया दै। पाटकोकी
मनोयोगपूर्वक इसे पटना ओर हदयद्गम करना चाद्ये ।
१. कला, काल, नियति, विद्या, रग, प्रकृति ओर गुण-ये सात ग्रन्िर्यो है, यदी आन्तरिकं भोग~-साधन कटे गये है!
((-0. 1\॥(1114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
£ ०६
संक्षिप्त नारदपुराण
है। इसमें गुणोंका विभाग नहीं हे; जैसे आधारमें
पृथ्वी आदिके भागका विभाग नहीं होता। उनका
जो आधार हे, वह भी अव्यक्त ही कहलाता है।
गुण तीन ही हें। उनका अव्यक्तसे ही प्राकस्य
होता हे। उनके नाम है- सत्व, रज ओर तम।
गुणोसे ही बुद्धि इन्द्रिय-व्यापारका नियमन ओर
विषयोका निश्चय करती हे । गुणसे त्रिविध कर्मोकि
अनुसार बुद्धि भी सात्विक, राजस ओर तामस-
भेदसे तीन प्रकारक कही गयी हे । महत्-तत्त्वसे
अहकार उत्पन्न होता हे, जो अहं भावको वृत्तिसे
युक्त होता हे । इस अहंकारके ही सम्भेद (इद्धिय
ओर देवता आदिके रूपमे परिणति) -से विषय
व्यवहारमें आते रहं । अहंकार सत्त्वादि गुणोके
भेदसे तीन प्रकारका होता है। उन तीनोके नाम
हे- तेजस, राजस ओर तामस अहंकार । उनमें
तेजस अहंकारसे मनसहित जानेन्द्ियाँ प्रकर हई
हे । जो सत्त्वगुणके प्रकाशसे युक्त होकर विषयोंका
बोध कराती हे । क्रियाके हेतुभूत राजस अहंकारसे
कर्मन्दियां उत्पन्न होती हैँ । तामस अहंकारसे पाँच
तन्मात्राएं उत्पन्न होती हैँ, जो पाचों भृतोंकी
उत्पत्तिमें कारण हैं । इनमे मन इच्छा ओर संकल्पके
व्यापारवाला है । अतः वह दो विकारोसे युक्त है।
वह वाह्य इद्धियोंका रूप धारण करके, जो उसके
लिये सर्वथा उचित है, सदा भोक्ताके लिये
भोगका उत्पादक होता है। मन अपने संकल्पसे
हदयके भीतर स्थित रहकर इद्ियोमें दिषय-
ग्रहणको शक्ति उत्पन्न करता है; इसलिये उसे
अन्तःकरण कहते है । मन, बुद्धि ओर अहंकार- ये
अन्तःकरणके तीन भेद हं। इच्छा, बोध ओर
संरम्भ (गर्वं या अहंभाव)-ये क्रमशः इनकी
तीन वृत्तियों हे ।
कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा ओर नासिका-ये
जानेन्दरियों हं । मुने ! शब्द आदि इनके ग्राह्य-विषय
जानने चाहिये । शब्द, स्पर्श, रूप, रस ओर गन्ध-
ये शब्दादि विषय माने गये हें । वाणी, हाथ, पेर,.
गुदा ओर लिङ्ग-ये पोच कर्मेद्िर्यां है। ये
बोलने, ग्रहण करने, चलने, मल-त्याग करने
ओर मेथुनजनित आनन्दकी उपलब्धिरूपी कर्मक
सिद्धिके करण हें; क्योकि कोर भी क्रिया
करणोके विना नहीं हो सकती । कार्यम लगाकर
दस प्रकारके करणोद्वारा चेष्टा की जाती है।
व्यापक होनेके कारण कार्यका आश्रय लेकर सब
इन्द्रियो चेष्टा करती हे, इसलिये उनका नाम करण
हे। आकाश, वायु, तेज, जल ओर पृथ्वी-ये
पोच तन्मात्रा हे । इन तन्मात्राओंसे ही आकाश
आदि पोच भूत प्रकट होते है, जो एक-एक
विशेष गुणके कारण प्रसिद्ध हैँ । शब्द आकाशका
मुख्य गुण हे; किंतु यह रपोँचों भूतोमें सामान्य
रूपसे उपलब्ध होता हे । स्पर्श वायुका विशेष गुण
हे; किंतु वह वायु आदि चारों भूतोमें विद्यमान ह ।
रूप तेजका विशेष गुण है, जो तेज आदि तीनों
भूतोमे उपलब्ध हे । रस जलका विशेष गुण है, जो
जल ओर पृथ्वी दोनोमें विद्यमान है तथा गन्ध
नामक गुण केवल पृथ्वीमें ही उपलब्ध होता हे।
इन रपोचों भूरततोके कार्य क्रमशः इस प्रकार
ठे- अवकाश, चेष्टा, पाक, संग्रह ओर धारण।
वायुम न शीत स्पर्शं है न उष्ण, जलमें शीतल
स्पर्श हे, तेजमें उष्ण स्पर्शं हे, अग्रिमे भास्वर
शुक्लरूप हं ओर जलमें अभास्वर शुक्ल । पृथ्वीमं
शुक्ल आदि अनेक वर्ण हँं। रूप केवल तीन
भूतोमें हे। जलमे केवल मधुर-रस है ओर
पृथ्वीम छः प्रकारका रस हे । पृथ्वीमें दो प्रकारक
गन्ध कही गयी है- सुरभि तथा असुरभि। तन्मात्राओंमं
उनके भूताके ही गुण हैं । करण ओर पोषण यह
भूतसमुदायको विशेषता है । परमात्मतत्व निर्विशेष
हे । ये पाचों भूत सब ओर व्याप्त है । सम्पूर्णं चराचर
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पूर्वभाग-तृतीय पाद
जगत् पञ्चभूतमय हे । शरीरम जो इन पाचों
संनिवेश है, उसका निरूपण किया जाता है।
देहके भीतर जो हड़ी, मांस, केश, त्वचा, नख
ओर दात आदि हे, वे पृथ्वीके अंश हें । मूत्र, रक्त,
कफ, स्वेद ओर शुक्र आदिमे जलकी स्थिति है।
हदयमें, नेत्रम ओर पित्तम तेजकी स्थिति हे;
क्योकि वर्हां उसके उष्णत्व ओर प्रकाश आदि
धर्मोका दर्शन होता हे। शरीरम प्राण आदि
वृक्तियोके भेदसे वायुकी स्थिति मानी गयी है।
सम्पूर्णं नाड्यां तथा गर्भाशयमे आकाशतत्तव व्याप्त
हे। कलासे लेकर पृथ्वीपर्यन्त यह तत््वसमुदाय
सम्पूर्णं ब्रह्माण्डका साधन हे । प्रत्येक शरीरम भी
यह नियत हे। भोग-भेदसे इसका निश्चय किया जाता
हे। इस प्रकार प्रत्येक पुरुषे नियति-कला आदि
तत्त्व कर्मवश प्राप्त हए सम्पूर्ण शरीरोमें विचरते है ।
यह ' मायेय पाश' कहलाता हे। जिससे यह सम्पूर्ण
जगत् आवृत हे। पृथ्वीसे लेकर कलापर्यन्त सम्पूर्ण
तत्त्व-समुदाय अशुद्धमार्ग माना गया हे।
(अव “निरोध-शक्तिज' पाशका वर्णन है--)
भूमण्डले वह स्थावर-जद्गमरूपसे विद्यमान ह।
पर्वत ओर वृक्ष आदिको स्थावर कहते है । जङ्गमके
तीन भेद है- स्वेदज, अण्डज ओर जरायुज।
चराचर भूतोमें चोरासी लाख योनियां हें । उन समं
भ्रमण करता हुआ जीव कभी कर्मवश मनुष्य-शरीर
प्राप्त कर लेता है, जो सवसे उत्तम ओर सम्पूर्ण
पुरुषार्थोका साधक हे । उसमें भी भारतवर्षमें त्राह्यण
आदि द्विजोके कुलमं तो महान् पुण्यसे ही जन्म
होता है । एेसा जन्म अत्यन्त दुर्लभ हे। जन्म इस
प्रकार होता हे । पहले स्त्री-पुरुपका संयोग होता है
फिर रज-वीर्यके योगसे एक विन्दु ग्भाशयमं प्रवेश
करता है । यह विन्दु द्रयात्मक होता है-इसमे स्त्री
ओर पुरुष-दोनोके रज-वीर्यका सम्मिश्रण होता
है। उस समय रजकी अधिकता होनेपर कन्याका
जन्म होता है ओर वीर्यकी मात्रा अधिक हीनेपर
पुत्रको उत्पत्ति होती है। उसमें मल, कर्म॑ अदि
४०७
पाशसे वेधा हआ कोई आत्मा जीवभावको प्राप्त
होता हे, वह (मल, माया ओर कर्म त्रिविध पाशसे
युक्त होनेके कारण) ' सकल ' कहा गया है । गभमिं
माताके खाये हए अन्न-पान आदिसे पोपित होकर
उसका शरीर पक्ष-मास आदि कालसे बढता रहता
हे। उसका शरीर जरायुसे ठका होता है ओर अनेक
प्रकारके दुःख आदिसे उसे पीड़ा प्हुंचती रहती है।
इस प्रकार गर्भमं स्थित जीव अपने पूर्वजन्मके
शुभाशुभ कर्मोका स्मरण करके वार्-वार दुःखमग्र
एवं पीडित होता रहता है। फिर समयानुसार वह
बालक स्वयं पीडित होकर माताको भी पीड़ा देता
हआ नीचे मुंह किये योनियन्त्रसे बाहर् निकलता
हे। बाहर आकर वह क्षणभर निशे रहता ह । फिर
रोना चाहता है । तदनन्तर क्रमशः प्रतिदिन बढता
हुआ बाल, पीगण्ड आदि अवस्थाओंको पार करता
हुआ युवावस्थामे जा पर्हैचता है। इस लोकपें
देहधारियोके शरीरका इसी क्रमसे प्रादुर्भाव होता है।
जो सम्पूर्ण लोकोंका उपकार करनेवाले दुर्लभ
मानव-जीवनको पाकर अपने आत्माका उद्धार नहीं
करता, उससे बढ़कर पापी यही कौन है 2 आहार
निद्रा, भय ओर मेथुन-यह सम्पूर्णं पशु आदि
जीवेकि लिये सामान्य कहा गया है। जो मूर्खं इन्हीं
चार वातेमें फसा हआ हे, वह आत्महत्यारा है । अपने
वन्धनका उच्छेद करना यह मनु्योका विशेष धर्म हे।
ब्रच्धनाशव्छा उपाय
पाशवन्धनका विच्छेद दीक्षासे ही होता है
अतः बन्धनका विच्छेद करनेके लिये मन्त्रदीक्षा
ग्रहण करनी चाहिये । दीक्षा एवं स्रान-शक्तिसे
अपने वन्धनका नाश करके शुद्ध आत्मा नामसे
स्थित हुआ पुरुप निर्वाणपद (मोक्ष)-को प्राप्त
होता है। जो अपनी शक्तिस्वरूपा दृष्टि भगवान्
शिवका ध्यान एवं दर्शन करता है ओर शिवमन्त्रोसे
उनको आराधनामें तत्पर रहता टै, वह अपना ओर
दूसराका हितकारी दै । शिवरूपी सूर्यकी शक्तिरूपी
किरणस समर्थं हृं चैतन्यदुष्टिकि द्वारा पुरूप
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 6810011
४०८
आवरणको अपनेमें लीन करके शक्तिं आदिके
साथ शिवका साक्षात्कार करता है । अन्तःकरणकी
जो बोध नामक वृत्ति है, वह निगड (बेड)
आदिकी भोति पाशरूप होनेके कारण महेश्वरको
प्रकाशित करनेमे समर्थं नहीं होती। दीक्षा ही
पाशका उच्छेद करनेमे सर्वोत्तम हेतु हे, अतः
शास्त्रोक्त विधिसे मन्त्रदीक्षाका आचरण करना
चाहिये । दीक्षा लेकर अपने वर्णके अनुरूप सदाचारमें
तत्पर रहकर नित्य-नेमित्तिक कर्मोका अनुष्ठान
करना चाहिये। अपने वर्ण तथा आश्रम-सम्बन्धी
आचारोका मनसे भी लङ्गन न करे। जो मानव
जिस आश्रममें दीक्षित होकर दीक्षा ले, वह उसीमें
रहे ओर उसीके धर्मोका निरन्तर पालन करे । इस
प्रकार किये हए कर्म भी बन्धनकारक नहीं होते।
मन्त्रानुष्ठानजनित एक ही कर्म फलदायक होता
हे। दीक्षित पुरुष जिन-जिन लोकोके भोगोंकी
इच्छा करता हे, मन््राराधनकी सामर्थ्यसे वह उन
सबका उपभोग करके मोक्ष प्राप्त कर लेता दै। जो
संक्षिप्त नारदपुराण
मनुष्य दीक्षा ग्रहण करके नित्य ओर नैमित्तिक
कर्मोका पालन नहीं करता, उसे कुछ कालतक
पिशाचयोनिमें रहना पड़ता हे। अतः दीक्षित पुरुष
नित्य-नैमित्तिक आदि कर्म अवश्य करे। नित्य-
नेमित्तिक आचारका पालन करनेवाले मनुष्यको
उसकी दीक्षामें त्रुटि न आनेके कारण तत्काल मोक्ष
प्राप्त होता हे। दीक्षाके द्वारा गुरुके स्वरूपमें स्थित
होकर भगवान् शिव सबपर अनुग्रह करते हं । जो
लोक-परलोकके स्वार्थे आसक्त होकर कृत्रिम
गुरुभक्तिका प्रदर्शन करता है, वह सब कुछ
करनेपर भी विफलताको ही प्राप्त होता है ओर
उसे पग-पगपर प्रायश्चित्तका भागी होना पडता
हे। जो मन, वाणी ओर क्रियाद्वारा गुरुभक्तिमें
तत्पर हे, उसे प्रायश्चित्त नहीं प्राप्त होता ओर पग-
पगपर सिद्धि लाभ होता हे । यदि शिष्य गुरुभक्तिसे
सम्पन्न ओर सर्वस्व समर्पण करनेवाला हो तो
उसके प्रति मिथ्या मन्त्रका प्रयोग करनेवाला गुरु
प्रायधित्तका भागी होता हेः । (पूर्व° ६३ अध्याय)
१ 7 |
१. इस ' तृतीय पाद" म अधिकांश सकाम अनुष्का प्रसङ्ग है। इसमे देवताओकि तथा भगवानूके विभिन्न स्वरूपोके
ध्यान-पूजनका निरूपण है तथा आराधनकी सुन्दर-सुन्दर विधियां बतलायी गयी है । उन विधियेकि अनुसार श्रद्धा-
विश्चासपूर्वक अनुष्ान करनेसे उदल्िखित फल अवश्य मिलता है । जसे विविध तार्पोकी निवृत्ति तथा इष्ट पदार्थौकी प्रापिके लिये
अन्यान्य आधिभौतिक साधन है, वैसे ही ये आधिदैविक साधन भी है एवं ये भौतिक साधनोकी अपेक्षा अधिक निर्दोष तथा
सहज ह ओर प्रतिवन्धकका नाश करके नवीन प्रारव्धके निर्माणे हेतु होनेके कारण ये उनकी अपेक्षा अधिक लाभप्रद हैँ ही।
ओर स्वयं भगवान्का तो सकाम आराधन करनेपर (यदि वे उचित समञ्चं तो कामनाकी पूर्तिं करके अथवा पूर्ति न करके भी)
अन्तःकरणकी शुद्धिद्वारा अन्तमें अपनी प्राति करा देते हँ, इस दृष्टिसे इस प्रसद्गकी निश्चय ही बड़ी उपादेयता है।
तथापि अल्पायु मनुष्यके लिये यह विचारणीय है कि अपने जीवनको क्या सांसारिक भोगपदार्थोकी प्रा्िके प्रयत्न ओर्
उनके उपभोगमें लगाना ही इष्ट है 2 मनुष्य-जीवन क्षणभंगुर है ओर वह है केवल भगवत्म्रापिके लिये ही । संसारके भोग
तो प्रत्येक योनिमें ही प्रारव्धानुसार पाप्त होते है ओर उनका उपभोग भी जीव करता ही है। मनुष्य-जीवन भी यदि उन्ही
क्षणभंगुर नाशवान्, दुःखयोनि ओर जीवको जन्म-मरणके चक्रमे डालनेवाले भोगपदा्थकि लिये सकाम उपासनामें ही लगा
दिया जाय तो यह लुद्धिमानीका कार्य नहीं है। जो कृपामय भगवान् परम दुर्लभ मोक्षको या स्वयं अपने-आपको देनेके
लिये प्रस्तुत है, उनसे दुःखपरिणामी ओर अनित्य भोग मगना भगवानूके तत्त्वको ओर भक्तिके महत्वको न समञ्जना ही
है। जो पुरुष किसी वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छासे भगवानूको भजता है, उसका ध्येय वह वस्तु है, भगवान् नहीं है। वह
वस्तु साध्य है ओर भगवान् तथा उनकी भक्ति साधन है। यदि किसी मद्गलकारी कारणवश ही उसके अभीष्टकी प्रतिमं
देर होगी तो बह भगवानूकी भक्तिको छेड़ दे सकता है। अतएव सकाम भावे की हुई उपासना एक प्रकारसे काम्य वस्तुकी
ही उपासना है, भगवान्की नहीं । इस बातको भली भोति समञ्च लेना चाहिये ओर अपनी स्चिकरे अनुसार भगवान्को उपासना
इस प्रसद्भमें आयी हुई पद्धतिके अनुकूल अवश्य करनी चाहिय, पर वह करनी चाहिये- निष्काम प्रमभावसं केवल
भगवानूकी प्रसन्नताके लिये ही । इसीमें मनुप्य-जन्मकी सार्थकता हे ।
इसके अतिरिक्त यह बात भी है कि सकाम अनुषटानका एल प्रतिबन्धक की प्रबलता ओर सरलताक अनुसार
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 8118811 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद्
2०९
मन्त्रके सम्बन्धे अनेक ज्ञातव्य बाते, मन्त्रके विविध दोष तथा उत्तम आचार्यं
एवं शिष्यके लक्षण
सनत्कुमारजी कहते है-- अब मं जीवोंके
पाश-समुदायका उच्छेद करनेके लिये अभीष्ट
सिद्धि प्रदान करनेवाली दीक्षा-विधिका वर्णन
करूगा, जो मन्त्रोको शक्ति प्रदान करनेवाली है।
दीक्षा दिव्यभावको देती है ओर पापोंका क्षय
करती है। इसीलिये सम्पूर्ण आगमोके विद्वानोने
उसे दीक्षा कहा है। मननका अर्थ हे सर्वज्ञता ओर
त्राणका अर्थ हे संसारी जीवपर अनुग्रह करना।
इस मनन ओर त्राणधर्मसे युक्त होनेके कारण
मन््रका मन्त्र नाम सार्थक होता हे।
मनत्रोके लिंगभेद
मन्त्र तीन प्रकारके होते है-स्त्री, पुरुष ओर
नपुंसक । स्त्री-मन्त्र वे हं जिनके अन्तमं दो "ठ"
अर्थात् ' स्वाहा" लगे हों। जिनके अन्तमें “हुम्!
ओर ' फट्" है वे पुरुष-मन्त्र कहे गये हैं । जिनके
अन्तमें ' नमः' लगा होता हे, वे मन्त्र नपुंसक हे ।
इस प्रकार मन्त्रकी जातियों बतायी गयी ह । सभी
मन्त्रोके देवता पुरुष हैँ ओर सभी विद्याओंको स्त्री
देवता मानी गयी है। वे त्रिविध मन्त्र छः कर्मोमिंः
प्रत्युक्त होते हे । जिसमें प्रणवान्त रेफ (रां) ओर
स्वाहाका प्रयोग हो, वे मन्त्र आग्रेय (अग्निसम्बन्धी )
कहे गये हें । मुने! जो मन्त्र भृगुबीज (सं) ओर
पीयूष-वीज (वं)-से युक्त है, वे सौम्य
(सोमसम्बन्धी) कहे गये हे । इस प्रकार मनीषी
पुरुषोको सभी मन्त्र अग्रीषोमात्मक जानने चाहिये ।
जव शास पिङ्गला नाड़ीमें स्थित हो अर्थात्
दाहिनी सस चलती हो तो आग्रेय मन्त्र जाग्रत्
होते है ओर जब श्वास इडा नाड़ीमें स्थित हो
अर्थात् वायीं सांस चलती हो तो सोम-सम्बन्धी
मन्त्र जागरूक होते हे । जब इडा ओर पिङ्गला
दोनों नाडिर्योमे सांस चलती हो अर्थात् वायां ओर
दाहिना दोनों स्वर समानभावसे चलते हों तो सभी
मन्त्र जाग्रत् होते है । यदि मन्त्रके सोते समय
उसका जप किया जाय तो वह अनर्थरूप फल
देनेवाला हे । प्रत्येक मन््रका उच्चारण करते समय
उनका श्चास रोककर उच्चारण न करे। अनुलोमक्रममें
विन्दु (अनुस्वार) -युक्त ओर विलोमक्रममें
विसर्गसंयुक्त मन्त्रोका उच्चारण करे। यदि जपा
हुआ मन्त्र देवताको जाग्रत् कर सका तो वह शीघ्र
सिद्धि देनेवाला होता है ओर उस मालासे जपा
हुआ दुष्ट मन्त्र भी सिद्ध होता है। क्रूर कर्ममं
आग्नेय मन्त्रका उपयोग होता है ओर सोमसम्बन्धी
मन्त्र सौम्य फल देनेवाले होते हैं । शान्त, जान
ओर अत्यन्त रोद्र-ये मन्त्रोकी तीन जातिया ह।
विलम्बसे या शीघ्र होता है। एक आदमीको किसी अमुक वस्तुको या स्थितिकी आवश्यकता है । वह उसके लिये
सकाम उपासना करता है । यदि उस वस्तु या स्थितिकौ प्रातिमें बाधक पूर्वजन्मका कर्म बहुत अधिक प्रबल
होता है तो एक ही अनुष्ठानसे अभीष्ट फल नहीं मिलता। बार-बार अनुष्ठान करने पड़ते है । आजकलके सकामी
पुरुषे इतना धैर्य नहीं हो सकता ओर फलतः वह देवतामें ही अविश्वास कर यैठता है तथा उसकी अवज्ञा
करने लगता है, इससे लाभके बदले उसको उलटी हानि हो जाती है। फिर सकाम साधना वही सफल होती
है जिसमें विधिका पृरा-पूरा साद्गोपाङ्ग पालन दुआ हो तथा कर्म, देवता ओर फलम पूर्णं श्रद्धा हो। विधि
ओर श्रद्धाके अभावमें भी फल नहीं होता ओर आजके युगके मनुष्योमें अधिकांश एेसे हँ जो मनमाना फल तो
तुरंत चाहते है, पर श्रद्धा ओर विधिकौ आवश्यकता नहीं समद्धते। अतः उनको भी उक्त फल नहीं मिलता। इन
सव दृष्टियोसे भी सकामभावमे देवतामे, देवाराधनमं अश्रद्धातक होनेको सम्भावना रहती है, फिर यदि कहीं कुछ
फल मिलता भी है तो वह अनित्य, क्षणभंगुरं ओर दुःख दनैवराला ही होता है। अतएव वुद्धिमान् पुरुषको सकाम
भावका सर्वधा त्याग ही करना चादिये।-सम्पादक
१. शान्ति, वश्य, स्तम्भन, द्वेष, उच्वाटन ओर मारण-ये छः कर्मं ह ¦ (मन्त्रमहोदधि)
((-0. 1/८11114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
९०
शान्तिजातिसमन्वित शान्त मन्त्र भी "हं फट्" यह
पल्छव जोडनेसे रौद्र भाव धारण कर लेता है।
म्रोके दोष
छिन्नता आदि दोपोसे युक्त मन्त्र साधककी
रक्षा नहीं कर पाते। छिन्न, रुद्ध, शक्तिहीन,
पराड्मुख, कर्णहीन, नेत्रहीन, कोलित, स्तम्भित,
द्ग्ध, त्रस्त, भीत, मलिन, तिरस्कृत, भदित,
सुषुप्त, मदोन्मत्त, मूच्छित, हतवीर्य, भ्रान्त, प्रध्वस्त,
बालक, कुमार, युवा, प्रो, वृद्ध, निस्त्रिशक,
निर्बीज, सिद्धिहीन, मन्द, कूट, निरंशक, सत्वहीन,
केकर, बीजहीन, धूमित, आलिद्धित, मोहित,
क्षुधार्त, अतिदीप्त, अङ्गहीन, अतिक्रुद्ध, अतिक्रूर,
व्रीडित (लज्ित), प्रशान्तमानस, स्थानभ्रष्ट, विकल,
अतिवृद्ध, अतिनिःसनेह तथा पीडित-ये (४९)
मन्त्रके दोष बताये गये हें । अव में इनके लक्षण
वतलाता हूं। जिस मन्त्रके आदि, मध्य ओर
अन्तमं संयुक्त, वियुक्त या स्वरसहित तीन-चार
अथवा पोच बार अग्निवीज (रं)-का प्रयोग हो,
वह मन्त्र छिन्न' कहलाता हे। जिसके आदि,
मध्य ओर अन्तम दो वार भूमिबीज (लं)-का
उच्चारण होता हो उस मन््रको !रुद्ध' जानना
चाहिये। वह बडे क्लेशसे सिद्धिदायक होता हे ।
प्रणव ओर कवच (हुं) ये तीन बार जिस मन्त्रमें
आये हों वह लक्ष्मीयुक्त होता है। एेसी लक्ष्मीसे
हीन जो मन्त्र है उसे ' शक्तिहीन" जानना चाहिये।
वह दीर्घकालके बाद फल देता है । जहां आदिमें
कामबीज, (क्लीं), मध्यमे मायाबीज (हीं) ओर
अन्तमें अङ्कश बीज (क्रो) हो, वह मन्त्र ' पराङ्मुख '
जानना चाहिये । वह साधकोंको चिरकालमें सिद्धि
देनेवाला होता है । यदि आदि, मध्य ओर अन्तमं
सकार देखा जाय, तो वह मन्त्र * बधिर्' (कर्णहीन)
संक्षिप्त नारदपुराण
कहा गया है । वह बहुत कष्ट उठानेपर थोडा फल
देनेवाला हे । यदि पञ्चाक्षर-मन्त्र हो, किंतु उसमें
रेफ, मकार ओर अनुस्वार न हो तो उसे ' नेत्रहीन'
जानना चाहिये । वह क्लेश उठानेपर भी सिद्धिदायक
नहीं होता। आदि, मध्य ओर अन्तमें हंसं (सं),
प्रासाद तथा वाग्बीज (ए) हो अथवा हंस ओर
चन्द्रविन्दु या सकार, फकार अथवा हुं हो तथा
जिसमें मा, प्रा ओर नमामि पद न हो वह मन्त्र
'कीलित' माना गया हे । इसी प्रकार मध्यमे ओर
अन्तमें भी वे दोनों पद न हों तथा जिसमें फट्
ओर लकार न हों, वह मन्त्र ' स्तम्भित ' माना गया
है, जो सिद्धिम रुकावट डालनेवाला है । जिस
मन्त्रके अन्तमें अग्रि (रं) बीज वायु (य) बीजके
साथ हो तथा जो सात अशक्षरोसे युक्तः दिखायी
देता हो वह “दग्ध! संक मन्त्र है। जिसमें दो,
तीन, छः या आठ अक्षरोके साथ अस्त्र (फट्)
दिखायी दे, उस मन्त्रको ' त्रस्त ' जानना चाहिये ।
जिसके मुखभागमें प्रणवरहित हकार अथवा शक्ति
हो, वही मन्त्र ' भीत' कहा गया हि । जिसके
आदि, मध्य ओर अन्तमं चार 'म' हों, वह मनर
मलिन" माना गया है वह अत्यन्त क्लेशसे
सिद्धिदायक होता हि । जिस मन्त्रके मध्यभागमें द
अक्षर ओर अन्तमें दो क्रोध (हुं हुं) बीज हों ओर
उनके साथ अस्त्र (फट्) भी हो, तो वह मन्त्र
“तिरस्कृत ' कहा गया है । जिसके अन्तमे "म
ओर “य' तथा ' हदय ' हो ओर मध्यमे वषट् एवं
वौषट् हो वह मन्त्र ' भेदित" कहा गया है । उसे
त्याग देना चाहिये; क्योकि वह बड़े क्लेशसे फल
देनेवाला होता है। जो तीन अक्षरसे युक्त तथा
हंसहीन है, उस मन््रको ' सुपुप्त' कहा गया है । जो
विद्या अथवा मन्त्र सतरह अक्षरोसे युक्त हो तथा
१. 'ससार्णः " पाठ माननेपर यह अर्थं होगा-“जो “स' अशक्षरसे युक्त हो।'
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पूर्वभाग-तृतीय पाद
४११
जिसके आदिमे पोच बार फट्का प्रयोग हुआ हो
उस "मदोन्मत्त" माना गया है। जिसके मध्य
भागमे फर्का प्रयोग हो उस मन्त्रको “मूर्छित
कहा गया है। जिसके विरामस्थानमें अस्त्र
(फट्)-का प्रयोग हो वह !हतवीर्य' कहा
जाता हे। मन्त्रके आदि, मध्य ओर अन्तमें चार
अस्त्र (फट्)-का प्रयोग हो तो उसे "भ्रान्त
जानना चाहिये । जो मन्त्र अठारह अथवा बीस
अक्षरवाला होकर कामबीज (क्लीं)-से युक्त
होकर साथ ही उसमें हृदय, लेख ओर अङ्कशके
भी बीज हों तो उसे प्रध्वस्त" कहा गया है|
सात अक्षरवाला मन्त्र ` बालक! आठ अक्षरवाला
' कुमार", सोलह अक्षरोवाला "युवा", चौबीस
अक्षरोवाला 'प्रौढ' तथा बीस, चौसठ, सौ ओर
चार सौ अक्षरोका मन्त्र 'वृद्ध' कहा गया हेै।
प्रणवसहित॒ नवार्ण-मन्त्रको ` निस्त्रिश' कहते
हे । जिसके अन्तमें हदय (नमः) कहा गया हो,
मध्यमे शिरोमन्त्र (स्वाहा) का उच्चारण होता
हो ओर अन्तमे शिखा (वषट्), वर्म (हुं), नेत्र
(वौषट्) ओर अस्त्र (फट्) देखे जाते हो तथा
जो शिव एवं शक्ति अक्षरोसे हीन हो, उस मन्त्रको
" निर्बीज' माना गया है । जिसके आदि, मध्य ओर
अन्तमे छः बार फट्का प्रयोग देखा जाता हो, वह
मन्त्र ' सिद्धिहीन ' होता है। पांच अक्षरके मन्त्रको
"मन्द" ओर एकाक्षर मन्त्रको “कूट' कहते है ।
उसीको ' निरंशक' भी कहा गया है । दो अक्षरका
मन्त्र ' सत्वहीन ', चार अशक्षरका मन्त्र केकर ' ओर
छः या सादे सात अक्षरका मन्त्र ' बीजहीन ' कहा
गया है। सादे वारह अक्षरके मन्त्रको * धूमित!
माना गया है। वह निन्दित है। सादृ तीन बीजस
युक्त बीस, तीस तथा इक्षोस अक्षरका मन्त्र
` आलिद्भित' कहा गया है । जिसमं दन्तस्थानीय
अक्षर हों वह मन्त्र "मोहित" बताया गया है।
चौबीस या सत्ताईस अक्षरके मन्त्रको शश्षुधार्त'
जानना चाहिये । वह मन्त्र सिद्धिसे रहित होता हे ।
ग्यारह, पच्चीस, अथवा तेईस अक्षरका मन्त्र " दृप्त"
कहलाता है। छव्वीस, छत्तीस तथा उनतीस
अक्षरके मन्त्रको “हीनाङ्ग ' माना गया है। अद्भाईस
ओर इकतीस अक्षरका मन्त्र अत्यन्त क्रूर" (ओर
` अतिक्रुद्ध ') जानना चाहिये, वह सम्पूर्णं कमपि
निन्दिति माना गया है। चालीस अक्षरसे लेकर
तिरसठ अक्षरोतकका जो मन्त्र है, उसे "व्रीडित"
(लज्ित) समङ्लना चाहिये। वह सब कार्योकी
सिद्धिमें समर्थ नहीं होता । पैंसठ अक्षरके मन्त्रोको
` शान्तमानस' जानना चाहिये। मुनीश्वर! पंसठ
अक्षरोसे लेकर निन्यानवे अक्षरोतकके जो मन्त्र
है, उन्हें ' स्थानभ्रष्ट ' जानना चाहिये। तेरह या
पंद्रह अक्षरोके जो मत्र है, उन्दें सर्वतन्त्र
विशारद विद्वानोंने विकल ' कहा है। सौ, डद
सो, दोसौ, दो सौ इक्यानवे अथवा तीन सौ
अक्षरोके जो मन्त्र होते है, वे "निःसह" कदे
गये है । ब्रह्यन्! चार सौसे लेकर एक हजार
अक्षरतकके मन्त्र प्रयोगमें * अत्यन्त वृद्ध ' माने गये
हें । उन्हें शिथिल कहा गया है। जिनमें एक
हजारसे भी अधिक अक्षर हों, उन मन्त्रांको
"पीडित" बताया गया है । उनसे अधिक अक्षरवाले
मन्त्रोको स्तोत्ररूप माना गया है। इस प्रकारके
मन्त्र दोषयुक्त कहे गये है ।
अव्र मं "छिन्न" आदि दोषोंसे दूषित मन्त्रोका
साधन वताता दं जो योनिमुद्रासनसे बैठकर
एकाग्रचित्त हो जिस किसी भी मन््रका जप
करता हे, उसे सब प्रकारकी सिद्धियां प्राप्त होती
हे । वायं पैरको एड़ीको गुदाके सहारे रखकर
दाहिने पैरकौ एटीको ध्वज (लिङ्ग )-के ऊपर
रखे तौ इस प्रकार योनिमुद्राबन्ध नामक उत्तम
आसन होता है।
((-0. 1/८1111(4<511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
४९१२
आचार्य ओर शिष्यके लक्षण
जो कुलपरम्पराके क्रमसे प्राप्त हुआ हो, नित्य
मन्र-जपके अनुष्टानमें तत्पर हो, गुरुको आज्ञाके
पालनमें अनुरक्त हो तथा अभिषेकयुक्त हो; शान्त,
कुलीन ओर जितेन्द्रिय हो, मन्त्र ओर तन्त्रके
तात्विक अर्थका ज्लाता तथा निग्रहानुग्रहमें समर्थ
हो; किसीसे किसी वस्तुको अपेक्षा न रखता हो,
मननशील, इन्द्रियसंयमी, हितवचन बोलनेवाला,
विद्वान्, तत्तव निकालनेमे चतुर, विनयी हो; किसी-
न-किसी आश्रमको मर्यादामें स्थित, ध्यानपरायण,
संशय-निवारण करनेवाला, परम बुद्धिमान् ओर
संक्षिप्त नारदपुराण
नित्य सत्क्मेकि अनुष्ठानमें संलग्र रहनेवाला हो,
उसे ही 'आचार्य' कहा गया है। जो शान्त,
विनयशील, शुद्धात्मा, सम्पूर्णं शुभ लक्षणोसे
युक्त, शम आदि साधनोंसे सम्पन्न, श्रद्धालु,
सुस्थिर विचार या हदयवाला, खान-पानमें शारीरिक
शुद्धिसे युक्त, धार्मिक, शुद्धचित्त, सुदृढ ब्रत एवं
सुस्थिर आचारसे युक्त, कृतक्च एवं पापसे डरनेवाला
हो, गुरुकी सेवामें जिसका मन लगता हो, एेसे
शील-स्वभावका पुरुष आदर्श शिष्य हो सकता
हे; अन्यथा वह गुरुको दुःख देनेवाला होता है।
(पूर्व० ६४ अध्याय)
१ 7 9 |
मन्रशोधन, दीक्षाविधि, पञ्चदेवपूजा तथा जपपूर्वक इष्टदेव ओर
आत्मचिन्तनका विधान
सनत्कुमारजी कहते है- गुरुको चाहिये कि
वह शिष्यको परीक्षा लेकर मन््रका शोधन करे।
पूर्वसे पश्चिम ओर दक्षिणसे उत्तर (रगमें इबोये
हुए) पोंच-पाच सूत गिरावे (तात्पर्य यह है कि
पाच खडी रेखा खींचकर उनके ऊपर पाँच पडी
रेखाएं खींच) । इस प्रकार चार-चार कोष्ठके चार
समुदाय बर्नेगे। उनमंसे पहले चौकेके प्रथम कोष्टमे
एक, दूसरेके प्रथमम दो, तीसरेके प्रथममें तीन ओर
चोथेके प्रथममे चार लिखे। (इसी क्रमसे अगेकी
संख्याएं भी लिख ले।) प्रथम कोष्टमे “अ
लिखकर उसके आग्रेय कोणमें उससे पोचवां अक्षर
लिखे। इस प्रकार सभी कोष्ठे क्रमशः अक्षरोको
लिखकर बुद्धिमान् पुरुष मन्त्रका संशोधन करे।
साधकके नामका आदि-अक्षर जिस कोष्मं हो,
वहोसे लेकर जहां मन्त्रका आदि-अक्षर हो उस
कोष्ठतक प्रदक्षिणक्रमसे गिनना चाहिये । यदि उसी
चौक मे मन््रका आदि-अक्षर हो, जिसमें नामका
आदि-अशक्षर हे तो वह “ सिद्ध चौक" कहा जायगा ।
उससे प्रदक्षिणक्रमसे गिननेपर यदि द्वितीय चोकमें
मन्त्रका आदिअक्षर हो तो वह ` साध्य' कहा गया
है। इसी प्रकार तीसरा चौक “ सुसिद्ध' ओर चौथा
चौक “अरि नामसे प्रसिद्ध है। यदि साधकके
नामसम्बन्धी ओर मन्त्रसम्बन्धी आदिअक्षर प्रथम
चौकके पहले ही कोष्ठे पड हों तो वह मन्त्र
" सिद्धसिद्ध' माना गया है। यदि मन्त्रवर्णं प्रथम
चौकके द्वितीय कोष्ठे पडा हो तो बह ' सिद्धसाध्य!
कहा गया है। प्रथमके तृतीय कोष्टमे हो तो
“सिद्धसुसिद्ध' होगा ओर चोथेमें हो तो “सिद्धारि
कहलायेगा। नामाक्षरयुक्त चौकसे दूसरे चौके यदि
मन्त्रका अक्षर हो, तो पहले जहो नामका अक्षर था
वहोकि उस कोष्ठसे आरम्भ करके क्रमशः पूर्ववत्
गणना करे। द्वितीय चौकके प्रथम, द्वितीय, तृतीय
एवं चतुर्थ कोष्ठमे मन्त्राक्षर होनेपर उसकी क्रमशः
ˆ साध्यसिद्ध' ' साध्यसाध्य', ` साध्यसुसिध्य' तथा
"साध्य-अरि' संज्ञा होगी। तीसरे चौकमें मन््रका
अक्षर हो तो मनीषी पुरुषोंको पूर्वोक्त रीतिसे गणना
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
४१३
करनी चाहिये । तृतीय चौकके प्रथम आदि कोष्ठके
अनुसार क्रमशः उस मन्त्रकी ' सुसिद्धसिद्ध " सुसिद्ध-
साध्य ', ` सुसिद्धसुसिद्ध ' तथा ' सुसिद्ध-अरि ' संज्ञा
होगी। यदि चौथे चौके मन्त्राक्षर हो तो भी
विद्वान् पुरुप इसी प्रकार गणना करे। चतुर्थ
चोकके प्रथम आदि कोष्ठके अनुसार उस यन्त्रकी
` अरिसिद्ध' ' अरिसाध्य ' ' अरिसुसिद्ध ' तथा “ अरि-
अरि' यह संञा होगी। सिद्धसिद्ध मन्त्र शास्त्रोक्त
विधिसे उतनी ही संख्यामें जप करनेपर सिद्ध हो
जायगा। पर॑तु सिद्धसाध्य मन्त्र दूनी संख्याम जप
करनेसे सिद्ध होगा। सिद्धसुसिद्ध मन्त्र शास्त्रोक्त
संख्यासे आधा जप करनेपर ही सिद्ध हो जायगा ।
परंतु सिद्धारि मन्त्र कुटुम्बीजनोंका नाश करता हे।
साध्यसिद्ध मन्त्र दूनी संख्यामें जप करनेसे सिद्ध
होता है। साध्यसाध्य मन्त्र बहुत विलम्बसे सिद्ध
होता हे। साध्यसुसिद्ध भी द्विगुण जपसे सिद्ध
होता है; किंतु साध्यारि मन्त्र बन्धु-वान्धवोंका
हनन करता हे । सुसिद्धसिद्ध आधे ही जपसे सिद्ध
हो जाता है। सुसिद्धसाध्य द्विगुण जपसे सिद्ध
होता है । सुसिद्धसिद्ध मन्त्र प्राप्त होते ही सिद्ध हो
जाता हे ओर सुसिद्धारि मन्त्र सारे कुटुम्बका नाश
करता हे। अरिसिद्ध पुत्रनाशक है तथा अरिसाध्य
कन्याका नाश करनेवाला होता है। अरिसुसिद्ध
१. मूलम बतायी हुई रीतिसे कोटक बनाकर उनमें
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स्त्रीका नाश करता है ओर अरि-अरि मन्त्र
साधकका ही नाश करनेवाला माना गया है । मुने।
यँ मन्त्रशोधनके ओर भी बहुत-से प्रकार हैँ
कितु यह अकथह नामक चक्र सवमें प्रधान ठै;
इसलिये यही तुम्हे बताया गया हैः।
इस प्रकार मन्त्रका भलीभोति शोधन करके
शुद्ध समय ओर पवित्र स्थानमें गुरु शिप्यको
दीक्षा दे। अव दीक्षाका विधान बताया जाता है।
प्रातःकाल नित्यकर्म करके पहले गुरुचरणोकी
पादुकाको प्रणाम करे। तत्प्ात् आदयपूर्वक वस्त्र
आदिके द्वारा भक्तिभावसे सदगुरुकी पूजा करके
उनसे अभीष्ट मन्त्रके लिये प्रार्थना करे । तदनन्तर
गुरु संतुष्टचित्त हो स्वस्तिवाचनपूर्वक मण्डल
आदि विधान करके शिष्यके साथ पवित्र हौ
यज्ञमण्डपमें प्रवेश करे। फिर सामान्य अर्ध्य
जलसे द्वारका अभिषेक करके अस्त्र-मन्त्रोसे
दिव्य विघ्रोंका निवारण करे; इसके बाद आकाशमें
स्थित विष्रोका जलसे पजन करके निराकरण करे ।
भूमिसम्बन्धी विघ्रोको तीन वार् ताली बजाकर
हटवे, तत्पश्चात् कार्य प्रारम्भ करे। भिन्न-भिन्न
रंगोद्वारा शास्त्रोक्तविधिसे सर्वतोभद्रमण्डलको रचना
करके उसमे बहिमण्डल ओर उसको कलाओंका
पूजन करे। तत्पश्चात् अस्त्र-मन्त्रका उच्चारण करके
अक्षराको लिखनेपर प्रथम कोषएटकमे अ कथ ह' अक्षर
आते है। इन्ीके नामपर इस चक्रको 'अकथह- चक्र ' कहते है । इसका रेखाचित्र नीचे दिया जाता है-
[ए अ स श ए ए ` ` भ 0 थ
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
१.3.
धोये हुए यथाशक्तिनिर्मित कलशकी वहाँ विधिपूर्वक
स्थापना करके सूर्यको कलाका यजन करे।
विलोममातृकाके मूलका उच्चारण करते हुए शुद्ध
जलसे कलशको भरे ओर उसके भीतर सोमकी
कलाओंका विधिपूर्वक पूजन करे। धूम्रा, अर्चि,
ऊष्मा, ज्वलिनी, ज्वालिनी, विस्फुलिङ्गिनी, सुश्री,
सुरूपा, कपिला तथा हव्य-कव्यवाहा-ये अग्रिकी
दस कले कही गयी ह । अब सूर्यकी वारह
कलाएं वतायी जाती है तपिनी, तापिनी, धुप्रा,
मरीचि ज्वालिनी, रुचि, सुषम्णा, भोगदा, विश्वा,
बोधिनी, धारिणी तथा क्षमा। चन्द्रमाकी कलाओकि
नाम इस प्रकार जानने चाहिये- अमृता, मानदा, पृषा,
तुष्टि पुष्टि. रति, धूति, शशिनी, चन्धिका, कान्ति,
ज्योत्स्ना, श्री, प्रीति, अङ्गदा, पूर्णा ओर पूर्णामृता- ये
सोलह चन्द्रमाकी कलाएं कही गयी हे ।
कलशको दो वस्त्रोंसे लपेट करके उसके
भीतर सर्वोपधि डाले। फिर नौ रल छोडकर
पञ्चपल्व डाले। कटहल, आम, बड, पीपल ओर
वकुल-इन पाच वृक्षौके प्टवोंको यहाँ पञ्चपल्यव
माना गया हे। मोती, माणिक्य, वैदूर्य, गोमेद,
वज्ज, विद्रुम (मगा), पद्मराग, मरकत तथा नीलमणि-
इन नौ रलोको क्रमशः कलशमें छोडकर उसमें इष्ट
दवताका आवाहन करे ओर मन्त्रवेत्ता आचार्य
विधिपूर्वक देवपृजाका कार्य सम्पन्न कर्के वस्त्राभूषणोमे
विभूषित शिप्यको वेदीपर वबिठावे ओर प्रोक्षणीके
जलसरे उसका अभिपक करे। फिर उसके शरीरमें
विधिपूर्वकं भूतशुद्धि आदि करके न्यासकि दवाय
शरीरशुद्धि करे ओर मस्तकमें प्छ मन्त्रोका न्यास
करके एक सो आठ मूलमन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित जलसे
प्रिय शिष्यका अभिपेक करे। उस समय मन-ही-मन
मूलमन्रका जप करते रहना चादिये। अवशिष्ट
जलसे आचमन करके शिष्य दूसरा वस्र धारण
करे ओर गुरुको विधिपूर्वकं प्रणाम करके पवित्र
संक्षिप्त नारदपुराण
हो उनके सामने बेठे। तदनन्तर गुरु शिष्यके मस्तकपर
हाथ देकर जिस मन्त्रको दीक्षा देनी हो, उसका
विधिपूर्वक एक सो आठ बार जप करे । "समः अस्तु'
(शिष्य मेरे समान हो) इस भावसे शिष्यको
अक्षर-दान करे। तब शिष्य गुरुको पूजा करे।
इसके वाद गुरु शिष्यके मस्तकपर चन्दनयुक्त हाथ
रखकर एकाग्रचित्त हो, उसके कानमे आठ बार
मन्त्र कहे । इस प्रकार मन्त्रका उपदेश पाकर शिष्य
भी गुरुके चरणोमें गिर जाय । उस समय गुरु इस
प्रकार कहे, ' बेटा! उठो । तुम बन्धनमुक्त हो गये।
विधिपूर्वक सदाचारी बनो । तुम्हें सदा कीर्ति, श्री,
कान्ति, पुत्र, आयु, बल ओर आरोग्य प्राप्त हो॥'
तव शिष्य उठकर गन्ध आदिक द्वारा गुरुको पूजा
करे ओर उनके लिये दक्षिणा दे। इस प्रकार
गुरुमन्त्र पाकर शिष्य उसी समयसे गुरुसेवामं लग
जाय। बीचमें अपने इषटदेवका पूजन करे ओर
उन्हे पुष्पाञ्जलि देकर अग्रि, नितऋऋति ओर वागीशका
क्रमशः पूजन करे। जब मध्यमे भगवान् विष्णुका
पूजन करे तो उनके चारों ओर क्रमशः गणेश,
सूर्य, देवी तथा शिवकी पूजा करे ओर जव
मध्यमे भगवान् शङ्करकी पूजा करे तो उनके
पूर्वादि दिशाओं क्रमशः सूर्य, गणेश, देवी तथा
विष्णुका पजन करे। जव मध्यमे देवीको पूजा
करे तो उनके चारों ओर शिव, गणेश, सूर्य ओर
विष्णुको पूजा करे। जब मध्यमे गणेशकी पूजा करे
तो उनके चारों ओर क्रमशः शिव, देवी, सूर्य ओर
विष्णुको पूजा करे ओर जब मध्यभागं सूर्यको
पूजा करे तो पूर्वादि दिशाओमें क्रमशः गणेश,
विष्णु, देवी ओर शिवको पूजा करे। इस प्रकार
प्रतिदिन आदपपूर्वक पञ्चदेवोंका पूजन करना चाहिये।
विद्वान् पुरुषको चाहिये कि ब्राह्यमुहूर्तमे उठकर
लघ्रुशंका आदि आवश्यक कार्य कर ले ओर यदि
लघुशंका आदि न लगी हो तो शय्यापर बैदे-ैठे
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
४१५
ही अपने गुरुदेवको नमस्कार । चैतन्य आपका स्वरूप है। आपकी आज्ञासे ही
पादुकामन्त्रका दस वार जप ओर समर्पण करके
गुरुदेवको पुनः प्रणाम ओर उनका स्तवन करे।
फिर मूलाधारसे ब्र्यरन््रतक मूलविद्याका चिन्तन
करे। मूलाधारसे निम्नभागमें गोलाकार वायुमण्डल
टे, उसमें वायुका बीज 'या' कार स्थित है। उस
बीजसे वायु प्रवाहित हो रही है। उससे ऊपर
अग्निका त्रिकोणमण्डल हे। उसमें जो अग्निका बीज
'र' कार है, उससे आग प्रकट हो रही है। उक्त वायु
तथा अग्निके साथ मूलाधारमें स्थित शरीरवाली
कुलकुण्डलिनीका ध्यान करे जो सोये हए सर्पके
समान आकारवाली हे। वह स्वयं भूलिङ्खको
आवेष्टित करके सो रही है । देखनेमें वह कमलकौ
नालके समान जान पडती है । वह अत्यन्त पतली
हे ओर उसके अद्गोसे करोड़ों विद्युतोंकी-सी प्रभा
छिटक रही हे । इस प्रकार कुलकुण्डलिनीका ध्यान
करके भावनात्मक कूर्च (कूची)-के द्वारा उसे
जगाकर उठाये ओर सुपुम्णा नाके मार्गसे क्रमशः
छः चक्रों का भेदन करनेवाली उस कुण्डलिनीको
गुरुको बतायी हई विधिके अनुसार विद्वान् पुरूष
ब्रह्मरन्ध्रतक ले जाय ओर वहकि अमृतमें निमग्र
करके आत्माका चिन्तन करे। मानो आत्मा उसके
प्रभापुञ्चसे व्याप्त हे। वह निर्मल, चिन्मय तथा देह आदिसे
पर हे। फिर उस कुण्डलिनीको अपने स्थानपर पू्हुचाकर
हृदयम इष्देवका चिन्तन करे ओर मानसिक उपचारे
उनका पूजन करे निश्नद्भित मत्से प्रार्थना. कर-
त्रेलोक्यचैतन्यमयादिदेव
श्रीनाथ विष्णो भवदाज्नयैव।
प्रातः समुत्थाय तव प्रियार्थं
संसारयात्रामनुवर्तयिष्ये ॥
प्रातःकाल उठकर आपका प्रिय कार्य करनेके लिये
मे संसारयात्राका अनुसरण करूगा ।'
व्रह्मन्! यदि ईष्टदेव कोई दूसरा देवता हो तो
पूर्वोक्त मन्त्रम "विष्णो" आदिके स्थानमें ऊदाद्रारा
उसके वाचक शब्द या नामका प्रयोग कर लेना
चाहिये । तत्पश्चात् सम्पूर्णं सिद्धिके लिये अजपा जप
निवेदन करे। दिन-रातमें जीव “इक्छीस हजार छः
सौ" वार सदा आजपा नामक गायत्रीका जप करता
हे । इस अजपा मन्त्रके ऋषि हंस ह, अव्यक्त गायत्री
छन्द कहा गया हे। परमहंस देवता हैं । आदि (हं)
बीज ओर अन्त (सः) शक्ति ठे, तत्पश्चात् षडद्घन्यास
करे। सूर्य, सोम, निरञ्जन, निराभास, धर्म ओर
ज्ञान-ये छः अद्ध हें। क्रमशः इनके पूर्वमे
' हंसः ' ओर अन्तमं “ आत्मने" पद जोड़कर श्रेष्ठ
साधक इनका छः अद्धोमे न्यास करेः। हकार
सूर्यके समान तेजस्वी होकर शरीरसे बाहर निकलता
है ओर सकार वैसे ही तेजस्वी रूपमे प्रवेश करता
हे । इस प्रकार हकार ओर सकारका ध्यान कहा गया
हे, इस तरह ध्यान करक वुद्धिमान् पुरुप वहि ओर
अर्कमण्डलमें विभागपूर्वक जप अर्पण करे।
मूलाधारचक्रमे चार दलका कमल है, जौ
बन्धूकपुष्पके समान लाल है । उसके चारों दलौमं
क्रमशः 'व श पस'-ये अक्षर अद्भत हं। उसमं
अपनी शक्तिके साथ गणेशजी विराजमान दै । वे
अपने चारो हाथोमें क्रमशः पाश, अङ्कुश, सुधापात्र
तथा मोदक लेकर उद्टसित ह। एसे वाकृपति
गणेशजीको छः सौ जप अर्पण करे । स्वाधिष्टान-
चक्रमे छः दलोका कमल है। वह चक्र रमुगिके
समान रंगका है । उसके छः दर्लेपिं क्रमशः "व भ
आदिदेव ! लक्ष्मीकान्त! विष्णो! त्रिलोकीका । म य रल! ये अक्षर अद्भत है । उसमे कमलजन्मा
१. हंसः सूर्यात्मने हृदयाय नमः। हंस सोमात्मने शिरसे स्वाहा । हंसो निरञ्ननात्मने शिखायै वषट्! हंसो
निग॑भासात्मने कवचाय हुम् । हंसो धमत्सिने नेत्राभ्यां वौषट् । हंसो ज्ञानात्मने अस्त्राय फर् ।
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/818145। (01661010. 01411260 0 66810011
४९१६ | संक्षिप्त नारदपुराण
ब्रह्माजी हंसारूढ होकर विराजमान हैं । उनके | हें । बह चक्र शुक्ल वर्णका हे। उसमे महाज्योतिसे
वामादङ्ग-भागमे उनको ब्राह्यीशक्ति सुशोभित हें । वे | प्रकाशित होनेवाले इन्दियाधिपति ईश्वर विराजमान है,
विद्याके अधिपति हं । खुवा ओर अक्षमाला उनके | जो प्राणशक्तिसे युक्त हें । उन्हं एक सहस्र जप अर्पण
हा्थोकी शोभा बाती हैं। एसे ब्रह्माजीको छः | करे। आज्ञाचक्रे दो दलोंवाला कमल हे, उसके
हजार जप निवेदन करे! मणिपूर चक्रमे दशदल | दलम क्रमशः “ह' ओर "क्ष' अङ्कित हे; उसमें
कमल विद्यमान हे! उसके प्रत्येक दलपर क्रमशः | पराशक्तिसे युक्त जगद्गुरु सदाशिव विराजमान ह
'उदणतथद धनप फ" ये अक्षर अद्भत हें। | उन्दं एक सहस्र जप अर्पण करे। सहस्नार- चक्रमे सहस्र
उसकी प्रभा विद्युद्धिलसित मेघके समान है । उसमें | दलेसे युक्त महाकमल विद्यमान है, उस्म नाद-
श्व, चक्र, गदा ओर पद्म धारण करनेवाले भगवान् | विन्दुसहित समस्त मातृकावर्ण विराजमान है । उसमं
विष्णु लक्ष्मीसहित विराजमान हें । उन्हें छः हजार | स्थित वर ओर अभययुक्त हाथोवाले परम आदिगुरुको
जप अर्पण करे। अनाहत चक्रमे द्रादशदल कमल | एक सहस्र जप निवेदन करे। फिर चुद्मं जल लेकर
विद्यमान है । इसके प्रत्येक दलपर क्रमशः ' क ख | इस प्रकार कहे-' स्वभावतः होते रहनेवाले इक्तीस
गघङचचछज जट ठ' ये अक्षर अङ्कति | हजार छः सौ अजपा जपका पूवोक्तरूमसे विभागपूर्वक
है। उसका वर्णं शुक्ल हे। उसमें शूल, अभय, वर ओर | संकल्प करनेके कारण मोक्षदाता भगवान् विष्णु मुञ्ञपर
अमृतकलश धारण करनेवाले वृषभारूढ भगवान् | प्रसन्न हों ।' इस अजपा गायत्रीके संकल्पमात्रसे मनुष्य
रुद्र॒ विराज रहे है । उनके वामाद्भ-भागमें उनकी | बड़-वडे पापोसे मुक्त हो जाता है। "में ब्रह्महीरहू
शक्ति पार्वतीदेवी विद्यमान है । वे विद्याके अधिपति | संसारी जीव नहीं हू। नित्यमुक्त हू शोक मेर स्पर्शं
हे । विदान् पुरुष उन सुद्रदेवको छः हजार जप निवेदन | नहीं कर सकता। में सच्चिदानन्द-स्वरूप हू।' इस
करे। विशुद्ध चक्र पोडशदल कमलसे युक्तं टे । | प्रकार अपने-आपके विषयमे चिन्तन करे। तदनन्तर
उसके प्रत्येक दलपर क्रमशः स्वरवर्ण (अ आ इ | देहिक कृत्य ओर देवार्चन करे। उसका विधान ओर
इईउङऊ्ऋऋल् लृएरएेओओअं अः) अद्भत । सदाचारका लक्षण में वताङगा। (पूर्व० ६५ अध्याय)
(म + 1100
शौचाचार, स्नान, संध्या-तर्पण, पूजागृहमे देवताओंका पूजन, केशव-कीर्त्यादि
मातृकान्यास, श्रीकण्ठमातृका, गणेशमातुका, कलामातृका आदि
न्यासोंका वर्णन
सनत्कुमारजी कहते है -- तदनन्तर बायीं या | नमस्कार है, मैने जो तुम्हें चरणोंसे स्पर्शं किया
दाहिनी जिस ओरकी ससि चलती हो, उसी | है, मेरे इस अपराधको क्षमा करो ।'
ओरका वायो अथवा दाहिना पैर पृथ्वीपर उतारे इस प्रकार भूदेवीसे क्षमा-प्रार्थना करके
ओर इस प्रकार प्रार्थना करे- विधिपूर्वक विचरण करे। तदनन्तर गोवसे नैऋत्य
समुद्रमेखले देवि पर्वतस्तनमण्डले । कोणे जाकर इस मन्त्रका उच्चारण कर-
विष्णुपल्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे॥ ६६।१-२ | गच्छन्तु ऋषयो देवाः पिशाचा ये च गुह्यकाः ।
"पृथ्वी देवि! समुद्र तुम्हारी मेखला (कटिबन्ध) | पितृभूतगणाः स्वे करिष्ये मलमोचनम्॥ २३-४
ओर पर्वत स्तनमण्डल हैं। विष्णुपत्नि! तुम्हें "यहां जो ऋषि, देवता, पिशाच, गुह्यक,
((-0. 1\॥८1114/5511॥1 8118811 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
पितर तथा भूतगण हो, वे चले जायं, मेँ
मल-त्याग करूगा ।!
एेसा कहकर तीन बार ताली बजावे ओर
सिरको वस्त्रसे आच्छादित करके मल-त्याग करे।
रात हो तो दक्षिणकी ओर मुंह करके वैठे ओर
दिनमें उत्तरकी ओर मह करके मलत्याग करे ।
तत्पश्चात् मिट ओर जलसे शुद्धि करे। लिङ्घमं
एक वार, गुदामें तीन बार, बाय हाथमे दस वार,
फिर दोनों हाथमे सात बार तथा पैरोमें तीन बार
मद्री लगवे। इस प्रकार शौोच-सम्पादन करके
बारह बार जलसे कुल्ला करे । उसके बाद दोतुनके
लिये निग्राह्भित मन्त्रसे वनस्पतिकौ प्रार्थना करे-
आयुर्बलं यो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च।
श्रियं प्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते ॥ ८
` वनस्पते! तुम हमें आयु, बल, यश, तेज,
संतान, पशु, धन, लक्ष्मी, प्रज्ञा (ज्ञानशक्ति) तथा
मेधा (धारणशक्ति) दो ।'
इस प्रकार प्रार्थना करके मन्त्रका साधक
बारह अंगुलको दोतुन लेकर एकाग्रचित्त हो उससे
दात ओर मुखकी शुद्धि करे। तत्पश्चात् नदी
आदिमे नहानैके लिये जाय, उस समय देवताके
गुणोका कर्तन करता रहे। जलाशयमें जाकर
उसको नमस्कार करके स्नानोपयोगी वस्तु-वस्त्र
आदिको तटपर रखकर मूलः (इष्ट) मन्त्रसे
अभिमन्त्रित मिद्री लेकर उसे कटिसे पैरतकके
अङ्खोमें लगावे ओर फिर जलाशयके जलसे उसे
धो डाले । तदनन्तर पाँच बार जलसे पैरोँको धोकर
जलके भीतर प्रवेश करे ओर नाभितकके जलमं
पहुंचकर खडा हो जाय । उसके बाद जलाशयकी
मिद्री लेकर वाये हाथकी कलाई, हथेली ओर
उसके अग्रभागमें लगावे ओर अंगुलीसे जलाशयकां
९१७
मिद्री लेकर मन्त्रस् विद्वान् अस्त्र (फट्) -के
उच्वारणद्वारा उसे अपने ऊपर घुमाकर छोड दे।
फिर हथेलीको मिट्रीको छः अङ्खोमें उनके मन्त्रोद्रारा
लगावे। तदनन्तर डुबकी लगाकर भली भांति उन
अङ्घखोको धो डाले। यह जल-स्नान बताया गया
है । इसके वाद सम्पूर्णं जगत्को अपने इष्टदेवका
स्वरूप मानकर आन्तरिक सान करे। अनन्त
सूर्यके समान तेजस्वी तथा अपने आभूषण ओर
आयुधोसे सम्पन्न मन्त्रमूर्तिं भगवान्का चिन्तन
करके यह भावना करे कि उनके चरणोदकसे
प्रकट हुई दिव्य धारा ब्रह्मरन्धसे मेरे शरीरम प्रवेश
कर रही है। फिर उस धारासे शरीरके भीतरका
सारा मल भावनाद्वारा ही धो डाले। एेसा करनेसे
मन्त्रका साधक तत्काल रजोगुणसे रहित हो
स्वच्छ स्फटिकके समान शुद्ध हो जाता है।
तत्पश्चात् मन्त्रसाधक शास्त्रोक्तविधिसे स्नान करके
एकाग्रचित्त हो मन्त्र-खरान करे। उसका विधान
बताया जाता है। पहले देश-कालका नाम लेकर
संकल्प करे, फिर प्राणायाम ओर षपडद्ध-न्यास
करके दोनों हासे मुष्टिको मुद्रा बनाकर सूर्यमण्डलसे
आते हए तीर्थोका आवाहन करे
ब्रह्माण्डोदरतीर्थानि करैः स्पृष्टानि ते रवे।
तेन सत्येन मे देव देहि तीर्थं दिवाकर॥
गङ्ख च यमुने यैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धुकावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु ॥
(ना० पूर्व ६६1 २५- २७)
"सूर्यदेव । ब्रह्माण्डके भीतर जितने तीर्थं है, उन
सवका आपकी किरणे स्पर्शं करती है । दिवाकर!
इस सत्यके अनुसार मेरे लिये यहीं सब तीर्थं प्रदान
कीजिये। गद्धे, यमुने, गोदावरि, सरस्वति, नमे,
सिन्धु, कावेरि! आप इस जले निवास करे।'
१. अपने इष्टदेवके अभीष्ट मन्रको ही यहां मूलमन्त्र कटा है।
((-0. ८1114551 81188 \/81811851 (01661101. 01411260 0 66810011
४१९८
संक्षिप्त नारदपुराण
इस प्रकार जलम सब तीर्थोका आवाहन
करके उन्हे सुधाबीज (वं)-से युक्त करे। फिर
गोमुद्रासे उनका अमृतीकरण करके उन्हें कवचसे
अवगुण्ठित करे । फिर अस्त्रमुद्राद्वारा संरक्षण
करके चक्रमुद्राका प्रदर्शन करे। तत्पश्चात् उस
जलमें विद्वान् पुरुष अग्रि, सूर्य ओर चन्द्रमाके
मण्डलोंका चिन्तन करे। फिर सूर्यमन्त्र ओर
अमृतबीजके द्वारा उस जलको अभिमन्त्रित करे ।
तदनन्तर मूल-मन्त्रसे ग्यारह वार अभिमन्त्रित
करके उसके मध्यभागमें पूजा-यन्त्रको भावना
करे ओर हदयसे देवताका आवाहन करके स्नान
कराकर मानसिक उपचारसे उनकी पूजा करे।
इष्टदेव सिंहासनपर विराजमान है, इस भावनासे
उन्हं नमस्कार करके विद्वान् पुरुष उस जलको
प्रणाम करे-
आधारः सर्वभूतानां विष्णोरतुलतेजसः।
तद्रूपाश्च ततो जाता आपस्ताः प्रणमाम्यहम्॥
(३२। ३३)
जल सम्पूर्ण भूतोंका ओर अतुल तेजस्वी
भगवान् विष्णुका आधार हे। अतः वह विष्णुस्वरूप
हे; इसलिये मेँ उसे प्रणाम करता हूं ।'
इस प्रकार नमस्कार करके साधक अपने
शरीरके सात छिद्रोंको वंद करके जलमें डुबकी
लगावे ओर उसमें मूलमन्त्रका इष्टदेवके स्वरूपमें
ध्यान करे। तीन वार डुबकी लगावे ओर ऊपर
आवे। तत्पात् दोनों हा्थोको घड़की मुद्रामें
रखकर उसके द्वारा सिरको सीचि।
फिर् श्रीशालग्रामशिलाका जल (भगवच्वरणामृत)
पान करे। कभी इसके विरुद्ध आचरण न करे।
यह शास्त्रका नियत विधान हे । तदनन्तर मन्त्रका
साधक अपने ईष्टदेवका सूर्यमण्डले विसर्जन
करके तटपर आवे ओर यत्पूर्वक वस्त्र धोकर दो
शुद्ध वस्त्र (धोती ओर अँगोछा) धारण करके
विद्वान् पुरुष संध्या आदि करे । रोगादिके कारण
सनानादिमें असमर्थ हो, वह वहां जलसे सान न
करके अघमर्षण करे अथवा अशक्त मनुष्य भस्म
या धूलसे स्नान करे। तदनन्तर शुभ आसनपर
वेटकर संध्यादि कर्म करे। "ॐ केशवाय नमः'
` ॐ नारायणाय नमः ' ' ॐ माधवाय नमः '
इन मन्त्रोसे तीन बार जलका आचमन करके
` ॐ गो विन्दाय नमः ' ' ॐ विष्णवे नमः'- इन
मन्त्रोका उच्चारण करके दोनों हाथ धो ले। फिर
' ॐ मधुसूदनाय नमः ' ' ॐ त्रिविक्रमाय नमः' से
दोनों ओष्ठोका मार्जन करे । तत्पश्चात् * ॐ वामनाय
नमः' “ॐ श्रीधराय नमः' से मुख ओर दोनों
हा्थोका स्पर्शं करे। ' ॐ हृषीकेशाय नमः ' ' ॐ
पद्मनाभाय नमः' से दोनों चरणोंका स्पर्श करे।
"ॐ दामोदराय नमः' से मूर्धा (मस्तक) का,
" ॐ संकर्षणाय नमः ' से मुखका, ' ॐ वासुदेवाय
नमः' ' ॐ प्रद्युम्नाय नमः' से क्रमशः दायीं - बायीं
नासिकाका स्पर्शं करे। “ॐ अनिरुद्धाय नमः!
" ॐ पुरुषोत्तमाय नमः' से पूर्ववत् दोनों नेत्रोका
तथा “ ॐ अधोक्षजाय नमः, ' ॐ नृसिंहाय नमः.
से दोनों कानोका स्पर्श करे। " ॐ अच्युताय नमः'से
नाभिका, ' ॐ जनार्दनाय नमः ' से वक्षःस्थलका
तथा * ॐ हरये नमः", * ॐ विष्णवे नमः' से दोनों
कंधोंका स्पर्शं करे। यह वैष्णव आचमनको
विधि हे। आदिमे प्रणव ओर अन्तमें चतुर्थीका
एकवचन तथा नमः पद जोड़कर पूर्वोक्तं केशव
आदि नामोद्रारा मुख आदिका स्पर्शं करना चाहिये ।
मुख ओर नासिकाका स्पर्श ॒तर्जनी अंगुलिसे
करे । नेत्रो तथा कानोंका स्पर्श अनामिकाद्रारा करे
तथा नाभिदेशका स्पर्शं कनिष्ठा अंगुलिसे करे।
अङ्गुष्टका स्पर्श सभी अङ्गे करना चाहिये।
' स्वाहा ' पद अन्तमं जोड़कर चतुर्थ्यन्त आत्मतत्त्व,
विद्यातत्व ओर शिवतक्त्वका उच्चारण करके जो
((-0. 1/८11114/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
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आचमन किया जाता हे, उसे शैव आचमन कहा
गया हे। आदिमे क्रमशः दीर्घत्रय, अनुस्वार ओर
ह अर्थात्-हां हीं हं जोड़कर स्वाहान्तं आत्मतत्त्व
विद्याततत्व ओर शिवतत्त्व शब्दके उच्वारणपूर्वक
किये हुए आचमनको तो शैवः कहते हं ओर
आदिमं क्रमशः रे हीं, रश्री' इस बीजके साथ
स्वाहान्त उक्त नामोका उच्चारण करके किये हुए
आचमनको शाक्त आचमन कहा गया है।
ब्रह्मन्! वाग्बीज (ए), लञनाबीज (हीं) ओर
श्रीबीज (श्री)-का प्रारम्भमें प्रयोग करनेसे वह
आचमन अभीष्ट अर्थको देनेवाला होता हे।
तदनन्तर ललामं सुन्दर गदाको-सी आकृतिवाला
तिलक लगावे। हदयमें नन्दक नामक खद्धको
ओर दोनों बोहोँपर क्रमशः शङ्ख ओर चक्रक
आकृति बनावे। उत्तम बुद्धिवाला वैष्णव पुरुष
क्रमशः मस्तक, कर्णमूल, पार्चभाग, पीठ, नाभि
तथा ककुदे भी शार्ङ्गं नामक धनुष तथा बाणका
न्यास करे। इस प्रकार वैष्णव पुरुष तीर्थजनित
मृत्तिका (गोपीचन्दन) आदिसे तिलक करे। अथवा
शेवजन त्रयम्बकमन्त्रसे अग्रिहोत्रका भस्म लेकर
अग्निरिति भस्म" इत्यादि मन्त्रेसे अभिमन्त्रित
करके तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात, वामदेव ओर
ईशान--इन नामोद्वारा क्रमशः ललाट, कंधे, उदर,
भुजा ओर हदयमें पाच जगह त्रिपुण्ड लगावे।
शक्तिके उपासकको त्रिकोणकौ आकृतिका अथवा
स्त्रियों जैसे वेदी लगाती हे, उस तरहका तिलक
करना चाहिये । वैदिकी संध्या करनेके वाद् मच्रका
साधक विधिवत् आचमन करके तान्त्रिको संध्या
करे । पूर्ववत् जलमें तीर्थोका आवाहन कर ले।
तत्पश्चात् कुशासे तीन वार पृथ्वीपर जल छिड्क।
फिर उसी जलसे सात वार अपने मस्तकपर
अभिषेक करे। फिर प्राणायाम ओर षडद्खन्यास
करके वाये हाथमे जल लेकर उसे दाहिने हाथसे
ढक ले। ओर मन्त्रज्ञ पुरुष आकाश, वायु, अग्रि,
जल तथा पृथ्वीके बीजमन्त्रोद्रारा* उसे अभिमन्त्रित
करके तत््वमुद्रापूर्वक हाथसे चूते हए जलविन्दुओंद्रारा
मूलमन्त्रसे अपने मस्तकको सात वार सींचे, फिर
शेष जलको मन््रका साधक बीजाक्षरोसे अभिमन्त्रित
करके नासिकाके समीप ले आवे। उस तेजोमय
जलको भावनाद्रारा इडा नाडीसे भीतर खचकर
उसके अन्तरके सारे मलोको धो डाले, फिर
कृष्णवर्णमें परिणत हए उस जलको पिङ्गला
नाडीसे बाहर निकाले ओर अपने अगे वच्रमय
प्रस्तरकी कल्पना करके अस्त्रमन्त्र (फट्) का
उच्चारण करते हए उस जलको उसीपर दे मारे ।
वह सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला अघमर्षण
कहा गया है। फिर मन्त्रवेत्ता पुरुष हाथ-पैर
धोकर पूर्ववत् आचमन करके खड़ा हो तंविके
पात्रमे पुष्प-चन्दन आदि डालकर मूलान्त मन््रका
उच्यारण करते हए सूर्यमण्डलमें विराजमान
इष्टदेवको अर्ध्य दे । इस प्रकार तीन बार अर्ध्य
देकर रविमण्डले स्थित आराध्यदेवका ध्यान
करे । तत्पश्चात् अपने-अपने कल्पमे बतायी हई
गायत्रीका एक सौ आठ या अद्राईस वार जप
करे । जपके अन्तमें “ गुह्यातिगुह्यगोप््ी त्वं ' इत्यादि
मन्त्रसे वह जप समर्पित करे, तदनन्तर गायत्रीका
ध्यान करे।
फिर विधिज्ञ पुरुष देवताओं, ऋषियों तथा
अपने पितरोका तर्पण करके कल्पोक्त पद्धतिसे
अपने ईषटदेवका भी तर्पण करे। तत्पश्चात्
१. हां आत्मतत्वाय स्वाहा । हीं विद्यातत्वाय स्वाहा । हं शिवतच्वाय स्वाहा। यै रैव आचमन-मन््र £।
२. ए आत्मतत्वाय स्वाहा । हीं विद्यातत्वाय स्वाहा । श्रीं रिवतत्वाय स्वाहा! ये शाक्तं आचमन-मन्त्र £।
३. हंयंरं वं लं-ये क्रमशः आकाश आदि तत्वेकि बीज रै।
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
2२०
संक्षिप्त नारदपुराण
गुरुपट्क्तिका तर्पण करके अद्धो, आयुधो ओर
आवरणोसहित विनतानन्दन गरुड्का “ साङ्खं सावरणं
सायुधं वेनतेयं तर्पयामि ' एेसा कहकर तर्पण करे ।
इसके बाद नारद, पर्वत, जिष्णु, निशठ, उद्धव,
दारुक, विष्वक्सेन तथा शेलेयका वैष्णव पुरुष
तर्पण करे। विप्रेन्द्र! इस प्रकार तर्पण करके
विवस्वान् सूर्यको अर्घ्य दे पूजाघर्मे आकर हाथ-
पैर धोकर आचमन करे। फिर अग्रिहोत्रमें स्थित
गार्हपत्य आदि अग्रियोकी तृपिके लिये हवन
करके यतपूर्वक उनको उपासना करके पूजाके
स्थानम आकर द्वारपूजा प्रारम्भ करे। द्वारकी
ऊपरी शखामे गणेशजीको, दक्षिण भागमें महालक्ष्मी
को, वाम भागम सरस्वतीकी, दक्षिणमें पुनः
विघ्नराज गणेशको, वाम भागमें क्षेत्रपालकी,
दक्षिणम गद्धाकौ, वाम भागमें यमुनाकी, दक्षिणमें
धाताकी, वाम भागमें विधाताकी, दक्षिणम शड्खनिधि-
को तथा वाम-भागमें पद्मनिधिकी पूजा करे।
तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष तत्तत्कल्पोक्त, द्वारपालोकी
पूजा करे। नन्द, सुनन्द, चण्ड, प्रचण्ड, प्रचल,
बल, भद्र तथा सुभद्र ये वेष्णव द्वारपाल रै । नन्दी,
भृद्खी, रिरि, स्कन्द, गणेश, उमामहे श्वर, नन्दीवृषभ
तथा महाकाल-ये शेव द्वारपाल हैं। त्राह्यी,
माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी आदि जो आठ मातृका
शक्तियों हें, वे स्वयं ही द्वारपालिका हँ । इन सबके
नामके आदि-अक्षरमे अनुस्वार लगाकर उसे
नामके पहले बोलना चाहिये। नामके चतुथी
विभक्त्यन्त रूपके वाद नमः लगाना चाहिये ।
यथा-'नं नन्दाय नमः" इत्यादि । इन्हीं नाममन्त्रसे
इन सबको पूजा करनी चाहिये ।
वैष्णव-मातृका-न्यास
इसके बाद बुद्धिमान् पुरुष पवित्र हो मन ओर
इन्दरियोके संयमपूर्वक आसनपर बैठकर आचमन
करे ओर यतपूर्वक स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा पृथ्वीके
वि्घ्रोका निवारण करनेके अनन्तर श्रेष्ठ वैष्णव
पुरुष केशव-कीर्त्यादि मातृका-न्यास करे। कीर्तिसहित
केशव, कान्तिसहित नारायण, तुष्टिके साथ माधव,
पुष्टिके साथ गोविन्द, धृतिके साथ विष्णु, शान्तिके
साथ मधुसूदन, क्रियाके साथ त्रिविक्रम, दयाके
साथ वामन, मेधाके साथ श्रीधर, हषकि साथ
हषीकेश, पद्मनाभके साथ श्रद्धा, दामोदरके साथ
लना, लक्ष्मीसहित वासुदेव, सरस्वतीसहित संकर्षण,
प्रीतिके साथ प्रद्युम्न, रतिके साथ अनिरुद्ध, जयाके
साथ चक्रो, दुगकि साथ गदी, प्रभाके साथ
शाङ्की, सत्याके साथ खङ्गी, चण्डाके साथ
शङ्खी, वाणीके साथ हली, विलासिनीके साथ
मुसली, विजयाके साथ शूली, विरजाके साथ
पाशी, विश्वाके साथ अङ्कशी, विनदाके साथ
मुकुन्द, सुनन्दाके साथ नन्दज, स्मृतिके साथ
नन्दी, वृद्धिके साथ नर, समृद्धिके साथ नरकजित्,
शुद्धिके साथ हरि, बुद्धिके साथ कृष्ण, भुक्तिके
साथ सत्य, मुक्तिके साथ सात्वत, क्षमासहित
सौरि, रमासहित सूर, उमासहित जनार्दन (शिव),
क्लेदिनीसहित भूधर, क्लिन्नाके साथ विश्वमूर्ति,
वसुधाके साथ वैकुण्ठ, वसुदाके साथ पुरुषोत्तम,
पराके साथ वली, परायणाके साथ बलानुज,
सृक्ष्माके साथ बाल, संध्याके साथ वृषहन्ता,
प्रज्ञके साथ वृष, प्रभाके साथ हंस, निशाके साथ
वराह, धाराके साथ विमल तथा विद्युत्के साथ
नृसिंहका न्यास करे। इस केशवादि मातृका-
न्यासके नारायण ऋषि, अमृताद्या गायत्री छन्द
ओर विष्णु देवता है । भगवान् विष्णु चक्र आदि
आथुधोसे सुशोभित है, उन्होने हाथमे कलश
ओर दर्पण ले रखा हे, वे श्रीहरि श्रीलक्ष्मीजीके
साथ शोभा पा रहे है, उनकी अद्गकान्ति विद्युत्के
समान प्रकाशमान है ओर वे अनेक प्रकारके दिव्य
आभूषणोसे विभूषित है; एेसे भगवान् विष्णुका म॑
((-0. 1\/॥(1114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661011. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
४२९१
भजन करता हूं । इस प्रकार ध्यान करके शक्ति (हीं)
श्र (श्री) तथा काम (क्लीं) बीजसे सम्पुटित “अ
आदि एक-एक अक्षरका ललाट आदिमे न्यास करे।
उसके साथ आदिमे प्रणव लगाकर श्रीविष्णु ओर
उनकी शक्तिके चतुर्थ्यन्त नाम बोलकर अन्तमें *नमः'
पद् जोड़कर बोले
एक अक्षर "अ! का ललारटमें, फिर एक
अक्षर “ आ' का मुखमे, दो अक्षर "इ' ओर "ई"
का क्रमशः दाहिने ओर बयं नेत्रम ओर दो अक्षर
"उ ˆ ऊ' का क्रमशः दाहिने-बायें कानमे न्यास
करे। दो अक्षर 'ऋ' 'ऋ' का दायीं-बायीं
नासिकामे, दो अक्षर “लृ' /लृ' का दार्ये- वायं
कपोलमें, दो अक्षर “ए "ए" का ऊपर-नीचेके
ओष्ठमे, दो अक्षर "ओ" ' ओ का ऊपर-नीचेकी
दन्तपंक्तिमे, एक अक्षर “अं ' का जिहामूलमें तथा
एक अक्षर "अः ' का ग्रीवामें न्यास करे। दाहिनी
हमें कवर्गका ओर बायीं बँहमें चवर्गका न्यास
करे। टवर्ग ओर तवर्गका दोनों पैरोमें तथा "प" ओर
"फ का दोनों कुक्षियोमें न्यास करे । पृष्ठवंशमें "व '
का, नाभिमें भ' का ओर हदयमें 'म' का न्यास
करे। 'य' आदि सात अक्षरोका शरीरकी सात
धातुओमे, “ह' का प्राणमें तथा व ' का आत्मामें
न्यास करे। क्ष" का क्रोधमें न्यास करना चाहिये।
इस प्रकार क्रमसे मातृका वर्णोका न्यास करके
मनुष्य भगवान् विष्णुको पूजामें समर्थ होता है।
शेव-मातृका-न्यास
[ भगवान् शिवके उपासकको केशव-कीर्त्यादि
मातृका-न्यासकी भति श्रीकण्टेशादि मातृका-
१. उदाहरणके लिये एक वाक्ययोजना दी जाती ईै-
न्यास करना चाहिये ।] पूर्णोदरीके साथ श्रीकण्ठेशका,
विरजाके साथ अनन्तेशका, शाल्मलीके साथ
सृक्ष्मेशका, लोलाक्षीके साथ त्रिमूर्तीशका, वर्तुलाक्षीके
साथ महेशका ओर दीर्घघोणाके साथ अर्घीशिका
न्यास करेः। दीर्धमुखीके साथ भारभूतीशका,
गोमुखीके साथ तिथीशका, दीर्घजिह्वाके साथ
स्थाण्वीशका, कुण्डोदरीके साथ हरेशका, ऊरध्वकिशीके
साथ ज्जिण्टीशका, विकृतास्याके साथ भौतिकेशका,
ज्वालामुखीके साथ सद्योजातेशका, उल्कामुखीके
साथ अनुग्रहेशका, आस्थाके साथ अक्रूरका,
विद्याके साथ महासेनका, महाकालीके साथ
क्रोधीशका, सरस्वतीके साथ चण्डेशका, सिद्धगौरीके
साथ पञ्चान्तकेशका, त्रैलोक्यविद्याके साथ शिवोत्तमेशका,
मन्त्र-शक्तिके साथ एकरुद्रेशका, कमटठीके साथ
कूर्मेशका, भूतमाताके साथ एकनेत्रेशका, लम्बोद्रीके
साथ चतुर्वक्त्रेशका, द्राविणीके साथ अजेशका,
नागरीके साथ सर्वेशका, खेचरीके साथ सोमेशका,
मर्यादाके साथ लाङ्गलीशका, दारुकेशके साथ
रूपिणीका तथा वीरिणीके साथ अर्धनारीशका
न्यास करना चाहिये । काकोदरीके साथ उमाकान्त
(उमेश) -का ओर पूतनके साथ आपाढीशका
न्यास करे। भद्रकालीके साथ दण्डीशका, योगिनीके
साथ अत्रीशका, शड्खनीके साथ मीनेशका, तर्जनीके
साथ मेषेशका, कालरात्रिके साथ लोहितेशका, कुब्जनीके
साथ शिखीशका, कपर्दिनीके साथ छलगण्डेशका,
वन्राके साथ द्विरण्डेशका, जयाके साथ महाबलेशका,
सुमुखेश्वरीके साथ बलीशका, रेवतीके साथ भुजब्गेशका,
माध्वीके साथ पिनाकीशका, वारूणीके साथ
'ॐ ही श्रीं क्लीं अं क्ली श्रीं हीं केशवकीर्तिभ्यां नमः
(ललाटे) ' एेसा कहकर ललारका स्पर्शं करे। इसी प्रकार "ॐ ही श्री क्लीं आं क्ली श्रीं हीं नारायणकान्तिध्यां
नमः (मुखे) ' एेसा कहकर मुखका स्पर्शं करे । ललाट, मुख आदि जिन-जिन अद्धो मातृका वर्णोका न्यास करना
है, उनका निर्देश मृलमें किया जा रहा है । उन सबके लिये उपर्युक्त रीतिसे वाक्ययोजना करनी चाहिये । तन्त्रे
द्विवचन-विभक्ति तथा शक्ति्याका अन्तमं प्रयोग देखा जानेके कारण द्रन्द्रसमास करके भी स्त्री-लिङ्गका पूर्वनिपात
नहीं किया गया।
२. उदाहरणके लिये वाक्यप्रयोग इस प्रकार है--ह् सौ अं श्रीकण्टेशपूर्णोदरीभ्यां नमः (ललाटे) 1 ह् सौ आं
अनन्तेशविरजाभ्यां नमः (मुखवृत्ते) इत्यादि ।
((-0. 1\॥(111104/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 6810011
४२२
खद्भोशका, वायवीके साथ वकेशका, विदारणीके
साथ श्वेतोरस्केशका, सहजाके साथ भृग्वीशका,
लक्ष्मीके साथ लकुलीशका, व्यापिनीके साथ
शिवेशका तथा महामायाके साथ संवर्तकशका
न्यास करे। यह श्रीकण्ठमातृका कही गयी हे ।
जहां 'ईश' पद न कहा गया हो, वहां सर्वत्र
उसको योजना कर लेनी चाहिये । इस श्रीकण्ठमातृका-
न्यासके दक्षिणामूर्ति ऋषि ओर गायत्री छन्द कहा
गया हे। अर्धनारीश्वर देवता है ओर सम्पूर्ण
मनोरथोकी प्रा्तिके लिये इसका विनियोग कहा
गया हे। इसके हल् बीज ओर स्वर शक्तिर्या हे ।
भृगु (स) -में स्थित आकाश (ह)-को छः दीघेसि
युक्त करके उसके द्वारा अङ्गन्यास करे । इसके
बाद भगवान् शङ्करका इस प्रकार ध्यान करे।
उनका श्रीविग्रह वन्धृकपुप्प एवं सुवर्णके समान
है। वे अपने हार्थोमें वर, अक्षमाला, अदश ओर
पाश धारण करते हे । उनके मस्तकपर अर्धचन्द्रका
मुकुट सुशोभित है। उनके तीन नेत्र है तथा
सम्पूर्णं देवता उनके चरणोंकी वन्दना करते हैँ ।
गाणपत्य-मातृका-न्यास
इस प्रकार शिवशक्तिका ध्यान करके अन्तमें
चतुर्थीं विभक्ति ओर नमः पद जोड़कर तथा
आदिमे गणेशजीका अपना बीज लगाकर
मातृकास्थलमे एक-एक मातृका वण्कि साथ
शक्तिसहित गणेशजीका न्यास करे। हीके साथ
विघ्रेश तथा श्रीके साथ विघ्नराजका न्यास करेः।
पुष्टिकि साथ विनायक, शान्तिके साथ शिवोत्तम,
स्वस्तिसहित विघ्रकृत् सरस्वतीसहित विप्रहता,
स्वाहासहित गणनाथ, सुमेधासहित एकदन्त,
संक्षिप्त नारदपुराण
कान्तिसिहित द्विदन्त, कामिनीसहित गजमुख,
मोहिनीसहित निरञ्जन, नटीसहित कपरदी, पार्वतीसहित
दीर्घजिह्, ज्वालिनीसहित शङ्कुकर्ण, नन्दासहित
वृषध्वज, सुरेशीसहित गणनायक, कामरूपिणीके
साथ गजेन्द्र; उमाके साथ शूर्पकर्ण, तेजोवतीके
साथ विरोचन, सतीके साथ लम्बोदर, वि्रेशीके
साथ महानन्द, सुरूपिणीसहित चतुमूर्ति कामदासहित
सदाशिव, मदजिह्वासहित आमोद, भूतिसहित दुर्मुख,
भोतिकीके साथ सुमुख, सिताके साथ प्रमोद,
रमाके साथ एकपाद, महिषीके साथ द्विजिह्व,
जम्भिनीके साथ शूर, विकणकि साथ वीर,
भ्रुकुटीसहित षण्मुख, लज्ाके साथ वरद, दीर्घघोणाके
साथ वामदेवेश, धनुर्धरीके साथ वक्रतुण्ड, यामिनीके
साथ द्विरण्ड, रात्रिसहित सेनानी, ग्रामणीसहित
कामान्ध, शशिप्रभाके साथ मत्त, लोलनेत्राके साथ
विमत्त, चञ्चलाके साथ मत्तवाह, दीतिके साथ
जटी, सुभगाके साथ मुण्डी, दुर्भगके साथ खद्गी,
शिवाके साथ वरेण्य, भगके साथ वृषकेतन, भगिनीके
साथ भक्त-प्रिय, भोगिनीके साथ गणेश, सुभगके
साथ मेघनाद, कालरात्रिसहित व्यापी तथा कालिकाके
साथ गणेशका अपने अद्धोपें न्यास करना चाहिये।
इस प्रकार विघ्रेश-मातृकाका वर्णन किया गया हे।
गणेशमातृकाके गण ऋषि कहे गये है । निचृद् गायत्री
छन्द हे तथा शक्तिसहित गणेश्वर देवता है । छः दीर्ध
स्वरोसे युक्त गणेशवीज (गां गीं गृ गै गौ गः) के द्वार
अद्धन्यास करके उनका इस प्रकार ध्यान करे
गणेशजी अपने चारों भुजाओमें क्रमशः पाश,
अङ्कूर, अभय ओर वर धारण किये हए है, उनको
पत्री सिद्धि हाथमे कमल ले उनसे सटकर वटी
१. ह सां हदयाय नमः। ह् सीं शिरसे स्वाहा । ह् सूं शिखायै वपट्। ह् सँ कवचाय हुम् । ह् सौ नेत्रत्रयाय वौषट् ।
हसः अस्त्राय फट्।
२. ग अं विघ्नेशदहीभ्यां नम: (ललाटे), गं आं विघ्रराजश्रीभ्यां नमः (मुखवृत्ते) इत्यादि रूपसे वाक्ययोजना कर
लेनी चाहिये।
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 8118801 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद्
४२३
है, उनका शरीर रक्तवर्णका है तथा उनके तीन नेत्र
हे, एेसे गणपतिका मैं भजन करता हूं। इस प्रकार
ध्यान करके स्वकोय बीजको पूर्वाक्षरके रूपमे
रखकर उक्त मातृका-न्यास करना चाहिये।
कला-मातृका-न्यास
(अब कला-मातृका-न्यास बताया जाता है- )
निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति, इन्धिका, दीपिका,
रोचिका, मोचिका, परा, सूक्ष्मा, असृक्ष्मा, अमृता,
ज्ञानामृता, आप्यायिनी, व्यापिनी, व्योमरूपा, अनन्ता,
सृष्टि, समूृद्धिका, स्मृति, मेधा, क्रान्ति, लक्ष्मी, धृति,
स्थिरा, स्थिति, सिद्धि, जरा, पालिनी, क्षान्ति, ईश्वरी,
रति, कामिका, वरदा, हादिनी, प्रीति, दीर्घा, तीक्ष्णा,
रौद्रा, निद्रा, तन्द्रा, क्षुधा, क्रोधिनी, क्रियाकारी, मृत्यु,
पीता, शेता, अरुणा, असिता ओर अनन्ता-इस
प्रकार कलामातृका कही गयी हे। भक्त पुरुष उन-
उन मातृकाओंका न्यास करे। इस कलामातृकाके
प्रजापति ऋषि कटे गये है । इसका छन्द गायत्री
ओर देवता शारदा है । हस्व ओर दीर्घ स्वरके बीचमें
प्रणव रखकर उसीके द्वारा षडद्भन्यास करे (यथा-अं
ॐ आं हृदयाय नमः ' इ ॐ ई शिरसे स्वाहा, ॐ
(व 4
ॐ ऊ शिखायै वषट्, ए ॐ एँ कवचाय हुम् , ओं
ॐ ओं नेत्रत्रयाय वौषट्, अं ॐ अः अस्त्राय
फट् ) । विद्वान् पुरुप मोतियोके आभूषणोसे विभूषित
पञ्चमुखी शारदादेवीका भजन (ध्यान) करे । उनके
तीन नेत्र हँ तथा वे अपने हाथमे पद्म, चक्र, गुण
(त्रिशूल अथवा पाश) तथा एण (मृगचर्म)
धारण करती ह । इस प्रकार ध्यान करके ॐपूर्वक
चतुर्थ्यन्त कलायुक्त मातृकाका न्यास करे (यथा- ॐ
अं निवृत्त्यै नमः ललाटे, ॐ आं प्रतिष्ठायै नमः
मुखवृत्ते इत्यादि )। तदनन्तर मृूलमन्त्रके छहों
अद्खोका न्यास करना चाहिये। "हदय" आदि
चतुर्थ्यन्त पदमे अद्गन्यास- सम्बन्धी जातियोका
संयोग करके न्यास करे । "नमः ', ' स्वाहा ', * वषट्",
"हुम्" " वौषट्" ओर फट्" ये छः जाति्यां कही गयी
है (अर्थात् हृदयाय नमः, शिरसे स्वाहा, शिखायै
वषट्, कवचाय हुम्, नेत्रत्रयाय वौषट्, अस्त्राय
फट्-इस प्रकार संयोजना करे) । तत्पश्चात् आयुध
ओर आभूषणोसहित इषटदेवका ध्यान करके उनकी
मूर्तिमे छः अद्गोका न्यास करनेके पश्चात् पूजन प्रारम्भ
करे। (पूर्व० ६६ अध्याय)
७.4 0 |
[+~ / +~ / र)
देवपूजनकी विधि
सनत्कुमारजी कहते है -- अव मं साधकोंका
अभीष्ट मनोरथ सिद्ध करनेवाली देवपूजाका वर्णन
करता हूं अपने वाम भागमें त्रिकोण अथवा
चतुष्कोणको रचना करके उसकी पूजा करे ओर
अस्त्र-मन्त्रद्रारा उसपर जल चछिडके। तत्पश्चात्
हदयसे आधारशक्तिकी भावनां करके उसमें
अग्रिमण्डलका पूजन करे। फिर अस्त्रवीजसे पात्र
धोकर आधारस्थानमे चमस रखकर उसमें
सूर्यमण्डलको भावना करे । विलोम मातृका मूलका
उच्चारण करते हए उस पात्रको जलसे भरे । फिर
उसमे चन्द्रमण्डलकी पूजा करके पूर्ववत् उसमें
तीर्थोका आवाहन करे। तदनन्तर धेनुमृद्रासे
अमृतीकरण करके कवचसे उसको आच्छादित
करे । फिर अस्त्रसे उसका संक्षालन करके उसके
ऊपर आट वार प्रणवका जप करे । यह मनुष्योके
लिये सर्वसिद्धिदायक सामान्य अर्घ्य बताया गया
है । श्रेष्ठ साधक उस जलमंसे किञ्चित् निकालकर
उसको अपने आपपर तथा सम्पूर्ण पूजन-सामग्रियोपर
पृथक्-पृथक् छिडके। अपने वाम भागमें आगेकी
ओर एक त्रिकोण मण्डल अद्भत करे। उस
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ठर
संक्षिप्त नारदपुराण
त्रिकोणको षट्कोणसे आवृत करके उस सबको
गोल रेखासे धेर दे, फिर सबको चतुष्कोण
रेखासे आवृत करके अर्घ्य जलसे अभिषेक
करे । तत्पश्चात् श्रेष्ट साधक शङ्खमुद्रासे स्तम्भन
करे। आग्नेय आदि चार कोणोमे हदय, सिर,
शिखा ओर कवच ( भुजमूल)--इन चार अब्खोंकी
पूजा करके मध्यभागमें नेत्रकी तथा दिशाओमें
अस्त्रको (पुष्पाक्षत आदिसे) पूजा करे । फिर
त्रिकोण मण्डलके मध्यमे स्थित आधारशक्तिका
मूलखण्डत्रयसे पूजन करे । इस प्रकार विधिवत्
पूजन करके अस्त्र (फट्) -के उच्चारणपूर्वक
प्रक्षालितं को हुईं त्रिपादिका (तिरपाई) स्थापित
करके निम्नाद्भित मन्त्रसे उसकी पूजा करे । "मं
वह्धिमण्डलाय दशकलात्मने.“ देवतार््यपात्रासनाय
नमः आधारपूजनके लिये यह चौबीस अक्षरोका
मन्त्र हे । तत्पश्चात् शङ्खको तत्सम्बन्धी मन्त्रहारा
धोकर उसे स्थापित करनेके अनन्तर उसकी पूजा
करे। शङ्खके स्थापनका मन्त्र इस प्रकार है
पहले तार (ॐ) है, फिर काम (क्लीं) ठै,
उसके बाद ' महा" शब्द है, तत्पश्चात् ' जलचराय '
हे । फिर वर्म (हुम्), ' फट्" ' स्वाहा ' “पाञ्चजन्याय '
तथा हदय (नमः पद्) है । पूरा मन्त्र इस प्रकार
१. धेनुमुद्राका लक्षण इस प्रकार है-
वामाङ्गुलीनां मध्येषु
दक्षमध्यमयोर्वामिां
दक्षयानामया
समज्लना चाहिये-' ॐ क्लीं महाजलचराय हं
फट् स्वाहा पाञ्चजन्याय नमः 1' इसके बाद “ ॐ
अर्कमण्डलाय द्वादशकलात्मने देवार्ध्यपात्राय
नमः' इस तेईस अशक्षरवाले मन्त्रसे शङ्खकी
पूजा करनी चाहिये । (इष्टदेवका नाम जोड़नेसे
अक्षर-संख्या पूरी होती है। उस मन्त्रसे पूजन
करनैके अनन्तर उसमें सूर्यकी बारह कलाओंका
क्रमशः पूजन करे। तत्पश्चात् विलोमक्रमसे
मूलमातृका वर्णोका उच्चारण करते हए शुद्ध
जलसे शङ्खको भर दे ओर उसकी निग्राह्भित
मन्त्रसे पूजा करे-"ॐ सोममण्डलाय
षोडशकलात्मने देवार्घ्यामृताय नमः'।
अर्ध्यपूजनके लिये यही मन्त्र है । फिर उस
जलमे चनद्रमाकौी सोलह कलाओंकी पूजा
करे । तदनन्तर पहले बताये अनुसार “गङ्ख
च यमुने चेव" इत्यादि मन्त्रसे सब तीर्थोका
उसमे आवाहन करके धनुमुद्राद्वाराः उसका
अमृतीकरण. करे ओर मत्स्यमुद्राद्वारारे उसे
आच्छादित करे । फिर कवच (हुं बीज) द्वारा
अवगुण्ठन करके पुनः अस्त्र (फट्)-
द्वारा उसको रक्षा करे। तदनन्तर इष्टदेवका
चिन्तन करके मुद्रा प्रदर्शन करे। शद्ध", मुसलः,
दक्षिणाङ्ुलिकास्तथा। संयोज्य तर्जनीं दक्षां मध्यमानामयोस्तथा॥
तर्जनीं च नियोजयेत्। वामयानामया दक्षकनिष्ठं च नियोजयेत् ॥
वामां कनिष्टं च नियोजयेत्। विहिताधोमुखी चैषा धेनुमुद्रा प्रकीर्तिता॥
` वायं हाथको अंगुलियोके बीचमें दाहिने हाथकौ अंगुलियोंको संयुक्त करके दाहिनी तर्जनीको मध्यमाके बीचमें
लगावे। दाहिने हाथको मध्यमामें वारये हाथकी तर्जनीको मिलावे। फिर बाय हाथकी अनामिकासे दाहिने दहाथकी
कनिष्ठिका _ओर दाहिने हाथको अनामिकाके साथ वाये हाथकी कनिष्ठिकाको संयुक्त करे। फिर इन सबका मुख
नीचेकी ओ करे- यही धेनुमुद्रा कही गयी दै ।'
२. क णको विधि यह है- वं" इस अमृतबीजका उच्चारण करके उस धेनुमुद्राको दिखावे। ३. मत्स्यमुद्रा
इस प्रकार है- वारये हाथके पृष्ट भागपर दाहिने हाथकी हथेली रखे। दोनों अगूरठोको फैलाये रखे। ४. बायीं मुदरी इस
प्रकार बंधं ले, जिससे तर्जनी अली निकली रहे, इस प्रकारक मुद्रीको शङ्खके ऊपर घुमाना अवगुण्ठनी मुद्रा है।
५. शङ्खमुद्राका लक्षण इस प्रकार है-बायं अगृठेको दाहिनी मुद्रीसे पकड़ ले। मुदरी उत्तान करके अंगूठेको फैला दे।
बाय हाथकी चारो अंगुलिर्योको सटी हई रखे ओर उन्हे फैलाकर दाहिने अंगूटेसे सया दे। यह शङ्खकी मुद्रा एर
देनेवाली है। ६. मुसलमुद्रा-
मुष्टं कृत्वा तु हस्ताभ्यां वामस्योपरि दक्षिणम् । कुर्यान्मुसलमुद्रेयं सर्वविघ्रविनाशिनी ॥
दोनों हाथको मुद्धी बोधकर वार्यीके ऊपर दाहिनी मुदरी रख दे। यह सब वि्रोका नाश करनेवाली मुसलमुदरा
कही गयी है।
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 8118811 \/8181185। (01661011. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
४२५
चक्र ^, परमीकरणर, महामुद्रा, तथा योनिमुद्राका,
विद्वान् पुरुष क्रमशः प्रदर्शन करावे। गारुड़ी+ ओर
गालिनीः- ये दो मुद्रा मुख्य कही गयी है । गन्ध-
पुष्प आदिसे वहाँ देवताका पूजन ओर स्मरण करे।
आठ बार मूल मन्त्रका तथा आठ बार प्रणवका
जप करे । शङ्खसे दक्षिण दिशाको ओर प्रोक्षणीपात्र
रखे । शङ्खका थोडा-सा जल प्रोक्षणीपात्रमें डालकर
उससे अपने ऊपर तीन बार अभिषेक करे। उस
समय क्रमशः इन तीन मन्त्रोका उच्चारण करे-' ॐ
आत्मतत्त्वात्मने नमः, ॐ विद्यातत्त्वात्मने नमः, ॐ
शिवतत््वात्मने नमः।' विद्वान् पुरुष इन मन्त्रोद्रारा
अपने साथ ही उस मण्डलका भी विधिवत् प्रोक्षण
करे ओर उसमें पुष्प तथा अक्षत भी बिखेरे अथवा
मूलगायत्रीसे पूजाद्रव्योका प्रोक्षण करे। फिर किसी
आधार (चौकी)-पर पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय
तथा मधुपर्कके लिये अपने आगे अनेक पात्र
विधिवत् रख ले । श्यामाक (सार्वं), दूर्वा, कमल,
विष्णुक्रान्ता नामक ओषधि ओर जल-इनके
मेलसे भगवान्के लिये पाद्य बनता है। फूल,
अक्षत, जौ, कुशाग्र, तिल, सरसो, गन्ध तथा
१. चक्रमुद्रा-
दूर्वादल, इनके द्वारा भगवान्के लिये अर्घ्य देनेकी
विधि है । आचमनके लिये शुद्ध जलम जायफल,
कंकोल ओर लवङ्ग मिलाकर रखना चाहिये।
मधु, घी ओर दहीके मेलसे मधुपर्क बनता है।
अथवा एक पात्रमें पाद्य आदिक व्यवस्था करे।
भगवान् शङ्कर ओर सूर्यदेवके पूजनमें शङ्खमय
पात्र अच्छा नहीं माना गया है। श्वेत, कृष्ण,
अरुण, पीत, श्याम, रक्त, शुक्ल, असित (काली),
लाल वस्त्र धारण करनेवाली ओर हाथमे अभयकौ
मुद्रासे युक्त पीठ-शक्तियोंका ध्यान करना चाहिये।
सुवर्णं आदिके पत्रपर लिखे हए यन्त्रमे, शालग्राम-
शिलाम, मणिमें अथवा विधिपूर्वक स्थापित कौ
हुई प्रतिमामें इष्टदेवको पूजा करनी चाहिये । घरमे
प्रतिदिन पूजाके लिये वही प्रतिमा कल्याणदायिनी
होती है जो स्वर्णं आदि धातुओंकी बनी हो ओर
कम-से-कम अंगूठेके बरावर तथा अधिक-से-
अधिक एक वित्तेकी हो। जो टेद्री हो, जली हई हो,
खण्डित हो, जिसका मस्तक या आख फूटी हई हो
अथवा जिसे चाण्डाल आदि अस्पृश्य मनुष्योने छ
दिया हो, वैसी प्रतिमाकी पूजा नहीं करनी चाहिये ।
हस्तौ च सम्मुखौ कृत्वा सुभूग्र सुप्रसारितौ। कणिषठाङ्गुष्टठको लग्रौ मुद्रैषा चक्र संञिका ॥ थ
दोनों हाधोको आमने-सामने करके उन्हे भलीभति फैलाकर मोड़ दं ओर दोनों कनिष्ठिकाओं तथा अ परस्पर
सय दे। यह चक्रमुद्रा है। २. दोनों हार्थोकी अंगुलिर्योको परस्पर सयाकर हार्थोको अलग रखे- यही परमीकरण मुद्रा है।
३. महतुद्रा--
अन्योऽन्यग्रधिताङ्गुष्टा
प्रसारितकराङ्गुली |
महामुद्रेयमुदिता परमीकरणे वुधैः॥
अंगृठोको परस्पर ग्रथितं करके दोनों हार्थोको अगुलि्योको ० दे। विद्रानोने इसीको परमीकरणमं महामुद्रा
कहा है । ४. दोनों हाथोको उत्तान रखते हए दाये हाथकौ अनामिकासे बायें हाथकौ तर्जनीको ओर् वार्य हाधकौ
अनामिकासे दायें हाथकी तर्जनीको पकड़ ले ओर दोनों मध्यमाओं तथा कनिष्टिकाओंको परस्पर सटी रखकर दोनों
अङ्गष्ठोको तर्जनीके मृलसे मिलाये रखे- यही योनिमुद्रा है ।
५. गरुडमुद्राका लक्षण इस प्रकार है-
सम्मुखौ तु करौ कृत्वा ग्रन्थयित्वा कनिष्ठिके। पुनश्चाधोमुखे कृत्वा तर्जन्यौ योजयेत्तयोः॥
मध्यमानामिके द्व तु पक्षाविव विचालयेत्। मुद्रैषा पक्षिराजस्य सर्वविघ्रनिवारिणी॥
(मन्त्रमहोदधि)
दोनों हार्थोको सम्मुख करके दोनों कनिषिकाओंको प बद्ध कर् दे ओर् अधोमुख करके उनमें तर्जनिर्योको
मिला दे। फिर मध्यमा ओर अनामिकाओंको पाकी भति हिलावे। यह गरुडमुद्रा सव विग्राका निवारण करनेवाली दै।
६. म. #ै सक्तौ करयोरितेतरम् । तर्जनीमध्यमानामा; संहता भुग्रवर्जिताः ॥
दोनीं हाथोकी
षिका ओर अओगटे परस्पर सटे रहे ओर तर्जनी, मध्यमा तथा अनामिका अंगुलियों सीधी-
सीधी रहकर परस्पर मिली रहें । यह गालिनीमुद्रा कही गयी दै ।
((-0. ८1114451 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
४२६ संक्षिप्त नारदपुराण
अथवा समस्त शुभ लक्षणोसे सुशोभित बाण आदि
लिङ्घर्मे पूजा करे या मूलमन््रके उच्चारणपूर्वक
मृतिका निर्माण करके इषटदेवके शास्त्रोक्त स्वरूपका
ध्यान करे। फिर उसमे देवताका परिवारसहित
आवाहन करके पूजा करे। शालग्रामशिलामें तथा
पहले स्थापित को हई देवप्रतिमामें आवाहन ओर
विसर्जन नहीं किये जाते।
तदनन्तर पुष्पाञ्जलि लेकर इषटदेवका ध्यान
करते हुए इस मन्त्रका उच्चारण करे-
आत्मसंस्थमजं शुद्धं त्वामहं परमेश्वर
अरण्यामिव हव्याशं मूर्तावावाहयाम्यहम्॥
तवेयं हि महाम्मूतिस्तस्यां त्वां सर्वगं प्रभो।
भक्तस्ेहसमाकृष्ं दीपवत्स्थापयाम्यहम्॥
सर्वान्तर्यामिणे देव सर्वबीजमयं शुभम्।
स्वात्मस्थाय पर शुद्धमासनं कल्पयाम्यहम्
अनन्या तव देवेश मूर्तिशक्तिरियं प्रभो।
सांनिध्यं कुरु तस्यां त्वं भक्तानुग्रहकारक ॥
अज्ञानादुत मक्तत्वाद् वैकल्यात्साधनस्य च।
यद्यपूर्ण भवेत् कल्पं तथाप्यभिमुखो भव ॥
दृशा पीयूषकर्षिण्या पूरयन् यज्ञविष्टर।
मूर्तो वा यज्ञस्मम्पूरत्ये स्थितो भव महेश्चर॥
अभक्तवाड्मन श्क्षुःश्रोत्रदूरायितद्युते ।
स्वतेजःपञ्चरेणाशु वेष्टितो भव सर्वतः॥
यस्य दर्शनमिच्छन्ति देवाः स्वाभीष्टसिद्धये।
तस्मै ते परमेश्टाय स्वागतं स्वागतं च मे॥
कृतार्थोऽनुगृही तोऽस्मि सफलं जीवितं मम।
आगतो देवदेवेशः सुखागतमिदं पुनः॥
(ना० पूर्वे ६७। ३७- ४५)
परमेश्वर ! आप अपने-आपमें स्थित, अजन्मा
एवं शुद्ध-बुद्ध-स्वरूप टं । जेसे अरणीमें अग्रि
चिपी हुई हे, उसी प्रकार इस मूर्तिमे आप
गृढरूपसे व्याप्त है, मे आपका आवाहन करता हूं ।
प्रभो! यह आपक्को महामूर्ति है, में इसके भीतर
आप सर्वव्यापी परमात्माको, जो कि भक्तके प्रति
स्नेहवश स्वयं खिच आये है, दीपकी भति
स्थापित करता हूं देव ! अपने अन्तःकरणमें
स्थित आप सर्वान्तर्यामी प्रभुके लिये में सर्वबीजमय,
शुभ एवं शुद्ध आसन प्रस्तुत करता हूं । देवेश! यह
आपको अनन्य मूर्ति-शक्ति है । भक्तोपर अनुग्रह
करनेवाले प्रभो! आप इसमे निवास कोजिये।
अज्ञानसे, प्रमादसे अथवा साधनहीनताके कारण
यदि मेरा यह अनुष्ठान अपूर्ण रह जाय तो भी आप
अवश्य सम्मुख हों । महेश्वर ! आप अपनी सुधावर्षिणी
दृष्द्रारा सव त्रुटियोंको पूर्णं करते हुए यज्ञको
पूर्णताके लिये इस यन्ञासनपर अथवा मूर्तिमें स्थित
होइये। आपका प्रकाश या तेज अभक्त जनोके
मन, वचन, नेत्र ओर कानसे कोसों दूर है।
भगवन्! आप सब ओर अपने तेजःपुञ्जसे शीघ्र
आवृत हो जाइये । देवतालोग अपने अभीष्ट मनोरथकी
सिद्धिके लिये सदा जिनका दर्शन चाहते है, उन्हीं
आप परमेश्चरके लिये मेरा बारम्बार स्वागत है,
स्वागत हे । देवदेवेश्वर प्रभु आ गये । मेँ कृतार्थ हो
गया। मुञ्जपर बड़ी कृपा हुई । आज मेरा जीवन
सफल हो गया। मैं पुनः इस शुभागमनके लिये
प्रभुका स्वागत करता हूं
पाद्य
यद्धक्तिलेशसम्पर्कात् परमानन्दसम्भवः।
तस्मै ते चरणान्नाय पाद्यं शुद्धाय कल्प्यते ॥४६॥
जिनकी लेशमात्र भक्तिका सम्पर्क होनेसे
परमानन्दका समुद्र उमड़ आता है, आपके उन
शुद्ध चरण-कमलोके लिये पाद्य प्रस्तुत किया
जाता हे।
अर्घ्यं
तापत्रयहरं दिव्यं परमानन्दलक्षणम्।
तापत्रयविनिर्मुक्ल्यै तवार्घ्य कल्पयाम्यहम्॥ ४८॥
देव } मैं तीन प्रकारके तापोसे दछुटकारा पानेके
((-0. 1/८111(4/5511॥ 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद्
2२७
लिये आपकी सेवामें त्रितापहारी ॑ परमानन्दमय ज्ञानके अगाध महासागरमें निम्र
दिव्य अर्घ्य अर्पण करता हूं।
आचमनीय
वेदानामपि वेदाय देवानां देवतात्मने।
आचामं कल्पयामीश शुद्धानां शुद्धिहेतवे ॥ ४७॥
भगवन्! आप वेदोके भी वेद ओर देवताओंके
भी देवता हें । शुद्ध पुरुषोंकी भी परम शुद्धिके
हेतु हें। मं आपके लिये आचमनीय प्रस्तुत
करता हूं ।
मधुपक
सर्वकालुष्यहीनाय परिपूर्णसुखात्मने।
मधुपर्कमिदं देव कल्पयामि प्रसीद मे॥४९॥
देव! आप सम्पूर्णं कलुषतासे रहित तथा
परिपूर्ण सुखस्वरूप है, में आपके लिये मधुपर्कं
अर्पण करता हूं। मुञ्पर प्रसन्न होडये ।
पुनराचमनीय
उच्छिष्टोऽप्यशुचिर्वापि यस्य स्मरणमात्रतः।
शुद्धिमाप्नोति तस्मै ते पुनराचमनीयकम् ॥ ५०॥
जिनके स्मरण करनेमात्रसे जूंठा या अपवित्र
मनुष्य भी शुद्धि प्राप्त कर लेता है, उन्हीं आप
परमेश्वरके लिये पुनः आचमनार्थं (जल) उपस्थित
करता हूं ।
स्नेह ( तेल )
स्रं गृहाण स्नेहेन लोकनाथ महाशय ।
सर्वलोकेषु शुद्धात्मन् ददामि स्ेहमुत्तमम्॥५९॥
जगदीश्वर! आपका अन्तःकरण विशाल हे।
सम्पूर्णं लोकोमें आप ही शुद्ध-वुद्ध आत्मा है, म॑
आपको यह उत्तम सेह (तैल) अर्पण करता हूः
आप इस स्रेहको स्नेहपूर्वक ग्रहण कीजिये ।
स्नान
परमानन्दबोधाव्धिनिमग्रनिजमूर्तये 1
साङ्कोपाङ्गमिदं स्नानं कल्पयाम्यहमीश ते ॥५२॥
ईश! आपका निज स्वरूप तौ निरन्तर
रहता हे, (आपके लिये वाह्य स्नानको क्या
आवश्यकता है 2) तथापि में आपके लिये यह
साङ्गोपाङ्ग स्ानकी व्यवस्था करता हूं।
अभिषेक
सहस्रं वा शतं वापि यथाशक्त्यादरेण च।
गन्धपुष्पादिकेरीश मनुना चाभिपिञ्छये ॥ ५३॥
ईश! म आदरपूर्वक यथाशक्ति गन्धपुष्प
आदिसे तथा मन्तरद्रारा सहस्र अथवा सौ बार
आपका अभिषेक करता हू
वस्त्र
मायाचित्रपटच्छन्ननिजगुह्योरुतेजसे ।
निरावरणविज्ञान वासस्ते कल्पयाम्यहम् ॥ ५४॥
निरावृतविज्ञानस्वरूप परमेश्वर ! आपने मायारूप
विचित्र परके द्वारा अपने महान् तेजको छिपा रखा
है । में आपके लिये वस्त्र अर्पण करता ह्ं।
उत्तरीय
यमाश्रित्य महामाया जगत्सम्मोहिनी सदा।
तस्मै ते परमेशाय कल्पयाम्युत्तरीयकम्॥ ५५॥
जिनके आश्रित रहकर भगवती महामाया सदा
सम्पूर्ण जगत्को मोहित किया करती है, उन्हीं
आप परमेश्वरके लिये मँ उत्तरीय अर्पण करता हू ।
दुर्गा देवी, भगवान् सूर्य तथा गणेशजीके लिये
लाल वस्त्र अर्पण करना चाहिये । भगवान् विष्णुको
पीत तस्त्र ओर भगवान् शिवको धेत वस्र चदाना
चाहिये। तेल आदिसे दूषित फटे-पुराने मलिन
वस्त्रको त्याग दे।
यज्ञोपवीत
यस्य शक्तित्रयेणेदं सम्प्रीतमखिलं जगत्।
यन्नसूत्राय तस्यै ते यज्ञसूत्रं प्रकल्पये ५७॥
जिनकी त्रिविध शक्तियांसे यह सम्पूर्णं जगत्
सदा तृष रहता दे, जौ स्वयं ही यज्ञसूत्ररूप है,
उन्हीं आप प्रभुको मै यज्ञसूत्र अर्पण करता हू
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
२८
भूषण
स्वभावसुन्दराङ्काय नानाशक्त्याश्रयाय ते।
भूषणानि विचित्राणि कल्पयाम्यमरायित ।॥ ५४॥
देवपूजित प्रभो! आपके श्रीअङ्ध स्वभावसे ही
परम सुन्दर हैं । आप नाना शक्तियोके आश्रय हँ
मे आपको ये विचित्र आभूषण अर्पण करता हू।
गन्ध
परमानन्दसोरभ्यपरिपूर्णदिगन्तरम् ।
गृहाण परमं गन्धं कृपया परमेश्वर ॥ ५९॥
परमेश्वर ! जिसने अपनी परमानन्दमयी सुगन्धसे
सम्पूर्ण दिशाओंको भर दिया है, उस परम उत्तम
दिव्य गन्धको आप कृपापूर्वक स्वीकार करें|
पुष्य
तुरीयवनसभूतं नानागुणमनोहरम्।
अमन्दसोरभं पुष्पं गृह्यतामिदमुत्तमम्॥ ६०॥
प्रभो ! तीनों अवरस्थाओंसे परे तुरीयरूपी वनमें
प्रकर हुए इस परम उत्तम दिव्य पुष्पको ग्रहण
कीजिये । यह अनेक प्रकारके गुणोके कारण अत्यन्त
मनोहर हे, इसको सुगन्ध कभी मन्द नहीं होती
केतकी, कुटज, कुन्द, बन्धूक (दुपहरिया),
नागकेसर, जवा तथा मालती-ये फूल भगवान्
शङ्करको नहीं चढाने चाहिये । मातुलिब्ग (विजौरा
नीवू) ओर तगर कभी सूर्यको नहीं चढ़ावे । दूर्वा,
आक ओर मदार-ये सब दुर्गजीको अर्पण न
करे तथा गणेश-प्रूजनमे तुलसीको सर्वथा त्याग
दे। कमल, दोना, मरुआ, कुश, विष्णुक्रान्ता, पान,
दुर्वा, अपामार्ग, अनार, ओंवला ओर अगस्त्यके
पत्रोसे देवपूजा करनी चाहिये । केला, वेर, अविला,
इमली, विजौरा, आम, अनार, जंबीर, जामुन ओर
कटहल नामक वृक्षके फलोसे विद्वान् पुरुष
देवताकी पूजा करे । सूखे पत्तो, फूलों ओर फलोसे
कभी देवताका पूजन न करे । मुने ! ओंवला, खैर,
विल्व ओर तमालके पत्र यदि छिन्न-भिन्न भी हों
सक्षि नारदपुराण
तो विद्वान् पुरुष उन्हे दूषित नहीं कहते। कमल
ओर ओंवला तीन दिनतक शुद्ध रहता है।
तुलसीदल ओर बिल्वपत्र-ये सदा शुद्ध होते हे ।
पलाश ओर कासके फूलोंसे तथा तमाल, तुलसी,
ओंवला ओर दूवकि पत्तोसे कभी जगदम्बा दुर्गाजीकी
पूजा न करे। फूल, फल ओर पत्रको देवतापर
अधोमुख करके न चटावे। ब्रह्मन्! पत्र-पुष्प
आदि जिस रूपमे उत्पन्न हो, उसी रूपमे उन्हें
देवतापर चढाना चाहिये ।
धूप
वनस्पतिरसं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्।
आघ्रेयं देवदेवेश धूपं भक्त्या गृहाण मे ॥७९॥
देवदेवेश्वर ! यह सूंघने योग्य धूप भक्तिपूर्वक
आपकी सेवामें अर्पित है, इसे ग्रहण करे । यह
वनस्पतिका सुगन्धयुक्तं परम मनोहर दिव्य रस है।
दीप
सुप्रकाशं महादीपं सर्वदा तिमिरापहम्।
घूतवर्तिसमायुक्तं गृहाण मम सत्कृतम्॥७२॥
भगवन्! यह घीकी बत्तीसे युक्त महान् दीप
सत्कारपूर्वक आपकी सेवामें समर्पित हे। यह
उत्तम प्रकाशसे युक्त ओर सदा अन्धकार दूर
करनेवाला हे। आप इसे स्वीकार करं ।
नैवेद्य
अत्रे चतुर्विधं स्वादु रसेः षड्भिः समन्वितम्।
भक्त्या गृहाण मे देव नैवेद्यं तुष्टिदं सदा ॥७३॥
देव ! यह छः रसोसे संयुक्त चार प्रकारका
स्वादिष्ट अन्न भक्तिपूर्वक नैवेद्यके रूपमे समर्पित
हे, यह सदा संतोष प्रदान करनेवाला है । आप इसे
ग्रहण करे ।
ताम्बूल
नागवष्टीदलं श्रेष्ठं पूगखादिरचूर्णयुक् ।
कर्पुरादिसुगन्धाद्यं यदत्तं तद् गृहाण मं ॥ ७४॥
प्रभो! यह उत्तम पान सुपारी, कत्था ओर
((-0. 1/८1111(4<511॥1 81188 \/81811851 (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
चूनासे संयुक्त हे, इसमे कपूर आदि सुगन्धित
वस्तु डाली गयी हे; यह जो आपकी सेवामें
अर्पित हे, इसे मुङ्ञसे ग्रहण करे ।
तत्पश्चात् पुष्पाञ्जलि दे ओर आवरण
करे। जिस दिशाकी ओर मह करके पूजन करे
उसीको पूर्वं दिशा समस्मे ओर उससे भिन्न दसों
दिशाओंका निश्चय करे। कमलके केशरोम अग्रिकोण
आदिसे आरम्भ करके हदय आदि अङ्खोको पूजा
करे। अपने आगे नेत्रको ओर सब दिशाओमें
अस्त्रको अद्घ-मन्त्रोद्रारा क्रमशः पूजा करे। क्रमशः
शुक्ल, श्त, सित, श्याम, कृष्ण तथा रक्त वर्णवाली
अद्धशक्तियोका अपनी-अपनी दिशाओमे ध्यान
करना चाहिये। उन सबके हाथमे वर ओर
अभयकौ मुद्रा सुशोभित है। "अमुक आवरणके
अन्तर्वर्ती देवताओंको पूजा करता हं ' एेसा कहे ।
तत्पश्चात् अलंकार, अङ्घ, परिचारक, वाहन तथा
आयुधोंसहित समस्त देवताओंकी पूजा करके यह
कहे “उपर्युक्त सब देवता पूजित तथा तर्पित होकर
वरदायक हों" । मूलमन्त्रके अन्मे निम्राङ्भित वाक्यका
उच्चारण करके इष्टदेवको पूजा समर्पित करे-
अभीष्टसिद्धि मे देहि शरणागतवत्सल ।
भक्त्या समर्पये तुभ्यममुकावरणार्यनम्॥ ८९-८२॥
“शरणागतवत्सल! मुञ्चे अभीषएटसिद्धि प्रदान
कोजिये। में आपको भक्तिपूर्वक अमुक आवरणकं
पूजा समर्पित करता हू। (अमुकके स्थानपर "प्रथम
या "द्वितीय" आदि पद बोलना चाहिये) ।'
एेसा कहकर ईषटदेवके मस्तकपर पुष्पाञ्जलि
विखेरे। तदनन्तर कल्पोक्त आवरणोको क्रमशः
पूजा करनी चाहिये। आयुध ओर वाहनोंसखदहित
इन्द्र आदि ही आवरण देवता है । उनका अपनी -
अपनी दिशाओमें पूजन करे। इन्द्र, अग्नि, यम,
निर्ऋति, वरुण, वायु, सोम, ईशान, ब्रह्मा तथा
नागराज अनन्त-ये दस देवता अथवा दिक्पाल
+ # ॐ णः
२९
प्रथम आवरणके देवता हैँ । एेरावत, भेड, भसा,
प्रेत, तिमि (मगर), मृग, अश्च, वृषभ, हंस ओर
कच्छप--ये विद्वानोद्वारा इन्द्रादि देवताओकि वाहन
माने गये हं, जो द्वितीय आवरणमें पूजित होते हैँ ।
वज्र, शक्ति, दण्ड, खङ्ग, पाश, अङ्कश, गदा,
त्रिशूल, कमल ओर चक्र-ये क्रमशः इन्द्रादिके
आयुध है (जो तृतीय आवरणमें पूजित होते है) |
इस प्रकार आवरणपूजा समाप्त करके भगवान्की
आरती करे। फिर शङ्खका जल चारों ओर
छिडककर ऊपर र्बोह उठाये हुए भगवान्का नाम
लेकर नृत्य करे ओर दण्डको भांति पृथ्वीपर
पड़कर साष्टाङ्ग प्रणाम करे। उसके बाद उठकर
अपने ईष्टदेवकी प्रार्थना करे । प्रार्थनाके पश्चात्
दक्षिण भागमें वेदी बनाकर उसका संस्कार करे।
मूलमन्त्रसे ईक्षण, अस्त्र (फट्) -द्वारा प्रोक्षण ओर
कुशोसे ताडन (मार्जन) करके कवच (हुम्) के
द्वारा पुनः वैदीका अभिषेक करे! उसके वाद्
वेदीकी पूजा करके उसपर अग्निको स्थापना करे ।
फिर अग्निको प्रज्वलित करके उसमें इष्टदेवका
ध्यान करते हुए आहति दे । समस्त महाव्याहतियोसे
चार बार घीकी आहुति देकर उत्तम साधक भात,
तिल अथवा घृतयुक्तं खीरद्वारा पचीस आहुति
करे। फिर व्याहतिसे होम करके गन्ध आदिके
दवारा पुनः इष्टदेवकी पूजा करे। भगवान्की मूर्तिमें
अग्निके लीन होनेकौ भावना करे। उसके बाद
निम्राड्धित प्रार्थना पदढकर अग्रिका विसर्जन करे-
भो भो वदे महाशक्ते सर्वकर्मप्रसाधक।
कर्मान्तििऽपि सम्प्राप्त सान्निध्यं कुरु सादरम्॥ ९३॥
हे अग्निदेव! आपकी शक्ति बहुत बड़ी दै।
आप सम्पूर्णं कर्मोकी सिद्धि करानेवाले है।
कोई दूसरा कार्य प्राप्त होनेपर भी आप यद्य
मादर पधार ।
इस प्रकार विसर्जन करके अग्रिदेवताके लिये
((-0. 1/८1111(4<511॥ 8118811 \/8181185। 01661101. 0141260 0 68110011
39
संक्षिप्त नारदपुराण
आचमनार्थं जल दे। फिर बचे हुए हविष्यसे | करनेवाले हैँ । आप मेरेद्रारा किये गये इस जपको
इष्टदेवको, पूर्वोक्त पार्षदोंको भी गन्ध, पुष्प ओर
अक्षतसहित बलि -दे। इसके बाद सव दिशाओमें
योगिनी आदिको व्लि अर्पण करे।
ये रौद्रा रोद्रकर्म्माणो रौद्रस्थाननिवासिनः।
योगिन्यो दयुग्ररूपाश्च गणानामधिपाश्च ये॥
विघ्नभूतास्तध्रा चान्ये दिग्विदिक्षु समाश्रिताः ।
सवे ते प्रीतमनसः प्रतिगृह्णन्त्विमं बलिम्॥
(९५--९७)
जो भयंकर है, जिनके कर्मं भयंकर है, जो
भयंकर स्थानोमें निवास करते हँ, जो उग्र रूपवाली
योगिनियां हँ, जो गणोके स्वामी तथा विघ्रस्वरूप
हे ओर प्रत्येक दिशा तथा विदिशामें स्थित हैँ, वे
सव प्रसन्नचित्त होकर यह बलि ग्रहण करें ।
इस प्रकार अनाठों दिशाओमें बलि अर्पण
करके पुनः भूतवलि दे। तत्पश्चात् धेनुमुद्राहारा
जलका अमृतीकरण करके इष्टदेवताके हाथमें
पुनः आचमनीयके लिये जल दे। फिर मूर्तिमें
स्थित देवताका किसर्जन करके पुनः उस मूर्तिमें
ही उनको प्रतिष्ठित करे। तत्पश्चात् भगवत्प्रसादभोजी
पार्षदको नैवेद्य दे। महादेवजीके " चण्डेश भगवान्
विष्णुके विष्वक्सेन ' सूर्यके ' चण्डांशु" गणेशजीके
` वक्रतुण्ड! ओर भगवती दुर्गाकी “उच्छिष्ट
चाण्डाली '-ये सव उच्छिष्टभोजी कहे गये हें ।
तदनन्तर मूलमनन्त्रके ऋषि आदिका स्मरण
करके मूलसे ही षडद्ग-न्यास करे ओर यथाशक्ति
मन्त्रका जप करके देवताको अर्पित करे।
गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं -गृहाणास्मतकृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादात्वयि स्थिता ॥ १०२॥
' देव! आप गुह्यसे अतिगुह्य वस्तुक भी रक्षा
ग्रहण करे । आपके प्रसादसे आपके भीतर रहनेवाली
सिद्धि मुञ्चे प्राप्त हो।'
इसके बाद पराद्ूमुख अर्ध्य देकर फूलोसे
पूजा करे । पूजनके पश्चात् प्रणाम करना चाहिये।
दोनों हाथोसे, दोनों पेरोसे, दोनों घुटनोंसे, छातीसे,
मस्तकसे, नेत्रोसे, मनसे ओर वाणीसे जो नमस्कार
किया जाता है उसे “ अष्टाङ्ग प्रणाम ' कहा गया हे।
दोनों बाहुओंसे, घुटनोसे, छातीसे, मस्तकसे जो
प्रणाम किया जाता है, वह पञ्चाङ्ग प्रणाम" है।
पूजाम ये दोनों अष्टाङ्ग ओर पञ्चाङ्ग प्रणाम श्रेष्ठ
माने गये है । मन्त्रका साधक दण्डवत्-प्रणाम करके
भगवानूकी परिक्रमा करे। भगवान् विष्णुकी चार बार,
भगवान् शङ्करको आधी बार, भगवती दुर्गाकी एक
बार, सूर्यको सात वार ओर गणेशजीकी तीन बार
पचरिमा करनी चाहिये । तत्पश्चात् मन्त्रोपासक भक्ति-
पूर्वक स्तोत्र-पाठ करे। इसके बाद इस प्रकार कहे-
ॐ इतः पूर्वं प्राणवुद्धिदेहधर्माधिकारतो
जाग्रत्स्वप्रसुषुष्त्यवस्थासु मनसा वाचा हस्ताभ्यां
पद्भ्यामुदरेण शिश्नेन यत्स्मृतं यदुक्तं यत्कृतं
तत्सर्वं ब्रह्मार्पणं भवतु स्वाहा। मां मदीयं च सकलं
विष्णवे ते समर्पये ॐ तत्सत्॥१
यह विद्वानोने ब्रह्यार्पण मन्त्र" कहा है । इसके
आदिमं प्रणव हे, उसके वाद बयासी अशक्षरोका
यह मन्त्र हे, इसीसे भगवान्को आत्म-समर्पण
करना चाहिये । इसके बाद नीचे लिखे अनुसार
क्षमा-प्रार्थना करे-
अज्ञानाद्वा प्रमादाद्र वैकल्यात् साधनस्य च।
यत्नयूनमतिरिक्तं वा तत्सर्वं क्षन्तुमर्हसि॥
द्रव्यहीनं क्रियाहीनं मन्त्रहीनं मयान्यथा।
१. इसका भावार्थं इस प्रकार है- "इससे पहले प्राण, वुद्धि, देहधर्मके अधिकारसे जाग्रत्, स्वप्र, सुपुपि अवस्थाओनिं
मनसे, वाणीसे, दोनों हाथोसे, चरणोसे, उदरसे, लिद्गसे ने जो कुछ सोचा है, जो बात कही है तथा जो कर्म किया है,
वह ब्रहयर्पण हो, स्वाहा । मै अपनेको ओर अपने सर्वस्वको आप श्रीविष्णुकी सेवामे समर्पित करता हँ । ॐ तत्सत्।'
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
कृतं यत्तत् क्षमस्वेश कृपया त्वं दयानिधे ॥
यन्मया क्रियते कर्म जाग्रत्स्वप्रसुषुपिषु।
तत्सर्व तावकी पूजा भूयाद् भूत्य च ये प्रभो ॥
भूमौ स्खलितपादानां भूमिरेवावलम्बनम्।
त्वयि जातापराधानां त्वमेव शरणं प्रभो ॥
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम।
तस्मात् कारुण्यभावेन क्षमस्व परमेश्वर ॥
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निंशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा श्चमस्व जगतां पते ॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चेव न जानामि त्वं गतिः परमेश्वर ॥
(ना० पू० ६७। ११०- ११७)
"भगवन्! अन्ञानसे, प्रमादसे तथा साधनकौ
कमीसे मेरेद्रारा जो न्यूनता या अधिकताका दोष
बन गया हो, उसे आप क्षमा केरेगे। ईश्वर!
दयानिधे! मैने जो द्रव्यहीन, क्रियाहीन तथा
मन्त्रहीन विधिविपरीत कर्म किया है, उसे आप
कृपापूर्वक क्षमा करे। प्रभो! मैने जाग्रत्, स्वप्र
ओर सुषुपि-अवस्थाओमिं जो कर्म किया है, वह
सव आपकी पूजारूप हो जाय ओर मेरे लिये
कल्याणकारी हो । धरतीपर जो लडखड़ाकर गिरते
है, उनको सहारा देनेवाली भी धरती ही है, उसी
प्रकार आपके प्रति अपराध करनेवाले मनुष्योके
लिये भी आप ही शरणदाता हँ, परमेश्वर ! आपके
सिवा दूसरा कोई शरण नहीं है। आप ही मेरे
शरणदाता हैँ । अतः करुणापूर्वक मेरी त्रुटियोंको
क्षमा करें । जगत्पते 2 मेरेद्रारा रात-दिन सहस
अपराध वनते है । अतः "यह मेरा दास ठै ।' एसा
समञ्जकर क्षमा करें । परमेश्वर ! म आवाहन करना
नहीं जानता, विसर्जन भी नहीं जानता ओर पूजा
करना भी अच्छी तरह नहीं जानता, अव आप ही
मेरी गति है- सहारे है ।'
इस प्रकार प्रार्थना करके मन्त्रका साधक
४३९१
मूलमन्त्र पद्कर विसर्जनके लिये नीचे लिखे
श्लोकका पाठ करे ओर पुष्पाञ्जलि दे-
गच्छ गच्छ परं स्थानं जगदीश जगन्मय।
यत्न ब्रह्मादयो देवा जानन्ति च सदाशिवः ॥ ३१८ ॥
"जगदीश! जगन्मय । आप अपने उस परम
धामको पधारिये, जिसे ब्रह्मा आदि देवता तथा
भगवान् शिव भी नहीं जानते हैँ ।'
इस प्रकार पुष्पाञ्जलि देकर संहार-मुद्राके
द्वारा भगवानूको उनके अङ्गभूत पार्षदोंसहित सुषुम्णा
नाडीके मार्गसे अपने हदयकमलर्मे स्थापित करके
पुष्प सूंघकर विद्वान् पुरुष भगवान्का विसर्जन
करे। दो शङ्ख, दो चक्रशिला (गोमतीचक्र), दो
शिवलिङ्ग, दो गणेशमूर्ति दो सूर्यप्रतिमा ओर
दुर्गाजीकी तीन प्रतिमाओंका पूजन एक घरमे नहीं
करना चाहिये; अन्यथा दुःखकी प्राति होती दै।
इसके वाद निग्राद्भित मन्त्र पढ़कर भगवान्का
चरणामृत पान करे-
अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।
सर्वपापक्षयकरं विष्णुपादोदकं शुभम्॥ १२१-१२२॥
` भगवान् विष्णुका शुभ चरणामृत अकालमूत्युका
अपहरण, सम्पूर्ण व्याधियोंका नाश तथा समस्त
पापोका संहार करेवाला है।'
भित्न-भिन्न देवताओंके भक्तोंको चाहिये कि
वे अपने आराध्यदेवको निवेदित किये हए नैवेद्य-
प्रसादको ग्रहण करे। भगवान् शिवको निवेदित
निर्माल्य-- पत्र, पुष्प, फल ओर जल ग्रहण करने
योग्य नहीं है, किंतु शालपग्राम-शिलाका स्पर्शं
होनेसे वह सब पवित्र (ग्राह्य) हो जाता ह।
पूजाके पोच प्रकार
नारद! सवने पोच प्रकारकी पूजा बतायी
आतुरी, सीतिकी, त्रासी, साधनाभाविनी तथा
दौर्वोधी । इनके लक्षणोका मुञ्चसे क्रमशः वर्णन
सुनी-रोग आदिसे युक्त मनुष्य न खान करे, न
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४३२
संक्षिप्त नारदपुराण
जप करे ओर न पूजन ही करे। आराध्यदेवकी
पूजा, प्रतिमा अथवा सूर्यमण्डलका दर्शन एवं
प्रणाम करके मन्त्र- स्मरणपूर्वक उनके लिये पुष्पाञ्जलि
दे। फिर जब रोग निवृत्त हो जाय तो स्नान ओर
नमस्कार करके गुरुकी पूजा करे तथा उनसे
प्रार्थना करे-' जगन्नाथ ! जगत्पूज्य ! दयानिधे ! आपके
प्रसादसे मुञ्चे पूजा छोड्नेका दोष न लगे।'
तत्पश्चात् यथाशक्ति ब्राह्यणोका भी पूजन करके
उन्हे दक्षिणा आदिसे संतुष्ट करे ओर उनसे
आशीर्वाद लेकर पूर्ववत् भगवान्की पूजा करे ।
यह आतुरी पूजा ' केही गयी हे । अब सौतिकी
पूजा बतायी जाती है। सूतक दो प्रकारका कहा
गया है-जातसूतक ओर मृतसूतक। दोनों ही
सूतकोमे एकाग्रचित्त हो मानसी संध्या करके
मनसे ही भगवानूक्रा पूजन ओर मनसे ही मन््रका
जप करे। फिर स्ूतक बीत जानेपर पूर्ववत् गुरु
ओर ब्राह्यणोका पूजन करके उनसे आशीर्वाद
लेकर सदाको भोति पूजाका क्रम प्रारम्भ कर
दे^। यह ' सौतिको पूजा" कही गयी । अब त्रासी
पूजा बतायी जाती हे । दुष्टोसे त्रासको प्राप्त हआ
मनुष्य यथाप्राप्त उपचारोसे अथवा मानसिक उपचारोसे
भगवान्को पूजा करे। यह "त्रासी पूजा" कही गयी
हे । पूजा-साधन-सामग्री जुटानेकी शक्ति न होनेपर
यथाप्राप्त पत्र, पुष्प ओर फलका संग्रह करके
उन्हीके द्वारा या मानसोपचारसे भगवान्का पूजन
करे। यह “ साधनाभाविनी पूजा" कही गयी है।
नारद ! अब दोर्बोधी पूजाका परिचय सुनो- स्त्री,
वृद्ध, बालक ओर मूर्ख मनुष्य अपने स्वल्प ज्ञानके
अनुसार जिस किसी क्रमसे जो भी पूजा करते
हे, उसे “दौर्बोधी पूजा" कहते हैँ । इस प्रकार
साधकको जिस किसी तरह भी सम्भव हो, देवपूजा
करनी चाहिये । देवपूजाके बाद बलिवैश्वदेव आदि
करके श्रेष्ट ब्राह्यणोंको भोजन कराये। तत्पश्चात्
भगवानूको अर्पित किया हुआ प्रसाद स्वयं स्वजनोके
साथ भोजनं करे। फिर आचमन एवं मुख-
शुद्धि करके कुछ देर विश्राम करे। फिर स्वजनोकि
साथ वेठकर् पुराण तथा इतिहास सुने। जो
सब कल्पो (सम्पूर्णं पूजा-विधियों) -के सम्पादनमे
समर्थं होकर भी अनुकल्प (पीछे बताये हुए
अपूर्ण विधान)-का अनुष्ठान करता है, उस
उपासकको सम्पूर्ण फलकी प्रापि नहीं होती है।
(पूर्व० ६७ अध्याय)
क |
भ्रीमहाविष्णुसम्बन्धी अष्टाक्षर, द्वादशाक्षर आदि विविध मन्त्रके अनुष्ठानकी विधि
सनत्कुमारजी कहते है- नारद! अव मेँ
महाविष्णुके मन्त्रोका वर्णन करता हूँ जो लोकमें
अत्यन्त दुर्लभ ह । जिन्हें पाकर मनुष्य शीघ्र ही
अपने अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेते है।
जिनके उच्चारणम्नात्रसे ही राशि-राशि पाप नष्ट
हो जाते हें । ब्रह्मा आदि भी जिन मन्त्रोका ज्ञान
प्राप्त करके ही संसारकी सृष्टिमें समर्थं होते हे।
प्रणव ओर नमःपूर्वक ङ विभक्त्यन्त "नारायण!
पद हो तो ॐ नमो नारायणाय" यह अष्टाक्षरं
मन्त्र होता है। साध्य नारायण इसके ऋषि है,
गायत्री छन्द है, अविनाशी भगवान् विष्णु देवता
है, ॐ बीज है, नमः शक्ति है तथा सम्पूर्ण
१. तत्र॒ सनात्वा मानसीं तु कृत्वा संध्यां समाहितः । मनसैव यजेद् देवं मनसैव जपेन्मनुम्॥
निवृत्ते सूतके प्राग्वत् सम्पूज्य च गुरु द्विजान् । तेध्यश्चाशिषमादाय ततो नित्यक्रमं चरेत्॥
(ना० पूर्व° तृ° ६७। १३१-१३२)
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पूर्वभाग-तृतीय पाद
४३३
मनोरथोंकौ प्रा्िके लिये इसका विनियोग
जाता है। इसका पञ्चाद्ध-न्यास इस प्रकार
हे- क्रुद्धोल्काय इदयाय नमः, महोल्काय शिरसे
स्वाहा, वीरोल्काय शिखायै वषट्, अत्युल्काय
कवचाय हुं, सहस्त्रोल्काय अस्राय फट्। इस
प्रकार पञ्चाङ्गको कल्पना करनी चाहिये । फिर
मन्त्रके छः वर्णेसि षडद्ध-न्यास करके शेष दो
मन्त्राक्षरोका कुक्षि तथा पृष्ठभागे न्यास करे।
इसके वाद सुदर्शन-मन्त्रसे दिग्बन्ध करना चाहिये।
` ॐ नमः सुदर्शनाय अस्त्राय फट्' यह बारह
अक्षरोका मन्त्र ' सुदर्शन-मन्त्र' कहा गया हे ।
अव मैं विभूतिपञ्जर नामक दशावृत्तिमय न्यासका
वर्णन करता हूं। मूल मन्त्रके अक्षरोका अपने शरीरके
मूलाधार हदय, मुख, दोनों भुजा तथा दोनों चरणेकि
मूलभाग तथा नासिकामें न्यास करे। यह प्रथम
आवृत्ति कही गयी हे। कण्ठ, नाभि, हदय, दोना स्तन,
दोनों पार्धभाग तथा पृष्ठभागे पुनः मन््राक्षरोका न्यास
करे। यह द्वितीय आवृत्ति बतायी गयी हे। मूर्धा, मुख,
दोनों नेत्र, दोनो श्रवण तथा नासिका-च्द्िे मनत्राक्षरोका
न्यास करे। यह तृतीय आवृत्ति है । दोनों भुजाओं ओर
दोनो पेरोकी सटी हई अगुलियेमिं चोथी आवृत्तिका
न्यास करे। धातु, प्राण ओर हदयमें पांचवीं आवृत्तिका
न्यास करे। सिर, नेत्र, मुख ओर हदय, कुक्षि, ऊरुः
जङ्घा तथा दोनों पैरोमें विद्वान् पुरुष एक-एक करके
क्रमशः मन््र-वर्णोका न्यास करे। (यह छठी, सातवीं
आठर्वीं आवृत्ति है) हदय, कधा, ऊरु तथा चरणेमें
मन्त्रके चार वर्णोका न्यास करे। शेष वर्णोका चक्रः
शङ्ख, गदा ओर कमलकी मुद्रा बनाकर उनमें न्यास
करे (यह नवम, दशम आवृत्ति है) । यह सर्वश्रेष्ठ
न्यास विभूति-पञ्जर नामसे विख्यात है। मूलके एक-
एक अक्षरको अनुस्वारसे युक्त करके उसके दोनों ओर
प्रणवका सम्पुट लगाकर न्यास करे अथवा आदिमे
प्रणव ओर अन्तमं नमः लगाकर मन््राक्षरोका न्यास
करे। एसा दूसरे विद्वानोंका कथन दै।
तत्पश्चात् बारह आदित्योसहित द्वादश मूर्तियोका
न्यास करे। ये वारह मूर्तियां आदिमे द्रादशाक्षरके
एक-एक मन्त्रसे युक्त होती ह ओर इनके साथ
बारह आदित्योका संयोग होता है। यह अष्टाक्षर-
मन्त्र अष्टप्रकृतिरूप बताया गया है। इनके साथ
चार आत्माका योग होनेसे द्वादशाक्षर होता है।
ललाट, कुक्षि, हदय, कण्ठ, दक्षिण पार्श्च, दक्षिण
अंस, गल दक्षिणभाग, वाम पार्श्व, वाम अंस, गल
वामभाग, पृष्ठभाग तथा ककुद्-इन बारह अब्भं
मन्त्रसाधक क्रमशः वारह मूर्तियोका न्यास करे।
केशवका धाताके साथ ललाटमं न्यास करके
नारायणका अर्यमाके साथ कुक्षिमें, माधवका मित्रके
साथ हदयमें तथा गोविन्दका वरुणके साथ कण्ठकूपे
न्यास करे। विष्णुका अंशुके साथ, मधुसृदनका
भगके साथ, त्रिविक्रमका विवस्वानूके साथ, वामनका
इन्द्रके साथ, श्रीधरका पृषाके साथ ओर हषीकेशका
पर्जन्यके साथ न्यास करे! पद्यनाभका त्वएटके साथ
तथा दापोदरका विष्णुके साथ न्यास करेः। तत्पश्चात्
१. आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा तथा ज्ञानात्मा-ये चार् आत्मा है।
२. यह मूर्तिपञ्जर-न्यास कहलाता है । इसका प्रयोग इस प्रकार टहै-
ललटे- ॐ अम् केशवाय धात्रे नमः।
कुक्षौ-ॐ नम् आम् नारायणाय अर्यम्णे नमः।
हदि- ॐ मोम् इम् माधवाय मित्राय नमः।
कण्टकूपे- ॐ भम् ईम् गोविन्दाय वरुणाय नमः।
दक्षिणपार्च- ॐ गम् उम् विष्णवे अंशवे नमः।
दक्षिणासे-ॐॐ वम् ऊम् मधुसृदनाय भगाय नमः।
गलदक्षिणभगे- ॐ तम् एम् त्रिविक्रमाय विवस्वते नमः।
वामपार्ध- ॐ वाम् एेम् वामनाय इन्द्राय नपः।
वामांसे- ॐ मुम् ओम् श्रीधराय पृथ्णे नमः)
गलवामभागे- ॐ देम् आम् दइषीकेशाय पर्जन्याय नमः।
पृषठ- 2 ताम् अम् पद्मनाभाय त्वष्रे नपः।
ककुदि-ॐ यम् अ; दामोदराय विष्णवे नपः।
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2४३४
संक्षिप्त नारदपुराण
द्वादशाक्षर-मन्त्रका सम्पूर्ण सिरमें न्यास करे । इसके
वाद विद्वान् पुरुप किरीट मन्त्रके द्वारा व्यापक-
नयास करे। किरीट मन्त्र प्रणवके अतिरिक्त पैंसठ
अक्षरका बताया गया है-' ॐ किरीटकेयुरहारमकर-
कुण्डलशङ्खचक्र गदाम्भोजहस्तपीताम्बरधर-
श्रीवत्साद्भितवक्षःस्थलश्रीभूमिसहितस्वात्मज्योति-
मयदीप्तकराय सहस्त्रादित्यतेजसे नमः।' इस प्रकार
न्यासविधि करके सर्वव्यापी भगवान् नारायणका
ध्यान करे ।
उद्यत्कोट्चर्कसदूशं शःडयखं चक्रं गदाम्बुजम्।
दधतं च करेरभूमिश्रीभ्यां पार्श्द्रयाञ्ितम्॥
श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कोस्तुभामुक्तकन्धरम्।
हारकेयूुरवलयाङ्कदं पीताम्बरं स्मरेत् ॥
(ना० पूर्वं° तृ० ७०।३२-३३)
जिनकी दिव्य कान्ति उदय-कालकरे कोटि-
कोरि सूर्योकि सदृश है, जो अपने चार भुजाओपें
शङ्क, चक्र, गदा ओर कमल धारण करते हे,
भूदेवी तथा श्रीदेवी जिनके उभय पार््की शोभा
बदा रही है, जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्वसे
सुशोभित है, जो अपने गलेमे चमकीली कोस्तुभमणि
धारण करते हैँ ओर हार, केयूर, वलय तथा अंगद
आदि दिव्य आभूषण जिनके श्रीअद्भोमें पड़कर
धन्य हो रहे हें, उन पीताम्बरधारी भगवान्
विष्णुका चिन्तन करना चाहिये।
इद्धियोको वशमें रखकर मन्त्रम जितने वर्णं है
उतने लाख मन््रका विधिवत् जप करे। प्रथम लाख
मन्त्रके जपसे निश्चय ही आत्मशुद्धि होती है। दो
लाख जप पूर्णं होनेपर साधकको मन्त्र-शुद्धि प्राप्त
हाती हे। तीन लाखके जपसे साधक स्वर्गलोक प्राप्त
कर लेता है। चार लाखके जपसे मनुष्य भगवान्
विष्णुके समीप जाता हे। पोच लाखके जपसे निर्मल
ज्ञान प्राप्त होता है। छठे लाखके जपसे मन्र-
साधककी वुद्धि भगवान् विष्णुमें स्थिर हो जाती हे।
सात लाखके जपसे मन्त्रोपासक श्रीविष्णुका सारूप्य
प्राप्त कर लेता हे। आठ लाखका जप पूर्ण कर लेनेपर
मन्र-जप करनेवाला पुरुष निर्वाण (परम शान्ति एवं
मोक्ष)- को प्राप्त होता हे। इस प्रकार जप करके
विद्वान् पुरुष मधुराक्त कमले्रारा मन्त्रसंस्कृत अग्रिमं
दशांश होम करे। मण्डूकसे लेकर परतत्त्वपर्यन्त
सवका पीटपर यलनपूर्वक पूजन करे। विमला,
उत्कर्पिणी, साना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, सत्या,
| ईशाना तथा नवीं अनुग्रहा-ये नो पीटशक्तियां है।
(इन सबका पूजन करना चाहिये ।) इसके बाद " ॐ
नमो भगवते विष्णवे सर्वभूतात्मने वासुदेवाय
सर्वात्मसयोगयोगपदमपीठाय नमः ' यह छत्तीस अक्षरका
पीटमन्त्र हे, इससे भगवान्को आसन देना चाहिये ।
। | मूलमन््रसे मूर्ति-निर्माण कराकर उसमें भगवानूका
आवाहन करके पूजा करे। पहले कमलके केसररोमे
मन््रसम्बन्धी छः अद्खका पूजन करना चाहिये ।
इसके बाद अष्टदल कमलके पर्वं आदि दलेमं
क्रमशः वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्धका
ओर आग्नेय आदि कोणों क्रमशः उनकी शक्तियोका
पूजन करे । उनके नाम इस प्रकार है- शान्ति, श्री,
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पूर्वभाग-तृतीय पाद
४३५
रति तथा सरस्वती । इनको क्रमशः पूजा करनी
चाहिये । वासुदेवको अद्गकान्ति सुवण्कि समान
हे । संकर्पण पीत वर्णके हे । प्रद्युप्र तमालके समान
श्याम ओर अनिरुद्ध इन्द्रमील मणिके सदृश हें ।
ये सब-के-सव पीताम्बर धारण करते हें । इनके
चार भुजां हे । ये शङ्ख, चक्र, गदा ओर कमल
धारण करनेवाले हं । शान्तिका वर्णं श्वेत, श्रीका वर्णं
सुवर्ण-गोर, सरस्वतीका रंग गोदुग्धके समान उज्वल
तथा रतिका वर्णं दूर्वादलके समान श्याम है। इस
प्रकार ये सव शक्तियाँ हँ । कमलदलेके अग्रभागमें
चक्र, शङ्ख, गदा, कमल, कोस्तुभमणि, मुसल,
खद्ध ओर वनमालाका क्रमशः पूजन करे। चक्रका
रग लाल, शङ्खका रग चन्द्रमाके समान शेत,
गदाका पीला, कमलका सुवर्णे समान, कोस्तुभका
श्याम, मुसलका काला, तलवारका शत ओर
वनमालाका उज्ज्वल हे । इनके वाह्यभागमें भगवानके
सम्मुख हाथ जोड़कर खड़े हए कुंकुम वर्णवाले
पक्षिराज गरुड्का पूजन करे। तत्पश्चात् क्रमशः
दक्षिण पाश्वं शड्खनिधि ओर वाम पारमे पद्मनिधिको
पूजा करे । इनका वर्णं क्रमशः मोती ओर माणिक्यके
समान हे। पशचिममें ध्वजको पूजा करे। अग्निकोणे
रक्तवर्णे विघ्र (गणेश) -का, नैर््ऋत्य कोणमें श्याम
वर्णवाले आर्यका, वायव्यकोणमें श्यामवर्णं दुर्गाका
तथा ईशान कोणमें पीतवर्णके सेनानीका पूजन
करना चाहिये । इनके बाह्यभागमें विद्वान् पुरुष इन्द्र
आदि लोकपालोका उनके आयुधोंसहित पूजन करे।
जो इस प्रकार आवरणोसहित अविनाशी भगवान्
विष्णुका पूजन करता हे, वह इस लोकमें सम्पूर्ण
भोगोका उपभोग करके अन्तमं भगवान् विष्णुके
धामको जाता है। खेत, धान्य ओर सुवर्णकी प्रा्िके
लिये धरणीदेवीका चिन्तन करे। उनकी कान्ति
दूर्वादलके समान श्याम है ओर वे अपने हार्थोमें
धानको वाल लिये रहती है । देवाधिदेव भगवानूके
दक्षिणभागमें पूर्ण चनद्रमाके समान मुखवाली वीणा-
[ 1183 ] सं० ना० पु १५-
पुस्तकधारिणी सरस्वतीदेवीका चिन्तन करे। वे
क्षीरसागरके फेनपुञ्जकी भोति उज्वल दो वस्त्र
धारण करती है । जो सरस्वतीदेवीके साथ परात्पर
भगवान् विष्णुका ध्यान करता है, वह वेद ओर
वेदाद्भका तत्त्वज्ञ तथा सर्वज्ञोमें श्रेष्ठ होता है।
जो प्रतिदिन प्रातःकाल पच्चीस बार ( ॐ नमो
नारायण ) इस अष्टाक्षर मन्त्रका जप करके जल
पीता है, वह सब पापोंसे मुक्त, ज्ञानवान् तथा
नीरोग होता हे। चन्दरग्रहण ओर सूर्यग्रहणके समय
उपवासपूर्वक ब्राह्मी घृतका स्पर्शं करके उक्त
मन्त्रका आट हजार जप करनेके पश्चात् ग्रहण शुद्ध
होनेपर श्रेष्ठ साधक उस घृतको पी ले। एेसा
करनेसे वह मेधा (धारणशक्ति), कवित्वशक्ति
तथा वाकूसिद्धि प्राप्त कर लेता है । यह नारायणमन््र
सब मन्त्रे उत्तम-से-उत्तम दहै। नारद! यह
सम्पूर्णं सिद्धियोका घर है; अतः मने तुम्हें इसका
उपदेश किया है। "नारायणाय" पदके अन्तमें
' विद्रहे ' पदका उच्चारण करे । फिर ' ड" विभक्त्यन्त
` वासुदेव ' पद ( वासुदेवाय )-का उच्वारण करे,
उसके वाद ' धीमहि" यह पद बोले । अन्तमें ' तत्रो
विष्णुः प्रचोदयात्" इन अक्षरोका उच्चारण करे ।
यह ( ॐ नारायणाय विग्रहे वासुदेवाय धीमहि
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ) विष्णुगायत्री बतायी गयी
हे, जो सब पापोका नाश करनेवाली दै।
तार (3), हृदय (नमः) भगवत् शब्दका
चतुर्थी विभक्तिमे एकवचनान्त रूप ( भगवते )
तथा 'वासुदेवाय' यह द्वादशाक्षर (ॐ नमो
भगवते वसुदेवाय ) महामन्त्र कहा गया है, जो
भोग ओर मोक्ष देनेवाला है। स्त्री ओर शुद्रोको
विना प्रणवकरे यह मन्त्र जपना चाहिये ओर
द्विजातियोके लिये प्रणवसहित इसके जपका विधान
दे। इस मन्त्रके प्रजापति ऋषि, गायत्री छन्द,
वासुदेव देवता, ॐ वीज ओर नमः शक्ति दै । इस
मन्त्रके एक, दो, चार् ओर पाच अक्षरों तथा
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|
४३६
सम्पूर्णं मन्त्रद्वारा पञ्चाद्ध-न्यास करना चाहिये ।
यहं भी पूर्वाक्तरूपसे ही ध्यान करना चाहिये।
इस मन्त्रके बारह लाख जपका विधान है। घीसे
सने हए तिलसे जपके दशांशका हवन करना
चाहिये । पूर्वोक्त पीठपर मूलमन्त्रसे मूर्तिकी कल्पना
करके मन्त्रसाधक उस मूर्तिमें देवेश्वर वासुदेवका
आवाहन ओर प्रूजन करे। पहले अङ्खोकी पूजा
करके वासुदेव आदि व्यहोको पूजा करनी चाहिये ।
तदनन्तर शान्ति आदि शक्तियोका पूजन करना
=:
८=ग८ >
संक्षिप्त नारदपुराण
उचित हे । वासुदेव आदिका पूर्वं आदि दिशाओमे
ओर शान्ति आदि शक्तियोका अग्नि आदि कोणोमें
पूजन करना चाहिये । तृतीय आवरणमें केशवादि
द्वादश मूर्तियोकी पूजा बतायी गयी हे । चतुर्थं ओर
पञ्चम आवरणमें इन्द्रादि दिक्पालों ओर उनके
आयुधोको पूजा करे । इनकी पूजाका स्थान भृपुर् हे।
इस प्रकार पोच आवरणोंसहित अविनाशी भगवान्
विष्णुको पूजा करके मनुष्य सम्पूर्णं मनोरथोको पाता
ओर अन्तमं भगवान् विष्णुके लोकमें जाता हे ।
न
> ५५८८१ 2 ।
भगवान् श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्च-सम्बन्धी विविध मन्त्रके
अनुष्टानको संक्षिप्त विधि
सनत्कुमारजी कहते हे -- नारद ! अव भगवान्
श्रीरामके मन्त्र ताये जाते है, जो सिद्धि प्रदान
करनेवाले हं ओर जिनकी उपासनासे मनुष्य
भवसागरके पार हो जाते हे। सब उत्तम मन्त्रों
वेप्णव-मन्त्र श्रेष्ठ बताया जाता है । गणेश, सूर्य,
दुर्गा ओर शिव- सम्बन्धी मन्त्रोकी अपेक्षा वैष्णव-
मन्त्र शीघ्र अभीष्ट सिद्ध करनेवाला हे । वैष्णव-
मन्त्रोमे भी राम~ मन्त्रके फल अधिक हैँ । गणपति
आदि मन्त्रोको अपेक्षा राममन्त्र कोरटि-कोरिगुने
अधिक महत्व रखते हे । विष्णुशय्या (आ) के
ऊपर विराजमान अग्रि (र)-का मस्तक यदि
चन्द्रमा ( अनुस्वार) -से विभूषित हो ओर उसके
आगे "रामाय नमः'-ये दो पद हों तो यह (रां
रामाय नमः) मन्त्र महान् पापोंकी राशिका नाश
करनेवाला हे । श्रीरामसम्बन्धी सम्पूर्णं मन्त्रों यह
पडक्षर मन्त्र अत्यन्त त्र है । जानकर ओर विना
जाने किये हए महापातक एवं उपपातक सव इस
मन्त्रके उच्चारणमात्रसे तत्काल नष्ट हो जते है,
इसमे संशय नहीं हे । इस मन्त्रके ब्रह्मा ऋषि,
गायत्री छन्द, श्रीराम देवता, रां बीज ओर नमः शक्ति
हे। सम्पूर्ण मनोरथोंकी प्रापिके लिये इसका विनियोग
किया जाता हे। छः दीर्षस्वरोये युक्त बीजमन्त्रद्रार
पडद्भन्यास करे । फिर पीठन्यास आदि करके हदयमें
रघुनाथजीका इस प्रकार ध्यान करे-
कालाम्भोधरकान्तं च वीरासनसमास्थितम्।
ज्ञानमुद्रां दक्षहस्ते दधतं जानुनीतरम्॥
सरोरुहकरां सीतां विद्युदाभां च पार््वगाम्।
पश्यन्तीं रामवक्त्राव्जं विविधाकल्पभूषिताम्॥
(७३। १०- १२)
= ज १
जः = दि 9 तः तः चोः तोः जि दि = तिः = = तः 3 कः जः = क त ज ऋ री मीके = जक = कि = ऋ
॥ 1 = |
ध ~=
ग. #, ् ५ .
४ ~ | ;
कः
व ` # ==
ऋक = = ऋ हए क 7)
| दि ता २ क १ तो र 2 क)
" भगवान् श्रीरामकी अद्भकान्ति मेघकी काली
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पूर्वभाग-तृतीय पाद
घटके समान श्याम हे । वे वीरासन लगाकर वटे
है । दाहिने हाथमें सानमुद्रा धारण करके उन्होने अपने
वायं हाथको वाये घुटनेपर रख छोड़ा हे। उनके
वामपारश्चमें विद्युतूके समान कान्तिमिती ओर नाना
प्रकारके वस्त्रभूषणेसे विभूषित सीतादेवी विराजमान
हे । उनके हाथमे कमल है ओर वे अपने प्राणवल्यभ
श्रीरामचन्द्रजीका मुखारविन्द निहार रही ह ।'
इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रोपासक छः
लाख जप करे ओर कमलोद्रारा प्रज्वलित अग्रिमे
दशांश होम करे । तत्पश्चात् ब्राह्मण-भोजन करावे ।
मूलमन्त्रसे इषटदेवको मूर्तिं बनाकर उसमे भगवानूका
आवाहन ओर प्रतिष्ठा करके साधक विमलादि
शक्तियोंसे संयुक्त वैष्णवपीठपर उनको पूजा
करे। भगवान् श्रीरामके वामभागमे वैटठी हुई
सीतादेवीकी उन्हीके मन्त्रसे पूजा करनी चाहिये ।
"श्रीसीताये स्वाहा ' यह जानको-मन्त्र हे । भगवान्
श्रीरामके अग्रभागे शा््धधनुषकी पूजा करके
दोनों पार्धभागोमें बाणोंकौ अर्चना करे । केसरोमें
छ: अङ्खोंकी पूजा करके दलोमें हनुमान् आदिकौ
अर्चना करे। हनुमान्, सुग्रीव, भरत, विभीषण,
लक्ष्मण, अङ्गद, शत्नुष्न तथा जाम्बवान्-इनका
क्रमशः पजन करना चाहिये । हनुमानजी भगवानूके
आगे पुस्तक लेकर वांच रहे हे । श्रीरामके दोनों
पारश्मे भरत ओर शत्रुघ्र चंवर लेकर खड रहै।
लक्ष्मणजी पीछे खड होकर दोनों हाथमे भगवानूके
ऊपर छत्र लगाये हए हं । इस प्रकार ध्यानपूर्वक
उन सव्रकौ पूजा करनी चाहिये । तदनन्तर अणएटदलेकि
अग्रभागमें सृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्रपाल
(अथवा राष्रवर्धन), अकोप, धर्मपाल तथा सुमन्त्रक
पूजा करके उनके वाह्यभागमें इन्द्र आदि देवताओंका
आयुधोंसहित पूजन करे। इस प्रकार भगवान्
श्रीरामकी आराधना करके मनुष्य जीवन्मुक्छं हो
जाता दै। घृताप्त शतपर्वासि आहुति करनेवाला
23७
पुरुष दीर्घायु तथा नीरोग होता है । लाल कमलोके
होमसे मनोवाच्छित धन प्राप्त होता दै। पलाशके
फूलोंसे हवन करके मनुष्य मेधावी होता है। जो
प्रतिदिन प्रातःकाल पूर्वोक्त षडक्षरमन्त्रसे अभिमन्त्रित
जल पीता है, वह एक वर्षमे कविसम्रार् हो जाता
ठे । श्रीराममन््र अभिमन्त्रित अन्न भोजन करे।
इससे बड़े-बड़े रोग शान्त हो जाते हैँ । रोगके
लिये वतायी हुई ओषधिका उक्त मन्त्रद्रारा हवन
करनेसे मनुष्य क्षणभरमें रोगमुक्त हो जाता हे।
प्रतिदिन दूध पीकर नदीके तटपर या गोशालामें
एक लाख जप करे ओर घृतयुक्तं खीरसे आहति
करे तो वह मनुष्य विद्यानिधि होता है। जिसका
आधिपत्य (प्रभुत्व) नष्ट हो गया हे, एेसा मनुष्य
यदि शाकाहारी होकर जलके भीतर एक लाख जप
करे ओर बेलके फूलोंको दशांश आहुति दे तो उसी
समय वह अपनी खोयी हई प्रभुता पुनः प्राप्त कर
लेता है इसमें संशय नहीं है। गद्भातरके समीप
उपवासपूर्वक रहकर मनुष्य यदि एक लाख जप
करे ओर त्रिमधुयुक्त कमलों अथवा बेलके फलंसि
दशांश आहुति करे तो राज्यलक्ष्मी प्राप्त कर लेता दै।
मार्गशीर्पमासमें कन्द-मूल-फलके आहारपर रहकर
जलम खड़ा हो एक लाख जप करे ओर प्रज्वलित
अग्रिमे खीरसे दशांश होम करे तो उस मनुप्यको
भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके समान पुत्र एवं पौत्र
प्राप्त होता है।
इस मन्त्रराजके ओर भी बहुत-से प्रयोग है।
पहले षट्कोण बनावे । उसके बाह्यभागमें अष्टदल
कमल अद्भत करे। उसके भी व्ाह्यभागमें
द्रादशदल कमल लिखे । छः कोणोमें विद्वान् पुरुष
मन्त्रके छः अक्षरोका उद्चेख करे । अष्टदल कमलपें
भी प्रणवसम्पुटित उक्त मन्त्रके आट अश्ष्तेका
उल्लेख करे । द्रादशदल कमले कामव्रीज (क्लीं)
लिखे । मध्यभागमं मन्त्रसे आवृत नामक्रा उद्धेख
(-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 66810011
४३८ संक्षिप्त नारदपुराण
करे । बाह्यभागमें सुदर्शन मन्त्रसे ओर दिशाओमें| पदो वसुदले देवमिन्द्रनीलसमप्रभम्।
युग्मवबीज (रां श्रीं)-से यन्त्रको आवृत करे।| वीरासनसमासीनं ज्ञानमुद्रोपशोधितम्॥
उसका भूपुर वज्रसरे सुशोभित हो। कोण कन्दर्प, | वामोरुन्यस्ततद्धस्तं सीतालक्ष्मणसेवितम्।
अङ्कृश, पाश ओर भूमिसे सुशोभित हो। यह | रल्नाकल्पं विभुं ध्यात्वा वर्णलक्षं जपेन्मनुम्॥
यृन््रराज गृयखा हे | अष गन्धरस य स्मारादिमन्त्राणां [ 1 ष
व २५ (4 4 ४. यद्रा र जयाभं च हरि स्मरेत्।
ऊपर बताये अनुखार यन्त्र लिखकर छः कोणके
= ५ ॥ षि [क ¢ ९-६२
ऊपर दलका आवेष्टन रह । अष्टदल कमलके ५८
७, ०७ ०५, युग्म वीजसे न आवृत = ८ "न्नः प र 7 : न र 7.17 14 { 2 4 (4 १ # ख़, 74 4
स शव | { 1 4 11.104 र ¦
दो-दो स्वरोका उद्धे करे। यन्त्रके बाह्यभागमं | {81 ८ ६ 4 | 800
मातृकावर्णोका उल्छेख करे । साथ ही प्राण-
प्रतिष्टाका मन्त्र भी लिखे। मन्त्रोपासक
किसी शुभ दिनको कण्ठमे, दाहिनी भुजामें
अथवा मस्तकपर इस यन्त्रको धारण करे ।
इससे वह सम्पूर्णं पातकोसे मुक्तं हो जाता
हे । स्व बीज (रां), काम (क्लीं), सत्य
(हीं), वाक् (ए), लक्ष्मी (श्री), तार
(ॐ ) इन छः प्रकारके वीजोसे प्थकू-
पृथक् जुड्नेपर पांच वर्णोका “रामाय
नमः' मन्त्र छः भेदोसे युक्त पडक्षर होता
हे । (यथा-' रां रामाय नमः, क्लीं रामाय
नमः, हीं रामाय नमः' इत्यादि) यह छः
प्रकारका पडक्षर-मन्त्र धर्म, अर्थ, काम
ओर मोक्ष- चारों फलोको देनेवाला हे।
इन छहोके क्रमशः ब्रह्मा, सम्मोहन,
सत्य, दक्षिणामूर्ति, अगस्त्य तथा श्रीशिव-
ये ऋषि ताये गये हें। इनका छन्द्
गायत्री टै, देवता श्रीरामचन्द्रजी है,
आदिमे लगे हए रां, क्लीं आदि वीज हैं
ओर अन्तिम नमः पद शक्ति दहे। मन्त्रके
छः अक्षरोसे षडद्धः-न्यास करना चाहिये।
अथवा छः दीर्घं स्वरोसे युक्त वीजाक्षराद्रारा
न्यास करे। मन्त्रके अक्षरोका पूर्ववत् न्यास
करना चाहिये ।
ध्यान
ध्यायेत्कल्पतरोर्मूले सुवर्णमयमण्डपे। |
पुष्पकाख्यविमानान्तःसिंहासनपरिच्छदे ॥ भगवान्का इस प्रकार ध्यान करे । कल्पवृक्षके
((-0. 1/८11104/5511॥ 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूरवंभाग-तृतीय पाद
नीचे एक सुवर्णका विशाल मण्डप बना हुआ हे।
उसके भीतर पुष्पक विमान है, उस विमानमें एक
दिव्य सिंहासन बिदा हुआ है। उसपर अष्टदल
कमलका आसन है, जिसके ऊपर इन्द्रनील
मणिके समान श्याम कान्तिवाले भगवान् श्रीरामचन्द्र
वीरासनसे वेदे हए ह । उनका दाहिना हाथ
ज्ञानमुद्रासे सुशोभित है ओर वायं हाथको उन्होने
बायी जाँघपर रख छोड़ा है । भगवती सीता तथा
सेवात्रती लक्ष्मण उनको सेवामे जुटे हए हे। वे
सर्वव्यापी भगवान् रत्रमय आभूषणोसे विभूषित
हें । इस प्रकार ध्यान करके छः अक्षरोकी संख्याके
अनुसार छः लाख मन्त्र जप करे अथवा क्लीं
आदिसे युक्त मन्त्रोके साधनमें जयाभ श्रीहरिका
चिन्तन करे।
पूजन तथा लौकिक प्रयोग सव पूर्वोक्त पडक्षर-
मन्त्रके ही समान करने चाहिये । ' ॐ रामचन्द्राय
नमः ' ' ॐ रामभद्राय नमः।' ये दो अष्टाक्षर मन्त्र
हैं । इनके अन्तमें भी * ॐ ' जोड़ दिया जाय तो
ये नवाक्षर हो जाते हे । इनका सव पूजनादि कर्म
मन्त्रोपासक षडक्षर-मन्त्रकी ही भाति करे। "हुं
जानकीवल्लभाय स्वाहा" यह दस अशक्षरोवाला
महामन्त्र हे । इसके वसिष्ठ ऋषि, स्वराट् छन्द,
सीतापति देवता, हं बीज तथा स्वाहा शक्ति है
(इन सवका यथास्थान न्यास करना चाहिये) ।
क्लीं बीजसे क्रमशः पडद्धन्यास करे । मन्त्रके दस
अक्षरोका क्रमशः मस्तक, ललाट, भ्रूमध्य, तालु,
कण्ठ, हदय, नाभि, ऊरु, जानु ओर चरण-इन
दस अद्धोमें न्यास करे।
ध्यान
अयोध्यानगरे रल्रचित्रसौवर्णमण्डपे।
मन्दारपुष्यैराबद्धविताने तोरणान्विते ॥
सिंहासनसमासीनं पुष्पकोपरि राधवम्।
रक्षोभिर्हरिभिर्देवेः सुविमानगतेः शुभेः॥
४२३९
संस्तूयमानं मुनिभिः प्रहेश्च परिसेवितम्।
सीतालंकृतवामाङ्क लक्ष्मणेनोपशोभितम्॥
श्यामं प्रसन्नवदनं सर्वाभरणभूषितम्।
(६८--७१)
दिव्य अयोध्या-नगरमें रल्नीसे चित्रित पकं
सुवर्णमय मण्डप टै, जिसमं मन्दारके फृलोंये
चंदोवा बनाया गया है । उसमं तोरण लगे हुए दहै,
उसके भीतर पुष्पक विमानपर एक दिव्य सिंहासनके
ऊपर राघ्वेन्र श्रीराम वटे हुए है। उस मुन्दः
((-0. 1/८1114<511॥1 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
६9
विमानमें एकत्र हो शुभस्वरूप देवता, वानर,
राक्षस ओर विनीत महर्पिगण भगवान्को स्तुति
ओर परिचर्या करते हें । श्रीराघवेन्द्रके वाम भागमें
भगवती सीता विराजमान हो उस वामाङ्कको शोभा
बदाती हे। भगवानूका दाहिना भाग लक्ष्मणजीसे
सुशोभित हे, श्रीरघुनाथजीकी कान्ति श्याम हे, उनका
मुख प्रसन्न हे तथा वे समस्त आभूषणेसे विभूषित हे ।
इस प्रकार ध्यान करके मन्रोपासक एकाग्रचित्त हो
दस लाख जप करे। कमल-पुष्पेद्ारा दशांश होम ओर
पूजन पडक्षर-मन्त्रके समान हे। ' रामाय धनुष्पाणये
स्वाहा ।' यह दशाक्षर मन्त्र है । इसके ब्रह्मा ऋषि हं
विराट् छन्द हे तथा राक्षसमर्दन श्रीरामचन्रजी देवता कहे
गये है। मन््रका आदि अक्षर अर्थात् “र यह बीज है ओर
स्वाहा शक्ति टे। बीजक द्राय षडङ्गन्यास करे। वर्णन्यास,
ध्यान, पुरश्चरण तथा पूजन आदि कार्य दशाक्षर-मन््रके
लिये पहले बताये अनुसार करे। इसके जपमें धनुप-बाण
धारण करनेवाले भगवान् श्रोरामका ध्यान करना चाहिये ।
त ~~ ----
[श कि क कि कि, 91, श उ त त = श 2
१. श्रीपूर्वं जयपूर्वं च तदृद्िधा रामनाम च॥ ७६ ॥
संक्षिप्त नारदपुराण
तार (ॐ )-के पश्चात् "नमो भगवते रामचन्द्राय ' अथवा
'रामभद्राय' ये दो प्रकारके द्वादशाक्षर- मन्त्र हें । इनके
ऋषि ओर ध्यान आदि पूर्ववत् दै। श्रीपूर्वक, जयपूर्वक
तथा जय-जयपूर्वक "राम" नाम होः । यह (श्रीराम जय
राम जय जय राम) तेरह अक्षरोका मन्त्र हे। इसके ब्रह्य
ऋषि, विराट् छन्द तथा पाप-राशिका नाश करवाले
भगवान् श्रीयम देवता कहे गये ह। इसके तीन परदेकी
दो-दो आवृत्ति के षडद्ध न्यास करे? । ध्यान-पूजन
आदि सब कार्य दशाक्षर मन्त्रके समान करे।
" ॐ नमो भगवते रामाय महापुरुषाय नमः' यह
अठारह अक्षरोका मन्त्र हे। इसके विश्चामित्र ऋषि,
धृति छन्द, श्रीराम देवता, ॐ बीज ओर ' नमः" शक्ति
हे। मन्त्रके एक, दो, चार, तीन, छः ओर दो
अक्षरोवाले पदोदवारा एकाग्रचित्त हो षडद्ध-न्यास करे।
ध्यान
निःशाणभरीपटदहशद्खुतुर्यादिनिःस्वनैः ॥
प्रवृत्तनृत्ये परितो जयमङ्कलभाषपिते।
त्रयादशाक्षरो मन्त्रो मुनि््रद्या विट् स्मृतम्। छन्दस्तु देवता प्राक्तो रामः पापौघनाशनः ॥ ५७ ॥
२. यथा--' श्रीराम! हृदयाय नमः । ' श्रीराम ' शिरसे स्वाहा । ' जय राम ' शिखायै वषट् । ' जय राम" कवचाय हुम्। ` जय
जय राम" नेत्राभ्यो वौपर्। ' जय जय राम' अस्त्राय फट्। पुराणे इसका प्रमापक मूल श्लोक इस प्रकार है-
पडद्घाति प्रकुर्वंति द्विरावृच्या पदव्रयैः।
((-0. 1/८111141/5511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
पूर्व भाग-तृतीय पाद
चन्दनागुरुकस्तूरीकर्पुरादिसुवासिते ॥
सिंहासने समासीनं पुष्पकोपरि राघवम्।
सोमित्रिसीतासहितं जटामुकुटशोभितम्॥
चापबाणधरं श्यामं ससुग्रीवविभीषणम्।
हत्वा रावणमायान्तं कृतत्रेलोक्यरक्षणम्॥
भगवान् राघवेन्द्र रावणको मारकर त्रिलोकोकों
रक्षा करके लौट रहे हें। वे सीता ओर लक्ष्मणके
साथ पुष्पक-विमानमें सिंहासनपर वेदे हं । उनका
मस्तक जटाओकि मुकुटसे सुशोभित हे । उनका वर्ण
श्याम हे ओर उन्होने धनुष-बाण धारण कर रखा है ।
उनकी विजयके उपलक्षमे निशान, भेरी, पटह, शङ्ख
ओर तुरही आदिक ध्वनियोके साथ-साथ नृत्य
आरम्भ हो गया हे । चारों ओर जय-जयकार तथा
मङ्गल-पाठ हो रहा है। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी
ओर कपूर आदिकी मधुर गन्ध छा रही हे।
इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रोपासक मन्त्रको
अक्षर-संख्याके अनुसार अठारह लाख जप करे
ओर धृतमिश्रित खीरकी दशांश आहुति करके
पूर्ववत् पूजन करे।
ॐ रां श्रीं रामभद्र महेष्वास रघुवीर नृपोत्तम ।
दशास्यान्तक मां रक्ष देहि मे परमां श्रियम् ॥
यह पतीस अक्षरोका मन्त्र है। बीजाक्षरोसे
विलग होनेपर बत्तीस अक्षरोका मन्त्र होता हे।
यह अभीष्ट फल देनेवाला है । इसके विश्वामित्र
ऋषि, अनुष्टुप् छन्द, रामभद्र देवता, रां बीज
ओर श्रीं शक्ति दे! मन्त्रके चार पादोंके आदिमे
तीनों बीज लगाकर उन पादां तथा सम्पूर्ण
मन्त्रके द्वारा मन्त्र पुरुप पञ्चाङ्ग-न्यास करके
मन्त्रके एक-एक अक्षरका क्रमशः समस्त अन्नम
1 1 1 क त रि किणि गणी
१.2.24.
न्यास करे। इसके ध्यान ओर पूजन आदि सव
कार्य पूर्ववत् करे। इस मन्त्रका पुरश्चरण तीन
लाखका हे । इसमें खीरसे हवन करनेका विधान
हे । पीतवर्णवाले श्रीरामका ध्यान करके एकाग्रचित्त
हो एक लाख जप करे, फिर कमलके फूर्लसे
दशांश हवन करके मनुष्य धन पाकर अत्यन्त
धनवान् हो जाता हे।
' ॐ हीं श्रीं श्रीं दाशरथाय नमः ' यह ग्यारह
अक्षरोका मन्त्र हे । इसके ऋषि आदि तथा पूजन
आदि पूर्ववत् हें। 'त्रैलोक्यनाथाय नमः" यह
आठ अक्षरोका मन्त्र है। इसके भी न्यास, ध्यान
ओर पूजन आदिं सब कार्य पूर्ववत् ह । “रामाय
नमः' यह पञ्चाक्षर-मन्त्र हे । इसके ऋषि, ध्यानं
ओर पूजन आदि सव कार्य पडक्षर-मन््रकी ही
भति होते हं। रामचन्द्राय स्वाहा! "गापभद्राय
स्वाहा" ये दो मन्त्र कटे गये है । इसके ऋषि ओर
पूजन आदि पूर्ववत् ह। अग्रि (र्) शेष (आ) -से
युक्त हो ओर उसका मस्तक चन्द्रमा (-)-से
विभूषित हो ती वह रघुनाधथजीका एकाक्षर-मन्त्र
(रां) है। जो द्वितीय कल्पवृक्षक्र समान ६ । इसकं
व्रह्मा ऋषि, गायत्री छन्द ओर श्रीराम देवता 8
छः दीर्घं स्वरोसे युक्त मन्त्रद्रारा षडद्भ-न्यास् करे।
सरयूतीरमन्दारवेदिकापद्धजासने ॥
श्यामं वीरासनासीनं ज्ञानमुद्रोपशोभितम्।
वामोरुन्यस्ततद्धस्तं सीतालक््मणसंयुतम्॥
अवेक्षमाणमात्मानं मन्मधामिततेजसम्।
शुद्धस्फटिकसंकाशं कवलं मोक्षकाङ्क्षया ॥
चिन्तयेत् परमात्मानमृतुलक्षं जपेन्मनुम्।
( १०५.-- १०८)
१. श्रीरामतापनौयोपनिषदूमं यही मन्त्र इस प्रकार टै-
रामभद्र महेष्वास रघुवीर नृपोचम। भो दशास्यान्तकास्माकं रकां देहि धियं चचते॥
((-0. 1/८111(4<511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
संक्षिप्त नारदपुराण
" सरयूके तटपर मन्दार (कल्पवृक्ष) -के नीचे
एक वेदिका बनी हुई है ओर उसके ऊपर एक
कमलका आसन विदा हआ है। जिसपर
श्यामवर्णवाले भगवान् श्रीराम वीरासनसे वैठे हेँ।
उनका दाहिना हाथ ज्ञानमुद्रासे सुशोभित है।
उन्होने अपने वाये ऊरुपर वायां हाथ रख छोडा
है । उनके वामभागे सीता ओर दाहिने भागमें
लक्ष्मणजी है । भगवान् श्रीरामका अमित तेज
कामदेवसे भी अत्यधिक सुन्दर है। वे शुद्ध
स्फटिकके समान निर्मल तथा अद्वितीय आत्माका
ध्यानद्वारा साक्षात्कार कर रह हँ । एेसे परमात्मा
श्रीरामका केवल _मोक्षकी इच्छासे चिन्तन करे
ओर छः लाख मन्त्रका जप करे।'
इसके होम ओर नित्य-पूजन आदि
सब कार्य पडक्षर-मन्त्रकी ही भाति
हें । वद्वि (र्), शेष (आ)-के आसनपर
विराजमान हो ओर उसके बाद भान्त (म)
हो तो केवल दो अक्षरका मन्त्र (राम)
होता हे। इसके ऋषि, ध्यान ओर पूजन
आदि सब कार्य एकाक्षर मन्त्रकी ही भोति
जानने चाहिये । तार (ॐ), माया (हीं),
रमा (श्री), अनङ्क (क्लीं), अस्त्र (फट्)
तथा स्व बीज (रां) इनके साथ पृथक् -
पृथक् जुड़ा हुआ द्वयक्षर मन्त्र (राम) छः
भेदोंसे युक्त त्र्यक्षर मन्त्रराज होता है। यह
सम्पूर्णं अभीष्ट पदार्थोको देनेवाला हे।
द्वयक्षर मन्त्रके अन्तमें “ चन्द्र" ओर !भद्र'
शब्द जोड़ा जाय तो दो प्रकारका चतुरक्षर
मन्त्र होता है । इन सवके ऋषि, ध्यान ओर
पूजन आदि एकाक्षरमन्त्रमे बताये अनुसार
हे । तार (ॐ ), चतुर्थ्यन्त राम शब्द (रामाय),
वर्म (हुं), अस्त्र (फट्), वहिवल्लभा
( स्वाहा) - यह (ॐ रामाय हु फट् स्वाहा)
आट अक्षरोका महामन्त्र है। इसके ऋषि ओर
पूजन आदि पडक्षर-मन्त्रके समान हं। "तार
( ॐ ) हत्( नमः ) ब्रह्मण्यसेव्याय रामायाकुण्ठतेजस।
उत्तमश्लोकधुयय स्व (न्य) भृगु (स्) कामिका
(त) दण्डार्पिताड्घ्रये।' यह ("ॐ नमः
ब्रहमण्यसेव्याय रामायाकुण्ठतेजसे। उत्तमश्लोक-
धुर्याय न्यस्तदण्डार्पिताड्श्रये' ) तेतीस अशक्षरोका
मन्त्र कहा गया है । इसके शुक्र ऋषि, अनुष्टपछन्द
ओर श्रीराम देवता ह । इस मन्त्रके चारों पादों तथा
सम्पूर्णं मन्त्रसे पञ्ाद्ग-न्यास करना चाहिये । शेप
सवर कार्य षडक्षर-मन्त्रकी भति करे। जो साधक
मन्त्र सिद्ध कर लेता हे, उसे भोग ओर मोक्ष दोनों
((-0. 1\॥८111104/5511॥1 81188 8181185 (01661011. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
17
प्राप्त होते हें । उसके सन पापोका नाश हो जाता टै
` दाशरथाय विदहे। सीतावल्छभाय धीमहि। तन्नो
रामः प्रचोदयात्।' यह राम-गायत्री कही गयी ठै
जो सम्पूर्णं मनोवाज्छित फलोंको देनेवाली है।
पदमा (श्री) ङ विभक्त्यन्त सीता शब्द (सीताये)
ओर अन्तमें ठद्रय (स्वाहा) -यह (श्रीं सीताये
स्वाहा) षडक्षर सीता-मन्त्र हे। इसके वाल्मीकि
ऋषि, गायत्री छन्द, भगवती सीता देवता, श्रीं
वीज तथा ' स्वाहा ' शक्ति है । छः दीर्घस्वरोसे युक्त
वीजाक्षरद्वारा षडङ्ग-न्यास करे।
ततो ध्यायेन्महादेवीं सीतां त्रेलोक्यपूजिताम्।
तप्तहाटकवणभिां पद्ययुग्मं करद्वये ॥
सद्रलभूषणस्फूर्जददिव्यदेहां \\ भात्मिकाम्।
नानावस्त्रां शशिमुखीं पदाक्षीं मुदितान्तराम्॥
पश्यन्तीं राघवं पुण्यं शय्यायां षडगुणे श्चरीम्।
(ना० पूर्व° १३३- १३५)
' तदनन्तर त्रिभुवनपूजित महादेवी सीताका ध्यान
करे। तपाये हुए सुवर्णके समान उनकी कान्ति हे।
उनके दोनों हा्थोमें दो कमलपुष्प शोभा पा रहे है।
उनका दिव्य-शरीर उत्तम रलमय आभूषणोसे
प्रकाशित हो रहा है। वे मङ्गलमयी सीता भोति-
भोतिके वस्त्रोसे सुशोभित ह । उनका मुख चन्द्रमाको
लल्ित कर रहा है। नेत्र कमलोंकी शोभा धारण
करते हं । अन्तःकरण आनन्दसे उद्टसित है । वे
एेश्चर्य आदि छः गुणोको अधीश्चरी है ओर
शय्यापर अपने प्राणवल्लभ पुष्पमय श्रीराघवेन्द्रको
अनुरागपूर्णं दृष्टिसे निहार रही ह ।'
इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रोपासक छः लाख
मन्त्रका जप करे ओर खिले हए कमलो्रारा
दशांश आहुति दे। पूर्वोक्तं पीठपर उनकी पूजा
करनी चाहिये। मृलमन्त्रसे मूर्तिं निर्माण करक
उसमं जनकनन्दिनी किशोरीजीका आवाहन ओर
स्थापन करे। फिर विधिवत् पजन करके उनक
दक्षिणभागमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी अर्चना
करे । तुत्पश्चात् अग्रभागमें हनुमान्जीकी ओर पष्ठभागमें
ल र्मजीकी पूजा करके छः कोणोमें हृदयादि
अङ्धोका पूजन करे। फिर आठ दलं मुख्य
मन्त्रियोका, उनके बाह्यभागमें इन्द्र आदि लोकेश्वरोका
ओर उनके भी वाह्यभागमें वज्र आदि आवु्धोका
पूजन करके मनुष्य सम्पूर्णं सिद्धि्योका स्वामी हो
जाता है। अधिक कहनेसे क्या लाभ? श्रीकिशोरीजीकी
आराधनासे मनुष्य सौभाग्य, पुत्र-पौत्र, परम सुख,
धन-धान्य तथा मोक्ष प्राप्त कर लेता टै।
इन्दु (-- अनुस्वार), युक्त शक्र (ल) तथा
` लक्ष्मणाय नमः ' यह ( लं लक्ष्मणाय नमः ) सात
अक्षरोका मन्त्र है। इसके अगस्त्य ऋषि, गायत्री
छन्द, महावीर लक्ष्मण देवता, "लं" बीज ओर
"नमः ' शक्ति है । छः दीर्घं स्वरोसे युक्त बीजद्रारा
षडद्घ-न्यास करे।
ध्यान
द्विभुजं स्वर्णङरूचिरतनुं पद्मनिभक्षणम्।
धनुर्बाणकरं रामं सेवासंसक्तमानसम्॥ १४४॥
“जिनके दो भुजाएं है, जिनकी अङ्घकान्ति
सुवर्णे समान सुन्दर है । नेत्र कमलदलके सदृश
ह । हाथमे धनुष-बाण ह तथा श्रीरामचन्द्रजीकी
सेवामं जिनका मन सदा संलग्र रहता है (उन
श्रीलक्ष्मणजीकी मैं आराधना करता दू) ।'
इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रोपासक सात लाख
जप करे ओर मधुसे सीची हई खीरसे आहुति देकर
श्रीरामपीठपर श्रीलक्ष्मणजीका पूजन करे । श्रीरामजीकी
ही भोति श्रीलक््मणजीका भी पूजन किया जाता है।
यदि श्रीरामचन्द्रजीके पूजनका सम्पूणं फल प्राप्त
करनेकी निधित इच्छ हो तो यत्नपूर्वक श्रीलक्ष्मणजीका
आदरसहित पूजन करना चाहिये । श्रीरामचन्द्र जीके
वहूत-ख भिन्न-भित्न मन्त्र है, जौ सिद्धि देनेवाले दै ।
अतः उनके साधकरंको सदा श्रीलक्ष्मणजीकी शुभ
0-0. ॥1111८॥|.511८ 11/81 \/8/8/125} 0601011. [21411260 0 66810011
टठठं
आराधना करनी चाहिये । मुक्तिक इच्छावाले मनुष्यको
एकाग्रचित्त होकर आलस्यरहित हो लक्ष्मणजीके
मन््रका एक हजार आट या एक सौ आठ वार जप
करना चाहिये । जो नित्य एकान्तम बेटकर् लक्ष्मणजीके
मन्त्रका जप करता हे, वह सव पापोसे मुक्त हो जाता
हे ओर सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता हे।
यह लक्ष्मण~मन्त्र जयप्रधान हे । राज्यकी प्रापिका
एकमात्र साधन हे। जो नित्यकर्म करके शुद्ध भावसे
तीनों समय लक्ष्मणजीके मन्त्रका जप करता है
वह सव पापोसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके परम
पदको प्राप्त होता हे । जो विधिपूर्वक मन्त्रकौ दीक्षा
लेकर सदूणोसे युक्त ॐओर पापरहित हो अपने आचारका
नियमपूर्वक पालन करता, मनको वशमे रखता
ओर घरमे रहते हए भी जितेन्धिय होता हे, इहलोकके
भोगोकी इच्छा न रखकर निष्कामभावसे भगवान्
लक्ष्मणका पूजन करता टे, वह _ समस्त पुण्य-
(++
संक्षिप्त नारदपुराण
पापके समुदायको दग्ध करके शुद्धचित्त हो
पुनरागमनके चक्रमे न पडकर सनातनपदको प्राप्त
होता हे। सकाम भाववाला पुरुष मनोवाज्छित
वस्तुओंको पाकर ओर मनके अनुरूप भोगोंका
उपभोग करके दीर्घं कालतक पूर्वजन्मोंको स्मृतिसे
युक्त रहकर भगवान् विष्णुके परम धाममें जाता
हे। निद्रा (भ), चन्द्र (अनुस्वार) -से युक्त हो
ओर उसके बाद * भरताय नमः' येदोपददहोंतो
सात अक्षरका मन्त्र होता है। इस !भं भरताय
नपः' मन्त्रके ऋषि ओर पूजन आदि पूर्ववत् है ।
वक (श), इन्दु (अनुसार)-से युक्त हो उसके
वाद ङ विभक्त्यन्त शत्रुश्च शब्द हो ओर अन्तमं
हदय (नमः) हो तो “शं शत्रुघ्राय नमः ' यह सात
अक्षरोका शत्रुघ्न मन्त्र होता हे, जो सम्पूर्ण
मनोरथोंको सिद्धि प्रदान करनेवाला है। (ना°
पूर्व० अध्याय ७३)
१३
र
विविध मन्त्रोद्धारा श्रीहनुमान्जीकी उपासना, दीपदानविधि ओर कामनाशक
भूतविद्रावण-मन्त्रोका वर्णन
सनत्कुमारजी कहते है- विप्रवर! अव
हनुमान्जीके मन्त्रोक्ता वर्णन किया जाता है, जो
समस्त अभीष्ट वस्तु ओंको देनेवाले है ओर जिनकी
आराधना करके खनुप्य हनुमानजीके ही समान
आचरणवाले हो जाते ह। मनुस्वर (ओ) तथा
इन्दु (अनुस्वार) -से युक्त गगन (ह) अर्थात् ' हो
यह प्रथम वीज है। हस् र् ओर अनुस्वार ये
भग (ए) -से युक्त हों अर्थात् " ट्फ" यह दूसरा
बीज रठै। ख् ष र्ये भग (ए) ओर इन्दु
(अनुस्वार) -से युक्त हों अर्थात् ` ख्फ़े ' यह तीसरा
वोज कहा गया हे । वियत् (ह), भृगु (स्), अग्नि
(र्), मनु (ओ) ओर इन्दु (अनुस्वार ) इन सबका
संयुक्त रूप ' हस्र ' यह चौथा बीज है । भग (ए)
ओर चन्द्र (अनुस्वार) ~ से युक्त वियत् (ह) भृगु
(स्) ख् फु तथा अग्नि (र्) हों अर्थात्
' हस्ख्फं ' यह पचा बीज है। मनु (ओ) ओर
इन्दु (अनुसार) -से युक्त ह् स् अर्थात् 'द सौँ'
यह छठा वीज हे । तदनन्तर ऊ विभक्त्यन्त हनुमत्
शब्द (हनुमते) ओर अन्तमं हदय (नमः) यह
(हो हस्फरे ख्फे टसं दस्ख्फे हसो हनुमते नमः
) वारह अक्षरोवाला महामन्त्रराज कहा गया हे।
इस मन्त्रके श्रीरामचनद्रजी ऋषि हँ ओर जगती
छन्द कहा गया है! इसके देवता हनुमानजी
हे। !हसों' बीज ठै, "दस्मे र्ति टै। छः
वीजोंसे षडद्घ-न्यास करना चाहिये। मस्तक,
ललाट, दोनीं नेत्र, मुख, कण्ट, द्रानां बाहु, हदय,
((-0. 1\/॥111104/5511॥1 81188 \/8181185। (0161011. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
१.2.
कुक्षि, नाभि, लिङ्ग, दोनों जानु, दोनों चरण इनमें | क्रमशः सुग्रीव, अङ्घद, नील, जाम्बवान्, नल, सुषेण,
क्रमशः मन्त्रके बारह अक्षरोका न्यास करे। छः
बीज ओर दो पद इन आठोंका क्रमशः मस्तक,
ललाट, मुख, हदय, नाभि, ऊरु, जङ्घा ओर
चरणोमें न्यास करे । तदनन्तर अञ्जनीनन्दन कपीश्वर
हनुमान्जीका इस प्रकार ध्यान करे-
उद्यत्कोट्यर्कसंकाशं जगत्प्रक्षोभकारकम्।
श्रीरामाङ्ध्रिध्याननिष्ठं सुग्रीवप्रमुखा्यितम्॥
वित्रासयन्तं नादेन राक्षसान् मारुतिं भजेत्।
(९-१०)
उदयकालीन करोड़ों सूर्योके समान तेजस्वी
हनुमान्जी सम्पूर्ण जगत्को क्षोभमे डालनेकौ
शक्ति रखते हे, सुग्रीव आदि प्रमुख वानर वीर
उनका समादर करते हें । वे राघवेन्द्र श्रीरामके
चरणारविन्दोंके चिन्तनमें निरन्तर संलग्र ह ओर
अपने सिंहनादसे सम्पूर्ण राक्षसोको भयभीत कर
रहे है । एेसे पवनकुमार हनुमान्जीका भजन
करना चाहिये ।
इस प्रकार ध्यान करके जितेन्द्रिय पुरुष बारह
हजार मन्त्र-जप करे। फिर दही, दूध ओर घी
मिलाये हए धानको दशांश आहुति दे । पूर्वाक्त
वैष्णवपीठपर मूलमन््रसे मूर्तिकी कल्पना करके
उसमें हनुमान्जीका आवाहन-स्थापनपूर्वक पाद्यादि
उपचारोसे पूजन करे। केसरोमें हदयादि अङ्गोकौ
पूजा करके अष्टदल कमलके आठ दलेमं हनुमानूजीके
निम्राङ्भित आठ नामोकौ पूजा करे-रामभक्त,
महातेजा, कपिराज, महाबल, द्रीणाद्विहारक,
मेरुपीटार्चनकारक, दक्षिणाशाभास्कर तथा
सर्वविघ्रविनाशक। ८ रामभक्ताय नमः, महातेजसे
नमः, कपिराजाय नमः, महावलाय नमः,
द्रौणाद्रिहारकाय नमः, मेरुपीटठार्चनकारकाय नमः,
दक्षिणाशाधास्कराय नमः, सर्वविघ्रविनाशकाय नमः )
इस प्रकार नामोंकी पजा करके दलोके अग्रभागे
द्विविद तथा मेन्दकी प्रजा करे। तत्पश्चात् लोकपालों
तथा उनके वञ्र आदि आयुधोको पजा करे । एसा
करनेसे मन्त्र सिद्ध हो जाता है। जो मानव लगातार
दस दिनतक रातमें नौ सौ मन््र-जप करतादै
उसके राजभय ओर शत्रुभय नष्ट हो जाते है । एक
सौ आठ वार् मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया हुआ जल
विषका नाश करनेवाला होता है। भूत, अपस्मार
(मिरगी) ओर कृत्या (मारण आदिके प्रयोग) -से
ज्वर उत्पन्न हो ते उक्त मन्त्रसे अभिमन्त्रित भस्म
अथवा जलसे क्रोधपूर्वक ज्चरग्रस्त पुरुषपर प्रहार
करे। एेसा करनेपर वह मनुष्य तीन दिनम ज्वरसे
दूट जाता ओर सुख पाता है । हनुमान्जीके उक्त
मन्त्रसे अभिमन्त्रित ओपध या जल खा-पीकर
मनुष्य सव रोगोको मार भगाता ओर तत्क्षण सुखी
हो जाता हे। उक्त मन्त्रसे अभिमचन्रित भस्मको अपने
अद्घोमे लगाकर अथवा उससे अभिमन्त्रित जलको
पीकर जो मन्त्रोपासक युद्धके लिये जाता हे, वहे
शस्त्रके समुदायसे पीडिति नहीं होता। किसी
शस्त्रसे कटकर घाव हुआहो या फोड़ फूटकर
वहता हो, लूता (मकरी) रोग फूटा हो, तीन बार
मन्त्र जपकर अभिमन्त्रित किये हए भस्मसे उनपर
स्पर्शं कराते ही वे सभी घावे सुख जाते हं, इसमं
संशय नहीं है ! ईशान कोणे स्थित करंज नामक
वृक्षकी जडको ले आकर उसके द्वारा हनुमानजीकं
वरावर प्रतिमा बनावे; फिर उसमं प्राण-
प्रतिष्ठा करके सिन्दूर आदिसे उसको पूजा करे।
तत्पश्चात् उस प्रतिमाका मुख घरकी ओर करके
मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसे दर्वाजेपर गाद् दै। उससे
ग्रह, अभिचार, रोग, अग्नि, विष, चीर तथा शजां
आदिके उपद्रव कभी उस घमं नदीं आते ओर
वह चर दीर्घकालतक्छ प्रतिदिन धन-पुत्न आदिमे
अभ्युदयो प्राप्त होता रहता दै ।
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2४६
संक्षिप्त नारदपुराण
विशुद्ध अन्तःकरणवाला पुरुष अष्टमी या
चतुर्दशीको मंगलवार या रविवारके दिन किसी
तख्तेपर तेलयुक्त उड़दके वेसनसे हनुमान्जीकी
सुन्दर तथा समस्त शुभ लक्षणोँसे सुशोभित
एक प्रतिमा बनावे। वाम भागमें तेलका ओर
दाहिने भागमे घीका दीपक जलाकर रखे । फिर
मन्त्रज्ञ पुरुष मूलमन्त्रसे उक्त प्रतिमामें हनुमान्जीका
आवाहन करे। आवाहनके पश्चात् प्राणप्रतिष्ठा
करके उन्हं पाद्य, अर्ध्य आदि अर्पण करे । लाल
चन्दन, लाल फूल तथा सिन्दूर आदिसे उनकी
पूजा करे। धूप ओर दीप देकर नैवेद्य निवेदन
करे । मन्त्रवेत्ता उपासक मूलमन्त्रसे पू, भात,
साग, मिठाई, बड़, पकोडी आदि भोज्य पदार्थोको
घृतसहित समर्पित करके फिर सत्ताईस पानके
पत्तोको तीन-तीन आवृत्ति मोड़कर उनके भीतर
सुपारी आदि रखकर मुख-शुद्धिके लिये मूलमन्त्रसे
ही अर्पण करे । मन्त्रज्ञसाधक इस प्रकार भली भोति
पूजा करके एक हजार मन्त्रका जप करे । तत्पश्चात्
विद्वान् पुरुप कपूरको आरती करके नाना प्रकारसे
हनुमान्जीको स्तुति करे ओर अपना अभीष्ट
मनोरथ उनसे निवेदन करके विधिपूर्वकं उनका
विसर्जन करे। इसके वाद नैवेद्य लगाये हुए
अन्नद्वारा सात ब्राह्मणोंको भोजन करावे ओर
चदाये हुए पानके पत्ते उन्हीको बोँटकर दे दे।
विद्वान् पुरुष अपनी शक्तिके अनुसार उन ब्राह्मणको
दक्षिणा भी देकर विदा करे । तत्पश्चात् इष्ट बन्धुजनेकि
साथ स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। उस दिन
पृथ्वीपर शयन ओर ब्रह्मचर्यका पालन करे । जो
मानव इस प्रकार आराधना करता है, वह
कपीश्वर हनुमान्जीके प्रसादसे शीघ्र ही सम्पूर्ण
कामनाओंको अवश्य प्राप्त कर लेता है।
भूमिपर हनुमान्जीका चित्र अद्भत करे ओर
उनके अग्रभागमें मन्त्रका उद्वेख करे । साथ ही
साध्यवस्तु या व्यक्तिका द्वितीयान्त नाम लिखकर
उसके आगे ' विमोचय विमोचय ' लिखे, लिखकर
उसे वाये हाथसे मिटा दे, उसके बाद फिर
लिखे। इस प्रकार एक सौ आठ वार लिख-
लिखकर उसे पुनः मिटावे । एेसा करनेपर महान्
कारागारसे वह शीघ्र मुक्त हो जाता है। ज्वरमें
दूर्वा, गुरुचि, दही, दृध अथवा घृतसे होम करे ।
शूल रोग होनेपर करंज या वातारि (एरंड) -कौ
समिधाओंको तैलमें डुबोकर उनके द्वारा होम
करे अथवा शेफालिका (सिंदुवार)-की तेलसिक्त
समिधाओंसे प्रयतनपूर्वक होम करना चाहिये।
सौभाग्यसिद्धिके लिये चन्दन, कपूर, रोचना,
इलाइची ओर लवंगको आहुति दे। वस्त्रक
प्रा्िके लिये सुगन्धित पुष्पोसे हवन करे । विभिन्न
धान्योको प्रापिके लिये उन्हीं धान्योंसे होम करना
चाहिये । धान्यके होमसे धान्य प्राप्त होता है ओर
अन्रके होमसे अन्नको वृद्धि होती है। तिल, घी,
दूध ओर मधुकी आहति देनेसे गाय-भसकोौ
वृद्धि होती है । अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता
हे ? विष ओर व्याधिके निवारणमें, शान्तिकर्ममि,
भूतजनित भय ओर संकटमे, युद्धे, देवी क्षति
प्राप्त होनेपर, बन्धनसे छूटनेमे ओर महान्
वनमे पड़ जानेपर आदि सभीमें यह सिद्ध किया
हुआ मन्त्र मनुष्योको निश्चय ही कल्याण प्रदान
करता हे।
द्रादशाक्षर-मन्त्रमे जो अआन्तिमि छः अक्षर
( हनुमते नमः) ह इनको ओर आदि वीज
( हौ) -को छोडकर शेष बचे हुए पोच बीजोंका
जो पञ्चाक्षर-मन्त्र बनता है, वह सम्पूर्णं मनोरथोको
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पूर्वभाग-तृतीय पाद
1.1.
देनेवाला हे । इसके श्रीरामचन्द्रजी ऋषि, गायत्री
छन्द ओर हनुमान् देवता कटे गये हे ।
कामनाओंको प्राप्तिके लिये इसका विनियोग किया
जाता हे । इसके पांच बीजों तथा सम्पूर्णं मन्त्रसे
पडद्भ-न्यास करे। रामदूत, लक्ष्मण-प्राणदाता,
अञ्जनीसुत, सीताशक-विनाशन तथा लङ्धप्रसादभञ्जन--
ये पोच नाम हँ, इनके पहले “ हनुमत्” यह नाम ओर
हे । हनुमत् आदि पाच नामोके आदिमे पोच बीज
ओर अन्तमें ङ विभक्ति लगायी जाती है । अन्तिम
नामके साथ उक्त पाचों बीज जुडते हें, ये ही
पडद्ध-न्यासके छः मन्त्र हे । इसके ध्यान-पूजन
आदि कार्य पूर्वोक्त द्वादशाक्षर मन्त्रके समान ही हे।
प्रणव (ॐ), वाग्भव (ए), पद्या (श्रीं) तीन
दीर्घं स्वरोसे युक्त मायाबीज (हां हीं हं) तथा
पाच कूट ( दस्फरे, ख्फ़े, सनौ, दस्ख्फ़े, हसौ ) यह
ग्यारह अक्षरोका मन्त्र सम्पूर्ण सिद्धियोको देनेवाला
हे। इसके भी ध्यान-पूजन आदि सब कार्य
पूर्ववत् होते हे । इस मन्त्रको आराधना की जाय
तो यह समस्त अभीष्ट मनोरथोंको देनेवाला हे ।
' नमो भगवते आञ्जनेयाय महाबलाय स्वाहा ।' यह
अठारह अक्षरोका मन्त्र है। इसके ईश्वर ऋषि,
अनुष्टुप् छन्द, पवनकुमार हनुमान् देवता, हं बीज
ओर स्वाहा शक्ति है, एेसा मनीषी पुरुषोका कथन
हे। "आञ्जनेयाय नमः" का हदयमे, “रुद्रमूर्तये नमः!
का सिरमं ' वायुपुत्राय नमः का शिखामं, "अग्निगर्भाय
नमः' का कवचे, "रामदूताय नपः' का नेत्रोमें
तथा "ब्रह्मास्त्राय नमः" के अस्त्रस्थानमे न्यास
करे। इस प्रकार न्यास-विधि कही गयी हे ।
ध्यान
तप्तचामीकरनिभं भीघ्नं संविहिताञ्जलिम्।
चलत्कुण्डलदीप्तास्यं पद्माक्षं मारुतिं स्मरेत् ॥
{` व
जका =
१. यथा-"दस्करं हनुमते नमः, हृदयाय नमः { ख़ रामभक्ताय नमः रिएसे स्वाहा । दसी लक्ष्षणप्राणदात्रे नमः
जिनको दिव्य कान्ति तपाये हुए सुवण्कि
समान हे, जो भयका नाश करनेवाले हं, जिन्होने
अपने प्रभु (श्रीराम)-का चिन्तन करके उनके
लिये अञ्जलि बाध रखी है, जिनका सुन्दर मुख
हिलते हए कृण्डलोंसे उद्धासित हो रहा है तथा
जिनके नेत्र कमलके समान शोभायमान ह, उन
पवनकुमार हनुमान्जीका ध्यान करे।
इस प्रकार ध्यान करके दस हजार मन्र-जप
करे । तत्पश्चात् धृतमिश्रित तिलसे दशांश दीम
करे । पूर्वोक्तं रीतिसे वैष्णव-पीठपर पूजन करे।
प्रतिदिन केवल रातमें भोजनका नियम लेकर
जितेन्ियभावसे एक सौ आठ वार् जपकररे तो
मनुष्य छोटे-मोटे रोगोसे छूट जाता है, इसमे
संशय नहीं है । बदु भारी रोगस मुक्त होनेके लिये
तो प्रतिदिनं एक हजार जप करना चाहिये ।
सुग्रीवके साथ श्रीरामकौ मित्रता करते हुए
हनुमान्ूजीका ध्यान करके जो दस हजार् मन्त्र-
9 वा जक जणो
रिखानै वपट्।' मच्छ अञ्जनीसुदाय नमः कव्याय हुम्" "दर्सौ सीताशोकविनाशाय नमः नेत्रत्रयाय वौषर् । दुग
ख्फ़ द्वी दसख्करटमौ लद्धाप्रासादभन्ननाय नमः अस्त्राय ट् ।'
((-0. 1\/॥८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
८
संक्षिप्त नारदपुराण
जप करता है, वह परस्पर द्वेष रखनेवाले दो
विरोधियोमे संधि करा सकता हि । जो यात्राके
समय हनुमान्जीका स्मरण करते हुए मन्त्र-जप
करता हे, उसके बाद यात्रा करता है, वह शीघ्र
ही अपना अभीष्ट-साधन करके घर लोट आता
हे । जो अपने घरमे मन्त्र-जप करते हए सदा
हनुमान्जीको आराधना करता हे, वह आरोग्य,
लक्ष्मी तथा कान्ति पाता है ओर किसी प्रकारके
उपद्रवमे नहीं पड़ता। वनमें यदि इस मन्त्रका
स्मरण किया जाय तो यह व्याघ्र आदि हिंसक
जन्तुओं तथा चोर-डाकुओंसे रक्षा करता हेै।
सोते समय शय्यापर एकाग्रचित्त होकर इस
मनत्रका स्मरण करना चाहिये। जो एेसा करता
हे, उसे दुःस्वप्न ओर चोर आदिका भय कभी
नहीं होता।
वियत् (ह) इन्दु (अनुस्वार) -से युक्त हो,
उसके वाद “हनुमते रुद्रात्मकाय! ये दो पद हों,
फिर॒ वर्मं (हु) ओर अस्त्र (फट्) हो तो (हं
हनुमते रुद्रात्मकाय हं फट् ) यह बारह अशक्षरोंका
महामन्त्र होता है, जो अणिमा आदि अष
सिद्धियोको देनेवाला हे । इसके श्रीरामचन्द्रजी
ऋषि, जगती छन्द, श्रीहनुमान्जी देवता, हं बीज
ओर "हुम्" शक्ति कही गयी है । छः दीर्घस्वरोसे
युक्तं वीज (हांहींह हे हौ हः)-के द्वारा
पडक्ग-न्यास करे ।
ध्यान
महाशेलं समुत्पाट्य धावन्तं रावणं प्रति॥
लाक्षारसारुणं रौद्रं कालान्तकयमोपमम्।
ज्वलदग्निसमं जत्र सूर्यकोटिसमप्रभम्॥
अङ्दादयैर्महावीरैीर्वेष्टितं रुद्ररूपिणम्।
तिष्ठ तिष्ठ रणे दुष्ट सृजन्तं घोरनिःस्वनम्॥
शेवरूपिणमभ्यर्च्य ध्यात्वा लक्षं जपेन्मनुम्।
(७४। १२२- १२५)
11८5.
।
|
५
८।
५. „द 5
०० । ^} तै 2 , श ठ द र
। ५४६ १424. (4 >) 1 ; ७
हनुमान्जी एक बहुत बड़ा पर्वत उखाड़कर
रावणको ओर दौड़ रहे हँ । वे लाक्षा (महावर) -
के रेगके समान अरुणवर्ण हैं । काल, अन्तक तथा
यमके समान भयंकर जान पडते देँ । उनका तेज
प्रज्वलित अग्रिके समान हे! वे विजयशील तथा
करोड़ों सू्येकि समान तेजस्वी हं । अंगद आदि
महावीर उन्हें चारों ओरसे घेरकर चलते हे । वे
साक्षात् सद्रस्वरूप हैँ । भयंकर सिंहनाद करते हुए
वे रावणसे कहते है -* अरे ओ दुष्ट ! युद्धम खडा
रह, खड़ा तो रह !' इस प्रकार शिवावतार् भगवान्
हनुमान्जीका ध्यान ओर पूजन करके एक लाख
मन्त्रका जप करे।
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पूर्व भाग-तृतीय पाद
४2९
तदनन्तर दूध, दही, घी मिलाय |
दशांश टोम करे। विमलादि शक्तियोसे युक्त
पूर्वोक्तं वैष्णवपीठपर मूल मन्त्रसे मूर्ति-कल्पना
करके हनुमान्जीकौ पूजा करनी चाहिये । एकमात्र
ध्यान करनेसे भी मनुष्योको सिद्धि प्राप्त होती है।
इसमें संशय नहीं हे । अव में लोकहितक इच्छासे
इस मन्त्रका साधन बतलाता हूं। हनुमान्जीका
साधन पुण्यमय हे, वह बड़े-बड़े पातकोंका नाश
करनेवाला हे । यह लोकमें अत्यन्त गुह्यतम रहस्य
हे ओर शीघ्र उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाला हे।
इसके प्रसादसे मन्त्र-साधक पुरुष तीनों लोकोमें
विजयी होता हे। प्रातःकाल स्नान करके नदीके
तटपर कुशासनपर बेटे ओर मूल-मन्त्रसे प्राणायाम
तथा पडद्क-न्यास सब कार्य करे । फिर सीतासहित
भगवान् श्रीरामचनद्रजीका ध्यान करके उन्हे आट
वार पुष्पाञ्जलि अर्पित करे। तत्पश्चात् धिसे हए
लाल चन्दनसे उसीको शलाकाद्वारा ताम्र-पात्रमे
अष्टदल कमल लिखे । कमलकी कर्णिकामें मन्त्र
लिखे। उसमे कपीश्र हनुमान्जीका आवाहन
करे। मूल-मन्त्रसे मूर्ति-निर्माण करके ध्यान तथा
आवाहनपूर्वक पाद्य आदि उपचार अर्पण करे।
गन्ध, पुष्प आदि सब सामग्री मूल-मन््रसे ही
निवेदन करके कमलके केसरोपें छः अद्धो (हदय,
सिर, शिखा, कवच, नेत्र तथा अस्त्र)-का पजन
करके आठ दलोमें सुग्रीव आदिका पजन करे।
सुग्रीव, लक्ष्मण, अंगद, नल, नील, जाम्बवान्,
कुमुद ओर केसरीका एक-एक दलमं पूजनं
करना चाहिये । तदनन्तर इन्द्र आदि दिक्फलों तथा
वन्न आदि आयुधोंका पूजन करे । इस प्रकार मन्त्र
सिद्ध होनेपर मन्त्रोपासक पुरुप पनी अभीष्ट
कामनाओंको सिद्ध कर सक्ता द।
नदीके तटपर, किसी वनम, पर्वतपर आधवा
कहीं भी एकान्त प्रदेशमे च्रे साधक्र भृमि-
ग्रहणपूर्वक साधन प्रारम्भ करे। आहार, श्रास,
वाणी ओर इद्दियोपर संयम रखे । दिग्बन्ध आदि
करके न्यास ओर ध्यान आदिका सम्यक् सम्पादन
करनेके पश्चात् पूर्ववत् पूजन करके उक्तं मनत्रराजका
एक लाख जप करे। एक लाख जप पूर्णं हो
जानेपर दूसरे दिन सबेरे साधक महान् पूजन करे ।
उस दिन एकाग्रचित्तसे पवननन्दन हनुमान्जीका
सम्यक् ध्यान करके दिन-रात जपम लगा रहे।
तवतक जप करता रहे, जवतक दर्शन न हो जाय।
साधकको सुदृढ जानकर आधी रातके समय
पवननन्दन हनुमान्जी अत्यन्त प्रसन्न हो उसके
सामने जाते ह । कपीश्वर हनुमान्जी उस साधकको
इच्छानुसार वर देते हैँ; वर पाकर वह श्रेष्ठ साधक
अपनी मौजसे इधर-उधर विचरता रहता है । यह
पुण्यमय साधन देवताओके लिये भी दुर्लभ दहै;
क्योकि गृ रहस्यरूप है । मेने सम्पूर्णं लोकोके
हितकौ इच्छासे इसे यहां प्रकाशित किया हे।
इसी प्रकार साधक अपने लिये हितकर अन्यान्य
प्रयोगोका भी अनुष्ान करे। इन्दु (अनुस्वार) - युक्त
वियत् (ह) अर्थात् “हं ' के पश्चात् ड विभक्त्यन्त
पवननन्दन शब्द हो ओर अन्तमे वद्िप्रिया ( स्वाहा)
हो तो ( हं पवननन्दनाय स्वाहा ) यह दस अक्षरका
मन्त्र होता टै, जो सम्पूर्णं कामनाओंको देनेवाला है।
इसके ऋषि आदि भी पहले वताय अनुसार ह।
पडद्घ- न्यास भी पूर्ववत् करने चाहिये।
ध्यान
ध्यायेद्रणे हनूमन्तं सूर्यकोटिसमप्रभम्।
धावन्तं रावणं जेतुं दृष्टा सत्वरमुत्थितम्॥
लक्ष्मणं च महावीरं पतितं रणभूतले ।
गुरुं च क्रोधमुत्पाद्य ग्रहीतुं गुरूपर्वतम्॥
हाहाकारः सदर्पश्च कम्पयन्तं जगत्रयम्
आब्रह्माण्ड समाव्यराप्य कृत्वा भीमं कलेवरम् ॥
( 44 1। १८'.--? ८)
((-0. 1/८111141/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 60810011
६५9
लङ्काको रणभूमिमे महावीर लक््मणको गिरा
देख हनुमान्जी तुरन्त उठ खड हए हैँ, वे हदयमें
महान् क्रोध भरकर एक विशाल एवं भारी
पर्वतको उठाने तथा रावणको मार गिरानेके लिये
वेगसे दौड पड़ हैँ । उनका तेज करोड़ों सूर्योकी
प्रभाको लज्जित कर रहा है। वे ब्रह्माण्डव्यापी
भयंकर एवं विराट् शरीर धारण करके दर्पपूर्ण
हंकारसे तीनों लोकोंको कम्पित किये देते है । इस
प्रकार युद्ध-भूमिमें हनुमान्जीका चिन्तन करना
चाहिये ।
ध्यानके पश्चात् विद्वान् साधक एक लाख जप
ओर पूर्ववत् दशांश हवन करे। इस मन्त्रका भी
विधिवत् पूजन पहले-जेसा ही बताया गया है ।
इस प्रकार मन्त्र सिद्ध होनेपर मन्त्रोपासक अपना
हित-साधन कर सकता हे। इस त्रे्ट॒ मन्त्रका
साधन भी गोपनीय रहस्य ही है । सव तन्त्रोमें इसे
अत्यन्त गोप्य बताया गया है । इसका उपदेश हर
एकको नहीं देना चाहिये । ब्राह्यमुहूर्तमे उठकर
शोचादि नित्यकर्म करके पवित्र हो नदीके तटपर
जाकर तीर्थके आवाहनपूर्वक स्नान करे । स्नानके
समय आठ बार मूलमन्त्रको आवृत्ति करे । तत्पश्चात्
वारह वार मन्त्र पट्कर् अपने ऊपर जल छिडके ।
इस प्रकार स्नान, संध्या, तर्पण आदि करके
गङ्धाजीके तटपर, पर्वतपर अथवा वनमें
भूमिग्रहणपूर्वक अकारादि स्वरवर्णोका उच्चारण
करके पूरक, ' क” से लेकर " म' तकके पाँचवर्गके
अक्षरोसे कुम्भक तथा 'य' से लेकर अवशेष
वर्णोका उच्चारण करके रेचक करना चाहिये ।
इस प्रकार प्राणायाम करके भूत-शुद्धिसे लेकर
पीठन्यासतकके सव कार्य करे। फिर पूर्वोक्त
रीतिसे कपीश्वर हनुमान्जीका ध्यान ओर पूजन
करके उनके आगे वैठकर साधक प्रतिदिन आदयपूर्वक
दस हजार मनत्र-जप कर । सातवें दिन विशपरूपये
संक्षिप्त नारदपुराण
पूजन करे। उस दिन मन्त्रसाधकः एकाग्रचित्तसे
दिन-रात जप करे। रातके तीन पहर बीत जानेपर
चोथे पहरमें महान् भय दिखाकर कपीश्वर पवननन्दन
हनुमान्जी अवश्य साधकके सम्मुख पधारते है
ओर उसे अभीष्ट वर देते हैं। साधक अपनी
रुचिके अनुसार विद्या, धन, राज्य अथवा विजय
तत्काल प्राप्त कर लेता है। यह सर्वथा सत्य है
इसमे संशयका लेश भी नहीं है । वह इहलोकमें
सम्पूर्णं कामनाओंका उपभोग करके अन्तमं मोक्ष
प्राप्त कर लेता हे।
सद्योजात (ओ) -सहित दो वायु (य् य्~यो
यो) “हनूमन्त' का उच्चारण करे । फिर "फल! के
अन्तमे "फ ' तथा नेत्र (इ) युक्त क्रिया (ल) एवं
कामिका (त)-का उच्चारण करे। तत्पश्चात् ' धग्गधगित'
बोलकर ` आयुराष ' पदका उच्चारण करे, तदनन्तर
लोहित (प) तथा “रुडाह' का उच्चारण करना
चाहिये । (पूरा मन्त्र इस प्रकार ह -*ॐ यो यो
हनुमन्त फलफलित धग्गधगित आयुराष परुडाह' )
यह पचीस अशक्षरका मन्त्र है। इसके भी ऋषि
आदि पूर्वोक्तं ही है । ' प्लीहा ' रोग दूर करनेवाले
वानरराज हनुमान्जी इसके देवता कहे गये हे ।
`प्लीहा' रोगसे युक्त पेटपर पानका पत्ता रखे,
उनके ऊपर आठ पर्व लपेटा हुआ वस्त्र रखकर
उसे ढक दे। तत्पश्चात् श्रेष्ठ साधक हनुमान्जीका
स्मरण करके उस वस्त्रके ऊपर एक वोसका
ट्कड़ा डाल दे। इसके वाद वेरके वृक्षकी
लकड्ीसे बनी हुई छृड़ी लेकर उसे जंगली
पत्थरसे प्रकट हुई आगमे मन्त्रसे सात बार तपावे,
फिर उस छृीसे पेटपर रखे हए बाँसके टुकडपर
सात वार प्रहार करे। इससे मनुष्योका प्लीहा रोग
अवश्य ही नष्ट हो जाता है।
" ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय अमुकस्य शर्खुलां
त्रोटय त्रोटय बन्धमोक्षं कुरु कुरु स्वाहा।'
((-0. 1/111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
निभ ््व षि ज ज
पूर्व भाग-तृतीय पाद्
६५१
यह एक मन्त्र है । इसके ईश्चर ऋषि, अनुष्टप्
छन्द, शृद्कलामोचक पवनपुत्र श्रीमान् हनुमान्
देवता, हं बीज ओर स्वाहा शक्ति है। बन्धनसे
छूटनेके लिये इसका विनियोग किया जाता हे।
छः दीर्घ स्वर तथा रेफयुक्त वीजमन््रसे षडङ्ग
न्यास करे (यथा--हां हृदयाय नमः, हीं शिरसे
स्वाहा इत्यादि) ।
ध्यान
वामे शेलं वैरिभिदं विशुद्धं टद्धमन्यतः।
दधानं स्वर्णवर्णं च ध्यायेत् कुण्डलिनं हरिम्॥
(७४। १६९-१७०)
"वाये हाथमे वैरियोंको विदीर्ण करनेवाला
पर्वत तथा दायें हाथमें विशुद्ध टक धारण करनेवाले,
सुवर्णके समान कान्तिमान्, कुण्डल-मण्डित वानरराज
हनुमान्जीका ध्यान करे ।'
इस प्रकार ध्यान करके एक लाख मन्त्रका
जप तथा आप्र-पट्टवसे दशांश हवन करे । विद्रानोने
इसके पूजन आदिकी विधि पूर्ववत् बतायी हे।
महान् कारागारमे पड़ा हुआ मनुष्य दस हजार जप
करे। इससे वह कारागारसे मुक्त हो अवश्य
सुखका भागी होता हे।
अब में बन्धनसे छडानेवाले शुभ हनुमत्-
मन्त्रका वर्णन करता हँ। अष्टदल कमलके भीतर
षट्कोण बनावे । उसकी कर्णिकामं साध्य पुरुषका
नाम लिखे। छः कोणोमें " ॐ आञ्जनेयाय ' का
उ्वेव करे । आटो दलमिं ' ॐ वातु-वातु' लिखे ।
गोरोचन ओर कुङ्कमसे यह उत्तम मन्त्र लिखकर
मस्तकपर धारण करके बन्धनसे द्ूटनेके लिये
उक्तं मन््रका दस हजार जप करे। इस मन््रको
प्रतिदिन मिट्रीपर लिखकर मन्त्रज्ञ पुरुष दाहिने
हाथसे मिटावे। बारह बार लिखने ओर मिटानेसे
मन्त्राराधक महान् कारागारमे द्ुटकारा पा जाता हे ।
गगन (ह) नेत्र (इ) -युक्तं ज्वलन (र) अर्थात्
"हरि ' पदके पश्चात् दो बार ' मर्कट ' शब्द बोलकर
शेष (आ) -सहित तोय (व) अर्थात् "वा' का
उच्चारण करके "मकरे ' पद् बोले । पिर “ परिमुच्ति
मुद्ति शृद्धलिकाम्' का उच्चारण करे। (पूरा
मन्त्र इस प्रकार है--हरि मर्कट मर्कट वाम करे
परिमुख्ति मुद्ति शृद्भूलिकाम्) यह चौवीस अशक्षरका
मन्त्र है। विद्रान् पुरुष इस मन्त्रको दाये हाथमें
वायं हाथसे लिखकर मिटा दे ओर एक सौ आट
वार इसका जप करे। एेसा करनेपर केदमं पड़ा
हआ मनुष्य तीन सप्ताहमे छूट जाता दै । इसमें
संशय नहीं हे। इसके ऋषि आदि पूर्ववत् टै।
पूजन आदि कार्य भी पूर्ववत् करे। इसका एक
लाख जप ओर शुभ द्रव्योंसे दशांश हवन करना
चाहिये । मन्त्रसाधक पुरुप इस प्रकार कपीश्वर
वायुपुत्र हनुमान्जीकौ आराधना करता टै, वह उन
सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता टै, जी
देवताओके लिये भी दुर्लभ दहै। अञ्जनीनन्दन
हनुमान्जीकी उपासना कौ जाय तो वे धन, धान्य,
पुत्र, पौत्र, अतुल सौभाग्य, यश, मेधा, विद्या,
प्रभा, राज्य तथा विवादमें विजय प्रदान करते ह ।
सिद्धि तथा विजय देते है।
सनत्कुमारजी कहते है -- अव मँ हनुमान्जीक
लिये रहस्यसहित दीपदान-विधिका वर्णन करता
हं । जिसको जान लेनेमात्रसे साधक सिद्ध दही
जाता है। दीपपात्रका प्रमाण, तैलका मान, द्रव्य-
प्रमाण तथा तन्तु (वत्ती)-का मान-इन सवका
क्रमशः वर्णन किया जायगा। स्थानभेद-मन््र,
पृथक् -पृथक् दीपदान-मन्त्र आदिका भी वर्णन
होगा। पुष्पसरे वासित तेलक द्वारा दिया हु
दीपक सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला पाना गया
दै। किसी पथिकके आनेपर् उसकी सवके
लिये तिलका तैल अर्पण किया जाय तो व्ह
लक्ष्मीप्रा्िका कारेण होता टै। सरसोंक्रा वेलं
((-0. 1/८11114<511॥1 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 68110011
८५२
संक्चिप्त नारदपुराण
रोग नाश करनेवाला हे, एेसा कर्मकुशल विद्रानोंका
कथन हे । गेह, तिल, उडद, मग ओर चावल- ये
पञ्चधान्य कहे गये हें । हनुमान्जीके लिये सदा
इनका दीप देना चाहिये । पञ्चघान्यका आरा बहुत
सुन्दर होता हे। वह॒ दीपदानमे सदा सम्पूर्ण
कामनाओंको देनेवाला कहा गया हे ।
सन्धिमे तीन प्रकारके आटेका दीप देना
उचित ठे, लक्ष्मीप्रा्िके लिये कस्तूरीका दीप
विहित हे, कन्याप्रा्िके लिये इलायची, लौंग,
कपूर ओर् कस्तूरीका दीपक बताया गया हे।
सख्य सम्पादन करनेके लिये भी इन्हीं वस्तुओंका
दीप देना चाहिये । इन सव वस्तु ओके न मिलनेपर
पञ्चधान्य श्रेष्ट माना गया हे। आठ मुद्रीका एक
किञ्चित् होता हे, आठ किञ्चित्का एक पुष्कल
होता हे । चार पुष्कलका एक आढक वताया गया
टे, चार् आढकका द्रौण ओर चारं द्रोणकी खारी
होती हे । चार खारीको प्रस्थ कहते हँ अथवा यहां
दूसरे प्रकारसे मान ताया जाता है। दो पलका
एक प्रसृत होता हे, दो प्रसृतका कुडव माना गया
हे, चार् कुडवका एक प्रस्थ ओर चार प्रस्थका
आढक होता हे। चार आढकका द्रौण ओर चार
द्रोणकी खारी होती टे । इस क्रमसे पट्कर्मोपयोगी
पात्रमे य मान समञ्जने चाहिये । पाँच, मात तथा
नौ-ये क्रमशः दीपक्के प्रमाण हैँ, सुगन्धित
तेलसे जलनंवाले दीपकका कोई मान नहीं है।
उसका मान अपनी रुचिके अनुसार ही माना गया
ठे। तेलोके नित्य पत्रमे केवल वत्तीका विशेष
नियम होता हे। सोमवारको धान्य लैकर उसे
जलमें इबोकर रखे । फिर् प्रमाणके अनुसार
कुमारी कन्याके हाथसे उसको पिसाना चाहिये ।
परीमे हुएको शुद्ध पात्रे रखकर नदीके जलसे
उसको पिण्डी वनानो चादिये। उसीसरे शुद्ध एवं
एकाग्रचित्त होकर दीपपात्र बनावे । जिस समय
दीपक जलाया जाता हो, हनुमत्कवचका पाठ
करे । मङ्गलवारको शुद्ध भूमिपर रखकर दीपदान
करे। कूट बीज ग्यारह बताये गये हें, अतः उतने
ही तन्तु ग्राह्य हैं । पात्रके लिये कोई नियम नहीं
ठे। मागमिं जो दीपक जलाये जाते है, उनकी
वत्तीमं इक्छोस तन्तु होने चाहिये । हनुमान्जीके
दीपदानमे लाल सूत ग्राह्य बताया गया हे । कूटकौ
जितनी संख्या हो उतना ही पल तेल दीपकमें
डालना चाहिये। गुरुकार्यमें ग्यारह पलसे लाभ
होता हे। नित्यकर्ममें पोच पल तेल आवश्यक
वताया गया हे। अथवा अपने मनकी जेसी रुचि
हो उतना ही तेलका मान रखे । नित्य-नैमित्तिक
कर्मोके अवसरपर हनुमान्जीको प्रतिमाके समीप
अथवा शिवमन्दिरमे दीपदान कराना चाहिये।
हनुमान्जीके दीपदानमें जो कोई विशेष वात
हे उसे में यहां वता रहा हूं। देव-प्रतिमाके आगे,
प्रमोदके अवसरपर, ग्रहोके निमित्त, भूतोके निमित्त,
गृहमे ओर चोराहोपर-इन छः स्थलोमें दीप
दिलाना चाहिये । स्फटिकमय शिवलिङ्गके समीप,
शालग्रामशिलाके निकट हनुमानूजीके लिये किया
हआ दीपदान नाना प्रकारके भोग ओर लक्ष्मीको
प्राप्तिका हेतु कहा गया हे। विघ्न तथा महान्
संकटोका नाश करनेके लिये गणेशजीके निकट
हनुमान्जीके उद्देश्यसे दीपदान करे । भयंकर विष
तथा व्याधिका भय उपस्थित होनेपर हनुमद्विग्रहके
समीप दीपदानका विधान है। व्याधिनाशके लिये
तथा दुष्ट ग्रहोंकी दृष्टस रक्षाके लिये चौराहेपर
दीप देना चाहिये । बन्धनसे दूटनेके लिये राजद्वारपर
अथवा कारागारके समीप दीप देना उचित है।
सम्पूर्णं कार्योकी सिद्धिके लिये पीपल ओर वड्के
मृलभागमें दीप देना चाहिये । भयनिवारण ओर
विवाद्-शान्तिके लिये, गृहसंकट ओर युद्ध
संकटको निवृत्तिके लिये तथा विष, व्याधि ओर
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 21188 \/8181185। (0166101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
४५३
ज्चरको उतारनेके लिये, भूतग्रहका निवारण
कृत्यासे छुटकारा पाने तथा कटे हुएको जोड्नेके
लिये, दुर्गम एवं भारो वनमें व्याघ्र, हाथी तथा
सम्पूर्णं जीवोके आक्रमणसे बचनेके लिये, सदाके
लिये बन्धनसे दूटनेके लिये, पथिकके आगमनमे,
आने-जानेके मागमे तथा राजद्वारपर हनुमान्जीके
लिये दीपदान आवश्यक बताया गया हे ! ग्यारह,
इक्ीस ओर पिण्ड-तीन प्रकारका मण्डलमान
होता हे। पांच, सात अथवा नौ-इन्हं लघुमान
कहा गया हे । दीपदानके समय दूध, दही, माखन
अथवा गोबरसे हनुमान्जीकौ प्रतिमा वनानेका
विधान किया गया हे। सिंहके समान पराक्रमी
वीरवर हनुमान्जीको दक्षिणाभिमुख करके उनके
पैरको रीछपर रखा हुआ दिखावे। उनका मस्तक
किरीटसे सुशोभित होना चाहिये। सुन्दर वस्त्र,
पीट अथवा दीवारपर हनुमान्जीको प्रतिमा अङ्कित
करनी चाहिये । कूटादिमें तथा नित्य दीपमे द्वादशाक्षर
मन्त्रका प्रयोग करना चाहिये।
गोबरसे लिपी हुई भूमिपर एकाग्रचित्त हो
षट्कोण अद्भत करे। उसके वाह्यभागमं अष्टदल
कमल बनावे तथा उसके भी वाह्यभागमें भृपुर-
रेखा खीचे। उस कमलमें दीपक रखे । शैव
अथवा वैष्णव पीठटकर अञ्जनीनन्दन हनुमानूजीकी
पूजा करे । छः कोणके अन्तरालमं हौं दस्र ख्फ़
हस्म हसव्छे हसो, ' इन छः कूटोंका उद्ेख करे ।
छहो कोणोमें बीजसहित छः अद्धगोको लिखे ।
मध्यमे सौम्यका उद्वेख करे ओर उसीमं पवननन्दन
हनुमान्जीकी पूजा करके छः कोणोमं छः अद्धो
तथा छः ना्मोको पहले बताये अनुसार पूजा कर ।
कमलके अषएटदलोमें क्रमशः इन वानरांको प्रजा
करनी चादिये--' सुग्रीवाय नमः, अद्भृदाय नमः,
सुषेणाय नमः, नलाय नमः, नीलाय नमः, जाम्बवते
नमः, प्रहस्ताय नमः, सुवेषाय नमः।' तत्पशात्
पडद्भ देवताओंका परजने कर। “अञ्जनापुत्राय
नमः, रुद्रमूर्तये नमः, वायुसुताय नमः, जानकीजीवनाय
नमः, रामदूताय नमः, ब्रह्मास््रनिवारणाय नमः।'
पञ्चोपचार (गन्ध, पुष्प, धूप, दीप ओर नैवेद्य) -
से इन सवका पूजन करके कुश ओर जल हाथमे
लेकर देश-कालके उच्वारणपूर्वक दीपदानका संकल्प
करे। उसके वाद दीप-मन्त्र बोले। श्रेष्ठ साधक
उत्तराभिमुख हो उस मन्त्रको कूट संख्याके बरावर
(छः वार) जप कर हाथमे लिये हुए जलको
भूमिपर गिरा दे। तदनन्तर दोनों हाथ जोड़कर
यथाशक्ति मन्त्र-जप करे! फिर इस प्रकार
कहे-“हनुमान्जी ! उत्तराभिमुख अर्पित करिये हए
इस श्रेष्ठ दीपकसे प्रसन्न होकर आप एेसी कृपा
करे, जिससे मेरे सारे मनोरथ पूर्णं हो जा्यं।'
इस प्रकार ये तेरहं द्रव्य उपयुक्त होते है-- गोवर,
मद्री, मपी, आलता, सिंदूर, लाल चन्दन, श्रेत
चन्दन, मधु, कस्तूरी, दही, दूध, मक्खन ओर घी।
गोवर दौ प्रकारके बताये गये है-गायका ओर
भंसका। खोये हए द्रव्यकौ पुनः प्राप्िके लिये
दीपदान करना हो तो उसमें भंसके गोवरका
उपयोग आवश्यक माना गया है । मुने! दूर देशमं
गये हए पथिकके आगमन, महादुर्गकौ रक्षा,
वालक आदिक रक्षा, चोर आदिके भयका नाश
आदि च्छार्योमिं गायका गोवर उत्तम कहा गया है।
वह भी भृमिपर पड़ाहो तो नहीं लेना चादिये।
जव गाय गोबर कर रही दहो तो किसी पात्रमं
आकाशमेसे ही उसे रोक लेना चादिय।
मद्री चार प्रकारकी कही गयी दै--सफ़द,
पीली, लाल ओर काली। उनमं गोपीचन्दन,
हरिताल, गरू आदि ग्राह्य ह; अन्य सव द्रव्य
प्रसिद्ध एवं सवके लिये मुपरिचित ै। विद्धान्
पुरुप गोपीचन्दनसे चीकोर मण्डल बनाकर उसके
मध्यभागे भंसकरे गोवरमे हनुमान्जीकौ मूर्ति
वनावे। मन्त्रोपासक्र एकाग्रचित्त दो बीज ओर
क्रोध (ह) उनकी पुंछ अद्भत करे । तैलस
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संक्षिप्त नारदपुराण
मूर्तिको नहलाये ओर गुडसे तिलक करे । कमलके
समान रगवाला धूप, जो शालवृक्षको गोंदसे बना
हो, निवेदन करे। पच वत्तियोके साथ तेलका
दीपक जलाकर अर्पण करे। इसके वाद (हाथ
धोकर) श्रेष्ट साधक दही-भातका नवेद्य निवेदन
करे। उस समय व्ह तीन बार शेष (आ) -सहित
विप (म्)-का उच्चारण करेः। एेसा करनेपर
खोयी हई भंसों, गोओं तथा दास-दासियोंकी भी
प्राप्ति हो जाती हे। चोर आदि दुष्ट जीवों तथा सर्प
आदिका भय प्राप्त होनेपर ' ताल ' से चार दरवाजेका
सुन्दर गृह बनावे । पूर्वके द्वारपर हाथीको मूर्ति
विठावे ओर दक्षिण द्वारपर भसेको, पश्चिम द्वारपर
सर्पं ओर उत्तर द्वारपर व्याघ्र स्थापित करे। इसी
प्रकार क्रमसे पूर्वादि द्रारोपर खद्ध, छुरी, दण्ड
ओर मुद्र अद्भत करके मध्य भागमें भंसके
गोबरसे मूर्तिं बनावे । उसके हाथमे उमरू धारण
करावे ओर यत्नपूर्वक यह चेष्टा करे कि मूर्तिसे
एेसा भाव प्रकट हो मानो वह चकित नेत्रोंसे देख
रही है । उसे दूधस्रे नहलाकर उसके ऊपर लाल
चन्दन लगाये। चमेलीके फूलोंसे उसको पूजा
करके शुद्ध धूपको गन्ध दे। घीका दीपक देकर
खीरका नैवेद्य अर्पण करे। गगन (ह), दीपिका
(ऊ) ओर इन्दु (अनुस्वार) अर्थात् "हुं" ओर
शस्त्र (फट्) यह आराध्यदेवताके अगे जपे । इस
प्रकार सात दिन करके मनुष्य भारी भयसे मुक्त हो
जाता हे । उक्त दानो प्रयोगोका प्रारम्भ मद्गलवारके
दिन आदरपूर्वकं करना चाहिये । शत्रुसेनासे भय प्राप्त
होनेपर गेरूसे मण्डल वनाकर उसके भीतर थोड़ा
ज्मुका हुआ ताडका वृक्ष अद्भत करे। उसपरसे
लटकती हुई हनुमान्जीकी प्रतिमा गोवरसे बनावे।
उनके वायं हाथमे तालका अग्रभाग ओर दाहिनेमें
ज्ञान-मुद्रा हो । ताडको जडसे एक हाथ दूर अपनी
दिशामें एक चोकोर मण्डल बनावे । उसके मध्यभागमें
मूर्तिं अङ्भित करे । उसका मुख दक्षिणकी ओर हो,
वह हनुमन्मूर्तिं बहुत सुन्दर बनी हो, हदयमें
अञ्जलि बोधे बैठी हो। जलसे उसको स्नान
कराकर यथासम्भव गन्ध आदि उपचार अर्पण
करे। फिर घृतमिशरित खिचडीका नैवेद्य निवेदन
करे ओर उसके आगे 'किलि-किलि' का जप
बताया गया हे। प्रतिदिन एेसा ही करे। एेसा
करनेपर पथिकोंका शीघ्र समागम होता हे।
जो प्रतिदिन विधिपूर्वक हनुमान्जीको दीप
देता हे, उसके लिये तीनों लोकें कुछ भी
असाध्य नहीं हे । जिसके हदयमें दुष्टता भरी हो,
जिसको वुद्धि दुष्टताका ही चिन्तन करती हो, जो
शिष्य होकर भी विनयशून्य ओर चुगला हो, एसे
मनुप्यको कभी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये ।
कृतघ्रको कदापि इस रहस्यका उपदेश न दे।
जिसके शील-स्वभावकी भलीभोति परीक्षा कर
ली गयी हो, उस साधु पुरुषको ही इसका उपदेश
देना चाहिये ।
अव मैं तत्त्वज्ञान प्रदान करनेवाले दूस
मन्त्रका वर्णन करूगा । ' तार ८ ॐ ) नमो हनुमते '
इतना कहकर तीन बार जाठर (म)-का उच्यारण
करे। फिर “दनक्षोभम्' कह-कहकर दो वार
` संहर' यह क्रियापद बोले । उसके वाद ` आत्म-
तत्त्वम्” बोलकर दो बार ' प्रकाशय ' का उच्चारण
करे। उसके बाद वर्म (हुं), अस्त्र (फट्) ओर
वहविजाया (स्वाहा) -का उच्चारण करे। (पूरा मनत
यो ह- ॐ नमो हनुमते मम मदनक्षोभं संहर संहर
आत्मतत्त्वं प्रकाशय प्रकाशय हुं फट् स्वाहा) यह
सादे छत्तीस अक्षरोंका मन्त्र है। इसके वसिष्ठ
१. "मा मामा इस प्रकार उच्चारण करना चाहिये।
((-0. 1/८11114<511॥1 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 68110011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
मुनि, अनुष्टुप् छन्द ओर हनुमान् देवता हे । सात-
सात, छः, चार, आठ तथा चार |
षडङ्ग-न्यास करके कपीश्वर हनुमान्जीका इस
प्रकार ध्यान करे-
जानुस्थवामबाहुं च ज्ञानमुद्रापरे हदि।
अध्यात्मचित्तमासीनं कदलीवनमध्यगम्॥
बालार्ककोटिप्रतिमं ध्यायेज्ज्ञानप्रदं हरिम्।
(७५। ९५-९६)
" हनुमान्जीका नायो हाथ घुटनेपर रखा हआ
हे । दाहिना हाथ ज्ञानमुद्रामें स्थित हो हदयसे लगा
हे। वे अध्यात्मतत्वका चिन्तन करते हुए कदलीवनमें
वेठे हए हैँ । उनकी कान्ति उदयकालके कोटि-
कोरि सूर्यकि समान हे। एसे ्ानदाता श्रीहनुमान्जीका
ध्यान करना चाहिये ।'
इस प्रकार ध्यान करके एक लाख जप करे
ओर घृतसहित तिलकौ दशांश आहुति दे, फिर
पूर्वोक्त पीठपर पूर्ववत् प्रभु श्रीहनुमान्जीका पूजन
करे। यह मन्त्र-जप किये जानेपर निश्चय ही
कामविकारका नाश करता है ओर साधक कपीश्वर
हनुमान्जीके प्रसादसे तत्त्वज्ञान प्राप्त कर लेता हे।
अव मैं भूत भगानेवाले दूसरे उत्कृष्ट मन्रका
वर्णन करता हूं। ' ॐ श्री मह्यञ्जनाय पवनपुतरावेशयावेशय
ॐ श्रीहनुमते फट्।' यह पचीस अक्षरका मनर हे।
इस मन्त्रके ब्रह्मा ऋषि, गायत्री छन्द, हनुमान् देवता,
श्रीं बीज ओर फट् शक्ति कही गयी है। छः
दीर्घस्वरोसे युक्त बीजद्वारा षडद्ध-न्यास करे।
ध्यान
आञ्जनेयं पाटलास्यं स्वणाद्रिसमविग्रहम्।
पारिजातद्रुमूलस्थं चिन्तयेत् साधकोत्तमः ॥
(44 । १०२)
^+ +221 21
न धन { ९,।
^
(8;
= 14 4 ।
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"जिसका मुख लाल ओर शरीर सुवर्णगिरिके
सदृश कान्तिमान् हे, जो पारिजात (कल्पवृक्ष) -
के नीचे उसके मूृलभागमे वैठे हृए दहं, उन
अञ्जनीनन्दन हनुमान्जीका श्र साधक चिन्तन
करे ।'
इस प्रकार ध्यान करके एक लाख जप कर
ओर मधु, घी एतं शक्र मिलाये हुए तिलसे
दशांश होम करे। विद्वान् पुरुष पूर्वोक्त पटपर
पूर्वोक्तं रीतिसे पूजन करे। मन्त्रोपासक इस
मन्तरद्रारा यदि ग्रहग्रस्त पुरुषको आड् दे तो वहं
ग्रह चीखता-चि्वाता हआ उस पुरुषको छोडकर
भाग जाता है। इन मन्त्रोको सदा गुप्त रखना
चाहिये । जहाँ - तहां सबके सामने इन्दं प्रकाशमें
नदीं लाना चाहिये । खूब जचि-वृञ्चे हुए शिष्यको
अथवा अपने पुत्रको ही इनका उपदेश करना
चाद्ये । (ना० पूर्व०° ७४-५५)
दु /
((-0. 1\/॥८11104/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 60810011
४५६
संक्षिप्त नारदपुराण
भगवान् श्रीकृष्ण-सम्बन्धी मन्त्रोको अनुष्ठानविधि तथा विविध प्रयोग
सनत्कुमारजीने कहा- नारद! अव मं भोग
ओर मोक्षरूप फल देनेवाले श्रीकृष्ण-मन्त्रोका
वर्णन करूगा; काम (क्लीं) ड" विभक्त्यन्त
कृष्ण ओर गोविन्द पद (कृष्णाय गोविन्दाय)
फिर “गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ' ८ क्लीं कृष्णाय
गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ) यह अठारह
अक्षरोका मन्त्र हे, जिसको अधिष्ठात्री देवी दुर्गाजी
हे । इस मन्त्रके नारद ऋषि, गायत्री छन्द, परमात्मा
श्रीकृष्ण देवता, क्लीं बीज ओर स्वाहा शक्ति हे ।
धर्म, अर्थ, काम ओर मोक्ष-- चारों पुरुषार्थोकौ
सिद्धिके लिये इसका विनियोग किया जाता हे।
श्रेष्ट साधक ऋषिका सिरमे, छन्दका मुखमें,
देवताका हदयमें व्रीजका गृह्यमे ओर शक्तिका
चरणोमे न्यास करे । मन्त्रके चार, चार, चार, चार
ओर दो अशक्षरोसे पञ्चाद्ध-न्यासरः करके फिर
ततत्व-न्यास करे। तत्पश्चात् हदयकमलमें क्रमशः
द्रादशकलाव्याप्त सूर्यमण्डल, पोडशकलाव्याप्
चन्द्रमण्डल तथा दशकलाव्याप्त अग्रिमण्डलका
न्यास करे। साथ ही मन्त्रके पदोमे स्थित आठ,
आठ ओर दो अक्षरोकरा भी क्रमशः उन मण्डलोंके
साथ योग करके उन सबका हदयमें न्यास करे
(यथा--क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय अं द्वादशकला-
व्याप्तसूर्यमण्डलात्मने नमः, गोपीजनवल्छभाय ॐ
घोडश्कलाव्याप्तचन्द्रमण्डलात्मने नमः स्वाहा,
मं दशकलाव्यास्वदधिमण्डलात्मने नमः-
हृत्पुण्डरीके) । तत्पश्चात् आकाशादिके स्थलों
अर्थात् मूद्धा, मुख, हदय, गृह्य तथा चरणोमं क्रमशः
वासुदेव आदिका न्यास कर। वासुदेव, सङ्कर्षण,
ण कुष्क कक कि क > तष;
१. नारदर्षये नमः शिरसि, गायत्रीछन्दसे नमः मुख,
स्वाहाशक्तये नमः पादयोः- यह ऋष्यादि न्याम दहै)
प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा नारायण--ये वासुदेव आदि
कहलाते हें । ये क्रमशः परमेष्ठी आदिसे युक्त हैं |
परमेष्ठि पुरुष, शोच, विश्च, निवृत्ति तथा सर्व-ये
परमेष्ठयादि कहे गये हें । परमेष्ि पुरुष आदि क्रमशः
श्चतवर्ण, अनिलवर्ण, अग्निवर्णं, अम्बुवर्ण तथा भूमिवर्णके
हें । इन सबका पूर्ववत् न्यास करे (यथा-
श्चेतवर्णपरमेष्ठिपुरुषात्मने वासुदेवाय नमः मूर्द्धनि ।
अनिलवर्णशौचात्मने सङ्कर्षणाय नमः मुखे।
अग्रिवर्णविश्चात्मने प्रद्युप्राय नमः हदये।
अम्बुवर्णनिवृत्त्यात्मनेऽनिरुद्धाय नमः गुह्य।
भूमिवर्णसर्वात्मने नारायणाय नमः पादयोः।) ॐ
क्षौ कोपतत्त्वात्मने नृसिंहाय नमः इति स्वाङ्के । इस
प्रकार सम्पूर्णं अङ्घमें न्यास करे! यह ततत्व-न्यास
कहा गया हे। इसी प्रकार श्रेष्ठ साधकोंको यह जानना
चाहिये कि वासुदेव आदि नामोंका "डः विभक्त्यन्त
रूप ही न्यासमें ग्राह्य हे। तदनन्तर मन्त्रस् पुरुष
मृलमन्त्रको चार वार पट्कर पूरक, छः वार
पटकर् कुम्भक ओर दो बार पट्कर् रेचक करते
हुए प्राणायाम सम्पन्न करे । कुक आचार्योका यहां
यह कथन है कि प्राणायामके पश्चात् पीठन्यास करके
दूसरे न्यासोका अनुष्ठान करे । आगे बतायी जानेवाली
विधिके अनुसार दशतत्त्वादि न्यास करके विद्वान्
पुरुष मूर्तिपञ्जर नामक न्यास करे। फिर किरीटमन्रद्राय
बुद्धिमान् साधक सर्वाद्िमें व्यापक न्यास करके
प्रणवसम्पुटित मन्त्रको तीन वार दोनों हाथोंको
पाचों अंगुलियों व्याप्त (विन्यस्त) करे । उसके
वाद तीन बार पञ्चाङ्ग-न्यास करे। तदनन्तर मूलमन्रक
पटकर सिरसे लेकर पैरतक व्यापक-न्यास करे।
श्रीकृष्णपरमात्मदेवतायै नमः हदि, क्लीवीजाय नमः गहय,
२. पञ्चाङ्ग न्यास इम प्रकार है- क्लं कृष्णाय दयाय नमः । गोविन्दाय शिरसे स्वाहा * गोपीजन" शिखायै
चप् " वह्भ्यय' कतनाय दुं, ' स्वाहा" अम्त्राय फर् ।
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 8118811 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद्
फिर केवल प्रणवद्वारा एक वार् व्यापक-न्यास
करके मन्त्र-न्यास करे। इसके वाद पुनः नेत्र,
मुख, हदय, गृह्य ओर चरणद्वय-इनमं क्रमशः
मन्त्रके पांच पदोंका. अन्तमं ' नमः ' लगाकर न्यास
करे (यथा--क्लीं नमः नेब्रह्मये। कृष्णाय नमः
मुखे। गोविन्दाय नमः हृदये। गोपीजनवल्यभाय
नमः गुह्ये । स्वाहा नमः पादयोः) । पुनः ऋषि
आदि न्यास करके पूर्वोक्त पञ्चाद्भ-न्यास करे।
अव में सव न्यासोमें उत्तमोत्तम परमगुह्य
न्यासका वर्णन करता हूं, जिसके विज्ञान मात्रसे
मनुष्य जीवन्मुक्त तथा अणिमा आदि आगो सिद्धिर्योका
अधीश्वर हो जाता हे, जिसको आराधनासे मन्त्रोपासक
श्रीकृष्णका सान्निध्य प्राप्त कर लेता हे । प्रणवादि
व्याहतियोसे सम्पुटित मन्त्रका ओर मन्त्रसे सम्पुटित
प्रणवादिका तथा गायत्रीसे सम्पुटित मन्त्रका ओर
मन्त्रसे सम्पुटित गायत्रीका मातृकास्थलमे न्यास
करे। मातृका-सम्पुरित मूलका ओर मूलसे सम्पुटित
मातृका वर्णोका श्रेष्ठ साधक क्रमशः न्यास करे।
विद्वान् पुरुप पहले मातृका वर्णोका नियतस्थलमें
न्यास कर ले। उसके वाद पूर्वोक्त न्यास करने
चाहिये । इस तरह उपर्युक्त छः प्रकारके न्यास
करे। यह पोढान्यास कहा गया है। इस रष
न्यासके अनुष्टानसे साधक साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके
समान हो जाता है। न्याससे सम्पुटित पुरुषको
देखकर सिद्ध, गन्धर्व, किन्नर ओर देवता भी उसे
नमस्कार करते हें । फिर इस भूतलपर मनुप्योके
लिये तो कहना दी क्या है 2 तत्पथात् ॐ नमः
सुदर्शनाय अस्त्राय फट् ' इस मन््रसे दिग्बन्ध करे ।
इसके बाद अपने हदयमें सम्पूर्णं अभीष्र वस्तुओंको
देनेवाले इष्टदेवका इस प्रकार ध्यान करे-
उत्फुल्यकुसुमव्रातनप्रणाखर्वरद्रुमः ।
सस्मेरमञ्जरीवृन्दवह्टरीवेष्टितेः शुभः ॥
गलत्परागधुलीभिः सुरभीकृतदिङ्मुखः।
2५७
स्मरेच्छिशिरितं वृन्दावनं मन््री समाहितः ॥
उन्मीलन्नवकञ्चालि विगलन्मधुसञ्चयैः।
लुव्धान्तःकरणैर्गुञ्जदद्विरेफपटलेः शुभम्॥
मरालपरभृत्कीरकपोतनिकरेर्मृहुः ।
मुखरीकृ तमानृत्यन्मायूरकुलमञ्जुलम् ॥
कालिन्द्या लोलकद्योलविप्रुधर्मन्दवाहिभिः।
उत्निद्राम्बुरुहव्रातरजोभिरर्धूसरः शिवैः ॥
प्रदीपितस्मरर्गोष्ठसुन्दरीमृदुवाससाम् ।
विलोलनपेः संसेवितं वा तेर्निरन्तरम्॥
स्मरेत्तदन्ते गीर्वाणभूरुहं सुमनोहरम्।
तदधः स्वण्विद्यां च रत्रपीठमनुत्तमम्॥
रन्रकुद्िमपीठेऽस्मिन्नरुणं कमलं स्मरेत्।
अष्टपत्रं च तन्मध्ये मुकुन्दं संस्मरत्स्थितम्॥
फुद्टेन्दीवरकान्तं च केकिवहावतंसकम्।
पीतांशुकं चन्द्रमुखं सरसीरुहनेत्रकम्॥
कोस्तुभोद्धासिताद्गं च श्रीवत्सादट्धं सुभूषितम्।
व्रजस्त्रीनेत्रकमलाभ्यर्यितं गोगणावृतम्॥
गोपवृन्दयुतं वंशीं वादयन्तं स्मरेत्सुधीः।
(८०--५०)
"मन्त्रोपासक एकाग्रचित्त होकर श्रीवृन्दावनका
चिन्तन करे, जो शुभ एवं सुन्दर हरे-भर वृक्षोसे
परिपूर्णं तथा शीतल है । उन वृक्षोकी शाखाएं खिले
हए कुसुम-समृहोके भारसे ञ्युको हई हं । उनप्
प्रफुल्ल मञ्जरियोसे युक्त विकसित लतावरद्रिया फैली
हई दै । वे वृक्ष ्जडते हुए पुष्पपरागरूप धमिकर्णोसै
सम्पूर्णं दिशाओंको सुवासित करते रहते ह, वहां
खिलते हए नृतन कमल-वनसे निकलती मधुधाराअकि
संचयये लुभाये अन्तःकरणवाले श्रमरोका समुदाय
मनोहर गुञ्जार करता रहता है । हंस, कोकिल, शुर
ओर पारावत आदि पक्षियाका समृह वारम्बार् कलव
करते हए वृन्दावनको कोलाहलपूर्णं क्रिये रहता
टै । चारों जर नृत्य करते मोग दये वह चन
अत्यन्त मनारम आन पडता दे। कालिन्दीकी
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 81811851 (01661010. 01411260 0 66810011
४५८
संक्षिप्त नारदपुराण
चञ्चल लहरोसे नीर-विन्दुओंको लेकर मन्द-मन्द
गतिसं प्रवाहित होनेवाली शीतल सुखद वायु
प्रफु्य पड्कजोके पराग-पुञ्जसे धूसर हो रही है।
त्रजसुन्दरियोके मृदुल वसनाञ्चलोंको वह चञ्चल
किये देती है ओर इस प्रकार मनमें प्रेमोन्मादका
उदहीपन करती हुड वह मन्द वायु वृन्दावनका
निरन्तर सेवन करती रहती है । उस वनके भीतर
एक अत्यन्त मनोहर कल्पवृक्षका चिन्तन करे,
जिसके नीचे सुवर्णमयी वेदीपर परम उत्तम रत्रमय
पीठ शोभा पाता हे। वर्हाकी प्राङ्गण-भूमि भी
रलोंसे आबद्ध है 1 उस रत्रमय पीठपर लाल रंगके
आटदलकमलको भावना करे, जिसके मध्यभागमें
श्रीमुकुन्द विराजम्नान हें । उनके स्वरूपका इस
प्रकार ध्यान करे-उनको अद्ग-कान्ति विकसित
नील कमलके समान श्याम हे । वे मोर-पट्कुका
मुकुट पहने हए हे, कटिभागमें पीताम्बर शोभा पा
रहा है । उनका मुख चन्द्रमाको लज्जित कर रहा
है, नेत्र खिले हए कमलोंकौ शोभा छीने लेते हैँ
उनका सम्पूर्णं अङ्ग कौस्तुभमणिकी प्रभासे उद्धासित
हो रहा हे, वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह सुशोभित
हे । वे परम सुन्दर दिव्य आभूषणोसे विभूषित है,
त्रजसुन्दरियों मानो अपने नेत्रकमलोके उपहारसे
उनकी पूजा करती है, गे उन्हे सब ओरसे घेरकर
खडी है । गोपवृन्द उनके साथ है ओर वे वंशी बजा
रहे ह। विद्वान् पुरुष भगवान्का चिन्तन करे।'
बुद्धिमान् साधक इस तरह ध्यान करके पहले
बीस हजार मन््र-जप करे। फिर एकाग्रचित्त हो
अरुण कमल-कुसुमोकी दशांश आहुति दे। तत्पश्चात्
समाहित होकर मनत्र-सिद्धिके लिये पच लाख जप
करे। लाल कमलोको आहुति देकर साधक सम्पूर्ण
सिद्धियोका स्वामी हो जाता हे। पूर्वोक्त वैष्णव पीठपर
मूलमन्त्रसे मूर्ति-निर्माण करके उसमे गोपीजनमनोहर
श्यामसुन्दर श्रीकृष्णका आवाहन ओर पूजन करे।
मुखमे वेणुकी पूजा करके, वक्षःस्थलमें वनमाला,
केोस्तुभ तथा श्रीवत्सका पूजन करे। इसके बाद
पुष्पाञ्जलि चट्ावे । तत्पश्चात् बुद्धिमान् उपासक देवेश्वर
श्रीकृष्णका चिन्तन करते हए उनके दक्षिणभागे
श्तचन्दनचचित शेत तुलसीको तथा वामभागमें
रक्तचन्दनचचित लाल तुलसीको समर्पित करे। इसके
वाद दो अश्वमार (कनेर) पुष्पोंसे उनके हदय ओर
मस्तकको पूजा करे । तदनन्तर शीर्षभागमें विधिपूर्वक
दो कमलपुष्प समर्पित करे। तत्पश्चात् उनके सम्पूर्णं
अङ्घोमें दो तुलसीदल, दो कमलपुष्प ओर दो अश्चमार
( श्चेत-रक्त कनेर) कुसुम चढाकर् फिर सब प्रकारके
पुष्प अर्पण करे। गोपाल श्रीकृष्णके दक्षिणभागे
अविनाशी निर्मल चेतन्यस्वरूप भगवान् वासुदेवका
तथा वामभागमें रजोगुणस्वरूपा नित्य अनुरक्ता रुक्मिणी
देवीका पूजन करे। इस प्रकार गोपालका भलीभोति
पूजन करके आवरण देवताओंको पूजा करे। दाम,
सुदाम, वसुदाम ओर किंकिणी-इनका क्रमशः पूर्व,
दक्षिण, पश्चिम ओर उत्तरमें पूजन करे। दाम आदि
शब्दके आदिमें प्रणव ओर अन्तमं “ङू' विभक्ति
तथा 'नमः' पद् जोड़ने चाहिये। (यथा- ॐ
दामाय नमः इत्यादि, यदि दाम शब्द नान्त हो तो
'दाप्रे नमः' यह रूप होगा) अग्रि, नैर््रहत्य, वायव्य
तथा ईशान कोणेमें क्रमशः हदय, सिर, शिखा तथा
कवचका पूजन करके सम्पूर्णं दिशाओमें अस्त्रोका
पूजन करे। फिर आढठों दलोमें रुक्मिणी आदि
पटरानियोको पूजा करे! रुक्मिणी, सत्यभामा,
नाग्रिजिती, सुविन्दा, मित्रविन्दा, लक्ष्मणा, जाम्बवती
तथा सुशीलाः! । ये सब-की-सब सुन्दर, सुरम्य एवं
विचित्र वस्त्राभूषणेसे विभूषित है । तदनन्तर अष्टदलेकि
१. अन्यत्र सुशीला ओर सुविन्दाके स्थानमें भद्रा ओर कालिन्दी-ये दो नाम उपलब्ध होते है।
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद्
अग्रभागमें वसुदेव-देवकी, नन्द-यशोदा, बलभद्र-
सुभद्रा तथा गोप ओर गोपियोका पूजन करे। इन
सवके मन, वुद्धि तथा नेत्र गोविन्दमें ही लगे हुए हे।
दोनों पिता वसुदेव ओर नन्द क्रमशः पीत ओर पाण्डु
वर्णके है । मातार्ँ (देवकी ओर यशोदा) दिव्य हार,
दिव्य वस्त्र, दिव्याङ्गराग तथा दिव्य आभूष्णोसे
विभूषित हे । दोनोनि चरु तथा खीरसे भरे हए पात्र ले
रखे हें । देवकीका रग लाल है ओर यशोदाका श्याम ।
दोनोनि सुन्दर हार ओर मणिमय कुण्डलसे अपनेको
विभूषित किया है। बलरामजी शद्रः तथा चन््रमाके
समान गोरवर्णके ह । वे मूसल ओर हल धारण करते
हे । उनके श्रीअद्खोपर नीले रणका वस्त्र सुशोभित होता
हे। हलधरके एक कानमे कुण्डल शोभा पाता हे।
भगवानकी जो श्यामला कला है, वही भद्रस्वरूपा
सुभद्रा है। उसके आभूषण भी भद्र (मङ्गल) -रूप हे ।
सुभद्राजीके एक हाथमे वर ओर दूसमे अभय हे। वे
पीताम्बर धारण करती है। गोपगणेकि हाथमे वेणु,
वीणा, सोनेकी छडी, शङ्ख ओर सींग आदि ठे।
गोपियेकि करकमलेपिं नाना प्रकारके खाद्य पदार्थं हे।
इन सबके बाह्यभागमे मन्दार आदि कल्पवृक्षोकी पूजा
करे। मन्दार, सन्तान, पारिजात, कल्पवृक्ष ओर
हर्चिन्दन (ये ही उन वृक्षेके नाम हँ) । उक्त पोच
वृक्षोसे चारकी चारो दिशाओमिं ओर एककी मध्यभागमं
पूजा करके उनके बाह्यभागमें इन्द्र॒ आदि दिक्पालों
ओर उनके वज्र आदि अस्त्रोकी पूजा करे। तत्पश्चात्
श्रीकृष्णके आठ नार्मद्वारा उनका यजन करना
चाहिये। वे नाम इस प्रकार है--कृष्ण, वासुदेव,
देवकीनन्दन, नारायण, यदुश्रेष्ठ, वार्ष्णेय, धर्मपालक
तथा असुराक्रान्त- भृभारहारी । विद्रान् पुरुपोको सम्पूण
कामनाओकी प्रा्िके लिये तथा संसार-सागरसे पार्
होनेके लिये इन आवरणोसहित असुरारि श्रीकृष्णकौ
आराधना करनी चाहिये ।
अव मै भगवान् श्रीकृष्णके त्रिकाल प्ूजनका
वर्णन करता ह, जो समस्त मनोरथोंकौ सिद्धि
प्रदान करनेवाला है ।
४५९
प्रातःकालिक ध्यान
श्रीमदुद्यानसंवीतहेमभूरलमण्डपे ॥
लसत्कल्पद्रुमाधःस्थरलान्नपीटसंस्थितम् ।
सूत्रामरल्संकाशं गुडस्निग्धालकं शिशम्॥
चलत्कनककुण्डलोह्यसितचारुगण्डस्थलं
सुधोणधरमद्धुतस्मितमुखाम्बुजं सुन्दरम्।
स्फुरद्विमलरल्रयुक्कनकसूत्रनद्धं दधत्-
सुवर्णपरिमण्डितं सुभगपौण्डरीकं नखम्॥
समुदधूसरोरः स्थले धनुधृल्या
सुपुष्टाद्गमष्टपदाकल्पदीसम्
कटीरस्थले चारुजङ्घान्तयुग्मं
पिनद्धं क्रणक्किद्धिणीजालदाम्ना ॥
हसन्तं हसद्रन्धुजीवप्रसून -
प्रभापाणिपादाम्बुजोदारकान्त्या
करे दक्षिणे पायसानं
सुहेयंगवीनं तथा वामहस्ते ॥
लसद्रोपगोपीगवां वृन्दमध्ये
स्थितं वासवाद्यैः सुरेरथिताड्व्रिम्।
महीभारभूतामरारातियूथा-
स्ततः पूतनादीन् निहन्तुं प्रवृत्तम्॥
(ना० पवर ८० । ॐ4--८०)
४
दधानं
च +
^|
7. / “६. '
व्क € ` = १३
क 9 दु +
((-0. 1/(111141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
४६० सं्चिप्त नारदपुराण
"एक सुन्दर उद्नानसे धिरी हुई सुवर्णमयी
भूमिपर रलमय मण्डप बना हुआ है। वहां
शोभायमान कल्पवृक्षके नीचे स्थित रत्निर्भित
कमलयुक्त पीठपर एक सुन्दर शिशु विराजमान हैः;
जिसको अङ्गकान्ति इन्द्रनीलमणिके समान श्याम
हे। उसके काले-काले केश चिकने ओर घँधराले
हे । उसके मनोहर कपोल हिलते हुए स्वर्णमय
कुण्डलोसे अत्यन्त सुन्दर लगते है, उसकी नासिका
वड़ी सुघड हे । उस सुन्दर बालकके मुखारविन्दपर
मन्द मुसकानकी अद्धुत छटा छा रही है। वह
सोनेके तारम गथा ओर सोनेसे ही मंढा हुआ
सुन्दर बघनखा धारण करता है, जिसमे परम
उज्वल चमकोले रल जडे हुए हँ । गोधूलिसे
धूसर वक्षःस्थलपर धारण किये हुए स्वर्णमय
आभूषणोसे उसको दीति बहुत बढी हुई हे।
उसका एक-एक अङ्ग अत्यन्त पुष्ट है । उसकी
दोनों पिण्डलियोंका अन्तिम भाग अत्यन्त मनोहर
हे। उसने अपने करटिभागमें घुंघरूदार करधनीकी
लड़ बोध रखी हे, जिससे मधुर नकार होती
रहती है । खिले हुए बन्धुजीव (दुपहरिया)-के
फूलको अरुण प्रभासे युक्त करारविन्द ओर
चरणारविन्दोंको उदार कान्तिसि सुशोभित वह
शिशु मन्द-मन्द हंस रहा है । उसने दाहिने हाथमे
खीर ओर बायें हाथमे तुरन्तका निकाला हुआ
माखन ले रखा हे । ग्वालो, गोपसुन्दरियों ओर
गौओंको मण्डलीमें स्थित होकर वह बडी शोभा
पा रहा है। इन्द्र॒ आदि देवता उसके चरणोकी
समाराधना करते हं । वह पुथ्वीके भारभूत दैत्यसमुदाय
पूतना आदिका संहार करनेमे लगा है ।'
इस प्रकार ध्यान करके पूर्ववत् एकाग्रचित्त हो
लसद्रोपगोपीगवां
सुकार्तंस्वराभाम्बरं
रूपधारी भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करे ।
मध्याद्वकालिक ध्यान
वृन्दमध्य-
स्थितं सान्द्रमेघप्रभं सुन्दराद्घम्।
शिखण्डिच्छदापीडमन्जायताक्षं
लसच्चिलिकं पूर्णचन्द्राननं च॥
चलत्करुण्डलोह्छसिगण्डस्थलश्री-
भरं सुन्दरं मन्दहासं सुनासम्।
दिव्यभूषं
क्रणत्किद्भिणीजालमात्तानुलेपम् ॥
वेणुं धमन्तं स्वकरे दधानं
सव्ये द्रं यष्टिमुदारवेषम्।
दक्चे तथेवेप्सितदानदक्चं
ध्यात्वार्चयेन्नन्दजमिन्दिराप्त्ये ॥
(ना० पूर्व० ८०1 ८३-८५)
चरर ज (¬? र ४ ~ ^€ प षै च ऋ
0 %/ ४ पनि 1 .4 -# 9९ षिः
#ै ` {क = $£:
79
जो सुन्दर गोप, गोपाद्गनाओं तथा गौओके
भगवानूका पूजन करे। दही ओर गुड़का नैवेद्य लगाकर | मध्य विराजमान हैँ, सिग्ध मेघके समान जिनकी
एक हजार मन्र-जप करे। इसी प्रकार मध्याहकालमें
नारदादि मुनिगणो ॐर देवताओंसे पूजित विशिष्ट
श्याम छवि है, जिनका एक-एक अङ्ग बहुत सुन्दर
है, जो मयूरपिच्छका मुकुट धारण करते है, जिनके
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
पूर्व भाग-तृतीय पाद
४६१
नेत्र कमलदलके समान विशाल ठै, भींहोंका | एसा भी कहते हें कि दोनों प्रकारके मन्त्रौसे दोनों
मध्यभाग शोभासम्मन है ओर मुख पूर्णं चन्द्रमाको
भी लज्ित कर रहा हे, हिलते ओर इलमलाते
हए कमनीय कुण्डलोंसे उद्यसित कपोलोपर जो
शोभाको राशि धारण करते है, जिनकी नासिका
मनोहर हे, जो मन्द-मन्द हँसते हुए बड़ सुन्दर
जान पडते ह; जिनका वस्त्र तपाये हुए सुवर्णके
समान कान्तिमान् ओर आभूषण दिव्य है, कटिभागमे
धारण कौ हुई जिनकी क्षुद्र घण्टिकाओंसे मधुर
ज्लनकार हो रहा हे, जिन्होंने दिव्य अङ्गराग धारण
किया हे, जो अपने हाथमे लेकर मुरली बजा रहे
हे, जिनके वाये हाथमे शङ्खं ओर दाहिने हाथमे
छडी हे, जिनकी वेश-भूषासे उदारता टपक रही
हे, जो मनोवाज्छित वस्तु प्रदान करनेमें दक्ष हें
उन नन्दनन्दन श्रीकृष्णका ध्यान करके लक्ष्मीप्राप्िके
लिये उनका पूजन करे ।'
इस प्रकार ध्यान करके श्रेष्ठ वेष्णव पुरुप
पूर्ववत् भगवान् श्रीकृष्णकौ पूजा करे । पृआ, खीर
तथा अन्य भक्ष्य-भोज्य पदार्थोका नैवेद्य अर्पण
करे । घृतयुक्त खीरकी एक सौ आठ आहुति देकर
प्रत्येक दिशामे उसीसे बलि अर्पण करे । तत्पश्चात्
आचमन करे। इसके बाद एक हजार आठ बार
उत्तम मन्त्र-जप करे। जो उत्तम वैष्णव मध्याहकालमं
इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करता है
उसे सव देवता प्रणाम करते ह ओर वह मनुष्य
सब लोगोंका प्रिय होता हे। वह मेधा, आयु,
लक्ष्मी तथा सुन्दर कान्तिसे सुशोभित होकर पुत्र-
पोत्रोके साथ अभ्युदयको प्राप्त होता है। तीसरे
समयकी पूजामे कोन-सा काल हे, इस विषयमे
मतभेद हे । कुछ विद्वान् इस पूजाको सायंकालमं
करने योग्य बताते ट ओर कुछ रात्रिम । दशाक्षर-
मन्त्रसे पूजा करनी हो तो रातमें करे। अष्टादशाक्षरसरे
करनी हो तो सायंकालमे करे। कुट दूसरे विद्वान्
ही समय पूजा करनी चाहिये ।
सायकालिक् ध्यान
सायंकालमे भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकापुरीमें एक
सुन्दर भवनके भीतर विराजमान है, जो विचित्र
उद्यानसे सुशोभित है। वह श्रेष्ठ भवन आट हजार
गृहोसे अलंकृत हे। उसके चारों ओर निर्मल
जलवाले सरोवर सुशोभित हें । हंस, सारस आदि
पक्षियोसे व्याप्त कमल ओर उत्पल आदि पष्प उन
सरोवरोंको शोभा बद्ाते ह। उक्तं भवनम एक
शोभासम्पन्न मणिमय मण्डप दै, जो उदयकालीन
सूर्यदेवके समान अरुण प्रकाशसे प्रकाशित हो रहा
हे। उस मण्डपके भीतर सुवर्णमय कमलकी
आकृतिका सुन्दर सिंहासन है, जिसपर त्रिभुवनमोहन
श्रीकृष्ण वैदे हैं । उनसे आत्मतक््वका निर्णय
0 ९
। 1
१ 1 =
3 ४ ~
९ 1
करानेके लिये मुनियोके समुदायने उन्हे सव
ओरसे घेर रखा है। भगवान् श्यामसुन्दर उन
मुनिर्योको अपने अविनाशी परम धामका उपदेश
दे रहे ह । उनकी अद्घकान्ति विकसित नीलकमलक
((-0. 1\॥(11114/5511॥1 21188 \/28/81/185। (01661010. 01411260 0 6810011
४६२
समान श्याम हे। दोनों नेत्र प्रफुट् कमलदलके
समान विशाल है । सिरपर लिग्ध अलकावलियोसे
संयुक्त सुन्दर किरीट सुशोभित है । गलेमे वनमाला
शोभा पा रही है। प्रसन्न मुखारविन्द मनको मोहे
लेता है। कपोलोपर मकराकृति कुण्डल ज्ललमला
रहे हें । वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चह है। वहीं
कौस्तुभमणि अपनी प्रभा विखेर रही है । उनका
स्वरूप अत्यन्त मनोहर हे। उनका वक्षःस्थल
केसरके अनुलेपसे सुनहली प्रभा धारण करता हे ।
वे रेशमी पीताम्बर पहने हए है, विभिन्न अद्धोमे
हार, बाजूबंद, कड ओर करधनी आदि आभूषण
उन्हें अलंकृत कर रहे हे । उन्होने पृथ्वीका भारी
भार उतार दिया। उनका हदय परमानन्दसे परिपूर्णं
हे तथा उनके चारो हाथ शङ्क, चक्र, गदा ओर
पद्यसे सुशोभित दैं९।
इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रोपासक भगवान्कीं
पूजा करे। हदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र ओर
अस्त्र-इनके द्वारा प्रथम आवरण बनता हे।
रुक्मिणी आदि पटरानियोद्रारा द्वितीय आवरण
सम्पन्न होता हे। तृतीय आवरणमें नारद, पर्वत,
विष्णु, निशठ, उद्धव, दारुक, विष्वक्सेन तथा
सात्यकि है, इनका आठ दिशाओमें ओर विनतानन्दन
गरुडका भगवान् सम्मुख पूजन करे। चौथे
संक्षिप्त नारदपुराण
आवरणमें लोकपालोके साथ ओर पांचवें आवरणमे
वज्र आदि आयुधोके साथ उत्तम वैष्णव भगवत्सूजनका
कार्य सम्पन्न करे। इस प्रकार विधिपूर्वक पूजा
करके खीरका नैवेद्य अर्पण करे। फिर जलमें
खोडमिश्रित दूधकौ भावना करके उस जलद्वारा
तर्पण करे। उसके बाद मन्त्रोपासक पुरुषोत्तम
भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए मूलमन््रका
एक सौ आठ बार जप करे। तीनों कालको
पूजाओमें अथवा केवल मध्याहकालमें ही होम
करे। आसनसे लेकर विशेषार्घ्यपर्यन्त सम्पूर्ण पूजा
पूरी करके विद्वान् पुरुष भगवान्कौ स्तुति ओर
नमस्कार करे । फिर भगवान्को आत्मसमर्पण करके
उनका विसर्जन करनेके पश्चात् अपने हदयकमलमें
उनकी स्थापना करे ओर तन्मय होकर पुनः
आत्मस्वरूप भगवान्को पूजा करे। जो प्रतिदिन
इस प्रकार सायंकालमे भगवान् वासुदेवकं पूजा
करता है, वह सम्पूर्णं कामनाओंको पाकर अन्तमं
परम गतिको प्राप्त होता हे।
रात्रिकालिक ध्यान `
रात्रौ चेन्मदनाक्रान्तचेतसं नन्दनन्दनम्।
यजेद्रासपरिश्रान्तं गोपीमण्डलमध्यगम्॥
विकसत्कुन्दकट्वारमलिकाकुसुमोद्रतैः ।
रजोभिर्धूसरर्मन्दमारुतेः शिशिरीकृते॥
१. सायाहे द्वारवत्यां तु चित्रोद्यानोपशोभिते । अष्टसाहस्रसंख्यातैर्भवनैरुपमण्डिते ॥
हंससारससंकोर्णकमलोत्पलशालिभिः । सरोभिर्निर्मलाम्भोभिः परीते भवनोत्तमे॥
उद्यत्प्द्योतनोद्योतद्युतौ श्रीमणिमण्डपे । हेमाम्भोजासनासीनं कृष्णं त्रैलोक्यमोहनम् ॥
मुनिवृन्दैः परिवृततमात्मतत्वविनिणये । तेभ्यो मुनिभ्यः स्वं धाम दिशन्तं परमक्षरम्॥
उतिन्दरेन्दीवरश्यामं
चारुप्रसखन्नवदनं
पद्मपत्रायतेक्षणम् । लिग्धकुन्तलसम्भिन्नकिरीटवनमालिनम् ॥
स्फुरन्मकरकुण्डलम् । श्रीवत्सवक्षसं
भ्राजत्कौस्तुभं सुमनोहरम् ॥
काश्मीरकपिशोरस्कं पीतकौशेयवाससम् । हारकेयूरकटककरिसूत्रैरलङ्कतम् ॥
हतविश्चम्भराभूरिभारं
मुदितमानसम् । शद्कचक्रगदापद्यराजद्धुजचतुष्टयम् ॥
(ना० पूर्व० ८०। ९२-९९)
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 21188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्व भाग-तृतीय पाद
६६३
उन्मीलन्नवकेरवालिविगलन्माध्वीकलब्धान्तर-
भ्राम्यन्मत्तमिलिन्दगीतललिते सन्मल्िकोजुम्भिते।
पीयूषांशुकरर्विशालितहरित्परान्ते स्मरोदीपने
कालिन्दीपुलिनाङ्कणे स्मितमुखं वेणुं रणन्तं मुहुः ॥
अन्तस्तोयलसन्नवाम्बुदघटासंघटदुकारत्विषं
चञ्छच्विधिकमम्बुजायतदृशं विम्बाधरं सुन्दरम्।
मायूरच्छदबद्धमोलिविलसद्धम्मिह्छमालं चलद्
दीप्यत्कुण्डलरल्नरश्मिविलसद्रण्डद्वयोद्धासितम् ॥
काञ्चीनूपुरहारकड्धणलसत्केयूरभूषान्वितं
गोपीनां द्वितयान्तरे सुललितं वन्यप्रसूनस्रजम्।
अन्योन्यं विनिबद्धगोपदयितादोर्व्किवीतं लस-
द्रासक्रीडनलोलुपं मनसिजाक्रान्तं मुकुन्दं भजेत्॥
विविधश्रुतिभित्नरमनोज्ञतरस्वरसप्तकमूरछनतानगणैः ।
श्रममाणममूभिरुदारमणिस्फुटमण्डनशिद्धितचारुतनुम् ॥
इतरेतरवबद्धकरप्रमदागणकल्पितरासविहारविधौ ।
मणिशद्गमप्यमुना वपुषा बहुधा विहितस्वकदिव्यतनुम्॥।
५ (ना० पूर्व ८०। १०७--११३)
रात्रिम पूजन करना हो तो भगवान्का ध्यान
इस प्रकार करे- भगवान् नन्दनन्दनने अपने
हदयमें प्रेमको आश्रय दे रखा हे । वे रासक्रीडामें
संलग्र हो मानो थक गये हैँ ओर गोपाद्धनाओंकी
मण्डलीके मध्यभागे विराज रहे हे । उस समय
यमुनाजीका पुलिन-प्राङ्गण अमृतमय किरणोवाले
चन्द्रदेवको धवल ज्योत्छ्रासे उद्धधासित हो रहा
हे । वहाका प्रान्त अत्यन्त हरा-भरा एवं भगवत्प्रमका
उद्दीपक हो रहा है। खिले हए कुन्द, कलहार
ओर मलिका आदि कुसुमोके परागपुञ्जसे धूसरित
मन्द-मन्द वायु प्रवाहित होकर उस पुलिन-
प्राद्गणको शीतल बना रही है । खिले हुए नृतन
कुमुदोके मादक मकरन्दका पान करके उन्मत्त
हदयवाले भ्रमर इधर-उधर भ्रमण करते हुए मधुर
गुञ्जारव फेला रहे है; जिससे वह वन प्रान्त अत्यन्त
मनोहर प्रतीत होता है। वहां सब ओर सुन्दर
चमेलीको सुगन्ध फैल रही है। एेसे मनोहर
कालिन्दीतटपर श्यामसुन्दर मुखसे मन्द-मन्द
मुसकानक प्रभा विखेरते हुए बारम्बार मुरली
वजा रहे हें । उनकी अङ्खकान्ति भीतर जलसे भरे
हुए नूतन मेघोंको श्याम घटासे टछ्छर ले रही है।
भौहोंका मध्यभाग कुछ चञ्चल हो उठा है। दोनों
नेत्र विकसित कमलदलके समान विशाल दें।
लाल-लाल अधर विम्बफलको लजा रहे है।
भगवान्को वह अंको बड़ी ही सुन्दर है । माथेपर
मोरपंखका मुकुट ठै, जिससे उनके व्रैधे हए
केशोकी चोटी बड़ी सुहावनी लग रही है । उनके
दोनों कपोल हिलते हए चमकोले कुण्डलोमें जटित
रत्नोको किरणोसे उद्धधासित हो रहे ह ओर उन
कपोलोंसे श्यामसुन्दरका सीन्दर्य ओर भी व्र
गया हे । वे करधनी, नुपुर, हार, कंगन ओर सुन्दर
भुजवंद आदि आभूषपणोंसे विभूषित हो प्रत्येक
दो गोपीके बीचमें खड होकर अपनी मनमोहिनी
लमक दिखा रहे है। गलेमें वन्यपुष्पोका हार
सुशोभित है। एक-दूसरीसे अपनी वाहांको
मिलाये हए नृत्य करनेवाली गोपाद्गनाओंकी
वाहु -वह्रियोसे वे धिरे हए हं। इस प्रकार
परम सुन्दर शोभामयी दिव्य रासलीलाके लिये
सदा उत्सुक रहनेवाले प्रेमके आश्रयभूत भगवान्
मुकुन्दका भजन करे । वे नाना प्रकारकी श्रुतियोकि
भेदसे युक्त परम मनोहर सात स्वरो की मूर्च्छनाः
१. संगीतमें किसी सप्तकके वाईस भागोमेसे एक भाग अथवा किसी स्वरके एक अंशको श्रुति कहते टे । स्वर्का
आरम्भ ओर अन्त इसीसे होता टै । पड्जमें चार, ऋषभम तीन, गान्धारमें दो, मध्यम ओर पञ्चममें चार्-चार, धवतम
तीन ओर निषादमं दो श्रुतिर्यो होती है।
२. संगीतमें एक ग्रामसे दूसरे ग्रामतक जानेमें सातों स्वरोका जौ आरोहावरोह होता है, उसीका नाम पूर्च्छना
है । ग्रामके सातवें भागकौ ही मुच्छना कहते ह । भरत मुनिके मतसे गते समय गलेको कंपरककपीसे ही मूर्च्छना होती
है। किसी-किसीके मतसे स्वरके सूक्ष्म विरामका नाम मूर्च्छना दै। तीन ग्राम होनेके कारण इष्रीस मूर्च्छना होती है।
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 8181185 01661010. 01411260 0 60810011
ठर
संक्षिप्त नारदपुराण
ओर तीनोकेः साथ-साथ गोपाङ्कनाओंसहित धिरक
रहे हे । सुन्दर मणिमय स्वच्छ आभूषणोके मधुर
शिञ्जनसे भगवान्का सम्पूर्ण मनोहर अङ्ग ही
ञ्ञनकारमय हो उठा हे। एक-दूसरीसे हाथ बोधिकर
मण्डलाकार खड़ी हुई गोपाद्भनाओंके समूहसे
कल्पित रासलीलामण्डलकी रचनामं यद्यपि भगवान्
श्यामसुन्दर बीचमें मणिमय मेखकी भति स्थित
हे तथापि इसी शरीरसे उन्होने अपने बहुत-से
दिव्य स्वरूप प्रकट कर लिये है (ओर उन
स्वरूपोसे प्रत्येक दो गोपीके बीचमें स्थित है) ।'
इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रोपासक भगवान्को
पूजा करे। हदयादि अद्गाद्वारा प्रथम आवरणको पूजा
होती हे। धन-सम्पत्तिकी इच्छा रखनेवाला श्रेष्ठ
वेष्णव पूर्वोक्तं केशव-कोर्ति आदि सोलह जोड़ांकी
कमलपुष्पोद्रारा पूजा करे । उन सबके नामके आदिमे
क्रमशः सोलह स्वरोको संयुक्त करे: । तदनन्तर इन्द्र
आदि दिकूपालों ओर वञ्र आदि आयुधोंको पूजा
करे। एक मोटा, गोल ओर चिकना खृंटा जिसकी
ऊचाई एक वित्तेको हो, पृथ्वीमे गाड़ दे ओर उसे
पैरोसे दबाकर एक-दूसरेसे हाथ मिलाकर उसके
चारों ओर चक्र देना रासगोष्ठी कही गयी है । इस
प्रकार पूजा करके दूध, घी ओर मिश्री मिलाकर
भगवान्को नैवेद्य अर्पण करे ओर सोलह प्याले
लकर उनमें मिश्री मिलायी हई खीर परोसे ओर
पूर्वोक्तं जोड़ांको क्रमशः अर्पण करे। फिर शेष
कार्य पूर्ववत् करके मन्त्रोपासक एक हजार मन्त्र-
जप करे। तत्पश्चात् स्तुति, नमस्कार ओर प्रार्थना
करके पूजनका शेष कार्य भी समाप्त करे। इस
प्रकार जो उपासक भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करता
हे, वह समृद्धिका आश्रय होता है तथा अणिमा
आदि आठ सिद्धियोंका स्वामी हो जाता है; इसमें
संशय नहीं हे । इहलोकमें वह विविध भोगोका
उपभोग करके अन्तमें भगवान् विष्णुके धाममे
जाता हे। इस तरह पूजा आदिके द्वारा मन्त्रके सिद्ध
होनेपर अभीष्ट मनोरथोकी सिद्धि करे। अथवा
विद्वान् पुरुप अदाईस वार मन्त्र-जपपूर्वक तीनों
समय भगवान्की पूजा करे। उस-उस कालमें
कथित परिवारों (आवरण देवताओं)-का भी तर्पण
करे । प्रातःकाल गुडमिश्रित दहीसे, मध्याहकालमें
मक्खनयुक्त दूधसे ओर सायंकालमे मिश्री मिलाय
हए दूधसे श्रेष्ठ वैष्णव तर्पण करे । मन्त्रके अन्तमं
तर्पणीय देवताओके नामोमें द्वितीया विभक्ति जोड़कर
अन्तमें ' तर्पयामि" पदका प्रयोग करे। तत्पश्चात्
शेप पूजा पूरी करे। भगवत्प्रसादस्वरूप जलसे
अपने-आपको सींचकर उस जलको पीये । उससे
तृप्त होकर देवताका विसर्जन करके तन्मय हो
मन्त्र-जप करे।
अव सकामभावसरे करिये जानेवाले तर्पणोमें
आवश्यक द्रव्य व्रताये जाते हं। शास्त्रोक्त
विधानसम्बन्धी उन वस्तुओंका आश्रय लेकर
उनमेसे किसी एकका भी सेवन करे। खीर, दही
वड़ा, घी, गुड मिला हआ अन्न, खिचड़ी, दूध,
दही, केला, मोचा, चिंचा (इमली ), चीनी, पञ,
मोदक, खील (लाजा), चावल, मक्खन-ये सोलह
१. मूर्च्छना आदिद्रारा राग या स्वरके विस्तारको तान कहते हँ । संगीत दामोदरके मतसे स्वरोसे उत्पत्न तान ४९ ह।
इन ४९ तानोसे भी ८,३०० कूट तान निकलते ह । किसी-करिसीके मतसे कूट तीनोकी संख्या ५०४० भी मानी गयी है।
२. केशव-कोर्ति, नारायण-कान्ति, माधव-तुष्टि, गोविन्द-पुष्टि, विष्णु-धृति, मधुसृदन-शान्ति, त्रिविक्रम -क्रिया,
वामन-दया, श्रीधरमेधा, हषीकेश-हर्षा, पद्मनाभ-श्रद्धा, दामोदर-लज्जा, वासुदेव-लक्ष्मी, संकर्षण-सरस्वती, प्रदयुम्न-
प्रीति ओर अनिरुद्ध-रति-ये सोलह जोड़े है । इनके आदिमे क्रमशः अ आइईउऊ्ऋऋलृलृषएएेओं
ओ अं आः' इन सोलह स्वरोको अनुस्वार युक्त करके जोड़ना चादिये। यथा-' अं केशवकोर्तिभ्यां नमः, आ
नारायणकान्तिभ्यां कान्त्यै नमः" इत्यादि । इन्हीं मन्त्रोसे इनको पूजा करनी चाहिये ।
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 0141260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद् ४६५
द्रव्य ब्रह्मा आदिक द्वारा तर्पणोपयोगी बताये गये
हें। जो प्रातःकाल अन्तमं लाजा ओर पहले
चावल तथा मिश्री अर्पित करके चौहत्तर वार
तर्पण करता है, साथ ही भगवान् श्रीकृष्णके
चरणोंका ध्यान करता रहता हे, वह मन्त्रोपासक
अभीष्ट वस्तुको प्राप्त कर लेता हे। धारोपष्ण तथा
पके हुए दूधसे- मक्खन, दही, दूध ओर आमके
रस, घी, मोटी चीनी, मधु ओर कोलल (शर्वत)-
इन नौ द्रव्योमेसे प्रत्येकके द्वारा बारह बार तर्पण
करे । इस प्रकार जो श्रेष्ठ वैष्णव एक सौ आट वार
तर्पण करता हे, वह पूर्वोक्त फलका भागी होता
हे । बहत कहनेसे क्या लाभ ? वह तर्पण सम्पूर्णं
अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला हे। मिश्री मिलाये
हए धारोष्ण दुग्धकी भावनासे जलद्वारा श्रीकृष्णका
तर्पण करके गँवको जानेवाला साधक वहां
अपने पारिवारिक लोगोके साथ धन, वस्त्र एवं
भोज्य पदार्थ प्राप्त कर लेता है। मन्त्रोपासक जितनी
वार तर्पण करे, उतनी ही संख्यामें जप करे । वह
तर्पणसे ही सम्पूर्णं कार्य सिद्ध कर लेता हे।
अव मे साधकोके हितके लिये सकाम
होमका वर्णन करता हूं । उत्तम श्रीक अभिलाषा
रखनेवाला मन्त्रोपासक बेलके फूलोसे होम
करे। घृत ओर अन्नरकी वृद्धिके लिये धृतयुक्त
अत्रक आहूति दे।
अव में एक उत्तम रहस्यका वर्णन करता ह
जो मनुष्योको मोक्ष प्रदान करनेवाला दे! साधकं
अपने हदयकमलमें भगवान् दवकोनन्दनका इस
प्रकार ध्यान करे-
श्रीमत्कुन्देन्दुगोरं सरसिजनयनं शङ्कचक्रे गदाब्जे
विभ्राणं हस्तपदीर्नवनलिनलसन्मालया दीप्यमानम् ॥
वन्दे वेद्यं मुनीन्दैः कणिकपणिलसदिव्यभृषाभिरामं
दिव्याङ्गालेपभासं सकलभयहरं पीतवस्त्रं मुरारिम् ॥
( ना पूर्वे ८०। १५८)
1 4 (0 £ (4 1 ९४६ \ स ५५
1 " 0
1 ॥ । 1 त ५११
र | |. (५५ (१ ६
र (1...
"जो कुन्द ओर चन्द्रमाके समान सुन्दर गौरवण्कि
हे, जिनके नेत्र कमलकी शोभाको लज्जितं कर रटे
हँ, जो अपने करारविन्दोमें शद्ध, चक्र, गदा ओर
पद्म धारण करते है, नृतन कमलाकर सुन्द
मालासे सुशोभित टं, छोरी -चछोटी मणियोँमे जटित
सुन्दर दिव्य आभूपण जिनके अनुपम सौन्दर्य
माधूर्यको ओर बदा रटे द तथा जिनके श्रीभद्गीमं
दिव्य अद्धराग शोभा पा रहा हे, उन मुनीद्धरवेद्य,
भयहारी, पीताम्बरधारी भुरारिकरौ मं वन्दना
करता हूं।'
ट्स प्रकार ध्यान करके आदिपुरुष श्रीकृष्णको
अपने विक्रसित हदयक्रमलके आसनपर विराजमानं
देखे ओर यह भावना करे कि वे घनीभूत मेधोंकी
श्याम घटा तथा अदधत मुवर्णकी-सी नील एवं
पीत प्रभा धारण करते ट। इस चिन्तनकर माथ
साधक वार्ह लाख मन््रका जप करे। दो प्रकारक
मन्त्रोेसे एकका, जी प्रणव्रसम्पुटितं हे, जेप
करना चहिये । फिर दृधवाने वुक्षोकी सतिधाओंसे
वार्ह हडार आटुति द अथवा मधु-घृत ए
मिश्रीमिश्रित खीगये दीम च्छ । इय प्रक्र पन््रीपासक
((-0. 1\॥(11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
६६,
अपने हदयकमलमे लोकेश्वरोके भी आराध्यदेव
भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करते हए प्रतिदिन तीन
हजार मन्त्रका जप करे। फिर सायंकालके लिये
बतायी हुई विधिसे भली भोति पूजा करके साधक
भगवत्-चिन्तनमे संलग्न हो पुनः पूर्वोक्त रीतिसे
हवन करे। जो विद्वान् इस तरह गोपालनन्दन
श्रीकृष्णका नित्य भजन करता हे, वह भवसागरसे
पार हो परमपदको प्राप्त होता हे।
पहले दो त्रिभुज अङ्कित करे; जिसमे एक
ऊर्ध्वमुख ओर दूसरा अधोमुख हो । एकके ऊपर
दूसरा त्रिकोण होना चाहिये । इस प्रकार छः कोण
हौ जायेगे । कोण बाह्य भागमें होगे । उनके बीचमें
जो षट्कोण चक्र होगा, उसे अग्निपुर कहते हे ।
उस अग्रिपुरको कर्णिका (मध्यभाग)-में 'क्लीं'
यह बीजमन्त्र अदधत करे। उसके साथ साध्य
पुरुप एवं कार्यका भी उद्धे
कर| बहिर्गत कोणोके विवरमें
पडश्षर-मन्त्र लिखे। छः
कोणोके ऊपर् एक गोलाकार
रेखा खींचकर उसके
व्राह्यभागमें दस-दल कमल
अद्भत करे। उन दस दलोकि
केसरोमे एक-एकमें दो-दो
अक्षरके क्रमसे हीं" ओर
"श्री ' पूर्वक अष्टादशाक्षर- |
मन्त्रके अक्षरोका उद्छेख करे । |
तदनन्तर दलोके मध्यभागमं
दशाक्षर-मन्त्रके एक-एक |
अक्षरोको लिखे । इस प्रकार |
लिखे हुए दस-दल चक्रको
भृपुरसे (चौकोर रेखासे)
आवृत करे । भूपुरमे अस्त्रोके
स्थानमें कामबीज ( क्ली) -
।
|
|
॥
(+
संक्षिप्त नारदपुराण
का उद्वे करे। इस यन्त्रको सोनेके पत्रपर
सोनेको ही शलाकासे गोरोचनद्वारा लिखकर उसको
गुटिका बना ले। यही गोपाल-यन्त्र है । यह
सम्पूर्णं मनोरथोंको देनेवाला कहा गया है । जो
रक्षा, यश, पुत्र, पृथ्वी, धन-धान्य, लक्ष्मी ओर
सोभाग्यकी इच्छा रखनेवाले हों उन श्रेष्ठ पुरुषोको
निरन्तर यह यन्त्र धारण करना चाहिये । इसका
अभिषेक करके मन्त्र-जपपूर्वक इसे धारण करना
उचित हे। यह तीनों लोकोंको वशमें करनेके लिये
एकमात्र कुशल (अमोघ) उपाय है। इसका
महती शक्ति अवर्णनीय हे।
स्मर (क्ली), त्रिविक्रम (ऋ) युक्त चक्रो (क्)
अर्थात् कृ, इसके पश्चात् ष्णाय तथा हत् (नमः)-
यह (क्लीं कृष्णाय नमः) पडक्षर-मनत्र कहा गया
हे, जो सम्पूर्णं मनोरथोको सिद्ध करनेवाला हे ।
= ~
((-0. /८11104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद ४६७
निर्मित हुआ है, जो पद्मराग मणिमयी भूमिसे
सुशोभित है। वहां एक कल्पवृक्ष है, जिससे
निरन्तर दिव्य रल्नोको धारावाहिक वृष्टि होती रहती
हे। उस वृक्षके नीचे प्रज्वलित रत्रमय प्रदीपोंकी
पडक्तियोसे चारों ओर दिव्य प्रकाश छाया रहता
हे। वहीं मणिमय सिंहासनपर दिव्य कमलका
आसन हे, जो उदयकालीन सूर्यकि समान अरुण
प्रभासे उद्रासित हो रहा है। उस आसनपर
विराजमान भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करे, जो
तपाये हए सुवर्णे समान तेजस्वी हैँ । उनका
प्रकाश समानरूपसे सदा उदित रहनेवाले कोरि-
कोरि चन्द्रमा, सूर्यं ओर विद्युत्के समान है। वे
सर्वाङ्गसुन्दर, सौम्य तथा समस्त आभूषणोसे विभूषित
हें । उनके श्रीअङ्खोपर पीताम्बर शोभा पाता है।
उनके चार हाथ क्रमशः शङ्ख, चक्र, गदा ओर
पद्रसे सुशोभित हं। वे प्टवकी छविको छीन
लेनेवाले अपने वायं चरणारविन्दके अग्रभागसे
कलशका स्पर्श कर रहे ह; जिससे विना किसी
आघातके रत्रमयी धाराएं उछलकर गिर रही टै।
उनके दाहिने भागमें रुक्मिणी ओर वामभागे
सत्यभामा खड़ी होकर अपने हा्थोमें दिव्य कलश
ले उनसे निकलती हुई रत्ररशिमयी जलधाराओंसे
( भगवान् श्रीकृष्ण) -के मस्तकपर अभिषेक
कर रही हें । नाग्रजिती (सत्या) ओर सुनन्दा ये
उक्त देविर्योके समीप खडी हो उन्हें एकके वाद्
दूसरा कलश अर्पण कर रही है । इन दोनोंको
क्रमशः दायें ओर वामधागमें खडी हुई मित्रविन्दा
ओर लक्ष्मणा कलश दे रही हैँ ओर इनके भी
दक्षिण वामभागमें खड़ी जाम्बवती ओर सुशीला
रन्नमयी नदीसे रलपूर्ण कलश भरकर उनके हाथोमें
द रही हे । इनके वाह्यभागमें चारों ओर खडी हुई
सोलह सहस श्रीकृष्णवह्छभाओंका ध्यान करे, जो
सुवर्णं एर्व रत्रमयी धाराओंसे युक्त कलशोसे
वाराह (ह्), अग्नि (र्), शान्ति (ई) ओर इन्दु
(-अनुस्वार)- ये सब मिलकर मायाबीज हीं"
कहे गये हें । मृत्यु (श्), वहि (र्), गोविन्द (ई)
ओर चन्द्र (-अनुस्वार)-से युक्त हो तो
श्रीवीज-- श्री" कहा गया हे । इन दोनों बीजोसे
युक्त होनेपर अष्टादशाक्षर-मन्त्र (हीं श्रीं क्लीं
कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवह्छभाय स्वाहा ) बीस
अक्षरोका हो जाता है। शालग्रामे, मणिं
यन्त्रमे, मण्डलमें तथा प्रतिमाओमे ही सदा
श्रीहरिको पूजा करनी चाहिये; केवल भूमिपर
नहीं । जो इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णको आराधना
करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता ठै। बीस
अक्षरवाले मन्त्रके ब्रह्मा ऋषि हैँ । छन्दका नाम
गायत्री हे । श्रीकृष्ण देवता है; क्लीं बीज है ओर
विद्वान् पुरुषोने स्वाहाको शक्ति कहा है । तीन,
तीन, चार, चार, चार तथा दो मन्तराक्षरोद्रारा
षडङ्ग-न्यास करे । मूलमन्त्रसे व्यापक न्यास करके
मन्त्रसे सम्पुटित मातृका वर्णोका उनके नियत
स्थानोमें एकाग्रतापूर्वक न्यास करे। फिर दस
तत्त्वोका न्यास करके मूलमन्तरद्रारा व्यापक करे ।
तदनन्तर देवभावकी सिद्धि (इषटदेवके साथ तन्मयता)
प्राप्त करनेके लिये मन्त्र-न्यास करे। मूर्तिपञ्जर
नामक न्यास पूर्ववत् करे। फिर षडद्क-न्यास
करके हदयकमलमें भगवान् श्रीकृष्णका इस प्रकार
ध्यान करे ।
द्वारकापुरीमें सहस्रं सूर्योकि समान प्रकाशमान
सुन्दर महलों ओर बहुतेरे कल्पवृक्षोसे धिरा हुआ
एक मणिमय मण्डप है, जिसके ` खंभे अग्रिके
समान जाज्वल्यमान रन्रोके बने हए हं । उसके
द्वार, तोरण ओर दीवार सभी प्रकाशमान मणिययोद्रारा
निर्मित है । वहाँ खिले हुए सुन्दर पुष्पके चित्रसे
सुशोभित चंदोवोमें मोतियोकी ्ालरं लटक रही
हं । मण्डपका मध्यभाग अनेक प्रकारके रब्रोसे
( 1183 ] सं० ना० पु० १६-
(-0. 1\/॥(1111415511॥1 21188 \/8/81/185। (01661010. 01411260 0 66810011
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सुशोभित हो रही हं । उनके बाह्यभागमें आठ
निधियां है, जो धनसे वहां वसुधाको भरपूर किये
देती हें । उनके बाह्यभागमें सब वृष्णिवंशी विद्यमान
है ओर पहलेकी भति स्वर आदि भी हँ।
इस प्रकार ध्यान करके पोच लाख जप करे
ओर लाल कमलोद्वारा दशांश होम करके पूर्वोक्त
वेष्णवपीठपर भगवानूका पूजन करे ।
पूर्ववत् पीठकी पूजा करनेके पश्चात् मूलमन्त्रसे
मूर्तिकी कल्पना करके उसमें भक्तिपूर्वक भगवान्
श्रीकृष्णका आवाहन करे ओर उसमें पूर्णताकीं
भावनासे पूजा करे। आसनसे लेकर आभूषणतक
भगवान्को अर्पण करके फिर न्यासक्रमसे आराधना
करे। सृष्टि, स्थिति, पडद्ख, किरीट, कुण्डलद्रय,
शह, चक्र, गदा, पद्य, वनमाला, श्रीवत्स तथा
कोस्तुभ--इन सबका गन्ध-पुष्पसे पूजन करके श्रेष्ठ
वैष्णव मूलमन््रद्वारा छः कोणे छः अङ्खोका ओर
पूर्वादि दलेमिं क्रमशः वासुदेव आदि तथा कोणोमें
शान्ति आदिका क्रमशः पूजन करे। तत्पश्चात् श्रेष्ठ
साधक दलोके अग्रभागमें आठों पटरानियोंका पूजन
करे। तदनन्तर सोलह हजार श्रीकृष्णपत्रियोकी एक
ही साथ पूजा करे। इसके बाद इन्द्र, नील, मुकुन्द,
कराल, आनन्द, कच्छप, श्भुः ओर पद्म-इन आठ
निधियोका क्रमशः पूजन करे। उनके वाह्यभागमें
इन्द्र॒ आदि लोकपालों तथा वज्र आदि आयुधोको
पूजा करे। इस प्रकार सात आवरणोसे धिरे हए
श्रीकृष्णका आदरपूर्वक पूजन करके दही, खांड
ओर घी मिले हए दुग्धमिश्रित अन्नरका नैवेद्य
लगाकर उन्हे तृप्त करे। तदनन्तर दिव्योपचार
समर्पित करके स्तुति ओर नमस्कारके पश्चात्
परिवारगणों (आवरण देवताओं )-के साथ भगवान्
संक्षिप्त नारदपुराण
केशवका अपने हदयमें विसर्जन करे। भगवानूको
अपनेमे विठाकर भगवत्स्वरूप आत्माका पूजन
करके विद्वान् पुरुष तन्मय होकर विचरे । रलाभिषेकयुक्त
ध्यानमें वर्णित भगवत्स्वरूपकी पूजा बीस अक्षरवाले
मन्त्रके आश्रित हे। इस प्रकार जो मन्त्रको आराधना
करता हे, वह समृद्धिका आश्रय होता है। जो जप,
होम, पूजन ओर ध्यान करते हुए उक्त मन्त्रका जप
करता हे, उसका घर रत्नो, सुवर्णो तथा धन-
धान्योसे निरन्तर परिपूर्णं होता रहता हे । यह विशाल
पृथ्वी उसके हाथमे आ जाती है ओर वह सव
प्रकारके शस्योसे सम्पन्न होती हे। साधक पुत्रों ओर
मित्रोंसे भरा-पूरा रहता है ओर अन्तमें परमगतिको
प्राप्त होता हे । उक्त मन्त्रसे साधक इस प्रकारके अनेक
प्रयोगोका साधन कर सकता है। अव में सम्पूर्ण
सिद्धियोको देनेवाले मन्त्रराज दशाक्षरका वर्णन
करता हू।
स्मृति (ग्) यह सद्य (ओ)-से युक्त हो ओर
लोहित (प्) वामनेत्र (ई)-से संलग्र हो। इसके
वाद "जनवल्लभा" ये अक्षरसमुदाय हों । तत्पश्चात्
पवन (य) हो ओर अन्तमें अग्निप्रिया (स्वाहा) हो
तो यह ( गोपीजनवल्यभाय स्वाहा ) दशाक्षर म्र
कहा गया हे। इसके नारद ऋषि, विराट् छन्द,
श्रीकृष्ण देवता, क्लीं बीज ओर स्वाहा शक्ति हे। यह
वात मनीषी पुरुषोने बतायी हे। आचक्र, विचक्र,
सुचक्र, त्रैलोक्यरक्षणचक्र तथा असुरान्तकचक्र-इन
शब्दोके अन्तमं 'ड* विभक्ति ओर स्वाहा पदं
जोड़कर इन पञ्चविध चक्रोद्वारा पञ्चाङ्ग-न्यास
करे१। तदनन्तर प्रणव-सम्पुटित मन्त्र पढ्कर तीन
वार दोनों हाथमे व्यापक-न्यास करे। तत्पश्चात्
मन्त्रके प्रत्येक अशक्षरको अनुस्वारयुक्त करके उनके
१. न्यास-वाक्यका प्रयोग इस प्रकार है-
ॐ आचक्राय स्वाहा हदयाय नमः
ॐ विचक्राय स्वाहा शिरसे स्वाहा ।
ॐ सुचक्राय स्वाहा शिखायै वषट्।
ॐ त्रैलोक्यरक्षणचक्राय स्वाहा कवचाय हुम्।
ॐ असुरान्तकचक्राय स्वाहा अस्त्राय फट्।
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661011. 01411260 0 66810011
कि
पूर्वभाग-तृत्ीय पाद
आदिमे प्रणव ओर अन्तम नमः जोड़कर उनका
दाहिने अंगूठेसे लेकर वाये अंगृठेतक अंगुलि-
पर्वमिं न्यास करे । यह सृष्टिन्यास बताया गया हे ।
अव स्थितिन्यास कहा जाता हे। विद्वान् पुरुप
स्थितिन्यासमं बायीं कनिष्ठासे लेकर दाहिनी कनिषए्ठतक
पूर्वोक्तरूपसे मन्त्राक्षरोका न्यास करे । संहारन्यासमें
वाये अंगूठेसे दाहिने अंगूठेतक उक्त मन्त्राक्षरोका
न्यास करना चाहिये । यह संहारन्यास दोषसमुदायका
नाश करनेवाला कहा गया हे। शुद्धचेता ब्रह्यचारियोको
चाहिये कि वे स्थिति ओर संहारन्यास पहले
करके अन्तमें सृष्टिन्यास करे; क्योकि वह विद्या
प्रदान करनेवाला है। गृहस्थोके लिये अन्तमें
स्थितिन्यास करना उचित है। (उन्हे सृष्टि ओर
संहारन्यास पहले कर लेना चाहिये। ) क्योकि
स्थितिन्यास काम्यादिस्वरूप (कामनापूरक) हे।
विरक्त मुनीश्वरोंको सर्वदा अन्तगे संहारन्यास
करना चाहिये । तदनन्तर साधक पुनः स्थितिक्रमसे
मन्त्राक्षरोका अंगुलियोमें न्यास करे । तत्पश्चात् पुनः
पूर्वोक्त चक्रोद्रारा हाथोमं पञ्ाद्क-न्यास करे।
(यथा-ॐ आचक्राय स्वाहा अङ्गुष्टाभ्यां नमः।
ॐ विचक्राय स्वाहा तर्जनीभ्यां नमः। ॐ सुचक्राय
स्वाहा मध्यमाभ्यां नमः। ॐ त्रेलोक्स्यरक्षणचक्छाय
स्वाहा अनामिकाभ्यां नमः। ॐ असुरान्तकचक्राय
स्वाहा कनिष्ठिकाभ्यां नमः) तदनन्तर विद्वान् पुरुष
मूलमन्त्रसे सम्पुटित अनुस्वारयुक्त मातृका वर्णका
मातृकान्यासके स्थलों विनीतभावसे न्यास करे।
उसके बाद प्रणवसम्पुटित मृलमन््रका उच्चारण
करके व्यापक न्यास करे । तत्पश्चात् पूर्वोक्त मूर्तिपञ्चर
नामक न्यास करे। उसके वाद क्रमशः दशाङ्ग-
न्यास ओर पञ्चाङ्ग -न्यास करे । दशादङ्क-न्यासकां
६९
विधि इस प्रकार ठहै-हदय, मस्तक, शिखा,
सर्वाङ्ग, सम्पूर्णं दिशा, दक्षिणापार्श्, वामपार््, करि,
पृष्ठ तथा मूर्धा-इन अद्खोमें श्रेष्ठ वैष्णवमन्त्रके एक~
एक अक्षरका न्यास करे। फिर एकाग्रचित्त हो
पूर्वोक्त चक्रोद्वारा पुनः पूर्ववत् पञ्चाद्ग-न्यास करे।
इसके सिवा अष्टादशाक्षरमन्त्रके लिये बताये हए
अन्य प्रकारके न्यासोका भी यहाँ संग्रह कर लेना
चाहिये। तदनन्तर विद्वान् पुरुष किरीर मन्त्रसे व्यापक-
न्यास करे। फिर श्रेष्ठ साधक वेणु ओर विल्व
आदिक मुद्रा दिखाये। फिर सुदर्शन मन्त्रसे दिग्बन्ध
करे । अङ्ुष्ठको छोड़कर शेष अंगुल्यां यदि सीधी
रहें तो यह हदयमुद्रा कही गयी है । शिरोमुद्रा भी
एेसी ही होती हे । अङ्ग्टको नीचे करके जो मुदरी
वांधी जाती हे, उसका नाम शिखामुद्रा है । हाथकी
अंगुलियोको फेलाना यह वरुणमुद्रा कही गयी हे ।
बाणको मुदढीकी तरह उठी हई दोना भुजाओकि अदु
ओर तर्जनीसं चुटको बजाकर उसको ध्वनिको सब
ओर फेलाना, इसे अस्त्रमुद्रा कहा गया है । तर्जनी
ओर मध्यमा-ये दो अंगुलियों नेत्रमुद्रा है । (जहां
तीन नेत्रका न्यास करना हो, वहां तर्जनी, मध्यमाके
साथ अनामिका अंगुलिको भी लेकर नेत्रत्रयका
प्रदर्शन कराया जाता है।) वाये हाथका अंगूठा
आओष्ठमें लगा हो । उसकी कनिषटिका अंगुली दाहनं
हाथके अंगूठेसे सटी हो, दाहिने हाथको कनिष्टिका
फैली हई हो ओर उसकी तर्जनी, मध्यमा ओर
अनामिका अंगुल्यां कुछ सिकोडकर हिलायी
जाती हों तो यह वेणुमुद्रा कही गयी दै। यह
अत्यन्त गुप्त होनके साथ ही भगवान् श्रीकृष्णको
वहुत प्रिय है। वनमाला, श्रीवत्स ओर कौस्तुभ
नामक मुद्रां प्रसिद्ध है; अतः उनका वर्णन नदं
१. यथधा- ॐ गों नमः, ्षिणाङ्गष्पर्वमु । ॐ पीं नमः, दक्षिणतर्जनीपर्वसु। ॐ जं नमः, दक्षिणमध्यमापर्वसु। ॐ
नं नमः, दक्षिणानामिकरापव्रसु।
वं नमः, दुक्षिणकनिष्िकापव्रसु।
वापानामिकापर्वसु। ॐ यं नमः, वाममध्यमापरवमु। ॐ स्वां नमः, वामतजनीपवेमु।
छ नमः, वामकनिषठिकापर्वसु। ॐ भां नम
हा नमः, वाम्रुषठय्वसु।
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संक्षिप्त नारदपुराण
किया जाता हे‹। वाये अंगूठेको ऊर्ध्वमुख खडा
करके उसे दाहिने हाथके अंगृूठेसे बोध ले ओर
उसके अग्र॑भागको दाहिने हाथको अंगुलियोँसे
दवाकर फिर उन अंगुलियोंको वाये हाथकौ
अंगुलियोंसे खूब कसकर बोध ले ओर उसे अपने
हदयकमलमं स्थापित करे। साथ ही कामबीज
( क्लीं )-का उच्यारण करता रहे । मुनीश्वरोने उसे
परम गोपनीय विल्वमुद्रा कहा है । यह सम्पूर्ण
सुखोको प्राति करानेवाली हे। मन, वाणी ओर
शरीरसे जो पाप किया गया हो, वह सव इस
मुद्राके जानमात्रसे नष्ट हो जायगा । मन्त्रका ध्यान,
जप ओर पूर्वोक्तरूपसे त्रिकाल पूजन करना
चाहिये। दशाक्षर तथा अष्टादशाक्षर आदि सब
मन्त्रोमे एक ही क्रम बताया गया हे। इस प्रकार
मन्त्र सिद्ध होनेपर मन्त्रोपासक उससे नाना प्रकारके
लोकिक अथवा पारलौकिक प्रयोग कर सकता हे]
चेचक, फोड़ या ज्वर् आदिसे जब जलन
ओर मूर्च्छा हो रही हो तो उक्तरूपसे ही
श्रीकृष्णका ध्यान करके रोगीके मस्तकके समीप
मन्त्र-जप करे। इससे ज्वरग्रस्त मनुष्य निश्चय ही
उस ज्वरसे मुक्त हो जाता हे। इसी प्रकार पूर्वोक्त
ध्यान करके अग्रिमे भगवान्को पूजा करे ओर
गुरुचिके चार-चार अंगुलके टुकड़ोद्वारा दस हजार
आहुति दे तो ज्वरकी शान्ति हो जाती हे। ज्वरसे
पीडति मनुष्यके ज्वरसे शान्तिके लिये बाणोसे
चिदे हुए भीष्मपितामहका तथा संताप दूर करनेवाले
श्रीहरिका ध्यान करके रोगीका स्पर्श करते हुए
मन्त्रजप करे। सान्दीपनि मुनिको पुत्र देते हुए
श्रीकृष्णका ध्यान करके पूर्वोक्त रूपसे गुरुचिके
टकड़से दस हजार आहति दे। इससे अपमृत्युका
निवारण होता हे। जिसके पुत्र मर गये थे एेसे
ब्राह्मणको उसके पुत्र अर्पण करते हुए अर्जुनसहित
श्रीकृष्णका ध्यान करके एक लाख मन्त्र-जप
करे । इससे पुत्र-पोत्र आदिक वृद्धि होती है। घी,
चीनी ओर मधुमें मिलाये हुए पुत्रजीवके फलोसे
उसीको समिधाद्वारा प्रज्वलित हुई अग्निम दस
हजार आहुति देनेपर मनुष्य दीर्घायु पुत्र पाता हे ।
दुधेले वृक्षके कासे भरे हुए कलशको रातमं
पूजा करके प्रातःकाल दस हजार मन्त्र जपे ओर
उसके रसके जलसे स्त्रीका अभिषेक करे । बारह
दिनोतक एेसा करनेपर वन्ध्या स्त्री भी दीर्घायु पुत्र
प्राप्त कर लेती है। पुत्रकी इच्छा रखनेवाली स्त्री
प्रातःकाल मौन होकर पीपलके पत्तेके दोनेमें रखे
हए जलको एक सौ आठ बार मन्त्रके जपसे
अभिमन्त्रित कराकर पीये। एक मासतक एेसा
करके बन्ध्या स्त्री भी समस्त शुभ लक्षणोसे
१. वनमाला आदि मुद्राओंका लक्षण इस प्रकार है-
. .. स्यृशेत्कण्ठादिपादान्तं तर्जन्याङ्गु्टिष्ठया । करद्रयेन तु भवेन्मुद्रेयं वनमालिका॥
दनां हार्थोकों तजनी ओर अंगूठेको सटाकर उनके द्वारा कण्ठसे लेकर चरणतकका स्पर्श करे । इसे वनमाला
नामक मुद्रा कहा गया है।
अन्योन्यस्यृष्टकरयोर्मध्यमानामिकाङ्गुली । अङ्गुष्ठन तु बध्नीयात् कनिष्ठामूलसंश्रिते ॥
तर्जन्यौ कारयेदषा मुद्रा श्रीवत्ससद्गिका।
आपसमें खटे हुए दोनों हा्थोकी मध्यमा ओर अनामिका अंगुलियोको अंगृूटेसे बंधे ओर तर्जनी अंगुलियोंको
कनिष्ठा अंगुलियोकर मूल -भागसे संलग्र कर्। इसका नाम श्रीवत्समद्रा है।
५.94 कनिष्ठिकाम् । कनिष्टयान्यया बद्ध्वा तर्जन्या दक्षया तथा ॥
वास्नानामां च वध्नायादकषाङ्गुष्ठस्य मूलके 1 अद्ुषटुमध्यमे वामे संयोज्य सरलाः पराः ॥
चतस्रोऽप्यप्रसलमग्रा मुद्रा कौस्तुभसंजिका।
दाहिने हाधकौ अनामिका ओर अ्गु्टसं सटी हुईं कानिष्ठिका अंगुलिको वां हाथको कािष्ठिकासे बाध ले।
दाहिनी तर्जनीसे बायीं अनामिकाको बोधे, दाहिने अगुटेके मृलभागमे वायें अन्नु ओर मध्यमाको संयुक्त करे । शेष
अंगुलि्योको सीधी रखे। चारो अंगलियोके अग्रभाग परस्पर मिले हों, यह कौस्तुभमद्रा है।
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पूर्वभाग-तृतीय पाद
सम्पन्न पुत्र प्राप्त कर लेती है। वेरके वृक्षोसे भरे
हुए शुभ एवं दिव्य आश्रममें स्थित हो अपने
करकमलोँसे घंटाकर्णके शरीरका स्पर्श करते हुए
श्रीकृष्णका ध्यान करके घी, चीनी ओर मधु
मिलाये हुए तिलोंसे एक लाख आहुति दे। एेसा
करनेसे महान् पापी भी तत्काल पवित्र हो जाता
हे । पारिजात-हरण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णका
ध्यान करके एक लाख मन्त्र जपे। जो एेसा करता
हे, उसकी सर्वत्र विजय होती है । पराजय कभी
नहीं होती है। श्रेष्ठ मनुप्यको चाहिये कि वह
पार्थको गीताका उपदेश करते हए हाथमे व्याख्यानको
मुद्रासे युक्त रथारूढ श्रीकृष्णका ध्यान करे । उस
ध्यानके साथ मन्त्र जपे। इससे धर्मको वृद्धि होती
हे। मधुमें सने हए पलाशके फूलोसे एक लाख
आहुति दे। इससे विद्याकी प्राति होती ठे। राष्,
पुर, ग्राम, वस्तु तथा शरीरको रक्षके लिये
विश्वरूपधारी श्रीकृष्णका ध्यान करे-उनको कान्ति
४७९
उदयकालीन करोड़ों सूयकि समान प्रकाशमान है।
वे अग्रि एवं सोमस्वरूप है, सच्चिदानन्दमय ठँ
उनका तेज तपाये हए स्वर्णे समान है, उनके
मुख ओर चरणारविन्द सूर्य ओर अग्रिके सदृश
प्रकाशित हो रहे हे, वे दिव्य आभूषणोसे विभूषित
हे । उन्टोने नाना प्रकारके आयुध धारण कर रखे
हें । सम्पूर्ण आकाशको वे ही अवकाश दे रहे रै।
इस प्रकार ध्यान करके एकाग्रचित्त हो एक लाख
मन्त्र-जप करे । इससे पूर्वोक्त सव वस्तु ओंकी रक्षा
होती हे। जो श्रेष्ठ वैष्णव सद्गुरुसे दीक्षा लेकर
उक्त विधिसे श्रीकृष्णका पजन करता है, वह
अणिमा आदि आठ सिद्धियोका स्वामी होता है।
उसके दर्शनमात्रसे वादी हस्तप्रतिभ हो जते है।
वह घरमे हो या सभामें उसके मुखम सदा
सरस्वती निवास करती हे । वह इस लोकमें नाना
प्रकारके भोगोका उपभोग करके अन्तमं श्रीकृष्णधामको
जाता है। (ना० पूर्वे० अध्याय ८०)
८१८५-0 =#
श्रीकृष्णसम्बन्धी विविध मन्त्रों तथा व्याससम्बन्धी मनत्रकी अनुष्ठानविधि
श्रीसनत्कुमारजी कहते है- मुनीश्वर! अव में
श्रीकृष्णसम्बन्धी मन्त्रोके भेद बतलाता हू, जिनकी
आराधना करके मनुष्य अपना अभीष्ट सिद्ध कर
लेते हे । दशाक्षर मन्त्रके तीन नूतन भेद है-'हीं श्रीं
क्लीं -इन तीन बीजेोके साथ "गोपीजनवल्यभाय
स्वाहा" यह प्रथम भेद है। "श्रीं हीं क्लीं इस
क्रमसे वीज जोडनेपर दूसरा भेद होता टे । ' क्लीं
हीं श्रीं इस क्रमसे बीज-मनत्र जोडनेपर तीसरा
भेद बनता है । इसके नारद ऋषि ओर गायत्री छन्दं
है तथा मनुष्योकी सम्पुर्ण कामनाओंको प्ण करनेवाले
गोविन्द श्रीकृष्ण इसकै देवता है । इन तीनो मनत्रोका
अङ्गन्यास पूर्ववत् चक्रोद्रारा करना चाहिये । तत्पश्चात्
किरीरमन्त्रसे व्यापक-न्यास करे, फिर सुदर्शन-
मन्त्रसे दिग्बन्ध करे। आदि मन्त्रम बीस अक्षरवाले
मन्त्रकी ही भति ध्यान-पूजन आदि करे। द्वितीय
मन्त्रम दशाक्षर-मन्त्रके लिये कहे हुए ध्यान-पूजन
आदिका आश्रय ले। तृतीय मन्त्रम विद्वान् पुरुप
एकाग्रचित्त होकर श्रीहरिका इस प्रकार ध्यान
करे--भगवान् अपनी छः भुजाओमिं क्रमशः शद्वु,
चक्र, धनुष, बाण, पाश तथा अद्धश धारण करते
हँ ओर शेष दो भुजाओमिं वेणु लेकर बजा रहे दै।
उनका वर्णं लाल है। वे श्रीकृष्ण साक्षात् सूर्यकूपसे
प्रकाशित होते हं । इस प्रकार ध्यान करके बुद्धिमान्
पुरुप पाच लाख जप करे ओर घृतयुक्तं खीरे
दशांश आहति दे । इस प्रकारे म्र सिद्ध हो जानेपर
मन्त्रोपासक पुरुप उसके दारा पूर्ववत् सकाम प्रयोग
((-0. 1/८111141/5511॥ 8118811 \/8181185। (01611010. 01411260 0 66810011
४७२
संक्षिप्त नारदपुराण
कर सकता हे । "श्रीं हीं क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय
स्वाहा" यह बारह अक्षरोका मन्त्र है। इसके ब्रह्य
ऋषि, गायत्री छन्द ओर श्रीकृष्ण देवता हैं । पृथक् -
पृथक् तीन बीजों तथा तीन, चार एवं दो मन्त्राक्षरोसे
षडङ्ख-न्यास करे। बीस अक्षरवाले मन््रकी भति
इसके भी ध्यान, होम ओर पूजन आदि करने चाहिये।
यह मन्त्र सम्पूर्ण अभीष्ट फलोको देनेवाला हे।
दशाक्षर मन्त्र ( गोपीजनवल्छभाय स्वाहा )-के
आदिमे श्रीं हीं क्लीं तथा अन्तमें क्लीं हीं श्रीं
जोडनेसे पोडशाक्षर-मन्त्र बनता है। इसी प्रकार
केवल आदिमे ही श्रं जोडनेसे बारह अक्षरोका मन्त्र
होता हे। पूर्वोक्त चक्रोद्रारा इनका अङ्गन्यास करे,
फिर भगवान्का ध्यान करके दस लाख जप करे
ओर घीसे दशांश होम करे। इससे ये दोनों मन्त्रराज
सिद्ध हो जाते हे। सिद्ध होनेपर ये मनुष्योके लिये
सम्पूर्ण कामनाओं, समस्त सम्पदाओं तथा सोभाग्यको
देनेवाले हें । अष्टादशाक्षर-मन्त्रके अन्तमें क्लीं जोड
दिया जाय तो वह पुत्र तथा धन देनेवाला होता हे ।
इस मन्त्रके नारद ऋषि, गायत्री छन्द ओर श्रीकृष्ण
देवता हे । क्लीं वीज कहा गया है ओर स्वाहा शक्ति
मानी गयी है। छः दीर्घं स्वरोसे युक्त बीजमन्त्रद्रारा
षडङ्गन्यास करे। ! दायं हाथमे खीर ओर वायं
हाथमं मक्खन लिये हुए दिगम्बर गोपीपुत्र श्रीकृष्ण
मेरी रक्षा करें।' इस प्रकार ध्यान करके बत्तीस
लाख मन्न जपे ओर प्रज्वलित अग्रिमे मिश्री
मिलायो हुई खीरसे दशांश आहूति दे, तत्पश्चात्
पूर्वोक्त वेष्णवपीटपर अष्टादशाक्षर-मन््रकी भति
पूजन करे। कमलके आसनपर विराजमान श्रीकृष्णकीं
पूजा करके उनके मुखारविन्दमे खीर, पके केले,
दही ओर तुरतका निकाला हआ माखन देकर तर्पण
करे। पुत्रकी इच्छा रखनेवाला पुरुष यदि इस प्रकार
तर्पण करे तो वह वर्षभरमें पुत्र प्राप्त कर लेता है । वह
जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब उसे
तर्पणसे ही प्राप्त हो जाती हे।
वाक् (ए), काम (क्लीं) ड विभक्त्यन्त कृष्ण
शब्द ( कृष्णाय ) तत्पश्चात् माया ( हीं ), उसके बाद
"गोविन्दाय" फिर रमा ( श्रीं ) तदनन्तर दशाक्षर मन्त्र
( गोपीजनवल्छभाय स्वाहा ) उद्धृत करे, फिर ह् ओर
स् ये दोनों ओकार ओर विसर्गसे संयुक्त होकर अन्तमें
जुड़ जार्यँ तो (ए क्लीं कृष्णाय हीं गोविन्दाय श्रीं
गोपीजनवल्यभाय स्वाहा हसों ) बाईस अक्षरका मन्त्र
होता हे, जो वागीशत्व प्रदान करनेवाला है। इसके
नारद ऋषि, गायत्री छन्द, विद्यादाता गोपाल देवता,
क्लीं बीज ओर ए शक्ति हे । विद्याप्रा्िके लिये इसका
विनियोग किया जाता है। इसका ध्यान इस प्रकार
हे- जो वाम भागके ऊपरवाले हा्थमिं उत्तम विद्या-
पुस्तक ओर दाहिने भागके ऊपरवाले हाथमें स्फटिक
मणिको मातृकामयी अक्षमाला धारण करते है । इसी
प्रकार नीचेके दोनों शब्दन्रह्ममयी मुरली लेकर वजाते
हँ जिनके श्रीअद्मिं गायत्री-छन्दमय पीताम्बर सुशोभित
हे, जो श्याम वर्णं कोमल कान्तिमान् मयूरपिच्छमय
मुकुट धारण करनेवाले, सर्वज्ञ तथा मुनिवरा
सेवित हैँ, उन श्रीकृष्णका चिन्तन करे। इस प्रकार
लीला करनेवाले भुवनेश्वर श्रीकृष्णका ध्यान करके
चार लाख मन्त्र जप करे ओर पलासके फूलोसे दशांश
आहुति देकर मन्त्रोपासक बीस अक्षरवाले मन्त्रके
लिये कहे हुए विधानके अनुसार पूजन करे। इस
प्रकार जो मनत्रकी उपासना करता है, वह वागीश्वर हो
जाता है। उसके विना देखे हए शास्त्र भी गद्धाको
लहरोके समान स्वतः प्रस्तुत हो जाते हे।
' ॐ कृष्ण कृष्ण महाकृष्ण सर्वज्ञ त्वं प्रसीद
मे। रमारमण विद्येश विद्यामाशु प्रयच्छ मे॥' (हे
कृष्ण! हे कृष्ण! हे महाकृष्ण ! आप सर्वज्ञ है । मुञ्लपर
प्रसन्न होइये । हे रमारमण ! हे विद्येश्वर ! मुञ्धे शीघ्र
विद्या दीजिये।) यह तीस अक्षरोवाला महाविद्याप्रद
मनर है। इसके नारद ऋषि, अनुष्टुप् छन्द ओर श्रीकृष्ण
((-0. 1\/॥111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद ४७३
देवता हं । मन्त्रके चारों चरणों ओर सम्पूर्ण मन्त्रसे | एक दिव्य उद्यान ठै, उसके भीतर सूर्यके
पञ्चाङ्ग-न्यास करके श्रीहरिका ध्यान करे। समान प्रकाशमान मणिमय मण्डप है, जहां सर्वं
ध्यान वेदान्तमय कल्पवृक्षके नीचे योगपीट नामक दिव्य
दिव्योद्याने विवस्वत्प्रतिममणिमये मण्डपे योगपीठे सिंहासन हे, जिसके मध्यभागमें भगवान् मुकुन्द
मध्ये .यः सर्ववेदान्तमयसुरतरोः संत्निविष्टो मुकुन्दः। | विराजमान है । कल्पवृक्षरूपी चार वेद जिसके
वेदेः कल्पद्रुरूपैः शिखरिशतसमालम्बिकोशेश्चतुर्भि- | कोष सौ पर्वतोंको सहारा देनेवाले हँ, उन्हे घेरकर
न्ययिस्तकेः पुराणैः स्मृतिभिरभिवृतस्तादूशश्चामरादयैः ॥ | स्थित हे । छत्र, चंवर आदिके रूपें सुशोभित
दद्याद्विभ्रत्करागरैरपि दरमुरलीपुष्पवाणेक्षुचापा- | न्याय, तर्क, पुराण तथा स्मृतिर्योसे भगवान् आवृत
नक्षस्पक् पूर्णकुम्भो स्मरललितवपुर्दिव्यभूषाङ्गरागः॥ | हं । वे अपने हाथोके अग्रभागमें शद्ध, मुरली,
व्याख्यां वामे वितन्वन् स्फुटरुचिरपदो वेणुना विश्वमात्रे | पुष्पमय व्राण ओर ईखके धनुष धारण करते है ।
शब्दब्रह्मोद्धवेन श्रियमरुणरुचिर्वछवीवछ्भो नः ॥ | अक्षमाला ओर भरे हए दो कलश उन्होनि ले रखे
(ना पूर्व° ८१। ३४-३५) | है; उनका दिव्य विग्रह कामदेवसे भी अधिक
मनोहर है। वे दिव्य आभूषण तथा दिव्य
अङ्गराग धारण करते हे । शब्दब्रह्मसे प्रकट हुई
व ६ | तथा वाये हाथमे ली हुई वेणुद्रारा स्पष्ट एवं
| ५ ४१ | रुचिर पदका उच्चारण करते हुए विश्वमात्रे
~. | विशद व्याख्याका विस्तार करते है। उनकी
१ = | अङ्ग-कान्ति अरुण वर्णकी हे, एेसे गोपीवल्लभ
| श्रीकृष्ण हमें लक्ष्मी प्रदान करे ।
| इस प्रकार ध्यान करके एक लाख जप करे
| | ओर खीरसे दशांश आहुति दे। मन्त्र पुरुप इसका
: | पूजन आदि अष्टादशाक्षर मन््रकौ भति करे ।
9 "ॐ नमो भगवते नन्दपुत्राय आनन्दवपुपे
[क| गोपीजनवल्यभाय स्वाहा" यह अदाईस अक्षरोका
| मन्त्र हे। जो सम्पूर्णं अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला
हे।
"नन्दपुत्राय श्यामलाङ्खाय बालवपुपे कृष्णाय
11 (त । ९" + ४" | गोविन्दाय गोपीजनवल्यभाय स्वाहा ।' यह वत्ीस
१ 4 (439 | धोका मल ह। इन दोन मके नारद ऋष
न स ~~ - +£ 9 टे, पहलेका उण्णिक् , दूसरेका अनुष्टप् छन्द है।
४. व देवता नन्दनन्दन श्रीकृष्ण हे । समस्त कामनाओंकी
0.5 2. ~ प्रापिके लिये इसका विनियोग किया जाता है।
८ = ~ चक्रद्वार पञ्च्ग-न्यास करे तथा हृदयादि अन्नो
इन्द्रादि दिक्पालों ओर उनके वञ्च आदि
(-0. 1\॥(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661101. 01411260 0 60810011
8७४
संक्षिप्त नारदपुराण
आयुधोंसहित भगवान्की पूजा करनी चाहिये । | घी, चीनी तथा मधुमे सने हए तिल ओर चावलोसे
फिर ध्यान करके एक लाख मन्त्र-जप ओर खीरसे
दशांश हवन करे । इन सिद्ध मन्त्रद्वारा मन्त्रोपासक
अपने अभीष्टकी सिद्धि कर सकता हे।
'लीलादण्ड गोपीजनसंसक्तदोर्दण्ड बालरूप
मेघश्याम भगवन् विष्णो स्वाहा ' यह उन्तीस अक्षरोका
मन्त्र है। इसके नारद ऋषि, अनुष्टप् छन्द ओर
'लीलादण्ड हरि" देवता कहे गये हें । चौदह, चार,
चार, तीन तथा चार मन्त्राक्षरोद्राया क्रमशः पञ्चाङ्ग
न्यास करे।
ध्यान
सम्मोहयंश्च निजवामकरस्थलीला-
दण्डेन गोपयुवतीः परसुन्दरीश्च।
दिश्यान्निजप्रियसखांसगदक्षहस्तो
देवः श्रियं निहतकस उरुक्रमो नः॥
(ना० पूर्वं° ८१। ५५)
व्क 0 । ष ५ 1 ४ ^ = 9 ह # =) ^ न नदा
4 ५ ॐ श वि # १ ४ 0 „का. >=
कि 4. = न 0 (० (= ल | > (+ र ५ - ' णः =
न 2 1 ४
ऋ क्क
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क्र चे
च क
र ~
४
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(1
,१/४\. 4
"जो अपने बाय हाथमे लिये हए लीलादण्डसे
भोति-भोतिके खेल दिखाकर परम सुन्दरी
गोपाद्गनाओंका मन मोहे लेते हँ, जिनका दाहिना
हाथ अपने प्रिय सरखाके कंधेपर हे, वे कसविनाशक
महापराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण हमं लक्ष्मी प्रदान कर्,
इस प्रकार ध्यान करके एक लाख जप ओर
दशांश होम करे। तत्पश्चात् पूर्वोक्त पीठपर अद्ध
दिक्पाल तथा आयुधोंसहित श्रीहरिका पूजन करे । जो
प्रतिदिन आदरपूर्वक ' लीलादण्ड हरि"को आराधना
करता है, बह सम्पूर्ण लोकोद्वारा पूजित होता है ओर
उसके घरमे लक्ष्मीका स्थिर निवास होता है। सद्य
(ओ) -पर स्थित स्मृति (ग्) अर्थात् "गो", केशव
(अ) युक्त तोय (व्) अर्थात् "व! धरायुग (ल),
' भाय ' अग्निवल्यभा८ स्वाहा )-- यह (८ गोवल्मभाय स्वाहाय )
म्र सात अक्षरोका है ओर सम्पूर्णं सिद्धियोको देनेवाला
हे। इसके नारद ऋषि, उष्णिक् छन्द तथा गोतलभ श्रीकृष्ण
देवता हं । पूर्ववत् चक्र-मनत्रठारा पञ्चाङ्ग न्यास करे।
ध्यान
ध्येयो हरिः स कपिलागणमध्यसंस्थ-
स्ता आह्वयन् दधददक्षिणदोःस्थवेणुम्।
पाशं सयष्टिमपरत्र पयोदनीलः
पीताम्बरोऽहिरिपुपिच्छकृतावतंसः ॥
(ना० पूर्व० ८१। ६०)
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"जो कपिला गायके बीचमे खड हो उनको
((-0. 1/८11114<511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 0141260 0 6810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद ४७५
पुकारते है, बाय हाथमे मुरली ओर दायें हाथमें | अत्यन्त सुन्दर लग रहे टँ । अपने दोनों हाथों
रस्सी ओर लाठी लिये हुए हँ, जिनको अङ्गकान्ति | श्भुः ओर वेत ले रखे हैँ । सहस्रं गाये उन्हें
मेघके समान श्याम हे, जो पीतवस्त्र ओर मोर- | घेरकर खड़ी हैं । वे सम्पूर्ण देवताओंके प्रतिपालक
पंखका मुकुट धारण करते हे, उन श्यामसुन्दर | हँ । एक प्रौढ व्यक्तिके हाथमे एक कलश है
श्रीहरिका ध्यान करना चाहिये ।' उससे अमृतको धारा इर रही है ओर उसीसे
ध्यानके वाद, सात लाख मन्र-जप ओर | भगवान् स्नान कर रहे है; उनके नेत्र नूतन
गोदुग्धसे दशांश हवन करे । पूर्वोक्त वैष्णवपीठपर | विकसित कमल-दलके समान विशाल एवं सुन्दर
पूजन करे। अङ्गदाय प्रथम आवरण होता है। | हँ । एेसे श्रीहरिका ध्यान करना चाहिये।
द्वितीय आवरणर्मे-सुवर्ण-पिद्कला, गोर-पिद्धला, रक्त- तत्पश्चात् बारह लाख मन्त्र जपे। फिर गोदुग्धसे
पिङ्गला, गुड-पिङ्गला, वश्रु- वर्णा, उत्तमा कपिला,
आठ गायोके समुदायकी पूजा करके तीसरे ओर = र
चौथे आवरणे इन्द्रादि लोकेशो तथा वज्र आदि (4;
आयुधोंका पूजन करे ।
इस प्रकार पूजन करके मन्त्र सिद्ध कर लेनेपर
मन्त्रज्ञ पुरुष उसके द्वारा कामना-पूर्विके लिये प्रयोग | य
करे। जो प्रतिदिन गोदुग्धसे एक सौ आठ आहुति |< “ 1४
ॐ नमो भगवते श्रीगोविन्दाय' यह द्वादशाक्षर | (3
मन्त्र कहा गया है । इसके नारद ऋषि माने गये (|
हैं । छन्द गायत्री है ओर गोविन्द देवता कहे गये ¢
है । एक, दो, चार ओर पाँच अक्षरों तथा सम्पूर्ण (£
मन्त्रसे पञ्चाङ्ग-न्यास करे। {
ध्यान
ध्यायेत् कल्पद्रुमूलाश्रितमणिविलसदिव्यसिंहासनस्थं
मेघश्यामं पिशद्धांशुकमतिसुभगं शद्खवेत्रे कराभ्यःम्।
विभ्राणं गोसहस्चैर्वृतममरपति प्रीढहस्तैककुम्भ-
प्रश्च्योतत्सौधधारास्नपितमभिनवाम्भोजपत्राभनेत्रम् ॥
"दिव्य कल्पवृक्षके नीचे मूलभागके समीप | दशांश होम करके पूर्वत् गोशालामं स्थित भगवानूका
नाना प्रकारकी मणिर्योसे सुशोभित दिव्य सिंहासनपर | पूजन करे। अथवा प्रतिमा आदिमे भी पूजा करं
भगवान् श्रीकृष्ण विराज रहे है । उनकी अद्भकान्ति | सकते टै । पूर्वोक्त वैष्णवपीटपर मूलमन्त्रसे मूर्तिनिर्मीण
मेघके समान श्याम है, वे पीताम्बर धारण किय | करके उस्म भगवानृका आवाहन ओर प्रतिष्टा कर।
((-0. 1\/॥(11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
४७६
तत्पश्चात् पहले गुरुदेवकी पूजा करके भगवान्
श्रीकृष्णकी पूजा करे। भगवान्के पार््चभागमे रुक्मिणि
ओर सत्यभामाका, सामने इन्द्रका तथा पृष्टभागमें
सुरभिदेवीका पूजन करके केसरोमे अङ्गपूजा करे ।
फिर आठ दलों कालिन्दी आदि आट पटरानियोंक
पूजा करके पीटके कोणोमं किद्िणी ओर दामः
(रस्सी) की अर्चना करे। पृष्ठभागोमं वेणुकी तथा
सम्मुख श्रीवत्स एवं कोस्तुभकी पूजा करे। आगेकौ
ओर वनमाला आदि अलंकारोका. पूजन करे। आठ
दिशाओपे स्थित पाञ्चजन्य, गदा, चक्र, वसुदेव,
देवकी, नन्दगोप, यशोदा तथा गोओं ओर ग्वालोसहित
गोपिका--इन सबकी पूजा करे। उनके बाह्यभागमें इन्द्र
आदि दिक्पाल तथा उनके भी वाह्यभागमें वज्र आदि
संक्षिप्त नारदपुराण
आयुध हे । फिर पूर्वं आदि दिशाओमिं क्रमशः कुमुद, | अत्यन्त चपल गतिसे ओंगनमे दोड़ रहे है, उनके
कुमुदाक्ष, पुण्डरीक, वामन, शङ्कुकर्ण, सवित्र, सुमुख
तथा सुप्रतिष्ठित--इन दिग्गजोका पूजन करके विष्वक्-
सेन तथां आत्माका पूजन करना चाहिये। जो मनुष्य
एक या तीनो समय श्रीगोविन्दका पूजन करता हे, वह
चिरायु, निर्भय तथा धन-धान्यका स्वामी होता है।
सद्य (ओ) सहित स्मृति (ग्) अर्थात् "गो",
दक्षिण कर्णं (उ) युक्तं चक्री (क्) अर्थात् "कु",
धरा (ल) -इन अक्षरोके पश्चात् ' नाथाय ' पद ओर
अन्तमं हदय (नमः) यह-' गोकुलनाथाय नमः '
महामन्त्र आठ अशक्षरोका हे। इसके ब्रह्मा ऋषि,
गायत्री छन्द तथा श्रीकृष्ण देवता हं । इसके दो-दो
अक्षरों तथा सम्पूर्णं मन्त्रसे पञ्चाद्गन्यास करे ।
ध्यान
पञ्चवर्षमतिलोलमङ्कने
धावमानमतिचच्चलेक्षणम् ।
किङ्किणीबलयहारनृपरे
रञ्जितं नमत गोपवालकम्॥ ८०॥
नेत्र भी बडे चञ्चल है, किङ्किणी, वलय, हार ओर
नूपुर आदि आभूषण विभिन्न अद्गोकी शोभा वट
रहे है, एेसे सुन्दर गोपवालकको नमस्कार करो।'
इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रोपासक आठ लाख
जप ओर पलाशकी समिधाओं अथवा खीरसे
दशांश हवन करे । पूर्वोक्त वैष्णवपीठपर मूलमन्तरसे
मूर्तिका संकल्प करके उसमें मन्त्रसाधक स्थिरचित्त
हो भगवान् श्रीकृष्णका आवाहन ओर पूजन करे ।
चारों दिशा-विदिशाओपमें जो केसर रह, उनमं
अद्खँको पृजा करे! फिर दिशाओंमें वासुदेव,
बलभद्र, प्रदयुप्र ओर अनिरुद्धका तथा कोणोमें
रुक्मिणी, सत्यभामा, लक्ष्मणा ओर जाम्बवतीका
पूजन करे। इनके बाह्यभागोमे लोकेशो ओर
आयुधोंको पजा करनी चाहिये । एेसा करनेसे मन्त्र
सिद्ध हो जाता हे।
तार (ॐ), श्री (श्री), भुवना (हीं), काम
( क्लीं), डः विभक्त्यन्तं श्रीकृष्ण शब्द अर्थात्
"बाल गोपालकी पाच वर्धकी अवस्था है, वे | * श्रीकृष्णाय" एसा ही गोविन्द पद ( गोविन्दाय ),
१. यशोदा मैयाने रस्सीसे उन्हें बाधा था, उसीसे कमरमे किंकिणोके साथ दाम (रस्सी ) -की पूजाका विधान दै।
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 21188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
99
फिर ' गोपीजनव्यभाय ' तत्पश्चात् तीन पद्मा (श्रीं
श्रीं श्री )- यह (ॐ श्रीं हीं क्लीं श्रीकृष्णाय
गोविन्दाय गोपीजनवह्यभाय श्रीं श्रीं श्रीं) तेईस
अक्षरोका मन्त्र है । इसके ऋषि आदि भी पूर्वोक्त
ही हें ।. सिद्ध गोपालका स्मरण करना चाहिये ।
ध्यान
माधवीमण्डपासीनौ गरुडेनाभिपालितो ।
दिव्यक्रीडासु निरतौ रामकृष्णो स्मरञ् जपेत्॥ ८७॥
जो माधवीलतामय मण्डपमें वेठकर दिव्य
क्रीडाओंपें तत्पर है, श्रीगरुडजी जिनको रक्षा कर
रहे ठै, उन श्रीबलराम तथा श्रीकृष्णका चिन्तन
करते हए मन्त्र-जप करना चाहिये ।
र्ट वैष्णवोंको पूर्ववत् पूजन करना चाहिये ।
चक्री (क् ) आठवें स्वर (ऋ)-से युक्त हो ओर
उसके साथ विसर्ग भी हो तो ' कृः' यह एकाक्षर मन्त्र
होता दै। “ कृष्ण" यह दो अक्षरोका मन्त्र है। इसके
आदिमे क्लीं जोडनेपर "क्लीं कृष्ण" यह तीन
अक्षरोका मन्त्र वनता हे । वही डे विभक्त्यन्त होनेपर
चार अक्षरोका “क्लीं कृष्णाय ' मन्त्र होता है। ' कृष्णाय
4 अनक = च
नमः" यह पञ्चाक्षर- मन्त्र है। क्लीं ' सम्पुटित कृष्ण
पद भी अपर पञ्चाक्षर-मन्र है; यथा-- क्लीं कृष्णाय
क्लीं । ' गोपालाय स्वाहा ' यह पडक्षर- मन्त्र कहा गया
टे! ' क्लीं कृष्णाय स्वाहा" यह भी दूसरा पटक्षर-मन्तर
हे। ' कृष्णाय गोविन्दाय" यह सप्ताक्षर-मन््र सम्पूर्ण
सिद्धियोको देनेवाला है। श्रीं हीं क्लीं कृष्णाय
क्लीं ' यह दूसरा सप्तक्षर- मन्त्र हे । ` कृष्णाय गोविन्दाय
नमः' यह दूसरा नवाक्षर-मन्त्र हे। “क्लीं कृष्णाय
गोविन्दाय क्लीं ' यह भी इतर नवाक्षर-मन््र हे।
"क्लीं ग्लो क्लीं श्यामलाङ्गाय नमः' यह दशाक्षरं
सम्पूर्ण सिद्धियोको देनेवाला हे । * बालवपुपे कृष्णाय
स्वाहा" यह दूस दशाक्षर मच है। तदनन्तर गोपीजनमनेहर
श्रीकृष्णका इस प्रकार ध्यान करे
श्रीवृन्दाविपिनप्रतोलिषु नमत्संफुद्यवद्यतति-
प्वन्तर्जालविघदरनैः सुरभिणा वातेन संसविते।
कालिन्दीपुलिने विहारिणमथो राधकजीवातुकं
वन्दे नन्दकिशोरमिन्दुवदनं स्निग्धाम्बुद्ाडम्वरम्॥
(नार पूर्व ८१। ९६)
श्रीवृन्दावनकी गलियोमें ज्युकी ओर फली
((-0. 1/८1111(4/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
४७८
संक्षिप्त नारदपुराण
हुई लतावेलोकी पङ्क्तियोँ फैली हुई हैँ । उनके | इसका अङ्गन्यास करे ।
भीतर घुसकर लोट-पोट करनेसे शीतल-मन्द
ध्यान
वायु सुगन्धसे भर गयी हे। वह सुगन्धित वायु | विजयेन युतो रथस्थितः प्रसमानीय समुद्रमध्यतः।
उस यमुना-पुलिनको सव ओरसे सुवासित कर
रही हे, जहां श्रीराधारानीके एकमात्र जीवनधन
नागर नन्दकिशोर विचरण कर रहे हें। उनका
मुख चन्द्रमसे भी अधिक मनोहर है ओर
उनको अद्गकान्ति सिग्ध मेघोको श्याम मनोहर
छविको छीने लेती डे । मैं उन्हीं नटवर नन्दकिशोरकी
वन्दना करता ह ।
मुनीश्वर ! इन मन्त्रोको पूजा पूर्वोक्त पद्धतिसे
ही होती ठे, यह जानना चाहिये ।
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥९
(ना° पूर्व° ८१। ९७-९८)
यह वत्तीस अक्षरोका मन्त्र है। इसके नारद
ऋषि, गायत्नी ओर अनुष्टुप् छन्द तथा पुत्रप्रदाता
श्रीकृष्ण देवता हं । चारो पादों तथा सम्पूर्ण मन्त्रसे
,
स~" 004
= कोक 7
१९. 6 ५५ \
९
सि
षै 7
क ;} 11.
प्रददत्तनयान् द्विजन्मने स्मरणीयो वसुदेवनन्दनः ॥
(ना० पूर्व० ८१। १००)
"जो अर्जुनके साथ रथपर बैठे ह ओर
क्षीरसागरसे लाकर ब्राह्यणके मरे पुत्रको उन्हे
वापस दे रहे है, उन वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णका
चिन्तन करना चाहिये ।'
इसका एक लाख जप ओर घी, चीनी तथा
मधु-मेवा आदि मधुर पदार्थमिं सने हए तिलोसे
दस हजार होम करे । पूर्वोक्त वैष्णवपीठपर अङ्ग
दिक्पाल तथा आयुधोंसहित श्रीकृष्णकी पूजा
करनी चाहिये । इस प्रकार मन्त्र सिद्ध कर लेनेपर
वन्ध्या स्त्रीके भी पुत्र उत्पन्न हो सकता हे। ' ॐ
ही हंसः सोऽहं स्वाहा" यह दूसरा अष्टाक्षर- मन्त्र
हे । इस पञ्चव्रह्मात्मक मन्त्रके ब्रह्मा ऋषि, परमा
गायत्री छन्द तथा परम ज्योति;स्वरूप परब्रह्म
~ क आ कय के
न
१. “देवकोपुत्र ! गोविन्द ! वासुदेव ! जगदीश्वर ! श्रीकृष्ण! मँ तुम्हारी शरणमे आया हूँ, मुञ्च पुत्र प्रदान करो ।'
((-0. /(111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद्
देवता कहे गये हें । प्रणव वीज है ओर स्वाहा
शक्ति कही गयी हे । ' स्वाहा ' हृदयाय नमः । सोऽहं
शिरसे स्वाहा । हंसः शिखायै वषट् । हच्छेखा कवचाय
हुम्। ॐ नेत्राभ्यां वौषट् । " हरिहर" अस्त्राय फट्।
इस प्रकार अङ्गन्यास करे।
स ब्रह्मा स शिवो विप्र स हरिः सैव देवराय्।
स सर्वरूपः सर्वख्यिः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥
(ना० पूर्व ८१। १०७)
' विप्रवर! वे श्रीकृष्ण ही ब्रह्मा हे, वे ही
शिव दहे, वे ही विष्णु ओर वे ही देवराज इन्द्र
है। वे ही सब रूपोमें है तथा सब नाम
उन्टीके है। वे ही स्वयं प्रकाशमान अविनाशी
परमात्मा हें ।'
इस प्रकार ध्यान करके आठ लाख जप ओर
दशांश होम करे । इनको पूजा प्रणवात्मक पीठपर
अङ्ग ओर आवरणदेवताओके साथ करनी चाहिये ।
नारद ! इस प्रकार मन्त्र सिद्ध हो जानेपर साधक-
शिरोमणि पुरुषको “ तत्त्वमसि ' आदि महावाक्योका
विकल्परहित ज्ञान प्राप्त होता हे।
' क्लीं हषीकेशाय नमः" यह अष्टाक्षर-मन्त्र
हे । इसके ब्रह्मा ऋषि, गायत्री छन्द ओर हषीकेश
देवता है । सम्पूर्णं मनोरथोकी प्रापतिके लिये इसका
विनियोग किया जाता है। 'क्लीं' बीज है तथा
आय" शक्ति कही गयी दहै । बीजमन्त्रसे ही
षडद्भ-न्यास करके ध्यान करे। अथवा पुरुषोत्तम
मन्त्रके लिये कही हुई सव बातें इसके लिये भी
समञ्चनी चाहिये। इसका एक लाख जप तधा
घृतसे दस हजार होम करे। संमोहिनी कुसुमोसे
तर्पण करना सम्पूर्णं कामनाओंकौ प्रापि करानेवाला
कहा गया है। श्रीं श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय
नमः" यह चौदह अशक्षरोका मन्त्र है। इसके ब्रह्मा
ऋषि, गायत्री छन्द, श्रीधर देवता, श्रीं बीज ओर
" आय ' शक्ति टै । बीजये ही पटद्ग-न्यास कर्।
इसमे भी पुरुषोत्तम मन्त्रकी ही भाति ध्यान-पूजन
आदि कहे गये है । एक लाख जप ओर घीयेद्ी
2७९
दशांश होमका विधान हे। सुगन्धित श्त पुष्पोंसे
पूजा ओर होम आदि करे । विप्रनद्र ! एेसा करनेपर
वह साक्षात् श्रीधरस्वरूप हो जाता हे। ' अच्युतानन्त-
गोविन्दाय नमः' यह एक मन्त्र है ओर "अच्युताय
नमः ', अनन्ताय नमः", गोविन्दाय नमः" ये तीन
मन्त्र हे । प्रथमके शौनक ऋषि ओर विराट् छन्द
हे । शेष तीन मन्त्रके क्रमशः पराशर, व्यास ओर
नारद ऋषि हें। छन्द इनका भी विराट् ही दै।
परब्रह्मस्वरूपं श्रीहरि इन सव मन्त्रोके देवता
हे । साधक इनके वीज ओर शक्ति भी पूर्वोक्त
ही समद्े।
ध्यान
शङ्कचक्रधरं देवं चतुर्बाहुं किरीटिनम् ॥
सर्वैरप्यायुधर्युक्तं गरुडोपरि संस्थितम्।
सनकादिमुनीन्धेस्तु॒ सर्वदेवेरूपासितम्॥
श्रीभूमिसहितं देवमुदयादित्यसन्निभम्।
प्रातरुद्यत्सहस््रांशुमण्डलोपमकुण्डलम् ॥
सर्वलोकस्य रक्षार्थमनन्तं नित्यमेव दहि।
अभयं वरदं देवं प्रयच्छन्तं मुदान्वितम् ॥
(नाऽ पूर्वऽ ८१। १२०- १२३)
' भगवान् अच्युत श्ल ओर चक्र धारण करते
है । वे द्युतिमान् होनेसे "देन" कहे गये ह । उनके
चार वाहं है। वे किरीटसे सुशोभित दै । उनके
हाथोमें सब प्रकारके आयुध है। वे गरूड्को
पीठपर वैदे है । सनक आदि मुनीश्वर तथा सम्पूर्णं
देवता उनकी उपासना करते ह । उनके उभय
पार्चमें श्रीदेवी तथा भूदेवी ह । वे उदयकालीन
सू्यकि समान तेजस्वी टै । उनके कानोके कमनीय
कुण्डल प्रातःकाल उगते हुए सूर्यदेवके मण्डलक
समान अरूण प्रकाशसे सुशोभित टै । वे वरदायक
देवता है, सदा परमानन्दसे परिपूर्णं रहते हँ ओर
सम्पूर्णं विश्चकी रक्षके लिये सदा ही सवक
अभय प्रदान करते है । उनका कहीं किसी कलमे
भी अन्त नदीं हीता।'
ट्स प्रकार ध्यान करके एकाग्रचित्त हौ
((-0. 1/(111104/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
ठ८9
संक्षिप्त नारदपुराण
"2 ण - र
> > (+) ५ ~ 4. 4
५ - ज = अम =] र
~: प - १ क £ (4 १,
116 ॥ ।
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क ^ ट ज्र १ {६ की = च
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0 ८ # ६
4 रै ~
वेष्णवपीटपर भगवान्की पूर्ववत् पूजा करे।
इनका प्रथम आवरण अद्घोद्रारा सम्पन्न होता
हे। चक्र, शह्ल, गदा, खन्ग, मुसल, धनुष,
पाश तथा अङ्कश--इनसे द्वितीय आवरण बनता
है । सनकादि चार महात्मा तथा पराशर,
व्यास, नारद ओर शोनकसे तृतीय आवरण
होता हे। लोकपालोद्रारा चौथा आवरण पूरा
होता है। (पांचवें आवरणे व्र आदि
आयुधोकी पूजा होती हे ।) इस मन्त्रका एक
लाख जप ओर घृतसे दशांश हवन किया
जाता है। इस प्रकार मन्त्र सिद्ध हो जानेपर
मन्त्रोपासक कामनापूर्तिके लिये मन्त्रका प्रयोग
भी कर सकता टै। वेलके पेड्के नीचे
उसकी जडके समीप वैटकर देवेश्वर भगवान्
विष्णुका ध्यान करते हए रोगीका स्मरण करे
ओर उसका स्पर्शं करके दस हजार मन्त्र
जपे। ब्रह्मन्! वह स्पर्शं करके, जप करके
अथवा साध्यका मन-ही-मन स्मरण करके
या मण्डल बनाकर रोगियोंको रोगसे मुक्त
ल < ( ति ~ 1 य ~ द्ध
(1 ४ ~ +
` १ =) सके ॥ ५.
= | १ = - (`
= भे न 9." द > | त जोक न म
च ++ कै ग्र + र
९९ ++ च # ` ङ च
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। १, 0. श. यै? > क | न
॥ = 8 क
^ >) ~ `
(;
र
कर सकता हे।
वाल (व्), पवन (य्) ये दोनों अक्षर दीर्घ
आकार ओर अनुस्वारसे युक्त हों ओर िंटीश
(एकार ) -से युक्त जल (ब्) हो, तत्पश्चात् अत्रि
अर्थात् दकार हो ओर उसके बाद "व्यासाय
पदके अन्तमें हदय ( नमः )-का प्रयोग हो तो यह
( व्यां वेदव्यासाय नमः ) अष्टाक्षर-मन्त्र बनता हे ।
यह मन्त्र सवकी रक्षा करे। इसके ब्रह्मा ऋषि,
अनुष्टुप् छन्द, सत्यवतीनन्दन व्यास देवता, व्यां
वीज ओर नमः शक्ति है। दीर्घस्वरोसे युक्त
बीजाक्षर ८ व्यां व्यीं व्यु व्यै व्यौ व्यः )-द्रारा अद्ध
न्यास करना चाहिये ।
ध्यान
व्याख्यामुद्िकया लसत्करतलं सद्योगपीटस्थितं
वामे जानुतले दधानमपरं हस्तं सुविद्यानिधिम्।
विप्रत्रातवृतं प्रसन्नमनसं पाथोरुहाङ्कद्यतिं
पाराशर्यमत्तीव पुण्यचरितं व्यासं स्मेत्सिद्धये ॥
{ ना० पूर्वे ८१। १३६)
“जिनका दाहिना हाथ व्याख्यातौ मुद्रासे सुशोभित
((-0. 1\/॥८111101/5511॥1 81188 \/8181185। 01661010. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद्
८१
है, जो उत्तम योगपीठासनपर हे, जिन्होने
अपना वायो हाथ वाये घुटनेपर रख छोड़ा हे, जो
उत्तम ॒विद्याके भण्डार, ब्राह्मणसमृहसे धिरे हए
तथा प्रसन्नचित्त है, जिनकी अद्भकान्ति कमलके
समान तथा चरित्र अत्यन्त पुण्यमय है, उन पराशसनन्दन
वेदव्यासका सिद्धिके लिये चिन्तन करे। आट हजार
मन््र-जप ओर खीरसे दशांश होम करे। पूर्वोक्त
पटपर व्यासका पूजन करे। पहले अद्भकी
पूजा करनी चाहिये। पूर्वं आदि चार दिशाओं
क्रमशः पेल, वेशम्पायन, जैमिनि ओर सुमन्तका तथा
ईशान आदि कोणोपमें क्रमशः श्रीशुकदेव, रोमहर्षण,
उग्रश्रवा तथा अन्य मुनियोका पूजन करे। इनके
वाह्यभागमं इन्द्र॒ आदि दिक्पालों ओर वज्ज आदि
आयुधोंकी पूजा करे। इस प्रकार मन्त्र सिद्ध कर्
लेनेपर मन्त्रोपासक पुरुष कवित्वशक्ति, सुन्दर संतान,
व्या्यान-शक्ति, कर्ति तथा सम्पदाओंकी निधि प्राप्त
कर लेता है।
=» 17 |
(क #
श्रीनारदजीको भगवान् शङ्करसे प्राप्त हुए युगलशशरणागति-मन््र तथा राधाकृष्ण-
युगलसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन
सनत्कुमारजी कहते है-- नारद ! क्या तुम जानते
हो कि पूर्व-जन्ममें तुमने साक्षात् भगवान् शद्धरसे
युगल-मन्त्रका उपदेश प्राप्त किया था। श्रीकृष्ण-
मन््रका रहस्य, जिसे तुम भूल चुके हो, स्मरण तो करो ।
सूतजी कहते हैं-- ब्राह्यणो । परम वुद्धिमान्
सनत्कुमारजीके द्वारा एेसा कहनेपर देवर्षिं नारदने
ध्यानमें स्थित हो अपने पूर्व-जन्मके चिरन्तन
चरित्रको शीघ्र जान लिया। तव उन्होने मुखम
आन्तरिक प्रसन्नता व्यक्त करते हए कहा--' भगवन् ।
पूर्व-कल्पका ओर वृत्तान्त तो मुञ्चे स्मरण दहो
आया है; परंतु युगल-मन्त्रका लाभ किस प्रकार
हुआ, यह याद नहीं आता ।' महात्मा नारदका यह
वचन सुनकर भगवान् सनत्कुमारने सखव वातं
यथावत्-रूपसे बतलाना आरम्भ करिया।
1 व ता ¬ म त ति र >) ता त त 1 "णक 2 दि त ` `
सनत्कुमारजी वोले-- ब्रह्मन्! सुनो, इस
सारस्वत कल्पसे पच्चीसरवेँ कल्प पूर्वको बात है
तुम कश्यपजीके पुत्र होकर उत्पन्न हृए थे। उस
समय भी तुम्हारा नाम नारद ही धा। एक दिन तुम
भगवान् श्रीकृष्णका परम तत्तव पृषछनेके लिये
कैलास पर्वतपर भगवान् शिवके समीप गये । वहां
तुम्हारे प्रश्न करनेपर, महादेवजीने स्वयं जिसका
साक्षात्कार किया धा, श्रीहरिकी नित्य-लीलासे
सम्बन्ध रखनेवाले उस परम रहस्यका तुमसे
यथार्थरूपमें वर्णन किया। तव तुमने श्रीहरिको
नित्य-लीलाका दर्शन करनेके लिये भगवान् शङ्करे
पुनः प्रार्थना की। तव भगवान् सदाशिव इम
प्रकार वोल--"गोपीजनवल्मभचरणाच्छरणं £ प्रपद्ये '
यह मन्त्र टे। इस मन्त्रके सुरभि ऋषि, गायत्री
(मि मि पि स त त ` 1 का 0 य ।
१. गोपीजनवह्छभ श्रीकृष्णके चरणोकी शरण लैतार्टू।
(-0. 1\/॥(111104/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 66810011
८२
छन्द ओर गोपीवक्छभ भगवान् श्रीकृष्ण देवता
कहे गये हे, ' प्रपन्नोऽस्मि ' एेसा कहकर भगवानूको
शरणागतिरूप भक्ति प्राप्त करनेके लिये इसका
विनियोग बताया गया है। विप्रवर! इसका
सिद्धादि-शोधन नहीं होता है। इसके लिये
न्यासकी कल्पना भी नहीं कौ गयी हे । केवल
इस मन्त्रका चिन्तन ही भगवान्को नित्य लीलाको
तत्काल प्रकाशित कर देता हे । गुरुसे मन्त्र ग्रहण
करके उनमें भक्तिभाव रखते हए अपने धर्मपालनमे
संलग्र हो गुरुदेवकी अपने ऊपर पूर्णं कृपा
समञ्च ओर सेवाओंसे गुरुको संतुष्ट करे । साधुपुरुषोके
धर्मोकी, जो शरणागतोके भयको दूर करनेवाले
है, शिक्षा ले। इहलोक ओर परलोककी चिन्ता
छोडकर उन सिद्धिदायक धर्मोको अपनावे।
'इहलोकका सुख, भोग ओर आयु पूर्वकमेकि
अधीन है, कर्मानुसार उनकी व्यवस्था भगवान्
श्रीकृष्ण स्वयं ही करेगे ।' एेसा दूद् विचार कर
अपने मन ओर बुद्धिके द्वारा निरन्तर
नित्यलीलापरायण श्रीकृष्णका चिन्तन करे । दिव्य
अर्चाविग्रहोके रूपमे भी भगवान्का अवतार
होता है। अतः उन विग्रहोंकी सेवा-पृजा-द्वारा
सदा श्रीकृष्णको आराधना करे। भगवान्की
शरण चाहनेवाले प्रपन्न भक्तोको अनन्यभावसे
उनका चिन्तन करना चाहिये ओर विद्वानोंको
भगवान्का आश्रय रखकर देह-गेह आदिकौ
ओरसे उदासीन रहना चाहिये । गुरुक अवहेलना,
साधु-महात्माओंकी निन्दा, भगवान् शिव ओर
विष्णुम भेद करना, वेदनिन्दा, भगवन्नामके बलपर
पापाचार करना, भगवन्नामकी महिमाको अर्थवाद
संक्षिप्त नारदपुराण
समञ्चना, नाम लेनेमें पाखण्ड फैलाना, आलसी
ओर नास्तिकिको भगवन्नामका उपदेश
देना,भगवन्नामको भूलना अथवा नाममे आदरवुद्धि
न होना-ये (दस) बडे भयानक दोष हेै।
वत्स ! इन दोषोंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये^।
मे भगवान्कौ शरणमे हृं, इस भावसे सदा
हदयस्थित श्रीहरिका चिन्तन करे ओर यह
विश्वास रखे कि वे भगवान् ही सदा मेरा पालन
करते है ओर करेगे। भगवान्से यह प्रार्थना
करे-' राधानाथ।! में मन, वाणी ओर क्रियाद्वारा
आपका हूं । श्रीकृष्णवल्छभे ! मेँ तुम्हारा ही हू।
आप ही दोनों मेरे आश्रय हैं ।' मुनिश्रेष्ठ ! श्रीहरिके
दास, सखा, पिता-माता ओर प्रेयसि्यां-सब-
के-सब नित्य है; एेसा महात्मा पुरुषोंको चिन्तन
करना चाहिये। भगवान् श्यामसुन्दर प्रतिदिन
वृन्दावन तथा ब्रजमें आते-जाते ओर सखाओंके
साथ गौण चराते है । केवल असुर-विध्वंसकों
लीला सदा नहीं होती । श्रीहरिके श्रीदामा आदि
बारह सखा कहे गये है तथा श्रीराधा-
रानीकी सुशीला आदि वत्तीस सखियां बतायी
गयी टै । वत्स ! साधकको चाहिये वह अपनेको
श्यामसुन्दरकी सेवाके सर्वथा अनुरूप समज
ओर श्रीकृष्णसेवाजनित सुख एवं आनन्दसे
अपनेको अत्यन्त संतुष्ट अनुभव करे । प्रातःकाल
ब्राह्यमुहूर्तसे लेकर आधी राततक समयानुरूप
सेवाके द्वारा दोनों प्रिया-प्रियतमकौ परिचर्या
करे । प्रतिदिन एकाग्रचित्त होकर उन युगल सरकारके
सहस्र ना्मोका पाठ भी करे। मुनीश्वर! यह प्रपन्न
भक्तोके लिये साधन बताया गया है । यह मने
१. गुरोरवज्ञां साधूनां निन्दां भेदं हरे हरौ । वेदनिन्दां
हरेनामिबलात्पापसमीहनम्॥
अर्थवादं हरेनप्रि पाखण्डं नामसंग्रहे । अलसे नास्तिके चैव हरिनामोपदेशनम्॥
नामविस्मरणं चापि नाम््यनादरमेव च । संत्यजेद् दूरतो वत्स दाषानतानसुदारुणान् ॥
(ना० पूर्व० ८२। २२-२४)
((-0. 1/८1114<511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्व भाग-तृतीय पाद्
तुम्हारे समक्ष गृढ तत्तव प्रकाशित किया हे।
सनत्कुमारजी कहते है-- नारद ! तब तुमने पुनः
भगवान् सदाशिवसे पृषछा--' प्रभो ! युगलसहस्रनाम
कोन-से हें ? महामुने! तुम्हारे पृछ्नेपर भगवान्
शिवने युगलसहस्नरनाम भी वबतलाया। वह सव
मुञ्चसे सुनो । रमणीय वृन्दावनमें यमुनाजीके तटसे
लगे हए कल्पवृक्षका सहारा लेकर श्यामसुन्दर
श्रीराधारानीके साथ खड हें । महामुने ! एेसा ध्यान
करके युगलसहस्रनामका पाठ करे ।
९. देवकीनन्दनः =देवकीको आनन्दित करनेवाले,
२. शौरिः=शूरसेनके वंशज, ३. वासुदेवः=वसुदेव-
पुत्र अथवा सबके भीतर निवास करनेवाले देवता,
४. बलानुजः = वलरामजीके छोटे भाई, ५. गदाग्रजः =
गदके बडे भाई, ६. कसमोहः= अपनी अलौकिक
शोर्यपूर्ण लीलाओंसे कंसको मोहित करनेवाले,
७. कंससेवकमोहनः =कंसको सेवामे तत्पर असुर
वीरोंको मोहित करनेवाले।
८. भित्नार्गलः= जन्म लेनेके पश्चात् गोकुल-
गमनको इच्छासे कंसके कारागारमे लगे हए
किंवाडोंकी अर्गला (सिरकिनी)-का भेदन करनेवाले,
९. भित्रलोहः=पिताके हाथों ओर पैरोमें बंधी हुई
लोहेको हथकड़ी ओर वेडीको संकल्पमात्रसे
तोड् देनेवाले, ९०. पितुवाह्यः=पिता वसुदेवके
द्वारा सिरपर वहन करने योग्य शिशुरूप श्रीकृष्ण,
१९१. पितृस्तुतः=अवतारकालमें पिताके द्वारा जिनको
स्तुति को गयी, वे श्रीकृष्ण, १२. मातृस्तुतः=माता
देवकोके द्वारा जिनकी स्तुति की गयी वे,
१३. शिवध्येयः= भगवान् शङ्भुरके ध्यानके विषय,
९४. यमुनाजलभेदनः गोकुल जाते समय वसुदेवजीको
मार्ग देनेके लिये यमुनाजीके जलका भेदन करनेवाले ।
१५. व्रजवासी~तव्रजमें निवास करनेवाले,
१६. व्रजानन्दी अपने शुभागमनसे सम्पूर्णं त्रजका
आनन्द बढानेवाले, १७. नन्दबालः = नन्दजीके पुत्र,
४८३
१८. दयानिधिः=दयाके समुद्र, १९. लीलाबालः ~
लीलाके लिये बालरूपमें प्रकट, २०. पद्यनेत्रः =
कमलसदुश नत्रवाले, २९१. गोकुलोत्सवः=गोकुलके
लिये उत्सवरूप अथवा अपने जन्मसे गोकुलमें
आनन्दोत्सवको बदानेवाले, २२. ईश्ररः=सव
प्रकारसे समर्थ।
२३. गोपिकानन्दनः = अपनी शेशवसुलभ
चेष्टाओंसे यशोदा आदि गोपियोंको आनन्दित
करनेवाले, २४. कृष्णः सच्विदानन्दस्वरूप अथवा
सबको अपनी ओर खीचनेवाले, २५. गोपानन्दः~
गोपोके लिये मूर्तिमान् आनन्द, २६. सताङ्घतिः~
साधु-महात्माओं तथा भक्तजनोके आश्रय,
२७. वकप्राणहरः=वकासुरके प्राण लेनेवाले,
२८. विष्णुः सर्वत्र व्यापक, २९. वकमुक्तिप्रदः =
वकासुरको मोक्ष देनेवाले, ३०. हरिः= पाप, दुःख
ओर अज्ञानको हर लेनेवाले।
३१. बलदोलाशयशयः =शेषस्वरूप बलरामरूपी
हिंडोलेपर शयन करनेवाले, ३२. श्यामलः~
श्यामवर्णं, ३३. सर्वसुन्दरः= पूर्णं सौन्दर्यके आश्रय,
३४. पद्मनाभः =जिनको नाभिसे कमल प्रकर हआ
वे भगवान् विष्णु, ३५. हृषीकेशः =इद्धियोके नियन्ता
ओर प्रेरक, ३६. क्रीडामनुजबालकः = लीलाके
लिये मनुष्य-बालकका रूप धारण किये हुए।
३७. लीलाविध्वस्तशकटः = अनायास ही चर्णकि
स्पशसे छकडेको उलटकर उसमें स्थित अमुरका
नाश करनेवाले, ३८. वेदमन््राभिषेचितः=यशोदा
मैयाकी प्रेरणासे बालाण्षटिनिवारणके लिये ब्राह्मणो्रारा
वेद-मन्त्रसे अभिषिक्त, ३९. यशोदानन्दनः यशोदा
मैयाको आनन्द देनेवाले, ४०. कान्तः=कमनीय
स्वरूप, ४१. मुनिकोटिनिषेवितः करोड़ मुनियोद्रारा
सेवित ।
४२. नित्यं मधुवनवासी~मधुवनमें नित्य निवासं
करनेवाले, ४३. वैकुण्ठः =वैकुण्टधामकरे अधिपति
((-0. 1/८111104/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
८
संश्चिप्त नारदपुराण
विष्णु, ४४. सम्भवः=सवको उत्पत्तिके स्थान,
४५. क्रतुः = यज्ञस्वरूप, ४६. रमापतिः = लक्ष्मीपति,
४७. यदुपतिः =यदुवंशियोके स्वामी, ४८. मुरारिः =
मुर देत्यके नाशक, ४९. मधुसूदनः =मधु नामक
देत्यको मारनेवाले।
५०. माधवः=यदुवंशान्तर्गत मधुकुलमें प्रकर,
५१. मानहारी=अभिमान ओर अहंकारका नाश
करनेवाले, ५२. श्रीपतिः=लक्ष्मीके स्वामी,
५३. भूधरः=शेपनागरूपसे पृथ्वीको धारण करनेवाले,
८४. प्रभुः=सर्वसमर्थ, ५५५. बुहद्रनमहालीलः=महावनमें
बड़ी-बड़ी लीला करनेवाले, ५६. नन्दसूनुः =
नन्दजीके पुत्र, ५९७. महासनः= अनन्त शेषरूपी
महान् आसनपर विराजनेवाले।
५८. तृणावर्तप्राणहारी=तृणावर्तं नामक दैत्यको
मारनेवाले, ५९. यशोदाविस्मयप्रदः = अपनी अद्भुत
लोलाओंसे यशोदा मैयाको आश्चर्यम डाल देनेवाले,
६०. त्रेलोक्यवक्त्रः = अपने मुखमें तीनों लोकोंको
दिखानेवाले, ६१. पद्याक्षः=विकसित कमलदलके
समान विशाल ने्रोंवाले, ६२. प्रहस्तः =हाथमें
कमल धारण करनेवाले, ६३. प्रियङ्करः=सवका
प्रिय कार्य करनेवाले ।
६४. ब्रह्मण्यः =व्राह्यण-हितकारी, ६५. धर्मगोप्ता
धर्मको रक्षा करनेवाले, ६६. भूपति; =पृथ्वीके
स्वामी, ६७. श्रीधरः = वक्षःस्थलमे लक्ष्मीको धारण
करनेवाले, ६८. स्वरादे<स्व्यंप्रकाश, ६९. अजाध्यक्षः
ब्रह्माजीके स्वामी,
शिवके स्वामी, ७१. धर्माध्यक्षः =धर्मके अधिपति,
७२. महेश्वरः = परमे श्चर ।
७३. वेदान्तवेद्यः =उपनिषदोद्रारा जानने योग्य
परमात्मा, ७४. ब्रह्मस्थः ~वेदमें स्थित, ७५. प्रजापतिः =
सम्पूर्ण जीवोके पालक, ७६. अमोधटदूक् =
जिनको दृष्टि कभी चूकती नहीं एेसे सर्वसाक्षी,
७9७. गोपीकरावलम्बी=गोपियोके हाथको पकड़कर
७५. शिवाध्यक्षः= भगवान्
नाचनेवाले, ७८. गोपबालकसुप्रियः=गोपबालकोके
अत्यन्त प्रियतम ।
७९. वबलानुयायी=नलरामजीका अनुकरण
करनेवाले, ८०. बलवान्=बली, ८९. श्रीदामप्रियः=
श्रीदामाके प्रिय सखा, ८२. आत्मवान्-मनको
वशमे करनेवाले, ८३. गोपीगृहाङ्णरतिः =गोपियोकेः
घर ओर ओंगनमें खेलनेवाले, ८४. भद्रः =
कल्याणस्वरूप, ८५. सुश्लोकमङ्गलः अपने
लोकपावन सुयशसे सवका मङ्गल करनेवाले ।
८६. नवनीतहरः=माखनका हरण करनेवाले,
८७. बालः = वाल्यावस्थासे विभूषित, ८८. नवनीत-
प्रियाशनः=मक्खन जिनका प्यारा भोजन है,
८९. बालवृन्दी=-गोप-बालकोके समुदायको साथ
रखनेवाले, ९०. मर्कवृन्दी=वानरोके ज्युंडके साथ
खेलनेवाले, ९९. चकिताक्षः=आश्चर्ययुक्त चञ्चल
नेत्रोंसे देखनेवाले, ९२. पलायितः=मेयाकी सोटीके
भयसे भाग जानेवाले।
९३. यशोदातर्जितः=यशोदा मैयाकी डाँट
सहनेवाले, ९४. कम्पी=मैया मारेगी इस भयसे
कोपनेवाले, ९५. मायारुदितशोभनः=लीलाकृत रुदनसे
सुशोभित, ९६. दामोदरः =मैयाद्रारा रस्सीसे कमरमें
बाधे जानेवाले, ९७. अप्रमेयात्मा=जिसकी कोई
माप नहीं एेसे स्वरूपसे युक्त, ९८. दयालुः =
सवपर दया करनेवाले, ९९. भक्तवत्सलः = भक्तोसे
प्यार करनेवाले ।
९००. उलूखले सुबद्धः=ऊखलमे अच्छी तरह
वधे हुए, १०९१. नम्रशिरा~ज्ुके मस्तकवाले, ९०२.
गोपीकदर्धितः=गोपियोद्रारा यशोदा मैयाके पास
जिनके बालचापल्यकी शिकायत की गयी है वे,
१०३. वृक्षभद्गी=यमलार्जुन नामक वृक्षोको भङ्ग
करनेवाले, १०४. शोकभङ्ी= स्वयं सुरक्षित रहकर
स्वजनोंका शोक भद्ध करनेवाले, १०५. धनदात्मज-
योक्षणः=कुवेरपुत्रोका उद्धार करनेवाले।
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 21188 \/8181185। (01661011. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद ४८५
करके जगानेवाले, १३२. आद्यः=सवके आदिकारणः;
१३३. आत्मप्रदः~प्रमी भक्तोके लिये अपने
आत्मातकको दे डालनेवाले, १३४. सद्गी-गोप-
बालकके सद्धं रहनेवाले, १३५. यमुनातीरभोजनः
यमुनाजीके तटपर ग्वालबालेकि साथ भोजन करनेवाले।
१३६. गोपालमण्डलीमध्यः = ग्वालवार्लोकी
मण्डलीके बीचमें वेठनेवाले, १३७. सर्वगोपाल-
भूषणः= सम्पूर्णं ग्वालवालोको विभूषित करनेवाले,
१३८. कृतहस्ततलग्रासः=टथेलीमें अन्नका ग्रास
लेनेवाले, १३९. व्यञ्जनाश्रितशाखिकः =वृक्षोपर
भोजन-सामग्री एवं व्यञ्जन रखनेवाले।
१४०. कृतवाहुशृद्धयष्टिः -हाथोमें सींग ओर
छट धारण करनेवाले, १४९१. गुञ्ालंकृतकण्ठकः=
गुञ्जाको मालासे अपने कण्टको विभूषित करनेवाले,
१४२. मयूरपिच्छमुकुटः=मोरपंखका मुकुट धारण
करनेवाले, १४३. वनमालाविभूषितः = वनमालासे
अलंकृत ।
१४४. गेरिकाचित्रितवपुः=गेरूसे अपने शरीरम
चित्रको रचना करनेवाले, १४५. नवपेधवपुः=नवीन
मेघ-घटाके समान श्याम शरीरवाले, १४६. स्मरः=
कामदेवस्वरूप, १४७. कोटिकन्दर्पलावण्यः =
करोड़ों कामदेवोके समान सौन्दर्यशाली,
४८. लसन्मकरकुण्डलः सुन्दर मकराकृति कुण्डल
धारण करनेवाले ।
१४९. आजानुबाहुः=घुटनेतक लंबी भुजावाले,
१५०. भगवान् एश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान ओर
वैराग्य-इन छृटीं एेश्चयसि पूर्णतया युक्त,
१५१. निद्रारहितलोचनः= निद्राशुनय नेत्रोवाले,
१५२. कोटिसागरगाम्भीर्यः=करोदं समुद्रकरि समान
गम्भीर, १५३. कालकालः कालके भी महाकाल,
१५४. सदाशिवः = नित्य कल्याणस्वरूप।
१५५. विरच्िमोहनवपुः = अपने आद्धुतरूपमे
ब्रह्माजीक्ो भी मोदमं डालनेवाले, १५६. गोप-
१०६. देवर्षिवचनश्लाघी-=देवर्षिं नारदके वचनका
आदर करनेवाले, ९०७. भक्तवात्सल्यसागरः =
भक्तवत्सलताके समुद्र, १०८. ब्रजकोलाहलकरः=
अपनी बालोचित क्रीडाओंसे त्रजमें कोलाहल
मचा देनेवाले, १०९. व्रजानन्दविवर्धनः=त्रजवासियेकि
आनन्दको वृद्धि करनेवाले ।
९९०. गोपात्मा=गोपस्वरूप, ११९. प्रेरकः =
इद्िय, मन, बुद्धि आदिको प्रेरणा देनेवाले, १९२.
साक्षी=अनन्त विश्वके सम्पूर्णं पदार्थो ओर भावोके
दरष्टा, १९३. वृन्दावननिवासकृत्-वृन्दावनमे निवास
करनेवाले, ११४. वत्सपालः=बछूडोंको पालनेवाले,
९९१५. वत्सपतिः=बछडोके स्वामी एवं रक्षक,
९१६. गोपदारकमण्डनः=गोपबालकोको मण्डलीको
सुशोभित करनेवाले ।
९११७. बालक्रीडः=बालोचित खेल खलने-
वाले, ११८. बालरतिः=गोपबालकोसे प्रेम करने-
वाले, ११९. बालकः=वालरूपधारी गोपाल,
१२०. कनकाङ्गदी सोनेका बाजूवंद पहननेवाले,
९१२९. पीताम्बरः = पीताम्बर पहननेवाले, १२२. हेममाली
सुवर्णमालाधारी, १२३. मणिमुक्ताविभूषणः=मणियों
ओर मोति्योके आभूषण धारण करनेवाले ।
१२४. किद्भिणीकटकी=करिमें क्षुद्र घण्टिका
ओर हा्थोमें कड पहननेवाले, १२५. सूत्री
बाल्यावस्थामें सूतक करधनी ओर बड़ होनेपर
यज्ञोपवीत धारण करनेवाले; १२६. नृपुरी=पैरोमे
नूपुर पहननेवाले, १२७. मुद्िकान्वितः =हाथकीं
अगुलियोमे अंगूठी धारण करनेवाले, १२८. वत्सासुर-
प्रतिध्वंसी= वत्सासुरका विनाश करनेवाले,
१२९. वकासुरविनाशनः=वकासुरका विनाश करनेवाले ।
१३०. अघासुरविनाशी अघासुर नामक
सर्परूपधारी रैत्यका विनाश करनेवाले,
१३९. विनिद्रीकृतबालकः सर्पके विषमे मूर्च्छितं
गोपव्रालकोको अपनी अमृतमयी दृष्टये जीवित
((-0. 1/८111104/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
४८६
संक्षिप्त नारदपुराण
वत्सवपुर्धरः=ग्वालवालों ओर बछृडोंका रूप धारण
करनेवाले, १५७. ब्रह्माण्डकोटिजनकः= करोड़ों
ब्रह्याण्डोके उत्पादक, ९५८. ब्रह्ममोहविनाशकः =
ब्रह्माजीके मोहका नाश करनेवाले ।
९५९. ब्रह्मा स्वयं ही ब्रह्माजीके रूपमे प्रकट,
९६०. ब्रहयडित्ः=ब्रह्याजीके द्वारा स्तुत, ९६९. स्वामी
सवके अधिपति, १६२. शक्रदर्पादिनाशनः= इन्द्रके
घमंड आदिको नष्ट करनेवाले, ९६३. गिरिपूजोपदेष्टा=
गोवर्धन पर्वतको पूजाका उपदेश देनेवाले,
९६४. धृतगोवर्धनाचलः= गोवर्धन पर्वतको धारण
करनेवाले ।
१६५. पुरन्दरेडितः =इन्द्रके द्वारा स्तुत,
१६६. पूज्यःसव्के लिये पूजनीय,
९६७. कामधेनुप्रपूजितः =कामधेनुद्रारा पूजित, १६८.
सर्वतीर्थाभिषिक्तः=सुरभिद्रारा सम्पूर्ण तीथेकि जलसे
इन्द्रपदपर अभिषिक्त, १६९. गोविन्दः गो ओके इन्द्र
होनेपर गोविन्द नामसे प्रसिद्ध, १७०. गोपरक्षकः=
गोपोको रक्षा करनेवाले।
१७९. कालियार्तिकैरः= कालिय नागका दमन
करनेवाले, ९७२. क्रूरः =दुष्टोको दण्ड देनेके लिये
कठोर, १७३. नागपलीरितः=नागपत्ियोद्वारा स्तुत,
१७४. विराट्=विरार् पुरुप, १७५. धेनुकारिः =
धेनुकासुरके शत्रु, ९७६. प्रलम्बारिः =वलभद्ररूपसे
प्रलम्ब नामक असुरका नाश करनेवाले,
९७७. वृषासुरविमर्दनः=वृपभरूपधारी अरिष्टासुरका
मर्दन करनेवाले ।
९७८. मयासरुरात्मजध्वंसी-मयासुरके पुत्र
व्योमासुर्का नाश करनेवाले. १७९. केशिकण्टविदारकः=
केशोका कण्ठ विदीर्ण करनेवाले, १८०. गोपगोपा=
ग्वालेके रक्षक, ९८९. दावाग्निपरिशोषकः =दावानलका
शोषण करनेवाले ।
१८२. गोपकन्यावस्त्रहारी- गोपकुमारियोके चीर
हरण कसनेवाल्. १८३. गोपकन्यावसप्रदः=गोपकन्याओंको
वर देनेवाले, १८४. यज्ञपल्यन्नभोजी= यज्ञपत्ियोके
अन्न भोजन करनेवाले, १८५. मुनिमानापहारकः =
अपनेको मुनि माननेवाले ब्राह्मणोके अभिमानको
दूर करनेवाले ।
९८६. जलेशमानमथनः=जलके स्वामी वरुणका
मान मर्दन करनेवाले, १८७. नन्दगोपालजीवनः =
अजगरसे दुडाकर नन्दगोपको जीवन देनेवाले,
९८८. गन्धर्वशापमोक्ता=अजगररूपमे आये हुए
गन्धर्वं (विद्याधर)-को शापसे दछुडानेवाले,
१८९. शङ्कचूडशिरोहरः= शङ्क चूड नामक गुह्यकका
मस्तक काट लेनेवाले।
९१९०. वंशीवटी=वंशीवटके समीप लीला
करनेवाले, १९९१. वेणुवादी= वंशी बजानेवाले,
१९२. गोपीचिन्तापहारकः गोपियोंकौ चिन्ताको
दूर करनेवाले, १९३. सर्वगोप्ता=सवके रक्षक,
१९४. समाह्वानः=सवके द्वारा पुकारे जानेवाले,
१९५. सर्वगोपीमनोरथः सम्पूर्ण गोपाद्धनाअकि अभीष्ट।
९१९६. व्यङ्ग्यधर्मप्रवक्ता=व्यङ्ग्योक्तिद्वारा धर्मका
उपदेश देनेवाले, १९७. गोपीमण्डलमोहनः =
गोपसुन्दरियोके समुदायको मोहित करनेवाले,
९१९८. रासक्रीडारसास्वादी=रासक्रीडाके रसका
आस्वादन करनेवाले, १९९. रसिकः=रसका अनुभव
करनेवाले, २००. राधिकाधवः=श्रीराधाके प्राणनाथ ।
२०१. किशोरीप्राणनाथः=श्रीकिशोरीजीके
प्राणवह्भ, २०२. वृषभानुसुताप्रियः = वृषभानु-
नन्दिनीके प्यारे, २०३. सर्वगोपीजनानन्दी सम्पूर्ण
गोपीजनोंको आनन्द देनेवाले, २०४. गोपीजन-
विमोहनः=गोपाङ्गनाओंके मनको मोह लेनेवाले।
२०५. गोपिकागीतचरितः=गोपाद्गनाओद्वारा गाये
हुए पावन चरित्रवाले, २०६. गोपीनर्तनलालसः=
गोपियोके रासनृत्यकी अभिलाषा रखनेवाले,
२०७. गोपीस्कन्धाश्रितकरः=गोपीके कंधेपर हाथ
रखकर चलनेवाले, २०८. गोपिकाचुम्बनप्रियः=
((-0. 1/८11114<511॥ 81188 \/81811851 (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
यशोदा आदि मातृस्थानीया वात्सल्यवती गोपियोके
द्वारा किया जानेवाला मुखचुम्बन जिन्हे प्रिय है
श्यामसुन्दर ।
२०९.
अपने अञ्चलसे जिनका मुख पोती हैँ वे,
२९०. गोपीव्यजनवीजितः=गोपियों जिन्हें
पंखा इलाकर आराम पहंचाती ह वे,
२९९. गोपिकाकेशसंस्कारी=गोपिकाके केशोंको
संवारनेवाले, २९२. गोपिकापुष्यसंस्तरः=गोपिकाका
फूलोसे शृद्खार करनेवाले ।
२९३. गोपिकाहदयालम्बी=गोपीके हदयका
आश्रय ` लेनेवाले, २९४. गोपीवहनतत्परः गोपी
(श्रीराधा)-को कंधेपर बिठाकर ढोनेके लिये प्रस्तुत,
२९९५. गोपिकामदहारी गोपाङ्कनाओंके अभिमानको
चर्ण करेवाले २९६. गोपिकापरमार्जितः गोपाद्गनाओंको
परम फलके रूपमे प्राप्त।
२९७. गोपिकाकृतसह्मलः=रासलीलामें अन्तर्धान
हो जानेपर गोपिकाओंने जिनको पवित्र
लीलाओंका अनुकरण किया था वे श्रीकृष्ण,
२१८. गोपिकासंस्मृतप्रियः= गोपिकाओद्रारा
निरन्तर चिन्तन किये जानेवाले प्रियतम,
२१९. गोपिकावन्दितपदः=गोपाद्भनाओंद्रारा वन्दित
चरणोवाले, २२०. गोपिकावशवर्तनः गोपसुन्दरियोके
वशमें रहनेवाले।
२२९१. राधापराजितः~श्रीराधारानीसे हार
मान लेनेवाले, २२२. श्रीमान्-शोभाशाली,
२२३. निकुञ्ेसुविहारवान्~वृन्दावनके कुञ्जमें सुन्दर
लीला करनेवाले, २२४. कुङ्प्रियः=निकुञ्जके
प्रेमी, २२५. कुञ्जवासी कुञ्जमें निवास करनेवाले,
२२६. वृन्दावनविकाशनः~वृन्दावनको प्रकाशित
करनेवाले ।
२२७. यमुनाजलसिक्ताद्गः=यमुनाजीके जलसे
अभिषिक्त अद्गोवाले, २२८. यमुनासौख्यदायकः=
यमुनाजीको सुख देनेवाले, २२९. शशिसंस्तम्भनः=
गोपिकामार्जितमुखः= गोपाङ्गना
2८७
रासलीलाकी रात्रिमें चन्द्रमाकी गतिको रोक देनेवाले,
२३०. शूरः=अखण्ड शोर्यसम्पन्न, २३१. कामी
प्रेमी भक्तोसे मिलनेकी कामनावाले,
२३२. कामविमोहनः = अपनी दिव्य लीलाओंसे
कामदेवको विमोहित कर देनेवाले।
२३३. कामाद्यः=कामदेवके आदिकारण,
२३४. कामनाथः=-कामके स्वामी, २३५.
काममानसभेदनः=कामदेवके भी हदयका भेदन
करनेवाले, २३६. कामदः=इच्छानुरूप भोग देनेवाले,
२३७. कामरूपः = भक्तजनोकी कामनाके अनुरूप
रूप धारण करनेवाले, २३८. कामिनीकामसंचयः
गोपकामिनियोके प्रेमका संग्रह करनेवाले ।
२३९. नित्यक्रीडः=नित्य खेल करनेवाले,
२४०. महालीलः=महती लीला करनेवाले,
२४९. सर्वः= स्वस्वरूप, २४२. सर्वगतः = सर्वत्र व्यापक,
२४३. परमात्मा=पख्रहमस्वरूप, २४४. पराधीशः=परमेश्वर्
२४५. सर्वकारणकारणः=समस्त कारणक भी कारण।
२४६. गृहीतनारदवचाः =नारदजीके वचन
माननेवाले, २४७. अक्रूरपरिचिन्तितः=व्रजमें
जाते हए अक्रूरजीके द्वारा मार्गमे जिनका
विशेषरूपसे चिन्तन किया गया, वे श्रीकृष्ण,
२४८. अक्रूरवन्दितपदः = अक्रूरजीके द्वारा वन्दित
चरणोवाले, २४९. गोपिकातोषकारकः भावी विरहसे
व्याकुल हई गोपाङ्कनाओंको सान्त्वना देनेवाले ।
२५०. अक्रूरवाक्यसंग्राही = अक्रूरजीके वचनोको
स्वीकार करनेवाले, २५९. मधुरावासकारणः~ मधुरां
निवास करनेवाले, २५२. अक्रूरतापषटमनः=
अक्रूरजीका दुःख दूर करनेवाले, २५३. रजकायुः-
प्रणाशनः=कसके धोवीको आयुको नष्ट करनेवाले ।
२५४. मथुरानन्ददायी=मधुरावासियोको आनन्द
देनेवाले, २५५. कंसवस्त्रविलुण्टनः=कंसके कपद्धंको
लूट लतनेवाले, २५६. कंसवस््रपरीधानः=कंसके
वस्त्र॒पहननेवाले, २५७. गोपवस्त्रप्रदायकः ~
ग्वालवालोको वस्त्र देनेवाले ।
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 81188 8181185 (01661010. 01411260 0 66810011
४८८
संक्षिप्त नारदपुराण
२५८. सुदामगृहगामी सुदामा मालीके घर
जानेवाले, २५९. सुदामपरिपूजितः = सुदामा मालीके
द्वारा पूजित, २६०. तन्तुवायकसम्प्रीतः = दर्जकि
ऊपर प्रसन्न, २६१. कुल्जाचन्दनलेपनः=कुन्जाके
धिसे हए चन्दनको अपने श्रीअङ्खोमें लगानेवाले।
२६२. कुल्जारूपप्रदः=कुन्जाको सुन्दर रूप
देनेवाले, २६३. विचः विशिष्ट सानवान्. २६४. मुकुन्दः
मोक्ष देनेवाले, २६९५. विष्टरश्रवाः = विस्तृत सुयश
एवं कानोवाले, २६६. सर्वज्ञः=सब कुछ जाननेवाले,
२६७. मथुरालोको= मथुरानगरीका दर्शन करनेवाले,
२६८. सर्वलोकाभिनन्दनः=सब लोगोसे अभिनन्दन
(सम्मान) पानेवाले।
२६९. कृपाकटाक्षदर्शी=कृपापूर्णं कटाक्षसे
सबको ओर देखनेवाले, २७०. दैत्यारिः =
देत्योके शत्रु, २७९१. देवपालकः=देवताओंके रक्षक,
२७२. सर्वदुःखप्रशणमनः=सबके सम्पूर्णं दुःखोंका
नाश करनेवाले, २७३. धनुर्भङ्गी= धनुष तोडनेवाले,
२७४. महोत्सवः=महान् उत्सवरूप।
२७५. कुवलयापीडहन्ता=कुवलयापीड नामक
हाथीका वध करनेवाले, २७६. दन्तस्कन्धः =हाथीके
तोड़े हुए दोतोंको कंधेपर धारण करनेवाले, २७७.
बलाग्रणी=बलरामजीको आगे करके चलनेवाले,
२७८. कल्परूपधरः = विभिन्न लोगोके लिये उनकी
भावनाके अनुसार रूप धारण करनेवाले, २७९. धीर=
अविचल धेर्यसे सम्पन्न, २८०. दिव्यवस्त्रानुलेपनः=
दिव्य वस्त्र तथा दिव्य अद्घराग धारण करनेवाले ।
२८१. मल्छरूपः =कसके अखादमें पहलवानके
रूपमे उपस्थित, २८२. महाकालः=महान् कालरूप,
२८३. कामरूपी इच्छानुसार रूप धारण
करनेवाले, २८४. बलान्वितः= अनन्त बलसम्पन्न,
२८५. कंसत्रासकरः =कसको भयभीत कर देनेवाले,
२८६. भीमः=कंसके लिये भयंकर, २८७. मुष्टिकानतः=
बलभद्ररूपसे मुष्टिकके जीवनका अन्त कर देनेवाले,
२८८. कंसहा-कंसका वध करनेवाले ।
२८९. चाणूरघ्नः=चाणूरका नाश करनेवाले,
२९०. भयहरः= भय हर लेनेवाले, २९९. शलारि;=
शलके शत्रु, २९२. तोशलान्तकः=तोशलका
अन्त करनेवाले, २९३. वैकुण्ठवासी विष्णुरूपसे
वैकुण्ठधाममें निवास करनेवाले, २९४. कंसारिः
कंसके शत्रु, २९५. सर्वदुष्टनिषूदनः=सवब दुष्टोका
संहार करनेवाले ।
२९६. देवदुन्दुभिनिर्घोषी =देव-दुन्दुभिघोषके
कारण, २९७. पितुशोक्रनिवारणः=पिता-माता (वसुदेव-
देवको )-का शोक दूर करनेवाले, २९८. यादवेन््रः=
यदुकुलके स्वामी, २९९. सतां नाथः=सत्पुरुषोके
रक्षक, ३००. यादवारिप्रमर्दनः=यादवोके शत्रुओंका
मर्दन करनेवाले।
३०९. शौरिशोकविनाशी वसुदेवजीके शोकका
नाश करनेवाले, ३०२. देवकीतापनाशनः=देवकीका
संताप नष्ट करनेवाले, ३०३. उग्रसेनपरित्राता
उग्रसेनके रक्षक, ३०४. उग्रसेनाभिपूजितः =उग्रसेनद्रार
पूजित।
३०५. उग्रसेनाभिषेकी उग्रसेनका राज्याभिषेक
करनेवाले, ३०६. उग्रसेनदयापरः=उग्रसेनके प्रति
दयाभाव बनाये रखनेवाले, ३०७. सर्वसात्वतसाक्षी
सम्पूर्ण यदुवंशियोंकौ देख-भाल करनेवाले,
३०८. यदूनामभिनन्दनः = यदुवंशियोको आनन्दित
करनेवाले ।
३०९. सर्वमाथुरसंसेव्यः= सम्पूर्ण मथुरावासिरयोद्राय
सेवन करने योग्य, ३९१०. करुणः=दयालु,
३९१. भक्तबान्धवः =भक्तोके भाई-वन्धु,
३१२. सर्वगोपालधनदः= सम्पूर्ण ग्वालोको धन
देनेवाले, ३९३. गोपीगोपाललालसः=गोपियों ओर
ग्वालोसे मिलनेके लिये उत्सुक रहनेवाले।
३१४. शौरिदत्तोपवीती=वसुदेवजीके द्वारा
उपनयन-संस्कारमें दिये हए यज्ञोपवीतको धारण
करनेवाले, ३१५. उग्रसेनदयाकरः =उग्रसेनपर दया
करनेवाले, ३१६. गुरुभक्ताः=गुरु सान्दीपनिके
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
2८९
न~---(-(----------- ~~~
प्रति भक्तिभावसे युक्त, ३९७.
रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले, ३१८. निगमाध्ययने
रतः=वेदाध्ययनपरायण।
३१९. संकर्षणसहाध्यायी-बलरामजीके सहपादी,
३२०. सुदामसुहत्= सुदामा ब्राह्मणके सखा,
३२९. विद्यानिधिः=विद्याके भण्डार ३२२. कलाकोषः=
सम्पूर्ण कलाओंके कोषागार, ३२३. मृतयपुत्रप्रदः=
मरे हए गुरुपुत्रंको यमलोकसे जीवित लाकर
गुरुको सेवामें अर्पित करनेवाले।
३२४. चक्री सुदर्शन चक्रधारी, ३२५. पाञ्चजनी-
पाञ्चजन्य श्भुः धारण करनेवाले, ३२६. सर्वनारकि-
मोचनः सम्पूर्ण नरकवासि्योका उद्धार करने-
वाले, ३२७. यमार्चितः यमराजद्वारा पूजित, ३२८.
परः= सर्वोत्कृष्ट, ३२९. देवः=द्युतिमान्,३३०.
नामोच्यारवशः=अपने नामके उच्चारणमात्रसे वशमें
हो जानेवाले, ३३९. अच्युतः =अपनी महिमासे
कभी च्युत न होनेवाले।
३३२. करुल्जाविलासी=कुव्जाके कुबडेपनको
मिटानेको लीला करनेवाले, ३३२. सुभगः पूर्ण
सौभाग्यशाली, ३२३४. दीनबन्धुः=दीन-दुःखियों ओर
असहायोके बन्धु, ३३५. अनूपमः=जिनके समान
दूसरा कोई नही, ३३६. अक्रूरगृहगोपाः = अक्रूरके
गृहकी रक्षा करनेवाले, ३३५७. प्रतिञ्चापालकः= प्रतिज्ञाका
पालन करनेवाले, ३३८. शुभः शुभस्वरूप।
३३९. जरासन्थजयी=सत्रह वार जरासन्धको
जीतनेवाले, ३४०. विद्वान् सर्वज्ञ, ३४१. यवनान्तः=
कालयवनका अन्त करनेवाले, ३४२. द्विजाश्रयः =
द्विजेकि आश्रय, ३४३. मुचुकुन्दप्रियकरः=मुचुकुन्दका
प्रिय करनेवाले, ३४४. जरासन्धपलायितः= अटारहवीं
बारके युद्धमें जरासन्धके सामनेसे युद्ध छोडकर
भाग जानेवाले।
३४५. द्रारकाजनकः~द्रारकापुरीको प्रकर करनेवाले,
३४६. गृढः=मानवरूपमें छिपे हुए परमात्मा,
३४७. ब्रह्मण्यः = ब्राह्मणभक्त, ३४८. सत्यसंगरः =
सत्यप्रतिज्ञ, ३४९. लीलाधरः=लीलाधारी,
३५०. प्रियकरः=सवका प्रिय करनेवाले,
३५१. विश्चकर्मा=वहुत प्रकारके कर्म करनेवाले,
३५२. यशप्रदः=दूसरोंको यश देनेवाले ।
३५३. रुक्मिणीप्रियसंदेशः=रुकव्मिणीको प्रिय
संदेश देनेवाले, ३५४. रुकिमिशोकविवर्धनः=रुक्मीका
शोक बदढ़ानेवाले, ३५५. चेद्यशोकालयः=शिशुपालके
लिये शोकके भण्डार, ३५६. श्रेष्ठः =उत्तम गुणसम्पन्न,
३५७. दुष्टराजन्यनाशनः न्दु राजाओंका नाश
करनेवाले।
३५८. रुक्मिवैरूप्यकरणः = रुक्मीके आधे
वाल मुडाकर उसे कुरूप बना देनेवाले, ३५९.
रुक्मिणीवचने रतः=रुक्मिणीके वचनका पालनं
करनेमं तत्पर, ३६०. बलभद्रवचोग्राही वलभद्रजीकी
आज्ञा माननेवाले, २६१. मुक्तरुक्मी=र्क्मीको जीवित
छोड देनेवाले, ३६२. जनार्दनः भक्तोद्रारा याचित ।
३६३. रुक्मिणीप्राणनाथः=रुव्मिणीके प्राणवद्यभ,
३६४. सत्यभामापतिः=सत्यभामके स्वामी,
३६५. स्वयं भक्तपक्षी स्वयं ही भक्तोका पक्ष
लेनेवाले, ३६६. भक्तिवश्यः= भक्तिसे वशम हो
जानेवाले, ३६७. अक्रूरमणिदायकः=अक्रूरजीको
स्यमन्तकमणि देनेवाले ।
३६८. शतधन्वप्राणहारी=शतधन्वाके प्राण लेनेवाले
३६९. ऋक्षराजसुताप्रियः = रके राजा जाम्बवानूकीं
पुत्रीके प्रियतम पति, ३७०. सत्राजित्तनयाकान्तः=
सत्राजित्को सुपुत्री सत्यभामाके प्राणवल्यभ,
३७९१. मित्रविन्दापहारकः=मित्रविन्दाका अपहरण
करनेवाले ।
३७२. सत्यापतिः=नग्रजित्कौ पुत्री सत्यक
स्वामी, ३७३. लक्ष्मणाजित्-स्वयंवग्मे लक्ष्मणाको
जीतनेवाले, ३७४. पुन्यः =पुजाके योग्य,
३७५. भद्राप्रियद्भरः= भद्राका प्रिय करनेवाले,
(-0. 1\/॥(111104/5511॥1 21188 \/8181/185। (0166101. 01411260 0 66810011
६९०
३७६. नरकासुरघाती =नरकासुरका वध करनेवाले,
३७७. लीलाकन्याहरः=लीलापूर्वक षोडश सहस्र
कन्याओंको नरकासुरकी केदसे छुड़ाकर अपने
साथ ले जानेवाले, ३७८. जयी=विजयशील ।
३७९. मुरारिः = मुर देत्यका नाश करनेवाले,
३८०. मदनेशः=कामदेवपर भी शासन करनेवाले,
३८१. धरित्रीदुःरनाशनः=धरतीका दुःख दूर
करनेवाले, ३८२. वैनतेयी=गरुडके स्वामी,
३८३. स्वर्गगामी = पारिजातके लिये स्वर्गलोककौ
यात्रा करनेवाले, ३८४. अदित्याः कुण्डलप्रदः
अदितिको कुण्डल देनेवाले।
३८५. इन्द्रा्यितः =इन्द्रके द्वारा पूजित,
३८६. रमाव्कान्तः=लक्ष्मीके प्रियतम,
३८७. वच्रिभार्याप्रिपूजितः=इन्द्रपत्री शचीके द्वारा
पूजित, ३८८. पारिजातापहारी = पारिजात वृक्षका
अपहरण करनेवाले, ३८९. शक्रमानापहारकः =इन्द्रका
अभिमान चूर्णं करनेवाले ।
३९०. प्रद्युप्रजनकः~प्रद्युप्रके पिता,
३९१. साम्बतातः= साम्बके पिता, ३९२. बहुसुतः=
अधिक पुत्रोवाले, ३९३. विधुः=विष्णुस्वरूप,
३९४. गर्गाचार्यः = गर्गमुनिको आचार्य बनानेवाले,
३९५. सत्यगतिः = सत्यसे ही प्राप्त होनेवाले,
३९६. धर्माधारः = धर्मके आश्रय, ३९७. धराधरः =
पृथ्वीको धारण करनेवाले ।
३९८. द्वारकामण्डनः नद्वारकाको सुशोभित
करनेवाले, ३९९. श्लोक्यः=यशोगानके योग्य,
४००, सुश्लोकः= उत्तम यशवाले, ४०९१. निगमालयः =
वेदोके आश्रय, ४०२. पौण्ड्कप्राणहारी~मिथ्या
वासुदेवनामधारी पौण्डकके प्राण लेनेवाले,
४०३. काशिराजशिरोहरः=काशिराजका सिर
काटनेवाले।
०४. अवेष्णवविप्रदाही= अवैष्णव ब्राह्यणोको,
जो यदुवंशियोके प्रति मारणका प्रयोग कर रहे
थे, दग्ध करनेवाले, ४०५. सुदक्षिणभयावहः=
संक्षिप्त नारदपुराण
काशिराजके पुत्र सुदक्षषिणको भय देनेवाले,
४०६. जरासन्धविदारी= भीमसेनके द्वारा जरासन्धको
चीर डालनेवाले, ४०७. धर्मनन्दनयज्ञकृत्-धर्मपुत्र
युधिष्ठिरका यज्ञ पूर्ण करनेवाले ।
४०८. शिशुपालशिरश्छेदी-शिशुपालका सिर
काटनेवाले, ४०९. दन्तवक्त्रविनाशनः =दन्तवक्त्रका
नाश करनेवाले, ४९१०. विदूरथान्तकः=विदूरथके
काल, ४९९. श्रीशः=लक्ष्मीके स्वामी, ४९२. श्रीदः=
सम्पत्ति देनेवाले, ४९३. द्विविदनाशनः=बलभद्ररूपसे
द्विविद वानरका नाश करनेवाले।
४९४. रक््मिणीमानहारी= रुक्मिणीका अभिमान
दूर करनेवाले, ४१५. रुक्मिणीमानवर्धनः=रुक्मिणीका
सम्मान बटढानेवाले, ४९६. देवर्षिशापहर्तानदेवर्षि
नारदका शाप दूर करनेवाले, ४९७. द्रौपदीवाक्य-
पालकःनद्रौपदीके वचनोका पालन करनेवाले।
४१८. दुर्वासोभयहारीन्दुर्वासाका भय दूर
करनेवाले, ४१९. पाञ्चालीस्मरणागतः =द्रौपदीके
स्मरण करते ही आ परहुचनेवाले, ४२०. पार्थदूतः=
कुन्तीपुत्रोके दूत, ४२९. पार्थमन्त्री-कुन्तीपुत्रोके
मन्त्री (सलाहकार), ४२२. पार्थदुःखोघनाशनः
कुन्तीपुत्रोके दुःखसमुदायका नाश करनेवाले।
४२३. पार्थमानापहारी=कुन्तीपुत्रोका अभिमान
दूर करनेवाले, ४२४. पार्थजीवनदायकः=कुन्तीपुत्रोको
जीवन देनेवाले, ४२५. पाञ्चालीवस्त्रदाता-कौरवोको
सभामें द्रोपदीको वस्त्रराशि अर्पण करनेवाले,
४२६. विश्चपालकपालकःन=विश्वकी रक्षा करनेवाले
देवताओंके भी रक्षक।
४२७. श्चेताश्चसारथिः = श्रेत घोडोंवाले अर्जुनके
सारथि, ४२८. सत्यः= सत्यस्वरूप, ४२९. सत्यसाध्यः=
सत्यसे ही प्राप्त होने योग्य, ४३०. भयापहः
भक्तोके भयका नाश करनेवाले, ४३९. सत्यसन्धः
सत्यप्रतिनज्ञ, ४३२. सत्यरतिः=सत्यमे रत,
४३३. सत्यप्रियः =सत्य जिनको प्यारा है,
४३४. उदारधीः=उदार बुद्धिवाले।
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/81811851 (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
४३५. महासेनजयी =शोणितपुरमें बाणासुरके
पक्षम युद्धके लिये आये हुए स्वामिकार्तिकेयको
भो परास्त करनेवाले, ४३६. शिवसैन्यविनाशनः
भगवान् शिवको सेनाको मार भगानेवाले,
४३७. बाणासुरभुजच्छेत्ता=वाणासुरको भुजाओंको
कारनेवाले, ४३८. बाणबाहुवरप्रदः=बाणासुरको
चार भुजाओंसे युक्त रहनेका वर देनेवाले।
४३९. तार्््यमानापहारीगरुडका अभिमान चूर्ण
करनेवाले, ४४०. ता््यतेजोविवर्धनः=गरुडके तेजको
बटानेवाले, ४४९. रामस्वरूपधारी-श्रीरामका स्वरूप
धारण करनेवाले, ४४२. सत्यभामामुदावहः =
सत्यभामाको आनन्द देनेवाले ।
४४३. रत्राकरजलक्रीडः=समुद्रके जलम क्रीडा
करनेवाले, ४४४. त्रजलीलाप्रदर्शकः=अधिकारी
भक्तोको त्रजलीलाका दर्शन करनेवाले, ४४५. स्वप्रतिञ्ञा-
परिध्वंसी भीष्मजीकी प्रतिज्ञा रखनेके लिये अपनी
प्रतिज्ञा तोड़ देनेवाले, ४४६. भीष्माज्ञापरिपालकः=
भीष्मको आज्ञाका पालन करनेवाले ।
४४७. वीरायुधहरः =वीरोके अस्त्र-शस्त्र हर
लेनेवाले, ४४८. कालः=कालस्वरूप, ४४९. कालि-
केशःन्कालिकके स्वामी, ४५०. महावलः=
महाशक्तिसम्पन्न, ४५९१. बर्बरीकशिरोहारी-=वर्बरीकका
सिर काटनेवाले, ४५२. वर्बरीकशिरप्रदः=वर्वरीकका
सिर देनेवाले ।
४५३. धर्मपुत्रजयी धर्मपुत्र युधिष्ठिरको जय
दिलानेवाले, ४५४. शुरदुर्योधनमदान्तकः =
शूरवीर दुर्योधनके मदका नाश करनेवाले,
४५५. गोपिकाप्रीतिनिर्वन्धनित्यक्रीडः= गोपाद्गनाअकि
प्रमपूर्ण आग्रहसे वृन्दावनमें नित्य लीला करनेवाले,
४५६. व्रजेश्वरः =व्रजके स्वामी ।
४५७. राधाकुण्डरतिः= राधाकुण्डमे खेल
करनेवाले, ४५८. धन्यः=धन्यवादके योग्य,
४५९. सदान्दोलसमाश्रितः-सदा चूलेपर लनेवाले,
४६०. सदामधुवनानन्दी-सदा मधुवनमें आनन्द
कृतावासः =नन्दगोवमें
४९९१
लेनेवाले, ४६१. सदावृन्दावनप्रियः= वृन्दावनके
शाश्चत प्रेमी ।
४६२. अशोकवनसत्रद्धः= अशोकवनमें लीलके
लिये सदा प्रस्तुत, ४६३. सदातिलकसङ्खतः=
सदेव तिलक लगनेवाले, ४६४. सदागोवर्धनरतिः=
गिरिराज गोवर्धनपर सदा क्रीडा करनेवाले,
४६५. सदागोकुलवल्लभः=सदैव गोकुल ग्राम एवं
गो-समुदायके प्रिय।
४६६. भाण्डीरवटसंवासी= भाण्डीर वटके नीचे
निवास करनेवाले, ४६७. नित्यं वंशीवटस्थितः =
वंशीवटपर सदा स्थित रहनेवाले, ४६८. नन्दग्राम-
निवास करनेवाले,
४६९. वृषभानुगृहप्रियः =वृषभानुजीके गृहको प्रिय
माननेवाले।
४७०. गृहीतकामिनीरूपः=मोहिनीका रूप
धारण करनेवाले, ४७१. नित्यं रासविलासकृत्-नित्य
रासलीला करनेवाले, ४७२. वह्छवीजनसंगोप्ता=
गोपाद्खनाओंके रक्षक, ४७३. वह्वीजनवल्यभः =
गोपीजनोंके प्रियतम ।
४७४. देवशर्मकृपाकर्ता~देवशर्मापर कृपा
करनेवाले, ४७५. कल्पपादपसंस्थितः=कल्पवृक्षके
नीचे रहनेवाले, ४७६. शिलानुगन्धनिलयः-शिलामय
सुगन्धित भवनमें निवास करनेवाले, ४७. पादचारी
पैदल चलनेवाले, ४७८. घनच्छविः=मेघके समान
श्यामकान्तिवाले।
४७९. अतसीकुसुमप्रख्यः = तीसीके फूलके-से
वर्णवाले, ४८०. सदा लक्ष्मीकृपाकरः= लक्ष्मीजीपर
सदा कृपा करनेवाले, ४८९१. त्रिपुरागिप्रियकरः=
महादेवजीका प्रिय करनेवाले, ४८२. उग्रधन्वा=भयट्कर
धनुपवाले, ४८३. अपराजितः=किसीसे भी परास्त
न होनेवाले।
४८४. षड्धुरघ्वंसकर्ता-पद्धुरका नाश करनेवाले,
४८५. निकुम्भप्राणहारकः= निकुम्भके प्रा्णोकी
हरनेवाले, ४८६. वज्रनाभपुरध्वंसी वञ्रनाभपुरका
((-0. 1/(1111(4/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 86810011
४९२
संक्षिप्त नारदपुराण
ध्वंस करनेवाले, ४८७. पौण्ड़कप्राणहारकः=
पौण्ड्कके प्राणोंका अन्त करनेवाले ।
४८८. बहुलाश्चप्रीतिकर्ता=मिथिलाके राजा
बहुलाश्चपर प्रेम करनेवाले, ४८९. द्विजवर्यप्रिय्करः =
ष्ठ ब्राह्यण भक्तशिरोमणि श्रुतदेवका प्रिय करनेवाले,
४९०. शिवसंकटहारी भगवान् शिवका संकट
टालनेवाले, ४९१. वृकासुरविनाशनः वृकासुरका
नाश करनेवाले।
४९२. भृगुसत्कारकारी=भृगुजीका सत्कार
करनेवाले, ४९३. शिवसात््विकताप्रदः= भगवान्
शिवको सात्विकता देनेवाले, ४९४. गोकर्णपूजकः=
गोकर्णकी पूजा करनेवाले, ४९५. साम्बकुष्टविध्वंस-
कारणः=साम्बको कोढका नाश करनेवाले।
४९६. वेदस्तुतःन्वेदोके द्वारा स्तुत,
४९७. वेदवेत्ताः=वेदस्ञ, ४९८. यदुवंशाववर्धनः=
यदुकुलको बढानेवाले, ४९९. यदुवंशविनाशी-
यदुकुलका संहार करनेवाले, ५००. उद्दधवोद्धाख्कास्कः=
उद्धवका उद्धार करनेवाले ।
५०१. राधा~श्रीकृष्णकी आराध्या देवी, उन्हीकी
आह्वादिनी शक्ति, ५०२. राधिका-~श्रीकृष्णकी
आराधना करनेवाली वृषभानुपुत्री, ५०३. आनन्दा
आनन्दस्वरूपा, ५०४. वृषभानुजा=वृषभानुगोपकी
कन्या, ५०५. वृन्दावनेश्वरी-वृन्दावनको स्वामिनी,
५०६. पुण्यापुण्यमयी, ५०७. कृष्णमानसहारिणी=
श्रीकृष्णका चित्त चुरानेवाली ।
५०८. प्रगल्भा-~प्रतिभा, साहस, निर्भयता ओर
उदार बुद्धिसे सम्पन्न, ५०९. चतुरा-चतुराईसे
युक्त, ५९०. कामा- प्रमस्वरूपा, ५१९. कामिनी=
एकमात्र श्रीकृष्णको चाहनेवाली, ५१२. हरिमोहिनी-
श्रीकृष्णको मोहित करनेवाली, ५१३. ललिता=
मनोहर सौन्दर्यसे सुशोभित, ५९४. मधुरा
माधुर्यभावसे युक्त, ५९५. माध्वी=मधुमयी,
५९६. किशोरी =नित्यकिशोरावस्थासे युक्त,
५९७. कनकप्रभाः = सुवर्णके समान कान्तिवाली ।
५९१८. जितचन्द्रा=मुखके सौन्दर्यसे चन्द्रमाको
भी परास्त करनेवाली, ५९९. जितमृगा=चञ्चल
चकित नेत्रोकी शोभासे मृगको भी मात करनेवाली,
५२०. जितसिंहा सूक्ष्म करटि-भागकौ कमनीयतासे
मृगराज सिंहके भी मदको चूर्णं करनेवाली,
५२९. जितद्विपा=मन्द-मन्द गतिसे गजेन्द्रका भी
गर्वं खर्वं करनेवाली, ५२२. जितरम्भा-ऊरुओंकी
लिग्धतासे कदलीको भी तिरस्कृत करनेवाली,
५२३. जितपिका-अपने मधुर कण्टस्वरसे कोयलको
भी तिरस्कृत करनेवाली, ५२४. गोविन्दहदयोद्धवा-
श्रीकृष्णके हदयसे प्रकट हुई ।
५२५. जितविम्बा=-अपने अधरको अरुणिमासे
विम्बफलको भी तिरस्कृत कसेवाली, ५२६. जितशुका=
नुकोली नासिकाकी शोभासे तोतेको भी लजा देनेवाली,
५२७. जितपद्या=अपने अनिर्वचनीय रूप-लावण्यसे
लक्ष्मीको भी लच्ित करनेवाली, ५२८. कुमारिका-
नित्य कुमारी, ५२९. श्रीकृष्णाकर्षणा~श्रीकृष्णको
अपनी ओर खीचनेवाली, ५३०. देवी=दिव्यस्वरूपा,
५३१. नित्ययुग्मस्वरूपिणी= नित्य युगलरूपा।
५३२. नित्यं विहारिणी=श्यामसुन्दरके साथ नित्य
लीला करनेवाली, ५२३. कान्ता<नन्दनन्दनको
प्रियतमा, ५३४. रसिका-प्रेमरसका आस्वादन
करनेवाली, ५३५. कृष्णवल्छभारश्रीकृष्णप्रिया,
५३६. आमोदिनी-श्रीकृष्णको आमोद प्रदान केवाली,
५३७. मोदवती मोदमयी, ५३८. नन्दनन्दनभूषिता-
नन्दनन्दन श्रीकृष्णके द्वारा जिनका शङ्कार किया
गया हे।
५३९. दिव्याम्बरा-दिव्य वस्त्र धारण करनेवाली,
५४०. दिव्यहारा=दिव्य हार धारण करनेवाली,
५४९. मुक्तामणिविभूषिता=दिव्य मुक्तामणियसे
विभूषित, ५४२. कुञ्प्रिया=वृन्दावनके कुञ्जोसे प्यार
करनेवाली, ५४३. कुञ्चवासा~कुञ्जमे निवास
करनेवाली, ५४४. कुञ्चजनायकनायिका=कुञ्जनायक
श्रीकृष्णकी नायिका ।
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 21188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्व भाग-तृतीय पाद ४९३
करोड़ों रतियोसे भी अधिक प्रगाढ प्रीतिरस प्रदान
करनेवाली ।
५७७. भक्तिग्राह्या= भक्तिसे प्राप्त होने योग्य,
५७८. भक्तिरूपा भक्तिस्वरूपा, ५७९. लावण्यसरसी
सौन्दर्यकौ पुष्करिणी, ५८०. उमा्योगमाया एवं
ब्रह्मविद्यास्वरूपा, ५८९१. ब्रह्मरुद्रादिसंराध्या~त्रह्या
तथा रुद्रादिके द्वारा आराधना करने योग्य, ५८२. नित्यं
कौतूहलान्विता=नित्य कौतुकयुक्त।
५८३. नित्यलीला नित्य लीलापरायणा,
५८४. नित्यकामा-नित्य श्रीकृष्ण-मिलनको
चाहनेवाली, ५८५. नित्यश्द्कारभूषिता=नित्य
नूतन शृङ्खारसे विभूषित, ५८६. नित्यवृन्दावनरसा-
वृन्दावनके माधूर्यरसका सदा आस्वादन करनेवाली,
५८७. नन्दनन्दनसंयुता=नन्दनन्दन श्रीकृष्णके साथ
रहनेवाली।
५८८. गोपिकामण्डलीयुक्ता- गोपिर्योकी
मण्डलीसे धिरी हई, ५८९. नित्यं गोपालसद्गता
सदा गोपाल श्रीकृष्णसे मिलनेवाली,
५९०. गोरसक्षेपिणीनरगोरस फेकने या लुटानेवाली,
५९१. शुरा-शर्यसम्पन्न, ५९२. सानन्दा=आनन्दयुक्त,
५९३. आनन्ददायिनी = आनन्द देनेवाली।
५९४. महालीलाप्रकृष्टाजश्रीकृष्णकी महालीलाकी
सर्वश्रेष्ठ पात्र, ५९५. नागरी-परम चतुरा,
५९६. नगचारिणी-~गिरिराज गोवर्धनपर विचरनेवाली,
९७. नित्यमाघूर्णिता-श्रीकृष्णकी खोजमे नित्य
घूमनेवाली, ५९८. पूर्णा-समस्त सद्गुणोसे परिपूर्ण,
५९९. कस्तूरीतिलकान्विता=कस्तूरीकी वेदीसे
सुशोभित ।
६००. पद्या लक्ष्मीस्वरूपा, ६०१. श्यामा=
सौन्दर्यसे सम्पन्न, ६०२. मृगाक्षी-पृगके समान
विशाल एवं चञ्चल नेत्रोवाली, ६०३. सिद्धिरूपा-
सिद्धिस्वरूपा, ६०४. रसावहा-श्रीकृष्णको माधुर्यरसका
आस्वादन करनेवाली, ६०५. कोटिचन्दरानना~
करो चनदरमाओकि समान सुन्दर मुखवाली,
५४९५. चारुरूपा=मनोहर रूपवाली,
५४६. चारुवक्त्रा-परम सुन्दर मुखवाली,
५४७. चारुहेमाङ्गदा सुन्दर सुवण्कि भुजवंद
धारण करनेवाली, ५४८. शुभा=शुभस्वरूपा,
५४९. श्रीकृष्णवेणुसङ्कीता= श्रीकृष्णद्वारा -मुरलीमें
जिनके नाम ओर यशका गान किया जाता है
५५५०. मुरलीहारिणी=विनोदके लिये श्रीकृष्णकौ
मुसलीका हरण कसेवाली, ५५१. शिवा= कल्याणस्वरूप।
५९५२. भद्रा-मङ्गलमयी, ५५३. भगवती
षड्विध एेश्चर्यसे सम्पन्न, ५५४. शान्ता=शान्तिमयी,
५५५. कुमुदा=पृथ्वीपर आनन्दोद्यास वितीर्णं
करनेवाली, ५५६. सुन्दरी=अनन्त सोन्दर्यको निधि,
५५७. प्रिया+सखियों तथा श्यामसुन्दरको अत्यन्त
प्रिय, ५५८. कृष्णक्रीडा~श्रीकृष्णके साथ लीला
करनेवाली, ५५९. कृष्णरतिः =श्रीकृष्णके प्रति प्रगाढ
प्रेमवाली, ५६०. श्रीकृष्णसहचारिणी-~वृन्दावनमें
श्रीकृष्णके साथ विचरनेवाली ।
५६९१. वंशीवटप्रियस्थाना=वंशीवर जिनका प्रिय
स्थान हे, ५६२. युग्मायुग्मस्वरूपिणी-युगलरूपा
ओर एक रूपा, ५६३. भाण्डीरवासिनी भाण्डीर
वनमें निवास करनेवाली, ५६४. शुभ्रा=गौरवर्णा,
५६५. गोपीनाथप्रिया=गोपीवल्यभ श्रीकृष्णकी प्रियतमा,
५६६. सखी-श्रीकृष्णको सखी ।
५६७. श्रुतिनिःश्वसितः=श्रुतियों जिनके निः श्ाससे
प्रकट होती हें, ५६८. दिव्या=दिव्यस्वरूपा,
५६९. गोविन्दरसदायिनी गोविन्दको माधुर्यरस
प्रदान करनेवाली, ५७०. श्रीकृष्णप्रार्धिनी=केवल
श्रीकृष्णको चाहनेवाली, ५७१. ईशाना<~ईश्चरो,
५७२. महानन्दप्रदायिनी = परमानन्द प्रदान करनेवाली ।
५७३. वैकुण्ठजनसंसेव्या-वैकुण्टवासियोद्वाय
सेवन कसे योग्य, ५७४. कोटिलक्षमीसुखावहा-कोटि-
कोरि लक्ष्मीसे भी अधिक सुख देनेवाली,
५७५. कोटिकन्दर्पलावण्या-कराडां कामदेर्वोसि
अधिक रूपलावण्यसे सम्पन्न, ५७६. रतिकोटिरतिप्रदा
((-0. 1/८1114<511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 60810011
2९
संक्षिप्त नारदपुराण
६०६. गौरी=गोरवर्णा, ६०७. कोटिकोकिलसुस्वरा
करोड़ों कोकिलोके समान मधुर स्वरवाली।
६०८. शीलस्रौन्दर्यनिलया=उत्तम शील तथा
अनन्त सौन्दर्यकौ आधारभूता, ६०९. नन्दनन्दन-
लालिता नन्दनन्दन श्रीकृष्णसे दुलार पानेवाली,
६९०. अशोकवनसंवासा=अशोकवनमें निवास
करनेवाली, ६१९. भाण्डीरवनसङ्ता=भाण्डीरवनमें
मिलनेवाली ।
६९२. कल्पद्रुमतलाविष्टा-कल्पवृक्षके नीचे बेटी
हई, ६९३. कृष्णा=कृष्णस्वरूपा, ६१४. विश्चा=
विश्चस्वरूपा, ६१९५. हरिप्रियारश्रीकृष्णको प्रेयसी,
६९६. अजागम्या =ब्रह्माजीके लिये अगम्य,
६९७. भवागम्या=महादेवजीके लिये अगम्य,
६१८. गोवर्धनकृतालया-गोवर्धन पर्वतपर निवास
करनेवाली ।
६९९. यमुनातीरनिलया=यमुनातटपर रहनेवाली,
६२०. शश्चद्गोविन्दजल्पिनी-सदा श्रीकृष्ण गोविन्दकीं
रट लगानेवाली, ६२९. शश्चन्मानवती=नित्य मानिनी,
६२२. सिग्धा-सरेहमयी, ६२३. श्रीकृष्णपरिवन्दिता=
श्रीकृष्णके द्वारा नित्य वन्दित ।
६२४. कृष्णस्तुता~श्रीकृष्णके द्वारा जिनका
गुणगान किया गया हे, ६२५. कृष्णत्रता=
श्रीकृष्णपरायणा, ६२६. श्रीकृष्णहदयालया-~श्रीकृष्णके
हदयमं निवास करनेवाली, ६२७. देवदूमफला-
कल्पवृक्षके समान मनोवाच्छित फल देनेवाली,
६२८. सेव्या-सेवन करने योग्य, ६२९. वृन्दावन-
रसालया=वृन्दावनके रसमें निमग्र रहनेवाली।
६३०. कोटितीर्थमयी् कोरितीर्थस्वरूपा,
६२३१. सत्या=सत्यस्वरूपा, ६३२. कोटितीर्थफलप्रदा=
करोड़ तीर्थोका फल दनेवाली, ६३३. कोटियोग-
सुदुष्प्राप्या=करोडों योगसाधनोसे भी दुर्लभ,
६२४. कोटियज्ञदुराश्रया=कोरि यज्ञोसे भी जिनको
शरणागति प्राप्त होनी कठिन हे।
६३५. मनसान्मनसा नामसे प्रसिद्ध,
६३६. शशिलेखाश्रीकृष्णरूपी चन्द्रमाकी कला,
६३७. श्रीकोटिसुभगा-कोरि लक्ष्मीके समान
सौभाग्यवती, ६३८. अनघा=पापशून्य,
६३९. कोटिमुक्तसुखा करोड़ों मुक्तात्माओंके
समान सुखी, ६४०. सौम्या=सौम्यस्वरूपा,
६४९. लक्ष्मीकोटिविलासिनी-करोडों लक्षिमियोके
समान विलासवती ।
६४२. तिलोत्तमा=ठोदीमें तिलके आकारकों
बेदी या चह होनेके कारण अतिशय उत्तम
सौन्दर्ययुक्त, ६४३. त्रिकालस्था भूत, भविष्य,
वर्तमान- तीनों कालोमे विद्यमान, ६४४. त्रिकालज्ञा
तीनों कालोकी घटनाओंको जाननेवाली, ६४८. अधीश्चरी-
स्वामिनी, ६४६. त्रिवेदज्ञा तीनों वेदोको जाननेवाली,
६४७. त्रिलोकन्ञा= तीनों लोकोंको जाननेवाली,
६४८. तुरीयान्तनिवासिनी-जाग्रतूसे लेकर तुरीयापर्यन्त
सव अवस्थाओंमें निवास करनेवाली ।
६४९. दुर्गाराध्याउमाके द्वारा आराध्य,
६५०. रमाराध्या-लक्ष्मीकी आराध्य देवी,
६५९. विश्चाराध्या= सम्पूर्णं जगते लिये आराधनीय,
६५२. चिदात्मिका=चेतनस्वरूपा, ६५३. देवाराध्या=
देवताओंकी आराध्य देवी, ६५४. पराराध्या-परम
आराध्य देवी, ६५५५५. ब्रह्माराध्या~ब्रह्माजीके द्वारा
उपास्य, ६५६. परात्मिका परमात्मस्वरूपा।
६५७. शिवाराध्या-भगवान् शिवके लिये
आराध्य, ६५८. प्रेमसाध्यानप्रेमसे प्राप्त होने
योग्य, ६५९. भक्ताराध्या-भक्तोंकी उपास्य देवी,
६६०. रसात्मिका रसस्वरूपा, ६६९. कृष्णप्राणार्पिणी-=
श्रीकुष्णको जीवन देनेवाली, ६६२. भामा-मानिनी,
६६३. शुद्धप्रेमविलासिनी-विशुद्ध प्रेमसे सुशोभित
हानेवाली।
६६४. कृष्णाराध्या~श्रीकृष्णकी आराध्य देवी,
६६५५. भक्तिसाध्या=अनन्य भक्तिसे प्राप्त होनेवाली,
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 60810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद् ४९५
कर देनेवाली, ६९७. कृष्णसारा~श्रीकृष्णको ही
जीवनका सारसर्वस्व माननेवाली, ६९८. कृष्ण-
रूपविहारिणीचश्रीकृष्णरूपसे विचरनेवाली,
६९९. कृष्णकान्ता=ग्रीकृष्णप्रिया, ७००. कृष्णधना=
श्रीकृष्णको ही अपना परम धन माननेवाली,
७०९१. कृष्णमोहनकारिणी अपने अनुपम प्रेमसे
श्रीकृष्णको मोहित करनेवाली ।
७०२. कृष्णदृष्टिः=एकमात्र श्रीकृष्णपर ही दृष्ट
रखनेवाली, ७०३. कृष्णगोव्रारश्रीकृष्णके गोत्रवाली,
७०४. कृष्णदेवी ~श्रीकृष्णकी आराध्यदेवी,
७०५. कुलोद्रहा=कुलमें सर्वश्रेष्ठ, ७०६. सर्वभूत-
स्थितात्मा=सम्पूर्णं भृतो विद्यमान आत्मस्वरूपा,
७०७. सर्वलोकनमस्कृता सम्पूर्ण लोकद्राग अभिवन्दित।
७०८. कृष्णदात्री=उपासरकोको श्रोकृष्णको प्रापि
करानेवाली, ७०९. प्रेमधात्री भावुकोके हदये
श्रीकृष्णप्रेमको प्रकट करनेवाली, ७१०. स्वर्णगात्री=
सुवर्णे समान गौर शरीरवाली, ७१९१. मनोरमा-
श्रीकृष्णके मनको रमानेवाली, ७९१२. नगधात्री
पर्वतोके अधिष्ठातृ देवताको उत्पन्न करनेवाली,
७९३. यशोदात्रीनयश देनेवाली, ७१४. महादेवी-
सर्वश्रेष्ठ देवी, ७१५. शुभङ्भरी-कल्याण करनेवाली ।
७९६. श्रीशेषदेवजननी = लक्ष्मीजी, शेषजी ओर
देवताओंको उत्पन्न करनेवाली, ७९७. अवतारगणप्रसूः =
अवतारगणोंको उत्पन्न करनेवाली, ७१८. उत्यलाङ्का=
| नील कमलके चिह्न धारण करनेवाली,
७१९. अरविन्दाङ्का-कमलके चिहसे युक्त,
७२०. प्रासादाङ्का=मान्दिरके चिहसे युक्त,
७२१. अद्वितीयका= जिसके समान दूसरी कोई
नहीं है एेसी।
७२२. रथाद्भा-रथके चिद्व युक्त, ७२३. कुर्क
हाथीके चिह्टसं युक्त, ७२४. कुण्डलाङ्कपदस्थिता=
चर्णोमं कुण्डलके चिहटसे युक्त, ७२५. छतराङ्का=छन्रके
चिद्से युक्त, ७२६. विद्युदङ्का-व्रके चिह्से युक्त,
६६६. भक्तवृन्दनिषेविता-भक्त-समुदायसे सेविता,
६६७. विश्वाधारा सम्पूर्णं जगत्को आश्रय देनेवाली,
६६८. कृपाधारा-कपाकी आधारभूमि, ६६९. जीवाधारा=
सम्पूर्णं जीवोंको आश्रय देनेवाली, ६७०. अतिनायिका=
सम्पूर्ण नायिकाओंसे उत्कृष्ट |
६७९. शृद्धप्रममयी=विशुद्ध अनुरागस्वरूपा,
६७२. लज्ना= मूर्तिमती लजना, ६७३. नित्यसिद्धा
सदा, विना किसी साधनके, स्वतःसिद्ध,
६७४. शिरोमणिः =गोपाङ्गनाओंकी शिरोमणि,
६७९५. दिव्यरूपा~दिव्य रूपवाली, ६७६. दिव्यभोगा-
दिव्यभोगोंसे सम्पन्न, ६७७. दिव्यवेषा=अलौकिक
वेशभूषाओंसे सुशोभित, ६७८. मुदान्विता-सदा
आनन्दमग्र रहनेवाली।
६७९. दिव्याङ्कनावृन्दसारा=दिव्य युवतियोके
समुदायकी सार-सर्वस्वरूपा, ६८०. नित्यनूतनयौवना
नित्य नवीन योवनसे युक्त, ६८१. परब्रह्मावृता
परब्रह्म परमात्मासे आवृत, ६८२. ध्येया-ध्यान
करने योग्य, ६८३. महारूपा-परम सुन्दर रूपवाली,
६८४. महोज्वला=परमोज्वल प्रकाशमयी ।
६८५. कोिसूर्यप्रभा=-करोडों सूर्योको प्रभासे
उद्धासित, ६८६. कोटिचन्द्रविप्बाधिकच्छविः =
कोटि चन्द्रमण्डलसे अधिक छविवाली, ६८७.
कोमलामृतवाक्-कोमल एवं अमृतके समान मधुर
वचनवाली, ६८८. आद्या-आदिदेवी, ६८९. वेदाद्या
वेदोको आदिकारणस्वरूपा, ६९०. वेददुर्लभात्वेदोको
भी पहुंचसे परे।
६९१. कृष्णासक्ताश्रीकृष्णमं अनुरक्त, ६९२.
कृष्णभक्ता-श्रीकृष्णके प्रति भक्तिभावसे परिपूर्ण,
६९३. चद्रावलिनिपेविता=चनद्रावली नामको सखीसे
सेवित, ६९४. कलापषोडशसम्पूर्णा-सोलह कलाओसे
पूर्ण, ६९५. कृष्णदेहार्धधारिणी=अपने आधे शरीरम
श्रीकृष्णके स्वरूपको धारण करनेवाली ।
६९६. कृष्णबुद्धिः श्रीकृष्णमं बुद्धिको अर्पित
((-0. 1/८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 60810011
४९६
संक्षिप्त नारदपुराण
७२७. पुष्पमालाद्भिता= पुष्पमालाके चिहसे युक्त ।
७२८. दण्डाद्ा=दण्डके चिह्से युक्त,
७२९. मुकुटाद्धा-मुकुरके चिहसे युक्त,
७३०. पूर्णचन्द्रा=पूर्णचन्द्रके सदृश शोभासम्पन्न,
७३९. शुकाङ्किता-शुकके चिहसे युक्त,
७३२. कृष्णान्नाहारपाकाचश्रीकृष्णको भोजन करानेके
लिये भोति-भोतिकी रसोई तेयार करनेवाली,
७३३. वृन्दाकुञ्चविहारिणी-वृन्दावनके ञ्चमें
विचरनेवाली ।
७३४. कृष्णप्रवबोधनकरीनकृष्णको शयनसे
जगानेवाली, ७३५. कृष्णशेषान्नभोजिनीरश्रीकृष्णके
आरोगनेसे बचे हए प्रसादरूप अन्नको ग्रहण
करनेवाली, ७३६. प्रकेसरमध्यस्था-कमलकेसरोके
मध्यमे विराजमान, ७३७. सङ्खीतागमवेदिनी=
सङ्खीतशास्त्रको जाननेवाली।
७३८. कोटिकल्पान्तश्रूभद्खा=अपने भ्रूभङ्खमात्रसे
करो कल्पोका अन्त करनेवाली, ७३९. अप्राप्तप्रलया=
कभी प्रलयको प्राप्त न होनेवाली, ७४०. अच्युता
अपनी महिमासे कभी विचलित न होनेवाली,
७४९१. सर्वसत्त्वनिधिः =पूर्ण सत्तवगुणकी निधि,
७४२. पद्यशङ्भादिनिधिसेविता=पद्म-शद्व आदि
निधियोसे सेवित।
७४३. अणिमादिगुणेश्चर्या=अणिमा आदि अष्टविध
गुणोके एेश्र्येसि युक्त, ७४४. देववृन्दविमोहिनी-
देवसमुदायको मोहित करनेवाली, ७४५. सर्बानिन्दप्रदा=
सबको आनन्द देनवाली, ७४६. सर्वा सर्वस्वरूपा,
७४७. सुवर्णलतिकाकृतिः =स्वर्णमयी लताके समान
आकृतिवाली ।
७४८. कृष्णाभिसारसंकेता-श्रीकृष्णसे मिलनेके
लिये संकेतस्थानमें स्थित, ७४९. मालिनी-मालासे
अलंकृत, ७५०. नृत्यपण्डिता=नृत्यकलाकी विदुषी,
७५१. गोपीसिन्धुसकाशाप्या = गोपीसमुदायरूपी
सिन्धुम प्राप्त होनेवाली, ७५२. गोपमण्डपशोभिनी-
वृषभानुगोपके मण्डपमें शोभा पानेवाली।
७५३. श्रीकृष्णप्रीतिदा~श्रीकृष्णके प्रेमको
प्रदान करनेवाली, ७५४. भीता~श्रीकृष्णके वियोगके
भयसे भीत, ७५५. प्रत्यङ्कपुलकाञ्िता-प्रत्येक
अङ्घमे श्रीकृष्ण-प्रेमजनित रोमाञ्चसे युक्त,
७५६. श्रीकृष्णालिद्धनरता=श्रीकृष्णका स्पर्श करनेमें
तत्पर, ७५७. गोविन्दविरहाक्षमा~श्रीकृष्णका वियोग
सहन करनेमें असमर्थ।
७५८. अनन्तगुणसम्पन्ना=अनन्त गुणोंसे
युक्त, ७५९. कृष्णकीर्तनलालसा~श्रीकृष्णके
नाम ओर गुणोंके कीर्तन करनेकी रुचिवाली,
७६०. वीजत्रयमयीमूर्तिः = श्री, ही, क्लीं- इन तीन
वीजोंसे संयुक्तरूपवाली, ७६१. कृष्णानुग्रहवाच्छिनी
श्रीकृष्णके अनुग्रहको चाहनेवाली ।
७६२. विमलादिनिषेव्या=-विमला, उत्कर्षिणी आदि
सखियोद्रारा सेव्य, ७६३. ललिताद्य्चिता= ललिता
आदि सखियोसे पूजित, ७६४. सती=उत्तम शील ओर
सदाचारसे सम्पन्न, ७६५. पद्मवृन्दस्थिता कमलवनमे
निवास करनेवाली, ७६६. दष्टा= हर्षसे युक्त,
७६७. त्रिपुरापरिसेवितानत्रिपुरसुन्दरीके द्वारा सेवित ।
७६८. वृन्दावत्यर्यिता=वृन्दावती देवीके द्वारा
पूजित, ७६९. श्रद्धाश्रद्धास्वरूपा, ७७०. दुर्तेया=
वुद्धिको पर्हुंचसे परे, ७७९. भक्तवह्यभा=भक्तप्रिया,
७७२. दुर्लभा-~दुप्प्राप्य, ७७३. सान्द्रसौख्यात्मा=
घनीभूत सुखस्वरूप, ७७४. श्रेयोहेतुः=कल्याणकी
प्रतिमे हतु, ७७५५. सुभोगदा=मुक्तिप्रद भोग देनेवाली
७७६. सारङ्का~श्रीकृष्णप्रेमकौ प्यासी चातक,
७७७. शारदा=सरस्वतीस्वरूपा, ७७८. वबोधा=
ज्ञानमयी, ७७९. सदवुन्दावनचारिणी=सुन्दर वृन्दावनमें
विचरनेवाली, ७८०. ब्रह्मानन्दा~त्रह्यानन्दस्वरूपा,
७८१. चिदानन्दा=चिदानन्दमयी, ७८२. ध्यानानन्दा=
्रीकृष्ण-ध्यानजनित आनन्दमं मग्र, ७८३. अर्धमात्रिका-
अर्धमात्रास्वरूपा।
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
पूर्व भाग-तृत्तीय पाद्
४९७
७८४. गन्धर्वागानविद्यामें प्रवीण, ७८५५. |
सुरतकलाको जाननेवाली, ७८६. गोविन्दप्राणसङ्मा-
गोविन्दके साथ एक प्राण होकर रहनेवाली,
७८७. कृष्णाङ्कभूषणा-~श्रीकृष्णके अद्खोको विभूषित
करनेवाली, ७८८. रल्नभूषणा=रतमय आभूषण धारण
करनेवाली, ७८९. स्वर्णभूषिता=सोनेके आभूषणोसे
विभूषित।
७९०. श्रीकृष्णहृदयावासानश्रीकृष्णके हदय-
मन्दिरमे निवास केवाली, ७९१. मुक्ताकनकनासिका-
नासिकामे मुक्तायुक्त सुवर्णके आभूषण धारण
करनेवाली, ७९२. सद्रलकङ्कणयुता-हाथोमें सुन्दर
रलजसिति कणन पहननेवाली, ७९३. श्रीमन्रीलगिरिस्थिता=
शोभाशाली नीलाचलपर विराजमान ।
७९४. स्वर्णनूपुरसम्पत्रा=सोनेके नूपुरोसे सुशोभित,
७९५. स्वर्णकिड्किणिमण्डिता=सुवर्णकी किङ्किणी
(करधनी) -से अलंकृत, ७९६. अशेषरासकुतुका=
महारजके लिये उत्कण्ठित रहनेवाली, ७९७. रम्भोरुः=
केलेके समान जंघावाली, ७९८. तनुमध्यमा~क्षीण
करिवाली ।
७९९. पराकृतिः सर्वात्कृष्ट आकृतिवाली,
८००. परानन्दा=परमानन्दस्वरूपा, ८०९१. परस्वर्ग-
विहारिणी-स्वर्गसे भी परे गोलोक धाममें विहार
करनेवाली, ८०२. प्रसूनकबरी~वेणीमे फूलोके
हार गथनेवाली, ८०३. चित्रा-विचित्र शोभामयी,
८०४, म्रहासिन्दूरसुन्दरी=उत्तम सिन्दूरसे अति सुन्दर
प्रतीत होनेवाली।
८०५. केशोरवयसा=-किशोरावस्थासे युक्त,
८०६. बाला=मुग्धा, ८०७. प्रमदाकुलशेखरा=
रमणीकुलशिरोमणि, ८०८. कृष्णधरासुधास्वादा=
श्रीकृष्णनामरूपी सुधाका अधरोके द्वारा नित्य
आस्वादन करनेवाली, ८०९. श्यामप्रेमविनोदिनी=
श्रीकृष्णप्रेमसे ही मनोरञ्जन करनेवाली ।
८९१०. शिखिपिच्छलसच्यूडा=मयुर -पंखसं
सुशोभित केशोवाली, ८११. स्वर्णचम्यक भूषिता
स्वर्णचम्पाके आभूषणोसे विभूषित, ८१२. कुद्धुमालक्त-
कस्तूरीमण्डिता-रोली, महावर ओर कस्तुरीके
शृद्खारसे सुशोभित, ८१३. अपराजिता-कभी परास्त
न होनेवाली ।
८१४. हेमहारान्विता=सुवरणके हारसे अलंकृत,
८९५. पुष्पहाराढ्या=पुष्पमालासे मण्डित,
८१६. रसवतीतप्रेमरसमयी, ८१७. माधुर्यमधुरा-
माधुर्य भावके कारण मधुर, ८१८. पद्या=पद्मानामसे
प्रसिद्ध, ८१९. पद्राहस्ता-हाथमें कमल धारण
करनेवाली, ८२०. सुविश्रुता=अति विख्यात ।
८२१. भरूभद्गाभङ्गकोदण्डकटाक्षसरसन्धिनी-
श्रीकृष्णके प्रति तिरी भौहरूपी सुदृढ धनुषपर
कटाक्षरूपी वा्णोका संधान करनेवाली,
८२२. शरेषदेवशिरःस्था-शेषजीके मस्तकपर पृथ्वीके
रूपमं स्थित, ८२३. नित्यस्थलविहारिणी-नित्य लीला-
स्थलियोमें विचरनेवाली ।
८ २४. कारुण्यजलमध्यस्था~-करुणारूपी
जलराशिके मध्य विराजमान, ८२५. नित्यपत्ता-सदा
प्रमे मतवाली, ८२६. अधिरोहिणी-=उन्नतिकौ
साधनरूपा, ८२७. अएटभाषावती = आठ भाषाओआंको
जाननेवाली, ८२८. अष्टनायिका-ललिता आदि
आठ सखियोंकी स्वामिनी, ८२९. लक्षणान्विता=
उत्तम लक्ष्णोसे युक्त।
८३०. सुनीतिज्ञा- अच्छी नीतिको जाननेवाली,
८३९. श्रुतिज्ञा-श्रुतिको जाननेवाली, ८३२. सर्वज्ञा
सवे कुद जाननेवाली, ८३३. दुःखहारिणी-
दुः खोको हरण करनेवाली, ८३४. रजोगुणेश्वरी
रजोगुणकौ स्वामिनी, ८३५५. एरच्यद्धनिभानना=शरद्
ऋतुके चनद्रमाकी भति मनोहर मुखवाली ।
८३६. केतकीकुसुमाभासा-करेतकरीके पुष्पको -
सी आभावाली, ८३७. सदासिन्धुवनस्थिता=सदा
सिन्धु- वनम रहनेवाली, ८३८. हैपपुष्पाधिककरा=
सुवर्ण-पुष्पस्े अधिक कमनीय हाथवाली,
८२९. पञ्चष्टक्तिमयी =पञ्चविधशक्तिमे सम्पन्न,
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 81188 \/8181185। 01661010. 01411260 0 6810011
४९८
८४०. हिता=हितकारिणी ।
८४२. स्तनकुम्भी=कुम्भके समान स्तनवाली,
८४२. नराढ्या=पुरुषोत्तम श्रीकृष्णसे संयुक्त, ८४३.
क्षीणापुण्या=पापरहित, ८४४. यशस्विनी-कीर्तिमती,
८४५. वेराजसूर्यजननी विराट् ब्रह्माण्डके प्रकाशक
सूर्यको जन्म देनेवाली, ८४६. श्रीशालक्ष्मीकौ
भी स्वामिनी, ८४७. भुवनमोहिनी= सम्पूर्णं भुवनोको
मोहित करनेवाली ।
८४८. महाशोभा=परम शोभाशालिनी, ८४९.
महामाया=महामायास्वरूपा, ८५०. महाकान्तिः =
अनन्त कान्तिसे सुशोभित, ८५९. महास्मृतिः =
महती स्मरणशक्तिस्वरूपा, ८५२. महामोहा
महामोहमयी, ८५२. महाविद्या=-भगवत्प्रपति करानेवाली
श्रष्ट विद्या, ८५४. महाकीर्तिः=विशाल कीर्तिवाली,
८५५. महारतिः=अत्यन्तानुरागस्वरूपा।
८५६. महाधेर्या=अत्यन्त धीर स्वभाववाली,
८५७. महावीर्या=महान् पराक्रमसे सम्पन्न, ८५७.
महाशक्तिः-महाशक्ति, ८५९. महाद्युतिः परम-
प्रकाशवती, ८६०. महागौरी=अत्यन्त गौर वर्णवाली,
८६१. महासम्पत्-परम सम्पत्तिरूपा, ८६२.
महाभोगविलासिनी=महान् भोग-विलाससे युक्त ।
८६३. समया=अत्यन्त निकटवर्तिनी, ८६४.
भक्तिदा-भक्ति दनेवाली, ८६५. अशोका-शोकरहित,
८६६. वात्सल्यरसदायिनी = वात्सल्यरस देनेवाली,
८६७. सुहदभक्तिप्रदा=सुहद् जनोंको भक्ति देनेवाली,
८६८. स्वच्छा=निर्मल, ८६९. माधुर्यरसवर्षिणी
माधूर्यरसकी वर्षां करनेवाली ।
८७०. भावभक्तिप्रदा=भावभक्ति प्रदान
करनेवाली, ८७१. शुद्धप्रेमभक्तिविधायिनी=शुद्ध
प्रमलक्षणा भक्तिका विधान करनेवाली, ८७२.
गोपरामा-गोपकुलकी रमणी, ८७३. अभिरामा सर्व-
सुन्दरी, ८७४. क्रीडारामा~श्यामसुन्दरके साथ लीलामें
रत रहनेवाली, ८७५. परेश्वरी=परमेश्वरी ।
८७६. नित्यरामा=नित्य वस्तुमें रमण करनेवाली,
संक्षिप्त नारदपुराण
८७७. आत्मरामा=-आत्मामें रमण करनेवाली,
८७८. कृष्णरामा=श्रीकृष्णके चिन्तनमें रमण
करनेवाली, ८७९. रमेश्वरी-लक्ष्मीकी अधीश्चरी,
८८०. एकानेकजगद्वयाप्ता=एक होकर भी अनेक
रूपसे जगतूमें व्याप्त, ८८९. विश्चलीलाप्रकाशिनी-
सम्पूर्ण विश्वके रूपमे बाह्यलीलाको प्रकाशित
करनेवाली ।
८८२. सरस्वतीशा-सरस्वतीको स्वामिनी,
८८३. दुर्गेशा~दुर्गाको स्वामिनी, ८८४. जगदीशा=
जगत्को स्वामिनी, ८८५. जगद्विधिः =संसारको
रचनेवाली, ८८६. विष्णुवंशनिवासा वैष्णववंशमें
निवास करनेवाली, ८८७. विष्णुवंशसमुद्धवा=
वैष्णववंशमें प्रकट हुई ।
८८८. विष्णुवंशस्तुता=वेष्णवकुलके द्वारा स्तुत,
८८९. कर्त्री = स्वतन्त्र कर्तृत्वशक्तिसे सम्पन्न,
८९०. सदाविष्णुवंशावनी=सदा वेष्णवकुलकौ रक्षा
करनेवाली, ८९१. आरामस्था=उपवनमें रहनेवाली,
८९२. वनस्था=वृन्दावनमे निवास करनेवाली,
८९३. सूर्यपुतर्यवगाहिनी=यमुनामें खान करनेवाली ।
८९४. प्रीतिस्थान्प्रेममे निवास करनेवाली,
८९५. नित्ययच्रस्था=नित्य-यनत्रमें स्थित रहनेवाली,
८९६. गोलोकस्था-गोलोकधाममें स्थित,
८९७. विभूृतिदा~पेश्चर्य देनेवाली, ८९८.
स्वानुभूतिस्थिता-केवल अपनी अनुभूतिमें प्रकट
होनेवाली, ८९९. अव्यक्ता=अव्यक्तस्वरूपा,
९००. सर्वलोकनिवासिनी सम्पूर्णं लोकोमें निवास
करनेवाली ।
९०१. अमृता=अमृतस्वरूपा, ९०२. अद्धुता
अद्धुत रूप ओर भावसे सम्पन्न,
९०३. श्रीमन्नारायणसमीरिता= लक्ष्मीसहित भगवान्
नारायणके द्वारा स्तुत, ९०४. अक्षरा=अक्षरस्वरूपा,
९०५. कूटस्था-एकरस परमात्मस्वरूपा, ९०६. मह्यपुरुष-
सम्भवा-महापुरुषोंको प्रकट करनेवाली ।
९०७. ओदार्यभावसाध्या-ओदार्यपूर्णं भक्तिभावसे
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 0141260 0 66810011
पूर्वभाग-तृतीय पाद
४९९
प्रा होनेवाली, ९०८. स्थूलसूक्ष्मातिरूपिणी-स्थूल- | ९३०. सुरवन्दिता=देवताओंद्रारा वन्दित ।
सृक्ष्मसे विलक्षण चिदानन्दमय स्वरूपवाली,
९०९. शिरीषपुष्पमृदुला=सिरसके फूलोसे भी अधिक
कोमल, ९१०. गाङ्कयमुकुरप्रभा=गद्गाजल एवं दर्पणके
समान निर्मल कान्तिवाली।
९१९९१. नीलोत्पलजिताक्षी-कजररे नेत्रोंकी
शोभासे नीलकमलको परास्त करनेवाली,
९९१२. सद्रलकवरान्विता=सुन्दर रल्ोसे अलंकृत
चोटीवाली, ९९१३. प्रेमपर्यङ्कनिलया-~प्रेमरूपी पर्यङ्कपर
शयन करनेवाली, ९१४. तेजोमण्डलमध्यगा=
तेजपुञ्जके भीतर विराजमान ।
९१५. कृष्णाङ्कगोपनाभेदानश्रीकृष्णके अङ्घोको
छिपानेके लिये उनसे अभिन्नरूपमे स्थित,
९१६. लीलावरणनायिका=विभिन्न लीलाओंको
स्वीकार करनेवाली प्रधान नायिका, ९९७. सुधासिन्धु-
समुह्छसानप्रमसुधाके समुद्रको समुद्टसित करनेवाली,
९१८. अमृतस्यन्दविधायिनी=अमृतरसका स्रोत
बहानेवाली ।
९१९. कृष्णचित्ता-अपना चित्त श्रीकृष्णको
समर्पित कर देनेवाली, ९२०. रासचित्ताश्रीकृष्णकों
प्रसन्नताके लिये रासमे मन लगानेवाली,
९२९. प्रेमचित्ता-श्रीकृष्णप्रेममे मनको निमग्र
रखनेवाली, ९२२. हरिप्रिया-श्रीकृष्णको प्रेयसी,
९२३. अचिन्तनगुणग्रामा=अचिन्त्य गुण-समुदायवाली,
९२४. कृष्णलीला श्रीकृ ष्णली लास्वरूपा,
९२५. मलापहा-मनकी मलिनता एवं पाप-तापको
धो वहानेवाली ।
९२६. राससिन्धुशशाङ्का=रासरूपी समुद्रको
उद्टसित करनेके लिये पूर्णं चन्द्रमाकी भोति प्रकाशित,
९२७. रासमण्डलमण्डिनी= अपनी उपस्थितिसे
रासमण्डलकी अत्यन्त णोभा वबदानेवाली,
९२८. नतव्रता=विनग्रस्वभाववाली, ९२९.
श्रीहरीच्छासुमूर्तिः=श्रीकृष्णडच्छको सुन्दर मूर्ति,
{ 1183 ] सं०्ना० पु° १७-
९३९१. गोपीचूडामणिः=गोपाद्धनाशिरोमणि,
९३२. गोपीगणेड्या=गोपियोके समुदायद्वारा स्तुत,
९३३. विरजाधिका गोलोकमे विरजासे अधिक
सम्मानित पदपर स्थित, ९३४. गोपप्रेष्ठा-गोपाल
श्यामसुन्दरको प्रियतमा, ९३५. गोपकन्या=
वृषभानुगोपको पुत्री, ९३६. गोपनारी-गोपकी वधू,
९३७. सुगोपिका~श्रष्ठ गोपी ।
९३८. गोपधामा-गोलोक धाममें विराजमान,
९३९. सुदामाम्बा=सुदामागोपके प्रति मातृ-स्रेह
रखनेवाली, ९४०. गोपाली गोपी, ९४१. गोपमोहिनी
गोपाल श्रीकृष्णको मोहनेवाली, ९४२. गोपभृषा=
गोपाल श्यामसुन्दर ही जिनके आभूषण रहै
९४६३. कृष्णभूषा~श्रीकृष्णको विभूषित करनेवाली,
९४४. श्रीवृन्दावनचद्धिका~श्रीवृन्दावनकौ चाँदनी ।
९४५. वीणादिघोषनिरता=वीणा आदिको बजानेमं
संलग्न, ९४६. रासोत्सवविकासिनी~रासोत्सवका
विकास करनेवाली, ९४७. कृष्णचेष्टानश्रीकृष्णके
अनुरूप चेष्ट करनेवाली, ९४८. अपरि्ञाता=पहचानमं
न आनेवाली, ९४९. कोटिकन्दर्पमोहिनी-कराडों
कामदेवोको मोहित करनेवाली ।
९५०. श्रीकृष्णगुणगानाढ्या~श्रीकृष्णके गुर्णोका
गान करनेमे तत्पर, ९५१. देवसुन्दरिमोहिनी~
देवसुन्दरि्योको मोहनेवाली, ९५२. कृष्णचन्द्रमनोञ्ञा
श्रीकृष्णचन्रके मनोभावको जाननेवाली, ९५३. कृष्णदेव-
सहोदरी-योगमाया रूपसे श्रीयशोदाके गर्भसे उत्पन्न
होनेवाली ।
९५४. कृष्णाभिलापिणीरश्रीकृष्ण-मिलनको
इच्छा रखनेवाली, ९५५. कृष्णप्रेमानुग्रहवाच्छिनी =
श्रीकृष्णके प्रेम ओर अनुग्रहको चाहनेवाली,
९५६. क्षेमाक्षेमस्वरूपा, ९५७. पधुरालापा=मीरे
वचन बोलनेवाली, ९५८. भ्रुवोमाया=भीोसे मायाको
प्रकट करनवाली, ९५९. सुभद्रिका~परम कल्याणमयी।
((-0. 1८111551 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 68110011
| क
८०99
संक्षिप्त नारदपुराण
९६०. प्रकृतिः =श्रीकृष्णकौ स्वरूपभूता
हादिनी शक्ति, ९६९. परमानन्दा=परमानन्दस्वरूपा,
९६२. नीपद्रुमतलस्थिता-कदम्बवृक्षके नीचे खडी
होनेवाली, ९६३. कृपाकटाक्षा=कृपापूर्ण कटाक्षवाली,
९६४. विम्बोष्ठ विम्बफलके समान लाल ओठवाली,
९६५५. रम्भा=सर्वाधिक सुन्दरी होनेके कारण
रम्भा नामसे प्रसिद्ध, ९६६. चारुनितम्विनी=मनोहर
नितम्बवाली ।
९६७. स्मरकेलिनिधानानप्रमलीलाकी निधि,
९६८. गण्डताटद्धमण्डिता=कपोलोपर कर्णभूषणोसे
अलंकृत, ९६९. हेमाद्रिकान्तिरुचिरा=सुवर्णगिरि
मेरुकौ कान्तिकि समान सुनहरी कान्तिसे
सुशोभित परम सुन्दरी, ९७०. प्रेमाढ्या~प्रेमसे परिपूर्ण,
९७९. मदमन्थरा-~प्रेममदसे मन्द गतिवाली ।
९७२. कृष्णचिन्ता~श्रोकृष्णका चिन्तन करनेवाली,
९७३. प्रेमचिन्ता-श्रीकृष्ण-प्रेमका चिन्तन करनेवाली,
९७४. रतिचिन्ता~श्रीकृष्णरतिका चिन्तन करनेवाली,
९७५. कृष्णदाश्रीकृष्णकौ प्राति करानेवाली,
९७६. रासचिन्ता=श्रोकृष्णके साथ रासका चिन्तन
करनेवाली, ९७७. भावचिन्ता~प्रम-भावका चिन्तन
करनेवाली, ९७८. शुद्धचिन्ता=विशुद्ध चिन्तनवाली,
९७९. महारसा=अतिशय प्रेमस्वरूपा।
९८०. कृष्णादृष्टित्िटियुगाश्रीकृष्णको देखे बिना
क्षणभरके विलम्बको भी एक युगके समान
माननेवाली, ९८१. दृष्टिपक्ष्मविनिन्दिनीरश्रीकृष्णका
दर्शन करते समय वाधा देनेवाली ओंखकी पल्कोकी
निन्दा करनेवाली, ९८२. कन्दर्पजननी=कामदेवको
जन्म देनेवाली, ९८३. मुख्या=सर्वप्रधाना, ९८४.
वेकुण्ठगतिदायिनी=वैकुण्ठ धामकी प्रापि करनेवाली ।
९८५. रासभावा~रासमण्डलमें आविर्भूत
होनेवाली, ९८६. प्रियाश्िलष्टा~प्रियतम श्यामसुन्दरके
द्वारा आश्लिष्ट, ९८७. प्रष्ठाश्रीकृष्णकी प्रेयसी,
९८८. प्रथमनायिका~श्रीकृष्णको प्रधान नायिका,
९८९. शुद्धा=शुद्धस्वरूपा, ९९०. सुधादेहिनी-
प्रमामृतमय शरीरवाली, ९९९. श्रीरामा=लक्ष्मीके
समान सुन्दर, ९९२. रसमञ्जरी-श्रीकृष्णप्रेम-रसको
प्रकट करनेके लिये मञ्जरीके समान।
९९३. सुप्रभावा=उत्तम प्रभावसे युक्त,
९९४. शुभाचारा-शुभ आचरणवाली, ९९५.
स्वर्नदीनर्मदाम्बिका= गङ्गा तथा नर्मदाको जननी,
९९६. गोमतीचन्द्रभागेड्या=गोमती ओर चन्द्रभागाके
द्वारा स्तवनीय, ९९७. सरयूताप्रपर्णिसूः=सरयू तथा
ताम्रपर्णीं नदीको प्रकट करनेवाली ।
९९८. निष्कलङ्कचरित्रा=कलङ्कशून्य चरित्रवाली,
९९९. निर्गुणा=गुणातीत, १०००. निरञ्जना=
निर्मलस्वरूपा। नारद! यह राधाकृष्णयुगलरूप
भगवान्का सहस्रनाम स्तोत्र हे ।
इसका प्रयतरपूर्वक पाठ करना चाहिये। यह
वृन्दावनके रसको प्राति करानेवाला है। बडे-से-
बडे पापको शान्त कर देता है। अभिलषित
भोगोको देनेवाला महान् साधन है। यह राधा-
माधवको भक्ति देनेवाला है। जिनकी मेधाशक्ति
कभी कुण्ठित नहीं होती तथा जो श्रीराधा-प्रेमरूपी
सुधासिन्धुमे नित्य विहार-सतत अवगाहन करते
हे, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है । श्रीराधादेवी
संसारको सृष्टि करती हैं । वे ही जगत्के पालनमं
तत्पर रहती हँ ओर वे ही अन्तकालमें जगतका
संहार करनेवाली हँ । वे सबकी अधीश्वरी तथा
सवकं जननी हे । मुनीश्वर! यह उन्हीं श्रीराधाकृष्णका
सहस्रनाम मेने तुम्हे बताया है । यह दिव्य सहस्रनाम
भोग ओर मोक्ष देनेवाला है। (नारदपुराण पूर्वभाग
अध्याय ८२)
॥ तृतीय पाद सम्पूर्ण ॥
77 >~^
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((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
यि == क)
[क „~ दक चक्क क ---ॐ =
(~ 1,
~
चत पादं
नारद-सनातन-संवाद्, ब्रह्माजीका मरीचिको ब्रह्मपुराणकी अनुक्रमणिका तथा
उसके पाठश्रवण एवं दानका फल बताना
देवर्षिं नारद विनीतभावसे सनातनजीको प्रणाम
करके बोले--त्रह्यन्! आप पुराणवेत्ताओमें श्रेष्ठ
ओर ज्ञान-विज्ञानमें तत्पर हँ, अतः मुञ्चे पुराणोके
विभागका पूर्णरूपसे परिचय कराइये, जिसके
श्रवण करनेपर सब कुछ सुन लिया जाता है
जिसका ज्ञान होनेपर सव कुछ ज्ञात हो जाता है
ओर जिसे कर लेनेपर सब कुछ किया हुआ हो
जाता हे । पुराणोके स्वाध्यायसे वर्णो ओर आश्रमोके
आचार-धर्मका साक्षात्कार हो जाता है। प्रभो!
पुराण कितने हं 2 उनकी संख्या कितनी है 2 ओर
उनके श्लोकोंका मान क्या है? उन पुराणोमें
कौन-कौनसे आख्यान वर्णित हैँ 2 यह सब मुञ्च
बताइये । चारों व्णसि सम्बन्ध रखनेवाली नाना
प्रकारके त्रत आदिकी कथाएं भी किये । सृष्टक्रमसे
विभिन्न वंशोमे उत्पन्न हए सत्पुरुषोकी जीवनकथाको
भी भली भोति प्रकाशित कीजिये; क्योकि भगवन्।
आपसे अधिक दूसरा कोई पौराणिक उपाख्यानोंका
जानकार नहीं है । इसलिये सव संदेहोका निराकरण
करनेवाले पुराणोका आप मुञ्चसे वर्णन कीजिये।
सूतजी बोले-- ब्राह्यणो ! तदनन्तर नारदजीका
वचन सुनकर वक्ताओमें श्रेष्ट सनातनजी एक क्षण
भगवान् नारायणका ध्यान करके बोले ।
सनातनजीने कहा- मुनिश्रेष्ट! तुम्टं बार-वार
साधुवाद है। पुराणोंका उपाख्यान जाननेके लिये
जो तुम्हें निष्ठायुक्त वुद्धि प्राप्त दई है, वह सम्यूरण
लोकांका उपकार करनेवाली दै । पूर्वकालमं ब्र्माजीने
पुत्रस्रेहसे परिपूर्ण चित्त होकर मरीचि आदि
ऋषियोमे इस विषयमे जो कुद कहा धा, उसीका
तुमसे वर्णन करता हूं । एक समय ब्रह्माजीके पुत्र
मरीचिने, जो स्वाध्याय ओर शास्त्रज्ञानसे सम्पन्न
तथा वेद-वेदाद्गोके पारद्गत विद्वान् है, अपने
पिता लोकस्र्टा ब्रह्माजीके पास जाकर उन्हे
भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। दृसरोको मान देनेवाले
मुनीश्वर! प्रणामके पश्चात् उन्होने भी निर्मल
पौराणिक उपाख्यानके विषयमे, जैसा कि तुम
पृते हो, यही प्रश्र किया था।
मरीचिने कहा- भगवन्! देवदेवेश्वर ! आप
सम्पूर्णं लोकोंकी उत्पत्ति ओर लयके कारण हेँ।
सर्वज्ञ, सबका कल्याण करनेवाले तथा सब्रके
साक्षी है, आपको नमस्कार है। पिताजी! मुञ्च
पुराणोके बीज, लक्षण, प्रमाण, वक्ता ओर श्रोता
वताइये । मै वह सव सुननेको उत्सुक दं ।
ब्रह्माजीने कटहा-- वत्स! सुनो, भैं पुराणोका
((-0. 1/८1114<511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
५०२
सक्षिप्त नारदपुराण
संग्रह बतला रहा हू, जिसके जान लेनेपर चर
ओर अचरसहित सम्पूर्ण वाङ्मयका सान हो जाता
हे। मानद! सब कल्पोमें एक ही पुराण था,
जिसका विस्तार सौ करोड श्लोकों था। वह
धर्म, अर्थ, काम ओर मोक्ष- चारों पुरुषार्थोका
बीज माना गया है। सब शास्त्रोकी प्रवृत्ति पुराणसे
ही हई है, अतः समयानुसार लोकमें पुराणोंका
ग्रहण न होता देख परम बुद्धिमान् भगवान् विष्णु
प्रत्येक युगमें व्यासरूपसे प्रकट होते हें । वे प्रत्येक
द्वापरमें चार लाख श्लोकोके पुराणका संग्रह
करके उसके अठारह विभाग कर देते ह ओर
भूलोकमें उन्ीका प्रचार करते हें। आज भी
देवलोकमें सो करोड श्लोकोंका विस्तृत पुराण
विद्यमान है। उसीके सारभागका चार लाख
श्लोकोारा वर्णन किया जाता हे। ब्रह्मपुराण,
पद्मपुराण, विष्णुपुराण, वायुपुराण, भागवतपुराण,
नारदपुराण, मार्कण्डेयपुराण, अग्निपुराण, भविष्यपुराण,
ब्रह्यवेवर्तपुराण, लिङ्गपुराण, वाराहपुराण, स्कन्दपुराण,
वामनपुराण, कूर्मपुराण, मत्स्यपुराण, गरुडपुराण
तथा ब्रह्याण्डपुराण-ये अठारह पुराण हैं । अव
सूत्ररूपसे एक-एक का कथानक तथा उसके वक्ता
ओर श्रोताके नाम संक्षेपसे बतलाता हू । एकाग्रचित्त
होकर सुनो। वेदवेत्ता महात्मा व्यासजीने सम्पूर्णं
लोकोके हितके लिये पहले ब्रह्मपुराणका संकलन
किया। वह सव पुराणोमें प्रथम ओर धर्म, अर्थ,
काम एवं मोक्ष देनेवाला है । उसमें नाना प्रकारके
आख्यान ओर इतिहास हे । उसको श्लोक-संख्या
दस हजार बतायी जाती है । मुनीश्वर ! उसमं देवताओं,
असुरों ओर दक्ष आदि प्रजापतियोंको उत्पत्ति कही
गयी है । तदनन्तर उसमें लोकेश्वर भगवान् सूर्यके
पुण्यमय वंशका वर्णन किया गया है, जो महापातर्कोका
नाश करनेवाला है । उसी वंशमें परमानन्दस्वरूप
तथा चतुर्व्यहावतारी भगवान् श्रीरामचनद्रजीके अवतारकी
कथा कही गयी है। तदनन्तर उस पुराणमें
चन्द्रवंशका वर्णन आया है ओर जगदीश्वर श्रीकृष्णके
पापनाशक चसित्रिका भी वर्णन किया गया हे । सम्पूर्ण
दीपो, समस्त वर्षा तथा पाताल ओर स्वर्गलोकका
वर्णन भी उस पुराणमें देखा जाता हे । नरकोका
वर्णन, सू्यदेवक स्तुति ओर कथा एवं पार्वतीजीके
जन्म तथा विवाहका प्रतिपादन किया गया हे।
तदनन्तर दक्ष प्रजापतिको कथा ओर एकाग्रकक्षेत्रका
वर्णन है । नारद । इस प्रकार इस ब्रह्मपुराणके पूर्व
भागका निरूपण. किया गया हे। इसके उत्तर भागमें
तीर्थयात्रा-विधिपूर्वक पुरुषोत्तम क्षेत्रका विस्तारके
साथ वर्णन किया गया हे। इसीमें श्रीकृष्णचरित्रका
विस्तारपूर्वक उदेख हआ हे। यमलोकका वर्णन
तथा पितरोके श्राद्धकी विधि है। इस उत्तर भागमे
ही वर्णो ओर आश्रमोके धर्मोका विस्तारपूर्वक
निरूपण किया गया हे । वैष्णव-धर्मका प्रतिपादन,
युगोका निरूपण तथा प्रलयका भी वर्णन आया
हे । योगोंका निरूपण, सांख्यसिद्धान्तोका प्रतिपादन,
ब्रह्मवादका दिग्दर्शन तथा पुराणकी प्रशंसा आदि
विषय आये हैँं। इस प्रकार दो भागोंसे युक्त
ब्रह्मपुराणका वर्णन किया गया है, जो सव पापोका
नाशक ओर सव प्रकारके सुख देनेवाला है।
इसमें सूत ओर शौनकका संवाद है । यह पुराण भोग
ओर मोक्ष देनेवाला हे। जो इस पुराणको लिखकर
वैशाखकी पूर्णिमाको अन्न, वस्त्र ओर आभूषणोद्रारा
पौराणिक ब्राह्मणकी पूजा करके उसे सुवर्णं ओर
जलधेनुसहित इस लिखे हए पुराणका भक्तिपूर्वक
दान करता हे, वह चन्द्रमा, सूर्य ओर तारोकी स्थिति-
कालतक ब्रह्मलोकमें वास करता हे। ब्रह्मन्! जो
ब्रह्मपुराणकी इस अनुक्रमणिका (विषय-सूची) -का
पाठ अथवा श्रवण करता है, वह भी समस्त पुराणके
पाठ ओर श्रवणका फल पा लेता है। जो अपनी
इद्धियोंको वशमं करके हविष्यात्र भोजन करते हुए
((-00. ॥॥८111164॥९51101 8118\//811 \/8/8185| 01661100. [01260 0 6870011
पूर्वभाग-चतुर्थं पाद
नियमपूर्वक समूचे ब्रह्मपुराणका श्रवण करता हे
वह ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। वत्स! इस विषयमे
^>
[ क
५०३
अधिक कहनेसे क्या लाभ ? इस पुराणके कीर्तनसे
मनुष्य जो-जो चाहता है, वह सव पा लेता है।
(शह्धिः ^ + +
पद्यपुराणका लक्षण तथा उसमे वर्णित विषयोंकी अनुक्रमणिका
ब्रह्माजी कहते है- वेरा! सुनो, अब मेँ
पद्मपुराणका वर्णन करता हूं। जो मनुष्य प्रसत्नतापूर्वक
इसका पाठ ओर श्रवण करते हे, उन्हें यह महान्
पुण्य देनेवाला है। जेसे सम्पूर्णं देहधारी मनुष्य
पांच ज्ानेनद्धियोसे युक्त बताया जाता है, उसी
प्रकार यह पापनाशक पद्मपुराण पांच खण्डोसे
युक्त कहा गया हे । ब्रह्मन्! जिसमें महर्षिं पुलस्त्यने
भीष्मको सृष्टि आदिके क्रमसे नाना प्रकारके
उपाख्यान ओर इतिहास आदिके साथ विस्तारपूर्वक
धर्मका उपदेश किया हे। जहां पुष्करतीर्थका
माहात्म्य विस्तारपूर्वक कहा गया है, जिसमें
ब्रह्म-यक्ञकी विधि, वेदपाठ आदिका लक्षण, नाना
प्रकारके दानों ओर ब्रतोका पृथकू-पृथक् निरूपण,
पार्वतीका विवाह, तारकासुरका विस्तृत उपाख्यान
तथा गौ आदिका माहात्म्य है, जो सबको पुण्य
देनेवाला है, जिसमे कालकेय आदि दैत्योकि
वधकौ पृथक्-पृथक् कथा दी गयी है तथा
द्विजश्रेष्ठ ! जहाँ ग्रहोके पूजन ओर दानकी विधि
भी बतायी गयी हि, वह महात्मा श्रीव्यासजीके
द्वारा कहा हुआ ' सृष्टिखण्ड ' है ।
पिता-माता आदिक पूजनीयताके विषयमे
शिवशर्माकी प्राचीन कथा, सुत्रतकी कथा, वृत्रासुरके
वधको कथा, पृथु, वेन ओर सुनीथाको कथा,
सुकलाका उपाख्यान, धर्मका आख्यान, पिताक
सेवाके विषयमे उपाख्यान, नहूषको कथा,
ययातिचरित्र, गुरुतीर्थका निरूपण, राजा ओर
जेभिनिके संवादमें अत्यन्त आश्र्यमयी कथा,
अशोक सुन्दरीकी कथा, हण्ड दैत्यका वध,
कामोदाको कथा, विहुण्ड दैत्यका वध, महात्मा
च्यवनके साथ कुञ्जलका संवाद, तदनन्तर
सिद्धोपाख्यान ओर इस खण्डके फलका विचार-ये
सव विषय जिसमें कहे गये हों, वह सूत-शौनक-
संवादरूप ग्रन्थ " भूमिखण्ड' कहा गया है ।
जहां सौति तथा महर्षियोके संवादरूपसे
ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति बतायी गयी है, पृश्वीसहितं
सम्पूर्णं लोकोंकी स्थिति ओर तीर्थोका वर्णन
किया गया हे । तदनन्तर जहां नर्मदाजीकी उत्पत्नि-
कथा ओर उनके तीर्थोका पृथक्-पृथक् वर्णन है
जिसमे कुरुक्षेत्र आदि तीर्थोको पुण्यमयी कथा
कही गयी है, कालिन्दीको पुण्यकथा, काशी-
माहात्म्य- वर्णन तथा गया ओर प्रयागके पुण्यमय
माहात्म्यका निरूपण दै, वर्णं ओर आश्रमके
अनुकूल कर्मयोगका निरूपण, पुण्यकर्मको कथाको
लेकर व्यास-जेमिनि-संवाद, समुद्र-मन्थनकी कथा,
त्रतसम्बन्धी उपाख्यान, तदनन्तर कार्तिकके अन्तिम
पोच दिन (भीष्मपञ्चक)-का माहात्म्य तथा
सर्वापराधनिवारक स्तोत्र-ये सब विषय जहां
आये है, वह ' स्वर्गखण्ड' कहा गया हे । ब्रह्मन्!
यह सव पातकोंका नाश करनेवाला ह।
रामाश्चमेधके प्रसद्भमं प्रथम रामका राज्याभिषेक,
अगस्त्य आदि महर्षियांका आगमन, पुलस्त्यवंशक्ा
वर्णन, अश्चमेधका उपदेश, अश्चमेधीय अश्चका
पृथ्वीपर विचरण, अनेक राजाओओंकी पुण्यमयी
कथा, जगत्राथजीको महिमाका निरूपण, वृन्दावनका
सर्वेपापनाशक माहात्म्य, कृष्णावतारधारी श्रीदस्किी
नित्य लीलाभोका कथन, वैशाखस्नानकी मदमा,
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (0166101. 01411260 0 6810011
५०
संक्षिप्त नारदपुराण
स्नान-दान ओर पूजनका फल, भृमि-वाराह-
संवाद, यम ओर ब्राह्मणक कथा, राजदूतोंका
संवाद, श्रीकृष्णस्तोत्रका निरूपण, शिवशम्भु-समागम,
दधीचिको कथा, भस्मका अनुपम माहात्म्य, उत्तम
शिव-माहात््य, देवरातसुतोपाख्यान, पुराणवेत्ताकी
प्रशंसा, गौतमका उपाख्यान ओर शिवगीता तथा
कल्पान्तरमे भरद्राज-आश्रममें श्रीरामकथा आदि
विषय “ पातालखण्ड'के अन्तर्गत हैं। जो सदा
इसका श्रवण ओर पाठ करते है, उनके सब
पापोका नाश करके यह उन्हे सम्पूर्णं अभीष्ट
फलोंकी प्रापि कराता हे।
पोचवें खण्डमें पहले भगवान् शिवके द्वारा
गोरीदेवीके प्रति कहा हुआ पर्वतोपाख्यान हे।
तत्पश्चात् जालन्धरकी कथा, श्रीशैल आदिका
माहात्म्यकोर्तन ओर राजा सगरको पुण्यमयी कथा
है । उसके बाद गङ्ख, प्रयाग, काशी ओर गयाका
अधिक पुण्यदायक माहात्म्य कहा गया है । फिर
अन्नादि दानका माहात्म्य ओर महाद्वादशीत्रतका
उदेख हे । तत्पश्चात् चौबीस एकादशियोंका पृथक्-
पृथक् माहात्म्य कहा गया हे । फिर विष्णुधर्मका
निरूपण ओर विष्णुसहस्रनामका वर्णन है । उसके
वाद कारतिकत्रतका माहात्म्य, माघ-स्नानका फल
तथा जम्बृद्रीपके तीर्थोकी पापनाशक महिमाका
वर्णन हे। फिर साश्रमती (साबरमती) -का माहात्म्य,
नृसिंहोत्पत्तिकथा, देवशर्मा आदिका उपाख्यान ओर
गीतामाहात्म्यका वर्णन है। तदनन्तर भक्तिका
आख्यान, श्रीमद्धागवतका माहात्म्य ओर अनेक
तीर्थोकी कथासे युक्त टन्द्रप्रस्थको महिमा हे।
इसके बाद मन्त्ररत्रका कथन, त्रिपादविभूतिका
वर्णन तथा मत्स्य आदि अवतारोकौ पुण्यमयी
=
909१
अवतार-कथा है। तत्पश्चात् अष्टोत्तरशत दिव्य
राम-नाम ओर उसके माहात्म्यका वर्णन है।
वाडव! फिर महर्षिं भृगुद्वारा भगवान् विष्णुके
वेभवको परीक्षाका उलेख दै। इस प्रकार यह
पोचवाँ उत्तरखण्ड' कहा गया है, जो सब प्रकारके
पुण्य देनेवाला है। जो श्रष्ठ मानव पोच खण्डोसे
युक्त पद्मपुराणका श्रवण करता है, वह इस लोकमें
मनोवाचज्छित भोगोंको भोगकर वैष्णव धामको प्राप्त
कर लेता है। यह पद््रपुराण पचपन हजार श्लोकोसे
युक्त हे। मानद! जो इस पुराणको लिखवाकर
ज ह्न
पुराणज् ब्राह्मणका भली भोति सत्कार करके ज्येष्टको
पूर्णिमाको स्वर्णमय कमलके साथ इस लिखित
पुराणका उक्त पुराणवेत्ता ब्राह्मणको दान करता है
वह सम्पूर्णं देवताओंसे वन्दित होकर वेष्णव धामको
चला जाता है। जो पद्मपुराणकी इस अनुक्रमणिकाका
पाठ तथा श्रवण करता हे, वह भी सम्पूर्णं पद्मपुराणके
श्रवणजनित फलको प्राप्त कर लेता हे।
०११;
&>०, न | (द , + +
((-0. 1/111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग- चतुर्थं पाद
"५०५
विष्णुपुराणका स्वरूप ओर विषयानुक्रमणिका
श्रीब्रह्माजी कहते है-- वत्स ! सुनो, अव में
वैष्णव महापुराणका वर्णन करता हूं। इसकी
श्लोक-संख्या तेईस हजार हे । यह सब पातकोंका
नाश करनेवाला हे । इसके पूर्वभागमें शक्तिनन्दन
पराशरजीने मेत्रेयको छः अंश सुनाये ह, उनमेसे
प्रथम अंशमें इस पुराणको अवतरणिका दी गयी
हे। आदिकारण सर्ग, देवता आदिकी उत्पत्ति,
समुद्रमन्थनकौ कथा, दक्ष आदिके वंशका वर्णन,
ध्रुव तथा पृथुके चरित्र, प्राचेतसका उपाख्यान,
प्रहादको कथा ओर ब्रह्माजीके द्वारा देव, तिर्यक्,
मनुष्य आदि वगकि प्रधान-प्रधान व्यक्तियोको
पृथक्-पृथक् राज्याधिकार दिये जानेका वर्णन-इन
सब विषयोंको प्रथम अंश कहा गया हे ।
प्रियव्रतके वंशका वर्णन, द्वीपों ओर वर्षोका
वर्णन, पाताल ओर नरकोंका कथन, सात स्वर्गोका
निरूपण, पृथक् -पृथक् लक्षणोसे युक्त सूर्य आदि
ग्रहोकी गतिका प्रतिपादन, भरत- चरित्र, मुक्तिमार्ग-
निदर्शन तथा निदाघ एवं ऋभुका संवाद-ये सव
विषय द्वितीय अंशके अन्तर्गत कहे गये हें ।
मन्वन्तरोका वर्णन, वेदव्यासका अवतार तथा
इसके वाद नरकसे उद्धार करनेवाला कर्म कहा
गया है। सगर ओर ओर्वके संवादमें सव धर्मोका
निरूपण, श्राद्धकल्प तथा वर्णाश्रमधर्म, सदाचार-
निरूपण तथा मायामोहकी कथा- यह सव विषय
तीसरे अंशमें बताया गया है, जो सव पा्पोका
नाश करनेवाला है।
मुनिश्रेष्ट ! सूर्यवंशको पवित्र कथा, चनद्रवंशका
वर्णन तथा नाना प्रकारके राजाओंका वृत्तान्त
चतुर्थं अंशके अन्तर्गत टे ।
श्रीकृष्णावतारविषयक प्रश्न, गोकुलका कथा,
वाल्यावस्थामें श्रीकृष्णद्रारा पृतना आदिका वध,
कुमारावस्थामं अघासुर अदिकी हिंसा, किशोरावस्थामें
उनके द्वारा कसका वध, मथुरापुरीकी लीला,
तदनन्तर युवावस्थामें द्वारकाकी लीलां समस्त
देत्योका वध, भगवानूके पृथक्-पृथक् विवाह,
द्वारकामें रहकर योगीश्चरोके भी ईश्वर जगन्नाथ
श्रीकृष्णके द्वारा शत्रुओंके वध आदिके साथ-साथ
पृथ्वीका भार उतारा जाना ओर अष्ावक्रजीका
उपाख्यान-ये सब बातें पांचवें अंशके अन्तर्गत है।
कलियुगका चरित्र, चार प्रकारके महाप्रलय
तथा केशिध्वजके द्वारा खाण्डिक्य जनकको ब्रह्मञ्ञानका
उपदेश इत्यादि विषयोको छटा अंश कहा गया है।
इसके वाद विष्णुपुराणका उत्तर भाग प्रारम्भ
होता है, जिसमें शौनक आदिके द्वारा आदरपूर्वक
पूरे जानेपर सूतजीने सनातन “ विष्णुधर्मोत्तर'
नामसे प्रसिद्ध नाना प्रकारके धर्मोकी कथार्पं की
हे । अनेकानेक पुण्यव्रत, यम-नियम, धर्मशास्त्र,
अर्थशास्त्र, वेदान्त, ज्योतिष, वंशवर्णनके प्रकरण,
स्तोत्र, मन्त्र तथा सब लोगोका उपकार करनेवाली
नाना प्रकारकी विद्याएं सुनायी है । यह विष्णुपुराण
हे, जिसमें सव शास्त्रोके सिद्धान्तका संग्रह हुआ
ठे। इसमें वेदव्यासजीने वाराहकल्पका वृत्तान्त
कहा है। जो मनुष्य भक्ति ओर आदरके साथ
विष्णुपुराणको पढते ओर सुनते हँ, वे दोनों यहां
मनोवाच्छित भोग भोगकर विष्णुलोके चले जाते
है। जो इस पुराणको लिखवाकर या स्वयं
लिखकर आपादको पूर्णिमाको घृतमयी धेनुके
साथ पुराणार्थवेत्ता विष्णुभक्तं ब्राह्यणको दान करता
टै, वह सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्रारा वैकुण्टधाममे
जाता टै। ब्रह्मन्! जो विष्णुपुराणको इस
विषयानुक्रमणिकाको कहता अथवा सुनता है, वेह
समूचे पुराणकर पठन एवं श्रवणका फल पाता दै ।
^+ 22 (८ ५/-# ^ #
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
५०६
संक्षिप्त नारदपुराण
वायुपुराणका परिचय तथा उसके दान एवं श्रवण आदिका फल
ब्रह्माजी कहते है-- ब्रह्मन्! सुनो, अब में
वायुपुराणका लक्षण बतलाता हू जिसके श्रवण
करनेपर परमात्मा भगवान् शिवका धाम प्राप्त होता हे ।
यह पुराण चौबीस हजार श्लोकोंका बतलाया गया हे।
जिसमें वायुदेवने धैतकल्पके प्रसङ्खसे धर्मोका उपदेश
किया हे, उसे वायुपुराण कहा गया हे। वह पूर्वं ओर
उत्तर दो भागोसे युक्त हे । ब्रह्यन्। जिसमें सर्ग आदिका
लक्षण विस्तारपूर्वक बतलाया गया है, जहाँ भित्न-
भित्न मन्वन्तरोमें रजाओके वंशका वर्णन हे ओर जहां
गयासुरके वधकी कथा विस्तारके साथ कही गयी है
जिस सब मासोक्ा माहात्म्य बताकर माघमासका
अधिक फल कहा गया हे, जहां दानधर्मं तथा राजधर्म
अधिक विस्तारसे कटे गये हे, जिसमें पृथ्वी, पाताल,
दिशा ओर आकाशमें विचरनेवाले जीवोंके ओर
त्रत आदिके सम्बन्धे निर्णय किया गया हे, वह
वायुपुराणका पूर्व भाग कहा गया हे ।
मुनीश्वर! उसके उत्तरभागमे नर्मदाके तीर्थोका
वर्णन है ओर विस्तारके साथ शिवसंहिता कही गयी
हे। जो भगवान् सम्पूर्ण देवताओकि लिये दुर्ेय ओर
सनातन है, वे जिसके तटपर सदा सर्वतोभावेन
निवास करते ह, वही यह नर्मदाका जल ब्रह्मा हे
यही विष्णु है ओर यही सर्वोत्कृष्ट साक्षात् शिव हे ।
यह नर्मदाजल ही निराकार ब्रह्म तथा केवल्य मोक्ष
है। निश्चय ही भगवान् शिवने समस्त लोकोंका हित
करनेके लिये अपने शरीरसे इस नर्मदा नदीके रूपमे
किसी दिव्य शक्तिको ही धरतीपर उतारा हे। जो
नर्मदाके उत्तर तटपर निवास करते है, वे भगवान्
रुद्रके अनुचर होते है ओर जिनका दक्षिण तटपर
निवास है, वे भगवान् विष्णुके लोकमें जाते ह ।
ॐॐकारिश्वरसे लेकर पश्चिम समुद्रतक नर्मदा नदीमें
दूसरी नदियेकि पतीस पापनाशक संगम हैँ, उन्मंसे
ग्यारह तो उत्तर तटपर है ओर तेईस दक्षिण तटपर।
पेतीस्वां तो स्वयं नर्मदा ओर समुद्रका संगम कहा
गया हे । नर्मदाके दोनों तटोपर इन संगमोके साथ चार
सौ प्रसिद्ध तीर्थं है। मुनीश्वर! इनके सिवा अन्य
साधारण तीर्थं तो रेवाके दोनों तर्योपर पग-पगपर
विद्यमान है, जिनकी संख्या साठ करोड़ साठ हजार
है। यह परमात्मा शिवकी संहिता परम पुण्यमयी है,
जिसमें वायुदेवताने नर्मदाके चरित्रिका वर्णन किया हे।
जो इस पुराणको लिखकर गुडमयी धेनुके साथ
श्राबणकी पूर्णिमाको भक्तिपूर्वक कुटुम्बी ब्राह्मणक
हाथमे दान देता है, वह चौदह इनद्रोके राज्यकालतक
रुद्रलोके निवास करता है। जो मनुष्य नियमपूर्तंक
हविष्य भोजन करते हए इस वायुपुराणको सुनाता
अथवा सुनता है, वह साक्षात् रद्र है, इसमं संशय नही
हे। जो इस अनुक्रमणिकाको सुनता ओर सुनाता हं
वह भी समस्त पुराणके श्रवणका फल पा लेता हे।
((-0. 1/८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-चतुर्थं पाद
५ ०७9
श्रीमद्धागवतक्ा परिचय, माहात्म्य तथा दानजनित फल
ब्रह्माजी कहते दहै- मरीचे! सुनो,
वेदव्यासजीने जो वेदतुल्य श्रीमद्भागवत नामक
महापुराणका सम्पादन किया है, वह अठारह
हजार श्लोकोंका बतलाया गया है। यह
पुराण सब पापोंका नाश करनेवाला है । यह
बारह शाखाओंसे युक्त कल्पवृक्षस्वरूप है ।
विप्रवर ! इसमें विश्वरूप भगवान्का ही प्रतिपादन
किया गया हे। इसके पहले स्कन्धे सूत
ओर शौनकादि ऋषियोके समागमका प्रसंग
उठाकर व्यासजी तथा पाण्ड्वोके पवित्र चरित्रका
वर्णन किया गया है। इसके बाद परीक्षित्के
जन्मसे लेकर प्रायोपवेशनतककौी कथा कही
गयी है । यहीं तक प्रथम स्कन्धका विषय हे ।
फिर परीकषित्-शुकसंवादमें स्थूल ओर सूक्ष्म
दो प्रकारकी धारणाओंका निरूपण है । तदनन्तर
ब्रह्म-नारद-संवादमें भगवान्के अवतारसम्बन्धी
अमृतोपम चरित्रोका वर्णन है। फिर पुराणका
लक्षण कहा गया हे । बुद्धिमान् व्यासजीने यह
द्वितीय स्कन्धका विषय बताया है, जो सृष्टिक
कारणतत्त्वंकी उत्पत्तिका प्रतिपादक है। तत्पश्चात्
विदुरका चरित्र, मेत्रेयजीके साथ विदुरका
समागम, परमात्मा ब्रह्मसे सृष्टिक्रमका निरूपण
ओर महर्षिं कपिलद्वारा कहा हुआ सांख्य- यह
सब विषय तृतीय स्कन्धके अन्तर्गत बताया
गया है। तदनन्तर पहले सतीचरित्र, फिर
ध्रुवका चरित्र, तत्पश्चात् राजा पृथुका पवित्र
उपाख्यान, फिर राजा प्राचीनवर्हिषूकरौ कथा- यह
सब विसर्गविषयक परम उत्तम चौथा स्कन्ध
कहा गया टहै। राजा प्रियव्रत ओर उनके
पु््रोका पुण्यदायक चरित्र, ब्रह्माण्डके अन्तर्गत
विभिन्न लोका वर्णन तथा नर्क स्थिति-यह
संस्थानविषयक पाचों स्कन्ध हे। अजामिलका
चरित्र, दक्ष प्रजापतिद्वारा की हुई सृष्टिका
निरूपण, वृत्रासुरको कथा ओर मरुद्रणोका
पुण्यदायक जन्म- यह सब व्यासजीके द्वारा
छटा स्कन्ध कहा गया दै । वत्स ! प्रह्ादका
पुण्यचरित्र ओर वर्णाश्रमधर्मका निरूपण यह
सात्वं स्कन्ध बताया गया हे। यह “ऊति"
अथवा कर्मवासनाविषयक स्कन्ध है। इसमें
उसीका प्रतिपादन किया गया है। तत्पश्चात्
मन्वन्तरनिरूपणके प्रसंगमें गजेन्द्रमोक्षकी कथा,
समुद्रमन्थन, बलिक एेश्र्यकौ वृद्धि ओर
उनका बन्धन तथा मत्स्यावतारचरित्र-यह
आठ्वोँं स्कन्ध कहा गया है। महामते!
सूर्यवंशका वर्णन ओर चन्द्रवंशका निरूपण- यह
वंशानुचरितविषयक नवां स्कन्ध बताया गया
हे । श्रीकृष्णका बालचरित, कुमारावस्थाकी
लीला्प व्रजमें निवास, किशोरवस्थाकी लीलार्षं
मथुरामे निवास, युवावस्था, द्वारकामं निवास
ओर भूभारहरण-- यह निरोधविषयक दसवां
हे । नारद-वसुदेव-संवाद, यदु-दत्तात्रेय-
संवाद ओर श्रीकृष्णके साथ उद्धवका संवाद,
आपसके कलहसे यादवोंका संहार-यह
सब मुक्तिविषयक ग्यारह्वँ स्कन्ध दे।
भविष्य राजाओंका वर्णन, कलिधर्मका
निर्देश, राजा परीक्षित्के मोक्षका प्रसद्ध,
वेदाकी शाखाओंका विभाजन, मार्कण्डेयजीकी
तपस्या, सूर्यदेवको विभूतिर्योका वर्णन, तत्पशात्
भागवती विभूतिका वर्णन ओर अन्ते पुराणोकी
श्लोक-संख्याका प्रतिपादन-यह सब
आश्रयविषयक बारहवा स्कन्ध है। वत्स
इस प्रकार तुम्हे श्रीमद्धागवतका परिचय
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0\ 6810011
५०८
संक्षिप्त नारदपुराण
दिया गया है। वह वक्ता, श्रोता, उपदेशक,
अनुमोदक ओर सहायक- सबको भक्ति,
भोग ओर मोक्ष देनेवाला है। जो भगवान्की
भक्ति चाहता हो, वह भाद्रपदकी पूर्णिमाको
सोनेके सिंहासनके साथ इस भागवतका
भगवद्दरक्त ब्राह्मणको प्रेमपूर्वक दान करे।
उसके पहले वस्त्र ओर सुवर्णं आदिके द्वारा
ब्राह्मणको पूजा कर लेनी चाहिये। जो
मनुष्य भागवतको इस विषयानुक्रमणिकाका
दूसरेको श्रवण कराता अथवा स्वयं सुनता
हे, वह समस्त पुराणके श्रवणका उत्तम
फल प्राप्त कर लेता है।
न् + #ै कै
कक» 11५0
नारदपुराणको विषय-सूची, इसके पाठ, श्रवण ओर दानका फल
ब्रह्माजी कहते हे - ब्रह्मन्! सुनो, अब में
नारदीय पुराणका वर्णन करता हूँ । इसमें पचीस
हजार श्लोक ठँ । इसमें वृहत्कल्पकी कथाका
आश्रय लिया गया है। इसमें पूर्वभागके प्रथम
पादमें पहले सूत-शौनक-संवाद है; फिर सृष्टिका
संक्षेपसे वर्णन है । फिर महात्मा सनकके द्वारा
नाना प्रकारके धर्मोकौ पुण्यमयी कथाएँ कही
गयी हँ । पहले पादका नाम "प्रवृत्तिधर्म" है।
दूसरा पाद 'मोक्षधर्म'के नामसे प्रसिद्ध है।
उसमे मोक्षके उपायोंका वर्णन है । वेदाद्भोका
वर्णन ओर शुकदेवजीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग विस्तारके
साथ आया है । सनन्दनजीने महात्मा नारदको इस
द्वितीय पादका उपदेश किया है। तृतीय पादमें
सनत्कुमार मुनिने नारदजीको महातन्त्रवर्णित
` पशुपाशविमोक्ष' का उपदेश दिया है । फिर गणेश,
सूर्य, विष्णु, शिव ओर शक्ति आदिके मन्त्रोका
शोधन, दीक्षा, मन्त्रोद्धार, पूजन, प्रयोग, कवच,
सहस्रनाम ओर स्तोत्रका क्रमशः वर्णन किया
है । तदनन्तर चतुर्थ पादमें सनातन मुनिने नारदजीसे
पुराणोका लक्षण, उनकी श्लोकसंख्या तथा
दानका पृथक्-पृथक् फल बताया है । साथ ही
उन दानोका अलग-अलग समय भी नियत किया
हे । इसके वाद चैत्र आदि सब मासोमे पृथक्-
पृथक् प्रतिपदा आदि तिथियोंका सर्वपापनाशक
व्रत बताया हे । यह ' बृहदाख्यान ' नामक पूर्वभाग
बताया गया है। इसके उत्तर भागमें एकादशी
व्रतके सम्बन्धे किये हुए प्रश्नके उत्तरमें महर्षि
वशिष्टके साथ राजा मान्धाताका संवाद उपस्थित
किया गया हे । तत्पश्चात् राजा रुक्माद्गदकी पुण्यमयी
कथा, मोहिनीकी उत्पत्ति, उसके कर्म, पुरोहित
वसुका मोहिनीके लिये शाप, फिर शापसे उसके
उद्धारका कार्य, गद्धाको पुण्यतम कथा, गयायात्रावर्णन,
काशीका अनुपम माहात्म्य, पुरुषोत्तमक्षेत्रका वर्णन,
उस क्षेत्रकी यात्राविधि, तत्सम्बन्धी अनेक
उपाख्यान, प्रयाग, कुरुक्षेत्र ओर हरिद्रारका
माहात्म्य, कामोदाको कथा, बदरीतीर्थका माहात्म्य,
कामाक्षा ओर प्रभासक्षेत्रकी महिमा, पुष्करकषेत्रका
माहात्म्य, गौतममुनिका आख्यान, वेदपादस्तोत्र,
((-0. 1/1114<511॥1 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 68110011
पूर्वभाग-चतुर्थं पाद
५०९
गोकर्णक्षेत्रका माहात्म्य, लक्ष्मषणजीकी कथा,
सेतुमाहात्म्यकथन, नर्मदाके तीर्थोका वर्णन,
अवन्तीपुरीको महिमा, तदनन्तर मथुरा-माहात्म्य,
वृन्दावनकौ महिमा, वसुका ब्रह्माके निकट जाना,
तत्पश्चात् मोहिनीका तीथमिं भ्रमण आदि विषय
हें । इस प्रकार यह सब नारदमहापुराण है । जो
मनुष्य भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्त हो इस पुराणको
सुनता अथवा सुनाता हे, वह ब्रह्मलोकमें जाता
हे । जो आशचिनकी पूर्णिमाके दिन सात धेनुओंके
साथ इस पुराणका श्रेष्ट ब्राह्मणोंको दान करता
हे, वह निश्चय ही मोक्ष पाता है। जो एकचित्त
होकर नारदपुराणकी इस अनुक्रमणिकाका वर्णन
अथवा श्रवण करता है, वह भी स्वर्गलोकमें
जाता हेै।
८८ {५0 #
मार्कण्डयपुराणका परिचय तथा उसके श्रवण एवं दानका माहात्म्य
श्रीब्रह्माजी कहते है -- मुने! अव मै तुम्हें
मार्कण्डयपुराणका परिचय देता हू। यह महापुराण
पटने ओर सुननेवाले पुरुषोके लिये सदा पुण्यदायक
हे। जिसमें पक्षि्योको प्रवचनका अधिकारी बनाकर
उनके द्वारा सब धर्मोका निरूपण किया गया है,
वह मार्कण्डेयपुराण नौ हजार श्लोकोंका है,
एेसा कहा जाता हे । इसमें पहले मार्कण्डेयमुनिके
समीप जैमिनिके प्रश्नका वर्णन है) फिर
धर्मसं्चक पकषियोके जन्मकी कथा कही गयी
है । फिर उनके पूर्वजन्मकी कथा ओर देवराज
इन्द्रके कारण उन्हें शापरूप विकारकी प्रातिका
कथन है। तदनन्तर बलभद्रजीकौी तीर्थयात्रा,
द्रौपदीके पचो पुत्रोंकी कथा, हरिशन्द्रकी
पुण्यमयी कथा, आडी ओर वक पक्षियोंका
युद्ध, पिता ओर पुत्रका उपाख्यान, दन्तात्रेयजीकौ
कथा, महान् आख्यानसहित टै हयचरित्र,
अल्कचरित्रके साथ मदालसाकी कथा, नौ
प्रकारक सृष्टिका पुण्यमय वर्णन, कल्पान्तकालका
निर्देश, यक्ष-सृष्टि- निरूपण, रुद्र आदिकी सृष्टि,
द्रीपचर्याका वर्णन, मनुओं की अनेक पापनाशक
कथाओंका कीर्तन ओर उन्हीमे दुगजिीकी
अत्यन्त पुण्यदायिनी कथा है, जो आठवें
मन्वन्तरके प्रसङ्खमे कही गयी है । तत्पश्चात्
तीन वेदोके तेजसे प्रणवकौ उत्पत्ति, मूर्यदेवके
जन्मकी कथा, उनका माहात्म्य, वैवस्वत मनुके
वंशका वर्णन, वत्सप्रीका चरित्र, तदनन्तर
महात्मा खनित्रकौ पुण्यमयी कथा, राजा
अविक्षित्का चरित्र, किमिच्छिक व्रतका वर्णन,
नरिष्यन्त-चरित्र, इक्ष्वाकु- चरित्र, नल~चरित्र,
श्रीरामचन्द्रजीकी उत्तम कथा, कुशकरे वंशका
वर्णन, सौमवंशका वर्णन, पुरूरवाकी पुण्यमयी
कथा, नहु पका अद्भूत वृत्तान्त, ययातिका पित्र
चरित्र, यदुवंशका वर्णन, श्रीकृष्णकी बाललीला,
उनकी मधुरा ओर द्वारक्राकी लीलां सव
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 60810011
५१०
संक्षिप्त नारदपुराण
अवतारोंकी कथा, सांख्यमतका वर्णन, प्रपञ्चके
मिथ्यात्वका वर्णन, मार्कण्डेयजीका चरित्र
तथा पुराणश्रवण आदिका फल-ये सव
विषय हें । वत्स ! जो मनुष्य इस मार्कण्डेयपुराणका
भक्तिभावसे आदरपूर्वक श्रव्रण करता हे, तह
परम गतिको पाता है। जो इसकौ व्याख्या
करता है, वह भगवान् शिवके लोकमें जाता
है। जो इसे लिखकर हाथीकौ स्वर्णमयी
प्रतिमाके साथ कार्तिककी पूर्णिमाके दिन श्रषठ
ब्राह्मणको दान देता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त
कर लेता हे। जो मार्कण्डयपुराणको इस विषय-
सूचीको सुनता अथवा सुनाता है, वह मनोवाञ्छित
फल पाता हे।
१ |
अगरिपुराणकी अनुक्रमणिका तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका फल
श्रीब्रह्माजी कहते है- अव में अग्रिपुराणका
वर्णन करता हू । जिसमे अग्निदेवने महर्षिं वसिष्टसे
ईशान-कल्पका वर्णन किया हे, वह अग्निपुराण
पंद्रह हजार श्लोकोसे पूर्ण है। उसमे अनेक
प्रकारके चरित्र हँ । यह पुराण अदधत हे । जो लोग
इसका पाठ ओर श्रवण करते हे, उनके समस्त
पापोंको यह हर लेनेवाला हे। इसमे पहले
पुराणविषयक प्रश्न ठै, फिर सव अवतारोको
कथा कही गयी है। तत्पश्चात् सृष्टिका प्रकरण
ओर विष्णुपूजा आदिका वर्णन है। तदनन्तर
अग्निकार्य, मन्त्र, मुद्रादिलक्षण, सर्वदीक्षाविधान
ओर अभिपेकनिरूपण हे। इसके बाद मण्डल
आदिका लक्षण, कुशापामार्जन, पवित्रारोपणविधि,
देवालयविधि, शालग्राम आदिकी पूजा तथा मूर्तियोके
पृथक्-पृथक् चिह्का वर्णन हे । फिर न्यास आदिका
विधान, प्रतिष्ठा, पूर्तकर्म, विनायक आदिका पूजन,
नाना प्रकारकी दीक्षाओंको विधि, सर्वदवप्रतिष्ठा,
ब्रह्याण्डका वर्णन, गङ्गादि तीर्थोका माहात्म्य,
द्वीप ओर वर्षका वर्णन, ऊपर ओर नीचेके
लोकोंकी रचना, ज्योतिश्चक्रका निरूपण, ज्योतिः-
शास्त्र, युद्धजयार्णव, षट्कर्म, मन्न, यन्त्र, ओषधसमूह,
कुन्जिका आदिकी पूजा, छः प्रकारकी न्यासविधि,
कोटिहोमविधि, मन्वन्तरनिरूपण, ब्रह्मचर्यादि आश्रमेकि
धर्म, श्राद्धकल्पविधि, ग्रहयज्ञ, श्रोतस्मार्तकर्म,
प्रायश्चित्तवर्णन, तिधि-त्रत आदिका वर्णन, वार-
व्रतका कथन, नक्षत्रत्रतकी विधिका प्रतिपादन, मासिक
व्रतका निर्देश, उत्तम दीपदानविधि, नवव्यूहपूजन,
नरक-निरूपण, व्रतो ओर दा्नोकी विधिका प्रतिपादन,
नाडीचक्रका संक्षिप्त वर्णन, संध्याकी उत्तम विधि,
गायत्रीके अर्थका निर्देश, लिङ्गस्तोत्र, राज्याभिषेकके
मन्रका प्रतिपादन, राजाओके धार्मिक कृत्य, स्वप्र
सम्बन्धी विचास्क अध्याय (या प्रसङ्ग), शकुन आदिका
निरूपण, मण्डल आदिका निर्देश, रतदीक्षाविधि, रामोक्तं
नीतिका वर्णन, रत्नेकि लक्षण, धनुर्विद्या, व्यवहारदर्शन,
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग- चतुर्थं पाद
देवासुरसंग्रामकौ कथा, आयुर्वेद-निरूपण, गज
आदिको चिकित्सा, उनके रोगोकी शान्ति, गोचिकित्सा,
मनुष्यादि चिकित्सा, नाना प्रकारक पूजा-पद्धति,
विविध प्रकारक शान्ति, छन्दःशास्त्र, साहित्य,
एकाक्षर आदि कोष, सिद्ध शब्दानुशासन (व्याकरण),
स्वगदि वर्गेसि युक्त कोश, प्रलयका लक्षण,
शारीरक (वेदान्त)-का निरूपण, नरक-वर्णन,
योगशास्त्र, ब्रह्मज्ञान तथा पुराणश्रवणका फल-इन
विषयोका प्रतिपादन हुआ हे । ब्रह्मन् ! यही अग्निपुराण
कहा गया हे । जो अग्रिपुराणको लिखकर सुवर्णमय
कमल ओर तिलमयी धेनुके साथ मार्गशीर्षकी
पूणिमाके दिन पौराणिक ब्राह्मणको विधिपूर्वकं
दान देता है, वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता हे।
, इस प्रकार तुम्हें अग्रिपुराणकौ अनुक्रमणिका
कष
बतायी गयी हे, जो इसे पटने ओर सुननेवाले
मनुप्योको इहलोक ओर परलोकमे भी मोक्ष
देनेवाली है।
५ ४५ +
१ 7 4 0
भविष्यपुराणका परिचय तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका माहात्म्य
ब्रह्माजी कहते है-- अव म॑ तुम्हें सब प्रकारक
सिद्धि प्रदान करनेवाले भविष्यपुराणका वर्णन
करता हू, जो सब लोगोके अभीष्ट मनोरथको
सिद्ध करनेवाला है; जिसमे में ब्रह्मा सम्पूर्ण
देवताओंका आदि स्रष्टा बताया गया हूं । पूर्वकालमें
सृष्टिके लिये स्वयम्भू मनु उत्पन्न हए। उन्होने मुञ्च
प्रणाम करके सर्वार्थसाधक धर्मके विषयमे प्रश्न
किया। तब मैने प्रसन्न होकर उन्हें धर्मसंहिताका
उपदेश किया । परम वुद्धिमान् व्यास जव पुरार्णोका
विस्तार करने लगे तो उन्होने उस धर्मसंहिताके
पोच विभाग किये। उनमें नाना प्रकारक आश्चर्यजनक
कथाओंसे युक्त अघोरकल्पका वृत्तान्त है। उस
पुराणमें पहला पर्वे "ब्रह्मपर्व' के नामसे प्रसिद्ध
हे। इसीमें ग्रन्थका उपक्रम टै। सुत-शौनक-
सवादमे पुराणविषयक प्रश्न है । इस्मं अधिकतर
सूर्यदेवका ही चरित्र हे। अन्य सब उपाख्यान भी
इसमे आये हे । इसमें सृष्टि आदिके लक्षण बताये
गये हें । शास्त्रोका तो यह स्वस्वरूप द । इसमं
पुस्तक, लेखक ओर लेख्यका भी लक्षण दिया
गया टै) सव प्रकारके संस्कारोका भी लक्षण
बताया गया दै। पक्षकी आदि सात तिधियकि
सात कल्प कहे गये हैं । अष्टमी आदि तिधियोके
शेष आठ कल्प 'वैष्णवपर्व' में बताये गये है।
"रौवपर्व' मं ब्रह्यपर्वसे भिन्न कथां हैं । ' सौरपर्व'
मे अन्तिम कथाओंका सम्बन्ध देखा जाता दै।
तत्पश्चात् "प्रतिसर्ग पर्व" है, जिसमं पुराणके
उपसंहारका वर्णन है । यह नाना प्रकारके उपादाने
युक्त पाचवां पर्व है। इन पाच पर्वेपिंये पहलेमें
मुञ्च त्रह्मकीो महिमा अधिक दटै। दूसरे ओर तीस
पर्वामिं धमं, काम ओर योक्ष विपयक्तौ सैका
((-0. 1/८11104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
५९२ संक्षिप्त नारदपुराण
क्रमशः भगवान् विष्णु तथा शिवकी महिमाका
वर्णन हे । चौथे पर्वमें सूर्यदेवकी महिमाका प्रतिपादन
, किया गया हे । अन्तिम या पचर्वाँ पर्व प्रतिसर्ग
नामसे प्रसिद्ध है। इसमें सब प्रकारकी कथां हे ।
बुद्धिमान् व्यासजीने इस पर्वका भविष्यकी कथाओकि
साथ उद्लेख किया हे । भविष्यपुराणकी श्लोकसंख्या
चौदह हजार बतायी गयी हे । इसमें ब्रह्मा, विष्णु
आदि सन देवताओंकी समताका प्रतिपादन किया
गया हे। ब्रह्म सर्वत्र सम है। गुणोके तारतम्यसे
उसमे विपमता प्रतीत होती हे। एेसा श्रुतिका कथन
हे। जो विद्वान् ईर्प्या-द्ेष छोडकर सुवर्ण, वस्र,
माला, आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप ओर भक्ष्य-
भोज्य आदि नेवेद्यांसे विधिपूर्वक वाचक ओर पुस्तककी
पूजा करता हे ओर भविष्यपुराणकी पुस्तकको लिखकर | पाठ ओर श्रवण करता है, वह भयंकर पातकोसे मुक्त
गुड्धेनुके साथ पौषको पूर्णिमाको उसका दान करता | होकर ब्रह्मलोकमें चला जाता है । जो भविष्यपुराणकी
हे तथा जो जितेन्द्रिय, निराहार अथवा एक समय | इस अनुक्रमणिकाका पाठ अथवा श्रवण करता ह
हविष्यभोजी एवं एकाग्रचित्त होकर इस पुराणका । वह भी भोग एवं मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
न
१ 7) 0 |
ब्रह्मवेवर्तपुराणका परिचय तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दान आदिकी महिमा
ब्रह्माजी कहते ह- वत्स ! सुनो, अव में तुम्हें | “प्रकृतिखण्ड ' 'गणेशखण्ड ' ओर ' श्रीकृष्णखण्ड '।
दसवें पुराण ब्रह्यवैवर्तका परिचय देता हू, जो | इन चारो खण्डोसे युक्त यह पुराण अटारह हजार
वेदमार्गका साक्षात्कार करानेवाला है । जहाँ देवर्षि | श्लोकोंका बताया गया है। उसमे सूत ओर
नारदको उनके प्रार्थना करनेपर भगवान् सावर्णिने | महर्षियोके संवादमें पुराणका उपक्रम है। उसमें
सम्पूर्णं पुराणोक्त विपयका उपदेश किया था। यह | पहला प्रकरण सृष्टिवर्णनका है । फिर नारदके ओर
पुराण अलौकिक एवं धर्म, अर्थं काम ओर मोक्षका | मेरे महान् विवादका वर्णन है, जिसमें दोनोंका
सारभूत है । इसके पाठ ओर श्रवणसे भगवान् विष्णु | पराभव हुआ था। मरीचे! फिर नारदका शिवलोकगमन
ओर शिवमें प्रीति होती हे। उन दोनोमे अभेद- | ओर भगवान् शिवसे नारदमुनिको ज्ञानक प्रापिका
सिद्धिके लिये इस उत्तम ब्रह्यवेवर्तपुराणका उपदेश | कथन है । तदनन्तर शिवजीके कहनेसे ज्ञानलाभके
किया गया हे। मैने रथन्तर कल्पका जो वृत्तान्त | लिये सावर्णिके सिद्धसेवित आश्रममे, जो परम
बताया था, उसीको वेदवेत्ता व्यासने संक्षिप्त करके | पुण्यमय तथा त्रिलोकीको आश्चर्यमें डालनेवाला
शतकोरिपुराणमें कहा है । व्यासजीने ब्रह्यवैवर्तपुराणके | था, नारदजीके जानेको बात कही गयी है । यह
चार भाग किये हैं, जिनके नाम है" ब्रह्मखण्ड", | "ब्रह्मखण्ड" हे, जो श्रवण करनेपर सव पार्पोका
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 21188 \/8181185। (01661011. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग- चतुर्थं पाद
नाश कर देता हे । तदनन्तर नारद-सावर्णि-संवादका
वर्णन हे। इसमें श्रीकृष्णका माहात्म्य तथा नाना
प्रकारके आख्यान ओर कथा हें । प्रकृतिकी
अंशभूत कलाओंके माहात्म्य ओर पूजन आदिका
विस्तारपूर्वक यथावत् वर्णन किया गया है। यह
प्रकृतिखण्ड' हे, जो श्रवण करनेपर एश्वर्य प्रदान
करता हे। तदनन्तर गणेशजन्मके विषयमे प्रश्न
किया गया हे। पार्वतीजीके द्वारा पुण्यक नामक
महात्रतके अनुष्ठानकी चर्चा है। तत्पश्चात् कार्तिकेय
ओर गणेशजीकी उत्पत्ति कही गयी हे। इसके
वाद कार्तवीर्य अर्जुन ओर जमदगप्निनन्दन परशुरामजीके
अद्भुत चरित्रका वर्णन है, फिर गणेश ओर
परशुरामजीमें जो महान् विवाद हआ था, उसका
उद्ेख किया गया है । यह ' गणेशखण्ड' हे, जो
सब विघ्रोका नाश करनेवाला है। तदनन्तर
श्रीकृष्णजन्मके विषयमे प्रश्न ओर उनके जन्मकों
अद्धुत कथा है । फिर गोकुलमें गमन तथा पूतना
आदिके वधकी आश्र्यमयी कथा हे। तत्पश्चात्
श्रीकृष्णकी बाल्यावस्था ओर कुमारावस्थाको विविध
लीलाओंका वर्णन है। उसके बाद शरत्पूर्णिमाकं
रात्रिम गोपसुन्दरियोके साथ श्रीकृष्णकी रासक्रोडाका
वर्णन है । रहस्यमें श्रीराधाके साथ उनको क्रीडाका
[९ 1 षी | 1 । `
7 ५५ (च
५१३
बहुत विस्तारके साथ प्रतिपादन किया गया है।
तत्पश्चात् अक्रूरजीके साथ श्रीकृष्णके मथुरागमनकी
कथा है। कंस आदिका वध हो जानेके बाद
श्रीकृष्णके द्विजोचित संस्कारका उल्लेख है । फिर
काश्य गोत्रोत्पन्न सान्दीपनि मुनिसे उनके विद्याग्रहणकी
अद्भुत कथा हे। तदनन्तर कालयवनका वध,
श्रीकृष्णका द्वारकागमन तथा वहां उनके द्वारा की
हुईं नरकासुर आदिके वधकौ अद्भूत लीलाओंका
वर्णन हे । ब्रह्मन्! यह श्रीकृष्णखण्ड' है, जो
पटने, सुनने, ध्यान करने, पूजा करने अथवा
नमस्कार करनेपर भी मनुष्योक संसार-दुःखका
खण्डन करनेवाला है । व्यासजीके द्वारा कटे हए
इस प्राचीन ओर अलौकिक ब्रह्मवैवर्तपुराणका
पाठ अथवा श्रवण करनेवाला मनुष्य ज्ञान-
विज्ञानका नाश करनेवाले भयंकर संसार-सागरसे
मुक्त हो जाता है। जो इस पुराणको लिखकर
माघको पूर्णिमाको प्रत्यक्ष धेनुके साथ इसका
दान करता है, वह अज्ञानबन्धनसे मुक्त हो
ब्रह्मलोकको प्राप्त कर तेता है। जो इस
विषय-सूचीको पदता अथवा सुनता है, वह भी
भगवान् श्रीकृष्णको कृपासे मनोवाज्छित फल पा
लेता हे।
ए / ^
@& लिङ्पुराणका परिचय तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका फल
ब्रह्माजी कहते है-वेटा! सुनो, अब में
लिद्गपुराणका वर्णन करता हू, जो पदन तथा
सुननेवालोको भोग ओर मोक्ष प्रदान करनेवाला
हे। भगवान् शङ्करने अग्रिलिङ्गमें स्थित होकर
अग्रि-कल्पकी कथाका आश्रय ले धर्म आदिक
सिद्धिके लिये मुञ्चे जिस लिङ्गपुराणका उपदेश
करिया धा, उसीको व्यासदेवने दो भागोमिं वारक
कहा है। अनेक प्रकारके उपाख्यानोंसे विचित्र
प्रतीत होनेवाला यह लि््गपुराण ग्यारह हजार
श्लोकोये युक्त है ओर भगवान् शिवको महिमाका
सूचक है । यह सव पुरार्णोमं श्र तथा त्रिलौकीका
सारभूत है । पुराणके आरम्भमें पहले प्रश्न है । फिर
संक्षपसे सृष्टिका वर्णन किया गया है। तत्पश्चात्
योगाग्च्यान ओर कल्पाख्यानका वर्णन है । इसके याद्
((-0. 1/८1111(4<511॥1 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 60810011
५९४
लिङ्गके प्रादुभवि ओर उसकी पूजाकी विधि
बतायी गयी है। फिर सनत्कुमार ओर शेल
आदिका पवित्र संवाद है। तदनन्तर दाधिचि-
चरित्र, युगधर्मनिरूपण, भुवन-कोश-वर्णन तथा
सूर्यवंश ओर चन्द्रवंशका परिचय है। तत्पश्चात्
विस्तारपूर्वक सृष्टिवर्णन, त्निपुरको कथा, लिङ्कप्रतिष्टा
तथा पशुपाश-विमोक्षका प्रसङ्ग है। भगवान् शिवके
त्रत, सदाचार-निरूपण, प्रायश्चित्त, अरिष्ट, काशी
तथा श्रीशेलका वर्णन है। फिर अन्धकासुरको
कथा, वाराह- चरित्र, नृसिंह- चरित्र ओर जलन्धर-
वधको कथा हे। तदनन्तर शिवसहस्रनाम, दक्ष-
यज्ञ-विध्वंस, मदन-दहन ओर पार्वतीके पाणिग्रहणकी
कथा
शिवके ताण्डव-नृत्य-प्रसद्ग तथा उपमन्युकी कथा
है। ये सब विषय लिङ्गपुराणके पूर्वभागमें कहे
गये हे । मुने! इसके बाद विष्णुके माहात्म्यका
कथन, अम्बरीषो कथा तथा सनत्कुमार ओर
नन्दी श्वरका संवाद है । फिर शिव-माहात्म्यके साथ
हे। तत्पश्चात् विनायककी कथा, भगवान्
सस्षिप्त नारदपुराण
स्नान, याग आदिका वर्णन, सूर्यपूजाकौ विधि तथा
मुक्तिदायिनी शिवपूजाका वर्णन हे । तदनन्तर अनेक
प्रकारके दान कहे गये हें । फिर श्राद्ध-प्रकरण
ओर प्रतिष्ठातन्त्रका वर्णन हे । तत्पश्चात् अघोरकीर्तन,
व्रजेश्वरी महाविद्या, गायत्री-महिमा, त्रयम्बक-
माहात्म्य ओर पुराणश्रवणके फलका वर्णन हे।
इस प्रकार मेने तुम्हें व्यासरचित लिङ्गपुराणके
उत्तरभागका परिचय दिया है। यह भगवान् रुद्रके
माहात्म्यका सूचक हे । जो इस पुराणको लिखकर
फाल्गुनकौ पूर्णिमाको तिलधेनुके साथ ब्राह्मणको
भक्तिपूर्वक इसका दान करता है। वह जरा-
मृत्युरहित शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता हे। जो
मनुष्य पापनाशक लिङ्घपुराणका पाठ या श्रवण
करता है, वह इस लोकमें उत्तम भोग भोगकर
अन्मे शिवलोकको चला जाता है। वे दोनों
भगवान् शिवके भक्त है ओर गिरिजावल्छभ शिवके
प्रसादसे इहलोक ओर परलोकका यथावत् उपभोग
करते हें, इसमें तनिक भी संशय नहीं हे।
१ ५0 0
वाराहपुराणका लक्षण तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका माहात्म्य
श्रीब्रह्माजी व्कहते है- वत्स! सुनो, अव मेँ
वाराहपुराणका वर्णन करता हूं। यह दो भागोसे
युक्त है ओर सनातन भगवान् विष्णुके माहात्म्यका
सूचक हे । पूर्वकालमें मेरे द्वारा निर्मित जो मानव-
कल्पका प्रसद्ध है, उसीको विद्वानोमें श्रेष्ट साक्षात्
नारायणस्वरूप वेदव्यासने भूतलपर इस पुराणमें
लिपिबद्ध किया डे । वाराहपुराणकी श्लोक-संख्या
चौबीस हजार हे । इसमें सबसे पहले पृथ्वी ओर
वाराहभगवान्का शुभ संवाद है। तदनन्तर आदि
सत्ययुगके वृत्तान्तमें रेभ्यका चरित्र है। फिर
दुर्जयके चरित्र ओर श्राद्धकल्पका वर्णन हे।
तत्पश्चात् महातपाका आख्यान, गौरीकी उत्पत्ति,
विनायक, नागगण, सेनानी (कार्तिकेय), आदित्यगण,
देवी, धनद तथा वृपका आख्यान है । उसके बाद
सत्यतपाके ब्रतकी कथा दी गयी हे। तदनन्तर
अगस्त्यगीता तथा सद्रगीता कही गयी हे। महिषामुरके
विध्वंसमें त्र्या, विष्णु ओर सुद्र- तीनोकी शक्तिर्योका
माहात्म्य प्रकट किया गया है । तत्पश्चात् पर्वाध्याय,
शेतोपाख्यान, गोप्रदानिक इत्यादि सत्ययुगका वृत्तान्त
मैने प्रथम भागमें दिखाया है। फिर भगवद्धर्ममें
व्रत ओर तीर्थोकी कथां है । वत्तीस अपराधोका
शारीरिक प्रायश्चित्त बताया गया है। प्रायः सभी
तीेकि पृथक्-पृथक् माहात््यका वर्णन है । मथुराकी
महिमा विशेषरूपसे दी गयी है । उसके बाद श्राद्ध
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पूर्वभाग-चतुर्थं पाद
आदिकी विधि है। तदनन्तर ऋषिपुत्रके प्रसङ्गसे
यमलोकका वर्णन, कर्मविपाक एवं विष्णुत्रतका
निरूपण है । गोकर्णि पापनाशक माहात्म्यका भी
वर्णन किया गया हे । इस प्रकार वाराहपुराणका यह
र्वभाग कहा गया है। उत्तर भागमें पुलस्त्य ओर
पुरुराजके संवादम विस्तारके साथ सब तीथकि
माहात्म्यका पृथक्-पृथक् वर्णन है । फिर सम्पूर्ण
धर्मोकी व्याख्या ओर पुष्कर नामक पुण्य-पर्वका
भी वर्णन है। इस प्रकार मने तुम्हं पापनाशक
वाराहपुराणका परिचय दिया है। यह पटने ओर
सुननेवालोके मनम भगवद्धक्ति बद़नेवाला हे। जो
मनुष्य इस पुराणको लिखकर ओर सोनेको गरुड
प्रतिमा बनवाकर तिलधेनुके साथ चैत्रकी पूर्णिमाके
दिन भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको दान देता हे, वह
देवताओं तथा महर्षियोसे वन्दित होकर भगवान्
विष्णुका धाम प्राप्त कर लेता है । जो वाराहपुराणकी
इस अनुक्रमणिकाका श्रवण या पाठ करता दे
वह भी भगवान् विष्णुके चरणोमें संसार-बन्धनका
नाश करनेवाली भक्ति प्राप्त कर लेता हे।
(१921 ५४ #
स्कन्दपुराणकी विषयानुक्रमणिका, इस पुराणके पाठ, श्रवण
एवं दानका माहात्म्य
श्रीब्रह्माजी कहते है-- वत्स सुनो, अब मं
स्कन्दपुराणका वर्णन करता हं, जिसके पद-पदमे
साक्षात् महादेवजी स्थित हैँ । मने शतकोटि पुराणम
जो शिवकी महिमाका वर्णन किया है, उसके
सारभूत अर्थका व्यासजीने स्कन्दपुराणमें वर्णन
किया हि। उसमें सात खण्ड किये गये हं । सव
पापोका नाश करनेवाला स्कन्दपुराण इक्यासी
हजार श्लोकोसे युक्त हे । जो इसका श्रवण अथवा
पाट करता है, वह साक्षात् भगवान् शिव ही ह।
इसमें स्कन्दके द्वारा उन शैव धर्मोका प्रतिपादन
किया गया है, जो तत्पुरुष कल्पमें प्रचलित थे ।
वे सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाले द । इसके
पहले खण्डका नाम ' माहैश्वरखण्ड' टै, जा सव
पापोंका नाश करनेवाला है । इसमें बारह हजारसे
कुछ कम श्लोक है । यह परम पवित्र तथा
विशाल कथाओंसे परिपूर्णं है । इसमें सैकड़ं उत्तम
चरित्र हँ तथा यह खण्ड स्कन्दस्वामीके माहात्म्यकरा
सूचक है । माहे श्वरखण्डके भीतर केदारमाहात्म्यमं
पुराणका आरम्भ हुआ है । इसमे पहले दक्षयक्ञको
कथा है । इसके बाद शिवलिद्ग-पूजनका फल बताया
गया है । इसके वाद समुद्र-मन्थनकौ कथा ओर
देवराज इन्द्रके चरित्रका वर्णन है । फिर पार्वतीका
उपाख्यान ओर् उनके विवाहका प्रसद्गं है । तत्पश्चात्
कुमारस्कन्दकी उत्पत्ति ओर तारकासुरके साथ
उनके युद्धका वणन दे । फिर पाशुपतका उपाण््यान
शरीर चण्डकी क्था है। पिर दूतकौ नियुकिका
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५९१६
सक्षि नारदपुराण
कथन ओर नारदजीके साथ समागमका वृत्तान्त | पापनाशक संवादका वर्णन हे । फिर उत्कलप्रदेशके
पुरुषोत्तमक्षत्रका माहात्म्य कहा गया हे । तत्पश्चात्
हे। उसके बाद कुमार-माहात्म्यके प्रसङ्घमें पञ्चतीर्थकी
कथा हे। धर्मवर्मा राजाकी कथा तथा नदियों ओर
समुद्रका वर्णन हे। तदनन्तर इन्द्रद्युम्न ओर नाडीजङ्कको
कथा हे। फिर महीनदीके प्रादुभवि ओर दमनककी
कथा हे। तत्पश्चात् मही-सागर-संगम ओर कुमारेशका
वृत्तान्त हे । इसके वाद नाना प्रकारके उपाख्यानोंसहित
तारकयुद्ध ओर तारकासुरके वधका वर्णन है।
फिर पञ्चलिद्ग-स्थापनकी कथा आयी हे । तदनन्तर
द्वीपोका पुण्यमय वर्णन, ऊपरके लोकोंकी स्थिति,
ब्रह्माण्डको स्थिति ओर उसका मान तथा वर्करेशको
कथा हे। महाकालका प्रादुरभवि ओर उसकी परम
अद्धुत कथा हे। फिर वासुदेवका माहात्म्य ओर
कोरितीर्थका वर्णन हे। तदनन्तर गुपक्षेत्रमे नाना
तीर्थोका आख्यान कहा गया है। पाण्डवोंकी
पुण्यमयी कथा ओर वर्वरीककी सहायतासे
महाविद्याके साधनका प्रसद्ध हे । तत्पश्चात् तीर्थयात्राकी
समाप्ति हे । तदनन्तर अरुणाचलका माहात्म्य तथा
सनक ओर ब्रह्माजीका संवाद है । गौरीकी तपस्याका
वर्णन तथा वहाकि भिन्न-भिन्न तीर्थोका वर्णन है।
महिषासुरको कथा ओर उसके वधका परम
अद्भुत प्रसद्ग कहा गया है । द्रोणाचल पर्वतपर
भगवान् शिवका नित्य निवास बताया गया है । इस
प्रकार स्कन्दपुराणमें यह अद्भुत “माहे श्चरखण्ड!
कहा गया हे।
दूसरा ' वेष्णवखण्ड' हे। अब उसके आख्यानोंका
मुञ्ञसे श्रवण करो । पहले भूमि-वाराह-संवादका
वर्णन हे, जिसमें वेद्धटाचलका पापनाशक माहात्म्य
बताया गया है। फिर कमलाकी पवित्र कथा
ओर श्रीनिवासको स्थितिका वर्णन है। तदनन्तर
कुम्हारको कथा तथा सुवर्णमुखरी नदीके माहात्म्यका
वर्णन हे । फिर अनेक उपाख्यानोंसे युक्त भरद्राजकी
अद्भुत कथा हे। इसके बाद मतङ्ग ओर अञ्जनके
मारकण्डयजीको कथा, राजा अम्बरीषका वृत्तान्त,
इन्द्रद्युप्रका आख्यान ओर विद्यापतिको शुभ कथाका
उद्ेख हे । ब्रह्मन्! इसके बाद जेमिनि ओर
नारदका आख्यान है, फिर नीलकण्ठ ओर नृसिंहका
वर्णन है । तदनन्तर अश्वमेध यज्ञकी कथा ओर
राजाका ब्रह्मलोकमें गमन कहा गया हे । तत्पश्चात्
रथयात्रा-विधि ओर जप तथा स्रानकी विधि कही
गयी है। फिर ॒दक्षिणामूर्तिका उपाख्यान ओर
गुण्डिचाकी कथा है। रथ-रक्षाकी विधि ओर
भगवान्के शयनोत्सवका वर्णन है। इसके बाद्
राजा धैतका उपाख्यान कहा गया हे । फिर पृथु-
उत्सवका निरूपण हे। भगवानके दोलोत्सव तथा
सांवत्सरिक-त्रतका वर्णन हि । तदनन्तर उदालकके
नियोगसे भगवान् विष्णुको निष्काम पूजाका
प्रतिपादन किया गया है। फिर मोक्ष-साधन
वताकर् नाना प्रकारके योगोका निरूपण किया
गया है । तत्पश्चात् दशावतारकी कथा ओर सान
आदिका वर्णन दै। इसके बाद वदरिकाश्रम-
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मै
पूर्वभाग- चतुर्थं पाद
५१७
तीर्थका पापनाशक माहात्म्य बताया गया हे । उस
प्रसद्धमे अग्रि आदि तीर्थो ओर गरुड-शिलाको
महिमा हे। वहां भगवान्के निवासका
वताया गया हे । फिर कपालमोचन-तीर्थ, पञ्चधारा-
तीर्थं ओर मेरुसंस्थानकी कथा है। तदनन्तर
कार्तिकमासका माहात्म्य प्रारम्भ होता है। उसमें
मदनालसके माहात्म्यका वर्णन है। धूप्रकेशका
उपाख्यान ओर कार्तिकमासमे प्रत्येक दिनके कृत्यका
वर्णन हे। अन्तमं भीष्मपञ्चकतव्रतका प्रतिपादन
कियागयादहे, जो भोग ओर मोक्ष देनेवाला हे।
तत्पश्चात् मार्गशीर्षके माहात्म्ये सानको विधि
वतायी गयी हे । फिर पुण्डादि-कौर्तन ओर माला-
धारणका पुण्य कहा गया हे । भगवान्को पञ्चामृतसे
स्नान करानेका तथा घण्टा बजाने आदिका पुण्य फल
वताया गया हे। नाना प्रकारके फएूलोसे भगवत्पूजनका
फल ओर तुलसीदलका माहात्म्य कहा गया हे ।
भगवान्को नैवेद्य लगानेकी महिमा, एकादशीके
दिन कीर्तन, अखण्ड एकादशी-त्रत रहनेका पुण्य
ओर एकादशीकी रातमें जागरण करनेका फल बताया
गया है । इसके वाद मत्स्योत्सवका विधान ओर
नाममाहात्प्यका कीर्तन है । भगवानूके ध्यान आदिका
पुण्य तथा मथुराका माहात्म्य वताया गया हे।
मथुरातीर्थका उत्तम माहात्म्य अलग कहा गया है
ओर वहोकि वारह वनोंकी महिमाका वर्णन किया
गया है। तत्पश्चात् इस पुराणमें श्रीमद्धागवतक उत्तम
माहात्म्यका प्रतिपादन किया गया है । इस प्रसद्कमं
वच्रनाभ ओर शाण्डिल्यके संवादका उद्टेख किया
गया टै, जो त्रजकी आन्तरिक लीलाओंका प्रकाशक
है । तदनन्तर माघ मासमे स्नान, दान ओर जप
करनेका माहात्म्य बताया गया है, जो नाना प्रकारके
आख्यानेपि युक्त दै । माघ-माहात्म्यका दस अध्यार्यामिं
प्रतिपादन क्रिया गया है। तत्पश्चात् वैशाख-
माहात्म्यमें शय्यादान आदिका फल का गवा दै ।
फिर जलदानकी विधि, कामोपाख्यान, शुकदेवचरित,
व्याधक्रौ अद्भुत कथा ओर अक्षयतृतीया आदिके
पुण्यका विशेषरूपसे वर्णन हे । इसके बाद अयोध्या-
माहात्म्य प्रारम्भ करके उसमें चक्रतीर्थं, ब्रह्मतीर्थ,
ऋणमोचनतीर्थ, पापमोचनतीर्थ, सहस्रधारातीर्थ,
स्वर्गद्रारतीर्थ, चनद्रहरितीर्थ, धर्महरितीर्थ,
स्वर्णवृष्टितीर्थको कथा ओर तिलोदा-सरयू-संगमका
वर्णन है । तदनन्तर सीताकुण्ड, गुप्तहरितीर्थ, सरयू-
घाघरा-संगम, गोप्रचारतीर्थ, क्षीरोदकतीर्थं ओर
वृहस्पतिकुण्ड आदि पोच तीर्थोकी महिमाका
प्रतिपादन क्रिया गया है । तत्पश्चात् घोषां आदि
तेरह तीर्थोका वर्णन है । फिर गयाकृपके सर्वपापनाशक
माहात्म्यका कथन है। तदनन्तर माण्डव्याश्रम
आदि, अजित आदि तथा मानस आदि ती्थेकि
वर्णन किया गया हे। इस प्रकार यह दूसरा
' वेष्णवखण्ड' कहा गया है ।
मरीचे! इसके वाद परम पुण्यदायक "ब्रह्म
खण्ड' का वर्णन सुनो, जिसमे पहले सतुमाहात्म्य
प्रारम्भ करके वहकि स्नान ओर दर्शनका फल
चताया गया है। फिर गालवकौ तपस्या तथा
राक्षसकी कथा है । तत्पश्चात् देवीपत्तनमं चक्रतीथं
आदिकी महिमा, वेतालतीर्थका माहात्म्य ओर
पापनाश आदिका वर्णन है । मद्गल आदि तीर्थोका
माहात्म्य, ब्रह्मकुण्ड आदिका वर्णन, हनुमत्कुण्डको
महिमा तथा अगस्त्यतीर्थके फलका कथन है।
रामतीर्थं आदिका वर्णन, लक्ष्मीतीर्थका निरूपण,
शद्वु आदि तीर्थोकौ महिमा तथा साध्यापृत
आदि ती्ेकि प्रभावका वर्णन है। इसके बाद
धनुपकोरि आदिका माहात्म्य, क्षीरकृण्ड आदिकं
महिमा तथा गायत्री आदि तीर्थकि माहात्स्यका
वर्णन दहै। फिर गरामेश्चश्की महिमा, तत्वज्ञानका
उपदेश तथा सतु-यात्रा-विधिका वर्णन दहै, जौ
मनुप्यक मोक्ष देनेवाला ई ¦ तत्पश्चात् धमरिण्यका
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५९८
संक्षिप्त नारदपुराण
उत्तम माहात्म्य बताया गया हे, जिसमें भगवान्
शिवने स्कन्दको तत्त्वका उपदेश किया है। फिर
ध्मरिण्यका प्रादुभवि, उसके पुण्यका वर्णन,
कर्मसिद्धिका उपाख्यान तथा ऋषिवंशका निरूपण
हे। तदनन्तर वहो अप्सरा-सम्बन्धी मुख्य तीर्थोका
माहात्म्य कहा गया हे! इसके बाद वर्णाश्रम-
धर्मके तत्त्वका निरूपण किया गया हे । तदनन्तर
देवस्थान-विभाग ओर बकुलादित्यकी शुभ कथाका
वर्णन हे । वां छत्रानन्दा, शान्ता, श्रीमाता, मतद्धिनी
ओर पुण्यदा-ये पोच देवियां सदा स्थित बतायी
गयी हं । इसके बाद वहां इन्द्रेश्चर आदिकी महिमा
तथा द्वारका आदिका निरूपण है। लोहासुरकी
कथा, गङ्गाकूपका वर्णन, श्रीरामचन्द्रजीका चरित्र
तथा सत्यमन्दिरका वर्णन है । फिर जीर्णेद्धारकौ
महिमाका कथन, आसन-दान, जातिभेद-वर्णन
तथा स्मृति-धर्मका निरूपण हे । तत्पश्चात् अनेक
उपाख्यानोसे युक्त वेष्णव-धर्मोका वर्णन है । तदनन्तर
पुण्यमय चातुर्मास्यका माहात्म्य प्रारम्भ करके
उसमे पालन करने योग्य सब धर्मोका निरूपण
किया गया हे। फिर दानकी प्रशंसा, त्रतकी
महिमा, तपस्या ओर पूजाका माहात्म्य तथा
सच्छद्रका कथन हे । तदनन्तर प्रकृतियोके भेदका
वर्णन, शालग्रामके ततत्वका निरूपण, तारकासुरके
वधका उपाय, गरुड्-पूजनकी महिमा, विष्णुका
शाप, वृक्षभावको प्रापि, पार्वतीका अनुनय, भगवान्
शिवका ताण्डवनृत्य, राम-नामकी महिमाका निरूपण,
शिव-लिङ्गपतनको कथा, पेजवन शूद्रक कथा,
पार्वतीजीका जन्म ओर चरित्र, तारकासुरका अद्भुत
वध, प्रणवके एेश्चर्यका कथन, तारकासुरके चरित्रका
पुनर्वर्णन, दक्ष-यक्ञकी समपि, द्वादशाक्षरमन्त्रका
निरूपण, ज्ञानयोगका वर्णन, द्वादश सूर्योकी महिमा
तथा चातुर्मास्य-माहात्म्यके श्रवण आदिके पुण्यका
वर्णन किया गया हे, जो मनुष्येकि लिये कल्याणदायक
हे। तदनन्तर ब्राह्योत्तर भागमें भगवान् शिवकी
अद्भुत महिमा, पञ्चाक्षर-मन्त्रके माहात्म्य तथा
गोकर्णकी महिमाका वर्णन हे । तत्पश्चात् शिवरात्रिकी
महिमा, प्रदोषतब्रतका वर्णन तथा सोमवार-त्रतकी
महिमा एवं सीमन्तिनीकौ कथा हे । फिर भद्रायुकी
उत्पत्तिका वर्णन, सदाचार-निरूपण, शिवकवचका
उपदेश, भद्रायुके विवाहका वर्णन, भद्रायुकी महिमा,
भस्म-माहात्म्य- वर्णन, शवबरका उपाख्यान, उमा-
महेश्चर-त्रतको महिमा, सुद्राक्षका माहात्म्य, सुद्राध्यायके
पुण्य तथा ब्रह्मखण्डके श्रवण आदिक पुण्यमयी
महिमाका वर्णन है। इस प्रकार यह ब्रह्मखण्ड
बताया गया हे।
इसके बाद चौथा परम उत्तम ' काशीखण्ड
हे, जिसमें विन्ध्यपर्वत ओर नारदजीके संबादका
वर्णन हे । फिर सत्यलोकका प्रभाव, अगस्त्यके
आश्रममें देवताओंका आगमन, पतित्रताचरित्र तथा
तीर्थयात्राकौ प्रशंसा हे । तदनन्तर सप्तपुरीका वर्णन,
संयमिनीका निरूपण, शिवशर्माको सूर्य, इन्द्र॒ ओर
अग्रिके लोककी प्रापिका उद्टेख है। अग्रिका
प्रादुर्भाव, निऋति तथा वरुणकी उत्पत्ति, गन्धवती,
अलकापुरी ओर ईशानपुरीके उद्धरवका वर्णन,
चन्द्र, सूर्य, बुध, मद्धल तथा बृहस्पतिके लोक,
ब्रह्मलोक, विष्णुलोकः, श्रुवलोक ओर तपोलोकका
वर्णन हे । तत्पश्चात् ध्रुवलोककी पुण्यमयी कथा,
सत्यलोकका निरीक्षण, स्कन्द-अगस्त्य-संवाद,
मणिकर्णिकाकी उत्पत्ति, गङद्धाजीका प्राकट्य,
गङ्गासहस्ननाम, काशीपुरीको प्रशंसा, भैरवका
आविभवि, दण्डपाणि तथा ज्ञानवापीका उद्धव,
कलावतीको कथा, सदाचारनिरूपण, ब्रह्मचारीका
आख्यान, स्त्रीके लक्षण, कर्तव्याकर्तव्यका निर्देश,
अविमुक्तेश्चरका वर्णन, गृहस्थ योगीके धर्म, कालज्ञान,
दिवोदासकी पुण्यमयी कथा, काशीका वर्णन,
भूतलपर मायागणपतिका प्रादुर्भाव, विष्णुमायाका
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पूर्वभाग-चतुर्थं पाद्
प्रपञ्च, दिवोदासका मोक्ष, पञ्चनदतीर्थको उत्पत्ति,
विन्दुमाधवका प्राकस्य, तदनन्तर काशीका वेष्णवतीर्थ
कहलाना; फिर शूलधारी शङ्करका काशीमें आगमन,
जेगीपव्यके साथ संवाद, महेश्वरका ज्येष्ठेश्चर नाम
होना, क्षेत्राख्यान, कन्दुकेश्चर ओर व्याघ्रेश्वरका
प्रादुरभावि, शेलेश्चर, रलेश्वर तथा कृत्तिवासेश्चरका
प्राकय्य, देवताओंका अधिष्ठान, दुर्गासुरका पराक्रम,
दुर्गाजीकी विजय, ॐॐकारेश्वरका वर्णन, पुनः
कारका माहात्म्य, त्रिलोचनका प्रादुर्भाव,
केदारेश्चरका आख्यान, धर्मेश्वरको कथा, विष्णुभुजाका
प्राकट्य, वीरेधरका आख्यान, गद्धा-माहात्म्यकोर्तन,
विश्चकर्मेश्चरकी महिमा, दक्षयज्ञोद्धव, सतीश ओर
अमृतेश आदिका माहात्म्य, पराशरनन्दन व्यासजीक
भुजाओंका स्तम्भन, क्षेत्रके तीर्थोका समुदाय,
मुक्तिमण्डपकी कथा, विश्चनाथजीका वैभव, तदनन्तर
काशीकी यात्रा ओर परिक्रमाका वर्णन-ये
' काशीखण्ड" के विषय हेँ।
तदनन्तर पांचवें ' अवन्तीखण्ड' का वर्णन सुनो ।
इसमें महाकालवनका आख्यान, ब्रह्माजीके मस्तकका
छेदन, प्रायश्चित्तविधि, अग्निक उत्पत्ति, देवताओंका
आगमन, देवदीक्षा, नाना प्रकारके पातकोंका नाश
करनेवाला शिवस्तोत्र, कपालमोचनकी कथा,
महाकालवनकी स्थिति, कलकलेश्वरका सर्वपापनाशक
तीर्थ, अप्सराकुण्ड, पुण्यदायक रद्रसरोवर, कुटुम्बेश,
विद्याधरेश्वर तथ मर्कटेश्वर तीर्थका वर्णन हे।
तत्पश्चात् स्वर्गद्वार, चतुःसिन्धुतीर्थ, शङ्करवापिका,
शङ्करादित्य, पापनाशक गन्धवतीतीर्थ, दशाश्चमेधिकतीथ,
अनंशतीर्थ, हरिसिद्धिप्रदतीर्थ, पिशाचादियात्रा,
हनुमदीश्चर, कवचैश्च, महाकालंश्चरयात्रा,
वल्मीकेश्वरतीर्थ, शुक्रेश्चर ओर नक्षत्रश्वरतीर्थका
उपाख्यान, कुशस्थलीकी पर्क्रिमा, अक्रूरतीर्थ,
एकपादतीर्थ, चद्धार्कवैभवतीर्थ, करभेशतीर्थ, लडुकेश
आदि तीर्थ, मार्कण्डेश्वरतीर्थ, यवापीती्थ,
५१९
सोमेश्वरतीर्थ, नरकान्तकतीर्थ, केदारेश्रर, रामेश्वर,
सोभागेश्वर तथा नरादित्यतीर्थ, केशवादित्य,
शक्तिभेदतीर्थ, स्वर्णसारमुखतीर्थ, ॐॐकारेश्र आदि
तीर्थ, अन्धकासुरके द्वारा स्तुति-कौर्तन, कालवनमें
शिवलिद्धोको संख्या तथा स्वर्णशरुद्ंश्रतीर्थका
वर्णन हे। फिर कुशस्थली, अवन्ती एवं उ्जयिनीपुरीके
पद्मावती, कुमुद्वती, अमरावती, विशाला तथा
प्रतिकल्प--इन नामोंका उद्टेख हे । इनका उच्चारण
ज्वरकी शान्ति करनेवाला है। तत्पश्चात् शिप्रामें
स्नान आदिका फल, नागेद्ार को हई भगवान् शिवकी
स्तुति, दहिरण्याक्षवधको कथा, सुन्दरकुण्डकतीर्थ,
नीलगद्धा, पुष्करतीर्थ, विन्ध्यवासनतीर्थ, पुरुपोत्तमतीर्थ,
अघनाशनतीर्थ, गोमतीतीर्थ, वामनकुण्ड, तिष्णुसदस्ननाम,
वीरिशधर सरोवर, कालभेरवतीर्थ, नागपञ्चमीकी महिमा,
नृसिंहजयन्ती, कुटुम्बेश्वरयात्रा, देवसाधककीर्तन,
कर्कराज नामक तीर्थ, विष्नेशादितीर्थं ओर
सुरोहनतीर्थका वर्णन किया गया है। रद्रकुण्ड
आदिमे अनेक तीर्थोका निरूपण क्रिया गया दै।
तदनन्तर आठ तीर्थोकी पुण्यमयी यात्राका वर्णन
है । इसके वाद नर्मदानदीका माहात्म्य बतलाया
गया है, जिसमें धर्मपुत्र युधिष्ठिरके वैराग्य तथा
मार्कण्डेयजीके साथ उनके समागमका वर्णन है।
तदनन्तर पहलेके प्रलयकालीन अनुभवका
वर्णन, अमृत-कीर्तन, कल्प-कल्पमें नर्मदाके पृथक्-
पृथक् नामका वर्णन, नर्मदाजीका आर्षस्तोत्र,
कालरात्रिको कथा, महादेवजीको स्तुति, पृथक्
कल्पकी अद्भुत कथा, विशल्याकी कथा, जालेश्चरकी
कथा, गौरीव्रतका वर्णन, त्रिपुरदाहकीो कथा,
| कावेरीसद्खम, दार्तीर्थ, ब्रह्मावर्त,
ईश्चरकथा, अग्रितीर्थ, सूर्यतीर्थ, मेघनादार्दितीर्थ,
दारुकतीर्थ, देवतीर्थ, नर्मदेशतीर्ध, कपिलातीर्थ,
करञ्जकतीर्थ, कु्डलेशतीर्थ, पिप्पलादतीर्थ,
विमलेश्चरतीर्थ, शृलभदनती्थ, शचीदरणकी कथा,
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५२०
अश्रकका वध, शूलभदोद्धवतीर्थ, पृथक्-पृथक्
दानधर्म, दीर्घतपाकी कथा, ऋष्यश्ङ्गका उपाख्यान,
चित्रसेनकौ पुण्यमयी कथा, काशिराजका मोक्ष,
देवशिलाकी कथा, शवरीतीर्थ, पवित्र व्याधोपाख्यान,
पुष्करिणीतीर्थ, अर्कतीर्थ, आदित्येश्वरतीर्थ, शक्रतीर्थ,
करोरिकतीर्थ, कुमरेश्वरतीर्थ, अगस्त्येश्वरतीर्थ,
आनन्देश्वरतीर्थ, मातृतीर्थं, लेकेशर, धनदेश्वर, मङ्गलेश्वर
तथा कामजतीर्थ, नगेश्चरतीर्थ, गोपारतीर्थ, गोतमतीर्थ
शह्भचूडतीर्थ, नारदेश्रतीर्थ, नन्दिके श्वरतीर्थ,
वरणेश्रतीर्थ, दधिस्कन्दादितीर्थ, हनुमदीश्चरतीर्थ
रामेश्वर आदि तीर्थ, सोमेश्वर, पिङ्गलेश्वर, ऋणमोक्षेश्चर्
कपिलेश्वर, पृतिकेश्चर, जलेशय, चण्डार्क, यमतीर्थः
काल्होडीश्चवर, नन्दिकेश्वर, नारायणेश्वर, कोटी श्चर,
व्यासतीर्थ, प्रभासतीर्थ, नागेश्चरतीर्थ, संकर्पणतीर्थ
प्रश्रयेश्वरतीर्थ, पुण्यमय एरण्डी-सद्गमतीर्थ,
सुवर्णशिलतीर्थ, करञ्ञतीर्थ, कामरतीर्थ, भाण्डीरतीर्थ,
रहिणीभवतीर्थ, चक्रतीर्थ, धोतपापतीर्थ, आद्भिरसतीर्थ
कोरितीर्थ, अन्योन्यतीर्थ, अङ्गारतीर्थ, त्रिलोचनतीर्थः
इन्द्रशतीर्थ, कम्बुकेशतीर्थ, सोमेशतीर्थ, कोहलेशतीर्थ
नर्मदातीर्थ, अर्कतीर्थ, आग्नेयतीर्थ, उत्तम
भाग्विश्वरतीर्थ, त्राह्यतीर्थ, देवतीर्थ, मार्गेशतीर्थ
आदिवाराहेश्चर, रामेश्वरतीर्थ, सिद्धेश्वरतीर्थ,
अहल्यातीर्थ, ककटेश्चरतीर्थ, शक्रतीर्थ, सोमतीर्थ,
नादेशतीर्थ, कोयेश तीर्थ, रुक्मिणीसम्भवतीर्थ,
योजनेशतीर्थ, वराहेशतीर्थ, द्वादशीतीर्थ, शिवतीर्थं
सिद्धेश्वरतीर्थ, मङ्गलेश्वरतीर्थ, लिद्धवाराहतीर्थ,
कुण्डेशतीर्थ, श्चतवाराहतीर्थ, भाग्विश तीर्थ, रवीश्वरतीर्थ
शुक्ल आदि तीर्थ, हु ्कारस्वामितीर्थ, सद्गमेश्वरतीर्थ,
नहुषेश्वरतीर्थ, म्पोक्षणतीर्थ, पञ्चगोपदतीर्थ,
नागशावकतीर्थ, सिद्धेशतीर्थ, मार्कण्डयतीर्थ,
अक्रूरतीर्थ, कामोदतीर्थ, शूलारोपतीर्थ, माण्डव्यतीर्थः
गोपकेश्वरतीर्थ, कपिलेश्वरतीर्थ, पिङ्गले श्वरतीर्थ,
भूतेश्वरतीर्थ, गङ्खातीर्थ, गौतमतीर्थ, अश्चमेधतीर्थ,
संक्षिप्त नारदपुराण
भृगुकच्छतीर्थ, पापनाशक केदारेशतीर्थ, कलकलेश
(या कनखलेश) तीर्थ, जालेशतीर्थ, शालग्रामतीर्थ
वराहतीर्थ, चन्द्रप्रभासतीर्थ, आदित्यतीर्थ, श्रीपदतीर्थ
हंसतीर्थ, मूलस्थानतीर्थ, शूलेश्वरतीर्थ, उग्रतीर्थ,
चित्रदैवकतीर्थ, शिखीश्वरतीर्थ, कोरितीर्थ,
दशकन्यतीर्थ, सुवर्णतीर्थ, ऋणमोचनतीर्थ, भारभूतितीर्थ
पुद्धमुण्डित तीर्थ, आमलेशतीर्थ, कपालेशतीर्थ,
शृङ्खैरण्डीतीर्थ, कोटितीर्थं ओर लोटलेशतीर्थं आदिका
वर्णन है । इसके नाद फलस्तुति कटी गयी है।
तदनन्तर कृमिजङ्गलमाहात्म्यके प्रसङ्घमें रोहिताश्चकी
कथा, धुन्धुमारका उपाख्यान, उसके वधका उपाय,
धुन्धु-वध, चित्रवहका उद्धव, उसकी महिमा,
चण्डीशका प्रभाव, रतीश्वर, केदारेश्चर, लक्षतीर्थ,
विष्णुपदी तीर्थ, मुखारतीर्थ, च्यवनान्धतीर्थ ब्रह्मसरोवर्
चक्रतीर्थं, ललितोपाख्यान, बहुगोमुखतीर्थ, स्द्रावर्ततीर्थ
मारकण्डयतीर्थ, पापनाशकतीर्थ, श्रवणेशतीर्थ,
शुद्धपटतीर्थ, देवान्धुप्रेततीर्थ, जिदह्वोदतीर्थका प्राकय्य,
शिवोद्धेदतीर्थं ओर फल-श्रुति-इन विषयोका वर्णन
हे। यह सब "अवन्ती-खण्ड"का वर्णन किया गया
हे, जो श्रोताओके पापका नाश करनेवाला है।
इसके अनन्तर ' नागरखण्ड' का परिचय दिया
जाता हे। इसमे लिद्भोंत्पत्तिका वर्णन, हरिश्नन्रकी
शुभ कथा, विश्चामित्रका माहात्म्य, त्रिशङ्कका
स्वर्गलोके गमन, हाटके श्वर-माहात्म्यके प्रसद्गमें
वृत्रासुरका वध, नागविल, शङ्कृतीर्थ, अचलेश्चरका
वर्णन, चमत्कारपुरकी चमत्कारपर्ण कथा, गयशीर्षतीर्थ,
व्ालशतीर्थ, बालमण्डतीर्थ, मृगतीर्थ, विष्णुपाद,
गोकर्ण, युगरूप, समाश्रय तथा सिद्धेश्वरतीर्थ,
नागसरोवर, सपर्षितीर्थ, अगस्त्यतीर्थ, भ्रूणगर्त,
नलेशतीर्थ, भीष्मतीर्थ, वैदडूरमरकततीर्थ, शर्मिष्ठातीर्थ,
सोमनाधतीर्थ, दुगतिीर्थ, आनर्तकेश्वरतीर्थ,
जमदग्निवधकी कथा, परशुरामद्रार कषत्रियेकि संहारका
कथानक, रामहद, नागपुरतीर्थ, षपद्लिद्भतीर्थ,
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-चतुर्थ पाद
यज्ञभूतीर्थ, मुण्डीरादितीर्थ,
सतीपरिणयतीर्थ, रुद्रशीर्षतीर्थ, योगेशतीर्थ,
बालखिल्यतीर्थ, गरुडतीर्थ, लक्ष्मीजीका शाप,
सप्तविशतीर्थ, सोमप्रासादतीर्थ, अम्बावृद्धतीर्थ,
अग्रितीर्थ, ` ब्रह्यकुण्ड, गोमुखतीर्थ, लोहयष्टितीर्थ,
अजापालेश्वरीदेवी, शनैश्चरतीर्थ, राजवापी, रामेश्वर,
लक्ष्मणेश्वर, कुशेश्चर, लवेश्वरलिङ्ग, सर्वोत्तिमोत्तम
अड़सठ ती्थेकि नाम, दमयन्तीपुत्र त्रिजातकौ
कथा, रेवती अम्बाको स्थापना, भक्तिकातीर्थका
आविर्भाव, क्षेमङ्करीदेवी, केदारक्षेत्रका प्रादुर्भाव,
शुक्लतीर्थ, मुखारकतीर्थ, सत्यसन्ध्येश्वरका आख्यान,
कर्णोत्पलाकी कथा, अटेश्वरतीर्थ, याक्ञवल्क्यतीर्थ,
गौरीगणेशतीर्थ, वास्तुपदतीर्थका आख्यान,
अजागृहादेवीकी कथा, सौभाग्यान्धतीर्थ,
शूलेधरलिद्घ, धर्मराजकौ कथा, मिष्टान्न देवेश्वरका
आख्यान, तीन गणपतिका आविर्भाव, जावालिचरित,
मकरेशको कथा, कालेश्चरी ओर अन्धकका आख्यान,
आप्सरसकुण्ड, पुष्पादित्यतीर्थ, रोहिताश्चतीर्थ, नागर
ब्राह्यणोंकी उत्पत्तिका कथन, भार्गवचरित,
विश्चामित्रचरित्र, सारस्वततीर्थ, पिषपलादतीर्थ,
कंसारीश्चरतीर्थ, पिण्डकतीर्थ, ब्रह्माका यज्ञानुष्ठान,
सावित्नरीकी कथा, रैवतका आख्यान, भर्तृयक्तका
वृत्तान्त, मुख्य तीर्थोका निरीक्षण, कुरुक्षेत्र, हाटकेशरकषेत्र
ओर प्रभासक्षेत्र-इन तीनों क्षत्रोका वर्णन, पुष्करारण्य,
नैमिषारण्य तथा धर्मरण्य-इन तीन अरण्योका
वर्णन, वाराणसी, द्वारका तथा अवन्ती-इन तीन
पुरियोका वर्णन, वृन्दावन, खाण्डववन ओर
उद्वैतवन-इन तीन वनका उद्टेख, कल्पग्राम,
शालग्राम तथा नन्दिग्राम-इन तीन उत्तम ग्रामोका
प्रतिपादन, असितीर्थ, शुक्लतीर्थं ओर पितृतीर्थ-इन
तीन तीर्थोका निरूपण, श्रीशैल, अर्वुदगिरि तथा
रैवतगिरि-इन तीन पर्वतोका वर्णन, गङ्गा, नर्मदा
ओर सरस्वती-इन तीन नदियोका नाम-उच्वारण,
५२९१
इनमेसे एक-एकका कीर्तन साद तीन करोड
तीर्थेका फल देनेवाला है--इत्यादि विष्योका
प्रतिपादन किया गया है । कूपिकातीर्थ, णद्भतीर्थ,
चामरतीर्थं ओर बालमण्डनतीर्थ-इन चार्ोका उच्चारण,
हारकेश्वरक्षेत्रका फल देनेवाला है। इन सव
ती्थोकि वर्णनके पश्चात् साम्बादित्यकी महिमा,
श्राद्धकल्पका निरूपण, युधिष्ठिर-भीष्म-संवाद,
अन्धक (अन्धकारपूर्ण नरक), जलशायीका माहात्म्य,
चातुर्मास्य-त्रत, अशून्यशयनव्रत, मङ्कणेशकी महिमा,
शिवरात्रिका माहात्म्य, तुलापुरुषदान, प्रथ्वीदान,
वालकेश्चर, कपालमोचनेश्चर, पापपिण्ड, साप्तलिङ्ध,
युगमान आदिका वर्णन, निम्बेश्वर ओर शाकम्भरीकी
कथा, ग्यारह रद्रोके प्राकट्यका वर्णन, दानमाहात्म्य
तथा द्वादशादित्यका कीर्तन-इन सव विषर्योका
प्रतिपादन किया गया है । इस प्रकार यह “नागर-
खण्ड' कहा गया ।
अब "प्रभासखण्ड' का वर्णन किया जाता टै
जिसमे सोमनाथ, विश्वनाथ, महान् पुण्यप्रद अर्कस्थल
तथा सिद्धेश्वर आदिका आख्यान पृथक्-पृथक्
कहा गया है। तत्पश्चात् अप्रितीर्थ, कपर्दीश्र,
उत्तम गतिदायक केदारेश्वर, भीमेश्वर, भैरवेश्वर,
चण्डीश्वर, भास्करेश्वर, चन्द्रेश्वर, मङ्गलेश्चर, वुधेश्वर,
वृहस्पतीश्वर, शुक्रे धर, शनैश्चरेधर, राहीश्वर, केत्वीश्वर
आदि शिवविग्रहोका वर्णन है। तत्पश्चात् सिद्धेश्वर
आदि अन्य पाच रुद्रोको स्थितिका वर्णन किया
गया है । वरारोहा, अजापाला, मङ्गला, ललितेश्चरी,
लक्ष्मीश्वर, बाडवेश्वर, उर्वीशर, कामेश्वर, गौरीश्वर,
वरुणेश्वर, दुवसिश्चवर, गणेश्वर, कुमारिश्वर, चण्डकल्प,
शकुलीश्वर, कोटीश्वर तथा बालरूपधारी त्र्या
आदिकी उत्तम कथा है। तत्पश्चात् नरकेशर्,
संवर्तेश्वर, निधीश्वर, बलभद्र, गङ्का, गणपति,
जाम्बवती नदी, पाण्डुकुप, शतमेध, लक्षमेध ओर
कोरिमेधकी श्रष्ट कथा टै । दुर्वासादित्य, घरस्थान्,
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 21188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
५२२
संक्षिप्त नारदपुराण
हिरण्यासङ्गम, नागरादित्य, श्रीकृष्ण, संकर्षण,
समुद्र, कुमारी, क्षेत्रपाल, ब्रह्येश्वर, पिद्धलासङ्खमेश्वर,
शङ्करादित्य, घटेश्वर, ऋषितीर्थं, नन्दादित्य, त्रितकूप,
सोमपान, पर्णादित्य ओर न्यङ्कमतीको भी अद्भुत
कथाका उद्वे है । तदनन्तर वाराहस्वामीका वृत्तान्त,
छायालि द्ग, गुल्फ, कनकनन्दा, कुन्ती ओर गङ्खेशकी
कथा हे । फिर चमसो द्धेदेश्वर, विदुरेधर, त्रिलोकेशर,
मङ्कणेश्वर, त्रैपुरेधर तथा षण्डतीर्थकी कथा हे।
फिर सूर्यप्राची, त्रीक्षण ओर उमानाथकी कथा हे।
पृथिव्युद्धार, शूलस्थल, च्यवनादित्य ओर च्यवनेश्चरका
वृत्तान्त है । उसके बाद अजापालेश्वर, बालादित्य,
कुबेरस्थल तथा ऋषितोयाकौ पुण्यमयी कथा एवं
शृगालेश्चरका माहात्म्यकीर्तन हे । फिर नारदादित्यकी
कथा, नारायणके स्वरूपका निरूपण, तप्तकुण्डकी
महिमा तथा मूलचण्डीश्वरका वर्णन हे । चतुर्मुख
गणेश ओर कलम्बेश्वरको कथा, गोपालस्वामी,
बकुलस्वामी ओर मरुद्रणको भी कथा हे । तत्पश्चात्
क्षेमादित्य, उन्नतविध्नेश, तलस्वामी, कालमेध,
रुक्मिणी, दुर्वासेश्वर, भद्रेश्वर, शद्भावर्त, मोक्षतीर्थ,
गोप्पदतीर्थ, अच्युतगृह, जालेश्चर, ॐकारेश्वर,
चण्डीश्चर, आशापुरनिवासी विघ्रेश ओर कलाकुण्डकी
अद्भुत कथा हे। कपिलेश्चर ओर जरद्रव शिवकी
भी विचित्र कथाका उदेख हे । नलेश्वर, कर्कारकेश्चर,
हारकेश्वर, नारदेश्वर, यन्त्रभूषा, दुर्गकूट ओर गणेशकी
कथाका भी उदेख हे । सुपर्णभेरवी ओर एलाभैरवी
तथा भह्लतीर्थकी भी महिमा हे। तत्पश्चात् कर्दमालतीर्थ
ओर गुप्त सोमनाथका वर्णन हे। इसके बाद
वहुस्वर्णेश्वर, शृद्गश्चर, कोटीश्चर, मार्कण्डश्चर, कोटीश
तथा दामोदरगृहकी माहात्म्य-कथा हे । तदनन्तर्
स्वर्णरेखा, ब्रह्मकुण्ड, कुन्तीश्वर, भीमेश्वर, मृगीकुण्ड
तथा सर्वस्व-ये वस्त्रापधक्षेत्रमे कहे गये दै।
तत्पश्चात् दुर्गाभद्वेश, गद्धेश, रेवतेश, अर्बुदेश्वर,
अचलेश्वर, नागतीर्थं, वसिष्ठाश्रम, भद्रकर्ण, त्रिनेत्र,
केदार, तीर्थागमन, कोटीश्र, रूपतीर्थं ओर
हषीकेश- ये अद्धुत माहात्म्यकथाएं हं । इसके
बाद सिद्धेश्वर, शुक्रेश्चर, मणिकणींशचर, पङ्खतीरथ,
यमतीर्थं ओर वाराहीतीर्थं आदिके माहात्म्यका
वर्णन है। फिर चन्द्रप्रभास, पिण्डोदक, श्रीमाता,
शुक्लतीर्थ, कात्यायनीदेवी, पिण्डारकतीर्थ,
कनखलतीर्थ, चक्रतीर्थ, मानुषतीर्थ, कपिलाग्रितीर्थ
तथा रक्तानुबन्ध आदि माहात्म्यकथाका उल्लेख हे ।
तदनन्तर गणेशतीर्थ, पार्थश्चरतीर्थ ओर उज््वलतीर्थकी
यात्रामें चण्डीस्थान, नागोद्धव, शिवकुण्ड, महेशतीर्थ
तथा कामेश्चरका माहात्म्यवर्णन ओर मार्कण्डयजीको
उत्पत्तिकथा है । फिर उदालकेश ओर सिद्धेशके
समीपवर्ती तीर्थोको पृथक्-पृथक् कथा हे।
इसके बाद श्रीदेवमाताको उत्पत्ति, व्यास ओर
गोतमतीर्थको कथा, कुलसन्तारतीर्थका माहात्म्य
तथा रामतीर्थं एवं कोरितीर्थकी महिमा ह।
चद््रोद्धेदतीर्थ, ईशानतीर्थं ओर ब्रह्यस्थानकी उत्पत्तिका
अद्धुत माहात्म्य तथा त्रिपुष्कर्, स्द्रहद ओर
गुहेश्चरकी शुभ कथा है। तत्पश्चात् अविमुक्तको
महिमा, उमामहेश्वरका माहात्म्य, महौजाका प्रभाव
ओर जम्बृतीर्थका महत्त्व कहा गया है । गङ्गाधर
ओर मिश्रककी कथा एवं फलस्तुतिका भी
वर्णन है । तदनन्तर द्वारकामाहात्म्यके प्रसद्घमे
चन्द्रशर्माकी कथा है। जागरण ओौर पूजन
आदिका आख्यान, एकादशीव्रतकौ महिमा,
महाद्रादशीका आख्यान, प्रहाद ओर ऋषियोका
समागम, दुर्वासाका उपाख्यान, यात्राको प्रारम्भिक
विधि, गोमतीकी उत्पत्तिकथा, उसमे सान
आदिका फल, चक्रतीर्थका माहात्म्य, गोमतीसागर-
सङ्गम, सनकादि कुण्डका आख्यान, नृगतीर्थकौं
कथा, गोप्रचारकी पुण्यमयी कथा, गोपियोका
द्वारका आगमन, गोपीसरोवरका आख्यान,
ब्रह्मतीर्थं आदिका कीर्तन, पाच नदियोके
((-0. 1/८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-चतुर्धं पाद ५२३
आगमनको कथा, अनेक प्रकारके उपाख्यान,
शिवलिङ्ग, गदातीर्थं ओर श्रीकृष्णपूजन आदिका
वर्णन हे। त्रिविध-मूर्तिका वर्णन, दुर्वासा ओर
श्रीकृष्ण-संवाद, कुश दैत्यके वधकौ कथा, विशेष
पूजनका फल, गोमती ओर द्वारकामें ती्थकि
आगमनका वर्णन, श्रीकृष्णमन्दिरका दर्शन, द्वारवतीमें
अभिषेक, वरहो तीर्थेके निवासकी कथा ओर
द्वारकाके पुण्यका वर्णन है । ब्राह्मणो ! इस प्रकार
सर्वोत्तम कथाओंसे युक्त शिवमाहात्म्य-प्रतिपादक
स्कन्दपुराणमें यह सातवां प्रभासखण्ड बताया गया
हे। जो इसे लिखकर सुवर्णमय त्रिशूलके साथ
माघको पूर्णिमाके दिन सत्कारपूर्वक ब्राह्मणको
दान देता है, वह सदा भगवान् शिवके लोकें
आनन्दका भागी होता है।
१ + [
(19
वामनपुराणकी विषय-सूची ओर उस पुराणके श्रवण, पठन एवं दानका माहात्म्य
ब्रह्माजी कहते है-- वत्स! सुनो, अव में| ओर भगवान् शङ्धरका युद्ध, अन्धकको गणत्वकी
त्रिविक्रमचरित्रसे युक्त वामनपुराणका वर्णन करता | प्रापि, मरुद्रणोके जन्मकी कथा, राजा बलिका
हू। इसकी श्लोक संख्या दस हजार है। इसमें कूर्म | चरित्र, लक्ष्मी-चरित्र, त्रिविक्रम- चरित्र, प्रह्मादकी
कल्पके वृत्तान्तका वर्णन है ओर त्रिवर्णकी कथा| तीर्थयात्रा ओर उसमें अनेक मङ्गलमयी कथार्पं
हे । यह पुराण दो भागोसे युक्त है ओर वक्ता-श्रोता | धुन्धु- चरित, प्रेतोपाख्यान, नक्षत्र पुरुषको कथा,
दोनोके लिये शुभकारक है । इसमें पहले पुराणके | श्रीदामाका चरित्र, त्रिविक्रमचरित्रके अन्तमं त्रह्माजीके
विषयमे प्रश्र है। फिर ब्रह्माजीके शिरश्छेदकी | द्वारा कहा हआ उत्तम स्तोत्र तथा प्रह्वाद ओरं
कथा, कपालमोचनका आख्यान ओर दक्ष-यस्च- | बलिके संवादम सुतललोकमें श्रीहरिक प्रशंसाका
विध्वंसका वर्णन है। तत्पश्चात् भगवान् हरक | उष्लेख है । ब्रह्मन्! इस प्रकार मैने तुष्टं इस
कालरूप संज्ञा, मदनदहन, प्रह्मदनारायणनुद्ध, देवासुर- | पुराणका पूर्वभाग बताया ठै । अब इस वामनपुराणके
संग्राम, सुकेशी ओर सूर्यकी कथा, काम्यत्रतका | उत्तरभागका श्रवण करो। उत्तरभागमें चार संहितां
वर्णन, श्रीदुर्गाचरित्र, तपतीचरित्र, कुरक्षेत्रवर्णन, | है । वे पृथक्-पृथक् एक-एक सहस्र श्लीकोंमे
अनुपम सत्या-माहात्म्य, पार्वती-जन्मकी कथा, | युक्छ टै । उनके नाम इम प्रकार ईै-महेश्चरी,
तपतीका विवाह, गीरी-उपाख्यान, कौ्थिकी-उपाख्यान, | भागवती, सीरी ओर गाणश्चरी । माहे शरी संहितःपे
कुमारचरित, अन्धकवधकी कथा, साध्योपाख्यान, | श्रीकृष्ण तथा उनके भक्तोका वर्णन टै । भागवती
जावालिचरित, अरजाको अद्भुत कथा, अन्धकरासुर | संहितां जगदम्बकरे अवतारकौ अद्भुत कधा दी
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (0166101. 01411260 0 6810011
८५२४
संक्षिप्त नारदपुराण
गयी है । " सोरीसंहिता' में भगवान् सूर्यकी पाप-
नाशक महिमाका वर्णन हे। 'गाणेश्वरीसंहिता "में
भगवान् शिव तथा गणेशजीके चरित्रका वर्णन
किया गया हे । यह वामन नामका अत्यन्त विचित्र
पुराण महरि पुलस्त्यने महात्मा नारदजीसे कहा
हे । फिर नारदजीसे महात्मा व्यासको प्राप्त हुआ है
ओर व्यासजीसे उनके शिष्य रोमहर्षणको मिला
है। रोमहर्षणजी नैमिषारण्यनिवासी शोनकादि
ब्रह्म्षियोसे यह पुराण करहेँगे। इस प्रकार यह
मङ्गलमय वामनपुराण परम्परासे प्राप्त हुआ है। जो
इसका पाठ ओर श्रवण करते है, वे भी परम
गतिको प्राप्त होते हं । जो इस पुराणको लिखकर
शरत्कालके विषुव योगमें वेदवेत्ता ब्राह्मणको
घृतधेनुके साथ इसका दान करता है, वह अपने
पितरोको नरकसे निकालकर स्वगे पहुंचा देता
हे ओर स्वयं भी नेक प्रकारके भोगोका उपभोग
करके देह-त्यागके पश्चात् वह भगवान् विष्णुके
परम पदको प्राप्त कर लेता हे।
८१5६८ =+ =+
कूर्मपुराणकी संक्षिप्त विषय-सूची ओर उसके पाठ, श्रवण तथा दानका माहात्म्य
ब्रह्माजी कहते है- वत्स मरीचे! अब तुम
कूर्मपुराणका परिचय सुनो। इसमें लक्ष्मी-कल्पका
वृत्तान्त है। इस पुराणम कृर्मरूपधारी दयामय
श्रीहरिने इन्दरदयुप्रके प्रसङ्गसे महर्षियोंको धर्म
अर्थ, काम ओर मोक्षका पृथक्-पृथक् माहात्म्य
सुनाया हे। यह शुभ पुराण चार संहिताओमें
विभक्त है। इसकी श्लोकसंख्या सतरह हजार
हे। मुने ! इसमें अनेक प्रकारकी कथाओके प्रसङ्गसे
मनुष्योको सद्रति प्रदान करनेवाले नाना प्रकारके
ब्राह्मणधर्मं बताये गये हें । इसके पूर्वभागमें पहले
पुराणका उपक्रम है । तत्पश्चात् लक्ष्मी ओर इन्द्र्युप्रका
संवाद, कूर्म ओर महर्षियोकी वार्ता, वर्णाश्रमसम्बन्धी
आचारका कथन, जगत्की उत्पत्तिका वर्णन, संक्षेपसे
काल-संख्याका निरूपण, प्रलयके अन्तमं भगवान्का
स्तवन, संक्षेपसे सृष्टिका वर्णन, शङ्करजीका चरित्र,
पार्वतीसहस्ननाम, `योगनिरूपण, भृगुवंशवर्णन,
स्वायम्भुव मनु तथा देवता आदिकी उत्पत्ति,
दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षसृष्टि-कथन, कश्यपके
वंशका वर्णन, अन्िवंशका परिचय, श्रीकृष्णका
शुभ चरित्र, मार्कण्डेय-श्रीकृष्ण-संवाद, व्यास-
पाण्डव-संवाद, युगधर्मका वर्णन, व्यास-जैमिनिकी
कथा, काशी एवं प्रयागका माहात्म्य, तीनों लोकोका
वर्णन ओर वैदिक शाखाका निरूपण है। इस
पुराणके उत्तरभागमें पहले ईशधरीय-गीता फिर व्यास-
गीता हे, जो नाना प्रकारके धर्मोका उपदेश देनेवाली
है । इसके सिवा नाना प्रकारके तीर्थोका पृथक् -
पृथक् माहात्म्य बताया गया हे । तदनन्तर प्रतिसर्गका
वर्णन हे। यह "ब्राह्यीसंहिता' कही गयी है । इसके
वाद “भागवतीसंहिता" के विषयोका निरूपण है,
जिसमें वर्णोको पृथक् -पृथक् वृत्ति बतायी गयी
हे। इसके प्रथम पादमं ब्राह्यणोक्दै सदाचाररूप
स्थिति वतायी गयी है, जो भ्रा ओर सुख
बदढानेवाली हे । द्वितीय पादमें क्षत्रियोंकी वृत्तिका
भली भोति निरूपण किया गया है, जिसका आश्रय
लेकर मनुष्य अपने पापोंका यहीं नाश करके
स्वर्गलोकमें चला जाता है। तृतीय पादमें वैश्योकी
चार प्रकारक वृत्ति कही गयी है, जिसके सम्यक्
आचरणसे उत्तम गतिक प्राति होती है। उसी
प्रकार इसके चतुर्थं पादमें शूद्रक वृत्ति कही गयी
है, जिससे मनुष्योके कल्याणक वृद्धि करनेवाले
भगवान् लक्ष्मीपति संतुष्ट॒होते ह। तदनन्तर
भागवतीसंहिताके पांचवें पादमं संकरजातियोको
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 2118811 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्व भाग-चतुर्थं पाद् ५२५
वृत्ति कही गयी हे, जिसके आचरणसे वह भविष्यमें
उत्तम गतिको पालेताहे। मुने! इस प्रकार द्वितीय
संहिता पोच पादोसे युक्त कही गयी है। इस
उत्तरभागमें तीसरी संहिता ' सौरीसंहिता' कहलाती
हे, जो मनुष्योका कार्य सिद्ध करनेवाली हे। वह
सकामभाववाले मनुष्योको छः प्रकारसे षट्कर्मसिद्धिका
बोध कराती हे। चौथी 'वेष्णवीसंहिता' हे, जो
मोक्ष देनेवाली कही गयी है । यह चार पदोंवाली
संहिता द्विजातियोके लिये ब्रह्मस्वरूप है । वे क्रमशः
छः, चार, दो ओर पांच हजार श्लोकोंकी वतायी
गयी हं। यह कृर्मपुराण धर्म, अर्थ, काम ओर
मोक्षरूप फल देनेवाला हे, जो पटने ओर सुननेवाले
मनुप्योको सर्वोत्तम गति प्रदान करता है। जो मनुष्य
इस पुराणको लिखकर अयनारम्भके दिन सोनेको
कच्छपमूर्तिके साथ ब्राह्मणको भक्तिपूर्वकं इसका । दान करता हे, वह परम गतिको प्राप्त होता हे।
९९
^=#^-+ >+ >: 1.^~+^=#
मत्स्यपुराणकी विषय-सूची तथा इस पुराणके पाठ, श्रवण ओर दानका माहात््य
ब्रह्माजी कहते ह -- द्विजश्रेष्ठ ! अव मैं तुम्हें | क्रियायोग, फिर पुराणकौर्तन, नक्षत्रत्रत, पुरुषत्रत,
मत्स्यपुराणका परिचय देता हू, जिसमें वेदवेत्ता | मार्तण्डशयनत्रत, श्रीकृष्णा्टमीत्रत, रोहिणीचन्द्र नामक
व्यासजीने इस भूतलपर सात कल्पोके वुत्तान्तको | व्रत, तद्गविधिकी महिमा, वृक्षत्सर्ग, सीभाग्यशयनव्रत,
संक्षिप्त करके कहा है । नृसिंहवर्णन आरम्भ करके | अगस्त्यतव्रत, अनन्ततृतीयाव्रत, रसकल्याणिनीत्रत,
चोदह हजार श्लोकोंका मत्स्यपुराण कहा गया हे । | आनन्दकरीव्रत, सारस्वतत्रत, उपरागाभिपैक
मनु ओर मत्स्यका संवाद, ब्रह्माण्डका वर्णन, | (ग्रहणसखान ) विधि, सपतमीशयनव्रत, भीमद्वादशी,
ब्रह्मा, देवता ओर असुरोकी उत्पत्ति, मरुद्रणका | अनद्धशयनत्रत, अशून्यशयनव्रत, अङ्गारकत्रत,
प्रादुर्भाव, मदनद्रादशी, लोकपालपूजा, मन्वन्तर- | सप्तमीसपतकत्रत, विशोकद्रादशीत्रत, दस प्रकारका
वर्णन, राजा पृथुके राज्यका ` वर्णन, सूर्य ओर | मेस्प्रदान, ग्रहशान्ति, ग्रहस्वरूपकथा, शिवचतुर्दशी,
वैवस्वत मनुकी उत्पत्ति, बुध-संगमन, पितृवंशका | सर्वफलत्याग, रविवारत्रत, संक्रान्तिल्नान,
वर्णन, श्राद्धकाल, पितृतीर्थ-प्रचार, सोमको उत्पत्ति, | विभृतिद्रादशीतव्रत, षष्ठीत्रत-माहात्म्य, स्नानविधिका
सोमवंशका कथन, राजा ययातिका चरित्र, कार्तवीर्य | वर्णन, प्रयागका माहात्म्य, द्वीप ओर लो्कोका
अर्जुनका चरित्र, सृष्टिवंश- वर्णन, भृगुणाप, भगवान् | वर्णन, अन्तरिक्षम गमन, ध्रुवकी महिमा, देवेश्ररके
विष्णुका पृथ्वीपर दस वार जन्म (अवतार), | भवन, त्रिपुरका प्रकाशन, श्रेष्ठ पितरोकी महिमा,
पृरुवंशका कीर्तन, हताशनवंशका वर्णन, पहले । मन्वन्तर-निर्णय, चारों युर्गोकी उत्पत्ति, युगधर्म-
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५२६
निरूपण, वज्राङ्कको उत्पत्ति, तारकासुरको उत्पत्ति,
तारकासुरका माहात्म्य, ब्रह्मदेवानुकीर्तन, पार्वतीका
प्राकख्य, शिवतपोवन, मदनदेहदाह, रतिशोक, गोरी-
तपोवन, शिवका गौरीको प्रसन्न करना, पार्वती
तथा ऋषियोका संवाद, पार्वतीविवाह-मङ्गल, कुमार
कारतिकेयका जन्म, कुमारको विजय, तारकासुरका
भयंकर वध, नृसिंहभगवान्को कथा, ब्रह्माजीको
सृष्टि, अन्धकासुरका वध, वाराणसी-माहात्म्य,
नर्मदा-माहात्म्य, प्रवर-गणना, पितुगाथाका कर्तन
उभयमुखी गोका दान, काले मृगचर्मका दान,
सावित्रीको कथा, राजधर्मका वर्णन, नाना प्रकारके
उत्पातोका कथन, ग्रहणान्त, यात्रानिमित्तक वर्णन,
स्वप्रमद्गलकीर्तन, ब्राह्मण ओर वाराहका माहात्म्य,
समुद्र-मन्थन, कालकूटको शान्ति, देवासुर-संग्राम,
वास्तुविद्या, प्रतिमालक्षण, देवमन्दिर-निर्माण,
प्रासादलक्षण, मण्डपलक्षण, भविष्य राजाओंका
वर्णन, महादानवर्णन तथा कल्पकौर्तन--इन सव
विषयोका इस पुराणमें वर्णन किया गया हे । जो
पवित्र, कल्याणकारी तथा आयु ओर कोर्ति
संक्षिप्त नारदपुराण
बदानेवाले इस पुराणका पाठ अथवा श्रवण
1
करता हे, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता
हे। जो इस पुराणको लिखकर सुवर्णमय
मत्स्य ओर गौोके साथ विषुव योगमें ब्राह्मणको
सत्कारपूर्वक दान देता हे, वह परम पदको प्राप्त
होता हे।
१ क) 0 |
गरुडपुराणक्को विषय-सूची ओर पुराणके पाठ, श्रवण ओर दानककी महिमा
ब्रह्माजी कहते है- मरीचे! सुनो, अव में
मद्गलमय गरुडपुराणका वर्णन करता हूं। गरुडके
पृषछनेपर गरुडासन भगवान् विष्णुने उन्हं तार््ष्य-
कल्पको कथासे युक्तं उन्नीस हजार श्लोकोंका
गरुडपुराण सुनाया था। इसमें पहले पुराणको
आरम्भ करनेके लिये प्रश्न किया गया हे।
फिर संक्षेपसे सृष्टिका वर्णन है। तत्पश्चात् सूर्य
आदिके पूजनको विधि, दीक्षाविधि, श्राद्ध-पजा,
नवव्यूहपूजाकी विधि, वैष्णव-पञ्चर, योगाध्याय,
विष्णुसहस्ननामकीर्तन, विष्णुध्यान, सूर्यपूजा, मूत्युञ्जय-
पृजा, मालामन्त्र, शिवार्चा, गोपालपूजा, त्रेलोक्यमोहन
श्रीधरपूजा, विष्णु-अर्चा, पञ्चतत्तवार्चा, चक्रार्चा,
देवपूजा, न्यास आदि, संध्योपासन, दुर्ग्चन,
सुरार्चन, महेश्वर-पूजा, पवित्रारोपण-पूजन, मूर्तिध्यान,
वास्तुमान, प्रासादलक्षण, सर्वदेवप्रतिष्ठा, पृथक्
पूजाविधि, अष्टाङ्गयोग, दानधर्म, प्रायश्चित्तविधि,
द्वीपेश्वरों ओर नरकोंका वर्णन, सूर्यव्यूह, ज्योतिष,
सामुद्रिकशास्त्र, स्वरज्ञान, नूतनरतरपरीक्षा, तीर्थ-
माहात्म्य, गयाका उत्तम माहात्म्य, पृथक् -पृथक्
विभागपूर्वक मन्वन्तर- वर्णन, पितरोका उपाख्यान,
वर्णधर्म द्रव्यशुद्धि, समर्पण, श्राद्धकर्म, विनायकपूजा,
ग्रहयज्ञ, आश्रम, जननाशौच, प्रेतशुद्धि, नीति-शास्त्र,
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पूर्वभाग-चतुर्थं पाद
५२.७9
व्रत-कथा, सूर्यवंश, सोमवंश, श्रीहरिको अवतारकथा,
रामायण, हरिवंश, भारताख्यान, आयुर्वेदनिदान,
चिकित्सा, द्रव्यगुणनिरूपण, रोगनाशक विष्णुकवच,
गरुडकवच, त्रैपुर मन्त्र, प्रश्नचूडामणि,
अश्चायुर्वेदकौर्तन, ओषधियोके नामका कीर्तन,
व्याकरणका ऊहापोह, छन्दःशास्त्र, सदाचार,
स्नानविधि, तर्पण, बलिवेश्वदेव, संध्या, पार्वणकर्म,
नित्यश्राद्ध, सपिण्डन, धर्मसार, पापोका प्रायश्चित्त,
प्रतिसंक्रम, युगधर्मं, कर्मफल, योगशास्त्र, विष्णुभक्ति,
श्रीहरिको नमस्कार करनेका फल, विष्णुमहिमा,
नृसिंहस्तोत्र, जानामृत, गुहाष्टकस्तोत्र, विष्ण्वर्चनस्तोत्र,
वेदान्त ओर सांख्यका सिद्धान्त, ब्रह्मज्ञान, आत्मानन्द,
गीतासार तथा फलवर्णन- ये विषय कहे गये हं ।
यह गरुडपुराणका पूर्वखण्ड बताया गया हे ।
इसीके उत्तरखण्डमे सबसे पहले प्रेतकल्पका
वर्णन है । मरीचे! उसमें गरुडके पूनेपर भगवान्
विष्णुने पहले धर्मके महत्त्तको प्रकट किया हे
जो योगियोंकी उत्तम गतिका कारण हे। फिर दान
आदिका फल तथा ओध्वदेहिक कर्म बताया गया
हे । तत्पश्चात् यमलोकके मार्गका वर्णन किया गया
है। इसी प्रसंगमें पोडश श्राद्धके फलको सूचित
करनेवाले वृत्तान्तका वर्णन है । यमलोकके मार्गसे
छूटनेका उपाय ओर धर्मराजके वैभवका कथन
है । इसके बाद प्रेतकी पीडाओंका वर्णन, प्रेतचिह-
निरूपण, प्रेतचरितवर्णन तथा प्रेतत्वप्रा्िके कारणका
उल्वेव किया गया है । तदनन्तर प्रेतकृत्यका विचार,
सपिण्डीकरणका कथन, प्रेतत्वसे मुक्त होनेका
कथन, मोक्षसाधक दान, आवश्यक एवं उत्तम
दान, प्रेतको सुख देनेवाले कार्योका ऊहापोह,
शारीरक निर्देश, यमलोक- वर्णन, प्रेतत्वसे उद्धारका
कथन, कर्म करनेके अधिकारीका निर्णय, मृत्युस
पहलेके कर्तव्यका वर्णन, मृत्युसे पीक कर्मका
निरूपण, मध्यपोडश श्राद्ध, स्वर्गप्रा्ि करानेवाले
कर्तव्यका उहापोह, सृतककी दिन- संख्या, नारायणव्रलि
कर्म, वृपोत्सर्गका माहात्म्य, तिपिद्ध कर्मका त्याग,
दर्मत्युके अवसरपर किये. जानेवाले कर्मका वर्णन,
मनुष्योके कर्मका फल, विष्णुध्यान ओर मोक्षके
लिये कर्तव्य ओर अकर्तव्यका विचार, स्वर्गकी
प्राप्तिके लिये विहित कर्मका वर्णन, स्वगीय सुखकरा
निरूपण, भूलोकवर्णन, नीचेके सात लोकोका वर्णन,
ऊपरके पच लोकोंका वर्णन, ब्रह्माण्डकी स्थितिका
निरूपण, त्रह्माण्डके अनेक चरित्र, ब्रह्य ओर जीवक
निरूपण, आत्यन्तिक प्रलयका वर्णन तथा फलस्तुतिका
निरूपण है । यही गरुड नामक पुराण हे, जो कीर्तन
ओर श्रवण करनेपर् वक्ता ओर श्रोता मनुष्यकि
पापका शमन करके उन्हें भोग ओर मोक्ष देनवाला
हे। जो इस पुराणको लिखकर दो सुवर्णमयी
हंसप्रतिमाके साथ विषुव योगमें ब्राह्मणको दान
देता है, वह स्वर्गलोकमं जाता दै।
नग! १.७-#
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५९२८
संक्षिप्त नारदपुराण
ब्रह्माण्डपुराणका परिचय, संक्षिप्त विषय-सूची, पुराण-परम्परा, उसके पाठ,
श्रवण एवं दानका फ़ल
ब्रह्माजी कहते हिं- वत्स! सुनो, अव में
ब्रह्याण्डपुराणका वर्णन करता हू, जो भविष्यकल्पोकी
कथासे युक्तं ओर बारह हजार श्लोकोंसे परिपूर्ण
हे । इसके चार पाद हे । पहला ' प्रक्रियापाद ' दूसरा
अनुषङ्गपाद, तीसरा 'उपोद्घातपाद' ओर चौथा
'उपसंहारपाद' है । पहलेके दो पादोंको पूर्वभाग
कहा गया हे । तृतीय पाद ही मध्यम भाग है ओर
चतुर्थं पाद उत्तरभाग माना गया हे। पूर्वभागके
प्रक्रियापादमें पहले कर्तव्यका उपदेश, नैमिषका
आख्यान, हिरण्यगर्भको उत्पत्ति ओर लोकरचना
इत्यादि विषय वर्णित हें । मानद ! यह पूर्वभागका
प्रथम पाद (प्रक्रियापाद) हे।
अब द्वितीय (अननुषद्ध) पादका वर्णन सुनो, इसमें
कल्प तथा मन्वन्तरव्का वर्णन हे। तत्पश्चात् लोकज्लान,
मानुषी-सृष्टिकथन, रुद्रसृष्टिवर्णन, महादेवविभूति,
ऋषिसर्ग, अग्रिविजय, कालसद्धाव-वर्णन, प्रियत्रत-
वशका परिचय, पृथ्वीका दर्घ्यं ओर विस्तार,
भारतवर्षका वर्णन, फिर अन्य वर्पोका वर्णन,
जम्बू आदि सात द्रीपोका परिचय, नीचेके लोकों-
पातालोका वर्णन, भूर्भुवः आदि ऊपरके लोकोंका
वर्णन, ग्रहोकी गतिका विश्लेषण, आदित्यव्यूहका
कथन, देवग्रहानुकोर्तन, भगवान् शिवकरे नीलकण्ठ
नाम पड्नेका कथन, महादेवजीका वैभव, अमावास्याका
वर्णन, युगतत््वनिरूपण, यजप्रवर्तन, अन्तिम दो युगोंका
कार्य, युगके अनुस्नार प्रजाका लक्षण, ऋषिप्रवर-
वर्णन, वेदव्यसन-वर्णन, स्वायम्भुव मन्वन्तरका निरूपण,
शेषमन्वन्तरका कथन, पृथ्वीदोहन, चाक्षुष ओर
वर्तमान मन्वन्तरके सर्गका वर्णन है। इस प्रकार
यह पूर्वभागका द्वितीय पाद कहा गया।
अव मध्यभागके उपोद्घातपादमें वर्णित विषय
कहे जाते हे। उसमें पहले सपर्षियोंका वर्णन,
प्रजापतिवंशका निरूपण, उससे देवता आदिकी
उत्पत्ति, तदनन्तर विजयकी अभिलाषा ओर मरुदर्णोकी
उत्पत्तिका कथन है । कश्यपकी संतानोंका वर्णन,
ऋषिवंशनिरूपण, पितुकल्पका कथन, श्राद्धकल्पका
वर्णन, वैवस्वतमनुकी उत्पत्ति, उनकी सृष्टि, मनुपुत्रोका
वंश, गान्धर्वनिरूपण, ईक्ष्वाकुवंशवर्णन, महात्मा
अत्रिके वंशका कथन, अमावसुके वंशका वर्णन,
रजिका अद्भुत चरित्र, ययातिचरित, यदुवंशनिरूपण,
कार्तवीर्यचरित, परशुरामचरित, वृष्णिवंशका वर्णन,
सगरकी उत्पत्ति, भार्गवका चस्ति, कार्तवीर्यवधसम्बन्धी
कथा, सगरका चरित्र, भार्गव (ओर्व)-कौ कथा,
देवासुर-संग्रामकी कथा, कृष्णावतारवर्णन, शुक्राचार्यकृत
इन्द्रका पवित्र-स्तोत्र, विष्णुमाहात्म्यकथन, बलिवंश-
निरूपण तथा कलियुगमे होनेवाले राजाओंका
चसित्रि-- यह मध्यमभागका तीसरा उपोदघातपाद हे।
अव उत्तरभागके चौथे उपसंहारपादका वर्णन
करता हूं। इसमें वैवस्वत मन्वन्तरकी कथा विस्तारके
साथ ज्यों-की-त्यों दी गयी है। जो कथा पहले
ही कह दी गयी है, वह यहाँ संक्षेपसे बतायी
जाती है। भविष्यमें होनेवाले मनुओंका चरित्र भी
कहा गया है । तदनन्तर कल्के प्रलयका निर्देश
किया गया हे। कालमान बताया गया है । तत्पश्चात्
प्राप्त लक्षणोके अनुसार चौदह भुवनोंका वर्णन
किया गया है। फिर विपरीत क्मकि आचरणसे
नरकोको प्राप्तिका कथन है । मनोमयपुरका आख्यान
ओर प्राकृत प्रलयका प्रतिपादन किया गया है।
तदनन्तर शिवधामका वर्णन है ओर सत्त्व आदि
गुणोके सम्बन्धसे जीवोकी त्रिविध गतिका निरूपण
किया गया है । इसके बाद अन्वय तथा व्यतिरेकृष्टिसे
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पूर्वभाग-चतुर्थं पाद
अनिर्देश्य एवं अतर्क्य परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका
प्रतिपादन किया गया है । इस प्रकार यह उत्तर-
भागसहित उपसंहारपादका वर्णन किया गया है ।
मरीचे! मेने तुम्हें चार पादचाले ब्रह्माण्डपुराणका
परिचय दिया। यह अटठारहर्वाँ पुराण सारसे भी
सारतर वस्तु है । इसकी कहीं भी उपमा नहीं है ।
मानद्। ब्रह्माण्डपुराण जो चार लाख श्लोकमें कहा
गया है, वास्तवमें उसीको भावितात्मा मुनियोके
उपदेशक पराशरनन्दन व्यासमुनिने अठारह भागोमें
विभक्त करके पृथक्-पृथक् कहा है । दीनोंपर
अनुग्रह करनेवाले धर्मशील मुनियोने मुञ्जसे सभी
पुराण सुनकर उनका सम्पूर्णं लोकोके लिये
प्रकाशन किया हे । पूर्वकालमें मेने वसिष्ठको इस
पुराणका उपदेश दिया था। वसिष्ठने शक्तिनन्दन
पराशरको ओर पराशरने जातूकर्ण्यको यह पुराण
सुनाया । फिर जातूकर्ण्यसे वायुदेवके मुखसे प्रकट
हुए इस उत्तम पुराणको पाकर व्यासदेवने इसे
प्रमाणभूत माना ओर इस लोकमें इसका प्रचार
किया । वत्स! जो एकाग्रचित्त हो इस पुराणका
^=
५२९
पाठ एवं श्रवण करता हे, वह इस लोकमें सारे
पापोका नाश करके अनामय लोक (रोग-शोकसे
रहित परम धाम) -में जाता है। जो इस पुराणको
लिखकर सोनेके सिंहासनपर रखता ओर वस्त्रसे
आच्छादित करके ब्राह्मणको दान कर देता है, वह
ब्रह्माजीके लोकमें जाता है। इसमें अन्यथा विचार
नहीं करना चाहिये। मरीचे! मेने तुमसे जो ये
अठारह पुराण संक्षेपसे कहे है, उन सबको विस्तारसे
सुनना चाहिये । जो श्रेष्ठ मानव इन अठारह पुरा्णोको
विधिपूर्वक सुनता अथवा कहता है, वह फिर इस
संसारमें जन्म नहीं लेता। मैने इस समय जो कुछ
कहा है, यह पुराणोंका सूत्रूप है। पुराणका फल
चाहनेवाले पुरुषको इसका नित्य अनुशीलन करना
चाहिये। जो दाम्भिक, पापाचारी, देवता ओर गुरुकी
निन्दा करनेवाला, साधुमहात्माओंसे द्वेष रखनेवाला
ओर शठ है, उसे इस पुराणका उपदेश कदापि नहीं
देना चाहिये। जो शान्त, मनोनिग्रहसे युक्त, सेवापरायण,
द्वेषरहित तथा पवित्र हो, उस श्रेष्ठ वेष्णव पुरुषको
ही इसका उपदेश देना चाहिये ।
८८१
बारह मासोंकी प्रतिपदाके व्रत एवं आवश्यक कृत्योका वर्णन
श्रीनारदजी बोले- प्रभो! मैने आपके मुखसे
समस्त पुराणोंका सूत्र, जैसा कि परमेष्ठी ब्रह्माजीने
महर्षिं मरीचिसे कहा था, सुन लिया। महाभाग।
अब मुड्से क्रमशः तिथियोके विषयमे निरूपण
कीजिये, जिससे त्रतका ठीक-ठीक निश्चय हो
जाय। जिस मासमे, जिस पुण्य तिधिको जिसने
उपासना की है ओर उसको पूजा आदिका जो
विधान है, वह सब इस समय बताइये ।
श्रीसनातनजीने कहा-- नारद! सुनो, अव म
तुमसे तिथियोके पृथक्-पृथक् व्रतका वर्णन करता
ह| तिधियेकि जो स्वामी है, उन्ठकि क्रमसे पृथक्-
पृथक् त्रत बताया जाता है, जो सम्पूर्णं सिद्धिर्योको
प्राप्ति करानेवाला है। चैत्रमासके शुक्ल पक्षं
प्रथम दिन सूर्योदयकालमें ब्रह्माजीने सम्पूर्णं जगत्की
सृष्टि की थी, इसलिये वर्षं ओर वसन्त ऋतुके
आदिमे बलिराज्य-सम्बन्धी तिथि- अमावास्याको
जो प्रतिपदा तिथि प्राप्त होती है, उसीमें सदा
विद्वानोको त्रत करना चादहिये। प्रतिपदा तिधि
पूर्वविद्धा होनेपर ही व्रत आदिमं ग्रहण करने
योग्य है । उस दिन महाशान्ति करनी चाहिये । वह
समस्त पापका नाश, सव प्रकारके उत्पा्तोकी
शान्ति तथा कलियुगके दुष्कर्मोका निवारण
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५३०
संक्षिप्त नारदपुराण
करनेवाली होती हे। साथ ही वह आयु देनेवाली,
पुष्टिकारक तथा धन ओर सौभाग्यको बटानेवाली
हे। वह परम मद्गलमयी, शान्ति, पवित्र होनेके
साथ ही इहलोक ओर परलोकमें भी सुख
देनेवाली है। उस तिथिको पहले अग्निरूपधारी
भगवान् ब्रह्माको पूजा करनी चाहिये, फिर क्रमशः
सव देवताओंको पृथक्-पृथक् पूजा करे । इस
तरह पूजा ओर ॐॐकारपूर्वक नमस्कार! करके
कुश, जल, तिल ओर अक्षतके साथ सुवर्णं ओर
वस्त्रसहित दक्षिणा लेकर वेदवेत्ता ब्राह्मणको ब्रतकी
पूतिके लिये दान करना चाहिये । इस प्रकार पूजा-
विशेषसे " सौरि' नामक त्रत सम्पन्न होता है । ब्रह्मन्
यह मनुष्योको आरोग्यः प्रदान करनेवाला है । मुने।
उसी दिन ' विद्याव्रत२' भी बताया गया है तथा
इसी तिथिको श्रीकृष्णने अजातशत्रु युधिष्ठिरको
" तिलकत्रत '* करनेका उपदेश दिया हे ।
तदनन्तर ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदाको
सूर्योदयकालमें देवमन्दिरसम्बन्धी वाटिकामे उगे
हए मनोहर कनेरवृक्षका पूजन करे। कनेरके
वृक्षमे लाल डोरा लपेटकर उसपर गन्ध, चन्दन,
धूप आदि चढ़ावे, उगे हुए सप्तधान्यके अङ्कुर,
नारंगी ओर विजौरा नीबू आदिसे उसकी पूजा
करे। फिर अक्षत ओर जलसे उस वृक्षको सींचकर
निग्राङ्कित मन्त्रसे क्षमा-प्रार्थना करे-
करवीरवृषावास नमस्ते भानुवह्यभ।
मोलिमण्डन दुर्गादिदेवानां सततं प्रिय॥
(ना० पूर्व° ११०। १०७)
"करवीर! आप धर्मके निवास-स्थान ओर
भगवान् सूर्यके पुत्र है । दुर्गादि देवताओके मस्तकको
विभूषित करनेवाले तथा उनके सदेव प्रिय हेँ।
आपको नमस्कार दै।'
तत्पश्चात् 'आ कृष्णेन ०५' इत्यादि वेदोक्त
मत्रका उच्चारण करके इसी प्रकार क्षमा-प्रार्थना
करे । इस प्रकार भक्तिपूर्वक पूजन करके ब्राह्मणोको
दक्षिणा दे ओर वृक्षकी परिक्रमा करके अपने घर
जाय । श्रावण शुक्ला प्रतिपदाको परम उत्तम
'रोटकव्रत' होता है, जो लक्ष्मी ओर बुद्धिको
देनेवाला है तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षका
कारण है। ब्रह्मन्! सोमवारयुक्त श्रावण शुक्ल
प्रतिपदा या श्रावणके प्रथम सोमवारसे लेकर सादे
तीन मासतक यह त्रत किया जाता है। इसमें
प्रतिदिन सोमेश्वर भगवान् शिवकी विल्वपत्रसे
पूजा की जाती हे। कार्तिक शुक्ला चतुर्दशीतक
इस नियमसे पूजा करके उस दिन उपवासपूर्वक
रहे ओर त्रतपरायण पुरुष पूर्णिमाके दिन पुनः
भगवान् शङ्करकी पूजा करे। फिर बाँसके पात्रे
१. नामके आदिमं * ॐ ' ओर अन्तम “नमः जोड़कर बोलना ही ॐकारपूर्वक नमस्कार दै; यथा-' ॐ ब्रह्मणे
नमः ' इत्यादि। अथवा “ॐ नमः' को एक साथ भी बोल सकते ठै; यथा-* ॐ नमो ब्रह्मणे ' इत्यादि ।
२. इसी तिथिको विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें आरोग्यतव्रत "का विधान किया गया है ओर ब्रह्मपुराणमें संवत्सरारम्भ-
विधि! दी गयी है)
३. ' विद्यात्रत ' को विधि विष्णुधरमत्तिरमें तथा गरुडपुराणमें भी उपलब्ध होती हे।
४. ' तिलकत्रत ' के विषयमे विशेष जानकारी भविष्योत्तरपुराणसे हो सकती है।
५. आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्य॑ च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥
६. निर्णयग्रन्थोके अनुसार धविष्योत्तरपुराणमें इसकी विशेष विधि दी गयी है । वहां ' करवीरत्रत' के नामसे इसका
उद्वेख किया गया है।
७, व्रतराजमें इस त्रतका विस्तारपूर्वक वर्णन है।
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पूर्वभाग-चतुर्थं पाद
सुवर्णसहित पवित्र एवं अधिक वायन, जो देवताकी
प्रसन्नताको बढ़ानेवाला हो लेकर संकल्पपूर्वक
ब्राह्मणको दान करे। मुनीश्वर! यह दान धनकी
वृद्धि करनेवाला है। भाद्रपदके शुक्ल पक्षकी
प्रतिपदाको कोई ` महत्तमनव्रतः ' एवं कोई ' मौनत्रत? '
वतलाते हे । इसमें भगवान् शिवको पूजा को जाती
हे। उस दिन मोन रहकर नैवेद्य तैयार करे।
अड़तालीस फल ओर पए एकत्र करके उनममेसे
सोलह तो ब्राह्मणको दे ओर सोलह देवताको भोग
लगावे एवं शेष सोलह अपने उपयोगमें लावे।
सुवर्णमयी शिवको प्रतिमाको विधानवेत्ता पुरुष
कलशके ऊपर स्थापित करके उसकी पूजा करे।
फिर वह सब कुछ एक धेनुके सहित आचार्यको
दान कर दे। ब्रह्मन्! देवदेव महादेवके इस त्रतका
चोदह वर्षोतक पालन करके नाना प्रकारके भोग
भोगनेकै पश्चात् देहावसान होनेपर शिवलोकमें
जाता हे।
ब्रह्मन्! आशिन शुक्ला प्रतिप्रदाको 'अशोक-
व्रत' का पालन करके मनुष्य शोकरहित तथा धन-
धान्यसे सम्पन्न हो जाता है। उसमें नियमपूर्वक
रहकर अशोक वृक्षक पूजा करनी चाहिये।
बारहवें वर्षं व्रतके अन्तमें अशोक वृक्षको सुवर्णमयी
मूर्ति बनाकर उसे भक्तिपूर्वक गुरुको समर्पित
करनेपर मनुष्य शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता दै।
इसी प्रतिपदाको "नवरात्रव्रत' आरम्भ करे।
पूर्वाहकालमें कलशस्थापनपूर्वक देवीको पूजा
करे। गेहूं ओर जौके वीजसे अंकुर आरोपण
करके प्रतिदिन अपनी शक्तिके अनुसार उपवास,
अयाचित अथवा एकभक्त करके रहे ओर पूजा,
पाठ, जप आदि करता रहे । ब्रह्मन्! मार्कण्डेयपुराणमं
देवीके जो तीन चरित्र कटे गये हैँ, उनका भोग
५३१
ओर मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाला पुरुष नौ
दिनोतक पाठ करे । नवरात्रमें भोजन, वस्त्र आदिके
द्वारा कुमारीपूजन उत्तम माना गया है । ब्रह्मन् ! इस
प्रकार व्रतका आचरण करके मनुष्य इस पृथ्वीपर
दुर्गाजीको कृपासे सम्पूर्णं सिद्धियोंका आश्रय हो
जाता है।
कार्तिक शुक्ला प्रतिपदाको नवरात्रमं बताये
अनुसार नियमोका पालन करे । विशेषतः अन्नकुट
नामक कर्म भगवान् विष्णुकी प्रसत्नताको बढृानेवाला
है। उस दिन गोवर्धनपूजनके लिये सव तरहके
पाक ओर सब गोरसोंका संग्रह करके सवको
अन्नकूट करना चाहिये । इससे सव मनोरथोकी
सिद्धि होती हे । सायंकालमे गौओंसहित श्रीगोवर्धन
पर्वतका पूजन करके जो उसकी प्रदक्षिणा करता
है, वह भोग ओर मोक्ष पाता है।
मार्गशीर्षं शुक्ला प्रतिपदाको परम उत्तम
धनव्रत' का पालन करना चाहिये । रातमें भगवान्
विष्णुका पृजन ओर होम करके अप्रिदेवकी
सुवर्णमयी प्रतिमाको दो लाल वस्त्रौसे आच्छादित
करके ब्राह्मणको दान दे। एेसा करके मनुष्य इस
१-२. महत्तम ओर मौन-इन दोनो व्रतोका विशेष विधान स्कन्दपुराणमें उपलब्ध होता है।
[ 1183 ] सं० ना० पुर १८-
((-0. 1/८111141/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
५३२ संक्षिप्त नारदपुराण
पृथ्वीपर धन-धान्यसे सम्पन्न होता है । अग्निदेवके
द्वारा उसके समस्त पाप दग्ध हो जाते हैँ ओर वह
विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
पोष शुक्ला प्रतिपदाको भक्तिपूर्वक सूर्यदेवकी
पूजा करके एकभुक्तत्रत करनेवाला मनुष्य सूर्यलोकमें
जाता हे। माघ शुक्ला प्रतिपदाके दिन अग्निस्वरूप
साक्षात् महेश्वरकी विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य
इस पृथ्वीपर समृद्धिशाली होता हे । फाल्गुन शुक्ला
प्रतिपदाको धूलिधूसरित अद्धोवाले देवदेव दिगम्बर
शिवको सब ओरसे जलद्वारा स्रान करावे। भगवान्
महेश्वर इस लोकिक कर्मसे भी संतुष्ट होकर अपना
सायुज्य प्रदान करते हँ । फिर भक्तिपूर्वक भली भोति
पूजित होनेपर वे क्या नहीं दे सकते! वैशाख शुक्ला
प्रतिपदाको विश्चव्यापक भगवान् विष्णुकी विधिपूर्वक
पूजा करके ब्रती पुरुष ब्राह्मणोंको भोजन करावे।
इसी प्रकार आषाद् शुक्ला प्रतिपदाको जगदुरु ब्रह्म
एवं विष्णुका पूजन करके ब्राह्मण-भोजन करावे ।
एेसा करनेसे विष्णुसहित सर्वलोकेश्वरेधर ब्रह्माजी
अपना सायुज्य प्रदान करते हँ ओर वह सम्पूर्ण
सिद्धियोको प्राप्त कर लेता हे। द्विजश्रेष्ठ! बारह
महीनोंकी प्रतिपदा तिथिययोमें होनेवाले जो त्रत तुमं
वताये गये हैँ, वे भोग ओर मोक्ष देनेवाले हैँ । इन
सव त्रतोमे ब्रह्यचर्य-पालनका विधान हे । भोजनके
लिये सामान्यतः हविष्यान्न बताया गया है।
बारह मासोके द्वितीया-सम्बन्धी व्रतो ओर आवश्यक कृत्योंका निरूपण
सनातनजी कहते है-- ब्रह्मन्! सुनो, अब मँ
तुम्हे द्वितीयाके त्रत बतलाता हूं, जिनका भक्ति-
पूर्वक पालन करके मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित
होता है। चैत्र शुक्ला द्वितीयाको ब्राह्मी शक्तिके
साथ ब्रह्माजीका हविष्यात्न तथा गन्ध आदिसे
पूजन करके व्रती पुरुष सम्पूर्णं यज्ञोका फल पाता
है ओर समस्त मनोवाच्छित कामनाओंको पाकर
अन्तमं ब्रह्मपद प्राप्त करता हे । विप्रवर! इसी दिन
सायंकाल उगे हुए बालचन्द्रमाकाः पूजन करनेसे
भोग ओर मोक्षरूप फलक प्रासि होती है । अथवा
उस दिन भक्तिपूर्वक अश्चिनीकुमारोकी यत्नपूर्वक
पूजा करके ब्राह्मणको सोने ओर चाँदीके नेत्रोंका
दान करे? । इस व्रतमें दही अथवा घीसे प्राणयात्राका
निर्वाह किया जाता हे । द्विजेन्द्र! बारह वर्षोतक
“नेत्रत्रत' का अनुष्ठान करके मनुष्य पृथ्वीका अधिपति
होता है । वैशाख शुक्ला द्वितीयाको सप्तधान्ययुक्त
कलशके ऊपर विष्णुरूपी ब्रह्माका विधिपूर्वक
पूजन करके मनुष्य मनोवाज्छित भोग भोगनेके
पश्चात् विष्णुलोक प्राप्त कर लेता है । ज्येष्ठ शुक्ला
द्वितीयाको सम्पूर्ण भुवनोके अधिपति ब्रह्मस्वरूप
भगवान् भास्करका विधिपूर्वक पूजन करके जो
भक्तिपूर्वक ब्राह्यणोंको भोजन कराता है, वह
सूर्यलोकमें जाता है । आषाढमासके शुक्ल पक्षमे
जो पुष्यनक्षत्रसे युक्त द्वितीया तिथि आती है,
उसमें सुभद्रादेवीके साथ श्रीबलराम ओरं श्रीकृष्णको
रथपर् विठाकर ब्रती पुरुष ब्राह्मण आदिके साथ
नगर आदिमे भ्रमण करावे ओर किसी जलाशयके
निकट जाकर बड़ा भारी उत्सव मनावे। तदनन्तर
देवविग्रहोंको विधिपूर्वक पुनः मन्दिरमे विराजमान
करके उक्तं व्रतकी पूर्तिके लिये ब्राह्मणोको
भोजन करावे। श्रावण कृष्णा द्वितीयाको प्रजापति
विश्वकर्मां शयन करते हैँ । अतः वह पुण्यमयी
१. विष्णुधर्मोत्तिरपुराणके अनुसार यह " बालेन्दुत्रत " कहा गया है ।
२. विष्णुधर्मे भी इस “नेत्रत्रत' का वर्णन किया गया है।
((-0. 1/८111141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
[य 0 श 7 क
न व ता । = 1
पूर्वभाग-चतुर्थं पाद
५३२३
तिथि 'अशून्यशयन' नामसे प्रसिद्ध है। उस दिन
अपनी शक्तिके साथ शय्यापर शयन किये हए
नारायणस्वरूप चतुर्मुख ब्रह्माजीकौ पूजा करके उन
जगदीश्चरको प्रणाम करे।
तदनन्तर सायंकालमे चन्द्रमाके लिये अर्घ्यदान
भी आवश्यक बताया गया है, जो सम्पूर्णं सिद्धियोकी
प्राप्ति करानेवाला हे। भाद्रपद शुक्ला द्वितीयाको
इनद्ररूपधारी जगद्विधाता ब्रह्माको विधिपूर्वक पूजा
करके मनुष्य सम्पूर्ण यज्ञोका फल पाता हे । आश्चिन
मासके शुक्लपक्षमें जो पुण्यमयी द्वितीया तिथि
आती हे, उसमे दिया हआ दान अनन्त फल
देनेवाला कहा जाता हे । कार्तिक शुक्ला द्वितीयाको
पूर्वकालमें यमुनाजीने यमराजको अपने घर भोजन
कराया था, इसलिये यह * यमद्वितीया ' कहलाती है।
इसमें बहिनके घर भोजन करना पुष्टिवर्धक बताया
गया हे। अतः वहिनको उस दिन वस्त्र ओर
आभूषण देने चाहिये । उस तिथिको जो बहिनके
हाथसे इस लोकमें भोजन करता हे, वह सर्वोत्तम
रल, धन ओर धान्य पाता है। मार्गशीर्षं शुक्ला
द्वितीयाको श्राद्धके द्वारा पितरोका पूजन करनेवाला
पुरुष पुत्र-पोत्रोंसहित आरोग्य लाभ करता है । पौष
शुक्ला द्वितीयाको गायके सीगमें लिये हए जलके
द्वारा मार्जन करना ओर संध्याकालमें बालचन्द्रमाका
दर्शन करना मनुष्योके लिये सम्ूर्ण कामनाओंको
देनेवाला है। जो हविष्यात्न भोजन करके
इद्धियसंयमपूर्वक रहकर अर्ध्यदानसे तथा घृतसहित
पुष्प आदिसे बालचन्द्रमाका पूजन करता है, वह
धर्म, काम ओर अर्धकी सिद्धि लाभ करता हे।
माघणशुक्ला द्वितीयाको भानुरूपी प्रजापतिकी विधिपूर्वक
अर्चना करके लाल फूल ओर लाल चन्दन आदिसे
उनकी पूजा करनी चाहिये । अपनी शक्तिके अनुसार
सोनेकी सूर्यमूर्तिका निर्माण कराकर तबिके पात्रको
गेहं या चावलसे भर दे ओर वह पात्र भक्तिपूर्वक
देवताको समर्पित करके मूर्तिसहित उसे ब्राह्मणको
दान कर दे। ब्रह्मन्! इस प्रकार त्रतका पालन
करनेपर वह मनुष्य उदित हए साक्षात् सूर्यकि समान
इस प्ृथ्वीपर दुर्जय एवं दुर्धर्ष हो जाता है। इस
लोकमें श्रेष्ठ कामनाओंका उपभोग करके अन्तमें
वह ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। फाल्गुन शुक्ला
द्वितीयाको श्रेष्ठ द्विज श्चैत एवं सुगन्धित पुष्पे
भगवान् शिवकी पूजा करे । फूलोसे चंदोवा बनाकर
सुन्दर पुष्पमय आभूषणोसे उनका श्ृद्वार करे। फिर
धूप, दीप, नाना प्रकारके नैवेद्य ओर आरती आदिके
द्वारा भगवान्को प्रसन्न करके पृथ्वीपर् पडकर उन्दें
स्टाद्ग प्रणाम करे। इस प्रकार देवेश्वर शिवकी
आराधना करके मनुष्य रोगसे रहित तथा धन-
धान्यसे सम्पन्न हौ निश्चय ही सौ वर्पोतक जीवित
रहता हे । शुक्लपक्षकी द्वितीया तिथियोमें जो विधान
बताया गया है, वही विधिज्ञ पुरूषांको कृष्णपक्षकीं
द्वितीयामें भी करना चाहिये । पृथकृ-पृथक् महीने
नाना रूप धारण करनेवाले अग्निदेव दी द्वितीया
तिधिर्योमं पृजित होते ट । इसमं भी पूर्ववत् ब्रह्मचर्यं
आदिका पालन आवश्यक है।
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((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
५३४
संक्षिप्त नारदपुराण
बारह महीनोके तृतीया-सम्बन्धी ब्रतोंका परिचय
सनातनजी कहते ह--नारद! सुनो, अव में
तुम्हें तृतीयाके त्रत वतलाता हूं, जिनका विधिपूर्वकः
पालन करके नारी शीघ्र सोभाग्य लाभ करती है।
ब्रह्मन्! वर-प्रा्तिको इच्छा रखनेवाली कन्या तथा
सोभाग्य, पुत्र एवं पतिको मङ्गलकामना करनेवाली
विवाहिता नारी चेत्र शुक्ला तृतीयाको उपवास
करके गोरीदेवी तथा भगवान् शङ्करकी सोने,
चोदी, तबे या मिटरीकी प्रतिमा बनावे ओर उसे
गन्धपुष्प, दूर्वाकाण्ड आदि आचारो तथा सुन्दर
वस्त्राभूषणोंसे विधिपूर्वक पूजित करके सधवा
ब्राह्मण-पत्नियों अथवा सुलक्षणा ब्राह्मण-कन्याओंको
सिन्दूर, काजल ओर वस्त्राभूषणों आदिसे संतुष्ट
करे। तदनन्तर उस प्रतिमाको जलाशयमें विसर्जन
कर् दे । स्त्रियोको सौभाग्य देनेवाली जैसी गौरीदेवी
हे, वेसी तीनों लोकोमें दूसरी कोई शक्ति नहीं है ।
_ वैशाख शुक्ल पक्षकी जो तृतीया है, उसे ' अक्षयतृतीया '
कहते हैँ । वह. चेतायुगको आदि तिथि है। उस
दिन जो सत्कर्म किया जाता है, उसे वह अक्षय
बना देती हे । वेशाख शुक्ला तृतीयाको लक्ष्मीसहित
जगद्गुरु भगवान् नारायणका पुष्प,धूप ओर चन्दन
आदिसे पूजन करना चाहिये अथवा गङ्गाजीके
जलम स्नान करना चाहिये । एेसा करनेवाला मनुष्य
समस्त पापोसे मुक्त हो जाता है तथा सम्पूर्ण
देवताओंसे वन्दित हो भगवान् विष्णुके लोकमें
जाता हे।
ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी जो तृतीया हे, वह
“रम्भा-तृतीया' के नामसे प्रसिद्ध है। उस दिन
सपल्लीक श्रेष्ठ ब्राह्मणको गन्ध, पुष्प ओर वस्त्र
आदिसे विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये । यह त्रत
धन, पुत्र ओर धर्मविषयक शुभकारक वुद्धि प्रदान
करता हे। आषाढ शुक्ला तृतीयाको सपत्ीक ब्राह्मणमें
लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुकी भावना करके वस्त्र,
आभूषण, भोजन ओर धेनुदानके द्वारा उनकी पूजा
करे; फिर प्रिय वचनोँसे उन्हें अधिक संतुष्ट करे ।
इस प्रकार सौभाग्यको इच्छासे प्रेमपूर्वक इस व्रतका
पालन करके नारी धन-धान्यसे सम्पन्न हो देवदेव
श्रीहरिके प्रसादसे विष्णुलोक प्राप्त कर लेती है।
श्रवण शुक्ला तृतीयाको ' स्वर्णगौरीत्रत' का आचरण
करना चाहिये । उस दिन स्त्रीको चाहिये कि वह
षोडश उपचारोसे भवानीकौ पूजा करे ।
भाद्रपद शुक्ला तृतीयाको सौभाग्यवती स्त्री
विधिपूर्वक पाद्य-अर्घ्य आदिके द्वारा भक्ति-
भावसे पूजा करती हई “ हरितालिकात्रत "का पालन
करे। सोने, चोदी, तबि, वांस अथवा मिदीके
पात्रमे दक्षिणासहित पकवान रखकर फल ओर
वस्त्रके साथ ब्राह्मणको दान करे। इस प्रकार
व्रतका पालन करनेवाली नारी मनोरम भोगोका
उपभोग करके इस त्रतके प्रभावसे गौरीदेवीकौ
सहचरी होती हे । आश्विन शुक्ला तृतीयाको “ बृहद्
गौरीत्रत'-का आचरण करे । नारद! इससे सम्पूर्ण
कामनाओंकी सिद्धि होती दै।
कातिक शुक्ला तृतीयाको " विष्णु-गौरीत्रत "का
आचरण करे। उसमे भोति-भतिके उपचारोसे
जगद्वन्द्या लक्ष्मीक पूजा करके सुवासिनी स्त्रीका
मङ्गल-द्रव्योसे पूजन करनेके पश्चात् उसे भोजन
करावे ओर प्रणाम करके विदा करे। मार्गशीर्ष शुक्ला
तृतीयाको मङ्खलमय ' हरगोरीत्रत' करके पूर्वोक्तविधिसे
जगदम्बाका पूजन करे । इस तव्रतके प्रभावसे स्त्री
मनोरम भोगोका उपभोग करके देवीलोकमें जाती
ओर गौरीके साथ आनन्दका अनुभव करती है।
पौष शुक्ला तृतीयाको ' ब्रह्मगौरीव्रत "का आचरण
करे। द्विजश्रेष्ठ । इसमें भी पूर्वोक्त विधिसे पूजन
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 8118801 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
पूर्वभाग-चतुर्थं पाद `
करके नारी ब्रह्मगौरीके प्रसादसे उनके लोकें
जाकर आनन्द भोगती हे । माघ शुक्ला तृतीयाको
व्रत रखकर पूर्वोक्त विधिसे सौभाग्यसुन्दरीकी
पूजा करनी चाहिये ओर उनके लिये नारियलके
साथ अर्घ्यं देना चाहिये । इससे प्रसन्न होकर ब्रतसे
संतुष्ट हई देवी अपना लोक प्रदान करती हेै।
फाल्गुनके शुक्ल पक्षमे कुलसोख्यदा-तृतीयाका
५३५
व्रत होता है, उसमें गन्ध, पुप्प आदिके द्वारा
पूजित होनेपर देवी सबके लिये मद्कलदायिनी
होती हं। मुने! सम्पूर्ण तृतीयाव्रतोमे देवीपूजा,
ब्राह्मणपूजा, दान, होम ओर विसर्जन- यह साधारण
विधि है। इस प्रकार तुम्हें तृतीयाके व्रतं बताये
गये है, जो भक्तिपूर्वक पालित होनेपर मनकी
अभीष्ट वस्तुएं देते हें ।
८ {1/9
बारह महीनोके चतुर्थी-तव्रतोंकी विधि ओर उनका माहात्म्य
सनातनजी कहते हे-- ब्रह्मन्! सुनो, अब मेँ
तुम्हें चतुर्थकि त्रत बतलाता हूं! जिनका पालन
करके स्त्री ओर पुरुष मनोवाचज्छित कामनाओंको
प्राप्त कर लेते हे । चेत्रमासकी चतुर्थीको वासुदेवस्वरूप
गणेशजीकौ भलीभोति पूजा करके ब्राह्मणको
सुवर्णं दक्षिणा देनेसे मनुष्य सम्पूर्णं देवताओंका
वन्दनीय हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता हेै।
वेशाखको चतुर्थीको संकर्षण गणेशकी पूजा करके
विधिज्ञ पुरुष गृहस्थ ब्राह्मणोको श्भुः दान करे तो
वह संकर्षणलोकमें जाकर अनेक कल्पोतक
आनन्दका अनुभव करता है। ज्येष्ठ मासकी
चतुर्थीको प्रद्युभ्ररूपी गणेशका पूजन करके
ब्राह्मणसमूहको फल-मूलका दान करनेसे मनुष्य
स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है । आपादढृकी चतुर्थीको
अनिरुद्धस्वरूप गणेशको पूजा करके संन्यासि्योको
तूबीका पात्र दान करनेसे मनुष्य मनोवाच्छित
फल पाता हे । ज्येष्टको चतुर्थीको एक दुसरा परम
उत्तम त्रत होता है, जिसे “ सतीव्रत' कहते हे । इस
त्रतका पालन करके स्त्री गणेशमाता पार्वतीके
लोकम जाकर उन्हीके समान आनन्दको भागिनी
होती है। इसी प्रकार आपाढकी चतुर्धीको एक
दूसरा कल्याणकारी त्रत होता है, क्योकि वह
तिथि रथन्तर कल्पका प्रथम दिन है। उस दिन
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प्रीतिदायक टे। इस प्रकार् व्रतं पृरा करके स्वयं
मनुष्य श्रद्धापूत हदयसे विधिपूर्वकं गणेशजीकी
पूजा करके देवताओके लिये दुर्लभ फल भी प्राप्त
कर लेता हे। मुने! श्रावणकी चतुर्थको चन्द्रोदय
होनेपर विधिज्ञोमें श्रेष्ठ विद्वान् गणेशजीको अर्घ्य
प्रदान करे। उस समय गणेशजीके स्वरूपका
ध्यान करना चाहिये । ध्यानके पश्चात् आवाहन
आदि सम्पूर्णं उपचारोसे उनका पूजन करे । फिर
लड्डूका नेवेद्य अर्पण करे, जो गणेशजीके लिये
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भी प्रसादस्वरूप लड्ढ़ खाय तथा रतभ गणेशजीका
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५३६
पूजन करके भूमिपर ही सुखपूर्वक सोये । इस
व्रतके प्रभावसे वह लोकमें मनोवाज्छित कामनाओंको
प्राप्त कर लेता है ओर परलोकमें भी गणेशजीका
पद पाता है। तीनों लोकोमें इसके समान दूसरा
कोई ब्रत नहीं हे ।
तदनन्तर भाद्रपद कृष्णा चतु्थीको बहुलागणेशका
गन्ध, पुष्प, माला ओर घास आदिके द्वारा
यलपूर्वक पूजन करना चाहिये । तत्पश्चात् परिक्रमा
करके सामर्थ्य हो तो दान करे। दानकी शक्ति न
हो तो इस बहुला गोको नमस्कार करके विसर्जन
करे । इस प्रकार पाच, दस या सोलह वर्षोतक इस
व्रतका पालन करके उद्यापन करे। उस समय दूध
देनेवाल गौका दान करना चाहिये । इस त्रतके
प्रभावसे मनुष्य मनोरम भोगोंका उपभोग करके
देवताओद्रारा सत्कृत हो गोलोकधाममें जाता है ।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थको सिद्धिविनायक-त्रतका
पालन करे। इसमे वाहन आदि समस्त उपचारोद्वारा
गणेशजीका पूजन करना चाहिये । पहले एकाग्रचित्त
होकर सिद्धिविनायकका ध्यान करे। उनके एक
दात है। कान सूपके समान जान पडता है । उनका
मुंह हाथीके मुखके समान है । वे चार भुजाओंसे
सुशोभित ह । उन्होने हाथोमें पाश ओर अङ्कश
धारण कर रखे है । उनकी अङ्गकानि तपाये हए
सुवर्णके समान देदीप्यमान हे । उनके इक्षौस नाम
लेकर उन्हें भक्तिपूर्वक इक्ीस पत्ते समर्पित करे।
अव तुम उन नामको श्रवण करो। "सुमुखाय
नमः' कहकर शमीपत्र, "गणाधीशाय नमः' से
भेगरेयाका पत्ता, “उमापुत्राय नमः' से विल्वपत्र,
संक्षिप्त नारदपुराण
से बेरका पत्ता, “हरसूनवे नमः ' से धतूरका पत्ता,
"शूर्पकर्णाय नमः' से तुलसीदल, * वक्रतुण्डाय
नमः' से सेमका पत्ता, "गुहाग्रजाय नमः' से
अपामार्गका पत्ता, "एकदन्ताय नमः' से बनभंटा
या भरकटेयाका पत्ता, “हेरम्बाय नमः" से सिंदूर
( सिंदूरचर्व अथवा सिंदूर वृक्षका पत्ता), ' चतुहात्रि
नमः' से तेजपात ओर सर्वेश्वराय नमः' से
अगस्त्यका पत्ता चटढावेः। यह सब गणेशजीको
प्रसन्नताको बदढ़ानेवाला है । तत्पश्चात् दो दूर्वादल
लेकर गन्ध, पुष्प ओर अक्षतके साथ गणेशजीपर
चदवे। इस प्रकार पूजा करके भक्तिभावसे
नेवेद्यरूपमें पोच लड्डू निवेदन करे । फिर आचमन
कराकर नमस्कार ओर प्रार्थना करके देवताका
विसर्जन करे। मुने! सब सामग्नियोसहित गणेशजीको
स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्यको अर्पित करे ओर
ब्राह्यणोको दक्षिणा दे। नारद! इस प्रकार पांच
वर्षोतक भक्तिपूर्वक गणेशजीको पूजा ओर उपासना
करनेवाला पुरुष इस लोक ओर परलोकके शुभ
भोगोंको प्राप्त कर लेता है। इस चतुर्थक रातमे
कभी चन्द्रमाकी ओर न देखे। जो देखता है उसे
न्ूठा कलङ्क प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है ।
यदि चन्द्रमा दीख जाय तो उस दोषकी शान्तिकि
लिये इस पौराणिक मन्त्रका पाठ करे-
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः.
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥
(ना० पूर्व० ११३। ३९)
' सिंहने प्रसेनको मारा ओर सिंहको जाम्बवान्ूने
मार गिराया। सुकुमार बालक! तु रो मत। यह
'गजमुखाय नमः ' से दूर्वादल, “लप्बोदराय नमः ' | स्यमन्तक अव तेरा ही है।'
१. यहाँ इ्षीस नामोपे इष्ीस पत्ते अर्पण करनेकी बात लिखकर तेरह नामोंका ही उदे किया गया है । संग्रह
ग्रन्थे उपर्युक्त नामोके अतिरिक्त आट नाम ओर आठ प्रकारके पत्तोका निर्देश इस प्रकार किया गया है-' विकटाय
नमः' से कनेरका पत्ता, "इभतुण्डाय नमः” से अश्मातपत्र, “ विनायकाय नमः" से आकका पत्ता, कपिलाय नमः' से
अर्जुनका पत्ता, “वटवे नमः" से देवदारुका पत्ता, “ भालचन्द्राय नमः” से मरुआका पत्ता, "सुराग्रजाय नमः' स
गान्धारी-पत्र ओर ' सिद्धिविनायकाय नमः" से केतको-पत्र अर्पण करे।
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पूर्वभाग- चतुर्थ पाद
आशिन शुक्ला चतुर्थको पुरुषसूक्तद्वारा
पोडशोपचारसे कपर्दीश विनायककी पूजा करे।
कार्तिक कृष्ण चतुर्थीको 'ककचितुर्थी' (करवा
चौथ)-का त्रत बताया गया है। इस ब्रतमें केवल
स्त्रियोका ही अधिकार है। इसलिये उसका विधान
बताया है-स्त्री स्नान करके वस्त्राभूषणोंसे विभूषित
हो गणेशजीकी पूजा करे । उनके आगे पकवानसे
भरे हए दस करवे रखे ओर भक्तिसे पवित्रचित्त
होकर. उन्हें देवदेव गणेशजीको समर्पित करे ।
समप॑णके समय यह क्टना चाहिये कि ' भगवान्
कपि गणेश मुञ्जपर प्रसर! हों ।' तत्पश्चात् सुवासिनी
स्त्रियों ओर ब्राह्मणोंको इच्छानुसार आदरपूर्वक
उन कर्वोको बांट दे। इसके बाद रातमें चन्द्रोदय
होनेपर चनद्रमाको विधिपूर्वकं अर्घ्यं दे। व्रतकौ
पूर्मिके लिये स्वयं भी मिष्टान्न भोजन करे। इस
व्र्मको सोलह या बारह वर्षोतक करके नारी
इ भका उद्यापन करे। ;उसके बाद इसे छोड दे
अथवा स्त्रीको चाहिये कि सौभाग्यको इच्छासे
वह जीवनभर इस व्रतको करती रहे; क्योकि
स्त्रियोके लिये इस व्रतके समान सौभाग्यदायक
व्रत तीनों लोकोपें दूसरा कोई नहीं हे ।
मुनी धर ! मार्गशीर्ष शुक्ला चतुर्थीसे लेकर एक
वर्षतकका समय प्रत्यव; चतुर्थीको एकभक्त (एक
समय भोजन) करके वितावे ओर द्वितीय वर्षं
उक्त तिथिको केवल रातमें एक बार भोजन करके
व्यतीत करे। तृतीय वर्षमे प्रत्येक चतुर्थको
अयाचित (विना माग। मिले हए) अन्न एक बार
खाकर रहे ओर चौथा वर्ष उक्त तिथिको उपवासपूर्वक
रहकर वितावे। इस प्रकार विधिपूर्वक त्रतका
पालन करते हए व्रमशः चार वर्षं पुरे करके
अन्तमें व्रत-स्नान केः। उस समय महाव्रती मानव
सोनेकी गणेशमूर्तिं ढनवावे। यदि असमर्थ हो तो
वर्णक (हल्दी-चूणं ) -द्रारा ही गणेश-प्रतिमा बना
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ले। तदनन्तर विविध रगोसे धरतीपर सुन्दर दलोंसहित
कमल अद्भत करके उसके ऊपर कलश स्थापित
करे। कलशके ऊपर तोवेका पात्र रखे। उस
पात्रको सफेद चावलसे भर दे। चावलके ऊपर
युगल वस्त्रसे आच्छादित गणेशजीको विराजमान
करे। तदनन्तर गन्ध आदि सामग्रियोद्वारा उनकी
पूजा करे। फिर गणेशजी प्रसन्न हो, इस उदेश्यसे
लङ्डूका नैवेद्य अर्पण करे । रातमें गीत, वाद्य ओर
पुराण-कथा आदिके द्वारा जागरण करे। फिर
निर्मल प्रभात होनेपर सान करके तिल, चावल,
जौ, पीली सरसों, घी ओर खोंड मिली हवनसामग्रीसे
विधिपूर्वक होम करे। गण, गणाधिप, कूष्माण्ड,
त्रिपुरान्तक, लम्बोदर, एकदन्त, रुक्मदष्र, विघ्नप,
ब्रह्मा, यम, वरुण, सोम, सूर्य, हताशन, गन्धमादी
तथा परमेष्टी-इन सोलह नामोद्रारा प्रत्येककै
आदिमें प्रणव ओर अन्तमं चतुर्थी विभक्ति ओर
"नमः ' पद लगाकर अग्रिमं एक-एक आहुति दे।
इसके बाद * वक्रतुण्डाय हुम्" इस मन्त्रके द्वारा
एक-सौ आठ आहति दे । तत्पश्चात् व्याहति्योद्वारा
यथाशक्ति होम करके पूर्णाहुति दे। दिक्पालोंका
पूजन करके चौवीस ब्राह्मणोंको लड ओर खीर
भोजन करावे । इसके बाद आचार्यको दक्षिणास्हित
सवत्सा गौ दान करे एवं दूसरे ब्राह्मणोको यथाशक्ति
भूयसी दक्षिणा दे। फिर प्रणाम ओर परिक्रमा
करके उन श्रेष्ठ ब्राह्यणोको विदा करनेके पश्चात्
स्वयं भी प्रसन्नचित्त होकर भाई-बन्धुओकि साथ
भोजन करे। मनुष्य इस तव्रतका पालन करके
| प्रसादसे इहलोकमें उत्तम भोग भीगता
ओर परलोकमें भगवान् विष्णुका सायुज्य लाभ
करता हे । नारद ! कुछ लोग इसका नाम “वश्त्रत'
कहते हैँ । इसका विधान भी यही है ओर फलं
भी उसके समान ही है। पौष मासकी चतुर्थीको
भक्तिपूर्वक विघ्नेश्वर गणेशकी प्रार्थना करके एकं
((-0. 1\/1(11114/5511॥1 21188 \/8/81/185। (01661010. 01411260 0 66810011
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ब्राह्मणको लड्ड् भोजन करावे ओर दक्षिणा दे।
मुने! एेसा करनेसे व्रती पुरुष धन-सम्पत्तिका
भागी होता हे।
माघ कृष्णा चतुर्थीको ' संकष्टत्रत' बतलाया
जाता हे। उसमें उपवासका संकल्प लेकर ब्रती
पुरुष सबेरेसे चनद्रोदयकालतक नियमपूर्वक रहे ।
मनको कावूमें रखे। चन्द्रोदय होनेपर मिद्रीक
गणेशमूर्ति बनाकर उसे पीढेपर स्थापित कर।
गणेशजीके साथ उनके आयुध ओर वाहन भी
होने चाहिये । मूर्तिमे गणेशजीकी स्थापना करके
षोडशोपचारसे विधिपूर्वकं उनका पूजन करे । फिर
मोदक तथा गुड्में बने हुए तिलके लङ्डूका नैवेद्य
अर्पण करे। तत्पश्चात् तोबेके पात्रमे लाल चन्दन,
कुश, दर्वा, फूल, अक्षत, शमीपत्र, दधि ओर जल
एकत्र, करके चन्द्रमाको अर्घ्य दे। उस समय
निप्राङ्कित मन्रका उच्चारण करे-
गगनार्णवमाणिक््य चन्द्र॒ दाक्षायणीपते।
गृहाणार्ध्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपकः ॥
(ना० पूर्व० ११३। ७७)
` गगनरूपी समुद्रके माणिक्य चन्द्रमा! दक्षकन्या
रोहिणीके प्रियतम ! गणेशके प्रतिविम्ब ! आप मेरा
दिया हुआ यह अर्घ्य स्वीकार कीजिये ।'
इस प्रकार गणेशजीको यह दिव्य तथा पापनाशकं
अर्घ्य देकर यथाशक्ति उत्तम ब्राह्यणोंको भोजन
करानेके पश्चात् स्वयं भी उनकी आज्ञा लेकर
भोजन करे। ब्रह्मन्! इस प्रकार कल्याणकारी
संकष्टत्रत' का पालन करके मनुष्य धन-धान्यसे
सम्पन्न होता है। वह कभी कष्टम नहीं पडता।
माघ शुक्ला चतुर्थीको परम उत्तम गौरीत्रत किया
जाता है। उस दिन योगिनी-गणोंसहित गौरीजीकी
संक्षिप्त नारदपुराण
पूजा करनी चाहिये । मनुष्यों ओर `उनमें भी
विशेषतः स्त्रियोको कुन्द, पुष्प, कुङ्कम, लाल
सूत्र, लाल फूल, महावर, धूप, दीप, बलि, गुड,
अदरख, दूध, खीर, नमक ओर पालक आदिसे
गोरीजीकी पूजा करनी चाहिये । अपनी सोभाग्यवृद्धिके
लिये सौभाग्यवती स्त्रियों ओर उत्तम् ब्राह्यणोंकी
भी पूजा करनी चाद्धिये। उसके बाद बन्धु-
बान्धवोके साथ स्वयं भी भोजन करे। चिप्रवर।
यह सौभाग्य तथा आरोग्य बढानेवाला "गौ रीत्रत'
हे । स्त्रियों ओर पुरुषों प्रतिवर्ष इसका पालन
करना चाहिये । कुछ ल।ग इसे " दुण्डित्रत' कहते
हें । किन्ही-किन्हीके ममे इसका नाम “कुण्ड
त्रत" हे । कुछ दूसरे लोग इसे "ललितात्रत' अथवा
` शान्तित्रत' भी कहते हे । मुने ! इस तिथिमें क्रिया
हुआ सान, दान, जप ओर होम सब छ
गणेशजीको कृपासे सदाके लिये सहस्नगुना हो
जाता है। फाल्गुन मासस्की चतुर्थीको मङ्गलमय
` दुण्डिराजत्रत' बताया गन्धा है । उस दिन तिल
पीठेसे ब्राह्यणोंको भोजन `कराकर मनुष्य स्वयं भौ
भोजन करे। गणेशजीकी -आराधनामें संलग्र होकर
तिलोसे ही दान, होम अं।र पूजन आदि करनेपर
मनुष्य गणेशके प्रसादसे सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
मनुष्यको चाहिये कि सोनेकी गणेशमूर्तिं बनाकर
यततपूर्वक उसको पूजा करे ओर श्रेष्ठ ब्राह्मणको
उसका दान कर दे। इसरो समस्त सम्पदाओंकों
वृद्धि होती हे। विप्रद्ध ! रजिस किसी मासमे भी
चतुर्थीं तिथि रविवार या म ्लवारसे युक्त हो तो
वह विशेष फल देनेवाली होती है। शुक्ल या
कृष्ण पक्षको सभी चतुर्थी तिथियों भक्तिपरायण
पुरुषोको देवेश्वर गणेशका ही पूजन करना चाहिये ।
८१ {12/४0
((-0. 1/111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-चतुर्थं पाद
५२३९
सभी मासोंकी पञ्चमी तिथियोमें करने योग्य ब्रत-पूजन आदिका वर्णन
सनातन जी कहते है -- ब्रह्मन्! सुनो, अव मै
तुम्हें पञ्चमीक त्रत कहता हूँ, जिनका भक्तिपूर्वक
पालन करने पर मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त
कर लेता हे । चैत्रके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिको
' मत्स्यजयन्ती ' कहते हें । इसमें भक्तोको मत्स्यावतार-
„ - द
रिः
विग्रहकी पूजा ओर तत्सम्बन्धी महोत्सव करने
चाहिये । इसे ' श्रीपञ्चमी ' भी कहते हं । अतः उस
दिन गन्ध आदि उपचारो तथा खीर आदि नेवेद्योद्रारा
श्रीलक्ष्मीजीका भी पूजन करना चाहिये । जो उस
दिन लक्ष्मीजीकी पूजा करता है, उसे लक्ष्मी कभी
नहीं छोडतीं । उसी दिन " पृथ्वीत्रत ", “ चान्द्र-त्रत
तथा " हयग्रीवत्रत' भी होता है। अतः उनकी पृथक्-
पृथक् सिद्धि चाहनेवाले पुर्पोंको शास्त्रोक्त
विधिसे उन-उन त्रतोका पालन करना चाहिये ।
जो मनुष्य वैशाखकी पञ्चमीको सम्पूर्ण नागगणोसे
युक्त शेषनागकी पूजा करता हे, वह प्रनोवाञ्छित
फल पाता है। इसी प्रकार विद्रान् पुरुष च्येष्ठक
पञ्चमी तिथिको पितरोका पूजन करे। उस दिन
ब्राह्यण-भोजन करानेसे सम्पूर्णं कामनाओं ओर
अभीष्ट फलकी प्राति होती है। मुने! आषादृ
शुक्ल पञ्चमीक्रो सर्वव्यापी वायुको परीक्षा को
जाती है। गोँवसे बाहर निकलकर धरतीपर खड़ा
रहे ओर वहाँ एक बाँस खडा करे । बोँसके डंडेके
अग्रभागमें पञ्चाङ्गी पताका लगा ले। तदनन्तर
बोँसके मूल भागे सब दिशाओंकी ओर लोकपालोको
स्थापना एवं पूजा करके वायुकी परीक्षा करे।
प्रथम आदि यामो (प्रहरो) -में जिस-जिस दिशाको
ओरसे वायु चलती है, उसी-उसी दिक्पाल या
लोकपालकी भली भति पूजा करे । इस प्रकार चार
प्रहरतक वहाँ निराहार रहकर सायंकाल अपने घर
आवे `ओर थोडा भोजन करके एकाग्रचित्त हो
लोकपा्लोको नमस्कार करके पवित्र भूमिपर सो
जाय। उस दिन रातके चौथे प्रहरमें जो स्वप्र होता
है, वह निश्चय ही सत्य होता दै- यह भगवान्
शिवका कथन रहै। यदि अशुभ स्वप्र हो तो
भगवान् शिवकी पूजाम तत्पर हो उपवासपूर्वक
आठ पहर वितावे। फिर आट त्राह्यणोको भोजन
कराकर मनुष्य शुभ फलका भागी होता है।
यह “शुभाशुभ-निदर्शनव्रत' कहा गया है, जो
मनुष्योके इहलोक ओर परलोकमें भी सौभाग्यजनक
होता हे।
श्रावण मासके कृष्णपक्षकी चतुर्थको जव
थोडा दिन शेष रहे तो कच्चा अन्न (जितना दान
देना हो) पृथक् -पृथक् पात्रोमें रखकर विद्वान्
पुरुष उन पात्रौमे जल भर दे। तदनन्तर वह सव
जल निकाल दे। फिर दूसरे दिन सबेरे सूर्योदय
होनेपर विधिवत् स्नान करके देवताओं, ऋषियों
तथा पितरोका भलीभंति पजन करे । उनके आगे
नैवेद्य स्थापित करे ओर वेह पहले दिनका धोया
((-0. 1/८11114<511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
५४०
संक्षिप्त नारदपुराण
हुआ कच्चा अन्न प्रसन्नतापूर्वक याचकोंको देवे।
तत्पश्चात् प्रदोषकालमें शिवमन्दिरमें जाकर लिङ्कस्वरूप
भगवान् शिवका गन्ध, पुष्प आदि सामग्रियोके
द्वारा सम्यक् पूजन करे। फिर सहस्र या सौ बार
पञ्चाक्षरी विद्या (* नमः शिवाय' मन्त्र)-का जप
करे। तदनन्तर उनका स्तवन करे। फिर सदा
अन्नको सिद्धिके लिये भगवान् शिवसे प्रार्थना
करे। इसके वाद अपने घर आकर ब्राह्मण
आदिको पकवान देकर स्वयं भी मौनभावसे
भोजन करे । विप्रवर } यह “ अन्नव्रत ' हे, मनुष्योद्रारा
विधिपूर्वकं इसका पालन होनेपर यह सम्पूर्णं
अन्नसम्पत्तियोका उत्पादक ओर परलोकमें सद्रति
देनेवाला होता हे ।
श्रावण मासक शुक्लपक्षकी पञ्चमीके दिन
आस्तिक मनुष्योको चाहिये कि वे अपने दरवाजेके
दोनों ओर गोवरसे सर्पोको आकृति बनावे ओर
गन्ध, पुष्प आदिसे उनको पूजा करे । तत्पश्चात्
इन्द्राणीदेवीकी पूजा करे। सोने, चाँदी, दही,
अक्षत, कुश, जल, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप ओर
नेवेद्य आदिसे उन सबकी पूजा करके परिक्रमा
करे ओर उस द्रव्यको प्रणाम करके भक्तिभावसे
परार्थनापूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्यणोंको समर्पित करे । नारद ।
इस प्रकार भक्तिभावसे द्रव्य दान करनेवाले
पुरुषपर स्वर्णं आदि समृद्धियोके दाता धनाध्यक्ष
कुबेर प्रसन्न होते हैँ । फिर भक्तिभावसे ब्राह्मणोको
भोजन करानेके पथात् स्वयं भी स्त्री-पुत्र ओर
सगे-सम्बन्धियोके साथ भोजन करे।
भाद्रपद मासक कृष्ण पक्षक पञ्चमीको दूधसे
नागोको तृप्त करे। जो एेसा करता है उसकी सात
पीढियोतकके लोग सोपिसे निर्भय हो जाते है।
भाद्रपदके शुक्ल पक्षको पञ्चमीको श्रेष्ठ ऋषियोंकी
पूजा करनी चाहिये । प्रातःकाल नदी आदिक
तटपर जाकर सदा आलस्यरहित हो स्नान करे।
फिर घर आकर यलपूर्वक मिद्रीकौ वैदी बनावे।
उसे गोबरसे लीपकर पुष्पोंसे सुशोभित करे।
इसके वाद कुशा विछाकर उसके ऊपर गन्ध,
नाना प्रकारके पुष्प, धूप ओर सुन्दर दीप आदिके
द्वारा सात ऋषियोका पूजन करे । कश्यप, अत्रि,
भरद्वाज, विश्वामित्र, गोतम, जमदग्नि ओर वसिष्ठ-ये
सात ऋषि माने गये हें । इनके लिये विधिवत्
अर्घ्य तेयार करके अर्घ्यदान दे । बुद्धिमान् पुरुषको
चाहिये कि उनके लिये विना जोते-षोये उत्पन्न
हुए श्यामाक (सोंवाके चावल) आदिसे नैवेद्य
तेयार करे। वह नैवेद्य उन्हें अर्पण करके उन
ऋषियोंका विसर्जन करनेके पश्चात् स्वयं भी वही
प्रसादस्वरूप अन्न भोजन करे। इस ब्रतका पालन
करके मनुष्य मनोवाचज्छित फल भोगता ओर
सपर्पियेके प्रसादसे श्रेष्ठ विमानपर बेठकर दिव्यलोकमं
जाता हे।
आश्विन शुक्ला पञ्चमीको 'उपादङ्गललिकात्रत'
होता हे । नारद ! यथाशक्ति ललिताजीकी स्वर्णमयी
मूर्तिं बनाकर पोडशोपचारसे उनकी विधिवत् पूजा
करे । व्रतकी पूर्तिके लिये श्रेष्ठ ब्राह्मणको पकवान,
फल, घी ओर दक्षिणा दान करे। तत्पश्चात्
निप्राङ्कितरूपसे प्रार्थना एवं विसर्जन करे-
सवाहना शक्तियुता वरदा पूजिता मया।
मातममिनुगृह्याथ गम्यतां निजमन्दिरम्॥
(ना० पूर्व° ११४। ५२)
"मेने वाहन ओर शक्तियोंसे युक्त वरदायिनी
ललितादेवीका पूजन किया है। मों! तुम मुञ्जपर
अनुग्रह करके अपने मन्दिरको पधारो।!
द्विजश्रेष्ठ ! कार्तिक शुक्ला पञ्चमीको सब पार्पाका
नाश करनेके लिये श्रद्धापूर्वक परम उत्तम " जया-
व्रत" करना चाहिये। ब्रह्मन्! एकाग्रचित्त हौ
विधिपूर्वक पोडशोपचारसे जयादेवीकी पूजा करके
पवित्र॒ तथा वस्त्राभूषणोसे अलंकृत हो एक
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पूर्वभाग-चतुर्थं पाद
ब्राह्मणको भोजन करावे ओर दक्षिणा देकर उसे
विदा करे। तत्पश्चात् स्वयं मौन होकर भोजन
करे। जो भक्तिपूर्वक जयाके दिन सान करता है,
उसके सव पाप नष्ट हो जाते हँ। विप्रवर!
अश्वमेध यज्ञके अन्तमें स्नान करनेसे जो फल
बताया गया हे, वही जयाके दिन भी स्नान करनेसे
प्राप्त होता हे । मार्गशीर्षं शुक्ला पञ्चमीको विधिपूर्वक
नागोँकौ पूजा करके मनुष्य उनसे अभय पाकर
५४१
बन्भु-वान्धवोंके साथ प्रसन्न रहता है। पौष
मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको भगवान् मधुसूदनकी
पूजा करके मनुष्य मनोवाच्छित कामनाओंको
प्राप्त कर लेता है। (इसी प्रकार माघ ओर
फाल्गुनके लिये समञ्जना चाहिये) नारद ! प्रत्येक
मासके शुक्ल ओर कृष्णपक्षे भी पञ्चमीको
पितरों ओर नागोंकी पूजा सर्वथा उत्तम मानी
गयी है ।
१ 7 6
वर्षभरकी षष्ठी तिथियोमें पालनीय त्रत एवं देवपूजन आदिकी
विधि ओर महिमा
सनातनजी कहते ह-- विप्रवर! सुनो, अव में
तुमसे षष्ठीके ब्रतोका वर्णन करता हूं, जिनका
यथार्थरूपसे अनुष्ठान करके मनुष्य यहाँ सम्पूर्ण
मनोरथोको प्राप्त कर लेता है। चैत्र शुक्ला षष्ठीको
परम उत्तम ' कुमारत्रतः' का विधान किया गया हेै।
उसमें नाना प्रकारक पृजा-विधिसे भगवान् षडाननकीः
आराधना करके मनुष्य सर्वगुणसम्पन्न एवं चिरंजीवी
पुत्र प्राप्त कर लेता है। वैशाख शुक्ला षष्ठीको
कार्तिकेयजीकी पूजा करके मनुष्य मातृसुखलाभ
करता है। ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठीको
विधिपूर्वक सूर्यदेवको पूजा करके उनकी कृपासे
मनुष्य मनोवाज्छित भोग पाता है। आषाढ शुक्ला
षष्ठको परम उत्तम ' स्कन्दत्रतः' करना चाहिये।
उस दिन उपवास करके शिव तथा पार्वतीके प्रिय
पुत्र स्कन्दजीकी पूजा करनेसे मनुष्य पुत्र-पौत्रादि
सन्तानं ओर मनोवाच्छित भोगोको प्राप्त कर लेता है।
श्रावण शुक्ला पष्ठीको उत्तम भक्तिभावसे युक्त हो
पोडशोपचारट्वारा शरजन्मा भगवान् स्कन्दकी आराधना
करनी चाहिये। एेसा कसेवाला पुरुप षडाननकी
कृपासे अभीष्ट मनोरथ प्राप्त कर् लेता है। भाद्रपद
मासके कृष्ण पक्षकी पष्ठीको ' ललितातव्रत' बताया
गया है। उस दिन नारी विधिपूर्वक प्रातःकाल स्नान
करनेके पश्चात् शेत वस्त्र धारण करके श्रेत मालासे
अलंकृत हो नदी-संगमकी बालुका लेकर उसके
पिण्ड बनाकर वासके पात्रमें रखे । इस प्रकार पाच
पिण्ड रखकर उसमें वन-विलासिनी ललितादेवीका
ध्यान करे। फिर कमल, कनेर, नेवारी (वनमद्िका),
मालती, नील कमल, केतकी ओर तगरका संग्रह
करके इनसे एक-एकके एक सौ आट या अद्राईस
फूल ग्रहण करे। उन फूलोकी अक्षत-कलिकार्पं
ग्रहण करके उन्हींसे देवीकी पजा करनी चाहिये।
पूजनके पश्चात् सामने खड होकर उन शिवप्रिया
ललितादेवीको इस प्रकार प्रार्थना करे-
गङ्काद्वारे कुशावर्ते बिल्वके नीलपर्वते।
स्नात्वा कनखले देवि हरं लब्धवती पतिम्॥
ललिते सुभगे देवि सुखसौ भाग्यदायिनि।
अनन्तं देहि सौभाग्यं मह्यं तुभ्यं नमो नमः॥
(ना० पूर्व ११५ । १३-- १५)
१. कार्तिकेय ।
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 6810011
न 0 ता ए नत
५५२४२
"देवि । आपने गद्धाद्रार, कुशावर्तं, बिल्वक,
नीलपर्वत ओर कनखल तीर्थमे स्नान करके
भगवान् शिवको पतिरूपमं प्राप्त किया हे। सुख
ओर सोभाग्य दनेवाली सुन्दरी ललितादेवी ! आपको
बारम्बार नमस्कार है, आप मुञ्चे अक्षय सोभाग्य
प्रदान कोजिये।'
इस मन्त्रसे चम्पके सुन्दर फूले्वारा ललितादेवीकी
विधिपूर्वक पूजा करके उनके आगे नैवेद्य रखे।
खीरा, ककडी, कुम्हड़ा, नारियल, अनार, विजीरा.
नीबू, तुंडीर, कारवेल्ल ओर चिभ॑ट आदि सामयिक
फलोसे देवीके आगे शोभा करके वदे हुए धानके
अङ्कूर, दीपोंको पंक्ति, अगुरु, धूप, सोहालक,
करञ्जक, गुड़, पुष्प, करण्वेष्ट (कानके आभूषण),
मोदक, उपमोदक तथा अपने वैभवके अनुसार
अनेक प्रकारके नैवेद्य आदिद्वारा विधिवत् पूजा
करके रातमें जागरणका उत्सव मनावे । इस प्रकार
जागरण करके सप्तमीको सवेरे ललिताजीको नदीके
तटपर ले जाय । द्विजोत्तम! वरहा गन्ध, पुष्पसे
गाजे-वाजेके साथ पूजा करके वह नैवेद्य आदि
सामग्री श्रेष्ठ ब्राह्मणको दे। फिर स्नान करके घर
आकर अग्रिमे होम करे। देवताओं, पितरों ओर
मनुप्योका पूजन करके सुवासिनी स्त्रियो, कन्याओं
तथा पन्द्रह ब्राह्यणोको भोजन करावे। भोजनक
पश्चात् बहुत-सा दान देकर उन सबको विदा करे ।
अनेकानेक व्रत, तपस्या, दान ओर नियमसे जो
फल प्राप्त होता हे, वह इसी व्रतसे यहीं उपलब्ध
हो जाता है। तदनन्तर नारी मृत्युके पश्चात् सनातन
शिवधाममें पर्हुचकर ललितादेवीके साथ उनको
सखी होकर चिरकालतक आनन्द भोगती है ओर
पुरुष भगवान् शिवके समीप रहकर सुखी हाता हे ।
भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षमें जो पष्ठी आती
हे, उसे * चन्दनषष्ठी ' कहते है । उस दिन देवकी
पृजा करके मनुष्य देतीलोकको प्राप्त कर लेता हे ।
संक्षिप्त नारदपुराण
यदि वह षष्ठी रोहिणी नक्षत्र, व्यतीपात योग ओर
मद्गलवारसे संयुक्त हो तो उसका नाम ` कपिलाषष्ठी '
होता हे। कपिलाषष्ठीके दिन व्रत एवं नियममें
तत्पर होकर सूर्यदेवको पूजा करके मनुष्य भगवान्
भास्करके प्रसादसे मनोवाच्छित कामनाओंको पा
लेता है। देवर्षिप्रवर। उस दिन किया हुआ
अन्नदान, होम, जप तथा देवताओं, ऋषियों ओर
पितरोका तर्पण आदि सव कुछ अक्षय जानना
चाहिये । कपिलाषष्ठीको भगवान् सूर्यको प्रसन्नताके
लिये वस्त्र, माला ओर चन्दन आदिसे दूध
देनेवाली कपिला गायकी पूजा करके उसे वेदज्
ब्राह्मणको दान कर देना चाहिये । ब्रह्मन्! आश्चिन
शुक्ला पष्ठीको गन्ध आदि माङ्गलिक द्रव्यो ओर
नाना प्रकारके नैवेद्योंसे कात्यायनीदेवीको पूजा
करनी चाहिये । पूजाके पश्चात् देवेश्वरी कात्यायनी-
देवीसे क्षमा-ग्रार्थना ओर उन्हें प्रणाम करके
उनका विसर्जन करे। यहां बालूकौ मूर्तिं
कात्यायनीकी प्रतिष्ठा करके उनकी पूजा करनी
चाहिये। एेसा करके कात्यायनीदेवीको कृपासं
((-0. 1/८111141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-चतुर्थं पाद्
कन्या मनके अनुरूप वर पाती है ओर विवाहिता
नारी मनोवाच्छित पुत्र प्राप्त करती है। कार्तिक
शुक्ला षष्टीको महात्मा षडाननने सम्पूर्णं देवताओंद्रारा
दी हई महाभागा देवसेनाको प्राप्त किया था। अतः
इस तिथिको सम्पूर्णं मनोहर उपचारोद्रारा सुरश्रेष्ठा
देवसेना ओर षडानन कार्तिकेयकी भली भोति पूजा
करके मनुष्य अपने मनके अनुकूल अनुपम सिद्धि
प्राप्त करता हे । द्विजोत्तम ! उसी तिथिको अग्निपूजा
वतायी गयी है। पहले अग्रिदेवको पूजा करके
नाना प्रकारके द्रव्योंसे होम करना चाहिये।
मार्गशीर्षं शुक्ला षष्ठको गन्ध, पुष्प, अक्षत,
फल, वस्त्र, आभूषण तथा भोति-भोतिके नैवेद्योद्वारा
स्कन्दका पूजन करना चाहिये । मुनिश्रेष्ट । यदि वह
पष्ठी रविवार तथा शतभिषा नक्षत्रसे युक्त हो तो
उसे “ चम्पापष्ठी ' कहते हे । उस दिन सुख चाहनेवाले
पुरुषको पापनाशक भगवान् विश्वेश्वरका दर्शन,
पूजन, ज्ञान ओर स्मरण करना चाहिये । उस दिन
किया हुआ सखरान-दान आदि सव्र शुभ कर्मं अक्षय
होता है। विप्रवर! पौष मासके शुक्ल पक्षको
षष्टीको सनातन विष्णुरूपी जगत्पालक भगवान्
दिनेश प्रकट हुए थे। अतः सव प्रकारका सुख
१ 7 ५
[ >+ १
५४३
चाहनेवाले पुरुपोको उस दिन गन्ध आदि द्रव्यो,
नैवेदयों तथा वस्त्राभूषण आदिके द्वारा उनका पूजन
करना चाहिये । माघ मासमे जो शुक्ल पक्षकी पष्ठी
आती है, उसे ' वरुणपष्ठी ' कहते हे । उसमें रक्त
चन्दन, रक्तं वस्त्र, पुष्प, धूप, दीप ओर नैवेद्यद्वारा
विष्णु-स्वरूप सनातन वरुणदेवताको पूजा करनी
चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वकं पूजन करके
मनुष्य जो-जो चाहता है, वही- वही फल वरुणदेवकी
कृपासे प्राप्त करके प्रसन होता है। नारद।
फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षक पष्टठीको विधिपूर्वकं
भगवान् पशुपतिको मृण्मयी मूर्तिं बनाकर विविध
उपचारोसे उनकी पजा करनी चाहिये । शतरुद्रीके
मन्त्रोसे पथकृ-पृथक् पञ्चामृत एवं जलद्रारा नहलाकर
धेत चन्दन लगावे; फिर अक्षत, सफ़द फूल
विल्वपत्र, धतूरके फल, अनेक प्रकारके फल ओर
भोति-भोतिके नैवेद्योसे भली भति पजा करके विधिवत्
आरती उतारे। तदनन्तर क्षमा-प्रार्थना करक प्रणामपूर्वक
उन्हें कैलासके लिये विसर्जन करे। मुने! जोस्त्री
अथवा पुरुष इस प्रकार भगवान् शिवको पूजा करते
है, वे इहलोकं श्रेष्ट भोगोंका उपभोग करके
अन्तमें भगवान् शिवके स्वरूपको प्राप्त होति है।
[+ ^ ^ ^
वारह मासोके सप्तमी-सम्बन्धी व्रत ओर उनके माहात्म्य
सनातनजी कहते है- सुनो, अव मैं तुम्हें
सप्तमीके त्रत बतलाता हूं । चैत्र शुक्ला सप्तमीको
गँवसे बाहर किसी नदी या जलाशयमें स्नान करे ।
फिर घर आकर एक वेदी बनावे ओर उसे गोवरसे
लीपकर उसके ऊपर सफेद बालू फैला दे । उसपर
अष्टदल कमल लिखकर उसकी कार्णिकामे भगवान्
सूर्यकी स्थापना करे । पूर्वके दलमें यज्ञसाधक दो
देवता्ओंका न्यास करे। अग्रिकोणके दलम दौ
यज्ञसाधक गन्धर्वोका न्यास करे। दक्षिणदले दो
अप्सराओंका न्यास करे । मुनिश्रेष्ठ । नैऋत्य-दलमें
दो रक्षसोको स्थापित करे। प्चिमदलमें यज्ञम सहायता
पर्हृचानेवाले काद्रवेयसं्क दो महानागोंका न्यास
करे। द्विजोत्तम! वायव्यदलमें दो यातुधा्नौका, उत्तरदलमं
दो ऋषियोका ओर एेशान्यदलमं एक ग्रहका न्यास
करे। इन सवका गन्ध, माला, चन्दन, धृप, दीप,
नैवेद्य ओर पान-सुपारी आदिके द्वारा पूजन करना
चाहिये । इस प्रकार पृजा करके मूर्यदेवके लिये घीसे
एक सौ आठ आहुति दे तथा अन्य लोगोकरे लिये
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 66810011
ठ्ठ
संक्षिप्त नारदपुराण
नाम-मन्त्रसे वेदीपर ही क्रमशः आठ-आठ आहुतियाँ | ' ॐ खखोल्काय नमः" इस मन्त्रद्रारा नीमके
दे । द्विजश्रेष्ठ ! तदनन्तर पूर्णाहुति दे ओर ब्राह्मणोंको
अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा अर्पित करे । इस
प्रकार सब विधान करके मनुष्य पूर्णं सोख्य लाभ
करता हे ओर शरीरका अन्त होनेपर सूर्यमण्डल
भेदकर परम पदको प्राप्त होता हे ।
वैशाख शुक्ला सप्तमीको राजा जने स्वयं
क्रोधवश गङ्गाजीको पी लिया था ओर पुनः अपने
दाहिने कानके छिद्रसे उनका त्याग किया था।
अतः वहां प्रातःकाल स्नान करके निर्मल जलमें
गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि सम्मूर्णं उपचारोद्रारा
गङ्ाजीका पूजन करना चाहिये । तदनन्तर एक
सहस्र घट दान करना चाहिये । " गङ्कात्रत ' में यही
कर्तव्य हे। यह सव भक्तिपूर्वक किया जाय तो
गङ्गाजी सात पीदियोको निःसंदेह स्वगे पंचा
देती हं । इसी तिथिको “कमलत्रत' भी वताया
गया हे । तिलसे भरे हुए पात्रमे सुवर्णमय सुन्दर
कमल रखकर उसे दो वस्त्रोसे ठंककर गन्ध, धृप
आदिक द्वारा उसकी पूजा करे । तत्पश्चात्-
नमस्ते पद्महस्ताय नमस्ते विश्चधारिणे।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥
(ना° पूर्व ११६। १५-१६)
` हाथमं कमल धारण करनेवाले भगवान् सूर्यको
नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वको धारण करनेवाले
भगवान् सतिताको नमस्कार हे । दिवाकर! आपको
नमस्कार हे। प्रभाकर! आपको नमस्कार हे।'
इस प्रकार देवेश्वर सूर्यको नमस्कार करके
सूयस्तिके समय जलसे भरे हए घड़के साथ वह
कमल ओर एक कपिला गाय ब्राह्मणको दान दे।
उस दिन अखण्ड उपवास ओर दूसरे दिन भोजन
करना चाहिये। ब्राह्यणोंको भक्तिभावसे भोजन
करानेसे त्रत सफल होता है । उसी दिन 'निम्बसपतमी '-
का त्रत बताया जाता है। द्विजश्रेष्ठ नारद! उसमं
पत्तेसे भगवान् भास्करकी पूजाका विधान है।
पूजनके पश्चात् नीमका पत्ता खाय ओर मौन होकर
भूमिपर शयन करे । दूसरे दिन ब्राह्यणोको भोजन
कराकर स्वयं भी भाई-वन्धुओंके साथ भोजन
करे। यह "निम्बपत्रव्रत' है, जो इसका पालन
करनेवाले पुरुषोंको सब प्रकारका सुख देनेवाला
हे। इसी दिन ' शर्करासप्तमी ' भी कही गयी है ।
शर्करासप्तमी अश्वमेध यञ्ञका फल देनेवाल), सब
दुःखोको शान्त करनेवाली ओर सन्तानपरम्पराको
वदानेवाली हे। इसमे शक्करका दान करना,
शक्कर खाना ओर खिलाना कर्तव्य हे। यह त्रत
भगवान् सूर्यको विशेष प्रिय हे । जो परम भक्तिभावसे
इसका पालन करता हे, वह सद्रतिको प्राप्त होता हे।
ज्येष्ठ शुक्ला सप्तमीको साक्षात् भगवान् सूर्यस्वरूप
इन्द्र॒ उत्पन्न हुए हे । ब्रह्मन्! जो उपवासपूर्वक
जितेन्द्रियभावसे विधि-विधानके साथ उनकौ पूजा
करता हे, वह देवराज इन्द्रके प्रसादसे स्वर्गलोकमें
स्थान पाता हे । विप्र ! आषाद् शुक्ला सप्तमीको
विवस्वान् नामक सुर्यं प्रकट हए थे; अतः उस
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पूर्वभाग-चतुर्थं पाद
तिधिमें गन्ध, पुष्प आदि पृथक्-पृथक् ॑
उनको भलीभाति पूजा करके मनुष्य भगवान्
सूर्यका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।
श्रावण शुक्ला सप्तमीको "अव्यङ्ग ' नामक शुभ
त्रत करना चाहिये । इसमें सूर्यदेवको पूजाके अन्तमं
उनको प्रसन्नताके लिये कपासके सूतका वना हुआ
साढे चार हाथका वस्त्र दान करना चाहिये । यह
व्रत विशेष कल्याणकारी हे । यदि यह सप्तमी हस्त
नक्षत्रसे युक्त हो तो पापनाशिनी कही गयी हे।
इसमें किया हुआ दान, जप ओर होम सव अक्षय
होता हे । भाद्रपद शुक्ला सप्तमीको “ आमुक्ताभरणत्रत'
बतलाया गया है । इसमें उमासहित भगवान् महेश्वरकी
पूजाका विधान है। गद्गाजल आदि पोडशोपचारसे
भगवानूका पूजन, प्रार्थना ओर नमस्कार करके सम्पूर्ण
कामनाओंकी सिद्धिके लिये उनका विसर्जन करना
चाहिये । इसीको "फलसप्तमी ' भी कहते हें । नारियल,
वैगन, नारंगी, विजौरा नीबू, कुम्हड़ा, बनभंटा ओर
सुपारी-इन सात फलोंको महादेवजीके आगे
रखकर सात तन्तुओं ओर सात गोठोसे युक्त एक
डोरा भी चदढावे। फिर पराभक्तिसे उनका पूजन
करके उस डोरेको स्त्री वायं हाथमे बोध ले ओर
पुरुष दाहिने हाथमे । जबतक वर्षं पूरा न हो जाय
तबतक उसे धारण किये रहे। सात ब्राह्मणको
खीर भोजन कराकर उन्हें विदा करे। उसके बाद
वुद्धिमान् पुरुष त्रतकौ पूर्णताके लिये स्वयं भी
भोजन करे। पहले बताये हुए सातां फल सात
ब्राह्मणोको देने चाहिये । विप्रवर । इस प्रकार सात
वर्पोतक तब्रतका पालन करके विधिवत् उपासना
करनेपर त्रतधारी मनुष्य महादेवजीका सायुज्य
प्राप्त कर लेता है । आश्चिनके शुक्ल पक्षम जी सप्तमी
आती है, उसे “शुभ सप्तमी ' जानना चाहिये । उसमें
स्नान ओर पूजा करके तथा त्र ब्राह्मणोको आज्ञा
` ले व्रतका आरम्भ करके कपिला गायका पुजन
एवं प्रार्थना करे-
त्वामहं ददि कल्याणि प्रीयतामर्यमा स्वयम्।
पालय त्वं जगत्कृत्स्नं यतोऽसि धर्मसम्भवा॥
(ना० पूर्वे ११६। ४१-४२्)
"कल्याणी ! में तुम्हारा दान करता हू इसमे
साक्षात् भगवान् सूर्य प्रसन्न हां । तुम सम्मूर्ण जगत्का
पालन करो; क्योकि धर्मसे उत्पत्र हई हो ।'
एेसा कहकर वेदवेत्ता ब्राह्मणको नमस्कार करके
उसे गाय ओर दक्षिणा दे। ब्रह्मन् ! फिर स्वयं पञ्चगव्य
पान करके रहे। इस प्रकार व्रत करके दूसरे दिन
उत्तम ब्राह्मणोंको भोजन करावे ओर उनसे शेष
बचे हए प्रसादस्वरूप अन्नको स्वयं भोजन करे।
जिसने श्रद्धापूर्वक इस शुभ सप्तमी नामक त्रतको
किया हे, वह देवदेव महादेवजीके प्रसादसे भोग
ओर मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
कार्तिकके शुक्ल पक्षमे ' शाकसप्तमी ' नामक
व्रत करना चाहिये । उस दिन स्वर्णकमलसहित सात
प्रकारके शाक सात ब्राह्यणोको दान करे ओर स्वयं
शाक भोजन करके ही रहे । दूसरे दिन ब्राह्मणांको
भोजन कराकर उन्हें भोजन-दक्षिणा दे ओर स्वयं
भी मौन होकर भाई-बन्धुओके साथ भोजन करे।
मार्गशीर्षं शुक्ला सप्तमीको “मित्र-त्रत' बताया गया
हे। भगवान् विष्णुका जो दाहिना नेत्र है, वही
साकार होकर कश्यपके तेज ओर अदितिके गर्भसे
"मित्र" नामधारी दिवाकरके रूपमे प्रकट हुआ है।
अतः ब्रह्मन्! इस तिधिमें शास्त्रोक्त विधिसे उन्हींका
पूजन करना चाहिये । पूजन करके मधुर आदि
सामग्रियोये सात ब्राह्यणोंको भोजनं करावे ओर
उन्हे सुवर्ण-दक्षिणा देकर विदा करे। तत्पश्चात्
स्वयं भी भोजन करे । विधिपूर्वक इस त्रतका पालन
करके मनुष्य निश्चय ही मूर्यके लोकमं जाता है।
पीप शुक्ला सपतमीको ' अभयत्रत' होता दै । उस
दिन उपवास करके प्ृध्वीपर् खड़ा हो तीनों समय
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सूर्यदेवकौ पूजा करे । तत्पश्चात् दूधमिशचित अन्नसे
बेधा हुआ एक सेर मोदक ब्राह्मणको दान करके
सात ब्राह्मणोको भोजन करावे ओर उन्हें सुवर्णकी
दक्षिणा दे विदा करके स्वयं भी भोजन करे। यह
सबको अभय देनेवाला माना गया हे । दूसरे ब्राह्मण
उसी दिन “ मार्तण्डत्रत ' का उपदेश करते हैं । दोनों
एक ही देवता होनेके कारण विद्वानोने उन्हें एक
ही त्रत कहा है। माघ मासके कृष्ण पक्षकी सप्तमीको
` सर्वापि ' नामक त्रत होता है। उस दिन उपवास
करके सुवर्णे बने हुए सूर्यविम्बकी गन्ध, पुष्प
आदिसे पूजा करे तथा रात्रिमें जागरण करके दूसरे
दिन सात ब्राह्यणोंको खीर भोजन करावे। उन
ब्राह्मणोको दक्षिणा, नारियल ओर अगुरु अर्पण
करके दूसरी दक्षिणाके साथ सुवर्णमय सूर्यविम्ब
आचार्यको समर्पित करे। फिर विशेष प्रार्थनापूर्वक
उन्हे विदा करके स्वयं भोजन करे। यह त्रत
सम्पूर्णं कामनाओंको देनेवाला कहा गया है । इस
त्रतके प्रभावसे सर्वथा अद्वितज्ञान सिद्ध होता हेै।
माघ शुक्ला सप्तमीको “अचलात्रत' बताया
गया हे। यह ' त्रिलोचनजयन्ती ' है । इसे सर्वपापहारिणी
माना गया हे। इसीको “रथसप्तमी ' भी कहते हैँ
जो “चक्रवर्ती ' पद प्रदान करनेवाली है। उस दिन
सूर्यको सुवर्णमयी प्रतिमाको सुवर्णमय घोडे जुते
हुए सुवर्णके ही रथपर विठाकर जो सुवर्ण
संक्षिप्त नारदपुराण
दक्षिणाके साथ भावभक्तिपूर्वक उसका दान करता
हे, वह भगवान् शङ्करके लोकमें जाकर आनन्द
भोगता हे । यही “ भास्करसपतमी ' भी कहलाती है,
जो करोड सूर्य-ग्रहणोकि समान है। इसमें अरुणोदयके
समय स्नान किया जाता है। आक ओर बेरके
सात-सात पत्ते सिरपर रखकर स्नान करना चाहिये।
इससे सात जन्मोके पापोंका नाश होता है। इसी
सप्तमीको " पुत्रदायक' त्रत भी बताया गया है।
स्वयं भगवान् सूर्यने कहा है-" जो माघ शुक्ला
सप्तमीको विधिपूर्वक मेरी पूजा करेगा, उसपर
अधिक सन्तुष्ट होकर में अपने अंशसे उसका पुत्र
होऊगा।' इसलिये उस दिन इन्दरियसंयमपूर्वक
दिन-रात उपवास करे ओर दूसरे दिन होम करके
ब्राह्मणोको दही, भात, दूध ओर खीर आदि भोजन
करावे। फाल्गुन शुक्ला सप्तमीको “ अर्कपुट' नामक
व्रतका आचरण करे । अर्कके पत्तंसे अर्क (सूर्य) -
का पूजन करे ओर अर्कके पत्ते ही खाय तथा
` अर्क" नामका सदा जप करे। इस प्रकार किया
हुआ यह अर्कपुटनव्रत' धन ओर पुत्र देनेवाला
तथा सब पापोका नाश करनेवाला है । कोई-कोई
विधिपूर्वक होम करनेसे इसे ' यज्ञत्रत" मानते हं ।
द्विजश्रेष्ठ । सब मासोंको सम्पूर्ण सप्तमी तिथियोमे
भगवान् सूर्यकौ आराधना समस्त कामनाओंको
पूर्णं करनेवाली बतायी गयी है ।
(वज / 09
बारह महीनोके अष्टमी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि ओर महिमा
सनातनजी कहते है- नारद! चैत्र मासके
शुक्ल पक्षको अष्टमीको भवानीका जन्म बताया
जाता हे। उस दिन सौ परिक्रमा करके उनकी
यात्राका महान् उत्सव मनाना चाहिये । उस दिन
जगदम्बाका दर्शन मनुष्योके लिये सर्वथा आनन्द
दनेवाला हे। उसी दिन अशोककलिका खानेका
विधान है। जो लोग चैत्र मासके शुक्ल पक्षको
अष्टमीको पुनर्वसु नक्षत्रम अशोककी आठ
कलिकाओंका पान करते हे, वे कभी शोक नही
पाते। उस दिन रातमें देवीकी पूजाका विधान
होनेसे वह तिथि महाष्टमी ' भी कही गयी ₹ै।
वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको
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पूर्वभाग-चतुर्थ पाद
उपवास करके स्वयं जलसे स्नान करे ओर अपराजिता-
देवीको जटा्मोंसी तथा उशीर (खस) -मिश्चित
जलसे स्रान कराकर गन्ध आदिसे उनको
करे । फिर शर्करासे तैयार किया हुआ नैवेद्य भोग
लगावे। दूसरे दिन नवमीको पारणासे पहले कुमारी
कन्याओंको देवीका शर्करामय प्रसाद भोजन करावे।
ब्रह्मन्! एेसा करनेवाला मनुष्य देवीके प्रसादसे
ज्योतिर्मय विमानमें बैठकर प्रकाशमान सूर्यकों
भोति दिव्य लोकोमें विचरता हे।
ज्येष्ठ मासके कृष्ण पक्षक अष्टमीको भगवान्
त्रिलोचनकी पूजा करके मनुष्य सम्पूर्णं देवताओंसे
वन्दित हो एक कल्पतक शिवलोकम निवास करता
हे। जो मनुष्य ज्येष्ठ शुक्ला अष्टमीको देवीको पूजा
करता है, वह गन्धर्वा ओर अप्सराओकि साथ विमानपर
विचरण करता है। आषाढ़ मासके शुक्ल पक्षकौ
अष्टमीको हल्दीमिश्ित जलसे खान करके वैसे ही
जलसे देवीको भी स्नान करावे ओर विधिपूर्तक
उनकी पूजा करे। तदनन्तर शुद्ध जलसे सान कराकर
कपूर ओर चन्दनका लेप लगावे। तत्पश्चात् शर्करायुक्त
नैवेद्य अर्पण करके आचमन करावे। फिर ब्राह्मणोको
भोजन कराकर उन्हें सुवर्णं ओर दक्षिणा दे।
तदनन्तर उन्हें विदा करके स्वयं मौन होकर भोजन
करे। इस त्रतका पालन करके मनुष्य देवीलोकमें
जाता है। श्रावण शुक्ला अष्टमीको विधिपूर्वक
देवीका यजन करके दूधसे उन्हें नहलावे ओर
मिष्टान्न निवेदन करे, तत्पश्चात् दूसरे दिन ब्राह्यणोको
भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करके व्रत समाप्त
करे। यह संतान वढानेवाला व्रत है । श्रावण मासके
कृष्ण पक्षकी अष्टमीको दशाफल ' नामका त्रत
होता है। उस दिन उपवास-व्रतका संकल्प
लेकर स्नान ओर नित्यकर्म करके काली तुलसीके
५ ६७
दस पत्तोसे कृष्णाय नमः „ “विष्णवे नमः ', ' अनन्ताय
नमः, गोविन्दाय नमः" "गरुडध्वजाय नमः,
"दामोदराय नमः", “हृषीकेशाय नमः, "पद्मनाभाय
नमः" "हरये नमः ', "प्रभवे नमः'- इन दस नामोका
उच्चारण करके प्रतिदिन भगवान् श्रीकृष्णका पूजन
करे। तदनन्तर परिक्रमापूर्वक नमस्कार करे। इस
प्रकार इस उत्तम त्रतको दस दिनतक करता रहे।
इसके आदि, मध्य ओर अन्तमें श्रीकृष्ण-मन्त्रद्रारा
चरुसे एक सौ आठ बार विधिपूर्वक होम करे।
होमके अन्तमे विद्वान् पुरुष विधिके अनुसार
भलीभति आचार्यक पूजा करे । सोने, तवि, मिद्री
अथवा वँसके पात्रमें सोनेका सुन्दर तुलसीदल
बनवाकर रखे। साथ ही भगवान् श्रीकृष्णकीं
सुवर्णमयी प्रतिमा भी स्थापित करके उसकी
विधिपूर्वक पूजा करे ओर वस्त्र तथा आभूषर्णोसि
विभूषित बछृडेसहित गौका दान भी करे । दस
दिनतक प्रतिदिन भगवान् श्रीकृष्णको दस-दस
पूरी अर्पण करे। उन पृरियोंको व्रती पुरुष विधिज्ञ
ब्राह्मणको दे डाले अथवा स्वयं भोजन करे।
द्विजोत्तम! दसवें दिन यथाशक्ति शय्यादान करे ।
तत्पश्चात् द्रव्यसहित सुवर्णमयी मूर्ति आचार्यक
समर्पित करे। व्रतके अन्तमं दस ब्राह्मणको
प्रत्येकके लिये दस-दस परियों देवे। इस प्रकार
दस वर्पोतक उत्तम त्रतका पालन करके विधिपूर्वकः
उपवासका निर्वाह कर लेनेपर मनुष्य सम्पूर्ण
कामनाओंसे सम्पन्न होता है ओर अन्तमं भगवान्
श्रीकृष्णका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।
यही ' कृष्ण-जन्माष्टमी ' तिथि है, जो मनुष्योके
सब पार्पोको हर लेनेवाली कही गयी दै । श्रीकृष्णके
जन्मके दिन केवल उपवास करनेमात्रसे मनुष्य
सात जन्मोके पापोंसे मुक्त हो जाता है। विद्वान्
१. अमावास्यातक मास माननैवा्लौी दृष्टि यह श्रावण मासक कृष्ण पश्षकी अष्मी कदी गयी दे। जौ पूर्णिपातकं
ही मास मानते है उनकी दृष्टिसि यह अष्टमी भाद्रपद कृष्ण पक्ष्म पडती दै।
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0\ 6810011
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५.४८ सक्िप्त नारदपुराण
~
पुरुष उपवास करके नदी आदिके निर्मल जलम पूर्ववत् कलशक ऊपर स्थापित श्रीराधाकी स्वर्णमयी
तिलमिश्ित जलसे स्नान करे। फिर उत्तम स्थानमें | प्रतिमाका पूजन करना चाहिये । मध्याहकालमं
बने हए मण्डपके भीतर मण्डल वबनावे। मण्डलके | श्रीराधाजीका पूजन करके एकभुक्त त्रत करे । यदि
मध्यभागमें तबि या मिदट्रीका कलश स्थापित करे। | शक्ति हो तो भक्त पुरुष पूरा उपवास करे । फिर
उसके ऊपर तबिका पात्र रखे । उस पात्रके ऊपर दो | दूसरे दिन भक्तिपूर्वक सुवासिनी स्त्रियोको भोजन
वस्त्रोसे ढकी हई श्रीकरष्णकी सुवर्णमयी सुन्दर प्रतिमा | कराकर आचार्यको प्रतिमा दान करे । तत्पश्चात् स्वयं
स्थापित करे । फिर वाद्य आदि उपचारोद्रारा सेहपूर्णं | भी भोजन करे। इस प्रकार इस व्रतको समाप
हदयसे उसकी पूजा करे। कलशके सब ओर पूरव
आदि क्रमसे देवकी, वसुदेव, यशोदा, नन्द, व्रज,
गोपगण, गोपीवृन्द तथा गोसमुदायकी पूजा करे।
तत्पश्चात् आरती करके अपराध क्षमा कराते हुए
भक्तिपूर्वक प्रणाम करे। उसके बाद आधी राततक
वहीं रहे। आधी रातमें पुनः श्रीहरिको पञ्चामृत तथा
शुद्ध जलसे स्नान कराये ओर गन्धपुष्प आदिसे पुनः
उनकी पूजा करे। नारद ! धनिया, अजवाइन, सोंठ,
खंड ओर धघीके मेलसे नैवेद्य तैयार करके उसे
चोदके पात्रमें रखकर भगवान्को अर्पण करे । फिर
दशावतारधारी श्रीहरिका चिन्तन करते हए पुनः आरती
करके चन्द्रोदय होनेपर चनद्रमाको अर्घ्य दे। उसके
वाद देवेश्वर श्रीकृष्णसे क्षमा-प्रार्थना करके ब्रती
पुरुष पोराणिक स्तोत्र-पाठ ओर गीत-वाद्य आदि
अनेक कार्यक्रमोद्वारा रात्रिका शेष भाग व्यतीत करे ।
तदनन्तर प्रातःकाल श्रष्ठ ब्राह्यणोको मिष्टान्न भोजन
करावे ओर उन्हं प्रसन्नतापूर्वक दक्षिणा देकर विदा
करे। तत्पश्चात् भगवरान्की सुवर्णमयी प्रतिमाको स्वर्ण,
धेनु ओर भूमिसहित आचार्यको दान करे । फिर ओर
भी दक्षिणा देकर उन्हें विदा करनेके पश्चात् स्वयं भी
स्त्री, पुत्र, सुहद् तथा भृत्यवर्गके साथ भोजन करे।
इस प्रकार व्रत करके मनुष्य श्रेष्ठ विमानपर वैठकर
साक्षात् गोलोकमें जाता है । इस जन्माष्टमीके समान
दूसरा कोई त्रत तीनों लोकोमं नहीं हे, जिसके करनेसे
करोड़ां एकादशियोका फल प्राप्त हो जाता हे।
भाद्रपद शुक्ला अषटमीको मनुप्य “राधात्रत' करे । इसमं
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पूर्वभाग-चतुर्थ पाद
करना चाहिये । ब्रह्मर्षे! त्रती पुरुष विधिपूर्वक
` राधाष्टमीत्रत' के करनेसे व्रजका रहस्य जान लेता
तथा राधापरिकरोमे निवास करता हे।
इसी तिथिको “दूर्व्टिमीव्रत' भी बताया
गया हे । पवित्र स्थानमें उगी हई दूबपर शिवलिद्गकी
स्थापना करके गन्ध, पुप्प, धूप, दीप, नैवेद्य,
दही, अक्षत ओर फल आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक
उसको पूजा करे । पूजाके अन्तम एकाग्रचित्त
होकर अर्घ्य दे। अर्घ्य देनेके पश्चात् परिक्रमा
करके वहीं ब्राह्मणोंको भोजन करावे ओर उन्हें
दक्षिणा, उत्तम फल तथा सुगन्धित मिष्टान्न देकर
विदा करे; फिर स्वयं भी भोजन करके अपने
घर जाय। विप्रवर! इस प्रकार यह !दूर्वष्टिमी'
मनुष्योके लिये पुण्यदायिनी तथा उनका पाप हर
लेनेवाली है। यह चारों वर्णो ओर विशेषतः
स्त्रियोके लिये अवश्यकर्तव्य त्रत है। ब्रह्मन्)
जव वह अष्टमी ज्येष्ठा नक्षत्रसे संयुक्त हो तो
उसे ' ज्येष्ठा अष्टमी ' के नामसे जानना चाहिये ।
वह पूजित होनेपर सब पापोंका नाश करनेवाली
हे। इस तिथिसे लेकर सोलह दिनोंतक
महालक्ष्मीका त्रत बताया गया है। पहले इस
प्रकार संकल्प करे-
करिष्येऽहं महालक्ष्मीव्रतं ते त्वत्परायणः।
तदविघ्चेन मे यातु समातिं त्वत्प्रसादतः॥
(ना० पूर्व ११७ ५८4)
"देवि ! म आपकी सेवामें तत्पर होकर आपके
इस महालक्ष्मीत्रतका पालन करूगा। आपको
कृपासे यह त्रत बिना किसी विघ्र-वाधाके
परिपूर्णं हो ।'
एेसा कहकर दाहिने हाथमे सोलह तन्तु ओर
सोलह गठोसे युक्त डोरा बंध ले। तवसे ब्रती
पुरुष प्रतिदिन गन्ध आदि उपचारोरारा महालक्ष्मीको
पूजा करे। पूजाका यह क्रम आशिन कृष्णा
५६९
अष्टमीतक चलाता रहे । व्रत पूरा हो जानेपर
विद्वान् पुरुप उसका उद्यापन करे। वस्त्र
घेरकर एक मण्डप बना ले। उसके भीतर
सर्वतोभद्रमण्डलको रचना करे ओर उस मण्डलमें
कलशकौ प्रतिष्ठा करके दीपक जला दे। फिर
अपनी वांहसे डोरा उतारकर कलशके नीचे रख
दे। इसके वाद सोनेकी चार प्रतिमापं बनव॑ीवे,
वे सव-की-सव महालक्ष्मीस्वरूपा हों । फिर
पञ्चामृत ओर जलसे उन सवको स्नान करावे
तथा पोडशोपचारसे विधिपूर्वक पूजा करके वहां
जागरण करे। तदनन्तर आधी रातके समय
चन्द्रोदय होनेपर श्रीखण्ड आदि द्रव्योसे विधिपूर्वकः
अर्ध्यं अर्पण करे । यह अर्घ्य चन्द्रमण्डले स्थित
महालक्ष्मीके उदैश्यसे देना चाहिये । अर्घ्य देनैके
पश्चात् महालक्ष्मीको प्रार्थना करे ओर फिर त्रत
करनेवाली स्त्री श्रोत्रिय ब्राह्य्णोकी प्निरयोका
रोली, महावर ओर काजल आदि सौभाग्यसूचक
दरव्योद्रारा भली भांति पूजन करके उन्हें भोजन
करावे। तत्पश्चात् विल्व, कमल ओर खीरसे
अग्रिमे आहति दे। ब्रह्यन्! उक्तं वस्तुओंके
अभावमे केवल घीकी आहुति दे । ग्रहोके लिये
समिधा ओर तिलका हवन करे। सव रोगोकी
शान्तिके उद्देश्यसे भगवान् मृत्युञ्जयके लिये भी
आहुति देनी चाहिये । चन्दन, तालपत्र, पुष्पमाला,
अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल तथा
नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थ-सवकोौ नये सुपेमें
रखे । प्रत्येक वस्तु सोलहकी संख्याम हो । उन
सव वस्तुओंको दूसरे सूपसै ढक दे। तदनन्तर
व्रती पुरुष निम्राद्भित मन्त्र पदुते हुए उपर्युक्त
सव वस्तुं महालक्ष्मीको समर्षित करै-
क्षीरोदार्णवसमप्भृता लक्ष्मीश्चद्रसहोदरा।
व्रतेनानेन संतुष्टा भवताद्विष्णुवह्यभा ॥
(ना० पूर्व ११०॥ ७०-७१)
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7 ~
५५५०
संक्षिप्त नारदपुराण
क्षीरसागरसे प्रकट हुई चनद्रमाकौ सहोदर | ब्रत" कहा गया है । उसमें अनेक पुत्रोसे युक्त
भगिनी श्रीविष्णुवह्छभा महालक्ष्मी इस तव्रतसे
सन्तुष्ट हों ।'
पूर्वोक्त चार प्रतिमां श्रोत्रिय ब्राह्मणको
अर्पित करे। इसके बाद चार ब्राह्मणों ओर
सोलह सुवासिनी स्त्रियोंको मिष्टान्न भोजन कराकर
दक्षिणा देकर उन्हें विदा करे । फिर नियम समाप्त
करके इष्ट भाई-वन्धुओंके साथ भोजन करे।
विप्रवर! यह महालक्ष्मीका ब्रत है। इसका
विधिपूर्वक पालन करके मनुष्य इहलोकके इष्ट
भोगोंका उपभोग करनेके बाद चिरकालतक
लक्ष्मीलोकमें निवास करता हे।
विप्रवर ! आशिन मासके शुक्लपक्षमें जो
अष्टमी आती हे, उसे ' महाष्टमी ' कहा गया है ।
उसमे सभी उपचारोसे दुर्गाजीके पूजनका विधान
हे । जो ' महाष्टमी *को उपवास अथवा एकभक्त
व्रत करता हे, वह सब ओरसे वैभव पाकर
देवताकी भोति चिरकालतक आनन्दमग्र रहता
हे । कार्तिक कृष्णपक्षे अ्टमीको *ककष्टिमी '
नामक त्रत कहा गया है। उसमे यत्तपूर्वक
उमासहित भगवान् शङ्करकी पूजा करनी चाहिये ।
जो सर्वेगुणसम्पन्न पुत्र ओर नाना प्रकारके सुखकी
अभिलाषा रखते हें, उन ब्रती पुरुषोंको चन्द्रोदय
होनेपर सदा चन्द्रमाके लिये अर्घ्यदान करना
चाहिये । कार्तिकक्रे शुक्लपक्षमें गोपाष्टमीका त्रत
बताया गया हे। उसमे गौओंकौ पूजा करना,
गोग्रास देना, गौओंकौ परिक्रमा करना, गौओंके
पीछे-पीरे चलना ओर गोदान करना आदि
कर्तव्य हे । जो समस्त सम्पत्तियोंकौ इच्छा रखता
हो, उसे उपर्युक्त कार्य अवश्य करने चाहिये।
मार्गशीर्षं मासके कृष्णपक्षकी अष्टमीको ' अनघा्मी-
अनघ ओर अनघा-इन दोनों पति-पलीकी
कुशमयी प्रतिमा बनायी जाती है। उस युगल
जोड़ीको गोबरसे लीपे हए शुभ स्थानें स्थापित
करके गन्धपुष्प आदि विविध उपचारोंसे
उनकौ पूजा करे। फिर ब्राह्मण पति-पत्रीको
भोजन कराकर दक्षिणा देकर विदा करे। स्त्री
हो या पुरुष विधिपूर्वक इस ब्रतका अनुष्ठान
करके उत्तम लक्षणोँसे युक्त पुत्र पाता है।
मार्गशीर्षं शुक्ला अष्टमीको कालभैरवके
समीप उपवासपूर्वक जागरण करके मनुष्य
वड़-वड़ पापोसे मुक्त हो जाता हे। पौष शुक्ल
अष्टमीको अष्ट कासं्ञक श्राद्ध पितरोंको एक
वर्पतक तृसि देनेवाला ओर कुल-संततिको
वदानेवाला है। उस दिन भक्तिपूर्वकं शिवकी
पूजा करके केवल भक्तिका आचरण करते हुए
मनुष्य भोग ओर मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेता हे ।
माघ मासके कृष्णपक्षकी अष्टमीको सम्पूर्ण
कामनाओंको पूर्णं करनेवाली भद्रकाली देवीकी
भक्तिभावसे पूजा करे। जो अविच्छिन्न संतति
ओर विजय चाहता हो, वह माघ मासके
शुक्लपक्षको अषटमीको भीपष्मजीका तर्पण करे ।
ब्रह्मन् ! फाल्गुन मासके कृष्णपक्षकौ अष्टमीको
व्रतपरायण पुरुष समस्त कामनाओंकौ सिदधिके
लिये भीमादेवीकी आराधना करे। फाल्गुन
शुक्ला अष्टमीको गन्ध आदि उपचारो से शिव
ओर शिवाकी भली भांति पूजा करके मनुष्य
सम्पूर्ण सिद्धिययोंका अधीश्वर हो जाता ह।
सभी मासोके दोनों पक्षोमे अष्टमीके दिन
विधिपूर्वकं शिव ओर पार्वतीकौ पूजा करके
मनुष्य मनोवाच्छित फल प्राप्त कर लेता हे।
((-0. 1/८1111(4<511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
४
पूर्वभाग-चतुर्थं पाद
५५१
नवमी-सम्बन्धी ब्रतोव्छी विधि ओर महिमा
सनातनजी कहते हं -- विप्रन्र ! अव मं तुमसे
नवमीके ब्रतोका वर्णन करता हू, लोकमें जिनका
पालन करके मनुष्य मनोवाज्छित फल पाते हें ।
चैत्रके शुक्लपक्षमे नवमीको श्रीरामनवमी ' का
त्रत होता है। उसमें भक्तियुक्तं पुरुष यदि शक्ति
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हो तो विधिपूर्वक उपवास करे। जो अशक्त हो,
वह मध्याहकालीन जन्मोत्सवके बाद एक समय
भोज करके रहे । ब्राह्मणोको मिष्टात्न भोजन कराकर
भगवान् श्रीरामको प्रसन्न करे। गौ, भूमि, तिल,
सुवर्ण, वस्त्र ओर आभूषण आदिके दानसे भी
श्रीरामप्रीतिका सम्पादन करे। जो मनुष्य इस
प्रकार भक्तिपूर्वक श्रीरामनवमीत्रत' का पालन करता
हे, वह सम्पूर्ण पापोका नाश करके भगवान्
विष्णुके परम धामको जाता है। वैशाखमें दोनों
पक्षोकी नवमीको जो विधिपूर्वक चण्डिका- पूजन
करता है, वह विमानसे विचरण करता हुआ
देवताओके साथ आनन्द भोगता है । ज्येष्ठ शुक्ला
नवमीको श्रेष्ठ मनुष्य उपवासपूर्वक उमदेवीका
विधिवत् पूजन करके कुमारी कन्याओं तथा ब्राह्यर्णोको
भोजन करावे ओर उन्हं अपनी शक्तिके अनुसार
दक्षिणा देकर अगहनीके चाबलका भात दूधके साध
खाय। जो मनुष्य इस “उमातव्रत' का विधिपूर्वेक
पालन करता है, वह इस लोकम श्रेष्ट भोर्गोको
भोगकर अन्ते स्वर्गलोके स्थान पाता टे । विप्र |
जो आषाढ मासके दोनों पक्षों नवमीको प
एेरावतपर विराजमान शुक्लवर्णा इन्द्राणीका भली
पूजन करता है, वह देवलोकमं दिव्य विमानपर
विचरता हुआ दिव्य भोगोका उपभोग करता ह।
विप्रवर! जो श्रावण मासके दोनों पक्षोकी नवमीको
., | उपवास अथवा केवल रातर्मे भोजन करता ओर्
' कौमारी चण्डिका" की आग॒धना करता हे, गन्ध, पुष्प,
धृप, दीप, भंति-भोतिके नैवेद्य अर्पण करके ओर
| कुमारी कन्यार्ओंको भोजन कराकर् जो उस पापहारिणी
देवीकी परिचर्यामं तत्पर रहता हे तथा इस प्रकार
भक्तिपूर्वक उस उत्तम 'कौमारोत्रत' का पालन करता
टे, वह विमानद्वाग सनातन दवीतलोकमं "जाता दे)
((-0. 1\॥८11114/5511॥1 21188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 60810011
५५२
भाद्रपद शुक्ला नवमीको “नन्दानवमी " कहते
हं। उस दिन जो नाना प्रकारके उपचारोद्रारा
दुगदिवीको विधिवत् पूजा करता है, वह अश्वमेध-
यज्ञका फल पाकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता हे ।
कातिक मासके शुक्लपक्षमें जो नवमी आती हे
उसे ' अक्षयनवमी ' कहते हे । उस दिन पीपलवृक्षकी
जडके समीप देवताओं, ऋषियों तथा पितरोका
विधिपूर्वक तर्पण करे ओर सूर्यदेवताको अर्घ्य दे।
तत्पश्चात् ब्राह्मणोको मिष्टान्न भोजन कराकर उन्हे
दक्षिणा दे ओर स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकार
जो भक्तिपूर्वक “ अक्षयनवमी ' को जप, दान, व्राह्मणपूजन
ओर होम करता है, उसका वह सव कुछ अक्षय
होता हे, एेसा ब्रह्माजीका कथन है। मार्गशीर्ष
शुक्ला नवमीको ' नन्दिनीनवमी ' कहते हैँ । जो उस
दिन उपवास करके गन्ध आदिसे जगदम्बाका
संक्षिप्त नारदपुराण
पूजन करता ठे, वह निश्चय ही अश्चमेध-यस्षके
फलका भागी होता है। विप्रवर! पौष मासके
शुक्लपक्षकौ नवमीको एक समय भोजनके
त्रतका पालन करते हुए महामायाका पूजन करे ।
इससे वाजपेय यक्ञके फलकी प्रापि होती है।
माघ शुक्ला नवमी लोकपूजित महानन्दा के
नामसे विख्यात है, जो मानवोके लिये सदा
आनन्ददायिनी होती है। उस दिन किया हुआ
स्नान, दान, जप, होम ओर उपवास सब अक्षय
होता हे । द्विजोत्तम ! फाल्गुन मासके शुक्लपक्षकी
जो नवमी तिथि हे, वह परम पुण्यमयी " आनन्दा
नवमी' कहलाती है। वह सब पापोंका नाश
करनेवाली मानी गयी हे। जो उस दिन उपवास
करके “ आनन्दा! का पूजन करता है, वह मनोवाच्छित
कामनाओंको प्राप्त कर लेता हे।
7 ५९
बारह महीनोके दशमी-सम्बन्धी ब्रतोंकी विधि ओर महिमा
सनातनजी कहते है- नारद ! अव मै तुम्हें
दशमीके व्रत बतलाता हूं, जिनका भक्तिपूर्वक
पालन करके मनुष्य धर्मराजका प्रिय होता हे । चैत्र
शुक्ला दशमीको सामयिक फल, फूल ओर गन्ध
आदिसे धर्मराजका पूजन करना चाहिये । उस दिन
पूरा उपवास या एक समय भोजन करके रहे
त्रतके अन्तम चौदह ब्राह्यणोंको भोजन करावे
ओर अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा दे । विप्रवर।
जो इस प्रकार धर्मराजकी पूजा करता है, वह
धर्मक आज्ञासे देवताओंकी समता प्राप्त कर लेता
हे ओर फिर उससे च्युत नहीं होता। जो मानव
वैशाख शुक्ला दशमीको गन्ध आदि उपचारो तथा
धेत ओर सुगन्धित पुर्पोसे भगवान् विष्णुकी पृजा
करके उनको सौ परिक्रमा करता ओर यतपूर्वक
बराह्मणोको भोजन कराता है, वह भगवान् विष्णुके
लोकमें स्थान पाता है। सरिताओमें श्रेष्ठ जहपुत्री
गङ्गा ज्येष्ठ शुक्ला दशमीको स्वर्गसे इस पुथ्वीपर
उतरी थी, इसलिये वह तिथि पुण्यदायिनी मानी
गयी हे । ज्येष्ठ मास, शुक्लपक्ष, हस्त नक्षत्र, बुध
दिन, दशमी तिथि, गर करण, आनन्द योग,
व्यतीपात, कन्याराशिके चन्द्रमा ओर वृषराशिके
सूर्य-इन दसोंका योग महान् पुण्यमय बताया
गया हे । इन दस योगोसे युक्त दशमी तिथि दस
पाप हर लेती हे । इसलिये उसे ' दशहरा" कहते
हं । जो इस "दशहरा" में गङ्गाजीके पास पहुंचकर
प्रसन्नचित्त हो विधिपूर्वक गद्गाजीके जलमें स्नान
करता है, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता हे।
मनु आदि स्मृतिकारोने आपाद शुक्ला दशमीको
पुण्य-तिथि कहा है, अतः उसमें किये जानेवाले
स्नान, जप, दान ओर होम स्वर्गलोककौ प्रापि
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 60810011
पूर्वभाग-चतुर्थं पाद ५५१३
त्रतका पालन करता हे, वह इस लोकमें उत्तम
भोग भोगकर अन्तमं विमानद्वारा सनातन विष्णुलोकको
जाता हे । आशिन शुक्ला दशमीको विजयादशमी '
कहते है । उस दिन प्रातःकाल घरके आगनमें
गोबरके चार पिण्ड मण्डलाकार रखे। उनके
भीतर श्रीराम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्तुप्र--इन
चारोको पूजा करे। गोवरके ही वने हए चार
ठक्रनदार पात्रोमें भीगा हआ धान ओर चाँदी
रखकर उसे धुले हुए वस्त्रसे ढक देना चाहिये।
फिर पिता, माता, भाई, पुत्र, स्त्री ओर भृत्यसहित
गन्ध, पुष्प ओर नैवेद्य आदिमे उस धान्यकी
विधिपूर्वक पूजा करके नमस्कार करे । फिर पूजित
ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करे।
इस प्रकारको विधिका पालन करके मनुष्य निश्चय
ही एक वर्तक सुखी ओर धन-धान्यसे सम्पन्न
होता है । नारद! कार्तिक शुक्ला दशमीको ' सार्वभौम-
व्रत" का पालन करे। उस दिन उपवास या एक
समय भोजनका त्रत करके आधी रातके समय घर
अथवा गोँवसे बाहर पए आदिके द्वारा दसी
दिशाओं बलि दे। गोबरसे लिपी हुई भृमिपर्
मण्डल बनाकर उसमें अष्टदल कमल अद्भत कर
ओर उसमें गणेश आदि देवताओंकी पूजा करे।
मार्गशीर्षं शुक्ला दशमीको “ आरोग्यत्रत' का
आचरण करे । दस ब्राह्मणोका गन्ध आदिसे पूजन
करे ओर उन्हें दक्षिणा देकर विदा करे। स्वय
दिन एक समय भोजन करके रहे । इस प्रकार
त्रत करके मनुष्य इस भृतलपर आरोग्य पाता ओर
धर्मराजके प्रसादसे देवलोके देवताकी भति
आनन्दका अनुभव करता टे । पीप शुक्ला दशमीको
विश्चेदेवोंकी पूजा करनी चाहिये । विश्वेदेव दस है
जिनके नाम इस प्रकार है-- क्रतु, दक्ष, चसु, सत्य,
करानेवाले हँ। श्रावण शुक्ला दशमी सम्पूर्ण
आशाओंकी पूर्तिं करनेवाली है । इसमें गन्ध आदि
उपचारोसे भगवान् शङ्करको पूजा उत्तम मानी गयी
हे। उस दिन किया हुआ उपवास या नक्तत्रत,
ब्राह्मणभोजन, जप, सुवर्णदान तथा धेनु आदिका
दान सब पापोंका नाशक बताया गया हे।
द्विजश्रेष्ठ । भाद्रपद शुक्ला दशमीको ' दशावतार-
व्रत' किया जाता है। उस दिन जलाशयमें सान
करके सन्ध्यावन्दन तथा देवता, ऋषि ओर पितरोका
तर्पण करनेके पश्चात् एकाग्रचित्त हो दशावतार
विग्रहोकी पूजा करनी चाहिये। मत्स्य, कूम,
वराह, नृसिंह, त्रिविक्रम (वामन), परशुराम, राम,
कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि-इन दसोंकौ सुवर्णमयी
मूर्ति बनवाकर विधिपूर्वक पूजा करे ओर दस
ब्राह्मणोका सत्कार करके उन्हें उन मूर्तिरयोका
दान कर दे। नारद! उस दिन उपवास या एक
समय भोजनका त्रत करके ब्राह्मणोंको भोजन
करावे ओर उन्दै विदा करके एकाग्रचित्त हो स्वयं | काल, काम, मुनि, गरु, विप्र ओर राम । इन सवम $
दृष्टजनोके साथ भोजन करे । जो भक्तिपूर्वकं इस | भगवान् विष्णु भलीभति विराजमान हैं । विश्रदेवींकी
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८५५४
संक्षिप्त नारदपुराण
कुशमयी प्रतिमाएं बनाकर उन्हें कुशके ही आसनोपर
स्थापित करे। आसनोंपर स्थित हो जानेपर उनमेसे
प्रत्येकका गन्ध, पुष्प, धूप, दीप ओर नैवेद्य
आदिके द्वारा पूजन करे । प्रत्येकको दक्षिणा देकर
प्रणाम करनेके अनन्तर उन सबका विसर्जन करे।
उनपर चटी हुई दक्षिणाको श्रेष्ठ द्विजों अथवा
गुरुको समर्पित करे । विप्र्षे। इस प्रकार एक
समय भोजनका ब्रत करके जो ब्रती पुरुष उक्त
विधिका पालन करता है, वह उभय लोकके
उत्तम भोगोंका अधिकारी होता है। नारद! माघ
शुक्ला दशमीको इन्द्रियसंयमपूर्वक उपवास करके
अद्धिरा नामवाले दस देवताओंकी स्वर्णमयी प्रतिमा
बनाकर गन्ध आदि उपचारोसे उनकी भली भति
पूजा करनी चाहिये । आत्मा, आयु, मन, दक्ष, मद,
प्राण, बरहिष्मान्, गविष्ठ, दत्त ओर सत्य-ये दस
अङ्गिरा है। उनको पूजा करके दस ब्राह्यणोको
मिष्टान्न भोजन करावे ओर उक्त स्वर्णमयी मूर्तियां
उन्हीको अर्पित कर दे। इससे स्वर्गलोककी प्रापि
होती हे । फाल्गुन शुक्ला दशमीको चौदह यमोंकी
पूजा करे। यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत,
काल, सर्वभूतक्षय, ओदुम्बर, दध्न, नील, परमेष्ठी,
=+»
वृकोदर, चित्र ओर चित्रगुप्त-ये चौदह यम हैं]
गन्ध आदि उपचारोसे इनकी भलीभोति पूजा
करके कुशसहित तिलमिश्रित जलकी तीन-तीन
अञ्जलियोसे प्रत्येकका तर्पण करे । तदनन्तर तविके
पात्रमे लाल चन्दन, तिल, अक्षत, जौ ओर जल
रखकर उन सबके द्वारा सूर्यको अर्घ्य दे । अर्घ्यका
मन्त्र इस प्रकार है-
एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्ते।
गृहाणार्ध्यं मया दत्तं भक्त्या मामनुकम्पय ॥
(ना० पूर्व ११९। ६३)
"सहस्रो किरणोसे सुशोभित तेजोराशि जगदीश्वर
सूर्यदेव ! आइये, भक्तिपूर्वक मेरा दिया हुआ अर्ध्य
स्वीकार कोजिये। साथ ही मुञ्चे अपनी सहज
कृपासे अपनाइये ।'
इस मन्त्रसे अर्घ्य देकर चोदह ब्राह्मणोको भोजन
करावे तथा रजतमयी दक्षिणा दे। उन्हें विदा करके
स्वयं भी भोजन करे । ब्रह्मन्! इस प्रकार विधिका
पालन करके मनुष्य धर्मराजकी कृपासे इहलोकके
धन, पुत्र आदि देवदुर्लभ भोगोंको भोगता है ओर
देहावसान होनेपर श्रेष्ठ विमानपर वेठकर भगवान्
विष्णुके लोकका भागी होता हे।
+ 0
द्वादश मासक एकादशी-व्रतोक्की विधि ओर महिमा तथा दशमी आदि तीन
दिनोके पालनीय विशेष नियम
सनातनजी कहते है- मुने! दोनों पक्षोकी
एकादशीको मनुष्य निराहार रहे ओर एकाग्रचित्त
हो नाना प्रकारके पुष्पोसे शुभ एवं विचित्र मण्डप
बनावे। फिर शास्त्रोक्त विधिसे भलीभाति सान
करके उपवास ओर इन्द्रियसंयमपूर्वक श्रद्धा ओर
एकाग्रताके साथ नाना प्रकारके उपचार जप, होम,
प्रदक्षिणा, स्तोत्रपाठ, दण्डवत्-प्रणाम तथा मनको
प्रिय लगनेवाले जय-जयकारके शब्दोंसे विधिवत्
श्रीविष्णुको पूजा करे तथा रात्रिम जागरण करे।
एेसा करनेसे मनुष्य भगवान् विष्णुके परम पदको
प्राप्त होता हे। चेत्र शुक्ला एकादशीको उपवास
करके श्रेष्ठ मनुष्य तीन दिनके लिये आगे
बताये जानेवाले सभी नियमोंका पालन करनेके
पश्चात् द्वादशीको भक्तिपूर्वक सनातन वासुदेवको
पोडशोपचारसे पूजा करे। तदनन्तर ब्राह्मणोको
भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे ओर उनको विदा
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-चतुर्थ पाद
५५५
करके स्वयं भी भोजन करे। यह “कामदा नामक
एकादशी है, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है ।
यदि भक्तिपूर्वक इस तिथिको उपवास किया जाय
तो यह भोग ओर मोक्ष देनेवाली होती हे । वेशाख
कृष्णा एकादशीको “ वरूथिनी! कहते हें । उस दिन
उपवास करके दूसरे दिन भगवान् मधुसूदनकं
पूजा करनी चाहिये। इसमे सुवर्ण, अन्न, कन्या
ओर धेनुका दान उत्तम माना गया है । वरूथिनीका
व्रत करके नियमपरायण मनुष्य सव पापोसे मुक्त
हो वैष्णवपद प्राप्त कर लेता है। वेशाख शुक्ला
एकादशीको ' मोहिनी ' कहते हे । उस दिन उपवास
करके दूसरे दिन स्नानके पश्चात् गन्ध आदिसे
भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करे। तदनन्तर ब्राह्मणभोजन
कराकर वह सव पातकोंसे मुक्त हो जाता हे।
ज्येष्ठ कृष्णा एकादशीको * अपरा" कहते हे । उस
दिन नियमपूर्वकं उपवास करके द्वादशीको प्रातः-
काल नित्यकर्मसे निवृत्त हो भगवान् त्रिविक्रमको
विधिवत् पूजा करे । तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणोको भोजन
कराकर उन्हें दक्षिणा दे। एेसा करनेवाला मानव
सब पापोसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमम जाता
हे । ज्येष्ठ शुक्ला एकादशीको .“ निर्जला" एकादशी
कहते हैं द्विजोत्तम ! सूर्योदयसे लेकर सूर्योदयतक
निर्जल उपवास करके दूसरे दिन द्वादशके प्रातः-
काल नित्यकर्म करनेके अनन्तर विविध उपचारोसे
भगवान् हषीकेशका पूजन करे। तदनन्तर भक्तिपूर्वक
त्राह्मणोको भोजन कराकर मनुष्य चौबीस एकादशिर्योका
फल प्राप्त कर लेता है । आयाद् कृष्ण एकादशीको
“योगिनी ^ कहते है । उस दिन उपवास के द्वादशको
नित्यकर्मकि पश्चात् भगवान् नारायणकी पूजा करे ।
तत्पश्चात् श्रषठ ्राह्मणोको भोजन कराकर उन्हं दक्षिणा
दे। एेसा करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण दानोंका फल
पाकर भगवान् विष्णुके धामे आनन्दका अनुभव
करता है। मुने! आपाद शुक्ला एकादशीको
उपवास करके सुन्दर मण्डप बनाकर उसमं विधिपूर्वक
भगवान् विष्णुकी प्रतिमा स्थापित करे। वह प्रतिमा
सोने या चाँदीकी बनी हई अत्यन्त सुन्दर हो।
उसकी चारों भुजा शद, चक्र, गदा ओर पद्यसे
सुशोभित हों। उसे पीताम्बर धारण कराया
गया हो ओर वह अच्छी तरह विदे हुए सुन्दर
पलंगपर विराज रही हो। तदनन्तर मन्त्रपाठपूर्वक
पञ्चामृत एवं शुद्ध जलसे स्नान कराकर पुरुषयुक्तके
सोलह मन्त्रोसे षोडशोपचार पृजन करे । पाद्यसमर्पणसर
लेकर आरती उतारनेतक सोलह उपचार होते ६ ।
तत्पश्चात् श्रीहरिकी इस प्रकार प्रार्थना करे--
सुपे त्वयि जगन्नाथ जगत्सु भवेदिदम्।
विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्वं चराचरम् ॥
(ना० पूर्वं १२०। २३)
"जगन्नाथ! आपके सो जानेपर यह सम्पूर्ण
जगत् सो जाता है ओर आपके जाग्रत् होनेपर् यद
सम्पूर्णं चराचर जगत् भी जाग्रत् रहता ह ।'
इस प्रकार प्रार्थना करके भक्त पुरुष चातुर्मास्यके
लिये शास्त्रविहित नियमोंको यथाशक्ति ग्रहण करे ।
तदनन्तर द्वादशीको प्रातःकाल पोडशोपचारद्रारं
भगवान् शेपशायीकी पूजा करे । तत्पश्चात् ब्राद्यणेकि
((-0. 1\/॥(11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
॥ च
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# पन अरि चि 5 9: @ - = छः
2 |
९५९५६
भोजन कराकर उन्हें दक्षिणासे संतुष्ट करे । फिर
स्वयं भी मोनभावसरे भोजन करे। इस विधिसे
भगवान्को ˆ शयनी ' एकादशीका ब्रत करके मनुष्य
भगवान् विष्णुको कपासे भोग एवं मोक्षका भागी
होता हे । द्विजश्रेष्ठ ! श्रावणके कृष्णपक्षमें एकादशीको
` कामिका" त्रत होता है। उस दिन श्रेष्ठ मनुष्य
कनयमपूर्वक उपवास करके द्वादशीको नित्यकर्मका
सम्पादन करनेके अनन्तर षोडशोपचारसे भगवान्
श्रीधरका पूजन करे 1 तदनन्तर ब्राह्मणोको भोजन
करा उन्हें दक्षिणा देकर विदा करनेके पश्चात् स्वयं
भी भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। जो इस
प्रकार उत्तम 'कामिकत्रत' करता है, वह इस लोकमें
सम्मूर्णं कामनाओंको प्राप्तकर भगवान् विष्णुके
परम धाममें जाता हे । श्रावण शुक्ला एकादशीको
^ पुत्रदा" कहते ह । उस दिन उपवास करके
नियमपूर्वक रहकर पोडशोपचारसे भगवान्
जनार्दनको पूजा करे। तदनन्तर ब्राह्मणभोजन
कराकर उन्हें दक्षिणा दे] इस प्रकार करनेवाला
इहलोकमे उनसे सदगुणसम्पन्न पुत्र पाकर सम्पूर्ण
देवताओंसे वन्दित हो साक्षात् भगवान् विष्णुके
धाममें जाता है।
भाद्रपद कृष्णा एकादशीको “अजा ' कहते हे ।
उस दिन उपवास करके द्वादशीके दिन विभिन्न
उपचारोसे भगवान् उपेन्द्रक पूजा करनी चाहिये।
फिर ब्राह्यणोको मिष्टान्न भोजन कराकर दक्षिणा दे
विदा करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक एकाग्रभावसे
' अजा' एकादशीका त्रत करके मनुष्य इहलोकमें
सम्पूर्णं उत्तम भोगोंको भोगता ओर अन्तमें
वैष्णवधामको जाता हे। भाद्रपद शुक्ला एकादशीका
नाम् पद्या" हे। उस दिन उपवास करके नित्य
पूजन करनेके अनन्तर ब्राह्मणको जलसे भरा घट
दान करे । द्विजोत्तम ! पहलेसे स्थापित प्रतिमाका
उत्सव करके उसे जलाशयके निकट ले जाय
संक्षिप्त नारदपुराण
| जलसे स्पर्शं कराकर उसकी विधिपूर्वक पूजा
करे। फिर उसे घरमें लाकर बायीं करवटसे सुला
दे। तदनन्तर प्रातःकाल द्वादशीको गन्ध आदि
उपचारोद्रारा भगवान् वामनकी पूजा करे । तत्पश्चात्
ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दक्षिणा दे विदा करे।
जो इस प्रकार पद्या" का परम उत्तम व्रत करता
हे, वह इस लोकमें भोग पाकर अन्तमं इस
प्रपञ्चसे मुक्त हो जाता हे। आश्चिन कृष्णा एकादशीको
कहते है । उस दिन उपवास करके
शालग्राम शिलाके सम्मुख मध्याहकालमं श्राद्ध
करे । ब्रह्मन्! यह भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेवाला
होता है। तदनन्तर द्वादशीको प्रातःकाल भगवान्
पद्मनाभकी पूजा करके विद्वान् पुरुष ब्राह्मणोको
भोजन करावे ओर दक्षिणा देकर उन्हें विदा
करनेके पश्चात् स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकार
"इन्दिरा एकादशी ' का त्रत करनेवाला मनुष्य इस
लोकमें मनोवाञ्छित भोगोंको भोगकर करोड़ों
पितरोंका उद्धार करके अन्तमें भगवान् विष्णुके
धाममें जाता हे । विप्रवर! आश्विन शुक्ला एकादशीको
' पापाङ्कशा' कहते हैं । उस दिन विधिपूर्वक
उपवासं करके द्वादशीके दिन भगवान् विष्णुकी
पूजा करे। तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणको भोजन करा
उन्हें दक्षिणा दे भक्तिभावसे प्रणाम करके विदा
करे। फिर स्वयं भी भोजन करे। जो मनुष्य इस
प्रकार भक्तिपूर्वकं पापाङ्कशा एकादशीका त्रत
करता है, बह इस लोकमें उत्तम भोगोको भोगकर
भगवान् विष्णुके लोकमें जाता हे।
द्विजश्रेष्ठ ! कार्तिक कृष्णपक्षे “रमा” नामको
एकादशीको विधिवत् सान करके द्वादशीको प्रातः-
काल केशी दैत्यका वध करनेवाले, देवताओकि
भी देवता सनातन भगवान् केशवकी पूजा करे।
तदनन्तर ब्राह्यणोको भोजन करावे ओर उन्हं
दक्षिणा देकर विदा करे। इस प्रकार व्रत करके
(-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/818/185। (01661011. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-चतुर्थं पाद ५५७
| पश्चात् स्वयं भाई-वन्धुओंके साथ भोजन
करे। इस प्रकार त्रत करके मनुष्य इहलोकमें
मनोवाज्छित भोगोको भोगकर पहले ओर पीरेकी
दस-दस पीदियोंका उद्धार करके भगवान् श्रीहरिके
धाममं जाता हे। पौष मासके कृष्णपक्षकी एकादशीको
`सफला' कहते हे । उस दिन उपवास करके
द्रादशीको सभी उपचारोसे भगवान् अच्युतकी
पूजा करे। फिर ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन करावे
ओर दक्षिणा देकर विदा करे । ब्रह्मन्! इस प्रकार
सफला' एकादशीका विधिपूर्वक त्रत करके
मनुष्य इहलोकमें सम्पूर्ण भोर्गोका उपभोग करके
अन्तमे वैष्णवपदको प्राप्त होता है। पौप शुक्ला
एकादशीको "पुत्रदा! कहा गया है। उस दिन
उपवास करके द्वादशीके दिन अर्घ्य आदि उपचारे
भगवान् चक्रधारी विष्णुकी पूजा करे। फिर श्रेष्ठ
ब्राह्मणोको भोजन करा दक्षिणा दे विदा करके
अपने इष्ट भाई-बन्धुओके साथ शेष अन्न स्वयं
भोजन करे। विप्रवर! इस प्रकार व्रत करनेवाला
मनुष्य इहलोकमें मनोवाज्छित भोग भोगकर अन्तमं
श्रेष्ठ विमानपर आरूद् हो भगवान् विष्णुके धामे
जाता है।
द्विजश्रेष्ट! माघके कृष्णपक्षमे “पट्तिला"
एकादशीको उपवास करके तिलोसे ही खान, `
दान, तर्पण, हवन, भोजन एवं पृजनका काम ले।
फिर द्वादशीको प्रातःकाल सव उपचारोसे भगवान्
वैकुण्ठको पूजा करे । फिर ब्राह्मणोंको भोजन करा
उन्हे दक्षिणा देकर विदा करे । इस प्रकार एकाग्रचित्त
हो विधिपूर्वक त्रत करके मनुष्य इहलोकमें
मनोवाज्छित भोग भोगकर अन्ते विष्णुपदं प्राप्त
कर लेता है। माघ शुक्ला एकादशीका नाम
"जया" टै। उस दिन उपवास करक द्वादशको
प्रातःकाल परम पुरुप भगवान् श्रीपतिकी अर्चना
कर । तदनन्तर ब्राह्मणको भोजन करा दक्षिणा द
मनुष्य इस लोकम मनोवाज्छित भोग भोगनेके
पश्चात् विमानद्वारा वैकुण्ठमें जाकर भगवान्
लक्ष्मीपतिका सामीप्य लाभ करता है। कार्तिक
शुक्ला एकादशीको प्रबोधिनी ' कहते हैँ । उस
दिन उपवास करके रातमें सोये हुए भगवान्को
गीत आदि माङ्गलिक उत्सवोद्रारा जगाये। उस
समय ऋ्वेद, यजुर्वेद ओर सामवेदके विविध
मन्त्रों ओर नाना प्रकारके वाद्योके द्वारा भगवान्को
जगाना चाहिये । द्राक्षा, ईख, अनार, केला ओर
सिंघाडा आदि वस्तुं भगवान्को अर्पित करनी
चाहिये । तत्पश्चात् रात बीतनेपर दूसरे दिन सवेरे
स्नान ओर नित्यकर्म करके पुरुषसूक्तके मन्त्रोद्वारा
भगवान् गदादामोदरको पोडशोपचारसे पूजा करनी
चाहिये । फिर ब्राह्यणोको भोजन करा उन्हें दक्षिणासे
संतुष्ट करके विदा करे। इसके बाद आचार्यक
भगवान्को स्वर्णमयी प्रतिमा ओर धेनुका दान
करना चाहिये । इस प्रकार जो भक्ति ओर आदरपूर्वक
"प्रबोधिनी एकादशी ' का त्रत करता है, वह इस
लोकमे श्रेष्ठ भोगोंका उपभोग करके अन्तमें
वेष्णवपद प्राप्त कर लेता है।
मार्गशीर्षं मासके कृष्णपक्षकी एकादशीको “उत्पन्ना”
एकादशी कहते हे । उस दिन उपवास करके
द्रादशीको गन्ध आदि उपचारोसे भगवान् श्रीकृष्णकी
पूजा करे । तत्पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्यणोंको भोजन करा
उन्हें दक्षिणा दे विदा करके स्वयं भी इष्टजनोके
साथ एकाग्र होकर भोजन करे। इस प्रकार जो
भक्तिभावसे “उत्पत्ना'का व्रत करता है, वह
अन्तकालमें श्रेष्ठ विमानपर वेठकर भगवान् विष्णुके
लोकमें चला जाता हे । मार्गशीर्षं शुक्ला एकादशीको
"मोक्षा" (मोक्षदा) एकादशी कहते है । उस दिन
उपवास करके द्वादशीको प्रातःकाल सम्पूणं उपचारेये
विश्चरूपधारी भगवान् अनन्तक पजा करे । फिर
ब्राह्यणोंको भोजन कराये ओर दक्षिणा देकर विदा
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 81188 \/81/81/185। (01661010. 01411260 0 6810011
५५८ संक्षिप्त नारदपुराण
विदा करके शेष अन्न अपने भाई-बन्धुअकि साथ स्वयं | एकादशीका त्रत मोक्षदायक कहा गया है । एकादशी
एकाग्रचित्त होकर भोजन करे। विप्रवर! जो इस प्रकार | व्रत तीन दिनमें साध्य होनेवाला बताया गया है।
भगवान् केशवको संतुष्ट करनेवाला व्रत करता हे, वह | वह सव त्रतोमे उत्तम ओर पापोंका नाशक है
इहलोकमें श्रेष्ठ भोगोको भोगकर अन्तम भगवान् | अतः उसका महान् फल जानना चाहिये । नारद !
विष्णुके धाममें जाता हे। फाल्गुन कृष्णा एकादशीका | इन तीन दिनके भीतर चार समयका भोजन त्याग
नाम ` विजया" ह । उस दिन उपवास करके द्वादशीको | देना चाहिये । प्रथम ओर अन्तिम दिनमें एक-एक
प्रातःकाल गन्ध आदि उपचारोसे भगवान् योगीश्वरकी | बारका ओर विचले दिनमें दोनों समयका भोजन
पूजा करे। तदनन्तर ब्राह्यणोको भोजन करा दकषिणासे | त्याज्य हे। अब में तुम्हें इस तीन दिनके त्रतमें
सतुष्ट करके उन्हे विदा करनेके पश्चात् स्वयं मोन | पालन करने योग्य नियम बतलाता हूं । कासका
होकर भाई-वन्धुओकि साथ भोजन करे। इस प्रकार | वर्तन, मांस, मसूर, चना, कोदो, शाक, मधु,
त्रत करनेवाला मानव इहलोकमे अभीष्ट भोगोको | पराया अन्न, पुनर्भोजन (दो बार भोजन) ओर
भोगकर देहान्त होनेके बाद देवताओंसे सम्मानित हो | मेथुन- दशमीके दिन इन दस वस्तुओंसे वैष्णव
भगवान् विष्णुके लोकमं जाता हे । द्विजोत्तम! फाल्गुनके | पुरुप दूर रहे । जुजआ खेलना, नींद लेना, पान
शुक्लपक्षमे “आमलकी ' एकादशीको उपवास करके | खाना, दातुन करना, दूसरेकी निन्दा करना, चुगली
द्रादशीको प्रातःकाल सम्पूर्णं उपचारोसे भगवान् | खाना, चोरी करना, हिंसा करना, मेथुन करना,
पुण्डरोकाक्षका भक्तिपूर्वक पूजन करे। तदनन्तर ब्राह्यणोको | क्रोध करना ओर जठ बोलना-एकादशीको ये
उत्तम अन्न भोजन कराकर उन्हे दक्षिणा दे । इस प्रकार | ग्यारह बातें न करे । कंस, मांस, मदिरा, मधु,
फल्गुनके शुक्लपक्षमं ' आमलकी ' नामवाली एकादशीको | तेल, ञ्ूठ बोलना, व्यायाम करना, परदेशमें जाना,
विधिपूर्तक पूजन आदि करके मनुष्य भगवान् विष्णुके | दुबारा भोजन, मेथुन, जो स्पर्श करने योग्य नहीं
परम पदको प्राप्त होता हे। ब्रह्मन्! चैत्रके कृष्णपक्षे | हे उनका स्पर्श करना ओर मसूर खाना-द्वादशीको
` पापमोचनी' नामवली एकादशीको उपवास करके | इन बारह वस्तुओंको न करे! । विप्रवर । इस
द्वादशको प्रातःकाल पोडशोपचारसे भगवान् गोविन्दकी | प्रकार नियम करनेवाला पुरुप यदि शक्ति हो तो
पूजा करे। तत्पश्चात् त्राह्मणोको भोजन करा दक्षिणा दे | उपवास करे । यदि शक्ति न हो तो वुद्धिमान् पुरुष
उन्हं विदा के स्वयं भाई-वन्धुअओकि साथ भोजन करे। | एक समय भोजन करके रहे ,किंतु रातमें भोजन
जो इस प्रकार इस “पापमोचनी" का त्रत करता है वह | न करे। अथवा अयाचित वस्तु (विना मगि मिली
तेजस्वी विमानद्वारा भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। | हुई चीज) -को उपयोग करे, किंतु एेसे महत्त्वपूर्ण
ब्रह्मन्। इस प्रकार कृष्ण तथा शुक्लपक्षमे । ब्रतका त्याग न करे।
>>>
१. अथ ते नियमान् वच्मि व्रते ह्यस्मिन् दिनत्रये । कास्यं मांसं मसूरान्नं चणकान् कोद्रवांस्तथा ॥
शाकं मधु परान्नं च पुनर्भोजनमेभुने। दशम्यां दश वस्तूनि वर्जयेद्रैष्णवः सदा॥
दयूतक्रोडां च निद्रां च ताम्बूलं दन्तधावनम्। परापवादं पैशुन्यं स्तेयं हिंसां तथा रतिम्॥
कोपं ह्यनृतवाक्यं च एकादश्यां विवर्जयेत् । कास्यं मांसं सुरां क्षौद्रं तैलं वितथभाषणम्॥
व्यायामं च प्रवासं च पुनर्भोजन्मथुने। अस्मृश्यस्पर्शमासूरे द्वादश्यां द्वादश त्यजेत् ॥
(ना० पूर्व० १२०। ८६-९०)
(-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 6810011
पूर्वभाग-चतुर्थं पाद
५५९
नारह महीनोके द्वादशी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि ओर महिमा तथा आठ
महाद्रादणियोका निरूपण
सनातनजी कहते हे- अनघ ! अव में
द्वादशके व्रतोका वर्णन करता हूं, जिनका पालन
करके मनुष्य भगवान् विष्णुका अत्यन्त प्रिय होता
हे । चेत्र शुक्ला द्वादशीको मदनत्रत' का आचरण
करे। सफेद चावलसे भरे हुए एक नूतन कलशकी
स्थापना करे, जिसमें कोई छेद न हो । वह अनेक
प्रकारके फलोसे युक्त इक्ुदण्डसंयुक्त दो धेत
वस््रोसे आच्छादित, धेत चन्दनसे चर्चित, नाना
प्रकारके भक्ष्य पदार्थसि सम्पन्न तथा अपनी शक्तिके
अनुसार सुवर्णसे सुशोभित हो। उसके ऊपर
गुडसहित तोबिका पात्र रखे। उस पात्रमे कामस्वरूप
भगवान् अच्युतका गन्ध आदि उपचारोसे पूजन
करे । द्वरादशीको उपवास करके दूसरे दिन प्रातः-
काल पुनः भगवान्को पूजा करे । वहां चदी हई
वस्तुएं ब्राह्मणको दे दे। फिर ब्राह्यणोंको भोजन
करावे ओर उन्हें दक्षिणा दे। इस प्रकार एक
वर्पतक प्रत्येक द्वादशीको यह त्रत करके आचार्यको
धृत-धेनुसहित सव सामग्रियोसे युक्त शय्यादान
दे। तदनन्तर वस्त्र आदिसे ब्राह्मण-दम्पतिको पूजा
करके उन्हें सुवणमय कामदेव तथा दूध देनेवाली
शेत गौ दान करे। दान करते समय यह कहे कि
"कामरूपी श्रीहरि मुञ्जपर प्रसत्र हां।' जो इस
विधिसे 'मदनद्रादशीव्रत'-का पालन करता है
वह सव पापोसे मुक्त हो भगवान् विष्णुकः समता
प्राप्त कर लेता है। इसी तिथिको ' भर्तृद्रादशो ' का
त्रत बताया गया हे । इसमं सुन्दर शय्या विदाकर
उसपर लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुको स्थापित
करके उनके ऊपर फलोंसे मण्डप बनावे । तत्पश्चात्
व्रती पुरुष गन्ध आदि उपचारोसे भगवानूकी पूजा
करे। माङ्गलिक गीत, वाद्य आदिके द्वा गतं
जागरण करे, फिर दूसरे दिन प्रातःकाल शय्यासहित
भगवान् विष्णुकी सुवर्णमयी प्रतिमाका श्रेष्ठ ब्राह्मणको
दान करे। ब्राह्यणोको भोजन कराकर दक्षिणाद्रारा उन्हे
संतुष्ट करके विदा करे। इस तरह त्रत करनेवाले
पुरुपका दाम्पत्यसुख चिरस्थायी होता है ओर वह
सात जन्मोतक इहलोक ओर परलोकके अभीष्ट
भोगोको भोगता रहता है।
वैशाख शुक्ला द्वादशीको उपवास ओर
इद्धियसंयमपूर्वक गन्ध आदि उपचारोद्राया भक्तिभावसे
भगवान् माधवको पूजा करे। फिर तृिजनक
मधुर पकवान ओर एक घड़ा जल ब्राह्मणको
विधिपूर्वक देवे। “ भगवान् माधवे मुञ्चपर प्रसन्न
हां", यही उसका उदेश्य होना चादिये। ज्येष्
शुक्ला द्वादशको गन्ध आदि उपचारोके द्वारा
भगवान् त्रिविक्रमकी पजा करके व्रती पुरुष
ब्राह्मणको मिष्टान्नसे भरा हुआ करवा निवेदन करे ।
तत्पश्चात् एक समय भोजनका व्रत करे । इस त्रतमे
संतुष्ट होकर देवदेव भगवान् त्रिविक्रम जीवनं
विपुल भोग ओर अन्तमं मोक्ष भी देते दे। आपादू
शुक्ला द्वादशको गन्ध आदिमं पृथकृ-पृथक् वारह `
त्राह्मणोकी पूजा करके उन्हें मिष्टान्न भोजन करावे ।
फिर् उनके लिये वस्त्र छी, यजोपवीत, अगृटी
ओर जलपात्र--इस वस्तु ओंको भक्िपूर्वक दवान
करे। ' भगवान् विष्णु मुञ्जपर प्रसन्न हों ग्रही
उस दानका उदेश्य होना चाहिये । श्रावण शुक्ला
द्रादशीको व्रती पुरुष भगवेत्परायण हो गन्ध आदि
उपचाररोसं भक्तिपूर्वकं भगवान् श्रीधरकौ पूजा
करे। फिर उत्तम ब्राद्यणोको दही -भात भोजन
कराकर चादीकी दक्षिणा दे, उन्हें नमस्कार करक
विदा करे। मन-ही-मन यह भावना करे कि "मेर
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संक्षिप्त नारदपुराण
इस तब्रतसे देवेश्वर भगवान् श्रीधर प्रसन्न हों।'
भाद्रपद शुक्ला द्वादशीको व्रती पुरुप भगवान्
वामनको पूजा करके उनके आगे बारह ब्राह्यणोंको
खीर भोजन कराव्रे । तत्पश्चात् स्वर्णमयी दक्षिणा
दे। वह भगवान् विष्णुको प्रसन्नताको करनेवाला
होता दे। आश्विन शुक्ला द्वादशीको गन्ध आदि
उपचारोसे भगवान् पदानाभकी पूजा करे ओर
उनके आगे ब्राह्मणको मिष्टान्न भोजन करावे।
साथ ही तस्त्र ओर सुवर्ण-दक्षिणा दे । द्विजोत्तम
इस त्रतसे संतुष्ट होकर भगवान् पद्मनाभ श्चेतद्रीपकी
प्राति कराते है ओर इहलोके भी मनोवाच्छित
भोग प्रदान करते हें । कार्तिक मासके कृष्णपक्षे
'गोवत्सद्वादशी ' का त्रत होता हे। उसमें बछडेसहित
गोकी आकृति लिखकर सुगन्धित चन्दन आदिके
द्वारा तथा पुप्पमालाओंसं उसको पूजां करे । फिर
ताम्रपात्रमे फूल, अक्षत ओर तिल रखकर उन
सवके द्वारा विधिपूर्वक अर्घ्यं दान करे। नारद !
निप्राह्भित मन्त्रसे उसके चरणेपें अर्घ्य देना चाहिये-
्षीरोदार्णवसम्भृते सुरासुरनमस्कृते।
सर्वदेवमये देवि सर्वदेवेरलंकृते ॥
ु मातगृहाणार्ध्य नमोऽस्तु ते॥
(ना० पूर्व १२१। ३०-३१)
क्षीरसागरसे प्रकट हुई, सर्वदेवभूषिता, देव-
दानववन्दिता, सम्पूर्ण देवस्वरूपा देवि ! तुम्हे नमस्कार
हे। मातः! गोमातः ! यह अर्ध्यं ग्रहण कीजिये ।'
तदनन्तर उड़द आदिसे बने हए बड़े निवेदन
करे । इस प्रकार अपने वैभवके अनुसार दस, पोच
या एक बड़ा अर्पण करना चाहिये । उस समय
इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-
सुरभे त्वं जगन्माता नित्यं विष्णुपदे स्थिता।
सर्वदेवमयि ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रस॥
सर्वदेवमय देवि सर्वदेवैरलंकृते।
मातर्ममाभिलषितं सफलं कुरु नन्दिनि॥
(ना० पूर्व° १२१। ३२-३४)
' सुरभी ! तुम सम्पूर्णं जगत्की माता हो ओर
सदा भगवान् विष्णुके धाममें निवास करती हो।
सर्वदेवमयी देवि ! मेरे दिये हए इस ग्रासको ग्रहण
करो । देवि ! तुम सर्वदेवस्वरूपा हो । सम्पूर्ण देवता
तुम्हे विभूषित करते हें। माता नन्दिनी! मेरी
अभिलाषा सफल करो ।'
द्विजोत्तम ! उस दिन तेलका पका हुआ ओर
वटलोईका पका हुआ अन्न न खाय। गायका दूध,
दही, घी ओर तक्र भी त्याग दे। ब्रह्मन्! कार्तिक
शुक्ला द्रादशीको गन्ध आदि उपचारोसे एकाग्रचित्त
हो भगवान् दामोदरकी पूजा करे ओर उनके आगे
वारह ब्राह्मणको पकवान भोजन करावे । तदनन्तर
जलसे भरे हए घड़को वस्त्रसे आच्छादित ओर
पूजित करके सुपारी, लड्ड् ओर सुवण्के साथ
उन सबको प्रसन्नतापूर्वक अर्पण करे । एेसा करनेपर
मनुष्य भगवान् विष्णुका प्रिय भक्त ओर सम्पूर्ण
भोगोका भोक्ता होता है ओर शरीरका अन्त होनेपर
वह भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।
मार्गशीषं शुक्ला द्रादशीको परम उत्तम ' साध्य-
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पूर्वभाग-चतुर्थं पाद ५६१
व्रत' का अनुष्ठान करना चाहिये । मनोभाव,
नर, अपान, वीर्यवान्, चिति, हय, नय, हंस,
नारायण, विभु ओर प्रभु-ये बारह साध्यगण कहे
गये है ‹ । चावलोपर इनका आवाहन करके गन्ध-
पुष्प आदिके द्वारा पूजन करना चाहिये । तदनन्तर
` भगवान् नारायण प्रसन्न हों! इस भावनासे बारह
श्रेष्ठ ब्राह्मणोको भोजन कराकर उन्हें उत्तम दक्षिणा
दे विदा करे। उसी दिन "द्रादशादित्य' नामक त्रत
भी विख्यात हे। उस दिन बुद्धिमान् पुरुष बारह
आदित्योको पूजा करे। धाता, मित्र, अर्यमा, पूपा,
शक्र, अंश, वरुण, भग, त्वष्टा, विवस्वान्, सविता
ओर विष्णु-ये बारह आदित्य बताये गये हें ।९
प्रत्येक मासके शुक्लपक्षकी द्वादशीको यलपूर्वक
वारह आदित्योको पूजा करते हुए एक वर्षं व्यतीत
करे । व्रतके अन्तमें सोनेकी बारह प्रतिमाएं बनवाये
ओर विधिपूर्वक उनकी पूजा करके बारह श्रेष्ठ
ब्राह्मणको सत्कारपूर्वक मिष्टान्न भोजन करावे।
तत्पश्चात् ब्रती पुरुष प्रत्येक ब्राह्मणको एक-एक
प्रतिमा दे। इस प्रकार द्रादशादित्य नामक त्रत
करके मनुष्य सूर्यलोकमे जा वहकि भोगोका
चिरकालतक उपभोग करनेके पथात् पृथ्वीपर
धर्मात्मा मनुष्य होता हे। मनुप्ययोनिमें उसे रोग
नहीं होते। उस त्रतके पुण्यसे वह पुनः उसी
व्रतको पाता हे ओर पुनः उसके पुण्यसे सूर्यमण्डलको
भेदकर निरञ्जन, निराकार एवं निर्द्र तब्रह्मको
प्राप्त होता है। द्विजोत्तम! उक्त तिधिको दही
"अखण्ड" नामक त्रत कहा गया टै। उसमें
भगवान् जनार्दनकी सुवर्णमयी मूर्तिं बनाकर गन्ध,
पुष्प आदिसे उसकी पूजा करके भगवानूके अगे
वारह ब्राह्मणोंको भोजन करावे । प्रत्येक मासकी
द्रादशीको एेसा करके स्वयं रातमें भोजन करे
ओर जितेन्द्रिय भावसे रहे । तत्पश्चात् वर्प पूरा
होनेपर उस स्वर्ण-मूर्तिका विधिपूर्वक पूजन
करके दूध देनेवाली गायके साथ उसका आचार्यको
दान करे। तदनन्तर बारह श्रेष्ठ ब्राह्मणोको खड
ओर खीर भोजन कराकर उन्हें बारह सुवर्णखण्डकी
दक्षिणा दे नमस्कार करे। इस प्रकार त्रत पूरा करके
जो भगवान् जनार्दनको प्रसन्न करता है, वह
सुवर्णमय विमानसे श्रीविष्णुके परम धाममं जाता है।
पौप मासके कृष्णपक्षकौ द्रादशीको “रूप-
व्रत" बताया गया है। ब्रह्मन्! व्रती पुरुषको
चाहिये कि वह दशमीको विधिपूर्वकं स्नान
करके सफेद या किसी एक रंगवाली गायके
गोवरको धरतीपर गिरनेसे पहले आकाशमेसे ही
ले ले। उस गोबरसे एक सौ आठ पिण्ड बनाकर
उन्हे तवि या मिद्रीके पात्रमें रखकर धूपे सुखा
ले। फिर एकादशीको उपवास करके भगवान्
विष्णुकौ स्वर्णमयी प्रतिमाका विधिपूर्वकं पूजन
ओर रात्रिम जागरण करे। सुन्दर मङ्गलमय
गीतवाद्य, स्तोत्र-पाठ ओर जप आदिके द्वार
जागरणका कार्य सफलं बनावे । तत्पश्चात् प्रातः-
काल जलसे भरे हए कलशपर तिलसे भरा पात्र
रखकर उसके ऊपर उस स्वर्णमयी प्रतिमाको
रखे ओर विभिन्न उपचारोसे उसकी पृजा कर ।
इसके बाद दो काके रगड्ने आ्दिके द्वारा
नृतन अग्नि उत्पन्न करके उसकी पूजा करे ओर
विद्वान् पुरुष उस प्रज्वलित अग्रिमे तिल भौर
घीसहित एक-एक गोमय-पिण्डका विष्णुसम्बन्धी
१. मनोभवस्तधा प्राणो नरोऽपानश्च वीर्यवान् । चितिर्हयो तनयश्चैव हसो नारायणस्तथा ॥
विभुधापि प्रभुश्चैव साध्या द्वादश कर्तिताः।
(ना० पूर्व १२१। ५१-५२)
२.धाता मित्रोऽर्यमा पूषा शक्रश वरुणो भगः । त्वषा विवस्वान् सविता विष्णुद्ादश ईग्तिः #
( ना० पूर्व॑ १२१। ५५-५६)
((-0. 1\॥८111104/5511॥1 81188 \/81/81185। (01661010. 01411260 0 6810011
५६२ ध
द्वादशाक्षर^-मनत्रसे होम करे। तत्पश्चात् पूर्णाहुति
करके प्रेमपूर्णं हदयसे प्रसन्नतापूर्वक एक सौ आठ
ब्राह्मणोको खीर भोजन करावे। फिर कलशसहित
वह प्रतिमा आचार्यको अर्पित करे। तदनन्तर दूसरे
ब्राह्मणोको यथाशक्ति दक्षिणा दे। पुरुष हो या
स्त्री, इस त्रतका आदरपूर्वक पालन करके वह
रूप ओर सौभाग्य प्राप्त कर लेती है।
माघ शुक्ला द्वादशको शालग्रामशिलाकी
विधिपूर्वक भक्तिभावसे पूजा करके उसके मुख्यभागमें
सुवर्णं रखे। फिर उसे चोदीके पात्रमे रखकर दो
शेत वस्त्रोसे ढक दे। तत्पश्चात् वेदवेत्ता ब्राह्मणको
उसका दान दे। दान देनेके पश्चात् उस ब्राह्मणको
खोंड ओर घीके साथ हितकर खीरका भोजन
करावे, यह करके स्वयं एक समय भोजनका व्रत
करते हुए भगवान् विष्णुके चिन्तनमे लगा रहे। एेसा
करनेवाला पुरुप यहाँ मनोवाञ्छित भोग भोगनेके
पश्चात् विष्णुधाम प्राप्त कर लेता है । ब्रह्मन्! फाल्गुन
मासके शुक्लपक्षकी द्वादशीको श्रीहरिकी सुवर्णमयी
प्रतिमाका गन्धपुष्प आदिसे पूजन करके उसे
वेदवेत्ता ब्राह्मणको दान कर दे। फिर वारह ब्राह्मणको
भोजन करा उन्हं दक्षिणा देकर विदा करे। उसके
वाद स्वयं भाई-वन्धुओकि साथ भोजन करे।
्रिस्पृशा, उन्मीलनी, पक्षवर्धिनी, वञ्जली, जया,
विजया, जयन्ती तथा अपराजिता-ये आठ प्रकारकी
द्वादशी तिथियों सब पापोंका नाश करनेवाली है।
इनमे सदा उपवासपूर्वक त्रत रहना चाहिये।
श्रीनारदजीने पृछा त्रन्! इन सव द्वादशियोका
लक्षण केसा है ? ओर उनका फल कैसा होता है,
वह सव मुञ्चे बताइये । इसके सिवा अन्य पुण्यदायक
तिथियोंका भी परिचय दीजिये ।
सूतजी कहते है- महर्षयो! देवर्षिं नारदने
संक्षिप्त नारदपुराण
द्विजश्रेष्ठ सनातनजीसे जब इस प्रकार प्रश्न किया
तो सनातन मुनिने अपने भाई महाभागवत नारदजीकी,
प्रशंसा करके कहा।
सनातनजी बोले-- भैया! तुम तो साधु पुरुपेकि `
संशयका निवारण करनेवाले हो। तुमने यह बहुत
सुन्दर प्रश्न किया हे। में तुमं महाद्वादशियोकि पृथक्-
पृथक् लक्षण ओर फल बतलाता ह| जिस दिन !
एकादशी सू्ादयसे पहले-अरुणोदयकालमें ही |
निवृत्त हो गयी हो, (दिनभर द्वादशी हो ओर रातके
अन्तिम भागमें त्रयोदशी आ गयी हो) उस दिन
त्रिस्यृशा' नामवाली द्वादशी होती है। उसका महान्
फल होता हे। नारद! जो मनुष्य उसमे उपवास
करके भगवान् गोविन्दका पूजन करता है, वह निश्चय ¦`
रि
ही एक हजार अश्चमेध-यज्ञका फल पाता है। जब
अरुणोदयकालमें एकादशी तिथि दशमीसे विद्ध हो
(ओर एकादशी पुरे दिन रहकर दूसरे दिन भी
कुछ कालतक विद्यमान हो) तो उस प्रथम दिनक
एकादशीको छोडकर दूसरे दिन महाद्रादशीको उपवास
करे (उसे “उन्मीलनी" द्वादशी कहते हें) । उस
उन्मीलनी त्रतमें उत्तम पूजाकी विधिसे भगवान्
वासुदेवका यजन करके मनुष्य एक सहस्र राजसूय-
क त "त ।
= =
यञ्ञका फल पाता है। जव सूर्योदयकालमें दशमी
एकादशीका स्पर्शं करती हो (ओर द्वादशीकी वृद्धि
हुई हो) तो उस एकादशीको त्यागकर “ वज्जुली
नामवाली उस महाद्वादशीको ही सदा ॐपवासं
करना चाहिये। उसमे सवको सदा अभयदान
करनेवाले परम पुरुष संकर्यणदेवका गन्ध आदि
उपचारोसे भक्तिपूर्वक पूजन करे। यह महाद्रादशी
सम्पूर्णं यज्ञोका फल देनेवाल, सव पापको हर
लेनेवाली तथा समस्त सम्पदाओंको देनेवाल कही
गयी हे। विप्रवर! जब पूर्णिमा अथवा अमावास्या
१. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 8118801 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 66810011
7 1 न भ च भि भी किक = = = =
पूर्वभाग-चतुर्थ पाद्
नामक तिथियाँ बद् जाती है, तो उस पक्षकी
दरदशीका नाम ' पक्षवर्धिनी' होता है, जो महान्
, परल देनेवाली है । उसमें सम्पूर्णं एेशर्यं प्रदान
करनेवाले तथा पुत्र ओर पौत्रोको वढानेवाले
जगदीश्वर भगवान् प्रदयुप्रका पूजन करना चाहिये।
जब शुक्लपक्षे हादशी तिथि मघा नक्षत्रसे युक्त
| हो तो उसका नाम *जया' होता हे। वह सम्पूर्ण
शत्रुओंका विनाश करनेवाली हं । उसमे समस्त
कामनाओकि दाता ओर मनुष्योको सम्पूर्णं सौभाग्य
प्रदान करनेवाले लक्ष्मीपति भगवान् अनिरुद्धको
आराधना करनी चाहिये । जब शुक्लपक्षमें द्वादशी
| तिथि श्रवण नक्षत्रसे युक्त हो तो वह "विजया!
। नामसे प्रसिद्ध होती है। उसमे सदा समस्त
। भोगोके आश्रय तथा सम्पूर्णं सौख्य प्रदान करनेवाले
भगवान् गदाधरकी पूजा करनी चाहिये। विप्रवर!
` "विजया" मेँ उपवास करके मनुष्य सम्पूर्णं तौर्थोका
। फल पाता है। जब शुव्लपक्षमे द्वादशी रोहिणी
| नकषत्रसे युक्त होती है, तब वह महापुण्यमयी
"जयन्ती" नामसे प्रसिद्ध होती है। उसमे मनु्योको
। सिद्धि देनेवाले भगवान् वामनक अर्चना करनी
+
। चाहिये। यह तिथि उपवास करनेपर सम्पूर्णं व्रतोका
५६३
फल देती हे, समस्त दानोंका फल प्रस्तुत करती
है ओर .भोग तथा मोक्ष देनेवाली होती है। जव
शुक्लपक्षमें हवादशी तिथि पुष्य नक्षत्रसे मुक्त हो तो
उसे "अपराजिता" कहा गया है। वह सम्पूर्णं ज्ञान
देनेवाली है। उसमें संसार-बन्धनका नाश करनेवाले,
ज्ञानके समुद्र तथा रोग-शोकसे रहित भगवान्
नारायणकी आराधना करनी चाहिये । उस तिथिको
उपवास करके ब्राह्मणभोजन करानेवाला मनुष्य उस
व्रते पुण्यसे ही संसार-वन्धनसे मुक्तं हो जाता है।
जब आपाद शुक्ला द्वादशको अनुराधा नक्षत्र
हो, तब दो व्रत करने चाहिये। यहाँ एक ही देवता
है, इसलिये दो व्रत करनेमें दोष नहीं है। जव
भाद्रपद शुक्ला द्वादशीको श्रवण नक्षत्रका योग हो
ओर कार्तिक शुक्ला द्वादशको रेवती नश्षत्रका
संयोग हो तो एकादशी ओर द्वादशी दोनों दिन त्रेत
रहने चाहिये । विप्रवर! इनके सिवा अन्यत्र दादशीको
एक समय भोजन करके त्रत रहना चाहिये। यह
व्रत स्वभावसे ही सव पातकोका नाश करनेवाला
बताया गया है। द्वादशीसहित एकादशीका त्रत नित्य
माना गया है, अतः यह उसका उद्यापन नही कहा
गया। इसे जीवनपर्यन्त कसते रहना चाहिये।
(न (4८५
त्रयोदशी-सम्बन्धी व्रतोको विधि ओर महिमा
_ सनातनजी कहते है--नारद ! अव म तुम्हं
। जरयोदशीके व्रत बतलाता हुः जिनका भक्तिपूवक
। पालन करके मनुष्य इस पृथ्वीपर सौभाग्यशाली
। होता है। चैत्र कृष्णपक्षकी त्रयोदशी शनिवारसे
। युक्त हो तो “महावारुणी' मानी गयी है। यदि
। उसमे गङ्गा-खानका अवसर मिले तो वह कोरि
| सूर्यग्रहणोसे अधिक फल देनेवाली ह। चैत्रके
, कृष्णपक्षमें त्रयोदशाक। शुभ योग, शतभिषा नक्षत्र
नो [क नी [अ #.
ओर शनिवारका योग हो तो वह " महामहावारुणा
के नामसे विख्यात होती है । जयेष्ठ शुक्ला त्रयोदशीको
'दौ्भस्यशमनव्रत' होता है। उस दिन नदीके
जले खान करके पवित्र स्थानम उत्पन हुए
सफेद मदार, आक ओर लाल कनेरकी पूजा कर ।
उस समय आकाशे सूर्यकी ओर देखकर निप्रा्भित
मन्रका उच्चारण करते हए प्रार्थना करे-
पन्दारकरवीराकां भवन्तो भास्करांशजाः।
पृजिता मम दीभग्विं नाशयन्तु नमोऽस्तु वः ॥
(ना० पूर्वे १२२1 २०-२१)
| [ 1183 1 सं० नाश्घुर शता) ८511५ 8112५५81 \/8/8185 ©@01601011. 0101260 0\/ @©69700ीं
५६४
'मदार। कनेर! ओर आक! आप लोग भगवान्
भास्करके अंशसे उत्पन्न हुए हे । अतः पूजित होकर
मेरे दुर्भाग्यका नाश कर, आपको नमस्कार हे ।'
इस प्रकार जो भक्तिपूर्वक एक-एक वर्षतक
इन तीनों वृक्षोकी पूजा करता हे, उसका दुर्भाग्य
नष्ट हो जाता है । आपाढ शुक्ला त्रयोदशीको एक
समय भोजनका त्रत करे। भगवती पार्वती ओर
भगवान् शङ्कर--इन दोनों जगदीश्वरोको यथाशक्ति
सोने, चाँदी अथवा मिद्ीकी मूतं बनाकर उनकी
पूजा करे। भगवती उमा सिंहपर वैटी हों ओर
भगवान् शङ्कर वृपभपर। नारद ! इन दोनों प्रतिमाओंको
देवमन्दिर, गोशाला अथवा त्राह्मणके घरमे वेदमन्रद्वार
स्थापित करके लगातार पोच दिनतक नित्य पूजन
तथा एक समय भोजनके त्रतका पालन करे।
तदनन्तर अन्तिम दिन प्रातःकाल स्नान करके पुनः
उन दोनों प्रतिमाओंको पजा करे। फिर वेद्-
वेदाङ्गके ज्ञानसे सुशोभित ब्राह्मणको वे दोनों
विग्रह समर्पित कर दे। पांच वर्पोतक प्रतिवर्ष
इसी प्रकार करना चाहिये । पांचवाँ वर्प बीतनेपर
दध दनेवाली दो गौओकि साथ उन दोनों प्रतिमाओंका
((-0. 1\/॥८111101/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
संक्षिप्त नारदपुराण
1
॥
। +
दान करे। स्त्री हो या पुरुष-जो इस प्रकार इस
शुभ त्रतका पालन करता है, वह सात जन्मोंतक
दाम्पत्यसुखसे वञ्चित नहीं होता--उसका दाम्पत्य ,
सम्बन्ध बीचमे खण्डित नहीं होता। |
भाद्रपद शुक्ला त्रयोदशीको ' गोत्रिरातरव्रत' ।
बताया गया है । उस दिन भगवान् लकष्मीनारायणकौ ,
सोने या चदीकी प्रतिमा बनवाकर उसे पञ्ामृतसे
स्नान करावे। तत्पश्चात् शुभ अष्टदल मण्डलमे .
पीठपर उस भगवद्विग्रहको स्थापित करके सुन्दर ।
वस्त्र चढाकर गन्ध आदिसे उसकी पूजा करे। ,
तत्पश्चात् आरती करके अन्न ओर जलसहित ,
घटदान करे। नारद ! इस प्रकार तीन दिनतक सव |
विधिका पालन करके त्रतके अन्तमें गौका पूजन
करे ओर भलीभोंति धनकी दक्षिणा देकर निप्राङ्कित
मन्त्रसे गौको नमस्कारपूर्वक दान दे-
पञ्च गावः समुत्पन्ना मध्यमाने महोदधौ ।
तासां मध्ये तु या नन्दा तस्यै धेन्व नमो नमः॥
(ना० पूर्व० १२२। ३६-३७) ।
"जव क्षीरसमुद्रका मन्थन होने लगा, उस |
समय उससे पाँच गौं उत्यन्न हुई। उनके मध्यमं ,
जो नन्दा नामवाली गौ है, उस धेनुको बारम्बार ¦
नमस्कार है।' |
तदनन्तर नीचे लिखे मन्त्रसे गायकौ प्रदक्षिणा
करके उसे ब्राह्मणको दान दे। (मन्त्र इस ¦
प्रकार है-)
गावो ममाग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पुष्ठतः।
गावो मे पार्तः सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम् ॥
(ना० पूर्व १२२। र
"गौं मेरे आगे रहं, गौं मेरे पीठे ए
गौ मेरे बगलमे रहे ओर मँ गौओंकि वीचम ,
निवास कर्ू।'
तत्पश्चात् ब्राह्मणदम्पतिका पूर्णतः सत्कार “`
उन्हं भोजन करावे ओर उने आदयपूरवक लक्षा
गा
ॐ = जे जक > क दि
.
1
1 । ऋ
#
त
ह
क
।
शः
~, पुनः खान करक मीन आ एकाग्रचिर
क -
पूर्वभाग-चतुर्थं पाद
५६५
नारायणकी प्रतिमा दान करे। सहस्रां अश्मेध ओर
सैकड़ों राजसूय यज्ञोका अनुष्टान करके मनुष्य
जिस फलको पाता हे, उसीको वह गोत्रिरात्रत्रत' से
पा लेता है। आश्विन शुक्ला त्रयोदशीको तीन
राततक “अशोकत्रत' करे। उस दिन नारा
उपवासपरायण हो अशोककौ सुवर्णमयी प्रतिमा
बनवाकर शास्त्रीय विधिसे उसकी प्रतिदिन पूजा
ओर आदरपूर्वक एक सौ आठ परिक्रमा करे । उस
समय इस मन््रका उच्चारण करना चाहिये-
हरेण निर्भितः पूर्वं त्वमशोक कृपालुना।
लोकोपकारकरणस्तत्प्रसीद शिवप्रिय ॥
(ना पूर्व° १२२। ४३)
अशोक! तुम्हे पूर्वकालमे परम कृपालु भगवान्
शङ्करने उत्पन किया हं । तुम सम्मूरणं जगतका
उपकार करनेवाले हो; अतः शिवप्रिय अशाक।
तुम मुञ्जपर प्रसन्न हाआ।
तदनन्तर तीसरे दिन, उस अशोकवृक्षम भगवान्
शङ्करकी विधिवत् पूजा करक ब्राह्मणको भाजन
करावे ओर उसे अशोक-प्रतिमाका दान कर । इस
प्रकार व्रत करनेवाली नारी कभी वेधव्यका करट
नहीं पाती। वह पुत्र-पौत्र आदिके साथ रहक?
अपने पतिकी अत्यन्त प्रियतमा हता ह । कार्तिक
कृष्णा त्रयोदशीको एकाग्रचित्त हा एक समय
भोाजनका त्रत करे। प्रदोपकालमं तलका दीपक
जलाकर उसकी यतूर्वक पूजा कर आर धर
रपर वाहरके भागमें उस दीपकको इस उर्दश्यस
रखे कि इसके दानसे यमराज मुद्षपः प्रसन्न हा।
विप्रन! एसा करनेपर मनुप्यका यमराजका पाड
नहीं प्राप्त होती । द्विजानम ' कार्तिकः णुका त्रयादशाक्रा
मनुप्य एकः समय भाजन करके त्रत रख । प्रदापकालम
काग्रयित्त हा वत्ताम
दीपकीकी पदक्तिसे भगवान् 1
करे। घीसे दीपकोंको जलाये ओर गन्ध आदिसे
भगवान् शिवकौ पूजा करे। फिर नाना प्रकारके
फलों ओर नैवेद्योद्रारा उन्हें संतुष्ट करे। तदनन्तर
निप्रलिखित नामोसे देवेश्वर शिवकी स्तुति करे-
रुदर, भीम, नीलकण्ठ ओर वेधा (स्ट) -को
नमस्कार है। कपदीं (जटा-जूटधारी), सुरेश तथा
व्योमकेशको नमस्कार है। वृषध्वज, सोम तथा
सोमनाथको नमस्कार है। दिगम्बर, भृङ्ग, उमाकान्त
ओर वद्धा (वृद्धि करनेवाले) शिवको नमस्कार
हे । तपोमय, व्याप्त ओर् शिपिविष्ट (तजस्वी). - -
भगवान् शङ्करको नमस्कार है । व्यालप्रिय (सर्पोको
पसंद कसेवाले), व्याल (सर्पस्वरूप) ओर व्यालपति
शिवको नमस्कार है। महीधर (पर्वतरूप), व्योम
(आकाशस्वरूप) ओर पशुपतिको नमस्कार टं।
त्रिपुरहन्ता, सिंह, शार्दूल तथा वृषभको नमस्कार
है। मित, मितनाथ, सिद्ध, परमेष्ठी, वेदगीत, गुम
ओर वेदगुह्य शिवको नमस्कार हे । दीर्घ, दीर्घरूप,
दीर्ार्थ, महीयान्, जगदाधार ओर व्योमस्वरूप
शिवको नमस्कार टै। कल्याणस्वरूप, विशिष्ट-
पुरुप, शष्ट (साधु-महात्मा), परमात्मा गजकृत्तिधर
(वस्त्ररूपसे हाथीका चमड़ा धारण करनवाल,
अन्धकासुरहन्ता भगवान् शिवका नमस्कार ₹६।
नील, लोहित एवं शुक्ल वर्णवालं चण्डमुण्डप्रिय
भक्तिप्रिय, देवस्वरूप, दक्षयज्ञनाशक तथा अविनाशी
शिवको नमस्कार है। महेश! आपको नमस्कार
हे। महादेव! सबका संहार कलेवाले आपकर
नमस्कार है। आपके तीन नेत्र है । आप तीनां वेदकि
आश्रय है । वेदाङ्गस्वरूप आपको बार-वार नमस्कार
हे। आप अर्थं है, अर्थस्वरूप र ओर परमार्थं है
आपको नमस्कार है। विश्वरूप, विश्मय तथा
विश्रनाथ भगवान् शिवको नमस्कार है। जी सत्रका
भयको आलोकित । कल्याण कगनवाल शङ्कर दे, कालस्वरूप है तथा
(-0. 1\/1(11114/5511॥1 2118811 \/8/81185। (01661010. 01411260 0 6081001
५५६६
कालके कला-काषरा आदि छोटे-छोटे अवयवरूप
ठे; जिनका कोड रूप नहीं हे, जिनके विविध रूप
हे तथा जो सुक्ष्मसे भी सुक्ष्म है, उन भगवान्
शिवका नमस्कार दे। प्रभो! आप ्मशानमें
निवास करनेवाले हे, आप चममय वस्त्र धारण
करते हे; आपको नमस्कार हे। आपके मस्तकपर
चन्द्रमाका मुकुट सुशोभित हे, आप भयंकर
भूमिमं निवास करते हे, आपको नमस्कार हे।
आप दुर्गं (कटठिनतासे प्राप्त होने योग्य), दुगपार
( कटिनाइयोंस पार लगानवाले ), दुगावयवसाक्षी
(पावतीजीक अद्ध -प्रत्यद्कका दर्शन करनवाले),
लि ङ्गरूप, लिङ्गमय ओर लिद्भोंके अधिपति दे,
आपको नमस्कार हे। आप प्रभावरूप दे । प्रभावरूप
प्रयोजनके साधक है, आपको बारम्बार नमस्कार
दे। आप कारणोके भी कारण, मृत्युञ्जय तथा
स्वयम्भूस्वरूप हें, आपको नमस्कार दै, नमस्कार
टे। आपके तीन नेत्र हें। शितिकण्ट! आप
तेजकरो निधि हें । गोरीजीके साथ नित्य संयुक्त
रहनेवाले ओर मद्भलके हतुभूत ट, आपको
नमस्कार टे।
विप्रवर! पिनाकधारी महदेवजीके गुर्णोका
प्रतिपादन करनेवाले इन नामका पाठ करके
महादेवजीकी पण्क्रिमा करनेसे मनुष्य भगवान्क
निज धाममं जाता हे। ब्रह्मन्! इस प्रकार त्रत
करके मनुष्य महादेवजीके प्रसादमे इहलोकके
सम्पूर्णं भोग भोगकर अन्तमं शिवधाम प्राप्त कर
लेता ह । पौप शुक्ला त्रयोदशीको अच्युत श्रीहरिका
पूजन करके सव्र मनोरथोंको सिद्धिके लिये श्रष्
ब्राह्मणको घीसे भरा हुआ पात्र दान करे । ब्रह्मन् ।
माघ शुक्ला त्रयोदशीसे लेकर तीन दिनतक
माघ-स्नान' का ब्रत होता हे, जो नाना प्रकारके
संक्षिप्न नारदपुराण
मनोवाच्छित फलको देनेवाला हे। माघ मासमे
प्रयागमे तीन दिन स्नान करनेवाले पुरुषको जो
फल प्राप्त होता हे, वह एक हजार अश्चमेध-यज्ञ
करनेसे भी इस पृथ्वीपर सुलभ नहीं होता । वहां
किया हआ स्नान, जप, होम ओर दान अनन्तगुना
अजथवा अक्षय हो जाता हे। फाल्गुन मासके
शुक्ल पक्षको त्रयोदशीको उपवास करके भगवान्
जगन्नाथको प्रणाम करे। तत्पश्चात् " धनदत्रत'
प्रारम्भ करे। नाना प्रकारके रंगोंसे एक पद्पर
यक्षपति महाराज कुबेरकौ आकृति अद्भित कर
ले ओर भक्तिभावसे गन्ध आदि उपचारोद्रारा
उसको पूजा करे।
द्विजोत्तम! इस प्रकार प्रत्येक मासके शुक्लपक्षकों
त्रयोदशीको मनुप्य कुवेरकी पूजा करे। उस दिन
वह उपवास करके रहे या एक समय भोजन करे ।
तदनन्तर एक वर्पमें त्रतकी समासि होनेपर पुनः
सुवर्णमयी निधियोके साथ धनाध्यक्ष कुबेरको भी
` ची
सुवर्णमयी प्रतिमा बनाकर पञ्चामृत आदि स्नानो,
पोडश उपचारो ओर् भंति-भतिके नैवेद्योसे भक्ति
एवं एकाग्रताके साथ पजन करे। तत्पश्चात् वस्त्र,
माला, गन्धं ओर आभूपणोसे वछृडुसहित शुभ
गोको अलंकृत करके वेदवेत्ता त्राह्मणके लिये
विधिपूर्वकं दान करे । पिर बारह या तेरह ब्राह्यणोको
मिष्टान्न भोजन कराकर वस्त्र आदिसे आचार्यको
पूजा करके पूर्वोक्त प्रतिमा उन्हें अर्पण करे। फिर
ब्राह्मणोको यथाशक्ति दक्षिणा दे, उन्हें नमस्कार
करके विदा करे । इसके वाद बुद्धिमान् पुरुष इष्ट-
बन्धुओके साथ एकाग्रचित्त हो स्वयं भोजन करे।
विप्रवर ! इस प्रकार त्रत पूर्णं करनेपर निर्धन मनुष्य
धन पाकर इस पृथ्वीपर दूसरे कुबेरकी भोति
विख्यात हो आनन्दका अनुभव करता हे ।
१ 1. ~+
((-0. 1/८1114<511॥ 81188 \/81811851 (01661101. 0141260 0 66810011
पूर्वभाग-चतुर्थ पाद ५६७
` वर्षभरके चतुर्दशीव्रतोंकी विधि ओर महिमा
सनातनजी कहते है-- नारद ! सुनो, अव मे | द्विजश्रेष्ठ! इसी प्रकार समस्त कृष्णा चतुर्दशियोमें
तुम्हे चतुर्दशीके व्रत बतलाता हूं, जिनका पालन | धन ओर संतानकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको यह
करके मनुष्य इस लोके सम्पूर्णं कामनाओंको | शिवसम्बन्धी त्रत करना चाहिये। वैशाख शुक्ला
प्राप्त कर लेता हे । चेत्र शुक्ला चतुर्दशीको कुंकुम, | चतुर्दशीको श्रीनृसिंहन्रत' का अनुष्ठान करे । यदि
अगुरु, चन्दन, गन्ध आदि उपचार, वस्त्र तथा | शक्ति हो तो उपवासपूर्वक त्रत करना चाहिये ओर
, मणियोद्वारा भगवान् शिवकी बड़ी भारी पूजा | यदि शक्ति न हो तो एक समय भोजन करके
करनी चाहिये । चंदोवा, ध्वज एवं छत्र आदि करना चाहिये। सायंकालमे देत्यसृदन भगवान्
मातृकाओंका भी पूजन करना चाहिये । विप्रवर! | नृसिंहको पञ्चामृत आदिसे स्नान कराकर पोडशोपचारसे
जो उपवास अथवा एक समय भोजन करके इस | उनकी पूजा करे । तत्पश्चात् इस मन्त्रका उच्चारण
पकार पूजन करता हे, वह मनुप्य इस पृथ्वीपर | करते हए भगवान्से क्षमा-प्रार्थना करे-
अश्वमेध-यन्ञसे भी अधिक पुण्यलाभ करता हे।| तप्तहाटककेशान्त॒ ज्वलत्पाबकलोचन।
इसी तिथिको गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा दमनक- | वन्राधिकनखस्यर्शं दिव्यसिंह नमोऽस्तु ते॥
पूजन करके पूर्णिमाको कल्याणस्वरूप भगवान् (ना० पूर्व० १२३॥। ११)
शिवको सेवामें समर्पित करना चाहिये । वैशाख | "दिव्यसिंह ! आपके अयाल तपाये हुए सोनेके
कृष्णा चतुर्दशीको उपवास करके प्रदोषकालमें | समान दमक रहे है, नेत्र प्रज्वलित अग्निके समान
स्नान करे ओर श्रेत वस्त्र धारण करके विद्वान् पुरुष | दहक रहे है ओर आपके नखोंका स्पर्शं वत्रये भी
गन्ध आदि उपचारो तथा विल्वपत्रोंसे शिवलिद्गको | अधिक कठोर हे, आपको नमस्कार हे।'
पूजा करे। भ्रष्ठ ब्राह्मणको निमन्त्रण देकर उसे | देवेश्वर भगवान् नृसिंहसे इस प्रकार प्रार्थना
` भोजन करानेके बाद दूसरे दिन स्वयं भोजन करे। | करके व्रती पुरुष मिद्रीकौ वेदीपर सोय । इदयं
५ ~ ~ 2/4 | | ओर क्रोधको कावूमे रखे ओर सव प्रकारक
भोगोसे अलग रहे। जो इस प्रकार प्रत्येक वर्पमें
विधिपूर्वकं उत्तम त्रतका पालन करता है, वह
सम्पूर्णं भोगोको भोगकर अन्तमं श्रीहरिके पदको
प्राप्त कर लेता है। मुनीश्र! इसी तिधिको
ॐकरेश्चरवकी यात्रा करनी चाहिये । वहो ॐॐकारेशर्के
पूजनका अवसर दुर्लभ है । उनका दर्शन पापोका
नाश करनेवाला है । ॐकारे श्चरका पजन, ध्यान,
जप ओर दर्शन जो भी हो जाय, वह मनुप्योके
लिये ज्ञान ओर मोक्ष देनेवाला बताया गया है । इस
तिधिको पापनाशक ' लि द्भव्रत ' भी करना चाहिये ।
आटेका शिवलिद्भ बनाकर उसे पञ्चामृतये स्नान
। ~
# ( ॥ ^> ~` च 2 >, +
((-0. 1८111551 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
५५६८
संक्षिप्त नारदपुराण
करावे। फिर उसपर कुंकुमका लेप करे ओर
वस्त्र, आभूपण, धूप, दीप तथा नैवेद्यके द्वारा
उसको पूजा करे। जो इस प्रकार सब मनोरथोंको
सिद्धि प्रदान करनेवाले पिष्टमय शिवलिद्खका
पूजन करता हे, वह महादेवजीको कृपासे भोग
ओर मोक्ष प्राप्त कर लेता हे। ज्येष्ठ शुक्ला
चतुर्दशीको दिनमें पञ्चाग्रिका सेवन करे ओर
सायंकाल सुवर्णमयी धनुका दान करे । यह ' रुद्र-
व्रत" कहा गया हे। जो मनुष्य आपाद शुक्ला
चतुर्दशीको देश-कालमें उत्पन्न हए फूलोद्रारा
भगवान् शिवका पूजन करता है, वह समस्त
सम्पदाओंको प्राप्त कर् लेता हे । द्विजश्रेष्ठ । श्रावण
शुक्ला चतुर्दशीको अपनी शाखामे बतायी हुई
विधिके अनुसार पवित्रारोपण करना चाहिये।
पहले पवित्रकको सौ वार् अभिमन्त्रित करके
देवीको समर्पित करे। स्त्रीदहो या पुरुप यदि वह
पवित्रारोपण करता हे तो महादेवजीके प्रसादसे
भोग एवं मोक्ष प्राप्त कर लेता हे।
भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशीको उत्तम 'अनन्त-
व्रत" का पालन करना चाहिये। इसमें एक समय
भोजन करिया जाता हे। एक सेर गेहंका आरा
लेकर उसे शक्कर ओर घीमं मिलाकर पकावे- पू
तेयार करे ओर वह भगवान् अनन्तको अर्पण करे।
इससे पहले कपास अथवा रेशमके सुन्दर सूतको
चौदह गोठोसे युक्त करके उसका गन्ध आदि
उपचारोसे पूजन करे । फिर पुराने सूतको बवाहमेंसे
उतारकर उसे किसी जलाशयमें डाल दे ओर नये
अनन्त सूत्रको नारी वायं भुजामं ओर पुरुप दायीं
भुजामे बोध ले । आटेका पृ्ा या पिद्री पकाकर
दक्षिणासहित उसका दान करे। फिर स्वयं भी
परिमित मात्रामें उसे भोजन करे। इस प्रकार इस
उत्तम त्रतका चौदह वर्पोतक पालन करना चाहिये ।
इसके बाद विद्वान् पुरुष उसका उद्यापन करे।
मुने! रगे हए चावलोँसे सुन्दर सर्वतोभद्रमण्डल
बनाकर उसमें तोकेका कलश स्थापित करे। उस
कलशके ऊपर रेशमी पीताम्बरसे आच्छादित
भगवान् अनन्तक सुन्दर सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित
करे ओर उसका विधिपूर्वक यजन करे। इसके
सिवा गणेश, मातृका, नवग्रह तथा लोकपालोका
भी पृथक् -पृथक् पूजन करे । फिर हविप्यसे होम
करके पूर्णाहुति दे । द्विजोत्तम ! तत्पश्चात् आवश्यकः
सामग्नियोसहित शय्या, दूध देनेवाली गाय तथा
अनन्तजीको प्रतिमा आचार्यको भक्तिपूर्वक अर्पण
करे ओर दूसरे चोदह ब्राह्मणोको मीठे पकवान
भोजन कराकर उन्हं दक्षिणाद्वारा संतुष्ट करे । इस“
प्रकार किये गये “ अनन्तव्रत ' का जो आदरपूर्वक
प्रत्यक्ष दर्शन करता हे, वह भी भगवान् अनन्तक
प्रसादसे भोग ओर मोक्षका भागी होता हे।
आश्विन कृष्णा चतुर्दशीको विप, शस्त्र, जल,
अग्रि, सर्पं, हिंसक जीव तथा वज्रपात आदिक
द्वारा मरे हए मनुष्यों तथा ब्रह्महत्यारे पुरुपोंक
लिये एकोदिषटकी विधिसे श्राद्ध करना चाहिये
ओर ब्राह्यणवर्गको मिष्टान्न भोजन कराना चाहिये, `
उस दिन तर्पण, गोग्रास, कुक्कुरबलि ओर काकबलि
आदि देकर आचमन करनेके पश्चात् स्वयं भी
भाई- वन्धु ओके साथ भोजन करे। जो इस प्रकार
दक्षिणा देकर श्राद्ध करता है, वह पितरोंका उद्धार ¦
करके सनातन देवलोकमें जाता हे। द्विजश्रष्ठ।
आशिन शुक्ला चतुर्दशीको धर्मराजकी सुवर्णमयी
प्रतिमा बनाकर गन्ध आदिसे उनको विधिवत्
पूजा करे ओर ब्राह्मणको भोजन कराकर उसे वह
प्रतिमा दान कर दे। नारद ! इस पृथ्वीपर धर्मराज
उस दाता पुरुपको रक्षा करते हे। जो इस प्रकार `
धर्मराजकी प्रतिमाका उत्तम दान करता हे, वह
दस लोकमें श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर धर्मराजको
आज्ञासे स्वर्गलोकमं जाता है। कातिक कृष्णा
((-0. 1/८11114<511॥1 8118811 \/8181185।1 (01661101. 0141260 0 68110011
पूर्व भाग-चतुर्थं पाद ५६१९
ब्रह्मकूर्चत्रत' से तत्काल नष्ट हो जाता है । नारद।
उसी दिन “ पापाणत्रत" भी बताया गया है। उसका
परिचय सुनो, दिनमें उपवास करके रातमें भोजन
करे । गन्ध आदिसे गौरी देवीकी पूजा करे ओर उन्हें
घीमें पकायी हई पापाणके जकारकी पिद्री अर्पण
करे। (उसी प्रसादको स्वयं भी ग्रहण करे।) द्विजश्रेष्ठ |
शास्त्रोक्त विधिसे इस व्रतका आचरण करके मनुष्य
एश्र्य, सुख, सोभाग्य तथा रूप प्राप्त करता है।
मार्गशीर्षं शुक्ला चतुर्दशीको शिवजीका त्रत
किया जाता हे। इसमे पहले दिन एक समय
भोजन करना चाहिये ओर त्रतके दिन निराहार
रहकर सुवर्णमय वृषको पजा करके उसे ब्राह्मणको
दान देना चाहिये । तदनन्तर दूसरे दिन प्रातःकाल
उठकर सत्रानके पश्चात् कमलके फूल, गन्ध,
माला ओर अनुलेपन आदिके द्वारा उमासहित
भगवान् महेश्वरकी पूजा करे। उसके बाद ब्राह्म्णोको
मिष्टान्न भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा आदिं
संतुष्ट करे। विप्रवर ! यह शिवत्रत जो करते हं
जो इसका उपदेश देते है, जो इसमें सहायक होते
अनुमोदन करते है, उन सवको यह भोग ओर
मोक्ष प्रदान करनेवाला है । पौष शुक्ला चतुर्दशीको
“विरूपाक्षत्रत' बताया गया है। उस दिन यह
चिन्तन करके कि “भ भगवान् कपर्दीश्चरका
सामीप्य प्राप्त करूगा' अगाध जलम स्नान करे।
विप्रवर ! सरानके पश्चात् गन्ध, माल्य, नमस्कार, धूप,
दीप तथा अन्न-सम्पत्तिके द्वारा विरूपाक्ष शिवका
पूजन करे । वहाँ चद हुई सव वस्तुं त्राह्मणको
देकर मनुष्य देवलोके देवताव्ी भाति आनन्दका
अनुभव करता है । माघ कृष्णा चतुर्दशीको " यमतर्पण'
ताया गया है। उस दिन सर्योादयसे पूर्वे स्नान
करके सव पापोंसे छुटकारा पानेके लिये शम्त्रोक्त
चीदह नामोसे यमका तर्पण करे । तिल, कुशा ओर
जलसे तर्पण करना चाहिये । उसके चाद त्राद्यणोंको
चतुर्दशीको सबेरे चन्द्रोदय होनेपर शरीरमें तेल
ओर उबटन लगाकर स्नान करे। स्रानके पश्चात् वह
धर्मराजको पूजा करे। एेसा करनेसे उस मनुष्यको
नरकसे अभय प्राप्त होता है। प्रदोषकालमें तेलके
दीपक जलाकर यमराजकी प्रसन्रताके लिये चौराहेपर
या घरसे बाहरके प्रदेशमे एकाग्रचित्त हो दीपदान
करे । हेमलम्ब नामक संवत्सरमें श्रीसम्पन्न कार्तिक
मास आनेपर शुक्लपक्षकी चतुर्दशीको अरुणोदयकालमें
भगवान् विश्चनाथजीने अन्य देवताओंके साथ
मणिकर्णिका-तीर्थमें स्नान करके भस्मसे त्रिपुण्ड
तिलक लगाया ओर स्वयं अपने-आपकी पूजा
" करके ' पाशुपत-त्रत' का पालन किया था; अतः वहाँ
गन्ध आदिके द्वारा शिवलिङ्गको महापूजा करनी
चाहिये । द्रोणपुष्प, बिल्वपत्र, अर्कपुष्प, केतकोपुष्प,
भोति-भोतिके फल, मीठे पकवान एवं नाना प्रकारके
नैवेद्योद्रारा उस शिवलिङ्गकी पूजा करनी चाहिये।
नारद! एेसा करके भगवान् विश्वनाथके संतोपके
लिये जो एक समय भोजनका त्रत करता हे, वह
इहलोक ओर परलोकमे मनोवाचज्छित भोगोको
` प्राप्त करता हे । समृद्धिको इच्छा रखनेवाले पुरुषको
उस दिन "ब्रह्यकूर्चव्रत' भी करना चाहिये । दिनमं
उपवास करके रातमें पञ्चगव्य पान करे ओर
जितेन्द्रिय रहे । कपिला गायका मूत्र, काली गौका
“गोवर, सफेद गोका दूध, लाल गायका दही ओर
कवरी गायका घी लेकर एकमे मिला दे । अन्तमं
कुशोदक मिलावे (यही ' पञ्चगव्य ' एवं "ब्रह्मकूर्चं '
ठे, जिसको त्रतके दिन उपवास करके रातमें पीया
जाता हि)। तदनन्तर प्रातःकाल कुशयुक्त जलसं
स्नान करके देवताओंका तर्पण करे ओर ब्राह्यणोको
भोजन आदिसे संतुष्ट करके स्वयं मौन हीकर
भोजन करे । यह "ब्रह्मकूर्चत्रत ' सव पातकांका नाश
करनेवाला है। बाल्यावस्था, कुमारावस्था ओर
वृद्धावस्थामे भी जो पाप किया गया है, वह
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८७०
संक्षिप्त नारदपुराण
खिचडी खिलावे ओर स्वयं भी मौन होकर वही
भोजन करे । द्विजश्रेष्ठ ! फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशीको
शिवरत्रित्रत' बताया गया है। उसमें दिन-रात
निर्जल उपवास करके एकाग्रचित्त हो गन्ध आदि
उपचारोसे तथा जल, बिल्वपत्र, धूप, दीप, नैवेद्य,
स्तोत्रपाठ ओर जप आदिसे किसी स्वयम्भू आदि
लिङ्खको अथवा पार्थिक लिद्गको पूजा करनी
चाहिये । फिर दूसरे दिन उन्दी उपचारोसे पुनः पूजन
करके ब्राह्मणोको मिष्टान्न भोजन करावे ओर दक्षिणा
देकर विदा करे। इस प्रकार त्रत करके मनुष्य
महादेवजीको कृपासे देवताओंद्वारा सम्मानित हो
दिव्य भोग प्राप्त करता हे । फाल्गुन शुक्ला चतुर्दशीको
भक्तिपूर्वक गन्ध आदि उपचारोसे दुर्गाजीकी पूजा
करके ब्राह्मणोको भोजन करावे ओर स्वयं एक
समय भोजन करके रहे। नारद! जो इस प्रकार
दुर्गाका त्रत करता है, वह इस लोक ओर
परलोकमें भी मनोवाज्छित भोगोंको प्राप्त कर
लेता है । चैत्र कृष्णा चतुर्दशीको उपवास करके
केदारतीर्थका जल पीनसे अश्वमेध-यनज्ञका फल
प्राप्त होता हे । सम्पूर्ण चतुर्दशीत्रतोके उद्यापनकी
सामान्य विधि बतायी जाती है) इसमें चोदह
कलश रखे जाते हँ ओर सबके साथ सुपारी, `
अक्षत, मोदक, वस्त्र ओर दक्षिणा-द्रव्य होते हे।
घट तोबिके हों या मिद्रीके, नये हों । टूटे-फूटे नहीं
होने चाहिये । सके चौदह डंडों ओर उतने ही .
पवित्रक, आसन, पात्र तथा यज्ञोपवीतोकी भी ` `
व्यवस्था करनी चाहिये। शेष बातें उन-उन
व्रतोके साथ जेसी कही गयी हैँ, उसी प्रकार करे।
नम 1 १३/२४
बारह महीनोंको पूर्णिमा तथा अमावास्यासे सम्बन्ध रखनेवाले व्रतो तथा
सत्कर्मोको विधि ओर महिमा
सनातनजी कहते है नारद! सुनो, अव मेँ तुमसे | करके अमृतके समान मधुर जलसे वयवृक्षको
पूर्णिमाके ्रर्तीका वर्णन करता हूँ जिनका पालन करके | सींचे ओर सूतसे उस वृक्षको एक सौ आठ वार
स्त्री ओर पुरुष सुख ओर संतति प्राप्त करते है। विप्रवर
चैत्रकी पूर्णिमा मन्वादि तिथि कही गयी है। उसमे
चन्द्रमाकी प्रसन्नताके लिये कच्चे अन्नसहित जलसे
भरा हुआ घट दान करना चाहिये। वैशाखकी पूर्णिमाको
ब्राह्मणको जो-जो द्रव्य दिया जाता है, वह सब दाताको
निश्चितरूपसे प्राप्त होता है। उस दिन ' धर्मराजव्रत'
कहा गया है । वेशाखकी पूर्णिमाको ऋ त्राह्मणके लिये
जलसे भय हआ घट ओर पकवान दान करना चाहिये।
वह गोदानका फल देनेवाला होता है ओर उससे
धर्मराज संतुष्ट होते हें । जो स्वच्छ जलसे भरे हए
कलशोका श्रेष्ठ ब्राह्मणको सुवर्णे साथ दान करता
हे, वह कभी शोकमें नहीं पड़ता । ज्येष्टकी पूर्णिमाको
वट-सावित्री ' का त्रत होता है। उस दिन स्त्री उपवास
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पूर्वभाग-चतुर्थ पाद
५७१
प्रदक्षिणापूर्वक लपेटे। तदनन्तर परम |
सावित्रीदेवीसे इस प्रकार प्रार्थना करे-
जगत्पूज्ये जगन्मातः सावित्रि पतिदेवते।
पत्या सहावियोगं मे वटस्थे कुरु ते नमः॥
(ना० पूर्व १२४। ११)
"जगन्माता सावित्री । तुम सम्पूर्णं जगत्के लिये
पूजनीय तथा पतिको ही इष्टदेव माननेवाली
पतिव्रता हो। वटवृक्षपर निवास करनेवाली देवि।
तुम एेसी कृपा करो, जिससे मेरा अपने पतिके
साथ नित्यसंयोग बना रहे । कभी वियोग न हो।
तुम्हें मेरा सादर नमस्कार हे।'
जो नारी इस प्रकार प्रार्थना करके दूसरे दिन
सुवासिनी स्त्रियोको भोजन करानेके पश्चात् स्वयं
भोजन करती है, वह सदा सौभाग्यवती बनी रहती
हे! आपाढकी पूर्णिमाको 'गोपद्यव्रत' का विधानं
है। उस दिन स्नान करके भगवान् श्रीहरिके
स्वरूपका इस प्रकार ध्यान करे-भगवान्के चार
भुजां हें । उनका शरीर विशाल है। उनको
अद्गकान्ति जाम्बूनद सुवण समान श्याम हे ।
~. शह, चक्र, गदा, पद्म, लक्ष्मी तथा गरुड़ उनको
शोभा बढा रहे हैँ तथा देवता, मुनि, गन्धर्व, यक्ष
ओर किन्नर उनकी सेवमें लगे हं। इस प्रकार
श्रीहरिका चिन्तन करके गन्ध आदि उपचारोद्रारा
- पुरुषसूक्तके मन्त्रोसे उनको पूजा करे । तत्पश्चात्
वस्त्र ओर आभूषण आदिके द्वारा आचार्यको संतुष्ट
करे ओर स्रेहयुक्त हदयसे आचार्य तथा अन्यान्य
ब्राह्मणको यथाशक्ति मीटे पकवान भोजन करावे ।
विप्रवर! इस प्रकार व्रत करके मनुष्य कमलापतिके
प्रसादसे इहलोक ओर परलोकके भोगोंको प्राप्त
कर लेता है।
श्रावण मासकी पूर्णिमाको 'वेदोका उपाकर्म'
बताया गया है। उस दिन यजुर्वेदी द्वि्जोको
देवताओं, ऋषियों तथा पितरोका तर्पण करना
चाहिये। अपनी शाखा बतायी हई विधिके
अनुसार ऋषियोंका पूजन भी करना चाहिये।
ऋग्वेदियोंको चतुर्दशीके दिन तथा सामवेदियोंको
भाद्रपद मासके हस्त नक्षत्रम विधिपूर्वक “रक्षा-
विधान ' करना चाहिये । लाल कपड़के एक भागमें
सरसों तथा अक्षत रखकर उसे लाल रंगके डोरेसे
बध दे, इस प्रकार बनी हुई पोटली ही रक्षा दै
उसे जलसे सीचकर कांसके पात्रे रखे। उसीमें
गन्ध आदि उपचारोद्रारा श्रीविष्णु आदि देवताओंको
पूजा करके उनकौ प्रार्थना करे। फिर ब्राह्मणको
नमस्कार करके उसीके हाथसे प्रसन्नतापूर्वक अपनी
कलाईमे उस रक्षापोरलिकाको वधा ले। तदनन्तर
ब्राह्मणको दक्षिणा दे वेदोका स्वाध्याय करे तथा
सप्र्षियोंका विसर्जन करके अपने हाथसे बनाकर
कुंकुम आदिसे रंगे हए नूतन यजोपवीतको धारण
करे । यथाशक्ति श्रेष्ठ ब्राह्मणोको भोजन कराकर
स्वयं एक समय भोजन करे । विप्रवर ! इस त्रतके
कर लेनेपर वर्षभर वैदिक कर्म यदि भूल गया हो,
विधिसे हीन हुआ हो या नहीं कियागयाहो तो
वह सव भली भांति सम्पादित हो जाता है। भाद्रपद
मासकी पूर्णिमाको 'उमामाहे श्रव्रत' किया जाता
है । उसके लिये एक दिन पहले एक समय भोजन
करके रहे ओर शिव-पार्वतीका यत्नपूर्तक पूजन
करके हाथ जोड प्रार्थना करे-' प्रभो! मं कल त्रत
करूंगा ।' इस प्रकार भगवानूसे निवेदन करके उस
उत्तम व्रतको ग्रहण करे। रातमें देवताके समीप
शयन करके रातके पिछले पहरमें उटे। फिर
संध्या-वन्दन आदि नित्यकर्म करके भस्म तथा
रुद्राक्षकी माला धारण करे । तत्पश्चात् उत्तम गन्ध,
विल्वपत्र, धृप, दीप ओर नैवेद्य आदि विभिन्न
उपचारोद्रारा विधिपूर्वक भगवान् शङ्करको पूजा
करे। उसके वाद सबेरेसे लेकर प्रदोपकालतकं
विद्वान् पुरुप उपवास करे । चन्द्रोदय होनेपर
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८५४७२
संक्षिप्त नारदपुराण
पुनः पूजा करके वहीं देवताके समीप रातमें
जागरण करे।
इस प्रकार प्रतिवर्षं आलस्य छोडकर पंद्रह
वर्पोतक इस त्रतका निर्वाह करे। उसके बाद
विधिपूर्वक त्रतका उद्यापन करना चाहिये। उस
समय भगवती उमा ओर भगवान् शङ्करकी सुवर्णमयी
दो प्रतिमां बनवावे। यथाशक्ति सोने, चाँदी, तवि
अथवा मिद्रीके पंद्रह उत्तम कलश स्थापित करे।
वहां एक कलशके ऊपर वस्त्रसहित दोनों प्रतिमाओंकी
स्थापना करनी चाहिये । उन प्रतिमाओंको पञ्चामृत
स्नान कराकर फिर शुद्ध जलसे नहलाना चाहिये ।
तदनन्तर पोडशोपचारसे उनको पूजा करनी चाहिये।
इसके बाद पंद्रह ब्राह्यणोंको मिष्टान्न भोजन करावे
ओर उन्हें दक्षिणा तथा एक-एक कलश दे।
भगवान् शङ्करको मूर्तिसे युक्त कलश आचार्यको
अर्पण करे। इस प्रकार “उमामाहेश्वरत्रत' का पालन
करके मनुष्य इस पृथ्वीपर विख्यात होता है । वह
समस्त सम्पत्तियोंको निधि बन जाता है। उसी
दिन “शक्रत्रत' का भी विधान किया गया हे। उसमें
प्रातःकाल स्नान करके विधिपूर्वकं गन्ध आदि
उपचारो तथा नेवेद्य-राशियोंसे देवराज इन्द्रकी
पूजा करे। फिर निमन्त्रित ब्राह्यणोंको विधिवत्
भोजन कराकर वहां आये हुए दूसरे लोगोंको तथा
दीनों ओर अना्थोको भी उसी प्रकार भोजनं
करावे। विप्रवर ! धनधान्यकी सिद्धि चाहनेवाले
राजाको अथवा दूसरे धनी लोगोंको प्रतिवर्षं यह
` शकत्रत' करना चाहिय ।
आशिन मासक पूर्णिमाको ' कोजागरत्रत' कहा
गया है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके उपवास
करे ओर जितेन्द्रिय भावसे रहे। तवि अथवा
मिटरीके कलशपर वस्त्रसे ढकी हई सुवर्णमयी
लक्ष्मीप्रतिमाको स्थापित करके भिन्न-भिन्न उपचारोसे
उनकी पजा करे 1 तदनन्तर सायंकालमे चन्द्रोदय
होनेपर सोने, चांदी अथवा मिटरीके घृतपूर्णं एक
सो दीपक जलावे। इसके बाद घी ओर शक्र
मिलायी हई बहुत-सी खीर तैयार करे ओर
बहुत-से पात्रोमें उसे ढालकर चन्द्रमाकी चोदनीमें
रखे । जब एक पहर बीत जाय तो लक्ष्मीजीको
वह सब अर्पण करे। तत्पश्चात् भक्तिपूर्वकं ब्राह्यणोको
वह खीर भोजन करावे ओर उनके साथ ही
माङ्गलिक गीत तथा मङ्गलमय कार्योद्वारा जागरण
करे। तदनन्तर अरुणोदय-कालमें स्नान करके
लक्ष्मीजीको वह स्वर्णमयी मूर्तिं आचार्यको अर्पित
करे। उस रातमें देवी महालक्ष्मी अपने कर- `
कमलोमे वर ओर अभय लिये निशीथ कालमे `
संसारमें विचरती है ओर मन-ही-मन संकल्प
करती हँ कि "इस समय भूतलपर कोन जाग रहा
हे ? जागकर मेरी पूजाम लगे हुए उस मनुष्यको
मे आज धन दूगी ।' प्रतिवर्षं किया जानेवाला यह
व्रत लक्ष्मीजीको संतुष्ट करनेवाला है। इससे प्रसन्न
हुई लक्ष्मी इस लोकमें समृद्धि देती है ओर
शरीरका अन्त होनेपर परलोकमें सद्रति प्रदान
करती हे। कार्तिककी पूर्णिमाको ब्राह्यणत्वको
प्रापि ओर सम्पूर्ण शत्रुओंपर विजय पानेके लिये
कार्तिकेयजीका दर्शन करे। उसी तिथिको प्रदोषकालमं
दीपदानके द्वारा सम्पूर्णं जीवोके लिये सुखदायक
त्रिपुरोत्सव' करना चाहिये। उस दिन दीपका `
दर्शन करके कीट, पतंग, मच्छर, वृक्ष तथा जल
ओर स्थलमें विचरनेवाले दूसरे जीव भी पुनर्जन्म
नहीं ग्रहण करते; उन्हें अवश्य मोक्ष होता हे।
ब्रह्मन्! उस दिन चन्धोदयके समय छहां कृत्तिकाओंकौ
खद्गधारी कार्तिकेयकी तथा वरुण ओर अग्निकौ
गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, प्रचुर नैवेद्य, उत्तम अन्न,
फल तथा शाक आदिके द्वारा एवं होम ओर
ब्राह्मणभोजनके द्वारा पूजा करनी चाहिये। इस
प्रकार देवताओंकी पूजा करके घरसे बाहर दीप-
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पूर्वभाग-चतुर्थं पाद ५७३
दान करना चाहिये । दीपकोके पास ही एक
चौकोर गडा खोदे। उसकी लंबाई- चौडाई ओर
गहराई चौदह अंगुलकी रखे । फिर उसे चन्दन
ओर जलसे सीचे। तदनन्तर उस गङ़को गायके
दूधसे भरकर उसमें स्वङ्धसुन्दर सुवर्णमय मत्स्य
डाले। उस मत्स्यके नेत्र मोतीके बने होने चाहिये ।
फिर ' महामत्स्याय नमः' इस मन्त्रका उच्चारण
करते हुए गन्ध आदिसे उसकी पूजा करके
ब्राह्मणको उसका दान कर दे । द्विजश्रेष्ठ ! यह मेने
तुमसे क्षीरसागर-दानकी विधि बतायी है। इस
दानके प्रभावसे मनुष्य भगवान् विष्णुके समीप
आनन्द भोगता हे । नारद ! इस पूर्णिमाको वृषोसर्गत्रत'
तथा 'नक्तव्रत' करके मनुष्य रुद्रलोक प्राप्त कर
लेता हे।
मार्गशीर्ष मासक पूर्णिमाके दिन शान्त स्वभाववाले
ब्राह्मणको सुवर्णसहित एक आढकः नमक दान
करे। इससे सम्पूर्णं कामनाओंकौ सिद्धि होती हे।
मनुष्य पूर्णिमाको पुष्यका योग होनेपर सम्पूर्ण
सोभाग्यकौ वृद्धिके लिये पीली सरसोके उबटनसे
' अपने शरीरको मलकर सर्वोषधियुक्त जलसे सान
करे। सरानके पश्चात् दो नूतन वस्त्र धारण करे।
फिर माङ्गलिक द्रव्यका दर्शन ओर स्पर्शं कर
विष्णु, इन्द्र, चन्द्रमा, पुष्य ओर वृहस्पतिको
नमस्कार करके गन्ध आदि उपचारोंद्रारा उनकी
पूजा करे। तदनन्तर होम करके ब्राह्य्णोको खीरके
भोजनसे तृप्त करे। विप्रवर! लक्ष्मीजीको प्रीति
बढानेवाले ओर दरिद्रताका नाश करनेवाले इस
व्रतको करके मनुष्य इहलोक ओर परलोके
आनन्द भोगता है । माघकी पूर्णिमाके दिन तिल,
सूती कपडे, कम्बल, रल, कंचुक, पगड़ी, जते | कार्तिकी अमावास्याकौ गोशाला, बगीचा, पोखर, नदी,
आदिका अपने वैभवके अनुसार दान करके बाजार आदिमे दीपदान
१. चार सेरके बराबरका एक तौल।
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८५७
मनुष्य स्वर्गलोकमें सुखी होता है । जो उस दिन
भगवान् शङ्करकी विधिपूर्वक पूजा करता हे,
वह अश्चमेध-यन्ञका फल पाकर भगवान् विष्णुके
लोकमें प्रतिष्ठित होता है । फाल्गुनकौ पूर्णिमाको
सव प्रकारके काष्टं ओर उपलों (कंडों)-का
संग्रह करना चाहिये। वहां रक्षोघ्र-मन्त्रोद्रारा
अग्रिमे विधिपूर्वक होम करके होलिकापर काठ
आदि फेककर उसमें आग लगा दे। इस प्रकार
दाह करके होलिकाकी परिक्रमा करते हए
उत्सव मनावे। यह होलिका प्रह्ादको भय
देनेवाली राक्षसी हे । इसीलिये गीत-मङ्गलपूर्वक
काष्ट आदिक द्वारा लोग उसका दाह करते हं ।
विप्रेन्द्र ! मतान्तरमें यह “ कामदेवका दाह ' हे ।
पक्षान्त-तिथियों दो होती हँ - पूर्णिमा तथा
अमावास्या। दोनोंके देवता पृथक्-पृथक् हं ।
अतः अमावास्याका व्रत पृथक् बतलाया जाता
हे । नारद ! इसे सुनो । यह पितरोंको अत्यन्त प्रिय
हे । चेत्र ओर वैशाखको अमावास्याको पितरोंकी
पूजा, पार्वणविधिसे धन-वेभवके अनुसार श्राद्ध,
ब्राह्मणभोजन, विशेषतः गो आदिका दान-ये सव
कार्य सभी महीनोको अमावास्याको अत्यन्त
पुण्यदायक बताये गये हें। नारद! ज्येष्टकी
अमावास्याको ब्रह्मसावित्नरीका त्रत बताया गया
हे । इसमे भी ज्येषटकी पूणिमाके समान ही सव
विधि कही गयी हे। आषाढ, श्रावण ओर भाद्रपद
मासमे पितृश्राद्ध, दान, होम ओर देवपूजा आदि
कार्य अक्षय होते ह । भाद्रपदकी अमावास्याको
संक्षिप्त नारदपुराण
अपरा्नमे तिलके खेतमे पैदा हए कुशोंको
ब्रह्माजीके मन्त्रसे आमन्त्रित करके "हुं फट्"
का उच्चारण करते हए उखाड़ ले ओर उन्हे
सदा सव कार्योमिं नियुक्त करे ओर दूसरे
कुशोंको एक ही समय काममें लाना चाहिये।
आशध्िनकी अमावास्याको विशेषरूपसे गङ्खाजीके
जलमें या गयाजीमें पितरोंका श्राद्ध-तर्पण करना
चाहिये; वह मोक्ष देनेवाला है। कार्तिककौ `
अमावास्याको देवमन्दिर, घर, नदी, बगीचा,
पोखरा, चैत्य वृक्ष, गोशाला तथा बाजारमें दीपदान
ओर श्रीलक्ष्मीजीका पूजन करना चाहिये । उस.
दिन गोओकि सींग आदि अङ्खोमें रंग लगाकर उन्हें `
घास ओर अन्न देकर तथा नमस्कार ओर प्रदक्षिणा
करके उनकी पूजा कौ जाती है। मार्गशीर्षक
अमावास्याको भी श्राद्ध ओर ब्राह्यणभोजनके
द्वारा तथा ब्रह्मचर्य आदि नियमों ओर जप,
होम तथा पूजनादिके द्वारा पितरोंकौ पूजा कौ
जाती है। विप्रवर। पौष ओर माघमे भी
पितृश्राद्धका फल अधिक कहा गया हे । फाल्गुनकां
अआमावास्यामे श्रवण, व्यतीपात ओर सूर्यका योग
होनेपर केवल श्राद्ध ओर ब्राह्मणभोजन गयासे अधिक
फल देनेवाला होता है । सोमवती अमावास्याको
किया हुआ दान आदि सम्पूर्णं फलोंको देनेवाला
हे। उसमें किये हए श्राद्धका अधिक फल है।
मुने! इस प्रकार मेने तुम्हें संक्षेपसे तिधिकृत्य
बताया है। सभी तिथियोमें कुछ विशेष विधि हं
जो अन्य पुराणोमें वर्णित हे।
१. निमन्त्रणसम्बन्धी ब्रह्माजीका मन्त्र इस प्रकार ह-
विरञ्िना सहोत्पत्ना परमेटित्रिसर्गज। नुद सर्वाणि पापानि दभं स्वस्तिकरा भव ॥
दर्भ! तुम ब्रह्माजीके साथ उत्पन्न हुए हो, मराक्षात् परमेष्ठ ब्र्माके स्वरूप हौ ओर तुम स्वभावतः प्रकट हुए हा । दमाद् `
सव्र पराप हर लौ ओर हमारे लियं कल्याणकारी बनी।
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पूर्वभाग-चतुर्थ पाद
५७५
सनकादि ओर नारदजीका प्रस्थान, नारदपुराणके माहात्म्यका वर्णन ओर
पूर्वभागवकी समाति
श्रीसूतजी कहते है- महर्षयो ! देवर्पि |
प्रश्न करनेपर उन्हे इस प्रकार उपदेश देकर वे सनकादि
चाये कुमार जो शास्त्रवेत्ताओमिं श्रेष्ठ है नारदजीसे पूजित
हो, संध्या आदि नित्यकर्म कके भगवान् शङ्करके लोकमें
चते गये। वहाँ देवताओं ओर दानवेकि अधीश्वर जिनके
चरणारविन्दोमे मस्तक ज्मुकाते हे, उन महेश्चरको प्रणाम
करके उनकी आनज्ञासे वे भूमिपर वेठे। तदनन्तर सम्पूर्ण
शास्त्रीके सारको, जो अज्ञानी जीवके अज्ञानमय
बन्धनको खोलनेवाला हे, सुनकर वे ज्ञानघनस्वरूप
कुमार भगवान् शिवको नमस्कार करके अपने पिताक
समीप चले गये। पिताके चरणकमलोमें प्रणाम
करके ओर उनका आशीर्वाद लेकर वे आज भी
सम्पूर्णं लोकोके तीथेमिं सदा विचरते रहते हे।
वास्तवमें वे स्वयं ही तीर्थस्वरूप हें । ब्रह्मलोकसे
वे बदरिकाश्रम-तीर्थमें गये ओर देवेश्वरसमुदायसे
सेवित भगवान् विष्णुके उन अविनाशी चरणारविन्दोका
चिरकालतक चिन्तन करते रहे; जिनका वीतराग
संन्यासी ध्यान कसते हे। ब्राह्मणो! तत्पश्चात् नारदजी भी
सनकादि कुमारोसे मनोवाच्छित ज्ञान-विज्ञान पाकर
उस गङ्गातटसे उठकर पिताके निकट गये ओर प्रणाम
करके खड रहे। फिर पिता ब्रह्माजीके द्वारा आज्ञा
मिलनेपर वे वैठे। उन्होने कुमारोसे जो ज्ञान-विज्ञान
श्रवण किया था, उसका ब्रह्मजीके समीप यथार्थरूपसे
वर्णन किया। उसे सुनकर ब्रह्माजी वड प्रसन्न हुए । इसके
बाद ब्रह्माजीके चरणे मस्तक दुकाकर आशीर्वाद लं
मुनिवर नारद मुनिसिद्ध-सेवित केलास पर्वतपर आये।
वह पर्वत नाना प्रकारके आश्चर्यजनक दृश्यसे भय हुआ
था। सिद्ध ओर किन्नरोने उस पर्वतको व्याप्त कर् रखा
था। जह सुन्दर स्वर्णमय कमल लिखे हृए् है, एये
स्वच्छ जलसे भरे हए सरेवर उस शैलशिखस्की शोभा
वदते हे। गद्गाजीके प्रपातकी कलकल ध्वनि वहां
सव ओर गूंजती रहती हे। कैलासका एक-एक
शिखर सफेद बादलोके समान जान पड़ता है। उसी
शिखरपर काले मेघके समान श्यामवर्णका एक
वरवृक्ष हे, जो सौ योजन विस्तृत है। उसके नीचे
योगियोकी मण्डलीके मध्यभागमें जयजृटधारी भगवान्
त्रिलोचन बाघाम्बर ओद हृए बैठे थे। उनका साय
अङ्ग भस्माङ्गरागसे विभूषित हो रहा था। नागेकि
आभूषण उनको शोभा बद्ाते थे। ब्राह्मणो! स्द्राक्षकी
मालासे सदा शोभायमान भगवान् चन्द्रशेखरको देखकर
नारदजीने भक्तिभावसे नतमस्तक हो उन जगदीश्वरके
चरणेमें सिर रखकर प्रणाम किया ओर प्रसन्न मनये
उन श्रीवृपध्वज शिवका स्तवन किया, तदनन्तर
भगवान् शिवकी आशज्ञासे वे आसनपर वैट। उस
समय योगियोने उनका वड़ा सत्कार किया। जगद्गुरु
सदाशिवने नारदजीकी कुशल पष्छी । नारदजीने
कहा- भगवन् आपके प्रसादसे सब कुशल है।
ब्राह्मणो! फिर सव योगियोके सुनते हए नार्दजीने
पशुओं (जीवों) -के अज्ञानमय पाशको द्युडनेवालं
पाशुपत (शाम्भव) ज्ञानके विषयमं प्रश्न किया। तव
शरणागतवत्सल भगवान् शिवने उनको भक्तिसे संतुष्ट
हो उनसे आदपूर्वक अष्टाङ्ग शिव-योगका वर्णन
किया। लोककल्याणकारी भगवान् शद्भरसे शाम्भवे
ज्ञान प्राप्त करके प्रसन्नचित्त हो नारदजी बदरिकाश्रममं
भगवान् नारायणके निकट गये। सदा आने-जानेवाले
देवर्षिं नारदे वर्ह भी सिद्धां ओर योगियोमे मेवित
भगवान् नारायणको बारम्बार सतुष किया।
ब्राह्मणो ! यह नारदमहापुराण टै, जिसका मनि
तुम्हे समक्ष वर्णन क्रिया टे। सम्पूर्ण शास्त्रौका
दिग्दर्शन करानेवाला यह उपाख्यान वेदक समान
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 8118811 \/8181185। (01661010. 01411260 0 8810011
५७६ संक्षिप्त नारदपुराण
मान्य हे। यह श्रोताओके जानकी वृद्धि करनेवाला हे।
विप्रगण। जो इस नारदीय महापुराणका शिवालयमे,
रेष्ठ द्विजेके समाजमें, भगवान् विष्णुके मन्दिरमे
मथुरा ओर प्रयागमे, पुरुषोत्तम जगननाथजीके समीप,
सेतुबन्ध रामेश्चरमे, काञ्ची, द्वारका, हरद्वारं ओर
कुशस्थलमे, त्रिपुष्कर तीर्थमे, किसी नदीके तटपर
अथवा ज्हा-कहीं भी भक्तिभावसे कीर्तन करता हे
वह सम्पूर्णं यजो ओर तीर्थोका महान् फल पाता हे।
सम्पूर्णं दानों ओर समस्त तपस्याओंका भी पृरा-पूरा
फल प्राप्त कर लेता है। जो उपवास करके या हविष्य
भोजन करके इन्द्रियोको कावूमें रखते हए भगवान्
नारायण या शिवक्को भक्तिमं तत्पर हो इस पुराणका
श्रवण अथवा प्रवचन करता है, वह सिद्धि पाता टे।
इस पुराणम सव प्रकारके पुण्यो ओर सिद्धियोके
उद्धरवका वर्णन किया गया हे, जो सदा पढने ओर
सुननेवाले पुरुपोके समस्त पापांका नाश करनेवाला
हे। यह मनुप्योके कलिसम्बन्धी दोपको हर लेता है
ओर सव सम्पत्तियोकी वृद्धि करता हे। यह सभीको
अभीष्ट हे। यह तपस्या, त्रत ओर उनके फलोका
प्रकाशक हे। मन्त्र, यन्त्र, पृथक् -पृथक् वेदाद्ध,
आगम, सांख्य ओर वेद-सवका इसमें संक्षये
संग्रह किया गया हे। इस वेदसम्मित नारदीय
महापुराणका श्रवण करके धन, रत्न ओर वस्त्र
आदिके द्वारा भक्तिभावसे पुराणवाचक आचार्यकी
पजा करनी चादिये। भृमिदान, गोदान, रत्रदान तथा
हाथी, घोड़े ओर रथके दानसे आचार्यको सदेव संतुष्ट
करना चाहिये। ब्राह्यणो ! यह पुराण धर्मका संग्रह
करनेवाला तथा धमं, अर्थ, काम ओर मोक्ष- चारो
पुरुपार्थोको देनेवाला है। जो इसकी व्याख्या करता है,
उसके समान मनुष्योका गुरु दूसरा कौन हो सकता हे।
शरीर, मन, वाणी ओर धन आदिके द्वारा सदा
धर्मोपदेशक गुरुक्का प्रिय करना चाहिये । इस पुराणको
विधिपूर्वक सुनकर देवपूजन ओर हवन करके सौ
ब्राह्मणोको मिठाई ओर खीरका भोजन कराना चाहिये
तथा भक्तिभावसे उन्हें दक्षिणा देनी चाहिये; क्योकि
भगवान् माधव भक्तिसे ही संतुष्ट होते हं। जसे
नदियोमें गङ्का, सरोवयेमे पुष्कर, पुरियोमे काशीपुरी,
पर्वतोमे मेरु, तीनों देवताओं सबका पाप हरनेवाले
भगवान् नारायण, युगोमें सत्ययुग, वेदोमें सामवेद,
पशुओमें धेनु, वर्णेमिं ब्राह्मण, देने योग्य तथा पोषक
वस्तुओमें अन्न ओर जल, मासेमें मार्गशीर्ष, मृगेपिं `
सिंह, देहधारियेमें पुरुष, वृक्षम पीपल, दैत्योमे
प्रह्ाद, अद्खोमे मुख, अश्वोमें उच्चैःश्रवा, कऋ्तुओपें
तसन्त, यज्ञोमें जपयक्ञ, नागमे शेष, पितरम अर्यमा, ,
अस्त्रम धनुष, वसुओमिं पावक, आदित्ये विष्णु. ¦
देवताओमे इन्द्र, सिद्धोमे कपिल, पुरोहितोमें वृहस्पति,
कवियेमें शुक्राचार्य, पाण्डवेमे अर्जुन, दास्य-भक्तोमें
हनुमान्, तृणेमें कुश, इद्धियोमे मन (चित्त), गन्धर्वोमिं
चित्ररथ, पुष्पम कमल, अप्सराओमें उर्वशी तथा
धातुओंमें सुवर्ण श्रेष्ठ है । जिस प्रकार ये सब वस्तुं
अपने सजातीय पदाथमिं श्रेष्ठ हें, उसी प्रकार
पुराणोमे श्रीनारदमहापुराण श्रेष्ठ कहा गया है।
द्विजवरो! आप सब लोगोंको शान्ति प्राप्त हो, आपका
कल्याण हो। अव मं अमित तेजस्वी व्यासजीके
समीप जार्गा।
एेसा कहकर सृतजी शौनक आदि महात्माओंसे
पूजित हो उन सव्रकी आज्ञा लेकर चले गये। वे
शोनक आदि द्विज श्रेष्ठ महात्मा भी जो यज्ञानुष्ठानमं
लगे हुए थे, एकाग्रचित्त हो सुने हए समस्त
धर्मोकि अनुष्टानमें तत्पर हो, वहीं रहने लगे। जो
कलिके पाप-विषका नाश करनेवाले श्रीहरिके
जप ओर पृजन-विधिरूप ओषधका सेवन करता
हे, वह निर्मल चित्तसे भगवान्के ध्यानमें लगकर
सदा मनोवाच्छित लोक प्राप्त करता ठहै।
4 + 7
॥ पूर्वभाग समाप्त ॥
॥ [वि । 1 ची
21 1 +
((-0. 1/(11114<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 0141260 0 6810011
32
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
्रोन्एर्दमहपुरण्ण्
ॐततरभाग
महिं वसिष्ठका मान्धाताको एकादशीव्रतकी महिमा सुनाना
गया है । वह भूत, वर्तमान अथवा भविष्य कैसा
ही क्योंन हो, किस अग्रिसे दग्ध हो सकता है?
यह जानना मुद्धे अभीष्ट है।
पान्तु वो जलदश्यामाः शाज्याधातकर्कशाः।
त्रलोक्यमण्डपस्तम्भाश्चत्वारो हरिबाहवः॥ १।
“जो मेघके समान श्यामवर्णं हे, शार््गधनुषकी
प्रत्यञ्चाके आघात (रगड)-से कठोर हो गयी हें
तथा त्रिभुवनरूपी विशाल भवनको खड रखनेके
लिये मानो खंभेके समान हे, भगवान् विष्णुको वे
चारों भुजाएं आप लोगोकी रक्षा करें ।'
सुरासुरशिरोरल्रनिधृष्टमणिरञ्जितम् ।
हरिपादाम्बुजद्रन्द्रमभीष्टप्रदमस्तु नः ॥२॥
भगवान् श्रीहरिके वे युगल चरणारविन्द
हमारे अभीष्ट मनोरथोंको पूर्तिं करे, जो देवताओं
ओर असुरोके मस्तकपर स्थित रत्नमय मुकुटकौ
धिसी हुईं मणियोसे सदा अनुरञ्जित रहते हं ।'
मान्धाताने ( वसिष्ठजीसे ) पृषछा-- द्विजोत्तम!
जो भयंकर पापरूपी सूखे या गीले ईधनको जला
सके, एेसी अग्नि कौन है? यह वतानेको कृपा
करें। ब्रह्मपुत्र! विप्र-शिरोमणे! तीनों लोकें
त्रिविध पाप-तापके निवारणका कोई भी एसा
वसिषएटजी बोले- नृपश्रेष्ठ ! सुनो, जिस अपग्रिसे
सुनिश्चित उपाय नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो । | ' शुष्क" अथवा “ आर्द्र ' पाप पूर्णतः दग्ध हो सकता
अज्ञानावस्थामें किये हुए पापको “शुष्क ओर | है, वह उपाय बताता दहूं। जौ मनुष्य भगवान्
जान-वूञ्जकर किये हुए पातकको "आद्र" कहा । विष्णुके दिन (एकादशी तिथि) आनेपर जितेद्धिय
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 6810011
५५७८
हो उपवास करके भगवान् मधुसूदनकी पूजा करता
हे, ओंवलेसे स्नान करके रातमें जागता है, वह
पापोंको धो बहा देता है । राजन्! एकादशी नामक
अग्रिसे, पातकरूपी ईधन सो वर्षसि संचित हो तो
भी शीघ्र ही भस्म हो जाता हे। नरेश्वर! मनुष्य जबतक
भगवान् पद्मनाभके शुभदिवस- एकादशी तिथिको
उपवासपूर्वक त्रत नहीं करता, तभीतक इस शरीरमें
पाप ठहर पाते ह । सहस्रां अश्वमेध ओर सेकडों
राजसूय यज्ञ॒ एकादशीत्रतको सोलहवीं कलाके
बराबर भी नहीं हो सकते । प्रभो ! एकादश इन्दियोद्रारा
जो पाप किया जाता है, वह सव-का-सव
एकादशीके उपवाससे नष्ट हो जाता है । राजन्।
यदि किसी दूसरे बहानेसे भी एकादशीको उपवास
कर लिया जाय तो वह यमराजका दर्शन नहीं होने
देती । यह एकादशी स्वर्ग ओर मोक्ष देनेवाली हे ।
राज्य ओर पुत्र प्रदान करनेवाली है । उत्तम स्त्रीक
प्राप्ति करानेवाली तथा शरीरको नीरोग बनानेवाली
हे । राजन्! एकादशीसे अधिक पवित्र न गङ्गा है,
न गयाः; न काशी हे, न पुष्कर । कुरुक्षेत्र, नर्मदा,
देविका, यमुना तथा चन्द्रभागा भी एकादशीसे
बदृकर पुण्यमय नहीं हे । राजन्! एकादशीकः
व्रत करनेसे भगवान् विष्णुका धाम अनायास ही
प्राप्त हो जाता है। एकादशीको उपवासपूर्वक
<
[क्- / = षप
>
संक्षिप्त नारदपुराण
रातमे जागरण करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त
हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है । राजेन्द्र ।
एकादशीतव्रत करनेवाला पुरुष मातृकुल, पितृकुल
तथा पत्रीकुलको दस-दस पीदियोंका उद्धार कर
देता हे । महाराज ! वह अपनेको भी वैकुण्ठमें ले
जाता है। एकादशी चिन्तामणि अथवा निधिके
समान है । संकल्पसाधक कल्पवृक्ष एवं वेदवाक्योकि
समान हे । नसशरष्ठ! जो मनुष्य द्वादशी (एकादशीयुक्त) -
को शरण लेते हैँ, वे चार भुजाओंसे युक्त हो
गरुड्को पीठपर वनमाला ओर पीताम्बरसे सुशोभित
हो भगवान् विष्णुके धाममें जाते हैं । महीपते!
यह मेने द्वादशी (एकादशीयुक्त)-का प्रभाव"
बताया हे। यह घोर पापरूपी ईधनके लिये
अग्रिके समान हे । पुत्र-पौत्र आदि विपुल योगों
(अप्राप्त वस्तुओं) अथवा भोगोकी इच्छा रखनेवाले
धर्मपरायण मनुप्योको सदा एकादशीके दिन
उपवास करना चाहिये। नरश्रेष्ठ! जो मनुष्य
आदरपूर्वक एकादशीत्रत करता है, वह माताके
उदरमं प्रवेश नहीं करता (उसकी मुक्ति हो जाती
हे) । अनेक पापोंसे युक्त मनुष्य भी निष्काम या
सकामभावसे यदि एकादशीका त्रत करता है तो
वह लोकनाथ भगवान् विष्णुके अनन्त पद (वैकुण्ठ
धाम)-को प्राप्त कर लेता है।
५५ अ 7
तिथिके विषयमे अनेक ज्ञातव्य बाते तथा विद्धा तिथिका निषेध
वसिष्ठजी कहते है- राजन्! एकादशी तथा
भगवान् विष्णुको महिमासे सम्बन्ध रखनेवाले
सूतपुत्रके उस वचनको जो समस्त पापराशियोंका
निवारण करनेवाला था, सुनकर सम्पूर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मणेन
पुनः निर्मल हदयवाले पौराणिक सूतपुत्रस पृछा-
मानद ! आप व्यासजीको कृपासे अठारह पुराण ओर
महाभारतको भी जानते हें । पुराणों ओर स्मृतियेपिं
एेसी कोई वात नहीं है, जिसे आप न जानते हो।
हम लोगोके हदयमें एक संशय उत्पन्न हो गया हे।
आप ही विस्तारसे समञ्ञाकर यथार्थरूपसे उसका
निवारण कर सकते हँ । तिथिके मूल भाग (प्रारम्भ) -
मे उपवास करना चाहिये या अन्तमें ? देवकर्म हो
या पितृकर्म उसमे तिथिके किस भागमें उपवास
करना उचित हे ? यह बतानेको कृपा करे ।
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करी
उत्तरभाग
सौतिने कहा- महर्षियो ! देवता्ओंकौ |
लिये तो तिधिके अन्तभागमें ही उपवास करना
उचित है। वही उनकी प्रीति बदानेवाला है।
पितरोको तिथिका मूलभाग ही प्रिय है-एेसा
कालज्ञ पुरुषोका कथन हे । अतः दसगुने फलक
इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको तिथिके अन्तभागमें ही
उपवास करना चाहिये । धर्मकामी पुरुषोको पितरोको
तृप्िके लिये तिथिके मूलभागको ही उत्तम मानना
चाहिये । विप्रगण! धर्म, अर्थ तथा कामको इच्छावाले
मनुष्योंको चाहिये कि द्वितीया, अष्टमी, पष्ठी ओर
एकादशी तिथियों यदि पूर्वविद्धा हों अर्थात्
पहलेवाली तिथिसे संयुक्त हों तो उस दिन त्रत न
करे । द्विजवरो ! सप्तमी, अमावास्या, पूर्णिमा तथा
पिताका वार्षिक श्राद्धदिन-इन दिनोमें पूर्वविद्धा
तिथि ही ग्रहण करनी चाहिये । सूर्योदयके समय
अदि थोडी भी पूर्वं तिथि हो तो उससे वर्तमान
तिथिको पूर्वविद्धा माने, यदि उदयके पूर्वसे ही
वर्तमान तिथि आ गयी हो तो उसे "प्रभूता!
समञ्च । पारण तथा मनुष्यके मरणमें तत्कालवर्तिनी
तिथि ग्रहण करने योग्य मानी गयी है । पितृकार्यमें
वही तिथि ग्राह्य है जो सूर्यस्तिकालमें मौजूद रहे ।,
विप्रवरो! तिथिका प्रमाण सूर्यं ओर चनद्रमाकौ
गतिपर निर्भर है। चन्द्रमा ओर सूर्यकी गतिका
ज्ञान होनेसे कालवेत्ता विद्वान् तिधिके कालका
मान समञ्जते हे ।
इसके बाद, अव म स्नान, पूजा आदिकं
विधिका क्रम बताऊगा, यदि दिन शुद्ध न मिले तो
रातमें पूजा की जाती है । दिनका सारा कार्य प्रदोष
(रात्रिके आरम्भकाल) -में पूर्णं करना चाहिये।
यह विधि त्रत करनेवाले मनुष्योके लिये वतायी
गयी है। विप्रवरो! यदि अरुणोदयकालमें थोड़ी
भी द्वादशी हो तो उसमें स्नान, पूजन, होम ओर
दान आदि सारे कार्य करने चाद्ये । द्वादशीमें त्रत
५७९
करनेपर शुद्ध त्रयोदशीमें पारण हो तो पृथ्वीदानका
फल मिलता है। अथवा वह मनुष्य सौ यजोके
अनुष्टानसे भी अधिक पुण्य प्राप्त कर लेता है।
विप्रगण! यदि आगे द्वादशीयुक्त दिन न दिखायी
दे तो (अर्थात् द्वादशीयुक्त त्रयोदशी न हो तो)
प्रातःकाल ही सान करना चाहिये ओर देवताओं
तथः पितरोंका तर्पण करके द्वादशीमं ही पारण
कर लेना चाहिये। इस द्वादशीका यदि मनुष्य
उच्लद्ुन करे तो वह बहुत बड़ी हानि करनेवाली
होती है। ठीक उसी प्रकार जैसे विद्याध्ययन
करके समावर्तन- संस्कारद्वारा मनुष्य स्नातक न
बने तो बह सरस्वती उस विद्रान्के धर्मका अपहरण
करती है। क्षयमे, वृद्धिमें अथवा सूर्योदयकालमें
भी पवित्र द्वादशी तिथि प्राप्त हो तो उसीमें उपवास
करना चाहिये, किंतु पूर्वं तिथिसे विद्ध होनेपर
उसका अवश्य त्याग कर देना चाहिये।
व्राह्मणोने पृषछा- सूतजी ! जव पहले दिनकी
एकादशीमें द्वादशीका संयोग न प्राप्त हातादहो तो
मनुष्योको किस प्रकार उपवास करना चाहिय ?
यह बतलाइये । उपवासका दिन जव पूर्वं तिधिसं
विद्ध हो ओर दूसरे दिन जब थोड़ी भी एकादशी
न हो तो उसमें किस प्रकार उपवास करनेका
विधान है? इसे भी स्पष्ट कीजिये।
सौतिने कहा~ ब्राह्मणो ! यदि पहले दिनकीं
एकादशोमे आधे सूर्योदयतक भी द्वादशीका संयोग
न मिलता हो तो दूसरे दिन ही त्रत करना चाहिये ।
अनेक शास्त्रम परस्पर विरुद्ध वचन देखे जाते ह
ओर ब्राह्मण लोग भी विवादमें ही पड़ रहते है ।
एेसी दशामें कोई निर्णय होता न देख पवित्र द्वादशी
तिधिमें ही उपवास करे ओर त्रयोदशीमें पारण कर
ले। जव एकादशी दशमीसे विद्ध हो ओर् द्वादशीमं
श्रवणका योग मिलता हो तो दोनों पक्षोमिं पवित्र
द्रादशी तिथिको ही उपवास करना चाहिय ।
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८५८०9
ऋषि बोले- सूतपुत्र! अब आप युगादि तिथियों
तथा सूर्यसंक्रान्ति आदिमं किये जानेवाले पुण्य
कर्मोकी विधिका यथावत् वर्णन कीजिये; क्योंकि
आपसे कोई बात छिपी नहीं हे।
सोतिने कहा-अयनका पुण्यकाल, जिस
दिन अयनका आरम्भ हो, उस पूरे दिनतक मानना
चाहिये । संक्रान्तिका पुण्यकाल सोलह घटीतक
होता हे । विषुवकालको अक्षय पुण्यजनक बताया
संक्षिप्त नारदपुराण
गया हे । द्विजश्रेष्ठगण। दोनों पक्षको दशमीविद्धा
एकादशीका अवश्य त्याग करना चाहिये । जैसे
वृषली स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाला ब्राह्मण श्राद्धमे
भोजन कर लेनेपर उस श्राद्धको ओर श्राद्धकतकि
पुण्यकृत पुण्यको भी नष्ट कर देता हे, उसी प्रकार
पूर्वविद्धा तिथिमे किये हए दान, जप, होम, स्नान
तथा भगवत्पूजन आदि कर्म॒सूर्योदयकालमें
अन्धकारकी भति नष्ट हो जाते हें।
2 175 111
१ 0 |
रुक्माङ्दके राज्यमें एकादशीव्रतके प्रभावसे सबका वैकुण्ठगमन,
यमराज आदिका चिन्तित होना, नारदजीसे उनका
वार्तालाप तथा ब्रह्यलोक-गमन
ऋषि बोले- सूतजी ! अव भगवान् विष्णुके
आराधनकर्मका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये, जिससे
भगवान् संतुष्ट होते ओर अभीष्ट वस्तु प्रदान करते
हे । भगवान् लक्ष्मीपति सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हे ।
यह चराचर जगत् उन्हीका स्वरूप है । वे समस्त
पापराशियोंका नाश करनेवाले भगवान् श्रीहरि
किस कर्मसे प्रसन्न होते हें?
सौतिने कहा- ब्राह्यणो! धरणीधर भगवान्
हषीकेश भक्तिसे ही वशमें होते हं, धनसे नहीं ।
भक्तिभावसे पूजित होनेपर श्रीविष्णु सव मनोरथ
पूर्णं कर देते हे । अतः ब्राह्मणो ! चक्रसुदर्शनधारी
भगवान् श्रीहरिकी सदा भक्ति करनी चाहिये। जलसे
भी पूजन करनेपर भगवान् जगन्नाथ सम्पूर्णं क्लेशोका
नाश कर देते है । जेसे प्यासा मनुष्य जलसे तृप्त होता
हे। उसी प्रकार उस पूजनसे भगवान् शीघ्र संतुष्ट
होते हे । ब्राह्मणो! इस विषयमे एक पापनाशक
उपाख्यान सुना जाता हे, जिसमें महर्षिं गोतमके साथ
राजा रुकमाद्घदके संवादका वर्णन है । प्राचीन कालमें
रुक्माङ्गद नामस प्रसिद्ध एक सार्वभौम राजा हो
गये हैं। वे सव प्राणि्योके प्रति क्षमाभाव रखते
थे । क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णु
उनके प्रिय आराध्यदेव थे। वे भगवद्भक्त तो थे ही,
सदा एकादशीत्रतके पालनमें तत्पर रहते थे। राजा
रुवमाङ्गद इस जगते देवेश्वर भगवान् पदानाभके
सिवा ओर किसीको नहीं देखते थे । उनकी सर्वत्र
भगवद्दृष्टि थी। वे एकादशीके दिन हाथीपर
नगाड़ा रखकर बजवाते ओर सब ओर यह घोषणा
कराते थे कि आज एकादशी तिथि हे। आजके दिन
आठ व्षसे अधिक ओर पचासी वर्षसे कम आयुवाला
जो मन्दबुद्धि मनुष्य भोजन करेगा, वह मेरेदरारा
दण्डनीय होगा, उसे नगरसे निर्वासित कर दिया
जायगा। ओरोकी तो वात ही क्या, पिता, भ्राता,
पुत्र, पत्नी ओर मेरा मित्र ही क्योंन हो, यदि वह
एकादशीके दिन भोजन करेगा तो उसे कठोर दण्ड
दिया जायगा। आज गङ्गाजीके जलमें गोते लगाओ,
श्रेष्ठ ब्राह्यणोको दान दो।' द्विजवर! राजाके इस प्रकार
घोषणा करानेपर सब लोग एकादशीत्रत करके भगवान्
विष्णुके लोकमें जाने लगे। ब्राह्मणो ! इस प्रकार
वैकुण्ठधामका मार्गं लोगोंसे भर गया । उस राजाके
राज्यमें जो लोग भी मृत्युको प्राप्त होते थे, वे
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उत्तरभाग
भगवान् विष्णुके धामे चले जाते थे।
ब्राह्मणो ! सूर्यनन्दन प्रेतराज यम दयनीय |
पहुंच गये थे। चित्रगुप्तको उस समय लिखने-
पदृनेके कामसे छुरी मिल गयी थी । लोगोके पूर्व
क्मकि सारे लेख मिटा दिये गये। मनुष्य अपने
धर्मके प्रभावसे क्षणभरमें वेकुण्ठधामको चले जाते
थे । सम्पूर्ण नरक सूने हो गये। कहीं कोई पापी
जीव नहीं रह गया था। वारह सूर्योकि तेजसे तपत
होनेवाला यमलोकका मार्ग नष्ट हो गया। सव
लोग गरुडकी पीठपर बैठकर भगवान् विष्णुके
धामको चले जाते थे मर्त्यलोगके मानव एकमात्र
एकादशीको छोडकर ओर कोई त्रत आदि नहीं
जानते थे। नरकमें भी सन्नाटा छा गया। तब एक
दिन नारदजीने धर्मराजके पास जाकर कहा।
नारदजी बोले- राजन्! नरकोके ओगनमें
भी किसी प्रकारको चीख-पुकार नहीं सुनायी
देती । आजकल लोगोके पापकर्मोकिा लेखन भी
नहीं किया जा रहा है। क्यों चित्रगुप्तजी मुनिकी
भोति मौन साधकर वैठे हं? क्या कारण है कि
आजकल आपके यहां माया ओर दम्भके वशीभूत
हो दुष्कर्मोमिं तत्पर रहनेवाले पापियोंका आगमन
नहीं हो रहा है ?
महात्मा नारदके एेसा पृनेपर सूर्यपुत्र धर्मराजने
कुछ दयनीय भावसे कहा।
यम वोले-नारदजी ! इस समय पृथ्वीपर जो
राजा राज्य कर रहा टै, वह पुराणपुरुषोत्तम
भगवान् हषीकेशका भक्त है । राजेश्वर रुक्माङ्गदं
अपने राज्यके लोगोको नगाडा पीटकर सयत
करता है- एकादशी तिथि प्राप्त होनेपर भोजन न
५८१
द्रादशीको उपवास कर लेते है, वे दाह ओर
प्रलयसे रहित वैष्णवधामको जाते है । सारांश यह
हे कि (एकादशीसंयुक्त) द्वादशीतव्रतके सेवनसे
सव लोग वैकुण्ठधामको चले जा रहे है । द्विजश्रेष्ठ ।
उस राजाने इस समय मेरे लोकके मार्गोका लोप
कर् दिया हे। अतः मेरे लेखकोने लिखनेका काम
ढीला कर दिया हे। महामुने! इस समय मैं काठके
मृगको भति निश हो रहा हूँं। इस तरहके
लोकपाल-पदको मेँ त्याग देना चाहता द्ं। अपना
यह दुःख ब्रह्माजीको वतानेके लिये मं ब्रह्मलोकमें
जाऊ्गा। किसी कार्यके लिये नियुक्त हुआ सेवक
कामन होनेपर भी यदि उस पदपर बना रहता है
ओर वेकार रहकर स्वामीके धनका उपभोग करता
ठे, वह निश्चय ही नरके जाता हे।
सोति कहते है ब्राह्यणो ! पेखा कहकर यमराजं
देवर्षिं नारद तथा चित्रगुप्तके साथ ब्रह्माजीके
धाममं गये । वहां उन्होने देखा कि ब्रह्माजी मर्त
ओर अमूर्तं जीवोसे धिरे वैदे हैं । वे सम्पूर्णं वेदोकि
तथा सवके
करो, न करो। जो मनुष्य उस दिन भोजन करेगे
वे मेरे दण्डके पात्र होगे।' अतः सव लोग
(एकादशीसंयुक्त) दादशीत्रत करते है । मुनिश्रेष्ट!
जो लोग किसी बहानेसे भी (एकादशीसंयुक्त)
प्रपितामह टै । उनका स्वतः प्रादुरभावि हआ दै। वे
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 21188 \/8181185। (0166101. 01411260 0 60810011
५८२
संक्षिप्त नारदपुराण
सम्पूर्ण भूतोके निवासस्थान ओर पापसे रहित है ।
उकार उन्हीका नाम हे। वे पवित्र, पवित्र
वस्तुओके आधार, हंस (विशुद्ध आत्मा) ओर
दर्भं (कुशा), कमण्डलु आदि चिहठोसे युक्त हे।
अनेकानेक लोकपाल ओर दिक्पाल भगवान् ब्रह्माजीकी
उपासना कर रहे दें । इतिहास, पुराण ओर वेद
साकाररूपमें उपस्थित हो उनकी सेवा करते हे।
उन सवके वीचमे यमराजने लजाती हुई नववधूकी
भोति प्रवेश किया। उनका मुंह नीचेकी ओर लुका
था ओर वे नीचेको ओर ही देख रहे थे।
ब्रह्माजीको सभामें वेठे हए लोग देवर्षिं नारद तथा
चित्रगुप्तके साथ यमराजको वहां उपस्थित देख
आश्चर्यचकित नेत्रोंसे देखते हए आपसमें कहने
लगे, "क्या ये सूर्यपुत्र यमराज यहां लोककर्ता
पितामह ब्रह्माजीका दर्शन करनेके लिये पधारे हुए
हे ? क्या इनके पास इस समय कोई कार्य नहीं है 2
इनको तो एक क्षणका भी अवकाश नहीं मिलता
हे; ये सूर्यनन्दन यम सदा अपने कार्यमिं ही व्यग्र
रहते हे, फिर भी आज यहाँ कैसे आ गये ? देवता
लोग सकुशल तो हँ ? सबसे बढ़कर आश्चर्य तो
^=-#८# ९५.
यह मालूम होता हे कि ये लेखक महोदय
(चित्रगुप्तजी) बड़ी दीनताके साथ यहाँ उपस्थित
हए है ओर इनके हाथमे जो पट है, जिसपर
जीवोंका शुभाशुभ कर्म लिखा जाता हे, उसका
सव लेख मिटा दिया गया है। अबतक किसी भी
धर्मात्माने इनके पटपर लिखे हुए लेखको नहीं
मिटाया था। अबतक जो बात देखने ओर सुननेमें नही
आयी थी, वह यहीं प्रत्यक्ष दिखायी देती है ।'
ब्राह्यणो ! ब्रह्माजीके सभासद् जब इस प्रकारकी
वाते कर रहे थे, उस समय सम्पूर्णं भूतोका शासन
करनेवाले सूर्यपुत्र यम पितामहके चरणोमें गिर
पड़ ओर बोले-' देवेश्वर! मेरा बड़ा तिरस्कार
हुआ ह । मेरे पटपर जो कुछ लिखा गया था, सब
मिटा दिया गया। कमलासन ? आप-जेसे स्वामीके
रहते हुए में अपनेको अनाथ देख रहा हू।'
द्विजवरो ! एेसा कहकर धर्मराज निश्चेष्ट हो गये।
फिर उदारचित्तवाले लोकमूर्तिं वायुदेवने अपनी
सुन्दर एवं मोटी भुजाओंसे यमराजके संदेहका
निवारण करते हए उन्हें धीरे-धीरे उठाया ओर
उन धर्मराज ओर चित्रगुप्तको आसनपर विठाया।
भ 1४9
यमराजके द्वारा ब्रह्माजीसे अपने कण्टका निवेदन ओर
रुक्माङ्दके प्रभावका वर्णन
तब यमराज बोले- पितामह! पितामह! । नाथ।
मेरो वात सुनिये। देव! किसीके प्रभावका जो
खण्डन हे, वह मूत्युसे भी अधिक दुःखदायकः
होता दे। कमलोद्भव! जो पुरुप कार्यम नियुक्त
होकर स्वामीके उस आदेशका पालन नहीं करता;
किंतु उनसे वेतन लेकर खाता है, वह काठका
कोड़ा होता है। जो लोभवश प्रजा अथवा राजासे
धन लेकर खाता हे, वह कर्मचारी तीन सौ
कल्पोतक नरकमे पड़ा रहता है । जो अपना काम
बनाता ओर स्वामीको लूटता टै, वह मन्दबुद्धि
मानव तीन सौ कल्पोंतक घरका चृहा होता हे।
जो राजकर्मचारी राजाके सेवकोंको अपने घरके
काममें लगाता है, वह विल्ली होता हे। देव! मं
आपकी आजासे धर्मपूर्वक प्रजाका शासन करता
था। प्रभो ! मं मुनियों तथा धर्मशास्त्र आदिके द्वारा
भली भोति विचार करके पुण्यकर्म करनेवालेको
पुण्यफलमे ओर पाप करनेवालेको पापके फलसे
संयुक्त करता धा। कल्पके आदिसे लेकर जवतक
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग ५८३
ओर पनी-इन तीन कुलोंका उद्धार करके मेरे
लोकका मार्गं त्यागकर विष्णुधाममें पर्हुच जाता
हे । वेष्णवतव्रत एकादशीका पालन करनेवाला पुरुष
जेसी गतिको पाता हे, वैसी गति ओर किसीकी
नहीं मिलती । एकादशीके दिन अपने शरीरमे
अंवलेके फलका लेपन करके भोजन छोडकर
मनुष्य दुष्कमेसि युक्त होनेपर भी भगवान् धरणीधरके
लोकमें चला जाता है। देव ! अवमे निराश हो
गया हूं। इसलिये आपके युगल चरणारविन्दोकी
सेवामें उपस्थित हआ हूं । आपको सेवामें अपने
दुःखका निवेदनमात्र कर देनेसे आप सवक
अभयदान देते हं। इस समय जगत्कौ सुषि,
पालन ओर संहारके लिये जो समयोचित कायं
प्रतीत हो, उसे आप करें । अव पृथ्वीपर वैसे पापी
मनुष्य नहीं है, जो मेरे भूतगणोद्वारा सोकल ओर
पाशमें बोधकर मेरे समीप लाये जार्य ओर मरे
अधीन होँ। सूर्यके तापसे युक्तं जो यमलोकका
मार्ग था, उसे अत्यन्त तीव्र हाथवाले विष्णुभक्तीनि
कर दिया; अतः समस्त जनसमुदाय कुम्भीपाककीं
यातनाको त्यागकर परात्पर श्रीहरिके धाममें चला
जा रहा हे।
त्रिभुवनपूजित देव ! निरन्तर जाते हुए मनुष्यों
ठटसाटस भरे रहनेके कारण भगवान् विष्णुके
लोकका मार्गं चिस गया है। जगत्पते! मै
समञ्चता हं कि भगवान् विष्णुके लोकका कोई
माप नहीं है, वह अनन्त दै। तभी तो सम्पूर्ण
जीवसमुदायके जानेपर भी भरता नहीं दे । राजा
रुक्माद्धदने एक हजार वर्षमे इस भूमण्डलका
शासन प्रारम्भ किया है ओर इसी बीचमें
असंख्य मानवको चतुर्भुज रूप दे पत् वर्तन,
वनमाला ओर मनोहर अद्करागमे सुशोभित करक
उन्दं गृटुकी पीटपर विटाकर् वैकुण्टश्रामपं
आपका वह दिन पूरा होता है, तवबतक आपके ही
आदेशके अनुसार मेँ सब काम करता आया हू
ओर आगे भी कर सकता हू, किंतु आज राजा
रुक्माङ्गदने मेरा महान् तिरस्कार कर दिया हे।
जगन्नाथ! उस राजाके भयसे समुद्रोद्रारा धिरी हुई
समूची पृथ्वीके लोग सर्वपापनाशक एकादशीके
दिन भोजन नहीं करते हँ ओर उसके प्रभावसे
भगवान् विष्णुके धाममें चले जाते हँ; वह भी
अकेले नहीं, पितरों ओर पितामहोंको भी साथ ले
लेते हैँ । इस लोकमें व्रत करनेवालोके पितर तो
वैकुण्ठलोकमें जाते ही हैँ, उनके पितरोके पितर
तथा माताके पिता-मातामह आदि भी विष्णुधामको
चले जाते हे, फिर उन सबके भी जो पिता-माता
आदि है, उनके पूर्वज भी वैकुण्ठवासी हो जाते
है । यही नहीं, उनकी पत्ियोके पितर भी मेरी
लिपिको मिटाकर विष्णुधामको चले जाते है।
पिता आदिके साथ वीर्यका सम्बन्ध है ओर
माताने तो गभमिं ही धारण किया हे। अतः उनका
सद्रति हो तो कोई अनुचित बात नहीं है । नियम
यह है कि एक पुरुष जो कर्म करता हे, उसका
उपभोग भी वह अकेले ही करता हे। ब्रह्मन् ।
कतसि भिन्न जो उसके पिता है, उनके वीर्यसे
उसका जन्म हुआ है ओर माताके पेटसे वह पेदा
हुआ है। इसलिये वह जिसको पिण्ड देनका
अधिकारी है ओर जिससे उसका शरीर् प्रकट
हआ है, एेसे पिता ओर माता इन दोनों पक्षको
वह तार सकता है । किंतु वह पत्रीका वीर्य तो है
नहीं ओर न पीने उसे गभि धारण किया है।
अतः जगन्नाथ! पति या दामादके पुण्यकी महिमामे
उसकी पल्ली तथा शशुर पक्षके लोग कैसे परम
पदको प्राप्त होते हं 2 इसीसे मेरे सिरमं चक्कर आ
रहा है । पद्मयोने! वह अपने साथ पिता, माता
((-0. 1\/॥८11114/5511॥ 21188 \/8181185। (01661011. 01411260 0 6810011
८५८ ठ
संक्षिप्त नारदपुराण
पहुंचा दिया। देवेश ! लक्ष्मीपतिका प्रिय भक्त
रुक्माङ्गद यदि पृथ्वीपर रह जायगा तो वह
सम्पूर्ण लोकको भगवान् विष्णुके अनामय धाम
वेकुण्ठमें पहुंचा देगा । लीजिये यह रहा आपका
दिया हुआ दण्ड ओर यह है पट; यह सब मैने
आपके चरणोमे अर्पित कर दिया । देवेश्वर! राजा
रुक्माङ्गदने मेरे अनुपम लोकपालपदको मिदट्रीमें
मिला दिया। धन्य हे उसकी माता, जिसने उसे
गभमिं धारण किया था। मातासे उत्पन्न हुआ
अधिक गुणवान् पुत्र सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश
करनेवाला होता है। माताको क्लेश देनेवाले
पुत्रके जन्म लेनेसे क्या लाभ ? देव! कुपुत्रको
जन्म देनेवाली माताने व्यर्थ ही प्रसवका कष्ट
भोगा हे ! विरञ्चे ! निःसंदेह इस संसारमें एक ही
नारी वीर पुत्रको जन्म देनेवाली है, जिसने मेरी
लिपिको मिटा देनेके लिये रुक्माङ्गदको उत्पन्न
किया है। देव! पृथ्वीपर अबतक किसी भी
राजाने एेसा कार्य नहीं किया था। अतः भगवन्
जो भयंकर नगाड़ा बजाकर मेरे लोकके मार्गका
लोप कर रहा है ओर निरन्तर भगवान् विष्णुकौ
सेवामे लगा हुआ हे, उस रुक्माङ्गदके पृथ्वीके
राज्यपर स्थित रहते मेरा जीवन सम्भव नहीं ।
८} <
(म 1 १ क
ब्रह्माजीके द्वारा यमराजको भगवान् तथा उनके भक्तोंकी श्रेष्ठता बताना
ब्रह्माजी बोले-- धर्मराज ! तुमने क्या आश्चर्यको | है ? क्योकि जो खिलवाडमें भी भगवान् विष्णुके
बात देखी है? क्यों इतने खिन्न हो रहे हो?
किसीके उत्तम गुणोको देखकर जो मनमें संताप
होता हे, वह मृत्युके तुल्य माना गया है।
सूर्यनन्दन ! जिनके नामका उच्चारण करनेमात्रसे
परम पद प्राप्त हो जाता है, उन्हीकी प्रीतिके लिये
उपवास करके मनुष्य वैकुण्ठधामको क्यों न
जाय ? भगवान् श्रीकृष्णके लिये किया हुआ एक
वारका प्रणाम दस अश्चमेध-यज्ञोके अवभृथ-
सरानके समान है। फिर भी इतना अन्तर है कि
दस अश्वमेध-यज्ञ करनेवाला मनुष्य पुण्यभोगके
पश्चात् पुनः इस संसारम जन्म लेता है; परंतु
श्रीकृष्णको प्रणाम करनेवाला पुरुप फिर संसार-
बन्धनमें नहीं पड्ताः । जिसकी जिह्वाके अग्रभागपर
` हरि" यह दो अक्षर विराजमान है, उसे कुरुक्षेत्र,
काशी ओर विरजतीर्थके सेवनकी क्या आवश्यकता
नामका उच्चारण ओर श्रवण कर लेता है, वह
मनुष्य गङ्गाजीके जलमें सान करनेसे प्राप्त हई
पवित्रताके तुल्य पवित्रता प्राप्त कर लेता है।
त्रिभुवननाथ पुरुषोत्तम हमारे जन्मदाता हैँ, उनके
दिन (एकादशी )-का सेवन करनेवाले पुरुषपर
शासन के से चल सकता है ? जो राजकर्मचारी इस
पृथ्वीपर राजाके श्रेष्ठ भक्तोको नहीं जानता, वह
उनके विरुद्ध सम्पूर्णं आयास करके भी फिर
उन्हींके द्वारा दण्डनीय होता है। अतः राजकार्यमें
नियुक्त हए पुरुषको चाहिये कि वे अपराधी
होनेपर भी राजाके प्रिय जनोंपर शासन न कर,
क्योकि वे स्वामीके प्रसादसे सिद्ध (कृतकार्य)
होते हे ओर शासकपर भी शासन कर सकते हे ।
सूर्यनन्दन! इसी प्रकार जो पापी होनेपर भी
भगवान् जनार्दनके चरणोंको शरणमे जा चुके है,
१. एको हि कृष्णस्य कृतप्रणामो दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः । दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय ॥
(ना० उत्तर० ६। ३)
((-0. 1/८111141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
उत्तरभाग
५८५
उनपर तुम्हारा शासन कैसे चल सकता है ? उनपर
शासन करना तो मूर्खताका ही सूचक है । धर्मराज ।
यदि भगवान् शिवके, सूर्यके अथवा मेरे भक्तोंसे
तुम्हारा विवाद हो तो मैं तुम्हारी कुछ सहायता
कर सकत्ता हू; किंतु भास्करनन्दन। विष्णुभक्तोके
साथ सामना होनेपर मं कोई सहायता नहीं कर
सर्कूगा; क्योकि भगवान् पुरुषोत्तम सभी देवताअकि
आदि हं। भगवान् मधुसूदनके भक्तोको दण्ड देना
सम्भव नहीं है । जिन्होने किसी बहानेसे भी दोनों
पक्षोको (एकादशीसंयुक्त) द्वादशीका सेवन किया
हे, उनके द्वारा यदि तुम्हारा अपमान हुआ है तो
उसमें में तुम्हारा सहायक नहीं हो सकता।
भ 1२/८४
यमराजको इच्छापूर्तिं ओर भक्त रुक्माङ्गदका गौरव बढ़ानेके लिये ब्रह्माजीका
अपने मनसे एक सुन्दरी नारीको प्रकट करना, नारीके प्रति वैराग्यकी भावना
तथा उस सुन्दरी "मोहिनी ' का मन्दराचलपर जाकर मोहक संगीत गाना
यमराजने कहा- तात! वेद जिनके चरण
उन भगवानूको नमस्कार करनेमें ही सबका हित
हे; इस बातको मैने भी समज्ञा है । जगत्पते! फिर
देरतक विचार किया। सम्पूर्ण प्राणि्योसे विभूषित
भगवान् ब्रह्याने क्षणभर चिन्तन करनेके पश्चात्
सम्पूर्ण लोकको मोहमें डालनेवाली एक नारीको
भी जबतक राजा रुक्माङ्कद पृथ्वीका शासन करता | उत्पन्न किया। ब्रह्माजीके मनसे निर्मित हई वह
है, तबतक मेरा चित्त शान्त नहीं रह सकता।
देवश्रेष्ठ | यदि एकमात्र रुक्माङ्गदको ही आप
एकादशीके दिन धैर्यसे विचलित करदे, तो मेँ
आपका किङ्कर बना रहूंगा। देव ! उसने मेरे पटका
लेख मिटा दिया है । आजसे जो मानव देवताओंके
स्वामी भगवान् विष्णुका स्मरण, स्तवन अथवा
उनके लिये उपवासत्रत करेगे, उनपर मैं कोई
शासन नहीं करूगा। जो मनुष्य किसी दूसरे
व्याजसे भी सहसा हरि-नामका उच्चारण कर्
लेते है, वे माताके गर्भसे छुटकारा पा जाते हँ । वे
चतुर मानव मेरे पटके लेखे नहीं आते तथा
देवताओकि समुदाय भी उन्हें नमस्कार करते ह ।
सौति कहते ह~ वैवस्वत यमके कार्यसे ओर
उनके सम्मानकी रक्षा करनेके लिये (ओर स्व्माङ्गदका
गौरव बढानेके लिये) देवेश्वर ब्रह्माजीने कुछ
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देवी संसारकी समस्त सुन्दरिर्योमि श्र एवं प्रकाशमान
१. हरिरिति सहसा ये संगृणन्ति च्छलेन जननिजटरमागत्ति विमु्छा हि मर्त्याः
मम पटविलिपिं ते नो विशन्ति प्रवीणा दिविचरवरसद्धस्ते नमस्या भवन्ति॥
(ना० उत्तर० ७1 ६)
((-0. 1/८11114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 60810011
५८६
धी । सम्पूर्ण आभूषणोसे विभूषित हो वह उनके
आगे खड़ी हई । रूपके वैभवसे सम्पन्न उस
सुन्दरीको सामने देख ब्रह्माजीने अपनी आंखें मंद
लीं । उन्होने इस बातपर भी लक्ष्य किया कि मेरे
स्वजन काममोहित होकर इस सुन्दरीकी ओर देख
रहे हे । तव उन्होने उन सबको समञ्चाते हुए
कहा-' जो यहां माता, पुत्री, पुत्रवधू, भौोजाई,
गुरुपत्ती तथा राजाक्रो रानीको ओर रागयुक्त मन
ओर आसक्तिपूर्णं दृष्टस देखता या उनका चिन्तन
करता है, वह घोर नरके पड़ता है । जो मनुष्य
इन प्रमदाओंको देरकर क्षोभको प्राप्त होता है
उसका जन्मभरका किया हुआ पुण्य व्यर्थं हो
जाता हे। यदि उन रमणियोंका सङ्घ करे तो दस
हजार जन्मोका पुण्य नष्ट होता है ओर पुण्यका
नाश होनेसे पापी म्ननुष्य अवश्य ही पहाड़ी चूहा
होता हे; अतः विद्धान् पुरुष इन युवति्योको न
तो रागयुक्त दृष्टस देखे ओर न रागयुक्त हदयसे
इनका चिन्तन ही करे।
धर्मराज! जो पुत्रवधू अपने शशुरको अपने
खुले अद्ध दिखाती हे, उसके हाथ ओर पैर गल
जाते है तथा वह ' कृमिभक्ष' नामक नरकमें पडती
हे । जो पापौ मनुष्य पुत्रवधूके हाथसे पैर धुलवाता,
स्नान करता अथवा शरीरमें तेल आदि मालिश
कराता हे, उसको भी एेसी ही गति होती है । वह
एक कल्पतक काले रंगके मुखवाले ' सूचीमुख '
नामक कोड़का भक्ष्य बना रहता है । अतः मनुष्य
कामनायुक्त मनसे किसी भी नारीकी ओर विशेषतः
पुत्री अथवा पुत्रच धूको ओर न देखे। जो देखता
हे, वह उसी क्षण पतित हो जाता है । इस प्रकार
विचार करके ब्रह्याजीने अपनी दृष्टि ओर सुक्ष्म
कर ली ओर कहा--'यह जो गोल-गोल ओर
कुछ ऊंचाई लिये हुए सुन्दर मुंह दिखायी देता है
वहे हड्ियोका ढाचामात्रे ही तो है, जो चर्म ओर
संक्षिप्त नारदपुराण
मांससे ठका हुआ है। स्त्रियोके शरीरमें जो दो
सुन्दर नेत्र स्थित दहे, वे वसा ओर मेदके सिवा
ओर क्या हें 2 छातीपर दोनों स्तनोमें यह अत्यन्त
ऊचा मांस ही तो स्थित हे। जघनदेशमें भी अधिक
मास ही भरा हुआ है। जिस योनिपर तीनों
लोकोके प्राणी मुग्ध रहते हें, वह छिपा हुआ
मूत्रका ही तो द्वार है। वीर्य ओर हडयोंसे भरा
हुआ शरीर केवल मांससे ढका होनके कारण कैसे
सुन्दर कहा जा सकता हे ? मांस, मेद ओर चर्वी
ही जिसका सार-सर्वस्व है, देहधारियोके उस
शरीरम सार-ततत्त क्या है 2 बताओ। विष्ठा, मूत्र
ओर मलसे पुष्ट हए शरीरमें कोन मनुष्य अनुरक्त
होगा ?' इस प्रकार ब्रह्माजीने ज्ञानदृष्टिसि बहुत
विचार करके उस नारीसे कहा-' सुन्दरी ! जिस
प्रकार मेने मनसे तुम श्रेष्ठ वर्णवाली नारीकौ सृष्टि
को हे, उसके अनुरूप ही तुम मनको उन्मत्त बना
देनेवाली उत्पन्न हुई हो ।'
तव उस नारीने चतुर्मुख ब्रह्माजीको प्रणाम
करके कहा-' नाथ! देखिये, योगियोंसहित समस्त
चराचर जगत् मेरे रूपसे मोहित हो गया है; तीनों
लोकोमें कोई भी एेसा पुरुप नहीं हे, जो मुञ्चे
देखकर क्षुब्ध न हो जाय। कल्याणकी इच्छा
रखनेवाले किसी पुरुषको अपनी स्तुति नहीं करनी
चाहिये; तथापि कार्यके उद्ेश्यसे मुञ्चे अपनी
प्रशंसा करनी पड़ी है । ब्रह्मन्! आपने किसीके
चित्तमें क्षोभ उत्पन्न करनेके लिये ही मेरी सृष्टि
को हे; अतः जगन्नाथ! उसका नाम बताइये, मं
निस्संदेह उसको क्षुब्ध कर डालूंगी । देव ! पृथ्वीपर
मुञ्चे देखकर पहाड़ भी मोहित हो जायगा; फिर
सस लेनेवाले जङ्गम प्राणीके लिये तो कहना ही
क्या? इसीलिये पुराणोमे नारीको ओर देखना,
उसके रूपकी चर्चा करना मनुष्येकि लिये उन्मादकारी
बतलाया गया है । वह कठिन-से-कठिन व्रतका
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। (01611010. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग ५८७
स्त्रीसुखका अनुभव नहीं किया। सहस्रं राजकुमारियां
उसको पत्री होनेके लिये स्वयं आयीं, किंतु उसने
सबको त्याग दिया। वह घरमे रहकर कभी
पिताको आज्ञाके पालनसे विचलित नहीं होता।
चारुहासिनि! धमङ्गिदके तीन सौ मातापं है। वे
सव-को-सव सोनेके महलोमें रहती है । राजकुमार
उन् सवके प्रति समानरूपसे पूज्य दृष्टि रखता है ।
रुक्माद्गदके जीवनमें धर्मकी ही प्रधानता है। वे
पुत्ररलसे सम्पन्न हँ । मोहिनी ! तुम उत्तम मन्दराचलपर
उन्हीं नरेशके समीप जाओ ओर उन्हें मोहित
करो। सुन्दरी ! तुमने इस सम्पूर्णं जगत्को मोहित
कर लिया है, अतः देवि! तुम्हारे इम गुणक
अनुरूप ही तुम्हारा ' मोहिनी ' नाम होगा।
ब्रह्माजीके एेसा कहनेपर मोहिनी ब्रह्याजीकीौ
प्रणाम करके मन्दराचलको ओर प्रस्थित हुई । तीस
मुहूर्त (पांचवीं घड़ी ) -में वह पर्वेतके शिखरपर जा
पहुंची । मन्दराचल वह पर्वत है, जिसे पूर्वकालमें
भगवान् विष्णुने कच्छपरूपसे अपनी पटपर धारण
किया था ओर देवता तथा दानवोँने जिसके द्वारा
क्षीरसागरका मन्थन किया था एवं जो महान् पर्वत
| कूर्म-शरीरसे रगडा जानेपर भी फट न
सका तथा जिसने क्षीरसागरमें पडुकर उसको
गहराई कितनी है, इसे स्पष्ट दिखा दिया। वह
अनेक प्रकारके रललोका घर तथा भति-भातिकी
धातुओंसे सम्पन्न है । मन्दराचल देवताओकरो क्रोडा
ओर विहारका स्थान है। तपस्वी मुनि्योकी
तपस्याका वह प्रमुख साधन है । उसका मृलभाग
ग्यारह हजार योजनतक नीचे गया टै । इतना ही
उसका विस्तार भी है ओर ऊचाईमं भी उसका
यही माप टै । वह अपने सुवर्णमय तथा रन्मय
शिखरे पृथ्वी ओर आकाशको प्रकाशित र श्रा
भी नाश करनेवाला है । मनुष्य तभीतक सन्मार्गपर
चलता रहता हे, तभीतक इन्दियोंको कामें रखता
हे, तभीतक दूसरोंसे लज्ना करता है ओर तभीतक
विनयका आश्रय लेता है, जबतक कि धैर्यको
छीन लेनेवाले युवतियोके नीली पांखवाले नेत्ररूपी
वाण हदयमें गहरी चोट नहीं पहंचाते। नाथ!
मदिराको तो जब मनुष्य पी लेता है, तब वह चतुर
पुरुषके मनमें मोह उत्पन्न करती है; परंतु युवती
नारी दूरसे दर्शन ओर स्मरण करनेपर ही मोहमें
डालती हे; अतः वह मदिरासे बढ़कर है "९।
ब्रह्माजीने कहा- देवि! तुमने ठीक कहा हे ।
तुम्हारे लिये तीनों लोकोमें कुछ भी असाध्य नहीं
हे। एेसी शक्ति रखनेवाली तुम सम्पूर्ण लोकोके
चित्तका अपहरण क्यों न करोगी । यह सत्य हे कि
तुम्हारा रूप सबको मोह लेनेवाला है । मेने जिस
उदश्यसे तुम्हारी सृष्टि कौ है, उसे सिद्ध करो।
शुभे! वेदिश नगरमे रुक्माङ्गद नामसे प्रसिद्ध एक
राजा हैँ । उनकी पत्रीका नाम सन्ध्यावली है, जो
रूपमे तुम्हारे ही समान हे । उसके गर्भसे राजकुमार
धर्माद्गदका जन्म हुआ हे, जो पितासे भी अत्यधिक
प्रतापी है। उसमें एक लाख हाथीका बल हे ओर
प्रतापमें तो वह सूर्यके ही समान है। क्षमाम
पृथ्वीके ओर गम्भीरतामें वह समुद्रके समान है।
तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित होता ह । त्यागमें
राजा बलि, गतिमें वायु, सौम्यतामे चन्द्रमा तथा
रूपमे कामदेवके समान है । राजकुमार धर्मङ्गिद
राजनीतिमें बृहस्पति ओर शुक्राचार्यको भी परास्त
करता है । वरानने । पिताने केवल एक (अखण्ड)
रूपमे समस्त जम्बृद्रीपका भोग किया है; किंतु
धरमङ्गिदने अन्य द्वीपोपर भी अधिकार प्राप्त कर
लिया है । उसने माता-पिताके संकोचवश अभीतक
१. पीतं हि मद्यं मनुजेन नाथ करोति मोहं सुविचक्षणस्य। स्मृता च दृषा युवती नरेण विमोयेदेव मुराधिक्रा टि ५
(ना? उन 4। 4०५)
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 0141260 0 66810011
५८८ संक्षिप्त नारदपुराण
हे । मोहिनी उस मन्दराचलपर आ पहुंची । उसके | मोहिनीने उस शिवलिङ्गके समीप ही उत्तम संगीत
अद्धोको प्रभा भी स्वर्णके ही समान थी; अतः वह | प्रारम्भ किया। वीणाकी इंकार ओर ताल-स्वरसे
अपनी कान्तिसे स्वयं भी उस पर्वतके तेजको बदा | युक्त वह श्रेष्ठ गीत मानसिक क्लेशको दूर करनेवाला
रही थी। वह राजा रुक्माङ्गदसे मिलनेको इच्छा | धा। वह सुन्दरी शिवलिङ्गके अत्यन्त निकट होकर
रखकर पर्वतको एक विशाल शिलापर जा वेटी, | मूर्च्छना ओर तालके साथ गान्धारस्वरमें गीत गा
जिसका विस्तार सात योजन था। वह दिव्य शिला | रही भी । राजेन्द्र! उसका वह गान कामवेदनाको
नीली कान्तिसे सुशोभित थी । राजेन्द्र ! उस शिलापर | बढानेवाला था। मुनी श्रो! उस संगीतके प्रारम्भ
एक वज्रमय शिवलिद्ध स्थापित था, जिसकी ऊंचाई | होनेपर स्थावर जीवोंकी भी उसमें स्पृहा हो गयी ।
दस हाथको थी । वह ' वृषलिद्भ' के नामसे विख्यात | देवताओं तथा देत्येकि समाजमं भी कभी वसा मोहक
था ओर एेसा जान पड़ता था, मानो महलके ऊपर | संगीत नहीं हुआ था। मोहिनीके मुखसे निकला हुआ
सुन्दर सोनेका कलश शोभा पा रहा हो । द्विजवरो! । वह गान चित्तको मोह लेनेवाला था।
९,
[ऋ ^ + > 2८ # =>
रुक्माङ्द-धर्माङ्कद-संवाद, धर्माङ्गदका प्रजाजनोंको उपदेश ओर प्रजापालन तथा
रुक्माङ्गदका रानी सन्ध्यावलीसे वार्तालाप
सोति कहते है- महाराज रुक्माङ्गदने मनुपष्य- | भाति पैदा हुआ हे । पुत्र वही है, जो इस पृथ्वीपर
लोकके उत्तम भोग भोगते हुए नाना प्रकारसे | पितासे भी अधिक ख्याति लाभ करे । यदि पुत्रके
पीताम्बरधारी भगवान् श्रीहरिको आराधना की । | अन्यायजनित दुःखसे पिताको रातभर जागना पडे
विप्रगण! युद्धम पराक्रमसे सुशोभित होनेवाले | तो वह पुत्र एक कल्पतक नरकमें पड़ा रहता हे।
शत्रु ओंपर विजय प्राप्त कर ली ओर वैवस्वत | जो पुत्र घरमे रहकर पिताकी प्रत्येक आज्ञाका
यमको जीतकर यमलोकका मार्गं सूना कर | पालन करता है, वह देवताओद्रारा प्रशंसित हो
दिया। वैकुण्टका मार्ग मनुष्योसे भर दिया ओर | भगवान्का सायुज्य प्राप्त करता ठै। पुत्र! मँ
उचित समय जानकर अपने पुत्र धर्मङ्गदको | प्रजाजनोंको रक्षाके लिये इस पृथ्वीपर सदा नाना
वबुलाकर कहा-' बेटा ! तुम अपने धर्मपर दृढतापूर्वक | प्रकारके कर्मोमिं आसक्त रहा । प्रजापालनमें संलग्र
डटे रहकर अपने पराक्रमसे इस धन-धान्य- | होकर मैने कभी भोजन ओर शयनकी परवा नहीं
सम्पन्न पृथ्वीका सब ओरसे पालन करो। पुत्रके | की । कुछ लोग शिवकी उपासनामें तत्पर रहते है,
समर्थं हो जानेपर जो उसे राज्य नहीं सोप देता, | कुछ लोग भगवान् सूर्यके भजन-ध्यानमें संलग्र
उस राजाके धर्म तथा कीर्तिका निश्चय ही नाश | हैं, कोई ब्रह्माजीके पथपर चलते है ओर दूसरे
हो जाता है। अपने शक्तिशाली पुत्रके द्वारा यदि | लोग पार्वतीजीकी आराधनामें स्थित हे। कुछ
पिता सुखी न हो तो उस पुत्रको तीनों लोकोपिं | लोग सायंकाल ओर सवेरे अग्निहोत्र कर्ममें लगे
अवश्य पातकी जानना चाहिये। पिताका भार | होते हैँ । “बालक हो या युवक, वृदढा हो या
हल्का करनेमे समर्थं होकर भी जो पुत्र उस | गर्भिणी स्त्री, कुमारी कन्या, रोगी पुरुष अथवा
भारको नहीं संभालता, वह माताके मल-मूत्रकी | किसी कष्टसे व्याकुल मनुप्य-ये सब उपवास
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 2118811 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग ५८९
इस प्रकार कहा--' प्रजागण! पिताने मुञ्चे आप
लोगोके पालन ओर हित-साधनके लिये नियुक्त
किया है। सर्वथा धर्मपालनकी इच्छा रखनेवाले
मुञ्ज-जेसे पुत्रको पिताक आज्ञाका सदैव पालन
करना चाहिये । पुत्रके लिये पिताके अदेशका पालन
करनेके सिवा दूसरा कोई धर्म नहीं है। अवर मैं
दण्ड धारण करके राजाके पदपर स्थित हआ हं ।
मेरे जीते-जी यहां कहीं यमराजका शासन नहीं
चल सकता। एेसा समञ्जकर आप सब लोगोको
भगवान् गरुडध्वजका स्मरण तथा भगवदर्पणवुद्धिसे
कर्म करते हुए उसके द्वारा भगवान् जनार्दनकरा
यजन करते रहना चाहिये । संसारके भोगोसे ममता
हटाकर अपनी-अपनी जातिके लिये विहित कर्मद्रारा
भगवान्को पूजा करनी चाहिये । इससे आपको
अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होगी । प्रजाजनो। यह मने
पिताजीके मार्गसे एक अधिक मार्गं आपको
दिखाया हे । ब्रह्मार्पणभावसे कर्ममें संलग्र होकर
आप सब लोग सानमें निपुण हो जायं । एकादशीके
दिन भोजन नहीं करना चाहिये- यह पिताजीका
हआ सनातन मार्गं तो है ही, यद
ब्रह्मनिष्ठारूप विशेष मार्ग आपके लिये मेने बताया
हे । तत्त्ववेत्ता पुरूपोंको इस ब्रह्मनिष्ठारूप मार्गका
अवलम्बन अवश्य करना चाहिये। इसमे इस
संसारम पुनः नहीं आना पड़ता।'
इस प्रकार सम्पूरणं प्रजाको अनुनयपूर्वक बारम्बार
आश्वासन देकर धर्माङ्गद उनके पालनमं लगे रहे ।
वेनतो दिनमें सोते थे ओर न रातमें ही। वे अपने
शौर्यके वलसे पृध्वीको निष्कण्टक वनाति हुए
सर्वत्र भ्रमण करते थे। हाथीके मस्तकपर् रखा
हआ उनका नगाड़ा प्रतिदिन बजता ओर
कर्तव्यपालनकी घोषणा इस प्रकार करता रहता
था-' लोगो! (एकादशीसयुक्त ) द्रादशीको उपवास
करत दुए ममतासं रहित हो जाश्रो ओर नाना
नहीं कर सकते ।' इस तरहक बातें जिन्ोने कहीं
उन सवकौो बातोका मेने सव तरहसरे खण्डन
किया ओर बहुत दिनोंतक पुराणमें कहे हुए
वचनद्वारा प्रजाके सुखके लिये उन्हें वार-वार
समञ्चाया । विद्वानोंको शास्त्रदृष्टिसे समञ्ञाकर ओर
मूर्खोको दण्डपूर्वक कावूमें करके में एकादशीके
दिन सवको निराहार रखता आया हू ।
वत्स ! अपने हों या पराये, कभी किसीको
दुःख नहीं देना चाहिये । जो राजा प्रजाकी रक्षा
करता है, उसे पुराणोमे अक्षय लोकोंकी प्रापि
वतायी गयी हे । अतः सोम्य! में प्रजाके लिये सदा
कर्तव्यपालनमे लगा रहा। अपने शरीरको विश्राम
देनेका मुञ्चे कभी अवसर नहीं मिला। बेटा! मुञ्च
कभी मदिरा पीने ओर जूआ खेलने आदिके
सुखको इच्छा नहीं होती । वत्स ! इन दुर्व्यसनोपें
फसा हुआ राजा शीघ्र नष्ट हो जाता है। पुत्र
तुम्हारे ऊपर राज्यका भार रखकर में (प्रजाजनोके
रक्षार्थ) शिकार खेलने जाना चाहता हूं ओर इसी
बहाने अनेकानेक पर्वत, वन, नदी ओर भोति-
भोतिके सरोवर देखना चाहता हूँ ।'
धर्माङ्कदने कहा- पिताजी ! में आपके राज्य-
सम्बन्धी भारी भारको आजसे अपने ऊपर
उठाता हू। आपकी आज्ञापालन करनेके सिवा
मेरे लिये दूसरा कोई धर्म नहीं हे । जो पिताकौ
वात नहीं मानता, यह धर्मानुष्ठान करते हए भी
नरकमें पडता हे । इसलिये मै आपकी आज्ञाका
पालन करूगा।
एेसा कहकर धर्माङ्गद हाथ जोड खड् रहे।
उनके इस वचनको सुनकर राजा रुक्माद्गद वहत
प्रसन्न हए। उन्होने (प्रजाके रक्षार्थ) मृगयाके
लिये वनमें जानेका निश्चय करिया ओर पुत्रको
अनुमति प्राप्त कर ली। इख वातको जानकर
धर्माङ्गदने प्रसन्नचित्त हो प्रजातवर्गको बुलाया ओर
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
५९० संक्षिप्त नारदपुराण
क माधवका चिन्तन करना चाहिये। वे भगवान्
नि अ~ ९8 “~= +£ | | पुरुषोत्तम ही भोक्ता ओर भोग्य है, सब कमम
~ 2~ उन्हीका विनियोग-उन्हींकी प्रसन्नताके लिये
कर्मोका अनुष्ठान करना उचित हे।' इस प्रकार
मेघको गर्जनाके समान गम्भीर स्वरसे डंका
¦ श ॐ || पीटकर श्रेष्ठ ब्राह्मण उपर्युक्त बातें दुहराया करते
( ~" 4} || थे । ब्राह्यणो! इस तरह धर्मका सम्पादन करके
९. { ् | धर्मङ्घदके पिताने जव यह जान लिया कि मेरा
पुत्र मुञ्चसे भी अधिक कर्तव्यपरायण है तो वे
अत्यन्त प्रसन्न हो द्वितीय लक्ष्मीके समान सुशोभित
अपनी धर्मपलीसे बोले-' सन्ध्यावलि! में धन्य
> | क्र | | ह् तथा श्रेष्ठ वर्णवाली देवि! तुम भी धन्य हो;
८1. क >>> || ` || वयोकि हम दोनोंका पैदा किया हुआ पुत्र इस
प्रकारके कार्यमिं देवेश्वर श्रीहरिका चिन्तन करते | पृथ्वीपर चन्द्रमाके समान उज्वल कौर्तिसे प्रकाशित
रहो। भगवान् पुरुषोत्तम ही यज्ञ॒ ओर श्राद्धके | हो रहा हे । सुन्दरी! यह निश्चय है कि सदाचार
भोक्ता हे। सूर्यमे, सूने आकाशमें तथा सम्पूर्णं | ओर पराक्रमसे सम्पन्न विनयशील एवं प्रतापी
सृष्टिमे वे जगदीश्चर भगवान् विष्णु व्याप्त हो | पुत्र प्राप्त होनेपर पिताके लिये घरमें ही मोक्ष
रहे हे । धर्म, अर्थं ओर कामरूप त्रिवर्गको भी | हे। किंतु अव में प्रसत्रतापूर्वक शिकार खेलने
इच्छा रखनेवाले सव मनुष्योको उन्हींका स्मरण | एवं जंगली पशुओंको मारनेके लिये वनमे
करना चाहिये। इसी प्रकार अपने वर्णोचित | जाऊंगा । विशाललोचने ! वहाँ स्वच्छन्द विचरते हुए
कर्तव्यकर्मका आचरण करते हुए भी उन्हीं भगवान् | मैं जन~रक्षाका कार्य करूगा।
४
7
रानी सन्ध्यावलीका पतिको मृगोंकी हिंसासे रोकना, राजाका वामदेवके
आश्रमपर जाना तथा उनसे अपने पारिवारिक सुख आदिका
कारण पूना
वसिष्ठजी कहते है- पतिका यह वचन सुनकर | मृगोके प्राण लेना न्यायकी वात नहीं है । पुराणोमें
विशाल नेत्रोवाली रानी सन्ध्यावलीने कहा-“राजन्! | कहा गया है कि “अहिंसा परम धर्म है। जो
आपने पुत्रपर सातो द्वीपोके पालनका भार रख | हिंसामें प्रवृत्त होता है, उसका सारा धर्म व्यर्थ हो
दिया। अब यह मृगोकी हिंसा छोडकर यज्ञोद्रारा | जाता है । राजन्। विद्वानने जीव-हिंसा छः प्रकारकी
भगवान् जनार्दनकी आराधना कीजिये ओर भोगोकी | बतायी है। पहला हिंसक वह है, जो हिंसाका
अभिलाषा त्यागकर देवनदी गङ्गाका सेवन कीजिये। | अनुमोदन करता है । दूसरा वह है, जो जीवको
आपके लिये अब यही न्यायोचित कर्तव्य है; | मारता है। जो विश्वास पैदा करके जीवको फंसाता
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग
हे, वह तीसरे प्रकारका हिंसक टै। मारे हुए
जीवका मांस खानेवाला चौथा हिंसक हे; उस
मांसको पकाकर तेयार करनेवाला पांचवां हिंसक
ठे तथा राजन्! जो यहाँ उसका वंटवारा करता है,
वह छठा हिंसक हे। विद्वान् पुरुषोने हिसायुक्त
धर्मको अधर्म ही माना हे । धर्मात्मा राजाओंमें भी
मृगोके प्रति दयाभावका होना ही श्रेष्ठ माना गया
हे। मैने आपके हितकी भावनासे ही बार-बार
आपको मृगयासे रोकनेका प्रयत्न किया हे।'
एेसी बातें कहती हई अपनी धर्मपत्नीसे राजा
रुक्माङ्गदने कहा-' देवि! में मृगोंको हत्या नहीं
करूगा। मृगया बहाने हाथमे धनुष लेकर वनमें
विचरण करूगा। वर्ह जो प्रजाके लिये कण्टकरूप
हिंसक जन्तु है, उन्हीका वध करूगा। जनपदमें
मेरा पुत्र रहे ओर वनमें में। वरानने! राजाको
हिंसक जन्तुओं ओर लुटेरोसे प्रजाकौ रक्षा करनी
चाहिये । शुभे! अपने शरीरसे अथवा पुत्रके द्वारा
प्रजाकी रक्षा करना अपना धर्महै। जो राजा
प्रजाकी रक्षा नहीं करता, वह धर्म्मा होनेपर भी
नरकमें जाता है; अतः प्रिये! में हिसाभावका
परित्याग करके जन-रक्षाके उदेश्यसे वनम जाऊंगा!"
रानी सन्ध्यावलीसे एेसा कहकर राजा रसुक्मार््गद
अपने उत्तम अश्वपर आरूढ हुए। वह घोड़ा
पृथ्वीका आभूषण, चनद्रमाके समान धवल वर्णं
ओर अश्वसम्बन्धी दोषोसे रहित ॒था। रूपमं
उच्यैःश्रवाके समान ओर वेगम वायुके समान धा।
राजा सुक्माङ्गद पृथ्वीको कम्मित करते हए-से
चले। वे नृपश्रेष्ठ अनेक देशोंको पार करते हुए
वनमें जा पहुंचे । उनके घोड़के वेगसे तिरस्कृत हो
कितने ही हाधी, रथ ओर घोड़े पीछे द्ूट जाते थ ।
वे राजा रुक्माद्गद एक सौ आठ योजन भृमि
लोँधकर सहसा मुनिर्योके उत्तम आश्रमपर प्च
गये । घोडेसे उतरकर उन्होने आश्रमकी रमणीय
५९१
भूमिमें प्रवेश किया, जहां केलेके बगीचे आश्रमकी
शोभा बढा रहे थे। अशोक, वकुल (मौलसिरी),
पुन्नाग (नागकेसर) तथा सरल (अर्जुन) आदि
वृक्षोसे वह स्थान धिरा हआ था। राजाने उस
आश्रमके भीतर जाकर द्विजश्रेष्ठ महर्पिं वामदेवका
दर्शन किया, जो अग्रिके समान तेजस्वी जान
पड़ते थे। उन्हे बहत-से शिप्योने घेर रखा धा।
राजाने मुनिको देखकर उन्हं आदरपूर्वक प्रणाम
किया। उन महर्षिने भी अर्घ्य, पाद्य आदिक द्वारा
राजाका सत्कार किया। वे कुशके आसनपर
बैठकर हर्षभरी वाणीसे बोले-' मुने! आज मेरा
पातक नष्ट हो गया। भलीभाति ध्याने तत्पर
|
|
|
|
।
।
|
।
| आप-जैसे महात्माके युगल चरणारविन्दाका
दर्शन करके मने समस्त पुण्य-कर्माका फलं प्राप्त
कर लिया।' राजा स्क्माद्भदकौ यह ब्रात सुनकर
वामदेवजी बडे प्रसन्न दए ओर कुशल-मर््खल
पकर वबोले-' राजन्! तुम अत्यन्त पुण्यात्मा
तथा भगवान् विष्णुके भक्त हो । महाभाग! तुम्हापै
दृ पडुनसे मेरा यह आश्रम इस पृथ्वीपर् अधिक
पुण्यमय हो गया। भूमण्डलमं कौन पेसा राजा
((-0. 1/(111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
५९२
संक्षिप्त नारदपुराण
होगा, जो तुम्हारी समानता कर सके। तुमने
यमराजको जीतकर उनके लोकम जानेका मार्ग ही
नष्ट कर दिया। राजन्! सब लोगोसे पापनाशिनी
(एकादशोसंयुक्त) द्वादशीका त्रत कराकर सबको
तुमने अविनाशी वेकुण्टधाममें पहंचा दिया। साम,
दान, दण्ड ओर भेद-दुन चार प्रकारके सुन्दर
उपायोसे भूमण्डलको प्रजाको संयममे रखकर
अपने कर्म या विपरीत कर्ममें लगी हई सब
प्रजाको तुमने भगवान् विष्णुके धाममें भेज दिया।
नरेश्वर! हम भी तुम्हारे दर्शनको इच्छा रखते थे,
सो तुमने स्वयं दर्शन दे दिया । महीपाल ! चाण्डाल
भी यदि भगवान् विष्णुका भक्त है तो वह द्विजसे
भी बदुकर् हे ओर द्विज भी यदि विष्णुभक्तिसे
रहित हे तो वह चाण्डालसे भी अधिक नीच टे।
भूपाल ! इस प्ृथ्वीपर विष्णुभक्तं राजा दुर्लभ हेः ।
जो राजा भगवान् विष्णुका भक्त नहीं हे, वह
भूदेवी ओर लक्ष्मीदेवीकी कृपा नहीं प्राप्त कर
सकता। तुमने भगवान् विष्णुकी आराधना करके
न्यायोचित कर्तव्यका ही पालन किया हे । नृपते।
भगवान्को आराधनासे तुम धन्य हो गये हो ओर
तुम्हारे दर्शनसे हम भी धन्य हो गये ।'
वामदेवजीको एेसी वाते करते देख नृपश्रेष्ठ
रुक्माङ्गृद, जो स्वभावसे ही विनयी थे, अत्यन्त नप्र
होकर उनसे बोले--' द्विजश्रेष्ठ ! आपसे क्षमा मँगता
हू। भगवन्! आप जेसा कहते है, वैसा महान् मेँ
नहीं हू । विप्रवर ! आपके चरणोंकी धूलके बरावर
भीमे नहीं हं। इस जगतूमें देवता भी कभी
ब्राह्यणोसे बढ़कर नहीं हो सकते; क्योकि ब्राह्यणोके
संतुष्ट होनेपर जीवकी भगवान् विष्णुम भक्ति होती
हे ।' तव वामदेवजीने उनसे कहा-' राजन्! इस
समय तुम मेरे घरपर आये हो । तुम्हारे लिये कुछ
भी अदेय नहीं हे, अतः बोलो, मेँ तुम्हें क्या दू?
महीपाल । इस भूतलपर जो सबको अभीष्ट वस्तु
प्रदान करता है ओर एकादशीके दिन डंका
पीटकर प्रजाको भोजन करनेसे रोकता है, उसके
लिये क्या नहीं दिया जा सकता ।'
तव राजाने हाथ जोड़कर विप्रवर वामदेवजीसे
कहा--' ब्रह्मन्! आपके युगल चरणोके दर्शनसे
मेने सव कुछ पा लिया। मेरे मनमें बहुत दिनोसे
एक संशय हे । मे उसीके विषयमे आपसे पता
हू; क्योकि आप सव संदेहोका निवारण करनेवाले `
ब्राह्मणशिरोमणि हें । मुञ्चे किस सत्कर्मके फलसे
त्रिभुवनसुन्दरी पती प्राप्त हई हे, जो सदा मुञ्
अपनी दृिसे कामदेवसे भी अधिक सुन्दर देखती
हे । परम सुन्दरी देवी सन्ध्यावली जहां - जहो पैर
रखती है, वर्हो-वहं पृथ्वी छिपी हुई निधि
प्रकाशित कर देती हे। उसके अद्धोमे बुढापेका
प्रवेश नहीं होता । मुनिश्रेष्ठ ! वह सदा शरत्कालके
च्द्रमाको प्रभाके समान सुशोभित होती हे।
विप्रवर! विना आगके भी वह षड्रस भोजन
तेयार कर लेती है ओर यदि थोडी भी रसोई
वनाती हे तो उसमें करोड़ों मनुष्य भोजन कर लेते
हे । वह पतित्रता, दानशीला तथा समस्त प्राणियोंको
सुख देनेवाली हे । ब्रह्मन्! उसने सोते समय भी
वाणीमात्रके द्वारा भी कभी मेरी अवहेलना नहीं
की हे। उसके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हुआ है, वह
सदा मेरी आज्ञाके पालनमें तत्पर रहता है।
द्विजश्रेष्ठ । एेसा लगता हे, इस भूतलपर केवल मं
ही पुत्रवान् हूँ, जिसका पुत्र पिताका भक्त है ओर
गुणोके संग्रहे पितासे भी बढ गया हे। मे
१. श्रपचोऽपि महीपाल विष्णुभक्तो द्विजाधिकः ॥ र
विष्णुभक्तविहीनस्तु द्विजोऽपि श्वपचाधिकः । दुर्लभा भूप राजानो विष्णुभक्ता महीतले ॥
( ना० उत्तर० १०।३७-३८ 9
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
उत्तरभाग
भूमण्डलमें केवल एक द्वीपके स्वामीरूपसे प्रसिद्ध
था; कितु मेरा पुत्र मुञ्ञसे बढ़ गया। वह सातं द्वीपोकी
पृथ्वीका पालक है। विप्रवर! वह मेरे लिये
विद्युद्केखा नामसे विख्यात राजकुमारीको ले आया
था ओर युद्धम उसने विपक्षी राजाओंको परास्त
कर दिया था। वह रूप-सम्पत्तिसे भी सुशोभित
हे। उसने सेनापति होकर छः महीनेतक युद्ध
किया ओर शत्रुपक्षके सैनिकोंको जीतकर सबको
अस्त्रहीन कर दिया। स्त्रीराज्यमे जाकर उसने
वर्हांको स्त्रियोको युद्धमें जीता ओर उनमेसे आठ
सुन्दरियोंको लाकर मुदे समर्पित किया तथा उन
सबको मातृभावसे उसने बारम्बार मस्तक ज्जुकाया।
पृथ्वीपर उसने जो-जो दिव्य वस्त्र तथा दिव्य रत
प्राप्त किये, उन सबको लाकर मुञ्चे दे दिया । इससे
उसको माताने उसकी बडी प्रशंसा की । वह एक
ही दिनमें अनेक योजन विस्तृत समूची पृथ्वीको
लोघकर रातको मेरे पैरोमें तेल मालिश करनेके
५९३
लिये पुनः घर लौट आता है। आधी रातमें मेरे
शरीरको सेवा करके वह द्वारपर कवच धारण
करके खड़ा हो जाता दै ओर नींदसे व्याकुल
इन्दरियोवाले सेवकोंको जगाता रहता है । मुनिश्रेष्ठ ।
मेरा यह शरीर भी नीरोग रहता है । मुञ्जे अनन्त
सुख प्राप्त है ओर घरमें मेरी प्यारी पत्नी सदा मेरे
अधीन रहती हे । पृथ्वीपर सव लोग मेरी आज्ञाका
पालन करनेवाले हे । किस कर्म्कि प्रभावसे इस
समय मुञ्चे यह सुख मिला है 2 वह सत्कर्म इस
जन्मका किया हुआ है या दूसरे जन्मका ? ब्रह्यन्।
आप अपनी वुद्धिसे विचारकर मेरा पुण्य मुञ्च
बताइये । मेरे शरीरम रोग नहीं है । मेरी पत्नी मेरे
वशम रहनेवाली है। घरमे अनन्त रेश्चर्य है।
भगवानूके चरणों मेरी भक्ति है। विद्वानेमें मेरा
आदर है ओर त्राह्यणोको दान देनेको मुञ्चमें शक्ति
टे। अतः म एेसा मानता हूं कि यह सव किसी
विशेष) पुण्यकर्मका फल है ।'
^+
ककि चै कि की
वामदेवजीका पूर्वजन्ममे किये हुए "अशून्यशयनव्रत ' को राजाके वर्तमान
सुखका कारण बताना, राजाका मन्दराचलपर जाकर मोहिनीके
गीत तथा रूप-दर्शनसे मोहित होकर गिरना ओर
मोहिनीद्रारा उन्हे आश्वासन प्राप्त होना
वसिष्ठजी कहते हे-राजाका यह वचन सुनकर
महाज्ञानी मुनीश्वर वामदेवजीने एक क्षणतक कुछ
चिन्तन किया। फिर राजाके सुख-सौभाग्यका
कारण जानकर वे इस प्रकार बोले।
वामदेवजीने कहा- महीपाल! तुम पूर्वजन्ममं
शद्रजातिमें उत्पन्न हए थे। उस समय दरिद्रता तथा
दुष्ट भायनि तुम्हारा बड़ा तिरस्कार किया धा।
तुम्हारी स्त्री पर-पुरुषका सेवन करती थी । राजन्!
तुम एेसी स्त्रीके साथ वहत वर्पोतक निवास करते
हए दुःखसे संतप्त होते रहे। एक समय किसी
ब्राह्मणके संसर्गसे तुम तीर्थयात्राके लिये गये; फिर
सब तीर्थोमिं घूमकर ब्राह्मणक सेवामें तत्पर हो,
तुम पुण्यमयी मथुरापुरीमें जा पहुंचे। महीपते ।
वहां ब्राह्मणदेवताके सद्गसे तुमने यमुनाजीके सव
तीर्थमिं उत्तम-विश्रामघाट नामक तीशे स्नान
करके भगवान् वाराहके मन्दिरं होती हई पुराणकं
कथा सुनी, जो ' अशून्यशयनव्रत! के विषयमे धी;
चार पारणसे जिसकी सिद्धि होती दै, जिसका
अनुष्ठान कर लेनेपर मेघके समान श्यामवर्णं
देवेश्वर लक्ष्मीभर्ता जगन्नाथ, जो अशेष पापराशिका
((-0. 1/८1111(4<511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 0141260 0 6810011
५९४
संक्षिप्त नारदपुराण
नाश करनेवाले हे, प्रसन्न होते है । राजन्! तुमने
अपने घर लौटकर वह पवित्र ' अशून्यशयनव्रत!
किया, जो घरमें परम अभ्युदय प्रदान करनेवाला
है। महीपते! श्रावण मासकी द्वितीयाको यह
पुण्यमयत्रत ग्रहष्ण॒ करना चाहिये । इससे जन्म,
मृत्यु ओर जरावस्थाका नाश होता है । पृथ्वीपते।
इस त्रतमें फल, पल, धूप, लाल- चन्दन, शय्यादान,
वस्त्रदान ओर ब्राह्मणभोजन आदिके द्वारा
लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुको पूजा करनी चाहिये ।
राजन्! तुमने यह सब दुस्तर कर्म भी पूरा किया।
महीपते ! तुमने जो पहले पुण्यके फलस्वरूप सुख
विस्तारपूर्वक बताये हं, वे इसी व्रतसे प्राप्त हए
हे, सुनो- जिस के ऊपर भगवान् जगन्नाथ प्रसन्न न
हों, उसके यहो वे सुख निश्चय ही नहीं हो सकते।
राजेन्द्र! इस जन्ममें भी तुम (एकादशीसंयुक्त)
द्रादशीव्रतके द्वारा श्रीहरिको पूजा करते हो।
राजन्! इससे तुम्हें निश्चितरूपसे भगवान् विष्णुका
सायुज्य प्राप्त होगा।
राजा बोत्े-- द्विजश्रेष्ठ ! आपको आज्ञा हो
तो मे मन्दराचचलपर जानेको उत्सुक हँ । राज्य-
शासनका गुरुतर भार अपने पुत्रके ऊपर छोड़कर
मं हलका हो गया हं । अब मेरे कर्तव्यका पालन
मेरा पुत्र करेगा।
राजाको व्रात सुनकर वामदेवजी इस प्रकार
बोले--' नृपश्रेष्ठ ! पुत्रका यह सबसे महान् कर्तव्य
हे कि वह सदा प्रेमपूर्वक पिताको क्लेशसे मुक्त
करता रहे। जो मन, वाणी ओर शरीरकी
शक्तिसे सदा पिताकी आज्ञाका पालन करता
है, उसे प्रतिदिन गङ्गासानका फल मिलता है ।
जो पिताकौ आज्ञाका उ्लद्कन करके गङ्गास्नान
करनेके लिये जाता है, उस पुत्रकी शुद्धि नहीं
होती- यह वैदिक श्रुतिका कथन हेः । भूपाल!
तुम इच्छानुसार यात्रा करो। तुमने अपना सब
कर्तव्य पूरा कर लिया।'
मुनिके एेसा कहनेपर श्रीमान् राजा रुक्माङ्गद
घोडेपर चदढकर शीघ्र गतिसे चले, मानो साक्षात्
वायुदेव जा रहे हों । मागमे अनेकानेक पर्वत,
वन, नदी, सरोवर तथा उपवन आदि सम्पूर्ण
आश्चर्यमय हदयोंको देखते हए वे राजाधिराज
रुक्माङ्गद थोड् ही समयमे श्वेतगिरि, गन्धमादन
ओर महामेरुको लँघकर उत्तर-कुरुवर्षको देखते
हए मन्दराचलपर्वतपर जा पहुंचे, जो सव
ओरसे सुवर्णसे आच्छादित था। वहां बहुत-से
निर ज्र रहे थे। अनेकानेक कन्दरा उस
पर्वतकी शोभा बढ़ा रही थीं । सहस्रं नदियोसे
पूर्ण मन्दराचल गङ्गाजीके शुभ जलसे भी
प्रक्षालित हो रहा था। यह सब देखते हुए राजा
रुक्माद्गद उस महापर्वतके समीप जा पहुंचे।
तत्पश्चात् उन्होंने समस्त मृग आदि पशुओं ओर
पक्षियोके समुदायको एक संगीतक ध्वनिसे
खिंचकर शीघ्रतापूर्वक एक ओर जाते देखा।
वह ध्वनि मोहिनीके मुखसे निकले हुए संगीतक
थी । उनको जाते देख राजा रुक्माङ्गद स्वयं भी
उन्हीके साथ शीघ्रतापूर्वक चल दिये । मोहिनीके
मुखसे निकले हुए संगीतक ध्वनि राजाके भी
कानमे पडी, जिससे मोहित होकर उन्होने
१. एतद्धि परमं कृत्यं पुत्रस्य नृपपुङ्गव । 'यत्क्लेशात् पितरं प्रेम्णा विमोचयति सर्वदा ॥
पितुर्वचनकारी च मनोवाक्कायशक्तितः । तस्य॒ भागीरथीस्नानमहन्यहनि जायते ॥
निरस्य पितृवाक्यं तु ब्रजेत्स्नातुं सुरापगाम्। नो शुद्धिस्तस्य पुत्रस्य इतीत्थं वैदिकी श्रुतिः ॥
(ना० उत्तर० ११1 २-२३)
((-0. 1\॥(111101/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 6810011
उत्तरभाग ५९५
घोडा वहीं छोड़ दिया ओर पर्वतीय मार्गको
लँघते हए वे क्षणभरमें सहसरा उसके पास प्च
गये । उन्होने देखा, तपाये हए सुवण्कि समान
कान्तिवाली एक दिव्य नारी पर्वतपर वैठी है,
मानो गिरिराजनन्दिनी पार्वतीकी रूपराशि उसके
रूपमे अभिव्यक्त हुई हो । उसे देखकर राजा
उसके पास खड़े हो उस मोहिनीका रूप
निहारने लगे । देखते-देखते वे मोहित होकर
वहीं गिर पड़ । मोहिनीने वीणाको रख दिया
ओर गीत बन्द कर दिया। वह देवी राजाके
समीप गयी । मोहिनी सन्तप्त राजा रुक्माद्गदसे
मधुर मनोरम वचनोंमे बोली-' राजन् ! उदये ।
मे आपके वशमें ह । क्यों मूच्छसि आप अपने
इस शरीरको क्षीण कर रहे हैं । भूपाल! आप
तो पृथ्वीके इस महान् भारको तिनकेके समान
समञ्ञकर ढोते आये है । फिर आज आप
मोहित क्यों हो रहे है 2 दृढतापूर्वक अपनेको
संभालिये। आप धीर हँ, वीर है। आपकी
चेष्टाएं उदारतापूर्णं हैँ । राजराजे श्वर ! यदि मेरे
साथ अत्यन्त मनोरम एवं मनोऽनुकृल क्रोडा
करनेकी आपके मनमें इच्छा हो तो मुद्ध
धर्मयुक्त दान देकर अपनी दासीक भाति मेरा
उपभोग कीजिये ।'
7 0
राजाकी मोहिनीसे प्रणय-याचना, मोहिनीकी शर्तं तथा राजाद्वारा उसकी स्वीकृति
एवं विवाह तथा दोनोंका राजधानीको ओर प्रस्थान
वसिष्ठजी कहते है- मोटिनीके इस प्रकार | देखा है, जैसा करि विश्चविमोहन रूप तुमने धारण
सुन्दर वचन बोलनेपर राजा स्कमाद्गद ओं | किया है । वरानने ! म तुम्हारे दर्शनमात्रसे इतना
खोलकर गद्गद कण्ठसे बोले-' बाले! मने पूर्णं | मोहित हो गया कि तुमसे बाततक न कर् सका
चन्द्रमके समान सुन्दर मुखवाली बहत-सी | ओर पृथ्वीपर गिर पड़ा । मुञ्चपर कृपा करो ! तुम्हार
रमणियोको देखा, कितु एेसा रूप मने कीं नहीं । मनमें जो भी अभिलाषा होगी, वह सव मै तुम्हे
[ 1183 ] सं० ना० प्०२०-
(-0. 1\/1(11114/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 66810011
५९६
संक्षिप्त नारदपुराण
दूगा। म सम्पूर्ण पृथ्वीको तुम्हारी सेवामें दे दूंगा । | मेरे पुत्रका नाम धर्म्गिद है । तुम मेरी प्रार्थनाका
इसके साथ ही कोष, खजाना, हाथी, घोडे, मन्त्री
ओर नगर आदि भी तुम्हारे अधीन हो जायंगे।
तुम्हारे लिये मै अपने-आपको भी तुम्हे अर्पण
कर दूगा; फिर धन, रत्न आदिकी तो बात ही क्या
हे ? अतः मोहिनी! मुञ्चपर प्रसन्न हो जाओ।'
राजाका मधुर वचन सुनकर मोहिनीने मुसकराते
हुए उस समय उन्हं उठाया ओर इस प्रकार
कहा-- वसुधापते! में आपसे पर्वतोंसहित पृथ्वी
नहीं मोगती । मेरी इतनी ही इच्छा है कि भ समयपर
जो कुछ कहू, उसका निःशङ्क होकर आप पालन
करते रहें । यदि यह शर्तं आप स्वीकार कर लँ तो
मे निःसंदेह आपकी सेवा करूगी ।'
राजा बोले-देवि! तुम जिससे संतुष्ट रहो,
वही शर्तं मे स्वीकार करता हूं ।
मोहिनीने कहा- आप अपना दाहिना हाथ मुञ्च
दीजिये; क्योकि वह बहुत धर्म करनेवाला हाथ हे।
राजन्! उसके मिलनेसे मुञ्चे आपकी बातपर विश्वास
हो जायगा। आप धर्मशील राजा है । आप समय
आनेपर् कभी असत्य नहीं वो्लेगे।
राजन्! मोहिनीके एेसा कहनेपर महाराज
रुक्माद्गदका मन प्रसन्न हो गया ओर वे इस प्रकार
बोले-' सुन्दरि ! जन्मसे लेकर अबतक मैने कभी
क्रोडाविहारमें भी असत्य भाषण नहीं किया हे।
लो, मेने पुण्य-चिहसे युक्त यह दाहिना हाथ तुं
दे दिया। मने जन्मसे लेकर अबतक जो भी पुण्य
किया हे, वह सव यदि तुम्हारी बात न मानं तो
तुम्हारा ही हो जाय। मैने धर्मको ही साक्षीका
स्थान दिया है । कल्याणी ! अव तुम मेरी पत्री वन
जाओ! मेँ इक्ष्वाकुकुलमें उत्पन्न हआ ह । मेरा नाम
रुक्माङ्गद हे । मे महाराज ऋतध्वजका पुत्र हूँ ओर
उत्तर देकर मेरे ऊपर कृपादृष्टि करो ।'
राजाके एेसा कहनेपर मोहिनीने उत्तर देते हए
कहा-' राजन्! में ब्रह्माजीको पुत्री हूं । आपकी
कोति सुनकर आपके लिये ही इस स्वर्णमय
मन्दराचलपर आयी हू। केवल आपमें मन लगाये
यहं तपस्यामें तत्पर थी ओर देवेश्वर भगवान्
शङ्करका संगीतदानके द्वारा पूजन कर रही थी।
मुञ्चे विश्वास है कि संगीतका दान देवताओंको
अधिक प्रिय है। संगीतसे संतुष्ट हो भगवान्
पशुपति तत्काल फल देते हें। तभी तो अपने
प्रियतम आप महाराजको मेने शीघ्र पालियाहै।
राजन्! आपका मुञ्पर प्रेम हे ओर में भी आपसे
प्रेम करती हूं।' राजासे एेसा कहकर मोहिनीने
उनका हाथ पकड़ लिया।
तदनन्तर राजाको उठाकर मोहिनी बोली-
महाराज ! मेरे प्रति कोई शङ्का न कीजिये! मुङ्ञे
कुमारी एवं पापरहित जानिये । महीपाल ! गृह्यसूत्रमे
वतायी हुई विधिके अनुसार मेरे साथ विवाह
कीजिये। राजन्! यदि अविवाहिता कन्या गभं
धारण कर ले तो वह सव वणेमिं निन्दित चाण्डाल
पुत्रको जन्म देती हे । पुराणमें विद्वान् पुरूषोने तीन
प्रकारको चाण्डाल-योति मानी है-एक तो वह
जो कुमारी कन्यासे उत्पन्न हुआ हे, दूसरा वह जो
विवाहिता होनेपर भी सगोत्र कन्याके पेटसे पैदा
हुआ हे। नृपश्रेष्ठ ! शुद्रके वीर्यद्रारा ब्राह्यणीके
गर्भसे उत्पन्न हुआ पुत्र तीसरे प्रकारका चाण्डाल
हे‹। महाराज ! इस कारण मुञ्च कुमारीके साथ
आप विवाह कर लें।
तव॒ राजा सुक्माद्गदने मन्दराचलपर उस
चपलनयना मोहिनीके साथ विधिपूर्वकं विवाह
१. चाण्डालयोनयस्तिस्रः पुराणे कवयो विदुः ॥
कुमारीसम्भवा त्वेका सगोत्रापि द्वितीयका। ब्राह्यण्यां शुद्रजनिता तृतीया नृपपुद्धव॥
(ना० उत्तर० १३। ३-४)
((-0. 1\॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661011. 01411260 0 6810011
उत्तरभाग
५९७
किया ओर उसके साथ हंसते हृए-से रहने लगे
राजाने कहा- वरानने! स्वर्गकौ प्राति भी
मुञ्चे वैसा सुख नहीं दे सकती, जैसा सुख इस
मन्दराचल पर्वतपर तुम्हारे मिलनेसे प्राप्त हो रहा
ठे। वाले! तुम यहीं मेरे साथ रहीगी या मेरे
राजमहलमें 2
राजा रुक्माद्गदको बात सुनकर मोहिनीनें
अनुरागपूर्वक मधुर वाणीमें कहा-' राजन्! जहां
आपको सुख मिले, वही मेँ भी रहूगी । स्वामीका
निवासस्थान धन-वेभवसे रहित हो तो भी पत्रीको
वहीं निवास करना चाहिये । उसके लिये पतिके
सामीप्यको ही सुवर्णमय मेरु पर्वत बताया गया
हे । नारीके लिये पतिके निवासस्थानको छोडकर
अपने पिताके घर भी रहना वर्जित है। पिताके
स्थान ओर आश्रयमें आसक्त होनेवाली स्त्री नरक्में
डूवती हे । वह सव धर्मसे रहित होकर सूकर-
योनिमे जन्म लेती टैः। इस प्रकार पतिके
निवासस्थानसे अन्यत्र रहनेमे जो दोप है, उसे मेँ
जानती हू। अतः मं आपके साथ ही चलँगी।
सुखमे ओर दुःखमें आप ही मेरे स्वामी है।'
मोहिनीका यह कथन सुनकर राजाक्रा हदय
प्रसन्नतासे खिल उठा। वे उस सुन्दरीको हदयसे
लगाकर वोले- प्रिये ! मेरी समस्त पत्नि्योमें तुम्हारा
स्थान सर्वोपरि होगा। मेरे घरमे तुम प्राणोये भी
अधिक प्रिय वनकर रहोगी। आओ, अव हम
लोग सुखपूर्वक राजधानीकी ओर चलें।' राजा
रुक्माद्गदने जव एेसी बात कही, तव चन्दरमाके
समान मुखवाली मोहिनी उस पर्वेतकी शोभाको
अपने साथ खींचती हई (राजा रुक्माद्गदके साथ
राजधानीकी ओर) चली ।
चीप
१ 7 क 7
घोडेकी टापसे कुचली हुईं छिपकलीकी राजाद्वारा सेवा, छिपकलीकी
आत्मकथा, पतिपर वशीकरणका दुष्परिणाम, राजाके
पुण्यदानसे उसका उद्धार
वसिष्ठजी कहते है- राजन्! वे दोनों पति-
पती मन्दराचलके शिखरसे पृथ्वीको ओर प्रस्थित
हुए। मार्गमे अनेकों मनोहर पर्वतीय दृश्योको
देखते हुए क्रमशः नीचे उतरने लगे । पृथ्वीपर
आकर राजाने अपने श्रेष्ट घोडेको देखा, जो व्रके
समान कठोर टापोसे धरतीको वेगपूर्वक खोद रहा
था। उस भूभागके भीतर एक छिपकली रहती
धी । जब तीखी टापसे वह घोड़ा धरती खोद रहा
था, उसी समय वह छिपकली वहासि निकलकर्
जाने लगी। इतनेमे ही टापके आघातस उसका
शरीर विदीर्ण हो गया। दयालु राजा स्क्माङ्गदने
जब उसको यह दशा देखी तो वे बड़ वेगसे दीडु
ओर वृक्षके कोमल पत्तेसे उन्होने स्वयं उसे खुरक
नीचेसे उठाया तथा घास एवं तृणस भरी हुई
भूमिपर रख दिया! तत्पश्चात् उमे मृच्छित देख
माहिनीसे बोले-' सुन्दरी ! शीघ्र पानी ले आभो।
कमललोचने ! यह छिपकली कुचलकर् पृच्छित
हो गयी है। इसे उस जलसे सीचंगा।' स्वामीकी
आज्ञासे मोहिनी शीघ्र शीतल जल ले आयी।
राजानि उस जलसं वेहोश पड़ी हई छिपक्रलीको
१. भर्तृस्थानं परित्यज्य स्वपितुर्वापि वर्जितम् ॥
पितृस्थानाश्रयग्ता नारो तमसि मजलति। सवधमविहनापि नारी भवति सृकरी ॥
( ना० उनर० १३॥। १८- १९)
((-0. 1\/॥८1114/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
५५९८
न)
। 9 " (कर) 4१
त =,
सीचा। राजन्! शीतल जलके अभिपेकसे उसकी
खोयी हुई चेतना फिर लौट आयी। किसी
प्रकारको चोट क्योंन हो, सवमें शीतल जलसे
सीचना उत्तम माना गया है अथवा भीगे हए
वस्त्रसे सहसा उसपर पद्री ्बँधना हितकर माना
गया दहै। राजन्! जब छिपकली सचेत हई तो
राजाको सामने खड़े देख वेदनासे पीडित हो
धीरे-धीरे इस प्रकार (मनुष्यकौ बोलीमें)
बोली-' महाबाहु सुक्माद्गद ! मेरा पूर्वजन्मका चरित्र
सुनिये । रमणीय शाकल नगरमें मं एक ब्राह्मणकी
पत्ती थी । प्रभो ! मुञ्में रूप था, जवानी थी तो भी
मे अपने स्वामीकी अत्यन्त प्यारी न हो सकौ। वे
सदा मुञ्जसे द्वेष रखते ओर मेरे प्रति कठोरतापूर्ण
वाते कहते थे। महाराज! तवर मेने क्रोधयुक्त हो
वशीकरण ओपध प्राप्त करनेके लिये एेसी स्त्रियोसे
सलाह ली, जिन्हें उनके पतियोने कभी त्याग
दिया था (ओर फिर वे उनके वशम हो गये थे) ।
भूपाल ! मेरे पृषनेपर उन स्त्रियोने कहा-' तुम्हारे
पति अवश्य वशमें हो जा्येगे । उसका एक उपाय
हे । यहाँ एक संन्यासिनी रहती है, उन्टींकी दी हई
संक्षिप्त नारदपुराण
दवाओंसे हमारे पति वशमें हए थे। वरारोहे ! तुम
भी उन्हीं सेन्यासिनीजीसे पृच्छो। वे तुम्हें कोई
अच्छी दवा दे देंगी । तुम उनपर संदेह न करना।'
राजन्! तब उन स्त्रियोके कहनेसे में तुरंत वहां
उनके पास पहुंची ओर उनसे चर्ण ओर रक्षासूत्र
लेकर अपने पतिके पास लोट आयी ओर प्रदोषकालमें
दूधके साथ वह चूर्ण स्वामीको पिला दिया। साथ
ही रक्षासूत्र उनके गलेमें बोध दिया। नृपश्रष्ठ।
जिस दिन स्वामीने वह चूर्णं पीया उसी दिनसे
उन्हें क्षयका रोग हो गया ओर वे प्रतिदिन दुबले
होने लगे। उनके गुप्त अङ्खमे घाव हो जानेसे उसमें
दूषित ब्रणजनित कोड पड़ गये कुछ ही दिन
वीतनेपर मेरे स्वामी तेजोहीन हो गये। उनको
इच्दियो व्याकुल हो उठीं। वे दिन-रात क्रन्दन
करते हुए मुञ्चसे वार-वार कहने लगे-' सुन्दरी।
मे तुम्हारा दास हू । तुम्हारी शरणमे आया हू, अब
कभी परायी स्त्रीके पास नहीं जाऊगा। मेरी रक्षा
करो।' महीपते ! उनका वह रोदन सुनकर में उन
तापसीके पास गयी ओर पृरछठा-' मेरे पति किस
प्रकार सुखी होगे ?' अब उन्होने उनके दाहक
शान्तिके लिये दूसरी दवा दी । उस दवाको पिला
देनेपर मेरे पति तत्काल स्वस्थ हो गये। तवसे मेरे
स्वामी मेरे अधीन हो गये ओर मेरे कथनानुसार
चलने लगे। तदनन्तर कुछ कालके वाद मेरी मृत्यु
हो गयी ओर में नरक-यातनामें पड़ी । मुञ्चे तबिके
भामे रखकर पंद्रह युगोतक जलाया गया । जब
थोड़ा-सा पातक शेष रह गया तो मेँ इस परथ्वीपर
उतारी गयी ओर यमराजने मेरा छिपकलीका रूप `
वना दिया । राजन्! उस रूपमें यहाँ रहते हुए मुञ्च
दस हजार वर्षं बीत गये ।
" भूपाल ! यदि कोई दूसरी युवती भी पतिके
लिये वशीकरणका प्रयोग करती है तो उसके सारे
धर्मं व्यर्थ हो जाते हं ओर वह दुराचारिणी स्त्री
((-0. 1/८1114<511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग ५९९
दुःखरूप फल भोगता हे; अतः स्वामीके प्रति दुष्ट
भाव रखनेवाली इस पापिनीसे अपना क्या
प्रयोजन हे, जिसने रक्षासूत्र ओर चूर्णं आदिके
द्वारा पतिको वशमें कर रखा था। इस पापिनीको
छोडिये, अव हम दोनों नगरकी ओर चलेँ। जो
दूसरे लोगोके व्यापारमें फंसते है, उनका अपना
सुख नष्ट होता हे।'
रुक्माङ्कदने कहा- ब्रह्मपुत्र ! तुमने एेसी बात
कैसे कही ? सुमुखि! साधुपुरुपोका वर्ताव एसा
नहीं होता हे । जो पापी ओर दूसरोको सतानेवाले
होते हे, वे ही केवल अपने सुखका ध्यान रखते
हे । सूर्य, चन्द्रमा, मेघ, पृथ्वी, अग्रि, जल, चन्दन,
वृक्ष ओर संतपुरुष परोपकार करनेवाले इी होते
हे । वरानने! सुना जाता है कि पहले राजा
हरिद्र हुए थे, जिन्हें (सत्यरक्ाके लिये) स्त्री
ओर पुत्रको बेचकर चाण्डालके घरमे रहना पड़ा।
वे एक दुःखसे दूसरे भारी दुःखमें फसते चले
परंतु सत्यसे विचलित नहीं हए । उनके
सत्यसे संतुष्ट होकर इन्द्र आदि देवताओनि महाराज
हरिशचन्द्रको इच्छानुसार वर मांगनेके लिये प्रररित
करिया; तवर उन सत्यपरायण नरेशने ब्रह्मा आदि
देवताओंसे कहा-देवगण। यदि आप संतुष्टै
ओर मुञ्चे वर देना चाहते ह तो यह वर
दीजिये-' यह सारी अयोध्यापुरी बाल, वृद्ध,
तरुण, स्त्री, पशु, कोट-पतंग ओर वृक्ष आदिक
साथ पापयुक्त होनेपर भी स्वर्गलोकमें चली जाय
ओर अयोध्याभरका पाप केवल म लेकर निधितरूपसे
नरकमें जाऊ । देवेश्वरो ! इन सव लोगांको पृथ्वीपर
छोडकर मैं अकेला स्वर्गमें नहीं जारऊगा । यह मने
तोवेके भामे जलायी जाती है। पति ही नारीका
रक्षक ठे, पति ही गति हे तथा पति ही देवता ओर
गुरु है। जो उसके ऊपर वशीकरणका प्रयोग
करेगी, वह केसे सुख पा सकती है? वह तो
सेकड़ों वार पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेती
ओर अन्तमें गलित कोटके रोगसे युक्त स्त्री होती
हे । अतः महाराज ! स्त्रियोको सदा अपने स्वामीके
आदेशका पालन करना चाहिये! । राजन्! आज मै
आपको शरणमे आयी ह| यदि आप विजया
द्रादशीजनित पुण्य देकर मेरा उद्धार नहीं करेगे तो
मे फिर पातक युक्त कुत्सित योनिमे ही पड़
जाऊंगी । आपने जो सरयू ओर गङ्गाके पापनाशक
एवं पुण्यमय संगम-तीर्थमे श्रवण नक्षत्रयुक्त द्रादशीका
व्रत किया हे, वह पुण्यमयी तिथि प्रेतयोनिसे
छ्ुडानेवाली तथा मनोवाच्छित फल देनेवाली हे ।
भूपाल ! उस तिथिको जो मनुष्य घरमे रहकर भी
भगवान् श्रीहरिका स्मरण करते हैँ, उन्हें भगवान्
सव ती्थेकि फलकी प्राति करा देते हे । भूपते।
विजयाके दिन जो दान, जप, होम ओर देवाराधन
आदि किया जाता हे, वह सब अक्षय होता है
जिसका एेसा उत्कृष्ट फल है, उसीका पुण्य मुच
दीजिये। द्रादशीको उपवास करके त्रयोदशीको
पारण करनेपर मनुष्य उस एक उपवासके बदले
बारह व्पेकि उपवासका फल पाता हे । महीपाल ।
आप इस पृथ्वीपर धर्मके साक्षात् स्वरूप तथा
यमराजके मार्गका विध्वंस करनेवाले है; दया
करके मुञ्च दुखियाका उद्धार कोजिये।'
छिपकलीकी वात सुनकर मोहिनी बोली-
"प्रभो! मनुष्य अपने ही कियेका सुख ओर
१. यान्यापि युवतिर्भृप भर्तर्वश्यं समाचरेत् । वृथाधर्मं दुराचारा दद्यते ताप्रश्रष्के॥
भर्ता नाधो गतिर्भर्ता दैवतं गुरुव च। तस्य वश्यं चरद्यातु सा कथं सुखमाप्नुयात् ॥
तिर्यग्योनिशतं याति कृमिकुष्टममन्विता । तस्माद्धूपाल कर्तव्यं स्त्रीधिर्भ्तृवचः सदा ॥
(ना० उचर० १४। ३९--४१)
(-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 66810011
६०० संक्षिप्त नारदपुराण
सच्ची बात बतायी है ।' उनकी यह दृढता जानकर | छिपकलीके उस पुराने शरीरको त्याग दिया ओर
इन्द्र॒ आदि देवताओंने आज्ञा दे दी ओर उन्हीके | दिव्य शरीर धारण करके दिव्य वस्त्राभूषणोंसे
साथ वह सारी पुरी स्वर्गलोगमें चली गयी । देवि ! | विभूषित हो बह दसो दिशाओंको प्रकाशित करती
महिं दधीचिने देवताओंको देत्योंसे परास्त हआ 3
सुनकर दयावश उनके उपकारके लिये अपने
शरीरको हडर्योतक दे दीं । सुन्दरी ! पूर्वकालमें
राजा शिविने कवूतरको प्राणरक्षाके लिये भूखे
बाजको अपना मांस दे दिया था। वरानने! प्राचीन
कालमें इस पृथ्वीपर जीमूतवाहन नामसे प्रसिद्ध
एक राजा हो गये है, जिन्हौने एक सर्पकी
प्राणरक्षाके लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया
था। इसलिये देवि ! राजाको सदा दयालु होना
चाहिये । शुभे ! बादल पवित्र ओर अपवित्र स्थानमें
भी समानरूपसे वर्षा करता है। चन्द्रमा अपनी
शीतल किरणोसे चाण्डालों ओर पतितोंको भी
आह्ाद प्रदान करते हें । अतः सुन्दरि! इस दुःखिया
छिपकलीको में उसी प्रकार अपने पुण्य देकर
उद्धार करूगा, जेसे राजा ययातिका उद्धार उनके | हुई राजाकी आज्ञा ले अद्भुत वैष्णव धामको चली
नातियोने किया था। गयी । वह वेकुण्ठधाम योगि्योके लिये भी अगम्य
इस प्रकार मोहिनीको बातका खण्डन करके | है । वहाँ अग्नि आदिका प्रकाश काम नहीं देता । बह
राजाने छिपकलीसे कहा-' मैने विजयाका पुण्य | स्वयं प्रकाश, श्रेष्ठ, वरणीय तथा परमात्मस्वरूप हैः
तुम्हे दे दिया, दे दिया। अब तुम समस्त पापोंसे | अतः राजन्! यह अग्रिको भी प्रकाश देनेवाली
रहित हो विष्णुलोकको चली जाओ।' भूपाल! | विजया-द्वादशी (वामन-द्वादशी) सम्पूर्णं जगत्को
राजा रुक्माङ्गदके एेसा कहनेपर उस स्त्रीने सहसा | प्रकाश देनेके लिये प्रकट हुई हे। ५
मोहिनीके साथ राजा रुक्माङ्गदका वैदिश नगरको प्रस्थान, राजकुमार
धर्माङ्खदका स्वागतके लिये मार्गमे आगमन तथा पिता-पुत्र-संवाद
वसिष्ठजी कहते है -चछिपकलीको पापसे मुक्त | हई । राजा रुक्माङ्गद वड हर्षके साथ मार्गमे आये
करके राजा रुक्माङ्गद बड़ प्रसन्न हुए ओर वे | हए वृक्ष, पर्वत, नदी, अत्यन्त विचित्र वन, नाना
मोहिनीसे हंसते इए बोले-' घोड़पर शप्र सवार | प्रकारके मृग, ग्राम, दुर्ग, देश, शुभ नगर, विचित्र
हो जाओ।' राजाकी बात सुनकर मोहिनी वायुके | सरोवर तथा परम मनोहर भृभागका दर्शन करते
समान वेगवाले उस अश्वपर पतिके साथ सवार | हए वैदिश नगरमे आये, जो उनके अपने अधीन
((-0. 1\/८1114<511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग
६०१
था। गुप्तचरोके द्वारा महाराजके आगमनका |
सुनकर राजकुमार ध्माङ्गद हर्षम भर गये ओर अपने
वशवतीं राजाओंसे पिताके सम्बन्धे इस प्रकार
बोले-' नृपवरो! मेरे पिताका अश्च इधर आ पर्हुचा
हे। इसलिये हम सब लोग महाराजके सम्मुख चलें |
जो पुत्र पिताके आनेपर उनको अगवानीके लिये
सामने नहीं जाता, वह चौदह इन्द्रौके राज्यकालतक
घोर नरके पड़ा रहता हे । पिताके स्वागतके लिये
सामने जानेवाले पुत्रको पग-पगपर यज्ञका फल
प्राप्त होता है-एेसा पोराणिक द्विज कहते हैः । अतः
उदिये, मैं आप लोगोके साथ पिताजीको प्रेमपूर्वक
प्रणाम करनेके लिये चल रहा हू; क्योकि ये मेरे
लिये देवताओके भी देवता हें ।'
तदनन्तर उन सव राजाओने ' तथास्तु' कहकर
धर्मङ्कदकी आज्ञा स्वीकार कौ। फिर राजकुमार
ध्मङ्खद उन सबके साथ एक कोसतक पैदल
चलकर पिताके सम्मुख गये । मार्गमे दूरतक बद्
जानेके बाद उन्हे राजा रुक्माङ्गद मिले। पिताको
पाकर धर्मङ्गदने राजाओंके साथ धरतीएर मस्तक
रखकर भक्तिभावसे उन्हे प्रणाम किया। राजन्।
महाराज रुक्माङ्गदने देखा कि मेरा पुत्र प्रेमवश
अन्य सब नरेशेके साथ स्वागतके लिये आया है
ओर प्रणाम कर रहा है, तब वे घोड़से उतर पड़
ओर अपनी विशाल भरुजाओंसे पुत्रको उठाकर
उन्होने हदयस लगा लिया। उसका मस्तक संघा
ओर उस समय धर्माङ्गदसे इस प्रकार कहा" पुत्र!
तुम समस्त प्रजाका पालन करते हो न ? शत्नुभंको
दण्ड तो देते हो न ? खजानेको न्यायोपार्जित धनसे
भरते रहते हो न? ब्राह्यणोंको अधिक संख्यामं
स्थिर वृत्ति तुमने दी है न? तुम्हारा शील-स्वभाव
सवको रुचिकर प्रतीतं होता टै न? तुम किसीसे
त 7 त १ 1
कठोर वाते तो नहीं कहते 2 अपने राज्यके भीतर
प्रत्येक पुत्र पिताक आज्ञाका पालन करनेवाला है
न? वहुएे सासका कहना मानती हैँ न2 अपने
स्वामीके अनुकूल चलती है न ? तिनके ओर घाससे
भरी हुई गोचरभूमिमें जानेसे गोओंको रोका तो नहीं
जाता ? अन्न आदिके तोल ओर माप आदिका तुम
सदा निरीक्षण तो करते हो न ? वत्स! किसी बडे
कुटुम्बवाले गृहस्थको उसपर अधिक कर लगाकर
कष्ट तो नहीं देते? तुम्हारे राज्यमें कहीं भी
मदिरापान ओर जूआ आदिका खेल तो नहीं
होता 2 अपनी सब माताओंको समानभावसे देखते
हो न? वत्स। लोग एकादशीके दिन भोजन तो
नहीं करते 2 अमावास्याके दिन लोग श्राद्ध करते
हें न 2 प्रतिदिन रातके पिछले पहरमें तुम्हारी नींद
खुल जाती हे न? क्योकि अधिक निद्रा अधर्मका
मूल है । निद्रा पाप बदढानेवाली है । निद्रा दस्द्रिताकी
जननी तथा कल्याणका नाश करनेवाली दै।
निद्राके वशमें रहनेवाला राजा अधिक दिनतक
पृथ्वीका शासन नहीं कर सकता। निद्रा व्यभिचारिणी
स्त्रीकी भोति अपने स्वामीके लोक-परलोक दोनोंका
नाश करनेवाली हे ।'
पिताके इस प्रकार पष्छनेपर राजकुमार धमाद्गदने
महाराजको बार-बार प्रणाम करके कहा-' तात।
इन सव वातोका पालन किया गया हे ओर आगे
भी आपकी आज्ञाका पालन करूगा। पिताकी
माने जाते है । राजन् जो पिताकौ वात नीं मानता,
उसके लिवे उसये वदृकर ओर् पातक यादी
सकता है 2 जो पिताके वचनोंकी अवहेलना करके
गद्घा-स्नान करनेके लिये जाता टै ओर पिताक
आज्ाका पालन नहीं करता, उमे उम तीध-
ज क त को = = त ऋ क कः क
निः = क = ऋ = ऋ =
१. सम्मुखं व्रजमानस्य पुत्रस्य पितरं प्रति। पदे पदे यन्नफलं प्रोचुः पौराणिका द्विजाः ॥
(त° उनर० १५ १६)
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६०२
संक्षिप्त नारदपुराण
सेवनका फल नहीं मिलता । मेरा यह शरीर आपके
अधीन हे। मेरे धर्मपर भी आपका अधिकार है ओर
आप ही मेरे सबसे बडे देवता हैँ।' अनेकों
राजाओंसे धिरे हुए अपने पुत्र ध्माङ्गदको यह बात
सुनकर महाराज रुक्माद्गदने पुनः उसे छातीसे लगा
लिया ओर इस प्रकार कहा-' बेटा! तुमने ठीक
कहा है; क्योकि तुम धर्मके ज्ञाता हो। पुत्रके लिये
पितासे बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं हे। बेटा,
तुमने अनेक राजाओंसे सुरक्षित सात द्वीपवाली
पृथ्वीको जीतकर जो उसकी भलीभति रक्षा की है
इससे तुमने मुञ्चे अपने मस्तकपर बिठा लिया।
लोकमे यही सबसे बड़ा सुख दै, यही अक्षय
स्वर्गलोक है कि पुथ्वीपर पुत्र अपने पितासे अधिक
यशस्वी हो। तुम सद्गुणपर चलनेवाले तथा समस्त
राजाओंपर शासन करनेवाले हो । तुमने मुञ्चे कृतार्थ
कर दिया, ठीक उसी तरह जेसे शुभ एकादशी
तिथिने मुञ्चे कृतार्थं किया है।'
पिताको यह वात सुनकर राजपुत्र धर्माङ्गदने
पृछा--' पिताजी ! सारी सम्पत्ति मुञ्चे सौपकर आप
कहां चले गये थे? ये कान्तिमयी देवी किस
स्थानपर प्राप्त हुई हँ 2 महीपाल ! मालूम होता हे,
ये साक्षात् गिरिराजनन्दिनी उमा हँ अथवा क्षीरसागर-
कन्या लक्ष्मी हं 2 अहो ! ब्रह्माजी रूप-रचनामें
कितने कुशल ह, जिन्होने एेसी देवीका निर्माण
किया हे। राजराजेश्वर! ये स्वर्णगौरीदेवी आपके
घरकी शोभा बढाने योग्य हैँ । यदि इनको-जैसी
माता मुञ्चे प्राप्त हो जायं तो मुडासे बदकर
पुण्यात्मा दूसरा कोन होगा ।'
१ 7 4 0
धर्माङ्दद्वारा मोहिनीका सत्कार तथा अपनी माताको मोहिनीकी सेवाके लिये
एक पतिव्रता नारीका उपाख्यान सुनाना
वसिष्ठजी कहते है--धर्माङ्गदकी बात सुनकर
रुक्माङ्गदको बड़ी प्रसन्नता हई । वे बोले-' बेटा
सचमुच ही ये तुम्हारी माता हैं। ये ब्रह्माजीकी
पुत्री हे। इन्होंने बाल्यावस्थासे ही मुञ्चे प्राप्त
करनेका निश्चय लेकर देवगिरिपर कठोर तपस्या
प्रारम्भ को थी। आजसे पंद्रह दिन पूर्व मे घोडपर
सवार हो अनेक धातुओंसे सुशोभित गिरिश्रष्ठ
मन्दराचलपर गया धा। उसीके शिखरपर यह
बाला भगवान् महेश्वरको प्रसन्न करनेके लिये
संगीत सुना रही थी। वहीं मैने इस सुन्दरीका
दर्शन किया ओर इसने कुछ प्रार्थनाके साथ मुञ्च
पतिरूपमें वरण किया । मेने भी इन्हें दाहिना हाथ
१.पितुर्वचनकर्तारः पुत्रा
देकर इनको मुंहमागी वस्तु देनेकौ प्रतिज्ञा को
ओर मन्दराचलके शिखरपर ही विशाल नेत्रोंवाली
ब्रह्यपुत्रीको अपनी पत्नी बनाया। फिर पृथ्वीपर
उतरकर घोड़ेपर चटढा ओर अनेक पर्वत, देश,
सरोवर एवं नदियोंको देखता हुआ तीन दिनमे
वेगपूर्वक चलकर तुम्हारे समीप आया हू ।'
पिताका यह कथन सुनकर शत्रुदमन धर्माङ्गदने
घोडेपर ची हुई माताके उद्ेश्यसे धरतीपर मस्तक
रखकर प्रणाम करते हुए कहा-“देवि ! आप मेरी
माँ है, प्रसन्न होडये । म आपका पुत्र ओर दास हू ।
माता! अनेक राजाओंके साथ म आपको प्रणाम
करता हूँ!" राजन्! मोहिनी राजपुत्र ध्मङ्गिदको
धन्या जगत्त्रये । किं ततः पातकं राजन् यो न कुर्यात्पितर्वचः ॥
पितृवाक्यमनादृत्य त्रजेत्छातुं त्रिमार्गगाम् । न तत्तीर्थफलं भुड्क्ते यो न कुर्यात् पितुर्वचः ॥
(ना० उत्तर० १५॥। ३४-३५)
((-0. 1/८1114<511॥1 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 66810011
{8 7)
उत्तरभाग
६०३
धरतीपर गिरकर प्रणाम करते देख घोडसे
पड़ी ओर उसने दोनों बाहोंसे उसे उठाकर हृदयसे
लगा लिया। फिर कमलनयन धर्माङ्गदने मोहिनीको
अपनी पीठपर पैर रखवाकर उस उत्तम घोडेपर
चदधाया। राजन्! इसी विधिसे उसने पिताको भी
घोड़ेपर विठाया। तत्पश्चात् राजकुमार धर्माङ्गद
अन्य राजाओंसे धिरकर पैदल ही चलने लगे। अपनी
माता मोहिनीको देखकर उनके शरीरमें हषतिरेकसे
रोमाञ्च हो आया ओर मेघके समान गम्भीर वाणीमं
अपने भाग्यकौ सराहना करते हुए वे इस प्रकार
वोले-' एक माताको प्रणाम करनेपर पुत्रको समूची
पृथ्वीकी परिक्रमाका फल प्राप्त होता है; इसी
प्रकार बहुत-सी माताओंको प्रणाम करनेपर मुञ्च
महान् पुण्यकी प्रापि होगी ।' राजाओंसे धिरकर
इस प्रकारकी बातें करते हए धर्माद्भदने परम
समृद्धिशाली रमणीय वैदिश नगरमे प्रवेश किया।
मोहिनीके साथ घोदेपर चद हए राजा स्क्माद्भद
भी तत्काल वहां जा पहुंचे। तदनन्तर राजमहलके
समीप पहुंचकर परिचारकोसे पूजित हो राजा घोडेसे
उतर गये ओर मोहिनीसे इस प्रकार बोले-“ सुन्दरि।
तुम अपने पुत्र धर्मद्गदके घरमे जाओ। ये गुणेकि
अनुरूप तुम्हारी गुरुजनोचित सेवा करेगे ।'
पतिके एेसा कहनेपर मोहिनी पुत्रके महलकी
ओर चली । ध्मङ्गिदने देखा, पतिकी आज्ञासे माता
मोहिनी मेरे महलकौ ओर जा रही हैँ । तव उन्होने
राजाओंको वहीं छोड दिया ओर कहा, आप लोग
ठदहरं। म पिताकी आज्ञासे माताजीकी सेवा करगा।'
एेसा कहकर वे गये ओर माताको घरमे ले गये।
पंद्रह पग चलनेके वाद एक पलंगके पास
पहुंचकर उन्होने माताको उसपर विटाया। वह
पलंग सोनेका बना ओर् रेशमी मूृतमे ब्रुना हुआ
था। अतः मजवृूत होनेके साथ ही कोमल भी था।
उस पलंगमें जहा - तहां मणि ओर रन्न जड हुए
थे । मोहिनीको पलंगपर वैठाकर धर्माद्गदने उसके
चरण धोये। संध्यावलीके प्रति राजकुमारके मनम
जो गौरव धा, उसी भावसे वे मोहिनीको भी देखते
थे। यद्यपि वे सुकुमार एवं तरुण थे ओर मोहिनी
भी तन्वद्गी तरुणी थी तथापि मोहिनीके प्रति
उनके मनमें तनिक भी दोप या विकार नहीं उत्पन्न
ह॒आ। उसके चरण धोकर उन्होने उस चरणोदकको
मस्तकपर चदाया ओर विनम्र होकर कहा-'मों।
आज मैं बड़ा पुण्यात्मा हूं ।' एेसा कहकर धर्माङ्गदने
स्वयं तथा दूसरे नर-नारियोके संयोगसे मोहिनी
माताके श्रमका निवारण किया ओर प्रसत्नतापूर्वक
उनके लिये सव प्रकारके उत्तम भोग अर्पण किये।
्षीरसागसर्का मन्थन होते समय जो दो अमृतवर्षी
कुण्डल प्राप्त हृए् थे, उन्हें धममाङ्गदने पातालम
जाकर दानवींको पराजित करके प्राप्त किया धथा।
उन दोनों कुण्डलोको उन्होनि स्वयं मो्हिनीके
कानों पहना दिया। ओंवलेके फल चराव्रर् सुन्दर
((-0. 1\/1(11114/5511॥1 2118811 \/8/81185। (01661101. 01411260 0 60810011
६०
मोतीके एक हजार आठ दानोंका बना हुआ सुन्दर
हार मोहिनीदेवीके वक्षःस्थलपर धारण कराया।
सो भर सुवर्णका एक निष्क (पदक) तथा सहस्तों
हीरोसे विभूषित एक सुन्दर लघृत्तर हार भी उस
समय राजकुमारने माताको भेट किया। दोनों
हाथोमें सोलह-सोलह रत्रमयी चूडियों, जिनमें
हीरे जडे हए थे, पहनाये। उनसे एक-एकका
मूल्य उसको कोमतको समञ्ञनेवाले लोगोने एक-
एक करोड स्वर्ण- मुद्रा निश्चित किया था। केयूर
ओर नूपुर भी जो सूर्यके समान चमकनेवाले थे,
राजकुमारने उसे अर्पित कर दिये। उस समय
धममङ्धदका अद्ग-अद्धं आनन्दसे पुलकित हो उठा
धा । पूर्वकालमे हिरण्यकशिपुकी जो त्रिलोकसुन्दरी
पत्री थी, उसके पास विद्युत्के समान प्रकाशमान
एक जोड़ा सीमन्त (शीशपूल) था । वह पतिव्रता
नारी जबर पतिके साथ अग्रिमे प्रवेश करने लगी
तो अपने सीमन्तको अत्यन्त दुःखके कारण
समुद्रमं फक दिया । कालान्तरमें धर्माङ्गदके पराक्रमसे
संतुष्ट हो समुद्रने उन्हे वे दोनों रत्न भट कर दिये।
धर्माङ्गदने प्रसन्नतापूर्वक वे दोनों सीमन्त भी
मोहिनी माताको दे दिये। अत्यन्त मनोहर दो
सुन्दर साड्यां ओर दो चोलि्या, जिनकी कीमत
कोटि सहस्र स्वर्णमुद्रा थी, धर्माङ्गदने मोहिनीको
भेट कौं । दिव्य माल्य, उत्तम गन्धसे युक्त दिव्य
अनुलेपन जो सम्पूर्णं देवताओंके गुरु वृहस्पतिजीके
सिद्ध हाथसे तेयार किया हुआ तथा परम दुर्लभ
था ओर जिसे वीर ध्माद्धदने सम्पूर्ण द्वीपोकी
विजयके समय प्राप्त किया था; मोहिनी देवीको दे
दिया। राजन्! इस प्रकार मोहिनीको विभूषित
करके राजकुमारने बड़ी भक्तिके साथ प्रस
भोजन मंगाया ओर अपनी माताके हाथसे मोहिनीको
भोजन कराया।
व्रहुत समञ्ञा-चुञ्जाकर माता संध्यावलीको इस्
सक्षिप्त नारदपुराण
सपलीसेवाके लिये तेयार कर लिया था। उन्होने
कहा थधा-' देवि! मेरा ओर तुम्हारा कर्तव्य है कि
राजाकी आज्ञाका पालन करें । स्वामीको स्नेहको
दृष्टिसि जो अधिक प्रिय है, उसके साथ स्वामीका
स्नेह छुडानेके लिये जो सौतिया-डाह करती हे
वह यमलोकमें जाकर तोबेके भामे भूंजी जाती
हे । अतः पतिव्रता पत्रीका कर्तव्य है कि जिस
प्रकार स्वामीको सुख मिले, वेसा ही करे। श्रेष्ठ
वर्णवाली माँ! स्वामीको ही भाति उनको प्रियतमा
पतीको भी आदरको दृष्टिसे देखना चाहिये । जो
सपत्नी अपनी सौतको पतिक प्यारी देख उसको
सदा सेवा-शुश्रूषा करती हे, उसे अक्षय लोक प्राप्त
होता हे।
"प्राचीन कालक बात है, एक दुष्ट प्रकृतिका
शूद्र था, जिसने अपने सदाचारका परित्याग कर
दिया था। उसने अपने घरमे एक वेश्या लाकर
रख ली । शृद्रक विवाहित पल्ली भी थी, कितु वह
वेश्या ही उसको अधिक प्रिय थी। उसकी स्त्री
पतिको प्रसन्न रखनेवाली सती थी। वह वेश्याके
साथ पतिकी सेवा करने लगी। दोनोंसे नीचे
स्थानमें सोती ओर उन दोनोंके हितमें लगी रहती
थीं । वेश्याके मना करनेपर भी उसकी सेवासे मुंह
नहीं मोडती थी ओर सदाचारके पावन पथपर
दृदरतापूर्वक स्थित रहती थी । इस प्रकार वेश्याके
साथ पतिको सेवा करते हए उस सतीके बहुत
वर्ष बीत गये। एक दिन खोरी बरुद्धिवाले उसके
पतिने मूलीके साथ भैसका दही ओर तेल मिलाया
हुआ ' निष्पाव" खा लिया । अपनी पतिव्रता स्त्रीकीं
बात अनसुनी करके उसने यह कुपथ्य भोजन कर
लिया। परिणाम यह हुआ कि उसको गुदामें
भगंदर रोग हो गया। अव वह दिन-रात उसकी
जलनसे जलने लगा। उसके घरमे जो धन था,
उमे लेकर वह वैश्या चली गयी । तव वह शुद्र
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661011. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग ६०५
लज्नामे डूबकर दीनतापूर्ण मुखसे रोता हुआ चितापर उसने घी छिदक दिया ओर वीचमें
पतीसे बोला । उस समय उसका चित्त वड़ा व्याकुल | पतिको सुलाकर स्वयं भी उसपर् चद् गयी । चह
था। उसने कहा-' देवि ! वेश्यामें फंसे हुए मुड्य र 11, इमः
निर्दयीकी रक्षा करो। मुञ्च पापीने तुम्हारा कुछ भी
उपकार नहीं किया। बहुत वर्पोतक उस वेश्याके
ही साथ जीवन विताता रहा। जो पापी अपनी
विनीत भार्याका अहंकारवश अनादर करता हे,
वह पंद्रह जन्मोतक उस पापके अशुभ फलको
भोगता ठे।' पतिक यह वात सुनकर शूद्रपती
उससे बोली-' नाथ! पूर्वजन्मके किये हुए पाप
ही दुःखरूपमें प्रकट होते है । जो विवेको पुरुप
उन दुःखोंको धैयपूर्वक सहन करता है, उसे
मनुप्योमें श्रेष्ट समञ्जना चाहिये ।' एेसा कहकर
उसने स्वामीको धीरज वंधाया। वह सुन्दरी नारी
अपने पिता ओर भाइयोंसे धन मोग लायी । वह
अपने पतिको क्षीरशायी भगवान् मानती थी।
प्रतिदिन दिनमें ओर रातमें भी उसको गुदाके
घावको धोकर शुद्ध करती थी । रजनीकर नामक
वृक्षका गोद लेकर उसपर लगाती ओर नखद्रारा
धीरे -धीरे स्वामीके कोढसे कीड़ोंको नीचे गिराती
थी । फिर मोरपंखका व्यजन लेकर उनके लिये
हवा करती थी। माँ! वह श्रेष्ठ नारी न राते
सोती थी, न दिनमे। थोडे दिनोके वाद उसके
पतिको त्रिदोष हो गया। अव वह बडे यतस
सोंट, मिर्च ओर पीपल अपने स्वामीको पिलाने
लगी। एक दिन सर्दीसि पीडित हो कंपते हए ||
पतिने पन्रीकी अंगुली काट ली। उस्र समय |-------------------
सहसा उसके दोनां दति आपसमे सट गये ओर | सुन्दर अङ्गो वाली सती प्रज्वलित अग्रिमं देहका
वह कटी हई अंगुली उसके मुँहके भीतर हौ रह | परित्याग करके पतिको साध ले सहसरा देवलीककों
गयी । महारानी! उसी दशामें उसकी मृत्यु हो | चली गयी 1 उसने, जिसका साधन कठिन दे, एसे
गयी। अव वह अपना कंगन वेचकर काठ | दुष्कर कर्मद्वारा बहुत-सी पापराशि्योंको शुद्ध कर
खरीद लायी ओर उसकी चिता तैयार क्रौ।। दिया था।
१ 7 4 0
जानकि
"भ
कक
१ कोः द ¬ कः ज = कः
((-0. 1\/॥८11104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
६०६
संक्षिप्त नारदपुराण
संध्यावलीका मोहिनीको भोजन कराना ओर धर्माङ्गदके मातुभक्ततिपूर्णं वचन
ध्मङ्गद कहते है- मां ! इस बातपर विचार
करके मोहिनीको भोजन कराओ। एेसा धर्म तीनों
लोकोमें कहीं नहीं मिलेगा । श्रेष्ठ वर्णवाली माताजी ।
पिताको सुख पहुंचाना ही हम दोनोंका कर्तव्य हे |
इससे इस लोकमें हमारे पापोंका भली भोति नाश
होगा ओर परलोकमें अक्षय स्वर्गकी प्रापि होगी।
पुत्रको यह बात सुनकर देवी संध्यावलीने
उसके साथ कुछ विचार-विमर्शं किया। फिर
पुत्रको वार-वार हदयस लगाकर उसका मस्तक
सृघा ओर इस प्रकार कहा- बेटा! तुम्हारी वात
धर्मसे युक्त हे। जतः मे उसका पालन करूगी।
ईर्प्या ओर अभिमान छोडकर मोहिनीको अपने
हाथसे भोजन कराऊगी । बेटा! व्रतराज एकादशीके
अनुष्ठानसे तुञ्च-जेसा पुत्र मुञ्चे प्राप्त हुआ हेै।
लोकमें एसा लाभदायक व्रत दूसरा नहीं देखा
जाता। यह वबड-बड पातकोंका नाश करनेवाला
तथा तत्काल फल देकर अपने प्रति विश्वास
बदानेवाला हे । शोक ओर संताप देनेवाले अनेक
पुत्रोके जन्मसे क्या लाभ ? समूचे कुलको सहारा
देनेवाला एक ही पुत्र श्रेष्ठ है, जिसके भरोसे
समस्त कुल सुख-शान्तिका अनुभव करता है\।
तुम्हे अपने गर्भम पाकर मैं तीनों लोकोंसे ऊपर
उठ गयी। पुत्र! तुम शूरवीर, सातों द्वीपोके
अधिपति तथा पिताके आज्ञापालक हो एवं पिता
ओर माता दोनोंको आह्वाद प्रदान करते हो। एेसे
पुत्रको ही विद्वानोने पुत्र कहा है। दूसरे सभी
नाममात्रके पुत्र है ।'
एेसा वचन कहकर उस समय देवी संध्यावलीने
षड्रस भोजन रखनेके लिये पात्रंकी ओर दृष्टिपात
किया। राजन्! उसको दृष्टि पड़नेमात्रसे वे सभी
पात्र उत्तम भोजनसे भर गये । महीपते । मोहिनीको
भोजन करानेके लिये कुछ-कुछ गरम ओर
षड्रसयुक्त भोजनको तथा अमृतके समान स्वादिष्ट
जलको व्यवस्था हो गयी। तदनन्तर रत्रजरित
सुवर्णमयी चम्मच लेकर मनोहर हास्यवाली रानी
संध्यावलीने शान्तभावसे मोहिनीको भोजन परोसा।
सोनेके चिकने पात्रमे, जिसमें उचितमात्रामें सब
प्रकारका भोज्य पदार्थ रखा हआ था, मोहिनी
देवी सोनेके सुन्दर आसनपर वैठकर अपनी
रुचिके अनुकूल सुसंस्कृत अन्न धीरे-धीरे भोजन
करने लगी। उस समय ध्मङ्गिदके द्वारा व्यजन
इलाया जा रहा था।
मोहिनीके भोजन कर लेनेके अनन्तर राजकुमारने
उसे प्रणाम करके कहा-"देवि ! इन संध्यावली
देवीने मुञ्चे तीन वर्षतक अपने गभमिं धारण किया
हे तथा आपके पतिदेवके प्रसादसे पलकर में
इतना बड़ा हुआ हू। मनोहर अद्खोंवाली देवि!
तीनों लोकोमें एेसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे देकर
पुत्र अपनी मातासे उऋण हो सके ।'
पुत्र धरमङ्गदके एेसा कहनेपर मोहिनीको बड़ा
आश्चर्य हुआ। वह सोचने लगी-' जिसमें पिताकी
सेवाका भाव है, उसके समान इस पृथ्वीपर
दूसरा कोई नहीं हे। जो इस प्रकार गुणोपें
बदा-चदढा हे, उस धर्मात्मा पुत्रके प्रति म माता
होकर कैसे कुत्सित वर्ता कर सकती हूं।'
मोहिनी इस तरह नाना प्रकारके विचार करके
पुत्रसे बोली- तुम मेरे पतिको शीघ्र बुला लाओ,
मे उनके विना दो घड़ी भी नहीं रह सकती ।' तव
१. किं जातेर्बहुभधिः पुत्रैः शोकसंतापकारकैः। वरमेकः कुलालम्बी यत्र विश्रमते कुलम्॥
(ना० उत्तर० १७। १०)
((-0. 1/८111(4<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग
६०७9
उसने तुरत ही पिताके पास जा उन्हें प्रणाम करके
कहा-' तात! मेरी छोटी मों आपका शीघ्र दर्शन
करना चाहती हे ।' पुत्रकौ यह बात सुन॑फर राजा
रुक्माङ्गद तत्काल वहां जानेको उद्यत हुए । उनके
मुखपर प्रसन्नता छा गयी । उन्होने महलमें प्रवेश
करके देखा, मोहिनी पलंगपर सो रही है । उसके
शरोरसे तपाये हए सुवर्णको-सी प्रभा फेल रही
ओर उस बालाक महारानी संध्यावली धीरे-धीरे
सेवा कर रही हं। प्रचुर दक्षिणा दनेवालं राजा
रुक्माङ्गदको शय्याके समीप आया देख सुन्दरी
मोहिनीका मुख प्रसन्रतासे खिल उठा ओर उसने
राजासे कहा--' प्राणनाथ । कोमल विछोनोंसे युक्त
इस पलंगपर वैव्यि। जो मानव दूसरे-दूसरे
का्यमिं आसक्त होकर अपनी युवती भायाका
सेवन नहीं करता, उसकी वह भार्या केसे रह
सकती हे 2 जिसका दान नहीं किया जाता, वह
धन भी चला जाता हे, जिसको रक्षा नहीं कां
८-#८=# २९१
जाती, वह राज्य अधिक कालतकर नहीं रिक पाता
ओर जिसका अभ्यास नहीं किया जाता, वह
शास्त्रज्ञान भी रिका नहीं होता । आलसी लोगोको
विद्या नहीं मिलती । सदा व्रतमें ही लगे रहनेवालोको
पलीका प्राति नहं होती । पुरुपार्थके विना लक्ष्मी
नहीं मिलतीं। भगवानकी भक्तिके विना यशकी
प्रापि नहीं होती । विना उद्यमके सुख नहीं मिलता
ओर विना पल्लीके संतानको प्रासि नहीं होती।
अपवित्र रहनेवालेको धर्म-लाभ नहीं होता । अप्रिय
वचन वाोलनंवाला ब्राह्मण धन नहीं पाता। जो
गुरुजनोंसे प्रश्न नहीं करता, उसे ततत्वका ज्ञान नहीं
होता तथा जो चलता नहीं, वह कीं पर्हंच नहीं
सकता। जो सदा जागता रहता हे, उमे भय नहीं
होता। भूपाल! प्रभो! आप राज्यकाजमं समर्थं पुत्रके
होते हुए भी मुञ्चे धमाङ्गदके सुन्दर महलमं अकेली
छोड राजका कायं क्या दखते ह 2' तव राजा
रुक्माङ्गद उसे खान्त्वना देते हए बाले ।
< # 9
धर्माङ्दका माताओंसे पिता ओर मोहिनीके प्रति उदार होनेका अनुरोध तथा
पुत्रद्वारा माताओंका धन-वस्त्र आदिसे समादर
राजाने कहा-- भीरु! मैने राजलक्ष्मी तथा
राजकीय वस्तुओंपर पुनः अधिकार नहीं स्थापित
किया है। मैने धर्म्दको पुकारकर यह अदेश
दिया था कि * कमलनयन ! तुम मोहिनीको सम्पूर्ण
रल्ोसे विभूषित अपने महलमे ते जाओ आर
इसकी सेवा करो; क्योकि यह मरां सवरस प्यारा
पत्री है । तुम्हारा महल हवादार भी है ओर उसमें
हवासे बचनेका भी उपाय है । वह सभी ऋतु ओं
सुख देनेवाला है, अतः वहीं ले जाओ।' पुत्रको
इस प्रकार आदेश देकर मैं कष्मे वचनेके लिय
विद्छौनेपर गया। शय्यापर पर्टृचते ही मुञ्च नीद आ
गयी ओर अभी-अभी ज्यांदही जगार, सहमा
तुम्हारे पास चला आया हू । देवि! तुम जो कुष
भी कदोगी, उसे निस्संदेह पूर्णं करूगा।
मोहिनी बोली- राजेन्द्र ! मेरे विवाहसे अत्यन्त
दुःखित हुई इन अपनी पलियोको धीरज वंधाओ।
इन पतित्रताओके ओसुओंसे दग्ध होनेपर मेरे
मनमे स्या शान्ति होगी 2 भूपाल! ये पतिव्रता
देवियाँ तो मेरे पिता ब्रह्माजीको भी भस्म करं
सकती रै । फिर आप-जैमे प्राकृत नरशको ओर
मेरी-जेसी स्त्रीको जला देना इनके लिये कौन
चढ़ी बात टै? भूमिपाल! महारानी मंध्याव्लीके
ममान नागी तीनों लोकोमं कदां नहीं दै} इनक]
पक-णकः अद्र आपके म्नहपाणम् वधाद हे;
((-0. 1\/1(11114/5511॥1 21188 \/8/81/185। (01661010. 14111260 0 66810011
६०८
इसीलिये ये मुञ्चे बड़ प्यारसे षड्रस भोजन कराती
हं ओर आपके ही गौरवसे मुञ्चे प्रिय लगनेवाली
मीटी-मीठी बातें सुनाती है । इन्दीके स्वभावकी
सैकड़ों देवि्याँ आपके घरकी शोभा बढा रही हे ।
महीपते! में कभी इन सवके चरणोंकी धूलके
बराबर भी नहीं हो सकती।
पुत्रके साथ खडी हुई जटी रानीके समीप
मोहिनीका यह वचन सुनकर राजा रुकमाङ्गद बहुत
लज्जित हुए। तव ध्माङ्गदने कहा-“ माताओ ! मेरे
पिताको मोहिनीदेवी तुम सबसे अधिक प्रिय हे।
वे मन्दराचलके शिखरसे उस बालाको अपने साथ
क्रोडाके लिये ले आये हैं । (अतः ईर्प्या छोडकर
तुम सव लोग पिताके सुखमें योग दो)
पुत्रको यह वात सुनकर सव मातां बोलीं-
"चेटा! तुम्हारे न्याययुक्तं वचनका पालन हम
अवश्य करेगी | '
माताओंको यह वात सुनकर राजकुमार धर्माङ्गदने
प्रसन्नचित्तसे एक-एकके लिये एक-एक करोडसे
अधिक स्वर्णमुद्रा्णँ हजार-हजार नगर ओर गाँव
संक्षिप्त नारदपुराण
तथा आठ-आटठ सुवर्णमण्डित रथ प्रदान किये।
एक-एक रानीको उन्होने दस-दस हजार बहुमूल्य
वस्त्र दिय्, जिनमेसे प्रत्येकका मूल्य सौ स्वर्णमुद्रासे
अधिक था। मेरुपर्वतकौी खानसे निकले हुए
शुद्ध एवं अक्षय सुवर्णकौ ढाली हुई एक-एक
लाख मुद्राएं उन्होने प्रत्येक माताको अर्पित कौं।
साथ ही एक-एकके लिये सौसे अधिक दासियां
भी दीं। घड़के समान थनवाली दस-दस हजार
दुधारू गाये ओर एक-एक हजार वेल भी दिये।
तदनन्तर भक्तिभावसे राजकुमारने सभी माताओंको
एक-एक हजार सोनेके आभूषण दिये, जिनमें
हीरे जड हुए थे। ओंवले बरावर मोतीके बने
हुए प्रकाशमान हारोंकी करई ढेरियां लगाकर उन
माताओंको दे दीं। सभीको पचपच या सात-
सात वलय (कड) भी दिये। महीपते ! महारानी
संध्यावलीके पास चन्द्रमाके समान चमकीले
ढाई सौ मोतीके हार थे। धर्मङ्गदने एक-एक
माताको दो-दो मनोहर हार दिये। प्रत्येकको
चौवीस सौ सोनेकी थालियाँ ओर इतने ही घडे
प्रदान किये । राजन्! हर एक माताके लिये सौ-
सौ सुन्दर पालकि्योँ ओर उनके ढोनेवाले मोटे-
ताजे शीघ्रगामी कहार दिये । इस प्रकार कुबेरके
समान शोभा पानेवाले उस धन्य राजकुमारने
बहत-सी माताओंको वहुत-सा धन देकर उन
सवक परिक्रमा की ओर हाथ जोड़कर यह
वचन कहा--' माताओ। म आपके चरणोमें
मस्तक रखकर प्रणाम करता हू । आप सब लोग
मेरे अनुरोधसे पतिके सुखकी इच्छा रखकर मेरे
पितासे आज ही चलकर कहें कि-' नरेश्वर!
ब्रह्मकुमारी मोहिनी बड़ी सुशीला हैं। आप
इनक साथ सैकड़ों वर्पोतक सुखसे एकान्तमें
निवास करे।'
पुत्रका यह वचन सुनकर सबके शरीरम
„ (-0. 41144511 81184811 \/8181185। 01661101. 01411260 0 €8010011
उत्तरभाग
६०९
हर्पातिरेकसे रोमाञ्च हो आया । उन सवने महाराजसे | तेजसे हमारी हार्दिक भावना दुःखरदित हो गयी
जाकर कहा-' आर्यपुत्र | आप ब्रह्मकुमारी मोहिनीके | है, इसलिये हमने आपसे यह बात कदी है । आप
साथ दीर्घकालतक निवास करें। आपके पुत्रके | इसपर विश्वास कीजिये ।'
=
| + / + ^
११109
राजाका अपने पुत्रको राज्य सौपकर नीतिका उपदेश देना ओर धर्माङ्कदके
सुराज्यको स्थिति
वसिष्ठजी कहते है - राजन्! अपनी पतियोके
इस प्रकार अनुमति देनेपर महाराज रुक्माङ्गदके
हर्पको सीमा न रही । वे अपने पुत्र धर्माङ्गदसे इस
प्रकार बोले-' बेटा! इस सात द्वीपोवाली
पालन करो । सदा उद्यमशील ओर सावधान रहना।
किस अवसरपर क्या करना उचित है, इसका सदा
ध्यान रखना। सदाचारका पालन हो रहा है या
नही, इसको ओर दृष्टि रखना। सदा सचेत रहना
ओर वाणिज्य-व्यवसायको सदा प्रिय कार्य समञ्जकर
उसे बढाना। राज्यम सदा भ्रमण करते रहना,
निरन्तर दानमे अनुरक्त रहना, कुटिलतासे सदा दूर
ही रहना ओर नित्य-निरन्तर सदाचारके पालनमें
संलग्र रहना। बेटा! राजाओके लिये सर्वत्र अविश्वास
रखना ही उत्तम बताया जाता है। खजानेको
जानकारी रखना आवश्यक है ।'
पिताकी यह बात सुनकर उत्तम बुद्धिवाले
धर्माङ्गदने भक्तिभावसे मातासहित उन्हे प्रणाम
किया। फिर उस राजकुमारने उन नुपश्रष्ट सुक्माङ्गदको
असंख्य धन दिया। उनकी आकज्ञाका पालन करनेके
लिये बहुत-सै सेवको ओर कण्ठमं सुवर्णका हार
धारण करनेवाली बहुत-सी दासि्योको नियुक्त
किया। इस प्रकार पिताको सुख पर्टुचानेके लिये
पुत्रने सारी व्यवस्था को। फिर उसने पृथ्वीकी
रक्षाका कार्य संभाला। तदनन्तर अनेक राजाओंसे
धि हए रजा धर्माद्गद सातो द्वीपोयं युक्त सम्पूर्ण
पृथ्वीपर भ्रमण करने लगे । उनके भ्रमण करनेसे
परिणाम यह होता था कि जनताके मनमें पापवुद्धि
नहीं आती थी । उनके राज्यमें कोई भी वृक्ष फल
ओर फूलसे हीन नहीं था। कोई भी खेत ठेसा
नहीं था जिसमे जौ या धान आदिकी खेती
लहलहाती न हो। उस राज्यकी खभी गौपं
घड़ाभर दूध देती थीं। उस दृधे घीका अंश
अधिक होता था ओर उसमे शक्करके समान
मिठास रहती थी। वह दूध उत्तम पेय, सव
रोगोंका नाशक, पापनिवारक तथा पुष्टिवर्धक
होता था। कोई भी मनुष्य अपने धनको छिपाकर
नहीं रखता था । पत्नी अपने पतिसे कटुवचन नहीं
बोलती थी । पुत्र विनयशील तथा पिताक आज्नाके
पालनमें तत्पर होता था। पुत्रवधू सासके हाथमे
रहती थी । साधारण लोग ब्राह्यणोके उपदेशक
अनुसार चलते थे। श्रेष्ठ द्विज वेदोक्तं धर्मोकिा
पालन करते थे। मनुष्य एकादशीके दिन भोजन
नहीं करते थे । पृथ्वीपर नदियां कभी सृखती नहीं
थीं । धर्माङ्गदके राज्यपालनमें प्रवृत्त होनपर सम्पूर्ण
जगत् पुण्यात्मा हो गया धा। भगवान् दिन
एकादशी-व्रतका सेवन करनेसे सव लीग इस
जगतमे सुख भोगकर अन्मे भगवान् विष्णुके
वैकुण्डधाममं जाते थे । भृपाल ! चर् ओर लुटेरोका
भय नहीं था। अतः अंधेरी गाते भी कोई अपने
घरक दरवाजे नहीं वंद करने थे। इच्छानुसार
((-0. 1\/॥(111104/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 6810011
६१० संक्षिप्त नारदपुराण
विचरनेवाले अतिथि घरपर आकर ठहरते थे। | सब लोगोमे धर्म-प्रेमकी प्रधानता थी। सभी
(किसीके लिये कहीं रोक-टोक नहीं थी।) हल | भगवान् विष्णुकौ भक्तिमें लगे रहते थे । राजकुमार
चलाये विना ही सब ओर अन्नरकी अच्छी उपज | ध्माङ्गदके द्वारा सारी जनता सुरक्षित थी ओर
होती थी। केवल माताके दूधसे बच्चे खूब हष्ट- | सबका समय बड़े सुखसे बीत रहा था।
पुष्ट रहते थे ओर पतिके संयोगसे युवतिर्यां भी पुष्ट उधर राजा रुक्माद्भद नीरोग रहकर सव
ओर संतुष्ट रहती थीं । राजाओंसे सुरक्षित होकर | प्रकारके ेश्चर्यसे सम्पन्न हो प्रचुर दानकी वर्षा
समस्त जनता ष्ट- पुष्ट रहती थी तथा शक्तिसहित | करते ओर उत्सव मनाते धे। वे मोहिनीकी
धर्मका भी भलीभोति पोषण होता था। इस प्रकार । चेष्टाओंके सुखसे अत्यन्त मुग्ध थे।
(~ +~
धर्माङ्खदका दिग्विजय, उसका विवाह तथा उसकी शासन-व्यवस्था
वसिष्ठजी कहते है- राजन्! इस प्रकार मोहिनीके
विलाससे मोहित हए राजा रुक्माङ्गदके आठ वर्ष
वडे सुखसे वीते। नवम वर्प आनेपर उनके
बलवान् पुत्र धर्माङ्गदने मलयपर्वतपर पोच विद्याधरोको
परास्त किया ओर उनसे पोच मणियोंको छीन
लिया, जो सम्पूर्णं कामनाओंको देनेवाली ओर
शुभकारक थीं । एक मणिमें यह गुण था कि वह
प्रतिदिन कोटि-कोरि गुना सुन्दर सुवर्णं दिया
करती थी। दूसरी लाखकोरि वस्त्राभूषण आदि
दिया करती थी । तीसरी अमृतकी वर्षा करती ओर
वुदढापेमे भी पुनः नयी जवानी ला देती धथी।
चौथीमें यह गुण था कि वह सभाभवन तैयार कर
देती ओर उसमें इच्छानुसार अन्न प्रस्तुत किया (द
करती थी। पांचवीं मणि आकाशमें चलनेको | विजय पायी है । नृपश्रष्ट ! वे अपनी स्त्रियो सहित
शक्ति देती ओर तीनों लोकोमें भ्रमण करा देती | आपके सेवक हो गये हं। आप ये मणियां
थी। उन पाचों मणियोंको लेकर धर्माङ्गद मनः- | मोहिनी देवीको दे दीजिये । वे इनके द्वारा अपनी
शक्तिसे पिताके पास आये। राजकुमारने पिता | बाहोंको विभूषित कररेगी। ये मणि्याँ समस्त
रुक्माङ्गद ओर माता मोहिनीके चरणोमें प्रणाम | कामनाओंको देनेवाली हं । भूपते! आपके ही
किया ओर उनके चरणे पाचों मणि समर्पित | प्रतापसे मैने सातों द्वीपोंको बडे कष्टसे अपने
करके विनीत भावसे कहा-“ पिताजी ! पर्वतश्रेष्ठ | अधिकारमें किया है ।' तदनन्तर कुमार् धर्माद्गदने
मलयपर मैने वेष्णवास्तरह्रारा पाँच विद्याधरोंपर | नागोकी भोगपुरी, विशाल दानवपुरी ओर वरुणलोकके
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/81/185। (01661010. 01411260 0 60810011
उत्तरभाग ६१९
तथापि पिताके आदेशसे उन्होने उस समय स्त्री-
सग्रह स्वीकार कर लिया। तदनन्तर महाबाहु
धर्माद्गदने वरुण-कन्याके साथ, मनोहर नागकन्याअकि
साथ भी विवाह किया, जो पृथ्वीपर अनुपम
रूपवती थीं । शास्त्रीय विधिके अनुसार उन
सवका विवाह करके धर्माङ्गदने ब्राह्मणोको धन,
रल तथा गौओंका प्रसन्नतापूर्वक दान करिया।
विवाहके पश्चात् उन्होने माता ओर पिताके चरणोमें
हर्षके साथ प्रणाम किया। तदमन्तर राजकुमार
धममङ्धदने अपनी माता संध्यावलीसे कहा-'देवि।
पिताजीको आज्ञासे मेरा वैवाहिक कार्यं सम्पन्न
हुआ है। मुञ्चे दिव्य भोगों तथा स्वगि भी कोई
प्रयोजन नहीं है । पिताजीकी तथा तुम्हारी दिन-
रात सेवा करना ही मेरा कर्तव्य टै ।'
संध्यावली बोली--'वेटा! तुम दीर्धकालतकः
सुखपूर्वक जीते रहो। पिताके प्रसादसे मनके
अनुरूप भोगोका उपभोग करो । वत्स! तुम-जेसे
गुणवान् पुत्रके द्वारा म इस पृथ्वीपर श्र पुत्रवाली
हो गयी हू ओर सपतनियोके हदयमे मेरे लिये
उच्चतम स्थान बन गया है।'
एेसा कहकर माताने पुत्रको हदयस लगाकर
वार-वार उसका मस्तक संधा। तत्पश्चात् उसे
| देखनेके लिये विदा किया। माता
संध्यावलीसे विदा लेकर राजकुमारने अन्य माताओंको
भी प्रणाम किया ओर पिताकी आज्ञाके अधीनं
रहकर वे राज्यशासनका समस्त कार्य देखने लगे ।
वे दुष्टोको दण्ड देते, साधु-पुरुपोंका पालन करते
ओर सब देशोमें घुम-घूमकर प्रत्येक कार्यको
देखभाल किया करते थे। सर्वत्र पर्टचकर प्रत्येक
मासमे वहकि कार्योका निरीक्षण करते थे । उन्होने
हाधी ओर् घोढकि पालन-पोपणकी अच्छी व्यवस्था
की थी । गुपतचर-मण्डलपर भी उनको दृष्टि र्हती
धी । इधर-उधरसे प्राप्त सपाचारोक्ो वेश्देखते ओर
विजयकौ बात सुनाकर वहाँसे जीतकर लाये हुए
करोड़ों रतन, हजारों श्वेतरंगके श्यामकर्ण घोडे ओर
हजारों कुमारियोको पिताको दिखाया ओर कहा-
` पिताजी! में ओर यह सारी सम्पत्तियां आपके
अधीन हें । तात! पुत्रको पिताके सामने आत्मप्रशंसा
नहीं करनी चाहिये । पिताके ही पराक्रमसे पुत्रकी
धनराशि वदती हे। अतः आप अपनी इच्छके
अनुसार इनका दान अथवा संरक्षण कीजिये । मेरी
मातां भी अपनी इस सम्पदाको देखें ।'
वसिष्ठजीने कहा-- पुत्रको बात सुनकर नृपश्रेष्ठ
रुक्माङ्गद बड़ प्रसन्न हए ओर अपनी प्रियाके
साथ उठकर खडे हो गये । उन्होने वह सारी धन-
सम्पत्ति देखी । उन विष्णुपरायण राजाने एक
क्षणतक हर्पमें मग्र रहकर बड़ प्रेमके सहित
वरुण-कन्यासहित समस्त नागकन्याओंको अपने
पुत्र धर्माङ्गदके अधिकारमें दे दिया। शेष सव
वस्तुएं बहुत-से रतं तथा दानव-नारियोके साथ
उन्होने मोहिनीको अर्पित कर दीं। धर्माङ्गदके
लाये हए धन-वैभवका यथायोग्य विभाजन करके
राजाने समयपर पुरोहितजीको बुलाया ओर कहा-
'ब्रह्यन्! मेरा पुत्र सदा मेरी आज्ञाके पालनमें
स्थित रहा है ओर अभीतक यह कुमार ही है।
अतः इन सब कुमारियोका यह धर्मपूर्वक पाणिग्रहण
करे। धर्मकी इच्छा रखनेवाले पिताको पुत्रका
विवाह अवश्य कर देना चाहिये । जो पिता पुत्रोको
पत्री ओर धनसे संयुक्त नहीं करता, उसे इस लोक
ओर परलोकमें भी निन्दित जानना चाहिये । अतः
पत्रोंको स्त्री तथा जीवन-निर्वाहके योग्य धनसे
सम्पन्न अवश्य कर देना चाहिये ।'
राजाका यह वचन सुनकर पुरोहितजी बडु
प्रसन हए ओर धर्माङ्गदका विवाह करानेके
उद्योगमें लग गये। धमद्धिद युवा होनेपर भी
लव्नावश स्त्री-सुखकी इच्छा नहीं रखते थे
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६९१२
संक्षिप्त नारदपुराण
उनपर् विचार करते थे। प्रतिदिन माप ओर
तोलकी भी जच करते रहते थे! राजा धर्माङ्गिद
प्रत्येक घरमे जाकर वहकि लोगोंकी रक्षाका
प्रवन्ध करते थे । उनके राज्यमें कहीं दूध पीनेवाला
बालक माताके स्तन न मिलनेसे रोता हो, एेसा
नहीं देखा गया। सास अपनी पुत्रवधूसे अपमानित
होकर कहीं भी रोती नहीं सुनी गयी । कहीं भी
समर्थं पुत्र पितास्रे याचना नहीं करता था। उनके
राज्यभरमे किसीकर यहां वर्णसंकर संतानकी उत्पत्ति
नहीं हुई । लोग अपना धन-वैभव छिपाकर नहीं
रखते थे। कोई भी धर्मपर दोपारोपण नहीं करता
धा। सधवा नारी कभी भी विना चोलीके नहीं
रहती थी । उन्होने यह घोषणा करायी थी कि “मेरे
राज्यमें स्त्रियां घरोमें सुरक्षित रहं । विधवा केश न
रखावे ओर सौभाग्यवती कभी केश न कटावे। जो
दूसरोको साधारणवृत्ति (जीवन-निर्वाहके लिये
अन्न आदि) नहीं देता, वह निर्दयी मेरे राज्यमें
निवास न करे। दूसरोंको सद्गुणोंका उपदेश
देनेवाला पुरुष स्वयं सदगुण-शुन्य हो ओर
ऋत्विग् यदि शास्त्रज्ञानसे वचित हो तो वह मेरे
राज्यम निवास न करे। जो नीलका उत्पादन
करता है अथवा जो नीलके रंगसे अधिकतर
वस्त्र रेणा करता है, उन दोनोंको मेरे राज्यसे
निकाल देना चाहिये । जो मदिरा बनाता है, वह
भी यहसे निर्वासित होने योग्य ही है। जो मांस
भक्षण करता हे तथा जो अपनी स्त्रीका अकारण
परित्याग करता हे, उसका मेरे राज्यमें निवास न
हो। जो गर्भवती अथवा सद्यःप्रसूता युवतीसे
समागम करता हे, वह मनुष्य मुञ्च-जेसे शासकोके
द्वारा दण्डनीय हे।'
राजा रुक्माङ्गदका मोहिनीसे कातिकमासकी महिमा तथा चातुर्मास्यके नियम,
त्रत एवं उद्यापन बताना
वसिषएठजी कहते है-- राजेन्द्र ! इस प्रकार पिताकी
आज्ञासे एकादशी-व्रतका पालन करते हए धर्माङ्गद
इस प्ृध्तरीका राज्य करने लगे। उस समय उनके
राज्यम कोई भी मनुष्य एेसा नहीं था, जो धर्म-
पालनमे तत्पर न हो । महीपते! कोई भी व्यक्ति
दुःखी, संतानहीन अथवा कोटी नहीं था । नरेश्वर!
उस राज्यमं सव लोग हष्ट-पुष्ट थे। पृथ्वी निधि
देनेवाली थी, गौं बछद्ाको दूध पिलाकर् तृप्त रखती
ओर एक घड़ा दूध देती थीं। वृक्षोके पत्ते-पत्तेमें
मधु भरा धा। एक-एक वृक्षपर एक-एक दोन मधु
सुलभ धा। सर्वथा प्रसन्न रहनेवाली पृथ्वीपर सव
प्रकारके धान्योकी उपज होती थी । त्रेताके अन्तका
द्रापरयुग सत्ययुगसे होड लगाता धा। वर्षाकाल
व्रीत चला, शरद्-ऋतुका आकाश ओर गृहस्थंका
भ्रर धरृल-पड्कसे रहित स्वच्छ हो गया। राजा स्क्ाद्धद
मोहिनीके प्रेमसे अत्यन्त मुग्ध होनेपर भी एकादशी-
व्रतकं अवहेलना नहीं करते थे। दशमी, एकादशी
ओर द्वादशी-डइन तीन दिनोतक राजा रतिक्रडा
त्याग देते थे। इस प्रकार क्रीडा करते हुए उन्हं
लगभग एक वर्षं पूरा हो गया। कालज्ञोमें श्रेष्ठ
नरेश! उस समय परम मङ्गलमय श्रेष्ठ कार्तिकमास
आ पर्हुचा था, जो भगवान् विष्णुकी निद्राको दूर
करनेवाला परम पुण्यदायक मास है। राजन्।
उसमें वैष्णव मनुष्योद्रारा किया हुआ सारा पुण्य
अक्षय होता है ओर विष्णुलोक प्रदान करता हे।
कार्तिकके समान कोई मास नहीं है, सत्ययुगके
समान कोई युग नहीं है, दयाके तुल्य कोई धर्म नही
है ओर नेत्रके समान कोई ज्योति नहीं है । वेदके
समान दूसरा शास्त्र नहीं हे, गद्वाके समान दूसरा तीर्थ
नदीं है । भृमिदानके समान अन्य दान नहीं है ओर
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उत्तरभाग ६१३
वटुकर कोई देवता नहीं हे तथा लोकमें कार्तिकत्रतके
समान दूसरा कोई पावन त्रत नहीं है । एेसा ज्ञानी
पुरुषोंका कथन है । कार्तिक सबसे श्रेष्ठ मास है
ओर वह भगवान् विष्णुको सदा ही प्रिय है।
राजन्! कार्तिक मासको आया देख अत्यन्त
मुग्ध हुए महाराज रुक्माङ्गदने मोहिनीसे यह बात
कही--' देवि! मेने तुम्हारे साथ बहुत वर्पोतिक
रमण किया। शुभानने! इस समय में कु कहना
चाहता ह। उसे सुनो। देवि ! तुम्हारे प्रति आसक्त
होनेके कारण मेरे बहुत-से कार्तिक मास व्यर्थ बीत
गये। कार्तिकमें में केवल एकादशीको छोडकर ओर
किसी दिन तब्रतका पालन न कर सका। अतः इस
वार में त्रतके पालनपूर्वक कार्तिक मासमे भगवानकी
उपासना करना चाहता दह। कार्तिकर्मे सदा किये
जानेवाले भोज्योका परित्याग कर देनेपर साधकको
अवश्य ही भगवान् विष्णुका सारूप्य प्राप्त होता
हे। पुष्करतीर्थमें कार्तिक-पूर्णिमाको त्रेत ओर
स्नान करके मनुष्य आजन्म क्रिये हुए पापस मुक्तं
हो जाता है। जिसका कार्तिक मास त्रत, उपवास
तथा नियमपूर्वक व्यतीत होता है, वह विमानका
अधिकारी देवता होकर परम गतिको प्रास होता
हे । अतः मोहिनी ! तुम मेरे ऊपर मोह छोट्कर
आज्ञा दो, जिससे इस समय में कार्तिकका त्रत
आरम्भ करू
मोहिनी बोली- नृपशिरोमणे ! कार्तिक मासका
माहात्म्य विस्तारपूर्वक बताइये । म कार्तिकर-
| सुनकर जैसी मेरी इच्छा होगी, वैसा
।
|
१
ॐ > ॥
|
|
१
1
।
।
त
॥
।
|
< कणन-# द क |
पत्री-सुखके समान कोई (लौकिक) सुख नहीं हे।
खेतीके समान कोई धन नहीं हे, गाय रखनेके समान
कोई लाभ नहीं है, उपवासक समान कोई तप
नहीं है ओर (मन ओर) इद्धियोके संयमके समान
कोई कल्याणमय साधन नहीं हे । र्सनातृप्िके समान
कोई (सांसारिक) वृपि नहीं है, ब्राह्मणक समान
कोई वर्णं नहीं है, धर्मक समान कोई मित्र नहीं टै
ओर सत्यके समान कोई यश नहीं है । आरोग्यके
समान कोई शर्य नहीं है, भगवान् विष्णुम
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करूगी।
रुक्माङ्दने कदहा-- वरानने! म इस कार्तिक
मासकी महिमा वताता दं। सुन्दरी! कार्तिक
मासमे जो कृच्छु अथवा प्राजापत्यत्रत करता है
धवा एकः दिनका अन्तर देकर उपवास करता
थवा तीन राता उपवास स्वीवच्छार् कगता दै
६१४
अथवा दस दिन, पंद्रह दिन या एक मासतक
निराहार रहता हे, वह. मनुष्य भगवान् विष्णुके
परम पदको प्राप्त कर लेता हे। जो मनुष्य
कातिकमे एकभुक्तं (केवल दिनमें एक समय
भोजन) या नक्ततव्रत (केवल रातमे एक वार
भोजन) अथवा अआयाचित्तव्रत (विना मोगि स्वतः
प्राप्त हए अन्नका दिन या रातमे केवल एक वार
भोजन) करते हए भगवान्की आराधना करते हें
उन्हें सातों द्वीपोसहित यह पृथ्वी प्राप्त होती हे।
विशेषतः पुष्करतीर्थ, द्वारकापुर तथा सूकरक्षेत्रमे
यह कार्तिक मास त्रत, दान ओर भगवत्पूजन
आदि करनेसे भक्ति देनेवाला बताया गया हे।
कार्तिकमें एकादशीका दिन तथा भीष्मपञ्चक अधिक
पुण्यमय माना गया है । मनुष्य कितने ही पापोसे
भरा हुआ क्यों न हो, यदि वह रात्रि जागरणपूर्वक
प्रबोधिनी एकादशीका ब्रत करे तो फिर कभी
माताके गरभमे नहीं आता। वरारोहे ! उस दिन जो
वाराहमण्डलका दर्शन करता हे, वह विना सांख्ययोगके
परमपदको प्राप्त होता हे। शुभे! कार्तिकमें शुकरमण्डल
या कोकवाराहका दर्शन करके मनुष्य फिर किसीका
पुत्र नहीं हाता । उसके दर्शनसे मनुष्योका आध्यात्मिक
आदि तीनों प्रकारके पापोसे छुटकारा हो जाता हे ।
ब्रह्मकुमार । उक्त मण्डल, श्रीधर तथा कृन्जकका
दर्शन करके भी मनुष्य पापमुक्त होते हैं । कार्तिकमें
तेल छोड़ दे। कार्तिकमें मधु त्याग दे। कार्तिकमें
स्त्रीसेवनका भी त्याग कर दे। देवि! इन सबके
त्यागद्वारा तत्काल ही वर्षभरके पापसे द्ुटकारा
मिल जाता है। जो थोड़ा भी त्रत करनेवाला हे
उसके लिये कार्तिक मास सब पापोंका नाशक
होता हे। कार्तिकमे ली हई दीक्षा मनुष्योके
जन्मरूपी बन्धनका नाश करनेवाली हे । अतः पूरा
प्रयज्न करके कार्तिकमें दीक्षा ग्रहण करनी चाहिये ।
जो तोर्थमे कार्तिक-पूर्णिमाका व्रत करता है या
संक्षिप्त नारदपुराण
कार्तिकके शुक्लपक्षको एकादशीको ब्रत करके
मनुष्य यदि सुन्दर कलशोका दान करता है तो वह
भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। सालभरतक
चलनेवाले व्रतोंकी समाति कार्तिकमें होती है।
अतः मोहिनी । में कार्तिक मासमे समस्त पापोके
नाश तथा तुम्हारी प्रीतिको वृद्धिके लिये ब्रत
सेवन करूगा। |
मोहिनीने कहा- पृथ्वीपते! अन चातुर्मास्यको
विधि ओर उद्यापनका वर्णन कौजिये, जिससे
सब त्रतोंकौ पूर्णता होती हे। उद्यापनसे ब्रतको
न्यूनता दूर होती है ओर वह पुण्यफलका साधक
होता हे।
राजा बोले- प्रिये! चातुर्मास्यमे नक्तत्रत
करनेवाला पुरुष ब्राह्मणको षड्रस भोजन करावे।
अयाचित-व्रतमें सुवर्णसहित वृषभ दान करे। जो
प्रतिदिन ओंवलेके फलसे स्नान करता है, वह
मनुष्य दही ओर खीर दान करे। सुभ्रु! यदि फल
न खानेका नियम ले तो उस अवस्थामे फलदान
करे । तेलका त्याग करनेपर घीदान करे ओर घीका
त्याग करनेपर दूधका दान करे। यदि धान्यके
त्यागका नियम लिया हो तो उस अवस्थामें
अगहनीके चावल या दूसरे किसी धान्यका दान
करे। भूमिशयनका नियम लेनेपर गदा, रजाई ओर
तकियासहित ॒शय्यादान करे। पत्तेमे भोजनका
नियम लेनेवाला मनुष्य घृतसहित पात्रदान करे ।
मौोनव्रती पुरुष घण्टा, तिल ओर सुवर्णका दान
करे। ब्रतकी पूर्तिके लिये ब्राह्मण पति-पत्रीको
भोजन करावे। दोनोके लिये उपभोगसामग्री तथा
दक्षिणासहित शय्यादान करे । प्रातःस्नानका नियम
लेनेपर अश्वदान करे ओर स्नेहरहित (विना
तेलके) भोजनका नियम लेनेपर घी ओर सत्तू दान
करे। नख ओर केश न कटाने-धारण करनेका
नियम लेनेपर दर्पण दान करे। पादन्नाण (जता,
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उत्तरभागय
खड़ाऊ आदि)-के त्यागका नियम लेनेपर
दान करे। नमकका त्याग करनेपर गोदान करे।
प्रिये! जो इस अभीष्ट व्रतमें प्रतिदिन देवमन्दिरमें
दीप-दान करता ठे, वह सुवर्णं अथवा तविका
घृतयुक्तं दीपक दान करे तथा त्रतक पूर्तिके लिये
वैष्णवको वस्त्र एवं छत्र दान करे। जो एक
दिनका अन्तर देकर उपवास करता है, वह रेशमी
वस्त्र दान करे । त्रिरात्र-त्रतमें सुवर्ण तथा वस्त्राभूषणोसे
अलंकृत शय्यादान करे । षड्रात्र आदि उपवासोमं
८४८ =#१ १.
६१५
छत्रसहित शिविका (पालकी) दान करे। साथ
ही हँकनेवाले पुरुषके साथ मोरा-ताजा गाडी
खीचनेवाला वैल दान करे। एक" भक्तं (आट
पहरमें केवल एक बार भोजन करनेके) व्रतका
नियम लेनेपर वकरी ओर भेड दान करे । फलाहारका
नियम ग्रहण करनेपर सुवर्णका दान करे । शाकाहारके
नियममें फल, घी ओर सुवर्ण दान करे । सम्पूर्ण
रसो तथा अवतक जिनकी चर्चा नहीं की गयी,
एेसी वस्तुओंका त्याग करनेपर अपनी शक्तिके
अनुसार सोने-चोदीका पात्र दान करे। सुधर!
जिसके लिये जो दान कर्तव्य वताया गया है
उनका पालन न हो सके तो भगवान् विष्णुके
स्मरणपूर्वक ब्राह्मणको आज्ञाका पालन करे।
सुन्दरी ! देवता, तीर्थं ओर य भी ब्राह्मणोके
वचनका पालन करते हं; फिर् कल्याणकं इच्छा
रखनेवाला कौन विद्वान् मनुष्य उनकी आजनाका
उल्लद्भन करेगा । प्रिये ! भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीको
जिस प्रकार यह धर्म-रहस्यसे युक्तं उपदेश दिया
था, वही मने तुमसे प्रकाशित किया ह । यह दूसरे
अनधिकारियोके सामने प्रकट करनं योग्य नहं
दै । यह दान ओर त्रत भगवान् तिष्णुकरी प्रसन्नताका
हेतु ओर मनोवाच्छित फल देनेवाला हे ।
{9८#/न#
राजा रुक्माङ्गदकी आनज्ञासे रानी संध्यावलीका कार्तिक मासमे कृच्छव्रत प्रारम्भ
करना, धर्माङ्कदकी एकादशीके लिये घोषणा, मोहिनीका राजास
एकादशीको भोजन करनेका आग्रह ओर राजाकी अस्वीकृति
मोहिनी बोली- राजेन्द्र ! आपने कार्तिक मासमे
उपवासके विषयमे जो बातें कही है, वे वहुत
उत्तम हैं । पर राजाओके लिये तीन ही कर्म प्रधान
रूपसे बताये गये हैं । पहला कर्म है दान देना,
दूसरा प्रजाका पालन करना तथा तीसरा है विरोधी
राजाओंसे युद्ध करना। आपको यह त्रत नहीं
करना चाहिये । मँ तो आपके चिना कीं दी घड़ी
भी नहीं रह सकती; फिर तीस दिनीतिक में आपसे
अलग कये रह सकती दँ! वसुधापते! आप जहाँ
उपवास करना उचित मानते है, वदां उपवास न
करके महात्मा ब्राह्मणोको भोजन-दान करं अथवा
यदि उपवास ही आवश्यक हौ ती आपकी जो
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६१६
ज्येष्ठ पी हें, वे ही यह सब ब्रत आदि करे ।
मोहिनीके एेसा कहनेपर राजा रुक्माङ्गदने
संध्यावलीको बुलाया । बुलानेपर वे प्रचुर दक्षिणा
देनेवाले महाराजके पास तत्काल आ पहुंचीं ओर
हाथ जोड़कर बोलीं--' प्राणनाथ ! दासीको किसलये
बुलाया 2 आज्ञा कीजिये, म उसका पालन करूंगी ।'
रुक्माङ्दने कहा- भामिनि! में तुम्हारे शील-
स्वभाव ओर कुलको जानता हूं । तुम्हारे आदेशसे
ही मेने मोहिनीके साथ दीर्घकालतक निवास किया
हे। इस तरह चिरकालतक प्रियाके समागम-
सुखसे मुग्ध हो निवास करते-करते मेरे बहुतसे
कातिक मास व्यर्थं बीत गये। तथापि मेरा
एकादशीव्रत कभी भद्ध नहीं होने पाया है। अव
सम्पूर्णं पापोंका विनाश करनेवाला यह कार्तिक
मास आया है। देवि! में उत्तम पुण्य प्रदान
करनेवाले इस कार्तिकत्रतको करना चाहता हू ।
परंतु शुभे! ये ब्रह्यकुमारी मुञ्चे इस त्रतसे रोकती
हे । इसलिये शरीरको सुखानेवाले कृच्छर नामक
त्रतका पालन मेरी ओरसे तुम करो।
रानी संध्यावलीने उस समय पतिदेवका वह
प्रस्ताव सुनकर कहा--' प्रभो ! मे आपके संतोषके
लिये त्रतका पालन अवश्य करूगी । आपके लिये
मे अपने शरीरको आगमे भी जोक सकती हू।
भूमिपाल! आपने जो आज्ञा दी है, वह तो बहुत
उत्तम है। नरदेवनाथ! मेँ इसका पालन कर्ूगी ।'
यमराजके शत्र राजा रुक्माङ्गदसे एेसा कहकर
मनोहर एवं विशाल नेत्रोवाली रानी संध्यावलीने
उन्हे प्रणाम किया ओर् समस्त पापराशिका विनाश
करनेके लिये उस उत्तम त्रत्तका पालन आरम्भ
किया। अपनी प्रियाद्वारा उत्तम कृच्छव्रत प्रारम्भ
किये जानेपर राजाको बडी प्रसन्नता हुई । उन्होने
ब्रह्माजीको पुत्री मोहिनीसे यह बात कही-' सुभ्रु!
मेने तुम्हारी आज्ञाका पालन किया। देवि! मेरे
संक्षिप्त नारदपुराण
प्रति तुम्हारे मनमें जो-जो कामना निहित है, उन
सबको सफल कर लो । में तुम्हारे संतोषके लिये
राज्यशासनके समस्त कारयेसि अलग हो गया हू
तुम्हारे सिवा दूसरी कोई नारी मुञ्चे सुख देनेवाली
नहीं हे ।'
अपने प्राणवल्वभके मुखसे एेसी बात सुनकर
मोहिनीके हर्षको सीमा न रही। उसने राजासे
कहा-' देवता, देत्य, गन्धर्व, यक्ष, नाग तथा
राक्षस सब मेरी दृष्टिमे आये, किंतु में सबको
त्यागकर् केवल आपके प्रति स्नेहयुक्त हो मन्दराचलपर
आयी थी । लोकमें कामको सफलता इसीमें है कि
प्रिया ओर प्रियतम दोनों एकचित्त हो- परस्पर
एक-दूसरेको चाहते हों ।' उस समय महाराज
रुक्माङ्गदके कानोमें डंकेको चोट सुनायी दी, जो
मतवाले गजराजके मस्तकपर रखकर धर्माङ्गदके
आदेशसे बजाया जा रहा था। उस पटह-ध्वनिके
साथ यह घोषणा हो रही थी-' लोगो! कल प्रातः-
कालसे भगवान् विष्णुका दिन (एकादशी) है,
अतः आज केवल एक समय भोजन करके रहो।
क्षार नमक छोड दो। सब-के-सब हविष्यान्नका
सेवन करो । भूमिपर शयन करो । स्त्री-संगमसे दूर
रहो ओर पुराणपुरुषोत्तम देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुका
स्मरण करो। आज एक समय भोजन करके कल
दिन-रात उपवास करना होगा। एेसा करनेसे
तुम्हारे लिये श्राद्ध चाहे न किया गया हो, तुम्हं
पिण्ड न मिला हो ओर तुम्हारे पुत्र गयामें जाक
श्रद्ध न कर स्के हों, तो भी तुम्हं भगवान्
श्रीहरिके वैकुण्टधामकौ प्राप्ति होगी । यह कार्तिक
शुक्ला एकादशी भगवान् श्रीहरिको निद्रा दर
करनेवाली है । प्रातःकाल एकादशी प्राप्त होनेपर
तुम कदापि भोजन न करो। इस प्रबोधिनी
एकादशीको उपवास करनेसे इच्छानुसार किये हुए
ब्रह्महत्या आदि सम्पूर्णं पाप नष्ट हो जायेगे। यह
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग ६१७
किंतु पहले मन्दराचलके शिखरपर आपने मुञ्च
अपना दाहिना हाथ देकर प्रतिञ्ा की है, उसके
पालनका समय आ गया है । अतः मुञ्ये आप वर्
दीजिये, यदि नहीं देते है तो जन्मसे लेकर
अवतक आपने बड यत्नसे जो पुण्यसंचय किया
हे, वह सव शीघ्र नष्ट हो जायगा।
रुक्माङदने कहा-- प्रिये ! आओ, तुम्हारे मनमें
जो इच्छा होगी, उसे मैं पूर्णं करूगा। मेरे पास
कोई भी वस्तु एेसी नहीं है, जो तुम्हारे लिये देने
योग्य न हो, मेरा यह जीवनतक तुम्हं अर्पित है,
फिर ग्राम, धन ओर पृथ्वीके राज्य आदिकी तो
वात ही क्या हे।
मोहिनी बोली- राजन्! यदि मेँ आपकी प्रिया
हूं तो आप एकादशीके दिन उपवास न करके
भोजन करें । यही वर मुञ्चे देना चाहिये । जिसके
लिये मैने पहले ही आपसे प्रार्थना कर ली है।
महाराज ! यदि आप वर नहीं देगे तो असत्यवादी
होकर घोर नरकमें जार्येगे ओर एक कल्पतक
उसीमें पड़ रहेगे ।
राजाने कहा- कल्याणी ! एेसी बात न कटो ।
यह तुम्हं शोभा नहीं देती । अहो ! तुम ब्रह्याजीको
पत्री होकर धर्में विघ्र क्यों डालती हो? शुभ!
जन्मसे लेकर अबतक मैने कभी एकादशीको
भोजन नहीं किया, तब आज जव कि मेरे बाल
हो गये है, मै कैसे भोजन कर सकता हू ।
जिसकी जवानी बीत चुको है ओर जिसको
इन्दरियोकी शक्ति नष्ट हो गयी टै, उस मनुष्यके
लिये यही उचित है कि वह गङ्खाजीका सेवन या
भगवान् विष्णुकी आराधना करे । सुन्दरी ! मुञ्पर
प्रसन्न होओ। मेरे ब्रतको भद्ध न करो। म तुम्हे
राज्य ओर सम्पत्ति दे दूंगा अथवा इसकी इच्छा न
हो तो ओर कोई कार्य कहो उसे परा करूगा।
अमावास्याकरे दिन मैथुन करनेपर जो पाप होता
तिथि धर्मपरायण तथा न्याययुक्तं सदाचारका पालन
करनेवाले पुरुषोको प्रबोध (ज्ञान) देती है ओर
इसमे भगवान् विष्णुका प्रबोध (जागरण) होता
हे, इसलिये इसका नाम प्रबोधिनी दै। इस
एकादशीको जो एक बार भी उपवास कर लेता
ठे, वह मनुष्य फिर संसारमें जन्म नहीं लेता।
मनुष्यो ! तुम अपने वैभवके अनुसार इस एकादशीको
चक्रसुदर्शनधारी भगवान् विष्णुको पूजा करो।
वस्त्र, उत्तम चन्दन, रोली, पुष्प, धूप, दीप
तथा हदयको अत्यन्त प्रिय लगनेवाले सुन्दर फल
एवं उत्तम गन्धके द्वारा भगवान् श्रीहरिके
चरणारविन्दोंको अर्चना करो। जो भगवान् विष्णुका
लोक प्रदान करनेवाले मेरे इस धर्मसम्मत वचनका
पालन नहीं करेगा, निश्चय ही उसे कठोर दण्ड
दिया जायगा।'
इस प्रकार मेघके समान गम्भीर शब्द करनेवाले
नगाडेको बजाकर जव उक्तं घोषणा कौ जा रही
थी, उस समय वे भूपाल मोहिनीको शय्या
छोडकर उठ गये। फिर मोहिनीको मधुर वचनोसे
सान्त्वना देते हुए बोले-' देवि! कल प्रातःकाल
पापनाशक एकादशी तिथि होगी । अतः आज में
संयमपूर्वक रहूंगा । तुम्हारी आज्ञासे मेने कृच्छर
व्रत तो संध्यावलीदेवीके द्वारा कराया हे, कितु यह
प्रबोधिनी एकादशी मुञ्चे स्वयं भी करनी ह । यह
सम्पूर्ण पापबन्धनोंका उच्छेद करनेवाली तथा
उत्तम गति देनेवाली है । अतः मोहिनी देवी ! आज
मै हविष्य भोजन करूगा ओर संयम-नियमसे रहूगा।
विशाललोचने! तुम भी मेरे साथ उपवासपूर्वक
समस्त इद्धियकि स्वामी भगवान् अधोक्षजकी आराधना
करो, जिससे निर्वाणपदको प्राप्त करोगी ।'
मोहिनी बोली-- राजन्! चक्रधारी भगवान्
विष्णुका पूजन जन्ममृत्यु तथा जरावस्थाका नाश
करनेवाला है- यह बात आपने ठीक कही टै
((-0. 1\॥(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661011. 01411260 0 66810011
नि `
६१९८
हे, चतुर्दशीको हजामत बनवानेसे मनुष्यमें जिस
पापका संचार होता है ओर षष्ठीको तेल खाने या
लगानेसे जो दोष होता है, वे सब एकादशीको
भोजन करनेसे प्राप्त होते हैँ । गोचरभूमिका नाश
करनेवाले, द्यूठी गवाही देनेवाले, धरोहर हड़पनेवाले,
कुमारी कन्यके विवाहम विघ्र डालनेवाले विश्वासघाती,
मरे हए बड़वाली गायको दुहनेवाले तथा श्रेष्ठ
ब्राह्मणको कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके न देनेवाले
पुरुषको जो पाप लगता हे, मणिकूटः, तुलाकूटर,
कन्यानृते ओर गवानृतर्मे* जो पातक होता है
वही एकादशीको अन्नम विद्यमान रहता हे।
चारुलोचने ! मे इन सब बातोको जानता हू, अतः
एकादशीको पापमय भोजन केसे करूगा?
मोहिनी बोली- राजेन्द्र! एकभुक्तव्रत, नक्त-
त्रत, अयाचितव्रत जअथवा उपवासके द्वारा एकादशी-
त्रतको सफल लनावे। उसका उल्लक्लन न करे,
यह वात ठीक हो सकती हे; किंतु जिन दिनों में
मन्दराचलपर रहती थी, उन दिनों महर्षिं गौतमने
मुञ्रे एक बात बतायी थी, जो इस प्रकार टै-
गर्भिणी स्त्री, गृहस्थ पुरुष, क्षीणकाय रोगी, शिशु,
वलिगात्र (मुर्थियोसे जिसका शरीर भरा हआ है
एसा), यज्चके आयोजनके लिये उद्यत पुरुष एवं
संग्रामभृमिमें रहनेवाले योद्धा तथा पतित्रता स्त्री-इन
सवके लिये निराहार व्रत करना उचित नहीं हे ।
नरश्रेष्ठ ! एकादशी को विना त्रतके नहीं व्यतीत करना
[र
संक्षिप्त नारदपुराण
चाहिये- यह आज्ञा उपर्युक्त व्यक्तियोपर लागू
नहीं होती । अतः जब आप एकादशीको भोजन
कर लेंगे, तभी मुञ्चे प्रसन्नता होगी । अन्यथा यदि
आप अपना सिर काटकर भीमुञ्ेदेदंतोभी
मुज्ञ प्रसन्नता न होगी । राजन्। यदि आप एकादशीको
भोजन नहीं करेगे तो आप-जैसे असत्यवादीके
शरीरका मैं स्पर्श नहीं करूगी । महाराज ! समस्त
वर्णो ओर आश्रमोमें सत्यक ही पूजा होती है ।
महीपते! आप-जेसे राजाओंके यहाँ तो सत्यका
विशेष आदर होना चाहिये । सत्यसे ही सूर्य तपता
है, सत्यसे ही चन्द्रमा प्रकाशित होते हैँ । भूपाल ।
सत्यपर ही यह पृथ्वी रिकौ हुई हे ओर सत्य ही
सम्पूर्णं जगत्को धारण करता है । सत्यसे वायु
चलती है, सत्यसे आग जलती है ओर इस
सम्पूर्णं चराचर जगत्का आधार सत्य ही है।
सत्यके ही बलसे समुद्र अपनी मर्यादाके आगे
नहीं बटता। राजन्! सत्यसे ही बंधकर विंध्यपर्वत
ऊचा नहीं उठता ओर सत्यके ही प्रभावसे युवती
स्त्री समय बीतनेपर कभी गर्भं नहीं धारण करती।
सत्यमे स्थित होकर ही वृक्ष समयपर फूलते-
फलते दिखायी देते हैँ । महीपते! मनुष्योके लिये
दिव्यलोक आदिके साधनका आधार भी सत्य ही
हे । सहस्रां अश्वमेध-यज्ञोसे भी बदढकर सत्य ही
हे। यदि आप असत्यका आश्रय लगे तो मदिरापानके
तुल्य पातकसे लिप्त होगे।
(९५.६९
की किक किमे द कि द कि की
१. ज स्रोकी विक्री कसलेवाला पुरुष असलीका दाम लेकर नकली सत्र दे दे, उसका वह कर्म “ मणिकरट' नामक पाप ह।
२. तौलमें ग्राहकको धोखा देकर कम माल देना ' तुलाकूट ' नामक पाप है।
३. व्याहके लिये एक कन्याको दिखाकर दूसरी सदोष कन्याको विवाह देना अथवा कन्याके सम्बन्धरमं जयूठ
कहना ' कन्यानृत ' नामक दोप है।
४. किसीको एक गाय देनेकी बात कहकर देते समय उसे बदलकर दूसरी दे देना अथवा गायके सम्बन्धे
शटी गवाही देना “गवानृत" कहा गया है।
((-0. 1/८11141/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग ६१९
राजा रुक्माङ्कदद्वारा मोहिनीके आक्षेपोंका खण्डन, एकादशीव्रतकी वैदिकता,
मोहिनीद्वारा गोतम आदि ब्राह्यणोके समक्ष अपने पक्षकी स्थापना
राजा बोले- वरानने! गिरिश्रेष्ठ । देता हू। जो शास्त्रको बहुत कम जानता है
एकादशीको भोजन करनेके विषयमे तुमने जो | उससे वेद डरता है कि “यह कहीं मुञ्जपर ही
महरि गौतमकौ कही हुई बात बतायी है, वह | प्रहार न कर वैठे।' सब विषयोंका निर्णय
कथन पुराणसम्मत नहीं हे । पुराणमें तो विद्वानोंका | इतिहास ओर पुराणोने पहलेसे ही कर रखा दै ।
किया हुआ यह निर्णय स्पष्टरूपसे बताया गया | वेदम जो नहीं देखा गया, वह सव स्मृतिमें
हे कि एकादशी तिथिको भोजन न करे। फिर | दृष्टिगोचर होता है । वेदों ओर स्मृति्योमें भी जो
में एकादशीको भोजन कैसे करूगा ? एकादशीके | बात नहीं देखी गयी है, उसका वर्णन पुराने
दिन क्षीणकाय पुरुषोके लिये मुनीश्वरोने फल, | किया हे । प्रिये ! हत्या आदि पापका प्रायश्चित्त
मूल, दूध ओर जलको अनुकूल एवं भोज्य | तथा रोगीके ओषधका वर्णन भी पुराणोमें मिलता
बताया है । एकादशीको किसीके लिये अन्नका | है । उन प्रायश्चित्तोके विना पापकी शुद्धि नहीं हो
भोजन किन्हीं महापुरुषोने नहीं कहा है। जो | सकती । सुश्रु ! वेदों, वेदके उपाङ्गं, पुराणों तथा
लोग ज्वर आदि रोगोके शिकार है उनके लिये | स्मृतिरयोद्रारा जो कुछ कहा जाता है, वह सब
तो उपवास ओर उत्तम बताया गया है। धार्मिक | वेदमें ही बताया गया है-एेसा मानना चाहिये ।
पुरुषोके लिये एकादशीके दिन उपवास शुभ एवं | वरानने! पुराण बार-बार यह दुहराते हैँ कि
सद्रति देनेवाला कहा गया है । अतः तुम भोजन | एकादशी प्राप्त होनेपर भोजन नहीं करना चाहिये,
करनेके लिये आग्रह न करो, इससे मेरा त्रत | नहीं करना चाहिये ।' पिताको कौन नहीं प्रणाम
भङ्ग हो जायगा। इसके सिवा, तुम्हे जो भी | करेगा, कौन माताकौ पूजा नहीं करेगा, कौन
रुचिकर प्रतीत हो, वह कार्य मेँ अवश्य करूगा। | सरिताओमें श्रेष्ठ गद्गाके समीप नहीं जायगा ओर
मोहिनीने कहा- राजन्! आप एकादशीको |कौन है जो एकादशीको भोजन करेगा? कौन
भोजन करे, इसके सिवा दूसरी कोई वात मुञ्चे | वेदकौ निन्दा करेगा, कौन ब्राह्मणको नीचे
अच्छी नहीं लगती । एकादशीके दिन यह उपवासका | गिरायेगा, कौन पर-स्त्नी-गमन करेगा ओर कौन
विधान वेदोमें नहीं देखा जाता हे । एकादशीको अन्न खायेगा 2
भूपते! मोहिनीकी यह वात सुनकर वेदवेत्ताओंमं | मोहिनीने कहा--पूर्णिके ! तुम शीघ्र जाकर
रष राजा रुक्माङ्गद मनमें तो कुपित हुए; परंतु | वेद-विद्यके पारङ्गत ब्राह्मणोंको यहां बुला
बाहरसे हँसते हए-से बोले-“ मोहिनी ! मेरी | लाओ, जिनके वाक्यसे प्रेरित होकर ये राजा
वात सुनो! वेद अनेक रूपमे स्थित है । यज्ञ | एकादशीको भोजन करे ।
आदि कर्मकाण्ड वेद है, स्मृति वेद है ओर ये| उसकी वात सुनकर घूर्णिका गयी ओर वेद्-
दोनों प्रकारके वेद पुराणोमें प्रतिष्ठित टै । अतः | विद्यसे सुशोभित गौतम आदि ब्राह्मणोको बरुलाकर
वरानने! मँ वेदार्थसे अधिक पुराणार्धको मान्यता | मोहिनीके पास लं आयी। उन वेद-वेदाङ्गके
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 8118 8/1 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
६२०
संक्षिप्त नारदपुराण
पारङद्कत ब्राह्मणोक्को आया देख राजासहित मोहिनीने
प्रणाम किया। कह अपना
काम बनानेके प्रयलमे लग
गयी भथी। गम्बहीपाल।
प्रज्चलित अग्रिके समान
तेजस्वी वे सव्र ब्राह्मण
सोनेके सिंहासनोंपर बेदे।
तदनन्तर उनमेसे वयोवृद्ध
ब्राह्मण गौोतमने कहा-
"देवि ! सब प्रकारके सदेहका
निवारण करनेवाले तथा
अनेक शस्त्रोमे कुशल हम
सब ब्राह्मण यहां आ गये
हें । जिसके लिये हमें बुलाया गया है वह कारण
बताइये ।' उनको बात सुनकर मोहिनी बोली ।
मोहिनीने च्छहा-- ब्राह्यणो ! हमारा यह संदेह
तो जडतापूर्णं हे; साथही छोटा भी है। इसपर
अपनी बुद्धिके अनुसार आप लोग प्रकाश डालें ।
ये राजा कहते ह- म एकादशीके दिन भोजन
नहीं करूगा, किंतु यह सम्पूर्णं चराचर जगत्
अन्नके ही आधारपर टिका है। मरे हए पितर
भी अन्नद्रारा श्राद्ध करनेपर स्वर्गलोके तृपि
एव प्रसन्नताक्ा अनुभव करते हं । द्विजवरो ।
स्वर्गके देवता वेरके बरावर पुरोडाशकी भी
आहुति पानेकी इच्छा रखते हँ, अतः अन्न
सर्वोत्तम अमृत हे, भूखी हई चींटी भी मुखसे
चावल लेकर बड़ कष्टसे अपने विलके भीतर
जाती हे। भला, अन्न किसको अच्छा नहीं लगता।
ये महाराज एकादशी प्राप्त होनेपर खाना-पीना
बिलकुल छोड देते है; किंतु व्रतका सेवन
| विधवाओं ओर यतियोके लिये ही उचित
होता है। राजाका धर्म है प्रजाकी रक्षा
करना। वह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-चारों
पुरुषार्थोका फल देनेवाला है । स्त्रियो के लिये
पतिसेवा, पुत्रके लिये माता-पिताकौ सेवा,
शद्रोके लिये द्विजोंकी सेवा तथा राजाओंके
लिये सम्पूर्णं जगत्की रक्षा स्वधर्म हे। जो
अपने धमानुकूल कर्मका परित्याग करके अज्ञान
अथवा प्रमादवश परधर्मके लिये कष्ट उटठाता
हे, वह निश्चय ही पतित है । इन राजाका शरीर
तो अत्यन्त क्षीण हो गया है; फिर ये एकादशीके
दिन संयम-नियमका पालन कैसे करेंगे ? अन्नसे
ही प्राणकी पुष्टि होती है ओर प्राणसे शरीरमे
विशेषरूपसे चेष्टाकी शक्ति आती है । चेष्टासे
शत्नुका नाश होता है। जो चेष्टा या पुरुपार्थसे
रहित है, उसका पराभव होता है। एेसा
जानकर मै राजाको बराबर समञ्चाती हू, परंतु
ये समञ्ञ नहीं पाते ।
= १६
(१31८ # 9
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8181185। (01661011. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग ६२१
---____~_~
राजाके द्वारा एकादशीके दिन भोजनविषयक मोहिनी तथा ब्राह्मणोके वचनका
खण्डन, मोहिनीका रुष्ट होकर राजाको त्यागकर जाना ओर धर्माङ्दका उसे
लाटाकर लाना एवं पितासे मोहिनीको दी हुई वस्तु देनेका अनुरोध करना
वसिष्टजी कहते है -- मोहिनीको कही हुई वचन सुनाता हू, आप लोग सुने । ' मदिरा कभी
सुनकर वे ब्राह्यणलोग “यह ठीक ही है" एेसा | नहीं पीना चाहिये, ब्राह्मणको कभी नहीं
कहकर राजासे बोले। मारना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुषको जृएका खेल
व्राह्मणोने कहा-- राजन्! आपने जो यह | नहीं खेलना चाहिये ओर एकादशीके दिन
पुण्यमय शपथ करली है कि दोनों पक्षोंकी | भोजन नहीं करना चाहिये । नह्य करने योग्य
एकादशीको भोजन नहीं करना चाहिये, वह | कार्यको करके कौन सौ वर्पोतक जीवित रहता
निश्चय शास्त्रदृष्टि से नहीं, अपनी बुद्धिसे ही | है ? कौन सचेष्ट मनुष्य है, जो एकादशीके दिन
किया गया हे। जो अग्निहोत्री हें, उनके लिये | भोजन करे। उत्तर दिशामें रहनेवाले तिष्णुधर्मपरायण
दोनों संध्याओमें भोजनका विधान है । ब्राह्यण | ब्राह्यणोंको तो उचित है कि वे एकादशीके
आदि तीन वण्कि लोग होमावशिष्ट (यज्ञशिष्ट ) | दिन पशुओंको भी अन्न न दे । द्विजोत्तमो ! मेरा
अन्नके भोक्ता बताये गये हैँ । प्रभो! जो सदा | शरीर क्षीण नहीं है ओर मे रोगी भी नहीदं
अस्त्र-शस्त्र उठाये ही रहते ह ओर दुष्ट | अतः ब्राह्मणके कहनेमात्रसे म एकादशीके
पुरुषोको संयममें रखते हँ, एेसे भूपालोके | व्रतका त्याग कैसे करूगा? मेरा पुत्र धममाङ्घिद
लिये विशेषतः उपवास-कर्म कैसे उचित हो | इस भूतलकी रक्षा कर रहा है । अतः मँ लोक या
सकता है ? शास्त्रसे या अशास्त्रसे आपने इस | प्रजाकी रक्षारूप धर्मसे भी शृन्य नहीं हं । मेरा
व्रतके लिये जो प्रतिज्ञा कर ली हे, वह ठीक | कोई भी शत्रु नहीं है। द्विजवरो! एेसा जानकर
है; किंतु आप ब्राह्मणोके साथ भोजन करें, | आपलोगोको वैष्णव-त्रतका पालन करनेवाले मेरे
इससे आपका व्रत भङ्ग नहीं हो सकता। प्रतिकूल कोई त्रतनाशक वचन नहीं कहना चाहिये।
यह वचन सुनकर राजाके मनम बड़ा क्रोध | देवता, दानव, गन्धर्व, राक्षस, सिद्ध, ब्राह्मण,
हुआ। पर वे उन ब्राह्मणोंसे मधुर वाणीम | हमारे पिता, भगवान् विष्णु, भगवान् शिव अथवा
वबोले-' विप्रवरो ! आप लोग सब प्राणियोंको | मोहिनीके पिता श्रीब्रह्माजी, सूर्यं अथवा ओर कोई
मार्ग दिखानेवाले है, अतः आपको एेसी बाते | लोकपाल स्वयं आकर कहें तो भी मँ एकादशीको
नहीं कहनी चाहिये । जो लोग एकादशीके दिन | भोजन नहीं कर्गा। द्विजो ! इस पृथ्वीपर विख्यात
उपवासका विधान करनेवाले वचनको (केवल) | यह राजा रुक्माङ्गद अपनी सच्ची प्रतिज्ञाको
यतियों ओर विधवाओके लिये ही विहित | कभी निष्फल नहीं कर सकता। ब्राह्मणो ।
वताते है, वे ठीक नहीं कहते हैं । वैष्णवोंका | इन्द्रका तेज क्षीण हो जाय, हिमालय बदल
कहीं एसा मत नहीं है । आप लोगोने जो यह | जाय, समुद्र सुख जाय तथा अग्रि अपनी
कहा है कि राजाओंके लिये उपवासका विधान | स्वाभाविक उष्णताको त्याग दै तथापि रै
नहीं टै, उसके विषयमे में वैष्णवाचार-लक्षणके । एकादशीके दिन उपवासरूप व्रतका त्याग नहीं
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 81188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 6810011
६२२
संक्षिप्त नारदपुराण
करूगा। विप्रगण! तीनों लोकोमें यह वात
प्रसिद्ध हो चुकी है ओर उंकेकी चोटसे
दुहरायी जाती है कि जो लोग रुक्माङ्गदके
गोव, देश तथा अन्य स्थानोमें एकादशीको
भोजन करेगे, वरे पुत्रसहित दण्डनीय एवं वध्य
होगे ओर उनके लिये इस राज्यमें ठहरनेका
स्थान नहीं होगा । एकादशीका दिन सब यज्ञसे
प्रधान पापनाशक, धर्मवर्धक, मोक्षदायक तथा
जन्मरूपी बन्धनको काटनेवाला है । यह तेजकी
निधि हे ओर सब लोगोमें इसकी प्रसिद्धि भी
हे । इस तरहके शब्दकौ घोषणा होनेपर भी यदि
मे एकादशीको भोजन करता हू तो पापका
प्रवर्तक होऊगा । मेरा ब्रत भङ्ग हो जानेपर मुञ्च
जन्म देनेवाली माता अपनेको व्यर्थं मानेगी तथा
ब्राह्मण, देवता तथा पितर निराश होंगे। जो वेद,
पुराण ओर शास्त्रोंको नहीं मानता, वह अन्तमें
सूर्यपुत्र यमराजको पुरीमें जाता है। जो वमन
करके फिर उसे खाता है, उसीके समान वह भी
हे, जो अपनी प्रतिज्ञा तथा ब्रतको भङ्ग कर देता
हे । वेद, शास्त्र, पुराण, संत-महात्मा तथा धर्मशास्त्र
कोई भी एेसे नहीं हँ, जो भगवान् विष्णुके
प्रिय कार्यके योग्य एकादशीके दिन भोजनका
विधान करते हों। एकादशीके दिनका त्रत
भगवान् विष्णुके पदको देनेवाला है । उस दिन
क्षयाह तिथि होनेपर भी अन्न-भोजनकी बात
मृद् पुरुष ही कह सकते हे ।'
राजाको यह वात सुनकर मोहिनी भीतर-
ही-भीतर जल उठी ओर क्रोधसे ओंखें लाल
करके पतिसे बोली-“ राजन्! तुम मेरी बात
नहीं स्वीकार करते हो तो धर्मभ्रष्ट हो जाओगे।
पृथ्वीपते! तुमने वर देनेके लिये अपना हाथ
सौपा था। अपनी उस प्रतिज्ञाका उष्लल्ुन करके
यदि दिये हुए वचनका पालन न करोगे तो मैं
चली जाऊंगी। नरेश! अबे न तो तुम्हारी
प्यारी पली हूं ओर न तुम मेरे पति। तुम अपने
वचनको मिटाकर धर्मका नाश करनेवाले हो।
तुम्हें धिक्कार है ।'
एेसा कहकर मोहिनी बड़ी उतावलीके साथ
उठी ओर जिस प्रकार सती देवी महादेवजीको
छोडकर गयी थीं, उसी प्रकार वह राजाको
छोडकर ब्राह्मणोंको साथ ले उसी समय वहसे
चल दी। उस समय ब्रह्माजीकी मानसपुत्री
मोहिनी "हा तात! हा जगन्नाथ } जगत्कौ सृष्टि,
स्थिति ओर संहार करनेवाले परमेश्वर ! मेरी सुध
लो '- इन शब्दोंका जोर-जोरसे उच्चारण करती
हई विलाप कर रही थी।
इसी समय धम्मङ्गद सारी पृथ्वीका परिभ्रमण
करके घोडेपर चदे हुए आये । उनके मनमें कोई
ईर्ष्या -द्वेष नहीं था। उन्होने मोहिनीकी वह
पुकार अपने कानों सुन ली थी। धर्माङ्गद बडे
पितृभक्त थे। धर्ममूरतिं रुक्माङ्गदकुमार तुरंत घोडेसे
उतर पड़े ओर पिताके चरणोंके समीप गये।
उन्हे प्रणाम करके धर्माङ्गदने फिर उठकर हाथ
जोड, उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोको प्रणाम किया । राजन्।
तदनन्तर रोषयुक्त हदयवाली मोहिनीको शीघ्र-
गतिसे बाहर जाती देख धममङ्गद बड़े वेगसे
सामने गये ओर हाथ जोड़कर बोले-'मां।
किसने तुम्हारा अपमान किया है? देवि! तुम तो
पिताजीको अधिक प्रिय हो, आज रुष्ट केसे हो
गयी ? इन ब्राह्मणोके साथ इस समय तुम कहां
जा रही हो 2" ध्मङ्गदकी बात सुनकर मोहिनी
बोली-' बेटा! तुम्हारे पिता जूठे है, जिन्होनि
अपना हाथ मुञ्चे देकर भी उसे व्यर्थं कर दिया।
अतः तुम्हारे पिता रुक्माङ्गदके साथ रहनेका अब
मेरे मनमें कोई उत्साह नहीं है ।'
धर्माङ्दने कहा--देवि! तुम जो कहोगी,
((-0. 1/८11114<511॥1 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग
उसे मेँ तुरंत करूगा। मों! तुम क्रोधन करो
तुम पिताजीको अधिक प्रिय हो; अतः उनके
पास लौट चलो।
मोहिनी बोली- वत्स ! मुंह्मोगा वरदान देनेकी
शर्तं रखकर तुम्हारे पिताने मन्दराचलपर मुद्ध
अपनी पती बनाया था। देवेश्वर भगवान् शिव
इसके साक्षी है, किंतु तुम्हारे पिता रुक्माद्गद
अव उस प्रतिज्ञासे गिर गये हें । राजकुमार! मैं
उनसे सुवर्ण, धन, हाथी, घोडे, गोव या
वहु मूल्य वस्त्र नहीं मोँगती हूं जिससे उनकी
आधिक हानि हो। देहधारियोमें श्रेष्ट वेरा
धममरङ्कद । जिससे वे अपने शरीरको पीड़ा दे
रहे है, वही वस्तु मैने उनसे मोगी है; किंतु
वे मोहवश उसे भी नहीं दे रहे हे । नृपनन्दन ।
उन्हीके शरीरकौ भलाईके लिये, उन्हीके सुखके
लिये मैने वर मोगा हे, किंतु वे नृपश्रेष्ठ उसे
न देकर आज भयंकर असत्यके दलदलमें फस
गये हे । असत्य मदिरापानके समान घृणित पाप
हे । इस कारण तुम्हारे पिताको में त्याग रही
हू । अव उनके साथ मेरा रहना नहीं हो सकता।
मोहिनीका यह वचन सुनकर पुत्र ध्मद्खिदने
कहा-' मेरे जीते-जी मेरे पिता कभी इठे
नहीं हो सकते। वरारोहे ! तुम लटो । मँ तुम्हारा
मनोरथ पूर्णं करूगा। देवि ! मेरे पिताने पहले
कभी असत्यभाषण नहीं किया है; फिर वे
महाराज मुञ्च पुत्रके होते हए असत्य कसं
बो्लेगे 2 जिनके सत्यपर देवता, असुर तथा
मानवोंसहित सम्पूर्णं लोक स्थित है, जिन्हे
यमराजके घरको पापियोसे शून्य कर दिया है,
जिनकी कीर्तिं रोज बद रही है ओर उससे
सम्पूर्ण ब्रह्याण्डमण्डल व्याप्तहोगयादै,.वेद्ी
६२३
भूपालशिरोमणि असत्य-भाषणमें तत्पर कैसे हो
सकते हे ? मेने महाराजका वचन सुना नहीं है
फिर उनके परोक्षमें तुम्हारी बातपर कैसे विश्रारः
कर लं ? शुभानने! मुञ्चपर दया करके लट चलो ।
राजन्! धर्माङ्गदका यह कथन सुनकर मोहिनी
लौटी। सूर्यके समान तेजस्वी रुक्माद्कद जिस
शय्यापर मृतकके समान लेटे थे, उसीपर धर्माद्गिदने
मोहिनीको विठाया। वह शय्या सुवर्णसे विभूषित,
अनुपम ओर मनोहर थी। जव मोहिनी उसपर
वेठ गयी, तव धमद्धदने हाथ जोडकर पितासये
मधुर वाणीमे कहा--' तात! ये मेरी माता मोहिनी
आज आपको असत्यवादी बता रही है । महाराज!
सातों समुद्रोसे युक्त भूमण्डलका शासन करते
हे । आपके पास खजाना है, रत्नोकी राशि संचित
हे। प्रभो! यह सब आप इन्हे दे दीजिये। ओर
भी जो कुछ देनेकी प्रतिज्ञा आपने की हो, वद
दे दीजिये। पिताजी! जव म धनुष-वाण धारण
करके खड़ा हूं तो आपके प्रतिकूल आचरण
कौन कर सकता है? आप चाहे तो देवीकी
इन्द्रपद दे दीजिये ओर इनद्रको जीता हुआ दी
समक्चिये । ब्रह्माजीका पद अत्यन्त दुर्लभ है, वह
योगियोके ही अनुभवमें आने योग्य तथा निरञ्जन
है। यदि देवी चाहे तो मेँ तपस्यासे ब्रह्माजीको
संतुष्ट करके वह भी इन्दे दे दंगा। राजेन्द्र
इस त्रिलोकी्मे जो दुष्कर हो अथवा अधिक
प्रिय होनेसे जौ दैनेयोग्य नहो, व्ह भी
मोहिनी देवको दे दीजिये। ये चाहें तो मेरा
अथवा मेरी जननीका जीवन भी इन्हें दे सकते
है । इससे आप तत्काल ही इस लोके सदाके
लिये उत्तम कीर्निसे सुशोभित होंगे।'
०९ 1 ० ‰° १५
1 + / 1 1
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/81/81185। (01661101. 01411260 0 60810011
६रर्द
संक्षिप्त नारदपुराण
राजा रुक्माङ्कदका एकादशीको भोजन न करनेका ही निश्चय
राजा बोले- वेरा! मेरी कीर्ति नष्ट हो जाय,
मे असत्यवादी हो जाऊ अथवा घोर नरकमें ही
पड़ जाऊ, किंतु एकादशीके दिन भोजन कैसे
करूगा ? पुत्र ! यह मोहनी देवी ब्रह्माजीके लोकमें
चली जाय, यह मुञ्चसे बार-बार यही कहती है
कि मं पापनाशिनी एकादशीके दिन तुम्हें भोजन
करानेके सिवा राज्य, वसुधा ओर धन आदि दूसरी
कोई वस्तु नदीं चाहती । यह जो हमारी दुदुभी स्वयं
गुरुतर होकर गम्भीर नाद करती हई लोगोको शिक्षा
देती हे, वह आज असत्य केसे हो जाय ? अभक्ष्यभक्षण,
अगम्या स्त्रीके साथ संगम तथा न पीने योग्य मदिरा
आदिका पान करके कोई सो वर्ष क्यो जीयेगा 2 इस
चञ्चल कटाक्षवाली मोहिनीके वियोगसे यदि मेरी
मृत्यु हो जाय तो वह भी यहाँ अच्छा ही है; किंतु
मे एकादशीके दिन भोजन नहीं करूगा। तात।
नरकोंको जो पडङ्क्तियँ मने सूनी करदीरहँ, वे
मेरे भोजन करते ही पुनः ज्यो-की-त्यों लोगोँसे
भर जायेगी । मेरा रुक्माद्गद नाम तीनों लोकोमे
प्रसिद्ध हे ओर एकादशीके उपवाससे ही मैने इस
यशका संचय किया हे, वही अब मैं एकादशीको
भोजन करके अपने ही द्वारा फैलाये हए यशका
नाश केसे कर दूंगा। मोहिनी मर जाय या चली
जाय, गिर जाय या नष्ट हो जाय तथापि मेरा मनं
इसके लिये एकादशीके उपवाससे विरत नहीं हो
सकता । स्त्री-पुत्र आदि कुटुम्बीजनोके साथ में
अपने शरीरका त्याग कर सकता हूं परंतु भगवान्
मधुसूदनके पुण्यमय दिवस एकादशीको अन्नका
सेवन नहीं करूगा।
६7;
(1411 #
संध्यावली -मोहिनी-संवाद, रानी संध्यावलीका मोहिनीको पतिकी इच्छाके
विपरीत चलनेमें दोष बताना
वसिष्ठजी क्छहते है-पिताकी बात सुनकर
पुत्र धर्माङ्गदने अपनी कल्याणमयी माता संध्यावलीको
शीघ्र ही बुलाया । पुत्रके कहनेसे वे उसी क्षण
महाराजके समीप आयीं । धर्म्गदने उनसे मोहिनी
तथा पिताको भो बातें कह सुनायीं ओर निवेदन
किया-*मों! दोनोंकी वातोंपर विचार करके
मोहिनीको सान्त्वना दो। यह एकादशीके दिन
राजाको भोजन करानेपर तुली हुई है । मेरे पिता
जिस प्रकार सत्यसे विचलित न हों ओर एकादशीको
भोजन भीन करे-एेसा कोई उपाय निकालो,
एसा होनेपर ही दोनोका मद्धल होगा।' राजन्।
पुत्रको बात सुनकर संध्यावलीदेवी ब्रह्यपत्री मोहिनीसे
उस समय मधुर वाणीमें बोलीं-' वामोरु! आग्रह
न करो । एकादशी प्राप्त होनेपर अन्नमात्रमे पापका
सम्पकं हो जाता हे, अतः महाराज किसी प्रकार
भी उसका आस्वादन नहीं कर सकते। तुम
राजाका अनुसरण करो। ये हम लोगोके सनातन
गुरु हं। जो नारी सदा अपने पतिकी आज्ञाका
पालन करती हे, उसे सावित्रीके समान अक्षय
तथा निर्मल लोक प्राप्त होते है । देवि! यदि इन्होने
पहले मन्दराचलपर कामसे पीडित होकर तुम्हं
अपना हाथ दिया है तो उस समय इन्होंने
योग्यायोग्यका विचार नहीं किया। जो देनेलायक
व्स्तुहे, उसेतोवेदेही रहे ह ओर जो नही
देनेयोग्य वस्तु है, उसको तुम मगो भी मत। जो
सन्मागमें स्थित है उसे यदि विपत्ति भी प्राप्त हो
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
उत्तरभाग ६२५
मे वह वात करूंगी, जो तुम्हारे प्राण लेनेवाली है।
तुम्हारे ही नही, पतिदेवके; प्रजावगकि तथा पुत्रवधुभकि
भी प्राण हर लेनेवाली वह बात है। उससे मेरे
धर्मका नाश तो होगा ही, मुञ्े भारी कलंककी भी
प्रापि होगी। उस बातको कर दिखाना तो दूर दै
मनमे उसे करनेका विचार लाना भी सम्भव नहीं
हे। यदि तुम मेरे उस वचनका पालन करोगी तो
इस संसारम तुम्हारी बड़ी भारी कीर्तिं फैलेगी,
पतिदेवको भी यश मिलेगा, तुम्हें स्वर्गलोककी
प्रापि होगी, तुम्हारे पुत्रको सव लोग प्रशंसा करेगे
ओर मुञ्चे चारों ओरसे धिक्कार मिलेगा।'
वसिष्ठजी कहते है- राजन्! मोहिनीकी बात
सुनकर देवी संध्यावलीने किसी तरह धैर्य धारण
किया ओर उस मोहिनीसे कहा-' कहो, को
क्या बात है? तुम कैसा वचन बोलोगी, जिसये
मुञ्चे दुःख होगा । मुञ्चे अपने पतिके सत्यको रक्षाम
कभी कोई दुःख नहीं हो सकता। स्वामीके
हितका साधन करते समय मेरे इस शरीरका अन्त
हो जाय, मेरे पुत्रकी मृत्यु हो जाय अथवा सम्पूर्ण
| नाश हो जाय; तथापि मुञ्चे कोई व्यथा
नहीं होगी । सुन्दरी! जिस पन्नीके पति उसके
व्यवहारसे दुःखी होते हँ, वह समृद्धिशालिनी हो
तो भी उस पापिनीकी अधोगति ही कही गयी है।
वह सत्तर युगोतक " पूय नामक नरकमें पड़ी रहती
है । तत्पश्चात् भारतवर्षमें सात जन्मोतक चछच्युदर
होती दै । उसके बाद काकयोनि्ें जन्म लेती है;
फिर क्रमशः शृगाली, गोधा ओर गाय होकर् शुद्ध
होती है। अतः तुम मागो; मँ पतिके हितके लिये
तुम्हें अवश्य अभीष्ट वस्तु प्रदान करूंगी । वरानने !
मेरा धन, शरीर, पुत्र अथवा अन्य कोई वस्तु जो
तो वह कल्याणमयी ही होती हे । सुभगे ! जिन्होने
बचपनमें भी एकादशीके दिन भोजन नहीं किया
हे, वे इस समय वृद्धावस्थामें भगवान् विष्णुके
पुण्यमय दिवसको अन्न कैसे ग्रहण करेगे ? तुम
इच्छानुसार कोई दूसरा अत्यन्त दुर्लभ वर मोग
लो। उसे महाराज अवश्य दे देगे। उन्हें भोजन
करानेके हटठसे निवृत्त हो जाओ। देवि! मेँ
धर्माद्भदको जननी हूं। यदि तुम मुञ्चे विश्वसनीय
मानती हो तो सातं द्वीप, नदी, वन ओर पर्वतसहित
इस सम्पूर्णं राज्यको ओर मेरे जीवनको भी मोग
लो। विशाललोचने! यद्यपि मेँ ज्येष्ठ हूं तथापि
पतिके लिये छोटी सपत्नीको भी चरण-वन्दना
करूगी। तुम प्रसन्न हो जाओ। जो वचनसे ओर
शपथ-दोषसे पतिको विवश करके उनसे न करने
योग्य कार्य करा लेती है, वह पापपरायणा नारी
नरके निवास करती है। वह भयंकर नरकसे
निकलनेके बाद बारह जन्मोतक शुकरीकी योनिमं
जन्म लेती है। तत्पश्चात् चाण्डाली होती हे । सुन्दरि।
इस प्रकार पापका परिणाम जानकर मैने तुम्हें
सखी-भावसे मना किया है। कमलानने! धर्मकी इच्छ
रखनेवाले मनुष्यको उचित है कि वह शत्रुको भी अच्छी
वुद्धि (नेक सलाह) दे; फिर तुम तो मेरी सखीके रूपमे
स्थित हो। अतः तुष्हं क्यों न अच्छी सलाह दी जाय ?'
संध्यावलीकी बात सुनकर मोहकारिणी मोहिनी
सुवण्के समान सुन्दर कान्तिवाली पतिको ज्येष्ठ
प्रियासे उस समय इस प्रकार बोली-' सुश्रु! तुम
मेरी माननीया हो, मै तुम्हारी बात मानुंगी।
नारदादि विद्वान् महर्पियोने एेसा ही कहा ह ।
देवि ! यदि राजा एकादशीके दिन भोजन न करं
तो उसके बदले एक दूसरा कार्य करे, जो तुम्हारे
लिये मृत्युसे अधिक कष्टदायक है । शुभे! वह | चाहो मोगो, स्त्रियकि लिये एकमात्र पतिके सिवा
कार्य मेरे लिये भी दुःखदायक है तथापि दैववश | संसारम दूसरा कौन देवता टै ?'
+न 1 +^ +
((-0. 1/८111141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 60810011
६२६
संक्षिप्त नारदपुराण
मोहिनीका संध्यावलीसे उसके पुत्रका मस्तक मांगना ओर संध्यावलीका उसे
स्वीकार करते हुए विरोचनको कथा सुनाना
वसिष्ठजी कहते है- संध्यावलीकी बात सुनकर
ब्रह्माजीको पुत्री मोहिनी अपने कार्यसाधनमें तत्पर
होकर बोली-“ शुभे! यदि तुग्र इस प्रकार धर्म
ओर अधर्मको गति जानती होः ओर स्वामीके
लिये धन तथा जीवनका भी दान करनेको उद्यत
हो तो में तुमसे उस धनको याचना करती हूं, जो
तुम्हारे लिये जीवनसे भी अधिक महत्त्व रखता
हे । तुम्हारे पति राजा रुक्माङ्गद यदि एकादशीके
दिन भोजन नहीं करेगे तो वे अपने हाथमे तलवार
लेकर धर्माङ्गदके चनद्रमण्डल-सदृश सुन्दर एवं
मनोहर कुण्डल भूषित मस्तकको, जिसमें अभी मूंछ
नहीं उगी हे, काटकर तुरत मेरी गोदमें गिरा दे।'
मोहिनीका वह कड्वे अशक्षरोसे युक्त वचन
सुनकर देवी संध्यावली शीतपीडित कदलीके
समान क्षणभरके लिये कोपि उठी। तदनन्तर श्रेष्ठ
वर्णवाली महारानी धैर्य धारण कर दहंसती हुई
सुन्दर मुखवाली मोहिनीसे बोली-' सुभ्रु! पुराणमें
द्वादशी (एकादशी) -के सम्बन्धे वर्णित कुछ
गाथां सुनी जाती हैँ, जो स्वर्ग ओर मोक्ष प्रदान
करनेवाली है-- धनको त्याग दे; स्त्री, जीवन ओर
घरको भी छोड़ दे; देश, राजा ओर मित्रको भी
त्याग दे; अत्यन्त प्रिय व्यक्तिको भी त्याग दे; परंतु
दोनों पक्षोकी पवित्र द्वादशी (एकादशी) -का त्याग
न करे; क्योकि पुत्र, भाई, सुहद् ओर प्रियजन-सव
सम्बन्धी यहीं काम देते हँ, कितु द्वादशी (एकादशी)
इहलोक ओर परलोकमें भी अभीष्ट साधन करती
हे। अतः द्वादशी (एकादशी) -के प्रभावसे सव
मङ्गल ही होगा । शुभे! मेँ तुम्हारी प्रसन्रताके लिये
धर्माङ्गदका मस्तक दिलाऊँगी । शोभने! मेरी बातपर
विश्वास करो ओर सुखी हो जाओ। भद्रे! इस
विषयमे एक प्राचीन इतिहास सुना जाता हे, उसे
मे कहती हूं, तुम सावधान होकर सुनो।
पूर्वकालमें विरोचन नामसे प्रसिद्ध एक धर्मपरायण
देत्य थे। उनकी पल्ली विशालाक्षी ब्राह्मणपूजनमें
तत्पर रहती थी । सुभ्रु! वह प्रतिदिन प्रातःकाल
एक ऋषिको बुलाकर विधिपूर्वक उनकी पूजा
करती ओर प्रसन्नचित्त हो, भक्तिभावसे उनका
चरणोदक लेती थी। उन दिनों हिरण्यकशिपुके
मारे जानेपर सब देवता प्रह्ादपुत्र विरोचनसे भी
सदा शंकित रहते थे। एक दिन वे इन्द्र॒ आदि
देवता बृहस्पतिजीकी सलाह लेते हुए बोले- हम
लोग शत्रुओंसे बहुत पीडित है, इस समय हमं
क्या करना चाहिये ?" उनका वह वचन सुनकर
देवगुरु बृहस्पतिने कहा-' देवताओ! आज दुःखमे
पड़ हए तुम सब लोगोंको अपना यह कष्ट
भगवान् विष्णुसे निवेदन करना चाहिये ।' अमित-
तेजस्वी गुरुका यह भाषण सुनकर सब देवता
विरोचनके प्राणनाशका संकल्प लेकर भगवान् विष्णुके
समीप गये । वहां जाकर उन्होने अनेक प्रकारके
स्तुतियोसे सुरश्रेष्ठ श्रीहरिका स्तवन किया।
देवता बोले-देवताअओकि भी अधिदेवता अमित
तेजस्वी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। भक्तकि
विघ्रका निवारण करनेवाले नरहरिको नमस्कार है।
महात्मा वामनको नमस्कार है। वाराहरूपधारी
भगवानूको नमस्कार है। प्रलयकालीन समुद्रे
निवास करनेवाले मत्स्यरूप माधवको नमस्कार
है । पीठपर मन्दराचलको धारण करनेवाले भगवान्
कूर्मको नमस्कार है। भृगुनन्दन परशुराम तथा
क्षीरसागरशायी भगवान् नारायणको नमस्कार है।
सम्पूर्णं जगत्के स्वामी श्रीरामको नमस्कार ह।
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
उत्तरभाग
६२७
विश्वके शासक तथा साक्षीरूप श्रीहरिको नमस्कार है
शुद्ध दत्तात्रेय-स्वरूप ओर दूसरोकी पीड़ा दूर करनेवाले
कपिलरूपधारी भगवान्को नमस्कार हे । धर्मको धारण
करनेवाले सनकादि महात्मा जिनके स्वरूप है, उन
यज्ञमय भगवान्को नमस्कार है। भ्रुवको वरदान
देनेवाले नारायणको नमस्कार है। महान् पराक्रमी
पृथुको प्रणाम हे । विशुद्ध अन्तःकरणवाले ऋषभको
ओर हयग्रीवावतारधारी श्रीहरिको नमस्कार है।
आगमस्वरूप भगवान् हंसको नमस्कार हे तथा अमृत
कलश धारण करनेवाले धन्वन्तरिको नमस्कार हे एवं
वासुदेव, संकर्षण, प्रदयुप्र ओर अनिरुद्ध जिनके व्यूहरूप
शरीर है, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार हे । ब्रह्मा,
शङ्कर, स्वामिकार्तिकेय, गणेश, नन्दी ओर भृद्खीरूपमें
भगवान् विष्णुको नमस्कार हे। जो बदरिकाश्रममें
नर-नारायणरूपसे गन्धमादन पर्वतपर निवास करते
हे, उन भगवान्को नमस्कार है । जो जगदीश्वरपुरीमें
जगन्नाथ नाम धारण करते हैं, सेतुबन्धे रामेश्वर
नामसे विख्यात होते हे तथा द्वारका ओर वृन्दावनमं
श्रीकृष्णरूपसे रहते है, उन परमेश्वरको नमस्कार है।
जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ हे, उन भगवान्
विष्णुको नमस्कार हे। प्रभो! आपके चरण, हाथ
ओर नेत्र सभी कमलके समान है । आपको नमस्कार
हे। आप कमला देवीके प्रतिपालक भगवान् केशवको
बारम्बार नमस्कार है। सूर्यरूपमें आपको नमस्कार
हे। चन्द्रमारूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार
है । इन्द्रादि लोकपाल आपके स्वरूप है, आपको
नमस्कार है । प्रजापतिस्वरूप धारण करनेवाले आपको
नमस्कार है। सम्पूर्ण प्राणियोंका समुदाय आपका
स्वरूप है, आप जीवस्वरूप, तेजोमय, जय, विजयी,
नेता, नियम ओर क्रियारूप हँ; आपको नमस्कार हे।
निर्गुण, निरीह, नीतिज्ञ तथा निष््रियरूप आपको
नमस्कार है। बुद्ध ओर कल्कि-ये दानां आपके
सुप्रसिद्ध अवतार-विग्रह है, आप ही क्ेत्र्न जीव
[ 1183 ] सं० ना० पु २१-
तथा अक्षर परमात्मा है, आपको नमस्कार है। आप
गोविन्द, विश्वम्भर, अनन्त, आदिपुरुष, शा्द्खधनुषधारी,
शङ्खधारी, गदाधर चक्रसुदर्शनधारी, खद्धहस्त, शूलपाणि,
समस्त शस्त्रास्त्रघाती, शरणदाता, वरणीय तथा सबसे
परे परमात्मा है, आपको नमस्कार है। आप इद्धियेकि
स्वामी ओर विश्वमय है । यह सम्पूर्णं जगत् आपका
स्वरूप है, आपको नमस्कार है। काल आपकी नाभि
हे, आप कालस्वरूप है, चन्द्रमा ओर सूर्य आपके नेत्र
है, आपको नमस्कार है । आप सर्वत्र परिपूर्ण, सवके
सेव्य तथा परात्पर पुरुष है, आपको नमस्कार है।
आप इस जगतके कर्ता, भर्ता तथा धर्ता है। यमराज
भी आपके ही रूप है । आप ही सबको मोह ओर
क्षोभे डालनेवाले ह । अजन्मा होते हुए भी इच्छानुसार
अनेक रूप धारण करते ह । आप सर्वश्रेष्ठ विद्वान् है;
आपको नमस्कार है। भगवन्। हम सव देवता दैत्योपे
सताये हुए ह ओर इस समय आपकी शरणमे आये है।
जगदाधार! आप एेसी कृपा कीजिये, जिससे हम स्त्री
पुत्र ओर मित्र आदिके साथ सुखी होकर् रह सर्के।
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दैत्योसे सताये हुए देवताओंका यह स्तवन
सुनकर भगवान् विष्णु मन-ही-मन बदु प्रसन्न
((-0. /८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
६२८
हुए ओर उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। स्नेहपूर्ण
हदयवाले देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुका दर्शन
करके उन देवताओंने विरोचनका शीघ्र वध
करनेके लिये उनसे सादर प्रार्थना कौ । कार्यसिद्धिका
उपाय जाननेवालोमे श्रेष्ठ श्रीहरिने इन्द्रादि देवताओंको
आवश्यकता सुनकर उन्हे आश्वासन दिया ओर
उन्हे प्रसन्न करके प्रेमपूर्वक विदा किया । देववर्गके
चले जानेपर भगवान् विष्णु देवताओंका कार्य
सिद्ध करनेके लिये वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारणकर
विरोचनके घर गये ओर ब्राह्मण-पूजनके समय वहाँ
पहुचे । जो पहले कभी नहीं आये थे, एसे ब्राह्मणको
आया देख विशालाक्षी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हई ।
उसने भक्तिभावसरे उनका सत्कार करके उन्हें वैठनेके
लिये आसन दिया । शुभे! ब्राह्मणने उसके दिये हए
आसनको स्वीकार न करके कहा-' देवि! में तुम्हारे
दिये हए इस उत्तम आसनको ग्रहण नहीं करगा।
मानिनि! जो मेरे मनोगत कार्यको समञ्जकर उसे
पूर्णं करनेको स्व्वीकृति दे, उसीकी पूजा मेँ ग्रहण
करूगा।' वृदे ब्राह्मणकी यह बात सुनकर बातचीत
करनेमं निपुण विशालाक्षी बड़ी प्रसन्न हुई । भगवान्
विष्णुकी मायाने उसे मोहित कर लिया था। अपने
स्त्री-स्वभावके कारण भी वह इस विषयमे अधिक
विचार न कर सकी ओर बोली ।
विशालाक्षीने कहा-- ब्रह्मन्! आपका जो मनोगत
कार्य हे, उसे मेँ पूर्णं करूगी। मेरा दिया हुआ आसन
ग्रहण कीजिये ओर अपना चरणोदक दीजिये।
उसके एेसा कहनेपर ब्राह्मण बोले--' में स्त्रीक
बातपर विश्ास नहीं करता। यदि तुम्हारे पति यह
बात कहें तो मुञ्चे विश्वास हो सकता हे ।' ब्राह्यणका
यह वचन सुनक्रर विरोचनकी गृहस्वामिनीने वहीं
उनके समीप पतिको बुलवाया । दूतके मुखसे सब
वात सुनकर घ्रह्वादपत्र विरोचन हर्षभरे हदयसे
संक्षिप्त नारदपुराण
अन्तःपुरमे आये, जहाँ महारानी विशालाक्षी विराजमान
थीं । पतिको आया देख धर्मपरायणा विशालाक्षी
उठकर खडी हो गयी । उसने उस श्रेष्ठ ब्राह्मणको
नमस्कार करके पुनः आसन समर्पित किया । जब
उन्होने आदरपूर्वक दिये हुए उस आसनको ग्रहण
नहीं किया, तब उसने अपने पति दैत्यराज विराचनसे
सब हाल कह सुनाया । सब बातें जानकर दैत्यराजने
पीके प्रेमसे मुग्ध होकर उस समय ब्राह्मणको शर्त
स्वीकार कर ली। विरोचनके स्वीकार कर लेनेपर
ब्राह्मणने प्रसन्नतापूर्वक कहा-' मुञ्चे अपनी आयु
समर्पित कर दो।' तब वे दोनों पति-पत्नी स्वनिर्मित
शोकसे मोहित हो दो घडीतक कुछ चिन्तन करते
रहे । फिर उन दम्पत्तिने हाथ जोड़कर ब्राह्यणसे
कहा--' विप्रवर! हमारा जीवन ले लीजिये ओर
अपना चरणोदक दीजिये। आपकी कही हुई बात
हम सत्य करेगे। आप प्रसन्न होइये 1!
तव ब्राह्मणने प्रसन्नचित्त होकर आसन ग्रहण
किया। विशालाक्षीने प्रसननतापूर्वक ब्राह्मणक दोनों
चरण पखारि ओर उनका चरणोदक पतिसहित
अपने मस्तकपर धारण किया। फिर तो वे दोनों
दम्पती सहसा (दैत्य-शरीर छोड़) दिव्यरूप
धारण करके श्रेष्ठ विमानपर बैठे ओर भगवानूके
वैकुण्ठधाममें चले गये। इस प्रकार देवताओंका
कण्टक दूर करके भगवान् अत्यन्त प्रसन्न हुए
ओर सम्पूर्ण देवताओंद्वारा अपनी स्तुति सुनते हए
वैकुण्टलोकको चले गये । देवि ! इसी प्रकार मने
भी जो तुम्हें देनेकी प्रतिज्ञा की है, वह अवश्य
दूंगी । देवि ! मै अपने पति महाराज रुक्माङ्गदको
सत्यसे विचलित न होने दंग; क्योकि सत्य ही
मनुष्योको उत्तम गति देनेवाला बताया गया है ।
सत्यसे भ्रष्ट हए मनुष्यको चाण्डालसे भी नीच
माना गया है।
०4:०१;
(-0. 11411550 8118\/211 \/8।/2185
ज इ>० "न
(0161100. 1411260 0 6810011
= = ~
उत्तरभाग
६२९
रानी संध्यावलीका राजाको पुत्रवधके लिये उद्यत करना, राजाका मोहिनीसे
अनुनय-विनय, मोहिनीका दुराग्रह तथा धर्माङ्खदका राजाको
अपने वधके लिये प्रेरित करना
वसिष्ठजी कहते ह- भूपते! तदनन्तर
संध्यावलीने पतिके दोनों चरण पकड़कर धर्माङ्गिदके
विनाशसे सम्बन्ध रखनेवाली बात कही-' महाराज ।
आपकी ही भति मेने भी इसे बहुत समञ्ाया ठै;
कितु इस मोहरूपा मोहिनीको इस समय दूसरी कोई
नात अच्छी ही नहीं लगती । इसका एक ही आग्रह
हे, एकादशीके दिन राजा भोजन करें अथवा अपने
पुत्रका वध कर डालें । नाथ! धर्म छोडनेको अपेक्षा
तो पुत्रका वध ही श्रेष्ठ हे । राजन्! गर्भ धारण करनेमें
माताको ही अधिक क्लेश सहना पडता है ओर
बालकपर उसीका स््रेह भी अधिक होता है। खेद
ओर स्नेह जेसा माताका होता है, वैसा पिताका नहीं
हो सकता। राजेन्द्र! इस भूतलपर पिताको बीज-
वपन करनेवाला कहा गया है, माता उसको धारण
करनेवाली है; अतः उसके पालन-पोषणमें अधिक
क्लेश उसीको उठाना पड़ता हे। पुत्रपर पितासे
सौगुना स्नेह माताका होता है। उसके स्नेहकां
अधिकतापर ही दृष्ट रखकर गौरवम माताको पितासे
बड़ी माना गया है, किंतु नृपश्रेष्ठ! आज मैं माता
होकर भी सत्यके पालनसे परलोकको जीतनेको
इच्छा रखकर पुत्र-स्नेहको तिलाञ्जलि दे चुकी हू ।
भूपाल! स्नेहको दूर करके पुत्रका वध कोजिये।
राजन्! वे आपत्ति्यां भी धन्य है, जो सत्यका पालन
करानेवाली हैँ । सत्यका संरक्षण करानेवाली होनेसे
वे मनुष्योके लिये मोक्षदायिनी हँ । अतः पृथ्वीपते।
संतप्त होनेसे कोई लाभ नी, आप सत्यको रक्षा
कीजिये। राजन्! सत्यके पालनसे भगवान् विष्णुका
सायुज्य प्राप्त होता है । देवताओनि आपकी परीक्षाके
लिये इस मोहिनीको कसौटीके रूपमं उत्पन्न किया
हे। अतः भूपाल! आप दृढ होकर प्रिय पुत्रका वध
कोजिये। अपने सत्य-पालनके उद्ेश्यसे मोहिनीके
वचनको पूर्तिं कीजिये।'
वसिष्ठजी कहते ह- राजन्! पतीकी यह वात
सुनकर महाराज रुक्माङ्गदने मोहिनीके समीप
रानी संध्यावलीसे इस प्रकार कहा-' प्रिये पुत्रकी
हत्या बहुत बड़ी हत्या है । वह ब्रह्महत्यासे भी
वद्कर हे। कहां-से-कहां मँ मन्दराचलपर गया
ओर न जाने कहांसे यह मोहिनी मुञ्चे वहां मिली।
देवि! यह स्त्री नहीं, धर्माङ्गदका नाश करनेके
लिये साक्षात् कालप्रिया काली है। धर्माङ्खिद
धर्मज्ञ, विनयशील तथा प्रजाको प्रसन्न रखनेवाला
हे, अभीतक उसे कोई संतान भी नहीं हई है । एसे
पुत्रको मारकर मेरी क्या गति होगी ? देवि ! कुपुत्रको
भी मारनेसे पिताके मनमें दुःख होता है, फिर जो
धर्मशील तथा गुरुजनोंका सेवक है, उसके मरनेसे
कितना दुःख होगा। वरवर्णिनि! इस समय तुम्हारे
पुत्रके प्रतापसे ही मने सातों द्वीपेकि राज्यका
उपभोग किया है। अपना यह पुत्र धर्माद्गद इस
पृथ्वीपर सबसे श्रेष्ठ है । मनोहराद्गी ! वह मेरे समूचे
कुलका सम्मान बद़ानेवाला है। सुन्दरि! मोहिनी
मोहमें डूबकर केवल मुञ्चे दुःख दे रही है, तुम पुनः
शुभ वचनोद्वारा उसे समङ्ञाओ।'
अपनी प्रिय पत्नी संध्यावलीसे एेसा कहकर
राजा उस समय मोहिनीसे इस प्रकार बोले--' शुभे!
मै एकादशीको भोजन नहीं करूगा ओर पुत्रकौ
हत्या भी नहीं कर सर्कूगा। अपनेको ओर संध्यावली
देवीको अआरेसे चीर सकता हूं अथवा तुम्हारे
कहनेसे कोई ओर भी भयंकर कर्म कर् सकता
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८३०
संक्षिप्त नारदपुराण
हू। सुश्रु। पुत्रके सम्बन्धे यह दुष्टतापूर्णं आग्रह
छोड दो । बताओ, पुत्र धमदङ्गदको मार दनेसे तुम्हें
क्या फल मिलेगा 2 मुञ्चे एकादशीको भोजन करा
दनेसे तुम्हारा क्या लाभ होगा 2 वरानने ! में तुम्हारा
दास दू. सेवक हू ओर सर्वथा तुम्हारे अधीन हूं।
साभाग्यशालिनि ! मं तुम्हारी शरणमे आया हूं।
सुन्दरि! कोई दूसरा वर मोग लो। देवि! मुञ्जपर
कृपा करो। पुत्रको भिक्षा दे दो। गुणवान् पुत्र
दुर्लभ हे ओर एकादशीका व्रत भी दुर्लभ है । इस
पृथ्वीपर गद्गाजीका जल दुर्लभ हे, भगवान्
विष्णुका पूजन दुर्लभ हे तथा स्मृतियोंका संग्रह
भा दुलभ ह एवं भगवान् विष्णुका स्मरण एवं
चिन्तन भी अत्यन्त दुर्लभ हे । साधु पुरुपोंका सङ्घ
दुलभ ह तथा भगवान्को भक्ति भी दर्लभ ही
तायो गयो हे । वरवर्णिनि! मृत्युकालमें भगवान्
विष्णुका स्मरण भी दुर्लभ ही हे, एेसा समञ्चकर
मेरा धर्मरक्षाविपयक वचन स्वीकार करो । मेने सव
विषय भोग लिये, निष्कण्टक राज्य भी कर लिया;
कितु मेरे पुत्रने तो अभो संसारके विपयोंका सुख
देखा ही नही, अतः उसकी हत्या कदापि नहीं
करूगा। मोहिनी ! अपने ही हाथसे अपने पुत्रका
वध! ओह! इससे वदढकर पाप ओर क्या होगा ?'
माहिनीने कहा- राजन्! मेने तो पहते ही कह
दिया ह, एकादशीको भोजन करो ओर इच्छानुसार
बहुत वर्पोतक पृथ्वीका शासन करते रहो । मेँ पुत्रका
वध नहीं कराऊगी । एकादशीको तुम्हारे भोजन कर
लनेमात्रसे ही मेरा प्रयोजन सिद्ध हो जायगा।
पृथ्वीपते ! तुम्हारे पुत्रको मृत्युसे मेरा कोई मतलब
नहीं हे। राजन् ! यदि पुत्र प्रिय है तो एकादशीके
दिन भोजने करो । महीपाल ! इस धर्मविरोधी विलापसे
क्या लाभ ? मरी बात मानो ओर यन्नपूर्वक सत्यक
रक्रा करो।
राजन्! मोहिनी जव एेसी बात कह रही थी,
उसी समय धर्मङ्धद वहां आ गये ओर मोहिनीकी
ओर देखकर उसे प्रणाम करके सामने खड हो
विनीतभावसे वोले-' भामिनि! तुम यही लो (मेरे
वधरूपी वरको ही ग्रहण करो); इसके विषयमे
तनिक भी शङ्का न करो।' एेसा कहकर उन्होने
राजाके आगे एक चमकती हुई तलवार रख दी ओर
अपने-आपको भी समर्पित कर दिया। तत्पश्चात्
सत्य-धर्ममें स्थित हो पितासे कहा-' पिताजी ।
अव आपको मुञ्चे मारनेमें विलम्ब नहीं करना
चाहिये। महाराज ! आपने मेरी माता मोहिनीके
समक्ष जो प्रतिक्ञा को हे, उसे सत्य कर दिखाईये ।
आपके हितके लिये मेरा मरना मुञ्चे अक्षय गति
देनेवाला है ओर अपने वचनके पालनसे आपको
भी तेजस्वी लोक प्राप्त होगे। अतः पुत्रके मारे
जानेका जो महान् दुःख हे, उसको त्यागकर अपने
धर्मका पालन कोजिये। इस मर्त्यशरीरका त्याग
करनेपर मेरे भावी जीवनका आरम्भ अमर देहमे
होगा। वह मेरा दिव्य शरीर सब प्रकारके रोगोसे
रहित होगा। प्रभो! जो पुत्र पिता अथवा माताके
हितक लिये मारे जाते ह तथा राजन्! जो गाय,
ब्राह्मण, स्त्री, भूमि, राजा, देवता, वालक तथा
आतजनके लिये प्राण त्याग करते है वे अत्यन्त
प्रकाशमय लोकामं जाते हे। अतः शोक-संतापसं
कोई लाभ नहीं, आप श्रेष्ट तलवारसे मेरा वध
कीजिये। राजेन्द्र! सत्यका पालन कीजिये ओर
एकादशीको भोजन न कीजिये। मैने अपने शरीरके
वधके लिये जो बात कही है, उसे सत्य कीजिये।
महाराज! आपने मोहिनीको दाहिना हाथ देकर जो
वचन दिया हि, उसका पालन न करनेसे असत्यका
दोप लगेगा। उस भयंकर असत्य-भाषणके पापसे
अपनेको वचाय ।
१ । { 1
^+ >^ ५, १
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उत्तरभाग ६३१
राजाको पुत्रवधके लिये उद्यत देख मोहिनीका मूर्च्छित होना ओर पलरी.
पुत्रसहित राजा रुक्माङ्गदका भगवान्के शरीरमें प्रवेश करना
वसिष्ठजी कहते हे-- पुत्रका यह वचन |
राजा रुक्माङ्गदने उस समय संध्यावलीके मुखकी
ओर देखा, जो कमलके समान प्रसन्नतासे खिल
उठा था। फिर मोहिनीको बात सुनी, जिसमें
एकादशीको भोजन करो, पुत्रको न मारो, यदि
भोजन न करना हो तो पुत्रका वध करो । यही वार-
वार आग्रह किया जा रहा था। नृपश्रेष्ठ! इसी समय
कमलनयन भगवान् विष्णु अदृश्यरूपसे आकाशमें
आकर ठहर गये। उनको अङ्ग-कान्ति मेषके समान
श्याम थी। वे स्वभावतः निर्मल-निर्दोष है।
भगवान् श्रीहरि गरुड्की पीठपर वैटकर वीर
धर्माङ्द, राजा स्क्माद्गद तथा देवी संध्यावली- तीनेकि
धेर्यका अवलोकन कर रहे थे। जब मोहिनीने पुनः
` एकादशीके दिन भोजन करो, भोजन करो' की
वात दुहरायी, तव राजाने हर्षयुक्त हदयसे भगवान्
गरुडध्वजको प्रणाम करके पुत्र धर्माङ्गदको मारनेके
लिये चमचमाती हई तलवार हाथमे ते ली।
पिताको खङ्गहस्त देख धर्माङ्गदने माता, पिता तथा
भगवान्को प्रणाम किया। तदनन्तर माताके उदार
मुखपर दृष्टि डालकर राजकुमारने अपनी गरदन
धरतीसे सरा ली। ध्माङ्गदने उसे ठीक तलवारकी
धारके सामने रखा। वे पितके भक्त तो थे ही,
माताके भी महान् भक्त थे।
राजन्! जव पुत्रने चन्द्रमाके समान मनोहर
मुखको प्रसन्न रखते हए अपनी गरदन समर्पित
कर दी ओर सम्पूर्णं जगत्के शासक महाराज
रुक्माद्गदने हाथमें तलवार उठा ली, उस समय
वृक्षों ओर पर्वतोंसहित सम्पूर्णं पृथ्वी कोपिने लगी ।
समुद्रमें ज्वार आ गया, मानो वह तीनों लोकोंको
तत्क्षण डुबो देनेके लिये उद्यत हो गया हो।
पृथ्वीपर सैकड़ों उल्काएं गिरने लगीं । आकाशं
विजली चमक उटी ओर गड़गडाहटकी आवाज
होने लगी । मोहिनीका रंग फीका पड गया। उसने
सोचा, "जगत्स्रष्टा विधाताने इस समय मुञ्चे व्यर्थ
ही जन्म दिया। मेरा यह विमोहक रूप विडम्बनामात्र
वनकर् रह गया; क्योकि इससे प्रभावित होकर
राजाने पापनाशिनी एकादशीके दिन अन्न नहीं
खाया। अव तो स्वर्गलोके मं तिनकेके समान
हो जाऊगी। राजामें सत्वगुण एवं धैर्य अधिक
होनेसे ये मोक्षमार्गको चले जाये, कंतु मेँ
पापिनी भयंकर नरके पडगी।' नुपश्रेष्! इसी
समय महाराज रुक्माद्दने तलवार ऊपर उटायी।
यह देख मोहिनी मोहसे मूर्च्छित होकर धरतीपर
गिर पड़ी । राजा धर्यं ओर हर्षसे युक्त हो पुत्रका
चन्द्रमाके समान प्रकाशमान कुण्डलमण्डित मनोहर
मुखयुक्त मस्तक काटना ही चाहते थे कि उसी
समय भगवान् श्रीहरिने अपने हाथमे उन्हें पकड
लिया ओर कहा-“ राजन्! मँ तुमपर बहुत प्रसन्न
(9) == ~~ ५। (1
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६२२
संक्षिप्त नारदपुराण
ह्, वहुत प्रसन्न हूँ, अब तुम मेरे वैकुण्टधामको
चलो। अकेले ही नहीं, अपनी प्रिया रानी संध्यावली
ओर पुत्र धममङ्गदको भी साथ ले लो। तीनों
लोकोके लिये पूजनीय, निर्मल तथा उज्ज्वल
कोतिको स्थापना करके यमराजके मस्तकपर पव
रखकर मेरे शरीरमें मिल जाओ।' एेसा कहकर
चक्रधारी भगवान्ने राजाको अपने हाथसे छू
दिया। भगवान्के स्पर्शमात्रसे उनका (मोहिनीमें
आसक्तिरूप) रजोगुण धुल गया । वे महात्मा नरेश
अपनी पत्री ओर पुत्रके साथ वेगपूर्वक समीप जा
भगवानके दिव्य शरीरम समा गये। उस समय
आकाशसे पुप्पमसम्ूहको वर्षां होने लगी । हर्पमें भरे
हए सिद्ध तथा देवताओंके लोकपाल दुन्दुभिरयों
वजाने लगे, जिनको आवाज सब ओर गंज उटी ।
सूर्यपुत्र यमराजने यह अद्भुत दृश्य अपनी ओंखसे
देखा। राजा उनकी लिपिको मिराकर अपनी स्त्री
ओर पुत्रके साथ भगवानूके शरीरम समा गये थे
ओर सर्वसाधारण लोग भी राजाके सिखाये हए
मार्गपर स्थित होकर एकादशीका त्रत एवं भगवान्का
कीर्तन आदि करते हुए वेकुण्ठके ही मार्गपर जाते
थे । यह सव देखकर भयभीत हए यमराज चतुर्मुख
ब्रह्याजीके समीप पुनः जाकर बोले-' सुरलोकनाथ।
अन भैं यमराजके पदपर नियुक्त नहीं होना चाहता,
क्योकि मेरी आज्ञा जगतूसे उठ गयी । तात! मेरे लिये
कोई दूसरा कार्य करनेको आज्ञा प्रदान की जाय।
दण्ड देनेका कार्यं अव मेरे जिम्मे न रहे।'
न)
१ 7
यमराजक्का ब्रह्याजीसे कषट-निवेदन,
वर देनेके लिये उद्यत देवताओंको
रुक्माङ्गदके पुरोहितकी फटकार तथा मोहिनीका
ब्राह्मणक शापसे भस्म होना
यमराज बोले-- देवेश्वर ! जगन्नाथ ! चराचरगुरो ।
प्रभो! राजा रुक्माद्गदकी चलायी हुई पद्धतिसे
सव लोग वैकुण्टमें ही जा रहे हैं । मेरे पास कोई
नहीं आता। पितामह! कुमारावस्थासे ही सव
मनुष्य एकादशीको उपवास करके पापशन्य हो
भगवान् विष्णुके परमधाममें चले जाते हें । आपकी
पुत्री मोहिनीदेवी लजजावश मूच्छित होकर पडी
हे, अतः आपके पास नहीं आती । सब लोग उसे
धिक्तारते है, इसलिये वह भोजनतक नहीं कर
रही हे । मेरा तो सारा व्यापार ही वंद हो गया हे।
आज्ञा कोजिये, मैं क्या करू?
सूर्यपुत्र यमको बात सुनकर कमलासन ब्रह्माजीने
कहा-' हम सब लोग साथ ही मोहिनीका होशमं
लानेके लिये चलें ।' तदनन्तर इन्द्र॒ आदि सव
देवता ब्रह्माजीके साथ दिव्य विमानोंपर वेठकर
पृथ्वीपर आये । उन्होने विमानोद्रारा मोहिनीको सव
ओरसे घेर लिया। वह मन्त्रहीन विधि, धर्म ओर
दयासे रहित युद्ध, भूपालरहित पृथ्वी ओर मन्त्रणारहित
राजाको भति शोचनीय अवस्थामें पड़ी थी।
ममत्वयुक्त जान ओर दम्भयुक्त धर्मकी जसी
अवस्था होती हे, वैसी ही उसकी भी थी।
देवताओंने उसे सर्वथा तेजोहीन देखा । प्रभो ! वह
उत्साहशून्य होकर किसी गम्भीर चिन्तनमें निमग्न
थी, सव लोग उसे देखते हुए निन्दायुक्त कटुवचन
सुना रहे थे। वह धर्मसे गिर गयी थी। पतिक
वचनको उलटकर अपनी वात मनवानेका दुराग्रह
रखनेवाली ओर अत्यन्त क्रोधी थी । उस अवस्थामं
उससे देवताओंँने कटा-' वामोरु! तुम शोक न
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उत्तरभाग ६३३
करो। तुमने पुरुषार्थं किया हे, किंतु जो भगवान्
विष्णुके भक्त है, उनके मानका कभी खण्डन नहीं
हो सकता। इसका एक कारण हे, वेशाखमासके
शुक्लपक्षमें जो परम पुण्यमयी मोहिनी नामवाली
एकादशी आती हे, वह सम्पूर्णं विघ्रोका विध्वंस
करनेवाली हे । राजा स्व्माद्धदने पहले उस एकादशीका
व्रत किया था। विशाललोचने। उन्होने एक
वर्पतक पादकृच्छव्रत करते हए उसका पजन
किया था। उसीका यह अनुपम अध्यवसाय
(सामर्थ्य) हे कि वे सत्यसे विचलित न हो सके।
लोकमें नारीको समस्त विश्रोंको रानी कहा जाता
हे। तुम्हारे विप्र डालनेपर भी राजा रुक्माङ्गदने
मन, वाणी ओर क्रियाद्वारा एकादशीको अन्न न
खानेका निश्चय करके पुत्रको मारनेका विचार कर
लिया ओर स्नेहको दूरसे ही त्यागकर तलवार
उठा ली । इस कसोरटीपर कसकर भगवान् मधुसूदनने
देख लिया कि “ये प्रिय पुत्रका वध कर डा्लेगे,
किंतु एकादशीको भोजन नहीं करेगे ।' पत्र, पतनी
तथा राजा तीनोंका विलक्षण भाव देखकर भगवान्
बहुत संतुष्ट हृए। तदनन्तर वे सव भगवानूमे मिल
गये । देवि ! सुभगे! यदि सव प्रकारसे प्रयतपूर्वक
कर्म करनेपर भी फलकी सिद्धि नदीं हो सकी तो
अव इसमें तुम्हारा क्या दोप है 2 इसलिये शुभ!
सव देवता तुम्दं वर देनेके लिये यहां आये हे।
सद्धावपूर्वक प्रयत्न करनेवाले पुरुपका कार्य यदि
नहीं सिद्ध होता तो भी उसको वेतनमात्र तो देही
देना चाहिये । नहीं ता उसे संतोप नहीं होगा ।'
देवताओकि एेसा कटनेपर सम्पूर्णं विश्चक्रो
मोटनेवाली मोहिनी आनन्दशुन्य, पतिहीन एवं
अत्यन्त दुःखित होकर बाली--' देवेश्वरो ! मर इस
जीवनको धिक्कार है, जो मैने यमलोकके मार्गको
मनुष्योसे भर नहीं दिया, एकादशीकर महत्वका
लोप नहीं किया ओर राजाकौ एकादणशीकरे दिन
भोजन नहीं करा दिया। वह वीर भूपाले स्क्याद्रद
प्रसन्नतापूर्तक भगवान् श्रीहरिमें मिल गये । जिन
कल्याणमय गुणका कोई माप नहीं दे, जो
स्वभावतः निर्मल तथा शुद्ध अन्तःकरणवाले मंतोकि
आश्रय ह। सर्वव्यापी, हंसस्वरूप, पवित्र पद,
परम व्योमरूप, ओद्ारमय, सवके कारण, अविनाशी,
निराकार, निराभास, प्रपञ्चसे परे तथा निरञ्जन
(निर्दापि) हे, जो आकाशस्वरूप तथा ध्येय ओर
ध्यानसे रहित हे, जिन्हें सत् ओर असत् कहा गया
ठे, जोनदृरदह, न निकट है, मन जिनको ग्रहण
नहीं कर सकता, जो परमधाम-स्वरूप, परम
पुरुष एवं जगन्मय हं, जो सनातन तजःस्वरूप है
उन्हीं भगवान् विष्णुम राजा स्वमाद्भद लीन हा
गये । देवताओं! जो भृत्य स्वामीके कायक सिद्धि
नहीं करते ओर वेतन भोगते रहते हे, वे इस
पृथ्वीपर खोड होते ह । आपकी यह मोहिनी तो
पति ओर पुत्रका नाश करनेवाली दे! इसके द्वारा
कार्यकी सिद्धि भी नहीं हुईं ह, फिर यह आप
स्वर्गवासियोसे वर कैसे ग्रहण कर ?'
देवताओने कहा- मोहिनी! तुम्दारे देदयर्मं
जो अभिलापा हो उसे को, हम अवश्य उसका
पूर्तिं करेगे।
महीपते! जव देवता लोग इस तरहकौ त्राते
कद रहे धे, सी समय राजा स्वमाद्गदके पुराहित
जो अग्निकरे समान तेजस्वी थे, वहां आये । वे मुनि
पटले जलमें बैठकर योगकी साधनामें तत्पर थ।
वारहवाँ वपं पूर्ण होनेपर पुनः जलमे निकले ध।
जलय निकलनेपर उन्दोने मोहिनीकी सारी करलं
मुनीं । इये क्राधं भरकर वे मुनिश्च दवसमुदायके
पास आये ओर मोहिनीक्ो वर देनेवाले सम्यूरण
देवताओंमे इस प्रकार वोले-“इस मोदिनीक
धिक्कार टै, देवममृको भी चिक्कार दहे ओर इम
पाप्मा धिक्च्छर है! श्राप लोम विदारकः पात्र
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६ेर्ट
इसलिये हें कि आप मोहिनीको मनोवाच्छित वर
दनवाले हे । इसपर हत्याका पाप सवार हे । इसमें
नारीजनोचित साधु वर्तव नहीं रह गया हे । यह
स्त्री नही, राक्षसी हे । देवताओं! यदि यह जलती
हई आगमे कृद पड़ तो भी इस लोकमें इसकी
शुद्धि नहीं हो सकती; क्योकि इसने इस पृथ्वीको
राजासे शून्य कर दिया। देवगण! इस खोरी
वुद्धिवाली पापिनीके लिये तो नरकोमें भी रहनेका
अधिकार नहीं हे। फिर स्वगमिं इसकी स्थिति
केसे हो सकती हे ? यह राजाके निकट नहीं जा
सकती हे । लोकापवादसे यह इतनी दूपित हो
चुकरो हे कि लोकमें कहीं भी इसका रहना सम्भव
नहीं हे । दवताओ ! जो सदा पापमें ही डवी रही
हे ओर अपने दुष्कमेकि कारण जिसकी सर्वत्र
निन्दा होती हे, उस पापिनीके जीवनको धिक्कार
हे । यह वेष्णवधर्मका लोप करनेवाली तथा भारी
पापराशिसे दवी हुई हे । देवेश्वरो ! यह तो स्पर्शं
करने योग्य भो नहीं हे, इसे आप लोग वर कैसे
दे रहे हे? जो लोग न्यायपरायण तथा धर्ममार्गपर
चलनेवाले हे, उन्हींको वर देनेके लिये आपको
सदा तत्पर रहना चाहिये । देवता लोग कभी
पापीको रक्षा नहीं करते; उन्हें धर्मका आधार
माना गया हे ओर धर्मका प्रतिपादन वेदमें किया
गया हे । वेदोने पतिकी सेवाको ही स्त्रियोका धर्म
बताया हे। पति जो कुछ भी कहे, उसे निःशङ्क
होकर करना चाहिये। इसीको सेवाकर्म जानना
चाहिये । केवल शारीरिक सेवाका ही नाम शुश्रूपा
नहीं हे। देवगण! इसने अपनी आज्ञा स्थापित
करनेको इच्छासे पतिकी आनज्ञाका उल्लद्घन किया
हे, इसलिये मोहिनी सम्पूर्णं स्त्रियोमें पापिनी है
इसमें तनिक भी संदेह नहीं है । इसको शपथोसे
वेधे हुए राजा रुक्माङ्गदने सत्यको रक्षाकरे लिये
संक्षि नारदपुराण
नाना प्रकारक अनुनय-विनयभरी वातं कीं
कितु इसने उनको ओरसे अनिच्छा प्रकट कर दी,
अतः राजा इसके ऊपर पाप डालकर स्वयं
मोक्षको प्राप्त हए है। इसलिये इसपर हजारों
हत्याका पाप सवार हे । इसका शरीर ही पापमय
हे। जो सव प्रकारके उत्तम दान देनेवाले, ब्राह्यणभक्त,
भगवान् विष्णुके आराधकः, प्रजाको प्रसन्न रखनेवाले
तथा एकादशी-व्रतके सेवी थे, परायी स्त्ियोके
प्रति जिनके मनमे आसक्ति नहीं थी, जो विषयोंकी
ओरसे विरक्त हो चले थे, परोपकारके लिये सारा
भोग त्याग चुके थे ओर सदा यज्ञानुष्ठानमे लगे
रहते थ, इस पृथ्वीपर जो सदा द्ष्टौका दमन
करनेमें तत्पर रहते थे ओर सात प्रकारके भयंकर
व्यसनोने कभी जिनपर आक्रमण नहीं किया,
उन्हीं महाराज सुक्माद्गदको इस जगत्से हटाकर
दुराचारिणी मोहिनी वर पानेके योग्य कैसे हो
सकती हे ? सुरश्रष्ठगण! जो इस मोहिनीके पक्षमें
होगा, वह देवता हो या दानव, में उसको भी
क्षणभरमे भस्म कर दूंगा। जो मोहिनीकी रक्षाका
प्रयल करेगा, उसको वही पाप लगेगा, जो
मोहिनीमें स्थित हे।'
राजन्! एेसा कहकर उन द्विजेन्द्रने हाथमे तीव्र
जल लिया ओर ब्रह्मपुत्र मोहिनीकी ओर क्रोधपूर्वक
देखकर उसके मस्तकपर वह जल डाल दिया।
उस जलसे अग्रिके समान लपटर उठ रही थी।
महीपते ! उस जलके छोड़ते ही मोहिनीका शरीर
स्वर्गवासियोके देखते-देखते तत्काल प्रज्वलित हो
उठा, मानो तिनकोंकी राशिमें आगकी लपटें उठ
रही हों । ' प्रभो! अपना कोप रोकिये, रोकिये।'
यह देवताओंकी वाणी जवतक आकाशमें गूंजी,
तवतक तो ब्राह्मणके वचनसे प्रकट हुई अग्निने
उस रमणीको जलाकर राख कर दिया,
१ 7 7
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¶ षा
उत्तरभाग ६३५
मोहिनीकी दुर्दशा, ब्रह्माजीका राजपुरोहितके समीप जाकर उनको
प्रसन्न करना, मोहिनीको याचना
हुए ओर अपने दूतोसे बोले-'इसे मेरे लोकसे
निकाल बाहर करो। जो ब्रह्मशापसे दग्ध हआ है
वह स्त्रीहो, पुरुषहो या चोर ही क्योंनहो, उस
पापीका स्पर्शं हमारी नरक-यातनाएं भी नहीं करना
चाहती हें । अतः इस पापिनीको, जो पतिके वचनका
लोप करनेवाली, पुत्रघातिनी, धर्मनाशिनी तथा
ब्रह्मदण्डसे मारी गयी है, यहंसे जल्दी निकालो ।'
भूपते! धर्मराजके एेसा कहनेपर वे दृत अस्त्र-
शस्त्रोका प्रहार करते हए मोहिनीको यमलोकसे
वाहर कर आये । राजन्! तव मोहयुक्त मोहिनी
अत्यन्त दुःखित होकर पाताललोकमें गयी, कितु
पातालवासियोने भी उसे रोक दिया । तव मोहिनीने
अत्यन्त ललज्ित हो अपने पिताके समीप जाकर
सारा दुःख निवेदन किया-'तात। चराचर
प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकोमे मेरे रहनेके लिये
कोई स्थान नहीं है । जहां -जहां जाती हं वहा-
वहाँ सब लोग मेरी निन्दा ओर तिरस्कार करते टै ।
नाना प्रकारके आयुधोसे मुञ्चे खृव मारकर लोगौने
अपने स्थानसे बाहर निकाल दिया दै। पिताजी!
मै तो आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके ही स्क्माङ्भदके
समीप गयी थी ओर वहाँ एेसी-एेसी चेष्टां की,
जो सम्पूर्णं लोकोपें निन्दित है। पतिको कषमं
पुत्रको तीखी तलवारसे कटवा देना चाहा
ओर संध्यावलीको भी क्षोभमें डाल दिया, इसीसे
मेरी यह दशा हुई है । देव ! मुञ्च पापिनीके लिव
अव कहीं कोई सहारा नहीं है । विशेषतः ब्राह्मणक
शापसे मुञ्चे अधिक दुःख भोगना पट् रहा है।
पिताजी ! जो ब्राह्यणके शापसे मरे है, आगमे जले
हं, चाण्डालके दाथों मारे गये हं, व्याघ्र-यिंह
आदि वन-जन्तुओद्रारा भक्षण क्रिये गये ट तथा
वसिष्ठजी कहते है- राजन्! मोहिनी मोहमय
शरीर त्यागकर देवताओंके लोकमें गयी । वहां
देवदूत ( वायुदेव ) -ने उसे डटा-' पापिनी! तेरा
स्वभाव पापमय है। तेरी बुद्धि अत्यन्त खोटी हे।
त् सदा एकादशी-तव्रतके लोपमें संलग्र रही है
अतः स्वर्गमें तेरा रहना असम्भव हे ।' इस प्रकार
कठोर वचन कहकर वायुदेवने उसे डंडसे पीटा
ओर यातनामय नरकमें भेज दिया । राजन्! देवदूत
( वायुदेव )-से इस प्रकार ताडित होनेपर मोहिनी
नरकमें गयी । वहां धर्मराजकौ आनज्ञासे दूतोने उसे
खूब पीटा ओर दीर्घकालतक क्रमशः सभी नरकोमें
उसे गिराया; साथ ही उससे यह वात भी
कही-' ओ पापिनी । तूने पतिके हाथों अपने पुत्र
ध्मङ्गदकी हत्या करनेको कहा, अतः अपने
किये हए उस पापकर्मका फल यहं अच्छी तरह
भोग ले ।' नृपश्रेष्ठ । यमदूतोके इस प्रकार धिक्तारनेपर
यमक आज्ञाके अनुसार वह क्रमशः सव नरकोक
यातनाएं भोगती रही । मोहिनी ब्राह्मणके शापसे
मरी थी, अतः उसके शरीरके स्पर्शसे उन नरक-
यातनाओंकी अभिमानिनी चेतनशक्तियोका सारा
अङ्ग जलने लगा। वे अधिष्ठात्री देविरयां उसको
धारण करनेमें असमर्थं हो गयीं । राजन्! तव वे
सभी नरक (नरकके अभिमानी देवता) धर्मराजके
समीप आये ओर हाथ जोड़कर भयभीत हो
वोले-'देवदेव ! जगन्नाथ! धर्मराज! हमपर दया
कीजिये ओर इस मोहिनीको हमारी यातनाओंसे
शीघ्र अलग कीजिये, जिससे हमें सुख मिले ।
नाथ! इसके शरीरके स्पर्शसे हम लोग क्षणभरमं
भस्म हो जायंगे; अतः इसे यहोमे निकाल बाहर
कीजिये ।' उनकी वात सुनकर धर्मराज वड़े विस्मित
((-0. 1\/॥८111104/5511॥1 8118811 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
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विजली गिरनेसे नष्ट हए है, उन सबको मोक्ष
देनेवाली केवल गङ्खा नदी है। यदि आप जाकर
मुञ्चे शाप देनेवाले उस ब्राह्मणको प्रसन्न कर लं
तो मेरी सद्रति हो सकती हे ।'
राजन्! तब लोकपितामह ब्रह्माजी शिव, इन्दर,
धर्म, सूर्य तथा अग्रि आदि देवेश्वरो ओर मुनियोंको
साथ ले उपर्युक्त बाते कहनेवाली मोहिनीको आगे
करके ब्राह्मणके समीप गये । वहां जाकर देवता
आदिसे धिरे हए स्वयं ब्रह्माजीने बडे गोरवसे
उन्हें नमस्कार किया। यद्यपि ब्रह्माजी रुद्र॒ आदि
देवताओके लिये भी पूजनीय ओर माननीय हैं
तथापि मोहिनीके स्नेहके कारण उन्होने स्वयं ही
नमस्कार किया। राजन्! जब तीनों लोकोमें
असाध्य एवं महान् कार्य प्राप्त हो जाय, तब
बडेके द्वारा छोटेका अभिवादन दूषित नहीं माना
जाता। वे ब्राह्मण देवता वेद-वेदाङ्गोके पारदर्शी
विद्वान् ओर तपस्वी थे। लोककर्ता ब्रह्माजीको
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देवताओंके साथ आया देख ब्राह्मणने उठकर
मुनियोंखहित उन सबको प्रणाम किया ओर
संक्षिप्त नारदपुराण
आसनपर विठाकर भक्तिपूर्वक ब्रह्माजीका स्तवन
किया, तव प्रसन्न होकर लोककर्ता जगद्गुरु भगवान्
ब्रह्याने मोहिनीके लिये उन राजपुरोहित ब्राह्मणसे
इस प्रकार प्रार्थना की-" तात! आप ब्राह्मण हें
सदाचारी हैँ ओर परलोकमें उपकार करनेवाले है ।
कृपासिन्धो ! कृपा कीजिये ओर मोहिनीको उत्तम
गति प्रदान कोजिये। ब्रह्यन् ! मोहिनी मेरी पुत्री हे ।
मानद! यमलीकको सूना देखकर रुक्माङ्गदको
मोहनेके लिये (प्रकारान्तरसे उस भक्तका गौरव
वदढानेके लिये) मेने ही उसे भेजा था । धर्मक गति
अत्यन्त सूक्ष्म है। वह सम्पूर्णं लोकका कल्याण
करनेवाली है। यह मोहिनी एक कसौटी थी,
जिसपर सुवर्णरूपी राजा रुक्माङ्गदकी परीक्षा करके
उन्हें स्त्री-पुत्रसहित भगवानूके धामको भेज दिया
गया है । राजाने अविचल भक्तिसे एकादशी-त्रतका
पालन करने ओर करानेके कारण यमराजकी लिपिको
मिराकर यमपुरीको सूना कर दिया धा। ब्रह्मन्!
सांख्यवेत्ताको जिसकी प्राति असम्भव है,
अष्टाद्गयोगके साधनसे भी जो मिलनेवाला नहीं
है, उस भक्तिगम्य पदकी प्राप्ति राजा, राजकुमार
ओर देवी संध्यावलीको हुई है । मोहिनीने जो
उस पुण्यशील भूपशिरोमणिके प्रतिकूल आचरण
किया है, उस पापके वेगसे उसकी बड़ी दुर्दशा हुई
हे। आपके शापसे दग्ध होकर यह राखकी ठेरमात्र
रह गयी ह । इसके द्वारा जो अपकार हआ है, उसे
क्षमा कर दीजिये। दया कीजिये, शान्त होडये।
आपके शाप देनेसे यह अधोगतिमें डाली गयी है।
इसपर प्रसन्न होदये ओर इसे उत्तम गति दीजिये।'
ब्रह्माजीके द्वारा एेसा कहे जानेपर उन
विप्रशिरोमणिने वुद्धिसे विचार करके क्रोध त्याग
दिया ओर मोहिनीके पिता देवेश्वर श्रब्रह्माजीसे
इस प्रकार कहा-' देव ! आपकी पुत्री मोहिनी
वहत पापसे भरी हुईं है, अतः प्राणियोसे परिपूर्ण
((-0. 1/८111141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग
लोकोमे उसकी स्थिति नहीं हो सकती । सुरेश्वर ।
जिस प्रकार आपका ओर मेरा भी वचन सत्य हो,
देवताओंका कार्य सिद्ध हो ओर मोहिनीकी
आवश्यकता भी पूर्ण हो जाय, वही करना
चाहिये । अतः जो भूतसमुदायसे कभी आक्रान्त न
हुआ हो, उसी स्थानपर मोहिनी रहे ।'
नृपश्रेष्ठ । तब ब्रह्माजीने सम्पूर्णं देवताओंसे
सलाह लेकर मोहिनी देवीसे कहा-' तुम्हारे
लिये कहीं स्थान नहीं है ।' यह सुनकर मोहिनी
सम्पूर्णं देवताओंको प्रणाम करके बोली-
६३७
` सुरश्रष्टगणण ! आप सव देवता सम्पूर्णं लोकके
साक्षी है । पुरोहितजीके साथ आप लोगोँको सौ-
सौ वार प्रणाम करके मैं हाथ जोडती हं । आपं
प्रसन्न हदयस मेरी याचना पूर्णं करे। मुञ्चे वह
स्थान दे, जो सवके लिये प्रीतिकारक हो।
दूसरोंको मान देनेवाले महात्माओ! किसी दोषसे
दूषित एकादशीका दिन जिस प्रकार मेरा हो
जाय, एेसा कोजिये- यही मेरी याचना है । इसे
आप अवश्य पूर्णं कर दें। यह माँग मैने
स्वार्थसिद्धिके लिये की है।'
की स 1
१ 7 क
मोहिनीको दशमीके अन्तभागमें स्थानक प्राप्ति तथा उसे पुनः शरीरकी प्रापि
देवता बोले- मोहिनी । निशीथकालमें जिसका
दशमीसे वेध हो, वह एकादशी देवताओंका
उपकार करनेवाली होती है ओर सूर्योदयमें
दशमीसे वेध होनेपर वह असुरोके लिये लाभदायक
होती हे । यह व्यवस्था स्वयं भगवान् विष्णुने की
हे । त्रयोदशीमें पारण हो तो वह उपवास व्रतका
नाश करनेवाला होता हे। वेष्णव-शास्त्रमं जो
आट महाद्रादशियां * बतायी गयी है, वे एकादशीसे
भिन्न हें। वेपष्णवलोग उनमें उपवास करते ह।
वैष्णव महात्माओंका एकादशी त्रत भिन्न है । दोनों
पक्षों वह नित्य बताया गया है। विधिपूर्वक
क्रिय जानेपर वह तीन दिने पूरा होता हे।
एकादशीके पहले दिन सावंकालका भोजन छोड
दे ओर दूसरे दिन प्रातःकालका भोजनं त्याग दे।
यदि एकादशी दो दिन हो या प्रथम दिन विद्ध
होनेके कारण त्याज्य हो तो दूसरे दिन उपवास
करना चाहिये । द्रादशीमें निर्जल उपवास करना
उचित हे। जो सर्वथा उपवास करने असमर्थ
हों, उनके लिये जल, शाक, फल, दूध अथवा
भगवान्के नेवेद्यको ग्रहण करनेका विधान है;
कितु वह अपने स्वाभाविक आहारकी मात्राके
चौथाई भागक बराबर होना चाहिये। साध्वी।
स्मार्तं (स्मृतियोके अनुसार चलनेवाले गृहस्थ)
लोग सुर्योदयकालमें दशमीविद्धा एकादशीका त्याग
१. आठ महाद्रादशियोके नाम इस प्रकार है-उन्मीलनी, वञ्जुली, त्रिस्पुशा. पक्षवर्धिनी, जया, विजया, जयन्ती
ओर पापनाशिनी। इनमेपे प्रारम्भकी चार द्रादशियां तिधियोगसे विशेष संज्ञा धारण करती है ओर अन्तकी चार
द्रादियोके नामक्ररणमें भिन्न-धिन्न नक्षत्रोका योग कारण है । दशमी -वेधरहित एकादशी जवर एक दिनमे बटुकर्
दूसरे दिन भी कुट समयतक दिखायी दे ओर द्रादशी न वद तो वह “उन्मीलनी ' महाद्रादशी कषहलाती दै । जव
एकादशी एक दही दिन हो ओर द्वादशी बहकर दूसरे दिनतक चली गयी हो तौ वह ' वञ्जुली ' कटलाती है । इसमें
द्रादशीमें उपवास ओर द्वादशमे ही पारण होता है । जब अरुणोदयकालमे एकादशी, दिनभर द्वादशी आर् दूसरे दिन
प्रातःकाल त्रयोदशी हो ' त्रिस्यृशा" नामक महाद्रादशी होती टै! जिस पक्षमं अमावास्या या पूर्णिमा एक दिन माट
दण्ड रहकर दूसरे दविनमें भी कुट समयतक्र चली गयी हो, उस पक्षको द्रादशीक्रो ˆ पक्षवर्धिनी ' कते दै । द्वादशके
साथ पुनर्वस-नक्षत्रका योगो तो वहे "जया", श्रवण-नक्षत्रका योगदा तो "विजया" पुथ्यका योगद ततौ
' पापनाशिनी " तथा रोहिणीका योग हो तो "जयन्ती" कहलाती टै।
((-0. 1/८1114<511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
६३८
संक्षिप्त नारदपुराण
करते हं, परंतु निष्काम एवं विरक्त वैष्णवजन
आधी रातके समय भी दशमीसे विद्ध होनेपर उस
एकादशीको त्याग देते हे । सम्पूर्णं लोकों यह
वात विदित है कि दशमी यमराजकी तिधि हे।
अनघे! उस दशमीके अन्तिम भागमें तुम्हें निवास
करना चाहिये । तुम दशमी तिथिके अन्तिम भागमें
स्थित होकर सूर्य ओर चन्द्रमाकौ किरणोके साथ
संचरण करोगी। अव तुम अपने पापका नाश
करनेके लिये पृथ्वीपर सब तीर्थमिं भ्रमण करो ।
अरुणोदयसे लेकर सूर्योदयतकका जो समय है,
उसके भीतर तुम त्रतमें स्थित होकर एकादशीका
फल प्रप्त करो। जो कोई मनुप्य तुमसे विद्ध
एकादशीका व्रत कररता हे, वह उस त्रतद्रारा तुम्हें
लाभ पहुचानेवाला होगा । यां अरुणोदयका समय
दो मुहूर्ततक जानना चाहिये। रात ओर दिनके
पृथक् - पृथक् पंद्रह मुहूर्तं माने गये हें । दिन ओर
रात्रिक छाटाई-बड्ाईके अनुसार त्रेराशिककी विधिसे
रात या दिनके मुहूर्तोको समञ्ना चाहिये । रात्रिके
तेरहवे मुदूर्तके व्राद तुम दशमीके अन्त भागम
स्थित होकर उस दिन उपवास करनेवाले लोगोके
पुण्यको प्राप्त कर लोगी। शुचिस्मिते! यह वर
पाकर तुम निश्चिन्त हो जाओ। मोहिनी! जो त्रत
करनेवाले लोग तुमसे विद्ध हुई एकादशीका त्रत
यहां प्रयतपूर्वक करते ह, उनके उस तब्रतसे जो
पुण्य होता ठे, उसका फल तुम भोगो!
व्रह्मा आदि दैवताओंद्रारा इस प्रकार आदेश
प्राप्त होनेपर मोहिनी वहत प्रसन्न हुई । अपने पाप
दूर करनेके लिये तीर्थ-सेवनकी आज्ञा मिल
जानेपर उसने जीवनको कृतार्थं माना। राजन्
एेसा सोचकर हर्षम भरी हुई मोहिनी देवताओं
तथा पुरोहितको प्रणाम करके सूर्योदयसे पूर्ववर्ती
दशमोकरे अन्त भागमें स्थित हौ गगरी । मोहिनीको
अपनी तिथिक्र अन्तमं स्थित देख सूर्यपुत्र यमका
मुख प्रसन्नतासे खिल उठा । वे बोले-- चारुलोचने।
तुमने इस लोकमें फिर मेरी अच्छी प्रतिष्ठा कर
दी। राजा रुक्माङ्गदके मतवाले हाथीपर रखकर
जो नगाड़ा वजाया जाता था, वह तो तुमने वंद
करा ही दिया । यह दशमी तिथि यदि सूर्योदयकालका
स्पशं करे तो सदा निन्दित मानी गयी हे। यदि
दशमीसे उदयकालका स्पर्शं न हो तो भी
अरुणोदयकालमें रहनेपर वह मनुष्योको मोहमें
डालनेवाली होगी । उस दशमीको त्याग करके त्रत
करनेपर मनुप्यको प्रिय वस्तुओंका संयोग एवं
भोग प्राप्त होता हे।' एेसा कहकर सूर्यपुत्र यम
प्रसन्नतापूर्वक ब्रह्यकुमारी मोहिनीको प्रणाम करके
देवताओंके साथ अपने चित्रगुप्तका हाथ पकड़
हुए स्वर्गलोकको चले गये। देवताओंके चले
जानेपर मोहिनी ब्रह्ाजीसे बोली-" पिताजी ! मेरे
इन पुरोहितने क्रोधपूर्वक मेरे शरीरको जला दिया
ठे। मैं पुनः उसे प्राप्त कर लूंएेसा प्रयत
कोजिये ।'
मोहिनीका यह वचन सुनकर लोकस्रष्टा ब्रह्माजी
पुत्रीक हितके लिये ब्राह्मणदेवताको पुनः शान्त
करते हए बोले-“तात। वसो! मेरी बात सुनो।
महाभाग । मं तुम्हारे, इस मोहिनीके तथा सम्पूर्ण
लोकोके हितके लिये हितकारक वचन कहता हू ।
मानद! तुमने क्रोधवश मोहिनीको भस्मावशेष कर
दिया हे। अव यह पुनः अपने लिये शरीरकौ
याचना करती हे, अतः आज्ञा दो। तात! मेरी पुत्री
ओर तुम्हारी यजमान होकर यह दुर्गतिमें पड़ी है।
तुम्हारा ओर मेरा कर्तव्य है कि इसका पालन
करे । मानद ! यदि तुम शुद्ध भावसे मुञ्चे आज्ञा दो
तो मं इसके लिये पुनः नृतन शरीर उत्पन्न कर
दगा, किंतु यह एकादशीसे तैर रखनेवाली होनेके
कारण पापाचारिणी हे । विप्रवर ! जिस प्रकार यह
पापम शीघ्र शुद्ध हो सके, वही उपाय कोजिये।'
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
उत्तरभाग
६३९
ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर राजपुरोहितने अपनी
यजमानपल्लीके शरीरकी प्रा्िके लिये प्रसन्नतापूर्वक
आज्ञा दे दी । ब्राह्मणका अनुमोदक वचन सुनकर
लोकपितामह ब्रह्माने मोहिनीके शरीरकी राखको
कमण्डलुके जलसे सीच दिया। लोककर्ता ब्रह्माके
सीचते ही मोहिनी पूर्ववत् शरीरसे सम्पन्न हो गयी ।
उसने अपने पिता ब्रह्माजीको प्रणाम करके विनयसे
नतमस्तक हो पुरोहित वसुके दोनों पैर पकड़ लिये।
वसु बोले-देवि! मेर ब्रह्माजीके कहनेये
क्रोध त्याग दिया। अव तीर्थ-स्नानादि पुण्य-
कर्मसे तुम्हारी सद्रति कराऊऊगा।
मोहिनीसे एेसा कहकर ब्राह्मणे उसके पिता
जगत्पति ब्रह्माजीको नमस्कार करके प्रसन्तापूर्वक
विदा किया। तब ब्रह्माजी अपने लोकको चले
गये, जो परम ज्योतिर्मय हे । रुक्माद्गदके पुरोहित
विप्रवर वसु मोहिनीको कृपाके योग्य मानकर
मन-ही-मन उसकी सद्रतिक्छना उपाय सोचने लमे।
दो घड़ीतक ध्यानमें स्थित च्छोकर उन्होने उसकी
सटतिका उपाय जान लिया ॥
इससे राजपुरोहित वसु प्रसन्न हो गये। उन्होने पति
ओर पुत्रसे रहित संकटमें पड़ी हई विधवा यजमानपत्नी
मोहिनीसे इस प्रकार कहा ।
=१-अ
१ 7 0 |
मोहिनी-वसु-संवाद- गङ्काजीके माहात्म्यका वर्णन
वचन सुनकर गद्धाजीके पास्ननाशक माहात्प्यकाः
इस प्रकार वर्णन किया।
पुरोहित वसु बोले- देवि ! वे देश, वे जनपद,
वे पर्वत ओर वे आश्रम भ्ो धन्य ह, जिनके
समीप सदा पुण्यसलिला भगव्ती भागीरथी बहती
रहती है। जीव गद्धाजीका सेवनं करके भिम
गतिको पाता है, उसे तपस्या, ब्रह्मचर्य, यस्न
अथवा त्यागके द्वारा भी नहीं पा सकता। जो
मनुष्य पहली अवस्थामे पापकर्म करक अत्तिम
अवस्थामे गद्गाजीका जीका सेवन क्रते रे, वे भी परम
गतिको प्राप्त होते हें । इस संसारम दुःखसं व्याकुल
जो जीव उत्तम गतिकी खोजम्ें लगे हं, उन सव्रक
लिये गद्काके समान दूसरी कोई गति नहीं दे।
गद्धाजी बडु-वदु भयंकर पातत्करके कारण अपवित्र
नरकमे गिरनेवाले नराधम पापियांको जवरन तार
देती ट। गद्धा देवी अधो, जड्डा तथा द्रव्यहीनको
पवित्र वनाती है। पाटिनी! (विशेषरूपे)
वसिष्ठजी कहते हें - नृपश्रेष्ठ ! सम्पूर्णं लोकोके
हितमें तत्पर रहनेवाले पुरोहित वसु यजमानपती
मोहिनीसे मधुर वाणीमें वोले।
पुरोहित वसुने कहा- मोहिनी । सुनो, में तुम्हे
तीथकि पृथक्-पृथक् लक्षण बतलाता हू । जिसके
जान लेनेमात्रसे पापियोंकी उत्तम गति होती हे।
पृथ्वीपर सब तीर्थपिं श्रेष्ठ गङ्गा हं । गद्भाके समान
पापनाशक तीर्थं दूसरा कोई नहीं हे।
अपने पुरोहित वसुका यह वचन सुनकर
मोहिनीके मनमें गद्धा-स्नानके प्रति आदर वदु
गया। वह पुरोहितजीको प्रणाम करके बोली ।
मोहिनीने कहा-- भगवन्! सम्पूर्ण पुराणोकों
सम्मतिके अनुसार इस समय गङ्खाजीका उत्तम
माहात्म्य बताइये । पहले गद्गाजीके अनुपम तथा
पापनाशक माहात्म्यको सुनकर फिर आपक साथ
पापनाशिनी गङ्गाजीमें स्नान करनेके लिये चलुंगी ।
वसु सव पुराणोके जाता थे। उन्होनं मोहिनीका
१. ते देशास्ते जनपदास्ते शैलास्तैऽपि चाश्रमाः) चां भागीरथी युप्या समीप वत्तन मदा॥
{ ना० उदर्न० ३८1 ८)
((-0. 1/८1111(4<511॥ 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 6810011
६४०9
संक्षिप्त नारदपुराण
पक्षोके आदि अर्थात् कृष्णपक्षमें पष्ठीसे लेकर
पुण्यमयी अमावास्यातक दस दिन गङ्गाजी इस
पृथ्वीपर निवास करती हें । शुक्लपक्षकौ प्रतिपदासे
लेकर दस दिनतक वे स्वयं ही पातालमें निवास
करती हं । फिर शुक्लपक्षकी एकादशीसे कृष्ण-
पक्षको पञ्चमीतक् जो दस दिन होते है, उनमें
गङ्गाजी सदा स्वर्गमें रहती हे । [इसलिये इन्हें
त्रिपथगा ' कहते हें ] सत्ययुगमें सब तीर्थं उत्तम
हे। त्रेतामें पुष्कर तीर्थं सर्वोत्तम ठै, द्वापरमें
कुरुक्षेत्रको विशेष महिमा हे ओर कलियुगमें गङ्गा
ही सवसे बट्करर हे। कलियुगमें सब तीर्थ
स्वभावतः अपनी-अपनी शक्तिको गङ्गाजीमें छोड़ते
हे, परंतु गङ्गादेवी अपनी शक्तिको कहीं नहीं
छोडतीं । गङ्गाजीके जलकणोसे परिपुष्ट हुई वायुके
स्पर्शसे भी पापाचारी मनुष्य भी परम गतिको प्राप्त
होते हें। जो सर्वत्र व्यापक हैं, जिनका स्वरूप
चिन्मय हे, वे जनार्दन भगवान् विष्णु ही द्रवरूपसे
गङ्गाजीके जल हैँ, इसमें संशय नहीं हे । महापातकी
भी गङ्गाजीके जलमें स्नान करनेसे पवित्र हो जाते
हे, इस विषयमे अन्यथा विचार नहीं करना
चाहिये। गङ्गाजीका जल अपने क्षेत्रमे हो या
निकालकर लाया गया हो, ठंडा हो या गरम हो,
वह सेवन करनेपर आमरण किये हुए पापोंको हर
लेता हे। वासी जल ओर वासी दल त्याग देने
योग्य माना गया हे, परंतु गद्गाजल ओर तुलसीदल
वासी होनेपर भी त्याज्य नहीं हे । मेरुके सुवर्णकी,
सब प्रकारके रलोकौ, वहके प्रस्तर ओर जलके
एक-एक कणको गणना हो सकती है, परंतु
गङ्खाजलके गुणोका परिमाण बतानेकी शक्ति किसीमें
भी नहीं हे‹। जो मनुष्य तीर्थयात्राकौ पूरी विधि
न कर सके वह भी केवल गङ्गाजलके माहात्म्यसे
यहां उत्तम फलका भागी होता है। ग्गाजीके
जलसे एक वार भक्तिपूर्वक कुल्ला कर लेनेपर
मनुष्य स्वगमें जाता ओर वहां कामधेनुके थनोसे
प्रकट हुए दिव्य रसोका आस्वादन करता है। जो
शालग्राम शिलापर गद्गाजल डालता है, वह
पापरूपी तीव्र अन्धकारको मिटाकर उदयकालीन
सूर्यको भति पुण्यसे प्रकाशित होता है। जो पुरुष
मन, वाणी ओर शरीरद्वारा किये हए अनेक
प्रकारके पापोंसे ग्रस्त हो, वह भी गद्धाजीका
दर्शन करके पवित्र हो जाता है; इसमें संशय नही
ठे । जो सदा गङ्गाजीके जलसे सीचकर पवित्र कौ
हुई भिक्षा भोजन करता हे, वह केचुलका त्याग
करनेवाले सर्पको भति पापसे शून्य हो जाता हे ।
हिमालय ओर विन्ध्यके समान पापराशियां भी
गद्खाजीके जलसे उसी प्रकार नष्ट हो जाती ह
जिस प्रकार भगवान् विष्णुकी भक्तिसे सब प्रकारक
आपत्तियां। गङ्काजीमें भक्तिपूर्वक सनानके लिय
प्रवेश करनेपर मनुष्योके ब्रह्यहत्या आदि पाप
` हाय-हाय' करके भाग जाते हैं। जो प्रतिदिन
१. कृते तु सर्वतीर्थानि त्रेतायां पुष्करं परम् । द्वापरे तु कुरुक्षेत्रं कलौ गद्गा विशिष्यते॥
कलौ तु सर्वतीर्थानि स्वं॒ स्वं वीर्य स्वभावतः। गङ्गायां प्रतिमुञ्चन्ति सातु देवी न कुत्रचित्॥
गङ्काम्भःकणदिग्धस्य वायोः
संस्पर्शनादपि । पापशीला
अपि नराः परां गतिमवापुवुः॥
योऽसौ सर्वगतो विष्णुश्चित्स्वरूपी जनार्दनः । स॒ एव द्रवरूपेण गङ्काम्भो नात्र संशयः॥
ब्रह्महा गुरुहा गोघ्नः स्तेयी च गुरुतल्पगः । गद्धाम्भसा च पूयन्ते नात्र कार्यां विचारणा॥
केत्रस्थमुद्धुतं वापि शीतमुष्णमथापि वा। गाङ्कयं तु हरेत्तोयं
पापमामरणान्तिकम् ॥
वर्ज्य पर्युषितं तोयं वर्ज्यं पर्युषितं दलम् । न वर्ज्यं जाहवीतोयं न वर्ज्यं तुलसीदलम् ॥
मेरोः सुवर्णस्य च सर्वरतैः
संख्योपलानामुदकस्य वापि।
गद्भाजलानां न तु शक्तिरस्ति वक्तुं गुणाख्यापरिमाणमत्र॥
(ना० उत्तर० ३८ । २०- २७)
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
उत्तरभाग
६४१
- ~~~ ~ ~
गङ्गाजीके तटपर रहता ओर सदा गद्भाजीका
पीता हे, वह पुरुष पूर्वसंचित पातकोंसे मुक्त हो
जाता हे। जो गङ्गाजीका आश्रय लेकर नित्य
निर्भय रहता है, वही देवताओं, ऋषियों ओर
मनुष्योके लिये पूजनीय हे ° । प्रभासतीर्थं सूर्यग्रहणके
समय सहस्र गोदान करनेसे मनुष्य जो फल पाता
हे, वह गद्खाजीके तटपर एक दिन रहनेसे ही
मिल जाता हे। जो अन्य सारे उपायोंको छोडकर
मोक्षकौ कामना लिये दृढनिश्चयके साथ गङ्गाजीके
तटपर सुखपूर्वक रहता है, वह अवश्य ही
मोक्षका भागी होता है, विशेषतः काशीपुरीमें
गङ्गाजी तत्काल मोक्ष देनेवाली हें । यदि जीवनभर
प्रतिमासको चतुर्दशी ओर अष्टमी तिथिको सदा
गङ्खाजीके तटपर निवास किया जाय तो वह उत्तम
सिद्धि देनेवाला है। मनुष्य सदा कृच्छर ओर
चान्द्रायण करके सुखपूर्वक जिस फलका अनुभव
करता है, वही उसे गङ्गाजीके तटपर निवास
करनेमात्रसे मिल जाता हे। ब्रह्मपुत्र । इस लोकमें
गद्गाजीकी सेवामें तत्पर रहनेवाले मनुप्यको आधे
दिनके सेवनसे जो फल प्राप्त होता है, वह, सैकड़ों
यज्ञोद्वारा भी नहीं मिल सकता । सम्पूर्ण यज्ञ, तप,
दान, योग तथा स्वाध्याय-कर्मसे जिस फलकं
९.मनोवाक्रायजेर्ग्रस्तः
गद्धातोयाभिपिक्तां तु भिक्षामश्राति यः
हिमवद्विध्यसदृशा
प्रवेशमात्रे
पापैर्बहविधैरपि ।
सदा।
राशयः पापकर्मणाम् ।
गद्धायां स्नानार्थं भक्तितो नृणाम्।
प्राप्ति होती हे, वही भक्तिभावसे गद्काजीके तरपर
निवास करनेमात्रसे मिल जाता है। सत्य-भाषण,
नैष्टिक ब्रह्मचर्यका पालन तथा अग्रिहोत्रके सेवनसे
मनुष्योको जो पुण्य प्राप्त होता है, वह गङ्कातटपर
निवास करनेसे ही मिल जाता है। गद्भाजीके
भक्तको संतोप, उत्तम एेश्र्य, तत्वज्ञान, सुखस्वरूपता
तथा विनय एवं सदाचार-सम्पत्ति प्राप्त होती है।
मनुष्य केवल गङ्गाजीको ही पाकर् कृतकृत्य हो
जाता हैः। जो भक्तिभावसे गद्गाजीके जलका
स्पर्शं करता ओर गङ्गाजल पीता है, वह मनुष्य
अनायास ही मोक्षका उपाय प्राप्त कर लेता है३।
जिनके सम्पूर्णं कृत्य सदद्म गङ्गाजलसे ही सम्पन्न
होते हे, पे मनुष्य शरीर त्यागकर भगवान् शिवके
समीप आनन्दका अनुभव करते हैः । जैसे इन्दर
आदि देवता अपने मुखसे चद्धमाकी किरणें
स्थित अमृतका पान करते हं, उसी प्रकार मनुष्य
गद्धाजीका जल पीते हैं। विधिपूर्वकं कन्यादान
ओर भक्तिपूर्वक भूमिदान, अन्नदान, गोदान, स्वर्णदान,
रथदान, अश्चदान ओर गजदान आदि करनेसे जो
पुण्य बताया गया हे, उससे सौ गुना अधिक पुण्य
चुद्ृभर गद्गाजल पीनेसं होता टै। सहस्री
चाद्द्रायणव्रतका जो फल कहा गया टह, उससे
वीक्ष्य गद्भां भवेत् पतः पुरुषो नात्र संशयः॥
सर्पवत्कश्चुकं मुक्त्वा पापहीनो भवेत् स व॥
गद्भाम्भमा विनश्यत्ति विष्णुभक्त्या यथधापदः॥
व्रह्महत्यादिपापानि हाहैत्युक्त्वा प्रया्त्यलम् ॥
यः पुमान् स विमुच्येत पातकैः पूर्वसंचितैः॥
गङ्गातीरे वसेन्नित्यं गद्गातोयं पिवेत् सदा।
यो वै गङ्खां समाश्रित्य नित्यं तिष्ठति निर्भयः} स॒ एव देवैर्मर्त्यैध पृजनीयो महर्षिभिः॥
(ना० उत्त० ३८। ३२-२७)
२.संतोषः परमैश्वर्यं ततत्व्नानं सुखरत्मता॥ विनयाचारसम्पतिर्गद्काभक्तस्य जायते।
(ना० उन० ३८ 1 ४५-५०)
३.भक्त्या तजलसंस्पशीं तलं पिवते च वः ॥ अनायासन हि नरो मोक्षोपायं स चिन्द्रति।
४.सर्वाणि येषां गद्धीवास्तोयैः कृत्यानि सर्वंद्रा ।
(ना० उत्तर २८ । ५१६-५२)
देहं त्यक्त्वा नगस्ते तु मोदन्ते रिवरमंनिधी\+
( ना० उनर० ३८ । ३)
(-0. 1\/॥(111104/5511॥1 11881 \/818/185। (01661010. 14111260 0 66810011
६४२ संक्षिप्त नारदपुराण
अधिक फल गङ्काजल पीनेसे मिलता है।
चुह्लभर गङ्गाजल पीनेसे अश्वमेध यक्ञका
फल मिलता है। जो इच्छानुसार गङ्गाजीका
पानी पीता है, उसको मुक्ति हाथमे ही हेै।
सरस्वती नदीका जल तीन महीनेमे, यमुनाजीका
जल सात महीनेमें, नर्मदाजीका जल दस
महीनेमें तथा गङ्खाजीका जल एक वर्षमे
पचता ठहै। अर्थात् शरीरमे उसका प्रभाव
विद्यमान रहता है । जो देहधारी मनुष्य कहीं
अज्ञात स्थानमें मर गये ओर उनके लिये
शास्त्रीय विधिसे तर्पण नहीं किया गया, एसे
लोगोको गङ्गाजीके जलसे उनकौ हड़्योंका
संयोग होनेपर परलोकमें उत्तम फलकी प्रापि
होती हे‹। जो शरीरकी शुद्धि करनेवाले
चाद्रायणत्रतका एक सहस्र बार अनुष्ठान
कर चुका है ओर जो केवल इच्छानुसार
गङ्गा-जल पीता हे, वही पहलेवालेसे बढ़कर
हे। जो गद्गाजीका दर्शन ओर स्तुति करता है,
जो भक्तिपूर्वकं गङ्गाम नहाता ओर गङ्गाका
ही जल पीता हे, वह स्वर्ग, निर्मल ज्ञान, योग
तथा मोक्ष सब कुछ पा लेता हैर।
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गङ्गाजीके दर्शन, स्मरण तथा उनके जलमें स्नान करनेका महत्त्व
पुरोहित वसु कहते है- मोहिनी ! सुनो, अव मेँ | अनुपम एश्वर्य, प्रतिष्ठ, आयु, यश तथा शुभ आश्रमोकी
गङ्गाजीके दर्शनका फल बतलाता हं, जिसका | प्राति गङ्गाजीके दर्शनका फल है । गद्धाजीके दर्शनमात्रसे
वर्णन तत्वदशीं मुनियोने पुराणम किया है । ज्ञान, । सम्पूर्ण इन्दरियोकी चञ्चलता, दुर्व्यसन, पातक तथा
१. कन्यादानैश्च विधिवद्धूमिदानैश्च भक्तितः । अन्नदानैश्च गोदानैः स्वर्णदानादिभिस्तथा॥
रथाश्वगजदानैश्च यत्पुण्यं परिकीर्तितम् । ततः शतगुणः पुण्यं गद्ाम्भश्वुलुकाशनात्॥
चादद्धायणसहस्राणां यत्फलं परिकीर्तितम् । ततोऽधिकफलं गङ्खातोयपानादवाप्यते ॥
गण्डूषमात्रपाने तु अश्वमेधफलं लभेत । स्वच्छन्दं यः पिबेदम्भस्तस्य मुक्तिः करे स्थिता ॥
त्रिभिः सारस्वतं तोयं सप्तभिस्त्वथ यामुनम् । नार्मदं दशभिमरसिगद्गं वर्पेण जीर्यति॥
शस्त्रेणाकृततोयानां मृतानां क्रापि देहिनाम् । तदुत्तरफलावापिर्गङ्गायामस्थियोगतः ॥
(ना० उत्तर० ३८ । ५५- ६०)
२. गङ्गां पश्यति यः स्तेति सरति भक्त्या पिवेजलम्। स स्वर्गं ज्ञानममलं योगं मोक्षं च विन्दति॥
(ना० उत्त० ३८। ६२)
((-0. 1/८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
उत्तरभाग
६३
निर्दयता आदि दोष नष्ट हो जाते है । दूसरोकी हिंसा,
कुटिलता, परदोष आदिका दर्शन तथा मनुप्योके दम्भ
आदि दोष गङ्गाजीके दर्शनमात्रसे दूर हो जाते हैँ।
मनुष्य यदि अविनाशी सनातन पदक प्राति करना
चाहता है तो वह भक्तिपूर्वक बार-बार गङ्गाजीकी
ओर देखे ओर बार-वार उनके जलका स्पर्श करे ।
अन्यत्र बावडी, कुओं ओर तालाब आदि बनवाने,
पोसले चलाने तथा अन्नसत्र आदिक व्यवस्था करनेसे
जो पुण्य होता हे, वह गङ्गाजीके दर्शनमात्रसे मिल
जाता हे। परमात्माके दर्शनसे मानवको जो फल प्राप्त
होता हे, वह भक्तिभावसे गद्खाजीका दर्शनमात्र करनेसे
सुलभ हो जाता है। नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, नर्मदा तथा
पुष्करतीर्थमें स्नान, स्पर्श ओर सेवन करके मनुष्य जिस
फलको पाता हे, वह कलियुगं गद्भाजीके दर्शनमात्रसे
प्राप्त हो जाता हे-एेसा महर्षिर्योका कथन हे।
राजपत्नी! जो अशुभ कर्मासि युक्त हो संसारसमुद्रमे
डूब रहे हों ओर नरकमें गिरनेवाले हो, उनके द्वारा
यदि गङ्गाजीका स्मरण कर लिया जाय तो वह दूरसे
ही उनका उद्धार कर देती है। चलते, खड होते,
सोते, ध्यान करते, जागते, खाते ओर हंसते-रोते
समय तो निरन्तर गङ्गाजीका स्मरण करता है, वह
बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जो सहस्रां योजन दूरसे
भी भक्तिपूर्वक गङ्गाका स्मरण करते हे तथा “ गद्गा-
गद्खा' की रट लगाते है, वे भी पातकसे मुक्त हो
जाते हं । विचित्र भवन, विचित्र आभूषणोसे विभूषित
स्त्रियाँ, आरोग्य ओर धन-सम्पत्ति-ये गद्काजीके
स्मरणजनित पुण्यके फल दहं । मनुष्य गङ्गाजीके
नामकीर्तनसे पापमुक्त होता है ओर दर्शनसे कल्याणका
भागी होता है। गद्धामें स्नान ओर जलपान करके
वह अपनी सात पीदटि्योको पवित्र कर दता है । जौ
अश्रद्धासे भी पुण्यवाहिनी गङ्गाका नामकौतन करता
है, वह भी स्वर्गलोकका भागी होता है।
देवि! अव मं गद्धाजीके जलमं सानक्रा फल
बतलाता हू। जो गद्गाजीके जलमें स्नान करता टै
उसका सारा पाप तत्काल नष्ट हो जाता है ओर मोहिनी ।
उसे उसी क्षण अपूर्व पुण्यकी प्राप्ति होती हे । गद्धाजीके
पवित्र जलसे स्नान करके शुद्धचित्त हुए पुरुपोको जिस
फलको प्राति होती हे, वह सैकड़ं येकि अनुष्टनसे भी
सुलभ नहीं हे । जेसे सूर्य उदयकालमें घने अन्धकारका
नाश करके प्रकाशित होते है, उसी प्रकार गद्भाजलसे
अभिपिक्त हुआ पुरुष पापराशिका नाश करके प्रकाशमान
होता हे। गद्धामें स्नान करनेमात्रसे मनुष्यके अनेक
जन्मोका पाप नष्ट हो जाता है ओर वह तत्काल पुण्यका
भागी होता हे । सम्पूर्ण तीथमिं स्नान करनेये ओर समस्त
इष्टदेव-म्दिरोमे पृजा करनेसे जो पुण्य होता है, वही
केवल गद्भास्नानसे मनुष्य प्राप्त कर लेता टै। कोई
महापाताकोसे युक्त हो या सम्पूर्ण पातके, तिधिपूर्वक
गद्धास्नान कसेसे वह सभी पातकोसे मुक्त हो जाता है ।
गद्धास्रानसे वदृकर दूसरा कोई स्नान न हुआ टह, न
होगा। विशेषतः कलियुगमें गङ्गादेवी सव पाप हर
लेती है । जो मानव नित्य-निरन्तर गद्भामें स्नान
करता है, वह यहीं जीवन्मुक्त हो जाता है ओर् मरनेपर
भगवान् विष्णुके धाममें जाता दै। गङ्गामें मध्याहृकालमं
स्नान करनेसे प्रातःकालकी अपेक्षा दस गुना पुण्य
होता है, सायंकालमे सौ गुना तथा भगवान् शिवके
समीप अनन्तगुना पुण्य होता है। करोड़ों कपिला
गोओंका दान करनेसे भी गद्भास्नान बदृकर् ६।
ग्खामें जहाँ कहीं भी स्नान किया जाय, वह कुरुकषत्रके
समान पुण्य देनेवाली है; किंतु ह्र, प्रयाग तथा
गङ्गासागर-संगममे अधिक फल देनेवाली होती है ।
भगवान् सूर्य गङ्गाजीसे कहते है करि हे जाहवि ! जे
लोग मेरी किरणोसे तपे हुए तुम्हारे जलमें स्नान करते
है, वे मेरा मण्डल भेदकर् मोक्षको प्राप्त होते ई।'
वरुणने भी गङ्कासे कटा है कि "जो मनुष्य अपने
घरमे रहकर भी स्नानकालपें तुम्हारे नामका कीर्तन
करेगा, वह भी वैकृण्टलोकमे चला जायगा ।'
^+ ९ 2 १.८५
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 21188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 66810011
गोणि भव
दर्टट
संक्षिप्त नारदपुराण
कालविशेष ओर स्थलविशेषमें गङ्खा-स्नानकी महिमा
पुरोहित वसु कहते है- वामोरु! अव म काल
विशेषमे किये जानेवाले गद्गा-स्रानका फल
बतलाऊगा। जो मनुष्य माघ मासमे निरन्तर गङ्गा
स्नान करता हे, वह दीर्घकालतक अपने समस्त
कुलके साथ इन्द्रलोके निवास करता है । तदनन्तर
दस लाख करोड कल्पोंतक ब्रह्मलोकमें जाकर
रहता हे । सम्पूर्णं संक्रान्तियोमें जो मनुष्य गद्गाजीके
जलमें स्नान करता है, वह सूर्यके समान तेजस्वी
विमानद्वारा वैकुण्टधामको जाता है । विपुव योगमें
उत्तरायण या दक्षिणायन आरम्भ होनेके दिन तथा
संक्रान्तिके समय विशेषरूपसे उसका फल वताया
गया हे। माघके ही समान का्तिकमे भी ग्खा-
स्नानका महान् फल माना गया हे । मोहिनी ! जव
सूर्य मेप राशिमें प्रवेश करते हँ, उस समय तथा
कार्तिक-पूर्णिमाको गद्गा-स्नान करनेसे ब्रह्मा आदिं
देवताओने माघस्नानकी अपेक्षा अधिक पुण्य बताया
टे । कातिक अथवा वैशाखमे अक्षयतृतीया तिथिको
गद्वा-सलान करनेसे एक वर्पतक स्नान करनेका
पुण्यफल प्राप्त होता है। मन्वादि ओर युगादि
तिथियोमें गङ्का-स्नानका जो फल वताया गया हे
तीन मासके निरन्तर स्नानसे भी वही फल प्राप्त
होता हे। द्वादशीको श्रवण, अष्टमीको पुष्य ओर
चतुर्दशीको आद्रा नक्षत्रका योग होनेपर गद्धा-
स्नान अत्यन्त दुर्लभ हे। वैशाख, कार्तिक ओर
माघको पूर्णिमा ओर अमावास्या बडी पवित्र मानी
गयी ठहे। इनमं गद्गा-स्रानका सुयोग अत्यन्त
दुर्लभ हे। कृष्णाष्टमी ( भाद्रपद कृष्णा अष्टमी ) -
को गङ्खा-स्नान करनेसे (साधारण तिथिके स्नानकी
अपेक्षा) सहस्रगुना फल होता है । सभी प्वपिं
सौगुना पुण्य प्राप्त होता है। माघ कृष्णा अष्टमी
तथा अमावास्याकरो भी गङ्गा-स्रानसे सोगुना पुण्य
हाता ह । उक्तं दानीं तिधियोको सूर्यके आधा उदय
होनेपर " अर्धोदय' योग होता है ओर आधासे कुछ
कम उदय होनेपर 'महोदय' कहा गया है।
महोदयमें गङ्गा-सनान करनेसे सोगुना ओर अर्धोदयमें
लाखगुना पुण्य बताया गया है। देवि ? फाल्गुन
ओर आपाढ मासमे तथा सूर्यग्रहण ओर चन्द्रग्रहणके
समय किया हुआ गद्धा-स्नान तीन मासके स्नानका
फल देनेवाला है । अपने जन्मके नक्षत्रम भक्तिभावसे
गङ्गा-स्नान करनेपर आजन्म संचित पापोंका नाश
हो जाता हे। माघ कृष्णा चतुर्दशीको व्यतीपातयोग
तथा कृष्णाष्टमी (भाद्रपद कृष्णा अष्टमी )-को
विशेषतः वैधृतियोग गङ्गा-स्रानके लिये दुर्लभ हे।
जो मनुष्य परे माघभर विधिपूर्वक अरुणोदयकालमें
गद्गा-स्नान करता हे, वह जातिस्मर (पूर्वजन्मकी
वातोंको स्मरण रखनेवाला) होता हे। इतना ही
नही, वह सम्पूर्ण शास्त्रोका अर्थवेत्ता, ज्ञानी तथा
नीरोग भी अवश्य होता है। संक्रान्तिमे, दोनों
पक्षोको आन्तिमि तिथिको तथा चन्दरग्रहण ओर
सूर्यग्रहणमे इच्छानुसार गङ्गा-सरान करनेवाला मानव
ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। चन्दरग्रहणका स्नान
लाखगुना बताया गया है ओर सूर्यग्रहणका स्नान
उससे भी दस गुना अधिक माना गया हे । वारुण-
नक्षत्र (शतभिषा) -से युक्त चैत्र कृष्णा त्रयोदशी
यदि गङ्गा-तरपर सुलभ हो जाय तो वह सौ
सूयग्रहणके समान पुण्य देनेवाली है । ज्येष्ठ मासके
शुक्लपक्षमे दशमी तिथिको मङ्गलवार तथा हस्त
नक्षत्रके योगमें भगवती भागीरथी हिमालयसे इस
मत्यलोकमें उतरी थीं । इस तिथिको वह आद्यगङ्गा-
स्नान करनेपर दसगुने पाप हर लेती ह ओर
अश्वमेधयज्ञका सौगुना पुण्य प्रदान करती हैं । "हे
जाहयवी ! मेरे जो महापातक-समुदायरूप पाप है
उन सव्रको तुम गोविन्द -द्वादशीके दिन स्नान करनेसे
नष कर दो!" यदि माघको पूर्णिमाको मधा नक्षत्र
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उत्तरभाग
६२४५
या बृहस्पतिका योग हो तो उक्त तिथिका महत्त्व
बहुत बद् जाता हे । यदि यह योग गङ्गाजीमें सुलभ
हो तव तो सौ सूर्यग्रहणके समान पुण्य होता है।
अव देशविशेषके योगसे गङ्का-स्रानका फल
बतलाया जाता हे । गङ्गाजीमें जहां - कहीं भी सान
किया जाय, वह कुरुक्षेत्रसे दसगुना पुण्य देनेवाली
टे; किंतु जहो वे विन्ध्याचल पर्वतसे संयुक्त होती
हे, वहां कुरुक्षेत्रकी अपेक्षा सौगुना पुण्य होता है।
काशीपुरीमें गद्गाजीका माहात्म्य विन्ध्याचलको
अपेक्षा सौगुना बताया गया है। यों तो गद्गाजी
सर्वत्र ही दुर्लभ हें, कितु गङ्गाद्वार, प्रयाग ओर
गङ्खासागर-संगम-इन तीन स्थानोमे उनका माहात्म्य
बहुत अधिक है। गङ्गाद्वारे कुशावर्ततीर्थके भीतर
स्नान करनेसे सात राजसूय ओर दो अश्चमेध-
यज्ञोका फल मिलता है। उस तीर्थमे पंद्रह दिन
निवास करनेसे छः विश्वजित् यज्चोका फल प्राप्त
होता हे। साथ ही विद्वानोने वहां रहनेसे एक
लाख गोदानका पुण्य बताया है। कुशावर्तमें
भगवान् गोविन्दका ओर कनखलमे भगवान् रुद्रका
दर्शन-पूजन करनेसे अथवा इन स्थानोमें गद्धा-
स्नान करनेसे अक्षय पुण्यको प्राति होती हे । जहां
पूर्वकालमें वाराहरूपधारी भगवान् विष्णु प्रकट
हए थे, वहां सान करके मनुष्य सौ अग्रिहोत्रका,
दो ज्योतिष्टोम यञ्चका ओर एक हजार अग्निष्टोम
यसोका पुण्य-फल पाता हे । वहीं ब्रह्मतीर्थे स्नान
करनेवाला पुरुष दस हजार ज्योतिष्टोम यज्ञोका
ओर तीन अश्चमेध-यज्चोका पुण्य प्राप्त करता हे।
मोहिनी! कुन्ज नामस प्रसिद्ध जो पापनाशक
तीर्थ ठै, वहाँ स्नान करनेसे सम्पूर्णं रोग ओर सव
जन्मोके पातक नष्ट हो जाते हे । हरिद्रारक्षत्रमं ही
एक दूसरा तीर्थं है, जो कापिलतीर्थके नामसे
प्रसिद्ध है। शुभे! उसमें स्नान करनेवाला मानव
अस्सी हजार कपिला गीओकरि दानक समान
पुण्य-फल पाता है । गद्भाद्वार, कुशावर्त, विल्वक,
नीलपर्वत तथा कनखल- तीर्थमें स्नान करके मनुष्य
पापरहित हो स्वर्गलोकमें जाता है। तदनन्तर
पवित्र नामक तीर्थं हे, जो सव ती्थमिं परम उत्तम
ठे । वहां स्नान करनेसे मनुष्य दो विश्चजित् यज्ञोका
पुण्य पाता हे। तदनन्तर वेणीराज्य नामक तीर्थ है
जहां महापुण्यमयी सरयू उत्तम पुण्यस्वरूपा गङ्कासे
इस प्रकार मिली ह, जैसे एक बहिन अपनी दूसरी
वहिनसे मिलती है। भगवान् विष्णुके दाहिने
चरणारविन्दके पखारनेसे देवनदी गङ्गा प्रकट हुई
ह ओर वायं चरणसे मानस-नन्दिनी सरयुका
प्रादुर्भाव हआ है । उस तीर्थम भगवान् शिव ओर
विष्णुको पजा करनेवाला पुरुष विष्णुस्वरूप हो
जाता है। वरहाका स्नान पाच अश्वमेध-यज्ञोका फल
देनेवाला बताया गया हे । तत्पश्चात् गाण्डवतीर्थं है
जहां गङ्कासे गण्डकी नदी मिली हे । वर्हाका स्नान
ओर एक हजार गौओंका दान दोनों बरावर दै।
तदनन्तर रामतीर्थं ठे, जिसके समीप पुण्यमय
वैकुण्ठ है। तत्पश्चात् परम पवित्र सोमतीर्थं दै
जहाँ नकुल मुनि भगवान् शिवकी पूजा करके
उनका ध्यान करते हुए गणस्वरूप हो गये । उसके
वाद चम्पक नामक पुण्य तीर्थं टै, जहां गद्गाकी
धारा उत्तर दिशाकी ओर बहती टै। उस
मणिककर्णिकाके समान महापातकोका नाश करनवाला
ताया गया है । तदनन्तर कलश-तीर्थं टै, जहां
कलशसे मुनिवर अगस्त्य प्रकट हुए थे। वहीं
भगवान् रुद्रकी आराधना करके वे श्रेष्ठ मुनीश्वर ह
गये । इसके बाद परम पुण्यमय सोमद्रीप-तीर्थं ह,
जिसका महत्व काशीपुरीके समान है। वहां
भगवान् शङ्करकी आराधना करनेवाले चन्द्रमाको
भगवान् सद्रने सिरपर धारण किया धा। यदी
विश्चामित्रकी भगिनी गद्ामें मिली दै । उसमे गोता
लगानेवाला मनुप्य इन्द्रका प्रिय अतिथि होता दै।
मोहिनी ! जद्रकुण्ड नामक महातीथमं स्नान करनेवाला
मनुष्य निय ही अपनी इक्कीस पीदियाका उद्धारक
((-0. 1/८111141/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
६४६
होता हे। सुभगे! तदनन्तर अदिति-तीर्थं है, जहां
अदितिने कश्यपसे भगवान् विष्णुको वामनरूपमें
प्राप्त किया था। वहां किये जानेवाले सनानका
फल महान् अभ्युदय बताया गया हे । तत्पश्चात्
शिलोच्चय नामक महातीर्थं हे, जहां तपस्या करके
समस्त प्रजा तृण आदिके साथ स्वर्गको चली
जाती हे; क्योकि वह स्थान अनेक तीर्थोका
आश्रय हे। तदनन्तर इन्द्राणी नामक तीर्थ है, जहां
इनद्राणीने तपस्या करके इन्द्रको पतिरूपमें प्राप्त
किया था। यह स्थान प्रयागके तुल्य सेवन करने
(न
[= / ~
संक्षिप्त नारदपुराण
योग्य है। उसके वाद पुण्यदायक स्नातक तीर्थ
हे, जहां क्षत्रिय विश्चामित्रने तपस्या करके तीर्थ-
सेवनके प्रभावसे ब्रह्यार्षिपदको प्राप्त किया था।
तत्पश्चात् प्रद्युप्र-तीर्थं हे, जो तपस्याके लिये
प्रसिद्ध है । वहां कामदेव तपस्या करके भगवान्
श्रीकृष्णके प्रद्युम्न नामक पुत्र हुए। उस तीर्थमें
स्नान करनेसे महान् अभ्युदयको प्राति होती है।
तदनन्तर दक्षप्रयाग हे, जहां गङ्गासे यमुना मिली
हें । वहां स्नान करनेसे प्रयागकी ही भाँति अक्षय
पुण्य होता हे।
ग्न
५
गङ्खाजीके तटपर किये जानेवाले स्नान, तर्पण, पूजन तथा विविध प्रकारके
दानोंकी महिमा
पुरोहित वसु कहते ह- राजपत्नी मोहिनी ।
अव गङ्गाजीमे सान-तर्पण आदि कर्मोका फल
बतलाया जाता हे। देवि! यदि गङ्गाजीके तटपर
संध्योपासना की जाय तो द्विजोंको पवित्र करनेवाली
गायत्रीदेवी किसी साधारण स्थानकी अपेक्षा वहाँ
लाख गुना पुण्य प्रकट करनेमें समर्थं हाती हे।
मोहिनी ! यदि पुत्रगण श्रद्धापूर्वक गद्वाजीमें पितरोंको
जलाञ्जलि दे तो वरे उन्हें अक्षय तथा दुर्लभ तृपि
प्रदान करते हं। गङ्धाजीमें तर्पण करते समय
मनुष्य जितने तिल हाथमे लेता है, उतने सहस्र
तर्पोतक पितृगण स्वर्गवासी होते है । सब लोगोकि
जो कोई भी पितर पितृलोकमें विद्यमान है, वे
गङ्गाजीके शुभ जलसे तर्पण करनेपर परम तृपिको
प्राप्त होते हें। शुभानने! जो जन्मकी सफलता
अथवा संतति चाहता हे, वह गद्भाजीके समीप
जाकर देवताओं तथा पितरोका तर्पण करे। जो
मनुष्य मृत्युको प्रास होकर दुर्गतिमे पड़ टह, वे
अपने वंशजोदरारा कुश, तिल ओर गङ्गाजलसे तृप
किये जानेपर वैकुण्टधाममे चले जाते है । जो कोई
पुण्यात्मा पितर स्वर्गलोके निवास करते ठै,
उनके लिये यदि गङ्काजलसे तर्पण किया जाय तो
वे मोक्ष प्राप्त कर लेते हें, एेसा ब्रह्माजीका कथन
दे। जो मनुष्य गङ्गाजीमें स्नान करके प्रतिदिनं
शिवलिङ्गकी पूजा करता है, वह निश्चय ही एक
ही जन्ममें मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अग्निहोत्र, वेद
तथा बहुत दक्षिणावाले यज्ञ भी गङ्गाजीपर शिवलिङ्ग-
पूजाकरे करोड्वें अंशके बराबर भी नहीं हैँ । जो
पितरों अथवा देवताओंके उद्देश्यसे गद्भाजलद्वारा
अभिपेक करता है, उसके नरकनिवासी पितर भी
तत्काल तृप्त हो जाते हे । मिद्रीके घडकी अपेक्षा
तोबके घड़ेसे किया हुआ स्नान दसगुना उत्तम
माना गया हे । इसी प्रकार अर्ध्य, नैवेद्य, बलि ओर
पूजा आदिमं भी क्रमशः समञ्जे चाहिये । उत्तरोत्तर
पात्रमें विशेषता होनेके कारण फलमें भी विशेषता
होती हे। जो धन होते हए भी मोहवश विस्तृत
विधिका पालन नहीं करता, वह उस कर्मके
फलका भागी नहीं होता।
देवताओंका दर्शन पुण्यमय होता है। दर्शनसे
स्पर्श उत्तम है । स्पर्शसे पूजन श्रेष्ठ है ओर पूजनमें
भी धरृतके द्वारा कराया हुआ देवताका स्नान परम
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181/185। (01661011. 01411260 0 6810011
उत्तरभाग
उत्तम माना गया हे। गङ्गाजलसे जो सान
जाता हे, उसे विद्वान् पुरुष घृतस्नानके ही तुल्य
कहते हें । जो तोविके पात्रे मगधदेशीय मापके
अनुसार एक प्रस्थ गङ्गाजल रखकर उसमें
दूसरे-दूसरे विशेष द्रव्य मिलाकर उस मिश्रित
जलके द्वारा अपने पितरोंसहित देवताओंको एक
बार भी अर्घ्य देता हे, वह पुत्र-पौत्रोके साथ
स्वर्गलोकको जाता हे। जल, क्षीर, कुशग्र, घृत,
दधि, मधु, लाल कनेरके फूल तथा लाल
चन्दन--इन आठ अङ्खोँसे युक्त अर्ध्यं सूर्यके लिये
देनेयोग्य कहा गया हे । जो श्रेष्ठ मानव गङ्गाजीके
तटपर भगवान् विष्णु, शिव, सूर्य, दुर्गा तथा
ब्रह्माजीकी स्थापना करता है ओर अपनी शक्तिके
अनुसार उनके लिये मन्दिर बनवाता हे, उसे अन्य
तीर्थोमिं यह सब करनेकी अपेक्षा गद्धाजीके तटपर
कोटि-कोरिगुना पुण्य प्राप्त होता है। जो प्रतिदिन
गङ्खाजीके तरको मिद्रीसे यथाशक्ति उत्तम लक्षणयुक्त
शिवलिङ्ग बनाकर उनकी प्रतिष्ठा करके मन्त्र तथा
पत्र-पुष्प आदिसे यथासाध्य पूजा करता ओर
अन्तमे विसर्जन करके उन्हें गङ्खामे ही डाल देता
हे, उसे अनन्त पुण्यक प्राति होती हे । जो नरश्रेष्ठ
सर्वानन्ददायिनी गङ्गाजीमें सान करके भक्तिपूर्वकं
` ॐ नमो नारायणाय ' इस अष्टाक्षर-मन्त्रका जप
करता हे, मुक्ति उसके हाथमे ही आ जाती हे। जो
नियमपूर्वक छः मासतक ॒गद्भाजीमं "ॐ नमो
नारायणाय" इस मन्त्रका जप करता है, उसके
पास सव सिद्धियां उपस्थित हो जाती ह। जो
गङ्खाजीके समीप प्रणवसहित * नमः शिवाय ' मन्त्रका
विधिपूर्वक चौबीस लाख जप करता ह, वह
साक्षात् शङ्कर (-के समान) हे । “नमः शिवाय '-- यह
पञ्चाक्षरी मन्त्र सिद्ध-विद्या है । उसको जपनेवाला
साक्षात् शिव (-के समान) ही टै, इसमे संशय
नहीं टै । अपवित्रः पवित्रो वा'-इस मन््रका
ए नगीम
६४७
जप करनेवाला पुरुष पातकरहित हौ जाता है।
गद्गाजीके पूजित होनेपर सव देवताओंकी पूजा हो
जाती है। अतः सर्वथा प्रयल्न करके देवनदी गद्खाकी
पूजा करनी चाहिये । गद्गाजीके चार भुजां ओर
तीन नेत्र हे । वे सम्पूर्ण अद्धोसे सुशोभित होती है।
उनके एक हाथमे रन्मय कलश, दूसरेमें श्रेत
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ओर चौथेमें अभय हे। वै
शुभ-स्वरूपा ह । उनके श्री अद्भोपर श्रेत वस्त्र
सुशोभित होता दै। मोती ओर मणिर्योके हार
उनके आभूषण हैं । उनका मुख परम सुन्दर है ।
वे सदा प्रसन्न रहती दहं । उनका हदय-कमल
करुणारसये सदा आर्द्रं बना रहता है। उन्होने
वसुधापर सुधाधारा बहा रखी है । तीनों लोक सदा
उनके चरणोपें नमस्कार करते हं। इस प्रकार
जलमयी गद्भाका ध्यान करके उनकी पूजा करनेवाला
पुरुष पुण्यका भागी होता है । जौ इस प्रकार पंद्रह
दिन भी निरन्तर पजा करता टै, वही देवताओक
समान हो जाता है ओर दीर्घकालतक्र पूजा करनेे
फलमे भी अधिक्रता होती दे। पूर्वकालं राजा
| यः = चकः ऋ क [ति कि 7)
१. अपवित्रः पवित्रो वा स्वविस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरत्पुण्डरीक्छाक्षं स वाद्याध्यन्तरः शुचिः ॥
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 81188 \/81/8/185। (01661010. 01411260 0 60810011
६४८
संक्षिप्त नारदपुराण
जहने वैशाख शुक्ला सप्तमीको क्रोधपूर्वक गङ्गाजीको
पी लिया था ओर फिर अपने कानके दाहिने छिद्रसे
उन्हें निकाल दिया। शुभानने! उस स्थानपर आकाशकी
मेखलारूप गद्धाजीका पूजन करना चाहिये । वैशाख
मासको अक्षयतृतीयाको तथा कार्तिकमें भी रातको
जागरण करते हए जो ओर तिलसे भक्तिभावपूर्वक
विष्णु, गद्धा ओर शिवको पूजा करनी चाहिये । उक्त
सामग्रियोके सिवा उत्तम गन्ध, पुष्प, कुंकुम, अगरु,
चन्दन, तुलसीदल, बिल्वपत्र, बिजोरा नीवू आदि,
धूप, दीप ओर नैवेद्यसे वेभव-विस्तारके अनुसार
पूजा करनी उचित हे । गङद्गाजीके तटपर किया हुआ
यज्ञ, दान, तप, जप, श्राद्ध ओर देवपूजा आदि सव
कर्म कोटि-कोरिगुना फल देनेवाला होता है । जो
अक्षयतृतीयाको गङ्भाजीके तटपर विधिपूर्वक घृतमयी
धेनुका दान करता हे, वह पुरुप सहस्रां सूर्यकि
समान तेजस्वी ओर सम्पूर्ण भोगोसे सम्पन्न हो हंस-
भूषित सुवर्ण-रलमय विचित्र विमानपर वेटकर
अपने पितरोके साथ कोरिसहस्र एवं कोटिशत
कल्पोतक ब्रह्मलोकमें पूजित होता है । इसी प्रकार
जो (कभी) गद्भातटपर शास्त्रीय विधिसे गोदान
करता हे, वह उस गायके शरीरमें जितने रों होते
है, उतने वर्पोतक स्वर्गलोके सम्मानित होता हे।
यदि गङ्गातटपर वेदवेत्ता ब्राह्मणोको विधिपूर्वक
कपिला गोका दान दिया जाय तो वह गौ नरकमें
पड़ हए सम्पूर्णं पितरोको तत्काल स्वर्ग पर्हुचा देती
हे। जो गद्धातटपर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दुर्गा तथा
सूर्यभगवान्को प्रीतिके लिये ब्राह्यणोको ग्रामदान
करता हे, उसे सम्पूर्ण दानोंका जो पुण्य हे, समस्त
यन्ञोका जो फल है तथा सब प्रकारके तप, त्रत ओर
पुण्यकर्मोका जो फल बताया गया हे, वह सहस्रगुना
होकर मिलता हे । उस दानक प्रभावसे दाता पुरुष
करोड़ों सूर्योकि समान तेजस्वी विमानपर वेठकर
अपनी रुचिके अनुसार श्रीविष्णुधाममें अथवा
श्रीशिवधाममें प्रसन्नतापूर्वक क्रौडा-विहार करता
है। देवता उसकी स्तुति करते रहते हं।
देवि! जो अक्षयतृतीयाके दिन गङ्गातटपर श्रेष्ठ
ब्राह्मणको सोलह माशा सुवर्णं दान करता हे,
वह भी दिव्यलोकोमें पूजित होता हे । अन्नदान
करनेसे विष्णुलोककी ओर तिलदानसे शिवलोकको
प्रापि होती है । रतदानसे ब्रह्मलोक, गोदान ओर
सुवर्णदानसे इनद्रलोक तथा सुवर्णसहित वस्त्रदानसे
गन्धर्वलोककी प्राति होती हे। विद्यादानसे मुक्तिदायक
जान पाकर मनुष्य निरञ्जन ब्रह्मको प्राप्त कर
लेता हे।
^ 88. १९
(म 1 199
एक वर्षतक गङ्खार्चन-व्रतका विधान ओर माहात्स्य, गङ्खातटपर नक्तव्रत करके
भगवान् शिवका पूजन, प्रत्येक मासक पूर्णिमा ओर अमावास्याको
शिवाराधन तथा गङ्खा-दशहराके पुण्य-कृत्य एवं उनका माहात्म्य
पुरोहित वसु बोले- मोहिनी ? एकाग्रचित्त हो
विधिपूर्वकं गद्भाजीकी पूजा करनी चाहिये।
दिव्यस्वरूपा गङ्खगदेवीका ध्यान करके एक सेर
अगहनीके चावलको दो सेर दृधे पकाकर खीर
तेयार करावे, उसमे मधु ओर घीमिलादे, वे
दोनों पृथक् -पृथक् एक-एक तोला होने चाहिये ।
तदनन्तर भक्तिभावसे परिपूर्णं हो खीर, पृ,
लङ्, मण्डल, आधा गुंजा सुवर्ण, कुछ चोदी,
चन्दन, अगरु, कर्पूर, कुंकुम, गुग्गुल, बिल्वपत्र,
दूर्वा, रोचना, शत चन्दन, नील कमल तथा
अन्यान्य सुगन्धित पुष्प यथाशक्ति गद्गाजीमें छोड
ओर अत्यन्त भक्तिभावसे निम्राह्भित पौराणिक
मन्त्रोंका उच्चारण करता रहे-' ॐ गद्धायै नमः ,
ॐ नारायण्यै नमः, ॐ शिवायै नमः।' मोहिनी !
((-0. 1\॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 01411260 0 6810011
उत्तरभाग ६४९
अपराहकालमं तथा गृह्यक आदिने रात्रिके प्रथम भागं
भोजन किया है। इन सव वेला्ओंका उद्ध॑बन करके
रातमें भोजन करना उत्तम है। अतः नक्तत्रतका
आचरण करना चाहिये । रतको भोजन करनेवाले नक्त-
व्रतीको ये छः कर्म अवश्य करने चाहिये- स्नान,
हविष्य-भोजन, सत्यभाषण, स्वल्पाहार, अग्निहोत्र तथा
भूमिशयन। जो कोई भी साधक हो, वह माघ मासमे
गङ्गातटपर शिव-मन्दिरके समीप रातमं घ्री मिलायी हुई
खिचडी भोजन करे। भोजन आरम्भ करनेसे पहले
भगवान् शिवको खिचड़का ही नैवेद्य लगावे। काष्-
मौन होकर भोजन करे ओर जिह्यकी लोलुपता त्याग
दे। भगवान् शिवको स्मरण करके जितेद्धियभावसे
पलाशके पततेमं नियम पूर्वक भोजन करे। धर्मराज तथा
देवीके लिये प्रथक् -पृथक् पिण्ड ॒दे। दोनों पक्षोकी
चतुर्दशीको उपवास करे। पूर्णिमकरे दिन गन्ध ओर
गङ्गाजलसे तथा दूध, दही, घी, शहद (ओर शर्करा) -
से भगवान् शिवको नहलाकर रशिवलि्गके मस्तकपर
धतूरका फूल चद्वे। तत्पश्चात् यथाशक्ति घीका पकाया
हआ पू निवेदन करे। फिर एक आढक तिल लेकर
शिवलिद्धके ऊपर चद्धवे। नील तथा लाल कमलके
फुलोपे सर्वेश्वर शिवका पूजन करे। कमलका फल न
मिले ते सुवर्णमय कमलसे महादेवजीकी पूजा क।
मधुयुक्तं खीरका भोग लगावे। धृतमिश्रित गुग्गुलका
धृष दे । घीका दीपक जलावे। चन्दन आदिसे अनुलेपन
करे। भक्तिपूर्वक महेश्चसको विल्चपत्र ओर फल चदवि।
प्रसत्रताके लिये काले की गौ ओर काले
रगका चैल दान करे। उन गाय-वैर्लोकी शकल-मुरत
एक-सी होनी चाहिये । माघ मास व्यतीत हानेपर आट
्राह्मणोको भोजन करावे ओर उन्हें दक्षिणा दे। ब्रह्मचर्य
पालनपूर्वक रहे। इस प्रकार यम-नियम, श्रद्धा ओः
भक्तिसे युक्त टोकर् जो एक व्यार भी शास्त्रीय विधिसे
इस त्रतका पालन करता टै, वह इस लोकमं उत्तम
भोर्गोका भागता टै ओर् मृल्युकरे पात् परम उम
गतिकरा भागी टोता है।
प्रत्येक मासक पूर्णिमा ओर अमावास्याको प्रातः-
काल एकाग्रचित्त हो इसी विधिसे गद्धाजीको पूजा
करनी चाहिये । जो मनुष्य एक वर्तक हविष्यभोजी,
मिताहारी तथा ब्रह्मचारी रहकर दिनमें अथवा
रात्रिके समय नियमपूर्वक भक्ति ओर प्रसन्नताके
साथ यथाशक्ति गङ्गाजीको पूजा करता है, उसे
वर्षके अन्तमें ये गङ्गादेवी दिव्य शरीर धारण
करके दिव्य माला, दिव्य वस्त्र तथा दिव्य रनोसे
विभूषित हो प्रत्यक्ष दर्शन देती हैँ ओर वर देनेके
लिये उसके सामने खडी हो जाती हे। शुभे! इस
प्रकार दिव्य देहधारिणी प्रत्यक्षरूपा गङ्गाजीका
अपने नेत्रोसे दर्शन करके मनुष्य कृतकृत्य होता
हे । वह मानव जिन-जिन भोगोंकी कामना करता
हे, उन सबको प्राप्त कर लेता हे ओर जो ब्राह्मण
निष्कामभावसे गद्गाकौ आराधना करता हे, वह
उसी जन्ममे मोक्ष पा जाता हे। गङ्खाजीके पजनका
यह _ सावंत्सरत्रत_ भगवान् लक्ष्मीपतिको_ संतुष्ट
करनेवाला एवं मोक्ष देनेवाला हे।
वसिष्ठजी कहते है-- राजेन्द्र! वसुका यह
गद्गामाहात्म्यसूचक वचन सुनकर मोहिनीने पुनः
अपने पुरोहित विप्रवर वसुसे पृरछा।
मोहिनी बोली-- ब्रह्मन्! गङ्गाजीके तटपर ग्धा
आदिके स्थापन ओर पूजनका क्या फल है? मुञ्च
अबलाको गङद्गाजीके माहात्म्यसे युक्त देवाराधनकी
विधि बताइये, जिसे सुनकर पापसे छुटकारा मिल
जाता हे।
पुरोहित वसु बोले-देवि ! तुमने सब लोकोकि
हितकी कामनासे बहुत उत्तम वात पष्ठी टे । गद्गाजीका
सम्पूर्णं माहात्म्य बड-बड् पापोका नाश करनेवाला
हे । पूर्वकालमें वृषध्वज भगवान् शिवने कृपापूर्वक
इसका वर्णन किया धा। देवी पार्वतीने प्रेमपूर्वक
उनसे प्रश्र किया था ओर उन्हेनि गद्घाजीके तटपर
वैटकर् गङ्गाजीका माहात्म्य उन्हं सुनाया धा। देवतानि
पर्वाह काले, ऋषि्योने मध्याहकालमें, पितरोन
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६५०
संक्षिप्त नारदपुराण
वैशाख शुक्ला चतुर्दशीको एकाग्रचित्त होकर
अगहनीके चावला भात ओर दूध रातमें भोजन
करे। पुष्प आदिसे भगवान् शिवकी पूजा करे ।
उन्हें भोज्य पदार्थं निवेदन करके काष्ट-मोन होकर
भोजन करे। उस दिन पवित्र हो मोन-भावसे
वरगदकी लकडीद्रारा दन्तधावन करे। रातमे
गङ्गातटपर शिवलिङ्घके समीप सोये। प्रातःकाल
पूर्णिमाको विधिपूर्वक गङ्गाम स्नान करके उपवास-
त्रतका संकल्प लेकर रातमे जागरण करे। शिवलिङ्गको
घीसे नहलाकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिके
द्वारा उनका पूजन करके एक सुन्दर वृषभको शेत
पुष्प, वस्त्र, हल्दी ओर चन्दनसे अलंकृत करके
विधिपूर्वकं भगवान् शिवके लिये निवेदन करे।
ब्राह्मणको यथाशक्ति खीर भोजन करावे। इस प्रकार
जो श्रद्धा ओर भक्तिके साथ एक वार भी उक्त
नियमका पालन करता है, वह अन्तमें मुक्त हो
जाता हे।
ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षमे दशमी तिधथिको हस्त
नक्षत्रका योग होनेपर स्त्री हो या पुरुष, भक्तिभावसे
गद्धाजीके तटपर जाकर रात्रिमें जागरण करना चाहिये
ओर दस प्रकारके फूलोसे, दस प्रकारकी गन्धसे, दस
तरहक नेवेद्योसे तथा दस-दस ताम्बूल एवं दीप
आदिसे श्रद्धापूर्वक गङ्गाजीकी पूजा करनी चाहिये।
पूजनके पहले भक्तिपूर्वक शास्त्रोक्त विधिके अनुसार
गङ्गाजीमें दस वार स्नान करके जलमें दस पसर
काले तिल ओर घी छोडना चाहिये । इसी प्रकार सत्तू
तथा गुडके दस-दस पिण्ड भी गङ्गाजीके जलें
डालने चाहिये। तदनन्तर गद्गाके रमणीय तटपर
अपनी शक्तिके अनुसार सोने या चोँदीसे गद्गाजीकौ
प्रतिमा निर्माण कराकर उसको स्थापना करे । पहले
भूमिपर कमल या स्वस्तिकका चिह बनाकर उसके
ऊपर कलश स्थापित करे। कलशपर भी पद्म एवं
स्वस्तिकेका चिह्न होना चाहिये। उसके कण्ठे
वस्त्र ओर पुष्पहार लपेट देना चाहिये । कलशको
गद्गाजलसे भरकर उसमें अन्य आवश्यक पदार्थ
छोड । उसके ऊपर पूर्णपात्र रखकर उसमें गङ्गाजीकी
पूर्वोक्तं प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। सुवर्ण
आदिको प्रतिमा न मिले तो मद्री आदिकी बनवानी
चाहिये । इसकी भी शक्ति न हो तो आटासे पृथ्वीपर
ही गङ्गाजीका स्वरूप अङ्भित करना चाहिये।
उनका स्वरूप इस प्रकार है- गङ्खादेवीके चार
भुजा ओर सुन्दर नेत्र है । उनके श्रीअङ्खोसे दस
हजार चन्द्रमाओके समान उज्वल चोँदनी-सी
छिटकती रहती हे । दासियां उन्हें चर्वेर इलाती हे ।
मस्तकपर तना हआ शेत छत्र उनकी शोभा बढाता
हे। वे अत्यन्त प्रसन्न ओर वरदायिनी हैं । करुणासे
उनका अन्तःकरण सदा द्रवीभूत रहता हे। वे
वसुधातलपर सुधाधारा बहाती हें । देवता आदि सदा
उनको स्तुति करते रहते हें। वे दिव्य र्नोके
आभूषण, दिव्य हार ओर दिव्य अनुलेपनसे विभूषित
ह । जलमें उनके उपर्युक्त स्वरूपका ध्यान करके
प्रतिमामें उनको विशेषरूपसे पूजा करनी चाहिये।
प्रतिमाको पञ्चामृतसे स्नान कराना उत्तम है । प्रतिमाके
आगे एक वेदी बनाकर उसको गोबरसे लीपे उसपर
भगवान् नारायण, शिव, ब्रह्मा, सूर्य, राजा भगीरथ
तथा गिरिराज हिमालयको स्थापना करके गन्ध-
पुष्प आदि उपचारोसे यथाशक्ति उनकी पूजा करे;
फिर दस ब्राह्मणोको दस सेर तिल दे। इसी प्रकार
दस सेर जौ दे ओर उनके साथ अलग-अलग दस
पात्रोमं गव्य (दही-घी आदि) भी दे। तत्पश्चात्
पहलेसे तेयार करायी हुई मछली, कदु, मेदक,
मगर आदि जलचर जीवोंकी यथाशक्ति सुवर्णमयी
अथवा रजतमयी प्रतिमा स्थापित करके उनको पूजा
करे, वैसी प्रतिमा न मिलनेपर आटेकौ प्रतिमा
बनावे ओर मन्त्रज्ञ पुरुष पुष्प आदिसे पूर्वनिर्ष्ट
मन्त्रद्रारा ही उनकी पूजा करके उन्हें गद्गाजीमें छोड
दे। यदि अपने पास वैभव हो तो उस दिन
गङ्गाजीकी रथयात्रा भी करावे। रथपर गङ्गाजीको
प्रतिमा या चित्र हो, उसका मुख उत्तर दिशाकौ ओर
रहे । रथपर भ्रमण करती हुई गङ्गाजीका दर्शन इस
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उत्तरभाग
२५१
लोकमें पापी मनुष्योके लिये अत्यन्त दुर्लभ है।
प्रकार विधिपूर्वक रथयात्रा सम्पन्न करके मनुष्य
आगे बताये जानेवाले दस प्रकारके पापोसे तत्काल
ही मुक्त हो जाता हे। विना दिये हए किसीकी वस्तु
ले लेना, हिसा करना ओर परायी स्त्रीके साथ सम्बन्ध
रखना--ये तीन प्रकारके शारीरिक पाप माने गये हें।
कठोरतापूर्ण वचन, असत्य, चुगली तथा अनाप-
शनाप वाते बकना--ये चार प्रकारके वाचिक पाप
कहे गये हें। दूसरेका धन हडपनेकी बात सोचना,
मनसे किसीका अनिष्ट-चिन्तन_ करना ओर ठा
अभिनिवेश (मरण-भय)--ये तीन प्रकारके मानसिक
पाप हें। ये दस प्रकारके पाप करोड़ जन्मोद्रारा संचित
हो तो भी पूर्वोक्त विधिसे रथयात्रा करनेवाला पुरुष
उनसे मुक्त हो जाता है।
पूजाका मन्त्र इस प्रकार हँ-' ॐ नमो दशहरायै
नारायण्यै गङ्गायै नमः।' जो मनुष्य उस दिन रातमं
ओर दिनमें भी उक्त मन्त्रका पोच-रपोच हजार जप
करता हे, वह मनुके बताये हए दस धर्माः का फल
प्राप्त करता है। आगे बताये जानेवाले स्तोत्रको
विधिपूर्वक ग्रहण करके उस दिन गद्धाजीके आगे
उसका पाठ करे। फिर भगवान् विष्णुको पूजा
करे। वह स्तोत्र इस प्रकार है-
ॐ शिवस्वरूपा गद्गाको नमस्कार हे। कल्याण
प्रदान करनेवाली गद्गाको नमस्कार हे । विष्णुरूपिणी
देवीको नमस्कार है। आप भगवती गद्गाको
वारंवार नमस्कार है । सम्पूर्ण देवता आपके स्वरूप
है, आपको नमस्कार हे। आपका स्वरूपभूत जल
उत्तम ओपध है, आपको नमस्कार है। आप
समस्त जीवोके सम्पूर्णं रोगोका निवारण करनेके
लिये श्रेष्ठ वैद्यके समान है, आपको नमस्कार हे ।
१. श्रीमनुके बतलाये हए दस धर्मं ये दै-
धृतिः श्रमा दमोऽस्तेयं शौचमि्ियनिग्रदः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशक्रं॑ धर्मलक्षणम् ॥
आप स्थावर ओर जङ्गम जीवोंसे उत्पन्न होनेवाले
विपका नाश करनेवाली हें, आपको नमस्कार है।
संसाररूपी विषका नाश करनेवाली जीवनदायिनी
गद्गादेवीको बारंबार नमस्कार है । आप आध्यात्मिक
आदि तीनों तापोका निवारण करनेवाली एवं
सबके प्राणोंको अधीश्चरी हे, आपको नमस्कार है
नमस्कार हे। आप शान्तिस्वरूपा तथा सवका
संताप दूर करनेवाली हं, सव कुछ आपका ही
स्वरूप हे, आपको नमस्कार है। सबको पूर्णतः
शुद्ध करनेवाली ओर सब पापे छुटकारा दिलनेवाली
आपको नमस्कार है। आप भोग ओर मोक्ष
देनेवाली भोगवती (नामक पातालगद्भा) हं, आपको
नमस्कार है, नमस्कार हे। आप ही मन्दाकिनी
नामसे प्रसिद्ध आकाशगद्धा हँ, आप्रको नमस्कार
हे । आप स्वर्ग देनेवाली हँ, आपको नमस्कार दै
नमस्कार है। तीनों लोकोमें मूर्तरूपमे प्रकट्
होनेवाली आप गङद्गादेवीको वारेवार नमस्कार है।
शुक्लरूपसे स्थित होनेवाली आपको नमस्कार है ।
सवका क्षेम चाहनैवाली क्षेमवतीको नमस्कार
नमस्कार है। देवताओके सिंहासनपर विराजमानं
होनेवाली तेजोमयी आप गङ्गादेवीको नमस्कार
हे। आप मन्द गति धारण करके "मन्दा' ओर
शिवलिद्धका आधार होनेसे “लिङ्गधारिणी ' कहलाती
है। भगवान् नारायणके चरणारविन्दोसे प्रकट
होनेके कारण आप ' नारायणी ' कहलाती है, आपको
नमस्कार है, नमस्कार है । सम्पूणं जगत्को मित्र
माननेवाली आप विश्चमित्राको नमस्कार ह । रेवती
नामसे प्रसिद्ध गद्धाको नमस्कार है, नमस्कार ह।
आप वृहतीदेवीको नित्य नमस्कार है । लोकधात्रीको
वारंवार नमस्कार है। विश्वमे प्रधान हानसे आपका
2 ` व `
(६।९२)
"धर्यं, क्षमा, मनका निग्रह, चोरी न करना, व्राहर-भीतरकौ पवित्रता, उद्रियनिग्रह, पाल्विकि वुद्धि,
अध्यात्मविद्या, सत्य ओर अक्रोध-ये टस धर्मक्र लक्षण दै
(-0. 1\/1(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 60810011
६५२
संक्षिप्त नारदपुराण
नाम विश्वमुख्या दै, आपको नमस्कार हे । जगत्को
आनन्दित करनेके कारण नन्दिनी है, आपको
नमस्कार हे, नमस्कार हे। पृथ्वी, शिवामृतार ओर
विरजा नामवाली गङ्खादेवीको बारंबार नमस्कार
हे। परावरगता, आद्या^ `एवं तारा९ नामवाली
आपको नमस्कार हे, नमस्कार हे । स्वर्गमें विराजमान
गङ्गादेवी ! आपको नमस्कार है। आप सवसे अभिन्न
हं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है! आप शान्त-
स्वरूपा, प्रतिष्ठा ( आधारस्वरूपा) तथा वरदायिनी
हे, आपको नमस्कार हे, नमस्कार है। आप उग्रा
मुखजल्पा- ओर संजीवनी है, आपको नमस्कार
हे, नमस्कार है । आपको ब्रह्मलोकतक पहुंच
हे । आप ब्रह्मकी प्रापि करानेवाली तथा पापनाशिनी
हं, आपको नमस्कार है, नमस्कार हे । प्रणतजनोंकी
पीड़ाका नाश करनेवाली जगन्माता गद्गाको नमस्कार
हे, नमस्कार हे । देवि ! आप जल-विन्दुओंकी राशि
हे, दुर्गम संकटका नाश करनेवाली तथा जगतूके
उद्धारमे दक्ष है, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण
विपत्तिर्योका विरोध करनेवाली मद्गलमयी गद्गादेवीको
नमस्कार हे, नमस्कार है। पर ओर अपर सव
आपके ही स्वरूप हैँ, आप ही पराशक्ति हैं
मोक्षदायिनी देवि ! आपको सदा नमस्कार है । गङ्गा
मेरे आगे रहे, गङ्गा मेरे दोनों पारमे रहें, गङ्गा मेरे
चारों ओर रहं ओर हे ग्ध ! आपमें ही मेरी स्थिति
हो। पृथ्वीपर प्राप्त हुई शिवस्वरूपा देवि! आदि,
मध्य ओर अन्तम आप ही हैं । आप सर्वस्वरूपा हें ।
आप ही मूल प्रकृति है । आप ही सर्वसमर्थं नर-
नारायण हें । गद्धे ! आप ही परमात्मा ओर आप ही
शिव ह, आपको नमस्कार है, नमस्कार है१०।
जो प्रतिदिन भक्तिभावसे इस स्तोत्रका पाठ
१. -पृथ्वीपर स्थित होने अथवा पृथुल जलराशि धारण करनेके कारण गद्धाजीका नाम " पृथ्वी ' हे । भगवदीय
शक्ति होनेसे गङ्गा ओर पृथ्वीमें अभेद भी हे।
२. शिव (कल्याणमय) हँ अमृत (जल) जिनका, वे गद्गाजी “शिवामृता ' है, शिवस्वरूपा ओर अमृतस्वरूपा
हानेके कारण उनका यह नाम सार्थक हे।
३. रजोगुणरहित, निर्मलस्वरूप होनेके कारण गद्गाजीको ' विरजा" कहते हैँ । गोलोकस्थित विरजासे अभिन्न
होनेके कारण भी इनका नाम "विरजा" है।
४. पर (ऊपर स्वर्गलोक) ओर अवर (नीचे पाताललोक) -में स्थित।
, आदिशक्िस्वरूपा।
. पाप-समुदायके लिये भयंकर ।
9 (^ & ^ ^
सर्वदेवस्वरूपिण्ये नमो
. सवको सरंसार-सागरसे तारनेवाली अथवा तारा" नामक शक्तिसे अभिन्न
. अपने स्रोतरूप मुखसे निरन्तर कलकल शब्द करनेवाली ।
. संवकोंको जन्म-मृत्युसे छुड़ाकर नृतन अमृतमय जीवन प्रदान करनेवाली ।
. ॐॐ नमः शिवाये गङ्खाये शिवदायै नमोऽस्तु ते । नमोऽस्तु विष्णुरूपिण्यै गद्भायै ते नमो नमः॥
भषजमूर्तये । सर्वस्य सर्वव्याधीनां भिषक्श्रेषठे नमोऽस्तु ते॥
स्थाणुजङ्गमसम्भूतविषहन्त्रि नमोऽस्तु ते। संसारविषनाशिन्यै जीवनायै नमो नमः॥
तापपत्रितयहन्त्यै च प्राणेशे नमो नमः। शान्त्यै संतापहारिण्यै नमस्ते सर्वमूर्तये॥
सर्वसंशुद्धिकारिण्यै नमः
पापविमुक्तये । भुक्तिमुक्तिप्रदायिन्यै भोगवत्यै नमो नमः॥
मन्दाकिन्यै नमस्तेऽस्तु स्वर्गदायै नमो नमः । नमस्रैलोक्यमृत्तयै त्रिदशायै नमो नमः॥
नमस्ते शुक्लसंस्थायै क्षेमवत्यै नमो
मन्दायै ल्तिङ्कधारिण्यै नारायण्यै नमो
वृहत्ये ते नमो नित्यं लोकधात्यै नमो
पृथ्व्यै शिवामृतायै च विरजायै नमो
नमस्ते स्व्वर्संस्थायै अभित्नायै नमो
उग्रायै मुरखजल्पायै संजीविन्यै नमो
प्रणतार्तिप्रभञ्जिन्यै जगन्मात्रे नमो
नमः । त्रिदशासनसंस्थायै तेजोवत्यै नमोऽस्तु ते॥
नमः । नमस्ते विश्वमित्रायै रेवत्यै ते नमो नमः॥
नमः । नमस्ते विश्वमुख्यायै नन्दिन्यै ते नमो नमः॥
नमः । परावरगताद्यायै तारायै ते नमो
नमः। शान्तायै ते प्रतिष्ठायै वरदायै नमो नमः॥
नमः । ब्रह्मगायै ब्रह्मदायै दुरितघ्रयै नमो नमः॥
नमः । विप्लुषायै दुरगहन््यै दक्षायै ते नमो नमः॥
नमः ॥
((-0. 1/८11114<511॥ 81188 \/8181185। (01611010. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग
६५३
करता हे अथवा जो श्रद्धापूर्वक इसे सुनता है
मन, वाणी ओर -शरीरद्वारा होनेवाले पूर्वोक्त दस पापों
तथा सम्पूर्णं दोषसे मुक्त हो जाता है। रोगी रोगसे ओर
विपत्तिका मारा पुरुष विपत्तिसे छुटकारा पा जाता हे।
शत्रुओंसे, बन्धनसे तथा सव प्रकारके भयसे भी वह
मुक्त हो जाता है। इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको
प्राप्त करता हे ओर मृत्युके पश्चात् परत्रह्म परमात्मामें
लीन हो जाता हे। जिसके घरमे इस स्तोत्रको
लिखकर इसकी पूजा की जाती है, वहां आग ओर
चोरका भय नहीं हे । वहो पापसे भी भय नहीं होता।
ज्येष्ठ शुक्ला दशमीको गङ्खाजीके जलमें खडा होकर
जो इस स्तोत्रका दस बार जप या पाठ करता है, वह
दरिद्र अथवा असमर्थं होनेपर भी वही फल पाता
हे, जो पूर्वोक्त विधिसे भक्तिपूर्वक गङ्गाजीकी पूजा
करनेसे प्रात होने योग्य बताया गया है। जेसी गौरी
देवीकी महिमा हे, वेसी ही ग्धा देवीकी भी है, अतः
गोरीके पूजनमें जो विधि कही गयी ठै, वही
गङ्गाजीके पूजनके लिये भी उत्तम विधि हे। जैसे
भगवान् शिव है, वैसे ही भगवान् विष्णु है, जेसे
भगवान् विष्णु है, वैसी ही भगवती उमा हे ओर जेसी
भगवती उमा है, वैसी ही गद्धाजी है-इनमें कोई भेद
नहीं हे। जो भगवान् विष्णु ओर शिवम, गद्धा ओर
गोरीमें तथा लक्ष्मी ओर पार्वतीमें भेद मानता है, वह
मूद्बुद्धि है । उत्तरायणमें किसी उत्तम मासका शुक्लपक्ष
हो, दिनका समय हो ओर गद्गाजीके तटकी भृमि हो,
साथ ही हदयमं भगवान् जनार्दनका चिन्तन हो रहा
हो-एेसी अवस्थामं जो शरीरका त्याग करते हे, वे
धन्य हैः । विधिनन्दिनी ! ज मनुष्य गङ्खामं प्राणत्याग
करते है, वे देवताओंद्रारा अपनी स्तुति सुनते हुए
विष्णुलोकको जते हं। जो मनुष्य गद्धाके तटपर
आमरण उपवासका त्रत त्नेकर मर जाता है वह
निश्चय ही अपने पितरोके साथ परमधामको प्राप्त होता
हे। गद्धाजीमें मृत्युके लिये दो योजन दूरकी भृमि ओर
समीपका स्थान दोनों समान दै । जो मनुष्य गद्गामं मर
जाता हि, वह स्वर्ग ओर मोश्चको प्राप्त होता है। जो
मानव प्राण-त्यागके समय गङ्घाका स्मरण अथवा
गद्धाजलका स्पर्शं करता है, वह पापी होनेपर भी
परमगतिको प्राप्त होता है। जिन धीर पुरुषनि गद्गाजीके
समीप जाकर अपने शरीरका त्याग कियारहै, वे
देवताअकि समान हो गये। इसलिये मुक्ति देनेवाले
दूसरे सब साधनोको छोडकर देहपातपर्यन्त गद्गाजीका
ही सेवन करे। जो महान् पापी होकर भी गरद्भाके
समीपवर्ती आकाशमं, गद्गातटकीं भूमिपर अधवा
गद्गाजीके जलमें मर है, वह त्र्या, विष्णु ओर शिवके
दवारा पूजनीय अक्षयपदको प्रास कर लेता है। जौ
सर्वापत्प्रतिपक्षायै मद्कलायै नमो नमः।
परापरे पे तुभ्यं नमो मोक्षप्रदे
सदा। गद्धा ममाग्रतो भूयाद् गङ्गा मे यपाश्चयोस्तथा॥
गद्रा मे सर्वतो भूयात्ववि गह्ऽस्तु मे स्थितिः। आदौ त्वमन्ते मध्य च सर्वा त्वं गाद्भते रिवे॥
त्वमेव मूलप्रकृतिस्त्वं हि कारायणः
१. शुक्लपक्ष दिवा भूमी
#।
गद्भायामुचगायणे । धन्या
प्रभुः। ग्धं त्वं परमात्मा च रित्रस्तुभ्स्रं नमो नमः॥
(ना० उत्त० ४३ । ६९--८४)
देहं विमुञ्चन्ति हदयस्य जनार्दम ५
( ना० उत० ४३) ९४)
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सकषिप्त नारदपुराण
धर्मात्मा, पवित्र॒ एवं साधुसम्मत प्राणधारी मनुष्य
मन-ही-मन गद्धाजीका चिन्तन करता हे, वह परम
गतिको प्राप्त कर लेता हे। कोई कहीं भी मर रहा हो,
पतु मृत्युकाल उपस्थित होनेपर यदि वह गङ्खाजीका
स्मरण करता हे, तो वह शिवलोक अथवा विष्णुधामको
जाता हे। भगवान् शद्धरके अत्यन्त कर्कश जयाकलापसे
निकलकर पापी सगर-पत्रके शरीरकी राखको
बहाकर गद्खाजीने उन्हं स्वर्गलोक पर्हुचाया था।
पुरुषके शरीरकी जितनी हया गद्धाजीमें मोजुद रहती
हं, उतने हजार वर्घोतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता
हे। मनुष्यकी हड़ी जव गङ्गाजीके जलम ले जाकर
छोडी जाती हे, उसी समयसे प्रारम्भ करके उसकी
स्वर्गलोकमें स्थित होती हे। जिस पुण्यकर्मा पुरुषकी
हड़ी ग्गाजीके जलमे परटुचायी जाती हे, उसकी
ब्रह्मलोकसे किसी प्रकार पुनरावृत्ति नहीं होती । जिस
मृतक पुरुषकी डी दशाहके भीतर गङ्गाजीके जलम
पड़ जाती है, उसे गद्धामे मेका जेसा फल बताया
गया ह, उसी फलकी प्रापि होती हे। अतः स्नान करके
पञ्चगव्य छिड्ककर सुवर्ण, मधु. घी ओर तिलके साथ
उस अस्थि-पिण्डको दोनेमें रख ले ओर प्रेतगणेसे युक्त
दक्षिण दिशाकी ओर देखते हुए "नमोऽस्तु धर्माय!
(धर्मराजको नमस्कार है) एेसा कहकर जलमें प्रवेश
करे ओर ' धर्मराज मुञ्यपर प्रसन्न हां" एेसा कहकर उस
हड़को जलमं फक दे। तदनन्तर स्नान करके तीर्थवासी
अक्षयवटका दर्शन करे ओर ब्राह्मणको दक्षिणा दे। एेसा
करनेपर यमलोके स्थित हए पुरुषका स्वर्गलोकमें
गमन होता हे ओर वहो उसे देवराज इन््रके समान
प्रतिष्ठ प्राप्त हाती हे। गद्धाजीकी बहती हुई मुख्य धारासे
लेकर चार हाथतकका जो भाग है, उसके स्वामी
भगवान् नारायण हें । प्राण कण्ठतक आ जार्ये तो भी
उसमं प्रतिग्रह स्वीकार न करे। भाद्रपद शुक्ला
चतुर्दशीको गङ्गाजीका जल ज्हातक बढ़ जाता है
वहोतककी भूमिको उनका गर्भं जानना चाहिये । उससे
दूरका स्थान “ तीर' कहलाता हे। साधारण स्थितिमं
जहोतक जल रहता है, उससे डेढ सौ हाथ टूरतक
गर्भको सीमा हे। उससे परेका भू-भाग तट हे । देवि।
किन्हीं विद्वानोका एेसा ही मत हे तथा यह श्रुतियों
ओर स्मृतियोको भी अभिमत हे। तीरसे दो-दो कोस
दोनों ओरका स्थान क्षेत्र' कहलाता हे। तीरको
छोडकर क्षत्रे वास करना चाहिये; क्योकि तीरपर
निवास अभीष्ट नहीं हे। दोनों तटोंसे एक योजन
विस्तृत भू-भाग कषेत्रकी सीमा माना गया है । जितने
पाप हें, वे सब-के-सब गङ्खाजीकी सीमा नही
लोघते। वे गद्धाको देखकर उसी प्रकार दूर भागते हैं
जेसे सिंहको देखकर वनमें रहनेवाले दूसरे जीव ।
महाभागे! जहो गद्खा है, जहाँ श्रीराम ओर श्रीशिवका
तपोवन हे, उसके चारों ओर तीन योजनतक सिद्धक्षेत्र
जानना चाहिये । तीर्थम कभी दान न ले। पवित्र देव-
मन्दिरोमें भी प्रतिग्रह न ले तथा ग्रहण आदि सभी
निमित्तमं मनुष्य प्रतिग्रहसे अलग रहे। जो तीर्थमं दान
लेता हे तथा पुण्यमय देवमन्दिरोमे भी प्रतिग्रह
स्वीकार करता है, उसके पास जबतक प्रतिग्रहका
धन हे, तवतक उसका तीर्थ-त्रत निष्फल कहा जाता
हे। देवि ! गङ्गाजीमें दान लेना मानो गङ्खाको वेचना
हे। गद्धाके विक्रयसे भगवान् विष्णुका विक्रय हो
जाता हे ओर भगवान् विष्णुका विक्रय होनेपर तीनो
लोकोका विक्रय हो जाता हे। जो गङ्खाजीके तीरकी
मिद्री लेकर अपने मस्तकपर धारण करता है, वह
केवल तम (अन्धकार, अज्ञान एवं तमोगुण) -का
नाश करनके लिये मानो सूर्यका स्वरूप धारण करता
हे। जो मनुष्य गद्गाजीके तटकी धृलि फेलाकर उसके
ऊपर पितरोके लिये पिण्ड देता है, वह अपने
पितरोको तृप्त करके स्वर्गलोके पर्हुचा देता हे। भद्र!
इस प्रकार मेने तुम्हं गद्धाका उत्तम माहात्म्य वताया
हे । जो मनुष्य इसको पदता अथवा सुनता हे, वह
भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त होता ह।
विधिनन्दिनी। जो भगवान् विष्णु अथवा शिवका
लोक प्राप्त करना चाहते हों, उन्हें प्रतिदिन
पवित्रचित्त हो श्रद्धा ओर भक्तिके साथ इस
गद्भा-माहात्म्यका पाट करना चाहिये।
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१ 7 4. |
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गयातीर्थव्छी महिमा
वसिष्ठजी कहते ह- राजन्! तदनन्तर | ब्रह्मलोकगामी होगे ओर जो लोग तुम्हारा पूजन
गङ्गाका यह उत्तम माहात्म्य सुनकर मोहिनीने पुनः | ओर सत्कार करेगे, उनके द्वारा सदा मँ पूजित
अपने पुरोहितसे पूछा । होञगा। ब्रह्मज्ञान, गयाश्राद्ध, गोशालामें प्राप्त होनेवाली
मोहिनी बोली-- भगवन्! आपने मुञ्चे गङ्गाका | मृत्यु तथा कुरुकषत्रमे निवास- यह मनुष्योकि लिये
पुण्यमय आख्यान (माहात्म्य) सुनाया हे । अव में | चार प्रकारक मुक्ति (-कर साधन) है । ब्रह्यहत्या,
यह सुनना चाहती हूं कि संसारमें गयातीर्थं केसे | मदिरापान, चोरी ओर गुरुपत्नीगमन तथा इन
विख्यात हुआ? सवके संसर्गसे होनेवाला पाप-ये सव-के-सव
पुरोहित वसुने कहा-- गया पितृतीर्थं हे। उसे | गयाश्राद्धसे नष्ट हो जाते है । मरनेपर जिनका दाह-
सब तीर्थम श्रेष्ठ माना गया है, जहां देवदेवेश्वर | संस्कार नहीं हुआ है, जो पशुद्वारा मारे गये दै
पितामह ब्रह्माजी स्वयं निवास करते है । जहां याग | अथवा जिन्हे सर्पने डस लियाटै, वे सब लोग
(श्राद्ध) -को अभिलाषा रखनेवाले पितरोने यह | गयाश्राद्धसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें जते है।
गाथा गायी है-'बहुत-से पुत्रोको अभिलापा| देवि! इस विषयमे एक प्राचीन इतिहास सुना
करनी चाहिये, क्योकि उनमेसे एक भी तो गया | जाता हे। त्रेतायुगमें विशाल नाममे प्रसिद्ध एक
जायगा अथवा अश्वमेध-यज्ञ करेगा या नीलवृषभका | राजा हो गये हें, जो विश्शालापुरीपें रहते थे। वे
उत्सर्गं करेगा।' देवि! गयाका उत्तम माहात्म्य | अपने सदुणोके कारण धन्य समञ्च जाते थे । उनमें
सारसे भी सारतर वस्तु है। में उसका संक्षेपसे | धैर्यका विलक्षण गुण था। उन्होनि च्रष्र तीर्थ
वर्णन करूगा। वह भोग ओर मोक्ष देनेवाला हे । | गयाशिरमें आकर पितृयाग प्रारम्भ किया। उन्होनि
सुनो, पूर्वकालको वात है । गयासुर नामसे प्रसिद्ध | विधिपूर्वक पितरोको पिण्डदान दिया। इतनेमें ही
एक असुर हुआ था, जो बड़ा पराक्रमी था। उसने | उन्होने आकाशम उत्तम आकृतिसे युक्तं तीन
वड़ा भयंकर तप किया, जो सम्पूर्णं भूतोको पीडित | पुरुषोंको देखा, जो क्रमशः श्रेत, लाल ओर काले
करनेवाला था। उसको तपस्यासे संतप्त हए देवता | रगके थे। उन्हें देखकर राजाने पृटा-' आपलोग
लोग उसके वधके लिये भगवान् विष्णुकी शरणमे | कौन हें 2'
गये। तब भगवान्ने उसको गदासे मार दिया।| सित ( श्चेत)-ने कहब्-राजन्! मं तुम्हार
अतः गदाधर भगवान् विष्णु ही गयातीर्थमे मुक्तिदाता | पिता सित हूं। मेरा नाम तो सित है ही, मेर
माने गये हैँ । भगवान् विष्णुने इस तीर्थकी मर्यादा | शरीरका वर्णं भी सित (शेत) है । साथ दही मेर
स्थापित की । जो मनुष्य यहाँ यज्ञ, श्राद्ध, पिण्डदान | कर्म ॒भी सित (उज्वल) है ओरयं जो लाल
एवं स्नानादि कर्म करता टै, वह स्वर्गं अथवा | रंगके पुरुप दिखायी देते है, ये मेरे पिता द।
ब्रह्मलोकमें जाता है। गयातीर्थको उत्तम जानकर | इन्होने बड़ षटु कर्मं क्किये ह । वे ब्रह्महत्या
ब्रह्माजीने वहां यज्ञ किया तथा उन्होने वहां | ओर पापाचारी रहे ठै ओर इनके वाद ये जो तीस
सज्जन है, ये तुम्हारे प्रपितामह ह । यै नामसे तो
सरस्वती नदीकी भी सृष्टि कौ ओर समस्त (५
दिशाओमें व्याप्त होकर उस तीर्थमें निवास किया।| कृष्ण ह ही, कर्म ओर वर्णसे भी कृष्ण हे । इन्दं
पूर्वजन्म अनेक प्राचीन ऋषि्योका वध किया
तदनन्तर ब्राह्मणोके प्रार्थना करनेपर ब्रह्माजीने
टै । ये दोनों पिता ओर पुत्र अवीचि नामक नरकमें
वहां अनेक तीर्थं निर्माण क्रिये ओर कहा-
ब्राह्मणो ! गयाें श्राद्ध करनेमे पवित्र हुए लोग | प्डहुएट, अतःयेमे पिता ओर ये दुसर् इनके
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संक्षिप्त नारदपुराण
पिता, जो दीर्घकालतक काले मुखसे युक्त हो
नरकमें रहे हं ओर में, जिसने अपने शुद्ध कमि
प्रभावसे इन्द्रका परम दुर्लभ सिंहासन प्राप्त किया
था, तुञ्च मन्त्रस्च पुत्रके द्वारा गयामें पिण्डदान करनेसे
हम तीनां ही बलात् मुक्त हो गये।
एक बार गया जाना ओर एक वार वहां
पितरोको पिण्ड देना भी दुर्लभ है; फिर नित्य
वहीं रहनेका अवसर मिले, इसके लिये तो कहना
ही क्या है! देश-कालके प्रमाणानुसार कीं
कहीं मूत्युकालसे एक वर्ष बीतनेके बाद अपने
भाई-बन्धु पतित ॒ पुरुषोके लिये गयाकूपमें
पिण्डदान करते हं । एक समय किसी प्रेतराजने एक
वेश्यसे अपनी मुक्तके लिये अनुरोध करते हए
कहा-तुम गयातीर्थका दर्शन करके स्नान कर लेना
ओर पवित्र होकर मेरा नाम ते मेरे लिये पिण्डदान
करना। वहो पिण्ड देनेसे मं अनायास ही प्रेतभावसे
मुक्त हो सम्पूर्ण दाताओंको प्राप्त होनेवाले शुभ
लोकोमे चला जारऊगा। वैश्यसे एेसा कहकर
अनुयायियोंसहित प्रेतराजने एकान्तमें विधिपूर्वक
अपने नाम आदि अच्छी तरह वताये। वैश्य
धनोपार्जन करके परम उत्तम गयातीर्थं नामक
तीर्थमें गया। उस महाबुद्धि वैश्यने वँ पहले
अपने पितरोको पिण्ड आदि देकर फिर सव प्रेतके
लिये क्रमशः पिण्डदान ओर धनदान किया। उसने
अपने पितरों तथा अन्य कुटुम्बीजनेके लिये भी
पिण्डदान किया था। वैश्यद्वारा इस प्रकार पिण्ड
दिये जानेपर वे सभी प्रेत प्रेतभावसे छूटकर
द्विजत्वको प्राप्त हो ब्रह्मलोकमें चले गये। गयामें
किये हुए श्राद्ध, जप, होम ओर तप अक्षय होते हे ।
यदि पिताको क्षयाह-तिधथिको पुत्रदारा ये कर्म किये
जाये तो वे मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले होते है।
पितृगण नरकके भयसे पीडित हो पुत्रको अभिलाषा
करते हें ओर सोचते हँ--जो कोई पुत्र गया जायगा,
वह हमें तार देगा।
गयामे धर्मपृष्ठ, ब्रह्मसभा, गयाशीर्ष तथा
अक्षयवटके समीप पितरोके लिये जो कुछ दिया
जाता हे, वह अक्षय होता हे। ब्रह्यारण्य, धर्मपृष्ठ
ओर धेनुकारण्य--इनका दर्शन करके वहां पितरोकी
पूजा करनेसे मनुष्य अपनी बीस पीढियोंका उद्धार
कर देता हे। महान् कल्पपर्यन्त किया हुआ पाप
गयामें पर्हुचनेपर नष्ट हो जाता है। गोतीर्थं ओर
गृध्रवटतीर्थमे किया हुआ श्राद्धदान महान् फल
देनेवाला होता हे। वहां सब मनुष्य मतङ्गके
आश्रमका दर्शन करते हे ओर सव लोकोके समक्ष
' धर्मसर्वस्व' को घोषणा करते है! । वहां पवित्र
पङ्कजवन नामक तीर्थ हे, जो पुण्यात्मा पुरुषोसे
सेवित हे, जिसमें पिण्डदान दिया जाता हे। वह
सवके लिये दर्शनीय तीर्थ हे। तृतीयातीर्थ, पादतीरथ,
निःक्षीरामण्डलतीर्थ, महाहृद तथा कोशिकीतीर्थ-इन
सवमे किया हुआ श्राद्ध महान् फल देनेवाला होता
हे। मुण्डपृष्ठे परम बुद्धिमान् महादेवजीने अपना
पैर दे रखा हे। अन्य तीर्थमिं अनेक सौ वर्षोतक
जो दुष्कर तपस्या कौ जाती है, उसके समान फल
यहां थोडे ही समयके तीर्थसेवनसे प्राप्त हो जाता है।
धर्मपरायण मनुष्य इस तीर्थमें आकर अपनी समस्त
पापराशिको तत्काल दूर कर देता हे, ठीक उसी तरह
जेसे सोप पुरानी केचुलकौ त्याग देता है। वही
मुण्डपुष्ठतीर्थके उत्तर भागमे कनकनन्दा नामसे विख्यात
तीर्थ हे, जहां ब्रह्र्षिगण निवास करते है । वहां सान
करके मनुष्य अपने शरीरके साथ स्वर्गलोकको जते हं।
वहो किया हुआ श्राद्ध, दान सदा अक्षय कहा गया हे।
सुलोचने! व्हा निःक्षीरामें तीन दिनतक
९. अग्रिपुराणमें धर्मसर्वस्व' की घोपणाका स्वरूप इस प्रकार स्पष्ट किया गया है । मतङ्गवापी्मे खान करक
श्राद्धकर्ता पुरुप वहां पिण्डदान करे ओर मतङ्कश्वरको, जो सुसिद्धोके अधीश्वर है, नमस्कार करके सक प्रकार
कटहे-' सव देवता प्रमाण देनेवाले ओर समस्त लोकपाल भी साक्षी रहे, मैने इस मतङ्घतीर्थमं आकर पितरोंका उद्धार
किया है" (देखिये अग्निपुराण अध्याय ११५ श्लोक ३४-३५) ।
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उत्तरभाग ६५७
मनुष्य परम उत्तम ब्र्यतीर्थमें जाय, वहाँ ब्रह्माजीके
समीप जानेसे राजसूय य्चका फल मिलता है।
तदनन्तर फल्गुतीर्थमं जाय । वह प्रचुर फल-मूलये
सम्पन्न ओर विख्यात है। वहीं कौशिकी नदी है, जहाँ
किया हुआ श्राद्ध अक्षय माना गया है। वहसि उस
पर्वतपर जाय, जो परम पुण्यात्मा, धर्मज्ञ राजर्षि गयके
दवारा सुरक्षित रहा है। वहीं गयशिर नामका सरोवर है
जहां पुण्यसलिला महानदी विद्यमान ह। ऋषियोपे
सेवित परम पुण्यमय ब्रह्मसरोवर नामक तीर्थं भी वही
हे, जहां भगवान् अगस्त्य वैतस्वत यमसे मिले थे
ओर जहो सनातन धर्मराज निरन्तर निवास करते है।
वहं सव सरिताओंका उद्रम दिखायी देता है ओर
पिनाकपाणि महादेव वहां नित्य निवास करते है।
लोकविख्यात अक्षयवर भी वहीं है। पूर्वकालमें
यजमान राजा गयने वहां यज्ञ किया था। वहां
प्रकट हुई सरिताओमिं श्रेष्ठ गङ्गा गयके यपं
सुरक्षित थीं। मुण्डपृष्ट, गया, रेवत, देवगिरि,
तृतीय, क्रोञ्चपाद--इन सवका दर्शन करके मनुष्य
सब पापोसे मुक्त हो जाता हे । शिवनदीमें शिवकरका,
| गदाधरका ओर सर्वत्र परमात्माका दर्शन
करके मनुष्य पापरशिसे मुक्तं हो जाता है । काशीमें
विशालाक्षी, प्रयागमे ललितादेवी, गयामं मङ्गलादवी
तथा कृतशौचतीर्थमें सेंहिकादेवीका दर्शन करनेसे
भी उक्त फलकी प्राति होती है। गयामं रहकर
मनुष्य जो कुछ दान केरता है, वह सव अक्षय
होता दै । उसके उत्तम कर्मे पितर प्रसन्न होते
टं । पुत्र गयामें स्थित होकर जो अन्नदान करता
है, उसीसे पितर अपनेको पुत्रवान् मानतै है।
स्नान करके मानसरेवरमें नहाकर श्राद्ध करे । उत्तरमानसमें
जाकर मनुष्य परम उत्तम सिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो
अपनी शक्ति ओर बलके अनुसार वहा श्राद्ध करता है
वह दिव्य भोगों ओर मोक्षके सम्पूर्णं उपार्योको प्राप्त कर
लेता हे। तदनन्तर ब्रह्मसरोवरतीर्थमें जाय, जो ब्रह्मयूपसे
सुशोभित हे। वहाँ श्राद्ध करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकको
पराप्त होता हे। सुभगे! तदनन्तर लोकविख्यात धेनुकतीर्थमे
जाय। वह एक रात रहकर तिलमयी धेनुका दान
करे। एेसा करनेसे मनुष्य सब पापोसे मुक्त हो निश्चय
टी चन्द्रलोकमें जाता हे। तत्पश्चात् परम वुद्धिमान्
महादेवजीके गृध्रवट नामक स्थानको जाय। वहां
भगवान् शङ्धरके समीप जाकर् अपने अद्गोमं भस्म
लगावे। देवि । एेसा करनेसे ब्राह्म्णोको तो बारह वर्षोतक
किये जानेवाले त्रतका पुण्य प्राप्त होता है ओर अन्य
वणि लोगोंका सारा पाप नष्ट हो जाता हे।
तत्पश्चात् उदयगिरि पर्वतपर जाय; जहाँ दिव्य
संगीतकी ध्वनि गूंजती रहती हे । वहां सावित्रीदेवीका
परम पुण्यदायक पदचिह दृष्टिगोचर होता है। उत्तम
व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण वहां संध्योपासना
करे। इससे वारह वर्षोतक संध्योपासना करनेका फल
प्राप्त होता हे। विधिनन्दिनि! वहीं योनिद्रार है। वहाँ
जानेसे मनुष्य योनि-संकटसे सदाके लिये मुक्त हो
जाता हे। जो मनुष्य शुक्ल ओर कृष्ण दोनों पक्षोमें
गयातीर्थमें निवास करता हे, वह अपने कुलको सात
पीदियोको पवित्र कर देता हे। सुभगे! तदनन्तर महान्
फलदायक धर्मपुष्ठ नामक तीर्थमें जाय, जहाँ पित्रलोकका
पालन करनेवाले साक्षात् धर्मज विराजमान हं । वहां
जानेये मनुष्य अश्वमेध-यक्ञका फल पाता हे । तदनन्तर
त-न» (4 9
गयामें प्रथम ओर द्वितीय दिनके कृत्यका वर्णन, प्रेतशिला आदि तीथमिं
पिण्डदान आदिकी विधि ओर उन तीर्थोको महिमा
पुरोहित वसु कहते है -- मोहिनी ! सुनो, अव | करता टे। प्रभासात्रिने शिलाके चरणप्रान्तकी
मै प्रेतशिलाका पवित्र माहात्म्य बतलाता दँ, जह | आच्छादित कर रखा टै। मुनियोमे संतुष्ट हुए
पिण्डदान करके मनुष्य अपने पितरोंका उद्धार। प्रभास शिलाक अ्गु्टभागस प्रकट् दृध । अद्रुषटमागमं
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ही भगवान् शङ्कर स्थित हें । इसलिये वे प्रभासेश
कहे गये हैं । शिलाके अद्खृष्ठका जो एक देश हे
उसीमें प्रभासेशको स्थिति है ओर वहीं प्रेतशिलाको
स्थिति हे। वहां पिण्डदान करनेसे मनुष्य प्रेतयोनिसे
मुक्त हो जाता है, इसीलिये उसका नाम "प्रेतशिला"
हे। महानदी तथा प्रभासात्रिके सङ्खममें स्नान करनेवाला
पुरुष साक्षात् वामदेव (शिव) - स्वरूप हो जाता हे ।
इसीलिये उक्त सङ्खगमको वामतीर्थ' कहा गया हे ।
देवताओंके प्रार्थना करनेपर भगवान् श्रीरामने जब
महानदीमें स्नान किया, तभीसे वरहो सम्पूर्णं लोकोको
पवित्र करनेवाला ' रामतीर्थ" प्रकट हुआ। मनुष्य
अपने सहस्रं जन्मोमें जो पापराशि संग्रह करते है,
वह सब रामतीर्थमें स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाती
हे। जो मनुष्य-
राम राम महाबाहो देवानामभयंकर॥।
त्वां नमस्ये तु देवेश मम नश्यतु पातकम्।
(ना० उत्तर० ४५ । ८-९)
"महाबाहु राम! देवताओंको अभय देनेवाले
श्रीराम ! आपको नमस्कार करता हूं। देवेश! मेरा
पातक नष्ट हो जाय ।'
-इस मन्त्रद्रारा रामतीर्थमें स्नान करके श्राद्ध
एवं पिण्डदान करता हे, वह विष्णुलोके प्रतिष्ठित
होता है। प्रभासेश्वरको नमस्कार करके भासमान
शिवके समीप जाना चाहिये ओर उन भगवान्
शिवको नमस्कार करके यमराजको बलि दे ओर
इस प्रकार कहे-' देवेश! आप ही जल हं तथा
आप ही ज्योतियोके अधिपति हैं। आप मेरे मन,
वचन, शरीर ओर क्रियाद्वारा उत्पन्न हए समस्त
पापका शीघ्र नाश कोजिये।' शिलाके जघन प्रदेशको
यमराजने दबा रखा हे । धर्मराजने पर्वतसे कहा-'न
गच्छ' (गमन न करो-हिलो-डलो मत), इसलिये
पर्वतको “नग कहते हैं । यमराजको बलि दनक
पश्चात् उनके दो कुत्तको भी अन्नरकी वलि या पिण्ड
देना चाहिये। उस समय इस प्रकार कटे-
संक्षिप्त नारदपुराण
' वैवस्वतकुलमें उत्पन्न जो दो श्याम ओर सबल
नामवाले कुत्ते है, उनके लिये में पिण्ड दूंगा। ये
दोनों हिंसा न करे ।' तत्पश्चात् प्रेतशिला आदि तीर्थमे
घृतयुक्तं चरुके द्वारा पिण्ड बनावे ओर पितरोका
आवाहन करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उनके लियं पिण्ड
दे । प्रेतशिलापर पवित्रचित्त हो जनेऊको अपसव्य
करके दक्षिण दिशाकी ओर मुंह किये हुए पितरोका
ध्यान एवं स्मरण करे-' कव्यवाहक, अनल, सोम,
यम, अर्यमा, अग्रिष्वात्त, बवर्हिषद् ओर सोमपा-
ये सब पितु-देवता हें । हे महाभाग पितृदेवताओ।
आप यहाँ पधार ओर आपके द्वारा सुरक्षित मेरे
पितर एवं मेरे कुलमें उत्पन्न हुए जो भाई-वन्धु हों
वे भी यहाँ आवें । मैं उन सबको पिण्ड देनेके लिये
इस गयातीर्थमे आया हू । वे सब-के-सव इस श्राद्ध-
दानसे अक्षय तृप्तिलाभ कर।'
तत्पश्चात् आचमन करके पञ्चाङ्ग-न्यासपूर्वक
यलतः प्राणायाम करे; फिर देश-काल आदिका
उच्चारण करके "अस्मत् पितृणां पुनरावृत्तिरहित-
ब्रह्मलोकातिहेतवे गयाश्राद्धमहे करिष्ये" (अपने
पितरोको पुनरावृत्तिरहित ब्रह्मलोककी प्राति करानेके
लिये में गयाश्राद्ध करूगा) एेसा संकल्प करके
शास्त्रोक्त क्रमसे विधिपूर्वक श्राद्ध करे। पहले श्राद्धके
स्थानको पृथक्-पृथक् पञ्चगव्यसे सीचकर पितरोका
आवाहन-पूजन करे । तत्पश्चात् मन्त्रोद्रारा पिण्डदान
करे। पहले सपिण्ड पितरोको श्राद्धका पिण्ड देकर
उनके दक्षिण भागमें कुश बरछछाकर उनके लिये एक
बार तिल ओर जलको अञ्जलि दे। अञ्जलिम तिल
ओर जल लेकर यतपूर्वक पितृतीर्थसे उनके लिये
अञ्जलि देनी चाहिये; फिर एक मुदरी सतूसे अक्षय्य
पिण्ड दे। पिण्डद्रव्योमें तिल, घी, दही ओर मधु
आदि मिलाना चाहिये । सम्बन्धियोका तिल आदिके
द्वारा कुशोंपर आवाहन करना चाहिये । श्राद्धमं माता,
पितामही ओर प्रपितामहीके लिये जो तीन मन्त्र
वाक्य बोले जाते टै, उनमें यथास्थान स्त्रीलिङ्गका
((-0. 1\॥८11114/5511॥1 81188 \/8181185। (01661010. 14111260 0 6810011
उत्तरभाग
उच्चारण करना चाहिये। सम्बन्धियोके लिये भी
पूर्ववत् पितरोका आवाहन करते हुए पहलेकी
भोति पिण्ड दे। अपने गोत्रमें या पराये गोत्रमें पति-
पत्रीके लिये पिण्ड देते समय यदि पृथक् -पृथक्
श्राद्ध, पिण्डदान ओर तर्पण नहीं किया गया तो
वह व्यर्थं हे। पिण्डपात्रमे तिल देकर उसे शुभ
जलसे भर दे ओर मन्त्रपापूर्वक उस जलसे
प्रदक्षिणक्रमसे उन सब पिण्डोको तीन बार सीचे।
तत्पश्चात् प्रणाम करके क्षमा-प्रार्थना करे। तदनन्तर
पितरोका विसर्जन करके आचमन करनेके पश्चात्
साक्षी देवताओंको सुना दे। मोहिनी ! सब स्थानोमें
इसी प्रकार पिण्डदान करना चाहिये ।
गयामं पिण्डदानके लिये समय एवं मुहूर्तका
विचार नहीं करना चाहिये । मलमास हो, जन्मदिन
हो, गुरु ओर शुक्र अस्त हों, अथवा वृहस्पति
सिंहराशिपर स्थित हों तो भी गयाश्राद्धं नहीं
छोडना चाहिये। संन्यासी गयामें जाकर दण्ड
दिखावे, पिण्डदान न करे। वह विष्णुपदमे दण्ड
रखकर पितरोसहित मुक्त हो जाता है। गयामे खीर,
सत्ते. आटा, चरु अथवा चावल आदिसे भी
पिण्डदान किया जाता है। सुभगे! गयाजीका दर्शन
करके महापापी ओर पातको भी पवित्र एवं श्राद्ध-
कर्मका अधिकारी हो जाता है ओर श्राद्ध करनेपर्
वह ब्रह्मलोकका भागी होता हे। फल्गुतीर्थमें श्राद्ध
करनेवाला मनुष्य जिस फलको पाता ठै, उसे जो
एक लाख अश्वमेध-यज्चोका अनुष्ठान करता ठे, वह
भी नहीं पाता। मनुष्यको गयामं जाकर अवश्य
पिण्डदान करना चाहिये । वहकि पिण्ड पितरोको
अत्यन्त प्रिय है। इस कार्यमे न तौ विलम्ब करना
चाहिये ओर न विघ्न डालना चा्हिये।
( श्राद्धकर्तको गयमिं इस प्रकार प्रार्थना करनी
चाहिये-) पिता, पितामह, प्रपितामह, माता,
[ 1183 ] सं० ना० पु०२२-
प्रमातामह आदि (अर्थात् वृद्धप्रमातामह, मातामही,
प्रमातामही ओर वृद्धप्रमातामही)-इन सवके
लिये मेरा दिया हुआ पिण्डदान अक्षय होकर प्राप्त
हो । मेरे कुले जो मरे है, जिनको उत्तम गति नहीं
हई है, उनके उद्धारके लिये मै यह पिण्ड देता हू।
मेरे भाई-बन्धुओकि कुलमें जो लोग मरे ह ओर
जिनकी उत्तम गति नहीं हुई है, उनके उद्धारके
लिये मँ यह पिण्ड देता हूं। जो फोंसीपर लटककर्
मरे है, जहर खाने या शस्त्रोके आघातसे जिनकी
मृत्यु हुई है ओर जो आत्मघाती है, उनके लिये म॑
पिण्ड देता हूं। जो यमदूतोके अधीन होकर सव
नरकोमिं यातनां भोगते है, उनके उद्धारके लिये मे
यह पिण्डदान करता दँ। जो पशुयोनिमें पडे ई,
पक्षी, कीट एवं सर्पका शरीर धारण कर चुके है
अथवा जो वृक्षोकी योनिम स्थित टै, उन सबके लिये
मै यह पिण्ड देता हूं द्युलोक, अन्तरिक्ष ओर पृथ्वीपर
स्थित जो पितर ओर भाई-बन्धु आदि ह तथा
संस्कारहीन अवस्थामें जिनको मृत्यु दई टै, उनके
लिवि म पिण्ड देतार्ह। जो मेरे भाई-बन्धु हां
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 0141260 0 66810011
^ > न क कक
६६०
अथवा न हों या दूसरे जन्ममें मेरे भाई-बन्धु रहे
हों, उन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्ड अक्षय
होकर मिले। जो मेरे पिताके कुलमें मरे रहै, जो
माताके कुलमे मरे हे, जो गुरु, शुर तथा बन्धु-
वान्धवोके कुलमें मरे हें एवं इनके सिवा जो दूसरे
भाई-बन्धु मृत्युको प्राप्त हए है, मेरे कुलमें
जिनका पिण्डदान-कर्म नहीं हुआ हे, जो स्त्री-
पुत्रसे रहित हें, जिनके श्राद्धकर्मका लोप हो गया
हे, जो जन्मसे अन्धे ओर पङ्कं रहे ह, जो विकृतरूपवाले
या कच्चे गर्भकौ दशामें मरे हे, मेरे कुलमें मरे
हुए जो लोग मेरे परिचित या अपरिचित हों, उन
सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्ड अक्षयभावसे
प्राप्त हो । ब्रह्मा ओर शिव आदि सब देवता साक्षी
रहें । मेने गयामे आकर पितरोका उद्धार किया
हे। देव गदाधर! में पितृकार्यं (श्राद्ध)-के लिये
गयामें आया हू। भगवन्! आप ही इस बातके
साक्षी हें। मे तीनों ऋणोसे मुक्त हो गया\।
दूसरे दिन पवित्र होकर प्रेतपर्वतपर जाय ओर
वहां ब्रह्यकुण्डमें स्नान करके विद्वान् पुरुष देवता
आदिका तर्पण करे । फिर पवित्र होकर प्रेतपर्वतपर
पितरोका आवाहन करे ओर पूर्ववत् संकल्प
करके पिण्ड दे। परम उत्तम पितृदेवताओंकी
उनके नाम-मन्त्रोद्रारा भली भति पूजा करके उनके
लिये पिण्डदान करे। मनुष्य पितर-कर्ममें जितने
तिल ग्रहण करता है, उतने ही असुर भयभीत
होकर इस प्रकार भागते हँ, जेसे गरुडको देखकर
सपं भाग जाते हें। मोहिनी! उस प्रेतपर्वतपर
पूर्ववत् सब कार्य करे । तत्पश्चात् वहां तिलमिश्रित
सत्तू दे ओर इस प्रकार प्रार्थना करे-
ये केचित्प्रेतरूपेण वर्तन्ते पितरो मम॥
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु सक्तुभिस्तिलमिश्रितेः।
सक्षिप्त नारदपुराण
आब्रह्यस्तम्बपर्यन्तं यत्किञ्चित् सचराचरम् ॥
मया दत्तेन पिण्डेन तृत्िमायान्तु सर्वशः।
(ना० उत्तर० ४५। ६४-६६)
"जो कोई मेरे पितर प्रेतरूपमें विद्यमान है, वे
सब इन तिलमिश्रित सत्तुओंके दानसे तृपि-लाभ
कररे। ब्रह्माजीसे लेकर कोटपर्यन्त जो कुछ भी
चराचर जगत् हं, वह मेरे दिये हुए पिण्डसे पूर्णतः
तृप्त हो जाय।'
सबसे पहले पांच तीर्थमिं तथा उत्तरमानसमें
श्राद्ध करनेको विधि दहै। हाथमे कुश लेकर
आचमन करके कुशयुक्त जलसे अपना मस्तक
सींचे ओर उत्तरमानसमें जाकर मन्त्रोच्यारणपूर्वक
स्नान करे। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करनी
चाहिये-
उत्तरे मानसे स्नानं करोम्यात्मविशुद्धये।
सूर्यलोकादिसम्प्रािसिद्धये पितृमुक्तये ॥ ६८॥
"मे उत्तरमानसमें आत्मशुद्धि, सूर्यादि लोकोंकी
प्राति तथा पितरोकी मुक्तिके लिये स्नान करता हू।'
इस प्रकार स्नान करके विधिपूर्वक देवता
आदिका तर्पण करे ओर अन्तमं इस प्रकार कहे-
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितुमानवाः।
तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः ॥ ६९-७०॥
'ब्रह्माजीसे लेकर कौटपर्यन्त समस्त जगत्,
देवता, ऋषि, दिव्य पितर, मनुष्य, पिता, पितामह,
प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह
ओर प्रमातामह आदि सब लोग तृप्त हो जायं ।'
अपनी शाखाके गृह्यसूत्रमे बतायी हुई विधिके
अनुसार पिण्डदानसहित श्राद्ध करना चाहिये।
अष्टकाश्राद्ध, आभ्युदयिकश्राद्ध, गयाश्राद्ध तथा
क्षयाह तिथिको किये जानेवाले एकोदिष्ट श्राद्धमे
माताके लिये पृथक् श्राद्ध करना चाहिये ओर
१.साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रद्येशानादयस्तथा। मया गयां समासाद्य पितृणां निष्कृतिः कृता ॥
आगतोऽस्मि गयां देव पितकार्य
गदाधर। त्वमेव साक्षी भगवन्ननृणोऽहमृणत्रयात्॥
(ना० उत्तर० ४५। ५८-५९)
((-0. 1/(11114<511॥1 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
~ [ इ 7 1
उत्तरभाग
अन्यत्र पतिके साथ ही संयुक्तरूपसे उसके लिये
श्राद्ध करना उचित हे। तदनन्तर-
ॐ नमोऽस्तु भानवे भत्रे सोमभोमज्नरूपिणे।
जीवभार्गवशनेश्चवरराहुकेतुस्वरूपिणे ॥७२।
" सोम, मद्धल, वुध, वृहस्पति, शक्र शनेश्चर, राह
तथा केतु--ये सब जिनके स्वरूप हे, सबका भरण-
पोषण करनेवाले उन भगवान् सूर्यको नमस्कार हे।'
--इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यको नमस्कार करके
उनकी पूजा करे। एेसा करनेवाला पुरुप अपने
पितरोको सूर्यलोकमें पहुंचा देता हे । मानसरोवर
पूर्वोक्त प्रेतपर्वत आदिसे यहां उत्तरमें स्थित हे
इसलिये इसे उत्तरमानस कहते हं । उत्तरमानससे
मोन होकर दकषिणमानसकी यात्रा करनी चाहिये ।
उत्तरमानससे उत्तर दिशामे उदीची नामक तीर्थ हे
जो पितरोंको मोक्ष देनेवाला हे। उदीची ओर
मुण्डपृष्ठके मध्यभागमें देवताओं, ऋषियों तथा
मनुष्योको तृप्त करनेवाला कनखलतीर्थं हे, जो
पितरोको उत्तम गति देनेवाला है। वहां स्नान
करके मनुष्य वबुकनककी भति प्रकाशित होता है
ओर अत्यन्त पवित्र हो जाता है; इसीलिये वह
परम उत्तम तीर्थं लोकमें कनखल नामसे विख्यात
है । कनखलसे दक्षिण भागमें दक्षिणमानसतीर्थ है।
दक्षिणमानसमे तीन तीर्थं बताये गये है। उन
सवमें विधिपूर्वक स्नान करके पृथक् - पृथक् श्राद्ध
करना चाहिये । सनानके समय निम्राङ्भित मन्रका
उच्चारण करे-
दिवाकर करोमीह स्नानं दश्चिणमानसे।
व्रह्महत्यादिपापौघघातनाय विमुक्तये ॥ ७८-७९॥
' भगवन् दिवाकर! मँ ब्रह्महत्या आदि पापोके
समुदायका नाश करने ओर मोक्ष पानेके लिये यहां
दक्षिणमानसतीर्थमें स्नान करता दू ।'
यहाँ स्रान-पृजन आदिं करके पिण्डसहित
श्राद्ध करे ओर अन्तमें पुनः भगवान् मूर्यको प्रणाम
करते हए निग्राह्भित वाक्य कटै--
नमामि सूर्य व्ृप्त्यर्थ पितृणां तारणाय च।
पुत्रपोत्रधनेश्च्यद्यायुरारोग्यवृद्धये ॥८०॥
"मे पितरोकौ तृति तथा उद्धारके लिये ओर
पुत्र, पौत्र, धन, एश्र्य आदि आयु तथा आरोग्यकी
वृद्धिके लिये भगवान् सूर्यको प्रणाम करता दं ।'
इस प्रकार मौनभावसे सूर्यका दर्शन ओर
पूजन करके नीचे लिखे मन््रका उच्चारण करे-
कव्यवाडादयो ये च पितृणां देवतास्तथा।
मदीयः पितृभिः साद्धं तर्पिताः स्थ स्वधाभुजः॥८१-८२॥
` कव्यवाड, अनल आदि जो पितरोके देवता
हे, वे मेरे पितरोके साथ तृप्त होकर स्वधाका
उपभोग करें ।'
वहासि सव तीर्थेमिं परम उत्तम फल्गुतीर्थको
जाय। वहां श्राद्ध करनेसे सदा पितरोंकी तथा
श्राद्धकर्ताकी भी मुक्ति होती हे। पूर्वकालमं ब्रह्मजीकौ
प्रार्थनासे भगवान् विष्णु स्वयं फल्गुरूपमे प्रकर
हए थे। दक्षिणाप्रिमें ब्रह्माजीके द्वारा जो हीम
किया गया, निश्चय ही उसीसे फल्गुतीर्थका
प्रादुभवि हआ; जिसमें सान आदि करनेसे घरक
लक्ष्मी फलती-फूलती हे, गौ कामधेनु होकर
मनोवाच्छित फल देती है तथा वर्हांका जल ओर
भूतल भी मनोवाच्छित फल देता है। मुष्टिक
अन्तर्गत फल्गुतीर्थं कभी निष्फल नहीं होता ।
समस्त लोको जो सम्पूर्ण तीर्थं है, वे सव
फल्गुतीर्थमें स्नान करनेके लिये आते है । गङ्गाजी
भगवान् विष्णुका चरणोदक रै ओर फल्गुरूपमं
साक्षात् भगवान् आदिगदाधर प्रकट हुए ट। वै
स्वयं ही द्रव (जल) -रूपमें विराजमान है, अतः
फल्गुतीर्थको गद्कासे अधिक माना गया दै।
फल्गुके जलें खान करनेसे सहस्र अश्रमध-
यज्ञोका फल प्राप्त होता टै। (उसमं स्नान करते
समय निमप्राद्भित मन्त्रका उच्चारण करना चादिय-- )
फल्गुतीर्थे विष्णुजले करोमि स््रानमद्य वे।
पितृणां विथ्णुलोकराय भुक्तिमक्तिप्रसिद्धये ॥८८ ॥
((-0. 1\/॥८1114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
६६२
"भगवान् विष्णु ही जिसके जल ठै, उस
फल्गुतीर्थमे आज में स्नान करता ह| इसका
उदेश्य यह है कि पितरोंको विष्णुलोककी ओर
मुस्र भोग एवं मोक्षकी प्राति हो।'
फल्गुतीर्थमें स्नान करके मनुष्य अपने गृह्यसूत्रे
वतायी हई विधिके अनुसार तर्पण एवं पिण्डदानपूर्वक
श्राद्ध करे। तत्पश्चात् शिवलि ङ्गरूपमं स्थित ब्रह्माजीको
नमस्कार करे-
नमः शिवाय देवाय इईशानपुरुषाय च।
अघोरवामदेवाय सद्योजाताय शम्भवे ॥ ९०॥
"ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा
सद्योजात-इन पाच नामोसे प्रसिद्ध कल्याणमय
भगवान् शिवको नमस्कार हे।'
इस मन्त्रसे पितामहको नमस्कार करके उनको
पृजा करनी चाहिये । फल्गुतीर्थमें स्नान करके यदि
मनुप्य भगवान् गदाधरका दर्शन ओर उनको
नमस्कार करे तो वह पितरोंसहित अपने-आपको
वेकुण्ठधाममें ले जाता हे! (भगवान् गदाधरको
नमस्कार करते समय निम्राद्भित मन्त्र पना
चाहिये- )
ॐ नमो वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च।
प्रदयम्रायानिरु द्धाय श्रीधराय च विष्णवे ॥ ९२-९३॥
` वासुदेव, संकर्षण, प्रदयुप्र तथा अनिरुद्ध-
इन चार व्यृहोंवाले सर्वव्यापी भगवान् श्रीधरको
नमस्कार हे।'
पोच तीर्थोमिं स्नान करके मनुष्य अपने
पित्तरोको ब्रह्मलोकमें पहुंचाता हे। जो भगवान्
गदाधरको पांच ती्थकि जलसे स्नान कराकर
उन्हे पुष्प ओर वस्त्र आदिमे सुशोभित नहीं
करता, उसका किया हुआ श्राद्ध व्यर्थं होता हे।
नागकूट, गृध्रकरर, भगवान् विष्णु तथा उत्तरमानस--
इन चारोके मध्यका भाग 'गयाशिर' कहटलाता
संक्षिप्त नारदपुराण
है । इसीको फल्गुतीर्थं कहते हें । मुण्डपृष्ठ पर्वतके
नीचे परम उत्तम फल्गुतीर्थं हें । उसमें श्राद्ध आदि
करनेसे सव पितर मोक्षको प्राप्त होते हें । यदि
मनुष्य गयाशिरतीर्थमें शमीपत्रके बराबर भी
पिण्डदान करता है तो वह जिसके नामसे पिण्ड
देता हे, उसे सनातन ब्रह्मपदको पहुंचा देता हे ।
जो भगवान् विष्णु अव्यक्त रूप होते हुए भी
मुण्डपृष्ठ पर्वत तथा फल्गु आदि ती्थकि रूपमे
सवके सामने अभिव्यक्त हें, उन भगवान् गदाधरको
मे नमस्कार करता हूं। शिला पर्वत तथा फल्गु
आदि रूपमे अव्यक्तभावसे स्थित हए भगवान्
श्रीहरि आदिगदाधररूपसे सवके समक्ष प्रकट
हए हं ।
तदनन्तर धममरिण्यतीर्थको जाय, जहां साक्षात्
धर्म विराजमान हें । वहां मतद्कवापीमें स्नान करके
तर्पण ओर श्राद्ध करे। फिर मतङ्ेश्वरके समीप
जाकर उन्हं नमस्कार करते हुए निम्राङ्भित मन्त्रका
उच्चारण करे-
प्रमाणं दवताः शभ्भूर्लोकपालाश्च साक्षिणः ।
मयागत्य मतद्धऽस्मिन् पितृणां निष्कृतिः कृता ॥ १०१-१०२॥
"सव देवता ओर भगवान् शङ्कर प्रमाणभूत हं
तथा समस्त लोकपाल भी साक्षी है। मैने इस
मतद्घतीर्थमे आकर पितरोका उद्धार किया है- उनका
ऋण चुकाया हे।'
पहले ब्रह्यतीर्थमें, फिर ब्रह्मकूपमे श्राद्ध
आदि करे। कूप ओर यूपके मध्यभागमें श्राद्ध
करनेवाला पुरुष पितरोंका उद्धार कर देता हे।
धर्मेश्वर धर्मको नमस्कार करके महाबोधि वृक्षको
प्रणाम करे। मोहिनी! यह दूसरे दिनका कृत्य
मेने तुम्हें वताया है। स्नान, तर्पण, पिण्डदान,
पूजन ओर नमस्कार आदिके साथ किया हुआ
श्राद्धकर्म पितरोंको सुख देनेवाला होता है।
[कि ४
१ 4 7
((-0. 1\/॥८11104/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 6810011
उत्तरभाग ६६३
गयामें तीसरे ओर चौथे दिनका कृत्य, ब्रह्मतीर्थं तथा विष्णुपद आदिकी महिमा
पुरोहित वसु कहते ह - मोहिनी ! अव मं तुम्हं
गयाजीमें तीसरे दिनका कृत्य बतलाता हू, जो
भोग ओर मोक्ष देनेवाला हे । उसका श्रवण गया-
सेवनका फल देनेवाला है । "ब्रह्मसर' में स्नान
करके पिण्डसहित श्राद्ध करना चाहिये । (नानक
समय इस प्रकार कहे-)
स्नानं करोमि तीर्थेऽस्मिन्नृणत्रयविमुक्तये ॥
श्राद्धाय पिण्डदानाय तर्पणायार्थसिद्धये।
(ना° उत्तर० ४६। २-३)
"मे तीनों ऋणोसे मुक्ति पाने, श्राद्ध, तर्पण एवं
पिण्डदान करने तथा अभीष्ट मनोरथोकी सिद्धिके
लिये इस तीर्थमें सान करता हू ।'
ब्रह्मकूप ओर ब्रह्मयूपके मध्यभागमें सान, तर्पण
एवं श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने पितरोको उद्धार
कर देता है। स्नान करके "ब्रह्मयूप ' नामसे प्रसिद्ध
जो ऊँचा यूप है, वहाँ श्राद्ध करे। ब्रह्मसरमं श्राद्ध
करके मनुष्य अपने पितरोको ब्रह्मलोकमें पर्हुचा देता
है। गोप्रचारतीर्थके समीप ब्रह्माजीके द्वारा उत्पन्न किये
हए आप्रवृक्ष है, उनको सीचनेमात्रसे पितृगण मोक्ष
प्राप्त कर लेते हैं। [आग्नवृक्षको सींचते समय
निप्राङ्कित मन््रका उच्चारण करे]
आप्र ब्रह्मसरोद्धूतं सर्वदेवमयं विभुम्।
विष्णुरूपं प्रसिञ्चामि पितृणां चैव मुक्तये ॥ ६॥
'ब्रह्मसरमें प्रकर हआ आघ्रवृक्ष सर्वदेवमय
हे, वह सर्वव्यापी भगवान् विष्णुका स्वरूप हे । मेँ
पितरोकी तृ्िके लिये उसका अभिपेक करता दू ।'
एक मुनि हाधमें जलसे भरा हआ घडा ओर
कुशका अग्रभाग लेकर आमकौ जडम पानी दे रहे
थे । उन्होने आमको भी सचा ओर पितरांको भी
तृप्त किया। उनकी एक ही क्रिया दो प्रयोजनोंको
सिद्ध करनेवाली हई । ब्रह्मयूपकी परिक्रमा करके
मनुष्य वाजपेय-यज्ञका फल पाता है ओर ब्रद्माजीको
नमस्कार करके अपने पितरोको ब्रह्मलोके ले
जाता हे । (निम्राङ्धित मन्त्रसे ब्रह्माजीको नमस्कार
करना चाहिये- )
ॐ नमो ब्रह्मणेऽजाय जगजन्मादिकारिणे।
भक्तानां च पितृणां च तारकाय नमो नमः ॥ ९॥
"जगत्क्री सृष्टि, पालन आदि करनेवाले सचिदानन्द-
स्वरूप अजन्मा ब्रह्माजीको नमस्कार हे। भक्तों ओर
पितरकि उद्धारक पितामहको बारम्बार नमस्कार हे।'
तत्पश्चात् निम्राद्भित मन््रसे इद्दिय- संयमपूर्वक
यमराजके लिये बलि दे-
यमराजधर्मराजौ निश्रलार्था इति स्थितौ।
ताभ्यां बलिं प्रयच्छामि पितृणां मुक्तिहेतवे ॥ १०-११॥
"यमराज ओर धर्मराज--दोनां मुरि्थिर प्रयोजनवाले
हें । में पितरोको मुक्तिके लिये उन दानीको ब्रलि
अर्पित करता हू।
मोहिनी ! इसके वाद “द्वौ श्वानौ श्यामशवलौ '-
इत्यादि पूर्वोक्त मन्त्रसे कुत्तोके लिये बलि देकर
नीचे लिखे मन्त्रद्रारा संयमपूर्वक काकवलि समर्पित
करे-
एद्रवारुणवायव्या याम्या वे नेत्रह्ास्तथा।
वायसाः प्रतिगृहणन्तु भूमौ पिण्डं मयार्पितम्॥ १२-१३॥
"पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, वायव्य कोण तथा
नैऋत्यकोणके कौए भूमिपर मेरे दिये हृए इस
पिण्डको ग्रहण करे।'
तत्पश्चात् हाथमे कुश लेकर ब्रह्मतीर्थमं लान
करे । इस प्रकार विद्वान् पुरुष तीसरे दिनका नियम
समाप्त करके भगवान् गदाधरको नमस्कार करे
ओर ब्रह्मचर्य पालन करता र्दे) चौथे दिन
फल्गुतीर्थमें स्नान आदि कार्य करे । फिर गयाशिरमं
"पद ' पर पिण्डदानसदहित श्राद्ध करे । वहा फल्गुती धमं
साक्षात् ' गयाशिर ' का निवास हे । क्रीञ्चपादमे लेक्रर
फल्गृतीर्धतक- साक्षात् गयाशिर दै! गय्ाशिरपर
(-0. ॥\५॥८111111<510 ८108811 \/8/8185। (01601101. [1011260.0/ 66810011
६६
वृक्ष, पर्वत आदि भी हे, कितु वह साक्षात् रूपसे
फल्गुतीर्थस्वरूप हे। फल्गुतीर्थं गयासुरका मुख
हे। अतः वहाँ स्नान करके श्राद्ध करना चाहिये।
आदिदेव भगवान् गदाधर व्यक्त ओर अव्यक्त
रूपका आश्रय ले पितरोको मुक्तके लिये विष्णुपद
आदिके रूपमे विद्यमान हं। वरहो जो दिव्य
विष्णुपद हे, वह दर्शनमात्रसे पापका नाश करनेवाला
हे । स्पर्शं ओर पूजन करनेपर वह पितरोको मोक्ष
देनेवाला हे। विष्णुपदमें पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध
करके मनुष्य अपनी सहस्र पीदियोंका उद्धार
करके उन्हें विष्णुलोक पहुंचा देता है। रुद्रपद
अथवा शुभ ब्रह्मपदमें श्राद्ध करके पुरुष अपने ही
साथ अपनी सौ पीढियोंको शिवधाममें पहुंचा देता
हे ) दक्षिणाग्निपदे श्राद्ध करनेवाला वाजपेय-यक्ञका
ओर गार्हपत्यपदमे श्राद्ध करनेवाला राजसूय-यक्ञका
फल पाता हे। चन्द्रपदमें श्राद्ध करके अश्चमेध-
यन्ञका फल मिलता है। सत्यपदमें श्राद्ध करनेसे
ज्योतिष्टेम-यस्षके फलकी प्रति होती हे। आवसथ्यपदमे
श्राद्ध करनेवाला चन्द्रलोकको जाता है ओर इन्द्रपदमें
श्राद्ध करके मनुष्य अपने पितरोको इन्द्रलोक पहुंचा
देता है। दूसरे-दूसरे देवताओंके जो पद है, उनमें
श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने पितरोको ब्रह्यलोकमें
पटुचा देता है । सबमें काश्यपपद श्रेष्ठ हे । विष्णुपद,
रुद्रपद तथा ब्रह्मपदको भी सर्वश्रेष्ठ कहा गया हे।
मोहिनी ! आरम्भ ओर समापिके दिनमें इनमेसे
किसी एक पदपर श्राद्ध करना श्राद्धकरतकि लिये भी
श्रेयस्कर होता हे।
पूर्वकालमें भीप्मजीने विष्णुपदपर श्राद्ध करते
समय अपने पितरोका आवाहन करके विधिपूर्वक
श्राद्ध किया ओर जब वे पिण्डदानके लिये उद्यत
हए, उस समय गयाशिरमें उनके पिता शन्तनुके
दोनों हाथ सामने निकल आये। परंतु भीप्मजीने
भूमिपर ही पिण्ड दिया, क्योकि शास्त्रमं हाथपर
पिण्ड देनेका अधिकार नहीं दिया गया हे।
सक्षिप्त नारदपुराण
भीष्मके इस व्यवहारसे सन्तुष्ट होकर शन्तनु
बोले--' बेटा! तुम शास्त्रीय सिद्धान्तपर दृढतापूर्वक
डटे हुए हो, अतः त्रिकालदर्शी होओ ओर अन्तमें
तुम्हें भगवान् विष्णुको प्राति हो; साथ ही जव
तुम्हारी इच्छा हो, तभी मृत्यु तुम्हारा स्पर्श करे।'
एेसा कहकर शन्तनु मुक्त हो गये ।
भगवान् श्रीराम रमणीय रुद्रपदमे आकर जव
पिण्डदान करनेको उद्यत हुए. उस समय पिता
दशरथ स्वरग्सि हाथ फलाय हुए वहां आये । कितु
श्रीरामने उनके हाथमें पिण्ड नहीं दिया । शास्त्रको
आज्ञाका उद्लद्न न हो जाय, इसलिये उन्होने
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रुद्रपदपर ही उस पिण्डको रखा। तब दशरथने
श्रीरामसे कहा-“ पुत्र! तुमने मुञ्चे तार दिया।
रुद्रपदपर पिण्ड देनेसे मुञ्चे रुद्रलोककी प्राति हुई
हे। तुम चिरकालतक राज्यका शासन, अपनी
प्रजाका पालन तथा दक्षिणासहित यज्ञोका अनुष्ठान
करके अपने विष्णुलोकको जाओगे । तुम्हारे साथ
अयोध्याके सव लोग, कीडे-मकोडेतक वैकुण्ठधाममं
जायँगे ' श्रीरामसे एेसा कहकर राजा दशरथ परम
उत्तम रुद्रलोकको चले गये।
((-0. 1\॥(11114/5511॥1 21188 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 60810011
उत्तरभाग
कनकेश, केदार, नारसिंह ओर वामन--इनकी
रथमार्गमें पूजा करके मनुष्य अपने समस्त पितरोका
उद्धार कर देता है। जो गयाशिरमें जिनके नामसे
पिण्ड देते हे, उनके वे पितर यदि नरकमें हों तो
स्वर्गमें जाते हँ ओर स्वगमें हों तो मोक्षलाभ करते
हे। जो गयाशिरमें कन्द, मूल, फल आदिके
द्वारा शमीपत्रके बरावर भी पिण्ड देता है, वह
अपने पितरोंको स्वर्गलोके पहुंचा देता है । जहां
विष्णु आदिके पद दिखायी देते हैँ, वहाँ उनके
आगे जिनके पदपर श्राद्ध किया जाता है, उन्हीके
लोकोमे मनुष्य अपने पितरोको भजता है। इन
पदोके द्वारा सर्वत्र मुण्डपृष्ठं पर्वत ही लक्षित होता
हे । वहा पूजित होनेवाले पितर ब्रह्मलोकको प्राप्त
६६५
होते हे । एक मुनि मुण्डपृष्ठमे कौञ्चरूपसे तपस्या
करते थे। उनके चरणोंका चिह्र जहां लक्षित
होता हे, वह क्रोञ्चपद माना गया है। भगवान्
विष्णु आदिके पद यां लिङ्गरूपमें स्थित है।
देवता आदिका तर्पण करके रुद्रपदसे प्रारम्भ
करके श्राद्ध करना चाहिये । मोहिनी! यह चौथे
दिनका कृत्य बताया गया हे। इसे करके मनुष्य
पवित्र एवं श्राद्धकर्मका अधिकारी होता है ओर
श्राद्ध करनेपर वह ब्रह्मलोकका भागी होता है।
शिलापर स्थित तीर्थपिं स्नान ओर तर्पण करके
जिनके लिये पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध किया जाता दहै
वे ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैँ ओर वहां कल्पपर्यन्त
सानन्द निवास करते है।
(नम 1 0४
गयामें पांचवें दिनका कृत्य, गयाके विभिन्न तीर्थोकी प्रथक् -पृथक् महिमा
पुरोहित वसु कहते ह- मोहिनी ! पांचवें दिन
मनुष्य गदालोल-तीर्थमे पूर्ववत् स्नान आदि करके
अक्षयवटके समीप पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करे।
वहो श्राद्ध आदि करके वह अपने पितरोंको
ब्रह्मलोकमें पहुंचा देता है । वहां ब्राह्मणोको भोजन
करावे ओर उनको पूजा करे। अक्षयवटके निकट
श्राद्ध करके एकाग्रचित्त हो वटेश्वरका दर्शन,
नमस्कार तथा पूजन करे। एेसा करनेसे श्राद्धकर्ता
पुरुष अपने पितरोको अक्षय तथा सनातन ब्रह्मलोकमें
भेज देता हे । (गदालोल-तीर्थमे स्नान करते समय
इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-)
गदालोले महातीर्थे गदाप्रक्षालने वरे॥
स्नानं करोमि शुद्धयर्थमक्षय्याय स्वराप्तये।
एकान्तरे वटस्याग्रे यः शते योगनिद्रया ॥
बालरूपधरस्तस्मै नमस्ते योगशायिने।
संसारवृक्षशस्त्रायाशेषपापक्षयाय च॥
अक्षय्यन्रह्मदात्रे च नमोऽक्षय्यवटाय वे।
(ना उत्तर ८८ । ४-- 9)
"जहां भगवान्की गदा धोयी गयी है, उस
गदालोल नामक श्रेष्ठ महातीर्थमं म आत्मशुद्धि
तथा अक्षय स्वर्गको प्रािके लिये ख्रान करता हं ।
जो बालरूप धारण करके वरकी शाखाके अग्रभागपर
एकान्त स्थलमें योगनिद्राके द्वारा शयन करते टै
उन योगशायी श्रीहरिको नमस्कार है। जो संसाररूपी
वृक्षका उच्छेद करनेके लिये शस्त्ररूप रहै, जो
समस्त पापका नाश तथा अक्षय ब्रह्यलोक प्रदान
करनेवाले है. उन अक्षयवरस्वरूप श्रीहरिको
नमस्कार टै।'
(इसके बाद लिङ्घस्वरूप प्रपितामहको नमस्कार
करे- )
कलौ माहेश्वरा लोका येन तस्माद् गदाधरः।
लिद्ररूपोऽभवत्तं च वन्द् त्वां प्रपितापहम्॥ ७-८॥
'"कलियुगमें लोग प्रायः शिवभक्त होत रै,
इसलिये भगवान् गदाधर वर्ह शिवलिद्घरूपमे प्रकट
हुए टै। प्रभा! आप पित्तामह ब्रह्याके भी पिता निमे
प्रपितामहरूप है। मैं आपको प्रणाम करता द्ं।'
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६६६
इस मन्त्रसे उन प्रपितामहदेवको नमस्कार
करके मनुष्य अपने पितरोको रुद्रलोकमें पहँचा
देता हे। हेति नामसे प्रसिद्ध एक असुर था;
भगवान्ने अपनी गदासे उस असुरके मस्तकके दो
ट्कडे कर दिये । तत्पश्चात् जहां वह गदा धोयी
गयी, वह गदालोल नामसे विख्यात श्रेष्ठ तीर्थ हो
गया। हेति राक्षस ब्रह्माजीका पुत्र था। उसने बडी
अद्भुत तपस्या को। तपस्यासे वरदायक ब्रह्मा
आदि देवताओंको सन्तुष्ट करके यह वर मोँगा-"में
देत्य आदिसे, शस्त्र आदिसे, नाना प्रकारके मनुष्योसे
तथा विष्णु ओर शिव आदिके चक्र एवं त्रिशूल
आदि आयुधोद्रारा अवध्य ओर महान् बलवान्
होऊ।' "तथास्तु ' कहकर देवता अन्तर्धान हो गये ।
तव हेतिने देवताओंको जीत लिया ओर स्वयं
इन्द्रपदका उपभोग करने लगा। तब ब्रह्मा ओर
शिव आदि देवता भगवान् विष्णुकी शरणमे गये
ओर बोले-' भगवन्! हेतिका वध कीजिये ।'
भगवानूने कहा-' देवताओ ! हेति तो समस्त सुर
ओर असुरोके लिये अवध्य हे। तुम लोग मुञ्चे कोई
ब्रह्माजीका अस्त्र दो, जिससे में हेतिको मारू।'
उनके एेसा कहनेपर ब्रह्मादि देवताओने भगवान्
विष्णुको वह गदा दे दी ओर कहा-“उपेन्र |
आप हेतिको मार डालिये।' देवताओंके एेसा
कहनेपर भगवानूने वह गदा धारण की। फिर
युद्धमें गदाधरने गदासे हेतिको मारकर देवताओंको
स्वर्गलोक लोटा दिया।
तदनन्तर महानदीम स्थित गायत्री-तीर्थमें
उपवासपूर्वक स्नान करके गायत्रीदेवीके समक्ष
सन्ध्योपासना करे। वहां पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध
करके मनुष्य अपने कुलको ब्राह्मणत्वकी ओर ले
जाता है। समुद्यत-तीर्थमे स्नान करके सावित्री-
देवीके समक्ष मध्याहकालकी सन्ध्योपासना करके
द्विज अपने पितरोको ब्रह्मलोकमें पहुंचा देता हे ।
तत्पश्चात् प्राची सरस्वतीमें स्नान करके सरस्वती -
संक्षिप्त नारदपुराण
देवीके समक्ष सायंकालीन सन्ध्योपासना करके मनुष्य
अपने कुलको सर्वज्ञताकी प्राति कराता है। वह
अनेक जन्मोतक किये हुए सन्ध्यालोपजनित पापसे
सर्वथा शुद्ध हो जाता हे। विशालामें लेलिहान-
तीर्थम, भरताश्रममें पदाङ्किति-तीर्थमे, मुण्डपृष्ठमे
गदाधरके समीप, आकाशगङ्गातीर्थमे तथा गिरिकर्ण
आदिमे श्राद्ध एवं पिण्डदान करनेवाला, गोदा
वेतरणीमें सान करनेवाला एवं देवनदीमे, गोप्रचारमें
मानसतीर्थमे, पदस्वरूप-ती्थमिं, पुष्करिणीमे,
गदालोल-तीर्थमें, अमरतीर्थमे, कोरितीर्थमें तथा
रुक्मकुण्डमें पिण्ड देनेवाला पुरुष अपने पितरोको
स्वर्गलोकमं पहुंचा देता है । सुलोचने ! मार्कण्डेयेश्वर
तथा कोटीश्वरको नमस्कार करके मनुष्य अपने
पितरोको तार देता हे तथा पुण्यदायिनी पाण्डुशिलाका
दर्शनमात्र करनेसे मानव अपने नरकनिवासी पितरोको
भी पवित्र करके उन्हें स्वर्गलोके पहंचाता हे।
पाण्डुशिलाके विषयमे यह उदार प्रकट करके
राजा पाण्डु अविनाशी शाश्वत पदको प्राप्त हए थे।
घृतकुल्या, मधुकुल्या, देविका ओर महानदी-ये
शिलामें संगत होकर मधुस्रवा कही गयी है । वहां
स्नान करनेसे मानव दस हजार अश्वमेध-यज्ञोका
फल पाता है।
दशाश्चमेधतीर्थं ओर हंसतीर्थे श्राद्ध करनेसे
श्राद्धकर्ता स्वर्गलोकमें जाता है। मतङ्गपदमें श्राद्ध
करनेवाला पुरुष ब्रह्मलोकका निवासी होता हे ।
ब्रह्माजीने विष्णु आदिके साथ शमीगभमिं अग्रिका
मन्थन करके एक नूतन तीर्थको उत्पन्न किया, जो
मन्थोकुण्डके नामसे विख्यात है । वह पितरोको
मुक्ति देनेवाला तीर्थं है। वहां सान करके तर्पण
ओर पिण्डदान करनेसे मनुष्य मोक्षका भागी होता
है। रामेश्वर ओर करकेश्चरको नमस्कार करके
मानव अपने पितरोको स्वग्मिं भेज देता हे।
गयाकूपमं पिण्डदान करनेसे अश्चमेध-यज्ञका फल
प्राप्त होता है । भस्मकूटमें भस्मस्नान करनेसे मनुष्य
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उत्तरभाग ६६७
उनके नामपर कुण्डपृष्ठतीर्थं विख्यात हआ।
पुण्यमय मतङ्गपदमें पिण्डड देनेवाला पुरुष अपने
पितरोको स्वर्गमें पहुंचा देता है। शिलके वायं
हाथमें उद्यन्तक गिरिक स्थापना हई । यहाँ महात्मा
अगस्त्यजीने उदयाचलको ले आकर स्थापित किया
था। वहां पिण्ड देनेवाला पुरुष अपने पितरोको
ब्रह्मलोक भेज देता हे। अगस्त्यजीने अपनी तपस्याके
लिये वहं उद्यन्तक नामक कण्डका निर्माण किया
था। वहो ब्रह्माजी अपनी देवी सावित्री ओर
सनकादि कुमारोके साथ विराजमान है। हाहा, हृद
आदि गन्धर्वनि वहां सद्वीत ओर वाद्यका आयोजन
किया था। अगस्त्यतीर्थमे स्नान करके मध्याहकालपें
सावित्रीको उपासना करनेपर पुरुष कोटि जन्मोंतक
धनाढ्य तथा वेदवेत्ता ब्राह्मण होता हे। अगस्त्यपदमें
स्नान करके पिण्ड देनेवाला पुरुष पितरोंको स्वर्गकी
प्राति कराता हे। जो मनुष्य ब्रह्ययोनिमे प्रवेश करके
निकलता हे, वह योनिसंकटसे मुक्त हो परब्रह्म
परमात्माको प्राप्त होता है । गयाकुमारको प्रणाम
करके मनुष्य ब्राह्मणत्व पाता है। सोमकुण्डमं स्नान
आदि करनेसे वह पितरोको चन्द्रलोककौ प्राति
ठै । काकशिलामें कौओके लिये दी हई बलि
क्षणभरमें मोक्ष देनेवाली है । स्वर्गद्रारेश्वरको नमस्कार
करके मनुष्य अपने पितरोको स्वर्गसे ब्रह्मलोकको
भेज देता है। आकाश-गद्गामें पिण्ड देनेवाला पुरुष
स्वयं निर्मल होकर पितरोको स्वर्गलोकमें भज देता
है। शिलाके दाहिने हाथमे धर्मराजने भस्मकूट
धारण किया था। अतः वहां महादेवजीने अपना
वही नाम रखा है । मोहिनी ! जहाँ भस्मकूट पर्वत
टे, वहीं भस्म नामधारी भगवान् शिव ह । जहा वट्
है वहां वटेश्वर् ब्रह्माजी स्थित ै। उनके सामने
रुकिमिणी-कुण्ड है ओर पश्चिमं कपिला नदी दै।
नदीके तटपर कपिलेश्चर महादेव टै, वहीं उमा आर
सोमको भट हृईं थी । मनुष्य च्पिलामें स्नान करके
कपिलेश्वरको प्रणाम एवं उनक्करा पूजन करे । वहां
अपने पितरोका उद्धार कर देता है। निःक्षीरा-
संगममे स्नान करनेवाले मनुष्यके सारे पाप धुल
जाते हें । रामपुष्करिणीमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष
अपने पितरोको ब्रह्मलोकं पहंचाता है । वशिष्टतीर्थमें
वशिष्टिश्चरको प्रणाम करके मनुष्य अश्मेध-यज्ञके
पुण्यका भागी होता है। धुनेकारण्यमें कामधेनु-
पदोंपर स्नान करके पिण्ड देनेवाला पुरुष वहाकि
देवताको नमस्कार करके पितरोको ब्रह्यलोकमें
पहुंचाता हे। कर्दमालतीर्थमे, गयानाभिमें ओर
मुण्डपृष्ठके समीप स्नान करके श्राद्ध करनेवाला
पुरुष अपने पितरोको स्वर्गलोकमें पहुंचा देता हे ।
चण्डीदेवीको नमस्कार तथा फल्गुचण्डीश नामक
संगमेश्वरका पूजन करनेसे भी पूर्वोक्त फलकी ही
प्राति होती हे। गयागज, गयादित्य, गायत्री,
गदाधर,गया ओर गयाशिर-ये छः प्रकारको गया
मुक्ति देनेवाली हे । श्राद्धकर्ता जिस-जिस तीर्थम
जाय, वहीं जितेन्द्रियभावसे आदिगदाधरका ध्यान
करते हुए ब्राह्मणके कथनानुसार श्राद्ध एवं पिण्डदान
करे। तदनन्तर भगवान् जनार्दनका विधिपूर्वक पूजन
करके दही ओर भातका उत्तम नैवेद्य अर्पण करे-
तत्पश्चात् पिण्डदान करके भगवत्प्रसादसे ही जीवननिर्वाह
करे। दैत्यके मुण्डपृष्ठपर वह शिला स्थित ठे,
इसलिये मुण्डपृष्ठ नामक पर्वत पितरोको ब्रह्मलोक
देनेवाला है। श्रीरामचन्द्रजीके वनमें जानेके बाद
उनके भाई भरत उस पर्वतपर आये थे। उन्होने
पिताको पिण्ड आदि देकर वहाँ रामेश्चरको स्थापना
की थी। जो एकाग्रचित्त होकर वहां स्नान करके
रामेश्चरको तथा राम ओर सीताको नमस्कार करता
ओर श्राद्ध एवं पिण्डदान देता है, वह धर्मात्मा
अपने पितरोके साथ भगवान् विष्णुके लोकमें जाता
हे । शिलाके दक्षिण हाथमें स्थापित मुण्डयपृष्टतीर्थके
समीप श्राद्ध आदि करनेसे मनुष्य अपने समस्त
पितरोको ब्रह्मलोक पर्चा देता हे । कुण्डने सीतागिगिकि
दक्षिण पर्वतपर बडी भारी तपस्या की थी, अतः
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श्राद्धका दान करनेवाला पुरुष स्वर्गलोकका भागी
होता है। महिषीकुण्डपर मङ्खलागोरीका निवास हे,
जो पूजित होनेपर पूर्णं सोभाग्यको देनेवाली हे।
भस्मकूटमें भगवान् जनार्दन हें । उनके हाथमे अपने
या दूसरेके लिये विना तिलके ओर सव्यभावसे भी
पिण्ड देनेवाला पुरुष जिनके लिये दधिमिश्चित
पिण्ड देता हे, वे सब विष्णुलोकगामी होते हे ।
(वहां पिण्ड देकर भगवानूसे इस प्रकार प्रार्थना
करनी चाहिये-- )
एष पिण्डो मया दत्तस्तव हस्ते जनार्दन ।
गयाश्राद्धे त्वया देयो मह्यं पिण्डो मृते मयि॥
तुभ्यं पिण्डो मया दत्तो यमुदिश्य जनार्दन ।
देहि देव गयाशीर्ष तस्मै तस्मे मृते ततः॥
जनार्दन नमस्तुभ्यं नमस्ते पितुरूपिणे।
पितृपात्र॒ नमस्तुभ्यं नमस्ते मुक्तिहेतवे ॥
गयायां पितृरूपेण स्वयमेव जनार्दनः
तं दृष्टा पुण्डरीकाक्षं मुच्यते च ऋणत्रयात् ॥
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष ऋणत्रयविमोचन।
लक्ष्मीकान्त नमस्तेऽस्तु नमस्ते पितुमोक्षद ॥
(ना० उत्तर० ४७। ६३--६७)
' जनार्दन ! मेने आपके हाथमं यह पिण्ड दिया
हे। मेरे मरनेपर आप गयाश्राद्धमे मञ्चे पिण्ड
दीजियेगा। जनार्दन! जिसके उदेश्यसे मेने आपको
पिण्ड दिया हे, देव ! उसके मरनेपर आप गयाशीर्षमे
उसके लिये अवश्य पिण्ड दें । जनार्दन! आप
पितृस्वरूप हे, आपको नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार
हे। पितरोके पात्ररूप नारायण! आपको नमस्कार
हे। आप सबकी मुक्तिके ठेतुभूत हैँ, आपको
नमस्कार है। गयामें साक्षात् जनार्दन ही पितृरूपसे
विद्यमान हें । उन कमलनेत्र श्रीहरिका दर्शन करके
मनुष्य तीनों ऋणोसे मुक्त हो जाता हे । पुण्डरीकाक्ष ।
आपको नमस्कार है। तीनों ऋणोसे मुक्त करनेवाले
लक्ष्मीकान्त ! आपको नमस्कार है। पितरांको मोक्ष
देनेवाले प्रभो! आपको नमस्कार ठै।'
संक्षिप्त नारदपुराण
इस प्रकार कमलनयन भगवान् जनार्दनका
पूजन करके मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता हे । पृथ्वीपर
वायो घुटना गिराकर भगवान् जनार्दनको नमस्कार
करे। तत्पश्चात् पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करनेवाला
पुरुष भाइयोंसहित विष्णुलोकमें जाता हे। शिलाके
वाम भागमें प्रेतकूटगिरि स्थित हे । प्रेतकूटगिरिको
धर्मराजने धारण किया है। वरहा प्रेतकुण्ड हे, जहां
पदोके साथ देवता विद्यमान हें । उसमें स्नान करके
श्राद्ध-तर्पण आदि करनेवाला पुरुष पितरोको प्रेतभावसे
मुक्त कर देता हे। कोकट प्रदेशमे गया, राजगृह
वन, महर्षिं च्यवनका आश्रम, पुनपुना नदी, वैकुण्ठ,
लोहदण्ड तथा शोणग गिरिकूट- ये सब पवित्र हँ ।
उनमें श्राद्ध-पिण्डदान आदि करनेवाला पुरुष पितरोको
ब्रह्मधाममें पर्चा देता हे। शिलाके दक्षिण पादमं
गृध्रकूटगिरि रखा गया हे। धर्मराजने शिलाको
स्थिर रखनेके लिये वहां उस पर्वतको स्थापित
किया है। वह शीघ्र पवित्र करनेवाला है। वहां
'गृघ्रश्चर' नामक भगवान् शिव विराजमान ह।
गृध्रश्चरका दर्शन ओर उनके समीप स्नान करके
मनुष्य शिवधाममें जाता हे । ऋणमोक्ष एवं पापमोक्ष
नामवाले शिवजीका दर्शन करके मनुष्य शिवलोकमं
जाता हे। वहां विघ्नोंका नाश करनेवाले विध्नेश्वर
गणेशजी गजरूपसे निवास करते हें । उनका दर्शन
करके मनुष्य विष्नोसे मुक्त होता है ओर पितरोको
भगवान् शिवके लोकमें पहुंचा देता हे। स्नान
करके गायत्री ओर् गयादित्यका दर्शन करनेसे
मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता हे । प्रथम पादमं विराजमान
ब्रह्माजीका दर्शन करके पुरुष अपने पितरोका
उद्धार कर देता है । जो नाभिमें पिण्ड देता है, वह
पितरोको ब्रह्यलोकमें पर्ुचाता हे । मुण्डपृष्टकी शोभाके
लिये श्रेष्ठ कमल उत्पन्न हुआ है । मुण्डपृष्ठ ओर
अरविन्द दोनोंका दर्शन करके मनुष्य सब पापोसे
मुक्त हो जाता हे।
जो हाथियों अथवा सर्पोका अपराध करके मारा
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उत्तरभाग
६६९
गया हे; जो परायी स्त्रियोसे रमण करते समय
उनके पतियोद्ारा मारे गये हैँ; जो गौओंको आगमे
जलाने या विष देनेवाले हँ, पाखण्डी तथा क्रूर
वुद्धिवाले हँ; जो नराधम क्रोधमें आकर प्रायः विष
खा लेते, आगमे जल मरते, अपने ऊपर हथियार
चला लेते, फोसी लगाकर मर जाते, पानीमें डूब
मरते तथा वृक्ष एवं पर्वतसे नीचे कूदकर प्राण
दे देते हे; जो पोच प्रकारकी हत्याके अधिकारी
हे तथा जो महापातकी ह; वे सव-के-सव
वहाकी भस्म रमानेसे आवश्य शुद्ध हो जाते
हे । देवि! इस प्रकार गयातीर्थका उत्तम माहात्म्य
सव पापोको शान्त करनेवाला तथा पितरोको
मुक्ति देनेवाला हे। जो मनुष्य इसे प्रतिदिन अथवा
श्रद्ध एवं पर्वके दिन भक्तिपूर्वक सुनता या
सुनाता हे, वह भी ब्रह्मलोका भागी होता है।
वह कल्याणका आश्रय, पवित्र, धन्य तथा
मानर्वोको स्वर्गीय गति प्रदान करनेवाला है। यह
माहात्म्य यश, आयु तथा पुत्र-पौत्रकी वृद्धि
पतित कहे गये हें। वे गयाकूपके स्रानसे तथा । करनेवाला हे।
9
१ 7 क 7
अविमुक्त क्षेत्र-- काशीपुरीकी महिमा
जाय तो वह मनुष्योंको उत्तम गति देनेवाली है।
नाना प्रकारके पापकर्म करनेवाले मनुष्य भी यहां
आकर अपने पापोंका नाश करके रजोगुणरदित
तथा शुद्ध अन्तःकरणके प्रक्राशसे युक्तं हो जाते
हें । इसे ' वैष्णवक्षेत्र ' तथा ' शैवक्षेत्र' भी कहते है ।
यह सव प्राणियोको मोक्ष देनेवाला है । महापातकं
मनुष्य भी जब भगवान् शिवक्रो नगरी काशीपुरीमं
आता है, तव उसका शरीर संसारके सुदृढ
बन्धनोसे मुक्त हो जाता हे। जो पुण्यात्मा मनुष्य
भगवान् विष्णु या भगवान् शिवेके भक्तं होकर
सबको प्रतिदिन आदरवुद्धिसे देखते हुए इस
त्रम निवास करते है, वे शुद्ध संत पुरुप भगवान्
शङ्करके समान है। वे भय, दुःख ओर पापसे
रहित हो जाते है । उनके कर्मकलाप पूर्णतः शुद्ध
होते है ओर वे जन्म-मृत्युकरे गहन जालका भदन
करके परम मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। काशीका
विस्तार पूर्वसे पश्चिमकी ओर ढाई योजनतक्र टै
ओर दक्षिणसे उत्तरकी ओर असीम वरणातक्र
आधे योजनका विस्तार है। शुभ! असी शुष्क
नदी टै । धगवान् शिवने इस कषत्रका यही विस्तार
बताया टै! क्राशी्मं जी तिपिचण्डेश्चर नामक
मान्धाता बोले- भगवन्! मोहिनीने पितरोको
उत्तम गति देनेवाले गया-माहात्म्यको ।
वेदवेत्ताओमें श्रेष्ठ विप्रवर वसुसे पुनः क्या पृष्ठा ?
वसिष्ठजी बोले- राजन्! सुनो, मोहिनीने पुनः
जो प्रश्र किया, वह बतलाता हू।
मोहिनीने कहा- लोकोद्धारपरायण द्विजश्रष् ।
आपको बारम्बार साधुवाद हे, आप वड़े दयालु
हे। ब्रह्मन्! मैने गयाजीका परम उत्तम पवित्र
माहात्म्य सुना, जो परम गोपनीय ओर पितरोको
सद्रति देनेवाला हे! विप्र ! अव काशीका उत्तम
माहात्म्य बताइये ।
वसिषएठजी कहते है- मोहिनीका यह कथन
सुनकर उसके पुरोहित वसु बोले- सुनो ।
पुरोहित वसुने कहा-- कल्याणमयी काशीपुरी
धन्य ॒है। भगवान् महेश्वर भी धन्य है, जौ
मुक्तिदायिनी वैष्णवपुरी काशीको श्रीहरिसे मोगकर
निरन्तर उसका सेवन करते ह । सनातनदेव भगवान्
शङ्धर श्रीहरिके क्षत्रमें ही विद्यमान है । वे भगवान्
हषीकेशकी पूजा करते हए स्वयं भी देवता
आदिसे पूजित होते हैँ । काशीपुरी तीनों लोकांका
सार है। उस रमणीय नगरीका यदि सेवन किया
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६७०
संक्षिप्त नारदपुराण
शिवलिङ्ग है, उससे उत्तरायण जानना चाहिये ओर
शङ्कुकर्णको दक्षिणायन । वह कारमं स्थित हे।
तदनन्तर पिङ्गला नामक तीर्थं आग्नेय कोणमें
स्थित बताया गया हे। सूखी हई नदी जो असी
नामसे प्रसिद्ध है, उसीको पिङ्गला नाडी समञ्जना
चाहिये । उसीके आस-पास लोलार्कतीर्थ विद्यमान
है। इडा नामको नाडी सोम्या कही गयी हे।
उसीको वरणाके नामसे जानना चाहिये, जहां
भगवान् केशवका स्थान हे। इन दोनोके बीचमें
सुषुम्णा नाडीकी स्थिति कही गयी हे । मत्स्योदरीको
ही सुषुम्णा जानना चाहिये। इस महाक्षेत्रको
भगवान् शिव ओर भगवान् विष्णुने कभी विमुक्त
(परित्यक्त) नहीं किया है ओर न भविष्यमे भी
करेगे। इसीलिये इसका नाम “ अविमुक्त" है ।
शुभे! प्रयाग आदि दुस्तर (दुर्लभ) तीर्थसे भी
काशीका माहात्म्य अधिक है, क्योंकि वहाँ
सबको अनायास ही मोक्षकी प्राप्ति होती दै।
निषिद्ध कर्म करनेवाले जो नाना वर्णके लोग
ह तथा महान् पातको ओर पापोंसे परिपूर्ण
शरीरवाले जो घृणित चाण्डाल आदि है, उन
सबके लिये विद्वानोने अविमुक्तक्षेत्रको उत्तम
ओषध माना है । वहाँ दुष्ट, अन्धे, दीन, कृपण,
पापी ओर दुराचारी सबको भगवान् शिव अपनी
कृपाशक्तिके द्वारा शीघ्र ही परम गतिकी प्राति
करा देते हे । उत्तरवाहिनी गङ्गा ओर पूर्ववाहिनी
सरस्वती अत्यन्त पवित्र मानी गयी हैँ । वहीं
कपालमोचन है। उस तीर्थमे जाकर जो श्राद्धमे
पिण्डदानके द्वारा पितरोंको तृप्त करेगे, उन्हें
परम प्रकाशमान लोकोंकी प्रापि होती है। जो
ब्रह्महत्यारा है, वह भी यदि कभी अविमुक्तक्षेत्र
काशीको यात्रा करे तो उस क्षेत्रके माहात्म्यसे
उसको ब्रह्महत्या निवृत्त हो जाती है । जो परम
पुण्यात्मा मानव काशीपुरीमें गये हँ, वे अक्षय,
अजर एवं शरीररहित परमात्मस्वरूप हो जाते
हें । कुरुक्षेत्र, हरिद्वार ओर पुष्करमें भी वह सद्रति
सुलभ नहीं है, जो काशीवासी मनुष्योको प्राप्त
होती हे । वहो रहनेवाले प्राणियोको सब प्रकारसे
तप ओर सत्यका फल मिलता है, इसमें संशय
नहीं हे। काशीपुरीमें रहनेवाले दुष्कर्मीं जीव
वायुद्रारा उडायी हुई वहांकी धूलिका स्पर्श पाकर
परम गतिको प्राप्त कर लेते हें । जो एक मासतक
वहाँ जितेद्धियभावसे नियमित भोजन करते हए
निवास करता हे, उसके द्वारा भलीभति महापाशुपत-
त्रतका अनुष्ठान सम्पन्न हो जाता है। वह जन्म
ओर मूत्युके भयको जीतकर परम गतिको प्राप्त
होता है। वह पुण्यमयी निःश्रेयसगति तथा योगगतिको
पा लेता हे। सैकड़ों जन्मोमें भी योगगति नहीं प्राप्त
((-0. /८111104/5511॥ 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग ६७१
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को जा सकती; परंतु काशीक्षत्रके माहात्म्य जिनके प्राण वसते है, वे निःसंदेह जीवन्मुक्त है।
भगवान् शङ्करके प्रभावसे उसको प्राप्ति हो जाती है। | अविमुक्तक्षतरमे मृत्युके समय साक्षात् भगवान्
शुभानने ! जो प्रतिदिन एक समय भोजन करके एक | भूतनाथ कर्मप्ररित जीवोकि कानमे मन्त्रोपदेश देते
मासतक काशीमें निवास करता है, वह जीवनभरके | है । स्वयं भगवान् श्रीरामने अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो
पापको एक ही महीनेमें नष्ट कर देता है । जो मानव | अविमुक्तनिवासी कल्याणकारी शिवसे यह कहा है
मृत्युपर्यन्त अविमुक्तकषत्रको नहीं छोडता ओर | कि शिव! तुम जिस-किसरी भी मुमूर्पु जीवके
ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक वहो निवास करता है, वह | दाहिने कानमें मेरे मन््रका उपदेश करोगे, वह मुक्त
साक्षात् शङ्कर होता हे । जो वि्नोसे आहत होकर भी | हो जायगा ।' अतः भगवान् शिवकी कृपाशक्तिसे
काशी नहीं छोडता, वह जरा-मृत्यु तथा इस नशर | अनुगृहीत हो सभी जीव वहां परम गतिको प्राप्त
जन्मसे छूट जाता हे । जो इस देहका अन्त होनेतक | होते हं । मोहिनी ! यह मैने अनविमुक्तकषत्रके संक्षपमे
निरन्तर काशीपुरीका सेवन करते है, वे मृत्युके | बहुत थोडे गुण बताये हैँ । समुद्रके र्रोकी भांति
पश्चात् हंसयुक्तं विमानसे दिव्यलोकोमे जाते हे। | अविमुक्तक्षत्रके गुणोका विस्तार अनन्त है। जो
जिसका चित्त विषयोमें आसक्त हे, जिसने भक्ति | जान-विज्ञानमें निष्ठा रखनेवाल्ले तथा परमानन्दकी
ओर सद्बुद्धि त्याग दी है, एेसा मनुष्य भी इस | प्रातिके इच्छुक है, उनके लिये जो गति वतायी गयी
काशीक्षेत्रमे मरकर फिर संसारवन्धनमें नहीं पड़ता। | है, निश्चय ही काशीमें मरे एको वही गति प्राप्त
पृथ्वीपर यह काशी नामक श्रेष्ठ तीर्थ स्वर्गं तथा| होती हे।
मोक्षका हेतु हे। जो वहां मृत्युको प्राप्त होता हे, | काशीका योगपीठ है श्मशान-तीर्थ, जिसे
उसकी मुक्तिमें कोई संशय नहीं हे । सहस्रं जन्मोंतक | मणिकर्णिका कहते हँ । अप्मने कर्मसे भ्रष्ट हए
योगसाधन करके योगी जिस पदको पाता हे, वही | मनुप्योको भी काशीके श्मशानादि तीर्थमिं मोक्षकौ
परम मोक्षरूप पद काशीमें मृत्यु होनेमात्रसे मनुष्य | प्रापि वतायी गयी है। काडीमें भी अन्य सव
प्राप्त कर लेता हे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, | तीर्थोकी अपेक्षा मणिकर्णिका उत्तम मानी गयी है।
वर्णसंकर, म्लेच्छ, कीट-पतंग आदि पाप-योनिके | वरहा नित्य भगवान् शिवका निवास माना गया है।
जीव, कीडे, चीटियोँ तथा दूसरे-दूसे मृग ओर | वरानने! दस अश्वमेध-यज्ञो्ता जो फल बताया
पक्षी आदि जीव काशीमें समयानुसार (अपने- | गया ठै, उसे धर्मात्मा पुरुष मणिकर्णिका्े स्नान
आप) मृत्यु होनेपर देवेश्वर शिवरूप माने गये हैँ। | करके प्राप्त कर लेता है। जो यहां वेदवेत्ता
शुभे! जो जीव वास्तवमें वहाँ प्राणत्याग करते ह, | ब्राह्मणको अपना धन दान करता है, वह शुभगतिको
वे रुद्र-शरीर पाकर भगवान् शिवके समीप आनन्द | पाता ओर अग्निक भाति तेजसे उद्रीषत होता हि। जो
भोगते है । मनुष्य सकाम हो या निष्काम अथवा वह | मनुष्य वहां उपवास करके ब्राह्यर्णोको तृप्त करता है,
पशु-पक्षीकी योनिमें क्यो न पड़ा हो, अविमुक्तक्षेत्र | वह निश्चय ही सीत्रामणी यज्ञका फल प्राप्त करता
(काशी ) -में प्राण-त्याग करनेपर वह अवश्य ही | है। जो मनुष्य वहां चार व्वत्सतरीसे युक्त सौम्य
मोक्षका भागी होता है, इसमे संशय नहीं हे । जो | स्वभावके तरुण वृषभको छत्र आदिसे चिद्धित
मानव सदा भगवान् शिवकी भक्तिमें तत्पर गहनेवाले | करके छोड़ता है, वह परम -गतिको प्राप्त होता है ।
ओर उनके अनन्य भक्त है, उन्हीके चिन्तनमं | इसमे संदेह नहीं कि वह वितरोकरे साथ पोक्षको
जिनका चित्त आसक्त है ओर भगवान् शिवमं ही | प्राप्त होता है। इस विषयमे अधिक कहनेमे क्या
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` क पपा
६७२
संक्षिप्त नारदपुराण
लाभ, भगवान् शिवकी प्रसन्नताके उदेश्यसे वहां
जो कुछ भी धर्मं आदि किया जाता हे, उसका
फल अनन्त हे । जो अविमुक्तक्षेत्रमे महादेवजीकी
पूजा ओर स्तुति करते हे, वे सब पापोसे मुक्त एवं
अजर-अमर होक्छर स्वर्गमें निवास करते हें। जो
मुक्तात्मा पुरुष एकाग्रचित्त हो इन्द्रिय-समुदायको
संयममे रखकर ध्यान लगाये हुए शतरुद्रीका जप
करते हँ ओर अविमुक्तक्षेत्रमे सदा निवास करते
हे, वे उत्तम द्विज कृतार्थं हो जाते है । यशस्विनी ।
जो काशीमे एक दिन उपवास करेगा, उसे सौ
वर्षोतक उपवास करनेका फल प्राप्त होगा ।
इससे आगे गद्धा ओर वरणाका संगमरूप उत्तम
तीर्थ हे, जो सायुज्य मुक्ति देनेवाला है। जव
व
बुधवारको श्रवण ओर द्वादशीका योग हो, उस
समय उसमें सान करके मनुष्य मोक्षरूप फल पाता
हे । शुभानने! जो वहां उस समय श्राद्ध करता
हे, वह अपने समस्त पितरोंका उद्धार करके
विष्णुलोकमें जाता हे । गङ्खाके साथ वरणा ओर
असीका जो संगम हे, वह समस्त लोकोमें
विख्यात हे; वहो विधिपूर्वक अश्चदान करके
मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जो
मनुष्य वहां भक्तिपूर्वक संगमे श्वरका पूजन करता
हे, वह निग्रह ओर अनुग्रहमें समर्थं साक्षात्
देवदेवेश्वर शिव (-तुल्य) हे । देवेश्वरसे पूर्वमें
भगवान् केशव विद्यमान हँ ओर केशवके पूर्वमे
जगद्विख्यात संगमेश्वर विद्यमान हे ।
| +~ / += द क 9
काशीके तीथं एवं शिवलिङ्खोके दर्शन-पूजन आदिकी महिमा
पुरोहित वस्तु कहते है- सुन्दरि! संगमेश्वर
पीठके वायव्य भागमें राजा सगरके द्वारा स्थापित
किया हुआ चतुर्मुख शिवलिङ्ग है । उससे वायव्य
कोणमे भद्रदेह नामक तालाब ठै, जो गोओंके
दधसे भरा गया है । वह सम्पूर्णं पातकोंका नाश
करनेवाला हे। मोहिनी ! सहस्रो कपिला गोओंके
विधिपूर्वक दान करनेका जो फल है, उसे मनुष्य
वहां रान करनेम्मात्रसे पा लेता है। जब पूर्वाभाद्रपदा
नक्षत्रसे युक्त पूर्णिमा हो, उस समय वहोके लिये
अतिशय पुण्यकाल माना गया हे, जो अश्वमेध-
यज्ञका फल देनेवाला हे। वहीं श्मशानभूमिमें
विख्यात देवी भीष्मचण्डिकाका दर्शन होता हे।
उनको पूजा करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिम नहीं
पड़ता । अन्तकेश्यरसे पूर्व, सर्वेश्वरके दक्षिणभागमें
ओर मातलीश्वरसे उत्तर दिशामें कृत्तिवासेश्वर नामक
शिवलिङ्ग है। देवि ! कृत्तिवासेश्वरका दर्शन ओर
पूजन करके मनुष्य एक ही जन्ममें शिवके समीप
परम गति प्राप्त कर लेता है। सत्ययुगमें पहले
उसका नाम त्र्यम्बकेश्वर' था, त्रेतामें वही
ˆ कृत्तिवासेश्वर ' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। द्वापरमें
उन्हीं भगवान् शिवका नाम "महेश्वर ' कहा जाता हे
तथा कलियुगमें सिद्ध पुरुष उन्हें “ हस्तिपालेश्वर'
कहते हे । यदि सनातन मोक्षप्रद तारकञ्ञान प्राप्त
करनेकी इच्छा हो तो वारवार भगवान् कृत्तिवासेश्चरका
दर्शन करना चाहिये । उन देवाधिदेवका दर्शन
करनेसे त्रह्महत्यारा भी पापमुक्त हो जाता हे।
उनका स्पर्शं ओर पजन करनेपर सम्पूर्णं यज्ञोका
फल मिलता है। जो उन सनातन महादेवजीका
वड श्रद्धासे पूजन करते है ओर फाल्गुन कृष्णा
चतुर्दशीको एकाग्रचित्त हो फूल, फल, विल्वपत्र,
उत्तम ओर साधारण भक्ष्यपदार्थ दूध, दही, घी,
मधु ओर जलसे उस उत्तम शिवलिङ्गका अर्चन
तथा टमरूके डिंडिम घोष, नमस्कार, नृत्य, गीत,
अनेक प्रकारके मुखवाद्य, स्तोत्र एवं मन्त्रो्रारा
शुभस्वरूप भगवान् शिवको तृप्त करते टै ओर
मोहिनी ! एक रात उपवास करके परम भक्तिभावसे
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उत्तरभाग
पूजन करके श्रीमहादेवजीको संतुष्ट करते है,
परम पदको प्राप्तकर लेते हें।
जो चैत्र मासक चतुर्दशीको परमेश्वर शिवकी
पूजा करता हे, वह धनके स्वामी कुबेरके समीप
जाकर उन्हींको भोति क्रीडा करता हे। जो वैशाखकी
चतुर्दशीको पवित्रचित्तसे भगवान् शिवकी अर्चना
करता हे, वह स्वामिकार्तिकियके लोकमें जाकर
उन्हीका अनुचर होता हे। जो ज्येष्ठ मासकी चतुर्दशीको
श्रद्धापूर्वक भगवान् शङ्करको पूजा करता हे, वह
स्वर्गलोकमें जाता है ओर प्रलयकाल आनेतक वहां
निवास करता हे। भद्रे! जो आषाढ मासक
चतुर्दशीको पवित्रभावसे कृत्तिवासेश्वर शिवको पूजा
करता हे, वह सूर्यलोकमें जाकर इच्छानुसार क्रीड़ा
करता है । जो श्रवणकौ चतुर्दशीको वहो प्रकट हुए
कामेश्वर शिवकौ पूजा करता है, उसे भगवान् शिव
वरुणलोक देते है । जो भाद्रपद मासक चतुर्दशीको
भोति-भोतिके पुष्पों ओर फलद्वारा भगवान् शङ्करकी
पूजा करता है, उसे इन्द्रका सालोक्य प्राप्त होता हे।
जो आश्चिन कृष्णा चतुर्दशीको भगवान् शिवकी पूजा
करता हे, वह पितरोके लोकमें जाता हे। जो कार्तिक
मासक चतुर्दशीको देवेश्वर महादेवजीकी पूजा
करता हे, वह चन्द्रलोकमें जाकर जबतक इच्छा हो,
तबतक वहाँ क्रीडा करता है। जो मार्गशीर्षं क्रृष्णा
चतुर्दशीको पिनाकधारी भगवान् शिवको पजा करता
हे, वह भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है ओर वहां
अनन्त कालतक क्रीडा-सुखमें निमग्र रहता है । जो
पौष मासमे प्रसन्नचित्त होकर भगवान् शिवकी
अर्चना करता है, वह नैऋत्यलोकमें जाता है ओर
नित्ऋतिके साथ ही आनन्दका अनुभव करता हे। जो
माघ मासमे सुन्दर पुष्प एवं मृल-फल आदिक द्वारा
भगवान् शङ्करको आराधना करता है, वह संसार-
सागरका त्याग करके भगवान् शिवके लोकमं जाता
हे। अतः यदि शिवधाममें जानेकी इच्छा हो तो
यलपूर्वक कृत्तिवासेश्चरका पूजन तथा अविमुक्त-
६७३
्ेत्रमें निवास करना चाहिये। काशीमें व्यासेश्वरके
पश्चिम घण्टाकर्णं (या कर्णघण्टा) नामक सरोवर
हे। देवि! उस सरोवरमें सान करके व्यासेश्वरका
दर्शन करनेसे मनुष्यकी जहां-कहीं भी मृत्यु हो,
उसे काशीमें मरनेका ही फल प्राप्त होता है।
मोहिनी ! यदि मनुष्य दण्डघात-तीर्थमें सान करके
अपने पितरोका तर्पण करे तो उसके नरक-
निवासी पितर वहसे निकलकर पितृलोकमें चले
जाते हें । देवि! जो पापकर्मीं मनुष्य पिशाचयोनिको
प्राप्त हो गये हँ, उनके लिये यदि वहाँ पिण्डदान
किया जाय तो उनका उस पिशाच-शरीरसे उद्धार
हो जाता हे। उस घातके दर्शनसे मानव कृतकृत्य हो
जाता हे। वहीं लोकको कल्याण प्रदान करनेवाली
ललितादेवी विद्यमान हैं । यह मनुष्य-जन्म दुर्लभ
हे । विद्युत्पातके समान चञ्चल है, उसे पाकर जिसने
ललितादेवीका दर्शन कर लिया, उसे जन्मका भय
कसि हो सकता है 2 पृथ्वीकी परिक्रमा करके
मनुष्य जिस फलको पाता है, वही फल उसे
काशीमे ललितादेवीके दर्शनसे मिल जाता है।
प्रत्येक मासक चतुर्थको उपवास करके ललिता-
देवीकी पूजा ओर उनके समीप रातमें जागरण
करे। देवि! एेसा करनेसे उसे सम्पूर्णं समृद्धियां
प्राप्त होती हं। मोहिनी ! तीनों लोकोद्रारा पजित
नलकूवरकेश्चर सव सिद्धियोके दाता है । उनकी
पूजा करके मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। देवि।
उनके दक्षिणभागमें मणिकर्णी नामसे प्रसिद्ध
शिवलिङ्ग है। उसके अगे एक महान् तीर्थ
(जलाशय) है, जो सब पार्पोका नाश करनेवाला है।
भगवान् मणिकर्णीश्चर कुण्डे विराजमान रै।
उनका दर्शन, नमस्कार ओर पूजन करनेये फिर
गर्भमं निवास नहीं करना पडता । मणिकर्णीश्चसके
दक्षिण पार्शे गद्भाजीके जलमें स्थापित परम
उत्तम गद्श्वरलिद्ग है। उसकौ पृजा करनेमे
देवलोककी प्राप्ति होती दै।
((-0. 1/८11114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
६७
मोहिनी ! अव में काशीके दूसरे मन्दिरका वर्णन
करता हू, जहो देवाधिदेव महादेवजीका रुचिर एवं
अभीष्ट स्थान है। सुभगे! पूर्वकालमें कुछ राक्षस
भगवान् चन्द्रमोलिका शुभ लिङ्ग साथ ले अन्तरिक्ष
मार्गसे बडी उतावलीके साथ जा रहे थे। जिस
समय वह शिवलिङ्ग इस काशी-क्षत्रमें पहंचा, उस
समय महादेवजीने सोचा-' क्या उपाय किया जाय,
जिससे मेरा अविमुक्तक्षेत्रसे वियोग न हो।' शुभे!
देवेश्वर भगवान् शिव इस बातका विचार कर ही रहे
थे कि उस स्थानपर मूर्गेका शब्द सुनायी दिया।
देवि! उस शब्दको सुनकर राक्षसोके मनमें भय
समा गया ओर वे प्रातःकाल उस शिवलिङ्गको वहीं
छोडकर वहसे भाग गये । राक्षसोके चले जानेपर
वहीं अत्यन्त रुचिर एवं सुन्दर स्थानमें वह लिद्ध
स्थित हुआ। साक्षात् देवदेव भगवान् शिव उस
अविमुक्तक्षेत्रमं उस शिवलिद्धके रूपमे विराजमान
हृए। इसीलिये उसे “ अविमुक्त' कहते है । उस समय
देवताओनि महादेवजीका नाम “ अविमुक्त" रख दिया,
जो परम पवित्र अक्षरोसे युक्त है। जो प्राणी वर्ह
मृत्युको प्राप्त हते हँ, वे स्थावर हों या जङ्गम, उन
सबको वह शिवलिङ्ग मोक्ष देनेवाला है। भगवान्
अविमुक्तके दक्षिण भागमें एक सुन्दर बावडी है
उसका जल पीनेसे इस लोकम पुनरावृत्ति नहीं
होती । जिन मनुप्योने उक्तं बावडीका जल पीया है,
वे कृतार्थ हे । उन्हें निश्चय ही तारक-ज्ञान प्राप्त होता
हे। मनुष्य वावड़ीके जलमें स्नान करके यदि
दण्डकेश्वर एवं अविमुक्तेश्वरका दर्शन करे तो वह
क्षणमात्रमे केवल्य-मोक्षका भागी होता है। काशीपुरी,
संक्षिप्त नारदपुराण
दर्शन करके मनुष्य शिवगणोंका अधिपति होता हे।
अविमुक्तेश्चर लिङ्गका दर्शन करनेसे मानव सम्पूर्ण
पापो, रोगों तथा पशुपाश (जीवके अक्ञानमय
बन्धन) -से मुक्त हो जाता हे।
अविमुक्तके आगे एक शिवलिङ्क स्थित है,
जिसका मुख पश्चिमकी ओर हे । भद्रे ! वह ' लक्षणेश्र'
नामसे विख्यात है । उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य ज्ञानी
हो जाता है । देवि ! उसके उत्तरमें चतुर्मुख लिद्ख है
जो चतुर्थश्चरके नामसे प्रसिद्ध है। वह श्रेष्ठ
शिवलिङ्ग पाप-भयका निवारण करनेवाला है।
वाराणसी नामक क्षेत्र पृथ्वीपर प्राणियोके लिये
मुक्तिदायक हे । उसमे भी अविमुक्तेश्चर तो जीवन्मुक्त
कहा गया हे। वह जीवन्मुक्ति देनेवाला है) ।
काशीमें जहां-कहीं भी जो रह चुका है, उसके
लिये गणपति-पदकी प्राति बतायी गयी है ओर जो
वहां प्राण-त्याग करता हे, वह आत्यन्तिक मोक्षको
प्राप्त करता है । उपर्युक्त सीमाके भीतरी कषेत्रमे प्रथम
आवरण बताया गया हे। द्वितीय आवरणमें पूर्व
दिशामें मणिकर्णिका हे । उस स्थानम सात करोड
शिवलिङ्ध विद्यमान हें । उनके दर्शनमात्रसे यज्चोका
फल प्राप्त होता हे। ये सब सिद्ध लिङ्ग हैँ । काशीमे
जो पवित्र कूप, सरोवर, बावडी, नदी ओर कुण्ड
कहे गये हे, वे ही सिद्धपीठ हे । जो एकाग्रचित्त हो
इन सबमें स्नान करेगा ओर वहकि शिवलिद्धोका
दर्शन करेगा, वह फिर इस संसारम जन्म नहीं ले
सकता। पृथ्वीपर ओर अन्तरिक्षम जो-जो तीर्थ
है, उनमें मुख्य तीर्थोका मेने तुमसे वर्णन किया
हे। वरारोहे! तीर्थयात्राको सब पापोका नाश
करनेवाली कहा गया हे।
श्मशानघाट, अविमुक्तस्थान ओर अविमुक्तेशधर लिङ्धका
=> ५ ==
काशी-यात्राका काल, यात्राकालमें यात्रियोके लिये आवश्यक कृत्य, अवान्तर
तीर्थं ओर शिवलिङ्गोका वर्णन
पुरोहित वसु कहते है - मोहिनी! अव मेँ | प्राति करनेवाली है । पूर्वकालमें देवता ओने काशीमं
यात्राकालका वर्णन करता हँ जिसे देवता आदिन | रहकर चैत्र मासमे यह तीर्थयात्रा कौ थी। वे
नियत किया है। वह यात्रा यथायोग्य फलकी | कामकुण्डपर स्थित होकर स्नान एवं पूजनमं
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उत्तरभाग
६७५4
तत्पर रहते थे। शुभानने! ज्येष्ठ मासमे रुद्रावास
कुण्डपर स्नान-पूजामें तत्पर रहनेवाले सिद्धोने
वर्हंकी शुभ यात्रा कौ है । गन्धर्वेनि आषाढ मासमे
यहांको यात्रा कौ थी। वे प्रियादेवी-कुण्डपर
रहकर स्नान-पूजन किया करते थे। मोहिनी
विद्याधरोने श्रावण मासमे यह यात्रा की थी। वे
लक्ष्मीकुण्डपर रहकर सनान-पूजन करते थे।
वरानने! यक्षोने आश्विन मासमे यह यात्रा सम्पन्न
कौ है। वे मार्कण्डेय-कुण्डपर रहकर सनान-
पूजनम संलग्र थे। मोहिनी! नागोने मार्गशीर्ष
मासमे यह यात्रा कौ है। वे कोरितीर्थमें रहकर
स्नान-पूजन आदि करते थे। शुभलोचने ! गुह्यकोने
कपालमोचनतीर्थमें रहकर स्नान-ध्यान एवं पूजन
आदि करते हुए पौष मासमे यहांकी यात्रा सम्पन्न
को हे। शोभने! पिशा्चोने फाल्गुन मासमे
काशीको यात्रा की थी। वे कालेश्वर-कुण्डपर
रहकर सरान-पूजन आदिमं तत्पर रहते थे। देवि!
शुभ फाल्गुन मासमे शुक्ल पक्षक जो चतुर्दशी है
उसीमें पिशाचोने यात्रा कौ थी। इसीलिये उसे
` पिशाच- चतुर्दशी ' कहते हे ।
शुभानने! अब मै यात्राका आवश्यक कृत्य
बतलाऊगा, जिसके करनेसे मनुष्य यात्राका
फल पाता है। यात्राके समय जलसे भरे हए
सुन्दर घडोंको वस्त्रसे ठककर फल, फूल ओर
मिष्ठान्रके साथ उनका दान करना चाहिये।
चैत्रके शुक्लपक्षे महान् फल देनेवाली जो
तृतीया है, उसमे मनुष्योको भक्तिभावसे गौरी-
देवीका दर्शन करना चाहिये। वरानने! स्नान
करके गोप्रक्षतीर्थमें जाना चाहिये ओर स्वर्गद्रारमे
जो कालिका देवीं है, उनकी यन्नपूर्वक पजा
= चाहिये। उनके सिवा संवर्त ओर
ललिता भी श्रेष्ठ एवं कल्याणमयी देवी कही
गयी है, उनका भी भक्तिभावसे दर्शन करना
चाहिये। वे सम्पूर्ण कामनाओंका फल देनेवाली
हैं । तदनन्तर पवित्र त्रतका पालन करनैवाले
शिवभक्त ब्राह्मणोको भोजन कराना ओर वस्त्र
तथा भरपूर दक्षिणाद्वारा उनका यथायोग्य सत्कार
करना चाहिये।
अब मैं उन विनायकोंका परिचय देता हू,
जो काशीक्षेत्रके निवासे विघ्र उालनेवाले
है । देवि ! उनका पूजन करके मनुष्य काशीवासका
निर्विघ्न फल प्राप्त करता है । पहले दुंदिविनायकः,
फिर किलविनायक, देवीविनायक, गोप्रक्षविनायक,
हस्तिहस्तीविनायक तथा सिन्दूर्यविनायकका दर्शन
करना चाहिये। देवि! चतुर्धीको इन सभी
विनायकोंका दर्शन करे ओर इनको प्रसन्नताके
लिये ब्राह्मणको मिठाई खिलावे। इस कार्यस
मनुष्यको सिद्धि प्राप्त होती है।
अव र्म काशीक्षेत्रको रक्षा करनेवाली
चण्डिकाओंका वर्णन करता द दक्षिण दिशां
दुर्गा रक्षा करती है । नैऋत्य कोणमें अन्ते श्वरी,
पथिममें अद्भारेश्चरी, वायव्य कोणमें भद्रकाली,
उत्तर दिशामं भीमचण्डा, ईशानकोणमें महामन्ता,
((-0. 1/८1111(4<511॥ 8118811 \/8181185। (01661101. 0141260 0 66810011
६७६
संक्षिप्त नारदपुराण
पर्वं दिशामें ऊध्वकेशीसहित शाङ्करीदेवी, अग्रिकोणमें
अधःकेशी तथा मध्यभागमें चित्रघण्टादेवी रक्षा
करती हं। जो मानव इन चण्डिका देवियोँका
दर्शन करता हे, उसपर प्रसन्न होकर वे सब-की-
सव तत्परतापूर्वक उसके लिये क्षेत्रकी रक्षा करती
हे । देवि ! ये पापियोके लिये सदा विघ्र उपस्थित
करती हे, अतः रक्षाके लिये विनायकोंसहित उक्त
देवियोको सदा पूजा करनी चाहिये।
भीप्मजी काशीपुरीमें आकर उत्तम पञ्चायतनरूपसे
देवेश्वर शिवको आराधना करते हुए कुछ कालतक
यहाँ रहे । सुभगे! उस स्थानपर भगवान् शिव
स्वयं प्रकट हुए थे, जो “गोप्रक्षक' के नामसे
विख्यात हुए । सम्पूर्णं देवता उनको स्तुति करते
हे । गोप्रेक्षेश्वरके पास आकर उनका दर्शन ओर
पूजन करके मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पडता
ओर सव पापोंसे मुक्त हो जाता है। एक समय
वनको गों दावानलसे दग्ध हो इधर-उधर
भटकती हुई इस कुण्डके समीप आयीं ओर
यहांका जल पीकर शान्त हुई । तवसे यह
` कपिलाहद' कहलाता है । यर्म प्रकट होकर
साक्षात् भगवान् शिव ' वृषध्वज ' नामसे विख्यात
हए। भगवान् शिवने न केवल वहाँ निवास
किया, वे वहां सबको प्रत्यक्ष दर्शन देते हए
, शिवलिद्भरूपमे विराजमान हैं । जो एकाग्रचित्त
हो इस कपिलाहद-तीर्थमें सान करके वृषध्वज
शिवका दर्शन करता है, वह सम्पूर्णं यज्ञोका
फल पाता हे। वह स्वर्गलोकमें जाता है।
भगवान् वृपध्वजको पूजा करके वहां मरा हआ
पुरुष शिवरूप हो जाता हे । अथवा शरीर-भेदसे
अत्यन्त दुर्लभ शिवगणका स्वरूप धारण करता
हे । इसी प्रदेशमे गोओंने स्वयं ब्रह्माजीके अनुरोधसे
सम्पूर्णं लोकोंकौ शान्तिके लिये तथा सबको
पवित्रे करनेके उदश्यसे अपना दुग्ध दान किया
था; जिससे ' भद्रदोह' नामक सरोवर प्रकट
हुआ, जो पवित्र, पापहारी एवं शुभ है । उस
स्थानमें स्नान करनेवाला मनुष्य साक्षात् वागीश्वर
होता हे । वहं परमेष्ठी ब्रह्माजीने स्वयं ले आकर
एक शिवलिङ्ग स्थापित किया है । फिर ब्रह्माजीसे
लेकर भगवान् विष्णुने दूसरा शिवलिद्घ स्थापित
किया, जो “हिरण्यगर्भ ' के नामसे वर्ह विद्यमान
है । तदनन्तर ब्रह्माजीने पुनः इसी कारणसे
` स्वर्लेकिश्चर' नाम शिवलिङ्ग स्थापित किया;
जो स्वर्गीय लीलाका दर्शन करानेवाला है।
देवताओंके स्वामी उन स्वलोकिश्वरका दर्शन
करके मनुष्य शिवलोके प्रतिष्ठित होता हे।
यहां प्राणत्याग करनेसे फिर कभी वह संसारमें
जन्म नहीं लेता। उसकी वह अक्षयगति होती
हे, जो केवल योगि्योके लिये सुलभ वतायी
गयी हे।
भूमण्डलके उसी प्रदेशमे देवताओंके लिये
कण्टकरूप देत्य व्याघ्रका रूप धारण करके रहता
था। वह वड़ा बलवान् ओर अभिमानी था।
भगवान् शङ्करने उसे मारा ओर उस स्थानपर
व्याघ्रेश्वर नामसे प्रसिद्ध होकर नित्य निवास
किया। उन देवेश्वरका दर्शन करके मनुष्य कभी
दुर्गतिम नही पडता। हिमवान्के द्वारा स्थापित
एक शिवलिङ्ग हे, जो ' रेलेश्चर ' के नामसे विख्यात
हे। भद्रे! शेलेश्चरका दर्शन करके मनुष्य कभी
दुर्गतिमे नहीं पड़ता। उत्पल ओर विदल नामके
जो दो दैत्य ब्रह्माजीके वरदानसे बलोन्मत्त हो रहे
थे, वे दोनों स्त्री-विषयक लोलुपताके कारण
पार्वतीजीके हाथसे मारे गये। एक शार्द्खधनुषसे
मारा गया ओर दूसरा कुन्तक अर्थात् भालेसे । इन
दोनों शस्त्रोके नामपर दो शिवलिङ्ग स्थापित किये
गये है । भद्रे! जो मनुष्य श्रेष्ठ स्थानमं विद्यमान
उक्त दोनों लिद्गोका दर्शन करता ह, वह जन्म-
((-0. 1\/॥८1114/5511॥1 8118 8/1 \/8181185। (0166101. 01411260 0 6810011
उत्तरभाग
६७७
जन्ममें सिद्ध होकर कभी शोक नहीं करता।
देवताओंने उनके सब ओर बहत-से शिवलिङ्घ
स्थापित किये हे। उनका दर्शन करके मनुष्य
देहत्यागके पश्चात् भगवान् शिवका गण होता है
वाराणसी नदी परम पवित्र ओर सब पापोंका
नीश करनेवाली है। यह इस पवित्र क्षेत्रको
सुशोभित करके गङ्खामें मिली हे । उसके सद्धमपर्
ब्रह्माजीने उत्तम शिवलिङ्खगको स्थापना को हे,
जो 'सङ्गमेश्वर' के नामसे संसारमें विख्यात ह
उसका दर्शन करना चाहिये । शुभे! जो मानव
इन देवनदियोके सद्गममें स्नान करके सद्धमेश्चरका
पूजन करता है, उसे जन्म लेनेका भय कैसे हो
सकता है ? भद्रे भृगुपुत्र शुक्राचार्यने यहां एक
शिवलिङ्ग स्थापित किया हे, जो "शुक्रेश्वर'के
नामसे विख्यात हे } सम्पूर्णं सिद्ध ओर देवता भी
उसको पूजा करते टें। इसका दर्शन करके
मनुष्य तत्काल सब पापोंसे मुक्त हो जाता दै
ओर मरनेपर फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता।
मोहिनी । महादेवजीने यहां जम्बुक नामक दैत्यका
वध किया था। तत्सम्बन्धी शिवलिद्गका दर्शन
करके मानव सम्पूर्णं कामनाओंको प्राप्त कर
लेता हे। इन्द्र आदि देवताञजोके द्वारा स्थापित
किये हए इन शिवलिद्भोको तुम पुण्यलिद्ध
सम्यो । ये समस्त कामनाओंको देनेवाले हैं।
मोहिनी! इस प्रकार इस अविमुक्तक्षेत्रमे मने
तुम्हं ये सव शिवलिङ्गं बताये है।
1 की
ल-++ 3 + -#
काशीकी गङ्काके वरणा-संगम, असी-संगम तथा पञ्चगद्धा
आदि तीर्थोका माहात्म्य
पुरोहित वसु कहते है-- भद्रे! अव मं तुम्हे
काशीकी गङ्गाका उत्तम माहात्म्य बताता हूं, जो
भोग ओर मोक्षरूप फल देनेवाला हे । अविमुक्त-
्षेत्रमे जो भी कर्म किया जाता है, वह अक्षय हो
जाता है। कोई भी पापी अविमुक्तक्षेत्र (काशी)-
मे जाकर पापरहित हो जानेके कारण कभी
नरकमें नहीं पड़ता। शुभे! अविमुक्तक्षेत्रमं किया
हआ पाप वच्रतुल्य हो जाता हे। तीनों लोकम जो
मोक्षदायक तीर्थं हं, वे सम्पूर्णं सदा काशीको
उत्तरवाहिनी गङ्गाका सेवन करते है। जो
दशाश्चमेधघाटमें स्नान करके विश्चनाथजीका दर्शन
करता है, वह शीघ्र ही पापमुक्त होकर संसारवन्धनसे
छट जाता हे । यों तो पुण्यसलिला गङ्गा सवत्र हा
ब्रह्यहत्या-जैसे पापांका निवारण करनवाली ह,
तथापि काशीमें जहां उनकी धारा उनकी ओर
वहती है, वहां उनकी विशेष महिमा प्रकट् दती
है। वरणा ओर गद्भाके तथा असी ओर गद्गाके
सद्घममें सान करनेमात्रसे मनुष्य सम्पूर्णं पातकोसे
मुक्त हो जाता हे । काशीकी उत्तरवाहिनी गङ्गाम
कार्तिक ओर माघ मासमे स्नान करके मनुष्य
महापाप आदि पातकोसे मुक्तं हो जाते ह।
सुन्दरी ! वहां धर्मनद नामस विख्यातं एक कुण्ड
है। उसमें धर्म स्वरूपतः प्रकट होकर बडु-
वड पातकोंका नाश करता है। वहीं धूली एवं
धूतपापा भी है, जो सर्वतीर्थमयी एवं शुभकारक
हे। जैसे नदीका वेग तटवर्ती वृक्षोको गिरा देता
है, उसी प्रकार वह धूतपापा समस्त पापराशिको
हर् लता ह।
काशीमं किरणा, धृतपापा, पुण्यसलिला
सरस्वती, गद्धा ओर यमुना-ये पच नदियां
एकत्र बताया गयी हे। इनसे त्रिभुवनविष््यात
पञ्चनद् (पञ्चगद्गा) ताथ प्रत्छट हा र । उमम
((-0. 1/८1114<511॥1 8118811 \/81811851 (01661101. 01411260 0 66810011
६७८
संक्षिप्त नारदपुराण
डबको लगानेवाला मानव फिर पाञ्चभौतिक
शरीर नहीं धारण करता। यह र्पोच नदियोंका
सङ्गम समस्त पापराशियोंका नाश करनेवाला है ।
उसमे स्नान करनेमात्रसे मनुष्य ब्रह्माण्डमण्डपका
भेदन करके परम पदको प्राप्त होता है । प्रयागमें
माघ मासमे विधिपूर्वक स्नान करनेसे जो फल
प्राप्त होता हे, वह काशीके पञ्चगङ्गातीर्थमें एक
ही दिनके स्नानसे मिल जाता हे। पञ्चगङ्घामें
स्नान ओर पितरोंका तर्पण करके ' माधव ' नामसे
प्रसिद्ध भगवान् विष्णुको पूजा करनेवाला पुरुष
फिर इस संसारम जन्म नहीं लेता। जिन्होने
पञ्चगद्गामें श्रद्धापूर्वक श्राद्ध किया है, उनके
पितर अनेक योनि्योमें पड़ होनेपर भी मुक्त हो
जाते हे। पञ्चनदतीर्थमें श्राद्धकर्मकी महिमाका
प्रत्यक्ष दर्शन करके यमलोकमें पितरलोग यह
गाथा गाया करते हें कि "क्या हमारे वंशमें भी
कोई एेसा होगा, जो काशीके पञ्चनदतीर्थमें
आकर श्राद्ध करेगा ? जिससे हम लोग मुक्तं हो
जा्येगे ।' पञ्चनदतीर्थमे जो कुछ धन दान किया
जाता ह, कल्पके अन्ततक उसके पुण्यका क्षय
नहीं होता। वन्ध्या स्त्री भी एक वर्पतक
पञ्चगङ्गातीर्थमें स्नान करके यदि मद्गलागौरीका
पूजन करे तो वह अवश्य ही पुत्रको जन्म देती
हे । वस्त्रसे छाने हुए पञ्चगङ्गाके पवित्र जलसे
यहां दिक्घ्रुतादेवीको स्नान कराकर मनुष्य
महान् फलका भागौ होता हे। पञ्चामृतके एक
सौ आट कलशोके साथ तुलना करनेपर पञ्चगद्भाका
एक वृद जल भी उनसे श्रेष्ठ सिद्ध होता है । इस
लोकमें पञ्चकूर्च (पञ्चगव्य) पीनेसे जो शुद्धि
कही गयी हे, वही शुद्धि श्रद्धापूर्वक पञ्चगङ्घाके
जलकौ एक वृद पीनेसे प्राप्त होती है ओर
उसके कुण्डमें स्नान करनेसे राजसूय तथा
अश्वमेधयज्ञका जो फल कहा गया है, उससे
सौगुना उत्तम फल उपलब्ध होता है । राजसूय
ओर अश्वमेध-यज्ञ केवल स्वगि साधक दहै,
कितु पञ्चगङ्गाके जलसे ब्रह्मलोकतकके सम्पूर्णं
दन्दरोसे मुक्ति मिल जाती है। सत्ययुगमें वह
` धर्मनद ' के नामसे प्रसिद्ध हआ, त्रेतामें उसीका
नाम ` धूतपापा" हुआ । द्वापरमें उसे “ विन्दुतीर्थ'
कहा जाने लगा ओर कलियुगमें ' पञ्चनद ' के
नामसे उसकौ ख्याति होती है। पञ्चनदतीर्थ
धर्म, अर्थ, काम ओर मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थोका
शुभ आश्रय हे, उसकी अत्यन्त महिमाका कोई
भी वर्णन नहीं कर सकता । भद्रे ! इस प्रकार मेने
तुम्हे काशीका उत्तम माहात्म्य बताया है । वह
मनुप्योके लिये सुखद, मोक्षप्रद तथा बडे-वडे
पातकोका नाश करनेवाला हे। महापातकी एवं
उपपातको मानव भी अविमुक्तक्षेत्रके इस
माहात्म्यको सुनकर शुद्ध हो जाता हे। ब्राह्मण
इसको सुनने ओर पदढनेसे वेदोंका विद्वान् होता
हे । क्षत्रिय युद्धमें विजय पाता हे, वैश्य धन-
सम्पत्तिसे भरपूर होता है ओर शूद्रको वैष्णव
भक्तोका सर्ग प्राप्त होता है। सम्पूर्ण यज्ञोमे जो
फल मिलता हे, समस्त तीथमिं जो फल प्राप्त
होता हे, वह सब इसके पाठटसे ओर श्रवणसे भी
मनुष्य प्राप्त कर लेता हे। विद्यार्थी इससे विद्या
पाता हे, धनार्थी धन पाता है, पत्री चाहनेवाला
पती ओर पुत्रकी इच्छावाला पुरुष पुत्र पाता हे।
[९ 1
१ 7 क 7
((-0. 1\/॥८11104/5511॥1 81188 \/8181185। 01661101. 01411260 0 66810011
उत्तरभाग
६७९
उत्कलदेशके पुरुषोत्तम-क्षेत्रकी महिमा, राजा इन्दरद्युम्रका वहां
जाकर मोक्च प्राप्त करना
मोहिनी बोली-- विप्रवर! मेने आपके मुखारविन्दसे
काशीका उत्तम माहात्म्य सुना। पुराणोमे मुनियों
ओर ब्राह्मणोंका यह वर्णन सुना जाता ठै
कि पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुका क्षेत्र मोक्ष
देनेवाला है। महाभाग। अब उस पुरुषोत्तम-
्षेत्रका माहात्म्य किये ।
पुरोहित वसुने कहा- देवि! सुनो, मैं तुमं
ब्रह्माजीके द्वारा कहा हुआ पुरुषोत्तम-क्षेत्रका उत्तम
माहात्म्य बतलाता हू। भारतवर्षमें दक्षिण समुद्रके
तरतक फैला हुआ एक उत्कल नामका प्रदेश है,
जो स्वर्गं ओर मोक्ष देनेवाला है। समुद्रसे उत्तर
विरज-मण्डलतकका जो प्रदेश है, वह पुण्यात्माओंका
देश है । वह भू-भाग सम्पूर्णं गुणोंसे अलंकृत हे ।
विशालाक्षि! समुद्रके उत्तर तटवतीं उस सर्वोत्तम
उत्कल प्रदेशमे सभी पुण्य तीर्थं ओर पवित्र
मन्दिर आदि है, जिनका परिचय जानने योग्य हे ।
मुक्ति देनेवाला परम उत्तम एवं पापनाशक पुरुषोत्तम-
शषेत्र परम गोपनीय है । सर्वत्र बालुका-आच्छादित
भू-भागमें वह पवित्र एवं धर्म ओर कामको पूर्ति
करनेवाला परम दुर्लभ क्षेत्र दस योजनतक फेला
हआ है । जैसे नक्षत्रों चन्द्रमा ओर सरोवरोमे सागर
ष्ठ है, उसी प्रकार समस्त तीथमिं पुरुषोत्तम-श्षत्र
सवसे श्रेष्ट है। भगवान् पुरुपोत्तमका एक वार
दर्शन करके, सागरके भीतर एक वार सान
करनेसे तथा ब्रह्मविद्याको एक बार जान लेनेसे
मनुष्यको गर्भमिं नहीं आना पड़ता । देवेश्वर पुरुषोत्तम
समस्त जगते व्यापक ओर सम्पूर्णं विश्वके
आत्मा हैं। वे जगत्की उत्पत्तिके कारण तथा
जगदीश्वर है। सव कृ उन्हीमें प्रतिति है । जो
देवताओं, ऋषियों ओर पितरोद्रारा सेवित तधा
सर्वभोगसम्पन्न हे, एेसे पुण्यात्मा प्रदेशमे निवास
करना किसको नहीं अच्छा लगेगा । इससे बदढकर्
इस देशक श्रेष्ठताके विषयमे ओर क्या कहा जा
सकता हे 2 जहां सबको मुक्ति देनेवाले जगदीश्वर
भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैँ, उस उत्कल-
देशमें जो मनुष्य निवास करते दै, वे देवताओके
समान तथा धन्य हें । जो तीर्थराज समुद्रके जलमें
स्नान करके भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करते हैँ
वे मनुष्य स्वगे निवास करते हँ । जो उत्कलमें
परम पवित्र श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्रके भीतर निवास
करते हैँ, उन उत्तम बुद्धिवाले उत्कलवासियोंका
ही जीवन सफल है; क्योकि वे भगवान् श्रीकृष्णके
उस मुखारविन्दका दर्शन करते है, जो तीनों
लोकोंको आनन्द देनेवाला है । भगवान्का मुख
लाल ओष्ठ ओर प्रसन्नतासे खिले हए विशाल
नेत्रोसे सुशोभित है । मनोहर भौहो, सुन्दर केशों ओर
दिव्य मुकुरसे अलंकृत है। सुन्दर कर्णलतामे
उसकी शोभा ओर बढ़ गयी है । उस मुखपर मन्द-
मन्द मुसकान बडी मनोहर लगती है। दन्तावली
भी बड़ी सुन्दर है। कपोलोपर मनोहर कुण्डल
ञ्िलमिला रहे है। नासिका, कपोल सभी परम
सुन्दर ओर उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न हं।
देवि! प्राचीन कालको व्रात है। सत्ययुगमं
इन्द्रके तुल्य पराक्रमी एक राजा थे, जो श्रीमान्
' इन्द्रद्युम्न ' के नामसे प्रसिद्ध हुए । वे बढ़ सत्यवादी,
पवित्र, कार्यदक्ष, सम्पूर्ण शस्त्रधारियामें त्ष
सौभाग्यशाली, शुर, दाता, भोक्ता, प्रिय वचनं
व्रोलनेवाले, सम्पूर्णं यज्ञेके याजक, ब्राद्मण-भक्त,
सत्य-प्रतिन, धनुर्वेद तथा वद-शाम्त्रके निपुण
विद्वान् एवं चदद्रमाको भति मधुर प्रकृतिकरे थे।
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+ + क्कः
६८०
संक्षिप्त नारदपुराण
राजा इन्द्रद्युम्न भगवान् विष्णुके भक्त, सत्यपरायण,
क्रोधको जीतनेवाले, जितेद्धिय, अध्यात्मविद्यातत्पर,
न्यायप्राप्त युद्धके लिये उत्सुक तथा धर्मपरायण
थे। इस प्रकार सम्पूर्णं गुणोंकी खानरूप राजा
इन्द्रद्युम्न सारी पृथ्वीका पालन करते थे। एक वार
उनके मनमे भगवान् विष्णुकी आराधनाका विचार
उठा। वे सोचने लगे-“ मे देवदेव भगवान् जनार्दनकीं
किस प्रकार आराधना करू? किस क्षेत्रमे, किस
नदीके तटपर, किस तीर्थमें अथवा किस आश्रममें
मुञ्चे भगवान्को आराधना करनी चाहिये ?' इस
प्रकार विचार करते हुए वे मन-ही-मन समूची
पृथ्वीपर दृष्टिपात करने लगे। जो-जो पापहारी
तीर्थं हे, उन सबका मानसिक अवलोकन ओर
चिन्तन करके अन्तमें वे परम विख्यात मुक्तिदायक
पुरुषोत्तमक्षत्रमे गये। अधिकाधिक सेना ओर वाहनेकि
साथ पुरुषोत्तमक्षेत्रमे जाकर राजाने विधिपूर्वक
अश्चमेध-यक्चका अनुष्ठान किया ओर उसमें प्य
दक्षिणा दीं । तदनन्तर बहुत ऊँचा मन्दिर बनवाकर
अधिक दक्षिणाके साथ श्रीकृष्ण, बलभद्र ओर
सुभद्राको स्थापित किया। फिर उन पराक्रमी नरेशने
विधिपूर्वक पञ्चतीर्थं करके वहाँ प्रतिदिन स्नान,
दान, जप, होम, देवदर्शन तथा भक्तिभावसे भगवान्
पुरुषोत्तमकी सविधि आराधना करते हुए देवदेव
जगन्नाथके प्रसादसे मोक्ष प्राप्त कर लिया।
च 88
१ 0 0 |
राजा इन्द्रद्युम्रके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति
मोहिनी बोली- मुनिश्रेष्ठ ! पूर्वकालमं महाराज
इद्रदयुप्नने श्रीकृष्ण आदिक प्रतिमाओंका निर्माण
केसे कराया ? भगवान् लक्ष्मीपति उनपर किस
प्रकार संतुष्ट हुए? ये सव बातें मुञ्चे बताये ।
पुरोहित वसुने कहा-- चारुनयने ! वेदके तुल्य
माननीय पुराणको वाते सुनो । में श्रीकृष्ण आदिक
प्रतिमाओके प्रकट होनेका प्राचीन वृत्तान्त कहता
हं सुनो। राजा इन््रद्युप्रके अश्चमेध नामक महायज्ञके
अनुष्टान ओर प्रासाद-निर्माणका कार्य पूर्णं हो
जानेपर उनके मनम दिन-रात प्रतिमाके लिये
चिन्ता रहने लगी। वे सोचने लगे-' कोन-सा
उपाय करू, जिससे सृष्टि, पालन ओर संहार
करनेवाले, सम्पूर्णं लोकोके उत्पादक देवेश्वर भगवान्
पुरुपोत्तमका मुञ्चे दर्शन हो'-इसी चिन्तामें निमग्र
रहनेके कारण महाराजको न रातमें नींद आती थी,
न दिनमें। वे न तो भोति-भातिके भोग भोगते ओर
न स्नान एवं शृङ्गार ही करते थे। इस पृथ्वीपर
पत्थर, लकड़ी अथवा धातु, किससे भगवान्
विष्णुको योग्य प्रतिमा हो सकती है जिसमें
भगवानूके सभी लक्षणोका अद्धन ठीक-ठीक हो
सके । इन तीनोमेसे किसको प्रतिमा भगवान्को
प्रिय तथा सम्पूर्णं देवताओंद्वारा पूजित होगी,
जिसकी स्थापना करनेसे भगवान् प्रसन्न हो
जायेगे ।' इस प्रकारकी चिन्तामे पडे-पडे उन्होने
पाञ्चरात्रको विधिसे भगवान् पुरुषोत्तमका पूजन
किया ओर अन्तमें ध्यानमग्र हो राजाने इस प्रकार
स्तुति प्रारम्भ को।
इन्द्रद्युभ्र बोले-- वासुदेव ! आपको नमस्कार
हे । आप मोक्षके कारण हैं, आपको मेरा नमस्कार
हे। सम्पूर्णं लोकोके स्वामी परमेश्वर! आप इस
जन्म-मृत्युरूपी संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये।
पुरुषोत्तम ! आपका स्वरूप निर्मल आकाशके
समान हे। आपको नमस्कार है। सबको अपनी
ओर खीचनेवाले संकर्षण! आपको प्रणाम है।
धरणीधर! आप मेरी रक्षा कीजिये। भगवन्,
आपका श्रीअङ्ग मेघके समान श्याम है । भक्तवत्सल ।
आपको नमस्कार हे। सम्पूर्णं देवताभकि निवासस्थान ।
आपको नमस्कार है । देवप्रिय ! आपको प्रणाम हे ।
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उत्तरभाग
६८१
नारायण ! आपको नमस्कार है। आप मुञ्च ।
रक्षा कोजिये। नील मेघके समान आभावाले
घनश्याम ! आपको नमस्कार हे । देवपूजित परमेश्वर!
आपको प्रणाम हे । विष्णो ! जगन्नाथ! में भवसागरमें
डूबा हुआ हू। मेरा उद्धार कीजिये । पूर्वकालमें
महावराहरूप धारण करके आपने जिस प्रकार
जलम डूबी हई पृथ्वीका रसातलसे उद्धार किया
था, उसी प्रकार मेरा भी दुःखके समुद्रसे उद्धार
कौजिये। कृष्ण ! आपको वरदायक मूर्तियोका मेने
स्तवन किया हे । ये बलदेव आदि जो पृथकूरूपसे
स्थित हे, इन सवके रूपमे आप ही विराजमान
हें । देवेश! प्रभो! अच्युत! गरुड आदि पार्षद
आयुधोंसहित इन्द्र॒ आदि दिक्पाल आपके ही
अद्घ हें । देवेश! आप मुञ्चे धर्म, अर्थ, काम ओर
मोक्ष देनेवाला वर प्रदान करं । हरे! आप एकमात्र
व्यापक, चेतनस्वरूप तथा निरञ्जन हं । आपका जो
परम स्वरूप हे, वह भाव ओर अभावसे रहित,
निर्लेप, निर्मल, सक्षम, कूटस्थ, अचल, ध्रुव,
समस्त उपाधियोसे विमुक्त ओर सत्तामात्रूपसे
स्थित हे। प्रभो! उसे देवता भी नहीं जानते, फिर
मे केसे जान सकता हूं। उससे भिन्न जो आपका
दूसरा स्वरूप है, वह पीताम्बरधारी ओर चार
भुजाओंसे युक्त हे। उसके हाथमे शद, चक्र
ओर गदा सुशोभित हें । वह मुकुट ओर अङ्गद
धारण करता है । उसका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिहसे
युक्त दै तथा वह वनमालासे विभूषित रहता है।
देवता तथा आपके अन्यान्य शरणागत भक्तं उसीकों
पूजा करते है । देव ! आप सम्पूर्णं देवताओमें श्रेष्ठ
एवं भक्तोंको अभय देनेवाले हे । मनोहर कमलके
समान नेत्रोवाले प्रभो! मै विपयोके समुद्रमे डवा
हूं! आप मेरी रक्षा कोजिये। लोकेश! मै आपके
सिवा ओर किसीको नहीं देखता, जिसकी शरणमे
जाऊ। कमलाकान्त! मधुसूदन! आप मुञ्जपर
प्रसन्न होहये । मैं वुढापे ओर सकड़ां व्याधि्योसे
युक्त हो नाना प्रकारके दुःखोसे पीडित हूं तथा
अपने कर्मपाशमें वेधकर हर्ष-शोकमे मग्र हो
विवेकशून्य हो गया हूं। अत्यन्त भयंकर घोर
संसार-समुद्रमे गिरा हूं। यह भवसागर विषयरूपी
जलराशिके कारण दुस्तर है । इसमे राग-द्रेषरूपी
मत्स्य भरे पड़ हें । इद्दियरूपी भंवरोसे यह वहत
गहरा प्रतीत होता हे। इसमे तृष्णा ओर शोकरूपी
लहर व्याप्त हैं। यहां न कोई आश्रय टै, न
अवलम्ब । यह सारहीन एवं अत्यन्त चञ्चल हे ।
प्रभो! में मायासे मोहित होकर इसके भीतर
चिरकालसे भटक रहा हू। हजारों भिन्न-भिन्न
योनियोमें वारंवार जन्म लेता दहू। प्रभो! देवता,
पशु, पक्षी, मनुष्य तथा अन्य चराचर भृतोपें एेसा
कोई स्थान नहीं हे, जहां मेरा जाना न हआ हो।
सुरश्रेष्ठ । जेसे रहटमें रस्सीसे चंधी हुई घटी कभी
ऊपर जाती, कभी नीचे आती ओर कभी बीचमें
ठहरी रहती है, उसी प्रकार म कर्मरूपी रल्नुमें
बेधकर दैवयोगसे ऊपर, नीचे तथा मध्यवर्ती
लोकम भटकता रहता हूं । इस प्रकार यह संसार-
चक्र बड़ा ही भयानक एवं रोमाञ्चकारी है। म
इसमें दीर्घकालसे घूम रहा दह, किंतु कभी मुच
इसका अन्त नहीं दिखायी देता। समञ्चमं नहीं
आता, अवमे क्या करू 2 हरे! मेरी सम्पूर्ण
इन्ियां व्याकुल हो गयी ह । मै शोक ओर तृष्णासे
आक्रान्त होकर अब कहां जाऊँ 2 मेरी चेतना लुप्त
हो रही है । देव ! इस समय व्याकुल होकर मँ
आपकी शरणमे आया हृ। श्रीकृष्ण! यैं संसार-
समुद्रे डूबकर दुःख भोग रहा हू, मुञ्चे बचाहये ।
जगन्नाथ! यदि आप मुञ्चे अपना भक्त मानते है ती
मुञ्चपर् कृपा कोजिये । आपके सिवा दूसरा कोई
एेसा बन्धुं नहीं है जो मेरी तरफ खयाल करेगा।
देव ! प्रभो ! आप-जैसे स्वामीकी शरणमे आकर
अव मुञ्चे जीवन-मरण अथवा योगक्षेमके लिये
करटा भी भय नहीं होता। इरे! अपने कर्मभि
((-0. 1/८11114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
६८२ संक्षिप्त नारदपुराण
बधे रहनेके कारण मेरा जहो -कहीं भी जन्म हो, | नहीं हैँ, फिर मानवी बुद्धिसे मै आपकी स्तुति
वहां सर्वदा आपमें मेरी अविचल भक्ति बनी रहे । | कैसे कर सकता हूँ; क्योंकि आप प्रकृतिसे परे हैं ।
देव ! आपको आराधना करके देवता, दैत्य, मनुष्य | अतः देवेश्वर ! आप भक्त-स््रेहके वशीभूत होकर
तथा अन्य संयमी पुरुषोने परम सिद्धि प्राप्त कौ हे, | मुञ्जपर प्रसन्न होडये। देव ! मैने भक्तिभावित
फिर कौन आपकी पूजा नहीं करेगा ? भगवन्! | चित्तसे आपकी जो स्तुति कौ है, वह साङ्गोपाङ्ग
ब्रह्मा आदि देवता भी आपकी स्तुति करनेमें समर्थ । सफल हो । वासुदेव ! आपको नमस्कार है ।
राजाको स्वप्रमे ओर प्रत्यक्ष भी भगवान्के दर्शन तथा भगवत्प्रतिमाओंका
निर्माण, वरप्रापति ओर प्रतिष्ठा
पुरोहित वसु कहते है-- सुभगे! राजा इन्दरदयुम्रके | किया ओर चिन्तामग्र हो पृथ्वीपर कुश ओर वस्त्र
इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् गरुडध्वज बहुत | विचछाकर भगवान्का चिन्तन करते हुए वे उसीपर
प्रसन्न हए ओर उन्होने राजाका सब मनोरथ पूर्णं | सो गये । सोते समय उनके मनमें यही संकल्प था
किया। जो मनुष्य भगवान् जगन्नाथका पूजन | कि सबकी पीडा दूर करनेवाले देवाधिदेव भगवान्
करके प्रतिदिन इस स्तोत्रसे उनका स्तवन करता | जनार्दन कैसे मुञ्चे प्रत्यक्ष दर्शन देगे। सो जानेपर
ह, वह बुद्धिमान् निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेता | चक्र धारण करनेवाले जगद्गुरु भगवान् वासुदेवने
हे। जो निर्मल हदयवाले मनुष्य उन परम सुक्ष्म, | राजाको स्वप्रमे अपने स्वरूपका दर्शन कराया।
नित्य, पुराणपुरुष मुरारि श्रीविष्णु भगवान्का ध्यान | राजाने स्वप्रमें देवदेव जगन्नाथका दर्शन किया । वे
करते हँ, वे मुक्तिके भागी हो भगवान् विष्णुम | शद्घ, चक्र धारण किये शान्तभावसे विराजमान थे।
प्रवेश कर जाते ह । एकमात्र वे देवदेव भगवान् | इनके दो हाथमे गदा ओर पद्म सुशोभित थे।
विष्णु ही संसारके दुःखोका नाश करनेवाले तथा
परोसे भी पर हें । उनसे भिन्न कोई नहीं है। वे ही
सवक सृष्टि, पालन ओर संहार करनेवाले है ।
भगवान् विष्णु ही सबके सारभूत एवं सम हेँ।
मोक्षसुख प्रदान करनेवाले जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णमें
यहां जिनकी भक्ति नहीं होती, उन्हें विद्यासे,
अपने गुणोंसे तथा यज्ञ, दान ओर कठोर तपस्यासे
क्या लाभ हुआ ? जिस पुरुषकी भगवान् पुरुषोत्तमके
प्रति भक्ति है, वही संसारमें धन्य, पवित्र ओर
विद्वान् है । वही यज्ञ, तपस्या ओर गुणोके कारण
श्रेष्ठ हे तथा वही ज्ञानी, दानी ओर सत्यवादी हे ।
ब्रह्मपुत्री मोहिनी ! इस प्रकार स्तुति करके
राजान सम्पूर्णं मनोवाच्छित फर्लोको देनेवाले
सनातन पुरुष जगन्नाथ भगवान् वासुदेवको प्रणाम
(0. 1\/॥(111104/5511॥1 2118811 \/8/8/185। (01661010. 01411260 0 66810011
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उत्तरभाग
६८३
शारद्खधनुष, बाण ओर खद्ग॒भी उन्होने धारण
रखे थे। उनके सब ओर तेजका दिव्य मण्डल
प्रकाशित हो रहा था। प्रलयकालीन सूर्यके समान
उनकी दिव्य प्रभा उद्रासित हो रही थी। उनका
श्रोअद्ध नीले पुखराजके समान श्याम था। आठ
भुजाओंसे सुशोभित भगवान् श्रीहरि गरुडकी पीठपर
वैठे हए थे। दर्शन देकर भगवान्ने उनकी ओर
देखते हुए कहा-“ परम बुद्धिमान् नरेश! तुम्हें
साधुवाद हे । तुम्हारे इस दिव्य यन्ञसे, भक्तिसे तथा
श्रद्धासे मैं बहुत संतुष्ट हूं। महीपाल! तुम व्यर्थ
सोचमें क्यों पड़ हो 2 राजन्! यहो जो जगत्पूज्य
सनातनी प्रतिमा हे, उसे तुम जिस प्रकार प्राप्त कर
सकते हो, वह उपाय तुम्हें बताता हूं । आजको रात्रि
बीतनेपर निर्मल प्रभातमे जब सूर्योदय हो, उस
समय अनेक प्रकारके वृक्षोसे सुशोभित समुद्रके
जलप्रान्तमें जहां तरद्गसे व्याप्त महती जलराशि
दिखायी देती है, वहां तटपर ही एक बहुत बड़ा
वृक्ष खड़ा है, जिसका कुछ भाग तो जलमें है ओर
कुछ स्थलमें। वह समुद्रकी लहरोकी थपेडं खाकर
भी कम्पित नहीं होता। तुम हाथमें कुल्हाड़ी लेकर
लहरोके बीचसे होते हृए अकेले ही वहां चले जाना।
तुम्ं वह वृक्ष दिखायी देगा । मेरे बताये अनुसार उसे
पहचानकर निःशङ्कभावसे उस वृक्षको काट डालना।
उस ऊचे वृक्षको काटते समय तुम्हं वह कोई अद्भुत
वस्तु दिखायी देगी। उसी वृक्षसे भलीभोति सोच-
विचारकर् तुम दिव्य प्रतिमाका निर्माण करो। मोहम
डालनेवाली इस चिन्ताको छोड़ दो।'
एसा कहकर महाभाग श्रीहरि अदृश्य हो गये।
यह स्वप्र देखकर राजाको बड़ा विस्मय हआ।
उस रात्रिके बीतनेकी प्रतीक्षा कसते हुए वे भगवानूमं
मन लगाकर उठ वैठे ओर 'वैष्णव-मन्त्र' एवं
" विष्णुसूक्त' का जप करने लगे। प्रभात होनेपर वे
उठे ओर भगवानूका स्मरण करते हुए विधिपूर्वक
उन्होने समुद्रम स्नान किया, फिर पूर्वाह्कृत्य पृरा
करके वे नृपश्रेष्ठ समुद्रके तटपर गये। महारज
इनदरदयुप्रने अकेले ही समुद्रकी महावेलामें प्रवेश
किया ओर उस तेजस्वी महावृक्षको देखा, जिसकी
अन्तिमि ऊपरी सीमा बहुत बड़ी शथी। वह बहत
ऊचेतक फेला हुआ धा। वह पुण्यमय वृक्ष फलये
रहित था। लिग्ध मजीटखके समान उसका लाल रंग
था। उसका न तो कुछ नाम था ओर न यही पता था
कि वह किस जातिका वृक्ष है। उस वृक्षको देखकर
राजा इन्द्रदयुप्र बड़ प्रसन्न हए । उन्होनि दृढ एवं तीक्षण
फरसेसे उस वृक्षको काट गिराया। उस समय
इन्द्रदयुप्रने जव काष्टका भली भोति निरीक्षण किया, तव
उन्हे वहो एक अद्भुत बात दिखायी दी। विश्वकर्मा
ओर भगवान् विष्णु दोनों ब्राह्मणका रूप धारण करके
वहो आये। दोनों ही उत्तम तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे।
राजा इनद्रयुप्रसे उन्होने पृछा- महागज! आप यहां
कोन कार्य करेगे 2 इस परम दुर्गम, गहन एवं निर्जन
वने इस महासागरके तटपर यह अकेला ही महान्
वृक्ष था। इसको आपने क्यों काटः दिया 2
मोहिनी ! उन दोनोंको बात सुनकर राजा बहुत
प्रसन्न हए । उन दोनों जगदीश्चरोको देखकर राजानं
पहले तो उन्हें नमस्कार किया ओर फिर विनीतभावसे
नीचे मुंह किये खड़े होकर कहा- विप्रवरो ! मेरा
विचार है कि पे अनादि, अनन्त, अमेय तथा
देवाधिदेव जगदीश्वरकी आराधना करनेके लिये
प्रतिमा बनाऊँ। इसके लिये परमपुरुष देवदेव
परमात्मने स्वेणपें मुञ्चे प्रेरित किया है।' राजा
इन्द्रदयुप्नका यदह वचन सुनकर भगवान् जगन्नाथने
प्रसत्नतापूर्वक हँसकर उनसे कहा-' महीपाल ! वहत
अच्छा, बहुत अच्छा; आपका यह विचार बहुत
उत्तम है। यह भयंकर संसार- सागर केलेके पत्तेकी
भति सारहीन ठै। इसमे दुःखकी ही अधिकता
है। यह काम ओर् क्रोध्से भरां हा दै।
इन्ियरूपी भंवर ओर कीचडके कारण इसके पार
जाना कठिन है । इसे देखकर रोमाञ्च हो आता ै।
((-0. 1\॥८11114/5511॥1 81188 \/8181/185। (01661010. 01411260 0 6810011
६८४
नाना प्रकारके सेकडों रोग यहं भंवरके समान हैँ
तथा यह संसार पानीके बुलवबुलेके समान क्षणभंगुर
हे । नृपश्रेष्ठ ! इसमें रहते हए जो आपके मनमें
विष्णुकी आराधनाका विचार उत्पन्न हुआ, उसके
कारण आप धन्य हें । सम्पूर्ण गुणोंसे अलंकृत हें ।
प्रजा, पर्वत, वन, नगर, पुर तथा ग्रामोंसहित एवं
चारों वर्णेसि सुशोभित यह धरती धन्य हे, जहोकि
शक्तिशाली प्रजापालक आप हें । महाभाग! आइये,
आइये । इस वृक्षको सुखद एवं शीतल छायाम हम
दोनोके साथ वेविये ओर धार्मिक कथा-वार्ताद्वारा
धर्मका सेवन कीजिये । ये मेरे साथी शिल्पियोमें
श्रेष्ठ है ओर प्रतिमाके निर्माणकार्यमें आपकी
सहायता करनेके लिये यर्होँ आये है । ये मेरे बताये
अनुसार प्रतिमा अभी तैयार कर देते हें ।'
उन ब्राह्मणदेगको एेसी बात सुनकर राजा
इन्द्रद्युम्न समुद्रका तर छोडकर उनके पास चले
गये ओर वृक्षको छायामें बेदे।
ब्रह्मपुत्र मोहिनी ! तदनन्तर ब्राह्मणरूपधारी
विश्वात्मा भगवान्ने शिल्सियोमें श्रेष्ठ विश्चकर्माको
आज्ञा दी, ' तुम प्रतिमा बनाओ । उसमें श्रीकृष्णका
रूप परम शान्त हो। उनके नेत्र कमलदलके
समान विशाल होने चाहिये। वे वक्षःस्थलपर
श्रीवत्सचिह्न तथा कौस्तुभमणि ओर हा्थोमें शद्भू,
चक्र एवं गदा धारण किये हुए हों। दूसरी
प्रतिमाका विग्रह गो-दृगधके समान गौरवर्ण हो।
उसमें स्वस्तिकका चिह्न होना चाहिये । वह अपने
"हाथमे हल धारण किये हुए हां । वही महाबली
भगवान् अनन्तका स्वरूप हे। देवता, दानव,
गन्धर्व, यक्ष, विद्याधर तथा नागोने भी उनका
अन्त नहीं जाना हे, इसलिये वे “ अनन्त' कहलाते
हें । तीसरी प्रतिमा बलरामजीकी बहिन सुभद्रादेवीकी
होगी । उनके शरीरका रग सुवर्णके समान गौर
एवं शोभासे सम्पन्न होना चाहिये । उनमें समस्त
शुभ लक्षणोका समावेश होना आवश्यक है ।'
संक्षिप्त नारदपुराण
भगवान्का यह कथन सुनकर उत्तम कर्म
करनेवाले विश्चकमनि तत्काल शुभ लक्षणोसे सम्पन्न
प्रतिमा तेयार कर दीं । पहले उन्होने बलभद्रजीकौ
मूर्तिं बनायी । वे विचित्र कुण्डलमण्डित दोनों कानों
तथा चक्र एवं हलके चिहयसे युक्त हाथोसे सुशोभित
थे । उनका वर्ण शरत्कालके चन्द्रमाके समान शेत
था। नेत्रोमे कुकछ-कुछ लालिमा थी । उनका शरीर
विशाल ओर मस्तक फणाकार होनेसे विकट जान
पडता था। वे नील वस्त्र धारण किये, बलके
अभिमानसे उद्धत प्रतीत होते थे। उन्होने हाथमे
महान् हल ओर महान् मुसल धारण कर रखा था।
उनका स्वरूप दिव्य था। द्वितीय विग्रह साक्षात्
भगवान् वासुदेवका था। उनके नेत्र प्रफुल् कमलके
समान सुशोभित थे। शरीरको कान्ति नील मेघके
समान श्याम थी । वे तीसीके फूलके समान सुन्दर
प्रभासे उद्द्रासित हो रहे थे। उनके बड़े-बड़े नेत्र
कमलदलकी शोभाको छीने लेते थे। श्रीअद्धोपर
पीताम्बर शोभा पाता था। वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका
चिह्न तथा हाथोमें शद, चक्र सुशोभित थे। इस
प्रकार वे सर्वपापहारी श्रीहरि दिव्य शोभासे सम्पन्न
थे। तीसरी प्रतिमा सुभद्रादेवीको थी, जिनके देहको
दिव्य कान्ति सुवरणि समान दमक रही थी, नेत्र
कमलदलके समान विशाल थे। उनका अब्ख
विचित्र वस्त्रसे आच्छादित था। वे हार ओर केयूर
आदि आभूषणेसे विभूषित थी । इस प्रकार विश्चकर्मानि
उनको बड़ी रमणीय प्रतिमा बनायी।
राजा इन्द्रद्युप्रने यह बडी अद्धुत बात देखी
कि सब प्रतिमां एक ही क्षणमें बनकर तैयार हो
गयीं । वे सभी दो दिव्य वस्त्रोसे आच्छादित थीं।
उन सबका भोति-भातिके रन्नोसे शृङ्गार किया
गया था ओर वे सभी अत्यन्त मनोहर तथा समस्त
शुभ लक्षणोसे सम्पन्न थीं। उन्हें देखकर राजा
अत्यन्त आश्चर्यमग्र होकर बोले-" आप दोनों
ब्राह्मणके रूपमें साक्षात् ब्रह्मा ओर विष्णु तो नहीं
((-0. 1\/॥८111104/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
उत्तरभाग
६८५
हें 2 आपके यथार्थं रूपको मैं नहीं जानता।
आप दोनोंकी शरणमे आया हू, आप मुस्े अपने
स्वरूपका ठीक-ठीक परिचय दे ।'
ब्राह्मण वबोले- राजन्! तुम मुञ्जे पुरुषोत्तम
समञ्ञो। मं समस्त लोकोंको पीड़ा दूर करनेवाला
अनन्त बल-पौरुषसे सम्पन्न तथा सम्पूर्ण भृतोका
आराध्य हूं। मेरा कभी अन्त नहीं होता। जिसका
सब शास्त्रमें प्रतिपादन किया जाता है, उपनिषदोमें
जिसके स्वरूपका वर्णन मिलता हे, योगिजन जिसे
ज्ञानगम्य वासुदेव कहते हैँ, वह परमात्मायं ही हू |
स्वयं मेही ब्रह्मा, में ही शिव ओर मेही विष्णु हू।
देवताओंका राजा इन्द्र ओर सम्पूर्ण जगत्का नियन्त्रण
करनेवाला यम भी मेँ ही हूं। पृथ्वी आदि पांच भूत,
हविष्यका भोग लगानेवाले त्रिविध अग्नि, जलाधीश
वरुण, सबको धारण करनेवाली धरती ओर धरतीको
भी धारण करनेवाले पर्वत भी मेही हू। संसारे जो
कुछ भी वाणीसे कहा जानेवाला स्थावर-जद्म भूत
ठे, वह मेरा ही स्वरूप हे। सम्पूर्णं विश्वके रूपमे मुञ्च
ही प्रकट हुआ समञ्जी । मुञ्चसे भित्र कुछ भी नहीं हे।
नृपश्रेष्ठ! में तुमपर बहुत प्रसन्न हू। सुत्रत ! मुञ्चसे कोई
वर मागो । तुम्हारे हदयको जो अभीष्ट हो, वह तुम्हं
टूगा। जो पुण्यात्मा नहीं हे, उन्हें स्वप्रमे भी मेरा
दर्शन नहीं होता। तुम्हारी तो मुञ्चमें दृढ भक्ति है
इसलिये तुमने मेरा प्रत्यक्ष दर्शन किया हे।
मोहिनी ! भगवान् वासुदेवका यह वचन सुनकर
राजाके शरीरम रोमाञ्च हो आया। वे इस प्रकार
स्तोत्र-गान करने लगे-
राजाने कहा- लक्ष्मीकान्त ! आपको नमस्कार
हे । श्रीपते ! आपके दिव्य विग्रहपर पीताम्बर शोभा
पा रहा है; आपको नमस्कार है। आप श्रीद
(धन-सम्पत्तिके देनेवाले), श्रीश (लक्ष्मीक पति),
श्रीनिवास (लक्ष्मीके आश्रय) तथा श्रीनिकेतन
(लक्ष्मीके धाम) ठै; आपको नमस्कार हे। आप्
आदिपुरुष, ईशान, सवके ईश्चर, सव आर मुखवाले,
निष्कल एवं सनातन परमदेव है, मं आपको प्रणाम
करता हू। आप शब्द ओर गुणोंसे अतीत, भाव ओर
अभावसे रहित, निर्लेप, निर्गुण, सृक्ष्म, सर्वज्ञ तथा
सवके पालक हें । आपके श्री अद्भोंकी कान्ति नील
कमलदलके समान श्याम है। आप क्षीरसागरके
भीतर निवास करनेवाले तथा शेषनागकी शय्यापर
सोनेवाले हे । इन्द्रियोके नियन्ता तथा सम्पूर्णं पापोको
हर लेनेवाले आप श्रीहरिको मं नमस्कार करता हूं।
देवदेवेश्वर! आप सबको वर देनेवाले, सर्वव्यापी,
समस्त लोकोके ईश्वर, मोक्षके कारण तथा अविनाशी
विष्णु ह; मे पुनः आपको प्रणाम करता हूं।
इस प्रकार स्तुति करके राजाने हाथ जोड़कर
भगवान्को प्रणाम किया ओर विनीतभावसे धरतीपर
मस्तक टेककर् कहा-' नाथ! यदि आप मुञ्खपर
प्रसन्न ह तो मोक्षमा्गकि ज्ञाता पुरुप जिस निर्गुण,
निर्मल एवं शान्त परमपदका ध्यान करते है, साक्षात्कार
करते है, उस परम दुर्लभ पदको मम आपके प्रसादये
प्राप्त करना चाहता हूं ।'
श्रीभगवान् बोले- राजन्! तुम्हारा कल्याण
हो । तुम्हारी कही हुई सव वाते सफल हों । मेरे
प्रसादसे तुम्हें अभिलपित वस्तुक प्रापि होगी।
नृपश्रेष्ठ । तुम दस हजार नौ सौ वर्पोतक अपने
अखण्ड एवं विशाल साप्राज्यका उपभोग करो,
इसके वाद उस दिव्य पदको प्राप्त होओगे, जी
देवता ओर असुरोके लिये भी दुर्लभ है ओर जिसे
पाकर सम्पूर्ण मनोरथ पूर्णं हौ जाते ह । जो शान्त,
गृढ, अव्यक्त, अव्यय, परस्रे भी पर, सुक्ष्म,
निर्लेप, निर्गुण, ध्रुव, चिन्ता ओर शोकसे मुक्त तथा
कार्य ओर कारणसे वर्जित, जानने योग्य परम पद्
हे, उसका तुम्हें साक्षात्कार कगर्छगा । उस परमानन्दमय
पदको पाकर तुम परम गति-मोक्षको प्राप्त हो
जाओगे । राजेन्द्र! जबतक पृथ्वी ओर आकाश दै,
जवतक चन्रमा, सूयं ओर तारे प्रकाशित होति,
जवतक सात समुद्र तथा मरु आदि पर्वत मौजृद रै
((-0. 1/८1114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 6810011
६८६
संक्षिप्त नारदपुराण
तथा जवतक स्वर्गलोकमें अविनाशी देवगण सब
ओर विद्यमान हे, तवबतक इस भूतलपर सर्वत्र
तुम्हारी अक्षय कर्ति छायी रहेगी । तुम्हारे यज्ञके
घृतसे प्रकट हुआ तालाब “इन्द्रद्युप्र-सरोवर ' के
नामसे विख्यात होगा ओर उसमें एक वार भी
स्नान कर लेनेपर मनुष्य इन्द्रलोकको प्राप्त होगा।
सरोवरके दक्षिण भागमें नैऋत्य कोणकी ओर जो
वरगदका वृक्ष हे, उसके समीप केवडेके वनसे
आच्छादित एक मण्डप हे, जो नाना प्रकारके वृक्षोसे
धिरा हुआ हे। आषाढ मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको
मघा नक्षत्रम भक्तजन हमारी इन प्रतिमाओंकी सवारी
निकालेगे ओर इन्हं ले जाकर उक्त मण्डपमें सात
दिनतक रखेंगे । ब्रह्मचारी, संन्यासी, सरातक, श्रेष्ठ
ब्राह्मण, वानप्रस्थ, गृहस्थ, सिद्ध तथा अन्य द्विज
नाना प्रकारके अक्षर ओर पदवाले स्तोत्रोंसे तथा
ऋवेद, यजुर्वेद ओर सामवेदकी ध्वनिरयोसे श्रीबलराम
तथा श्रीकृष्णको बारंबार स्तुति करेगे।
भद्रे ! इस प्रकार राजाको वरदान दे ओर उनके
लिये इस लोकमें रहनेका समय निर्धारित करके
भगवान् विष्णु विश्चकमकि साथ अन्तर्धान हो
गये। उस समय राजा बडे प्रसन्न थे। उनके
शरीरम रोमाञ्च हो आया था। भगवान्के दर्शनसे
उन्होने अपनेको कृतकृत्य माना । तत्पश्चात् श्रीकृष्ण,
बलराम तथा वरदायिनी सुभद्राको मणिकाञ्चनजरित
विमानाकार रथोमे विठाकर वे वुद्धिमान् नरेश
अमात्य ओर पुरोहितके साथ मङ्गलपाठ, जय-
जयकार, अनेक प्रकारके वैदिक मन्त्रोके उच्चारण
ओर भति-भांतिके गाजे-वाजेके सहित ले आये
ओर उन्हें परम मनोहर पवित्र स्थानमें पधराया।
फिर शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र, शुभ समय ओर शुभ
मुहूर्तमें ब्राह्यणोके द्वारा उनको प्रतिष्ठा करायी ।
उत्तम प्रासाद (मन्दिर) -में वेदोक्त विधिसे आचार्यकौ
आक्चाके अनुसार प्रतिष्ठा करके विश्चकमकि द्वारा
बनाये हुए उन सब विग्रहोंको विधिवत् स्थापित
किया। प्रतिष्ठासम्बन्धी सव कार्य पूरा करके
राजाने आचार्य तथा दूसरे ऋत्विजोंको विधिपूर्वक
दक्षिणा दे अन्य लोगोंको भी धनदान किया।
तत्पश्चात् भति-भतिके सुगन्धित पुष्पोंसे तथा
सुवर्ण, मणि, मुक्ता ओर नाना प्रकारके सुन्दर
वस्त्रोसे भगवद्विग्रहोकी विधिपूर्वक पूजा करके
ब्राह्मणको ग्राम, नगर तथा राज्य आदि दान
किया। फिर कृतकृत्य होकर समस्त परिग्रहोका
त्याग कर दिया ओर वे भगवान् विष्णुके परम
धाम- परम पदको प्राप्त हो गये।
(म 3 (१५/८४
पुरुषोत्तमक्षेत्रकी यात्राका समय, मार्कण्डयेश्चर शिव, वटवृक्ष, श्रीकृष्ण, बलभद्र
तथा सुभद्राके ओर भगवान् नृसिंहके दर्शन-पूजन
आदिका माहात्म्य
मोहिनीने पृछा-- द्विजश्रेष्ठ ! पुरुषोत्तमक्षत्रकौ | कि ज्येष्ठ मासमे शुक्लपक्षको द्वादशीको विधिपूर्वक
यात्रा किस समय करनी चाहिये 2 ओर मानद!
पाचों तीर्थोका सेवन भी किस विधिसे करना
उचित है? एक-एक तीर्थके भीतर स्नान, दान
ओर देव-दर्शन करनेका जो-जो फल है, वह सव
पृथक् -पृथक् बताये ।
पुरोहित वसु बोले--श्रष्ठ मनुष्यको उचित ह
पञ्चतीर्थोका सेवन करके श्रीपुरुषोत्तमका दर्शन
करे। जो ज्येष्ठको द्वादशीको अविनाशी देवता
भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करते ह, वे विष्णुलोकमे
पहुंचकर वहसि कभी लौटकर वापस नहीं आते।
मोहिनी ! अतः ज्येष्ठं प्रयत्रपूर्वक पुरुषोत्तमक्षत्रक
यात्रा करनी चाहिये ओर वहां पञ्चतीर्थसेवनपूर्वक
((-0. 1/८11114<511॥1 81188 \/8181185। (01611010. 01411260 0 66810011
उत्नरभाग
६८७
श्रीपुरुषोत्तमका दर्शन करना चाहिये । जो अत्यन्त दूर
होनेपर भी प्रतिदिन प्रसन्रचित्त हो भगवान् |
चिन्तन करता हे, अथवा जो श्रद्धापूर्वक एकाग्रचित्त
हो पुरुषोत्तमक्षत्रमे भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनार्थं
यात्रा करता है, वह सब पापोसे मुक्त हो भगवान्
विष्णुके लोकमें जाता है। जो दूरसे भगवान्
पुरुषोत्तमके प्रासादशिखरपर स्थित नील चक्रका
दर्शन करके उसे भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हे, वह
सहसा पापसे मुक्त हो जाता हे।
मोहिनी ! अब में पञ्चतीर्थेकि सेवनको विधि
बतलाता हू, सुनो! उसके कर लेनेपर मनुष्य
भगवान् विष्णुका अत्यन्त प्रिय होता हे। पहले
मार्कण्डय-सरोवरमें जाकर मनुष्य उत्तराभिमुख हो,
तीन वार इवको लगाये ओर निम्राङ्किति मन््रका
उच्चारण करे-
संसारसागरे मग्रं पापग्रस्तमचेतनम्।
त्राहि मां भगनेत्रध्र त्रिपुरारे नमोऽस्तु ते॥
नमः शिवाय शान्ताय सर्वपापहराय च।
स्नानं करोमि देवेश मम नश्यतु पातकम्॥
(ना० उत्तर० ५५। १४-१५)
' भगके नेत्रोका नाश करनेवाले त्रिपुरनाशक
भगवान् शिव। मे संसार-सागरमं निम्र, पापग्रस्त
एवं अचेतन हूं। आप मेरी रक्षा कोजिये, आपको
नमस्कार है। समस्त पापोको दूर करनेवाले शान्तस्वरूप
शिवको नमस्कार है। देवेश्वर! मे यहो स्नान करता
हू, मेरा सारा पातक नष्ट हो जाय।'
यों कहकर बुद्धिमान् पुरुष नाभिके बरावर
जलम स्नान करनेके पथात् देवताओं ओर
ऋषियोका विधिपूर्वक तर्पण करे। फिर तिल ओर
जल लेकर पितरोंको भी तृपति करे। उसके बाद
आचमन करके शिवमान्दिरमं जाय । उसके भीतर
प्रवेश करके तीन वार देवताकी परिक्रमा करे।
तदनन्तर “मार्कण्डयेश्चराय नमः इस मृल-मन्त्रसे
शङ्करजीकी पूजा करके उन्हे प्रणाम करे ओर
निम्नाङ्धित मन्त्र पटृकर उन्हें प्रसन्न करे-
त्रिलोचन नमस्तेऽस्तु नमस्ते शशिभूषण।
त्राहि मां त्वं विरूपाक्ष महादेव नमोऽस्तु ते।।
( ना० उत्तर० ५५। १९)
"तीन नेत्रोवाले शङ्कर! आपको नमस्कार ह।
चन्द्रमाको भूषणरूपमें धारण करनेवाले! आपको
नमस्कार है। विकट नेत्रोवाले शिवजी! आप मेरी
रक्षा कीजिये। महादेव । आपको नमस्कार दहै ।'
इस प्रकार मार्कण्डेय-हृदमें सान करके भगवान्
शङ्करका दर्शन करनेसे मनुष्य अश्चमेधयज्ञोका फल
पाता है तथा सब पापोसे मुक्त हो भगवान् शिवके
लोकें जाता हे।
तत्पश्चात् कल्पान्तस्थायी वटवृक्षके पास
जाकर उसकी तीन वार परिक्रिमा करे; फिर
निग्राह्भित मन्त्रद्वारा बडे भक्तिभावके साथ उस
वटको पूजा करे-
ॐ नमोऽव्यक्तरूपाय महते नतपालिने।
महोदकोपविष्टाय न्यग्रोधाय नमोऽस्तु ते॥
अवसस्त्वं सदा कल्पे हरेश्चायतनं वट।
न्यग्रोध हर मे पापं कल्पवृक्ष नमोऽस्तु ते॥
(ना० उत्तर० ५५। २४-२५)
"जो अव्यक्तस्वरूप, महान् एवं प्रणतजनोका
पालक है, महान् एकार्णवके जलमें जिसकां
स्थिति है, उस वटवृक्षको नमस्कार है । हे वट।
आप प्रत्येक कल्पमें अक्षयरूपसे निवास करते
है । आपकी शाखापर श्रीहरिका निवास है।
न्यग्रोध! मेरे पाप हर लीजिये। कल्पवृक्ष)
आपको नमस्कार है।'
इसके वाद भक्तिपूर्वक परिक्रमा करके उस
कल्पान्तस्थायी वटवृक्षको नमस्कार करना
चाहिये। उस कल्पवृक्षकी छायाम पर्टुच जानेपर
मनुष्य ब्रह्महत्यासमे भी मुक्त हो जाता हे, फिर
अन्य पापोकी तो बात ही क्या है? ब्रद्यपुत्री
भगवान् श्रीकृष्णके अर््गसे प्रकट हए ब्रह्मतेजोपय
((-0. 1\/॥८11114/5511॥1 81188 \/81/81185। (0166101. 01411260 0\ 60810011
६८८
संक्षिप्त नारदपुराण
वटवृक्षरूपी विष्णुको प्रणाम करके मानव राजसूय
' हल धारण करनेवाले राम! आपको नमस्कार
तथा अश्चमेधयज्ञसे भी अधिक फल पाता हे | है। मुसलको आयुधरूपमे रखनेवाले! आपको
ओर अपने कुलका उद्धार करके विष्णुलोकमें
जाता हे। भगवान् श्रीकृष्णके सामने खड़े हए
गरुड्को जो नमस्कार करता हे, वह सव पापोंसे
मुक्त हो श्रीविष्णुके वैकुण्ठधाममें जाता है। जो
वटवृक्ष ओर गरुड्जीका दर्शन करनेके पश्चात्
पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, बलभद्र ओर सुभद्रादेवीका
दर्शन करता हे, वह परम गतिक प्राप्त होता हे ।
जगन्नाथ श्रीकृष्णके मन्दिरमे प्रवेश करके उनकी
तीन बार परिक्रमा करे, फिर नाम-मन्त्रसे बलभद्र
ओर सुभद्रादेवीका भक्तिपूर्वक पूजन करके निप्राङ्कित
रूपसे बलरामजीसे प्रार्थना करे-
नमस्ते हलधृग् राम नमस्ते मुसलायुध ।
नमस्ते रेवतीकान्त नमस्ते भक्तवत्सल ॥
नमस्ते बलिनां श्रेष्ठ नमस्ते धरणीधर।
प्रलम्बारे नमस्तेऽस्तु त्राहि मां कृष्णपूर्वज ॥
(ना० उत्तर्० ५८५ । ३२३-३४)
नमस्कार है। रेवतीरमण! आपको नमस्कार है।
भक्तवत्सल ! आपको नमस्कार है। बलवानोमें
शष्ठ । आपको नमस्कार हे। पृथ्वीको मस्तकपर
धारण करनेवाले शेषजी ! आपको नमस्कार है।
प्रलम्बशत्रो ! आपको नमस्कार है। श्रीकृष्णके
अग्रज! मेरी रक्षा कीजिये।'
इस प्रकार केलासशिखरके समान गोर शरीर
तथा चद्धमासे भी कमनीय श्रेष्ठ मुखवाले, नीलवस्त्रधारी,
देवपूजित, अनन्त, अनज्ञेय, एक कुण्डलसे विभूषित
ओर फणोके द्वारा विकट मस्तकवाले रोहिणीनन्दन
महावली हलधरको भक्तिपूर्वक प्रसन्न करे। एेसा
करनेवाला पुरुष मनोवाज्छित फल पाता है ओर समस्त
पापोसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके धाममें जाता हे।
बलरामजीको पूजाके पश्चात् विद्वान् पुरुष एकाग्रचित्त
हो द्वादशाक्षर-मन््र ८ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय )-
से भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे । जो धीर पुरुष
द्वादशाक्षर-मन्त्रसे भक्तिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमकौ
सदा पूजा करते है, वे मोक्षको प्राप्त होते हैँ।
मोहिनी ! देवता, योगी तथा सोमपान करनेवाले
याज्ञिक भी उस गतिको नहीं पाते, जिसे दादशाक्षर-
मन्त्रका जप करनेवाले पुरुष प्राप्त करते हें । अतः
उसी मन््रसे भक्तिमूर्वक गन्धपुष्प आदि सामप्रियाय
जगद्गुरु श्रीकृष्णको पूजा करके उन्हे प्रणाम करे।
तत्पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करे-
जय कृष्ण जगन्नाथ जय सर्वाघनाशन।
जय चाणूरकेशिक्ष जय कंसनिषूदन॥
जय पद्मपलाशाक्ष जय चक्रगदाधर।
जय नीलाम्बुदश्याम जय सर्वसुखप्रद ॥
जय देव जगत्पूज्य जय संसारनाशन।
जय लोकपते नाथ जय वाञ्छाफलप्रद॥
संसारसागरे घोरे निःसारे दुःखफेनिले।
क्रोधग्राहाकुले रौद्रे विषयोदकसम्प्लवे॥
((-0. 1\/॥(11114/5511॥1 21188 \/8/81185। (01661010. 14111260 0 66810011
उत्तरभाग
६८९
नानारोगोर्मिकलिले मोहावर्तसुदुस्तरे।
निमग्नोऽहं सुरश्रष्ठ॒त्राहि मां पुरुषोत्तम ॥
(ना० उत्तर० ५५ ४४-४८ )
"जगन्नाथ श्रीकृष्ण ! आपकी जय हो। सब
पापोंका नाश करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो
चाणूर ओर केशीके नाशक! आपकी जय हो।
कंसनाशन ! आपकी जय हो। कमललोचन ! आपकी
जय हो। चक्रगदाधर! आपकी जय हो। नील
मेघके समान श्यामवर्णं ! आपकी जय हो । सबको
सुख देनेवाले परमेश्वर ! आपकी जय हो । जगत्पूज्य
देव ! आपकी जय हो । संसार संहारक आपकी
जय हो। लोकपते! नाथ! आपकी जय हो।
मनोवाञ्छित फल देनेवाले देवता। आपको जय
हो । यह भयंकर संसार-सागर सर्वथा निःसार हे।
इसमें दुःखमय फेन भरा हुआ है । यह क्रोधरूपी
ग्राहसे पूर्णं है। इसमें विषयरूपी जलराशि भरी हुई
ठे । भोति-भातिके रोग ही इसमें उठती हुई लहर
हे । मोहरूपी भंवरोके कारण यह अत्यन्त दुस्तर जान
पड़ता हे । सुरश्रेष्ठ ! मे इस संसाररूपी घोर समुद्रम
डूवा हुआ हू। पुरुषोत्तम! मेरी रक्षा कौजिये।'
मोहिनी । इस प्रकार प्रार्थना करके जो देवेश्वर,
वरदायक, भक्तवत्सल, सर्वपापहारी, द्युतिमान्,
सम्पूर्णं कमनीय फलोके दाता, मोटे कंधे ओर दो
भुजाओंवाले, श्यामवर्ण, कमलदलके समान विशाल
नेत्रोवाले, चौडी छाती, विशाल भुजा, पीत वस्त्र
ओर सुन्दर मुखवाले, शद्क-चक्र-गदाधर, मुकुटाङ्गद-
भूषित, समस्त शुभलक्षणोसे युक्त ओर वनमाला-
विभूषित भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करके हाथ
जोड़कर उन्हें प्रणाम करता है, वह हजारों
अश्वमेध यज्ञोका फल पाता है। सव ती्थमिं स्नान
ओर दान करनेका अथवा सम्पूर्ण वेदोके स्वाध्याय
तथा समस्त यज्ञोके अनुष्टानका जो फल है
उसीको मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन ओर
प्रणाम करके पालेताहै। सव प्रकारके दान, व्रत
ओर नियमोंका पालन करके मनुष्य जिस फलको
पाता हे, अथवा ब्रह्मचर्य -त्रतक्रा विधिपूर्वक पालन
करनेसे जो फल बताया गया है, उसी फलको
मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन ओर प्रणाम
करके प्राप्त कर लेता हे। भामिनि! भगवदर्शनके
माहात्म्यके सम्बन्धे अधिक कहनेकी क्या
आवश्यकता ? भगवान् श्रीकृष्णका भक्तिपूर्वक दर्शन
करके मनुष्य दुर्लभ मोक्षतक प्राप्त कर लेता हे।
ब्रह्मकुमारी मोहिनी ! तदनन्तर भर्तोपर स्नेह
रखनेवाली सुभद्रादेवीका भी नाम-मन्त्रसे पूजन
करके उन्हे प्रणाम करे ओर हाथ जोड़कर इस
प्रकार प्रार्थना करे-
नमस्ते सर्वगे देवि नमस्ते शुभसौख्यदे ।
त्राहि मां पदापत्राक्षि कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥
(का० उर्तर० ~^ 1 ६७)
"देवि! तुम सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली ओर शुभ
सौख्य प्रदान करनेवाली हो। तुम्हं बारम्बार नमस्कार
हे। पदयपत्रेकि समान विशाल नेत्रोवाली कात्यायनी-
स्वरूपा सुभद्रे! मेरी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है।'
इस प्रकार सम्पूर्णं जगत्को धारण करनेवाली
लोकहितकारिणी, वरदायिनी एवं कल्याणमयी बल-
भद्रभगिनी सुभद्रादेवीको प्रसन्न करके मनुष्य इच्छानुसार
चलनेवाले विमानके द्वारा श्रीविष्णुलोकमें जाता हे।
इस प्रकार बलराम, श्रीकृष्ण ओर सुभद्रादेवीको
प्रणाम करके भगवान्के मन्दिरसे बाहर निकले ।
उस समय मनुष्य कृतकृत्य हो जाता ह । तत्पश्चात्
जगन्नाथजीके मन्दिरको प्रणाम करके एकाग्रचित्त
हो उस स्थानपर जाय जहां भगवान् विष्णुकौ
इन्द्रनीलमयी प्रतिमा बालके भीतर छिपी है । वहां
अदृश्यरूपसे स्थित भगवान् पुरुषोत्तमको प्रणाम
करके मनुष्य श्रीविष्णुके धामे जाता है। देवि।
जौ भगवान् सर्वदेवमय हैं, जिन्टोने आधा शरीर
सिंहका बनाकर हिरण्यकशिपुका उद्धार किया था,
वे भगवान् नृसिंह भी पुरुपोत्तमतीरथमें नित्य निवास
((-0. 1\/॥८11114/5511॥ 81188 \/8181185। (01661101. 01411260 0 66810011
६९०
करते हं। शुभे! जो भक्तिपूर्वकं उन भगवान्
नृसिंहदेवका दर्शन करके उन्हें प्रणाम करता है,
वह मनुष्य समस्त पातकोंसे मुक्त हो जाता हे। जो
मानव इस पृथ्वीपर भगवान् नृसिंहके भक्त होते
हे, उन्ठं कोई पाप छू नहीं सकता ओर मनोवाज्छित
फलक प्राप्ति होती है। अतः सब प्रकारसे यतर
करके भगवान् नृसिंहको शरण ले; क्योकि वे
धर्म, अर्थ, काम ओर मोक्षसम्बन्धी फल प्रदान
करते हें । ब्रह्मपुत्री ! अतः सम्पूर्णं कामनाओं ओर
फलोके देनेवाले महापराक्रमी श्रीनसिंहदेवको सदा
भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये । ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वेश्य, स्त्री, शूद्र ओर अन्त्यज आदि सभी मनुष्य
भक्तिभावसे सुरश्रेष्ट भगवान् नृसिंहको आराधना
करके करोड़ों जन्मोके अशुभ एवं दुःखसे छुटकारा
पा जाते हं। विधिनन्दिनी! में अजित, अप्रमेय
तथा भोग ओर मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान्
नृसिंहका प्रभाव बतलाता हू सुनो ! सुव्रते ! उनके
समस्त गुणोका वर्णन कौन कर सकता ठै 2 अतः
मे भी श्रीनृसिंहदेवके गुणोका संक्षेपसे ही वर्णन
करूगा। इस लोकमें जो कोई दैवी अथवा मानुषी
सिद्धि्यां सुनी जाती है, वे सब भगवान् नृसिंहके
प्रसादसे ही सिद्ध होती हें । भगवान् नृसिंहदेवके
कृपाप्रसादसे स्वर्ग, मर्त्यलोक, पाताल, अन्तरिक्ष,
जल, असुरलोक तथा पर्वत-इन सब स्थानोमें
मनुष्यको अबाध गति होती है। सुभगे! इस
सम्पूर्णं चराचर जगत्मं कोई भी एेसी वस्तु नहीं
हे, जो भक्तोंपर निरन्तर कृपा करनेवाले भगवान्
नृसिंहके लिये असाध्य हो।
अव में श्रीनृसिंहदेवके पूजनकी विधि बतलाता
हु, जो भक्तोके लिये उपकारक है, जिससे वे
भगवान् नृसिंह प्रसन्न होते हे । भगवान् नृसिंहका
यथार्थं तत्तव देवताओं ओर असुरोंको भी ज्ञात नहीं
टे । उत्तम साधकको चाहिये कि साग, जौकी
लपसी, मूल, फल, खली अथवा सत्तूसे भोजनक
संक्षिप्त नारदपुराण
आवश्यकता पूरी करे अथवा भद्रे! दूध पीकर
रहे। घास-फूस या कौपीनमात्र वस्त्रसे अपने
शरीरको ढक ले । इन्दरियोको वशमें करके (भगवान्
नृसिंहके) ध्यानमें तत्पर रहे। वनमें, एकान्त
प्रदेशमे, नदीके सङ्गम या पर्वतपर, सिद्धिक्षेत्रमे,
ऊसरमें तथा भगवान् नृसिंहके आश्रममें जाकर
अथवा ज्हो-कहीं भी स्वयं भगवान् नृसिंहकी
स्थापना करके जो विधिपूर्वक उनक पूजा करता
हे, देवि! वह उपपातक हो या महापातकी, उन
समस्त पातकोंसे वह साधक मुक्त हो जाता हे।
वहां नृसिंहजीकी परिक्रमा करके उनकी गन्ध,
पुष्प ओर धूप आदि सामग्रियोद्रारा पूजा करनी
चाहिये । तत्पश्चात् धरतीपर मस्तक टेककर भगवानूको
प्रणाम करे ओर कर्पूर एवं चन्दन लगे हुए
चमेलीके फूल भगवान् नृसिंहके मस्तकपर चढावे।
इससे सिद्धि प्राप्त होती हे । भगवान् नृसिंह किसी
भी कार्यम कभी प्रतिहत नहीं होते। नृसिंह-
कवचका एक वार जप करनेसे मनुष्य आगक
लपटद्वारा सम्पूर्ण उपद्र्वोका नाश कर सकता हे ।
तीन वार जप करनेपर वह दिव्य कवच दैत्यों ओर
दानवोसे रक्षा करता है । तीन बार जप करके सिद्ध
किया हुआ कवच भूत, पिशाच, राक्षस, अन्यान्य
लुटेरे तथा देवताओं ओर असुरोके लिये भी
अभेद्य होता हे । ब्रह्यपुत्री मोहिनी ! सम्पूर्णं कामनाओं
ओर फलके दाता महापराक्रमी नृसिंहजीकी सदा
भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। शुभे! भगवान्
नृसिंहका दर्शन, स्तवन, नमस्कार ओर पूजन करके
मनुष्य राज्य, स्वर्ग तथा दुर्लभ मोक्ष भी प्राप्त कर
लेते है । भगवान् नृसिंहका दर्शन करके मनुप्यको
मनोवाज्छित फलको प्राति होती है तथा वह
सव पापोँसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकम
जाता है। जो भक्तिपूर्वक नृसिंहरूपधारी भगवानूका
एक वार भी दर्शन कर लेता है, वह मन, वाणी
ओर शरीरद्रारा होनेवाले सम्पूर्णं पातकोंसे मुक्त
((-0. 1\॥८111104/5511॥1 81188 \/81/81185। (01661011. 01411260 0 6810011
उत्तरभाग ६९१
प्रकार भगवान् नृसिंहका दर्शन होनेपर सब प्रकारके
उपद्रव मिट जाते हें। भगवान् नृसिंहके प्रसन्न
होनेपर गुटिका, अञ्जन, पातालप्रवेश, पैरोमें लगाने
योग्य दिव्यलेप, दिव्य रसायन तथा अन्य मनोवाच्छित
हो जाता है। दुर्गम संकटमें, चोर ओर व्याघ्र
आदिक पीड़ा उपस्थित होनेपर, दुर्गम प्रदेशमे,
प्राणसंकटके समय, विष,अग्रि ओर जलसे भय
होनेपर, राजा आदिसे भय प्राप्त होनेपर, घोर
संग्राममे ओर ग्रह तथा रोग आदिक पीडा प्राप्त
होनेपर जो पुरुष भगवान् नृसिंहका स्मरण करता
हे, वह संकटोसे छूट जाता है। जेसे सूर्योदय
होनेपर भारी अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी
पदार्थं भी मनुष्य प्राप्त कर लेता हे। मानव जिन-
जिन कामनाओंका चिन्तन करते हुए भगवान्
नृसिंहका भजन करता हे, उन-उनको अवश्य
प्राप्त कर लेता है।
श्चेतमाधव, मत्स्यमाधव, कल्पवृक्ष ओर अष्टाक्षर-मन्र, स्नान,
तर्पण आदिक महिमा
पुरोहित वसु कहते है - महाभागे ! उस
पुरुपोत्तमक्षेत्रमे तीर्थोका समुदायरूप एक दूसरा
तीर्थं हे जो परम पुण्यमय तथा दर्शनमात्रसे
पापोंका नाश करनेवाला है, उसका वर्णन करता
हू, सुनो। उस तीर्थके आराध्य है-- अनन्त नामक
वासुदेव । उनका भक्तिपूर्वक दर्शन ओर प्रणाम
करके मनुष्य सब पापोँसे मुक्त हो परम पदको
प्राप्त होता है। जो मनुष्य धेतगङद्धामें स्नान करके
श्रेतमाधव तथा मत्स्यमाधवका दर्शन करता है
वह शेतद्रीपमें जाता है । जो हिमके